रविवार, 30 सितंबर 2018

तेलुगु मीडिया की विकास यात्रा पर महत्वपूर्ण सामग्री से भरपूर मीडिया विमर्श का "तेलुगु मीडिया विशेषांक"

भाषायी पत्रकारिता पर मीडिया विमर्श का एक और महत्वपूर्ण प्रयास
- लोकेन्द्र सिंह - 
पत्रकारिता एवं संचार क्षेत्र से जुड़े लोगों को मीडिया विमर्श के प्रत्येक अंक का बेसब्री से इंतजार रहता है। मीडिया विमर्श का प्रत्येक अंक न केवल अपने पाठकों एवं प्रबुद्ध वर्ग की कसौटी पर खरा उतरता है, बल्कि और अधिक अपेक्षाएं बढ़ा देता है। 12 वर्ष से यह क्रम जारी है। एक के बाद एक महत्वपूर्ण विशेषांक हमारे सामने आए हैं। इस सबके पीछे मीडिया विमर्श के कार्यकारी संपादक प्रो. संजय द्विवेदी हैं। 
          भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता की समृद्ध विरासत और प्रयोगों को हिंदी जगत के सामने लाने का उल्लेखनीय कार्य भी मीडिया विमर्श के माध्यम से प्रो. संजय द्विवेदी ने अपने हाथों में संभाल रखा है। वह सबसे पहले उर्दू पत्रकारिता पर चर्चित विशेषांक लेकर आए। उसके बाद गुजराती पत्रकारिता पर एक उल्लेखनीय विशेषांक उपलब्ध कराया। अब नये विशेषांक के माध्यम से उन्होंने हिंदी मीडिया के जगत को तेलुगु मीडिया से परिचित कराने का प्रयत्न किया है। 
           हम सब जानते हैं कि तेलुगु भाषा का एक बड़ा परिवार है। तेलुगु भारत की प्राचीनतम भाषाओं में से एक है। भारत में तेलुगु बोलने वालों की संख्या 15 करोड़ से अधिक है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के अलावा संपूर्ण भारत में तेलुगु भाषी रहते हैं। यही नहीं, भारत के बाहर भी तेलुगु बोलने वालों की बड़ी संख्या है। ऐसे में तेलुगु मीडिया को समझना और उसको जानना जरूरी हो जाता है। इस काम में मीडिया विमर्श का यह अंक बहुत ही सहयोगी और महत्वपूर्ण सिद्ध होगा। 
          तेलुगु मीडिया विशेषांक के अतिथि संपादक हैं- सी. जयशंकर बाबु, जिन्हें अकसर हम मीडिया विमर्श में पढ़ते रहे हैं। उन्होंने अपनी जिम्मेदारी का बखूबी निर्वाहन किया है। तेलगू मीडिया के विविध आयामों पर इस विशेषांक में सामग्री है। भारतीय भाषायी पत्रकारिता का जगत कितना वृहद और समृद्ध है, यह समझाने में मीडिया विमर्श की यह श्रृंखला साधुवाद की पात्र है। मीडिया विमर्श की यह श्रृंखला अनवरत चलती रहनी चाहिए... यही शुभकामनाएं हैं।  
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मीडिया विमर्श के "तेलुगु मीडिया विशेषांक" पर यूट्यूब चैनल "अपना वीडियो पार्क" में चर्चा देखिये.... 


सोमवार, 24 सितंबर 2018

सहिष्णुता और सादगी से प्रश्न करती ‘हम असहिष्णु लोग’

- सुदर्शन वीरेश्वर प्रसाद व्यास
‘हम असहिष्णु लोग’...यकीनन, पुस्तक के शीर्षक से यह तो पूर्व में ही आभास हो जाता है कि लेखक इस पुस्तक के पाठकों से प्रत्यक्ष संवाद के साथ ही एक अप्रत्यक्ष संवाद उन लोगों से भी करना चाहते हैं जो एक विचारधारा (वर्ग) विशेष के प्रति ‘असहिष्णु’ शब्द की रट लगाए बैठे हैं। हालांकि, पुस्तक चर्चा से पूर्व हमें यह अच्छी तरह से जान लेना चाहिए कि असल में इस ‘असहिष्णु’ शब्द के मायने क्या हैं? देशभर के ख्यातिलब्ध विद्वानों ने इस शब्द को अपने हिसाब से विभिन्न परिभाषाओं में गढ़ा है, किसी का मानना है कि दूसरे धर्म या विचार से असहमति ही असहिष्णुता है, कोई कहता है कि अनायास क्रोधित होकर तेश में आना असहिष्णुता है, किसी का मानना है दूसरों की आवाज़ दबाकर अपनी आवाज़ बुलन्द करना असहिष्णुता है तो किसी का मानना है कि जो पसन्द न हो, उसे बर्दाश्त करना असहिष्णुता है। सरल शब्दों में कहा जाए तो जो व्यक्ति को निजी तौर पर पसंद ना हो, उसके खिलाफ जाना या उसे बर्दाश्त ना कर पाना असहिष्णुता है। इसके अतिरिक्त किसी के विचारों से सहमत न हो पाना तथा बिना किसी कारण के उनकी काट करना (सिरे से नकारना) असहिष्णुता का प्रतीक है। या कहें कि उसे सहन ना करना, जो अपने से भिन्न हो, फिर चाहे वह धार्मिक हो, सांस्कृतिक हो, नस्लीय हो या किसी अन्य प्रकार से भिन्न हो, उसे बर्दाश्त ना करना असहिष्णुता कहलाती है। असहिष्णुता को अंग्रेजी में इनटॉलरेंस (Intolerance) कहा जाता है।

रविवार, 23 सितंबर 2018

हैरतंगेज और रोमांचक नृत्य भवई

- लोकेन्द्र सिंह
भवई, राजस्थान के पारंपरिक लोक नृत्यों में से एक है। यह नृत्य बहुत कठिन है। हैरतंगेज और अत्यंत रोमांचक भी। जब नर्तकियां भवई की प्रस्तुति देती हैं, तो लोग दाँतों तले अंगुलियां दबा कर उनकी प्रस्तुति देखते हैं। भवई नृत्य के लिए लंबी नृत्य साधना की आवश्यकता होती है। कुशल कलाकार ही इस नृत्य की प्रस्तुति दे सकते हैं। भवई नृत्य में नर्तकियां अपने सिर पर 7 से 8 घड़े एक के ऊपर एक रखकर संतुलन बनाते हुए नाचती हैं। उसके बाद इस नृत्य को और अधिक रोमांचक बनाने के लिए यह नर्तकियां सिर पर घड़े रख कर काँच या अन्य धातु के गिलास पर पैर रखकर नाचती हैं। दर्शक सबसे अधिक हैरत में तब पड़ जाते हैं, जब यह कुशल नर्तकियां नंगी तलवारों के ऊपर चढ़ कर नाचती हैं। 
          मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में 11-12 अगस्त, 2018 को आयोजित 'यंग थिंकर्स कॉन्क्लेव' में राजस्थानी कलाकारों की भवई नृत्य की एक प्रस्तुति दी। उस शानदार प्रस्तुति की छोटी-सी वीडियो क्लिप की लिंक यहाँ दी हुई है। उस लिंक पर क्लिक करके आप भी रोमांचित करने वाले भवई नृत्य का आनंद ले सकते हैं। उल्लेखनीय है कि भवई नृत्य में पुरुष संगीतकार नर्तकियों के लिए पृष्ठभूमि संगीत बजाता है। संगीत के लिए कई यंत्र जैसे पखावज, ढोलक, झांझर, सारंगी और हार्मोनियम बजाए जाते हैं। आमतौर पर इसके साथ ही मधुर राजस्थानी लोक गीत भी संगीतकारों द्वारा गाया जाता है। नर्तकियों सहित सभी कलाकार राजस्थान के पारंपरिक रंगीन और सुंदर कपड़े पहनते हैं। 
          यह रहा भवई नृत्य का लिंक। 

शनिवार, 22 सितंबर 2018

समाधानमूलक प्रश्नोत्तरी

भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण
- लोकेन्द्र सिंह
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 'भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' व्याख्यान माला में अंतिम दिन अभ्यागतों के प्रश्नों के उत्तर दिए। प्रश्न वही थे, जो हमेशा संघ से पूछे जाते हैं किंतु इस बार यह प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण थे क्योंकि उनको समाधानमूलक उत्तरों ने पूर्ण कर दिया। संघ ने 'सनातन प्रश्नों' के उत्तर अधिकृत एवं सर्वोच्च पदाधिकारी के माध्यम से संपूर्ण समाज के सम्मुख रख दिए हैं। भले ही कोई उनसे सहमत हो या असहमत, किंतु अब कम से कम अनेक प्रश्नों पर संघ का अधिकृत पक्ष तो सार्वजनिक हो गया है। हालाँकि अनेक प्रश्नों के उत्तर संघ पूर्व में भी अपने कार्य-व्यवहार, अधिकृत वक्तव्यों एवं प्रस्तावों के माध्यम से समाज के सामने रख चुका है। कुल मिलाकर इस बौद्धिक यज्ञ की पूर्णाहुति लोक-विमर्श और लोक-व्यवहार को दिशा देने वाली रही। व्याख्यानमाला में शामिल अभ्यागतों के 215 प्रश्नों के उत्तर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने दिए। तीसरे दिन के आयोजन को कुछ नाम देना हो तो 'समाधानमूलक प्रश्नोत्तरी' दिया जा सकता है।

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

हिंदुत्व का अर्थ

भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण-3
- लोकेन्द्र सिंह 
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 'भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ का दृष्टिकोण' में हिंदुत्व पर बहुत ही महत्वपूर्ण विचार देश के सामने रखे हैं। उनके विचार हिंदुत्व की भारतीय संकल्पना को पूर्ण रूप से स्पष्ट करते हैं। 'हिंदुत्व' गाहे-बगाहे बौद्धिक और राजनीतिक जगत में चर्चा का विषय बना रहता है। दुर्भाग्य से भारत में कुछ ऐसी ताकतें हैं, जो भारतीय अवधारणाओं के प्रति सामान्य जन के मन में घृणा उत्पन्न करने का प्रयास करती रहती हैं। राष्ट्रवाद और हिंदुत्व ऐसे ही शब्द हैं, जिनको लेकर भारत विरोधी विचार से प्रेरित लोग सदैव नकारात्मक ढंग से बात करते हैं। हिंदुओं की नाराजगी से बचने के लिए आजकल उन्होंने 'हिंदुत्व' पर रणनीति बदल ली है। अब वह दो हिंदुत्व बताते हैं- कट्टर हिंदुत्व और सॉफ्ट हिंदुत्व। हिंदुत्व को श्रेणीबद्ध करते समय वह आगे कहते हैं कि आरएसएस का हिंदुत्व कट्टर है। हिंदुत्व को बदनाम करने के लिए चलने वाले इस षड्यंत्र के मुकाबले सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने बहुत ही सहजता से हिंदुत्व के विराट, उदार, सहिष्णु स्वरूप के दर्शन सबको कराए हैं। उन्होंने सकारात्मक ढंग से अपना विचार रखा।

बुधवार, 19 सितंबर 2018

संघ एक परिचय

'भविष्य का भारत: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' - 2 
- लोकेन्द्र सिंह
संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 'भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' विषय पर पहले दिन के व्याख्यान में संघ का परिचय प्रस्तुत किया। संघ की विकास यात्रा को देश-दुनिया के महानुभावों के सम्मुख रखा। सहज संवाद में अनेक प्रश्नों के उत्तर दिए। सबसे महत्वपूर्ण बात अपने संबोधन के प्रारंभ में उन्होंने कही- 'मैं यहां आपको सहमत करने नहीं आया, बल्कि संघ के बारे में वस्तुस्थिति बताने आया हूं।' यह कहते हुए उन्होंने बताया कि आप संघ के संबंध में अपना विचार बनाने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन, संघ के संबंध में वस्तुस्थिति जानकार आप अपना मत रखेंगे तो अच्छा होगा। उनका यह कहना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ज्यादातर लोग संघ के संबंध में टिप्पणी तो करते हैं किंतु उसके संबंध में बुनियादी जानकारी भी नहीं रखते हैं। इस संबंध में उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव का हालिया वक्तव्य उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है। व्याख्यानमाला का आमंत्रण मिलने पर उन्होंने कहा कि वह संघ के बारे में अधिक नहीं जानते हैं। स्वयं उन्होंने स्वीकारा कि वह संघ के संबंध में अधिक नहीं जानते, इसके बाद भी वह आगे कहते हैं कि वह इस आयोजन में नहीं जाएंगे, क्योंकि संघ पर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने प्रतिबंध लगाया था और जिन कारणों से प्रतिबंध लगाया गया था, वह कारण अभी तक समाप्त नहीं हुए हैं। यह एकमात्र उदाहरण नहीं है। देश के ज्यादातर राजनेता एवं अन्य लोग संघ के संबंध में जानकारी रखते नहीं है, इसके बाद भी संघ पर अनर्गल टिप्पणी करते हैं।

सोमवार, 17 सितंबर 2018

संघ की पहल

'भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' - 1
- लोकेन्द्र सिंह 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम पर सबकी नजर है। देश में भी और देश के बाहर भी। सब जानना चाहते हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा सांस्कृतिक संगठन आरएसएस ‘भविष्य का भारत’ को किस तरह देखता है? संघ का ‘भारत का विचार’ क्या है? दरअसल, यह उत्सुकता इसलिए भी है क्योंकि पिछले 93 वर्षों में कुछेक राजनीतिक/वैचारिक खेमों से संबद्ध राजनेताओं, लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर अनेक मिथक गढ़ दिए हैं। किंतु, संघ सब प्रकार के दुष्प्रचारों की चिंता न करते हुए समाज के बीच कार्य करता रहा और तमाम आरोपों का उत्तर अपने आचरण/कार्य से देता रहा। परिणामस्वरूप आज संघ का विस्तार ‘दशों दिशाओं...’ में हो गया है। उसके निष्ठावान स्वयंसेवक सबदूर ‘दल बादल...’ से छा गए हैं। इसके बावजूद व्यापक स्तर पर किए गए दुष्प्रचार के कारण समाज के कुछ हिस्सों में संघ को लेकर स्पष्टता नहीं है। एक विश्वास व्यक्त किया जा रहा है कि इस महत्वपूर्ण आयोजन से बहुत हद तक भ्रम और मिथक के बादल छंट जाएंगे।

रविवार, 16 सितंबर 2018

नर्मदा के तट पर हुई सांख्य दर्शन की रचना

भारतीय संस्कृति के प्रमुख दर्शनों में से एक है- "सांख्य दर्शन"। महाभारतकार वेद व्यास ने कहा है कि "ज्ञानं च लोके यदिहास्ति किंचित् सांख्यागतं तच्च महन्महात्मन्" (शांति पर्व 301.109)।  इसका अर्थ है- इस संसार में जो कुछ भी ज्ञान है, सब सांख्य से आया है। शान्ति पर्व के कई स्थलों पर सांख्य दर्शन के विचारों का बड़े काव्यमय और रोचक ढंग से उल्लेख किया गया है। 
       इस महत्वपूर्ण ग्रन्थ की रचना अमरकंटक में नर्मदा तट के किनारे पर कपिल मुनि ने की है। कपिल मुनि और सांख्य दर्शन से जुड़े उस स्थान को देखने के लिए यह वीडियो देखें...  


आग्रह : यूट्यूब चैनल "अपना वीडियो पार्क" को सब्सक्राइब अवश्य करें। लाइक, कमेंट और शेयर करने में संकोच न करें... नर्मदे हर 

शनिवार, 15 सितंबर 2018

‘हिन्दीपन’ से मिलेगा हिंदी को सम्मान


- लोकेन्द्र सिंह 
भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है। बल्कि, इससे इतर भी बहुत कुछ है। भाषा की अपनी पहचान है और उस पहचान से उसे बोलने वाले की पहचान भी जुड़ी होती है। यही नहीं, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रत्येक भाषा का अपना संस्कार होता है। प्रत्येक व्यक्ति या समाज पर उसकी मातृभाषा का संस्कार देखने को मिलता है। जैसे हिन्दी भाषी किसी श्रेष्ठ, अपने से बड़ी आयु या फिर सम्मानित व्यक्ति से मिलता है तो उसके प्रति आदर व्यक्त करने के लिए 'नमस्ते' या 'नमस्कार' बोलता है या फिर चरणस्पर्श करता है। 'नमस्ते' या 'नमस्कार' बोलने में हाथ स्वयं ही जुड़ जाते हैं। यह हिन्दी भाषा में अभिवादन का संस्कार है। अंग्रेजी या अन्य भाषा में अभिवादन करते समय उसके संस्कार और परंपरा परिलक्षित होगी। इस छोटे से उदाहरण से हम समझ सकते हैं कि कोई भी भाषा अपने साथ अपनी परंपरा और संस्कार लेकर चलती है। किसी भी देश की पहचान उसकी संस्कृति से होती है। संस्कृति क्या है? हमारे पूर्वजों ने विचार और कर्म के क्षेत्र में जो भी श्रेष्ठ किया है, उसी धरोहर का नाम संस्कृति है। यानी हमारे पूर्वजों ने हमें जो संस्कार दिए और जो परंपराएं उन्होंने आगे बढ़ाई हैं, वे संस्कृति हैं। किसी भी देश की संस्कृति उसकी भाषा के जरिए ही जीवित रहती है, आगे बढ़ती है। जिस किसी देश की भाषा खत्म हो जाती है तब उस देश की संस्कृति का कोई नामलेवा तक नहीं बचता है। यानी संस्कृति भाषा पर टिकी हुई है।

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