सोमवार, 26 जुलाई 2021

आज की आवश्यकता है 'भारत जोड़ो आंदोलन'

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में देश के नागरिकों से महत्वपूर्ण आह्वान किए हैं। प्रधानमंत्री की पहल पर समूचा देश स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूर्ण होने पर 'आजादी का अमृत महोत्सव' मना रहा है। देश के ऐसे बलिदानियों को याद किया जा रहा है, जिन्हें इतिहास की पुस्तकों या अन्यत्र वह स्थान नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था। इस उत्सव को और अधिक विस्तार देने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री मोदी ने अपील की है कि यह किसी राजनीतिक दल या सरकार का आयोजन नहीं है बल्कि यह सभी भारतवासियों का कार्यक्रम है। इसलिए सभी लोगों को अमृत महोत्सव से जुडऩा चाहिए और महापुरुषों का स्मरण करें। यकीनन जब हम अपने महापुरुषों को याद करेंगे, तब उनके व्यक्तित्व के साथ उनका कृतित्व का स्मरण भी करेंगे, जो हमें गौरव की अनुभूति से भरेगा। साथ ही यह भी ध्यान आएगा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए हमने कितना संघर्ष किया है। स्वतंत्रता का मूल्य क्या है? अपने महापुरुषों का स्मरण करेंगे तब हम भारत, भारतीयता और भारतीय मूल्यों के अधिक नजदीक भी जाएंगे। 

'मन की बात' के 79वें संस्करण में प्रधानमंत्री मोदी ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण और सामयिक आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि "बात जब आजादी के आंदोलन और खादी की हो तो पूज्य बापू का स्मरण होना स्वाभाविक है। जैसे बापू के नेतृत्व में 'भारत छोड़ो आंदोलन' चला था, वैसे ही आज हर देशवासी को 'भारत जोड़ो आंदोलन' का नेतृत्व करना है"। 'भारत जोड़ो आंदोलन' यदि जनांदोलन बन जाता है तब उसके अनेक सुखद परिणाम आएंगे। पहला, अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत जिस तेजी और मजबूती से आगे बढ़ रहा है, उसमें भारत की स्थिति और सशक्त होगी। दूसरा, भारत में सक्रिय 'ब्रेकिंग इंडिया ब्रिगेड' के मनसूबे ध्वस्त होंगे और भारत आंतरिक तौर पर और अधिक शक्तिशाली हो जाएगा। यह आंतरिक शक्ति भारत को प्रत्येक क्षेत्र में मजबूत करेगी। 

पिछले कुछ समय को गौर से देखें तो ऐसी अनेक भारत विरोधी ताकतें सक्रिय हैं, जो वर्ग, जाति, संप्रदाय एवं अन्य प्रकार के संघर्ष उत्पन्न करने की साजिशें रच रही हैं। उन उसको मुंहतोड़ जवाब देने के लिए 'भारत जोड़ो आंदोलन' की अनिवार्यता नजर आ रही है। भारत को स्वतंत्र कराने के लिए महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के विरुद्ध 'भारत छोड़ो आंदोलन' खड़ा किया। आज उसी स्वतंत्रता को मजबूत करने के लिए भी 'भारत जोड़ो आंदोलन' की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री मोदी के इस आह्वान के साथ सभी देशवासियों को जुडऩा चाहिए और इस आंदोलन को ऐतिहासिक रूप देकर भारत को मजबूत बनाने में अपनी भूमिका का निर्वाहन करना चाहिए। 

बुधवार, 21 जुलाई 2021

भारत की संस्कृति के साक्षी

भारत की मूल संस्कृति क्या है? इसको लेकर दिग्भ्रिमित करने वाले अनेक विमर्श चलते रहते हैं। एक शायर ने तो यहाँ तक कह दिया कि यहाँ सब किराएदार हैं, कोई मकान मालिक नहीं। उनके कहने का आशय यही था कि भारत में अलग-अलग समय में लोग आते गए और बस गए। भारतीय मूल का कोई नहीं है। दरअसल, वे आर्य-द्रविणवाली कपोल कल्पना के लिए गढ़े गए झूठ के या तो वाहक थे या फिर उसके फेर में फंस गए होंगे। भारत के मूल लोग कौन थे, उनकी संस्कृति क्या थी, जीवन पद्धति क्या थी, धर्म क्या था, यह सब कोई शायर नहीं बता सकता, बल्कि भारत की मिट्टी इसका स्वयं जवाब देती है कि उसमें किसका रक्त शामिल है। अयोध्या से लेकर मथुरा, राखीगढ़ी से लेकर उज्जैन तक खुदाई में भारतीय संस्कृति के प्रमाण मिलते हैं।

शनिवार, 17 जुलाई 2021

बेहतर जीवन के लिए आवश्यक है जनसंख्या नियंत्रण

उत्तरप्रदेश की योगी सरकार देश में सर्वाधिक जनसंख्या वाले प्रदेश के लिए जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने जा रही है। 11 जुलाई को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तरप्रदेश जनसंख्या विधेयक-2021 के मसौदे के बारे में स्वयं लोगों को जानकारी दी। दरअसल, विपक्षी राजनीतिक एवं उनके सहयोगी बुद्धिजीवी अत्यंत आवश्यक कानून को भी सांप्रदायिक रंग देने का प्रयास करने लगे थे। तथाकथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी वर्ग का दोगलापन एवं पाखंड अब खुलकर सामने आ गया है। उत्तरप्रदेश जनसंख्या विधेयक किसी एक संप्रदाय की जनसंख्या को रोकने का एजेंडा नहीं है। यह कानून सब पर एक समान रूप से लागू होगा। यह कानून किसी विशेष संप्रदाय को लक्षित करके तैयार नहीं किया गया है। इसके बावजूद विपक्षी नेता एवं अन्य लोग जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास को मुुस्लिम विरोधी बता रहे हैं। जबकि यही लोग यह दावा भी करते हैं कि मुस्लिमों की जनसंख्या दर में हिन्दुओं की अपेक्षा कमी आई है। यानी अब मुस्लिम भी सात-आठ बच्चे पैदा नहीं कर रहे बल्कि वे भी हम दो-हमारे दो की अवधारणा पर चल रहे हैं। जब यह सच है कि मुसलमानों ने आधुनिक सोच के साथ कदमताल करना शुरू कर दिया है, तब यह कानून उनके विरुद्ध कैसे हो सकता है?

कोरोना संक्रमण की तीसरी लहर चिंता


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोरोना संक्रमण की तीसरी आवृत्ति (तीसरी लहर) को लेकर चिंता जताई है। संक्रमण की दूसरी आवृत्ति से पहले जिस तरह के संकेत मिले थे, ठीक वैसे ही संकेत इस समय देश के विभिन्न राज्यों में देखे जा रहे हैं। महाराष्ट्र, केरल, ओडिशा, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में पिछले कुछ समय से कोरोना संक्रमण के नये मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। महामारी की दूसरी आवृत्ति से पूर्व भी इन राज्यों में संक्रमण बढ़ा था। देश के अन्य राज्यों में भले ही स्थितियां नियंत्रित दिख रही हैं, लेकिन खतरा बरकरार है। कोरोना संक्रमण को एक राज्य से दूसरे राज्य में फैलने में अधिक समय नहीं लगता है। हमने दूसरी आवृत्ति में स्थितियों को अचानक से भयावह और अनियंत्रित होते हुए देखा है। केंद्र सरकार ने तब भी राज्यों को चेताया था और जरूरी प्रबंध करने के निर्देश दिए थे लेकिन तब सरकारें ही नहीं, आम नागरिक भी गफलत में चले गए थे। सबकी मिला-जुली लापरवाही के कारण परिस्थितियां बहुत बिगड़ गई थीं। सरकारों को ही नहीं, अपितु नागरिकों को भी दूसरी लहर के पीड़ादायक परिणामों से सबक लेने की आवश्यकता है।

शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

समान नागरिक संहिता की आवश्यकता


देश में लंबे समय से समान नागरिक संहिता की माँग हो रही है, लेकिन वोटबैंक की राजनीति करने वालों ने इस मामले को मुस्लिम समुदाय से जोड़कर अत्यधिक संवेदनशील बना दिया है। मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति का ही असर है कि देश में सबके लिए समान नागरिक संहिता नहीं है, जबकि संविधान में इसका आग्रह किया गया है। समान नागरिक संहिता नहीं होने से सर्वाधिक नुकसान उसी मुस्लिम संप्रदाय का है, जिसके नाम पर समान नागरिक संहिता का विरोध किया जाता है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने समान नागरिक संहिता पर महत्वपूर्ण टिप्पणी कर लंबे समय से चली आ रही माँग को तेज कर दिया है। मीणा जनजाति की एक महिला और उसके पति के बीच तलाक के प्रकरण की सुनवाई के दौरान दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि देश में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता है और इसे लाने का यही सही समय है। उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से इस मामले में जरूरी कदम उठाने को कहा है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि भारतीय समाज में जाति, धर्म और समुदाय से जुड़े अंतर समाप्त हो रहे हैं। इस बदलाव की वजह से दूसरे धर्म और दूसरी जातियों में शादी करने और फिर तलाक होने में दिक्कतें आ रही हैं। आज की युवा पीढ़ी को इन दिक्कतों से बचाने की जरूरत है। इस समय देश में समान नागरिक संहिता होनी चाहिए। अनुच्छेद-44 में समान नागरिक संहिता को लेकर जो बात कही गई है, उसे हकीकत में बदलना होगा। 

उच्च न्यायालय की टिप्पणी के बाद जैसा कि तय था- देश में स्वयं को सेकुलर एवं संविधान हितैषी कहलाने वाला वर्ग समान नागरिक संहिता के विरोध में उतर आया। बुद्धिजीवियों का यह वर्ग आज तक इस बात को नहीं समझा सका है कि समान नागरिक संहिता भला किस प्रकार से किसी संप्रदाय के विरुद्ध हो सकती है? एक तरफ यह वर्ग संविधान से देश चलना चाहिए, इस बात की रट लगाता है, वहीं दूसरी ओर अनेक विषयों में संविधान को दरकिनार करना चाहता है। यह दकियानूसी सोच उस समय भी सक्रिय हो गई थी, जब बाबा साहेब डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर देश की आधी आबादी (महिलाओं) को उनके अधिकार देने के लिए समान नागरिक संहिता का विधेयक प्रस्तुत करना चाहते थे। विरोध को देखते हुए डॉ. अंबेडकर ने प्रस्ताव किया कि समान नागरिक संहिता पर एक राय बनाकर उचित समय पर इसे लागू किया जाना चाहिए। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि आज तक इस पर एक राय नहीं बन सकी है। अब तक सत्ता के केंद्र में रहे राजनीतिक दलों ने कभी इस दिशा में आम सहमति बनाने के प्रयास भी नहीं किए। बल्कि उन्होंने तो इस माँग को वोटबैंक की राजनीति का माध्यम बना लिया। 

उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व सर्वोच्च न्यायालय भी समान नागरिक संहिता लागू करने की बात कह चुका है। उस समय तो अल्पसंख्यक समुदाय (ईसाई) के एक व्यक्ति ने ही सर्वोच्च न्यायालय में याचिका लगाई थी कि एक देश में अलग-अलग कानून क्यों हैं? विरोध करने वाले कूपमंडूकों को समझना चाहिए कि समान नागरिका संहिता सबको समान अधिकार देगी। इसलिए इसका स्वागत किया जाना चाहिए। केंद्र सरकार से अपेक्षा है कि वह जल्द ही इस दिशा में आवश्यक कदम उठाए। 

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रविवार, 11 जुलाई 2021

अपना शहर-अपने लोग

देखें वीडियो : ग्वालियर तू बहुत याद आता है | Gwalior


गोपाचल पर्वत पर शान से खड़ा

आसमान का मुख चूमता 'दुर्ग'

नदीद्वार, ज्येन्द्रगंज, दौलतगंज

नया बाजार से कम्पू को आता रास्ता

वहां बसा है मेरा प्यारा घर

मुझे बहुत भाता है 

ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है। 


सात भांति के वास्तु ने संवारा

सबको गोल घुमाता 'बाड़ा' 

दही मार्केट में कपड़ा, टोपी बाजार में जूता

गांधी मार्केट में नहीं खादी का तिनका

पोस्ट ऑफिस के पीछे नजर बाग मार्केट में 

मेरा दोस्त कभी नहीं जाता है

ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है। 


सन् 1857 के वीरों की विजय का गवाह

शहर की राजनीति का बगीचा 'फूलबाग'

बाजू से निकला स्वर्णरेखा नाला

कईयों को कर गया मालामाल

नए-नए बने चौपाटी की चाट खाने

शाम को सारा शहर जाता है

ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है। 


चाय की दुकान, कॉलोनी का चौराहा

यहां सजती हैं दोस्तों की महफिल

देश की, विदेश की, आस की, पड़ोस की

बातें होती दुनिया जहांन की

मां की ममता, पिता का आश्रय 

बहन का दुलार, पत्नी का प्यार बुलाता है

ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है। 


- लोकेन्द्र सिंह -

(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)

मंगलवार, 6 जुलाई 2021

सबर कर...

देखें वीडियो : सबर कर | ये वक्त गुजर जायेगा | Ye Waqt Guzar Jayega



ये वक्त गुजर जाएगा तू जरा सबर कर

ये हकीकत है तू खुशी से बसर कर।


कलयुग है भाई बहुत काजल है फैला

दाग न लगे दामन पर, तू फिकर कर। 


चरैवेति में असली मजा है ठहराव तो सजा है

मंजिल है दूर, हौसला रख, तू सफर कर।


बहुत मौका परस्त है ये जमाना लोकेन्द्र

कौन दोस्त-दुश्मन, तू जरा ये खबर कर।


दरियादिली से दुश्मन की हिमाकत बढ़ रही है

अदब से रहेगा वो, तू जरा तिरछी नजर कर।


- लोकेन्द्र सिंह -
(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)

सोमवार, 28 जून 2021

टीकाकरण में मध्यप्रदेश का कीर्तिमान

CoWIN Portal से प्राप्त आंकड़े

मध्यप्रदेश की सरकार और जनता ने वह काम कर दिखाया है, जिसकी वर्तमान समय में अत्यधिक आवश्यकता है। मध्यप्रदेश में कोरोना टीकाकरण को लेकर समाज में जिस प्रकार की जागरूकता आई है, उससे कोरोना महामारी को हराने एवं संक्रमण की तीसरी आवृत्ति को रोकने में सफलता मिलने की संभावना बढ़ गई है। 21 जून से प्रारंभ हुए कोरोना टीकाकरण महाभियान के अंतर्गत मध्यप्रदेश के नागरिक लगातार कीर्तिमान रच रहे हैं। टीकाकरण महाभियान के पहले दिन ही 21 जून को मध्यप्रदेश में मात्र 10 घंटे में लगभग 16 लाख 95 हजार लोगों को टीका लगाने का इतिहास रच दिया था। उस दिन मध्यप्रदेश टीकाकरण में देश के अन्य सभी राज्यों से बहुत आगे खड़ा था। इतना ही नहीं, अभी तक एक दिन में इतनी संख्या में दुनिया के किसी भी शहर में टीकाकरण नहीं हुआ है। मध्यप्रदेश की इस उपलब्धि को वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज किया गया है। 

अच्छी बात यह है कि मध्यप्रदेश के नागरिक यह रिकॉर्ड अपने नाम करके रुक नहीं गए, बल्कि उसके बाद भी टीकाकरण को लेकर प्रदेश में उत्साह का वातावरण है। महाभियान के अंतर्गत 23 जून को मध्यप्रदेश में 11 लाख 37 हजार 888 लोगों को टीका लगाया गया, उस दिन भी मध्यप्रदेश टीकाकरण में शीर्ष पर रहा। जबकि 24 जून को 7 लाख 48 हजार 611 लोगों ने टीकाकरण कराया। वहीं, 26 जून को टीकाकरण में मध्यप्रदेश ने फिर कीर्तिमान रचा। इस दिन प्रदेश में 10 लाख 719 लोगों को कोरोनारोधी टीका लगाया गया। कुल मिलाकर टीकाकरण महाभियान में मध्यप्रदेश लगातार देश-दुनिया में शीर्ष पर बना हुआ है। 

विपक्षी राजनीतिक दलों एवं उनके सहयोगी बुद्धिजीवियों द्वारा अनेक प्रकार के भ्रम उत्पन्न करने के बाद भी टीकाकरण को लेकर मध्यप्रदेश में जो विश्वास और उत्साह का वातावरण बना है, उसके पीछे कहीं न कहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनकी सरकार की सक्रियता एवं उसके प्रति जनता का विश्वास है। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने महाभियान से पूर्व टीकाकरण के प्रति जनजागरण, उत्साह एवं विश्वास का वातावरण बनाने के लिए संपूर्ण समाज का सहयोग माँगा। उन्हें समाज का सहयोग मिला भी। सामान्य नागरिकों से लेकर प्रभावशाली लोगों ने टीकाकरण के प्रति लोगों को प्रेरित करने का जो सामाजिक दायित्व निभाया, उसकी सराहना करनी होगी। प्रदेश के जिम्मेदार नागरिकों को यह दायित्व तब तक निभाना है, जब तक कोरोना पूरी तरह समाप्त न हो जाए। याद रखें कि कोरोना के विरुद्ध हम प्रत्येक लड़ाई को जनजागरूकता से ही जीत सकते हैं। 

मध्यप्रदेश में कोरोना के मामले एक हजार से भी कम हो गए हैं। 35 जिलों में एक भी नया मामला सामने नहीं आया है। वहीं, विगत सात दिनों से संक्रमण की दर 0.1 प्रतिशत है। इसके बाद भी हमें अभी सावधानी छोडऩी नहीं है। हमें स्वयं तो कोरोना नियमों का पालन करना है, अपने आसपास भी अन्य लोगों को सचेत करते रहना है। कोरोना महामारी की पहली लहर हो या फिर उसकी पुनरावृत्ति, दोनों ही अवसरों पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एवं उनकी सरकार ने जिस सक्रियता से काम किया, उसकी सराहना राजनीतिक स्वार्थ, विचारधारा एवं असहमतियों से ऊपर उठकर की जानी चाहिए। उम्मीद है कि प्रदेश में जागरूकता का यह वातावरण बना रहेगा।

शनिवार, 19 जून 2021

झूठ के सहारे सांप्रदायिक तनाव की साजिश

गाजियाबाद में ‘जय श्रीराम’ नहीं कहने पर एक मुस्लिम बुजुर्ग के साथ मारपीट की गई और उसकी दाढ़ी काट दी गई। इस आशय का एक वीडियो वायरल कर देश की तथाकथित सेकुलर बिरादरी ने एक बार फिर भारत और हिन्दू धर्म पर हमला बोल दिया। देश में सांप्रदायिक तनाव पैदा करने के उद्देश्य से फैलाए गए इस झूठ को उन तथाकथित पत्रकारों एवं वेबसाइट्स ने भी साझा किया, जो स्वयं को ‘फैक्ट-चेकर’ (Fact Checker) बताते हैं। ‘कौव्वा कान ले गया’ की तर्ज पर विपक्षी दलों के नेता लोग भी इस झूठ को ले उड़े। मानो कि हिन्दू समाज को कठघरे में खड़ा करने के लिए ये लोग तैयार बैठे रहते हैं। गाजियाबाद पुलिस ने तत्काल मामले की पड़ताल कर यह स्पष्ट कर दिया कि यह आपसी विवाद का मामला है और उसमें आरोपी सिर्फ हिन्दू नहीं है बल्कि तीन मुस्लिम (आरिफ, आदिल और मुशाहिद) भी पकड़े गए हैं, जिन्होंने बुजुर्ग के साथ मारपीट की और कथित तौर पर उसकी दाढ़ी काटी। अब भला मुस्लिम लोग ही मुस्लिम बुजुर्ग को ‘जय श्रीराम’ नहीं कहने पर क्यों पीटेंगे? हिन्दू ऐसा करेंगे, यह सवाल ही बेकार है। अब तक इस तरह के जितने भी मामले आये हैं, वे फर्जी निकले या उनका सच कुछ और था। 

बुधवार, 16 जून 2021

मुंह की खाएगा रामद्रोही वर्ग


जब ऋषि-मुनि समाज कल्याण के उद्देश्य के साथ यज्ञ-हवन करते थे, तब पुनीत कार्य में बाधा उत्पन्न करने के लिए राक्षस अनेक प्रकार के धतकर्म करते थे। प्राचीन ग्रंथों में अनेक स्थानों पर इस प्रकार का वर्णन आता है। समय बदल गया, परिस्थितियां बदल गईं, लेकिन राक्षस कर्म वैसा का वैसा ही है। देश में कुछ ताकतें ऐसी हैं, जो वर्षों से रामकाज में बाधा उत्पन्न करने के भरसक प्रयास करती आ रही हैं।

पहले इन ताकतों ने यह सिद्ध करने के लिए पूरा जोर लगा लिया कि अयोध्या में श्रीराम का कोई मंदिर नहीं था। जब लगा कि इनके झूठ चल नहीं रहे तो न्यायालय में जाकर सुनवाई को टालने के प्रयास किए। इस काम में भी जब सफलता मिलती नहीं दिखी तो कहने लगे कि मंदिर की जगह अस्पताल या स्कूल बनाना चाहिए। परंतु, न्यायालय से लेकर समाज तक ने एकजुटता से राक्षसों की मंशा को पूरा नहीं होने दिया। जब सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण के पक्ष में निर्णय दिया और वहाँ मंदिर निर्माण की प्रक्रिया आगे बढऩे लगी, तब इस ‘रामद्रोही वर्ग’ के कलेजे पर खूब सांप लौटे। मंदिर निर्माण में समाज के सहयोग और उत्साह को देखकर उन्हें बहुत पीड़ा हुई। जब रामभक्तों ने अपने प्रभु के भव्य मंदिर के लिए दिल खोलकर समर्पण किया, तब भी रामद्रोही वर्ग को बहुत कष्ट हुआ। उन्होंने उस समय भी भरपूर प्रयास किए कि लोग श्रीराममंदिर निर्माण के लिए दान न दें। लेकिन, समाज ने तब भी उनकी नहीं सुनी। 

अधम गति को प्राप्त हो चुका यह वर्ग अभी भी बेशर्मी से श्रीराम मंदिर के पुनीत कार्य को बदनाम करने के प्रयासों में लगा हुआ है। इस पृष्ठभूमि से आप समझ गए होंगे कि श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए कथित ‘जमीन घोटाले’ के पीछे कौन-सी मानसिकता एवं षड्यंत्र है। जिन्होंने यह प्रयास किए कि श्रीराम मंदिर के निर्माण के लिए लोग दान न दें, वे आज ‘रामधन’ को लेकर चिंतित होने की नौटंकी कर रहे हैं। जिन्होंने न्यायालय में हलफनामा दिया कि राम का कोई अस्तित्व नहीं है तथा राम काल्पनिक थे, वे आज ‘रामनाम’ ले रहे हैं। ऐसे में उनके पाखंड को समझना किसके लिए कठिन है। दरअसल, रामद्रोही वर्ग नहीं चाहता कि देश के स्वाभिमान से जुड़े पुनीत स्मारक का निर्माण निश्कलंक और निर्विघ्न सम्पन्न हो। वह अभी तक श्रीराम को स्वीकार नहीं कर सका है। 

देखें - अयोध्या में मंदिर बनेगा धूम-धाम से :

श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट की ओर से श्रीमान चंपत राय जी ने समूची सच्चाई को प्रकट कर दिया है, लेकिन धूर्त अभी भी नहीं मानेंगे। क्योंकि उनका तो काम ही है, धूल का गुब्बार उड़ाकर लोगों के सामने धुंध उपस्थित करना और खुद दूर खड़े होकर तमाशा देखना। परंतु, वे भूल गए कि यह रामकाज है, यहाँ उनकी धूर्तता चलने वाली नहीं। जिन्होंने श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए समर्पण किया है, उन्हें भली प्रकार पता है कि उनकी एक-एक पाई का उपयोग ‘रामकाज’ में होगा। यह निश्चित है कि राष्ट्रनिर्माण के यज्ञ में विघ्न पैदा करने का काम कर रहीं राक्षसी मानसिकता कभी सफल नहीं हो सकती।    

अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण से जुड़े कथित ज़मीन घोटाले का सच जानने के लिए देखें ये समाचार :

जमीन बेचने वाले सुल्तान अंसारी ने कहा कि "राम के काम के लिए आधी कीमत पर बेची ज़मीन"

राम मंदिर मामले में ज़मीन घोटाले का भ्रम फैलाने वालों पर FIR की तैयारी

संभलकर चलने की आवश्यकता

कोरोना महामारी की दूसरी लहर से बाहर निकलकर अब हम सामान्य गतिविधियों की ओर बढ़ रहे हैं। याद रहे अभी एकदम सामान्य जीवन जीने का समय नहीं आया है। हमें सावधानी के साथ व्यवहार करना होगा, अन्यथा एक बार फिर कोरोना हम पर हावी हो सकता है। दूसरी लहर ने यह भी बता दिया कि यह कितनी खतरनाक महामारी है। इसलिए याद रखें कि हमारा जरा भी बेपरवाह आचरण हमारे ही परिवार, समाज और देश के लिए घातक हो सकता है। पहले अनलॉक के बाद हमने जो गलतियां की हैं, उनसे सबक सीखने की बहुत जरूरत है। प्रशासन और आम नागरिकों को, दोनों को अपनी भूमिकाएं सजगता से निभानी होंगी। आम नागरिक कोविड-19 व्यवहार का कड़ाई और स्व-अनुशासन के साथ पालन करें। प्रशासन कोरोना संक्रमण पर निगरानी बनाए रखे, नागरिकों को कोविड-19 व्यवहार का पालन करने के लिए प्रोत्साहित करे और किसी भी विषम परिस्थिति से निपटने के लिए आवश्यक प्रबंध भी करे। 

जब हम सबकुछ अनलॉक करने की ओर बढ़ रहे हैं, तब प्रशासन को अनलॉक की वैज्ञानिक प्रक्रिया को अपनाना चाहिए। अनेक शोध अध्ययनों से साबित हुआ है कि एकदम से अनलॉक करने से कोरोना संक्रमण तेजी से लौट आता है। चरणबद्ध अनलॉक करने से कोरोना संक्रमण की वापसी को बहुत हद तक टाला जा सकता है। मध्यप्रदेश अब तक सधे हुए कदमों से अनलॉक की ओर बढ़ रहा है। लोगों को काम-धंधा मिले और अर्थव्यवस्था को गति मिले, इसके लिए उद्योग-कारोबार एवं बाजारों को शुरू करना आवश्यक है। इन्हें अनिश्चितकालीन समय तक रोका नहीं जा सकता। परंतु देखने में आ रहा है कि बाजार खोलते ही भारी भीड़ उमडऩे लगी है। मास्क और शारीरिक दूरी के अनिवार्य नियमों का पालन होते नहीं दिख रहा है। हमें यह समझना होगा कि इस लापरवाही का दुष्परिणाम हमें ही भोगना पड़ सकता है। 

बाजार चलते रहें, इसके लिए जरूरी है कि व्यवसायी एवं ग्राहक दोनों ही कोविड-19 अनुरूप व्यवहार का पालन करें। जब तक देश में बड़ी जनसंख्या का टीकाकरण नहीं हो जाता, तब तक सार्वजनिक स्थलों पर मास्क पहनने, शारीरिक दूरी बनाने, समय-समय पर साबुन से हाथ धोने और भीड़ जुटाने से बचने जैसी जरूरतों के लिए लगातार जन जागरण करना होगा। वैसे तो हम सबको स्व-अनुशासन का पालन करते हुए स्वयं ही इन नियमों का पालन करना चाहिए किंतु यदि कोई उपरोक्त दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करता है, तब उस पर कड़ा जुर्माना लगाया जाना चाहिए।

सोमवार, 14 जून 2021

मदरसे में बम विस्फोट से उपजे सवाल

बिहार के बांका जिले के मदरसे में हुए विस्फोट से अनेक प्रश्न उठने लगे हैं। यह स्वाभाविक ही है। क्योंकि उसके मूल में दो बातें हैं- एक, मदरसे संदिग्ध गतिविधियों को लेकर पहले भी सवालों के घेरे में आते रहे हैं। दो, यह बड़ा सवाल है कि शिक्षा संस्थान में विस्फोटक सामग्री का क्या उपयोग किया जा रहा था? बांका के मदरसे में विस्फोट के बाद जिस तरह की संदिग्ध गतिविधियों को अंजाम दिया गया, उनसे भी अनेक संदेह उत्पन्न हो रहे हैं। सांप्रदायिक शिक्षा के नाम पर देशभर में संचालित मदरसे केवल अपनी कट्टरवादी तालीम के लिए ही बदनाम नहीं है, बल्कि हिंसक गतिविधियों एवं विस्फोटक सामग्री के भंडारण केंद्र होने के आरोप पहले भी मदरसों पर लगते रहे हैं। पूर्व में भी मदरसों में बम विस्फोट की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले के खागरागढ़ के एक मदरसे में हुए बम विस्फोट में तो दो आतंकियों की मौत हुई थी और उस विस्फोट के तार बांग्लादेश के आतंकी गिरोह जमात-उल-मुजाहिदीन से जुड़े थे। बिहार के बांके जिले के मदरसे में हुए बम विस्फोट को भी उसी तरह की घटना माना जा रहा है। 

अब तक सामने आई जानकारी के अनुसार अवैध ढंग से बने इस मदरसे में धमाका कंटेनर में रखे एक देसी बम के फटने से हुआ है। मौलाना के मौत की वजह दम घुटना बताया गया है। विस्फोट इतना जबरदस्त था कि मदरसे का भवन पूरी तरह ध्वस्त हो गया और इलाका धमाके से थर्रा गया था। मौके पर बम बाँधने में उपयोग की जाने वाली सुतली, कील और कंटेनर के प्रमाण मिले हैं। ये प्रमाण संकेत देते हैं कि मदरसे में बम बनाने का कार्य किया जा रहा था। विस्फोटक सामग्री भी भारी मात्रा में रही होगी, तभी इतना बड़ा धमाका संभव हो सका। सोचिए, यदि उस समय वहाँ बच्चे पढ़ रहे होते, तब क्या स्थिति बनती? ये मदरसे बच्चों का भविष्य संवारने के केंद्र हैं या फिर उनके जीवन को सब प्रकार के नष्ट करने के अड्डे? 

कुछ स्थानीय लोगों के हवाले से बताया गया था कि मौलाना बम बनाता था और तीन युवक उसका सहयोग करते थे। क्षेत्र में छोटी-छोटी बात पर बमबारी होती थी। भागलपुर से बारूद लाकर काम किया जाता था। यह भी तथ्य सामने आ रहे हैं कि मौलाना का संबंध तबलीगी जमात से था और उसका बांग्लादेश आना-जाना भी था। 

बहरहाल, इस घटना की जाँच राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी द्वारा कराई जानी चाहिए। यह छोटी और सामान्य घटना नहीं है। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। बांका की घटना से सबक लेकर देश के अन्य राज्यों में संचालित मदरसों की जाँच भी समय रहते करनी चाहिए और उनकी निगरानी बढ़ानी चाहिए। अब समय आ गया है कि मदरसों के संचालन के लिए स्पष्ट और पारदर्शी व्यवस्था बने। मदरसों पर सरकार का पूरा नियंत्रण हो। वहाँ सरकार द्वारा तय पाठ्यक्रम ही पढ़ाया जाए। प्रशासन को लगातार मदरसों का औचक निरीक्षण करना चाहिए ताकि सांप्रदायिक तालीम की आड़ में वहाँ चलने वाली संदिग्ध एवं खतरनाक गतिविधियों को रोका जा सके।

सोमवार, 31 मई 2021

पुण्यश्लोक राजमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर

देखें यह वीडियो : Rajmata Devi Ahilyabai Holkar



अहिल्याबाई का जन्म 31 मई, 1725 को महाराष्ट्र के जिले अहमदनगर के चौंढ़ी ग्राम तालुका जामखेड़ा में हुआ था। उनके पिता माणकोजी शिंदे और माता सुशीलाबाई बहुत धार्मिक थे। अपने माता-पिता से ही धार्मिक और संवेदनशील होने का संस्कार अहिल्याबाई को विरासत में मिला।  

वर्ष 1733 में पुणे में हिंदू विधि-विधान से उनका विवाह श्रीमंत खण्डेराव के साथ सम्पन्न हुआ। उनको आशीर्वाद देने के लिए बाजीराव पेशवा अपने परिवार के साथ आए थे। एक साधारण परिवार की दिव्य कन्या अब इंदौर के राजमहल की रानी हो गई।

शनिवार, 29 मई 2021

एक ध्येय के सूत्र से बंधे थे वीर सावरकर और भगत सिंह

वीडियो ब्लॉग देखें: Veer Savarkar and Bhagat Singh | वीर सावरकर पर भगत सिंह के विचार


आपने देखा और पढ़ा होगा कि भारत में तथाकथित बुद्धिजीवियों का एक विशेष वर्ग स्वातंत्र्यवीर सावरकर और सरदार भगत सिंह को एक-दूसरे के सामने खड़ा करने का प्रयास करता है। ऐसा करते समय उसकी नीयत साफ नहीं होती। मन में बहुत मैल रहता है। दरअसल, वे स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर को कमतर दिखाने और उनका अपमान करने की चेष्टा कर रहे होते हैं। लेकिन, सूरज से भी भला कोई आँखें मिला सकता है। दो महापुरुषों/क्रांतिकारियों की तुलना करके ऐसे लोग अपने ओछेपन को ही उजागर कर रहे होते हैं। ऐसा करते समय उन्हें पता ही नहीं होता कि दोनों क्रांतिवीर एक-दूसरे का बहुत सम्मान करते थे। आज हम वीर सावरकर और सरदार भगत सिंह के आपसी संबंधों को टटोलने का प्रयास करेंगे। हम जानेंगे कि कैसे भगत सिंह क्रांति की राह में सावरकर के प्रति आदर का भाव रखते थे और सावरकर के मन में भगत सिंह के प्रति कितनी आत्मीयता थी?

बुधवार, 26 मई 2021

शर्मनाक! आपदा में भी ‘कन्वर्जन का खेल’

मध्यप्रदेश के रतलाम जिले में कोरोना महामारी की आड़ में ईसाई संप्रदाय के प्रचार का और कन्वर्जन (धर्मान्तरण) की प्रक्रिया का चौकाने वाला मामला सामने आया है। मध्यप्रदेश सरकार ने अच्छी पहल करते हुए कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए ‘किल कोरोना’ अभियान शुरू किया, जिसके तहत घर-घर जाकर स्वास्थ्यकर्मी लोगों के स्वास्थ्य की जाँच कर हैं और उन्हें उचित परामर्श दे रहे हैं। महामारी से लोगों का जीवन बचाने के उद्देश्य से शुरू किए गए इस अभियान का उपयोग ईसाई संप्रदाय के प्रचार और कन्वर्जन के लिए प्रेरित करने हेतु किया जाएगा, इसकी कल्पना भी सरकार ने नहीं की होगी। सरकार क्या, कोई भी निर्मल मन का व्यक्ति यह कल्पना नहीं कर सकता। सोचिए, जो लोग शासकीय अभियान को भी ईसाई संप्रदाय के प्रचार एवं कन्वर्जन की प्रक्रिया के लिए उपयोग कर सकते हैं, वे अपने तथाकथित ‘सेवा प्रकल्पों’ के माध्यम से किस स्तर पर जाकर गरीब, पिछड़े एवं वनवासी बंधुओं को ईसाई बनाते होंगे? यह घटना इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि भारत में सेवा कार्यों के पीछे चर्च का एक ही एजेंडा है- कन्वर्जन। यह अत्यंत घृणित एवं निंदनीय कार्य है कि सेवा की आड़ में लोगों का धर्म परिवर्तित कर अपने संप्रदाय का विस्तार किया जाए।

शुक्रवार, 21 मई 2021

कोरोना की रोकथाम का मध्यप्रदेश मॉडल

कोरोना महामारी की दूसरी लहर अचानक तेजी से आई, जिसकी भयावहता ने सबको मूकदर्शक बना दिया। कैसे इस लहर को रोका जाए, यह बड़ा प्रश्न बन गया। प्रारंभिक दिनों में अफरा-तफरी के हालात बन गए। ऐसी कठिन परिस्थितियों को संभालने के लिए मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार और उसके मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने युद्धस्तर पर प्रयास किए। मुख्यमंत्री श्री चौहान अत्यधिक सक्रिय नजर आए। पहले चरण में वे स्वयं सड़कों पर निकले और लोगों को कोरोना संबंधी दिशा-निर्देशों को पालन करने का आग्रह किया। लेकिन, परिस्थितियां तेजी से बिगड़ती जा रही थीं। तब उन्होंने प्रदेश में कोरोना संक्रमण का आकलन कर कोरोना कर्फ्यू जैसा कठोर निर्णय लेने में हिचक नहीं दिखाई। उधर, स्वास्थ्य सेवाओं का प्रबंध ठीक हो इस पर भी सरकार ने विशेष जोर दिया। सामाजिक संस्थाओं से इस संकट की घड़ी में सहयोग करने का आग्रह भी उन्होंने किया। किल कोरोना अभियान चलाया। बहुत ही कम समय में सीमित संसाधनों और सरकार की सक्रियता के कारण मध्यप्रदेश की स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर हो गई है। 

गुरुवार, 20 मई 2021

स्वातंत्र्यवीर सावरकर पर 'द वीक' का माफ़ीनाम

वीडियो रिपोर्ट देखें : 'The Week' magazine apologies for defaming Veer Savarkar

'द वीक' पत्रिका ने स्वातंत्र्यवीर सावरकर पर लिखे गए झूठे और अपमानजनक लेख के लिए माफी मांगी है। ‘द वीक’ की यह माफ़ी राष्ट्रभक्त लोगों की जीत है और महापुरुषों का अपमान करने वाले संकीर्ण मानसिकता के लोगों की पराजय। निरंजन टाकले नाम के पत्रकार का एक लेख ‘द वीक’ ने 24 जनवरी, 2016 को प्रकाशित किया, जिसका शीर्षक ‘लैंब लायोनाइज्ड’ था। वीर सावरकर की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के उद्देश्य से लिखे गए इस लेख में मनगढ़ंत और तथ्यहीन बातें लिखी गयीं। तथ्यों को तोड़-मरोड़कर कर भी प्रस्तुत किया गया। ‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक’ ने इस आलेख को चुनौती दी। सबसे पहले 23 अप्रैल, 2016 को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया में इसकी लिखित शिकायत की गई। परन्तु प्रेस काउंसिल कहाँ, इस तरह के मामलों पर संज्ञान लेती है। राष्ट्रीय विचार से जुड़े विषयों पर उसकी उदासीनता सदैव ही देखने को मिली है, उसका कारण सब जानते ही हैं। उसके बाद स्मारक इस लेख के विरुद्ध याचिका लेकर न्यायालय पहुँच गया और हम देखते हैं कि न्यायालय में झूठ टिक नहीं सका। इससे पहले वीर सावरकर के सम्बन्ध में आपत्तिजनक कार्यक्रम के प्रसारण के लिए एबीपी माझा भी लिखित माफी मांग चुका है। सोचिये, इतिहास में इस तरह के लोगों ने कितना और किस प्रकार का झूठ परोसा होगा? 

मंगलवार, 18 मई 2021

सकारात्मकता का संचार : ‘हम जीतेंगे - पाजिटीविटी अनलिमिटेड’

हम विकट संकट से गुजर रहे हैं। इस प्रकार के वैश्विक संकट का सामना सामूहिक प्रयासों, धैर्य एवं सकारात्मक मन के साथ ही किया जा सकता है। निराश और हतोत्साहित मन से हम इस मुसीबत से पार नहीं पा सकते। वैसे भी दुनिया में यह सामाजिक व्यवस्था है कि दु:ख एवं कष्ट की स्थिति में व्यक्ति के दु:ख को बढ़ाने का काम नहीं किया जाता, अपितु उसे सांत्वना दी जाती है, धैय दिया जाता है और उसके दु:ख में शामिल होकर उसको हिम्मत दी जाती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने समाज में सेवा एवं राहत कार्यों को करने के साथ ही अपने इस दायित्व को भी स्वीकार किया। निराशा के गर्त में धकेले जा रहे अपने समाज के मन में जीत का विश्वास जगाने के उद्देश्य से संघ की प्रेरणा से ‘कोविड रिस्पॉन्स टीम’ ने पाँच दिवसीय ‘हम जीतेंगे - पाजिटीविटी अनलिमिटेड’ व्याख्यानमाला का आयोजन किया। इस व्याख्यानमाला में सामाजिक एवं धार्मिक नेतृत्व ने समाज में आत्मविश्वास जगाने का प्रयास किया।

शुक्रवार, 14 मई 2021

संवेदनशीलता शिवराज सरकार

बेसहारा परिवार को पाँच हजार पेंशन और बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा का सराहनीय निर्णय

हम सब जानते हैं कि कोरोना महामारी की दूसरी लहर ने किसी को संभलने का अवसर नहीं दिया। बहुत तेजी से फैली महामारी की यह लहर अपने पीछे अनेक प्रकार के दु:ख और कष्ट छोड़कर जाने वाली है। यह दु:ख और कष्ट छोटे हो सकते हैं यदि समाज और सरकार मिलकर प्रयास करें। कोरोना संक्रमण की त्रासद घटनाओं के कारण यह महामारी अब हमारे लिए सामाजिक समस्या भी बन गई है। अनेक परिवार बेसहारा हो गए हैं। उनमें जो कमाने-खिलानेवाले थे, उनका दु:खद निधन हो गया है। बेसहारा परिवार और बच्चों के सामने अनेक चिंताएं हैं। हमें प्रयास करना चाहिए कि हम सब ऐसे परिवारों की चिंताओं का समाधान कैसे कर सकते हैं? मध्यप्रदेश सरकार ने पहलकदमी करते हुए बेसहारा परिवारों को पाँच हजार रुपये मासिक पेंशन, बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा और राशन की नि:शुल्क व्यवस्था करने का निर्णय लिया है। यह निर्णय बाकी राज्यों की सरकारों के लिए अनुकरणीय हो सकता है। 

इस तरह के प्रयासों में सरकारों के साथ सामाजिक संगठनों एवं जागरूक व्यक्तियों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। सरकार ऐसे परिवारों के लिए कोई योजना बनाए और सामाजिक संगठन एवं जागरूक नागरिक जरूरतमंद व्यक्ति तक इन योजनाओं का लाभ पहुँचाने में सहयोगी बनें। साथ यह भी नजर रखी जाए कि कोई जरूरतमंदों का हक न मार ले। योजनाओं का सीधा लाभ पीडि़त व्यक्ति को मिले। उसमें बिचौलिए आकर उनको सहायता देने की जगह उनके दर्द को बढ़ाने का काम न करें। मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार एवं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस बात के लिए प्रशंसा के पात्र हैं कि उन्होंने बेसहारा हुए परिवारों एवं बच्चों को प्रत्येक माह पाँच हजार रुपये की पेंशन देने का निर्णय लिया है। बेसहारा परिवारों के लिए यह बड़ी राहत होगी। यह निर्णय बताता है कि शिवराज सिंह चौहान बहुत संवेदनशील मुख्यमंत्री हैं। उनके लिए अंत्योदय की चिंता प्राथमिक है। वह उन परिवारों की चुनौतियों को समझते हैं, जो कमजोर आय वर्ग से हैं। पाँच हजार रुपये की मासिक पेंशन के साथ ही उन्होंने ऐसे बच्चों की नि:शुल्क पढ़ाई की व्यवस्था एवं परिवारों को नि:शुल्क राशन की व्यवस्था करने का निर्णय भी लिया है। 

इसके साथ ही महिलाओं को काम प्रारंभ करने के लिए सरकार की गारंटी पर बिना ब्याज का ऋण उपलब्ध कराने का निर्णय भी सराहनीय है। इस बात के लिए लोगों को अधिक प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि वे स्वावलंबी बनें और स्वरोजगार कर बाकी सबके लिए भी उदाहरण बनें। मध्यप्रदेश सरकार का यह निर्णय एक आत्मविश्वास पैदा करता है, एक भरोसा जगाता है एवं आश्वासन देता है कि कठिन परिस्थितियों में सरकार हमारा सहारा बनेगी और हम फिर से उठ खड़े होंगे। आज की निराशाजनक परिस्थिति में इस प्रकार का भरोसा बहुत जरूरी है। यह भरोसा ही इस कठिन लड़ाई में जीतने का हमारा सबसे बड़ा सहारा बनेगा। 

शनिवार, 24 अप्रैल 2021

संघ फिर मैदान में

कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के दौरान लोगों को संकट से उबारने एवं उन्हें सहायता देने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता एक बार फिर मैदान में नजर आ रहे हैं। पिछले वर्ष जब पहली बार देश कोरोना संक्रमण की चपेट में आया था और लोगों का जीवन बचाने के लिए सरकार ने कठोर निर्णय लेते हुए लॉकडाउन लगाया था, तब संघ के स्वयंसेवकों ने बड़े स्तर पर सेवा एवं राहत कार्यों का संचालन किया था। देश में जब भी आपदा की स्थिति होती है, संघ के स्वयंसेवक सबसे आगे खड़े नजर आते हैं। यह भावना देश और समाज के प्रति उनके समर्पण को बताती है। एक बार फिर जब देश में संक्रमण फैल रहा है, तब घर से लेकर अस्पताल तक संघ के स्वयंसेवक संक्रमितों एवं उनके परिजनों के लिए देवदूत बनकर कार्य कर रहे हैं। मरीजों को दवा, भोजन और अस्पताल तक पहुँचाने के काम में स्वयंसेवक लगे हुए हैं। 

अकसर यह मन में प्रश्न आता है कि बिना किसी विशेष प्रशिक्षण के संघ के स्वयंसेवक यह सब कैसे कर लेते हैं? पिछले वर्ष सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में इस बात की स्पष्टता सबको दी थी। दरअसल, संघ के लिए सेवाकार्य, किसी पर उपकार नहीं है। उसके लिए सेवाकार्य करणीय कार्य है। शाखा स्थान पर स्वयंसेवकों का मानस ही इस प्रकार तैयार हो जाता है कि यह समाज हमारा अपना है, प्रत्येक परिस्थिति में इसकी चिंता हमें ही करनी है। इसलिए अपने जीवन को भी दांव पर लगाकर वह कठिनतम परिस्थितियों में भी अग्रिम पंक्ति में खड़ा होता है।

           वर्तमान समय में संघ ने समूचे देश में, विशेषकर जहाँ कोरोना संक्रमण तेजी से फैल रहा है, वहाँ कोरोना सहायता केंद्र बनाए हैं। मध्यप्रदेश की ही बात करें तो यहाँ संघ ने प्रांतश: कोरोना हेल्प डेस्क बनाई हैं, जो लोगों को हर संभव सहायता उपलब्ध करा रही हैं। इसके साथ ही संघ की प्रेरणा से संचालित सरस्वती शिशु मंदिर, सेवा भारती, विद्या भारती ने अपने संस्थान क्वारन्टाइन सेंटर बनाने के लिए प्रशासन को सौंप दिए हैं। अनेक स्थान पर संघ के स्वयंसेवक स्वयं ही क्वारन्टाइन एवं आइसोलेशन सेंटर चला रहे हैं।

संघ से संबंधित संस्थाओं के अस्पताल एवं स्वास्थ्य केंद्र भी कोरोना मरीजों की सेवा में समर्पित हो गए हैं। संघ ने विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं से बात करके उनकी धर्मशालाओं, भोजनशालाओं एवं अस्पतालों को भी कोरोना के विरुद्ध लड़ाई में उपलब्ध करवाया है। कोरोना के विरुद्ध युद्ध स्तर पर कार्य कर रहे संघ के स्वयंसेवक सबको साथ लेकर चल रहे हैं। संघ के इन प्रयासों को साधुवाद। अन्य सामाजिक संगठन भी संघ से प्रेरणा लेकर अपने दायित्व निर्वहन के लिए आगे आएं।

देखें 2 मिनट की यह फिल्म - 'समिधा: सेवा परमो धर्म'




गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

कोरोना से बचने स्वास्थ्य-आग्रह

मध्यप्रदेश में कोरोना संक्रमण अनियंत्रित होता जा रहा है। मध्यप्रदेश देश के उन राज्यों में शामिल हो गया है, जहाँ कोरोना महामारी की दूसरी लहर तेजी से फैल रही है। कोरोना संक्रमितों के मामले में मध्यप्रदेश देश में सातवें स्थान पर पहुंच गया है। विगत सात दिन में इंदौर का औसत पॉजिटिविटी रेट 15 जबकि भोपाल का 19 पर पहुँच गया है। यह स्थिति चिंताजनक है। ऐसी स्थिति में मध्यप्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उस भूमिका में सक्रिय हो गए हैं, जिसकी अपेक्षा किसी भी जनप्रतिनिधि से होती है। मुख्यमंत्री श्री चौहान प्रतिनिधि बाजारों में निकल कर लोगों को कोरोना संक्रमण के खतरे के प्रति जागरूक कर रहे हैं। इस संदर्भ में मंगलवार को उन्होंने महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने से ‘स्वास्थ्य-आग्रह’ की शुरुआत की। कोरोना महामारी के प्रति आम नागरिकों को जागरूक करने के लिए समाज के प्रमुख लोगों से आग्रह करने का यह अभिनव प्रयोग है। 

पिछले कुछ समय से कोरोना संक्रमण को लेकर सामान्य नागरिकों में जिस प्रकार की उदासीनता एवं लापरवाही बढ़ती गई है, ऐसी स्थिति में उन्हें फिर से सावधान करने के लिए समाज के ही प्रभावशाली लोगों का सहयोग आवश्यक है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं पत्रकारों-साहित्यकारों से भी बातचीत कर उनसे कोरोना के विरुद्ध लड़ाई में सहयोग की माँग की है। नि:संदेह यदि सब मिलकर अपने आस-पास के लोगों को जागरूक करेंगे, तब कोरोना को हराना आसान होगा। जिस तरह प्रतिदिन मुख्यमंत्री श्री चौहान आम लोगों से मिल कर मास्क लगाने, शारीरिक दूरी रखने एवं स्वच्छता का आग्रह कर रहे हैं, वैसे प्रयास सभी क्षेत्रों के नेतृत्वकारी लोगों को करना चाहिए। कोरोना संक्रमण समूची मानवता के लिए खतरा बन गया है। दूसरी लहर में जिस प्रकार यह अधिक घातक हो गया, वैसे में अपने समाज को बचाना हम सबकी जवाबदेही है। शासन के साथ हर स्तर पर सहयोग करना ही इस समय हमारा धर्म होना चाहिए। 

मुख्यमंत्री ने अपने घर पर अपनी सहधर्मिणी एवं पुत्र को मास्क पहनाकर प्रतीकात्मक ढंग से संदेश दिया है कि कोरोना के विरुद्ध जन-जागरूकता की लड़ाई हमें अपने घर से ही शुरू करनी होगी। मुख्यमंत्री बार-बार चेता रहे हैं कि लॉकडाउन जैसी स्थितियां बनने से रोकना होगा, अन्यथा सरकार को अपने नागरिकों का जीवन बचाने के लिए कड़े कदम उठाने पड़ सकते हैं। एक बात स्पष्ट है कि आज की स्थिति में हम सब लॉकडाउन लगाने की स्थिति में नहीं है, अब लॉकडाउन लगा तो वह हम पर बहुत भारी पड़ेगा। इसलिए आवश्यक है कि हम सब अपने जवाबदेही को पहचाने और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के ‘स्वास्थ्य-आग्रह’ के आह्वान को समझें। हमें अपनों के साथ ही समाज के प्रत्येक बंधु-भगिनी के स्वास्थ्य की चिंता करते हुए उनसे आग्रह करना होगा कि मास्क पहनें, स्वच्छ रहें और शारीरिक दूरी का पालन करें। साथ ही अनावश्यक रूप से बाहर न निकलें। 

सोमवार, 29 मार्च 2021

चार पाकिस्तान बनाने का विचार 'लीगी मानसिकता'

जिस मुस्लिम लीगी मानसिकता ने भारत का विभाजन किया था, वह अब भी मौजूद है। भारत की अखंडता, एकता और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए यह विभाजनकारी मानसिकता खतरनाक संकेत है। बंगाल के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान तृणमूल कांग्रेस के नेता शेख आलम ने भारत के टुकड़े करके चार पाकिस्तान बनाने संबंधी देश विरोधी भाषण दिया है। बीरभूम जिले के नानूर विधानसभा सीट से तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार करने पहुँचे शेख आलम ने कहा कि "हमारी जनसंख्या 30 प्रतिशत है और वो (हिन्दू) 70 प्रतिशत हैं। अगर पूरे भारत में हम 30 प्रतिशत लोग इकट्ठे हो जाते हैं तो हम चार-चार पाकिस्तान बना सकते हैं। फिर कहां जाएंगे ये 70 प्रतिशत लोग"? शेख आलम का यह बयान स्पष्ट तौर पर देशद्रोह की श्रेणी में आता है और इसके साथ ही यह भारत के विरुद्ध अंदरखाने में चल रही भयंकर साजिश की ओर भी इंगित करता है।

भारत हितैषी संगठनों एवं व्यक्तियों द्वारा बार-बार जब यह चेतावनी दी जाती है कि मुस्लिम बाहुल्य वाले क्षेत्र भारत की एकता एवं अखंडता के लिए खतरा बन सकते हैं, तब उनकी बातों को तथाकथित सेक्युलर ताकतें सांप्रदायिक कह कर खारिज कर देती हैं। लेकिन, यही सेक्युलर समूह/व्यक्ति शेख आलम जैसे कट्टरपंथी एवं लीगी मानसिकता के लोगों के बयानों पर चुप्पी साध जाते हैं। बल्कि पुलिस प्रशासन द्वारा जब इनके विरुद्ध कार्रवाई की जाती है, तब यह गैंग तख्ती एवं मोमबत्ती लेकर सड़कों पर उतर आती है। इससे पहले भारत से पूर्वोत्तर राज्यों को तोडऩे की योजना बताने वाले शर्जील इमाम के मामले में देश ने देखा ही कि कैसे तथाकथित प्रगतिशील उसकी तरफदारी कर रहे थे। 

बंगाल में कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहाँ लीगी मानसिकता का प्रभाव दिखाई देता है। इस संदर्भ में तृणमूल कांग्रेस की सरकार में मंत्री फिरहाद हकीम के उस बयान का उल्लेख आवश्यक हो जाता है, जिसमें उन्होंने माना कि बंगाल के कई क्षेत्र 'पाकिस्तान' बनाए जा चुके हैं। वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव के पांचवे चरण के मतदान से पहले मंत्री फिरहाद हकीम ने पाकिस्तान के एक पत्रकार से कहा था- "आप हमारे साथ आइए, हम अपको कोलकाता के मिनी पाकिस्तान ले चलते हैं"। वैसे यह स्थिति प्रत्येक उस शहर में बन गई है, जहाँ मुस्लिम आबादी 15 से 30 प्रतिशत है। मुस्लिम बाहुल्य वाले इन क्षेत्रों में सांप्रदायिक तनाव स्पष्ट तौर दिखाई देता है। जहाँ शेख आलम ने आपत्तिजनक बयान दिया है, उसी बीरभूमि के एक गाँव में 300 हिन्दू परिवारों को लगातार चौथे वर्ष दुर्गा पूजा का आयोजन करने के लिए स्थानीय प्रशासन से अनुमति लेनी पड़ी। ममता सरकार में कई बार यह स्थिति बनी है कि दशहरा और दुर्गा पूजा से हिन्दुओं को रोका गया है। अपनी परंपरा-संस्कृति का पालन करने और धार्मिक स्वतंत्रता के अपने मौलिक अधिकार के लिए हिन्दुओं को न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। 

यह स्थिति चिंताजनक है। शेख आलम के बयान को हवा में उड़ाना एक बड़ी भूल साबित हो सकती है। शासन-प्रशासन के साथ ही देशभक्त नागरिकों को लीगी मानसिकता पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। 

यह भी देखें - कश्मीरी हिन्दुओं की हत्या के पीछे जेहादी मानसिकता




बुधवार, 24 मार्च 2021

हर बूँद अनमोल

Lokendra Singh

विश्व जल दिवस पर जल शक्ति अभियान की शुरुआत कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मनुष्यता एवं प्रकृति-पर्यावरण के हित में एक महत्वपूर्ण शुरुआत की है। जल संरक्षण और जल प्रबंधन एक-दूसरे के पूरक हैं। बिना जल संरक्षण किए अगर हम जल का दोहन करेंगे, तो आने वाले समय में जल संकट की समस्या उत्पन्न हो जाएगी। भारत के अनेक हिस्सों में अब हम इस संकट का सामना करने की स्थिति में आ चुके हैं। यह संभलने का समय है। यह अभियान हमें संभलने का अवसर देता है। इस अभियान को ‘कैच द रैन’ नाम दिया गया है। वर्षा जल का संचयन करना, इसका उद्देश्य है। 

शहरीकरण की प्रक्रिया में एक बड़ी चूक पिछले वर्षों में हुई है कि वर्षा जल के संचयन की प्राकृतिक एवं नैसर्गिक संरचनाओं को हमने ध्वस्त कर दिया या बदहाल होने दिया। स्थिति यह है कि वर्षा जल का ज्यादातर हिस्सा बह कर शहर से बाहर चला जाता है, जबकि उसको वहाँ की भूमि में समाना चाहिए था। भू-जल स्तर को बनाए रखने में वर्षा जल का बहुत महत्व है। थोड़ी जागरूकता एवं थोड़े ही प्रयासों से हम वर्षा जल का संचयन कर सकते हैं। इसलिए इस अभियान को वर्षा जल के संचयन से जोडऩा अनुकरणीय है। 

मध्यप्रदेश में अनेक स्वयंसेवी संस्थाएं एवं समाजसेवी वर्षा जल के संचयन के लिए क्रांतिकारी पहल प्रारंभ कर चुके हैं। मध्यप्रदेश के बैतूल में पर्यावरण पुरुष मोहन नागर बारिश के पानी को सहजने के लिए ग्रामवासियों के सहयोग से ‘गंगा अवतरण अभियान’ एवं ‘बोरी बंधान’ जैसे परंपरागत वैज्ञानिक प्रयोगों का संचालन करते हैं। इन प्रयोगों के कारण जिन गाँवों में कभी जल संकट भयावह हो जाता था, आज वहाँ संग्रहित वर्षा जल का उपयोग सिंचाई के लिए भी होने लगा है। वहीं, झाबुआ में शिव गंगा अभियान के चला कर पद्मश्री महेश शर्मा ने एक लाख से अधिक जल संरचनाएं खड़ी कर दीं। दोनों ही महानुभाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरणा लेकर पर्यावरण संरक्षण के महती अभियान में जुटे हुए हैं। 

पर्यावरण पुरुष मोहन नागर के प्रयासों पर केन्द्रित फिल्म 


यह ठीक बात है कि सरकार ने वर्षा जल संरक्षण की चिंता की है लेकिन यह जब तक समाज की चिंता का विषय नहीं बनेगा, तब तक वांछित लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता। जल संरक्षण प्रत्येक मनुष्य का दायित्व होना चाहिए। जीवन में जल का क्या महत्व है, हमारी संस्कृति में, ऋषियों ने इसे भली प्रकार रेखांकित किया है। उन्होंने बताया है कि पृथ्वी का आधार जल और जंगल है। इसलिए उन्होंने पृथ्वी की रक्षा के लिए वृक्ष और जल को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा है- “वृक्षाद् वर्षति पर्जन्य: पर्जन्यादन्न सम्भव:” अर्थात् वृक्ष जल है, जल अन्न है, अन्न जीवन है। हिन्दुओं के चार वेदों में से एक अथर्ववेद में बताया गया है कि आवास के समीप शुद्ध जलयुक्त जलाशय होना चाहिए। जल दीर्घायु प्रदायक, कल्याणकारक, सुखमय और प्राणरक्षक होता है। छान्दोग्योपनिषद् में अन्न की अपेक्षा जल को उत्कृष्ट कहा गया है। महर्षि नारद ने भी कहा है कि पृथ्वी भी मूर्तिमान जल है। अन्तरिक्ष, पर्वत, पशु-पक्षी, देव-मनुष्य, वनस्पति सभी मूर्तिमान जल ही हैं। जल ही ब्रह्मा है। 

आधुनिक जीवनशैली में हम अपनी संस्कृति की सीखों को पीछे छोड़ते आए हैं, जिसके कारण आज अनेक प्रकार के संकटों का सामना कर रहे हैं। जल शक्ति अभियान के माध्यम से हमारे पास एक अवसर आया है कि हम अपनी संस्कृति के संदेशों को आत्मसात करें, दुनिया के सामने आचरण हेतु प्रस्तुत करें और प्रकृति के साथ अपने आत्मीय संबंध को पुन: प्रगाढ़ करें। याद रखें, जल का कोई विकल्प नहीं है। इसलिए इसका संरक्षण एवं संचयन अनिवार्य है।

मंगलवार, 2 मार्च 2021

पिता ने क्या किया

यूट्यूब चैनल 'अपना वीडियो पार्क' पर देखें


क्या किया पिता ने तुम्हारे लिए?
तुमने साहस कहां से बटोरा
प्रश्न यह पूछने का।
बचपन की छोड़ो
तब की तुम्हें सुध न होगी
जवानी तो याद है न
तो फिर याद करो...


पिता दफ्तर जाते थे साइकिल से
तुम्हें दिलाई थी नई मोपेड
जाने के लिए कॉलेज।
ऊंची पढ़ाई कराने तुम्हें
बैंक के काटे चक्कर तमाम
लाखों का लोन लिया उधार।
तुम्हारे कंधों पर होना था
बोझ उस उधार का
लेकिन, कमर झुकी है पिता की।


याद करो,
पिता ने पहनी तुम्हारी उतरी कमीज
लेकिन, तुम्हें दिलाई ब्रांडेड जींस
पेट काटकर जोड़े कुछ रुपये
तुम्हारा जन्मदिन होटल में मनाने।


नहीं आने दी तुम तक
मुसीबत की एक चिंगारी भी, कभी
खुद के स्वप्न खो दिए सब
तुम्हारे लिए चांद-सितारे लाने में।
पिता ही उस मौके पर साथ तुम्हारे थे
जब पहली बार हार से
कदम तुम्हारे लडख़ड़ाए थे।
सोचो पिता ने हटा लिया होता आसरा
तो क्या खड़े होते तुम
जिस जगह खड़े हो आज।


पिता होकर क्या पाया
तुम्हारा रूखा व्यवहार, बेअदब सवाल
पिता होकर ही समझोगे शायद तुम।
फिर साहस न जुटा पाओगे
प्रश्न यह पूछने का
क्या किया पिता ने तुम्हारे लिए?


आओ, प्यारे
प्रश्न यह बनाने की कोशिश करें
हमने क्या किया पिता के लिए?
क्या करेंगे पिता के लिए?
क्या उऋण हो सकेंगे पितृ ऋण से?

- लोकेन्द्र सिंह -

(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से) 


मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी की पत्रिका 'साक्षात्कार' के अगस्त-2020 के अंक में प्रकाशित

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

एकजुट भारत : वयं पंचाधिकं शतम्

तथाकथित किसान आंदोलन के नाम पर भारत विरोधी ताकतों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करने का षड्यंत्र रचा, लेकिन भारत के नागरिकों ने अविलम्ब एकजुट प्रतिकार करके बता दिया कि हम भारत विरोधी किसी भी साजिश को सफल नहीं होने देंगे। यह भारत की शक्ति और उसकी सुंदरता है कि आम और प्रभावशाली, सभी लोगों ने भारत की आवाज को मजबूत किया। महाभारत का एक प्रसंग है, जिसमें संदेश दिया गया है कि – ‘वयं पंचाधिकं शतम्’। जो भारतीय संस्कृति में रचा-बसा है, वह इस संदेश को जीता है। उसे पता है कि भले ही हमारी आपस में असहमति है लेकिन बाहर के लिए हम सब एकजुट हैं। इसलिए अनेक असहमतियों के बाद भी विगत दिवस देश के सभी नागरिकों ने ‘भारत के विरुद्ध रचे गए प्रोपोगंडा’ का एक सुर में विरोध किया। 

सुबह से जो लोग पॉप सिंगर रिहाना, पॉर्न स्टार मिया खलीफा, एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग और कमला हैरिस की भतीजी/भान्जी के ट्वीट पर लहालोट हो रहे थे, उनके प्रोपोगंडा की हवा ‘हम भारत के लोग’ में आस्था रखने वाले भारतीयों ने निकाल दी। भारत की ओर से इस बात पर आपत्ति की गई है कि एक अलग दुनिया में रहने वाले इन लोगों ने जमीनी सच्चाई को जाने बिना ही अपनी नाक भारत के आंतरिक मामले में घुसाई है। क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर से लेकर अभिनेता अक्षय कुमार और एक सामान्य भारतीय नागरिक ने कहा कि “भारत की संप्रभुता से समझौता नहीं किया जा सकता। आईए, भारत के विरुद्ध इस प्रोपोगंडा के सामने एकजुट होकर खड़े होते हैं”। विदेश मंत्रालय ने भी उचित ही प्रतिक्रिया दी कि “भारत की संसद ने व्यापक बहस और चर्चा के बाद, कृषि क्षेत्र से संबंधित सुधारवादी कानून पारित किया। ये सुधार किसानों को अधिक लचीलापन और बाजार में व्यापक पहुँच देते हैं। ये सुधार आर्थिक और पारिस्थितिक रूप से सतत खेती का मार्ग प्रशस्त करते हैं”। 

यह सच है कि इन ‘सेलेब्रिटीज’ न तो कृषि सुधार कानूनों की एक पंक्ति पढ़ी है और न ही उन्हें किसानों की माँगों का ही पता है। उन्हें जो ट्वीट और पोस्टर दिया गया, उसे उन्होंने ट्वीट कर दिया। इस कॉपी-पेस्ट कर्म में अनजाने में स्वीडिश एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग ने इस अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र की पोल खोल दी। ग्रेटा ने भारत में जारी किसान आंदोलन के समर्थन की अपील करते हुए जो ट्वीट किया, उसमें उन्होंने एक ऐसे दस्तावेज को साझा कर दिया, जिससे स्पष्ट होता है कि किसान आन्दोलन एक सोची समझी रणनीति के साथ शुरू किया गया था और 26 जनवरी का उपद्रव भी इसी रणनीति का हिस्सा था। गूगल ड्राइव पर साझा की गई इस फाइल में इस तथाकथित किसान आंदोलन के आगे की रणनीति एवं सोशल मीडिया अभियान का क्रम और अन्य गतिविधियों का ब्योरा दर्ज है। इसके साथ ही इस दस्तावेज में यह तक उल्लेख है कि किसको क्या ट्वीट करना है और किन्हें टैग करना है। दरअसल, प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने कृषि सुधार कानूनों की सराहना की है। उन संस्थाओं को टैग करके उन पर दबाव बनाने की योजना भी उजागर हुई है। 

इस दस्तावेज में भारत के कुछ मीडिया संस्थानों का भी जिक्र है, जो इस षड्यंत्र में उनके सहयोगी साबित हो सकते हैं। जैसे ही ग्रेटा ने यह ट्वीट किया, भारत विरोधी ताकतों की कलई खुल गई। आनन-फानन में ग्रेटा से यह ट्वीट हटवाया गया। हालाँकि, तब तक सच सामने आ चुका था। धीरे-धीरे ही सही, लेकिन इस आंदोलन के पीछे सक्रिय अराजक ताकतों का चेहरा सामने आता जा रहा है। वैसे भी राष्ट्रीय स्वाभिमान के पर्व ‘गणतंत्र दिवस’ पर हुई अराजकता और हिंसा के बाद से यह तथाकथित किसान आंदोलन अपनी नैतिकता खो चुका है। अब धीमे-धीमे जनसमर्थन और सहानुभूति से भी हाथ धो रहा है।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

बाचा : द राइजिंग विलेज

 देश का पहला गाँव, जिसके हर घर में सोलर इंडक्शन पर पकता है खाना

मध्यप्रदेश के बैतूल जिले का एक छोटा-सा अनुसूचित जनजाति (शेड्यूल ट्राइब) बाहुल्य गाँव है- बाचा। आजकल यह छोटा-सा गाँव अपने बड़े नवाचारों के कारण चर्चा में बना हुआ है। वर्ष 2016-17 से बाचा ने बदलाव की करवट लेनी शुरू की। आज बाचा न केवल मध्यप्रदेश बल्कि भारत के सभी गाँवों के लिए प्रेरणा स्रोत बन सकता है। गाँववासियों की लगन, समर्पण, सूझबूझ और वैज्ञानिक समझ ने बाचा गाँव की तस्वीर में रंग भर दिए हैं। एक समय में पानी की समस्या का सामना करने वाले इस गाँव में अब पानी के पर्याप्त प्रबंध हैं। शैक्षणिक संस्था विद्या भारती से जुड़े समाजसेवी मोहन नागर की प्रेरणा से ग्रामवासियों ने परंपरागत ग्राम-विज्ञान के सहारे बारिश के पानी को एकत्र करना प्रारंभ किया। इसके लिए पहाड़ी या ढलान से आने वाले पानी को रेत की बोरियों की दीवार बनाकर एकत्र किया गया, इससे न केवल खेती और पशुओं के लिए पानी जमा हुआ, बल्कि गाँव का भू-जलस्तर (ग्राउंड वाटर लेवल) भी बढ़ गया। गाँववालों ने इस प्रयोग को नाम दिया- बोरी बंधान। 

बोरी बंधान के इस प्रयोग से संग्रहित बारिश के पानी का उपयोग फसलों की सिंचाई में किया जाता है। पशुओं के पेयजल के लिए भी यह पानी उपयोग होता है। एक छोटे से ग्रामीण विज्ञान के प्रयोग से आज बाचा गाँव वह खेत लहलहाते हैं, जो कभी सिंचाई के अभाव में सूखे रह जाते थे। बोरी बंधान से गाँव की लगभग 15 एकड़ जमीन सिंचित की जा रही है। इसके साथ ही समाजसेवी मोहन नागर की योजना से प्रारंभ हुए गंगाअवतरण अभियान के अंतर्गत सभी ग्रामीणों ने आस-पास की पहाड़ियों पर खंती खोद कर बारिश के जल को जमीन के भीतर भेजने का और पौधरोपण करने का अनुपम एवं अनुकरणीय कार्य आरम्भ किया है। पिछले कुछ वर्षों से यह कार्य लगातार जारी है। प्रकृति संवर्धन और जल संरक्षण का यह अभिनव कार्य उस समय भी नहीं रुका जब कोरोना के कारण समूचा देश स्थिर-सा हो गया है। चूंकि गाँव में घरवास (लॉकडाउन) से छूट थी, कोरोना के संक्रमण की दस्तक भी नहीं हुयी थी, इसलिए बाचा और उसके आसपास के ग्रामीणों ने बारिश के जल को संरक्षित करने के लिए मानसून के आने से पहले ही गंगा अवतरण अभियान को प्रारम्भ कर दिया।  

सौर ऊर्जा के प्रयोग के लिए देशभर में चर्चित :

बाचा गाँव ने न केवल स्वच्छता और जलसंरक्षण सहित अन्य महत्व अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किये हैं, बल्कि प्राकृतिक ऊर्जा का दैनिक जीवन में उपयोग करने के लिए वैज्ञानिक पहल भी प्रारंभ की है। आज बाचा की पहचान देश में ऐसे पहले गाँव के रूप में है, जहाँ हर घर की रसोई में सौर ऊर्जा की सहायता से भोजन तैयार किया जाता है। समाजसेवी मोहन नागर बताते हैं- “जीवाश्म ईंधन से जहाँ पर्यावरण को क्षति पहुँच रही थी, वहीं महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए भी यह ठीक नहीं था। हमने सबसे पहले गाँववालों को सौर ऊर्जा के बारे में जागरूक किया गया। आईआईटी मुंबई के विद्यार्थियों और ओएनजीसी के अधिकारियों के सहयोग गाँव में इलेक्ट्रिक सोलर इंडक्शन लगाए गए हैं। अब गाँव के प्रत्येक घर में सौर्य ऊर्जा का उपयोग कर खाना बनाया जाता है। इसके लिए आईआईटी मुंबर्ई के विद्यार्थियों और ओएनजीसी के अधिकारियों ने गाँव के कुछ लोगों को प्रशिक्षित किया और उन्हें सौर ऊर्जा से बिजली कैसे बनाई जाती है, इसकी वैज्ञानिक प्रक्रिया की जानकारी दी।” 

गाँव वालों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह थी कि प्रारंभ में उन्हें न तो सौर ऊर्जा के बारे में पता था और न ही इसके लिए उपयोग में आने वाले उपकरणों की कोई जानकारी थी। इस समस्या का समाधान निकला आईआईटी मुंबई और ओएनजीसी के अधिकारीयों से। उन्होंने बाकायदा सौर ऊर्जा के उपयोग और उसके उपकरणों के रखरखाव के लिए गाँव के ही कुछ लोगों प्रशिक्षित किया। गाँववासियों को समझाया कि सौर ऊर्जा की वैज्ञानिक प्रक्रिया क्या है और उससे कैसे बिजली बनाई जा सकती है। हालाँकि, शुरुआत में तो गांववालों को यह बेहद ही मुश्किल और खर्चीला काम नज़र आया। लेकिन, पुराने अनुभवों और सफलता ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। परिणाम सबके सामने हैं कि आज सौर ऊर्जा ने ग्रामीणों के ईंधन का खर्च तो बचाया ही, महिलाओं को चूल्हे के धुंए से भी बचा लिया है।

अपने रसोईघर में सौर ऊर्जा से खाना बनाने वाली लता बताती है कि सौर पैनल नहीं लगा था तब हमें लकड़ी लाने के लिए जंगल में दूर तक जाना पड़ता था। हमें डर भी लगता था। इसके साथ ही अब हमें रसोई में धुंए से भी छुटकारा मिल गया है। ग्रामीण शरद बताते हैं कि सौलर ऊर्जा के उपयोग के बाद से गाँव में बहुत परिवर्तन आया है। 

आईआईटी मुंबई के इंजीनियर देवसुख बताते हैं कि बाचा गाँव में 74 घर हैं। इन सभी घरों में एक-एक हजार वॉट के सोलर पैनल सिस्टम लगे हैं। इसमें चार पैनल, चार बैटरी और एक चूल्हा शामिल है। उनका दावा है कि बारिश के मौसम में सूरज की रौशनी नहीं मिलने पर भी बैटरी के बैकअप से 5-6 घंटे तक यह काम करता है। 

‘अन्नपूर्णा मंडपम’ से बचा रहे हैं प्रतिमाह 500 से 1000 रुपये : 

विद्या भारती ने इस गाँव में एक और सार्थक पहल की शुरुआत की है, जिसे “अन्नपूर्णा मंडपम” नाम दिया गया है। इसका अर्थ है घर का किचन गार्डन। गाँव के लगभग हर घर में यह गार्डन है, जिसमें ग्रामीण घर में उपयोग के लिए सब्जी उगा रहे हैं। इससे हर परिवार के महीने के 500-1000 रूपये की बचत हो जाती है। 

प्लास्टिक मुक्त घूरा :

इस गाँव की एक और बड़ी उपलब्धि है कि ग्रामीणों ने अपने घूरों (कचरा एकत्र करने के स्थान) को प्लास्टिक मुक्त कर लिया है। प्लास्टिक मुक्त घूरे में एकत्र कचरे का उपयोग खेत के लिए जैविक खाद बनाने में किया जाता है। वैसे तो इस गाँव में प्लास्टिक का उपयोग कम ही किया जाता है, लेकिन जो भी प्लास्टिक कचरा निकलता है, उसे अलग रखा जाता है। उसे घूरे में नहीं फेंका जाता है।

गाँव पर बनी फिल्म 'बाचा : द राइजिंग विलेज' को मिला राष्ट्रीय पुरस्कार : 


माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक लोकेन्द्र सिंह और प्रोड्यूसर मनोज पटेल ने इस गाँव कहानी सबके सामने लाने के उद्देश्य से एक डॉक्युमेंट्री फिल्म ‘बाचा : द राइजिंग विलेज’ का निर्माण किया। फिल्म को राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान, हैदराबाद के तत्वावधान में आयोजित ‘नेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑन रूरल डेवलपमेंट’ में द्वितीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके अलावा इस फिल्म को कोलकाता में आयोजित 5वें अंतरराष्ट्रीय विज्ञान फिल्म फेस्टिवल में स्क्रीनिंग हेतु भी चुना गया। 

आदर्श गाँव के रूप में बाचा :

मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के एक छोटे से अनुसूचित जनजाति गाँव “बाचा” की कहानी सबको प्रेरणा देने वाली है। आधुनिक और पारंपरिक विज्ञान के छोटे-छोटे उपायों को अपनाकर, "बाचा" जैसा कोई भी गाँव एक आदर्श गाँव के रूप में खड़ा हो सकता है। इसी बात को समझाने के लिए हमने इस गाँव पर एक फिल्म बनायी। जिसको लेकर अभी तक काफी अच्छी प्रतिक्रियाएं आई हैं। - मनोज पटेल, निर्देशक-संपादक 

हर कोई जाने बाचा की कहानी :

हम चाहते हैं कि बाचा की कहानी हर कोई जाने, ताकि अन्य गाँव भी आदर्श बनें। बाचा जलसंरक्षण और सौर ऊर्जा का बड़ा सन्देश देता है। “इलेक्ट्रिक सोलर इंडक्शन” और “बोरी बंधन” जैसे अनूठे प्रयोग अनुकरणीय हैं। - लोकेन्द्र सिंह, फिल्म प्रोड्यूसर



बाचा की कहानी साधारण कहानी नहीं है। यह पिछड़े गाँव से आदर्श गाँव तक सीमित रह जाने की कहानी भी नहीं है। ‘बाचा’ की यात्रा अभी रुकी नहीं है। आधुनिक और परंपरागत विज्ञान के छोटे उपायों को अपनाकर बाचा ने सफलता की जो नींव रखी हैं, वह उसे और मजबूत करने के लिए प्रयत्नशील है। यह अन्य गाँव को भी राह दिखा रहा है। निसंदेह यह छोटा गाँव आज सबके बीच न केवल चर्चा का बल्कि प्रेरणा का स्रोत भी बन गया है। 

गुरुवार, 28 जनवरी 2021

‘हनुमानजी की भूमिका’ में भारत

आज जब हम 72वां गणतंत्र मना रहे हैं, तब हम गौरव की अनुभूति कर रहे हैं कि भारत अपनी वैश्विक भूमिका को भी प्राप्त करने की ओर तेजी से अग्रसर है। ‘हम भारत के लोग’ इस बात से रोमांचित होते हैं कि ज्ञान-विज्ञान से लेकर आर्थिक क्षेत्र में कभी हम दुनिया का नेतृत्व करते थे। लंबे समय से हम अपने देश को पुन: विश्वगुरु की भूमिका में देखना चाह रहे थे, उसके लिए प्रयासरत थे। हम चाहते हैं कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की अवधारणा का प्रतिपादक हमारा देश वैश्विक पटल पर ‘विश्व परिवार के मुखिया’ की भूमिका का निर्वहन करे। पिछले पाँच-छह वर्षों में भारत ने उस सामर्थ्य को अर्जित किया है। वैश्विक महामारी ‘कोरोना संक्रमण’ की शुरुआत में ही दुनिया ने भारत की इस भूमिका को देखा कि हमने कमजोर देशों के साथ ही समर्थ देशों की भी सहायता की। अब एक बार फिर भारत में निर्मित कोरोना के टीके जरूरतमंद देशों को भेज कर हम अपनी मानवतावादी आचरण की प्रस्तुति कर रहे हैं। 

भारत ने कोरोना के दो स्वदेशी टीके बनाकर न केवल अपने नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा को सुनिश्चित किया है, बल्कि वह अपने अनेक पड़ोसी देशों को टीके अनुदान के तौर पर देकर एक बड़ी लकीर खींच रहा है। पिछले कुछ दिनों में देसी टीकों की खेप भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश, मालदीव, नेपाल, सेशेल्स और मॉरिशस पहुंची है। इसके अलावा सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और मोरक्को को व्यावसायिक तौर पर टीके भेजे जा रहे हैं। इस सूची में अभी कुछ और देश भी जुड़ेंगे। अमेरिकी विदेश विभाग दक्षिण एवं मध्य एशिया ब्यूरो ने पड़ोसी देशों को मुफ्त टीका मुहैया कराने तथा वैश्विक स्तर पर कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए एक बार फिर भारत की प्रशंसा करते हुए उसे ‘सच्चा दोस्त’ बताया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अदनोम घेब्रेयेसस ने महामारी से निजात पाने की कोशिशों में भागीदारी के लिए भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद कहा है।

ब्राजील के राष्ट्रपति जेयर बोलसोनारो तो भारत से सहयोग मिलने पर अत्यधिक कृतज्ञ अनुभव कर रहे हैं। उन्होंने भारत के प्रति धन्यवाद प्रकट करते हुए कोरोना वैक्सीन लाते हुए हनुमानजी का पोस्टर ट्वीट किया है। हमें ज्ञात है कि जब भगवान श्रीराम के भाई लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे, तब हुनमानजी हिमालय से संजीवनी बूटी लेकर आए थे। उसी संजीवनी बूटी ने लक्ष्मणजी के प्राणों की रक्षा की थी। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि ब्राजील के राष्ट्रपति ने भारतीय संस्कृति के आधार ‘रामायण’ के प्रसंग को इस तरह उल्लेख किया। भारत की कोरोना वैक्सीन को उन्होंने ‘संजीवनी’ के रूप में मान्यता दी और भारत को मानवतासेवी बताया है। एक और अच्छी बात यह है कि उन्होंने हिन्दी में भी धन्यवाद ज्ञापित किया है। यह वैश्विक पटल पर भारत के सम्मान एवं उसकी भूमिका को रेखांकित करता है। इन तथ्यों को भारत के विपक्षी राजनीतिक दलों एवं मोदी विरोधी समूह को भी देखना और समझना चाहिए। जिस वैक्सीन को लेकर ‘झूठों का समूह’ दुष्प्रचार कर रहा था, उसके प्रति वैश्विक जगत भारत के प्रति कृतज्ञता प्रकट कर रहा है। उल्लेखनीय है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि हमारी वैक्सीन समूची मानवता के लिए है। इसलिए यह बात स्पष्ट समझ लेनी चाहिए कि अपने पड़ोसियों और मित्र देशों को टीका देना, केवल कूटनीति या व्यापार का मामला नहीं है बल्कि सदैव से मानवता की चिंता भारत की प्राथमिकता है।


शनिवार, 9 जनवरी 2021

लक्ष्य : हार और जीत ही काफी नहीं जिंदगी में...

यूट्यूब चैनल 'अपना वीडियो पार्क' पर देखें 


हार और जीत ही काफी नहीं
जिंदगी में मेरे लिए
मीलों दूर जाना है अभी मुझे।
निराशा के साथ बंधी
आशा की इक डोर थामे
उन्नत शिखर की चोटी पर चढ़ जाना है मुझे।
हार और जीत ही....


है अंधेरा घना लेकिन
इक दिया तो जलता है रोशनी के लिए
उसी रोशनी का सहारा लिए
भेदकर घोर तमस का सीना
उस दिये का हाथ बंटाना है मुझे।
हार और जीत ही...


चांद पर पहुंच पाऊंगा या नहीं
ये सोच अभी नहीं रुकना है मुझे
चलता रहा विजय की उम्मीद लिए
तो चांद पर न सही
तारों के बीच टिमटिमाना है मुझे।
हार और जीत ही...

- लोकेन्द्र सिंह -

(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)