समाज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
समाज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 5 जून 2026

स्कूल की छुट्टियां : नानी का घर बनाम गैजेट्स की दुनिया

ग्रीष्मकालीन अवकाश : सीखने, समझने और निखरने का उत्तम अवसर


गर्मी की छुट्टियों की प्रतीक्षा किसे नहीं होती है। भले ही समय बदल गया है, पीढ़ी बदल गई है, लेकिन गर्मी की छुट्टियों को लेकर रोमांच कम नहीं हुआ है। छुट्टियों के नाम से आज भी हमारे चेहरों पर एक प्यारी-सी मुस्कान तैर जाती है। हर बच्चे के मन में वार्षिक परीक्षा के बाद आने वाली लंबी छुट्टियों को लेकर अपने-अपने सपने होते हैं। हालांकि इन सपनों या कहें योजनाओं में बड़ा बदलाव आया है। बदलते समय ने हमारे जीने के तरीके को जितना बदला है, उतना ही असर इन छुट्टियों के आनंद पर भी डाला है। एक वह दौर था जब अप्रैल का महीना आते ही मन किसी पंछी की तरह उड़ने को बेताब हो जाता था। फुर्र से उड़कर नानी के आंगन, वहाँ से दादी के घर। खेत-खलियान। नीम की छांव। चाचा के साथ मटरगस्ती। मामा के साथ नदी में छलाँग। भाई-बहनों के साथ अष्टा-चंगा, गिल्ली-डंडा, छुपन-छुपाई, सांप-सीढ़ी और न जाने कितने देशी खेल। एक से मन भरे, दूसरे में आए आनंद। रात में तारों की छांव में सोना। नाना-नानी की किस्सागोई में सिनेमा से बढ़कर मनोरंजन। रोज नई कहानी। नया संस्कार। आम के आम, गुठलियों के दाम। छुट्टियों का आनंद भी और समाज जीवन की शिक्षा-संस्कार भी। एक आज का दौर है, जहाँ छुट्टियां तो हैं, लेकिन उनका रंग-रूप पूरी तरह बदल चुका है। नानी-दादी का घर तो है लेकिन हम जाते चार दिन के लिए ही हैं। मामा, चाचा-ताऊ के बच्चे यानी हमारे भाई-बहनों की मंडली तो है लेकिन हम देशी खेल नहीं खेलते, गैजेट्स में डूबे रहते हैं। जो हम खेल-खेल में सीख लेते थे, उसके लिए हॉबी क्लासेस लगा रहे हैं। कुछ समय तो समर कैम्प भी जीम लेता है। जो आनंद हमें नानी-दादी के घर आता था, उसे मोटी फीस देकर भी हम समर कैम्प में नहीं पा सकते। हालांकि, इस सबका अभिप्राय यह नहीं है कि समर कैम्प और हॉबी क्लासेस का महत्व नहीं है। बदली परिस्थितियों में यह हमारी छुट्टियों को उपयोगी बनाते हैं।

सोमवार, 16 मार्च 2026

अनूठा जन्मदिन : पुस्तकों से तौले गए 8 वर्षीय मारुति

भोपाल में 8 वर्षीय बालक मारुति का जन्मदिन अनूठे ढंग से मनाया गया। पूरे उत्सव में भारतीय संस्कृति की गहरी झलक दिखाई दी। मारुति के माता-पिता और दादा-दादी ने भारतीय पद्धति के अनुसार जन्मदिन की योजना बनाई। इस उत्सव को सार्थक स्वरूप देते हुए 'पुस्तक-तुला' का आयोजन किया गया, जिसमें मारुति को पुस्तकों से तौला गया। ​तराजू के एक पलड़े में मारुति को बैठाया गया और दूसरे पलड़े में पुस्तकें रखी गईं। जो भी अतिथि आए थे, वे अपने साथ लाई गई पुस्तकें या वहां उपलब्ध पुस्तकों को दूसरे पलड़े में तब तक रखते गए, जब तक मारुति का पलड़ा ऊपर नहीं उठ गया। इस अवसर पर कई सामाजिक कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे। परिवार 'पुनरुत्थान विद्यापीठ' से जुड़ा हुआ है और इस प्रकार जन्मदिन मनाने की प्रेरणा उन्हें वहीं से प्राप्त हुई। मारुति की शिक्षा भी पुनरुत्थान विद्यापीठ के गुरुकुल में चल रही है।

बुधवार, 25 अक्टूबर 2023

प्रधानमंत्री मोदी ने दिलाए भारत के नवनिर्माण के 10 संकल्प

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विजयादशमी के उत्सव को सामाजिक सरोकारों के साथ जोड़ते हुए देशवासियों को 10 संकल्प दिलाए हैं। इन संकल्पों के पालन में व्यक्तिगत लाभ भी हैं और राष्ट्र निर्माण में एक नागरिक के नाते योगदान भी है। प्रधानमंत्री ने कहा है कि हम सब अपने जीवन में योग, खेल और स्वास्थ्य से जुड़ी गतिविधियों को प्राथमिकता दें, मोटे अनाज को अपनाएं और अपने आसपास स्वच्छता को बढ़ावा दें। ये संकल्प ऐसे हैं, जिसके अनुपालन में नागरिकों को अतिरिक्त प्रयास नहीं करने हैं परंतु यदि इन संकल्पों को जीवन में उतार लिया जाए तो उसके सुखद परिणाम प्राप्त होंगे। एक बात कहनी होगी कि प्रधानमंत्री मोदी ने राजनीति को सामाजिक सरोकारों की ओर मोड़ दिया है। शुद्ध राजनीतिक चर्चाओं से इतर वे अकसर पर्यावरण, गरीबी कल्याण, जल संरक्षण, भाषा संवर्धन, स्वदेशी, स्वरोजगार और नागरिक स्वास्थ्य जैसे शुद्ध सामाजिक विषयों पर प्रबोधन करते नजर आते हैं।

रविवार, 17 सितंबर 2023

तमाशबीन नहीं, हमें है जागृत समाज की आवश्यकता


देश के विभिन्न हिस्सों से सामने आनेवाली कुछ घटनाओं को लेकर सामाजिक एवं राजनीतिक नेतृत्व को चिंतित होना चाहिए। ये घटनाएं सामान्य नहीं हैं, इनमें गंभीर आशंकाएं छिपी हैं। इन स्थितियों को बदले बिना हम अपने देश को आगे नहीं ले जा सकेंगे। दिल्ली में साहिल नाम का लड़का नृशंसता से 16 वर्ष की नाबालिग लड़की की हत्या कर देता है। इस घटना ने देश का झकझोर दिया था। इस घटना का विश्लेषण करते समय केवल हत्या करने के वहसी तौर-तरीके तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि इस घटना का सबसे डरावना पक्ष यह है कि साहिल जब किशोरी पर चाकुओं से वार कर रहा था, उसके सिर को पत्थर से कुचल रहा था तब इस सबसे वहाँ खड़े लोगों पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। लोग बहुत ही सहजता से यह सब होते हुए न केवल देख रहे थे, बल्कि वहाँ से ऐसे गुजर रहे थे कि जैसे सबकुछ सामान्य है। इसे समाज की संवेदनहीनता कहें या कायरता।

शनिवार, 19 अगस्त 2023

समाज को समरसता के स्नेह सूत्र में बाँधने निकले संत

यह कितनी सुखद बात है कि समाज के विभिन्न वर्गों में आत्मीयता एवं समरसता के भाव को बढ़ाने के लिए साधु-संत ‘स्नेह यात्रा’ पर निकल पड़े हैं। जब द्वार पर आकर संत कुछ आग्रह करते हैं, तब हिन्दू समाज का कोई भी वर्ग उस आग्रह को अस्वीकार नहीं कर सकता। मन में असंतोष होगा, लेकिन संतों का सम्मान सबके हृदय में सर्वोपरि है। इसलिए तो सब भेद भुलाकर, हिन्दू विरोधी ताकतों के उलाहने नकारकर, भगवत् कथा का श्रवण करने के लिए सभी वर्गों के लोग संतों के पंडाल में एकत्र हो जाते हैं। हम जानते हैं कि भारत को कमजोर करने के लिए बाह्य विचार से पोषित ताकतें हिन्दू समाज के जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगा रही हैं। ये ताकतें पूर्व में हुए जातिगत भेदभाव के घावों को कुरेद कर अनुसूचित जाति वर्ग के बंधुओं के कोमल हृदय में द्वेष के बीज बोने का काम कर रही हैं, जबकि कोशिश होनी चाहिए उनके घावों पर मरहम लगाने की। परंतु जिनका स्वार्थ परपीड़ा से सध रहा हो, वे जख्म पर नमक ही छिड़केंगे। उनसे कोई और उम्मीद करना बेमानी है। ऐसे वातावरण में संत समाज ने आगे आकर, सभी वर्गों में बंधुत्व के भाव को बढ़ाने के जो प्रयास किए हैं, वह अनुकरणीय हैं। समाज की सज्जनशक्ति को संतों के साथ जुड़ना चाहिए और स्नेह धारा को आगे बढ़ाना चाहिए।

सोमवार, 10 जुलाई 2023

सामाजिक समरसता के लिए समर्पित श्रीगुरुजी का जीवन

श्रीगुरुजी और सामाजिक समरसता पर उनके विचार


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्रद्धेय माधव सदाशिवराव गोलवलकर का जीवन हिन्दू समाज के संगठन, उसके प्रबोधन एवं सामाजिक-जातिगत विषमताओं को समाप्त करके एकरस समाज के निर्माण के लिए समर्पित रहा है। जातिगत ऊँच-नीच एवं अस्पृश्यता को समाप्त करने की दिशा में श्रीगुरुजी के प्रयासों से एक बड़ा और उल्लेखनीय कार्य हुआ, जब 13-14 दिसंबर, 1969 को उडुपी में आयोजित धर्म संसद में देश के प्रमुख संत-महात्माओं ने एकसुर में समरसता मंत्र का उद्घोष किया-  

“हिन्दव: सोदरा: सर्वे, न हिन्दू: पतितो भवेत्।

मम दीक्षा हिन्दू रक्षा, मम मंत्र: समानता।।”

अर्थात् सभी हिन्दू सहोदर (एक ही माँ के उदर से जन्मे) हैं, कोई हिन्दू नीच या पतित नहीं हो सकता। हिन्दुओं की रक्षा मेरी दीक्षा है, समानता यही मेरा मंत्र है।1 श्रीगुरुजी को विश्वास था कि देश के प्रमुख धर्माचार्य यदि समाज से आह्वान करेंगे कि अस्पृश्यता के लिए हिन्दू धर्म में कोई स्थान नहीं है, इसलिए हमें सबके साथ समानता का व्यवहार रखना चाहिए, तब जनसामान्य इस बात को सहजता के साथ स्वीकार कर लेगा और सामाजिक समरसता की दिशा में बड़ा कार्य सिद्ध हो जाएगा। विश्व हिन्दू परिषद की ओर से इस धर्म संसद में श्रीगुरुजी के आग्रह पर सभी संतों ने सर्वसम्मति से सामाजिक समरसता का ऐतिहासिक का प्रस्ताव पारित किया। श्रीगुरुजी ने अपनी भूमिका को यहीं तक सीमित नहीं रखा अपितु अब उन्होंने विचार किया कि यह शुभ संदेश लोगों तक कैसे पहुँचे। क्योंकि उस समय आज की भाँति मीडिया की पहुँच जन-जन तक नहीं थी। सामाजिक समरसता के इस अमृत को जनसामान्य तक पहुँचाने के लिए श्रीगुरुजी ने 14 जनवरी 1970 को संघ के स्वयंसेवकों के नाम एक पत्र लिखा2, जिसमें उन्होंने कहा कि कर्नाटक में कार्यकर्ताओं की अपेक्षा से कई गुना अधिक सफल आयोजन हुआ। मानो हिन्दू समाज की एकता एवं परिवर्तन के लिए शंख फूंक दिया गया हो। परंतु हमें इससे आत्मसंतुष्ट होकर बैठना नहीं है। अस्पृश्यता के अभिशाप को मिटाने में हमारे सभी पंथों के आचार्य, धर्मगुरु और मठाधिपतियों ने अपना समर्थन दिया है। परंतु प्रस्ताव को प्रत्यक्ष आचरण में उतारने के लिए केवल पवित्र शब्द काफी नहीं हैं। सदियों की कुरीतियां केवल शब्द और सद्भावना से नहीं मिटती। इसके लिए अथक परिश्रम और योग्य प्रचार करना पड़ेगा। नगर-नगर, गाँव-गाँव, घर-घर में जाकर लोगों को बताना पड़ेगा कि अस्पृश्यता को नष्ट करने का निर्णय हो चुका है। और यह केवल आधुनिकता के दबाव में नहीं, बल्कि हृदय से हुआ परिवर्तन है। भूतकाल में हमने जो गलतियां की हैं, उसे सुधारने के लिए अंत:करण से इस परिवर्तन को स्वीकार कीजिए। श्रीगुरुजी के इस पत्र से हम समझ सकते हैं कि अस्पृश्यता को समाप्त करने और हिन्दू समाज में एकात्मता का वातावरण बनाने के लिए उनका संकल्प कैसा था? धर्माचार्यों से जो घोषणा उन्होंने करायी, वह समाज तक पहुँचे, इसकी भी चिंता उन्होंने की। संघ की शाखा पर सामाजिक समरसता को जीनेवाले लाखों स्वयंसेवक सरसंघचालक के आह्वान पर ‘हिन्दव: सोदरा: सर्वे’ के मंत्र को लेकर समाज के सब लोगों के बीच में गए।

बुधवार, 16 जून 2021

संभलकर चलने की आवश्यकता

कोरोना महामारी की दूसरी लहर से बाहर निकलकर अब हम सामान्य गतिविधियों की ओर बढ़ रहे हैं। याद रहे अभी एकदम सामान्य जीवन जीने का समय नहीं आया है। हमें सावधानी के साथ व्यवहार करना होगा, अन्यथा एक बार फिर कोरोना हम पर हावी हो सकता है। दूसरी लहर ने यह भी बता दिया कि यह कितनी खतरनाक महामारी है। इसलिए याद रखें कि हमारा जरा भी बेपरवाह आचरण हमारे ही परिवार, समाज और देश के लिए घातक हो सकता है। पहले अनलॉक के बाद हमने जो गलतियां की हैं, उनसे सबक सीखने की बहुत जरूरत है। प्रशासन और आम नागरिकों को, दोनों को अपनी भूमिकाएं सजगता से निभानी होंगी। आम नागरिक कोविड-19 व्यवहार का कड़ाई और स्व-अनुशासन के साथ पालन करें। प्रशासन कोरोना संक्रमण पर निगरानी बनाए रखे, नागरिकों को कोविड-19 व्यवहार का पालन करने के लिए प्रोत्साहित करे और किसी भी विषम परिस्थिति से निपटने के लिए आवश्यक प्रबंध भी करे। 

जब हम सबकुछ अनलॉक करने की ओर बढ़ रहे हैं, तब प्रशासन को अनलॉक की वैज्ञानिक प्रक्रिया को अपनाना चाहिए। अनेक शोध अध्ययनों से साबित हुआ है कि एकदम से अनलॉक करने से कोरोना संक्रमण तेजी से लौट आता है। चरणबद्ध अनलॉक करने से कोरोना संक्रमण की वापसी को बहुत हद तक टाला जा सकता है। मध्यप्रदेश अब तक सधे हुए कदमों से अनलॉक की ओर बढ़ रहा है। लोगों को काम-धंधा मिले और अर्थव्यवस्था को गति मिले, इसके लिए उद्योग-कारोबार एवं बाजारों को शुरू करना आवश्यक है। इन्हें अनिश्चितकालीन समय तक रोका नहीं जा सकता। परंतु देखने में आ रहा है कि बाजार खोलते ही भारी भीड़ उमडऩे लगी है। मास्क और शारीरिक दूरी के अनिवार्य नियमों का पालन होते नहीं दिख रहा है। हमें यह समझना होगा कि इस लापरवाही का दुष्परिणाम हमें ही भोगना पड़ सकता है। 

बाजार चलते रहें, इसके लिए जरूरी है कि व्यवसायी एवं ग्राहक दोनों ही कोविड-19 अनुरूप व्यवहार का पालन करें। जब तक देश में बड़ी जनसंख्या का टीकाकरण नहीं हो जाता, तब तक सार्वजनिक स्थलों पर मास्क पहनने, शारीरिक दूरी बनाने, समय-समय पर साबुन से हाथ धोने और भीड़ जुटाने से बचने जैसी जरूरतों के लिए लगातार जन जागरण करना होगा। वैसे तो हम सबको स्व-अनुशासन का पालन करते हुए स्वयं ही इन नियमों का पालन करना चाहिए किंतु यदि कोई उपरोक्त दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करता है, तब उस पर कड़ा जुर्माना लगाया जाना चाहिए।

शनिवार, 17 अक्टूबर 2020

अपने लोगों को ताकत दें, स्थानीय बाजार से खरीदारी करें


हमारे देश में दीपावली से पहले बड़े स्तर पर खरीदारी शुरू हो जाती है। दरअसल, शारदीय नवरात्र के साथ ही त्योहारों और शुभ अवसरों की एक शृंखला प्रारंभ होती है, जो दीपावली के बाद तक जारी रहती है। इन शुभ प्रसंगों पर हम आवश्यक वस्तुएं, उपहार और चल-अचल संपत्ति क्रय करते हैं। विजय की आकांक्षा जगाने वाला पर्व विजयादशमी पर भी बाज़ारों में रौनक रहती है। सुख-समृद्धि और आरोग्य का प्रतीक पर्व धनतेरस भी दीपावली से ठीक दो दिन पूर्व ही आता है, जब हमारे बाजार विशेष तौर पर सजाए जाते हैं। इस दिन बड़ी संख्या में लोग बर्तन, सोना-चांदी, जेवरात इत्यादि संपत्ति खरीदते हैं। 

कुल मिलाकर यह एक ऐसा अवसर आ रहा है, जब हम सही मायने में ‘वोकल फॉर लोकल’ के अपने शुभ संकल्प को परख सकते हैं। क्या हम यह तय कर सकते हैं कि इस बार हम अपने स्थानीय व्यवसायियों के हाथ मजबूत करेंगे? अपनी आवश्यकता का सामान अपने आसपास के बाजार से खरीदेंगे। 

  • स्थानीय सुनार से आभूषण तैयार कराएंगे। 
  • स्थानीय इलेक्ट्रीशियन को सजावटी लाइट तैयार करने को कहेंगे। 
  • साज-सज्जा की सामग्री किसी मॉल या शो-रूम से नहीं, बल्कि अपने शिल्पियों से खरीदेंगे। 
  • कुम्हार के चाक को गति देंगे और उससे दीये खरीदेंगे। 
  • शहर के मोची से जूते-चप्पल बनवाएंगे। 
  • फर्नीचर अपने बढ़ई से तैयार कराएंगे। 
  • अपने हलवाई से मिठाई बनवाएंगे। 

क्या हम तय कर सकते हैं कि अब हम ब्रांडेड के चक्कर में न पड़ कर स्थानीय उत्पाद को प्रोत्साहित करेंगे। अपने स्थानीय उत्पाद को ब्रांड बनाएंगे। स्थानीय उत्पाद को न केवल खरीदेंगे अपितु उपयोग के बाद संतुष्ट होने पर उसका प्रचार भी करेंगे। अपने परिचितों के साथ और अपने सोशल मीडिया मंचों के माध्यम से उस उत्पाद की खूबियां सबके साथ साझा करेंगे। 

हम ऐसा विज्ञापन करेंगे कि उन देशी-विदेशी बड़े ब्रांडों को शर्म आ जाए, जो प्रचार में भी हिन्दू समाज पर आघात करते हैं। यह लगातार देखने में आ रहा है कि विभिन्न देशी-विदेशी कंपनियां अपने उत्पाद का प्रचार करने के लिए ऐसी झूठी कहानियां प्रस्तुत कर रहीं हैं, जिनसे हिन्दू समाज की छवि यथार्थ के ठीक विपरीत संकीर्ण, कूपमंढूक और असहिष्णु समाज के रूप में बन रही है। 

यह अच्छी बात है कि विज्ञापनों और सिनेमा के माध्यम से समाज पर हो रहे लगातार हमले पर अब हिन्दू समाज ने अपना प्रतिरोध दर्ज कराना शुरू कर दिया है। निश्चित ही यह जागरूक समाज की जिम्मेदारी है कि वह अपने विरुद्ध हो रहे वैचारिक हमलों को रोके। वास्तविकता से परे, कपोल-कल्पित, झूठे और आपत्तिजनक विज्ञापनों को रोका जाना बहुत आवश्यक है। इसके साथ ही अच्छी और सच्ची बातों का स्वागत भी करना है।

अब हमें बहिष्कार करने की प्रवृत्ति से आगे बढ़ कर अपने स्थानीय उत्पादों को स्थापित करके भी दिखाना चाहिए। उन छोटे दुकानदारों, कारीगरों और कलाकारों का प्रचार करना चाहिए, जो विज्ञापन फिल्में बनाकर अपने गुणवत्तापूर्ण सामग्री को सब तक नहीं पहुँचा पाते हैं। यह इसलिए भी करना आवश्यक है क्योंकि कोरोना संक्रमण का बहुत नकारात्मक प्रभाव हमारे छोटे-मोटे दुकानदार, कारीगर, व्यवसायियों पर पड़ा है। इस दौरान उनके यहाँ काम करने वाले कामगारों को भी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा है। यदि हमें भारत को मजबूत बनाना है तब इन लोकल्स के लिए वोकल होना ही पड़ेगा। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान के बाद हमने जिस आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का संकल्प लिया है, उसमें ‘गिलहरी योगदान’ देने का अवसर आ गया है। यह अवसर स्वदेशी के प्रति आग्रही होने के हमारे अभ्यास को भी पक्का करेगा। 

तो आईये, संकल्प लेते हैं कि इस बार स्वदेशी और स्थानीय उत्पाद ही खरीदेंगे। साथ ही उसका प्रचार भी करेंगे। 

शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

सेवागाथा डॉट ओआरजी : सेवा के अनुपम और अनुकरणीय प्रयासों का पता

 राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) दुनिया का सबसे बड़ा सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन है। वह समाज के उत्थान के लिए कार्यरत है। लगभग 92 वर्षों की यात्रा में संघ ने समाज में व्यापक स्थान बनाया है। आरएसएस के संबंध में अकसर उसके ही कार्यकर्ता कहते हैं कि संघ में आए बिना संघ को समझा नहीं जा सकता। वास्तविकता भी यही है। संघ विरोधियों और संकीर्ण राजनेताओं के कारण संघ की चर्चा राजनीतिक गलियारे में अधिक होती है, जबकि राजनीति से संघ का लेना-देना बहुत अधिक नहीं है। संघ तो समाज के बाकि क्षेत्रों में अधिक सक्रिय है। सेवा का क्षेत्र भी ऐसा ही है। भला कितने सामान्य नागरिक जानते होंगे कि पूरे देश में आरएसएस के स्वयंसेवक एक लाख 70 हजार से अधिक नियमित सेवा कार्य चलाते हैं। यह सब काम संघ बिना किसी प्रचार के करता है। 'प्रसिद्धि परांगमुखता' संघ का सिद्धाँत है। संघ के लिए सेवा उपकार या पुण्यकार्य की भावना से किया जाने वाला कार्य नहीं है, बल्कि यह तो स्वयंसेवकों के लिए 'करणीय कार्य' है। किंतु, समय की आवश्यकता है कि समाज में यह भरोसा पैदा किया जाए कि देश में बहुत से अच्छे लोग हैं, जो रचनात्मक, सकारात्मक और सृजनात्मक कार्यों में संलग्न हैं। देश का वातावरण ऐसा है कि अच्छाई का प्रचार करने की आवश्यकता आन पड़ी है, ताकि अच्छे कार्यों में और लोग जुटें।

रविवार, 3 सितंबर 2017

संस्कार की पाठशाला हैं महिलाएं एवं बुजुर्ग

हिन्दू गर्जना में प्रकाशित लेख
 भारतीय  परंपरा में परिवार व्यवस्था अद्धितीय है। हम जानते हैं कि किसी भी व्यक्ति की पहली गुरु माँ और पहली पाठशाला परिवार होता है। परिवार संस्कार की पाठशाला है। परिवार में व्यक्ति का सामाजिक शिक्षण होता है। यहाँ हम जीवनमूल्य सीखते हैं। भारतीयता की धुरी परिवार अपने ढंग से मनुष्य को त्याग, सहयोग, सम्मान, दुलार, आत्मीयता, कर्तव्य और अनुशासन इत्यादि का पाठ पढ़ाते हैं। लेकिन, हमारा दुर्भाग्य है कि विरासत में प्राप्त अपनी सबसे बड़ी और सुघड़ रचना को हम छिन्न-भिन्न कर रहे हैं। हम अपने शिक्षा के सबसे बड़े केंद्र को ध्वस्त करने में व्यस्त हैं। आज समाज में हम मानवीयता का जो अवमूल्यन देख रहे हैं, उसका सबसे बड़ा कारण है परिवार व्यवस्था का कमजोर होना। जब हम भारत के प्राचीन इतिहास के पन्ने पलटने बैठते हैं, तब हमें ध्यान आता है कि हमारे यहाँ महिलाओं और बुजुर्गों का अत्यधिक सम्मान था। उनका अपमान तो बहुत दूर की बात थी, उनकी अनदेखी भी संभव नहीं थी। घर में उनका शीर्ष स्थान था। उनकी देखरेख में ही परिवार का संचालन होता था। लेकिन, आज इस प्रकार के परिवार की कल्पना भी मुश्किल है। हालाँकि हमारी परिवार व्यवस्था कमजोर जरूर हुई है, लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। हमारी संस्कृति की ताकत है कि वह अनेक झंझावात सहकर भी अपने संस्कारों को बचाते हुए गतिमान है।

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

सद्भाव के दृश्य

 भारतीय  संस्कृति में गुरु पूर्णिमा/ व्यास पूर्णिमा का बहुत महत्त्व है। समूचे भारत में यह उत्सव बहुत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। बीते रविवार को भी देशभर में गुरु पूर्णिमा उत्सव व्यापक स्तर पर मनाया गया। इस दौरान धर्म नगरी काशी से सुंदर और सार्थक चित्र सामने आए हैं। यह चित्र दो समुदायों को जोड़ने वाले हैं। बनारस में गुरु पूर्णिमा का उत्सव हिंदुओं के साथ-साथ मुस्लिम समुदाय के लोगों ने भी मनाया। हिंदू उत्सवों में मुस्लिम चेहरों को देखना दुर्लभ होता है। अमूमन ईद और इफ्तार पार्टी में बड़ी संख्या में हिंदू समाज के लोग शामिल होते हैं। अनेक स्थानों पर इफ्तार पार्टी का आयोजन ही हिंदू समाज की ओर से किया जाता है। लेकिन, हिंदू उत्सवों में मुस्लिम सहभागिता कम ही होती है। इसलिए जब देश में कुछ समाजविरोधी तत्वों के द्वारा दोनों संप्रदायों के बीच वैमनस्य का वातावरण उत्पन्न करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है, तब इस प्रकार के दृश्य एक उम्मीद की तरह उपस्थित होते हैं। दो समुदायों को नजदीक लाते हैं। आपसी सौहार्द का निर्माण करते हैं।

रविवार, 17 अप्रैल 2016

आरक्षण पर नीतीश कुमार की राजनीति समाज और संविधान विरोधी

आरक्षण पर दो बयान आए हैं, जिनके गहरे निहितार्थ हैं। यह बयान हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और सांसद चिराग पासवान के। चूँकि देश में पिछले कुछ समय से आरक्षण का मुद्दा ज्वलंत है। इसलिए दोनों बयानों पर विमर्श महत्त्वपूर्ण है। आश्चर्य की बात है कि इन दोनों ही बयानों पर मीडिया में अजीब-सी खामोशी देखी गई है। जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से आए बयानों पर मीडिया ने किस तरह का राग अलापा था, सबने देखा-सुना। हमें यह मानना होगा कि आरक्षण पर राजनीतिक और सामाजिक विमर्श को सही दिशा देने में मीडिया चूक रहा है। खासकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया का आचरण राजनीतिक दलों की तरह है। जिस तरह कुछ राजनेता आरक्षण का मुद्दा उठाकर अपना राजनीतिक स्वार्थ साधने की कोशिश कर रहे हैं। ठीक उसी प्रकार, समाचार वाहिनियाँ (न्यूज चैनल्स) उसी समय आरक्षण का विषय उठाती हैं, जब उसमें उन्हें टीआरपी दिखाई देती है। टीआरपी से पैदा होने वाले अर्थ की चाह में समाचार वाहिनियाँ अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से भी मुँह फेर लेती हैं। आरक्षण ऐसा मसला है, जिसे व्यक्तिगत स्वार्थ की नजर से देखने से बचना होगा। क्योंकि, यह सामाजिक समानता और विभेद दोनों का कारण बनता है। सकारात्मक ढंग से बात करेंगे तब यह सामाजिक समानता का विषय बनता है। जब सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत करेंगे, तब यह समाज में विभेद पैदा करने का कारण बनता है।

सोमवार, 21 सितंबर 2015

एक अभिनेता का संवेदनशील होना

 अ मूमन देखने में आता है कि हमारे सिने सितारों की दुनिया अलग ही होती है। आम आदमी के जीवन से उनका सीधा संबंध नहीं होता है। आम आदमी के जीवन के यथार्थ को कलाकार केवल पर्दे पर जीते हुए दिखते हैं। वास्तविक जीवन में बहुत कम कलाकार होते हैं, जो आम आदमी के साथ खड़े दिखते हैं, उनकी मुश्किलों को दूर करने के लिए चमकदार दुनिया से बाहर निकलकर आते हैं। बॉलीवुड के दूसरे महत्वपूर्ण कलाकारों को नाना पाटेकर से सीख लेनी चाहिए। नाना बेहद संवेदनशील व्यक्ति हैं। बिना किसी 'शो-बाजी' के किसानों का दु:ख बांटने के लिए महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में काम कर रहे हैं। नाना गाँव-गाँव जाकर आत्महत्या कर चुके किसानों के परिवारों की आर्थिक मदद कर रहे हैं। किसानों को मुश्किल घड़ी से लडऩे का हौसला दे रहे हैं। यह होती है वास्तविक 'हीरो' की पहचान। किसानों का संघर्ष, उनकी समस्याएं और दिन-रात की तकलीफें नाना पाटेकर को सोने नहीं दे रहीं। नाना ने उम्रभर किसानों के लिए काम करने का संकल्प लिया है। उनके एक कथन में समूचे बॉलीवुड और देश की महत्वपूर्ण हस्तियों के लिए गहरा संदेश छिपा है। नाना कहते हैं- 'हम शहर में रहते हैं। हमने खुद को चारदीवारी में बांध लिया है। हम स्क्वेयर फीट में सोचने लगे हैं। सबसे पहले हमें ये दीवार गिरानी होंगी। फिर दीवार के उस पार के पहाड़ भी अपने होंगे, नदी, पक्षी और लोग भी अपने होंगे।'

शनिवार, 29 अगस्त 2015

मूल्य खोकर क्या पाया हमने?

 स नसनीखेज शीना बोरा हत्याकांड ने भारतीय समाज को सोचने का अवसर दिया है कि वह किस तरफ आगे बढ़ रहा है। रिश्तों में खोखलापन, झूठ की बुनियाद पर टिके रिश्ते, विवाह को खेल बना देना, रिश्तों में जिम्मेदारी से ऊपर हावी व्यक्तिगत सोच ने हमें कहां लाकर पटक दिया है? क्या यह आधुनिकता है? आधुनिक होने के लिए क्या भारतीय मूल्यों को छोडऩा जरूरी है? अपने चिर-पुरातन और जीवन को संयमित करने वाले संस्कारों के साथ हम आधुनिक नहीं हो सकते? एक बड़ा सवाल है आखिर तथाकथित प्रगतिशीलता की दौड़ में अपने मूल्यों को खोकर हमने क्या पाया है? चमकती दुनिया में रहने वाली इंद्राणी मुखर्जी की कहानी आज बहुत से परिवारों का यथार्थ है। जहां हर कोई अपने कर्तव्य-जिम्मेदारी निभाने में असफल हैं। रिश्ते दिखावटी अधिक हैं। उनमें मिठास नहीं है, संवेदनाएं नहीं हैं, जीवतंता नहीं है। चमकती दुनिया के पीछे कितना गहन अंधकार पसरा रहता है, इसके कई उदाहरण शीना बोरा हत्याकांड प्रकरण से उजागर हो रहे हैं। एक घर में, एक छत के नीचे रहते हुए एक-दूसरे से अजनबी हैं। एक-दूसरे के जीवन की दिशा का पता नहीं है और जब पता चलता है तब रिश्तों को तार-तार कर देने वाला विस्फोट होता है। कितने आश्चर्य और चिंता की बात है कि समाज तो क्या घर में ही किसी को पता नहीं होता है कि शीना बोरा और इंद्राणी मुखर्जी का रिश्ता क्या है?

शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

आरक्षण की आग

 आ रक्षण की मांग को लेकर गुजरात में जो हो रहा है, वह देशहित में नहीं है। आरक्षण की मांग के लिए सरकारी और निजी सम्पत्ति को नष्ट करना, कहाँ उचित है? आगजनी और हिंसक गतिविधियों से शेष समाज के समक्ष भय का वातावरण बनाना, कहाँ ठीक है? भारतीय समाज के लिए यह खतरनाक संकेत हैं। आरक्षण के विषय पर पहले से ही हिन्दू समाज बंटा हुआ है। आरक्षण के लिए इस तरह के हथकंडे देखकर अन्य जातियां भी उत्तेजित हो रही हैं। ईश्वन न करे कि हिन्दू समाज जातियां तोडऩे की जगह फिर से जातियों में बंट जाए। आरक्षण की मांग या विरोध में, कहीं ये जातियां एक-दूसरे के सामने खड़ी न हो जाएं? लोकतंत्र में अपनी बात कहने के और भी तरीके हैं। सरकार से अपनी मांगें मनवाने के और भी रास्ते हैं। आंदोलन करने की अपनी एक मर्यादा है। हिंसा का रास्ता अपनाया तो आंदोलन की पवित्रता बची नहीं रहती। गुजरात की भूमि से निकले महापुरुष महात्मा गांधी ने स्वयं कहा है कि पवित्र साध्य की प्राप्ति के लिए साधन और मार्ग भी उतने ही पवित्र होने चाहिए। गांधीजी ने तो अहिंसक आंदोलनों से दमनकारी ब्रिटिश शासन को हिन्दुस्थान से इग्लैंड तक हिला दिया था। गुजरात का होकर भी पटेल समुदाय गांधीजी से आंदोलन की सीख नहीं ले सका।

सोमवार, 1 सितंबर 2014

सत्य-असत्य

भोपाल स्थित इंदिरा गाँधी मानव संग्रहालय में कई प्रकार के मुखौटों की प्रदर्शनी 

मैं नहीं जानता सत्य क्या है
और असत्य क्या? 
बस जानता हूं इतना
जो जी रहा हूं सत्य है
पर मृत्यु को झुठला रहा हूं, वह असत्य है। 

सत्य-असत्य 
बीच में बहुत बारीक-सा पर्दा है
जो उठ गया सत्य है
जो छुप गया असत्य है। 

असल में, 
असत्य का कोई अस्तित्व नहीं
वह तो सत्य का मुखौटा
ओढ़कर ही आता है। 
मुखौटा हट जाने पर
सत्य ही सामने आता है। 

सत्य साहसी है, वीर है
वह समाज के लिए लड़ता है
जबकि असत्य कायर है, भीरू है
वह डरता है, समाज को ठगता है।

सत्य कभी खुद को छिपाता नहीं
वह तो भीड़ से निकलकर सामने आता है
किन्तु असत्य सदैव स्वयं को छिपाता है
कभी भीड़ के पीछे
तो कभी रूप बदल आता है।
---
- लोकेन्द्र सिंह -
(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

रावण मारो, शक्तिशाली बनो

 द शहरा आने को है। सब ओर तैयारियां चल रही हैं। मोहल्लों में रहने वाले बच्चे खुद ही रावण तैयार कर रहे हैं जबकि बड़ी मंडलियां चंदा जमा कर रही हैं, बाजार से रेडीमेड बड़ा रावण खरीदा जाएगा। छोटे-बड़े सभी रावणों को गली-मैदान में स्वाह कर दिया जाएगा। उल्लास मनाएंगे कि बुराई का अंत कर दिया। सब माया है। रावण तो जिन्दा है। हम सबके भीतर। तैयारी उसे मारने की होनी चाहिए। भीतर का रावण एक तीर से नहीं मरता, उसके लिए रोज सजग रहना पड़ता है कमान खींचकर, जैसे ही सिर उठाए, तीर छोड़ देना होता है। कई दिन तो रोज उसे मारना पड़ता है। इसके बाद फिर समय-समय पर उसका वध करना होता है। यह सतत प्रक्रिया है। लेकिन, हम मार किसे रहे हैं, बाहर के रावण को, वह भी पुतले को। असल रावण तो जीते रहते हैं, हम में और तुम में। ये हम और तुम का रावण मर गया फिर सब ठीक हो जाएगा। 
अब सवाल यह है कि आखिर भीतर कौन-सा रावण है। लोभ, वासना, बेईमानी, कायरता, आलस, क्रोध, स्वार्थ, कपट, झूठ और फरेब। ये सब भीतर के रावण हैं। इनसे युद्ध मनुष्य की प्राथमिकता होनी चाहिए। लोभ मनुष्य को भ्रष्टाचारी बनाता है। लोभ ही हमे बेईमान भी बनाता है। अब हम देखें कि लोभ के कारण आज देश की क्या स्थिति है और आम समाज को क्या नुकसान है। लोभ पर शुरुआत से ही काबू नहीं किया गया तो यह बढ़ता ही जाता है। यह कभी-भी कम नहीं होता। लोभी मनुष्य ने पहले हजारों के घोटाले किए फिर लाखों के और अब लाखों के घोटाले उनके लिए घोटाले ही नहीं हैं। क्योंकि लोभ बढ़ गया। यानी भ्रष्टाचार की सीमा बढ़ गई।  देश-समाज का नुकसान ज्यादा बढ़ गया। यही हाल वासना रूपी रावण का है। वासना के फेर में फंसकर अच्छे से अच्छा व्यक्तित्व धूमिल हो जाता है, क्षणभर में। सिर्फ व्यक्तित्व धूमिल नहीं होता बल्कि उसके साथ जुड़े मानबिन्दुओं पर भी प्रश्न चिह्न खड़ा होता है। यदि धार्मिक चोला ओढ़कर बैठा व्यक्ति काम का शिकार हो जाता है तो लोगों का विश्वास डिगता है। इसका फायदा धर्म-परंपरा विरोधी लोग उठाते हैं। धर्म-परंपरा के नाम पर अपना जीवनयापन कर रहे चारित्रिक रूप से कमजोर व्यक्ति की आड़ में धर्म विरोधी लोग हमलावर भूमिका में आ जाते हैं। वे संबंधित धर्म पर आक्षेप लगाते हैं। परंपराओं पर अंगुली उठाते हैं। हालांकि जिस धर्म और समाज पर अगुंली उठाई जा रही होती है, वह धर्म और समाज ही चारित्रिक रूप से पतित व्यक्ति को स्वीकार नहीं करता है। रावण को प्रकांड ब्राह्मण बताया जाता है लेकिन इसके बावजूद हिन्दू समाज में उसका आदर नहीं है। कारण, उसका अमर्यादित आचरण। इसलिए आपने जीवनभर में नाम रूपी जो पूंजी कमाई है, उसे बचाए रखना चाहते हैं, अपनी आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करना चाहते हैं तो वासना रूपी रावण का अंत बार-बार करते रहिए। 
दशहरा चूंकि शक्ति का पर्व है। इस दिन क्षत्रिय अपने हथियारों की पूजा करते हैं। पूर्वजों ने समाज को एक संदेश देने की कोशिश की है कि ताकत हासिल कीजिए। साथ में यह भी संकेत कर दिया कि इसका दुरुपयोग मत कीजिए। गरीब, असहाय पर अपनी ताकत का इस्तेमाल नहीं करें बल्कि उनकी रक्षा के लिए आगे खड़े रहें। साथ ही अन्य लोगों को भी यह आभास बना रहना चाहिए कि यह शक्तिशाली है ताकि वह आप पर हावी न हो सके। कमजोर को हर कोई दबाना चाहता है। भारतीय राजनीति इसका अच्छा उदाहरण है। यहां बाहुबली नेतागिरी कर रहे हैं। कमजोर की कोई पूछ नहीं। जो शक्तिशाली है, संगठित वोट बैंक हैं उनकी भारतीय राजनीति में भारी पूछपरख है, मौज भी उनकी ही है। शासन की योजनाएं भी उनके लिए हैं जबकि असंगठित बहुसंख्यक समाज की फिक्र तक किसी को नहीं। उसकी भावनाएं भी गईं चूल्हे में। 
मजबूत और शक्तिशाली दिखने की जरूरत जितनी व्यक्तिगत स्तर पर है, उससे कहीं अधिक एक देश के लिए आवश्यक है। इजराइल के संबंध में समझा जा सकता है। इजराइल छोटा-सा देश है लेकिन साहस उसका किसी ऊंचे पर्वत से भी विशाल है। चारों तरफ से शत्रु देशों से घिरा है लेकिन मजाल है कि कोई उसकी तरफ आंख उठाकर देख जाए। इजराइल ने अपनी शक्तिशाली छवि यूं ही नहीं बनाई है। उसने करके दिखाया है। अपने शत्रुओं को ईंट का जवाब पत्थर से दिया है। जबकि भारत और पाकिस्तान के संबंध में ऐसा नहीं दिखता। पाकिस्तान बार-बार गुर्राता है। भारत की ओर आंखें तरेरता है। चार युद्ध हारने के बाद भी उसकी इतनी हिम्मत भारत की सुरक्षात्मक नीति के कारण है। भारत सरकार बार-बार उसके अमर्यादित व्यवहार को माफ करती है। जबकि होना यह चाहिए कि पाकिस्तान की ओर से कोई संदिग्ध गतिविधि की आशंका दिखे तो घटना घटने से पहले ही भारत की ओर से कार्रवाई कर दी जानी चाहिए। यदि ऐसा हो जाए तो पाकिस्तान की अक्ल ठिकाने आ जाए। वह भारत विरोधी कदम उठाने से पहले सौ बार सोचेगा। 
दशहरा महज उल्लास का पर्व नहीं है। बल्कि बहुत कुछ संकेत की भाषा में बताने की कोशिश करता है। अपने भीतर के तमाम रावणों को मारो-जलाओ बाकि बाहर सब ठीक हो जाएगा। खुद सशक्त बनो तो समाज ताकतवर बनेगा और देश को भी मजबूती मिलेगी। आखिर लोकतंत्र है भारत में, नेता इसी समाज से चुनकर जाने हैं। जैसा हम समाज बनाएंगे, वैसे ही नेता चुने जाएंगे। लोभ, लालच, स्वार्थ सहित अन्य सारे रावणों पर विजय पा लेंगे तभी तो हम आने वाले वक्त में सही चुनाव कर सकेंगे। तो खींच लो कमान अब ज्यादा वक्त नहीं बचा।  

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

थैंक्स अ लॉट जेन

 ज र्मन युवती जेन वॉन रेबनाउ ने भारत के संदर्भ में अपने अनुभव साझा किए हैं। जेन के अनुभव भारत और भारतीय समाज को सुखद और गर्व की अनुभूति कराते हैं। सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि जेन ने अमेरिकन युवती मिशेल क्रॉस को करारा जवाब दिया है। स्टडी ट्रिप पर भारत आई मिशेल ने यहां से जाने के बाद भारत को औरतों के लिए नरक बताया था। खासकर विदेशी युवतियों के लिए भारत को एक तरह से वाहियात बताया था। मिशेल ने ब्लॉग पर अपने अनुभव लिखे थे कि किस तरह भारतीय पुरुष लंपटों की तरह उसके रंग और सीने को घूरते थे। कभी-कभी तो पीछे ही पड़ जाते थे। इतना ही नहीं कुछ मौकों पर तो उसका रेप होते-होते बचा। मिशेल के अनुभवों से सभ्य भारतीय समाज ने लज्जा का अनुभव किया। शर्म से भारत का सिर झुक गया था। हालांकि हम भी जानते हैं कि मिशेल ने जो लिखा वह सच है लेकिन यह पूरे भारत का सच नहीं। इस तरह के लोग तो सभी देशों में पाए जाते हैं। ब्रिटेन, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, चीन, अफ्रीका, अफगानिस्तान और अरब देश सहित अन्य देशों में भारतीय महिला-पुरुषों के साथ भी कई मौकों पर अभद्र व्यवहार होता है। खासकर सिख समाज को कई बार बेहद लज्जाजनक स्थितियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन, यह तो कभी किसी ने नहीं कहा कि ये देश महिलाओं के लिए नरक हैं। लेकिन, भारत के प्रबुद्ध वर्ग की ओर से मिशेल को कोई जवाब नहीं दिया गया। अच्छा ही रहा। एक तो स्वयं अपनी वकालात करते तो शायद तथ्यों को उतनी स्वीकार्यता नहीं मिलती जितनी कि जर्मन युवती जेन की कथ्य से मिली है। दूसरा यह कि चलो अच्छा हुआ मिशेल ने अपने अनुभव साझा किए, इससे हमें आत्म चिंतन करने का मौका मिला। 
मिशेल की तरह ही जेन वॉन रेबनाउ भी भारत स्टडी टूर पर आई। महीनों भारत के अलग-अलग हिस्सों में रहीं। दर्शन की छात्रा जेन भारत ही नहीं दुनिया के अन्य देशों की सैर भी कर चुकी हैं। जेन लिखती हैं कि वे मिशेल क्रॉस के अनुभवों को कई बार पढ़ चुकी हैं। मेरे लिए भारत के अनुभव सकारात्मक और रोमांचक हैं। भारतीयों के आतिथ्य से मैं काफी प्रभावित हूं। इसके बाद जेन ने अपने ब्लॉग पर मिशेल के अनुभवों का जवाब बिन्दुवार दिया है। वे कहती हैं कि हम आम भारतीयों से अलग दिखते हैं तो स्वाभाविक है कि वे हमें घूरेंगे ही। हम भी तो उन्हें घूरते हैं। वे हमारे फोटो खींचते हैं, मोबाइल में वीडियो बनाते हैं तो इसे हम अपनी निजता का हनन मानते हैं जबकि हम तो उनसे भी अधिक फोटो बिना इजाजत खींचते हैं। फिर इसमें फर्क क्यों? जेन लिखती हैं कि इटली में पुरुष महिलाओं को घूरते हैं तो इसे तारीफ समझा जाता है जबकि भारत में यौन शोषण, यह दोहरा मापदण्ड क्यों? जेन ने इस तरह से मिशेल के तमाम आपत्तियों को सिरे से खारिज किया है। वे भारतीयों की मेहमाननवाजी की कायल हो गईं और तारीफ करते नहीं थकतीं। उनका कहना है कि उनके बाकी दोस्तों के अनुभव भी भारत के संदर्भ में ऐसे ही सकारात्मक हैं। भारतीय संस्कृति से अभिभूत जेन बार-बार भारत आने की इच्छा जाहिर करती हैं। भारत के सकारात्मक पक्ष को दुनिया के सामने रखने के लिए हम भारतवासी उनका धन्यवाद करते हैं। भारत में जेन, उनके दोस्त और मिशेल सहित अन्य विदेशी पर्यटकों, छात्रों का स्वागत है। जरा-सी सावधानी आप बरतें तो भारत सभी के लिए स्वर्ग ही होगा। हम राम-कृष्ण के हामी है, प्रेम में भरोसा करते हैं। 
हाल के दिनों में कुछेक बेहद दर्दनाक और शर्मनाक घटनाएं भारत में हुईं। दिल्ली गैंगरेप और मुबंई रेपकाण्ड सहित अन्य घटनाओं ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर नारी को देवी के समान आदर देने वाले देश में उसे रौंदा जा रहा है। आखिर देश में चल क्या रहा है? मीडिया से लेकर प्रबुद्ध वर्ग की चिंताओं में भारत की जो छवि सामने आई वह वाकई सोचने वाली थी कि क्या सिर्फ इसी देश में महिलाओं की बदतर स्थिति है? बाकि दुनिया महिलाओं के लिए मुफीद है। अगर हम ऐसा मानते हैं तो यह एक झूठ के सिवा कुछ न होगा। सउदी अरब में महिलाएं अकेली घर के बाहर भी नहीं निकल सकतीं, उनके साथ किसी पुरुष को होना जरूरी है। यहां तक की घर में घुसने-निकलने के लिए महिला-पुरुषों के दरवाजे भी अलग-अलग हैं। तालिबान ने तो महिला शिक्षा की बात कर रही महज १५ साल की बच्ची मलाला यूसुफजई को गोली मार दी थी, उसकी किस्मत थी कि वह बच गई। पाकिस्तान में ९० फीसदी से ज्यादा महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार रहती हैं। माली में भी महिलाओं को घर से बाहर जाने के लिए पुरुष की इजाजत लेनी पड़ती है। सोमालिया भी महिलाओं के लिए एक बुरा देश माना जाता है। माली और सोमालिया में ९० फीसदी महिलाओं के गुप्तांग के अंग-भंग करने की बात सामने आई है। डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो को दुनिया की 'रेप की राजधानी' कहा जाता है। यहां महिलाओं का उपयोग युद्ध में भी किया जाता है। इसके अलावा भी कई देश हैं जहां महिलाओं को तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ब्राजील, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और न्यूजीलैण्ड में भी महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की घटनाएं आम हैं। 
दूसरे देशों के हाले-बयां करके यहां इस बात की तरफदारी करने की कोशिश कतई नहीं की जा रही है कि जब सब जगह ऐसा है तो भारत में ऐसी घटनाओं पर चिल्ला-तौबा क्यों? और न ही महिलाओं की अस्मिता पर नजर गड़ाने वाले भेडिय़ों का बचाव किया जा रहा है। बल्कि यह कहने का प्रयास है कि भारत को इसी रूप में पेश न किया जाए, भारत के सकारात्मक पक्षों पर भी बात की जाए। साथ ही महिलाओं के प्रति दुराचार की एक घटना भी न घट सके इसके लिए ठोस काम करने की जरूरत है। भारत दुनिया की श्रेष्ठ सभ्यता और संस्कृतियों के मालिकों में से एक है। भारत के मान को बनाए रखना और उसके गौरव को बढ़ाने की जिम्मेदारी  हम सभी भारतीयों के कंधों पर है। पूरी कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि देश की ही नहीं विदेश से आने वाली एक भी महिला को अपमानजनक स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा। बाहर से आने वाली प्रत्येक महिला जर्मन छात्रा जेन वॉन रेबनाउ की तरह भारत में मिले मान-सम्मान से अभिभूत होकर जाए और बार-बार यहां की मेहमाननवाजी का लुत्फ उठाने के लिए आती रहे। जब भी भारत का जिक्र चले, वे धन्यवाद भारत कहें और हमें थैंक्स अ लॉट जेन की जगह वेलकम जेन कहने की आदत पड़ जाए।
---------------------------------------------------------------------------------
मिशेल क्रॉस के अनुभव -
http://aajtak.intoday.in/story/the-india-you-will-ashamed-to-know-us-students-haunting-account-1-740198.html
जेन वॉन रेबनाउ के अनुभव -
http://aajtak.intoday.in/story/india--a-blonde-tourist-an-alternate-account-1-740836.html

सोमवार, 11 मार्च 2013

समान अधिकार और सम्मान चाहिए, विशेषाधिकार नहीं

 बैं क में भारी भीड़ थी। लोग घंटों से लाइन में लगे अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। तभी कॉलेज की एक लड़की आती है। उम्र २०-२२ साल। तंग कपड़े पहने हुए और आंखों पर धूप का चश्मा चढ़ाए हुए थी। भीड़ देखकर परेशान थी। लेडीज फर्स्ट जुमले का फायदा उठाने के लिए लाइन खड़ी न होकर काउंटर पर आगे चली गई। तभी एक युवक ने उसे आवाज दी- ओ दोस्त लाइन में आ जाओ। हम भी बहुत देर से यहां खड़े हैं। क्या हो जाएगा? यदि मैं तुमसे पहले ड्राफ्ट बना लूंगी तो। अकेली ही तो हूं, बस पांच मिनट का ही तो अंतर आएगा। अब दूसरा दृश्य देखिए रेलवे स्टेशन टिकट के लिए लंबी कतार। ठीक बैंक वाली लड़की जैसी ही टिप-टॉप लड़की यहां भी आती है। आगे की ओर खड़े लोगों से अपना टिकट लेने का निवेदन करती है। इस पर एक युवक ने उससे कहा - अरे बहन, तुम खुद ही पहले टिकट ले लो। कहां लड़कों के साथ लाइन में फंसोगी। लकड़ी मुस्काती हुई आगे जाती है और टिकट ले लेती है। एक और दृश्य देखिए। मल्टीप्लेक्स सिनेमा का टिकट काउंटर। टिकट लेने के लिए लंबी लाइन लगी है। यहां भी महिलाओं की अलग से लाइन नहीं है। वह दो पल के लिए खड़ी होकर सोच ही रही थी कि टिकट ले या नहीं। इसके बाद वह लाइन में लगने लगी। लाइन में खड़े एक-दो लड़कों ने कहा- अरे आप कहां लाइन में लग रही हो। आप तो लड़की हो, आगे चली जाओ। वह पहले टिकट मिल जाएगा। यहां लड़की का जवाब गौर करने लायक था। उसने कहा- मुझे जरूरत नहीं। लड़की होने के कोई विशेषाधिकार नहीं चाहिए। जितने विशेषाधिकार देने थे, ऊपर वाले ने दे दिए हैं। धरती पर तो बस सम्मान और समान अधिकार चाहिए।
    तीनों लड़कियों में आखिरी वाली लड़की ने पते की बात कही। विशेषाधिकार तो कमजोर होने की निशानी है। स्त्रियां सदैव से यह सिद्ध करती आई हैं कि कम से कम वे पुरुषों के मुकाबले किसी काम में कमजोर तो नहीं ही है। बल्कि की आगे ही हैं। व्यक्तिगत गुणों के मुकाबले भी पुरुष उनके सामने कहीं नहीं टिकता। अब देखें तो नारी आंदोलन के नाम पर हो उल्टा रहा है।  स्त्री के लिए विशेषाधिकार की मांग की जा रही है। जिसकी उसे कतई जरूरत नहीं है। उसके जीवन में कमी है तो समान अधिकार की। सम्मान की। ये उसे मिल जाए तो फिर किसी विशेषाधिकार की उसे जरूरत नहीं रह जाती। बलात्कार के खिलाफ दिल्ली में अभूतपूर्व प्रदर्शन हुआ। कानून में भी फेरबदल किया गया। लेकिन, क्या इससे बलात्कार की घटनाओं में कमी आई। जवाब है नहीं। लड़कियों को उसी रफ्तार से रौंदा जा रहा है। महानगर से लेकर कस्बे तक एक जैसे हालात हैं। सवाल उठता है कि तो कैसे बदलाव आएगा? क्या कानूनों को कड़ा नहीं किया जाना चाहिए? जरूर आएगा बदलाव। कानून भी कड़े होने चाहिए सभी तरह के अपराधियों के लिए। यह अलग बात है कि बदलते दौर में कड़े कानून स्त्रियों के सहायक तो हो सकते हैं लेकिन उसके प्रति समाज की सोच नहीं बदल सकते। स्त्री को देखने, सोचने और समझने का नजरिया बदलना होगा। इसकी शुरुआत किसी कानून के बनने से नहीं हो सकती। मन बनाना होगा। समाज यानी स्त्री-पुरुष दोनों को खुद से करनी होगी शुरुआत। स्त्री को कदम-कदम पर क्षणिक लाभ लेने के लिए खुद को कमजोर साबित करने से बचना होगा। उसे लेडीज फर्स्ट के जुमले को छोडऩा होगा। मैं नारी हूं इसलिए मेरी मदद कीजिए, यह भी नहीं चलने देना होगा। पुरुष को भी यह खयाल दिल से निकालना होगा कि नारी को उसकी जरूरत है। देखने में आता है कि कोई लड़का गाड़ी धकेलकर ले जा रहा है तो कोई उससे नहीं पूछता कि क्या दिक्कत है? मैं क्या मदद कर सकता हूं? लेकिन, स्थिति इसके उलट हो यानी जब कोई लड़की गाड़ी धकेलकर ले जा रही हो तो राह चलते सौ लोग रुककर उससे पूछते हैं, क्या हुआ? कोई मदद तो नहीं चाहिए? पुरुषों को हर काम में लड़कियों की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाने की मानसिकता से भी पीछा छुड़ाना होगा। इसकी शुरुआत अपने घर से करनी होगी। अपनी बहन-बेटी को स्कूल-कॉलेज छोडऩे जाने की बजाय उसे स्वयं जाने दिया जाए। घर में बेटे के समान ही बेटी को भी पढ़ाई का अवसर उपलब्ध कराना चाहिए। उसे सिर्फ इसलिए नहीं पढ़ाना चाहिए कि ब्याह करने में दिक्कत न आए। उसे अच्छा नौकरीपेशा वर मिल सके। जिस तरह लड़के को अफसर बनाने के लिए पढ़ाई पर पैसा खर्च किया जाता है वैसी ही बिटिया को भी अफसर बनाने का सपना देखना चाहिए। घर की संपत्ति में भी पुत्र के बराबर पुत्री को हक देना चाहिए। इस मामले में अभी समाज बहुत रूढि़ है। घर की सबसे लाड़ली सदस्य से पिता, मां और भाई भी उस समय खपा हो जाते हैं, जब वह शादी के बाद पैतिृक संपत्ति में से अपना हिस्सा मांग ले। इस वक्त घरवालों का एक ही कहना होता है कि दहेज तो दे दिया, अब क्या भाइयों का हिस्सा भी चाहिए। खून के रिश्ते बिगडऩे से बचाने के लिए घर की बेटी छोटी-मोटी नौकरी करके गुजारा कर लेती है लेकिन किसी भी आपात स्थिति में वह पिता की संपत्ति में से हिस्सा नहीं मांगती। यहां समानता लाने के लिए काफी प्रयास करने होंगे। असमानता और विभेद की लकीर घर में बेटा और बेटी को दी जाने वाली अलग-अलग नैतिक शिक्षा से भी बनती है। बेटे के लिए भरपूर आजादी। बेटी को ये नहीं करना चाहिए, वो नहीं करना चाहिए, तमाम बंदिशें। जबकि नैतिकता और मर्यादा का पाठ लड़की के साथ-साथ लड़कों को भी पढ़ाया जाए तो ठीक बनेगा आने वाला समाज।
    दिक्कत कहां है? क्यों तमाम प्रयास के बावजूद हम वहीं के वहीं खड़े हैं? इसके लिए हम सबके साथ-साथ बहुत हद तक नारी को आधुनिक बनाने के नाम पर चल रहे तमाम नारी आंदोलन भी जिम्मेदार हैं। मशहूर नारीवादी चिंतक जर्मेन ग्रीयर का कथन याद आता है कि नारीवादी आंदोलनों ने भारतीय नारी को बस तीन चीजें दी हैं- लिपस्टिक, हाईहील सैंडल और ब्रा। हम सबकी नजर में भी आधुनिक स्त्री की छवि लाली-पाउडर पोते, स्टाइलिश बाल कटवाए और जींस-टीशर्ट पहनने वाली लड़की की है। इतना ही नहीं नारीवादी आंदोलनों से जुड़े लोग नारी की आजादी के नाम पर सिर्फ यौनिक आजादी की ही प्रमुखता से चर्चा करते हैं। जिसका खामियाजा स्त्री को ही उठाना पड़ रहा है। यौनिक आजादी की आड़ में बाजार ने उसे अपना गुलाम बना लिया है। बाजार ने आधुनिक नारी का समूचा व्यक्तित्व उसके शरीर पर केन्द्रित कर दिया है। नारी देह दिखाकर साबुन से लेकर सीमेंट तक बेचा जा रहा है। बाजार अपने मतलब के लिए नारी देह से सारे लिबास नोंच लेना चाहता है।
    बाजार और नारीवादी आंदोलन के नाम पर आए भटकाव से तो स्वत: नारी को ही बचना होगा। उसे तय करना चाहिए कि उसकी पहचान कैसे हो? उसे जरूरत नहीं पुरुषों की नजरों में सुंदर दिखने की। उसे ही तय करना होगा कि बाजार की ओर से सुझाए कपड़े उसे पहनने हैं या फिर देह और देश-काल के अनुरूप। उसे जरूरत नहीं किसी का सामान बेचने के लिए अपना शरीर बेचने की। उसे घर से लेकर बाजार तक स्वयं को मजबूत साबित करना होगा। कहीं भी अगर पुरुष उसे कमजोर समझ कर आगे जाने का अवसर दे या दया भाव दिखाए तो स्त्री को ताकत के साथ उसका प्रतिरोध करना चाहिए। बराबर ताकत वाले का सब सम्मान करते हैं।

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

सब समाज का है 'शिवराज'

 म ध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान समाज के प्रत्येक वर्ग के करीबी हो गए हैं। जब कोई अपना हो जाता है तो उसे उसके मुख्य नाम से नहीं बुलाते। उसके लिए प्यार से एक नया नाम यानी निकनेम रखते हैं। प्रदेश में लिंगानुपात बहुत अधिक है। लड़का-लड़की के भेद को कम करने के लिए मुख्यमंत्री ने लाडली लक्ष्मी योजना शुरू की। इसके बाद शिवराज सिंह प्रदेशभर की बच्चियों के 'मामा' बन गए। किसान खुशहाल हों तो प्रदेश भी तरक्की की राह पकड़ ले। यही सोचकर मुख्यमंत्री  ने किसानों के लिए जीरो फीसदी पर कर्ज मुहैया कराने की योजना शुरू की। यानी ब्याज जीरो, किसान हीरो का नारा देकर वे किसानों के मसीहा बन गए। किसान पुत्र बन गए। हाल ही में बुजुर्गों को मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना के तहत तीर्थ यात्रा पर भेजकर शिवराज इस युग के 'श्रवण कुमार' बन गए। काफिला रुकवाकर किसी की दुकान से जलेबी तो किसी ठेलेवाले से पोहा खाना, लोगों के कंधे पर हाथ रखकर उनका हालचाल पूछना और गांव-गांव संपर्क करने से उन्हें 'पांव-पांव वाले भैया' के नाम से पुकारा जाने लगा। योग और गीताज्ञान को स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल कराकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को संघ का खाटी 'स्वयंसेवक' कहलाने में गुरेज नहीं। भेष बदलकर, चोरी-छिपे जनता का हाल जानने सड़कों पर निकलकर 'विक्रमादित्य' बन गए शिवराज। प्रदेश में लोकप्रियता के चरम पर हैं शिवराज सिंह चौहान। मुख्यमंत्री की लोकप्रियता के बारे में एक लाइन में कुछ कहना हो तो - मध्यप्रदेश का मुखिया भारत के दिल पर काबिज है और आगे भी रहने वाला है।
    शिवराज सिंह चौहान की विनम्रता, पार्टी गाइडलाइन का पालन, वरिष्ठ नेताओं व पार्टी संगठन से सांमजस्य और विरोधियों की प्रशंसा करने के गुण उन्हें अन्य नेताओं से अलग करते हैं। 29 नवंबर, 2005 को उन्होंने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। सात साल से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल रहे शिवराज सिंह चौहान की शैली ऐसी है कि कोई उनसे नाराज नहीं होता। यहां तक कि विरोधी भी उनकी विनम्रता के मुरीद हो जाते हैं। विधानसभा की कार्यवाही में भी अकसर दिख जाता है कि कांग्रेस भाजपा सरकार को तो घेरने के प्रयास करती दिखती है लेकिन सीएम को निशाना नहीं बनाती। हाल ही में ग्वालियर में स्वर्गीय माधवराज सिंधिया प्रतिमा के अनावरण कार्यक्रम में कांग्रेस के युवा मंत्री ज्योतिरादित्य ने मुख्यमंत्री की कार्यशैली, विनम्रता और वाकपटुता की खुलकर प्रशंसा की। सिंधिया ने मुख्यमंत्री की प्रशंसा उस वक्त की है जबकि प्रदेश कांग्रेस का एक धड़ा उन्हें कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर २०१३ के चुनाव फतेह करना चाहता है। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी भी कहते हैं कि एक सफल शासक में जिस प्रकार की विनम्रता जरूरी है, शिवराज का व्यक्तित्व उस पहलू को बहुत उजागर करता है।
    किसान परिवार में जन्मे और किरार जाति (पिछड़ा वर्ग) से संबंध रखने वाले शिवराज सिंह चौहान का भाषण देना का अंदाज भी निराला है। जिस तरह कथावाचक अपने श्रोताओं को बांधकर रखता है वैसे ही शिवराज सिंह चौहान अपनी बात आहिस्ता-आहिस्ता जनता के मन में गहरे तक उतार देते हैं। सरकार की उपलब्धि पर वे मंच से जनता की हामी भरवा लेते हैं और केन्द्र सरकार के खिलाफ अपनी बात पर लोगों की मुहर भी लगवा लेते हैं।
    जाति फैक्टर का भारतीय राजनीति में बड़ा महत्व है। किसी भी प्रांत की राजनीति पर नजरें दौड़ा लें तो जाति बड़ा कारक सामने आता है। उत्तरप्रदेश में यादव, ब्राह्मण और दलित राजनीति का बोलबाला है। बिहार में भी भाजपा के आने से पहले यही हाल था। शिवराज सिंह चौहान इस मामले में भी अन्य राजनेताओं से अलग दिखते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में पाए गुणों के कारण ही वे समरस समाज का स्वप्न देखते हैं और जातिगत राजनीति से दूर रहते हैं। वर्ष २००५ में पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद शिवराज सिंह चौहान को ग्वालियर आने के लिए उनके जातिगत समाज ने बुलावा भेजा। किरार समाज ने अपनी जाति के साधारण से किसान पुत्र को बुलंदी चूमने पर सम्मानित करने का निर्णय लिया था। वीरागंना लक्ष्मीबाई समाधिस्थल के सामने मैदान में मुख्यमंत्री के सम्मान का समारोह आयोजित किया गया। मंच से किरार जाति के नेताओं ने समाजहित की चिंता करते हुए कुछ अपेक्षाएं अपने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के समझ व्यक्त कीं। माइक संभालते ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने सम्मान के लिए समाज को धन्यवाद दिया। इसके बाद उन्होंने भरे मंच और मैदान में कहा- शिवराज किसी एक समाज का नहीं है। उसे प्रदेश के हर समाज, प्रत्येक वर्ग की चिंता का गुरुतर दायित्व प्रदेश की सारी जनता ने दिया है। इसीलिए आपसे माफी मांगते हुए कहता हूं कि मैं महज किरार समाज का नहीं वरन् सब समाज का हूं।
    भारतीय राजनीति में किसी भी नेता के लिए जाति के बड़े-बड़े नेताओं के सामने इस तरह की बात कहना इतना आसान नहीं होता लेकिन जिसे समाज को समरस बनाना हो उसके लिए इतना कठिन भी नहीं होता है। वरना वोटों और कुर्सी के भूखे नेता ऑनर किलिंग तक का समर्थन कर जाते हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का यही व्यक्तित्व है, जिसके आगे विपक्ष टिक नहीं पा रहा है और भाजपा के लिए मिशन-२०१३ की राह भी आसान दिख रही है।