गरिमामयी जीवन जीने के लिए मनुष्य होने के नाते हमारे कुछ अधिकार हैं। वैश्विक स्तर पर मनुष्यों के अधिकारों की रक्षा हो सके, इस उद्देश्य के साथ संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 10 दिसंबर, 1948 को ‘मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा’ की। यह दस्तावेज मानव जीवन, स्वतंत्रता, विचार की अभिव्यक्ति, धर्म, शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों को परिभाषित करता है। भारत के संविधान में भी कई अनुच्छेद मानवाधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। मानवाधिकारों का हनन रोकने, उनकी निगरानी करने एवं इससे जुड़े अन्य मामलों पर हस्तक्षेप करने के लिए राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थाएँ भी गठित की गई हैं। परंतु, विडंबना यह है कि इन संस्थाओं को अन्य समुदायों के मानवाधिकारों की चिंता तो होती है, लेकिन हिंदुओं के मानवाधिकार इन्हें संभवतः दिखाई ही नहीं देते। विश्व के विभिन्न देशों में हिंदुओं के मानवाधिकारों का खुलेआम हनन हो रहा है, लेकिन कहीं कोई घोर आपत्ति सुनाई नहीं देती। एक प्रकार से वैश्विक चुप्पी छाई हुई है। यह स्थिति चिंताजनक है। यह चुप्पी हिंदू समाज के मन में आक्रोश पैदा करती है और सांप्रदायिक भेद भी बढ़ाती है।
गुरुवार, 8 जनवरी 2026
शुक्रवार, 28 नवंबर 2025
भारत के विचार की विजय पताका
श्री अयोध्या धाम में श्रीराम मंदिर पर धर्म ध्वजा की प्रतिष्ठा का यह प्रसंग अविस्मणीय है। यह केवल एक मंदिर पर फहराने वाला ध्वज नहीं है अपितु भारत के विचार की विजय पताका है। सदियों की तपस्या, संघर्ष और आस्था एक होकर भव्य श्रीराम मंदिर के शिखर पर धर्मध्वमजा के रूप में साकार हुई है। वास्तव में, 25 नवंबर, 2025 भारत की सांस्कृतिक चेतना के लिए ‘सार्थकता का दिन’ बन गया। जैसा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि “सार्थकता के इस दिन के लिए जितने लोगों ने प्राण न्योछावर किए, उनकी आत्मा तृप्त हुई होगी। आज मंदिर का ध्वजारोहण हो गया। मंदिर की शास्त्रीय प्रक्रिया पूर्ण हो गई। राम राज्य का ध्वज, जो कभी अयोध्या में फहराता था, जो पूरी दुनिया में अपने आलोक से समृद्धि प्रदान करता था, वह आज धीरे-धीरे ऊपर उठते हुए अपनी आंखों से देखा है। इस भगवा ध्वज पर रघुकुल का प्रतीक कोविदार वृक्ष है। यह वृक्ष रघुकुल की सत्ता का प्रतीक है”।
शनिवार, 4 जनवरी 2025
धर्म की सीख
धार्मिक कहानियां सिखाती हैं जीने की कला
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| AI द्वारा निर्मित प्रतीकात्मक चित्र |
सार्थक और देवकी का परिवार बहुत धार्मिक है। उनके माता-पिता अकसर श्री रामचरितमानस और श्रीमद्भगवत गीता का पाठ करते हैं। एक दिन सार्थक और देवकी अपनी माँ के पास बैठे थे। उनके मन में जिज्ञासा उठी कि मम्मी और पापा धार्मिक किताबें क्यों पढ़ते रहते हैं। एक ही प्रकार की पुस्तक को बार-बार पढ़ने से क्या होता है? दरअसल, सार्थक और देवकी को धर्म-अध्यात्म और भारतीय संस्कृति की उतनी अधिक जानकारी नहीं थी क्योंकि वे जिस स्कूल में पढ़ते हैं, वहाँ के पाठ्यक्रम में भी भारत की कहानियां नहीं पढ़ाई जाती हैं।
गुरुवार, 22 जून 2023
‘गीता प्रेस’ के सम्मान का विरोध करके क्या प्राप्त होगा?
Gita Press Controversy को Exposed करनेवाला यह वीडियो देखिए-
भारत सरकार की ओर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता वाली समिति ने सर्वसम्मति से गीता प्रेस, गोरखपुर को प्रतिष्ठित ‘गांधी शांति पुरस्कार’ देने का निर्णय करके बहुत अच्छा काम किया है। इसी वर्ष गीता प्रेस ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण किये हैं। अपनी इस 100 वर्ष की यात्रा में इस प्रकाशन ने भारतीय संस्कृति की खूब सेवा की है। भारतीयता के विचार को जन-जन तक पहुँचाने में गीता प्रेस का कोई मुकाबला नहीं कर सकता। वर्ष 1923 में स्थापित गीता प्रेस आज विश्व के सबसे बड़े प्रकाशकों में से एक मानी जाती है। इस प्रेस ने अब तक 14 भाषाओं में 41.7 करोड़ पुस्तकें प्रकाशित कर नया कीर्तिमान बनाया है। इनमें से श्रीमद्भगवद्गीता की 16.21 करोड़ प्रतियां शामिल हैं। गीता प्रेस की नीति के कारण श्रीमद्भगवतगीता, श्री रामायण, श्री महाभारत सहित अनेक भारतीय ग्रंथ घर-घर तक पहुँच सके।
मंगलवार, 15 फ़रवरी 2022
हिन्दूहित यानी राष्ट्रहित
भाग्यनगर (हैदराबाद) में चल रहे रामानुजाचार्य सहस्राब्दी समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने जो उद्बोधन दिया है, वह वर्तमान राजसत्ता एवं समाजसत्ता के लिए दिशासंकेत है। उनके उद्बोधन पर संकीर्ण राजनीतिक दृष्टि से नहीं अपितु वृहद भारतीय दृष्टिकोण से चिंतन करने और उसका अनुसरण करने की आवश्यकता है। अपने व्याख्यान में सबसे पहले उन्होंने एक लोककथा के माध्यम से भारतीय समाज को उसके सामर्थ्य से परिचित कराया। भारतीय समाज के सामर्थ्य का ही परिणाम है कि विगत एक हजार वर्षों में अनेक बाह्य आक्रमणों के बाद भी हिन्दू संस्कृति जीवित है। अनेक ताकतों ने हिन्दुओं को नष्ट करने के लिए पूरी ताकत लगा ली लेकिन परिणाम क्या है, सब जानते हैं। इस ओर ध्यान दिलाते हुए उन्होंने कहा कि "हमें खत्म करने के अनेक कोशिशें की गईं लेकिन उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली। अगर हमें खत्म होना होता होता तो पिछले 1000 साल में ऐसा हो गया होता लेकिन लगभग पाँच हजार साल पुराना सनातम धर्म आज भी टिका हुआ है और अक्षुण्ण है। जिन्होंने हिन्दुओं को खत्म करने की कोशिश की वो आज पूरी दुनिया में आपस में संघर्ष कर रहे हैं। इतने अत्याचारों के बाद भी आज हमारे पास मातृभूमि है। हमारे पास संसाधनों की कमी नहीं है इसलिए हमें डरने की जरूरत भी नहीं है"।
शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2022
हिन्दुत्व ही राष्ट्रत्व
एक ओर बाह्य विचारधारा के प्रभाव में कुछ राजनेता और उनके सहयोगी बुद्धिजीवी ‘हिन्दुत्व’ एवं ‘राष्ट्र’ की अवधारणा पर प्रश्न उठाकर उसे नकार रहे हैं। हिन्दुत्व को लेकर उनका विचार अत्यधिक नकारात्मक है। उन्हें जैसे ही अवसर मिलता है, नकारात्मक बातों के साथ हिन्दुत्व को जोड़कर, हिन्दुत्व के प्रति समाज में घृणा का भाव पैदा करने का प्रयास करते हैं। वहीं, दूसरी ओर राष्ट्रीय विचार से अनुप्रमाणित संगठन हैं, जो हिन्दुत्व को भारत का मूल बता रहे हैं। हिन्दुत्व को सही प्रकार से परिभाषित करते हुए उनकी ओर से बताया जाता है कि उसमें सबके लिए सम्मानपूर्वक स्थान है। इस विमर्श के क्रम में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के वक्तव्य को देखा जा सकता है। भाग्यनगर (हैदराबाद) में चल रहे रामानुजाचार्य सहस्राब्दी समारोह में शामिल होने पहुँचे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि “हिन्दुत्व ही राष्ट्रत्व है। इसमें दो मत नहीं है। इस बात को कहने में कोई संकोच नहीं है”।
शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021
सिनेमा के निशाने पर हिन्दू संस्कृति
फिल्म निर्माता प्रकाश झा की विवादित वेबसीरीज ‘आश्रम’ के कारण एक बार फिर आम समाज में यह विमर्श चल पड़ा है कि सिनेमाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं रचनाधर्मिता के निशाने पर हिन्दू संस्कृति ही क्यों रहती है? फिल्मकार अन्य संप्रदायों पर सिनेमा बनाने का साहस क्यों नहीं कर पाते हैं? हिन्दू संस्कृति एवं प्रतीकों को ही अपनी तथाकथित रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए चुनने के पीछे का एजेंडा क्या है? मुस्लिम कलाकार भी अपने धर्म की आलोचनात्मक प्रस्तुति करने की जगह हिन्दू धर्म पर ही व्यंग्य करना पसंद करता है। पिछले दिनों एम्स दिल्ली के विद्यार्थियों ने भी रामलीला का आपत्तिजनक मंचन किया, जिसका निर्देशन शोएब नाम के लड़के ने किया था। हिन्दू बार-बार इन प्रश्नों के उत्तर माँगता है, लेकिन उसको कभी भी समाधानमूलक उत्तर मिले नहीं। परिणामस्वरूप अपमानजनक एवं उपेक्षित परिस्थितियों और चयनित आलोचना एवं चुप्पी ने उसके भीतर आक्रोश को जन्म देना प्रारंभ कर दिया है।
सोमवार, 11 अक्टूबर 2021
निशाने पर कश्मीरी हिन्दू
जम्मू-कश्मीर के घाटी और श्रीनगर के क्षेत्रों में इस्लामिक आतंकी जिस तरह चिह्नित करके हिन्दुओं की हत्याएं कर रहे हैं, उससे पता चलता है कि वह 1990 की तरह हिन्दुओं को भयाक्रांत करके बचे-खुचे हिन्दुओं को भी खदेडऩा चाहते हैं। विवादास्पद अनुच्छेद-370 हटाए जाने के बाद से केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ लेकर अनेक हिन्दू घाटी में नौकरी एवं व्यवसाय करने गए हैं। 1990 में इस्लामिक आतंकवाद से पीडि़त होकर जिन हिन्दुओं को घर छोडऩे पड़े, सरकार उन्हें उनके घर एवं संपत्तियों वापस दिखाने के प्रयास भी कर रही है। मोदी सरकार के यह सब प्रयास इस्लामिक चरमपंथियों को पसंद नहीं आ रहे हैं। यही कारण है कि उन्होंने एक बार फिर यह संदेश देने का प्रयास किया है कि कश्मीर घाटी में हिन्दुओं को जीवित नहीं रहने दिया जाएगा। सरकार को आतंकवादियों की इस चुनौती को गंभीरता से लेना चाहिए।
शुक्रवार, 3 सितंबर 2021
गाय को मिले राष्ट्रीय पशु का दर्जा
भारत में प्राचीनकाल से गाय का बहुत महत्व रहा है। गाय भारतीय संस्कृति की प्रतीक होने के साथ ही अर्थव्यवस्था की धुरी भी रही है। हिन्दुओं के लिए गाय आस्था का केंद्र भी है। यही कारण रहा है कि हिन्दू विरोधी मानसिकता के लोग हिन्दुओं की भावनाओं को आहत करने और उनकी आस्था पर चोट पहुँचाने के लिए गाय की हत्या करने का घिनौना काम करते हैं। देश में एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो गोमांस खाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। इसके पीछे उसकी मंशा उदरपूर्ति नहीं बल्कि हिन्दुओं को दु:ख पहुँचाना की रहती है। रामचंद्र गुहा जैसे बुद्धिजीवी तो मांसाहारी नहीं होने के बाद भी बीफ की प्लेट सोशल मीडिया में शेयर करते हैं, सिर्फ इसलिए ताकि गाय के प्रति श्रद्धा रखने वालों को आहत किया जा सके। केरल के कांग्रेसी चौराहे पर गाय काटकर तो कम्युनिस्ट ‘बीफ फेस्ट’ का आयोजन करके हिन्दुओं की आस्था पर सीधे चोट पहुँचाते हैं। ऐसे ही अनेक बुद्धिजीवी लोग गोमांस खाने को अपना मौलिक अधिकार समझते हैं। इलाहबाद उच्च न्यायालय ने ऐसे लोगों को आईना दिखाने का काम किया है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि गोमांस खाना किसी का मौलिक अधिकार नहीं हो सकता। अपितु गो-संरक्षण को माननीय न्यायालय ने मौलिक अधिकार कहा है।
बुधवार, 21 जुलाई 2021
भारत की संस्कृति के साक्षी
भारत की मूल संस्कृति क्या है? इसको लेकर दिग्भ्रिमित करने वाले अनेक विमर्श चलते रहते हैं। एक शायर ने तो यहाँ तक कह दिया कि यहाँ सब किराएदार हैं, कोई मकान मालिक नहीं। उनके कहने का आशय यही था कि भारत में अलग-अलग समय में लोग आते गए और बस गए। भारतीय मूल का कोई नहीं है। दरअसल, वे आर्य-द्रविणवाली कपोल कल्पना के लिए गढ़े गए झूठ के या तो वाहक थे या फिर उसके फेर में फंस गए होंगे। भारत के मूल लोग कौन थे, उनकी संस्कृति क्या थी, जीवन पद्धति क्या थी, धर्म क्या था, यह सब कोई शायर नहीं बता सकता, बल्कि भारत की मिट्टी इसका स्वयं जवाब देती है कि उसमें किसका रक्त शामिल है। अयोध्या से लेकर मथुरा, राखीगढ़ी से लेकर उज्जैन तक खुदाई में भारतीय संस्कृति के प्रमाण मिलते हैं।
सोमवार, 31 मई 2021
पुण्यश्लोक राजमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर
देखें यह वीडियो : Rajmata Devi Ahilyabai Holkar
अहिल्याबाई का जन्म 31 मई, 1725 को महाराष्ट्र के जिले अहमदनगर के चौंढ़ी ग्राम तालुका जामखेड़ा में हुआ था। उनके पिता माणकोजी शिंदे और माता सुशीलाबाई बहुत धार्मिक थे। अपने माता-पिता से ही धार्मिक और संवेदनशील होने का संस्कार अहिल्याबाई को विरासत में मिला।
वर्ष 1733 में पुणे में हिंदू विधि-विधान से उनका विवाह श्रीमंत खण्डेराव के साथ सम्पन्न हुआ। उनको आशीर्वाद देने के लिए बाजीराव पेशवा अपने परिवार के साथ आए थे। एक साधारण परिवार की दिव्य कन्या अब इंदौर के राजमहल की रानी हो गई।
शुक्रवार, 7 अगस्त 2020
बंधुत्व का प्रतीक श्रीराम मंदिर
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| श्रीराम जन्मभूमि, अयोध्या मंदिर में विराजे रामलला के दर्शन |
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का जीवन भारतीय विचार की अभिव्यक्ति है। श्रीराम ने अपने जीवन से सामाजिक समरसता, एकात्म एवं बंधुत्व का संदेश दिया है। आज से हजारों वर्षों पूर्व त्रेतायुग में उन्होंने भारत को एक छोर से दूसरे छोर तक एकसूत्र में पिरोया। प्रभु श्रीराम ने सामाजिक समरसता को न केवल अपने शासन की आधारशिला बनाया, बल्कि उनके जीवन का सार भी यही है। इसलिए समूचा समाज राम का है और राम सबके हैं। आज के युग में उनके संदेश का केंद्र बनेगा अयोध्या में बनने जा रहा श्रीराम मंदिर। भारत का यह मंदिर बंधुत्व का प्रतीक होगा। पाँच अगस्त को श्रीराम की जन्मभूमि पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने भूमिपूजन के बाद अपने उद्बोधनों से यही संदेश दिया।
श्रीराम मंदिर के संघर्ष को रेखांकित करते हुए दोनों महानुभावों ने कहना यही था कि श्रीराम मंदिर भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत का द्योतक होगा, अनंतकाल तक पूरी मानवता को प्रेरणा देगा और मार्गदर्शन करता रहेगा। यह भारत को जोडऩे का काम करेगा। श्रीराम मंदिर ने यह कार्य अपने निर्माण से बहुत पहले, आंदोलन के दौरान ही प्रारंभ कर दिया था। श्रीराम मंदिर आंदोलन में समूचे भारत से सभी वर्गों के लोग शामिल हुए। सबको स्मरण है कि अशोक सिंघल जी के नेतृत्व में विश्व हिंदू परिषद के प्रयासों से 1989 में श्रीराम जन्मभूमि के शिलान्यास का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ था, जिसका श्रेय अचानक से भगवा रंग में रंगी कांग्रेस लूटने का प्रयास कर रही है। शिलान्यास का वह कार्यक्रम शुद्ध तौर पर विश्व हिंदू परिषद का कार्यक्रम था, जिसमें अनेक पूज्य संत शामिल हुए थे। उस दिन भी सामाजिक समरसता का उदाहरण सबने देखा था, जब अनुसूचित जाति के कामेश्वर चौपाल के कर कमलों से शिलान्यास पूजन हुआ।
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| भगवान श्रीराम के दरबार में दंडवत प्रणाम करते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी |
5 अगस्त, 2020 को जब श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण कार्य का शुभारंभ हो रहा था, तब भी कार्यक्रम में लगभग 36 परंपराओं, पंथ-संप्रदायों के संत उपस्थित थे, जिनमें प्रमुख हैं- दशनामी सन्यासी परंपरा, रामानुज, निंबार्क, वल्लभ, कृष्ण प्रणामी आदि संप्रदाय निर्मले संत, लिंगायत, रविदासी संत, जैन, सिख, मत पंथ, स्वामीनारायण, चिन्मय मिशन, रामकृष्ण मिशन, एकनाथी, वनवासी संत, सिंधी संत, रामानंदी वैष्णव, माधवाचार्य, रामस्नेही, उदासीन, कबीरपंथी, वाल्मीकि संत, आर्य समाजी, बौद्ध, नाथ परंपरा, गुरु परंपरा, आचार्य सभा के प्रतिनिधि, संत कैवल्य ज्ञान, इस्कॉन, वारकरी, बंजारा संत, आदिवासी गौण, भारत सेवाश्रम संघ, संत समिति एवं अखाड़ा परिषद। इसके अतिरिक्त भी अन्य मत-संप्रदाय के प्रतिनिधि लोग वहाँ उपस्थित रहे।
मंदिर निर्माण के लिए देश की विभिन्न नदियों से जल एवं प्रमुख स्थानों से मिट्टी लाई गई, जिनमें संत रविदास जन्मस्थली, सीतामढ़ी उत्तर प्रदेश से महर्षि वाल्मीकि आश्रम, मध्यप्रदेश के टंट्या भील की पुण्य भूमि, श्री हरमंदिर साहिब अमृतसर पंजाब, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के जन्मस्थान महू की, दिल्ली के जैन लाल मंदिर, वाल्मीकि मंदिर (जहां महात्मा गांधी 72 दिन रहे थे) इत्यादि स्थान प्रमुख हैं। इसलिए बार-बार यह कहा जा रहा है कि यह मंदिर साधारण नहीं है, यह भारत की पहचान बनेगा। निश्चित ही श्रीराम मंदिर विश्व-बंधुत्व का संदेश देने वाला सबसे बड़ा केंद्र बनेगा।
गुरुवार, 6 अगस्त 2020
रामत्व का उद्घोष
मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में जब भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत की उपस्थिति में मंदिर निर्माण कार्य प्रारंभ करने के लिए पूजन किया जा रहा था, तब चहुँ ओर हर्ष व्याप्त था। रामनाम का प्रभाव और हिंदू समाज की सांगठनिक शक्ति का प्रताप है कि राम को काल्पनिक सिद्ध करने की भरसक चेष्टा करने वाले भी राम-नाम जाप कर रहे हैं। यह अद्भुद दृश्य भारत में ही नहीं, अपितु समूची दुनिया में देखे गए। लगभग पाँच सदियों बाद साकार हो रहे स्वप्न को देखने के लिए सारा देश टेलीविजन के सामने बैठा रहा। उसका मन आल्हादित था। प्रत्येक रामभक्त की भौतिक उपस्थिति तो अपने ही घर में टेलीविजन के सामने थी, लेेकिन मन अयोध्या में विचर रहा था। प्रत्येक भारतीय मन की यही स्थिति थी। वह बीती रात से ही दीपोत्सव मना रहा था। मानो उसके राम वनवास पूरा करके अयोध्या लौट रहे हों। अयोध्या भी वैसे ही सजी-धजी थी।
निस्संदेह यदि कारोनो संक्रमण ने लोगों के पैर न थामे होते तो पाँच अगस्त को अयोध्या में पग रखने की भी जगह न होती। महाकुंभ का आयोजन होता। अभी बेशक लोग इस महत्वपूर्ण और गर्व से भरे हुए पल के साक्षी न बन पाए हैं लेकिन राम अनादि से अनन्त तक हैं और समस्त विश्व के राम भक्त राम में ही समाये हुए हैं इसलिए जो जहाँ थे वहीं से मन ही मन तो अयोध्या में उपस्थित हुए। पूर्ण विश्वास है कि तीन वर्ष बाद उन सबको सशरीर राम के प्रांगण में उपस्थित होने का ऐसा ही अवसर मिलेगा। लगभग तीन वर्ष बाद जब श्रीराम का भव्य मंदिर बनकर तैयार हो जाएगा, तब निश्चित ही उसका उद्घाटन कार्यक्रम आयोजित होगा, तब निश्चित ही भारतीय समाज अपनी इस अभिलाषा को पूर्ण कर सकेगा और भव्य मंदिर में दिव्य रामलला के दर्शन करेगा। उस क्षण की भी तो प्रतीक्षा समाज को है, जब भव्य मंदिर के ऊंचे शिखर आसमान को छू रहे होंगे। मंदिर पर लहरा रही विजय पताकाएं भारत की पहचान को प्रकट कर रही होंगी।
पाँच अगस्त की तिथि इतिहास में दर्ज हो गई है। यह रामत्व के उद्घोष का दिन था। भारतीय स्वाभिमान के हिमालय-सा ऊंचा उठने का अवसर था। यह भी शुभ संयोग है कि राम के मंदिर के निर्माण कार्य का शुभारंभ करने का अवसर उन महानुभावों/विचार को मिला, जिसने देशवासियों के मन में रामत्व को जगाया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो व्रत लिया था कि अयोध्या में प्रभु श्रीराम के दर्शन को तभी जाएंगे जब वहाँ मंदिर निर्माण के अपने संकल्प को पूरा करेंगे। यह उनका अकेले का संकल्प नहीं था, असंख्य देशवासियों का संकल्प था, जो अब जाकर फलित हुआ है। कहते हैं कि यदि आपका संकल्प शुभ है तो उसको पूर्ण करने में प्रकृति भी भरपूर सहयोग देती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत वहाँ उन लाखों स्वयंसेवकों के प्रतिनिधि के रूप में दिखे, जिन्होंने राममंदिर आंदोलन में संघर्ष और बलिदान किया। अयोध्या में बनने जा रहा यह श्रीराम मंदिर कोई साधारण मंदिर नहीं होगा, विश्वास है कि यह भारत की पहचान बनेगा।


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