गुरुवार, 21 नवंबर 2019

बेटी के लिए कविता-8

ऋष्वी के पांचवे जन्मदिन पर
नखरे तुम्हारे 
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सुनो, मीठी
नखरे बढ़ गए हैं तुम्हारे
ज़िद्दी पहले ही
बहुत थी तुम।
अब गुस्सा होकर
कोप भवन में बैठना
बड़ा प्यारा लगता है।

बता नहीं सकता
मनाना तुम्हें
कितना भाता है मुझे।
यह बात तो
जानती हो तुम भी
इसलिए नौटंकी तुम्हारी
मेरे घर आने पर ही
होती है शुरू।

मुझे पता है
तुम स्वभाव से
नखराली-ज़िद्दी नहीं हो।
बस बातें मनवाने
मुझसे खुशामद कराने
करती हो चालाकी तुम।
भरी है मासूमियत
सब अदाओं में।

परंतु, ध्यान रखना
मेरी प्यारी बेटी
ये ज़िद-नखरे
बुरी आदत न बन जाएं।
अन्यथा, खो जाएगा
चैन-ओ-सुकून दोनों का
रखना है बचाकर
अपनी समझदारी।

रविवार, 10 नवंबर 2019

राष्ट्रवाद के चिंतन और विकास पर महत्वपूर्ण कृति

वैसे तो 'राष्ट्रवाद' सदैव ही जनसाधारण की चर्चाओं से लेकर अकादमिक विमर्श के केंद्र में रहता है। किंतु, वर्तमान समय में राष्ट्रवाद की चर्चा जोरों पर है। राष्ट्रवाद का जिक्र बार-बार आ रहा है। राष्ट्रवाद को 'उपसर्ग' की तरह भी प्रयोग में लिया जा रहा है, यथा- राष्ट्रवादी लेखक, राष्ट्रवादी संगठन, राष्ट्रवादी विचारक, राष्ट्रवादी राजनीतिक दल, राष्ट्रवादी नेता, राष्ट्रवादी मीडिया इत्यादि। ऐसे में लोगों की रुचि यह जानने-समझने में बहुत बढ़ गई है, आखिर ये राष्ट्रवाद है क्या? राष्ट्रवाद को अनेक प्रकार से परिभाषित किया गया है। राष्ट्रवाद को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा गया है। राष्ट्रवाद पर विभिन्न प्रकार के मत हैं। ऐसे में एक सामान्य व्यक्ति के लिए राष्ट्रवाद को समझना कठिन हो जाता है। वह भ्रमित हो जाता है, क्योंकि देश में एक वर्ग ऐसा है जो भारतीय राष्ट्रवाद पर पश्चिम के राष्ट्रवाद का रंग चढ़ा कर लोगों के मन में उसके प्रति चिढ़ पैदा करने के लिए योजनाबद्ध होकर लंबे समय से प्रयास कर रहा है। इनके प्रोपोगंडा लोगों को उलझा देते हैं। राष्ट्रवाद के प्रति नकारात्मक वातावरण बनाने में बहुत हद तक यह वर्ग सफल भी रहा है। लेकिन, भारत का राष्ट्रवाद इतना उदात्त और स्वाभाविक है कि उसके विस्तार को किसी प्रकार का षड्यंत्र रोक नहीं सका। यह सुखद है कि कुछ विद्वान भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की रोशनी को जनता के बीच लेकर जाने का असाध्य श्रम कर रहे हैं। लेखक राजेन्द्र नाथ तिवारी ने अपनी पुस्तक 'राष्ट्रवाद : चिंतन एवं विकास' के माध्यम से उसी अत्यावश्यक कार्य को भली प्रकार आगे बढ़ाया है। भरोसे के साथ कहा जा सकता है कि उनकी यह पुस्तक राष्ट्रवाद जैसे गूढ़ विषय को सरलता के साथ समझाने वाली महत्वपूर्ण कृति सिद्ध हो सकेगी। वर्तमान समय में जब राष्ट्रवाद पर बहस तेज है, तब श्री तिवारी की पुस्तक अनेक प्रश्नों के सटीक उत्तर लेकर पाठकों/अध्ययेताओं के बीच उपस्थित है। 
          पुस्तक के चौथे अध्याय में लेखक ने बेबाकी के साथ स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रवाद की अवधारणा को समझने के लिए सबसे पहले लार्ड मैकाले एवं उसके मानसपुत्रों की सिखाई हुई असत्य तथ्यों और बातों को भूलना उचित होगा। राष्ट्रवाद को समझने में रुचि रखने वालों से लेखक का यह आग्रह उचित ही है। क्योंकि, जब तक हमारे पूर्वाग्रह होंगे, हम राष्ट्रवाद को निरपेक्ष भाव से समझ ही नहीं पाएंगे। भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को समझना है, तब यह अत्यंत आवश्यक है कि हम अपने दिमाग के दरवाजे-खिड़कियां अच्छे से खोल लें। दरअसल, भारतीय दृष्टि में राष्ट्रवाद की अवधारणा संकुचित नहीं, बल्कि वृहद है। यह 'सर्वसमावेशी'। सबका साथ-सबका विकास। सब साथ आएं। इसलिए हमारे पूर्वजों ने वसुदैव कुटुम्बकम् की बात की। वहीं, यूरोप द्वारा परिभाषित और प्रस्तुत 'राष्ट्रवाद' अत्यंत संकुचित है। 'राष्ट्रवाद' का अध्ययन करने से पूर्व इस अंतर को समझने की आवश्यकता है। लेखक राजेन्द्र नाथ तिवारी की पुस्तक यह कार्य बखूबी करती है। 
          पहले अध्याय में लेखक ने 'राष्ट्रवाद' के चिंतन और विकास को प्रस्तुत किया है। इस शब्द की उत्पत्ति और उसके वास्तविक अर्थ को समझाने का प्रयास किया है। भारतीय वांग्मय में यह शब्द कहाँ और किस संदर्भ में आया है, इसे भी लेखक ने बताया है। अगले तीन अध्यायों में उन्होंने विस्तार से भारतीय चिंतन में राष्ट्रवाद संबंधी विविध विचारों को प्रस्तुत किया है। वेदों, उपनिषदों और आधुनिक शास्त्रों में राष्ट्र की संकल्पना ने कैसे आकार लिया है, उसको संदर्भ सहित समझाया है। लेखक ने चिंतन की गहराई तक उतर कर कुछ महत्वपूर्ण तथ्य हम सबके सामने रखे हैं। इस पुस्तक के महत्व को रेखांकित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक पद्मश्री राम बहादुर राय ने लिखा है कि पुस्तक की उपादेयता वर्तमान में सांस्कृतिक-राष्ट्रवाद एवं संचेतना के विकास के अध्ययन में पंडित दीनदयाल उपाध्याय सहित राष्ट्रवादीजनों, संघ के विचारकों, गीता की सार्थक उपयोगिता के लिए तो है ही, यह पुस्तक इतिहास लेखन की दृष्टि से भी गंभीर एवं नीति-रीति पर विचार करती है। वैदिक काल से आधुनिक काल के बीच की कड़ी को मिलाकर अध्ययन करने से पुस्तक इतिहासविदों एवं राष्ट्र के प्रति सचेष्ट अध्ययन के उत्सुकजनों को सीधे प्रभावित करेगी। दस अध्यायों में लेखक राजेन्द्र नाथ तिवारी ने 'राष्ट्रवाद : चिंतन एवं विकास' को एक सुव्यवस्थित आकार दिया है। नि:संदेह रूप से यह पुस्तक राष्ट्रवाद को लेकर भारतीय बोध को सुदृढ़ और मजबूत आधार देती है। लेखक के चिंतन में अध्ययन का महत्तव भी यथेष्ट है। पुस्तक का व्यापक क्षेत्र सबको समाहित कर सबके लिए पठनीय एवं उपयोगी है। 
(मीडिया विमर्श के दिसम्बर, 2019 के अंक में प्रकाशित)

पुस्तक : राष्ट्रवाद : चिंतन एवं विकास
लेखक : राजेन्द्र नाथ तिवारी
मूल्य : 230 रुपये
पृष्ठ : 160
प्रकाशक : समदर्शी प्रकाशन
मकान नंबर-1652, न्यू हाउसिंग बोर्ड, 
हुड्डा सेक्टर-1, रोहतक, हरियाणा-124001
मोबाइल : 9599323508

शनिवार, 2 नवंबर 2019

भाषाई पत्रकारिता पर संदर्भ सामग्री से भरपूर मीडिया विमर्श का 'मलयालम मीडिया विशेषांक'

भारतीय भाषाओं के सम्मान का अनुष्ठान


यूँ तो मीडिया विमर्श का हर अंक ही विशेष होता है। हर अंक पठनीय और संदर्भ सामग्री से भरा पड़ा संग्रहणीय। कई ऐसे विषयों पर भी मीडिया विमर्श ने विशेषांक निकाले हैं, जिनकी मीडिया में भी अत्यंत कम चर्चा होती है और होती भी है तो वही पुराने किस्से/तथ्यों के साथ, नया कुछ नहीं होता। मीडिया विमर्श उन विषयों को नए तथ्यों के साथ हम सबके सामने लेकर आया है।
          बहरहाल, भारतीय भाषायी पत्रकारिता के यशस्वी योगदान को रेखांकित करने में भी 'मीडिया विमर्श' अग्रणी और महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर रहा है। अभी जो अंक (दिसम्बर, 2019) आ रहा है, वह 'मलयालम भाषा की पत्रकारिता' पर केंद्रित है। अतिथि संपादक डॉ. सी. जयशंकर बाबु (पांडिचेरी) ने 'मलयालम मीडिया विशेषांक' का संपादन किया है। निश्चित तौर पर मीडिया विमर्श का यह अंक अध्ययनशील पत्रकारों, पत्रकारिता के शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण होगा। इससे पूर्व डॉ. सी. जयशंकर बाबु ने मीडिया विमर्श के 'तेलुगु मीडिया विशेषांक' का बखूबी संपादन किया था। उनके उस संपादन से हम कल्पना कर सकते हैं कि मलयालम भाषा पर केन्द्रित यह अंक भी अच्छा बन पड़ा होगा।
          उल्लेखनीय है कि 'भारतीय भाषायी पत्रकारिता' के विस्तार को रेखांकित करने के अपने महत्वपूर्ण प्रयासों में मीडिया विमर्श इससे पूर्व उर्दू पत्रकारिता, गुजराती पत्रकारिता और तेलुगु पत्रकारिता पर विशेषांक प्रकाशित कर चुका है। हिंदी पत्रकारिता पर तो उसका हर अंक उपयोगी सामग्री लेकर आता है। मलयालम चौथी भारतीय भाषा है, जिस पर 'मीडिया विमर्श' पत्रिका का नया अंक आया है। इन सब यशस्वी प्रयासों के पीछे मीडिया गुरु प्रो. संजय द्विवेदी हैं, जो मीडिया विमर्श के कार्यकारी संपादक भी हैं।

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