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सोमवार, 1 सितंबर 2025

प्रतिभाशाली युवाओं से देश की सेवा करने का आग्रह

भारत के लिए प्रतिभा पलायन दशकों से एक गंभीर चुनौती रहा है। हमारे देश में सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों में शिक्षा प्राप्त करने वाले युवा, जिन्होंने सरकारी खर्च पर उच्च शिक्षा हासिल की, अकसर स्नातक होने के बाद अच्छे ‘पैकेज’ के आकर्षण में दूसरे देशों की ओर रुख कर लेते हैं। अपनी प्रतिभा से उस देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सोचिए, अगर ये प्रतिभाशाली लोग विदेश नहीं गए होते और भारत में रहकर ही अपनी सेवाएं देते, तब आज भारत कहाँ होता? केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भोपाल में आईआईएसईआर के दीक्षांत समारोह में युवा वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए ‘ब्रेन ड्रेन’ (प्रतिभा पलायन) के मुद्दे पर चिंता जताई है और देश की सेवा करने की एक भावनात्मक अपील भी की है। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान की अपील- “देश छोड़कर मत जाना” केवल भावनात्मक आग्रह भर नहीं है अपितु इसके पीछे राष्ट्रीय विकास की ठोस चिंता है। जब योग्य युवा देश में रहकर अपनी ऊर्जा और ज्ञान का उपयोग करेंगे, तभी शोध, नवाचार और तकनीकी प्रगति भारत को आत्मनिर्भर बना पाएगी।

मंगलवार, 22 जुलाई 2025

पाठ्यक्रम से साफ हुई कम्युनिस्टों की दूषित सोच

अब पढ़ाया जाएगा- भारत का सच्चा और संतुलित इतिहास


राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने अपनी पाठ्य पुस्तकों को संशोधित करने का बहुप्रतीक्षित काम किया है। देश में लंबे समय से यह बहस चल रही थी कि पाठ्य पुस्तकों में भारत का संतुलित इतिहास क्यों नहीं पढ़ाया जाता है? आखिर वह क्या सोच रही होगी जिसने भारतीय नायकों को इतिहास में न केवल सीमित स्थान दिया, अपितु उनको पराजित राजा की तरह ही प्रस्तुत किया? वहीं, भारत को लूटने के उद्देश्य से आए मुगल आक्रांताओं का न केवल महिमामंडन किया अपितु इतिहास की पुस्तकों में उन्हें सर्वाधिक स्थान देकर यह स्थापित करने का प्रयास किया कि मुगल काल ही भारत का वास्तविक इतिहास है। बौद्धिक चतुराई दिखाकर मुगलिया शासन की क्रूरताओं पर पर्दा डाल दिया गया। अब जबकि एनसीईआरटी ने भारत के इतिहास को भारतीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने की दिशा में जनाकांक्षाओं के अनुरूप पहल की है, तब यही सोच विरोध कर रही है।

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2025

परीक्षा में फेल-पास से बड़ा है जीवन

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक जिम्मेदार अभिभावक की भांति देश के भविष्य के साथ संवाद का एक क्रम बनाया है- परीक्षा पे पर्चा। उनके इस प्रयास का अनुकरण सभी परिवारों में होना चाहिए। परीक्षा के तनावपूर्ण वातावरण को समाप्त करने के लिए अभिभावक अपने बच्चों से इसी प्रकार संवाद करें और उनके भीतर आत्मविश्वास एवं सकारात्मकता जगाएं। अधिकतम अंक पाने की दौड़ में हमने परीक्षा में सफलता को जीवन से बड़ा बना दिया, जिसके कारण कई होनहार विद्यार्थी किन्हीं कारणों से कम अंक पाने पर अवसाद में चले जाते हैं या फिर इसे अपनी विफलता मानकर जीवन को ही समाप्त करने का गलत निर्णय कर बैठते हैं। परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए विद्यार्थी के मन में भाव जागृति करना अपनी जगह है, लेकिन उसे ही सफलता के रूप में स्थापित कर देना ठीक बात नहीं है।

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2021

शिक्षक के हाथ में राष्ट्र के उत्थान-पतन की बागडोर

‘स्वतंत्र भारत के 75 वर्ष और शिक्षकों की भूमिका’




तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये।

आयासायापरं कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम्॥ - श्रीविष्णुपुराण 1-19-41

अर्थात, कर्म वही है जो बन्धन का कारण न हो और विद्या भी वही है जो मुक्ति की साधिका हो। इसके अतिरिक्त और कर्म तो परिश्रम रुप तथा अन्य विद्याएँ कला-कौशल मात्र ही हैं॥

सोमवार, 14 जून 2021

मदरसे में बम विस्फोट से उपजे सवाल

बिहार के बांका जिले के मदरसे में हुए विस्फोट से अनेक प्रश्न उठने लगे हैं। यह स्वाभाविक ही है। क्योंकि उसके मूल में दो बातें हैं- एक, मदरसे संदिग्ध गतिविधियों को लेकर पहले भी सवालों के घेरे में आते रहे हैं। दो, यह बड़ा सवाल है कि शिक्षा संस्थान में विस्फोटक सामग्री का क्या उपयोग किया जा रहा था? बांका के मदरसे में विस्फोट के बाद जिस तरह की संदिग्ध गतिविधियों को अंजाम दिया गया, उनसे भी अनेक संदेह उत्पन्न हो रहे हैं। सांप्रदायिक शिक्षा के नाम पर देशभर में संचालित मदरसे केवल अपनी कट्टरवादी तालीम के लिए ही बदनाम नहीं है, बल्कि हिंसक गतिविधियों एवं विस्फोटक सामग्री के भंडारण केंद्र होने के आरोप पहले भी मदरसों पर लगते रहे हैं। पूर्व में भी मदरसों में बम विस्फोट की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले के खागरागढ़ के एक मदरसे में हुए बम विस्फोट में तो दो आतंकियों की मौत हुई थी और उस विस्फोट के तार बांग्लादेश के आतंकी गिरोह जमात-उल-मुजाहिदीन से जुड़े थे। बिहार के बांके जिले के मदरसे में हुए बम विस्फोट को भी उसी तरह की घटना माना जा रहा है। 

अब तक सामने आई जानकारी के अनुसार अवैध ढंग से बने इस मदरसे में धमाका कंटेनर में रखे एक देसी बम के फटने से हुआ है। मौलाना के मौत की वजह दम घुटना बताया गया है। विस्फोट इतना जबरदस्त था कि मदरसे का भवन पूरी तरह ध्वस्त हो गया और इलाका धमाके से थर्रा गया था। मौके पर बम बाँधने में उपयोग की जाने वाली सुतली, कील और कंटेनर के प्रमाण मिले हैं। ये प्रमाण संकेत देते हैं कि मदरसे में बम बनाने का कार्य किया जा रहा था। विस्फोटक सामग्री भी भारी मात्रा में रही होगी, तभी इतना बड़ा धमाका संभव हो सका। सोचिए, यदि उस समय वहाँ बच्चे पढ़ रहे होते, तब क्या स्थिति बनती? ये मदरसे बच्चों का भविष्य संवारने के केंद्र हैं या फिर उनके जीवन को सब प्रकार के नष्ट करने के अड्डे? 

कुछ स्थानीय लोगों के हवाले से बताया गया था कि मौलाना बम बनाता था और तीन युवक उसका सहयोग करते थे। क्षेत्र में छोटी-छोटी बात पर बमबारी होती थी। भागलपुर से बारूद लाकर काम किया जाता था। यह भी तथ्य सामने आ रहे हैं कि मौलाना का संबंध तबलीगी जमात से था और उसका बांग्लादेश आना-जाना भी था। 

बहरहाल, इस घटना की जाँच राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी द्वारा कराई जानी चाहिए। यह छोटी और सामान्य घटना नहीं है। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। बांका की घटना से सबक लेकर देश के अन्य राज्यों में संचालित मदरसों की जाँच भी समय रहते करनी चाहिए और उनकी निगरानी बढ़ानी चाहिए। अब समय आ गया है कि मदरसों के संचालन के लिए स्पष्ट और पारदर्शी व्यवस्था बने। मदरसों पर सरकार का पूरा नियंत्रण हो। वहाँ सरकार द्वारा तय पाठ्यक्रम ही पढ़ाया जाए। प्रशासन को लगातार मदरसों का औचक निरीक्षण करना चाहिए ताकि सांप्रदायिक तालीम की आड़ में वहाँ चलने वाली संदिग्ध एवं खतरनाक गतिविधियों को रोका जा सके।

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

‘सबको शिक्षा-अच्छी शिक्षा’ की ओर बढ़ते कदम

भारत सरकार के प्रकाशन विभाग की पत्रिका 'योजना' के जुलाई-2018 के अंक में प्रकाशित

- जगदीश उपासने एवं लोकेन्द्र सिंह 

किसी भी राष्ट्र की पहचान उसके मानव संसाधन से बनती है। जबकि श्रेष्ठ मानव संसाधन शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करता है। एक सामान्य किंतु महत्वपूर्ण बात सभी जानते हैं कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति वहाँ के नागरिकों पर निर्भर करती है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त किए हुए नागरिक ही अपने देश की प्रगति में सहयोग कर सकते हैं। शिक्षित नागरिक ही अपने देश को प्रगति के पथ पर आगे ले जाने में सक्षम होते हैं। स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा के महत्व को समझाते हुए यहाँ तक कहा है कि 'यदि शिक्षा से सम्पन्न राष्ट्र होता तो आज हम पराभूत मन:स्थिति में न आए होते।' भारत में स्वामी विवेकानंद ऐसे संन्यासी हुए जिन्होंने नागरिकों को शिक्षित बनाने पर सर्वाधिक जोर दिया। भारत जैसे विविधता सम्पन्न और विशाल देश में अब भी शिक्षा सब तक नहीं पहुँच सकी है। अनेक स्थानों पर शिक्षा के उपक्रम प्रारंभ तो हो गए किंतु उसमें गुणवत्ता नहीं है। दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था में भारतीय दृष्टिकोण ही नदारद है। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने अपने पहले साल से ही शिक्षा में गुणात्मक एवं भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार सुधार का शुभ संकल्प ले लिया था। सरकार के संकल्प 'सबको शिक्षा-अच्छी शिक्षा' की पूर्ति के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय योजनाबद्ध तरीके से निरंतर कार्य कर रहा है। पिछले चार वर्ष में स्कूली शिक्षा के साथ-साथ उच्च शिक्षा में भी महत्वपूर्ण आवश्यक कदम सरकार ने उठाए हैं। शिक्षा के दोनों स्तर पर जितने भी प्रयास हुए हैं, सराहनीय हैं।

शनिवार, 18 जून 2016

स्कूल चलें हम : सब पढ़ें, सब बढ़ें

 प्रत्येक  सरकार का प्राथमिक उद्देश्य होना चाहिए कि वह प्रत्येक व्यक्ति को गुणवत्ता युक्त शिक्षा उपलब्ध कराए। किसी भी राज्य/देश के नागरिक सरकार से बुनियादी जरूरतों में रोटी, कपड़ा और मकान के साथ-साथ गुणवत्ता युक्त शिक्षा और स्वास्थ्य भी चाहते हैं। बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि उनके लिए शिक्षा सबसे पहली बुनियादी जरूरत होनी चाहिए। शिक्षा न केवल व्यक्ति के विकास में सहायक होती है, बल्कि संस्कारित समाज के निर्माण के लिए भी जरूरी है। यह कहना गलत नहीं होगा कि किसी भी देश की तरक्की में उसके शिक्षित नागरिकों की अहम हिस्सेदारी होती है। गौरतलब है कि मध्यप्रदेश सरकार ने अपने राज्य के प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षित करने का संकल्प लिया है। अपने संकल्प की पूर्ति के लिए सरकार राज्य में 'स्कूल चलें हम' अभियान का संचालन करती है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं इस अभियान का नेतृत्व करते हैं इसलिए अपेक्षित परिणाम भी प्राप्त हो रहे हैं।

मंगलवार, 8 सितंबर 2015

अपनी भाषा में हो शिक्षा

 ज ब किसी राष्ट्र पर विदेशी भाषा हावी हो जाती है तो उसकी संस्कृति, परंपरा और उसके जीवन मूल्यों के समक्ष गहरा संकट खड़ा हो जाता है। उस राष्ट्र की संतति भ्रम की स्थिति में होती है। बाहरी भाषा के प्रभुत्व के कारण एक ही राष्ट्र में भाषाई आधार पर भेदभाव की दीवार खड़ी हो जाती है। भारत जैसे बहुभाषी देश में तो एक विदेशी भाषा ने भारतीय भाषाओं को आमने-सामने शत्रु की तरह खड़ा करवा दिया है। इसके साथ ही विदेशी भाषा के प्रभाव में वह राष्ट्र स्वभाविक प्रगति भी नहीं कर पाता है। अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण यह स्थिति भारत के साथ दिखती है। दरअसल, भाषा महज संवाद की सेतु नहीं है। संवाद सेतु से कहीं अधिक, भाषा संस्कृति की धुरी है। संस्कृति भाषा पर ही टिकी रहती है। भाषा बदलने पर संस्कृति बदल जाती है, मूल्य बदल जाते हैं। बात सांस्कृतिक मूल्यों तक भी सीमित नहीं है बल्कि सार्वभौमिक सत्य है कि कोई भी राष्ट्र अपनी भाषा के साथ ही आगे बढ़ता है। हम दुनिया के उन्नत और प्रगतिशील राष्ट्रों का इतिहास-वर्तमान उलट-पलट कर जब देखेंगे तो ज्ञात होगा कि उन्होंने निज भाषा को नहीं त्यागा। लोक व्यवहार से लेकर पठन-पाठन और शोध तक अपनी मातृभाषा में किए। मातृभाषा में शिक्षा का क्या महत्व है, इसे दुनिया के उन्नत राष्ट्रों जापान, जर्मनी, रूस, अमरीका और चीन से लेकर इजराइल तक ने साबित करके दिखाया है। दुनिया के शिक्षाविद् भी यही मानते हैं कि शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। महामना मदनमोहन मालवीय, महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अम्बेडकर, रविन्द्रनाथ ठाकुर, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे महापुरुषों ने भी मातृभाषा में शिक्षा पर जोर दिया है। भारत में समय-समय पर गठित शिक्षा आयोगों राधाकृष्णन आयोग और कोठारी आयोग सहित अन्य आयोगों ने भी मातृभाषा में ही शिक्षा की अनुशंसा की है।

शनिवार, 22 अगस्त 2015

सोच-विचार कर करें शिक्षा में बदलाव

 भा रत सरकार एक बार फिर स्कूली शिक्षा प्रणाली में बदलाव करने का विचार कर रही है। आठवीं कक्षा तक विद्यार्थियों को फेल नहीं करने के नियम को सरकार बदलने जा रही है। शिक्षा से संबंधित केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड में बनी सहमति के बाद राज्य सरकारों से रजामंदी मांगी गई है। मध्यप्रदेश के स्कूली शिक्षा मंत्री पारस जैन ने यह मामला उठाया था कि जब से पांचवी और आठवीं की बोर्ड परीक्षा समाप्त की गई है तब से शिक्षा का स्तर गिर गया है। विद्यार्थियों को पता है कि वे फेल नहीं होंगे, इसलिए पढ़ाई पर उनका ध्यान नहीं रहता। प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर बच्चों की नींव कमजोर होने से उच्च शिक्षा में भी दिक्कतें आती हैं। हमें याद है कि आठवीं तक बोर्ड की परीक्षा खत्म करने के पीछे तर्क दिया गया था कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता सुधरेगी, बच्चों के दिमाग पर परीक्षा का भूत सवार नहीं रहेगा तो रचनात्मकता बढ़ेगी। बच्चों के दिमाग से तनाव हटेगा। इन महत्वपूर्ण तथ्यों के प्रकाश में आठवीं तक किसी बच्चे को फेल नहीं करने का निर्णय बिना तैयारी किए ही ले लिया था।

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय का पूरा देश करे पालन

 शि क्षा व्यवस्था को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला ऐतिहासिक है। लगातार अनदेखी से दुर्दशा के शिकार हुए सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था को ठीक करने का यह प्रभावी रास्ता हो सकता है। हाईकोर्ट के फैसले को महज उत्तरप्रदेश के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि स्कूली शिक्षा की हालत तो पूरे देश में लगभग एकसमान है। अच्छा होगा यदि सभी राज्य स्वत: पहल करके अपने यहां भी इस फैसले को लागू करें। हाईकोर्ट ने कहा है कि जनप्रतिनिधि, नौकरशाह और न्यायाधीश अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाएं। हाईकोर्ट ने यह भी कहा है कि जिन नेताओं, अधिकारियों और न्यायाधीशों के बच्चे सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ें, उनके वेतन से स्कूल की फीस के बराबर राशि काटकर सरकारी स्कूलों के कल्याण पर खर्च की जाए। प्राथमिक स्कूलों की दयनीय हालत के संदर्भ में दायर की गई जनहित याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। फैसला सुनाते वक्त न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा कि खराब हालत होने के बाद भी करीब 90 फीसदी बच्चे इन्हीं सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, ऐसे में इनकी दशा सुधारना बहुत जरूरी है।

सोमवार, 1 जून 2015

व्यक्ति और राष्ट्र हित में मूल्यपरक शिक्षा

 शि क्षा के अभाव से कितनी समस्याएं और विसंगतियां उत्पन्न होती हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। विशेषकर मूल्यहीन शिक्षा व्यवस्था के कारण तो कई प्रकार की नई समस्याएं जन्म ले लेती हैं। अपनी बौद्धिक और तर्क क्षमता से दुनिया पर विजय प्राप्त करने वाले युवा संन्यासी स्वामी विवेकानन्द तो यहां तक कहते हैं- 'यदि शिक्षा से सम्पन्न राष्ट्र होता तो आज हम पराभूत मन:स्थिति में न आए होते।' इस देश का सबसे अधिक नुकसान शिक्षा के अभाव के कारण ही हुआ है। भारत के संदर्भ में शिक्षा का अभाव ही एकमात्र चुनौती नहीं है बल्कि उचित शिक्षा का अभाव ज्यादा गंभीर मसला है। इस बात से किसी को इनकार नहीं है कि एक समर्थ राष्ट्र के निर्माण में शिक्षा व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह कहना ज्यादा उचित होगा कि राष्ट्र निर्माण में शिक्षा पहली और अनिवार्य आवश्यकता है। लेकिन, यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत को कैसी शिक्षा की आवश्यकता है? सब लोग पढऩा-लिखना सीख लें, अंगूठे की जगह हस्ताक्षर करना सीख लें, केवल इतना भर शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए क्या? मनुष्य अपने हित-अहित के संबंध में जागरूक हो जाए, उसे इतना शिक्षित करने मात्र से काम चलेगा क्या? अच्छे-भले मनुष्य को पैसा कमाने की मशीन बना देना, शिक्षा है क्या? अच्छी नौकरी पाने के योग्य हो जाना, अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो जाना, किताबें पढऩा-लिखना सीख लेना ही शिक्षा और शिक्षा का उद्देश्य नहीं है, तो भला क्या है?

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

माननियों की शिक्षा का हो इंतजाम

 अ कसर यह बहस खड़ी की जाती है कि विधायक-सांसद बनने के लिए भी न्यूनतम योग्यता तय होनी चाहिए। इंजीनियर बनने के लिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई जरूरी है, डॉक्टर बनने के लिए एमबीबीएस, एमडी सहित अन्य डिप्लोमा अनिवार्य हैं, शिक्षक बनने के लिए भी मापदण्ड तय हैं लेकिन ऐसा क्यों है कि विधायक-सांसद बनने के लिए किसी प्रकार की शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य नहीं है। ऐरा-गैरा नत्थूखेरा, कोई भी, अंगूठाछाप भी, विधानसभा से लेकर देश के सर्वोच्च सदन संसद में प्रवेश पा जाता है। न्यूनतम योग्यता क्यों तय नहीं की जाती? जवाब में अमूमन यही कहा जाता है कि शैक्षणिक योग्यता अलग है और मुद्दों की समझ अलग बात है। राजनेता के पास कागज की डिग्रियों से अधिक मानवीय संवेदनाओं का होना जरूरी है। राजनीति में आने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि नेता अपने क्षेत्र, परिवेश और देश-प्रदेश की नब्ज को पहचानता हो। नेता बनने के लिए जरूरी है कि वह लोगों की समस्याओं को समझता हो। कुछ हद तक यह सही बात भी है कि शैक्षणिक योग्यता से ही समझदारी और संवेदनाएं नहीं आती हैं। जिन्दगी असल पाठ खुद ही पढ़ा देती है। राजनीति में अधिक कारगर वह आदमी है जो संवेदनशील है, न कि उच्च शिक्षित मशीनी आदमी। यूपीए सरकार की कैबिनेट में दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों से उच्चतम शिक्षा प्राप्त मंत्री शामिल थे, लेकिन क्या उनकी शैक्षणिक योग्यता का देश को लाभ मिला? बीती सरकार का कार्यकाल देखें तो पढ़े-लिखे लोगों ने देश का अधिक बेड़ागर्ग किया। लेकिन, इस सबके बावजूद अनेक मौकों पर नेताओं की टिप्पणी, उनके क्रियाकलाप और उनके विचार-चिंतन को देखकर लगता है कि माननियों की शिक्षा का कुछ तो इंतजाम होना चाहिए। ज्यादा वक्त नहीं बीता जब राजनीतिक पार्टियां अपने कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण का पूरा ध्यान रखती थीं। चिंतन शिविर, राष्ट्रीय अधिवेशन, प्रादेशिक कार्यकर्ता प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन पार्टियां अपने स्तर पर किया करती थीं, ताकि उनके कार्यकर्ता अधिक संवेदनशील और जागरूक बन सकें। लोक जीवन में आने के लिए किस प्रकार का व्यवहार जरूरी है, इन प्रशिक्षण शिविरों में राजनीतिक कार्यकर्ताओं को सिखाया जाता था। हाल के कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति और राजनेताओं का जैसा चरित्र सामने आया है, उसे देखकर समाज का प्रबुद्ध वर्ग चिंतित है। अपने समय के सर्वाधिक लोकप्रिय राजपुरुष और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह राजनीतिक बदलाव की शुरुआत की है, उससे आशा की उम्मीद बंधी है। लगता है कुछ सार्थक परिवर्तन की बात की जा सकती है। इसलिए यह बहस और अधिक ताकत से खड़ी होने की कोशिश में है कि माननियों के शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था तय होनी चाहिए। 
       माननीय अपने परिवेश, अपने प्रदेश और अपने देश के प्रति कितने जागरूक हैं? समसामयिक घटनाओं को लेकर उनका कैसा चिंतन है? सामाजिक क्षेत्र में हो रहे सद्प्रयासों पर उनकी कितनी पैनी नजर है? यह बताने के लिए मध्यप्रदेश के माननियों का उदाहरण संभवत: सबसे सही होगा। बचपन बचाओ आंदोलन के पुरोधा और सर्वेसर्वा कैलाश सत्यार्थी को शांति के लिए नोबेल पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई। कैलाश सत्यार्थी चूंकि मध्यप्रदेश के विदिशा जिले के निवासी हैं, इसलिए पत्रकारों ने मध्यप्रदेश विधानसभा के सदस्यों से इस पर प्रतिक्रिया लेनी चाही। युवा पत्रकार सुधीर दण्डौतिया ने भाजपा के एक मंत्री से सवाल पूछा कि मध्यप्रदेश के कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार मिलने पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? उन माननीय के लिए तो एकमात्र कैलाश ही इस दुनिया में हैं, वह हैं भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय। मंत्री ने चट से जवाब दिया- 'हमें खुशी है। हमारे नेता हैं। उनको तो नोबेल पुरस्कार मिलना ही था। उन्होंने इंदौर में बहुत काम कराया है। हरियाणा विधानसभा चुनाव में अभूतपूर्व जीत पार्टी को दिलाई है। नोबेल पुरस्कार मिलने पर उन्हें बहुत बधाई।' टीवी पत्रकार श्री दण्डौतिया ने उन्हें समझाने का प्रयास भी किया लेकिन वे कहां किसी की सुनते। खैर, पत्रकारों को एक बढिय़ा खबर हाथ लग गई। फिर क्या था, अलग-अलग चैनल और अखबारों के पत्रकारों ने विधानसभा भवन से बाहर निकल रहे मंत्री-विधायकों को पकड़-पकड़ कर पूछना शुरू किया- 'कैलाश जी को नोबेल पुरस्कार मिला है, इस पर आप क्या कहना चाहेंगे? ' धड़ाधड़ कैलाश विजयवर्गीय की प्रशंसा में जवाब आने शुरू हो गए। यह स्थिति ऐसी पार्टी (भाजपा) के नेताओं की थी, जो खुद को 'औरों से अलग' मानकर चलती है। जिसके नेताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे पढ़ते-लिखते भी हैं। उनकी अपनी एक विचारधारा है। हालांकि कांग्रेस सहित दूसरे दल के नेता भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने कहा कि अब तो केन्द्र और राज्य दोनों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। झूठे पुरस्कार लेकर आना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। कैलाश जी अच्छे नेता हैं लेकिन फिर भी वे नोबेल पुरस्कार के लायक नहीं हैं। अब सोचिए क्या यह सवाल वाजिब नहीं हो जाता कि माननियों को शिक्षा की जरूरत है। दुनियाभर के इलेक्ट्रोनिक चैनल्स और अखबार पाकिस्तान की मलाला और भारत के कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार मिलने के समाचारों, विश्लेषणों और शुभकामनाओं से भरे पढ़े थे, तब भी हमारे माननीय बेखबर थे। ऐसे में इनसे कैसे अपेक्षा की जाए कि आमजन के सरोकारों को लेकर जागरूक रहते होंगे। 
      सदन में किस तरह का व्यवहार अपेक्षित है, इसकी भी जानकारी शायद इन्हें न हो। तभी तो सदन में जूता-चप्पल, कुर्सी, मिर्च पाउडर फेंकने की घटनाएं हमारे सामने आती हैं। संभवत: हमारे माननीय यह मानकर चलते हैं कि सदन होता ही इसलिए है। कर्नाटक विधानसभा के सदस्य तो दो-चार कदम और आगे तक निकल गए हैं। उन्होंने तो विधानसभा भवन को अश्लील फिल्म देखने का अड्डा बना दिया। सदन में चल रही गंभीर बहस के बीच कोई पोर्न फिल्म देख रहा है तो कोई प्रियंका गांधी के ग्लैमर को नजदीक से देखने के लिए उसका चित्र बार-बार जूम करके देख रहा है। जिन माननियों को इन सब काम में रुचि नहीं हैं, वे बेफिक्र होकर खर्राटे ले रहे होते हैं। खुले आम सदन में सो रहे माननियों से कैसे अपेक्षा की जाए कि ये जागरूक हैं, देश की समस्याओं के हल के लिए इन्होंने व्रत लिया है। क्यों नहीं माना जाए कि सदन में बैठकर आपत्तिजनक गतिविधियों से संलिप्त माननियों के दिमाग में गंदगी भरी होगी? फिर गंदे दिमाग कैसे समाज को स्वच्छ करेंगे? एक बार निर्वाचित होने के बाद जब माननियों को कुछ समझ नहीं आता तो लोकप्रिय होने के लिए, खबरों में बने रहने के लिए, न्यूज चैनल पर छाए रहने के लिए ऊल-जुलूल बयान देना ही इनका प्रिय काम हो जाता है। हकीकत यह है कि यदि कोई जिम्मेदार राजनेता हो तो उसके लिए देश में इतना काम है कि उसे सांस लेने की फुरसत न मिले। लेकिन, हमारे कई माननियों का कार्य-व्यवहार देखकर तो लगता है कि देश में करने के लिए अब कुछ काम ही शेष नहीं है।  
       लोकतंत्र जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन व्यवस्था है। लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार प्राप्त हैं। सबकी हैसियत एक वोट की है। प्रत्येक नागरिक चुनाव में खड़ा हो सकता है, चुनाव जीतकर विधानसभा-संसद जा सकता है। इसे लोकतंत्र की खामी न माना जाए। यह तो लोकतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन, जिस तरह से समाज ने समय की मांग को देखते हुए पुरानी शासन व्यवस्थाओं में फेरबदल किए, उसी तरह अब भी कुछ बदलाव तो लाए ही जा सकते हैं। चुनाव लडऩे की आजादी सबको हो लेकिन उसके लिए निर्धारित योग्यता होना अनिवार्य कर दी जाए। इससे लोकतंत्र का कुछ बिगड़ेगा नहीं बल्कि कुछ तो सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे ही। इससे भी आगे बढ़ा जा सकता है। चूंकि सरकार में अलग-अलग मंत्रालय हैं। जिन माननियों को ये मंत्रालय सौंपे जाएं, जरूरी नहीं कि उन्हें उसकी समझ हो। ऐसे में क्यों न नई सरकार के गठन पर मंत्री-सांसदों का प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएं। वर्तमान में भी यह व्यवस्था है लेकिन प्रभावी नहीं है। उसे प्रभावी बनाया जाना चाहिए। प्रशिक्षण कार्यशाला में जनप्रतिनिधि अनिवार्य रूप से शामिल हों, इसे सुनिश्चित किया जाना जरूरी है। ताकि वे संसदीय कार्यवाही की प्रणाली को, अपने विभाग की कार्यप्रणाली को, संबंधित मंत्रालय की चुनौतियों को समझ सकें। ताकि उन्हें यह पता चल सके कि उन्हें क्या काम करने हैं। ताकि उन्हें समझ आए कि उन्हें कहां अपनी ऊर्जा बर्बाद नहीं करनी है? यह जिम्मेदारी अकेले सरकार की नहीं है। पार्टियों को भी अपने स्तर पर यह चुनौती स्वीकार करनी होगी कि जिन कार्यकर्ताओं को वे आगे बढ़ा रहीं हैं, उनकी योग्यता को भी बढ़ाएं। चुनाव जरूरी लोकप्रियता के बूते जीते जा सकते हैं लेकिन चुनाव जीतने के लिए जनता को जो सपने दिखाए हैं, उन्हें पूरा करने के लिए तो काबिलियत ही काम आने वाली है। पार्टी संगठनों को सोचना होगा कि विधायक-सांसद-मंत्री जब अर्मादित, हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण व्यवहार करते हैं तो बदनामी सिर्फ माननियों की नहीं होती बल्कि पार्टी का चरित्र भी गिरता है। पार्टी की भूमिका माता-पिता की तरह है। उनका बेटा (कार्यकर्ता) जैसा व्यवहार करेगा, उसका प्रतिसाद माता-पिता (पार्टी-संगठन) को ही मिलेगा। अच्छा व्यवहार करेगा का यश मिलेगा और बुरा व्यवहार करेगा तो ताने मिलेंगे कि जरूरी माता-पिता (पार्टी-संगठन) ने अच्छे संस्कार नहीं दिए होंगे। जरूर उनके घर में भी ऐसा ही माहौल होगा। नरेन्द्र मोदी के आने से भारतीय राजनीति में आई बदलाव की इस बयार के बीच हर कोई यह अपेक्षा कर रहा है कि शायद अब माननीय 'शिक्षित' हो जाएंगे।

सोमवार, 12 जनवरी 2015

शिक्षा नीति में दिखे विवेकानन्द का चिंतन

 यु वा नायक स्वामी विवेकानन्द को याद करते ही बुद्धि, हृदय और शरीर में ऊर्जा का संचार होने लगता है। स्वामी विवेकानन्द सबके प्रेरणा स्रोत हैं। लेकिन, युवाओं के तो वे हृदय सम्राट हैं। यही कारण है कि उनकी जयंती (१२ जनवरी) युवा दिवस के रूप में मनाई जाती है। देश की वर्तमान परिस्थितियों के हिसाब से देखें तो स्वामी विवेकानन्द, उनके विचार, उनका चिंतन, उनकी सीख आज बहुत प्रासंगिक हैं। दरअसल, भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। निकट भविष्य में हम और अधिक जवां होंगे। लेकिन, क्या ये तरुणाई हमारी ताकत बन सकेगी? यह बड़ा प्रश्न है। ये तरुणाई देश को शक्ति तभी दे सकेगी जब इनकी आस्था भारत में होगी। फिर एक सवाल उठता है कि क्या आज की शिक्षा नीति ऐसी है कि जिससे युवाओं में राष्ट्र के प्रति श्रद्धा के भाव जागृत होते हैं? समर्पण की बात आती है? 'राष्ट्र सबसे पहले' यह भाव जागृत होता है क्या? यही नहीं, क्या हम अपनी तरुणाई को राष्ट्र के उद्देश्य के अनुरूप शिक्षित कर रहे हैं? हमारी शिक्षा नीति क्या राष्ट्र के उद्देश्य के अनुरूप है? स्वामी विवेकानन्द ने जिस मैन मेकिंग एजुकेशन की बात कही है, क्या आज की शिक्षा नीति वैसी है? आज की शिक्षा विद्यार्थी को मनुष्य बनाने की प्रक्रिया की ओर ले जाती है या पैसा कमाने की मशीन बनाने का प्रयास करती है। स्वामी विवेकानन्द अर्थवादी शिक्षा व्यवस्था का कड़ा विरोध करते थे लेकिन, आज की शिक्षा व्यवस्था तो पूरी तरह अर्थ आधारित होकर रह गई है। क्या इस अर्थवादी शिक्षा नीति से हम अपने राष्ट्र को फिर से शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी बना सकेंगे? मैकाले की शिक्षा पद्धति का उद्देश्य मनी मेकिंग, पैसा बनाने की शिक्षा देना था और स्वामी विवेकानन्द की शिक्षा का उद्देश्य मैन मेकिंग, व्यक्ति निर्माण था। हमें मैकाले की शिक्षा नीति पर आगे बढऩा चाहिए या फिर स्वामी विवेकानन्द के विचारों को भारत की शिक्षा नीति में शामिल करना चाहिए? यदि हम सही अर्थों में भारत निर्माण करना चाहते हैं, भारत को शिक्षा के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व करते हुए देखना चाहते हैं तो भारत की शिक्षा नीति में स्वामी विवेकानन्द के विचारों का समावेश होना ही चाहिए। शिक्षा नीति में परिवर्तन समय की मांग है और यह परिर्वतन स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा संबंध उपदेशों को ध्यान में रखकर होना चाहिए। 
       स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षा पर बहुत बल दिया था। उनका स्पष्ट मानना था कि भारत का सबसे अधिक नुकसान किसी ने किया है तो वह अशिक्षा ने किया। चंद लोगों के मस्तिष्क तक शिक्षा के सीमित रह जाने से भी भारत का अनिष्ट हुआ है। इस संबंध में २४ अप्रैल १८९७ को 'भारती' की सम्पादक सरला घोषाल को दार्जिलिंग से लिखे उनके पत्र को देखना होगा। स्वामीजी लिखते हैं- 'भारत के सत्यानाश का मूल कारण यही है कि देश की सम्पूर्ण विद्या-बुद्धि राजशासन और दम्भ के बल से केवल मुट्ठीभर लोगों के अधिकार में रखी गई है। यदि हमें फिर से उन्नति करनी है, तो हमको उसी मार्ग पर चलना होगा अर्थात् जनता में विद्या का प्रचार करना होगा।' सम्पूर्ण भारत को शिक्षित करने का चिंतन जब स्वामी विवेकानन्द करते हैं तो वे प्रत्येक उपाय पर विचार करते हैं। गांव-गांव, नगर-नगर घूम रहे साधु और संन्यासियों को भी वे उनका मूल काम याद दिलाने का प्रयास करते हैं। भारत को शिक्षित करने के अपने संकल्प को पूरा करने के लिए वे इन्हें शिक्षा अभियान से जोडऩे की बात करते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने २३ जून १८९४ को शिकागो से मैसूर के महाराजा को पत्र लिखा कि मान लीजिए महाराज आपने हरएक गांव में एक नि:शुल्क पाठशाला खोल दी, तो भी इससे कुछ काम न होगा। क्योंकि, भारत में इतनी अधिक गरीबी है कि गरीब लड़के पाठशाला आने की बजाय खेतों में अपने माता-पिता को मदद देना या दूसरे किसी उपाय से रोटी कमाने का प्रयत्न करना अधिक पसंद करेंगे। यदि पहाड़ मुहम्मद के पास न आये, तो मुहम्मद ही पहाड़ के पास क्यों न जाय? यदि गरीब लड़का शिक्षा के मन्दिर तक न आ सके, तो शिक्षा को ही उसके पास जाना चाहिए। हमारे देश में हजारों एकनिष्ठ और त्यागी साधु हैं, जो गांव-गांव धर्म की शिक्षा देते फिरते हैं। यदि उनमें से कुछ लोग सुनियन्त्रित रूप से ऐहिक विषयों के भी शिक्षक बनाये जाएं तो गांव-गांव, दर-दर जाकर वे केवल धर्मशिक्षा ही नहीं देंगे, बल्कि ऐहिक शिक्षा भी दिया करेंगे। 
      ऐहिक शिक्षा के साथ ही धर्मशिक्षा पर भी स्वामी जी का जोर था। वे विज्ञान की शिक्षा के साथ-साथ अध्यात्म की शिक्षा को भी अनिवार्य मानते थे। शिक्षा के विषय में समय-समय पर दिए गए उनके विचारों से यह परिलक्षित होता था। तीन जनवरी १८९५ को शिकागो से सर एस. सुब्रह्मण्य अय्यर को पत्र में स्वामी विवेकानन्द लिखते हैं- 'बहुत सोच-विचार के बाद मेरे मन ने तय किया है कि पहले मद्रास में धर्मशिक्षा के लिए एक विद्यालय खोलना ठीक होगा, फिर इसका कार्यक्षेत्र धीरे-धीरे बढ़ाया जाएगा। नवयुवकों को वेदों, विभिन्न भाष्यों और दर्शनों की पूरी शिक्षा देनी होगी, जगत् के अन्य धर्मों का ज्ञान भी इसमें शामिल होगा।' लेकिन, हमने क्या किया? शिक्षा को धर्मविहीन कर दिया। सेकुलरिज्म के चक्कर में फंस कर हमने स्वामी विवेकानन्द के विचारों को खूंटी पर टांग दिया। शिक्षा को नैसर्गिक नहीं रहने दिया। यही कारण है कि आज अभिभावक, शिक्षक, राजनेता और प्रबुद्ध वर्ग मूल्य आधारित शिक्षा की जरूरत महसूस कर रहे हैं। समाज की 'गति' देखकर धर्मविहीन, मूल्यहीन, असंवेदनशील शिक्षा में परिवर्तन की बात हर कोई कर रहा है। स्वामी विवेकानन्द के लिए धर्म अंग्रेजी का शब्द 'रिलीजन' नहीं था। स्वामीजी ने धर्म की व्याख्या उन नियमों और संहिताओं के रूप में की, जो प्रकृति में करोंड़ों वर्षों से प्रचलित हैं। इसलिए देश की तथाकथित सेकुलर बिरादरी को धर्मशिक्षा की बात से बिदकने की जरूरत नहीं है। स्वामी विवेकानन्द ने बार-बार बल दिया है कि धर्म ही भारत की आत्मा है। उन्होंने कहा है -'मैं धर्म को शिक्षा का सबसे आंतरिक सारतत्व मानता हूं।' धर्मविहीन वर्तमान शिक्षा मनुष्य को डॉक्टर, इंजीनियर, टेक्नोक्रेट, ब्यूरोक्रेट आदि बनने के लिए प्रेरित करती है। जबकि वास्तव में मनुष्य की शिक्षा का उद्देश्य स्वयं को पहचानने का होना चाहिए। यूनेस्को ने भी शिक्षा पर प्रकाशित अपनी रिपोर्ट का शीर्षक दिया था- 'कुछ होने के लिए सीखना, न कि कुछ बनने के लिए सीखना।' स्वामीजी भी बार-बार कहते रहे कि विद्यार्थी को कुछ बनाने की जरूरत नहीं है। उसके भीतर सबकुछ है, बस उसे बाहर आने दो। 
      यह बात जग जाहिर है कि एक समय में भारत शिक्षा के क्षेत्र में सबसे आगे था। भारत में विश्वविद्यालय जैसे संस्थाएं थीं, जिनमें शिक्षा प्राप्त करने के लिए दुनियाभर से विद्यार्थी आते थे। नगरों में ही नहीं ग्रामीण क्षेत्रों में भी पाठशालाएं थीं, यह बात प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक धर्मपाल ने भी अपने शोध से प्रमाणित की है। धर्मपाल ने अपनी पुस्तक 'अ ब्यूटीफुल ट्री' में बताया है कि अंग्रेजों के सर्वे के मुताबिक १८वीं सदी में भारत में लाखों की संख्या में स्कूल थे। भारतीयों ने चिंतन, अध्यात्म, सामाजिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, कला ही नहीं परंतु विज्ञान के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व उपलब्धियां अर्जित की थीं। मैकाले की शिक्षा नीति के प्रभाव में आकर भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में अपना नेतृत्व तो खोया ही, स्वाभिमान भी खो दिया। स्वामी विवेकानन्द लगातार भारतीयों से आग्रह करते रहे कि अपने तईं भेड़-बकरी होने का भ्रम दूर करो। खुद को पहचानो, तुम सिंह हो, अमृत के पुत्र हो। अत्यंत अल्पायु में बहुत कुछ मार्गदर्शन देकर स्वामीजी चले गए। अब उनके मार्गदर्शन पर आगे बढऩे का काम हमारा होना चाहिए। हमारे शिक्षाविदों के सामने ऐसी शिक्षा नीति बनाने की चुनौती है, जिसमे बूते फिर से हम शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी हो जाएं। लेकिन, शिक्षा नीति तय करने से पहले यह जान लेना जरूरी होगा कि स्वामी विवेकानन्द असल में शिक्षा किसे मानते थे? स्वामी विवेकानन्द देवघर (वैद्यनाथ) से २३ दिसम्बर १९०० को एक बंगाली महिला को पत्र में लिखते हैं कि आखिर शिक्षा क्या है? क्या वह केवल कुछ पुस्तकों का पठन-पाठन ही है? नहीं। फिर क्या विविध विषयों का ज्ञान? वह भी नहीं है। शिक्षा तो वह है, जिसके सहारे इच्छाशक्ति का प्रवाह एवं उसकी अभिव्यक्ति संयत की जाती है। अब यह विचार कीजिए कि क्या वह शिक्षा कहलाने के योग्य है, जिसके फलस्वरूप इच्छाशक्ति पीढिय़ों से बलपूर्वक अनवरत अवरुद्ध होकर आज मृतप्राय हो रही है। जिसके प्रभाव से नवीन विचारों की कौन कहे, पुराने तक एक-एक करके विलुप्त होते जा रहे हैं? क्या वह शिक्षा है, जो धीरे-धीरे मनुष्य को मशीन बना दे रही है? मेरे विचार से यंत्रवत् अच्छे होने की अपेक्षा स्वतन्त्र इच्छा और बुद्धि द्वारा प्रेरित होकर एक बार गलती भी कर लेना अधिक श्रेयस्कर है। 
     बहरहाल, स्वामी विवेकानन्द के विचार-दर्शन से होकर गुजरते हैं तो यह स्पष्ट होता है कि उनके विचारों का प्रमुख केन्द्र जीविकोपार्जन की शिक्षा, तकनीकी ज्ञान और विज्ञान की शिक्षा नहीं था, वे सबसे पहले व्यक्ति के अंदर निहित क्षमताओं को उजागर करने की शिक्षा देना चाहते थे। वे तकनीकी ज्ञान और विज्ञान की शिक्षा के साथ-साथ चरित्र निर्माण की शिक्षा पर अधिक बल देते थे। शिक्षा के संबंध में उनका महत्वपूर्ण कथन है - 'शिक्षा मनुष्य में निहित सम्पूर्णता की अभिव्यक्ति है।'

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

शिक्षक कौन?

 भा रतीय संस्कृति में पुरातनकाल से ही अपने शिक्षकों के आदर-सम्मान की परम्परा चली आ रही है। हिन्दुस्थान में शिक्षकों को देवतुल्य बताया गया है। विद्यार्थी उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में पूजते रहे हैं। समाज में उनका सर्वोच्च स्थान रहा है। लेकिन, क्या आज ऐसी स्थिति है? क्या आज शिक्षक वास्तव में शिक्षक हैं? क्या शिक्षकों को देवतुल्य मानकर उन्हें सर्वोच्च स्थान दिया जा रहा है? क्या विद्यार्थी भी पहले जैसे हैं, अनुशासित, समर्पित, संयमी? गौरवशाली गुरु-शिष्य परंपरा कहां खो गई? शिक्षा संस्थानों से पढ़-लिखकर निकलने वाली फौज महज डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक और अन्य प्रोफेशनल्स ही नहीं होते हैं बल्कि समाज में उनकी भूमिका बहुत बड़ी है। शिक्षा संस्थानों वे भारत का नेतृत्व करने के लिए तैयार होते हैं। गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से उन्हें गौरवशाली भारतीय संस्कृति से परिचित भी कराया जाता है। ताकि वे अपनी संस्कृति के संवाहक बन सकें। इसलिए गुरु पूर्णिमा हो या शिक्षक दिवस, ये सवाल उठते हैं। इन सवालों के जवाब खोजना बेहद जरूरी है। ये भारत के भविष्य और उसके अस्तित्व से जुड़ी चिंताएं हैं।
            गुरु-शिष्य परंपरा में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी शिक्षक है। शिक्षक है कौन? उसके दायित्व क्या हैं? उसका महत्व क्या है? इन सवालों के जवाब खोजने जब निकलते हैं तो पता चलता है कि शिक्षक वह है जो विद्यार्थी में निहित गुणों को उजागर करके सामने ला देता है, ताकि वह सही दिशा में आगे जा सके और समाज में अपनी भूमिका का निर्वाहन प्रभावी तरीके से कर सके। युवा नायक स्वामी विवेकानन्द का भी यही मानना था कि जिस तरह एक नन्हें बीज के भीतर विशाल वृक्ष छिपा हुआ है, उसे उपजाऊ भूमि में बोया जाए और उचित वातावरण मुहैया कराया जाए तो वह स्वत: ही पहले पौधा और फिर वृक्ष बन जाता है। ठीक इसी तरह किसी भी विद्यार्थी में उसकी प्रतिभा छिपी हुई है, इसलिए उस प्रतिभा को सामने लाने का कार्य शिक्षक का है। लगभग यही बात महर्षि अरविन्द ने कही है कि शिक्षक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते हैं। वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से सींच कर उन्हें शक्ति में निर्मित करते हैं।
            सिखाना शिक्षक का असल कार्य नहीं है। सीख तो विद्यार्थी स्वयं ही जाता है। दुनियाभर की किताबों से लाइब्रेरी भरीं पड़ी हैं। जानकारियों का नया खजाना इंटरनेट हो गया है। किताबी और पाठ्यक्रम की पढ़ाई तो विद्यार्थी किताबों और इंटरनेट से पूरी कर लेगा। लेकिन, जीवन क्या है और क्यों है? यह सिखाना जरूरी है। जीवन जीने की कला सिखा दी जाए तो किसी भी व्यक्ति को अपना रास्ता साफ नजर आ जाएगा। अपने ४० वर्ष आदर्श शिक्षक के रूप में जीने वाले डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी अपनी कक्षाओं में विद्यार्थियों को जीवन सिखाते थे। वे छोटी-छोटी आनंददायक कहानियों के माध्यम से उच्च नैतिक मूल्यों को अपने जीवन में उतारने के लिए विद्यार्थियों को प्रेरित करते थे। विद्यार्थियों के साथ उनके मैत्रीपूर्ण संबंध रहते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि शिक्षक और विद्यार्थी के बीच कोई संकोच नहीं होगा तो सहजता के साथ अध्ययन-अध्यापन का कार्य हो सकता है। इसलिए शिक्षक को महज यह करना चाहिए कि विद्यार्थी को वह अधिक से अधिक जिज्ञासु बना दे। उसके अंतर्मन में सवाल पैदा होंगे तो उनके प्रश्न खोजने के लिए वह खुद आगे आएगा। उसकी जिज्ञासाओं का समाधान कहां और कैसे हो सकता है, यह मार्गदर्शन जरूर शिक्षक कर सकता है। यह एक लम्बी प्रक्रिया है। आज-कल या एक दिन में शिक्षक और विद्यार्थी के बीच यह सार्थक परंपरा विकसित नहीं हो सकती। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में यही खामी है। पश्चिम की परिभाषा के मुताबिक जो 'टीचर' है, प्रत्येक छह माह में बदल जाता है। एक सेमेस्टर में कोई पढ़ाता है तो दूसरे सेमेस्टर में कोई दूसरा 'टीचर'। ऐसे में विद्यार्थियों की नैसर्गिक प्रतिभा और दक्षता से शिक्षक ही परिचित नहीं हो पाता तो वह उन विद्यार्थियों को कैसे अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित कर सकता है। छात्रों से 'टीचर' का नाता सिर्फ 'क्लास रूम' तक सीमित है। कक्षा के बाहर उसे कोई मतलब नहीं कि उसका विद्यार्थी क्या कर रहा है? जबकि भारतीय अवधारणा के मुताबिक शिक्षक प्रत्येक मौके पर विद्यार्थी को प्रेरित करने का कार्य करता है। क्योंकि विद्यार्थियों की कामयाबी ही शिक्षक को समाज में अमर बनाती है, सम्मान का स्थान दिलाती है। इसलिए शिक्षक लगातार विद्यार्थी में आ रहे परिवर्तनों पर नजर रखता है। विद्यार्थी में अच्छे बदलाव आ रहे हैं तो उसे उस दिशा में आगे बढऩे के लिए प्रेरित किया जाता है और विद्यार्थी अनैतिक आचरण की ओर बढ़ रहा है तो उसे सही राह दिखाने की कोशिश शिक्षक करता है।
            भारतीय परंपरा में गुरु की महत्ता इसलिए भी अधिक है क्योंकि वह गुरु ही है जो अपने जीवनभर का अनुभव अपने शिष्य को दे देना चाहता है। जो कुछ उसने अपने जीवन में अर्जित किया, उसे विद्यार्थी के मन में बैठा देता चाहता है। गुरु हमें द्विज बनाता है, पुनर्जन्म देता है। आंखें खोलता है। अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करता है। हम क्या हैं? हमारे कर्तव्य क्या हैं? हमारे दायित्व क्या हैं? हमें कहां जाना है? यह सब तो शिक्षक ही बताता है। यदि शिक्षक यह न बताए तो व्यक्ति अंधेरी गुफा में भटकता रहेगा। इसलिए विद्यार्थियों को भी चाहिए कि वे अपना समूचा अहंकार त्याग कर शिक्षक के समक्ष उपस्थित हों। उपभोग की संस्कृति आज के युवाओं पर इतनी हावी है कि वे अपने संस्कार भूल गए हैं। मर्यादा भूल गए हैं। शिक्षक ही नहीं वरन अपने से बड़ों का सम्मान भूल गए हैं। उन्हें युवा जोश का अहंकार है। टेक्नोक्रेट होने का अहंकार है। आजादी का अहंकार है। उन्हें अपने अधिकारों का तो ज्ञान है लेकिन अपने कर्तव्यों का भान नहीं है। पश्चिम से आ रही आंधी से उनके होश उड़े हुए हैं। इस बे-होशी की हालत में वे अपने शिक्षकों का सम्मान ही नहीं कर पा रहे हैं। यही कारण है कि बदले हालातों में शिक्षक भी अपने आप को सीमित कर रहे हैं। वे भी 'क्लास रूम स्टडी' पर ही पूरा ध्यान दे रहे हैं। बाहर की दुनिया का ज्ञान देने का प्रयत्न करने से वे बच रहे हैं। जीवन सिखाने से वे बच रहे हैं। उन्हें डर है कि पता नहीं किस घड़ी छात्रों की कोई हरकत उन्हें अपमान सहने के लिए मजबूर कर दे। यही कारण है कि शिक्षा संस्थानों से डॉक्टर-इंजीनियर तो निकल रहे हैं लेकिन जिम्मेदार नागरिक नहीं निकल रहे। विद्यार्थियों, शिक्षकों और शिक्षा नीति निर्धारकों को अपनी भूमिका को ठीक से समझना होगा। महर्षि अरविन्द ने शिक्षक को राष्ट्र का वास्तविक निर्माता बताया है। इसलिए तमाम प्रतिकूल समय के बावजूद शिक्षक को तो अपने कर्म, अपनी भूमिका के साथ न्याय करना ही होगा। देश के निर्माण की बागडोर उसके हाथ में है। 

शनिवार, 19 जनवरी 2013

भारत, विज्ञान और सोशल मीडिया

 स्कू ल-कॉलेज के समय अक्सर एक सवाल मन में नागफनी-सा चुभता था कि विज्ञान की किताबों में डब्ल्यू के रोएण्टजेन, जेएच वैंटहाफ, एई वॉन बेहरिंग, रेगनर फ्रिश, जॉन टिनबर्गन और आइंस्टीन जैसे कठिन और विदेशी नाम क्यों हैं? रामचंद्र, श्यामसुन्दर, अनिल, सुनील जैसे सरल और हमारे-तुम्हारे जैसे नाम क्यों नहीं है? क्या विज्ञान के क्षेत्र में सबकुछ विदेशियों की ही देन है? भारतमाता ने ऐसे सुत नहीं जने, जिन्होंने विज्ञान की प्रज्वला जलाई हो? बहुत पूछ-पड़ताल करने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा कि भारत में विज्ञान का दीप प्रज्वलित ही नहीं था बल्कि अन्य को प्रकाश भी दे रहा था। लेकिन हम बचपन से रटे हुए विज्ञान को झुठलाना नहीं चाहते। हम आज भी विज्ञान के विकास और वैज्ञानिक दृष्टि के लिए पश्चिम की ओर ही देखते रहना चाहते हैं। हम यह स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है कि रॉकेट और बारूद विदेश में नहीं बल्कि अपने ही देश में ईजाद हुए। इस संदर्भ में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के एक अनुभव को उल्लेखित करना चाहूंगा। उन्होंने अपनी पुस्तक 'इंडिया टू थाउजेंड ट्वेंटी : अ विजन फॉर न्यू मिलेनियम' में लिखा है कि एक बार वे रात्रिभोज में आमंत्रित थे। जहां बाहर के अनेक वैज्ञानिक और भारत के कुछ प्रमुख लोग आमंत्रित थे। वहां चर्चा चलते-चलते रॉकेट की तकनीक के विषय पर चर्चा चली। किसी ने कहा कि चीनी लोगों ने हजार वर्ष पूर्व बारूद की खोज की, बाद में तेरहवीं सदी में इस बारूद की सहायता से अग्नि तीरों का प्रयोग युद्धों में प्रारंभ हुआ। इस चर्चा में भाग लेते हुए डॉ. कलाम कहते हैं कि एक बार वे इंग्लैड गए थे। वहां लंदन के पास वुलीच नामक स्थान पर रोटुण्डा नाम का संग्रहालय है। इसमें टीपू श्ररंगपट्टनम् में अंग्रेजों के साथ हुए युद्ध में टीपू सुल्तान की सेना द्वारा प्रयुक्त रॉकेट देखे और यह विश्व में रॉकेट का युद्ध में सर्वप्रथम प्रयोग था। डॉ. कलाम के इतना कहते ही वहां मौजूद एक प्रमुख भारतीय ने तुरन्त टिप्पणी की कि वह तकनीक फ्रेंच लोगों ने टीपू को दी थी। इस पर डॉ. कलाम ने उन सज्जन से कहा कि आपका कथन ठीक नहीं है। मैं आपको प्रमाण बतलाऊंगा। बाद में डॉ. कलाम ने उन्हें प्रख्यात ब्रिटिश वैज्ञानिक सर बर्नाड लॉवेल की पुस्तक 'द ऑरीजिन एण्ड इंटरनेशनल इकॉनॉमिक ऑफ स्पेस एक्सप्लोरेशन' बताई। इसमें लिखा था कि विलियम कोनग्रेव्ह ने टीपू की सेना द्वारा प्रयुक्त रॉकेट का अध्ययन किया। उसमें कुछ सुधार कर सन् १८०५ में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विलियम पिट और युद्ध सचिव के्रसर लीध के सामने प्रस्तुत किया। वे इसे देखकर प्रभावित हुए और उन्होंने इसे सेना में शामिल करने की अनुमति प्रदान की। यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि हम क्रोनगेव्ह के बारे में तो जानते हैं लेकिन उन महान वैज्ञानिकों के बारे में कोई जानकारी नहीं, जिन्होंने टीपू सुल्तान की सेना के लिए तोप बनाकर दी।
       दरअसल, भारत में वर्तमान में विज्ञान को लेकर जो धारणा प्रचलित है उसके लिए बहुत हद तक हमारा शिक्षा विभाग और बुद्धिजीवी लोग जिम्मेदार रहे हैं। शिक्षा संस्थानों ने अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभाई। कहते हैं न जो बोएंगे वही तो काटेंगे। हमने एक लंबे अंतराल से विज्ञान के बीज शिक्षा संस्थानों में बोए ही नहीं तो विज्ञान के पौधे-वृक्ष कहां से मिलेंगे। विज्ञान के गीत गाना बंद कर दिया तो विज्ञान की अनुगूंज कहां से आएगी। भारत में आने वाली नस्ल को अपनी परंपरा, संस्कृति, इतिहास और ज्ञान के प्रति गौरव का भाव न रहे, इसके लिए १८३५ में लार्ड थॉमस बॉबिंग्टन मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा पद्धति लागू करके पूरी कर दी। रही-सही कसर भारतीय मैकाले पुत्रों ने मैकाले के पौधे को सींच कर पूरी कर दी।
      चलिए अब इस बात पर गौर किया जाए कि भारत में फिर से वैज्ञानिक सोच का समाज बनाने के लिए सोशल मीडिया किस प्रकार की भूमिका निभा सकता है। अन्ना हजारे का आंदोलन हो बाबा रामदेव का आंदोलन दोनों को सोशल मीडिया से खूब ताकत मिली। असांजे ने विकीलीक्स के माध्यम से अमरीका के चाल, चरित्र और चेहरे को बेपर्दा कर उसकी चूलें हिला दीं। सोशल मीडिया वर्तमान में अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। परंपरागत मीडिया की तरह यह मैनेज नहीं हो सकता। सोशल मीडिया में कहीं भी कोई चिंगारी उठती है तो वह दूर तक जाती है। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण को लेकर भारतीय जनमानस के मस्तिष्क पर छाई धुंध को हटाने में सोशल मीडिया एक कारगर माध्यम है। बस करना यह है कि सोशल मीडिया में विज्ञान लेखन की शुरुआत हो। हालांकि अभी भी कई सोशल मीडियाकर्मी विज्ञान लेखन का कार्य कर रहे हैं लेकिन यह अभी सीमित है। इस कार्य को गति देने की जरूरत है। चूंकि आजकल स्कूल-कालेज के विद्यार्थी अध्ययन के लिए इंटरनेट का काफी इस्तेमाल करते हैं। अब तो इंटरनेट डेस्कटॉप और लैपटॉप से निकलकर मोबाइल में आ गया है। ऐसे में सोशल मीडिया विज्ञान को रोचक तरीके से प्रस्तुत कर युवाओं को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। बाल सुलभ मन विज्ञान के परंपरागत अध्ययन से ऊब जाता है। छुटपन से ही बच्चों में विज्ञान के प्रति रुचि जगानी है तो विज्ञान कथा लेखन इस दिशा में बेहतर उपाय हो सकता है। कथा रुचिकर होने के साथ अंतर्मन में पैठ करती है। विज्ञान कथा लेखन कर सोशल मीडिया दादा-दादी और नाना-नानी की भूमिका निभा सकता है। साथ ही अंग्रेजी में उपलब्ध सामग्री को क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद किया जाना चाहिए। गुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इस बात पर बड़ा जोर दिया है कि सृजन मातृभाषा में ही हो सकता है। शिक्षा की राष्ट्रीय परिचर्या-2005 की रूपरेखा में भी इस बात को स्वीकारा गया है कि अपनी भाषा में इंसान बेहतर सीख सकता है। वहीं कोठारी आयोग-1966 ने भी कहा था कि दुनियाभर के देशों में बच्चों को शिक्षा उनकी मातृभाषा में ही दी जाती है। भारत ही एकमात्र देश है जहां यह व्यवस्था नहीं है। अपनी भाषा में विज्ञान लेखन का कार्य सोशल मीडिया पर अच्छे से किया जा सकता है। विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए भारतीय भाषाओं में विज्ञान लेखन जरूरी है। इसके साथ ही इस बात के भी प्रयास करने होंगे की हमारे सुझाव सरकार तक भी पहुंचे। समाज में वैज्ञानिक सोच का वातावरण बनाने के लिए कुछ निजी और सरकारी संस्थाएं कार्यरत हैं। विज्ञान भारती, मेपकॉस्ट, मध्यप्रदेश विज्ञान सभा, साइंस सेंटर और स्पंदन इसके उदाहरण है, ऐसे और भी कई नाम हैं। सोशल मीडिया में जो लोग विज्ञान लेखन की जिम्मेदार संभाले हुए हैं या जो इस दिशा में कुछ करने का मन बना रहे हैं, वे इनके साथ जुड़कर काम कर सकते हैं। विज्ञान मेले, विज्ञान सेमिनार, परिचर्चा, वर्कशॉप, वैज्ञानिक संस्थानों का भ्रमण, वैज्ञानिकों से मुलाकात, विज्ञान नाटकों का आयोजन आदि गतिविधियां शुरू कर सकते हैं। इससे वैज्ञानिक सोच का समाज बनाने में बड़ी मदद मिलेगी।
      आखिर में एक बात और कहूंगा कि भारत में सदैव से विज्ञान की गंगाधारा बहती रही है। बीच में बाह्य आक्रमणों के कारण कुछ गड़बड़ जरूर हुई लेकिन यह धारा अवरुद्ध नहीं हुई। समाज में वैज्ञानिक चेतना खासकर विज्ञान के प्रति भारतीय दृष्टि के विकास के लिए अब सोशल मीडिया को मिलकर भगीरथी प्रयास करने होंगे।

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

भारत में चमका था विज्ञान का सूर्य

 भा रत और भारत के लोगों के बारे में एक धारणा दुनिया में प्रचलित की गई कि भारत जादू-टोना और अंधविश्वासों का देश है। अज्ञानियों का राष्ट्र है। भारत के निवासियों की कोई वैज्ञानिक दृष्टि नहीं रही न ही विज्ञान के क्षेत्र में कोई योगदान है। भारत के संदर्भ में यह प्रचार लंबे समय से आज तक चला आ रहा है। नतीजा यह हुआ कि अधिकतर भारतवासियों के अंतर्मन में यह बात अच्छे से बैठ गई कि विज्ञान यूरोप की देन है। विज्ञान का सूर्य पश्चिम में ही उगा था उसी के प्रकाश से संपूर्ण विश्व प्रकाशमान है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आज हम हर बात में पश्चिम के पिछलग्गू हो गए हैं क्योंकि हम मानते हैं कि पश्चिम की सोच वैज्ञानिक सम्मत है। पश्चिम ने जो सोचा है, अपनाया है वह मानव जाति के लिए उचित ही होगा। इसलिए हमें भी उसका अनुकरण करना चाहिए। भारत में योग पश्चिम से योगा होकर आया तो जमकर अपनाया गया। आयुर्वेद को चिकित्सा की सबसे कमजोर पद्धति मानकर एलोपैथी के मुरीद हुए लोगों की आंखें तब खुली जब आयुर्वेद पश्चिम से हर्बल का लेवल लगाकर आया। भारत में विज्ञान को लेकर जो वातावरण निर्मित हुआ उसके लिए हमारे देश के कर्णधार भी जिम्मेदार हैं। जिन्होंने तमाम शोध और विमर्श के बाद भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था में भारत में विज्ञान की उज्ज्वल परंपरा को शामिल नहीं किया। भारत के छात्रों का क्या दोष, जब उन्हें पढ़ाया ही नहीं जाएगा तो उन्हें कहां से मालूम चलेगा कि भारत में विज्ञान का स्तर कितना उन्नत था।
    विज्ञान और तकनीकी मात्र पश्चिम की देन है या भारत में भी इसकी कोई परंपरा थी? भारत में किन-किन क्षेत्रों में वैज्ञानिक विकास हुआ था? विज्ञान और तकनीकी के अंतिम उद्देश्य को लेकर क्या भारत में कोई विज्ञानदृष्टि थी? और यदि थी तो आज की विज्ञानदृष्टि से उसकी विशेषता क्या थी? आज विश्व के सामने विज्ञान एवं तकनीक के विकास के साथ जो समस्याएं खड़ी हैं उनका समाधान क्या भारतीय विज्ञान दृष्टि में है? ऊपर के पैरे को पढ़कर निश्चिततौर पर हर किसी के मन में यही सवाल हिलोरे मारेंगे तो इन सवालों के जवाब के लिए 'भारत में विज्ञान की उज्ज्वल परंपरा' पुस्तक पढऩी चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक सुरेश सोनी की इस पुस्तक में तमाम सवालों के जवाब निहित हैं। पुस्तक में कुल इक्कीस अध्याय हैं। धातु विज्ञान, विमान विद्या, गणित, काल गणना, खगोल विज्ञान, रसायन शास्त्र, वनस्पति शास्त्र, प्राणि शास्त्र, कृषि विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान, ध्वनि और वाणी विज्ञान, लिपि विज्ञान सहित विज्ञान के अन्य क्षेत्रों में भारत का क्या योगदान रहा इसकी विस्तृत चर्चा, प्रमाण सहित पुस्तक में की गई है। यही नहीं यह भी स्पष्ट किया गया है कि विज्ञान को लेकर पश्चिम और भारतीय धारणा में कितना अंतर है। जहां पश्चिम की धारणा उपभोग की है, जिसके नतीजे आगे चलकर विध्वंसक के रूप में सामने आते हैं। वहीं भारतीय धारणा लोक कल्याण की है। सुरेश सोनी मनोगत में लिखते हैं कि आचार्य प्रफुल्लचंद्र राय की 'हिन्दू केमेस्ट्री', ब्रजेन्द्रनाथ सील की 'दी पॉजेटिव सायन्स ऑफ एन्शीयन्ट हिन्दूज', राव साहब वझे की 'हिन्दी शिल्प मात्र' और धर्मपालजी की 'इण्डियन सायन्स एण्ड टेकनोलॉजी इन दी एटीन्थ सेंचुरी' में भारत में विज्ञान व तकनीकी परंपराओं को प्रमाणों के साथ उद्घाटित किया गया है। वर्तमान में संस्कृत भारती ने संस्कृत में विज्ञान और बॉटनी, फिजिक्स, मेटलर्जी, मशीन्स, केमिस्ट्री आदि विषयों पर कई पुस्तकें निकालकर इस विषय को आगे बढ़ाया। बेंगलूरु के एमपी राव ने विमानशास्त्र व वाराणसी के पीजी डोंगरे ने अंशबोधिनी पर विशेष रूप से प्रयोग किए। डॉ. मुरली मनोहर जोशी के लेखों, व्याख्यानों में प्राचीन भारतीय विज्ञान परंपरा को प्रभावी रूप से प्रस्तुत किया गया है।
    भारत में विज्ञान की क्या दशा और दिशा थी उसको समझने के लिए आज भी वे ग्रंथ मौजूद हैं, जिनकी रचना के लिए वैज्ञानिक ऋषियों ने अपना जीवन खपया। वर्तमान में जरूरत है कि उनका अध्ययन हो, विश्लेषण हो और प्रयोग किए जाएं। हालांकि कई विद्याएं जानने वालों के साथ ही लुप्त हो गईं क्योंकि हमारे यहां मान्यता रही कि अनधिकारी के हाथ में विद्या नहीं जानी चाहिए। विज्ञान के संबंध में अनेक ग्रंथ थे जिनमें से कई आज लुप्त हो गए हैं। हालांकि आज भी लाखों पांडुलिपियां बिखरी पड़ी हैं। भृगु, वशिष्ठ, भारद्वाज, आत्रि, गर्ग, शौनक, शुक्र, नारद, चाक्रायण, धुंडीनाथ, नंदीश, काश्यप, अगस्त्य, परशुराम, द्रोण, दीर्घतमस, कणाद, चरक, धनंवतरी, सुश्रुत पाणिनि और पतंजलि आदि ऐसे नाम हैं जिन्होंने विमान विद्या, नक्षत्र विज्ञान, रसायन विज्ञान, अस्त्र-शस्त्र रचना, जहाज निर्माण और जीवन के सभी क्षेत्रों में काम किया। अगस्त्य ऋषि की संहिता के उपलब्ध कुछ पन्नों को अध्ययन कर नागपुर के संस्कृत के विद्वान डॉ. एससी सहस्त्रबुद्धे को मालूम हुआ कि उन पन्नों पर इलेक्ट्रिक सेल बनाने की विधि थी। महर्षि भरद्वाज रचित विमान शास्त्र में अनेक यंत्रों का वर्णन है। नासा में काम कर रहे वैज्ञानिक ने सन् १९७३ में इस शास्त्र को भारत से मंगाया था। इतना ही नहीं राजा भोज के समरांगण सूत्रधार का ३१वें अध्याय में अनेक यंत्रों का वर्णन है। लकड़ी के वायुयान, यांत्रिक दरबान और सिपाही (रोबोट की तरह)। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता में चिकित्सा की उन्नत पद्धितियों का विस्तार से वर्णन है। यहां तक कि सुश्रुत ने तो आठ प्रकार की शल्य क्रियाओं का वर्णन किया है। सृष्टि का रहस्य जानने के लिए आज जो महाप्रयोग चल रहा है उसकी नींव भी भारतीय वैज्ञानिक ने रखी थी। सत्येन्द्रनाथ बोस के फोटोन कणों के व्यवहार पर गणितीय व्याख्या के आधार पर ऐसे कणों को बोसोन नाम दिया गया है।
    भारत में सदैव से विज्ञान की धारा बहती रही है। बीच में कुछ बाह्य आक्रमणों के कारण कुछ गड़बड़ जरूर हुई लेकिन यह धारा अवरुद्ध नहीं हुई। 'भारत में विज्ञान की उज्ज्वल परंपरा' एक ऐसी पुस्तक है जो भारत के युवाओं को जरूर पढऩी चाहिए।

पुस्तक : भारत में विज्ञान की उज्ज्वल परंपरा
मूल्य : ६० रुपए
लेखक : सुरेश सोनी
प्रकाशक : अर्चना प्रकाशन
१७, दीनदयाल परिसर, ई/२ महावीर नगर,
भोपाल-४६२०१६, दूरभाष - (०७५५) २४६६८६५
   

रविवार, 18 नवंबर 2012

क्या फिर से पढ़ाए जाएंगे नैतिकता के पाठ?

 भ्रष्टाचार, अत्याचार, यौनाचार, अवमानना जैसी बुराइयों की लम्बी सूची है, जो आज देश में चहुं ओर अपने बलवति रूप में दिख रही हैं। इन बुराइयों में लिप्त लोगों को सब दण्ड देना चाह रहे हैं। घोटाले-भ्रष्टाचार रोकने के लिए सिस्टम (जैसे लोकपाल) बनाने की मांग कर रहे हैं। अपराध को कम करने के लिए कानून के हाथ और लम्बे करने पर विमर्श चल रहा है। यह चाहत, मांग और विमर्श अपनी जगह सही है। दुष्टों को दण्ड मिलना ही चाहिए, भ्रष्टाचार रोकने सिस्टम जरूरी है और बेलगाम भाग रहे अपराध पर लगाम कसने के लिए कानून के हाथ मजबूत करना ही चाहिए। लेकिन, इसके बाद भी ये बुराइयां कम होंगी क्या? इस बात को लेकर सबको शंका है।
    ऐसे में विचार आता है कि भारत जैसे सांस्कृतिक राष्ट्र में ये टुच्ची बुराइयां इतनी विकराल कैसे होती जा रही हैं? यही नहीं घोटाले और भ्रष्टाचार व्यक्ति के बड़े होने की पहचान बन गए हैं। हाल ही में यूपीए सरकार के मंत्री सलमान खुर्शीद के ट्रस्ट पर विकलांगों का पैसा खाने का आरोप लगा। मामला पूरे ७१ लाख के घोटाले का था। लेकिन, खुर्शीद के बचाव में एक कांग्रेसी नेता कहते हैं कि ७१ लाख का घोटाला कोई घोटाला है। खुर्शीद मंत्री हैं वे महज ७१ लाख का घोटाला करेंगे ये माना ही नहीं जा सकता। हां, अगर ये ७१ लाख की जगह ७१ करोड़ होते तो सोचना भी पड़ता कि खुर्शीद ने गबन किया है। कांग्रेस नेता के बयान से साफ झलकता है कि बड़ा घोटाला यानी बड़ा मंत्री। खैर जाने दीजिए। कमी कहां हो रही है कि समाज की यह स्थिति बनी है। दरअसल, इसका मूल कारण नैतिक मूल्यों का पतन होना है। जब मनुष्य की आत्मा यह पुकारना ही भूल जाए कि तुम जो कर रहे हो वह गलत है तो मनुष्य किसकी सुनेगा। नैतिक मूल्यों की कमी तो आएगी ही शिक्षा व्यवस्था ही ऐसी कर रखी है कि मनुष्य को मनुष्य नहीं पैसा कमाने वाला रोबोट बनाया जा रहा है। रोबोट तो रोबोट होता है। उसे क्या भले-बुरे का ज्ञान। स्कूल के समय से उसके मन में एक बात बिठाई जाती है कि बड़ा होकर अमीर बनना है, पैसा कमाना है, अरबों-खरबों में खेलना है। बड़ा होकर वह इसी काम में जुट जाता है। जो जिस स्तर पर है उस स्तर का घोटाला कर रहा है।
    आज हालात ये हैं कि व्यक्ति महिलाओं के बदसलूकी करते वक्त भूल जाता है कि उसके घर में भी मां-बहन है। अपने बूढ़े मां-पिता को सताते समय उसे यह ज्ञान नहीं रहता कि आने वाले समय में वह भी बूढ़ा होगा। दूसरों को ठगते समय वह यह नहीं देखता कि बेईमानी की कमाई नरक की ओर ले जाती है। किसी की मेहनत की कमाई चोरी करते वक्त वह सोचता है कि उसे कौन पकड़ेगा, वह भूल जाता है कि आत्मा है, परमात्मा है जो सबको देख रहा है और पकड़ रहा है। यह सब उसे भान नहीं है क्योंकि उसका नैतिक शिक्षण नहीं हुआ। वह नैतिक रूप से पतित है। बेचारा सीखता कहां से? हमारी शिक्षा व्यवस्था में नैतिक मूल्यों को विकसित करने की व्यवस्था ही खत्म कर दी गई। परिवार भी एकल हो गए। दादा-दादी से महापुरुषों का चरित्र सुनकर नहीं सोते आजकल का नौनिहाल बल्कि उनका चारित्रिक विकास तो टीवी, कम्प्यूटर, मोबाइल और इंटरनेट कर रहा है। मैकाले का उदाहरण अकसर सभी देते हैं। उसने ब्रिटेन पत्र लिखकर बताया कि भारत को गुलाम बनाना मुश्किल है क्योंकि यहां की शिक्षा व्यवस्था लोगों के नैतिक पक्ष को मजबूत बनाती है। वे देश और समाज के लिए जीने-मरने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। यदि भारत को गुलाम बनाना है तो सबसे पहले यहां की शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त करनी होगी। बाद में उसने यही किया। भारत में गुरुकुल और ग्राम-नगर की पाठशालाएं खत्म कर मिशनरीज के स्कूल खुलवा दिया। अभी तक हम मैकाले के हिसाब से पढ़ रहे हैं, अपना नैतिक पतन करने के लिए। आजाद होने के बाद सबसे पहला सुधार शिक्षा व्यवस्था में होना चाहिए था लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। अब जाकर भाजपा या अन्य राष्ट्रवादी पार्टियां/संगठन शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन की बात करती हैं तो भगवाकरण कहकर उसका विरोध किया जाता है।
    भारत में गैरसरकारी स्तर पर अतुलनीय योगदान देने वाले महान शिक्षाविद् गिजुभाई बधेका भी इस बात को कई बार कहते थे कि भारत की शिक्षा व्यवस्था का कबाड़ा कर दिया गया है। शिक्षा से नैतिक मूल्य हटाने से बच्चे स्कूल-कॉलेजों से स्वार्थी, स्पर्धालु, आलसी, आराम-तलबी और धर्महीन मनुष्य बनकर निकल रहे हैं। उनका शिक्षा की दशा-दिशा तय करने वालों से आग्रह था कि शिक्षा पद्धति में धार्मिक-नैतिक जीवन को, गुरु-परंपरा और आदर्श शिक्षक को स्थान दें।  लेकिन, इस दिशा में अभी तक कुछ हुआ नहीं। उल्टा जितना था उसे भी निकाल बाहर किया। हां, रामायण के कुपाठ पढ़ाने के जरूर इस बीच प्रयास हुए, भरपूर हुए। खैर, जब बात हाथ से निकलती दिखने लगी है। समाज एकदम विकृत होता दिखने लगा तब जाकर सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की आंख खुली है। अब ये कितनी खुलीं हैं और किस ओर खुलीं हैं, ये देखने की बात है। खबर है कि एनसीईआरटी प्राथमिक स्तर पर नैतिक और मूल्य आधारित शिक्षा शुरू करेगा। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने बड़े होते बच्चों को नैतिक शिक्षा के सकारात्मक पक्ष के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए एनसीईआरटी को इसकी संभावना तलाशने को कहा है। मंत्रालय ने राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के एक प्रतिनिधि मंडल को अगले महीने इस मुद्दे पर विचार-विमर्श के लिए आमंत्रित किया है। नैतिक शिक्षा का विषय प्राथमिक शिक्षा का एक हिस्सा होगा। इसके अलावा मूल्य आधारित विषय जैसे बड़ों का आदर और उनके प्रति संवेदनशीलता इस विषय और उनके प्रति संवेदनशीलता इस विषय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। अब यहां यह देखना है कि एनसीईआरटी और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय नैतिक मूल्य भारत की संस्कृति की जड़ों में तलाश करेंगे या फिर बाहर से आयातित करेंगे। भारत की आने वाली युवा पीढ़ी को संभालकर रखना है और उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनाना है तो उसे शिक्षित करने के लिए भारतीय संस्कृति की जड़ों में ही लौटना होगा। पश्चिम में तो वैसे ही नैतिक मूल्यों के नाम पर कुछ है नहीं। वहां के नैतिक मूल्य ही तो मैकाले हमारी शिक्षा में ठूंस गया जिसके दुष्परिणाम हम आज भुगत रहे हैं।

शनिवार, 28 अप्रैल 2012

देश के बाहर पहुंची संस्कृत की सुगंध


 भा  रत में उसकी मूल और सबसे पुरानी भाषा संस्कृत तुच्छ राजनीति की भेंट चढ़ गई। भाषाई राजनीति के घटिया खेल ने उसे अभिजात्य वर्ग की भाषा करार देकर सामान्य वर्ग को उससे दूर कर दिया। अंग्रेजी की महिमा गाकर संस्कृत की उपयोगिता पर सवाल खड़े कर दिए। सरल, सरस और समृद्ध संस्कृत को कठिन भाषा बताकर उसके अध्ययन को कर्मकाण्डी ब्राह्मणों तक सीमित कर दिया। सुनियोजित षड्यंत्र के तहत संस्कृत को स्कूली अध्ययन से बाहर कर दिया। लेकिन सूरज पर कितना भी मैला फेंका जाए वह गंदला नहीं होता। एक ओर जब संस्कृत के खिलाफ षड्यंत्र रचे जा रहे हैं दूसरी ओर उसे लोकप्रिय बनाने के लिए 'संस्कृत भारती' जी-जान से जुटी है। संस्था के प्रयासों से भारत की संस्कृति की आधार भाषा संस्कृत की चमक देश की भौगोलिक सीमाओं से भी बाहर पहुंच गई।
     शिक्षा के व्यवसायीकरण के बाद से भारत में जहां अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ रहा है, वहीं विदेश में संस्कृत का झंडा बुलंद हो रहा है। देश-विदेश में समय-समय पर हुए तमाम शोधों ने भी स्पष्ट किया कि संस्कृत वैज्ञानिक सम्मत भाषा है। रिसर्च के बाद सिद्ध हुआ है कि कम्प्यूटर के लिए सबसे उपयुक्त भाषा भी संस्कृत ही है। विश्व की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्था नासा भी लंबे समय से संस्कृत को लेकर रिसर्च कर रही है। दुनिया के कई देशों में संस्कृत का अध्ययन कराया जा रहा है। इसके अलावा कई विदेशी संस्कृत सीखने के लिए भारत का रुख कर रहे हैं। इन्हीं में से एक हैं पोलैंड की अन्ना रुचींस्की, जिनका पूरा परिवार ही अब संस्कृतमय हो गया है। रुचींस्की के परिवार में आपस में बातचीत भी संस्कृत में की जाती है। संस्कृत में रुचींस्की की रुचि २० साल पहले जगी थी। अन्ना रुचींस्की अपने पति तामष रुचींस्की के साथ घूमने के लिए भारत आईं थीं। वे बनारस के घाट पहुंचीं। यहां गूंज रहे वेदमंत्रों से प्रभावित होकर वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय पहुंचीं। विश्वविद्यालय में रुचींस्की ने संस्कृत भाषा और भारत की संस्कृति को पहली बार करीब से जाना। अंतत: देवभाषा से प्रेरित होकर अन्ना ने संस्कृत विश्वविद्यालय से डॉ. पुरुषोत्तम प्रसाद पाठक के निर्देशन में वर्ष २००६ में पीएचडी किया। इसके पूर्व वे पोलैंड में भारतीय विज्ञान से एमए कर चुकी थीं। इसी बीच उनके सबसे छोटे पुत्र स्कर्बीमीर रुचींस्की (योगानंद शास्त्री) के मन में भी संस्कृत के प्रति अलख जगी और वह वाराणसी आ गए। उन्होंने संस्कृत विश्वविद्यालय से विदेशी छात्रों के लिए चलाए जा रहे संस्कृत के प्रमाणपत्रीय पाठ्यक्रम में वर्ष १९९९ में दाखिला लिया और द्वितीय श्रेणी से उत्तीर्ण हुए। २००४ में शास्त्री (स्नातक) और २००६ में आचार्य (स्नातकोत्तर) की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद योगानंद ने वर्ष २०१० में योगतंत्रागम विभाग में उपाचार्य डॉ. शीतला प्रसाद उपाध्याय के निर्देशन में उन्होंने 'मंत्रदेव प्रकाशिका तंत्र ग्रंथस्य समालोचनात्मक' विषय पर पीएचडी के लिए पंजीयन कराया। उनकी शोध साधना अभी जारी है। उन्होंने बताया कि उनके पिता ने पोलैंड में ही भारतीय दर्शन पर पीएचडी की है। ऐसे और भी कई उदाहरण हैं जो संस्कृत के प्रति विदेशियों के मन में जगे प्रेम को प्रकट करते हैं। 
      'संस्कृत भारती' ने संस्कृत को बोलचाल की भाषा बनाने का अभियान २५ साल पहले शुरू किया था। संस्था की ओर से देश-विदेश में संस्कृत सिखाने के लिए दस-दस दिन के शिविरों से लेकर कुछ सर्टीफेकेट कोर्स भी कराए जाते हैं। संस्था के प्रयासों की बदौलत देश में कई क्षेत्र संस्कृतमय हो गए हैं। कर्नाटक में २०० परिवारों का गांव मत्तूर वैदिक काल का गांव लगता है। यहां घरों की दीवारों पर संस्कृत में मंत्र लिखे हैं। सुबह-शाम मत्तूर मंत्रोच्चार से गूंजता है। यहां सब आपस में संस्कृत में ही बातचीत करते हैं। वर्तमान पीढ़ी से आगामी पीढ़ी की ओर संस्कृत ज्ञान की गंगा बहती रहे, इसकी व्यवस्था भी है। मत्तूर में गुरुकुल परंपरा का पालन भी किया जा रहा है। भारतीय विद्या भवन के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय पद्यश्री डॉ. मत्तूर कृष्णमूर्ति का संबंध इसी गांव से है। मत्तूर का लगभग हर व्यक्ति संस्कृत का प्रकांड विद्वान है। इतना ही नहीं इनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली है। इनमें से कई विद्वान तो हिन्दू संस्कृति के प्रचार-प्रसार में भी लगे हुए हैं। मध्यप्रदेश में झिरी गांव भी मत्तूर की तरह संस्कृतनिष्ठ गांव है। संस्कृत भारती के अथक प्रयासों से यहां भी बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़े संस्कृत की अच्छी समझ रखते हैं। यहां आप पहुंचेंगे तो संस्कृत अभिभावन से ही आपका स्वागत होगा। खास बात यह है कि यहां इससे पहले संस्कृत का कोई माहौल नहीं था। यहां पहुंचने पर प्रतीत होता है कि यह कोई रामायण काल का गांव है। संभवत: ये लोग दुनिया की नजर से बचे रह गए होंगे। लेकिन, यह सच नहीं। सब आधुनिक सुविधाओं के बीच भी गांव में संस्कृत का प्रचलन है। उन्हें अपनी भाषा पर गर्व है।     
    संस्कृत विश्व की ज्ञात भाषाओं में सबसे पुरानी भाषा है। लैटिन और ग्रीक सहित अन्य भाषाओं की तरह समय के साथ इसकी मृत्यु नहीं हुई। कारण भारत का वैभव तो संस्कृत में ही रचा बसा है। भारत की अन्य भाषाओं हिन्दी, मराठी, सिन्धी, पंजाबी, बंगला, उडिय़ा आदि का जन्म संस्कृत की कोख से ही हुआ है। हिन्दू धर्म के लगभग सभी ग्रंथ संस्कृत में ही लिखे गए हैं। बौद्ध व जैन संप्रदाय के प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत में ही हैं। हिन्दुओं, बौद्धों और जैनियों के नाम भी संस्कृत भाषा पर आधारित होते हैं। अब तो संस्कृत नाम रखने का फैशन भी चल पड़ा है। प्राचीनकाल से अब तक भारत में यज्ञ और देव पूजा संस्कृत भाषा में ही होते हैं। यही कारण रहा कि तमाम षड्यंत्रों के बाद भी संस्कृत को भारत से दूर नहीं किया जा सका। यह दैनिक जीवन में नित्य उपयोग होती रही, भले ही कुछ समय के लिए पूजा-पाठ तक सिमटकर रह गई थी। लेकिन, समय के साथ अब फिर इसकी स्वीकार्यता बढ़ रही है। आज भी पूरे भारत में संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन से भारतीय एकता को सुदृढ़ किया जा सकता है। इसके लिए क्षेत्रीयता और वोट बैंक की कुटिल राजनीति छोडक़र आगे आना होगा। सार्थक प्रयासों से संस्कृत को फिर से जन-जन की भाषा बनाया जा सकता है।

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

मार्क्स-लेनिन जाएं भाड़ में


 भा रत से वामपंथ को विदा करने की सही राह पश्चिम बंगाल की तेजतर्रार मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पकड़ी है। ममता ने लम्बे संघर्ष के दौरान पश्चिम बंगाल की जनता को वामपंथ का कलुषित चेहरा दिखाया और उसे पश्चिम बंगाल की सत्ता से बेदखल किया। ममता बनर्जी को साधुवाद है इतिहास की पुस्तकों में से मार्क्स और लेनिन के अध्याय हटाने के लिए। शुक्र की बात यह है कि ममता भारतीय जनता पार्टी की नेता नहीं हैं। वरना हमारे तमाम बुद्धिजीवि और सेक्युलर जमात 'शिक्षा का भगवाकरण-भगवाकरण' चिल्लाने लगते। आखिर हम गांधी, सुभाष, दीनदयाल, अरविन्द, विवेकानन्द, लोहिया और अन्य भारतीय महापुरुषों, चिंतकों और राजनीतिज्ञों की कीमत पर मार्क्स और लेनिन को क्यों पढ़े? हम अपने ही महापुरुषों के बारे में अपने नौनिहालों को नहीं बता पा रहे हैं ऐसे में मार्क्स और लेनिन के पाठ उन पर थोपने का तुक समझ नहीं आता। अगर किसी को मार्क्स और लेनिन को पढऩा ही है तो स्वतंत्र रूप से पढ़े, उन्हें पाठ्यक्रमों में क्यों घुसेड़ा जाए। जबकि वामपंथियों ने यही किया। उन्हें पता है कि शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से अपनी विचारधारा को किस तरह विस्तार दिया जा सकता है। 
       वामपंथियों का मार्क्स, लेनिन और अन्य कम्युनिस्ट नेताओं के प्रति कितना दुराग्रह है इसकी झलक सन् २०११ में त्रिपुरा राज्य में देखने को मिली। यहां की कम्युनिस्ट सरकार ने कक्षा पांच के सिलेबस से सत्य-अंहिसा के पुजारी महात्मा गांधी की जगह घोर कम्युनिस्ट, फासीवादी, जनता पर जबरन कानून लादने वाले लेनिन (ब्लाडिमिर इल्या उल्वानोव) को शामिल किया है। भारतीय संदर्भ में जहां-जहां वामपंथी ताकत में रहे शिक्षा का सत्यानाश होता रहा। शिक्षा व्यवस्था में सेंध लगाकर ये भारतीयों के मानस पर कब्जा करने का षड्यंत्र रचते रहे हैं। केरल के कई उच्च शिक्षित नागरिकों को विश्व शांति का मंत्र देने वाले महात्मा गांधी और अयांकलि के समाज सुधारक श्रीनारायण गुरु सहित अन्य स्वदेशी विचारकों के संदर्भ में उचित जानकारी नहीं होगी। क्योंकि केरल की कम्युनिस्ट पार्टी ने वहां स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रमों में इन्हें स्थान ही नहीं दिया। बल्कि उन्होंने मार्क्सवादी संघर्ष के इतिहास से किताबों के पन्ने काले कर दिए। केरल के ही महात्मा गांधी विश्वविद्यालय के एमए राजनीति विज्ञान के पाठ्यक्रम में भारतीय राजनीतिक विचारधारा में गांधीजी, वीर सावरकर और श्री अरविन्दों को हटाया गया, इनकी जगह मार्क्सवादी नेताओं को रखा गया। पत्रकार और सांसद अरुण शौरी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'एमिनेण्ट हिस्टोरियन्स' में 'शुद्धो-औशुद्धो' के संदर्भ में पश्चिम बंगाल के अध्यादेश का उदाहरण दिया है। यह अध्यादेश १९८९ को हायर सेकण्डरी स्कूलों को जारी किया गया था। इसमें इतिहास की पाठ्य पुस्तकों के लेखकों और प्रकाशकों कहा गया था कि उनके द्वारा प्रकाशित पुस्तक औशुद्ध (गलतियां) हो तो वे आगामी संस्करण में उन्हें ठीक कर लें। एक लम्बी सूची भी दी गई जिसमें बताया गया कि क्या-क्या गलत है और उसमें क्या संसोधन करना है। इस तरह पश्चिम बंगाल ने कम्युनिस्टों ने भारत के इतिहास में मनमाफिक फेरबदल किया। पश्चिम बंगाल में लम्बे समय तक कम्युनिस्ट सरकार रही। इस दौरान उन्होंने जबर्दस्त तरीके से शिक्षा व्यवस्था में घुसपैठ की। इसके चलते पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, केरल के प्राथमिक विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक के अधिकांश शिक्षक, शिक्षक न होकर माकपा के सक्रिय कार्यकर्ता अधिक रहे हैं। वामपंथियों की मंशानुरूप ये शिक्षक इतिहास, भूगोल, साहित्य सहित अन्य विषयों को तोड़-मड़ोरकर प्रस्तुत करते रहे हैं। वामपंथियों ने अपनी थोथी राजनीति की दुकान चलाने के लिए शिक्षा व्यवस्था को तो जार-जार किया ही इसके माध्यम से राष्ट्रीय भावना को भी तार-तार किया। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था में ममता सरकार की ओर से किए जा रहे सार्थक प्रयासों का स्वागत किया जाना चाहिए। वर्षों से कम्युनिस्टों ने जो गड़बडिय़ां की, उन्हें ठीक किया ही जाना चाहिए। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार ने कक्षा ११वी और १२वी के इतिहास के सिलेबस में बदलाव करने का फैसला लिया है। सिलेबस बनाने वाली कमेटी की ओर से तैयार किए गए नए प्रारूप में पुराने अध्यायों को हटाया गया है। हटाए जाने वालों में मार्क्स और लेनिन के अध्याय भी हैं। पाठ्यक्रम तैयार करने वाली कमेटी के चेयरमैन अभिक मजूमदार ने बताया कि इतिहास में ऐसे कई अध्याय हैं जिन्हें किताबों में बेवजह शामिल किया गया था, जबकि इनकी कोई जरूरत नहीं है। इन्हें हटाने की सिफारिश की गई है। उन्होंने कहा कि जब चीन का इतिहास पाठ्यक्रम में शामिल है तो अलग से मार्क्स और लेनिन को पढऩे की जरूरत क्या है? नए प्रारूप में महिला आंदोलन, हरित क्रान्ति और पर्यावरण से जुड़े अध्याय शामिल हैं। मजूमदार ने बताया कि हमने किसी विषय को जबरन थोपने की कोशिश नहीं की है।
       चालाक कम्युनिस्टों ने भारत में मार्क्स, लेनिन व अन्य वामपंथी विचारकों को पढ़ाने में भी ईमानदारी नहीं दिखाई। वामपंथ का पूरा सच भारत के कम्युनिस्टों ने कभी नहीं पढ़ाया। वामपंथ का साफ-सुथरा और लोक-लुभावन चेहरा ही प्रस्तुत किया गया। कम्युनिस्ट मार्क्सवाद के पीछे छिपा अवैज्ञानिकवाद, फासीवाद, अधिनायकवाद, हिंसक चेहरा कभी सामने लेकर नहीं आए। इससे वे हमेशा कन्नी काटते नजर आए। कम्युनिस्टों ने कभी नहीं पढ़ाया या स्वीकार किया कि रूस में लेनिन और स्टालिन, रूमानिया में चासेस्क्यू, पोलैंड में जारू जेलोस्की, हंगरी में ग्रांज, पूर्वी जर्मनी में होनेकर, चेकोस्लोवाकिया में ह्मूसांक, बुल्गारिया में जिकोव और चीन में माओ-त्से-तुंग ने किस तरह नरसंहार मचाया। इन अधिनायकों ने सैनिक शक्ति, यातना-शिविरों और असंख्य व्यक्तियों को देश-निर्वासन करके भारी आतंक का राज स्थापित किया। मार्क्सवादी रूढि़वादिता ने कंबोडिया में पोल पॉट के द्वारा वहां की संस्कृति के विद्वानों मौत के घाट उतार दिया गया। जंगलों और खेतों में उन्हें मार गिराया गया। रूस और मध्य एशिया के गणराज्यों में भी हजारों गिरजाघरों और मस्जिदों को बंद कर दिया गया। स्टालिन के कारनामों से मार्क्सवाद का खूनी चेहरा जग-जाहिर हुआ। हालांकि इन फासीवादी ताकतों को धूल में मिलाने में जनता ने अधिक समय नहीं लगाया। जल्द ही उक्त देशों से कम्युनिज्म उखाड़ फेंका गया। रूस में तो लेनिन और स्टालिन के शवों को बुरी तरह पीटा गया। इतना ही नहीं वहां कि जनता ने उन सब चीजों को बदलने का प्रयास किया जिन पर कम्युनिज्म ने अपना ठप्पा लगा दिया था। इतिहास की पुस्तकों से वे पन्ने निकाल दिए गए, जो कम्युनिस्ट के काले रंग से रंगे थे। सेंट पीटर्सबर्ग नगर कम्युनिस्टों के शासनकाल में 'लेनिनग्राड' हो गया था। कम्युनिज्म के ध्वस्त होते ही लेनिनग्राड वापिस सेंट पीटर्सबर्ग हो गया। भारत में भी कम्युनिस्टों ने समय-समय पर अपना रंग दिखाया है। महात्मा गांधी के आंदोलन भारत छोड़ो के खिलाफ षड्यंत्र किए, अंग्रेजों का साथ दिया, कम्युनिस्टों ने सुभाषचंद्र बोस और आजाद हिन्द फौज के खिलाफ दुष्प्रचार किया, पाकिस्तान बनाने की मांग को वैध करने और भारत में अनेक स्वायत्त राष्ट्र बनाने का समर्थन किया। १९६२ के युद्ध में चीन की तरफदारी की, क्योंकि वहां कम्युनिस्ट सरकार थी। कम्युनिस्टों के लिए सदैव राष्ट्रहित से बढक़र स्वहित रहे हैं। कम्युनिस्टों ने भारत की संस्कृति, राष्ट्रीय चरित्रों, राष्ट्रीय आदर्शों और परम्पराओं से नफरत करना सिखाया। मार्क्स, लेनिन, माओ, फिदेल कास्त्रो, चे ग्वारा  सबके सब उनके लिए आदर्श बने रहे, स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविन्द, महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, डॉ. हेडगेवार सभी बुर्जुआ, पुनरुत्थानवादी कहे जाते रहे। कितनी बेशर्मी से कम्युनिस्ट इस देश में रहकर ही इस देश के महापुरुषों को दरकिनार करते रहे और विदेश से प्रेरणा लेते रहे। ऐसे कम्युनिज्म को तो इस देश से खुरच-खुरच कर बाहर फेंक देना चाहिए।
         जिस कम्युनिज्म की अर्थी उसके जन्म स्थान से ही उठ गई, उसे भारत में दुल्हन की तरह रखा गया। रूस में मार्क्सवाद का प्रारंभ भीषण नरसंहार, नागरिकों की हत्याओं, दमन और सैनिक गतिविधियों से हुआ। १९९१ में इसका अंत व्यापक भ्रष्टाचार, आर्थिक कठिनाइयों और देशव्यापी भुखमरी के रूप में हुआ। ऐसे कम्युनिज्म का भारत में बने रहने का कोई मतलब नहीं है। ममता बनर्जी की तरह औरों को भी आगे आना होगा। साथ ही इस तरह के सुधारों का स्वागत किया जाना चाहिए। इतना ही नहीं अगर किसी भी स्तर पर वामपंथियों की ओर से विरोध जताया जाता है तो उसका सबको मिलकर मुकाबला करना चाहिए।

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

जिन्दगी के सवालों के जवाब देती पुस्तक : मंगल भवन अमंगलहारी


 क भी-कभी हम सुनते हैं कि जिन्दगी सवालों के नागपाश में उलझी हुई है। ये सवाल मानव को जीवन भर सताते हैं। हर आदमी इनके उत्तर खोजता रहता है, लेकिन उसे ठीक-ठीक उत्तर नहीं मिलते। ऐसे ही सवालों के जवाब 'मंगल भवन अमंगलहारी' पुस्तक देती है। पुस्तक में जन्म से मृत्यु तक जीवन के विकट सफर से जुड़े सभी सवालों के उत्तर हैं। यह पुस्तक जीवन को सरल, सुगम और संस्कारपूर्ण बनाने में मदद कर सकती है। 
       पुस्तक में कुल ३६४ पृष्ठ हैं। इंसान के जीवन के उद्देश्य, इस संसार में करना ही चाहिए ऐसे कार्य कौन-से और कितने हैं, ८०० प्रश्नों के उत्तर में सब समाहित है। खास बात यह है कि इन सवालों को पुस्तक रूप देने से पहले कर्नाटक के कई मंदिरों में प्रयोग किया गया। मंदिरों व अन्य जगह प्रत्येक दिन एक प्रश्न सूचना पटल पर लिखकर टांग दिया जाता था। इससे मंदिर आने वाले सभी लोगों के मन में प्रश्नों के उत्तर को लेकर कौतूहल देखा गया। उनकी मनोस्थिति में बदलाव देखे गए। ऐसे ही ८०० प्रश्नों को बाद में पुस्तक की सूरत में प्रकाशित कराया गया।
        वर्ष २०१० में पहली बार पुस्तक कन्नड भाषा में 'मनेय मांगल्य' के नाम से प्रकाशित कराई गई। मनेय मांगल्य का अर्थ होता है घर ही मांगल्य स्त्रोत। पुस्तक की मांग को देखते हुए एक ही साल में इसके छह: सस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। कर्नाटक में पुस्तक की लोकप्रियता इतनी है कि शुभ और मांगलिक अवसरों पर उपहार स्वरूप देने की परंपरा सी बन गई है। इसकी लोकप्रियता और समाज में आवश्यकता को देखते हुए इसे हिन्दी भाषा में 'मंगल भवन अमंगलहारी' नाम से प्रकाशित कराया गया है। 
        वर्तमान संदर्भ में देखें तो ऐसी पुस्तकों के प्रचार-प्रसार की अति आवश्यकता है। हमारे साथ की पीढ़ी भारतीय संस्कारों से दूर हो रही है। ऐसे में आने वाली पीढ़ी की हम कल्पना कर सकते हैं। परिवारों में संस्कारपूर्ण वातावरण न होने से समाज के सामने विकट समस्या खड़ी हो गई है। समाज में व्याभिचार बढ़ गया है। हर कोई भोग विलास में डूबा है। उन्हें सही राह भी नहीं दिख रही है। ऐसे में मंगल भवन अमंगलहारी पुस्तक बहुत उपयोगी साबित हो सकती है।

प्रकाशक : परिवार प्रदीपिका 
७५ - ७६, ज्ञानगिरि
४ वां क्रॉस, २ वां मईन, सौदामिनी ले आउट
कोणनकुंटे मईन रोड
बेंगलूरु - ५६००६२ 
दूरभाष - ०९९००१५७७१४
मूल्य - १२० रुपए