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सोमवार, 29 मार्च 2021

चार पाकिस्तान बनाने का विचार 'लीगी मानसिकता'

जिस मुस्लिम लीगी मानसिकता ने भारत का विभाजन किया था, वह अब भी मौजूद है। भारत की अखंडता, एकता और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए यह विभाजनकारी मानसिकता खतरनाक संकेत है। बंगाल के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान तृणमूल कांग्रेस के नेता शेख आलम ने भारत के टुकड़े करके चार पाकिस्तान बनाने संबंधी देश विरोधी भाषण दिया है। बीरभूम जिले के नानूर विधानसभा सीट से तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार करने पहुँचे शेख आलम ने कहा कि "हमारी जनसंख्या 30 प्रतिशत है और वो (हिन्दू) 70 प्रतिशत हैं। अगर पूरे भारत में हम 30 प्रतिशत लोग इकट्ठे हो जाते हैं तो हम चार-चार पाकिस्तान बना सकते हैं। फिर कहां जाएंगे ये 70 प्रतिशत लोग"? शेख आलम का यह बयान स्पष्ट तौर पर देशद्रोह की श्रेणी में आता है और इसके साथ ही यह भारत के विरुद्ध अंदरखाने में चल रही भयंकर साजिश की ओर भी इंगित करता है।

भारत हितैषी संगठनों एवं व्यक्तियों द्वारा बार-बार जब यह चेतावनी दी जाती है कि मुस्लिम बाहुल्य वाले क्षेत्र भारत की एकता एवं अखंडता के लिए खतरा बन सकते हैं, तब उनकी बातों को तथाकथित सेक्युलर ताकतें सांप्रदायिक कह कर खारिज कर देती हैं। लेकिन, यही सेक्युलर समूह/व्यक्ति शेख आलम जैसे कट्टरपंथी एवं लीगी मानसिकता के लोगों के बयानों पर चुप्पी साध जाते हैं। बल्कि पुलिस प्रशासन द्वारा जब इनके विरुद्ध कार्रवाई की जाती है, तब यह गैंग तख्ती एवं मोमबत्ती लेकर सड़कों पर उतर आती है। इससे पहले भारत से पूर्वोत्तर राज्यों को तोडऩे की योजना बताने वाले शर्जील इमाम के मामले में देश ने देखा ही कि कैसे तथाकथित प्रगतिशील उसकी तरफदारी कर रहे थे। 

बंगाल में कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहाँ लीगी मानसिकता का प्रभाव दिखाई देता है। इस संदर्भ में तृणमूल कांग्रेस की सरकार में मंत्री फिरहाद हकीम के उस बयान का उल्लेख आवश्यक हो जाता है, जिसमें उन्होंने माना कि बंगाल के कई क्षेत्र 'पाकिस्तान' बनाए जा चुके हैं। वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव के पांचवे चरण के मतदान से पहले मंत्री फिरहाद हकीम ने पाकिस्तान के एक पत्रकार से कहा था- "आप हमारे साथ आइए, हम अपको कोलकाता के मिनी पाकिस्तान ले चलते हैं"। वैसे यह स्थिति प्रत्येक उस शहर में बन गई है, जहाँ मुस्लिम आबादी 15 से 30 प्रतिशत है। मुस्लिम बाहुल्य वाले इन क्षेत्रों में सांप्रदायिक तनाव स्पष्ट तौर दिखाई देता है। जहाँ शेख आलम ने आपत्तिजनक बयान दिया है, उसी बीरभूमि के एक गाँव में 300 हिन्दू परिवारों को लगातार चौथे वर्ष दुर्गा पूजा का आयोजन करने के लिए स्थानीय प्रशासन से अनुमति लेनी पड़ी। ममता सरकार में कई बार यह स्थिति बनी है कि दशहरा और दुर्गा पूजा से हिन्दुओं को रोका गया है। अपनी परंपरा-संस्कृति का पालन करने और धार्मिक स्वतंत्रता के अपने मौलिक अधिकार के लिए हिन्दुओं को न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। 

यह स्थिति चिंताजनक है। शेख आलम के बयान को हवा में उड़ाना एक बड़ी भूल साबित हो सकती है। शासन-प्रशासन के साथ ही देशभक्त नागरिकों को लीगी मानसिकता पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। 

यह भी देखें - कश्मीरी हिन्दुओं की हत्या के पीछे जेहादी मानसिकता




रविवार, 6 मई 2018

कौन हैं भारत में जिन्ना के प्रेमी?

 अलीगढ़  मुस्लिम विश्वविद्यालय में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर क्यों लगाई गई है? यह प्रश्न बहुत वाजिब है। यह आश्चर्य का विषय भी है कि स्वतंत्रता के इतने वर्ष बाद तक भारत विभाजन के प्रमुख गुनहगारों में शामिल जिन्ना की तस्वीर एक शिक्षा संस्थान में सुशोभित हो रही है। मोहम्मद अली जिन्ना सिर्फ भारत विभाजन का ही गुनहगार नहीं है, बल्कि हजारों लोगों की हत्या का भी दोषी है। भाजपा के सांसद सतीश गौतम ने विश्वविद्यालय के उपकुलपति तारिक मंसूर को पत्र लिखकर उचित ही प्रश्न पूछा है कि क्या मजबूरी है कि जिन्ना की तस्वीर विश्वविद्यालय में लगाई गई है? उन्होंने पत्र में यह भी कहा है कि अगर वह विश्वविद्यालय में कोई तस्वीरें लगाना चाहते हैं तो उन्हें महेंद्र प्रताप सिंह जैसे महान लोगों की तस्वीर संस्थान में लगानी चाहिए, जिन्होंने विश्वविद्यालय बनाने के लिए अपनी जमीन दान में दी थी।

शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

सरकारी दखल पर है सुप्रीम कोर्ट को आपत्ति, लेकिन 'अंकल जज' का क्या करें

 सु प्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग एक्ट (एनजेएसी) को असंवैधानिक बताकर खारिज कर दिया है। न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता और निष्पक्षता लाने के उद्देश्य से भाजपानीत एनडीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए अगस्त-2014 में इस आयोग का गठन किया था। इसके लिए संविधान में 99वां संशोधन भी किया गया था। केन्द्रीय कानून मंत्री सदानंद गौड़ा ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर आश्चर्य जताते हुए कहा है कि न्यायिक व्यवस्था में सुधार के लिए यह कानून जरूरी था। संसद के दोनों सदनों ने कानून को पारित किया था। उन्होंने अपने बयान में यह भी कहा है कि एनजेएसी को 20 राज्यों का समर्थन प्राप्त है। इस हिसाब से देखें तो भारत में न्यायिक व्यवस्था में बदलाव की जरूरत केवल एनडीए सरकार ही नहीं बल्कि देश महसूस कर रहा है।

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

रावण मारो, शक्तिशाली बनो

 द शहरा आने को है। सब ओर तैयारियां चल रही हैं। मोहल्लों में रहने वाले बच्चे खुद ही रावण तैयार कर रहे हैं जबकि बड़ी मंडलियां चंदा जमा कर रही हैं, बाजार से रेडीमेड बड़ा रावण खरीदा जाएगा। छोटे-बड़े सभी रावणों को गली-मैदान में स्वाह कर दिया जाएगा। उल्लास मनाएंगे कि बुराई का अंत कर दिया। सब माया है। रावण तो जिन्दा है। हम सबके भीतर। तैयारी उसे मारने की होनी चाहिए। भीतर का रावण एक तीर से नहीं मरता, उसके लिए रोज सजग रहना पड़ता है कमान खींचकर, जैसे ही सिर उठाए, तीर छोड़ देना होता है। कई दिन तो रोज उसे मारना पड़ता है। इसके बाद फिर समय-समय पर उसका वध करना होता है। यह सतत प्रक्रिया है। लेकिन, हम मार किसे रहे हैं, बाहर के रावण को, वह भी पुतले को। असल रावण तो जीते रहते हैं, हम में और तुम में। ये हम और तुम का रावण मर गया फिर सब ठीक हो जाएगा। 
अब सवाल यह है कि आखिर भीतर कौन-सा रावण है। लोभ, वासना, बेईमानी, कायरता, आलस, क्रोध, स्वार्थ, कपट, झूठ और फरेब। ये सब भीतर के रावण हैं। इनसे युद्ध मनुष्य की प्राथमिकता होनी चाहिए। लोभ मनुष्य को भ्रष्टाचारी बनाता है। लोभ ही हमे बेईमान भी बनाता है। अब हम देखें कि लोभ के कारण आज देश की क्या स्थिति है और आम समाज को क्या नुकसान है। लोभ पर शुरुआत से ही काबू नहीं किया गया तो यह बढ़ता ही जाता है। यह कभी-भी कम नहीं होता। लोभी मनुष्य ने पहले हजारों के घोटाले किए फिर लाखों के और अब लाखों के घोटाले उनके लिए घोटाले ही नहीं हैं। क्योंकि लोभ बढ़ गया। यानी भ्रष्टाचार की सीमा बढ़ गई।  देश-समाज का नुकसान ज्यादा बढ़ गया। यही हाल वासना रूपी रावण का है। वासना के फेर में फंसकर अच्छे से अच्छा व्यक्तित्व धूमिल हो जाता है, क्षणभर में। सिर्फ व्यक्तित्व धूमिल नहीं होता बल्कि उसके साथ जुड़े मानबिन्दुओं पर भी प्रश्न चिह्न खड़ा होता है। यदि धार्मिक चोला ओढ़कर बैठा व्यक्ति काम का शिकार हो जाता है तो लोगों का विश्वास डिगता है। इसका फायदा धर्म-परंपरा विरोधी लोग उठाते हैं। धर्म-परंपरा के नाम पर अपना जीवनयापन कर रहे चारित्रिक रूप से कमजोर व्यक्ति की आड़ में धर्म विरोधी लोग हमलावर भूमिका में आ जाते हैं। वे संबंधित धर्म पर आक्षेप लगाते हैं। परंपराओं पर अंगुली उठाते हैं। हालांकि जिस धर्म और समाज पर अगुंली उठाई जा रही होती है, वह धर्म और समाज ही चारित्रिक रूप से पतित व्यक्ति को स्वीकार नहीं करता है। रावण को प्रकांड ब्राह्मण बताया जाता है लेकिन इसके बावजूद हिन्दू समाज में उसका आदर नहीं है। कारण, उसका अमर्यादित आचरण। इसलिए आपने जीवनभर में नाम रूपी जो पूंजी कमाई है, उसे बचाए रखना चाहते हैं, अपनी आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करना चाहते हैं तो वासना रूपी रावण का अंत बार-बार करते रहिए। 
दशहरा चूंकि शक्ति का पर्व है। इस दिन क्षत्रिय अपने हथियारों की पूजा करते हैं। पूर्वजों ने समाज को एक संदेश देने की कोशिश की है कि ताकत हासिल कीजिए। साथ में यह भी संकेत कर दिया कि इसका दुरुपयोग मत कीजिए। गरीब, असहाय पर अपनी ताकत का इस्तेमाल नहीं करें बल्कि उनकी रक्षा के लिए आगे खड़े रहें। साथ ही अन्य लोगों को भी यह आभास बना रहना चाहिए कि यह शक्तिशाली है ताकि वह आप पर हावी न हो सके। कमजोर को हर कोई दबाना चाहता है। भारतीय राजनीति इसका अच्छा उदाहरण है। यहां बाहुबली नेतागिरी कर रहे हैं। कमजोर की कोई पूछ नहीं। जो शक्तिशाली है, संगठित वोट बैंक हैं उनकी भारतीय राजनीति में भारी पूछपरख है, मौज भी उनकी ही है। शासन की योजनाएं भी उनके लिए हैं जबकि असंगठित बहुसंख्यक समाज की फिक्र तक किसी को नहीं। उसकी भावनाएं भी गईं चूल्हे में। 
मजबूत और शक्तिशाली दिखने की जरूरत जितनी व्यक्तिगत स्तर पर है, उससे कहीं अधिक एक देश के लिए आवश्यक है। इजराइल के संबंध में समझा जा सकता है। इजराइल छोटा-सा देश है लेकिन साहस उसका किसी ऊंचे पर्वत से भी विशाल है। चारों तरफ से शत्रु देशों से घिरा है लेकिन मजाल है कि कोई उसकी तरफ आंख उठाकर देख जाए। इजराइल ने अपनी शक्तिशाली छवि यूं ही नहीं बनाई है। उसने करके दिखाया है। अपने शत्रुओं को ईंट का जवाब पत्थर से दिया है। जबकि भारत और पाकिस्तान के संबंध में ऐसा नहीं दिखता। पाकिस्तान बार-बार गुर्राता है। भारत की ओर आंखें तरेरता है। चार युद्ध हारने के बाद भी उसकी इतनी हिम्मत भारत की सुरक्षात्मक नीति के कारण है। भारत सरकार बार-बार उसके अमर्यादित व्यवहार को माफ करती है। जबकि होना यह चाहिए कि पाकिस्तान की ओर से कोई संदिग्ध गतिविधि की आशंका दिखे तो घटना घटने से पहले ही भारत की ओर से कार्रवाई कर दी जानी चाहिए। यदि ऐसा हो जाए तो पाकिस्तान की अक्ल ठिकाने आ जाए। वह भारत विरोधी कदम उठाने से पहले सौ बार सोचेगा। 
दशहरा महज उल्लास का पर्व नहीं है। बल्कि बहुत कुछ संकेत की भाषा में बताने की कोशिश करता है। अपने भीतर के तमाम रावणों को मारो-जलाओ बाकि बाहर सब ठीक हो जाएगा। खुद सशक्त बनो तो समाज ताकतवर बनेगा और देश को भी मजबूती मिलेगी। आखिर लोकतंत्र है भारत में, नेता इसी समाज से चुनकर जाने हैं। जैसा हम समाज बनाएंगे, वैसे ही नेता चुने जाएंगे। लोभ, लालच, स्वार्थ सहित अन्य सारे रावणों पर विजय पा लेंगे तभी तो हम आने वाले वक्त में सही चुनाव कर सकेंगे। तो खींच लो कमान अब ज्यादा वक्त नहीं बचा।  

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

थैंक्स अ लॉट जेन

 ज र्मन युवती जेन वॉन रेबनाउ ने भारत के संदर्भ में अपने अनुभव साझा किए हैं। जेन के अनुभव भारत और भारतीय समाज को सुखद और गर्व की अनुभूति कराते हैं। सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि जेन ने अमेरिकन युवती मिशेल क्रॉस को करारा जवाब दिया है। स्टडी ट्रिप पर भारत आई मिशेल ने यहां से जाने के बाद भारत को औरतों के लिए नरक बताया था। खासकर विदेशी युवतियों के लिए भारत को एक तरह से वाहियात बताया था। मिशेल ने ब्लॉग पर अपने अनुभव लिखे थे कि किस तरह भारतीय पुरुष लंपटों की तरह उसके रंग और सीने को घूरते थे। कभी-कभी तो पीछे ही पड़ जाते थे। इतना ही नहीं कुछ मौकों पर तो उसका रेप होते-होते बचा। मिशेल के अनुभवों से सभ्य भारतीय समाज ने लज्जा का अनुभव किया। शर्म से भारत का सिर झुक गया था। हालांकि हम भी जानते हैं कि मिशेल ने जो लिखा वह सच है लेकिन यह पूरे भारत का सच नहीं। इस तरह के लोग तो सभी देशों में पाए जाते हैं। ब्रिटेन, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, चीन, अफ्रीका, अफगानिस्तान और अरब देश सहित अन्य देशों में भारतीय महिला-पुरुषों के साथ भी कई मौकों पर अभद्र व्यवहार होता है। खासकर सिख समाज को कई बार बेहद लज्जाजनक स्थितियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन, यह तो कभी किसी ने नहीं कहा कि ये देश महिलाओं के लिए नरक हैं। लेकिन, भारत के प्रबुद्ध वर्ग की ओर से मिशेल को कोई जवाब नहीं दिया गया। अच्छा ही रहा। एक तो स्वयं अपनी वकालात करते तो शायद तथ्यों को उतनी स्वीकार्यता नहीं मिलती जितनी कि जर्मन युवती जेन की कथ्य से मिली है। दूसरा यह कि चलो अच्छा हुआ मिशेल ने अपने अनुभव साझा किए, इससे हमें आत्म चिंतन करने का मौका मिला। 
मिशेल की तरह ही जेन वॉन रेबनाउ भी भारत स्टडी टूर पर आई। महीनों भारत के अलग-अलग हिस्सों में रहीं। दर्शन की छात्रा जेन भारत ही नहीं दुनिया के अन्य देशों की सैर भी कर चुकी हैं। जेन लिखती हैं कि वे मिशेल क्रॉस के अनुभवों को कई बार पढ़ चुकी हैं। मेरे लिए भारत के अनुभव सकारात्मक और रोमांचक हैं। भारतीयों के आतिथ्य से मैं काफी प्रभावित हूं। इसके बाद जेन ने अपने ब्लॉग पर मिशेल के अनुभवों का जवाब बिन्दुवार दिया है। वे कहती हैं कि हम आम भारतीयों से अलग दिखते हैं तो स्वाभाविक है कि वे हमें घूरेंगे ही। हम भी तो उन्हें घूरते हैं। वे हमारे फोटो खींचते हैं, मोबाइल में वीडियो बनाते हैं तो इसे हम अपनी निजता का हनन मानते हैं जबकि हम तो उनसे भी अधिक फोटो बिना इजाजत खींचते हैं। फिर इसमें फर्क क्यों? जेन लिखती हैं कि इटली में पुरुष महिलाओं को घूरते हैं तो इसे तारीफ समझा जाता है जबकि भारत में यौन शोषण, यह दोहरा मापदण्ड क्यों? जेन ने इस तरह से मिशेल के तमाम आपत्तियों को सिरे से खारिज किया है। वे भारतीयों की मेहमाननवाजी की कायल हो गईं और तारीफ करते नहीं थकतीं। उनका कहना है कि उनके बाकी दोस्तों के अनुभव भी भारत के संदर्भ में ऐसे ही सकारात्मक हैं। भारतीय संस्कृति से अभिभूत जेन बार-बार भारत आने की इच्छा जाहिर करती हैं। भारत के सकारात्मक पक्ष को दुनिया के सामने रखने के लिए हम भारतवासी उनका धन्यवाद करते हैं। भारत में जेन, उनके दोस्त और मिशेल सहित अन्य विदेशी पर्यटकों, छात्रों का स्वागत है। जरा-सी सावधानी आप बरतें तो भारत सभी के लिए स्वर्ग ही होगा। हम राम-कृष्ण के हामी है, प्रेम में भरोसा करते हैं। 
हाल के दिनों में कुछेक बेहद दर्दनाक और शर्मनाक घटनाएं भारत में हुईं। दिल्ली गैंगरेप और मुबंई रेपकाण्ड सहित अन्य घटनाओं ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर नारी को देवी के समान आदर देने वाले देश में उसे रौंदा जा रहा है। आखिर देश में चल क्या रहा है? मीडिया से लेकर प्रबुद्ध वर्ग की चिंताओं में भारत की जो छवि सामने आई वह वाकई सोचने वाली थी कि क्या सिर्फ इसी देश में महिलाओं की बदतर स्थिति है? बाकि दुनिया महिलाओं के लिए मुफीद है। अगर हम ऐसा मानते हैं तो यह एक झूठ के सिवा कुछ न होगा। सउदी अरब में महिलाएं अकेली घर के बाहर भी नहीं निकल सकतीं, उनके साथ किसी पुरुष को होना जरूरी है। यहां तक की घर में घुसने-निकलने के लिए महिला-पुरुषों के दरवाजे भी अलग-अलग हैं। तालिबान ने तो महिला शिक्षा की बात कर रही महज १५ साल की बच्ची मलाला यूसुफजई को गोली मार दी थी, उसकी किस्मत थी कि वह बच गई। पाकिस्तान में ९० फीसदी से ज्यादा महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार रहती हैं। माली में भी महिलाओं को घर से बाहर जाने के लिए पुरुष की इजाजत लेनी पड़ती है। सोमालिया भी महिलाओं के लिए एक बुरा देश माना जाता है। माली और सोमालिया में ९० फीसदी महिलाओं के गुप्तांग के अंग-भंग करने की बात सामने आई है। डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो को दुनिया की 'रेप की राजधानी' कहा जाता है। यहां महिलाओं का उपयोग युद्ध में भी किया जाता है। इसके अलावा भी कई देश हैं जहां महिलाओं को तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ब्राजील, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और न्यूजीलैण्ड में भी महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की घटनाएं आम हैं। 
दूसरे देशों के हाले-बयां करके यहां इस बात की तरफदारी करने की कोशिश कतई नहीं की जा रही है कि जब सब जगह ऐसा है तो भारत में ऐसी घटनाओं पर चिल्ला-तौबा क्यों? और न ही महिलाओं की अस्मिता पर नजर गड़ाने वाले भेडिय़ों का बचाव किया जा रहा है। बल्कि यह कहने का प्रयास है कि भारत को इसी रूप में पेश न किया जाए, भारत के सकारात्मक पक्षों पर भी बात की जाए। साथ ही महिलाओं के प्रति दुराचार की एक घटना भी न घट सके इसके लिए ठोस काम करने की जरूरत है। भारत दुनिया की श्रेष्ठ सभ्यता और संस्कृतियों के मालिकों में से एक है। भारत के मान को बनाए रखना और उसके गौरव को बढ़ाने की जिम्मेदारी  हम सभी भारतीयों के कंधों पर है। पूरी कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि देश की ही नहीं विदेश से आने वाली एक भी महिला को अपमानजनक स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा। बाहर से आने वाली प्रत्येक महिला जर्मन छात्रा जेन वॉन रेबनाउ की तरह भारत में मिले मान-सम्मान से अभिभूत होकर जाए और बार-बार यहां की मेहमाननवाजी का लुत्फ उठाने के लिए आती रहे। जब भी भारत का जिक्र चले, वे धन्यवाद भारत कहें और हमें थैंक्स अ लॉट जेन की जगह वेलकम जेन कहने की आदत पड़ जाए।
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मिशेल क्रॉस के अनुभव -
http://aajtak.intoday.in/story/the-india-you-will-ashamed-to-know-us-students-haunting-account-1-740198.html
जेन वॉन रेबनाउ के अनुभव -
http://aajtak.intoday.in/story/india--a-blonde-tourist-an-alternate-account-1-740836.html

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

हिन्दुओं के लिए दोहरी त्रासदी था विभाजन

 १४ अगस्त १९४७ आधुनिक भारत का सबसे दु:खद दिन था। कुछ सिर-फिरे नेताओं की सत्तालोलुपता के कारण दोनों ओर से हजारों-लाखों लोगों को मार डाला गया। विशेषकर वर्तमान पाकिस्तान में बसे हिन्दुओं की निर्ममता से हत्या की गई। जुलाई-अगस्त से ही उपद्रव शुरू हो गए थे, जो विभाजन के बाद तक जारी रहे। रात के समय हिन्दुओं के घर और दुकान अधिकारियों की मिलीभगत से उपद्रवी जला रहे थे और हिन्दुओं को मार-काट कर उन पर कब्जा कर रहे थे। बीभत्स नर-संहार के समाचार पाकिस्तान में बसने के इच्छुक लोगों को भी कंपा रहे थे। खून-पसीने की कमाई से बनाए पूर्वजों के और अपने पहले घर को कोई छोडऩा नहीं चाहता। लेकिन, धार्मिक देश के नाम पर नर से पिचाश बने लोगों के आगे उदार हिन्दुओं की हिम्मत जवाब देने लगी। आखिर ज्यादातर हिन्दुओं ने पाकिस्तान जो कि हिन्दुओं के लिए नापाक हो चुका था, से भाग आना ही उचित समझा। अहो! दुर्भाग्य, सुरक्षित भारत चले आना भी उनके नसीब में नहीं था। उस पार से रेलगाडिय़ों में जिन्दा इंसान की जगह लाशें यात्रा कर हिन्दुस्तान आती थीं। जिनकी किस्मत बहुत ही बुलंद थी, वे ही अमन की सरजमीं पर सही-सलामत आ सके। महज तीन माह में ही पाकिस्तान में बसे ९० फीसदी हिन्दुओं ने हमेशा के लिए अपने पैतृक भूमि को छोड़ दिया, या कहें छोडऩे पर मजबूर होना पड़ा। विभाजन की नींव हिन्दू-मुस्लिम एकता को छिन्न-भिन्न करके रखी गई थी। उस दौर के कई मुस्लिम  और हिन्दू संतों ने इस खूनी मंजर को रोकने के अथाह प्रयास किए थे लेकिन प्रयास रंग नहीं ला सके। विभाजन का दंश हिन्दुओं को ही नहीं चुभा वरन इससे उदार मुस्लिम भी आहत हुए। उन्होंने भी अपने लोग खोए और भूमि भी। लेकिन, तुलनात्मक रूप से इसका खामियाजा हिन्दुओं को अधिक उठाना पड़ा। विभाजन की अधिक मार हिन्दुओं पर ही पड़ी। लुटे-पिटे हिन्दू, खाली हाथ बमुश्किल जान बचाकर हिन्दुस्तान आ सके थे।
    कांग्रेस के प्रवक्ता शकील अहमद ने शायद इतिहास ठीक से नहीं पढ़ा या अहमद बेहद निर्मम है, जिसे विभाजन के घाव को कुरेदने में मजा आ रहा है। तभी मिस्टर अहमद ने बड़ी आसानी से कह दिया कि लालकृष्ण आडवाणी यहां सेवा नहीं मेवा खाने के लिए आए हैं। पाकिस्तान से यहां आना महज आडवाणी का मसला नहीं है। यह तो उन लाखों लोगों का दु:ख है, जिन्होंने अपनी जमीन खोयी और अपनी आंखों के सामने परिजनों की हत्या देखी। आडवाणी का भारत मेवा खाने के लिए आना, ऐसा कह कर कांग्रेसी नेता ने इन लाखों लोगों को तकलीफ पहुंचाई है। हकीकत तो यह है कि आडवाणी जैसे ही तमाम हिन्दुओं के लिए वहां रहना मुमकिन ही नहीं था। जो वहां रह गए, आज उनकी क्या हालत है, किसी से छिपी नहीं। विश्व के मीडिया में आई रिपोर्ट बयां करती हैं कि आज भी पाकिस्तान में हिन्दू सबसे निचले दर्जे का आदमी है। या कहें, पाकिस्तानी हुकूमत को उसकी फिक्र ही नहीं, उसकी नजर में हिन्दू पाकिस्तान का नागरिक है ही नहीं। वहां हिन्दू अपनी ही सुरक्षा और सेवा नहीं कर पा रहा है तो भला दूसरे हिन्दुओं की देखभाल कैसे करे? यह बात कांग्रेस के प्रवक्ता शकील अहमद को समझ नहीं आएगी क्योंकि वह भारत में रहते हैं। उन्हें जीने के लिए टेरर टैक्स नहीं देना पड़ता। उन्हें अपने परिजन की मौत पर धार्मिक रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार करने में बाधा नहीं होती। राजनीति में शीर्ष सत्ता तक पहुंचने में आसानी है। उन्हें जवान होती बेटियों के अपहरण और बलात्कार का डर नहीं। बलात धर्मांतरण का खौफ नहीं, क्योंकि शकील अहमद भारत में रहते हैं, धर्मनिरपेक्ष और हिन्दु बहुसंख्यक भारत में। पाकिस्तान में उक्त कामों में से एक भी हिन्दू आसानी के साथ नहीं कर पाता। उसका जीना दूभर है। वह बेचारा भारत भी नहीं आ पाता। आ भी जाता है तो यहां की सरकार उसकी चिंता नहीं करती है।
    विभाजन के वक्त भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी २० साल से भी कम उम्र के थे। लेकिन, सामाजिक जीवन में सक्रिय थे। सिंध में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ताओं में उनका नाम था।  संघ उस वक्त पाकिस्तान में बसे हिन्दुओं से यही आग्रह कर रहा था कि हिन्दू अपनी जमीन न छोड़ें, भारत नहीं जाएं, मिल-जुलकर यहीं पाकिस्तान में बसे रहें। इससे स्पष्ट है कि विभाजन की घोषणा के साथ ही लालकृष्ण आडवाणी ने पाकिस्तान छोडऩे का विचार नहीं बनाया होगा। लालकृष्ण आडवाणी अपनी आत्मकथा 'मेरा देश मेरा जीवन' में लिखते हैं कि सितंबर के आरंभ में एक दिन वे मोटरसाइकिल से कराची के मुख्य रेलवे स्टेशन के पास की सड़क पर जा रहे थे। उन्होंने वहां एक व्यक्ति का शव देखा, जिसकी छुरा घोंपकर हत्या कर दी गई थी। कुछ दूर ही चले थे कि उन्होंने एक और शव देखा, फिर एक तीसरा....। वे आगे लिखते हैं कि यह दृश्य उनके लिए अस्वाभाविक और परेशान करने वाला था। उन्होंने अपने जीवन में पहली बार सड़कों पर इस तरह लाशें देखी थीं। अपने आसपास इस तरह की घटनाएं देखने के बाद ही आडवाणी ने पाकिस्तान छोडऩे का निश्चय किया।
    शकील अहमद साहब को जरा सोचना चाहिए कि ऐसी स्थिति में भला कोई इंसान रुकना चाहेगा। हां, उनकी सुप्रीमो यहां मेवा खाने जरूर आई हैं। अब भला शकील अहमद आडवाणी को ढाल बनाकर अपनी ही पार्टी की सर्वेसर्वा सोनिया गांधी को निशाना बना रहे हैं तो बात अलग है। लेकिन, जायज फिर भी नहीं। क्योंकि यह केवल एक आडवाणी से जुड़ा मसला नहीं है वरन विभाजन से आहत लाखों लोगों की बात है।