बुधवार, 25 नवंबर 2020

'स्व' की ओर बढ़ते भारत को 'पाथेय'



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ रहा है। अपनी स्थापना के प्रारंभ से ही विजयादशमी पर सरसंघचालक के उद्बोधन की परंपरा है। वैसे तो विजयादशमी का उद्बोधन स्वयंसेवकों के लिए पाथेय होता है परंतु यह संघ के दृष्टिकोण को भी प्रकट करता है और भविष्य की राह की ओर इंगित करता है। इसलिए संघ के स्वयंसेवकों का ही नहीं अपितु देश के प्रबुद्ध वर्ग का ध्यान भी सरसंघचालक के विजयादशमी के उद्बोधन पर रहता है। 25 अक्टूबर को वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने जो उद्बोधन दिया, वह बहुत महत्वपूर्ण है। भारत अपने 'स्व' की ओर बढ़ रहा है, इस बात की आश्वस्ति उनके संबोधन में थी और भविष्य की चुनौतियां की ओर संकेत और उनसे निपटने की तैयारियों का आग्रह भी। इसलिए उनके इस उद्बोधन की देशव्यापी चर्चा होनी चाहिए। भारत हितचिंतकों के वर्ग में विमर्श होने चाहिए। शासन स्तर पर भी उनकी विचारों के अनुपालन में नीतियां बनाई जा सकती हैं। भारत के संदर्भ में 2020 महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक वर्ष है। ऐसा वर्ष, जिसे ऐतिहासिक घटनाओं, उपलब्धियों और सामर्थ्य के लिए याद किया जाएगा। किंतु, कोरोना संक्रमण के कारण गौरव की अनुभूति कराने वाले अवसरों की चर्चा अधिक नहीं होने दी। सरसंघचालक ने उचित ही ध्यान दिलाया कि पिछली विजयादशमी से अब तक बहुत महत्व की बातें देश में हुई हैं। भारत के स्वाभिमान के प्रतीक श्रीराम मंदिर पर निर्णय, श्रीरामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण हेतु भूमिपूजन, पड़ोसी देशों में धार्मिक आधार पर उत्पीडऩ झेल रहे हिन्दुओं को भारत की नागरिकता एवं स्वाभिमान से जीने का अधिकार देने वाले कानून का निर्माण, यह सब इसी बीच में हुआ। शैव दर्शन की भूमि पर अलगाव का कारण और विकास में अवरोध बने अस्थायी अनुच्छेद-370 को निष्प्रभावी करने वाला निर्णय हालांकि कुछ पहले ही हो चुका था, लेकिन इस बीच ऐतिहासिक निर्णय का असर भी दिखा। 

अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर बनाने के लिए भारत के लोग उसी दिन से संघर्ष कर रहे थे जब एक आक्रांता ने हमारे गौरव को पददलित करने की मानसिकता से श्रीराम मंदिर को ध्वस्त किया और तथाकथित मस्जिद का ढांचा खड़ा कर दिया। भारतीय समाज कितना सहिष्णु है, यह आंदोलन इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है। ऐसा कोई विरला ही समाज/देश होगा, जिसने अपने ही मानबिंदु को प्राप्त करने के लिए धैर्यपूर्वक संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया। वर्षों की प्रतीक्षा पूर्ण होने के ऐतिहासिक अवसर पर किसी प्रकार की उत्तेजना को प्रकट न करते हुए संयमित व्यवहार प्रदर्शित किया। भूमिपूजन के दिन 'भारत का नियति से भेंट का अवसर' का स्वागत भी शांत, सौम्य, सात्विक, पवित्र और स्नेहिल वातावरण में किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जब इस ऐतिहासिक अवसर का वर्णन कर रहे थे, तब भारत के मूल स्वभाव का बखूबी चित्रण जनमानस में पहुंचा। 

हम सबने देखा कि कोरोना संक्रमण के कारण देश-दुनिया में सबकुछ ठप हो गया। एक निराशा का वातावरण बनने लगा, मानो अब सब समाप्त हो जाएगा। भारत में तो अपने ही समाज के एक बड़े वर्ग के सामने जीवनयापन और दो वक्त की रोटी का संकट उपस्थित हो गया। तब दुनिया ने 'भाव' को अनुभूत किया। 'खुद दर्द में होते हुए दूसरों के जख्मों को सिलते हुए' भारत को दुनिया ने बहुत करीब से देखा। सरसंघचालक जी ने इस ओर भी सबका ध्यान आकर्षित किया। यह अनुकरणीय बात है और संघ के विराट लक्ष्य को प्रकट करता है कि देश में सबसे अधिक सेवा और राहत कार्यों का संचालन करने वाले संगठन के मुखिया ने इसका श्रेय स्वयं के संगठन को न देकर, सेवाभावी भारतीय समाज को दिया। इस संदर्भ में उनका वह उद्बोधन भी सबको स्मरण में रखना चाहिए, जो घरवास (लॉकडाउन) के समय में उन्होंने दिया था। तब उन्होंने संघ के सेवाकार्यों की स्पष्ट संकल्पना प्रस्तुत की थी। संघ के स्वयंसेवकों के लिए सेवाकार्य कोई उपकार या यश प्राप्त करने का प्रयोजन नहीं है, बल्कि उनके लिए तो सेवा 'करणीय कार्य' हैं। सरसंघचालक डॉ. भागवत ने कोरोनयोद्धाओं के सेवाभाव, कर्तव्य परायणता और समर्पण की स्तुति करते हुए कहा कि "प्रशासन के कर्मचारी, विभिन्न उपचार पद्धतियों के चिकित्सक तथा सुरक्षा और सफाई सहित सभी काम करने वाले कर्मचारी उच्चतम कर्तव्यबोध के साथ रुग्णों की सेवा में जुटे रहे। स्वयं को कोरोना वायरस की बाधा होने की जोखिम उठाकर उन्होंने दिन-रात अपने घर परिवार से दूर रहकर युद्ध स्तर पर सेवा का काम किया। नागरिकों ने भी अपने समाज बंधुओं की सेवा के लिए स्वयंस्फूर्ति के साथ जो भी समय की आवश्यकता थी, उसको पूरा करने में प्रयासों की कमी नहीं होने दी। समाज की मातृशक्ति भी स्वप्रेरणा से सक्रिय हुई। महामारी के कारण पीडि़त होकर जो लोग विस्थापित हो गए, जिनको घर में वेतन और रोजगार बंद होने से विपन्नता का और भूख का सामना करना पड़ा, वह भी प्रत्यक्ष उस संकट को झेलते हुए अपने धैर्य और सहनशीलता को बनाकर रखते रहे। अपनी पीड़ा व कठिनाई को किनारे करते हुए दूसरों की सेवा में वे लग गए, ऐसे कई प्रसंग अनुभव में आए। विस्थापितों को घर पहुंचाना, यात्रा पथ पर उनके भोजन विश्राम आदि की व्यवस्था करना, पीडि़त विपन्न लोगों के घर पर भोजन आदि सामग्री पहुँचाना, इन आवश्यक कार्यों में सम्पूर्ण समाज ने महान प्रयास किए। एकजुटता एवं संवेदनशीलता का परिचय देते हुए जितना बड़ा संकट था, उससे अधिक बड़ा सहायता का उद्यम खड़ा किया।" सरसंघचालक ने इस ओर भी सबका ध्यान आकर्षित किया कि भौतिकवाद की अंधी दौड़ में व्यस्त इस दुनिया को कोरोना महामारी ने भारतीय संस्कृति की सर्वोच्चता और उसकी आवश्यकता से परिचित कराया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति के जीवन में स्वच्छता, स्वास्थ्य तथा रोगप्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने वाली अपनी कुछ परंपरागत आदतें एवं आयुर्वेद जैसे शास्त्र भी इस समय उपयुक्त सिद्ध हुए। अब तो यह चिकित्सकीय प्रक्रिया से भी सिद्ध हुआ कि कोरोना मरीजों को सबसे अधिक लाभ आयुर्वेद से हुआ है। 

संघ सिर्फ तात्कालिक परिस्थिति में सक्रिय नहीं होता है, बल्कि उससे सीखकर आगे की योजना-रचना भी करता है। निसंदेह कोरोना के कारण बहुत नुकसान हुआ है। भारत अब उससे उबरता दिख भी रहा है। स्थितियों को सामान्य बनाने के लिए अब सबके सहयोग की आवश्यकता है। इसलिए उन्होंने आह्वान किया है कि "इस परिस्थिति से उबरने के लिए अब दूसरे प्रकार की सेवाओं की आवश्यकता है। विद्यालयों का प्रारम्भ, शिक्षकों के वेतन तथा बच्चों की शिक्षा के लिए कुछ सेवा सहायता करनी पड़ेगी। विस्थापन के कारण रोजगार चला गया, नए क्षेत्र में रोजगार पाना है। अत: रोजगार का प्रशिक्षण व रोजगार का सृजन करना पड़ेगा। इस सारी परिस्थिति के चलते घरों में एवं समाज में तनाव बढऩे की परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में अपराध, अवसाद, आत्महत्या आदि कुप्रवृत्तियां ना बढ़ें, इसलिए समुपदेशन की व्यापक आवश्यकता है।" सरसंघचालक के उद्बोधन के इस हिस्से में वे वृहद समाज के सचेत अभिभावक के रूप में नज़र आये। 

पर्यावरण की चिंता करने का आग्रह भी उनके उद्बोधन में दिखा। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे हमने अपनी प्रकृति को नुकसान पहुंचाया है। इसकी अनुभूति भी कोरोना काल में हुई है। उन्होंने कहा- "कोरोना महामारी की परिस्थिति के चलते जीवन लगभग थम सा गया। कई नित्य की क्रियाएं बंद हो गईं। उनको देखते हैं तो ध्यान में आता है कि जो कृत्रिम बातें मनुष्य जीवन में प्रवेश कर गई थीं, वे बंद हो गईं और जो मनुष्य जीवन की शाश्वत आवश्यकताएं हैं, वास्तविक आवश्यकताएं हैं, वे चलती रहीं। कुछ कम मात्रा में चली होंगी, लेकिन चलती रहीं। अनावश्यक और कृत्रिम वृत्ति से जुड़ी हुई बातों के बंद होने से एक हफ्ते में ही हमने हवा में ताजगी का अनुभव किया। झरने, नाले, नदियों का पानी स्वच्छ होकर बहता हुआ देखा। खिड़की के बाहर बाग-बगीचों में पक्षियों की चहक फिर से सुनाई देने लगी। अधिक पैसों के लिए चली अंधी दौड़ में, अधिकाधिक उपभोग प्राप्त करने की दौड़ में हमने अपने आपको जिन बातों से दूर कर लिया था, कोरोना परिस्थिति के प्रतिकार में वही बातें काम की होने के नाते हमने उनको फिर स्वीकार कर लिया और उनके आनंद का नए सिरे से अनुभव लिया। उन बातों की महत्ता हमारे ध्यान में आ गई। नित्य व अनित्य, शाश्वत और तात्कालिक, इस प्रकार का विवेक करना कोरोना की इस परिस्थिति ने विश्व के सभी मानवों को सिखा दिया है। विश्व के लोग अब फिर से कुटुम्ब व्यवस्था की महत्ता, पर्यावरण के साथ मित्र बन कर जीने का महत्त्व समझने लगे हैं। यह सोच कोरोना की मार की प्रतिक्रिया में तात्कालिक सोच है या शाश्वत रूप में विश्व की मानवता ने अपनी दिशा में थोड़ा परिवर्तन किया है यह बात तो समय बताएगा। परन्तु इस तात्कालिक परिस्थिति के कारण शाश्वत मूल्यों की ओर व्यापक रूप में विश्व मानवता का ध्यान खींचा गया है, यह बात निश्चित है।" 

सरसंघचालक ने 'देशविरोधी ताकतों' को भी आड़े हाथ लिया और देशभक्त जनता को उनके षड्यंत्रों से सावधान रहने का आग्रह किया। पड़ोसी देशों में कट्टरता और धार्मिक अत्याचार से पीड़ित हिन्दू समाज सहित अन्य अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने का कानून भारत सरकार ने बनाया, जिसके विरोध में दिल्ली के 'शाहीनबाग' से लेकर देशभर में निर्लज्ज प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों की आड़ में साम्प्रदायिक ताकतों ने देश को हिंसा में झौंकने का षड्यंत्र रचा। देश के सौहार्द को बिगाड़ने के लिए असामाजिक तत्व सक्रिय हो गए। भारतीय मुसलमानों के मन में द्वेष और भय पैदा करने का प्रयास किया। देशवासियों ने इस सबको नज़दीक से देखा। भविष्य में ऐसी ताकतें फिर से सिर न उठाएं का समाज विभाजन पैदा करने के षड्यंत्र न रच पाएं, इसके लिए सरसंघचालक ने बाबा साहब अंबेडकर का उल्लेख करते हुए कहा- "25 नवम्बर, 1949 के संविधान सभा में दिये अपने भाषण में श्रद्धेय डॉ. बाबासाहब अंबेडकर ने ऐसे तरीकों को 'अराजकता का व्याकरण' कहा था। ऐसे छद्मवेषी उपद्रव करने वालों को पहचानना एवं उनके षड्यंत्रों को नाकाम करना तथा भ्रमवश उनका साथ देने से बचना समाज को सीखना पड़ेगा।" 

विपक्षी राजनैतिक दलों के लिए भी उन्होंने मार्गदर्शन दिया। वर्तमान परिस्थितियों में उनके विचार को सभी राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को सुनना और उस पर चिंतन करना चाहिए। आखिर राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का व्यवहार और नीति कैसी होनी चाहिए? सरसंघचालक कहते हैं- "सत्ता से जो वंचित रहे हैं, ऐसे सत्ता चाहने वाले राजनीतिक दलों के पुन: सत्ता प्राप्ति के प्रयास, यह प्रजातंत्र में चलने वाली एक सामान्य बात है। लेकिन उस प्रक्रिया में भी एक विवेक का पालन अपेक्षित है कि वह राजनीति में चलने वाली आपस की स्पर्धा है, शत्रुओं में चलने वाला युद्ध नहीं। स्पर्धा चले, स्वस्थ चले, परंतु उसके कारण समाज में कटुता, भेद, दूरियों का बढऩा, आपस में शत्रुता खड़ी होना, यह नहीं होना चाहिए। ध्यान रहे, इस स्पर्धा का लाभ लेने वाली, भारत को दुर्बल या खण्डित बनाकर रखना चाहने वाली, भारत का समाज सदा कलहग्रस्त रहे इसलिए उसकी विविधताओं को भेद बता कर, या पहले से चलती आई हुई दुर्भाग्यपूर्ण भेदों की स्थिति को और विकट व संघर्षयुक्त बनाते हुए, आपस में झगड़ा लगाने वाली शक्तियां, विश्व में हैं व उनके हस्तक भारत में भी हैं। उनको अवसर देने वाली कोई बात अपनी ओर से ना हो, यह चिंता सभी को करनी पड़ेगी।" 

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में स्वदेशी के विचार पर प्रकाश डाला। उसकी आवश्यकता को रेखांकित किया। चीन के सामने पूर्ण सामर्थ्य के साथ खड़े होने के लिए सरकार की नीति की सराहना की। उन्होंने दोहराया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सम्पूर्ण देश में बंधुता, पुरुषार्थ तथा न्याय, नीतिपूर्ण व्यवहार का वातावरण चतुर्दिक खड़ा करने का प्रयास अपनी स्थापना के समय से कर रहा है। उन्होंने आह्वान किया कि अपने संविधान को यशस्वी करने के लिए पूरे समाज में स्पष्ट दृष्टि, परस्पर समरसता, एकात्मता की भावना तथा देश हित सर्वोपरि मानकर किया जाने वाला व्यवहार इस संघ कार्य से ही खड़ा होगा। इस पवित्र कार्य में प्रामाणिकता से, निस्वार्थ बुद्धि से एवं तन-मन-धन पूर्वक देशभर में लक्षावधि स्वयंसेवक लगे हैं। आपको भी उनके सहयोगी कार्यकर्ता बनकर देश के नवोत्थान के इस अभियान के रथ में हाथ लगाने का आवाहन करता हूँ।" 

निस्संदेह, सरसंघचालक मोहन भागवत का यह उद्बोधन देश की सज्जन शक्ति के मध्य विमर्श का विषय बनना चाहिए। उनके विचारों को आधार बनाकर 'विश्वगुरु भारत' की राह बनानी चाहिए। संगठित होकर देश को मजबूत करने की आधारशिला रखनी चाहिये। उनके आग्रह/आह्वान को अपने जीवन में उतार कर श्रेष्ठ भारत के नवनिर्माण के प्रयत्न करने चाहिए। संघ के इस 'ईश्वरीय कार्य' में सहस्त्रों राष्ट्रभक्त नागरिकों के सहयोग की आवश्यकता है। अपने उद्बोधन को उन्होंने प्रेरक गीत की दो पंक्तियों के साथ पूरा किया- 

"प्रश्न बहुत से उत्तर एक, कदम मिलाकर बढ़ें अनेक।

वैभव के उत्तुंग शिखर पर, सभी दिशा से चढ़ें अनेक।

शनिवार, 21 नवंबर 2020

बेटी के लिए कविता-9

यह कविता ऋष्वी के 6वें जन्मदिवस पर

पसीने की बूंदें

याद है तुम्हें
बी-फॉल की सीढिय़ां उतरते हुए
मेरी गोद में थी तुम
देखकर माथे पर पसीने की बूंदें 
तुमने कहा था- 
“ध्यान रखना पिताजी, 
ये पसीना मुझ पर न गिरे”

तुम्हारे चेहरे पर निश्छल हंसी 
और देखकर एक विश्वास 
मंद-मंद मुस्काया था मैं
तुम्हें पसीना न बहाना पड़े
सुनिश्चित करूंगा यह 
परंतु, पसीने का मूल्य
उसकी ताकत और ताप 
पता होना ही चाहिए तुम्हें
ताकि पसीने का सम्मान
कर पाओ तुम। 

किसान का पसीना गिरता है खेत में
लहराता है धरती का आंचल
मजदूर के पसीने की बूंदें
करती हैं निर्माण बुलंद भारत का
कलाकार का पसीना
निखारता है कला-संस्कृति को
शिक्षक अपने पसीने से
गढ़ता है भारत के भविष्य को
चिकित्सक पसीने की बूंदों से
बचाता है लोगों का जीवन
बाकी सब की तरह ही
माता-पिता के पसीने की बूंदों से
पोषित होता है संतति का जीवन।

सुनिश्चित करूंगा मैं
अपने पसीने की बूंदों से
तुम्हारे जीवन में सुख लाऊं
चेहरे की इस हंसी को,
चमक और धमक को बढ़ाऊं
मेरा पसीना गिरे जहाँ
उठ खड़े हों बाग-बगीचे वहाँ
पसीने से सिंचित पुष्पों से
सुंगधित हो जीवन तुम्हारा 
एक-एक बूंद से समृद्ध हो,
सुरक्षित हो, जीवन तुम्हारा। 
परंतु, शर्त एक यही है
निरादर न करना कभी
पसीने की बूंदों का।