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गुरुवार, 8 जनवरी 2026

हिन्दुओं के मानवाधिकारों पर वैश्विक चुप्पी

गरिमामयी जीवन जीने के लिए मनुष्य होने के नाते हमारे कुछ अधिकार हैं। वैश्विक स्तर पर मनुष्यों के अधिकारों की रक्षा हो सके, इस उद्देश्य के साथ संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 10 दिसंबर, 1948 को ‘मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा’ की। यह दस्तावेज मानव जीवन, स्वतंत्रता, विचार की अभिव्यक्ति, धर्म, शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों को परिभाषित करता है। भारत के संविधान में भी कई अनुच्छेद मानवाधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। मानवाधिकारों का हनन रोकने, उनकी निगरानी करने एवं इससे जुड़े अन्य मामलों पर हस्तक्षेप करने के लिए राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थाएँ भी गठित की गई हैं। परंतु, विडंबना यह है कि इन संस्थाओं को अन्य समुदायों के मानवाधिकारों की चिंता तो होती है, लेकिन हिंदुओं के मानवाधिकार इन्हें संभवतः दिखाई ही नहीं देते। विश्व के विभिन्न देशों में हिंदुओं के मानवाधिकारों का खुलेआम हनन हो रहा है, लेकिन कहीं कोई घोर आपत्ति सुनाई नहीं देती। एक प्रकार से वैश्विक चुप्पी छाई हुई है। यह स्थिति चिंताजनक है। यह चुप्पी हिंदू समाज के मन में आक्रोश पैदा करती है और सांप्रदायिक भेद भी बढ़ाती है।

शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

भारत के विचार की विजय पताका

श्री अयोध्या धाम में श्रीराम मंदिर पर धर्म ध्वजा की प्रतिष्ठा का यह प्रसंग अविस्मणीय है। यह केवल एक मंदिर पर फहराने वाला ध्वज नहीं है अपितु भारत के विचार की विजय पताका है। सदियों की तपस्या, संघर्ष और आस्था एक होकर भव्य श्रीराम मंदिर के शिखर पर धर्मध्वमजा के रूप में साकार हुई है। वास्तव में, 25 नवंबर, 2025 भारत की सांस्कृतिक चेतना के लिए ‘सार्थकता का दिन’ बन गया। जैसा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि “सार्थकता के इस दिन के लिए जितने लोगों ने प्राण न्योछावर किए, उनकी आत्मा तृप्त हुई होगी। आज मंदिर का ध्वजारोहण हो गया। मंदिर की शास्त्रीय प्रक्रिया पूर्ण हो गई। राम राज्य का ध्वज, जो कभी अयोध्या में फहराता था, जो पूरी दुनिया में अपने आलोक से समृद्धि प्रदान करता था, वह आज धीरे-धीरे ऊपर उठते हुए अपनी आंखों से देखा है। इस भगवा ध्वज पर रघुकुल का प्रतीक कोविदार वृक्ष है। यह वृक्ष रघुकुल की सत्ता का प्रतीक है”।

शनिवार, 4 जनवरी 2025

धर्म की सीख

धार्मिक कहानियां सिखाती हैं जीने की कला


AI द्वारा निर्मित प्रतीकात्मक चित्र

सार्थक और देवकी का परिवार बहुत धार्मिक है। उनके माता-पिता अकसर श्री रामचरितमानस और श्रीमद्भगवत गीता का पाठ करते हैं। एक दिन सार्थक और देवकी अपनी माँ के पास बैठे थे। उनके मन में जिज्ञासा उठी कि मम्मी और पापा धार्मिक किताबें क्यों पढ़ते रहते हैं। एक ही प्रकार की पुस्तक को बार-बार पढ़ने से क्या होता है? दरअसल, सार्थक और देवकी को धर्म-अध्यात्म और भारतीय संस्कृति की उतनी अधिक जानकारी नहीं थी क्योंकि वे जिस स्कूल में पढ़ते हैं, वहाँ के पाठ्यक्रम में भी भारत की कहानियां नहीं पढ़ाई जाती हैं।

गुरुवार, 22 जून 2023

‘गीता प्रेस’ के सम्मान का विरोध करके क्या प्राप्त होगा?

Gita Press Controversy को Exposed करनेवाला यह वीडियो देखिए-


भारत सरकार की ओर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता वाली समिति ने सर्वसम्मति से गीता प्रेस, गोरखपुर को प्रतिष्ठित ‘गांधी शांति पुरस्कार’ देने का निर्णय करके बहुत अच्छा काम किया है। इसी वर्ष गीता प्रेस ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण किये हैं। अपनी इस 100 वर्ष की यात्रा में इस प्रकाशन ने भारतीय संस्कृति की खूब सेवा की है। भारतीयता के विचार को जन-जन तक पहुँचाने में गीता प्रेस का कोई मुकाबला नहीं कर सकता। वर्ष 1923 में स्थापित गीता प्रेस आज विश्व के सबसे बड़े प्रकाशकों में से एक मानी जाती है। इस प्रेस ने अब तक 14 भाषाओं में 41.7 करोड़ पुस्तकें प्रकाशित कर नया कीर्तिमान बनाया है। इनमें से श्रीमद्भगवद्गीता की 16.21 करोड़ प्रतियां शामिल हैं। गीता प्रेस की नीति के कारण श्रीमद्भगवतगीता, श्री रामायण, श्री महाभारत सहित अनेक भारतीय ग्रंथ घर-घर तक पहुँच सके।

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2022

हिन्दूहित यानी राष्ट्रहित

भाग्यनगर (हैदराबाद) में चल रहे रामानुजाचार्य सहस्राब्दी समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने जो उद्बोधन दिया है, वह वर्तमान राजसत्ता एवं समाजसत्ता के लिए दिशासंकेत है। उनके उद्बोधन पर संकीर्ण राजनीतिक दृष्टि से नहीं अपितु वृहद भारतीय दृष्टिकोण से चिंतन करने और उसका अनुसरण करने की आवश्यकता है। अपने व्याख्यान में सबसे पहले उन्होंने एक लोककथा के माध्यम से भारतीय समाज को उसके सामर्थ्य से परिचित कराया। भारतीय समाज के सामर्थ्य का ही परिणाम है कि विगत एक हजार वर्षों में अनेक बाह्य आक्रमणों के बाद भी हिन्दू संस्कृति जीवित है। अनेक ताकतों ने हिन्दुओं को नष्ट करने के लिए पूरी ताकत लगा ली लेकिन परिणाम क्या है, सब जानते हैं। इस ओर ध्यान दिलाते हुए उन्होंने कहा कि "हमें खत्म करने के अनेक कोशिशें की गईं लेकिन उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली। अगर हमें खत्म होना होता होता तो पिछले 1000 साल में ऐसा हो गया होता लेकिन लगभग पाँच हजार साल पुराना सनातम धर्म आज भी टिका हुआ है और अक्षुण्ण है। जिन्होंने हिन्दुओं को खत्म करने की कोशिश की वो आज पूरी दुनिया में आपस में संघर्ष कर रहे हैं। इतने अत्याचारों के बाद भी आज हमारे पास मातृभूमि है। हमारे पास संसाधनों की कमी नहीं है इसलिए हमें डरने की जरूरत भी नहीं है"।

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2022

हिन्दुत्व ही राष्ट्रत्व

एक ओर बाह्य विचारधारा के प्रभाव में कुछ राजनेता और उनके सहयोगी बुद्धिजीवी ‘हिन्दुत्व’ एवं ‘राष्ट्र’ की अवधारणा पर प्रश्न उठाकर उसे नकार रहे हैं। हिन्दुत्व को लेकर उनका विचार अत्यधिक नकारात्मक है। उन्हें जैसे ही अवसर मिलता है, नकारात्मक बातों के साथ हिन्दुत्व को जोड़कर, हिन्दुत्व के प्रति समाज में घृणा का भाव पैदा करने का प्रयास करते हैं। वहीं, दूसरी ओर राष्ट्रीय विचार से अनुप्रमाणित संगठन हैं, जो हिन्दुत्व को भारत का मूल बता रहे हैं। हिन्दुत्व को सही प्रकार से परिभाषित करते हुए उनकी ओर से बताया जाता है कि उसमें सबके लिए सम्मानपूर्वक स्थान है। इस विमर्श के क्रम में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के वक्तव्य को देखा जा सकता है। भाग्यनगर (हैदराबाद) में चल रहे रामानुजाचार्य सहस्राब्दी समारोह में शामिल होने पहुँचे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि “हिन्दुत्व ही राष्ट्रत्व है। इसमें दो मत नहीं है। इस बात को कहने में कोई संकोच नहीं है”।

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021

सिनेमा के निशाने पर हिन्दू संस्कृति

फिल्म निर्माता प्रकाश झा की विवादित वेबसीरीज ‘आश्रम’ के कारण एक बार फिर आम समाज में यह विमर्श चल पड़ा है कि सिनेमाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं रचनाधर्मिता के निशाने पर हिन्दू संस्कृति ही क्यों रहती है? फिल्मकार अन्य संप्रदायों पर सिनेमा बनाने का साहस क्यों नहीं कर पाते हैं? हिन्दू संस्कृति एवं प्रतीकों को ही अपनी तथाकथित रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए चुनने के पीछे का एजेंडा क्या है? मुस्लिम कलाकार भी अपने धर्म की आलोचनात्मक प्रस्तुति करने की जगह हिन्दू धर्म पर ही व्यंग्य करना पसंद करता है। पिछले दिनों एम्स दिल्ली के विद्यार्थियों ने भी रामलीला का आपत्तिजनक मंचन किया, जिसका निर्देशन शोएब नाम के लड़के ने किया था। हिन्दू बार-बार इन प्रश्नों के उत्तर माँगता है, लेकिन उसको कभी भी समाधानमूलक उत्तर मिले नहीं। परिणामस्वरूप अपमानजनक एवं उपेक्षित परिस्थितियों और चयनित आलोचना एवं चुप्पी ने उसके भीतर आक्रोश को जन्म देना प्रारंभ कर दिया है।

सोमवार, 11 अक्टूबर 2021

निशाने पर कश्मीरी हिन्दू

जम्मू-कश्मीर के घाटी और श्रीनगर के क्षेत्रों में इस्लामिक आतंकी जिस तरह चिह्नित करके हिन्दुओं की हत्याएं कर रहे हैं, उससे पता चलता है कि वह 1990 की तरह हिन्दुओं को भयाक्रांत करके बचे-खुचे हिन्दुओं को भी खदेडऩा चाहते हैं। विवादास्पद अनुच्छेद-370 हटाए जाने के बाद से केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ लेकर अनेक हिन्दू घाटी में नौकरी एवं व्यवसाय करने गए हैं। 1990 में इस्लामिक आतंकवाद से पीडि़त होकर जिन हिन्दुओं को घर छोडऩे पड़े, सरकार उन्हें उनके घर एवं संपत्तियों वापस दिखाने के प्रयास भी कर रही है। मोदी सरकार के यह सब प्रयास इस्लामिक चरमपंथियों को पसंद नहीं आ रहे हैं। यही कारण है कि उन्होंने एक बार फिर यह संदेश देने का प्रयास किया है कि कश्मीर घाटी में हिन्दुओं को जीवित नहीं रहने दिया जाएगा। सरकार को आतंकवादियों की इस चुनौती को गंभीरता से लेना चाहिए।

शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

गाय को मिले राष्ट्रीय पशु का दर्जा

भारत में प्राचीनकाल से गाय का बहुत महत्व रहा है। गाय भारतीय संस्कृति की प्रतीक होने के साथ ही अर्थव्यवस्था की धुरी भी रही है। हिन्दुओं के लिए गाय आस्था का केंद्र भी है। यही कारण रहा है कि हिन्दू विरोधी मानसिकता के लोग हिन्दुओं की भावनाओं को आहत करने और उनकी आस्था पर चोट पहुँचाने के लिए गाय की हत्या करने का घिनौना काम करते हैं। देश में एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो गोमांस खाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। इसके पीछे उसकी मंशा उदरपूर्ति नहीं बल्कि हिन्दुओं को दु:ख पहुँचाना की रहती है। रामचंद्र गुहा जैसे बुद्धिजीवी तो मांसाहारी नहीं होने के बाद भी बीफ की प्लेट सोशल मीडिया में शेयर करते हैं, सिर्फ इसलिए ताकि गाय के प्रति श्रद्धा रखने वालों को आहत किया जा सके। केरल के कांग्रेसी चौराहे पर गाय काटकर तो कम्युनिस्ट ‘बीफ फेस्ट’ का आयोजन करके हिन्दुओं की आस्था पर सीधे चोट पहुँचाते हैं। ऐसे ही अनेक बुद्धिजीवी लोग गोमांस खाने को अपना मौलिक अधिकार समझते हैं। इलाहबाद उच्च न्यायालय ने ऐसे लोगों को आईना दिखाने का काम किया है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि गोमांस खाना किसी का मौलिक अधिकार नहीं हो सकता। अपितु गो-संरक्षण को माननीय न्यायालय ने मौलिक अधिकार कहा है।

बुधवार, 21 जुलाई 2021

भारत की संस्कृति के साक्षी

भारत की मूल संस्कृति क्या है? इसको लेकर दिग्भ्रिमित करने वाले अनेक विमर्श चलते रहते हैं। एक शायर ने तो यहाँ तक कह दिया कि यहाँ सब किराएदार हैं, कोई मकान मालिक नहीं। उनके कहने का आशय यही था कि भारत में अलग-अलग समय में लोग आते गए और बस गए। भारतीय मूल का कोई नहीं है। दरअसल, वे आर्य-द्रविणवाली कपोल कल्पना के लिए गढ़े गए झूठ के या तो वाहक थे या फिर उसके फेर में फंस गए होंगे। भारत के मूल लोग कौन थे, उनकी संस्कृति क्या थी, जीवन पद्धति क्या थी, धर्म क्या था, यह सब कोई शायर नहीं बता सकता, बल्कि भारत की मिट्टी इसका स्वयं जवाब देती है कि उसमें किसका रक्त शामिल है। अयोध्या से लेकर मथुरा, राखीगढ़ी से लेकर उज्जैन तक खुदाई में भारतीय संस्कृति के प्रमाण मिलते हैं।

सोमवार, 31 मई 2021

पुण्यश्लोक राजमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर

देखें यह वीडियो : Rajmata Devi Ahilyabai Holkar



अहिल्याबाई का जन्म 31 मई, 1725 को महाराष्ट्र के जिले अहमदनगर के चौंढ़ी ग्राम तालुका जामखेड़ा में हुआ था। उनके पिता माणकोजी शिंदे और माता सुशीलाबाई बहुत धार्मिक थे। अपने माता-पिता से ही धार्मिक और संवेदनशील होने का संस्कार अहिल्याबाई को विरासत में मिला।  

वर्ष 1733 में पुणे में हिंदू विधि-विधान से उनका विवाह श्रीमंत खण्डेराव के साथ सम्पन्न हुआ। उनको आशीर्वाद देने के लिए बाजीराव पेशवा अपने परिवार के साथ आए थे। एक साधारण परिवार की दिव्य कन्या अब इंदौर के राजमहल की रानी हो गई।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

बंधुत्व का प्रतीक श्रीराम मंदिर

श्रीराम जन्मभूमि, अयोध्या मंदिर में विराजे रामलला के दर्शन

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का जीवन भारतीय विचार की अभिव्यक्ति है। श्रीराम ने अपने जीवन से सामाजिक समरसता, एकात्म एवं बंधुत्व का संदेश दिया है। आज से हजारों वर्षों पूर्व त्रेतायुग में उन्होंने भारत को एक छोर से दूसरे छोर तक एकसूत्र में पिरोया। प्रभु श्रीराम ने सामाजिक समरसता को न केवल अपने शासन की आधारशिला बनाया, बल्कि उनके जीवन का सार भी यही है। इसलिए समूचा समाज राम का है और राम सबके हैं। आज के युग में उनके संदेश का केंद्र बनेगा अयोध्या में बनने जा रहा श्रीराम मंदिर। भारत का यह मंदिर बंधुत्व का प्रतीक होगा। पाँच अगस्त को श्रीराम की जन्मभूमि पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने भूमिपूजन के बाद अपने उद्बोधनों से यही संदेश दिया। 

श्रीराम मंदिर के संघर्ष को रेखांकित करते हुए दोनों महानुभावों ने कहना यही था कि श्रीराम मंदिर भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत का द्योतक होगा, अनंतकाल तक पूरी मानवता को प्रेरणा देगा और मार्गदर्शन करता रहेगा। यह भारत को जोडऩे का काम करेगा। श्रीराम मंदिर ने यह कार्य अपने निर्माण से बहुत पहले, आंदोलन के दौरान ही प्रारंभ कर दिया था। श्रीराम मंदिर आंदोलन में समूचे भारत से सभी वर्गों के लोग शामिल हुए। सबको स्मरण है कि अशोक सिंघल जी के नेतृत्व में विश्व हिंदू परिषद के प्रयासों से 1989 में श्रीराम जन्मभूमि के शिलान्यास का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ था, जिसका श्रेय अचानक से भगवा रंग में रंगी कांग्रेस लूटने का प्रयास कर रही है। शिलान्यास का वह कार्यक्रम शुद्ध तौर पर विश्व हिंदू परिषद का कार्यक्रम था, जिसमें अनेक पूज्य संत शामिल हुए थे। उस दिन भी सामाजिक समरसता का उदाहरण सबने देखा था, जब अनुसूचित जाति के कामेश्वर चौपाल के कर कमलों से शिलान्यास पूजन हुआ। 

भगवान श्रीराम के दरबार में दंडवत प्रणाम करते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

           5 अगस्त, 2020 को जब श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण कार्य का शुभारंभ हो रहा था, तब भी कार्यक्रम में लगभग 36 परंपराओं, पंथ-संप्रदायों के संत उपस्थित थे, जिनमें प्रमुख हैं- दशनामी सन्यासी परंपरा, रामानुज, निंबार्क, वल्लभ, कृष्ण प्रणामी आदि संप्रदाय निर्मले संत, लिंगायत, रविदासी संत, जैन, सिख, मत पंथ, स्वामीनारायण, चिन्मय मिशन, रामकृष्ण मिशन, एकनाथी, वनवासी संत, सिंधी संत, रामानंदी वैष्णव, माधवाचार्य, रामस्नेही, उदासीन, कबीरपंथी, वाल्मीकि संत, आर्य समाजी, बौद्ध, नाथ परंपरा, गुरु परंपरा, आचार्य सभा के प्रतिनिधि, संत कैवल्य ज्ञान, इस्कॉन, वारकरी, बंजारा संत, आदिवासी गौण, भारत सेवाश्रम संघ, संत समिति एवं अखाड़ा परिषद। इसके अतिरिक्त भी अन्य मत-संप्रदाय के प्रतिनिधि लोग वहाँ उपस्थित रहे। 

मंदिर निर्माण के लिए देश की विभिन्न नदियों से जल एवं प्रमुख स्थानों से मिट्टी लाई गई, जिनमें संत रविदास जन्मस्थली, सीतामढ़ी उत्तर प्रदेश से महर्षि वाल्मीकि आश्रम, मध्यप्रदेश के टंट्या भील की पुण्य भूमि, श्री हरमंदिर साहिब अमृतसर पंजाब, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के जन्मस्थान महू की, दिल्ली के जैन लाल मंदिर, वाल्मीकि मंदिर (जहां महात्मा गांधी 72 दिन रहे थे) इत्यादि स्थान प्रमुख हैं। इसलिए बार-बार यह कहा जा रहा है कि यह मंदिर साधारण नहीं है, यह भारत की पहचान बनेगा। निश्चित ही श्रीराम मंदिर विश्व-बंधुत्व का संदेश देने वाला सबसे बड़ा केंद्र बनेगा।


गुरुवार, 6 अगस्त 2020

रामत्व का उद्घोष

मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में जब भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत की उपस्थिति में मंदिर निर्माण कार्य प्रारंभ करने के लिए पूजन किया जा रहा था, तब चहुँ ओर हर्ष व्याप्त था। रामनाम का प्रभाव और हिंदू समाज की सांगठनिक शक्ति का प्रताप है कि राम को काल्पनिक सिद्ध करने की भरसक चेष्टा करने वाले भी राम-नाम जाप कर रहे हैं। यह अद्भुद दृश्य भारत में ही नहीं, अपितु समूची दुनिया में देखे गए। लगभग पाँच सदियों बाद साकार हो रहे स्वप्न को देखने के लिए सारा देश टेलीविजन के सामने बैठा रहा। उसका मन आल्हादित था। प्रत्येक रामभक्त की भौतिक उपस्थिति तो अपने ही घर में टेलीविजन के सामने थी, लेेकिन मन अयोध्या में विचर रहा था। प्रत्येक भारतीय मन की यही स्थिति थी। वह बीती रात से ही दीपोत्सव मना रहा था। मानो उसके राम वनवास पूरा करके अयोध्या लौट रहे हों। अयोध्या भी वैसे ही सजी-धजी थी। 

निस्संदेह यदि कारोनो संक्रमण ने लोगों के पैर न थामे होते तो पाँच अगस्त को अयोध्या में पग रखने की भी जगह न होती। महाकुंभ का आयोजन होता। अभी बेशक लोग इस महत्वपूर्ण और गर्व से भरे हुए पल के साक्षी न बन पाए हैं लेकिन राम अनादि से अनन्त तक हैं और समस्त विश्व के राम भक्त राम में ही समाये हुए हैं इसलिए जो जहाँ थे वहीं से मन ही मन तो अयोध्या में उपस्थित हुए। पूर्ण विश्वास है कि तीन वर्ष बाद उन सबको सशरीर राम के प्रांगण में उपस्थित होने का ऐसा ही अवसर मिलेगा। लगभग तीन वर्ष बाद जब श्रीराम का भव्य मंदिर बनकर तैयार हो जाएगा, तब निश्चित ही उसका उद्घाटन कार्यक्रम आयोजित होगा, तब निश्चित ही भारतीय समाज अपनी इस अभिलाषा को पूर्ण कर सकेगा और भव्य मंदिर में दिव्य रामलला के दर्शन करेगा। उस क्षण की भी तो प्रतीक्षा समाज को है, जब भव्य मंदिर के ऊंचे शिखर आसमान को छू रहे होंगे। मंदिर पर लहरा रही विजय पताकाएं भारत की पहचान को प्रकट कर रही होंगी। 

पाँच अगस्त की तिथि इतिहास में दर्ज हो गई है। यह रामत्व के उद्घोष का दिन था। भारतीय स्वाभिमान के हिमालय-सा ऊंचा उठने का अवसर था। यह भी शुभ संयोग है कि राम के मंदिर के निर्माण कार्य का शुभारंभ करने का अवसर उन महानुभावों/विचार को मिला, जिसने देशवासियों के मन में रामत्व को जगाया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो व्रत लिया था कि अयोध्या में प्रभु श्रीराम के दर्शन को तभी जाएंगे जब वहाँ मंदिर निर्माण के अपने संकल्प को पूरा करेंगे। यह उनका अकेले का संकल्प नहीं था, असंख्य देशवासियों का संकल्प था, जो अब जाकर फलित हुआ है। कहते हैं कि यदि आपका संकल्प शुभ है तो उसको पूर्ण करने में प्रकृति भी भरपूर सहयोग देती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत वहाँ उन लाखों स्वयंसेवकों के प्रतिनिधि के रूप में दिखे, जिन्होंने राममंदिर आंदोलन में संघर्ष और बलिदान किया। अयोध्या में बनने जा रहा यह श्रीराम मंदिर कोई साधारण मंदिर नहीं होगा, विश्वास है कि यह भारत की पहचान बनेगा।


बुधवार, 5 अगस्त 2020

‘भारत की नियति से भेंट’ का दिन

श्रीराम जन्मभूमि, अयोध्या में प्रस्तावित भव्य श्रीराम मंदिर

लगभग 500 वर्षों के संघर्ष और लंबी प्रतीक्षा के पश्चात अब जाकर वह क्षण आया है, जिसका स्वप्र हिंदू समाज देख रहा था। अयोध्या जी में भारत की श्रद्धा के केंद्र भगवान श्रीरामचंद्र जी के मंदिर निर्माण के शुभारंभ के साथ अब जाकर हिन्दू समाज के आत्मगौरव का वनवास भी खत्म हो रहा है। यह कोई साधारण मंदिर नहीं है, भारत के स्वाभिमान का प्रतीक है। इसलिए यह क्षण सामान्य नहीं है, ऐतिहासिक अवसर है। गौरव की अनुभूति से भर जाने का समय है। इस अवसर के मर्म को समझना है तो वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए भारतीय समाज के अंतर्मन में झांकना चाहिए। इस समय कोरोना महामारी के कारण समाज एक गहरे संकट का सामना कर रहा है लेकिन इस सबके बाद भी जब से मंदिर निर्माण की तिथि घोषित हुई है, उसका अंतर्मन प्रफुल्लित है। उसकी आँखों में एक चमक है। हर्षित होकर वह आज के दिन की प्रतीक्षा कर रहा है। भारत में ही नहीं, अपितु विश्व में जहाँ कहीं भारतीय मन बसता है, वहाँ पाँच अगस्त की प्रतीक्षा है। सब अपने अंदाज से इस तिथि को विशेष बनाने का प्रबंध कर रहे हैं। मानो, समूचा विश्व इस समय राममय हो गया है। उत्साह ऐसा है कि मानो आज ही श्रीरामचंद्र अपने वनवास से लौट रहे हैं। यह वनवास ही तो था कि करोड़ों हृदय में बसने वाले श्रीराम अपनी ही जन्मभूमि पर टाट में विराजे थे। अब समय आ गया है कि राक्षसी प्रवृत्तियों के पराभव के बाद भव्य मंदिर में अपने रामजी ठाठ से विराजेंगे। 
आज जब यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत मंदिर निर्माण के कार्य हेतु भूमिपूजन करेंगे, तो एक सपना साकार होगा। इस तरह का उदाहरण पूरे विश्व में कहीं नहीं मिलेगा कि बहुसंख्यक समाज ने अपने ही आराध्य के मंदिर के लिए पाँच शतक का संघर्ष किया। अन्यत्र तो यही देखने को मिलता है कि जैसे ही मूल समाज के हाथ में सत्ता आती है, वह अपने प्रतीकों को स्थापित करने में देरी नहीं करता। औपनिवेशिकता एवं कलंक के प्रतीकों को ढहाने में वह कोई संकोच नहीं करता। लेकिन, हिन्दू समाज वैसा नहीं है। वह बदले की भावना से भरा हुआ नहीं है। अन्यथा अयोध्या में कब का श्रीराम मंदिर बन गया होता। हिन्दू समाज तो सत्य की पुनस्र्थापना के लिए संघर्ष कर रहा था। उसको यह भी साबित करना था कि उसका पक्ष सत्य का है। वह सही मायनों में राम का उत्तराधिकारी समाज है, जो कंटकों पर चल कर भी स्वयं को प्रमाणित करता है। 

आज जिस क्षण के हम सब साक्षी होने जा रहे हैं, उसको उपस्थित कराने में सहस्त्रों रामभक्तों का बलिदान शामिल है। यह क्षण उन सब बलिदानी रामभक्तों के प्रति भी श्रद्धा से नतमस्तक होने का अवसर है। यह स्वीकार करना चाहिए कि वर्षों से चले आ रहे बिखरे संघर्ष एवं प्रयासों को विश्व हिंदू परिषद एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने एकजुट किया। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के कारण हिन्दू समाज की हुंकार को न केवल सबने सुना अपित सब हिन्दुओं के सामुहिक आने से समाज का जो विराट स्वरूप दिखाई दिया, उसके कारण सबने गंभीरता से ध्यान भी दिया। यह भी स्वीकार करना चाहिए कि यदि 2014 में राजनीतिक परिवर्तन नहीं होता, भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सरकार में नहीं आती, तब संभव है कि आज भी यह मामला न्यायालय में अटका होता। भाजपानीत सरकार ने न्यायालयीन प्रक्रिया में आगे बढ़कर सहयोग किया है। जबकि पूर्ववर्ती सरकारों ने न्यायालय प्रक्रिया में उदासीनता ही दिखाई। बहरहाल, आज उस कड़वे अनुभव को स्मरण करने का दिन नहीं है। आज तो उत्साह और उल्लास का दिन है। शुभ दिन है। सही मायने में आज ‘भारत की नियति से भेंट’ का दिन है, जब भारत नव प्रभात में, नयी रोशनी में, जगमग उजाले में, स्वाभिमान के साथ सुशोभित होगा। सकल जगत इस क्षण का साक्षी बनेगा।

यह भी देखें - 


रविवार, 19 जुलाई 2020

लव जिहाद की सच्ची कहानियों का दस्तावेज है 'एक मुखौटा ऐसा भी'

डॉ. वंदना गांधी
समाजशास्त्र की शिक्षिका हैं। समाज में चल रही गतिविधियों और उनके पीछे के एजेंडे को वह बहुत बारीक से समझती हैं। जब उन्होंने प्रेम की आड़ में चल रहे 'लव जिहाद' की नब्ज टटोलने की कोशिश की तो उनका सामना ऐसे सच से पड़ा, जो बहुत डरावना है। अपने कहानी संग्रह 'एक मुखौटा ऐसा भी' में उन्होंने 15 सच्ची कहानियों के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि कैसे प्रेम का मुखौटा लगा कर हिंदू युवतियों को निशाना बनाया जा रहा है। उनका जीवन बर्बाद किया जा रहा है। इनमें छह कहानियां मध्यप्रदेश की हैं और शेष भारत के विभिन्न हिस्सों से ली गई हैं। लेखिका का कहना है कि वह कई परिवारों और पीडि़त युवतियों से प्रत्यक्ष मिली हैं और उनके दर्द को समझने का प्रयास किया है। 
          धरती पर सबसे अधिक पवित्र कुछ है तो वह प्रेम है। प्रेम के सभी रूप मनुष्य के जीवन को सुंदर बनाते हैं। यह शाश्वत सत्य है कि जिसको किसी प्रकार जीतना संभव न हो, उसे प्रेम जीता जा सकता है। प्रेम में एक-दूसरे पर अटूट भरोसा हो जाता है। इस अटूट भरोसे के कारण ही कई बार प्रेम के मुखौटे के पीछे छिपी घिनौनी सूरत को हम देख नहीं पाते हैं। जब यह मुखौटा हटता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। कहानीकार डॉ. वंदना गांधी की पुस्तक निश्चित ही बहुत देर होने से पहले ऐसे घिनौने चेहरों से मुखौटे नौंचने का कार्य करेगी। उनकी यह पुस्तक हिंदू युवतियों को सावधान करती है कि उन्हें जरा एक बार अच्छे से पड़ताल करनी चाहिए कि वह जिसे प्रेम समझ रही हैं, वह वास्तव में प्रेम ही है या कुछ और। 
         डॉ. वंदना गांधी की यह कहानियां बताती है कि यह सिर्फ प्रेम में धोखे की दास्तां मात्र नहीं है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को छिन्न करने वाला पूरा एक षड्यंत्र है। अब यह कोई छिपा हुआ षड्यंत्र नहीं है कि हिंदू युवतियों का धर्मांतरण करने के लिए सुनियोजित ढंग से 'लव जिहाद' शुरू किया गया है। तथाकथित प्रगतिशील बंधु इसे भाजपा और आरएसएस का राजनीतिक एजेंडा कह कर खारिज कर सकता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा या आरएसएस से भी पहले 'लव जिहाद' शब्द का उपयोग वर्ष 2009 में न्यायमूर्ति केटी शंकरन ने किया था। केरल हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति केटी शंकरन ने मुस्लिम लड़के और हिंदू युवती की शादी के मामले की सुनवाई करते समय कहा था कि देश में लव जिहाद चल रहा है। बाद में, केरल से चर्चा में आए लव जिहाद के मामले देश के कई हिस्सों से भी सामने आए, जो स्पष्टतौर पर न्यायमूर्ति केटी शंकरन के कहे को सत्य सिद्ध करते हैं। यह पुस्तक भी लव जिहाद की ऐसी कहानियां का संग्रह है। पुस्तक यह स्पष्ट करती है कि यह किसी का राजनीतिक एजेंडा हो या न हो, किंतु यह एक सामाजिक संकट जरूर है। इस पर राजनीतिक बहस कम और सामाजिक दृष्टि से विमर्श अधिक होना चाहिए। 
          मुस्लिम समाज भी कोरी कल्पना कह कर 'लव जिहाद' नकार नहीं सकता। यथार्थ में क्या है? यह भी मुस्लिम समाज को देखना होगा। घटनाएं और मुस्लिम समाज का व्यवहार तो यही बयां करता है कि मुस्लिम समाज का कट्टरपंथी धड़ा 'लव जिहाद' की अवधारणा पर काम तो कर रहा है। वरना क्या कारण है कि मुस्लिम युवक से विवाह करने वाली प्रत्येक लड़की को इस्लाम कबूल करना पड़ता है? मुस्लिम लड़का क्यों नहीं हिंदू धर्म अपनाता? यह कैसा प्रेम है कि हिंदू लड़की को ही अपने धर्म का त्याग करना पड़ता है? हिंदू लड़की के सामने इस्लाम अपनाने के अलावा कोई रास्ता नहीं छोडऩा, लव जिहाद नहीं तो क्या है? यह तो स्पष्टतौर पर धर्मांतरण का तरीका है। ज्यादातर मामलों में यह भी देखने में आता है कि युवक अपनी मजहबी पहचान छिपा कर हिंदू लड़की से मुलाकात बढ़ाता है। झूठ की बुनियाद पर बनाया गया संबंध प्रेम कतई नहीं हो सकता। 
          पुस्तक 'एक मुखौटा ऐसा भी' निश्चित तौर पर अपने उद्देश्य को पूरा करने में सफल होगी। एक षड्यंत्र के विरुद्ध जागरूकता लाने में यह पुस्तक सहायक सिद्ध होगी। डॉ. गांधी कहती हैं कि लव जिहाद की खौफनाक हकीकत सामने लाकर उन्हें बहुत संतोष है। यह किताब कॉलेज छात्राओं के लिए गीता साबित होगी। हर युवती को इस किताब को जरूर पढऩा चाहिए। अर्चना प्रकाशन को साधुवाद कि उसने ऐसे विषय पर पुस्तक प्रकाशित करने का साहस दिखाया, जिस पर दुर्भाग्यपूर्ण राजनीति हो रही है। इस संबंध में अर्चना प्रकाशन के ट्रस्टी ओमप्रकाश गुप्ता कहते हैं कि लव जेहाद की सच्ची घटनाओं पर देश में यह पहली किताब है। इस किताब में उन युवतियों की पीड़ा को उजागर किया गया है, जो गलत कदम उठाने के बाद अब पछता रहीं हैं। दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में विमोचित इस कृति ने पर्याप्त चर्चा प्राप्त की है।

पुस्तक : एक मुखौटा ऐसा भी (लव जिहाद पर केंद्रित कहानी संग्रह) 
लेखक : डॉ. वंदना गांधी
मूल्य : 80 रुपये (पेपरबैक)
पृष्ठ : 86
प्रकाशक : अर्चना प्रकाशन, 
17, दीनदयाल परिसर, ई-2, महावीर नगर, भोपाल
दूरभाष – 0755-2420551

मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

साधुओं की निर्मम हत्या, आक्रोश में हिंदू समाज

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से सटे पालघर में बीते गुरुवार को ऐसी घटना घटी, जिसने सभी को अंदर तक झकझोर कर रख दिया। भीड़ द्वारा दो साधुओं सहित तीन लोगों की पीट-पीट कर हत्या करने की घटना से हिंदू समाज आक्रोश में है। उसका आक्रोश महाराष्ट्र सरकार की लचर कानून व्यवस्था के साथ ही उन तथाकथित बुद्धिजीवियों के प्रति है, जिन्होंने साधुओं की हत्या पर चुप्पी साध रखी है। देश के किसी भी कौने में मुस्लिम समुदाय के किसी व्यक्ति के साथ यदि इस तरह की घटना हो जाती, तो देश में अब तक हंगामा मच गया होगा। अवार्ड वापसी गैंग और उनके सहयोगी आसमान सिर पर उठा लेते। सिनेमा जगत के कुछ चिह्नित कलाकारों को भारत में भय लगने लगता। लेकिन हैरत की बात है कि महाराष्ट्र के सबसे प्रमुख शहर मुंबई से सटे पालघर में दो साधुओं की हत्या हो जाती है और तीन दिन तक देश को इस घटना के विषय में पता ही नहीं चलता है। यह भी विचार करने की बात है कि एक और देशभर में कोरोना लॉकडाउन है तब पालघर में यह भीड़ एकत्र कैसे हो गई? 
          लगभग 200 लोगों की भीड़ ने निर्दोष और असहाय साधुओं सहित उनके वाहन चालक की हत्या की है। वीडियो देखने से साफ समझ आ रहा है कि भीड़ साधुओं की एक बात भी सुनने को तैयार नहीं थी। वीडियो में बर्बरता स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती है। नि:संदेह उस भीड़ में कोई भी मनुष्य नहीं था, सब पर हैवानियत हावी थी। सबसे अधिक शर्मनाक बात यह है कि महाराष्ट्र पुलिस की भी परवाह भीड़ को नहीं थी। पुलिस के सामने उस भीड़ ने हिंदू साधुओं और वाहन चालक की निर्ममता से हत्या की। पुलिसकर्मियों ने अपने कर्तव्य पालन के लिए जरा भी साहस नहीं दिखाया है। यह स्थिति बताती है कि महाराष्ट्र सरकार में अराजक तत्व बेलगाम हैं। पुलिस तंत्र पूरी तरह फेल है। 
          साधु ने रक्षक समझकर बड़ी आशा के साथ पुलिसवाले का हाथ थामा था, लेकिन दुर्भाग्य है कि महाराष्ट्र की कायर पुलिस ने साधु को उन नरपिशाचों के बीच छोड़ दिया। इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस की भूमिका भी संदिग्ध है। अपराधियों के साथ ही मौके पर उपस्थित पुलिसवालों के विरुद्ध भी कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए। जब वे किसी नागरिक की सुरक्षा ही नहीं कर सकते तब उन्हें पुलिस में रहने का कोई अधिकार नहीं है। 
          बताया जा रहा है कि उस क्षेत्र में बच्चा चोर की अफवाह फैली हुई थी। पुलिस ने कुछ दिन पूर्व ही दो चिकित्सकों को भी हिंसक भीड़ के चंगुल से बचाया था। प्रश्न है कि जब वह क्षेत्र इतना संवेदनशील था, तब पुलिस ने अतिरिक्त सतर्कता क्यों नहीं बरती? पुलिस ने पहले ही क्यों नहीं हिंसक भीड़ के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की। यदि पुलिस ने पहले ही वहाँ के लोगों को कानून का पाठ पढ़ा दिया होता तो आज निर्दोष हिंदू साधु जीवित होते। 
           दरअसल, पालघर के उस क्षेत्र में हिंदू विरोधी ताकतें सक्रिय हैं। इसलिए भी यह घटना हुई। वरना गेरूए वस्त्रधारी बुजुर्ग को देखकर भीड़ इस तरह अमानुष न होती। कम्युनिस्ट और ईसाई मिशनरियों ने वहाँ हिंदू विरोध को हवा दी है। विश्व हिंदू कोंकण प्रांत के सहमंत्री और प्रवक्ता श्रीराज नायर ने इस संबंध में बताया है कि यह क्षेत्र जनजाति बाहुत्य है। कुछ वर्ष पहले तक पालघर ठाणे जिले का हिस्सा हुआ करता था, अब पालघर जिला बन चुका है। यहाँ ईसाई मिशनरियां और वामपंथी ब्रिगेड हिंदुत्व के विरोध में वातावरण बनाने के लिए सक्रिय हैं। इसलिए किसी षड्यंत्र की बात से इनकार नहीं किया जा सकता। हिंदू साधुओं और उनके वाहन चालक के नृशंस हत्याकांड की गंभीरता से जाँच होनी चाहिए, जो भी इस षड्यंत्र/हत्याकांड में शामिल हैं, उन्हें फांसी मिलनी चाहिए। बाला साहेब ठाकरे की विरासत पर रत्तीभर गौरव हो तो मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को हत्याकांड की जाँच में तीव्रता से करा कर हिंदू समाज को न्याय देना चाहिए। 

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

लोकनायक श्रीराम


मर्यादापुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम भारत की आत्मा हैं। राम भारतीय संस्कृति के भव्य-दिव्य मंदिर के न केवल चमकते शिखर हैं, अपितु वे वास्तव में उसके आधार भी हैं। इसलिए राम का जीवन उनके समय से लेकर आज तक प्रासंगिक है। उनका जीवन प्रकाश स्तम्भ की तरह है, जो अंधेरे में हमारा मार्ग प्रशस्त करता है। संसार का ऐसा कोई प्रश्न नहीं है, जिसका व्यवहारिक आदर्श उत्तर राम ने अपने आचरण से नहीं दिया हो। उनके जीवन में सारा जग समाया हुआ है। बाबा तुलसीदास लिखते हैं- ‘सिय राम मय सब जग जानी, करहु प्रणाम जोरी जुग पानी।’ राष्ट्र एवं समाज जीवन की दिशा क्या होनी चाहिए, यह रामकथा में राम के जीवन से अनुभूत की जा सकती है। वह ऐसे नरश्रेष्ठ या अवतार हैं, जिन्होंने वाणी से नहीं अपितु आचरण से जीवनदर्शन को प्रस्तुत किया। इसलिए वह सीधे लोक से जुड़ते हैं। असाधारण होकर भी अपने साधारण जीवन से समूचे लोक का नेतृत्व करते हैं। राम भारतीय संस्कृति के ऐसे नायक हैं, जिन्होंने समाज के सुख-दु:ख और उसकी रचना को नजदीक से देखा-समझा। अयोध्या के राजकुमार-राजा से कहीं अधिक बड़ी भूमिका में राम हमें एक ऐसे जननायक के रूप में दिखाई पड़ते हैं, जिन्होंने उत्तर से दक्षिण तक दुष्ट राजाओं के आतंक से भयाक्रांत भारतीय समाज के साहस को जगाया और उन्हें एकजुट किया। अन्याय के विरुद्ध प्रतिकार और पराक्रम का बल दिया। राष्ट्र के सोये हुए भाग्य को जगाने का काम लोकनायक करते हैं, वहीं प्रभु राम ने किया। 
          शक्तिशाली राज्य अयोध्या के महाराज दशरथ के वीर पुत्र और भावी सम्राट होने मात्र से राम जनता के नायक नहीं हो जाते। वह अपने व्यक्तित्व को इस प्रकार गढ़ते हैं कि जनता उन्हें स्वाभाविक तौर पर अपना नायक मानती है। जनमानस में राम के प्रति कितना समर्पण था, उनके प्रति कितनी आस्था-भक्ति थी, व्यापक स्तर पर उसका पहला प्रकटीकरण तब होता है, जब राम अयोध्या का भव्य महल छोड़कर वन की ओर निकलते हैं। अयोध्या के समस्त मार्ग अवरुद्ध हो गए हैं। राम को रोकने के लिए जनसैलाब उमड़ आया है। रथ के आगे लोग लेट गए हैं। राम उनसे दूर जाएं, अयोध्या का कोई भी जन यह स्वीकार करने को तैयार नहीं। अयोध्या में आर्तनाद छा गया। यह अगाध श्रद्धा, अपनत्व, ममत्व, स्नेह और भक्ति राम ने अपने आचरण से कमाई थी। अयोध्या का हाल देखकर भरत अपने भाई को वापस लाने के लिए चित्रकूट में पहुँचते हैं। राम से लौटकर चलने के लिए मनुहार करते हैं। करबद्ध प्रार्थना करते हैं। किंतु, राम को मर्यादा की स्थापना करनी है। वह भरत को मना कर देते हैं। परंतु, अयोध्या का क्या, जो दशरथ के बाद राम की है। राम ही अयोध्या को नेतृत्व दे सकते हैं। क्योंकि, अयोध्या की जनता सिर्फ ‘रामराज्य’ चाहती है। राम के विरह की अग्नि अभी ठण्डी भी कहाँ हुई थी? ऐसे में भरत स्वप्न में भी अयोध्या के सिंहासन पर बैठने की सोच नहीं सकते। भाई राम के प्रति भी भरत के मन में जो श्रद्धा है, वह भी इसकी अनुमति नहीं देती। भले ही माता कैकयी भरत को राजा के रूप में सिंहासन पर बैठे देखना चाहती थीं। यदि किसी दबाव में भरत यह करते तो जनमानस उनके विरुद्ध हो सकता था। अयोध्या को सिर्फ राम संभाल सकते थे। इसलिए भरत ने राम की चरणपादुकाएं लीं और अयोध्या लौट गए।  
          महल छोड़कर राम जब वन पहुँचते हैं, तब उन्हें ज्ञात होता है कि समाज किन कठिनाइयों से गुजर रहा है। हालाँकि, गुरु वशिष्ठ उन्हें पहले भी समाज की समस्याओं से साक्षात्कार करा चुके थे। समाज को अत्यंत समीप से देखने के बाद राम उसे संगठित और जागृत करना चाहते थे। इसलिए भी संभव है कि राम अयोध्यावासियों और अपने प्रिय भाई भरत की प्रार्थनाओं को अस्वीकार कर देते हैं। वह साधारण जीवन जी कर समाज के सामने अनेक प्रकार के उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते हैं। वह चाहते तो वन में किसी एक जगह सुंदर और साधन-सम्पन्न कुटिया बना कर रह सकते थे। लेकिन, उन्होंने वनगमन को राष्ट्र निर्माण के एक अवसर में बदल दिया। अपना हित छोड़ा, कष्ट सहन किए। सरलता को छोड़ा, कठिनता को चुना। आराम का त्याग किया, परिश्रम को चुना। वनवास के दौरान राम ने व्यापक जनसंपर्क किया। वनवासियों को अपने साथ जोड़ा। उन्हें अपना बनाया। सामान्य व्यक्ति जिस संघर्ष भरे जीवन को जी रहा था, उसी को राम ने भी अपनाया। इसलिए वन-ग्राम में रहने वाले सब लोगों के साथ उनका आत्मीय और विश्वास का संबंध जुड़ता। 
          वनवास खत्म होने में केवल छह-सात माह ही बचते हैं, तब माता जानकी का अपहरण रावण ने कर लिया। राम ने ऐसे कठिन समय में भी अयोध्या, मिथिला या फिर अन्य किसी मित्र राज्य से सहायता नहीं ली। वह समाज को संदेश देना चाहते थे कि समाज की एकजुटता से बिना साधन के भी रावण जैसे अत्यधिक शक्तिशाली आताताई को भी परास्त किया जा सकता है। संगठन में ही वास्तविक शक्ति है। अत्याचारी और अन्यायी ताकतों का सामना करने के लिए राज्य की सशस्त्र सेना ही आवश्यक नहीं है। हम अपनी शक्ति को एकत्र कर भी दुष्टों को धूल चटा सकते हैं। चूँकि वह मानते थे- ‘यथा हि कुरुते राजा प्रजा तमनुवर्तते’ (उत्तरकाण्ड, सर्ग ४३, श्लोक १९)। अर्थात् प्रजा अपने राजा का अनुसरण करती है। यदि राम ने सेना बुला कर रावण का अंत किया होता, तब जनमानस में ‘संगठन में शक्ति है’ का भाव कभी नहीं आ पाता, तब शायद समाज में पराक्रम का भाव नहीं जाग पाता, तब शायद सामान्य समाज अपने साहस और कौशल को हथियार नहीं बना पाता, अन्याय के सामने सिर उठाने का साहस नहीं कर पाता। वह बाहुबलियों द्वारा पददलित होना, अपना भाग्य समझ लेता। राम ने लोगों का संगठन कर उसे शक्तिशाली सेना का स्वरूप देकर समाज का भाग्य बदल दिया। उन्होंने समाज में संघर्ष और आत्मविश्वास का बीज बो दिया। राम ने आने वाले भविष्य के लिए उदाहरण प्रस्तुत कर दिया कि कितना भी बलशाली दुष्ट शासन हो, संगठित समाजशक्ति द्वारा उसका प्रतिकार किया जा सकता है। अन्यायपूर्ण शासन को जनशक्ति उखाड़ कर फेंक देती है। संगठित जनसमूह के सामने साधन-सम्पन्न दुष्ट ताकत कमजोर पड़ जाती है। अंत में विजय समाज के हिस्से आती है। 
          प्रभु राम की ईश्वरीय अवधारणा से इतर, रामकथा ऐसे जननायक की कहानी है, जिसने संपूर्ण भारत को एकसूत्र में पिरोया, समाज के विभेद को समाप्त किया, समाज में मूल्य एवं आदर्श स्थापित किए। आज भी भारत राम के नाम पर एक है। राम ऐसे लोकनायक हैं, जो सिर्फ भक्त शिरोमणि वीर हनुमान के सीने में ही नहीं बसते, वरन भारत के बच्चे-बच्चे में राम की छवि दिखती है। राम ऐसे जननायक हैं, जो आज भी प्रत्येक संकट में हमें सहारा देते हैं। उनका जीवन हमें कठिन से कठिन संकटों का सामना करने की प्रेरणा देता है। लोकनायक होने के लिए किस तरह का संकल्प चाहिए, यह राम के संपूर्ण जीवन से स्पष्ट हो जाना चाहिए। यद्धपि महाकवि भवभूति ने अपने नाटक ‘उत्तररामचरित’ में स्वयं प्रभु राम से वक्तव्य दिलाया है- “स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि, आराधनाय लोकस्य मुंचतो नास्ति मे व्यथा।” अर्थात् राम कहते हैं कि लोक की आराधना के लिए मुझे अपने स्नेह, दया, सौख्य और यहाँ तक कि जानकी का भी परित्याग करने में भी कोई व्यथा नहीं होगी। हमको ज्ञात है कि राम ने लोक की सेवा के लिए फूलों की सेज छोड़ कर कंटकाकीर्ण मार्ग चुना। अपना सर्वस्व त्यागा। राम सुखपूर्वक अपना जीवन बिता सकते थे लेकिन उन्होंने कठिन और कष्टप्रद जीवन को चुना।
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मेरा भारत साक्षात् राजा राम स्वरुप है 



गुरुवार, 10 जनवरी 2019

न्याय में अब देर न हो


- लोकेन्द्र सिंह -
सर्वोच्च न्यायालय में आज फिर श्रीराम जन्मभूमि का मामला आएगा। हिंदुओं की आस्था और भावनाओं से जुड़े इस बहुप्रतीक्षित मामले की सुनवाई के लिए पाँच न्यायमूर्तियों की संवैधानिक पीठ तय हो गई है। हिंदू समाज प्रार्थना कर रहा है कि मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में यह पीठ श्रीराम जन्मभूमि मामले की सुनवाई आज से नियमित करे और शीघ्र ही निर्णय सुनाए, ताकि न्याय की प्रतीक्षा समाप्त हो। इस प्रकरण में न्यायालय का अब तक का रुख देखकर आशंका भी है कि सुनवाई फिर न टल जाए। क्योंकि, मुख्य न्यायाधीश स्वयं भी इसे राजनीतिक तौर पर संवेदनशील मानते हैं और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं अधिवक्ता कपिल सिब्बल पहले ही श्रीराम जन्मभूमि के मामले को 2019 के बाद तक टालने की माँग से लेकर प्रयास तक कर चुके हैं। पिछली बार ही 4 जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले पर मात्र 60 सेकंड तक सुनवाई चली। इस दौरान कोई भी पक्ष अपना तर्क प्रस्तुत नहीं कर सका था। उस दिन मात्र 60 सेकंड में न्यायमूर्ति ने मामले को 10 जनवरी तक टाल दिया था। इससे पहले भी न्यायमूर्ति लोग कह चुके हैं कि श्रीराम मंदिर निर्माण का प्रकरण उनकी प्राथमिकता में नहीं है। इसलिए ही हिंदू समाज आशंकित है कि आज से नियमित सुनवाई प्रारंभ हो सकेगी या मामला फिर से टाल दिया जाएगा।

गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

हिंदू राष्ट्र पर उच्च न्यायालय का अभिमत

- लोकेन्द्र सिंह -
मेघालय के उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय नागरिकता पंजीयन प्रकरण की सुनवाई करते हुए भारत के संदर्भ में जो कहा, उसके बाद देशव्यापी विमर्श खड़ा हुआ। एक ओर कथित सेकुलर बिरादरी उच्च न्यायालय की टिप्पणी से असहज हो गई। उसे संविधान की याद आई। वहीं, दूसरी ओर उच्च न्यायालय की टिप्पणी ने भारत के 'हिंदू राष्ट्र' होने की अवधारणा को पुष्ट किया। उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एसआर सेन ने विभाजन और हिंदुओं पर हुए अत्याचार का जिक्र करते हुए कहा- 'पाकिस्तान ने स्वयं को इस्लामिक देश घोषित किया। चूंकि विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था। इसलिए भारत को भी स्वयं को हिंदू राष्ट्र घोषित करना चाहिए था।' स्पष्ट है कि इस टिप्पणी के बाद देश में दो तरह का विमर्श प्रारंभ होना ही था। जो लोग उच्च न्यायालय की इस टिप्पणी की निंदा कर रहे हैं, उन्हें जरा निरपेक्ष भाव से न्यायमूर्ति के कहे पर चिंतन करना चाहिए। क्या उन्होंने उचित नहीं कहा कि इस देश का विभाजन धर्म के नाम पर किया गया? एक हिस्सा इस्लामिक राष्ट्र के नाम पर बनाया गया तो दूसरा स्वत: ही हिंदू राष्ट्र नहीं बनना चाहिए था?

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

हिंदुत्व का अर्थ

भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण-3
- लोकेन्द्र सिंह 
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 'भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ का दृष्टिकोण' में हिंदुत्व पर बहुत ही महत्वपूर्ण विचार देश के सामने रखे हैं। उनके विचार हिंदुत्व की भारतीय संकल्पना को पूर्ण रूप से स्पष्ट करते हैं। 'हिंदुत्व' गाहे-बगाहे बौद्धिक और राजनीतिक जगत में चर्चा का विषय बना रहता है। दुर्भाग्य से भारत में कुछ ऐसी ताकतें हैं, जो भारतीय अवधारणाओं के प्रति सामान्य जन के मन में घृणा उत्पन्न करने का प्रयास करती रहती हैं। राष्ट्रवाद और हिंदुत्व ऐसे ही शब्द हैं, जिनको लेकर भारत विरोधी विचार से प्रेरित लोग सदैव नकारात्मक ढंग से बात करते हैं। हिंदुओं की नाराजगी से बचने के लिए आजकल उन्होंने 'हिंदुत्व' पर रणनीति बदल ली है। अब वह दो हिंदुत्व बताते हैं- कट्टर हिंदुत्व और सॉफ्ट हिंदुत्व। हिंदुत्व को श्रेणीबद्ध करते समय वह आगे कहते हैं कि आरएसएस का हिंदुत्व कट्टर है। हिंदुत्व को बदनाम करने के लिए चलने वाले इस षड्यंत्र के मुकाबले सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने बहुत ही सहजता से हिंदुत्व के विराट, उदार, सहिष्णु स्वरूप के दर्शन सबको कराए हैं। उन्होंने सकारात्मक ढंग से अपना विचार रखा।