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मंगलवार, 29 अप्रैल 2025

यह लव जिहाद नहीं तो क्या है?

साभार : स्वदेश ज्याेति

भोपाल और इंदौर से लव जिहाद के जिस प्रकार के मामले सामने आए हैं, वे एक खतरनाक प्रवृत्ति की ओर संकेत कर रहे हैं। यह मामले अनिवार्य रूप से उस मानसिकता का संकेत दे रहे हैं जिसमें मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा अपने मजहबी काम के तौर पर हिन्दू और गैर-इस्लामिक युवतियों को साजिश पूर्वक अपने जाल में फंसाया जाता है, उनका शारीरिक-मानसिक शोषण किया जाता जाता है। उसके बाद उन्हें या तो आपराधिक जगत में धकेल दिया जाता है या फिर इस्लाम में कन्वर्ट करके सम्प्रदाय के विस्तार के लिए उनका दुरुपयोग किया जाता है। चिंता की बात यह है कि ये मामले केवल भोपाल और इंदौर तक सीमित नहीं होंगे। मामले की गहराई से पड़ताल की जाए तो इस तरह के गिरोह मध्यप्रदेश के अन्य जिलों में भी सक्रिय मिलेंगे, जो मजहबी मानसिकता से हिन्दू युवतियों को अपना शिकार बना रहे होंगे। इस लव जिहाद के पीछे बड़ा तंत्र है, जिसके तार हमें देशभर में फैले दिखाई देते हैं। फ़िल्म 'द केरल स्टोरी' के माध्यम से पहली बार लव जिहाद की साजिश को बड़े स्तर पर समाज के सामने लाया गया। उससे पहले केरल के उच्च न्यायालय ने 'लव जिहाद' शब्द का पहली बार उपयोग करते हुए, इस प्रवृत्ति पर अपनी चिंता जताई थी। परंतु हमने बीमारी को पहचान करके उसका उपचार करने की बजाय बीमारी को नकारने में अपनी पूरी ऊर्जा खर्च कर दी। भोपाल के प्रकरण में भी पुलिस प्रशासन ने यही गलती की। यदि मीडिया ने खोज-पड़ताल करके इस समाचार को प्रकाशित नहीं किया होता, तब पुलिस मामले को यूँ ही रफा-दफा कर देती। कहना होगा कि हम हर बार इस प्रकार के मामलों में सेकुलर दिखने की चक्कर में शुतुरमुर्ग बन जाते हैं।

शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

हिन्दवी स्वराज्य की आधार स्तम्भ - जिजाऊ माँ साहेब

जिजाऊ मां साहेब की जयंती पौष मास की पूर्णिमा को आती है , ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार 12 जनवरी को जिजाऊ मां साहेब की जयंती मनायी जाती है

जिजाऊ माँ साहेब समाधि स्थल, पाचाड़ में श्रीशिव छत्रपति दुर्ग दर्शन यात्रा

हिन्दवी स्वराज्य के जो आधार स्तम्भ हैं, उनमें से एक है- राजमाता जिजाऊ माँ साहेब। उनके बिना हिन्दवी स्वराज्य के महान विचार का साकार होना संभव नहीं था। बाल शिवा के मन में स्वराज्य का बीज उन्होंने ही रोपा। उस बीज को उचित खाद-पानी एवं वातावरण मिले, इसकी भी चिंता उन्होंने की। रामायण-महाभारत और भारतीय आख्यानों की कहानियां सुनाकर माँ जिजाऊ ने शिवाजी के व्यक्तित्व को गढ़ा। वे ही शिवाजी महाराज की प्रथम गुरु भी थीं। प्रतिकूल परिस्थितियों में और अनेक प्रकार के झंझावातों का सामना करते हुए तेजस्विनी माता ने शिवाजी महाराज को वीरता, साहस, निर्भय, धर्मनिष्ठा, दयालुता, संवेदनशीलता और स्वतंत्रता के संस्कार दिए। जिजाऊ माँ साहेब के वात्सल की छांव का ही आशीष था कि कंटकाकीर्ण मार्ग पर भी शिवाजी महाराज मुर्झाये नहीं अपितु हीरे की तरह चमक उठे।

शनिवार, 10 जून 2023

महिला सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्ध है शिवराज सरकार

 प्रदेश की महिलाओं के बैंक खातों में 10 जून को आएगी ‘लाड़ली बहना योजना’ की पहली किस्त


महिला सशक्तिकरण की दिशा में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की महत्वाकांक्षी ‘लाड़ली बहना योजना’ को लेकर जिस प्रकार का उत्साहजनक वातावरण मातृशक्ति के बीच में बना हुआ है, उससे इस योजना की आवश्यकता एवं महत्व ध्यान में आ रहा है। अभी हाल में ग्वालियर प्रवास के दौरान विभिन्न वर्गों की माताओं-बहनों से बातचीत के बाद दो बातें अनुभव में जुड़ी हैं। एक, महिलाओं के बीच मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता गजब की है। यह मामला केवल लोकप्रियता तक सीमित नहीं है, अपितु उन्हें मुख्यमंत्री पर अटूट विश्वास भी है। दो, उनका मानना है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने महिलाओं के लिए जितनी योजनाएं शुरू कीं, उतनी किसी और ने कभी नहीं की हैं। बेटी के जन्म से लेकर उसके विवाह और उसके बाद के जीवन की भी चिंता सरकार ने की है। शिवराज सरकार बेटी के साथ माँ का ध्यान भी रखती है। नि:संदेह, शिवराज सरकार अपने पहले कार्यकाल से ही स्त्री सशक्तिकरण के लिए प्रयासरत दिखी है। मध्यप्रदेश सरकार की महिला नीति को देखने से ध्यान आता है कि यह सरकार सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं शैक्षणिक रूप से महिलाओं को सशक्त करने के लिए प्रतिबद्ध है। बेटी बचाओ अभियान, लाड़ली लक्ष्मी योजना, स्वागतम् लक्ष्मी योजना, गाँव की बेटी योजना, जननी सुरक्षा कार्यक्रम, कन्या अभिभावक पेंशन योजना, उषा किरण योजना और मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना के अतिरिक्त कई अन्य कार्यक्रम एवं योजनाएं हैं, जिनके माध्यम से सरकार हर कदम पर महिलाओं के साथ खड़ी नजर आती है। स्त्री सशक्तिकरण की इसी शृंखला में ‘लाड़ली बहना योजना’ भी जुड़ गई है।

रविवार, 14 मई 2023

बस 'माँ'

माँ को समर्पित इस कविता को यहाँ सुनिए- बस माँ


सृष्टि को अभिव्यक्त करना हो

शब्दों से

खींचना हो उसका चित्र

शब्दों से

अनुभूति करना हो उसकी

शब्दों से


बेहद आसान है

सृष्टि को अभिव्यक्त करना

उसका चित्र खींचना

उसकी अनुभूति करना

शब्दों से

न्यूनतम शब्दों से

मात्र एक अक्षर से

शब्द से


कह दो, सुन लो, लिख दो

बस ‘माँ’


- लोकेन्द्र सिंह -

(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)


और कविताएं सुनने के लिए चटका लगाएं...

मंगलवार, 2 मई 2023

‘लाडली लक्ष्मी उत्सव’ : बेटियों को प्रोत्साहित करती शिवराज सरकार

भोपाल से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र 'सुबह सवेरे' में 2 मई 2023 को प्रकाशित

मध्यप्रदेश में बेटियों को लेकर एक सकारात्मक एवं भावनात्मक वातावरण बन गया है। आज मध्यप्रदेश की बेटियां खूब पढ़ रही हैं और आगे बढ़ रही हैं। प्रत्येक कार्यक्षेत्र में भी अपना योगदान दे रही हैं। खेल के मैदान हों, या जोखिम भरी एवरेस्ट की चढ़ाई, बेटियों के कदमों को अब रोका नहीं जाता अपितु उन्हें आगे बढ़ाने के लिए सब सहयोगी की भूमिका में हैं। लड़ाकू विमान उड़ानेवाली पहली महिला फाइटर पायलट में भी मध्यप्रदेश की बेटी का नाम शामिल है। बेटियां अपने पग से जल, थल, नभ को नाप रही हैं। मध्यप्रदेश में यह बदलाव अचानक नहीं आया है। बेटियों के लिए बना यह वातावरण ‘संकल्प से सिद्धि’ का उदाहरण है। बेटियों के प्रति संवेदनशील मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक संकल्प लिया कि वे बेटियों को प्रोत्साहित करनेवाला वातावरण बनाएंगे। इसके लिए उनकी पहल पर 16 वर्ष पूर्व 1 अप्रैल 2007 को मध्यप्रदेश सरकार ने ‘लाडली लक्ष्मी योजना’ शुरू की। स्वयं को प्रदेश की बेटियों का ‘मामा’ घोषित करके ‘बेटी बचाओ’ का नारा दिया। मुख्यमंत्री का यह विचार इतना शक्तिशाली एवं प्रभावशाली था कि लोकप्रिय राजनेता नरेन्द्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने इस नारे को राष्ट्र का नारा बना दिया और ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का आह्वान किया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में मध्यप्रदेश की सरकार यहीं नहीं रुकी, अपितु बेटियों को संरक्षण और संबल देने के लिए प्रयास अनेक स्तर पर किए गए। इस सबमें अधिक महत्वपूर्ण है कि उन्होंने इस मुद्दे पर जनता से सीधे और लगातार संवाद किया। जब एक जनप्रिय राजनेता नागरिक समाज से कोई आग्रह करता है, तब उसका सुफल परिणाम आने की संभावनाएं अधिक होती हैं।

बुधवार, 8 मार्च 2023

महिला सशक्तिकरण पर जोर देती शिवराज सरकार

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार ने महिला सशक्तिकरण के उल्लेखनीय प्रयास किए हैं, उसी शृंखला में ‘लाडली बहना योजना’ को देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की इस महत्वाकांक्षी योजना को लेकर आम नागरिकों के बीच प्रतीक्षा भी बहुत थी और चर्चा भी। बहुत से लोग ऐसे भी हैं, जो इसे आगामी चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं। चुनावी वर्ष में सरकार कोई भी पहल करे, उसे चुनाव से जोड़कर देखा जाना स्वाभाविक ही है। परंतु यह अवश्य स्मरण रखना चाहिए कि शिवराज सरकार महिला सशक्तिकरण के लिए प्रारंभ से नवाचार करती रही है। बेटियों की पढ़ाई, उनके पोषण एवं भविष्य में विवाह इत्यादि में आर्थिक सहयोग की दृष्टि से सरकार ने अनेक योजनाएं प्रारंभ की हैं। सरकारी योजनाओं से इतर भी प्रदेश में बेटियों को लेकर सामाजिक सोच में बदलाव लाने का क्रांतिकारी परिवर्तन भी शिवराज सरकार ने किया है। मुख्यमंत्री श्री चौहान अपने भाषणों में नियमित तौर पर बेटियों के प्रति समान और सम्मान का भाव रखने का आग्रह करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में बेटियों के प्रति समाज में जो सकारात्मक वातावरण दिखायी देता है, उसकी अनुभूति सब कर पा रहे हैं।

सोमवार, 3 अक्टूबर 2022

स्वाधीनता आंदोलन में त्याग, बलिदान और साहस की प्रतीक बन गई थी मातृशक्ति

स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका | Role of women in freedom movement


प्रत्येक कालखंड में मातृशक्ति ने भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है। समाज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वह पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चली है अपितु अनेक अवसर पर अग्रणी भूमिका में भी रही है। आज जबकि समूचा देश भारत के स्वाधीनता आंदोलन का अमृत महोत्सव मना रहा है तब मातृशक्ति के योगदान/बलिदान का स्मरण अवश्य करना चाहिए। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के पृष्ठ पलटेंगे और मातृशक्ति की भूमिका को देखेंगे तो निश्चित ही हमारे मन गौरव की अनुभूति से भर जाएंगे। भारत के प्रत्येक हिस्से और सभी वर्गों से, महिलाओं ने स्वाधीनता आंदोलन में हिस्सा लिया। अध्यात्म, सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय होने के साथ ही क्रांतिकारी गतिविधियों में भी महिलाएं शामिल रहीं। यानी उन्होंने ब्रिटिश शासन व्यवस्था को उखाड़ फेंकने और ‘स्व’ तंत्र की स्थापना के लिए प्रत्येक क्षेत्र से भारत के स्वर एवं उसके संघर्ष को बुलंद किया। आंदोलन के कुछ उपक्रम तो ऐसे रहे, जिनके संचालन की पूरी बागडोर मातृशक्ति के हाथ में रही। भारतीय स्वाधीनता संग्राम का एक भी अध्याय ऐसा नहीं है, जिस पर मातृशक्ति के त्याग, बलिदान और साहस की गाथाएं अंकित न हो।

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

त्वरित न्याय

 महिला  अपराधों में लगातार हो रही वृद्धि से मध्यप्रदेश की जनता एवं सरकार, सब चिंतित हैं। अक्टूबर के आखिरी दिन 'बेटी बचाओ' का नारा देने वाले प्रदेश में कोचिंग से पढ़ कर घर जा रही किशोरी के साथ मानसिक तौर पर बीमार लोगों ने सामूहिक दुष्कर्म कर, मध्यप्रदेश की चिंता को भय में बदल दिया था। घटना के बाद पीडि़त किशोरी ने जिस तरह साहस एवं शक्ति दिखाई थी, उसके ठीक उलट व्यवस्था ने कायरता एवं बेशर्मी का प्रदर्शन किया था। समाज को सुरक्षा एवं न्याय का भरोसा देने वाले पुलिस विभाग ने पीडि़त और उसके अभिभावक के साथ जिस तरह का लापरवाही भरा व्यवहार किया था, उससे प्रदेश के सभी अभिभावक भयभीत हो गए थे। सुरक्षा देने में असफल व्यवस्था पीड़िता का दर्द समझने के लिए भी तैयार नहीं दिखा। बल्कि, अपनी खिलखिहट से पीड़िता के जख्मों पर नमक रगड़ने का काम किया गया। किंतु, साहसी लड़की ने बड़ी हिम्मत और धैर्य दिखाया, उसका परिणाम अब अनुकरणीय उदाहरण बन गया है। न्यायालय ने बहुत तेजी से मामले की सुनवाई करते हुए घटना के मात्र 54 दिन बाद ही चारों आरोपियों को दोषी करार देकर मृत्यु तक सलाखों के पीछे रहने का आदेश सुनाया है।

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

सरकार का निर्णय महिलाओं को करेगा सशक्त

 मध्यप्रदेश  के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ी महत्वपूर्ण घोषणा की है। भोपाल में आयोजित महिला स्व-सहायता समूहों के सम्मेलन में मुख्यमंत्री ने कहा है कि महिला स्व-सहायता समूहों को पाँच करोड़ रुपये तक के ऋण पर गारंटी सरकार देगी और तीन प्रतिशत ब्याज अनुदान भी सरकार ही देगी। इसमें कोई दोराय नहीं कि मध्यप्रदेश सरकार अपनी महिला नीति के अंतर्गत महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में प्रयासरत है। इसमें महिला स्व-सहायता समूहों को प्रोत्साहित करने की नीति भी शामिल है। प्रदेश के मुखिया की इस घोषणा से न केवल महिला स्व-सहायता समूहों को प्रोत्साहन मिलेगा, बल्कि महिलाओं के हाथ भी मजबूत होंगे। मुख्यमंत्री की घोषणा के अनुसार महिला स्व-सहायता समूहों को जब 700 करोड़ रुपये के पोषण आहार का कारोबार मिलेगा, तब महिलाओं को आर्थिक ताकत मिलेगी। एक सबल प्रदेश एवं देश के निर्माण में महिलाओं की उपस्थिति आर्थिक क्षेत्र में बढऩी ही चाहिए।

शनिवार, 13 मई 2017

धर्म की आड़ में अधर्म कब तक?

 तीन  तलाक के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने गुरुवार से सुनवाई शुरू कर दी है। तीन तलाक, हलाला और बहुविवाह के विरुद्ध देशव्यापी आंदोलन चला रही महिलाओं को उम्मीद है कि इस बार उन्हें न्यायालय से न्याय मिलेगा। (पढ़ें - महिलाओं के हित में आए निर्णय) मुस्लिम महिलाओं ने न्याय के लिए ईश्वर से प्रार्थना भी शुरू कर दी है। इस सिलसिले में उन्होंने हनुमान मंदिर में हनुमान चालीसा का पाठ भी किया है। बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय भी महिला सम्मान और मुस्लिम धर्म से जुड़े इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रहा है। पहले दिन की कार्यवाही यही बताती है। आश्चर्य है कि न्यायालय को मानवीय और संवैधानिक अधिकारों के मामले में धार्मिक तुष्टीकरण का ध्यान रखना पड़ रहा है। वरना क्या कारण था कि पाँच न्यायमूर्तियों की सबसे बड़ी संवैधानिक पीठ को कहना पड़ा कि वह सबसे पहले यह तय करेगी कि क्या तीन तलाक की परंपरा इस्लाम धर्म का मूल तत्व है? पीठ ने यह भी कहा है कि हम इस मुद्दे पर भी विचार करेंगे कि क्या तीन तलाक सांस्कारिक मामला है और क्या इसे मौलिक अधिकार के रूप में लागू किया जा सकता है? हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय की आगे की कार्यवाही से उम्मीद बंध रही है कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय मिलेगा। न्यायालय ने तीन तलाक के संबंध में अनेक कठोर टिप्पणियाँ की हैं। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि 'तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं को जिंदा दफन करने जैसा है।' मुख्य न्यायमूर्ति जेएस खेहर की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि बहुविवाह मामले में फिलहाल बहस नहीं होगी। पीठ तीन तलाक की संवैधानिकता को परखेगी। कोर्ट ने कहा कि हम इस मुद्दे को देखेंगे कि क्या तीन तलाक इस्लाम धर्म का मूल हिस्सा है? क्या उसे मूल अधिकार के तौर पर लागू किया जा सकता है? कोर्ट ने कहा कि अगर यह साबित तय हो जाता है और कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचता है कि तलाक धर्म का मूल तत्व है तो वह इसकी संवैधानिक वैधता के सवाल को नहीं परखेगा।

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

तीन तलाक पर बोर्ड का ढोंग

 तीन  तलाक शुद्ध तौर पर मुस्लिम महिलाओं के शोषण की व्यवस्था है। तीन तलाक को खत्म करने के लिए देश में व्यापक बहस चल रही है। इस बहस के दबाव का ही परिणाम है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को तीन तलाक पर विचार करने और इस संबंध में एक आचार संहिता जारी करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। क्योंकि मुस्लिम धर्म के तथाकथित ठेकेदारों को पता है कि महिलाएं जागरूक हो चुकी हैं, उनका शोषण अब और नहीं किया जा सकता। देश में मुस्लिम महिलाओं के समर्थन में वातावरण बन गया है। हालाँकि तीन तलाक पर बोर्ड ने महिलाओं के हित की चिंता करने की अपेक्षा ढोंग ही किया है। बोर्ड के ढोंग से उसकी महिला विरोधी मानसिकता की पोल और अधिक खुलकर सामने आ गई है।

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

महिलाओं के हित में आए निर्णय

 पिछले  ढाई साल में तीन तलाक का मसला काफी बड़ा हो गया है। तीन तलाक पर व्यापक बहस प्रारंभ हो चुकी है। हालाँकि, मुस्लिम महिलाओं की ओर से लम्बे समय से तीन तलाक को खत्म करने के लिए आंदोलन चलाया जा रहा है। लेकिन, अब तक उन्हें न्याय नहीं मिला। अब तक की सरकारों ने मुस्लिम महिलाओं की आवाज को न तो सुना और न ही उनका समर्थन किया। वरन् शाहबानो प्रकरण में तो तत्कालीन कांग्रेसनीत केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटकर एक तरह से मुस्लिम महिलाओं को उनकी बदहाली पर छोड़ दिया था। महिलाओं के संघर्ष को उस वक्त ताकत और सफल होने की उम्मीद मिली, जब मई-२०१४ में केंद्र में भाजपानीत सरकार का गठन हुआ। क्योंकि, भारतीय जनता पार्टी सदैव से समान नागरिक संहिता और मुस्लिम महिलाओं की बेहतरी के लिए तीन तलाक को खत्म करने की हिमायती रही है। भाजपा के शीर्ष नेता अकसर अपने भाषणों में मुस्लिम महिलाओं के हित में तीन तलाक को खत्म करने की मांग उठाते रहे हैं। हाल में सम्पन्न उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी तीन तलाक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना था। माना जा रहा है कि उत्तरप्रदेश में भाजपा को जो प्रचंड बहुमत मिला है, उसमें मुस्लिम महिलाओं की बड़ी हिस्सेदारी है।

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

जायज है समान नागरिक संहिता की माँग

 प्र ख्यात लेखिका तसलीमा नसरीन ने जयपुर साहित्य उत्सव (जयपुर लिटरेचर फेस्टीवल) के मंच से एक महत्त्वपूर्ण बहस को हवा दी है। सदैव चर्चा में रहने वाली बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने साहित्य उत्सव में माँग की है कि देश में तुरंत समान नागरिक संहिता लागू की जाए। तसलीमा बेबाकी से मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर अपनी बात रखने के लिए जानी जाती हैं। इस कारण वह मुस्लिम कट्टरपंथियों के निशाने पर भी रहती हैं। समान नागरिक संहिता की माँग करते वक्त उन्होंने कहा भी कि जब वह हिंदुत्व का विरोध करती हैं तब किसी को कोई परेशानी नहीं होती है, लेकिन जब इस्लाम की आलोचना करती हैं या फिर मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की बात करती हैं, तब उन्हें जान से मारने की धमकी दी जाती है। उन्हें खत्म करने के लिए गैरकानूनी फतवा तक जारी कर दिया जाता है।

सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

सुधार क्यों नहीं चाहता मुस्लिम समुदाय

 तीन  तलाक के मुद्दे पर सरकार का हलफनामा स्वागत योग्य है। मुस्लिम महिलाओं की सामाजिक स्थिति और उनके संवैधानिक अधिकार को मजबूत करने के लिए केन्द्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में दायर अपने हलफनामे में स्पष्ट कहा है कि तीन तलाक महिलाओं के साथ लैंगिग भेदभाव करता है। केन्द्र सरकार ने उचित ही कहा है कि पर्सनल लॉ के आधार पर किसी को संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। महिलाओं की गरिमा के साथ किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता। केन्द्र सरकार ने यहाँ तक कहा है कि तीन तलाक, हलाला निकाह और बहुविवाह इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है। सरकार का यह कहना उचित ही है। यदि यह प्रथाएँ इस्लाम का अभिन्न अंग होती, तब इस्लामिक देशों में इन पर प्रतिबंध संभव होता क्या? दुनिया के अनेक प्रमुख इस्लामिक मुल्कों में तीन तलाक, हलाला निकाह और बहुविवाह प्रतिबंधित हैं। इसलिए भारत में भी महिलाओं के साथ धर्म और पर्सनल लॉ के नाम पर होने वाली ज्यादती रुकनी चाहिए।

सोमवार, 8 अगस्त 2016

सना से सीखें कट्टरपंथियों को जवाब देना

 सांप्रदायिक  और कट्टर सोच को उजागर करती दो घटनाएं हमारे सामने हैं। एक, मायानगरी मुम्बई की घटना है। दूसरी घटना मध्यप्रदेश की धर्मनगरी उज्जैन की है। घर-घर 'आराध्या' नाम से पहचानी जाने वाली सना अमीन शेख टीवी कलाकार हैं। धारावाहिक 'कृष्णदासी' में सना का नाम आराध्या है। धारावाहिक में वह एक विवाहित मराठी महिला का किरदार कर रही हैं। भूमिका के अनुसार उन्हें माँग में सिंदूर भरना होता है और गले में मंगलसूत्र पहनना होता है। गजब की धार्मिक असहिष्णुता है कि पर्दे पर अपने किरदार को निभाने के लिए सना द्वारा सिंदूर भरने और मंगलसूत्र पहनने भर से ही इस्लाम खतरे में आ गया। सना ने धारावाहिक की शूटिंग के कुछ चित्र सामाजिक माध्यम (सोशल मीडिया) पर साझा किए, तबसे वह कट्टरपंथी मानसिकता के निशाने पर हैं। ओछी सोच के अनेक मुसलमान उन्हें नसीहत देने लगे हैं, यथा - 'मुस्लिम लड़कियों को सिंदूर नहीं लगाना चाहिए। तुम एक मुस्लिम लड़की हो, मंगलसूत्र क्यों पहनती हो? किसी भी मुस्लिम महिला को चाहे वह अभिनेत्री हो, सबसे पहले अपने धर्म का सम्मान करना चाहिए। कुछ अतिवादी तो धमकाने की हद तक पहुँच गए। सना शेख ने इन मनोरोगियों की कट्टरपंथी सोच को करारा जवाब दिया है। उसने सामाजिक माध्यम पर खुला खत लिखकर सांप्रदायिक सोच को लताड़ लगाई है। सना ने लिखा है कि क्या सिंदूर लगाने से अल्लाह मुझे दोजख में भेज देंगे और विरोध करने वालों को जन्नत में भेजेंगे? सना ने कहा कि शूटिंग के वक्त मेरी माँग में भरा सिंदूर तब तक मेरे बालों में रहता है जब तक मैं नहाती नहीं हूँ। सना ने संकुचित मानसिकता के लोगों को उनकी ही भाषा में आईना दिखाने का प्रयास भी किया। उसने कहा कि यदि अपने किरदार को निभाने के लिए मेरा सिंदूर लगाना और मंगलसूत्र पहनना इस्लाम के खिलाफ है तब मेरा धारावाहिक देखने वाले क्या कर रहे हैं? सिनेमा देखना, फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम का उपयोग करना क्या हराम नहीं है? आप लोग मेरा धारावाहिक देखना बंद क्यों नहीं करते? फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर समय बर्बाद करके क्या तुम लोग जन्नत में जाओगे?

सोमवार, 20 जून 2016

नारी शक्ति का परचम

 धीरे -धीरे ही सही महिलाएं प्रत्येक क्षेत्र में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। आज वह कौन-सा क्षेत्र है, जहाँ नारियों ने विशेष उपलब्धि अर्जित नहीं की हो? शिक्षा, सेवा, बैंकिग, व्यवसाय, कला, राजनीति, रक्षा और विज्ञान जैसे तमाम क्षेत्रों में महिलाओं ने न केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है बल्कि अपनी उपस्थिति को मजबूत भी किया है। भारतीय वायुसेवा में पहली बार तीन महिला सैनिकों ने फाइटर पायलट का कमीशन हासिल करके संदेश दिया है कि वे कहीं भी पीछे नहीं रहेंगी। समूची धरा को नापेंगी, समुद्र को लांघेंगी और आसमान की ऊंचाई को छू लेंगी। महिलाएं दशों दिशाओं में जाएंगी और अपनी खुशबू बिखेरेंगी। अब उनके हौसले के सामने कुछ भी असंभव नहीं है। वाकई यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

अराजक भीड़ ने 'बेंगलुरु' को किया अपमानित

 बें गलुरु से खबर है कि उग्र भीड़ ने तंजानिया की एक छात्रा के साथ बदसलूकी की है। उसकी पिटाई की है। इतना ही नहीं, भीड़ ने छात्रा के कपड़े भी नोंच लिए। उसे अर्धनग्न अवस्था में सड़क पर दौड़ाया। एक युवक ने जब छात्रा की मदद करने की कोशिश की, उसे अपनी टी-शर्ट पहनने के लिए दी तो भीड़ ने उस युवक को भी जमकर पीटा। बुरी तरह जख्मी लड़की ने भीड़ से बचने के लिए जब वहां से गुजर रही बस में चढऩे की कोशिश की तो यात्रियों ने उसे धकेलकर वापस भीड़ के हवाले कर दिया। यह किस तरह का व्यवहार है। एक लड़की की रक्षा करने की जगह बस यात्रियों ने कायराना व्यवहार किया। उफ! हमारी संवेदनाएं। भीड़ ने छात्रा के तीन दोस्तों को भी बुरी तरह पीटा है। बताते हैं कि पुलिस भी मूक दर्शक की तरह यह वीभत्स घटना को देखती रही। अस्पताल स्टाफ ने भी उन्हें इलाज के लिए भर्ती नहीं किया। बेंगलुरु की पहचान एक हाईटेक और उच्च शिक्षित शहर के नाते है। वहां इस तरह की घटना होना चिंता का विषय है। उग्र भीड़ ने अपने इस कृत्य से समूचे बेंगलुरु को अपमानित किया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बदनामी का कारण यह घटना बन सकती है।

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव क्यों?

 सु प्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ की आड़ में मुस्लिम महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव पर चिंता जताई है। मुस्लिम महिलाओं की दशा सुधारने और उन्हें अन्य धर्म की महिलाओं के समान अधिकार दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ की समीक्षा करने का फैसला किया है। महिला सशक्तिकरण, नारी सम्मान और समानता की दिशा में सुप्रीम कोर्ट की इस पहल का स्वागत होना चाहिए। चूंकि मामला कथित अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़ा है, इसलिए राजनीति से यह अपेक्षा बेमानी है कि वे मुस्लिम महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिलाने के लिए कोई पहल करते। लेकिन, उनसे आग्रह है कि इस मसले पर 'अल्पसंख्यक हितों पर कुठाराघात' का वितंडावाद खड़ा न करें। सुप्रीम कोर्ट का साथ देकर महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिलाएं।

रविवार, 13 सितंबर 2015

गाँधी परिवार से आगे बढ़ पाएगी कांग्रेस?

 कां ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी का कार्यकाल एक साल और बढ़ा दिया गया है। कांग्रेस कार्यसमिति ने यह फैसला उस वक्त लिया है जब पार्टी अपने सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है। सब दूर और सब प्रकार के चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन गिरता ही जा रहा है। कांग्रेस को खोयी प्रतिष्ठा वापस मिल सके, इसके लिए कार्यकर्ताओं सहित कांग्रेस हितैषी पार्टी में बड़े फेरबदल की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन, नतीजा 'ढाक के तीन पात' ही निकला। उपाध्यक्ष राहुल गाँधी को अध्यक्ष बनाए जाने की चर्चा भी जोरों से थी। लेकिन, 'गरीबी में आटा गीला' न हो जाए, इसलिए कार्यसमिति ने यहां भी कोई जोखिम नहीं उठाया। 'चिंतन प्रवास' से लौटने के बाद से भले ही राहुल के तेवर बदले-बदले से हों, लेकिन कुछ मौकों पर उनकी अरिपक्वता प्रकट हो ही जाती है। कांग्रेस के सामने अभी बिहार जैसा महत्वपूर्ण चुनाव है। पार्टी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। राहुल गाँधी अब तक चुनावी जंग में असफल ही रहे हैं। इसलिए भी पार्टी ने राहुल गांधी को अभी कमान देना उचित नहीं समझा होगा। खैर, कमान मिले या न मिले, क्या फर्क पड़ता है? राहुल अध्यक्ष की तरह व्यवहार कर ही सकते हैं। पार्षदपति, विधायक पति की तर्ज पर अध्यक्ष-पुत्र। भले ही वरिष्ठ कांग्रेसी नेता राहुल गांधी को स्वीकार न करते हों लेकिन राहुल को नापसंद करने का विकल्प भी उनके पास नहीं हैं। विकल्प तो छोडि़ए, असल में राहुल का विरोध करने का साहस किसी में नहीं है। आज नहीं तो कल, मजबूरन उन्हें गाँधी उपनाम के कारण राहुल के पीछे खड़ा होना ही पड़ेगा।

शनिवार, 29 अगस्त 2015

मूल्य खोकर क्या पाया हमने?

 स नसनीखेज शीना बोरा हत्याकांड ने भारतीय समाज को सोचने का अवसर दिया है कि वह किस तरफ आगे बढ़ रहा है। रिश्तों में खोखलापन, झूठ की बुनियाद पर टिके रिश्ते, विवाह को खेल बना देना, रिश्तों में जिम्मेदारी से ऊपर हावी व्यक्तिगत सोच ने हमें कहां लाकर पटक दिया है? क्या यह आधुनिकता है? आधुनिक होने के लिए क्या भारतीय मूल्यों को छोडऩा जरूरी है? अपने चिर-पुरातन और जीवन को संयमित करने वाले संस्कारों के साथ हम आधुनिक नहीं हो सकते? एक बड़ा सवाल है आखिर तथाकथित प्रगतिशीलता की दौड़ में अपने मूल्यों को खोकर हमने क्या पाया है? चमकती दुनिया में रहने वाली इंद्राणी मुखर्जी की कहानी आज बहुत से परिवारों का यथार्थ है। जहां हर कोई अपने कर्तव्य-जिम्मेदारी निभाने में असफल हैं। रिश्ते दिखावटी अधिक हैं। उनमें मिठास नहीं है, संवेदनाएं नहीं हैं, जीवतंता नहीं है। चमकती दुनिया के पीछे कितना गहन अंधकार पसरा रहता है, इसके कई उदाहरण शीना बोरा हत्याकांड प्रकरण से उजागर हो रहे हैं। एक घर में, एक छत के नीचे रहते हुए एक-दूसरे से अजनबी हैं। एक-दूसरे के जीवन की दिशा का पता नहीं है और जब पता चलता है तब रिश्तों को तार-तार कर देने वाला विस्फोट होता है। कितने आश्चर्य और चिंता की बात है कि समाज तो क्या घर में ही किसी को पता नहीं होता है कि शीना बोरा और इंद्राणी मुखर्जी का रिश्ता क्या है?