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रविवार, 8 अक्टूबर 2023

ग्वालियर में ‘अल्मोड़ा’

अपने आस-पास पर्यटन


उत्तराखंड के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल अल्मोड़ा के बारे में आप सबने सुना होगा। अल्मोड़ा अपने सुरम्य वातावरण के साथ ही साहसिक गतिविधियों के लिए पर्यटकों को आमंत्रित करता है। अल्मोड़ा अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा और वन्य जीवन के लिए प्रसिद्ध है। यह तो हुई हिमालय की गोद में बसे विश्व प्रसिद्ध अल्मोड़ा की बात। यदि मैं आपसे कहूँ कि ग्वालियर में भी एक अल्मोड़ा है, तो आप हैरान रह जाएंगे। जी हाँ, ग्वालियर में भी सुरम्य वातावरण और ऊंची-नीची पहाड़ियों की गोद में ‘अल्मोड़ा’ मुस्कुरा रहा है। आमखो से सटी विशेष सशस्त्र बल (एसएएफ) की पहाड़ियों पर पर्यावरण प्रेमियों ने निरंतर पौधारोपण करके सूखी पहाड़ियों का नाना प्रकार के वृक्षों से शृंगार कर दिया है। यहाँ कुछ हिस्सों में तो सघन वन विकसित हो गए हैं। ऐसे ही एक हिस्से को पर्यावरण प्रेमी डॉ. नरेश त्यागी ने विकसित किया और उसे नाम दिया है- अल्मोड़ा। यदि आप ट्रैकिंग के शौकीन हैं और प्रकृति की गोद में आनंद आता है, तब यह स्थान अवश्य ही आपके हृदय को प्रसन्नता से भर देगा।

मंगलवार, 28 जून 2022

पिपरौआ गाँव के सरपंच शैलेन्द्र सिंह यादव

जो बाबा पुष्पहार पहने हैं, चुनाव वे नहीं जीते हैं। जो शांत चित्त से पास में खड़े हैं, चेकवाली आधी बांह की शर्ट में, वे चुने गए हैं सरपंच। नेताजी शैलेंद्र सिंह यादव। सही तो है, वे कहां जीते हैं। जीत तो समूचे गांव की हुई है। हर कोई जीता है। इसलिए तो समाज से प्राप्त आशीर्वाद के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का भाव ही उनके लिए सर्वोपरि है। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा...

ये इतने ही सहज और सरल हैं। जीत का कोई अभिमान नहीं। विनम्र। हंसमुख। संवेदनशील। उनका मिलनसार व्यक्तित्व उन्हें बाकी सबसे अलग पहचान देता है। श्रेय की भूख नहीं। कर्तव्य समझकर काम किया और भूल गए। कभी बड़प्पन नहीं दिखाते। सदा छोटे बनकर रहते हैं। इसलिए समूचे गांव ने खूब सारा प्रेम दिया। ग्राम पिपरौआ ने मास्टर साहब के लड़के शैलेंद्र सिंह यादव को सरपंच चुना है, जो अपने पिता की तरह ही सुलझे हुए और गांव के विकास के लिए समर्पित हैं। 

जिस दिन पंचायत चुनाव के मैदान में नेताजी ने अपना परचम उठाया था, उसी वक्त से जीत सुनिश्चित थी, बस प्रक्रिया और परिणाम आने की औपचारिकता बाकी थी। 

लोग चुनाव जीतने के लिए विकास और सहयोग के वायदे करते हैं। यह ऐसे चुनिंदा लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने सरपंच बने बिना ही गांव की तस्वीर बदलने में अग्रणी भूमिका निभाई है। 

रिष्ठ पत्रकार अनंत विजय और शिवानन्द द्विवेदी की पुस्तक 'परिवर्तन की ओर' में जिला पंचायत भितरवार के गाँव पिपरौआ का उल्लेख

नेताजी शैलेंद्र सिंह यादव तो पहले से ही सच्चे जनप्रतिनिधि थे। अब लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने हुए सरपंच भी बन गए। 

उन्होंने अपने सामर्थ्य का उपयोग सदा ही लोगों की भलाई के लिए किया है। वे लोगों की सहायता के लिए हर समय एक फोन कॉल की दूरी पर उपलब्ध रहते हैं। समाज से ऐसा गहरा नाता है कि अनेक जरूरतमंदों की मदद स्वयं आगे बढ़कर उस समय में की, जब उन्हें कहीं से सहायता की उम्मीद नहीं थी। शासकीय योजनाओं का लाभ ग्रामीण बंधुओं को मिले, ऐसे प्रयास भी लगातार उनकी ओर से रहते हैं। 

इस विजय के साथ यह विश्वास सबको है कि गांव की तरक्की को अब और पंख लग जायेंगे। शासकीय योजनाओं का लाभ गांव के अधिकतम लोगों को मिल सकेगा। नेताजी के नेतृत्व में गांव खुशहाली की ओर बढ़ेगा और बाकी अन्य पंचायतों के सामने उदाहरण बनेगा।

ईश्वर से प्रार्थना है कि सार्वजनिक जीवन में उनकी यात्रा और आगे बढ़े। मध्यप्रदेश की राजधानी उनकी प्रतीक्षा में है...

पंचायत चुनाव में जीत के बाद पिपरौआ के ग्रामवासियों का धन्यवाद ज्ञापन एवं सम्मान करते नवनिर्वाचित सरपंच शैलेन्द्र सिंह यादव


पिपरौआ गाँव के सरपंच शैलेन्द्र सिंह यादव / Shelendra Singh Yadav

रविवार, 11 जुलाई 2021

अपना शहर-अपने लोग

देखें वीडियो : ग्वालियर तू बहुत याद आता है | Gwalior


गोपाचल पर्वत पर शान से खड़ा

आसमान का मुख चूमता 'दुर्ग'

नदीद्वार, ज्येन्द्रगंज, दौलतगंज

नया बाजार से कम्पू को आता रास्ता

वहां बसा है मेरा प्यारा घर

मुझे बहुत भाता है 

ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है। 


सात भांति के वास्तु ने संवारा

सबको गोल घुमाता 'बाड़ा' 

दही मार्केट में कपड़ा, टोपी बाजार में जूता

गांधी मार्केट में नहीं खादी का तिनका

पोस्ट ऑफिस के पीछे नजर बाग मार्केट में 

मेरा दोस्त कभी नहीं जाता है

ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है। 


सन् 1857 के वीरों की विजय का गवाह

शहर की राजनीति का बगीचा 'फूलबाग'

बाजू से निकला स्वर्णरेखा नाला

कईयों को कर गया मालामाल

नए-नए बने चौपाटी की चाट खाने

शाम को सारा शहर जाता है

ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है। 


चाय की दुकान, कॉलोनी का चौराहा

यहां सजती हैं दोस्तों की महफिल

देश की, विदेश की, आस की, पड़ोस की

बातें होती दुनिया जहांन की

मां की ममता, पिता का आश्रय 

बहन का दुलार, पत्नी का प्यार बुलाता है

ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है। 


- लोकेन्द्र सिंह -

(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)

गुरुवार, 18 जून 2020

ग्वालियर में रानी लक्ष्मीबाई के समाधि स्थल पर स्वातंत्र्यवीर सावरकर


यह ऐतिहासिक चित्र उस समय का है जब स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर 1937 में ग्वालियर में आयोजित लक्ष्मीबाई बलिदान दिवस समारोह में आए थे।

हमें यह याद रखना चाहिए...
भारत के जिस स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व भारत की बेटी रानी लक्ष्मीबाई ने किया था, उसे अंग्रेज और उनके दरबारी लेखक एक साजिश के तहत 'सिपाही विद्रोह' लिख रहे थे।

जब अंग्रेज भारत की स्वतंत्रता के लिए 1857 की क्रांति से उठी चिंगारी को दबाने का प्रयास कर रहे थे। एक सुनियोजित आंदोलन को मात्र 'सिपाही विद्रोह' साबित करने में लगे थे, तब स्वातन्त्र्यवीर सावरकर ने तथ्यों के आधार पर 1857 की क्रांति को 'भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम' सिद्ध किया।

ऐसा लिखने वाले, कहने वाले और उसे सिद्ध करने वाले वे पहले लेखक हैं।

इस संबंध में उन्होंने प्रेरक पुस्तक भी लिखी, जो क्रांतिकारियों की गीता बन गई। यह दुनिया की इकलौती पुस्तक है, जिसे किसी सरकार ने प्रकाशित होने से पूर्व ही प्रतिबंधित कर दिया था।

'1857 का स्वातंत्र्य समर' पुस्तक को यशस्वी क्रांतिकारी भगत सिंह ने ब्रिटिश सरकार को धता बताते हुए प्रकाशित करा कर क्रांतिकारी साथियों में वितरित कराया। अन्य क्रांतिकारियों ने भी इस पुस्तक को योजनापूर्वक प्रकाशित कराया।

यह चित्र समाचार पत्र 'स्वदेश' में प्रकाशित हुआ है।



सोमवार, 10 अगस्त 2015

स्वच्छता को आदत बनाना पड़ेगा

 के न्द्र सरकार ने देश के स्वच्छ शहरों की सूची जारी की है। इस सूची में दक्षिण भारत के शहरों ने बाजी मारी है। दक्षिण भारत के 39 शहर शीर्ष 100 शहरों में स्थान बनाने में कामयाब रहे हैं। जबकि उत्तर भारत के महज 12 शहर ही टॉप 100 में आ सके हैं। शीर्ष पर कर्नाटक का मैसूर है। जबकि मध्यप्रदेश का शहर दमोह सूची में सबसे आखिरी स्थान पर रहा। सूची में भिण्ड 475, नीमच 467, ग्वालियर 400 और उज्जैन 355वें पायदान पर रहा। मध्यप्रदेश के लिए सोचने की बात है कि उसकी राजधानी (भोपाल) भी स्वच्छता के मामले में 106वें स्थान पर है। देश के एक लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की स्वच्छता के मामले में स्थिति क्या है, यह जानने के लिए सरकार ने 31 राज्यों के 476 शहरों का सर्वे कराया था। सर्वे में सरकार ने खुले में शौच, सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट, वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट, पानी की गुणवत्ता और पानी से होने वाली बीमारियों से मौतों के आंकड़े का अध्ययन किया।

मंगलवार, 24 मार्च 2015

अपनी जड़ों में लौटना होगा

ग्वालियर में नववर्ष के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम.
 वे लेन्टाइन डे (वीक) के रोज-डे और हग-डे से लेकर किस-डे तक की जानकारी रखने वाले आज के कूल डूड और हॉट बेबीज को भारतीय त्योहारों की न्यूनतम जानकारी है। यदि आप उनसे पूछ लें कि भारतीय नववर्ष कब है तो सबके सब 'जीरो' नजर आएंगे। अभारतीय संस्कृति और बाजारवाद के 'डे' (त्योहार) मनाने में आज की पीढ़ी इतनी व्यस्त है कि अपनी संस्कृति के पन्ने पलटने की फुरसत उन्हें नहीं है। 31 दिसम्बर की रात से 'हुड़दंग' के साथ ग्रेगेरियन कैलेण्डर का स्वागत करना ही उनके लिए नववर्ष का उत्सव है। बहरहाल, आज की पीढ़ी को अपने नववर्ष का पता भी कैसे होगा? लम्बे समय से भारतीय मानस सुप्त अवस्था में है। उसे भान ही नहीं है कि उसके पूर्वजों ने भी कैलेण्डर बनाया था, वह भी अन्य की अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक। अंग्रेजों की लिखीं इतिहास की किताबों या इन किताबों को पढ़कर तैयार हुए 'स्वतंत्र इतिहासकारों' ने हमेशा यही बताया कि विज्ञान का सूरज तो पश्चिम में ही उगा था, भारत के लोग तो सदैव गाय चराने में ही व्यस्त रहे। भारत लम्बे समय तक दासता में रहा है। उसका कुप्रभाव भारतीय मानस पर अब तक है। बार-बार चेताने पर भी वह सजग नहीं हो रहा है। यदि कोई व्यक्ति भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ पलटकर आज की पीढ़ी को अपने अतीत से प्रेरणा लेने की बात करता है तो उस व्यक्ति को 'स्वतंत्र इतिहासकार' ढकोसलावादी और भ्रम फैलाने वाला करार दे देते हैं। मुंबई में आयोजित राष्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस में विद्वान कैप्टन आनंद जे. बोडास और अमेय जाधव ने अपने शोधपत्र में तथ्यों के आधार पर बताया कि प्राचीन भारत का विज्ञान बहुत उन्नत था। उस समय की विमान तकनीक के आसपास भी आज की विमान तकनीक पहुंच नहीं सकी है। लेकिन, उनके शोध को वामपंथियों और दूसरी विचारधाराओं के लोगों ने लेख पर लेख लिखकर और भाषण दे-देकर कूड़ा साबित करने का प्रयास किया। बोडास और जाधव के शोध को आगे बढ़ाने की बात किसी ने नहीं की, जिसने की, उसे इन्होंने अवैज्ञानिक करार दे दिया। इसी तरह जब भी भारतीय कैलेण्डर की बात निकलती है, अंग्रेजियत से प्रभावित और भारतीय संस्कृति की चमक से पीडि़त बुद्धिजीवियों की बिरादरी उत्तेजित हो जाती है। वे इस तथ्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते की भारत का अपना शानदार इतिहास रहा है। वे भारतीय नववर्ष और उसकी वैज्ञानिक गणना पर प्रश्न चिह्न खड़ा कर देते हैं? भारतीय नववर्ष मनाने का आग्रह करने वालों की हँसी उड़ाने का प्रयास करते हैं।

बुधवार, 31 दिसंबर 2014

हैप्पी न्यू ईयर या नववर्ष, तय कीजिए

 दृ श्य एक। सुबह के पांच बजे का समय है। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि यानी वर्ष प्रतिपदा का मौका है। ग्वालियर शहर के लोग शुभ्रवेश में जल विहार की ओर बढ़े जा रहे हैं। जल विहार के द्वार पर धवल वस्त्र पहने युवक-युवती खड़े हैं। उनके हाथ में एक कटोरी है। कटोरी में चंदन का लेप है। वे आगंतुकों के माथे पर चंदन लगा रहे हैं। भारतीय संगीत की स्वर लहरियां गूंज रही हैं। सुर-ताल के बेजोड़ मेल से हजारों मन आल्हादित हो रहे हैं। बहुत से लोगों ने तांबे के लोटे उठाए और जल कुण्ड के किनारे पूर्व की ओर मुंह करके खड़े हो गए। सब अघ्र्य देकर नए वर्ष के नए सूर्य का स्वागत करने को तत्पर हैं। तभी सूर्यदेव ने अंगडाई ली। बादलों की चादर को होले से हटाया। अपने स्वागत से शायद सूर्यदेव बहुत खुश हैं। तभी उनके चेहरे पर विशेष लालिमा चमक रही है। सूर्यदेव के आते ही जोरदार संघोष हुआ। सबने आत्मीय भाव से, सकारात्मक ऊर्जा से भरे माहौल में एक-दूसरे को नववर्ष की शुभकामनाएं दीं। 
       दृश्य दो। दिसम्बर की आखिरी रात। पुलिस परेशान है कि 'हैप्पी न्यू ईयर वालों' को कैसे संभाला जाएगा? शराब पीकर बाइक-कार को हवाईजहाज बनाने वालों को कैसे आसानी से लैंड कराया जा सकेगा? खैर पुलिस के तनाव के बीच जैसे ही रात १२ बजे घड़ी की दोनों सुईयां एक जगह सिमटीं, जोरदार धमाकों की आवाज आती है। आसमान आतिशबाजी से जगमग हो उठा। आस-पास के घरों से म्यूजिक सिस्टम पर कान-फोडू संगीत बज उठा है। देर शाम से नए साल के स्वागत में शराब पी रहे लौंडे अपने बाइक पर निकल पड़े हैं। कुछ बाइकर्स कॉलोनी में भी आए हैं। सीटी बजाते हुए, चीखते-चिल्लाते हुए, धूम मचा रहे हैं। नारीवादी आंदोलन के कारण खुद को 'ठीक से' पहचान सकीं लड़कियों ने भी लड़कों से पीछे नहीं रहने की कसम खा रखी है। शोर-शराबे के बीच जैसे-तैसे सो सके। सुबह उठे तो अखबार में फोटो-खबर देख-पढ़कर जाना कि नए साल का स्वागत बड़ा जोरदार हुआ। कई लीटर शराब पी ली गई। बहुत-से मुर्गे-बकरे भी निपट गए। कुछ लोग पीकर सड़क किनारे गटर के ढक्कन पर पाए गए तो कुछ लोग सड़क दुर्घटना में घायल हो गए, जिनकी एक जनवरी अस्पताल में बीती। और भी बहुत कुछ है बताने को। 
       दो तस्वीर आपने देखीं। इनमें नया कुछ नहीं है। कुछ दिन से यह सब बताने वाले चित्र आपके फेसबुक पेज और व्हाट्सअप पर आ रहे होंगे। हो सकता है आपने इन्हें लाइक-शेयर-कमेन्ट भी किया हो। हो सकता है आप थोड़ी देर के लिए भारतीय हो गए हों और आपने इन्हें आगे बढ़ा दिया हो। आपको अचानक से अपनी संस्कृति खतरे में नजर आई हो। बहरहाल, समस्या यहां सिर्फ संस्कृति संरक्षण की नहीं है। यहां यह प्रश्न भी नहीं है कि मेरी संस्कृति अच्छी, उनकी संस्कृति घटिया। यहां प्रश्न लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी नहीं है। असल में प्रश्न तो यह है कि हमें किस तरफ आगे बढ़ाना चाहिए? हमें भारतीय मूल्यों, भारतीय चिंतन और भारतीय संस्कृति की ओर बढ़ाना चाहिए या फिर पश्चिम से आए कचरे को भी सिर पर रखकर दौड़ लगा देना है? क्या भारतीय संस्कृति पुरातनपंथी है? क्या वर्ष प्रतिपदा 'बैकवर्ड' समाज का त्योहार है और न्यू ईयर 'फॉरवर्ड' का? प्रश्न तो यह भी है कि वास्तव में हमारा आत्म गौरव कब जागेगा? कब हमारी तरुणाई अंगडाई लेगी? कब हम अपने मूल्यों में अधिक भरोसा दिखाएंगे? कब हम अपनी चीजों को दुनिया से सामने प्रतिष्ठित करेंगे? 
       समय तो तय करना पड़ेगा, खुद को बदलने का। सोचते-सोचते, भाषण देते-देते, कागज कारे करते-करते बहुत वक्त बीत गया है। अब समय आ गया है कि हम भारतीय हो जाएं। आखिर कब तक प्रगतिशील दिखने के लिए दूसरे का कोट-जैकेट पहने रहेंगे? अब हम जान रहे हैं कि एक जनवरी को हमारा नववर्ष नहीं है। कारण भी क्या हैं कि एक जनवरी को नववर्ष मनाया जाए? सिर्फ यही कि अंग्रेजी कैलेण्डर बदलता है। अब तय कीजिए क्या यह हमारे लिए उत्सव मनाने का कारण हो सकता है? यदि हो सकता है तो निश्चित ही हमारे पुरखे तय कर गए होते। हम तो वैसे भी उत्सवधर्मी हैं, त्योहार मनाने के मौके खोजते हैं। लेकिन, हमने इस नववर्ष को उत्सव घोषित नहीं किया, क्योंकि हमारे लिए एक जनवरी को नया साल मनाने का कोई कारण नहीं था। हिन्दू जीवनशैली पूर्णत: वैज्ञानिक है। यह तथ्य सिद्ध हो चुका है। इसीलिए भारतीय मनीषियों ने प्रकृति के चक्र को समझकर बताया कि चैत्र से नववर्ष शुरू होता है। उस वक्त मौसम बदलता है। वसंत ऋतु का आगमन होता है। प्रकृति फूलों से मुस्काती है। फसल घर आती है तो किसानों के चेहरे पर खुशी चमकती है। दुनिया के दूसरे कैलेण्डर से भारतीय कैलेण्डर की तुलना करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि भारतीय मनीषियों की कालगणना कितनी सटीक और बेहतर थी। वर्ष प्रतिपदा को ही नववर्ष मनाने का एक प्रमुख कारण यह है कि भारतीय कालगणना के मुताबिक इसी दिन पृथ्वी का जन्म हुआ था। 
       बहुत से विद्वान कहते हैं कि जब ईस्वी सन् ही प्रचलन में है तो क्यों भारतीय नववर्ष को मनाने पर जोर दिया जाए। जब एक जनवरी से ही कामकाज का कैलेण्डर बदल रहा है तो इसे ही नववर्ष मनाया जाना चाहिए। जवाब वही है, सनातन। जब सब काम ग्रेगेरियन कैलेण्डर से ही किए जा रहे हैं तो फिर निजी जीवन में जन्म से लेकर अंतिम संस्कार तक की सभी प्रक्रियाओं के लिए पंचाग क्यों देखा जाता है। क्योंकि अंतर्मन में विश्वास बैठा है कि कालगणना में भारतीय श्रेष्ठ थे। भारतीय कैलेण्डर का पूर्णत: पालन करने पर कोई क्या कहेगा, इसकी चिंता हमें खाए जाती है। सारी चिंताएं छोड़कर अपने कैलेण्डर को प्रचलन में लाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। एक मौका हाथ आया था लेकिन पाश्चात्य प्रेम में फंसे हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वह मौका खो दिया था। वर्ष 1952 में वैज्ञानिक और औद्योगिक परिषद ने पंचाग सुधार समिति की स्थापना की थी। समिति ने 1955 में अपनी रिपोर्ट में विक्रम संवत को भी स्वीकार करने की सिफारिश प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से की थी। लेकिन, पंडितजी ने इस सिफारिश को नजरअंदाज कर दिया। खुद को सेक्यूलर कहने वाले प्रधानमंत्री ने ऐसे कैलेण्डर को मान्यता दी, जिसका संबंध एक सम्प्रदाय से है। जनवरी से शुरू होने वाले नववर्ष का संबंध ईसाई सम्प्रदाय और ईसा मसीह से है। रोम के सम्राट जूलियस सीजर इसे प्रचलन में लाए। जबकि भारतीय नववर्ष का संबंध हिन्दू धर्म से न होकर प्रकृति से है। यानी खुद को सेक्यूलर कहने वाले विद्वानों को भी अंग्रेजी नववर्ष का विरोध कर पंथ निरपेक्ष भारतीय कैलेण्डर के प्रचलन के लिए आंदोलन करना चाहिए। 
       बहरहाल, खुद से सवाल कीजिए कि अपने नववर्ष को भूल जाना कहां तक उचित है? अगर भारतीयपन बचा होगा तो निश्चित ही आप जरा सोचेंगे। यह भी सोचेंगे कि वास्तव में उत्सव के रंग एक जनवरी के नववर्ष में दिखते हैं या फिर चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा में। उत्सव मनाने का तरीका पाश्चात्य का अच्छा है या भारत का? कब तक गुलामी के प्रतीकों को गले में डालकर घूमेंगे? अब अपने मूल्यों, अपनी संस्कृति, अपनी पहचान और अपने ज्ञान-विज्ञान को दुनिया में स्थापित करने का वक्त आ गया है। 

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

नदी नहीं बची तो हम कहां बचेंगे

 स ब जानते हैं कि नदियों के किनारे ही अनेक मानव सभ्यताओं का जन्म और विकास हुआ है। नदी तमाम मानव संस्कृतियों की जननी है। प्रकृति की गोद में रहने वाले हमारे पुरखे नदी-जल की अहमियत समझते थे। निश्चित ही यही कारण रहा होगा कि उन्होंने नदियों की महिमा में ग्रंथों तक की रचना कर दी और अनेक ग्रंथों-पुराणों में नदियों की महिमा का बखान कर दिया। भारत के महान पूर्वजों ने नदियों को अपनी मां और देवी स्वरूपा बताया है। नदियों के बिना मनुष्य का जीवन संभव नहीं है, इस सत्य को वे भली-भांति जानते थे। इसीलिए उन्होंने कई त्योहारों और मेलों की रचना ऐसी की है कि समय-समय पर समस्त भारतवासी नदी के महत्व को समझ सकें। नदियों से खुद को जोड़ सकें। नदियों के संरक्षण के लिए चिंतन कर सकें। हर तीन साल में देश के चार अलग-अलग संगम स्थलों पर लगने वाला कुंभ भी इसी चिंतन परंपरा का सबसे बड़ा उदाहरण है। 'नद्द: रक्षति रक्षित:' (नदी संरक्षण) विषय पर आहूत 'मीडिया चौपाल' को ऐसे ही उदाहरण की श्रेणी में रखा जा सकता है। नदी संरक्षण के लिए वेब संचालकों, ब्लॉगर्स एवं जन-संचारकों के जुटान का स्वागत किया जाना चाहिए। 'विकास की बात विज्ञान के साथ : नये मीडिया की भूमिका' और 'जन-जन के लिए विज्ञान और जन-जन के लिए मीडिया' जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर पिछले दो वर्षों में मीडिया चौपाल का सफल आयोजन भोपाल में हो चुका है। तीसरी मीडिया चौपाल दिल्ली में भारतीय जनसंचार संस्थान के परिसर में जमेगी। भारत की लगभग सभी नदियों और उससे जुड़े जीवों (मनुष्य भी शामिल) के सम्मुख जब जीवन का संकट खड़ा हो तब संवाद के नए माध्यम 'सोशल मीडिया' की पहुंच, प्रयोग और प्रभाव का नदी संरक्षण के लिए उपयोग करने पर मंथन करना अपने आप में महत्वपूर्ण और आवश्यक पहल है। 
         नदी संरक्षण में सोशल मीडिया की कितनी अहम भूमिका हो सकती है, इसे सब समझते हैं। सोशल मीडिया की ताकत और प्रभाव की अनदेखी शायद ही कोई करे। पिछले चार-पांच वर्षों में सोशल मीडिया का प्रभाव जोरदार तरीके से बढ़ा है। सस्ते स्मार्टफोन की बाढ़ ने तो ज्यादातर लोगों को सोशल मीडिया का सिपाही बना दिया है। यह आम आदमी का अपना अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया है। इसका उपयोग सहज है, इसलिए यह मीडिया अधिक सोशल हो गया है। दोतरफा संवाद, बिना रोक-टोक के अपनी बात कहने की आजादी और सहज उपलब्धता के कारण आम आदमी ने इसे हाथों-हाथ लिया है। स्वयं को अभिव्यक्त करने के साथ-साथ आदमी यहां सार्थक संवाद भी कर रहा है। पिछली सरकार को अपने कई फैसले इसलिए वापस लेने पड़े क्योंकि सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ जमकर माहौल बनाया गया था। लोक कल्याण के लिए बनाई गईं कमजोर नीतियों पर जोरदार बहस आयोजित हुईं। सोशल मीडिया का ही असर है कि समाज में फिर से राजनीतिक चेतना बढ़ी है। राजनीति को कीचड़ की संज्ञा देकर इससे बचने वाले युवा भी सोशल मीडिया के माध्यम से भारतीय राजनीति का स्वास्थ्य सुधारने का प्रयास कर रहे हैं। क्रांति की अलख जगा रहे हैं। भारत के संदर्भ में देखें तो अन्ना हजारे के आंदोलन को खाद-पानी सोशल मीडिया ने ही दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसका सबसे बेहतर उपयोग कर इसकी ताकत और लोकप्रियता को जग-जाहिर कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी की अभूतपूर्व जीत और कांग्रेस की ऐतिहासिक हार की कहानी कहीं न कहीं सोशल मीडिया पर ही लिखी जा रही थी। 'तहलका' की एक रिपोर्ट के मुताबिक पेशेवर आंदोलनकारी भी सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। यानी इस प्रभावशाली माध्यम का उपयोग हर कोई कर रहा है। राजनेता से लेकर अभिनेता और तमाम चर्चित शख्सियतें रोज ट्विटर, फेसबुक और ब्लॉग सहित अन्य सोशल मंचों से जुड़ रहे हैं। इन सबके बीच पर्यावरण से जुड़े लोग ही कहीं पीछे खड़े दिखते हैं। नदी और मानव जाति का कल बचाने के लिए उन्हें और हमें भी सोशल मीडिया पर सक्रियता बढ़ानी होगी। सोशल मीडिया के माध्यम से जन जागरण करना होगा। आखिर नदी बचाने के लिए हमें अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को स्पष्टतौर पर समझना ही होगा। सामाजिक जिम्मेदारी तय करने के लिए संचार के सामाजिक माध्यम से अच्छा मंच कहां हो सकता है। बस, जरूरत है इस दिशा में सार्थक और सामूहिक प्रयास करने की। मीडिया चौपाल के प्रयास से यह संभव हो सके तो कितना सुखद होगा। 
        अब जरा एक नजर नदियों की स्थिति पर भी डाल लेते हैं ताकि हम अपनी जिम्मेदारी को ठीक से समझ लें और उसे अधिक वक्त के लिए टालें नहीं बल्कि तत्काल नदी संरक्षण में अपनी भूमिका तलाश लें। नदियां हमें जीवन देती हैं लेकिन विडम्बना देखिए कि हम उन्हें नाला बनाए दे रहे हैं। मोक्षदायिनी श्री गंगा भी इससे अछूति नहीं है। मां गंगा का आंचल उसके स्वार्थी पुत्रों ने कुछ जगहों पर इतना मैला कर दिया है कि उसके वजूद पर ही संकट खड़ा हो गया है। धार्मिक क्रियाकलापों से गंगा उतनी दूषित नहीं हो रही जितनी कि तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या, जीवन के निरंतर ऊंचे होते हुए मानकों, औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के हुए अत्यधिक विकास के कारण मैली हो रही है। गंगा सहित अन्य नदियों के प्रदूषित होने का सबसे बड़ा कारण सीवेज है। बड़े पैमाने पर शहरों से निकलने वाला मल-जल नदियों में मिलाया जा रहा है जबकि उसके शोधन के पर्याप्त इंतजाम ही नहीं हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपने अध्ययन में कहा है कि देशभर के ९०० से अधिक शहरों और कस्बों का ७० फीसदी गंदा पानी पेयजल की प्रमुख स्रोत नदियों में बिना शोधन के ही छोड़ दिया जाता है। कारखाने और मिल भी नदियों को प्रदूषित कर रहे हैं। हमने जीवनदायिनी नदियों को मल-मूत्र विसर्जन का अड्डा बनाकर रख दिया है। नदियों में सीवेज छोडऩे की गंभीर भूल के कारण ग्वालियर की दो नदियां स्वर्णरेखा नदी और मुरार नदी आज नाला बन गई हैं। इंदौर की खान नदी भी गंदे नाले में तब्दील हो गई है। कभी इन नदियों में पितृ तर्पण, स्नान और अठखेलियां करने वाले लोग अब उनके नजदीक से गुजरने पर नाक-मुंह सिकोड़ लेते हैं। यह स्थिति देश की और भी कई नदियों के साथ हुई है। देश की ७० फीसदी नदियां प्रदूषित हैं और मरने के कगार पर हैं। इनमें गुजरात की अमलाखेड़ी, साबरमती और खारी, आंध्रप्रदेश की मुंसी, दिल्ली में यमुना, महाराष्ट्र की भीमा, हरियाणा की मारकंडा, उत्तरप्रदेश की काली और हिंडन नदी सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं। गंगा, नर्मदा, ताप्ती, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी, ब्रह्मपुत्र, सतलुज, रावी, व्यास, झेलम और चिनाब भी बदहाल स्थिति में हैं।
         भारत सरकार ने करोड़ों रुपये जल और नदी के संरक्षण पर खर्च कर दिए हैं लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही है। नदियां साफ-स्वच्छ होने की जगह और अधिक मैली ही होती गई हैं। आखिर नदियों को बचाने की रणनीति में कहां चूक होती रही है? क्यों हम अपनी नदियों को मैला होने से नहीं बचा पा रहे हैं? क्या किया जाए कि नदियों का जीवन बच जाए? क्या उपाय करें कि नदियां नाला न बनें? इन सब सवालों पर मंथन जरूरी है। समाज का जन जागरण जरूरी है। प्रत्येक भारतवासी को यह याद दिलाने की जरूरत है कि नदी नहीं बचेगी तो हम भी कहां बचेंगे? नदी के जल की कल-कल है तो कल है और जीवन है। नदियों में मल-मूत्र (सीवेज) और औद्योगिक कचरा छोडऩा सरकार को तत्काल प्रतिबंधित करना चाहिए। नदियों के संरक्षण के अभियान में अब तक समाज की भागीदारी कभी सुनिश्चित नहीं की गई। जबकि समाज को उसकी जिम्मेदारी का आभास कराए बगैर नदियों का संरक्षण और शुद्धिकरण संभव ही नहीं है। यह आंदोलन है, भले ही सरकारी योजना की शक्ल में है। हम जानते हैं कि समाज की सक्रिय भागीदारी के बिना कोई भी आंदोलन अपने लक्ष्य को नहीं पा सकता। मीडिया चौपाल पर होने वाले मंथन में इन सब सवालों पर गंभीर विमर्श होना चाहिए। जन संचार के माध्यमों से जुड़े लोगों को अपनी भूमिका तय करने के साथ ही इस आंदोलन को समाज के बीच ले जाने के लिए भी प्रयास करने चाहिए। 'हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।' कवि दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां मीडिया चौपाल में सबसे लिए प्रेरणा और पथ-प्रदर्शन का काम करें तो निश्चित ही नदी संरक्षण की दिशा में एक बड़ी मुहिम शुरू हो सकती है। 

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

चम्बल में भी है संसद

मितावली स्थित चौसठ योगिनी शिवमंदिर 
 अ तुलनीय भारत का दिल बेहद खूबसूरत है। घुमक्कड़ी के शौकीनों के लिए मध्यप्रदेश में कई ठिकाने हैं। यह अलग बात है कि कई शानदार पर्यटन स्थल अब भी पर्यटकों की बाट जोह रहे हैं। मुरैना जिले के मितावली गांव में स्थित चौसठ योगिनी शिवमंदिर अपनी वास्तुकला और गौरवशाली परंपरा के लिए आसपास के इलाके में तो प्रसिद्ध है लेकिन मध्यप्रदेश पर्यटन के मानचित्र पर जगह नहीं बना सका है। अपने क्रियेटिव विज्ञापनों को लेकर चर्चित मध्यप्रदेश का पर्यटन विभाग चौसठ योगिनी शिवमंदिर की मार्केटिंग ढंग से नहीं कर सका है। आप यदि मितावली आएंगे और नौवीं सदी के इस मंदिर को निहारेंगे तो हैरत से भर उठेंगे। जमीन से करीब ३०० फीट ऊंचाई पर एक पहाड़ी पर बने गोलाकार शिवमंदिर को देखकर अनायास ही आपको मशहूर ब्रिटिश वास्तुकार सर एडविन लुटियंस की याद आएगी। सर लुटियंस, जिन्होंने दिल्ली को एक नया रूप, रंग और आकार दिया था। भारत के खूबसरत संसद भवन की रचना के लिए आज भी उन्हें तहेदिल से याद किया जाता है। मितावली में इकंतेश्वर महादेव मंदिर के नाम से भी पहचाने जाने वाला चौसठ योगिनी शिवमंदिर हू-ब-हू हमारी संसद के जैसा दिखता है। मंदिर परिसर में आकर दिमाग की कुछ खिड़कियां खुलने लगती हैं और हवा के साथ कुछ प्रश्न इन खिड़कियों से होकर भीतर घुस आते हैं। क्या वाकई हमारी संसद के भवन की परिकल्पना लुटियंस की मौलिक सोच थी? १२ फरवरी १९२१ को दिल्ली में जिस संसद भवन की आधारशिला रखी गई, क्या उसके वास्तु की प्रेरणा लुटियंस को चम्बल के चौसठ योगिनी शिवमंदिर से मिली थी? ये कुछ सवाल हैं जो इतिहास के विद्यार्थियों के लिए शोध का विषय तो बनते ही हैं। गहन शोध के जरिए ही इन सवालों के सही जवाब भी हमारे सामने आएंगे। तब ही हम गर्व के साथ कह सकेंगे कि दुनिया में अपनी खूबसूरती के लिए विख्यात भारतीय संसद की इमारत की परिकल्पना सर लुटियंस के दिमाग की उपज नहीं बल्कि गौरवशाली भारतीय वास्तुकला का ही एक नायाब नमूना है।

सोमवार, 24 मार्च 2014

शिव मंदिरों का खजाना बटेश्वर

 ए क नहीं, दो नहीं, लगभग आधा सैकड़ा शिव मंदिर। एक ही जगह पर, एक ही परिसर में। आठवीं शताब्दी की कारीगरी का उत्कृष्ट नमूना। आसपास बिखरे पड़े तमाम अवशेष। पुरातत्व विभाग और सरकार ईमानदारी से प्रयास करते रहेंगे तो निश्चित ही चारों तरफ बिखरे पड़े इन्हीं अवशेषों में से और मंदिर जी उठेंगे। जैसे फीनिक्स पक्षी के बारे में कहा जाता है कि वह अपनी ही राख से फिर जी उठता है। मुरैना जिले के बटेश्वर में अवशेषों के बीच खड़े मंदिरों को देखकर तो यही उम्मीद मजबूत होती कि भविष्य में यहां विशालतम मंदिर समूह होगा। पुरातत्वविद मानते हैं कि कभी यहां ३०० से ४०० मंदिर हुआ करते थे। इनमें ज्यादातर शिव मंदिर हैं। कुछेक विष्णु मंदिर भी हैं। श्रंखलाबद्ध खड़े करीब आधा सैकड़ा मंदिरों का समूह ही जब प्रखरता के साथ अपनी विरासत की कहानी बयान करता है तो सोचिए ३००-४०० मंदिरों का समूह कैसे भारतीय संस्कृति, सभ्यता और विरासत का परचम लहराएगा।

रविवार, 23 फ़रवरी 2014

रोज बिकती हैं औरतें और मासूम भी

सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्त्ता नीरू सिंह ज्ञानी। 
 भ गवान ने इंसान को इंसान बनाते समय कोई भेदभाव नहीं बरता। लेकिन मनुष्य ने अपनी बुद्धि का दुरुपयोग करते हुए आदमी-आदमी के बीच भेदभाव की तमाम दीवारें खड़ी कर दीं। किसी को जाति के आधार पर बांट दिया। किसी को काले-गोरे के भेद में रंग दिया। किसी को धन-दौलत के तराजू में तौल दिया। खुद इंसान ने इंसान को इंसान नहीं रहने दिया। अपनी दुष्ट बुद्धि के उपयोग से उसने इंसानों के साथ जानवरों-सा बर्ताव किया और कर रहा है। पैसे और रसूख के जोर पर कमजोर आदमी को अपना गुलाम बनाया। उसे अपनी जागीर समझा। उससे कोहलू तक चलवाया और दो वक्त का खाना तक नसीब नहीं होने दिया। इंसानों के द्वारा ही इंसानों की खरीद-फरोख्त का धंधा चलाया जा रहा है। यह देख मानवता के रचियता को भी रोना आता होगा। 
       अपने निहित स्वार्थों के चलते इंसान ने कई काले टीके अपने माथे पर लगा रखे हैं। मानव तस्करी (ह्यूमन ट्रैफिकिंग) इंसानों की दुनिया का विद्रूप सत्य है। यह एक तरह से इंसानों की मण्डी है। जहां इंसानों की खरीद-फरोख्त होती है। इसमें सबसे अधिक औरतें और मासूम बेटियां बेची जाती हैं। ह्यूमन ट्रैफिकिंग के जरिए सबसे अधिक महिलाओं और बच्चों का शोषण, उनके साथ दुराचार और अनैतिक व्यवहार किया जाता है। दुनिया ह्यूमन ट्रैफिकिंग की समस्या से जूझ रही है। भारत में भी यह गंदा धंधा संगठित रूप से चल रहा है। पड़ोसी मुल्कों के अलावा उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश सहित भारत के अन्य राज्यों से महानगरों में लाकर महिलाओं को अनैतिक तरीके से देह व्यापार में इस्तेमाल किया जाता और बच्चों को बंधुआ मजदूर की तरह रखा जाता है। दिल्ली, बैंगलूरू, गोवा, मुंबई और चंडीगढ़ जैसे बड़े शहरों में रसूखदार और तथाकथित ऊंचे तबके के लोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए मासूम बच्चों और लड़कियों की खरीद-फरोख्त करते हैं। उन्हें अपने घर में बंधक बनाकर रखते हैं। जानवरों की तरह काम कराते हैं। बर्ताव भी घोर आपत्तीजनक रहता है। छोटे बच्चों से जोखिम भरे काम कराए जाते हैं। खाने को बचा-खुचा दिया जाता है। लड़कियों से देह व्यापार कराया जाता है। उन्हें नर्क की ऐसी आग में झौंक दिया जाता है कि वे वर्षों तक उसमें झुलसती रहती हैं। हालांकि भारत में भी सरकार ने मानव तस्करी के खिलाफ कानून बना रखा है। अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम-१९५६ किसी भी प्रकार से इंसान को अनैतिक व्यापार में लगाने का सख्ती से विरोध करता है। इसके बावजूद भी ह्यूमन ट्रैफिकिंग रुकने का नाम नहीं ले रही। 
समाज से ह्यूमन ट्रैफिकिंग जैसे भद्दे दाग को हटाने के लिए सरकार के साथ-साथ तमाम एनजीओ भी अपने स्तर पर काम कर रहे हैं। दुनिया में ह्यूमन ट्रैफिकिंग की समस्या खत्म हो, इसके लिए एमटीवी एक्जिट (एण्ड एक्सप्लोएशन एण्ड ट्रैफिकिंग) अपने स्तर पर कार्य कर रही है। खासकर इस समस्या को लेकर जनजागृति लाने की दिशा में उनके प्रयास को सार्थक कहा जा सकता है। ट्रैफिकिंग की समस्या को लेकर २८ फरवरी से एमटीवी पर आधे-आधे घंटे की पांच शॉर्ट डाक्युमेंट्री का प्रसारण किया जाएगा। सोशल मीडिया पर इसके प्रोमो आने लगे हैं। लीक से हटकर फिल्में बनाने के लिए ख्यात बॉलीवुड के डायरेक्टर अनुराग कश्यप ने इन फिल्मों का निर्देशन किया है। ग्वालियर की समाजसेवी नीरू सिंह ज्ञानी और उनकी प्रतिभाशाली बेटी प्रांजुल एक-एक फिल्म में दिखेंगी। प्रांजुल ने पांचों फिल्मों में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर काम किया है। नीरू सिंह एक फिल्म में समाजसेवी की भूमिका में दिखेंगी। दिल्ली का एक परिवार है, जहां एक मासूम को अवैध रूप से खरीदकर रखा गया है। वह परिवार उस मासूम से घर के सभी काम कराता है। समाजसेवी रागिनी (नीरू सिंह ज्ञानी) उस मासूम को मुक्त कराती हैं। उसके पुनर्वास की व्यवस्था करती हैं। यह तो फिल्म की बात हुई। असल जिन्दगी में भी नीरू सिंह ज्ञानी अपने स्तर पर समाजसेवा के काम करती रही हैं। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी ऐसी ही है। श्रीमती सिंह के श्वसुर ने ग्वालियर के नजदीक रायरू में बेशकीमती जमीन पर गांव के बच्चों के पढऩे के लिए स्कूल शुरू किया। वे हमेशा स्थानीय लोगों के लिए मददगार के रूप में मौजूद रहते थे। अब उनके बेटे-बहू उनकी सोच और काम को आगे बढ़ा रहे हैं। नीरू सिंह ज्ञानी अपने एनजीओ प्रांजुल आटर््स के जरिए सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ाने की दिशा में भी काम कर रही हैं। उनके प्रयास प्रसंशनीय हैं। सार्थक हैं। उनकी सोच सकारात्मक है। समाजसेवा के उनके प्रयास तब और महत्वपूर्ण हो जाते हैं जबकि वे सक्रिय राजनीति से जुड़ी हैं। उनका अधिकतम समय महिलाओं और गांवों में भाजपा संगठन को मजबूत करने में जाता है। राजनीति कोयले की कोठरी है। इसमें सब काले ही काले लोग हैं। साफ-सुथरे लोग भी इसमें आकर काले हो जाते हैं। सब अपने लोभ-स्वार्थ को लेकर राजनीति में आते हैं। अब वो दौर नहीं रहा जब राजनीति को समाजसेवा का जरिया माना जाता था। अब तो राजनीति शुद्ध रूप से करियर हो गई है। ऐसा करियर जिसमें अकूत धन-दौलत कमाने का मौका मिलता है, बेईमान होकर। उम्दा और क्रियेटिव लोगों की यहां कमी है। भारतीय राजनीति और राजनेताओं के बारे में अमूमन हम यह सब सुनते रहते हैं। नीरू सिंह ज्ञानी जैसे लोगों से मिलकर यह मिथक टूटता-सा महसूस होता है। राजनीति में सब बुरे हैं, यह पूरा सच नहीं है। सच तो यह है कि बहुत से लोग भाजपा सहित अन्य पार्टियों में भी ऐसे हैं, जो निहायत ईमानदार हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। बिना किसी शोर-शराबे के अपने स्तर पर काम कर रहे हैं। कुछ क्रियेटिव वर्क। कुछ नया गढ़ रहे हैं। कुछ नई राहें बना रहे हैं। 
       ह्यूमन ट्रैफिकिंग को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में नीरू सिंह बताती हैं कि मनुष्यों द्वारा मनुष्यों के साथ यह भेदभाव किसी एक देश में नहीं अपितु पूरी दुनिया में हुआ। प्रत्येक मनुष्य में ईश्वर का अंश मानने वाली परम्परा का देश भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। दुनिया में रोज कई औरतें और बेटियां खरीदी-बेची जा रही हैं। स्त्री के मान का मर्दन किया जा रहा है। दुनिया इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर गई है। पारदर्शिता का जमाना आ गया है। दुनियाभर में जनजाग्रति के अभियान चलाए जा रहे हैं। मनुष्य खुलकर, अपने हिसाब से, स्वस्थ वातावरण में जी सके इसके लिए दुनियाभर में तमाम कानून बन गए हैं। १० दिसम्बर १९४८ को संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा में मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा हो चुकी है। तब से अब तक मानवाधिकारों पर लम्बी-लम्बी सार्थक बहस हो चुकी हैं, ठोस कदम उठाए जा चुके हैं। इस सबके बावजूद आज भी मनुष्य अपनी दुष्टतई से बाज नहीं आ रहा। किसी व्यक्ति से, चाहे वो पुरुष हो, महिला हो या फिर छोटा बच्चा, उसकी मर्जी के खिलाफ  या उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर, उनका शोषण करना, उन पर अत्याचार करना, उन्हें बंधुआ मजदूरों की तरह रखना, अनैतिक काम में लगाना, मानवाधिकारों का सीधा-सीधा उल्लंघन है। दरअसल, कुछ पैसे वाले लोग, रसूखदार, सफेदपोश और तथाकथित सभ्य समाज के लोग ह्यूमन ट्रैफिकिंग को बढ़ावा देते हैं। मनुष्य होकर मनुष्यों के साथ दुराचार करते हैं। मानव सभ्यता को लज्जित करते हैं। किसी की गरीबी का फायदा उठाकर मासूम बच्चों के साथ अनाचार करते हैं। ये ही पढ़े-लिखे रईस लोग सार्वजनिक मंचों से समानता की बात करते हैं और घर में किसी को गुलाम बनाकर रखते हैं। यह समाज का असली चेहरा है। यह समाज का घिनौना चेहरा है। वे बताती हैं कि अशिक्षा, गरीबी और बेरोजगारी के कारण ही बहुत से लोग इंसानों की मण्डी में अपनों को बेचते हैं। मानव तस्करी रोकने के लिए समाज जागरण के साथ ही सरकारी स्तर पर बहुत से प्रयास होने जरूरी हैं। शिक्षा और रोजगार के अवसर बढऩे से काफी हद तक ह्यूमन ट्रैफिकिंग को रोका जा सकता है। 
      ह्यूमन ट्रैफिकिंग पर आधारित पांचों शॉर्ट फिल्मस् सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं। इनमें पहली फिल्म सेक्सुल ट्रैफिकिंग है। इसके अलावा डोमेस्टिक सर्विट्यूट, बांडेड लेबर और चाइल्ड लेबर में भी ह्यूमन ट्रैफिकिंग का स्याह चेहरा दिखाया गया है। इन फिल्मों की ज्यादातर शूटिंग बनारस, मुंबई, गोवा और दिल्ली में हुई है। ह्यूमन ट्रैफिकिंग को लेकर जनजागृति लाने में ये फिल्में मील का पत्थर साबित हों, इसी उम्मीद के साथ। 

रविवार, 22 दिसंबर 2013

खजुराहो के कंदारिया महादेव से भी विशाल है ककनमठ

 मं दिर, मठ या अन्य पूजा स्थल महज धार्मिक महत्व के स्थल नहीं होते हैं। ये अपने समय के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक व्यवस्था के गवाह होते हैं। अपने में एक इतिहास समेटकर खड़े रहते हैं। उनको समझने वाले लोगों से वे संवाद भी करते हैं। ग्वालियर से करीब ७० किलोमीटर दूर मुरैना जिले के सिहोनिया गांव में स्थित ककनमठ मंदिर इतिहास और वर्तमान के बीच ऐसी ही एक कड़ी है। मंदिर का निर्माण ११वीं शताब्दी में कछवाह (कच्छपघात) राजा कीर्तिराज ने कराया था। उनकी रानी का नाम था ककनावती। रानी ककनावती शिवभक्त थीं। उन्होंने राजा के समक्ष एक विशाल शिव मंदिर बनवाने की इच्छा जाहिर की। विशाल परिसर में शिव मंदिर का निर्माण किया गया। चूंकि शिव मंदिर को मठ भी कहा जाता है और रानी ककनावती के कहने पर इस मंदिर का निर्माण कराया गया था, इसलिए मंदिर का नाम ककनमठ रखा गया। वरिष्ठ पत्रकार एवं शिक्षाविद् श्री जयंत तोमर बताते हैं कि सिहोनिया कभी सिंह-पानी नगर था। बाद में अपभ्रंश होकर यह सिहोनिया हो गया। यह ग्वालियर अंचल का प्राचीन और समृद्ध नगर था। यह नगर कछवाह वंश के राजाओं की राजधानी था। इसकी उन्नति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ग्वालियर अंचल के संग्रहालयों में संरक्षित अवशेष सबसे अधिक सिहोनिया से प्राप्त किए गए हैं। श्री तोमर बताते हैं कि तोमर वंश के राजा महिपाल ने ग्वालियर किले पर सहस्त्रबाहु मंदिर का निर्माण कराया था। सहस्त्रबाहु मंदिर के परिसर में लगाए गए शिलालेख में अंकित है कि सिंह-पानी नगर (अब सिहोनिया) अद्भुत है।

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

तीसरी बार जनआशीर्वाद या परिवर्तन

लोकप्रिय मुख्यमंत्री के सहारे महासमर में भाजपा

 म ध्यप्रदेश में राजनीतिक हलचल तेज हो गई हैं। रोमांच दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। दोनों मुख्य राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस, रथ पर सवार होकर जनता के बीच पहुंच रहे हैं। भाजपा मुख्यमंत्री के नेतृत्व में जनआशीर्वाद यात्रा निकाल रही है तो कांग्रेस भाजपा के खिलाफ परिवर्तन यात्रा। आरोप-प्रत्यारोप के शब्दवाण दोनों ओर से जारी हैं। दिग्गजों ने मचान कस लिए हैं। अभी आ रहीं बौछारें बता रही हैं बादल बहुत घने हैं। चुनाव घमासान होने हैं। मुकुट किसके माथे सजेगा, ये तो युद्ध के बाद ही पता चलेगा। फिर भी राजनीतिक विश्लेषण अपनी जगह हैं। अभी तक के सर्वेक्षण बता रहे हैं कि भाजपा इस बार भी शिव के सहारे चुनावी वैतरणी पार कर जाएगी। पांच बार लोकसभा सांसद रह चुके और पिछले आठ साल से प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह बेहद लोकप्रिय नेता हो गए हैं। प्रदेश के प्रत्येक जातिवर्ग, संप्रदाय, पुरुष-महिलाएं, आयुवर्ग उन्हें बराबर से अपना नेता मानते हैं।
प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान बेहद विनम्र हैं। उनके भाषण का लहजा मतदाताओं को अपने मोहपाश में बांध लेता है। घोषणाएं करने में तो उनकी कोई सानी नहीं है। सिर्फ घोषणाएं ही उनके खाते में नहीं हैं बल्कि तमाम लोक कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से भी उन्होंने मध्यप्रदेश की जनता का दिल जीता है। मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के माध्यम से शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने वंचित, गरीब और पिछड़े लोगों के बीच जगह बनाई तो लाडली लक्ष्मी योजना ने तो उन्हें जगत मामा ही बना दिया। महिलाओं के हित की बात कर उन्होंने आधी आबादी को अपने हिस्से में कर लिया है। शिवराज सिंह चौहान जानते हैं कि अब समाज की वह स्थिति नहीं रही कि महिलाएं अपने पति के बताए निशान पर ठप्पा लगाएं। वे अपने विवेक का इस्तेमाल कर अपनी पसंद के नेता के नाम के आगे का बटन दबाकर वोट का उपयोग कर रही हैं। इसलिए महिलाओं के हित में सरकार के प्रयास शिवराज सिंह चौहान को एक बड़ा वोट बैंक उपलब्ध कराते हैं। घर के बुजुर्गों को भी खुश करने का इंतजाम मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना के जरिए शिवराज सिंह चौहान ने कर लिया है। शिक्षित बेरोजगार युवाओं को सरकार की गारंटी पर बैंक से लोन दिलाने की योजना से युवा भी शिवराज सरकार के करीब ही हैं। मुख्यमंत्री निवास पर अलग-अलग समुदाय और व्यवसाय से जुड़े लोगों को बुलाकर, यह संदेश देने की कोशिश की है कि किसी महाराजा का महल नहीं आपके ही बीच के एक आदमी का ठिकाना है, जिसके दरवाजे सारे समाज के लिए खुले हैं। शिवराज सिंह चौहान ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने पैदल-पैदल अपने प्रदेश को नाप लिया है। वे मतदाताओं के साथ जीवंत संपर्क कर अपनी जादूगरी दिखाते हैं। किसी बुजुर्ग या युवा के कंधे पर हाथ रखकर यह पूछ लेना कि दादा, सब कैसा चल रहा है? दोस्त, भविष्य की क्या योजना है? बड़ी बात है। इसी तरह तो जीतते हैं शिवराज सिंह चौहान लोगों का दिल। हालांकि शिवराज के मंत्रियों और विधायकों को लेकर खासा आक्रोश जनता में लेकिन मुख्यमंत्री की छवि और जनसंपर्क विरोध को काफी हद तक ठण्डा कर सकेगी, ऐसा माना जा रहा है। दस साल में भाजपा सरकार की ओर से शुरू की गई लोक कल्याणकारी योजनाओं को लेकर सरकार के मुखिया जनआशीर्वाद यात्रा लेकर जनता का आशीर्वाद लेने निकले हैं।  
अभी हाल ही में आए सीएनएन-आईबीएन और एसडीएस के इलेक्शन ट्रैकर सर्वे में सामने आया कि मध्यप्रदेश के ८२ फीसदी लोग प्रदेश सरकार के कामकाज से संतुष्ट हैं। साथ ही ६४ प्रतिशत लोग चाहते हैं कि फिर से भाजपा की सरकार बने और शिवराज सिंह चौहान ही मुख्यमंत्री बनें। वर्ष २००९ में ४२ फीसदी वोट हासिल करने वाली भाजपा को २०१३ में ५० फीसदी वोट मिल सकते हैं जबकि कांग्रेस का वोट प्रतिशत ४० से गिरकर ३२ रह सकता है। २३० विधायकों वाली मध्यप्रदेश की विधानसभा में फिलहाल भाजपा के १५२ सदस्य हैं जबकि कांग्रेस के ६६ विधायक ही विपक्ष में बैठ रहे हैं। इनमें से एक विधायक चौधरी राकेश चतुर्वेदी एक हाईवोल्टेज पॉलीटिकल ड्रामे का मंचन करने के बाद भाजपा में शामिल हो गए। शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ लाए जा रहे अविश्वास प्रस्ताव की हवा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता चौधरी राकेश चतुर्वेदी ने ही निकाला दी। इससे पहले भी कांग्रेसी नेता शिवराज सिंह की लोकप्रियता से प्रभावित दिखते रहे हैं। शिवराज की लोकप्रिय नेता की छवि का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस के पास मुद्दे ही नहीं हैं। मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की बहन और कांग्रेस नेता वीणा सिंह ने कुछ समय पहले ही बयान दिया था कि शिवराज पूरे राज्य में लोकप्रिय भी हैं और गांवों तक सरकार की विकास योजनाएं पहुंचा रहे हैं। ऐसे में विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराना बेहद मुश्किल होने वाला है।
भारतीय जनता पार्टी ने भी अपनी चुनावी रणनीति बनाने के लिए सरकार के कामकाज, मंत्री-विधायकों की स्थिति, लोकप्रिय नेता सहित सीटवार सर्वे कराया था। सर्वे में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़ों ने भाजपा नेताओं की नींद उड़ा दी है। सर्वे के मुताबिक उत्तरप्रदेश से सटे विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा के लिए बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं। प्रदेश की १५५ सीटों पर भाजपा की स्थिति कुछ खास अच्छी नहीं है। यहां के विधायक-मंत्री के कामकाज से जनता संतुष्ट नहीं है। क्षेत्र के विकास को लेकर विधायकों की बेपरवाह बने रहने की आदत, भ्रष्टाचार के आरोप, भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगने से जनता में आक्रोश है। यहां साफतौर पर एंटी इन्कम्बेंसी फैक्टर का असर दिख रहा है। महज प्रदेश के ५९ विधायकों को कोई खतरा नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक ये ५९ विधायक सौ फीसदी जीतकर आएंगे। हालांकि यह भी है कि सर्वे में ७० फीसदी लोगों ने सरकार के कामकाज से संतुष्टि जाहिर की है। ऐसे में स्पष्ट होता है कि स्थानीय विधायकों को लेकर तो आक्रोश है लेकिन लोग इसी सरकार को फिर से जीतते देखना चाहते हैं। सर्वे में भी शिवराज सिंह भाजपा के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता माना गया है। भाजपा सर्वे को गंभीरता से लेती है तो तीसरी बार सरकार बनाने के लिए संगठन को कई विधायकों और मंत्रियों के टिकट काटने पड़ेंगे। सर्वे में भाजपा को सबसे अधिक खतरा ज्योतिरादित्य सिंधिया से बताया गया है। युवाओं में सिंधिया का क्रेज देखने को मिला है। ज्योतिरादित्य की बढ़ती लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण उनके युवा होने और ईमानदार इमेज को बताया जा रहा है। प्रदेश की राजनीति में भी सिंधिया का अच्छा-खासा दखल है। यही कारण है कि जनआशीर्वाद यात्रा में शिवराज सिंह के निशाने पर दिग्विजय सिंह और राहुल सिंह के साथ-साथ प्रमुखता से ज्योतिरादित्य सिंधिया भी हैं। वे जनता के बीच भाषण देते समय मंच से बोलते हैं कि मैं किसान का बेटा हूं, आपके बीच का ही हूं, सामंत और राजा-महाराजा नहीं। अभी आप सहज मुझसे मिलने आ सकते हो, मुख्यमंत्री निवास के दरवाजे आपके किसान बेटे ने खोल रखे हैं। क्या सामंत और राजा-महाराज के शासनकाल में यह संभव था या संभव होगा। आप ही तय करें कि किसे मुख्यमंत्री बनाएंगे, अपने बीच के आदमी को या राजा-महाराजाओं को। आपके दु:ख-दर्द को समझने वाले को या फिर महलों से राजनीति करने वालों को। गौर करने वाली बात यह है कि भाजपा तो समझ रही है कि कांग्रेस ज्योतिरादित्य को सीएम प्रोजेक्ट करके चुनावी मैदान में उतरती है तो तीसरी बार सरकार बनाना आसान नहीं होगा। लेकिन, गुटों में बंटी कांग्रेस यह समझ नहीं पा रही है। भले कांग्रेस हार जाए लेकिन गुटबाज एक-दूसरे की टांग खींचने से बाज नहीं आने वाले।  ज्योतिरादित्य को सीएम प्रोजेक्ट करने के लिए सोनिया गांधी के दरबार में सिंधिया समर्थकों का पहुंचना और फिर इस घटना से उठा बवंडर यही बताता है कि प्रदेश की कुर्सी संभालने के लिए कांग्रेस में अलग-अलग गुट सक्रिय हैं। कह सकते हैं कि सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठम लट्ठ। मध्यप्रदेश कांग्रेस दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और सुरेश पचौरी के खेमे में बंटी है। अब तक दिग्विजय सिंह के गुट में शामिल रहे कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और वर्तमान नेता प्रतिपक्षा अजय सिंह भी अपनी टीम बना रहे हैं। सभी गुटों का प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में प्रभाव है। दिग्विजय सिंह के गुट का प्रभाव राधौगढ़, सतना, रीवा और झाबुआ सहित आसपास के क्षेत्र में है। इसी तरह दूसरे सबसे प्रभावी और बड़ा गुट सिंधिया का है। सिंधिया का प्रभाव क्षेत्र ग्वालियर-चंबल बेल्ट, इंदौर और मालवा के कुछ क्षेत्रों में है। कमलनाथ और सुरेश पचौरी के गुट बेहद छोटे हैं और इनका प्रभाव क्षेत्र भी सीमित हैं। दोनों को मास लीडर भी नहीं माना जाता है। ऐसे में यदि कांग्रेस के गुट जल्द ही एकसाथ आकर भाजपा को हराने के लिए मोर्चाबंदी नहीं करते हैं तो विधानसभा-२०१३ में जीत कांग्रेस के लिए दूर की कौड़ी साबित होने वाली है।
प्रदेश में फिलहाल तो कांग्रेस एकजुट नहीं दिख नहीं रही है। न ही निकट भविष्य में इसकी संभावनाएं नजर आ रही हैं। राहुल गांधी इस मसले पर कांग्रेस के चारों क्षत्रपों को ताकीद दे चुके हैं। प्रदेश में कार्यकर्ताओं से बातचीत के दौरान छोटे-छोटे कार्यकर्ताओं ने राहुल गांधी से कहा कि प्रदेश में कांग्रेस एक नहीं है। प्रत्याशी चुनने से पहले कार्यकर्ताओं की राय नहीं ली जाती। बंद कमरों में चंद लोग अपने गुट के आदमी को टिकट थमाकर चुनावी मैदान में उतार देते हैं जबकि उसका न तो कोई जनाधर होता है और न ही कार्यकर्ता ही उसे पसंद करते हैं। भाजपा को परास्त करना है तो कांग्रेस की एकजुटता के लिए प्रयास किए जाएं। जबर्दस्त गुटबाजी कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी है और कांग्रेस की यह कमजोरी ही भाजपा की सबसे बड़ी ताकत बन गई है। इधर, भाजपा अपने लोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और लोककल्याणकारी योजनाओं के सहारे जनता को आकर्षित कर रही है और जमकर कांग्रेस पर हमला बोल रही है। 

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

ऊंचे शिखरों पर रोमांच का सफर


 क ठिनाइयां आपको अंदर से मजबूत करती हैं। अचानक से आईं मुसीबतें आपको फटाफट निर्णय लेने का अनुभव देती हैं। अनजाने रास्ते और लंबे सफर आपके लिए नई राहें खोलते हैं। यह सब करने के लिए बस थोड़े-से साहस की जरूरत होती है।  उठाइए साइकिल और निकल जाइए, ऐसे रास्तों पर जहां जाने के लिए आपका जी मचल रहा हो। जिंदगी को ठाट से जीने के लिए साइकिलिंग से अच्छा विकल्प नहीं है। यह कहना है रोमांच के साथी युवा देवेन्द्र तिवारी का। मध्यप्रदेश के जिले ग्वालियर में कृषक परिवार में जन्मे देवेन्द्र तिवारी देश के कई दुर्गम क्षेत्रों को साइकिलिंग से जीत चुके हैं।

रविवार, 23 दिसंबर 2012

ठाकरे पथ के राही प्रभात

 म ध्यप्रदेश में प्रभात झा ने महज ढाई साल में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया और शक्तिशाली भी बनाया। वरिष्ठ नेता कहते हैं कि जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे अति सक्रिय नेता थे। उनका क्षण-क्षण पार्टी के विस्तार के लिए समर्पित था। पार्टी की जड़ें मजबूत करने में उनका अतुलनीय योगदान है। उन्होंने देश के कई प्रांतों में भाजपा को खड़ा किया। मध्यप्रदेश की राजनीति का सौभाग्य है कि इसे कुशाभाऊ ठाकरे ने सींचा। प्रदेश के इस छोर से उस छोर तक प्रवास किया, कई बार किया। कभी थके नहीं, कभी रुके नहीं, कभी थमे नहीं। छोटे से लेकर बड़े, सभी कार्यकर्ताओं के लिए वे सहज थे। दूसरे दल के नेताओं के लिए भी अनुकरणीय थे। प्रभात झा को ऐसे ही कुशल संगठनकर्ता का सानिध्य मिला। मार्गदर्शन मिला। सार्थक और सकारात्मक काम करने की प्रेरणा मिली। सच के लिए अडऩे और लडऩे का हौसला मिला। कुशाभाऊ ठाकरे के विराट व्यक्तित्व की तुलना प्रभात झा से नहीं की जा सकती लेकिन राजनीति की जिस राह पर प्रभात झा ने कदम रखा है, जिस राह पर वे बढ़ रहे हैं, उस राह पर स्वर्गीय ठाकरे के पग चिह्न हैं। वह राह ठाकरे की राह है। वह सही राह है। सकारात्मक और असली राह है।
    प्रभात झा ने ढाई साल पहले प्रदेशाध्यक्ष बनते ही अपने काम करने के तौर तरीके जाहिर कर दिए थे। मेरे स्वागत-सत्कार में कोई बैनर और होर्डिंग नहीं लगाया जाएगा। कार्यकर्ताओं को यही सबसे पहले निर्देश थे उनकी ओर से। वे जानते हैं, भारतीय जनता पार्टी के पितृपुरुष कभी नहीं चाहते थे कि भाजपा में व्यक्ति पूजा को महत्व दिया जाए। व्यक्तिवाद को बढ़ावा मिले। यह कैडर आधारित पार्टी है। यहां संगठन और सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं, व्यक्ति नहीं। उन्होंने दूसरा जरूरी काम किया कि पार्टी को पार्टी कार्यालय से चलाया, बंगले से नहीं। प्रभात झा से पूर्ववर्ती प्रदेशाध्यक्ष बंगले से ही सारे राजनीतिक कार्यक्रम संचालित करते थे। ऐसे में पार्टी कार्यालय खाली-खाली सा रहता था। प्रभात झा के प्रदेशाध्यक्ष बनने से पार्टी कार्यालय में रौनक बढ़ गई। लगने लगा कि यह सत्तारूढ़ पार्टी का कार्यालय है। प्रदेश के पार्टी कार्यालय में ही प्रदेशभर के कार्यक्रमों की रूपरेखा बनना शुरू हो गई।
    प्रभात झा का व्यक्तित्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में भी गढ़ा गया है। वहीं उन्होंने सीखा कि कार्यकर्ता को अपने कार्य से सीख दो, सिर्फ भाषण से नहीं। उन्होंने मंडल-मंडल में प्रवास शुरू कर मंत्रियों, विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों को नींद से जगाना शुरू किया। उन्होंने सबको साफ शब्दों में कह दिया आपको जो जिम्मेदारी पार्टी ने दी है, जनता ने दी है उसका निर्वहन ठीक ढंग से किया जाए। अपने-अपने क्षेत्र में लोगों से मिलो, संपर्क करो, दौरे करो। कुर्सी मिल गई है तो काम करो वरना कुर्सी जाते देर नहीं लगेगी। एक साधारण से कार्यकर्ता को अहसास कराया कि भाजपा तुम्हारी पार्टी है, तुम्हारे सहयोग के बिना नहीं चल सकती। सेठ-साहूकारों की जगह उन्होंने आम कार्यकर्ता से १०-१० रुपए चंदा एकत्र कराया ताकि कार्यकर्ता में समर्पण का भाव जगे। स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे के बाद प्रभात झा ऐसे प्रदेशाध्यक्ष हैं जिन्होंने अपने एक ही कार्यकाल में प्रदेश के लगभग सभी मंडलों में प्रवास किया, एक बार नहीं कई जगह तो कई बार पहुंचे। उनके लगातार संपर्क और अथक मेहनत का ही नतीजा रहा कि भाजपा उनके कार्यकाल में कोई भी उपचुनाव नहीं हारी। कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले क्षेत्रों में भी जीत का परचम पहराया। स्थानीय नगर पालिका और नगर पंचायतों के चुनाव में भी पार्टी को विजय मिली। प्रभात झा ने कभी भी किसी जीत को अपनी या किसी और व्यक्ति विशेष की मेहनत नहीं बताया। उन्होंने हर जीत के बाद यही कहा कि यह जीत पार्टी की जीत है, अनुशासन की जीत है, कार्यकर्ताओं की मेहनत की जीत है। वर्ष २०११ में प्रदेश में कई जगह स्थानीय निकायों के चुनाव चल रहे थे। प्रभात झा प्रदेशाध्यक्ष होने के नाते सभी जगह पहुंचकर कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा रहे थे। शाजापुर नगरपालिका के अध्यक्ष पद के प्रत्याशी की आर्थिक स्थिति कुछ कमजोर थी। चुनाव खर्च उसके लिए मुश्किल खड़ी कर रहा था। प्रभात झा को इस बात का जैसे ही पता चला, उन्होंने तुरंत मौके पर ही उन्हें अपना एक माह का वेतन उस कार्यकर्ता को चुनाव लडऩे के लिए दे दिया। उनके इस प्रयास का असर बाकी कार्यकर्ताओं पर भी हुआ। शाजापुर नगरपालिका का अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ रहे कार्यकर्ता के चुनाव प्रचार के लिए उसी दिन करीब १२ लाख रुपए जमा हो गए।
    प्रभात झा भाजपा सरकार के श्रेष्ठ पालक साबित हुए। वे उच्चकोटि के पत्रकार रहे हैं। पत्रकारों को क्या खबर चाहिए, बेहतर जानते हैं प्रभात झा। अपने इसी चातुर्य का फायदा उन्होंने मुख्ममंत्री और भाजपा सरकार का संरक्षण करने में किया। वे ढाई साल तक पत्रकारों से लेकर कांग्रेसी नेताओं को अपने मायाजाल में ही उलझाकर रखे रहे। लगातार कांग्रेसी नेताओं पर बयानबाजी कर उन्हें घेरे रखा। उन्हें फुरसत ही नहीं दी कि वे भारतीय जनता पार्टी को सदन या सदन के बाहर घेर सकें। प्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से अधिक समाचार माध्यमों और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय प्रभात झा हो गए थे। यही कारण है कि प्रदेश में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल ने उन्हें डेंजर की उपाधि से नवाजा। प्रभात झा का कार्यकाल पूरा होने पर अजय सिंह ने राहत की सांस लेते हुए कहा भी - अहा! हमारा डेंजर चला गया।
    हालांकि प्रभात झा को दूसरा कार्यकाल नहीं मिलना अप्रत्याशित है। उनके मुताबिक परमाणु विस्फोट जैसा ही है। २०१३ विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं। ढाई साल में प्रभात झा ने जो मेहनत की उसकी परीक्षा का समय आ रहा था। प्रभात झा की संगठन पर बढ़ती पकड़ और लोकप्रियता प्रदेश के मुख्यमंत्री को सशंकित करने लगी थी। उस पर भी प्रभात झा मुख्यमंत्री को हटाकर स्वयं प्रदेश के मुखिया बनना चाहते हैं, जैसी अफवाहों से बाजार गर्म था। इन सब कारणों से शिवराज सिंह चौहान प्रभात झा को फिर से भाजपा प्रदेशाध्यक्ष की कुर्सी पर देखना नहीं चाहते थे। वे अपने किसी विश्वस्त सिपहसलार को पार्टी संगठन की कमान सौंपना चाह रहे थे। वे ऐसे किसी चेहरे की तलाश में थे कि उनके सामने नरेन्द्र सिंह तोमर को आगे कर दिया गया। एक सुनियोजित योजना के तहत नरेन्द्र सिंह प्रदेश में अपनी वापसी के लिए प्रयासरत भी थे। आखिर  शिवराज सिंह चौहान का वरदहस्त पाकर नरेन्द्र सिंह तोमर प्रदेश अध्यक्ष बन गए हैं। हालांकि इसके पीछे राजनीति की लंबी कहानी है, जिसके बीज उत्तरप्रदेश के चुनावी संग्राम के समय ही बोए जा चुके थे। इसकी फसल नरेन्द्र सिंह तोमर काटेंगे। शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में २०१३ के चुनाव जीतना तय बात है। यह भी तय बात है कि शिवराज सिंह चौहान की मुख्यमंत्री के पद पर ताजपोशी होगी। लेकिन, यह बात भी गांठ बांध ली जाए कि शिवराज सिंह चौहान अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे, मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कोई और ही सुशोभित होगा। शिवराज सिंह चौहान जिस नरेन्द्र सिंह तोमर को अपना हितैषी और खास समझ रहे हैं तो उन्हें करीब तीन साल पुराना घटनाक्रम याद करना होगा। ये वही ठाकुर नरेन्द्र सिंह तोमर हैं जो शिवराज सिंह चौहान को ओबीसी कैटेगिरी का ठाकुर समझते हैं। उन्हें अपने से कमतर आंकते हैं। ये वही नरेन्द्र सिंह तोमर हैं जिन्होंने ग्वालियर में स्थापित महाराजा मानसिंह प्रतिमा को इसलिए दूध से धुलवा दिया था क्योंकि उसका अनावरण पिछड़ा वर्ग के शिवराज सिंह चौहान ने किया था। खैर, राजनीति में कब अपने पराए हो जाते हैं और पराए अपने, कहा नहीं जा सकता। फिलहाल तो यही कहना होगा कि भाजपा तमाम खामियों के बाद भी सच्ची लोकतांत्रिक पार्टी है। यही कारण है कि एक ऐसा आदमी जो स्वदेश के दफ्तर में जिस टेबल पर अपनी खबर लिखता था, रात में उसी टेबल पर सो जाता था, भारतीय राजनीति में उत्तरोत्तर सोपान चढ़ रहा है। प्रभात झा ने सिद्धांत, मूल्यपरक और स्वस्थ राजनीति की जो लकीर खींची है, उम्मीद है भाजपा उस पर आगे बढ़े। प्रभात झा ने यही किया, भाजपा को कांग्रेस संस्कृति से बाहर निकालकर सादगी, शुचिता और मूल्यों की राजनीति की धारा में लाए। 
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बुधवार, 19 दिसंबर 2012

सब समाज का है 'शिवराज'

 म ध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान समाज के प्रत्येक वर्ग के करीबी हो गए हैं। जब कोई अपना हो जाता है तो उसे उसके मुख्य नाम से नहीं बुलाते। उसके लिए प्यार से एक नया नाम यानी निकनेम रखते हैं। प्रदेश में लिंगानुपात बहुत अधिक है। लड़का-लड़की के भेद को कम करने के लिए मुख्यमंत्री ने लाडली लक्ष्मी योजना शुरू की। इसके बाद शिवराज सिंह प्रदेशभर की बच्चियों के 'मामा' बन गए। किसान खुशहाल हों तो प्रदेश भी तरक्की की राह पकड़ ले। यही सोचकर मुख्यमंत्री  ने किसानों के लिए जीरो फीसदी पर कर्ज मुहैया कराने की योजना शुरू की। यानी ब्याज जीरो, किसान हीरो का नारा देकर वे किसानों के मसीहा बन गए। किसान पुत्र बन गए। हाल ही में बुजुर्गों को मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना के तहत तीर्थ यात्रा पर भेजकर शिवराज इस युग के 'श्रवण कुमार' बन गए। काफिला रुकवाकर किसी की दुकान से जलेबी तो किसी ठेलेवाले से पोहा खाना, लोगों के कंधे पर हाथ रखकर उनका हालचाल पूछना और गांव-गांव संपर्क करने से उन्हें 'पांव-पांव वाले भैया' के नाम से पुकारा जाने लगा। योग और गीताज्ञान को स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल कराकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को संघ का खाटी 'स्वयंसेवक' कहलाने में गुरेज नहीं। भेष बदलकर, चोरी-छिपे जनता का हाल जानने सड़कों पर निकलकर 'विक्रमादित्य' बन गए शिवराज। प्रदेश में लोकप्रियता के चरम पर हैं शिवराज सिंह चौहान। मुख्यमंत्री की लोकप्रियता के बारे में एक लाइन में कुछ कहना हो तो - मध्यप्रदेश का मुखिया भारत के दिल पर काबिज है और आगे भी रहने वाला है।
    शिवराज सिंह चौहान की विनम्रता, पार्टी गाइडलाइन का पालन, वरिष्ठ नेताओं व पार्टी संगठन से सांमजस्य और विरोधियों की प्रशंसा करने के गुण उन्हें अन्य नेताओं से अलग करते हैं। 29 नवंबर, 2005 को उन्होंने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। सात साल से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल रहे शिवराज सिंह चौहान की शैली ऐसी है कि कोई उनसे नाराज नहीं होता। यहां तक कि विरोधी भी उनकी विनम्रता के मुरीद हो जाते हैं। विधानसभा की कार्यवाही में भी अकसर दिख जाता है कि कांग्रेस भाजपा सरकार को तो घेरने के प्रयास करती दिखती है लेकिन सीएम को निशाना नहीं बनाती। हाल ही में ग्वालियर में स्वर्गीय माधवराज सिंधिया प्रतिमा के अनावरण कार्यक्रम में कांग्रेस के युवा मंत्री ज्योतिरादित्य ने मुख्यमंत्री की कार्यशैली, विनम्रता और वाकपटुता की खुलकर प्रशंसा की। सिंधिया ने मुख्यमंत्री की प्रशंसा उस वक्त की है जबकि प्रदेश कांग्रेस का एक धड़ा उन्हें कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर २०१३ के चुनाव फतेह करना चाहता है। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी भी कहते हैं कि एक सफल शासक में जिस प्रकार की विनम्रता जरूरी है, शिवराज का व्यक्तित्व उस पहलू को बहुत उजागर करता है।
    किसान परिवार में जन्मे और किरार जाति (पिछड़ा वर्ग) से संबंध रखने वाले शिवराज सिंह चौहान का भाषण देना का अंदाज भी निराला है। जिस तरह कथावाचक अपने श्रोताओं को बांधकर रखता है वैसे ही शिवराज सिंह चौहान अपनी बात आहिस्ता-आहिस्ता जनता के मन में गहरे तक उतार देते हैं। सरकार की उपलब्धि पर वे मंच से जनता की हामी भरवा लेते हैं और केन्द्र सरकार के खिलाफ अपनी बात पर लोगों की मुहर भी लगवा लेते हैं।
    जाति फैक्टर का भारतीय राजनीति में बड़ा महत्व है। किसी भी प्रांत की राजनीति पर नजरें दौड़ा लें तो जाति बड़ा कारक सामने आता है। उत्तरप्रदेश में यादव, ब्राह्मण और दलित राजनीति का बोलबाला है। बिहार में भी भाजपा के आने से पहले यही हाल था। शिवराज सिंह चौहान इस मामले में भी अन्य राजनेताओं से अलग दिखते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में पाए गुणों के कारण ही वे समरस समाज का स्वप्न देखते हैं और जातिगत राजनीति से दूर रहते हैं। वर्ष २००५ में पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद शिवराज सिंह चौहान को ग्वालियर आने के लिए उनके जातिगत समाज ने बुलावा भेजा। किरार समाज ने अपनी जाति के साधारण से किसान पुत्र को बुलंदी चूमने पर सम्मानित करने का निर्णय लिया था। वीरागंना लक्ष्मीबाई समाधिस्थल के सामने मैदान में मुख्यमंत्री के सम्मान का समारोह आयोजित किया गया। मंच से किरार जाति के नेताओं ने समाजहित की चिंता करते हुए कुछ अपेक्षाएं अपने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के समझ व्यक्त कीं। माइक संभालते ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने सम्मान के लिए समाज को धन्यवाद दिया। इसके बाद उन्होंने भरे मंच और मैदान में कहा- शिवराज किसी एक समाज का नहीं है। उसे प्रदेश के हर समाज, प्रत्येक वर्ग की चिंता का गुरुतर दायित्व प्रदेश की सारी जनता ने दिया है। इसीलिए आपसे माफी मांगते हुए कहता हूं कि मैं महज किरार समाज का नहीं वरन् सब समाज का हूं।
    भारतीय राजनीति में किसी भी नेता के लिए जाति के बड़े-बड़े नेताओं के सामने इस तरह की बात कहना इतना आसान नहीं होता लेकिन जिसे समाज को समरस बनाना हो उसके लिए इतना कठिन भी नहीं होता है। वरना वोटों और कुर्सी के भूखे नेता ऑनर किलिंग तक का समर्थन कर जाते हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का यही व्यक्तित्व है, जिसके आगे विपक्ष टिक नहीं पा रहा है और भाजपा के लिए मिशन-२०१३ की राह भी आसान दिख रही है। 

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

कुंआरा करवाचौथ

 का र्तिक मास की कृष्ण पक्ष की पंचमी का दिन था। यानी करवाचौथ के एक दिन बाद। सुबह के करीब ११ बज रहे होंगे। सूरज आसमान के बीचों-बीच जगह बनाने को चल रहा था। धूप हो रही थी लेकिन जाड़े ने उसकी उष्णता कम कर दी थी। दोपहर की धूप भी गुनगुनी, अच्छी लग रही थी। छत पर सब बैठे थे। मैं अभी-अभी नहा-धोकर निपटा था। ठंड में देर से ही नहाने की हिम्मत हो पाती है। फिर ग्वालियर की ठंड के क्या कहने। हालांकि अभी ठंड अपने सबाब पर नहीं आई थी। भोजन की तैयारी थी। तभी दरवाजे से आवाज आई।
    कहां है भाई? इधर आ।
    अंदर ही आ जा। मैं खाना खाने बैठ गया हूं।
आवाज मैं पहचान गया था। सत्यवीर आया था बाहर। यहीं एक गली छोड़कर ही तो रहता है। मैन रोड पर उसका मकान है। मेरा सबसे खास दोस्त है। दिन-रात के २४ घंटे में से कम से कम १० घंटे हम साथ रहते हैं। वैसे तो वह मेरे घर कम ही आता है। मैं ही उसके घर पहुंच जाता हूं। थोड़ी देर पहले उसी के यहां से तो आया था।
    अरे यार, तू बाहर निकल आ।
    अब ऐसी भी क्या बात है। अंदर आकर ही बता देता।
    क्या बता देता? बैंड बजी पड़ी है। तू तो यहां आराम से रोटी खा रहा है कोई दो दिन से प्यासा है।
    क्यों, क्या हो गया? कौन प्यासा है? साफ-साफ बता।
    अरे यार, उसकी अम्मा की... पूर्वी ने करवाचौथ का व्रत धर लिया है। कल से पानी तक नहीं पिया है, पिया के चक्कर में। सत्यवीर ने झुंझलाते हुए कहा। मेरे कंधे पर हाथ रखा और फिर मुझे सड़क की ओर लेकर चल दिया।
    साली कुतिया की तरह घूम रही है। मेरा तो दिमाग खराब हो गया है। एक तो मां को पहले ही सब पता चल गया है कि मेरा उसके साथ लफड़ा चल रहा है। तुझे तो पता ही है चार दिन पहले ही मां उसके घर जाकर उसकी मां को ठांस आई- तुम्हारी लड़की हवा में उडऩे लगी है। संभालो। मेरे घर आई या मेरे लड़के से मिली तो टांगे तोड़ दूंगी। ये साली हरामखोर ने करवाचौथ का व्रत धर लिया। अब व्रत खुलवाने के लिए दिमाग खा रही है। संदेश पर संदेश भेज रही है। मैं क्या करूं? कुछ समझ में नहीं आ रहा।
    तू बहुत बड़ा वाला है यार। तेरे से मैंने पहले ही कही थी- मत पड़ उस लड़की के चक्कर में। तुझे उससे प्यार-व्यार तो था नहीं। मजे के चक्कर में फंस गईं न लेंडी। अब भुगतो, और क्या।
    अबे तू दोस्त है या दुश्मन। मैं मुसीबत में हूं तू मजे ले रहा है। उसे समझा न कि ये त्योहार कुंआरी लौंडियों के लिए नहीं होता। ब्याह के बाद रहे अपने पति के लिए रखे मजे से। मेरे गले क्यों पड़ रही है?
    उसने तो तुझे मन ही मन पति मान लिया न। अब क्या किया जा सकता है। मैंने हंसते हुए कहा।
    वह शांत रहा क्योंकि घर आ गया था। हम छत पर पहुंचे। दो मंजिल मकान है। कुल जमा ३० जीने चढऩे होते हैं छत पर पहुंचने के लिए। यहां ही हम सब मुद्दों पर चर्चा करते हैं। पूर्वी को पहली चिट्ठी भी सत्यवीर ने मुझसे यहीं बैठकर लिखवायी थी।
    अबे यार, मजाक का टाइम नहीं है। हमको तो समझ में नहीं आता कि ये कौन-सा चलन चल निकला है, कुंआरी लड़कियां करवाचौथ का व्रत रख लेती हैं।
    हम बताते हैं क्या चलन है। वैलेन्टाइन का नाम सुना है।
    अब हमको ये भी नहीं पता होगा क्या?
    मालूम है तुम्हें नहीं पता होगा तो क्या मुझ जैसे ब्रह्मचारी को पता होगा। दो-दो तीन-तीन गोपियों से उपहार जो वसूलते हो उस दिन। देने के नाम पर सबको चूतिया बना देते हो। हां तो सुनो भाई साधौ। देशी वैलेन्टाइन हो गया है करवाचौथ। जितनी भी लड़कियां प्रेम में आकंठ डूबी हैं। जिनका प्रेम सरेबाजार बाइक पर बैठते समय कुछ अपने प्रेमी पर टपकता है कुछ रास्ते पर, ऐसी सभी कथित कुंआरी लड़कियां करवाचौथ का व्रत रखने लगी हैं। और सुन बेटा लौंडे भी कम नहीं, वे भी करवाचौथ कर रहे हैं।
    पगला गए है भौसड़ी के सब। उसकी झुंझलाहट और बढ़ गई थी। छत से पूर्वी का घर साफ-साफ दिखता है। सत्यवीर और पूर्वी के नैना यहीं से चार होते रहे हैं। अभी भी पूर्वी इधर-उधर चहल-कदमी कर रही थी। वह इशारे से सत्यवीर को कहीं बुलाना चाह रही थी। यह देखकर सत्यवीर का दिमाग गर्म हो रहा था। वह रसिक जरूर था लेकिन ये सब चोचलेबाजी उसे कतई पसंद नहीं थी। पूर्वी को वैसे भी वह छोडऩे की फिराक में था। एक तो मां ने सारा मामला पकड़ लिया था। दूसरा सत्यवीर को भी समझ आ गया था कि यह चिपकने वाली लड़की है।
    पगलाए नहीं हैं बच्चू। प्रेम में हैं। प्रेम जो न कराए वो कम है। तू सुन, प्रेमी युगल करवाचौथ का व्रत खोलने के क्या-क्या उपाय करते हैं। तेरा मामला तो लेट हो गया। बेचारी पूरे दो दिन से बिना अन्न-पानी के है। कुछ रहम कर अपनी महबूबा पर। तो लड़के पाइप से चढ़कर अपनी कुंआरी पत्नी को चांद से चेहरे का दीदार कराने और उसे अपने हाथ से पानी पिलाने पहुंच जाते हैं। लड़कियां सबके सोने के बाद चुपके से छत पर आ जाती हैं। या फिर कहीं बाहर मिल लेते हैं।
    तू एक काम कर खाना खाकर आ। फिर अपन दो दिन के लिए गांव चलते हैं। कॉलेज में भी खास पढ़ाई नहीं चल रही है। मुझे समस्या से बाहर निकालने के लिए तेरा दिमाग भी नहीं चल रहा है।
    गांव जाने से समस्या का हल नहीं निकलेगा मेरे भाई।
    अब तू जा जल्दी खाना खाकर आ। तेरा दिमाग नहीं चलेगा। मेरी खाज है मुझे ही खुजानी पड़ेगी।
    खाना खाने के बाद मैंने घर पर बताया कि दो दिन के लिए गांव होकर आता हूं। बहुत दिन हो गए हैं, गांव गए हुए। एक जोड़ी कपड़े पॉलीबैग में डाले और चला आया फिर से सत्यवीर के घर। वो तैयार बैठा था। बस पकडऩे के लिए हम घर से बचते-बचाते निकले, कहीं पूर्वी न देख ले। बस स्टॉप पर खड़े हुए पांच मिनट ही हो पाईं थीं कि पूर्वी आ गई। वो मैडम तो घाघ की तरह शिकार पर नजरें जमाए बैठी थी। उसे देखकर सत्यवीर के माथे की लकीरें बढ़ गईं। कोई देख ले और घर जाकर कह दे तो मां के हाथ दोनों के बारह बजने तय थे। सत्यवीर और पूर्वी के बारह मेरे नहीं। मेरे तो तेरह बजते।
    भैया इन्हें समझाओ न। मैंने इनके लिए व्रत रखा है और ये हैं कि मुझे पानी तक नहीं पिला रहे हैं। मैं दुकान तक जाने की कहकर आई हूं जल्दी वापस जाना होगा। आप प्लीज इन्हें समझाइए। पूर्वी ने उदास चेहरे के साथ मुझसे गुहार लगा रही थी।
    वैसे तुम्हें ये व्रत रखने की सलाह किसने दी? ये व्रत कुंआरी लड़कियों के लिए होता ही नहींं हैं। जाओ खुद ही पानी पी लेना, कोई दिक्कत नहीं होगी। मैंने अपनी लंगोटिया यारी निभाने की कोशिश की। हालांकि मुझे पता थी कि लड़की प्रेम में पगलाई हुई है। आसानी से मानेगी नहीं। वह नहीं मानी और सत्यवीर के पास पहुंच गई। खूब विनय किया पूर्वी ने लेकिन सत्यवीर नहीं माना। तब एक बार फिर वो मेरे पास आई।
    बस आप मेरा व्रत खुलवा दीजिए। आपका एहसान रहेगा मुझ पर।
    यहां तो पानी ही नहीं है। कैसे खुलेगा तुम्हार व्रत?
    इतना सुनते ही उसने इधर-उधर देखा। टिक्की (पानी पूरी) वाले के ठेले को देखकर उसका चेहरा खिल गया। वो पट्ठी दौड़ते हुए वहां गई। टिक्की वाले से एक दोना (पत्ते की कटोरी) लिया और उसमें जलजीरा का पानी भरकर ले आई।
    अब बुला लो अपने दोस्त को। जरा अपने हाथ से पिला दे फिर भाग जाए, जहां जाना हो।
    ठीक है। लेकिन, तुम्हारे लिए एक सलाह है। ये लड़का तुम्हें प्यार नहीं करता। इसलिए इसका ख्याल अपने दिल से निकाल देना। भविष्य में इस तरह की नाटक-नौटंकी मत करना। हमारी बात बुरी लग रही होगी लेकिन यही सत्य है।
    सत्यवीर के हाथ से टिक्की का पानी पीकर वह अपने घर चली गई। सत्यवीर ने भी राहत की सांस थी। उसने कहा - अब क्या करेंगे गांव जाकर।
    अब गांव तो चलना ही पड़ेगा। हम मन बना चुके हैं। दो दिन गांव में रहकर आएंगे। चलो बस आ गई।
    दोनों बस में सवार हो गए। ईश्वर की कृपा से सीट भी मिल गई। सत्यवीर किसी सोच में डूब गया। हम मंद-मंद मुसकरा रहे थे। पूरे एपिसोड को सोच-सोच कर मैं मन ही मन व्यथित भी था तो हंस भी रहा था। व्यथित इसलिए था कि आज के युवा किस रास्ते पर हैं। जिन्हें न तो प्रेम का पता है न परंपराओं का।

सोमवार, 24 सितंबर 2012

बड़ों के लिए किस्से बचपन के

 गि रिजा कुलश्रेष्ठ का पहला कहानी संकलन है 'अपनी खिड़की से'। भले ही यह उनका पहला कहानी संग्रह है लेकिन उनकी लेखनी की धमक पहले से मौजूद है साहित्यकारों के बीच। हाल ही में अपने स्थापना के तीन सौ साल पूरे करने वाली बाल जगत की पत्रिका 'चकमक' में उनकी कहानियां प्रकाशित होती रही हैं। झरोका, पाठक मंच बुलेटिन  और सोशल मीडिया भी उनकी रचनाओं को लोगों तक पहुंचा चुका है। 'अपनी खिड़की से' में १५ बाल कहानियां हैं। हालांकि परंपरागत नजरिए से ये बाल कहानियां हैं लेकिन मेरे भीतर का मन इन्हें सिर्फ बाल कहानियां मानने को तैयार नहीं। इन १५ कहानियों का जो मर्म है, आत्मा है, संदेश है वह न सिर्फ बच्चों के लिए आवश्यक है बल्कि उनसे कहीं अधिक जरूरी बड़ों के लिए है। भाग-दौड़ के जीवन में अक्सर हमारा मन इतना थक जाता है कि हम अपने बच्चों की आवाज भी नहीं सुन पाते, उनकी संवेदनाओं को महसूस करना तो दूर की बात है। ऐसे में गिरिजा कुलश्रेष्ठ की कहानियां हमें ये सोचने पर मजबूर करती हैं कि अनजाने में ही सही कहीं हम अपने लाड़ले के बचपन के साथ नाइंसाफी तो नहीं कर रहे। हालांकि 'अपनी खिड़की से' की कहानियां खुलेतौर पर बड़ों को उनकी गलतियां नहीं बतातीं लेकिन कहानियों का मर्म यही है। ये कहानियां गुदगुदाती हैं, जिज्ञासा जगाती हैं, चाव बढ़ाती हैं, मुस्कान लाती हैं और हौले से जीवन की अनमोल सीख दे जाती हैं।
     संग्रह का शीर्षक पहली कहानी के शीर्षक से लिया गया है। पहली कहानी में साधारण परिवार का बालक वचन अपने घर की खिड़की से पड़ोस में रहने वाले अमीर परिवार के बालक नीलू की गतिविधियां देखकर अपना मन उदास करता रहता है। नीलू के कितने मजे हैं। उसके पास कितने खिलौने हैं। इकलौता होने के कारण मम्मी-पापा के प्रेम पर भी अकेले का अधिकार। लेकिन, जिस दिन वह मौका पाकर नीलू के घर उसके साथ खेलने जाता है और वहां उसकी जिंदगी से बावस्ता होता है तब उसे पता चलता है कि मजे तो नीलू के नहीं उसके हैं। उसके मां-पिता कहीं भी जाते हैं तो सब भाई-बहनों को लेकर जाते हैं। वह जी भरकर साइकिल चला सकता है। कपड़े मैले होने का डर नहीं, वह मैदान में खेल सकता है। लेकिन नीलू की मां तो कितनी रोक-टोक करती है। चुपके से यह कहानी बड़ों को भी समझाइश देती है कि बच्चों के मन को समझो और उन्हें तितली की तरह आजाद रहने दो। तमाम तरह की बंदिशों में बचपन को बांधकर उन पर जुल्म न किया जाए। बच्चों को महंगे खिलौनों से अधिक अपनों का स्नेह चाहिए होता है। इसलिए दुनियादारी के बीच से अपने मासूमों के लिए थोड़ा-सा वक्त तो निकाला जाए। दूसरी कहानी 'पतंग' बड़ी महत्वपूर्ण है। माता-पिता कई बार जबरन और कुतर्क के साथ अपने विचार अपने बच्चों पर थोप देते हैं। बच्चे की खुशी जाए भाड़ में। माता-पिता की यही गलतियां कई बार उन्हें और बच्चों को असहज स्थितियों में लाकर खड़ा कर देती हैं। अब इसी कहानी के पात्र सूरज को लीजिए, वह ईमानदार, सच बोलने वाला और माता-पिता का आज्ञाकारी बालक है। उसके पिता का मत है कि पतंग उड़ाने वाले लड़कों का भविष्य निन्यानवे प्रतिशत खराब है। वे सबके सामने यदाकदा घोषणा भी करते रहते हैं कि हमारा बेटा सूरज कभी पतंग नहीं उड़ाएगा। उसे तो एक अच्छा विद्यार्थी बनना है। अब भला पतंग न उड़ाने और अच्छे विद्यार्थी बनने का क्या विज्ञान है? सूरज का मन तो पतंगों के रंगीन ख्वाब सजाता है। एक दिन पतंग उड़कर खुद ही उसके करीब आ जाती है। अब वह पिता के डर से उसे छिपाता है, झूठ भी बोलता है, इस चक्कर में वह गिरकर चोटिल भी हो जाता है। हालांकि अंत में पिता को पता चल जाता है और बेटे की खुशी को भी वो समझ लेते हैं। 'रद्दी का सामान, इज्जत वाली बात, मां, बॉल की वापसी और आंगन में नीम' बेहद रोचक कहानियां हैं। ये बड़ों और छोटों के मनोविज्ञान को उकेरती हैं। बड़ों और छोटों के बीच किन बातों को लेकर उठापटक, खटपट और अनबन रहती है और इन्हें कैसे दूर करके दोनों एक-दूसरे के नजदीक आ सकते हैं, दोस्त बन सकते हैं, इन कहानियों में बेहद खूबसूरती से इसका शब्द चित्रण किया गया है।
    'कोयल बोली' निश्चित ही आपको भावुक कर देगी। आपको आपका छुटपन और छुटपन के खास दोस्त की याद दिला देगी। 'बिल्लू का बस्ता' स्कूल के शुरुआती वर्षों की यादों का पिटारा खोल देगा। स्कूल जाने की कैसी-कैसी शर्तें होती थी। मां-पिता भी कितने प्रलोभन देते थे स्कूल भेजने के लिए। हमारे बस्ते में किताबें कम खिलौने ज्यादा मिला करते थे। विद्या के नाम पर किताबों में किसी पक्षी के रंगीन पंख और पौधे की पत्तियां। कंचे, डिब्बे-डिब्बियां, किताबों से काटे गए कार्टून और फूल के चित्र न जाने क्या-क्या। उस वक्त तो यही हमारे लिए कुबेर का खजाना होता था। सबसे छिपाकर रखना पड़ता था अपना खजाना।
    'सूराख वाला गुब्बारा' और 'बादल कहां गया' बड़ी मजेदार कहानियां हैं। सूराख वाला गुब्बारा का आशय चंद्रमा से है। यह धरती, सूरज और चंद्रमा के संबंध में है। मनुष्य की गलतियों की वजह से 'बादल का अपहरण' हो गया है। हवा बालक बादल को अपने साथ ले गई है। उसने फिरौती के रूप में मांगे हैं पेड़, पौधे, जंगल और बगीचे। बादल चाहिए तो हमें धरती को हरी साड़ी से सुशोभित करना पड़ेगा। प्रकृति के संवद्र्धन का संदेश देती कहानी है यह।
    तो मित्रो गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने अपने पहले ही कहानी संग्रह में हमें एक भरी-पूरी फुलवारी सौंपी है। जिसके १५ पुष्पों से उठती तरह-तरह की भीनी खुशबू बेहतरीन है। लेखिका प्रस्तावना में उम्मीद व्यक्त करती हैं उनकी ये बाल-कहानियां बाल पाठकों में ही नहीं वरन् प्रबुद्ध पाठकों के बीच में भी अपना स्थान बनाएंगी। मेरा मत है कि कहानियां प्रबुद्ध पाठकों द्वारा निश्चित ही सराही जाएंगी। अपने मकान की 'अपनी खिड़की से' देखेंगे तो कहीं न कहीं ये कहानियां हमें अपने आस-पास ही बिखरी नजर आएंगी।
दो शब्द अलग से : संग्रह में 'अपराजिता' का एक ही अंश प्रकाशित हो सका है। पूरी कहानी होती तो अपना प्रभाव ठीक से छोड़ पाती। कई बार अंश कथा के मर्म को पूरी तरह से व्यक्त नहीं कर पाते। 'तनु को रोना क्यों आ गया' इस सवाल का जवाब तो मुझे नहीं सूझा। संभवत: कहानी का संदेश कहीं फंस-सा गया। एक और छोटी-सी खामी दिखी। संग्रह में कहीं-कहीं वर्तनी की मामूली-सी त्रुटियां भी दिखीं। हालांकि इन्हें मैं प्रकाशक की जिम्मेदारी ही मानता हूं। एक और सूचना - गिरिजा जी का एक खंडकाव्य 'ध्रुव गाथा' प्रकाशित होकर आ गया है. आप गिरिजा जी को यहाँ (ये मेरा जहाँ ) पढ़ सकते हैं.

रविवार, 8 अप्रैल 2012

धवल राजनीति की पैरोकार थीं राजमाता


 पु  ण्यश्लोका राजमाता पुस्तक महज 69 पृष्ठों की है। 26 संक्षिप्त अध्याय हैं। इनमें ही राजमाता के सहज-सरल और उन्नत व्यक्तित्व को श्री नरसिंह जोशी जी ने प्रस्तुत किया है। पुस्तक अति लघु है क्योंकि राजमाता के बारे में पढऩे का मन अधिक है। उनके प्रेरक और विराट व्यक्तित्व को जानने की ललक अधिक है। पुण्यश्लोका राजमाता को पढ़कर यह ललक और बढ़ जाती है। नरसिंह जोशी जी ने इस लघु पुस्तक में राजमाता के प्रखर राष्ट्रवादी व्यक्तित्व, धर्म के प्रति प्रेम-आस्था, पर्यावरण की चिंता, समाज की चिंता, स्वदेशी प्रेम को बखूबी रेखांकित किया है। साथ ही सदैव-सदैव के लिए राजनीति का चित्र और चरित्र क्या होना चाहिए इस ओर भी पुस्तक इंगित करती है। राजमाता का असल नाम लेखा दिव्येश्वरी था। पिता डिप्टी कलेक्टर थे लेकिन ननिहाल नेपाल राजघराने से संबंध रखता था। राजमाता का जन्म सागर में हुआ। यहीं उनकी पढ़ाई हुई। कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही उनकी राष्ट्रभक्ति का प्रादुर्भाव हो गया था। उन्होंने अपनी सहेलियों के साथ विदेशी वस्त्रों को त्यागने की शपथ ली और स्वदेशी को अपना लिया। जीवन की अंतिम सांस तक राजमाता जी अपनी इस शपथ का पालन करते दिखीं वे बहुत ही सात्विक जीवन जीती रहीं। धर्म पारायणता उन्होंने अपनी नानी से सीखी। राजमाता भगवान कृष्ण की अनन्य भक्त थीं। 
       पुस्तक में नरसिंह जोशी जी ने लिखा है कि वे हमेशा अपने साथ एक सुन्दर से बक्से में कृष्ण की प्रतिमा साथ रखती थीं। तमाम वैभव होने के बाद भी उनका जीवन संकटों के बीच गुजरा। असमय उनके पति महाराज जीवाजीराव सिंधिया का निधन, आपातकाल में जेल की यातानाएं, विपरीत समय में पुत्र माधवराव सिंधिया उनसे दूर हो गए। इन सबके बाद भी राजमाता अपने कर्तव्य पर डटी रहीं। उन्होंने कभी अपने को हारने नहीं दिया। अन्याय का सदैव विरोध किया। राजमाता पहली बार कांग्रेस के टिकट पर जीतकर संसद गईं हालांकि राजमाता कभी-भी कांग्रेस पार्टी में जाना नहीं चाहती थीं। उनका असल राजनीतिक जीवन तो 1966 से शुरू हुआ। 17 सितंबर 1966 में ग्वालियर में छात्रों के प्रदर्शन पर पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। कांग्रेस से मुख्यमंत्री द्वारिका प्रसाद मिश्रा की सरकार ने छात्रों पर गोली भी चलवाईं। इसमें एक छात्र मारा गया। इस प्रसंग के बाद राजमाता जी कांग्रेस के प्रति मन खीझ जाता है। वे 1967 के चुनाव से पूर्व कांग्रेस का त्यागकर काफी सोच-विचारकर जनसंघ में प्रवेश करती हैं। राजमाता ने अथक प्रयासकर द्वारिका प्रसाद की सरकार को मटियामेट कर दिया। जनसंघ से जुडऩे और मप्र से कांग्रेस को उखाड़ फेंकने के कारण कांग्रेस नेतृत्व उनसे चिढ़ गया। इसके बाद कांग्रेस ने उनके खिलाफ साम-दाम-दण्ड की नीति अपनाई। आपातकाल में राजमाता को तिहाड़ जेल में रखा गया। धीमे-धीमे राजमाता की निकटता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद और अन्य राष्ट्रवादी संगठनों से बढ़ी। राजमाता ने संपत्ति जोडऩे से अधिक संपत्ति का जनता के हित में उपयोग हो इस आचरण को समाज के सामने प्रस्तुत किया। 1967 के चुनाव के बाद छत्तीसगढ़ में सूखा की स्थिति में और अतिवृष्टि से चंबल नदी से मुरैना, नर्मदा से होशंगाबाद में आई बाढ़ के समय उन्होंने यथासंभव पीडि़तों की मदद की। 
राजनीति कैसी होनी चाहिए। उसका चरित्र क्या हो। राजनीति का उद्देश्य क्या हो। राजनेताओं का चरित्र और व्यवहार कैसा हो। इसकी झलक वे स्वयं तो प्रस्तुत करती ही थी अन्य को भी इसके लिए प्रेरित करती थीं। इस विषय में उन्होंने मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने पर विधानसभा सदस्यों को विस्तृत पत्र लिखा। पत्र में वे लिखती हैं कि यह हमारे लाखों कार्यकर्ताओं की वर्षों की कठिन तपस्या और कठोर परिश्रम का ही फल है कि मध्यप्रदेश के शासन की बागडोर प्रदेश की जनता ने हमें सौंपी है। अक्षम, भ्रष्ट और अत्याचारी इकाई शासन को हटाकर जनता ने हमें सत्ता इसीलिए सौंपी है कि उसे एक साफ सुथरी, ईमानदार, सक्षम और सेवाभावी सरकार मिल सके। इस अवसर पर आपसे कुछ व्यक्तिगत निवेदन करना चाहती हूं। वस्तुत: यह परिवर्तन केवल चेहरों या हाथों का परिवर्तन नहीं, अपितु इसे एक संपूर्ण व्यवस्था का परिवर्तन समझा जाना चाहिए। इसे अंधेरी रात के स्थान पर नए सवेरे के सूरज का उदय समझना चाहिए। अत: जो अंतर अंधेरे और उजाले में होता है, वही अंतर कांग्रेस की और हमारी सरकार के बीच जनता को महसूस होना चाहिए। इस पत्र में वे आगे और लिखती हैं। राजनीतिक सुचिता की बात करती हैं। राजनीति का उद्देश्य और जनता के प्रति उत्तरदायित्व की बात करती हैं। लेखक नरसिंह जोशी जी ने पुस्तक में यह पत्र शामिल किया है। पुस्तक में सुनी-सुनाई बातें नहीं अपितु लेखक के स्वयं के अनुभव हैं। साथ ही प्रमाण सहित उन्होंने राजमाताजी के संदर्भ में अपनी बात लिखी हैं। लेखक ने लंबा राजनीतिक कालखण्ड राजमाताजी के साथ बिताया इस दौरान उन्होंने उनके विराटत्व, गरिमा, सादगी, आध्यात्मिक और संत पक्ष के दर्शन किए। नरसिंह जोशी जी ने महसूस किया कि जनसंघ में शामिल होने के समय और उसके बाद भी कुछ वर्षों तक राजमाताजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को साम्प्रदायिक संगठन मानती थी। उनका कहना था कि कांग्रेस में उन्हें यही बताया गया था। इसलिए उनकी धारणा संघ के प्रति ऐसी ही बन गई। लेकिन, जब बाद में उन्होंंने राष्ट्र के प्रति संघ की तड़प और समर्पण को देखा तो उनकी धारणा बिखर गईं। वे संघ सहित उसके कई अनुषांगिक संगठनों से जुड़ गईं। विश्व हिन्दू परिषद के साथ तो उन्होंने लम्बे समय तक काम किया। राम मंदिर निर्माण का वे प्रबल पक्ष लेती थीं। उनका कहना था कि राम इस देश की आन है जब सर्वविधित है कि एक आक्रांता ने अयोध्या में मंदिर तोड़कर उसके स्थान पर मस्जिद का ढांचा खड़ा किया है। ढांचे के स्थान पर पुन: मंदिर बनना चाहिए। उन्होंने रामजन्मभूमि आंदोलन के लिए काम किया। भाजपा में भी इस मुद्दे पर कई मर्तबा अपनी राय रखी। प्रदेश में गौवंश की रक्षा हो उसके प्रति भी वे चिंतित थीं। वर्ष 1986 में भोपाल में प्रन्यासी मण्डल की बैठक में जब अन्य कार्यवाही चल रही थी तब मंच पर बैठे-बैठे ही राजमाताजी ने गौरक्षा का प्रस्ताव लिखा। अधिकारियों को बताया और आंशिक संशोधन के साथ उस पर बैठक में चर्चा भी हुई। इसके बाद उनके इस प्रयास ने एक बड़ा रूप ले लिया।
पुस्तक में करीब 20 चित्र राजमाताजी से संबंधित प्रकाशित किए गए हैं, ये चित्र इस पुस्तक को और अधिक महत्वपूर्ण व संग्रहणीय बनाते हैं। पुस्तक सभी वर्गों के लिए पठनीय, संग्रहणीय और उपहार देने योग्य है। 
 पुस्तक - पुण्यश्लोका राजमात
लेखक - नरसिंह जोशी
प्रकाशक - सौ. अपर्णा पाटील
संपादिका, यश
एफ-160, हरिशंकरपुरम्, ग्वालियर
मूल्य - 60 रुपए

रविवार, 25 दिसंबर 2011

शराबी कवियों से छीन लिया था मंच

 भा रत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के ८७वें जन्मदिन पर उनके कुछ पुराने फोटोग्राफ्स प्रस्तुत कर रहा हूं। कविमना, सरल हृदय और ओजस्वी वक्ता की एक कविता भी प्रस्तुत है। उनका जन्म ग्वालियर में हुआ था। यहीं से उन्होंने राजनीति में कदम रखा। संयुक्त राष्ट्र सभा को हिन्दी में संबोधित करने वाले भारत के सपूत और प्रख्यात हिन्दी प्रेमी के संबंध में ग्वालियर में अनेक किस्से प्रचलित हैं। एक किस्सा जरूर बताना चाहूंगा। उन दिनों की बात है जब वे महाविद्यालयीन पढ़ाई कर रहे थे। ग्वालियर में एक कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कवि समय से सम्मेलन में नहीं पहुंच सके थे। कार्यक्रम में विलंब होते देख अटल बिहारी ने माइक संभाला और कॉलेज के नए-नए कवियों को मंच सौंप दिया। इसके बाद की बात और जबरदस्त है। कवि महोदय शराब के नशे में टुन्न होकर कार्यक्रम में पहुंचे। अटल बिहारी को जैसे ही मालूम हुआ उन्हें यह ठीक नहीं लगा। कविता का पाठ करते-करते कवि बहकने भी लगे थे। मामला बिगड़ता इससे पहले ही उन्होंने कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा कर दी।
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि उन्हें दीर्घ आयु और स्वास्थ्य मिले। ताकि वे फिर से नेताओं को मूल्य आधारित राजनीति का पाठ पढ़ा सकें।











झुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते
सत्य का संघर्ष सत्ता से
न्याय लड़ता निरंकुशता से
अंधेरे ने दी चुनौती है
किरण अंतिम अस्त होती है
दीप निष्ठा का लिये निष्कंप
वज्र टूटे या उठे भूकंप
यह बराबर का नहीं है युद्ध
हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध
हर तरह के शस्त्र से है सज्ज
और पशुबल हो उठा निर्लज्ज
किन्तु फिर भी जूझने का प्रण
अंगद ने बढ़ाया चरण
प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार
समर्पण की माँग अस्वीकार
दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते