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गुरुवार, 14 मार्च 2024

सच का सामना करने की है दम तो देखिए- बस्तर : द नक्सल स्टोरी

कम्युनिस्टों की हिंसक एवं क्रूर विचारधारा एवं भारत विरोधी सोच को उजागर करती है सुदीप्तो सेन की फिल्म 

‘द केरल स्टोरी’ के बाद सुदीप्तो सेन ने फिल्म ‘बस्तर: द नक्सल स्टोरी’ के माध्यम से एक और आतंकवाद को, उसके वास्तविक रूप में, सबके सामने रखने का साहसिक प्रयास किया है। भारत में कम्युनिस्ट, नक्सल और माओवाद (संपूर्ण कम्युनिस्ट परिवार) के खून से सने हाथों एवं चेहरे को छिपाने का प्रयास किया जाता रहा है। लेफ्ट लिबरल का चोला ओढ़कर अकादमिक, साहित्यक, कला-सिनेमा एवं मीडिया क्षेत्र में बैठे अर्बन नक्सलियों ने कहानियां बनाकर हमेशा लाल आतंक का बचाव किया और उसकी क्रांतिकारी छवि प्रस्तुत की। जबकि सच क्या है, यही दिखाने का काम ‘बस्तर : द नक्सल स्टोरी’ ने किया है। फिल्म संवेदनाओं को जगाने के साथ ही आँखों को भिगो देती हैं। फिल्म जिस दृश्य के साथ शुरू होती है, वह दर्शकों को हिला देता है। जब मैं ‘बस्तर’ की विशेष स्क्रीनिंग देख रहा था, तब मैंने देखा कि अनेक महिलाएं एवं युवक भी पहले ही दृश्य को देखकर रोते हुए सिनेमा हॉल से बाहर निकल गए। जरा सोचिए, हम जिस दृश्य को पर्दे पर देख नहीं पा रहे हैं, उसे एक महिला और उसकी बेटी ने भोगा है। फिल्म में कुछ दृश्य विचलित कर सकते हैं। यदि उन दृश्यों को दिखाया नहीं जाता, तो दर्शक कम्युनिस्टों की हिंसक मानसिकता का अंदाजा नहीं लगा सकते थे। 76 जवानों को जलाकर मारने की घटना का चित्रांकन, कुल्हाड़ी से निर्दोष वनवासियों की हत्या करने के दृश्य, मासूम बच्चों को उठाकर आग में फेंक देने की घटना, यह सब देखने के लिए दम चाहिए। यह फिल्म अधिक से अधिक लोगों को देखनी एवं दिखायी जानी चाहिए। सुदीप्तो सेन को सैल्यूट है कि उन्होंने बेबाकी से लाल आतंक के सच को दिखाया है। हालांकि, कम्युनिस्ट हिंसा की और भी क्रूर कहानियां हैं, जिन्हें दिखाया जाना चाहिए था लेकिन फिल्म में समय की एक मर्यादा है। अपेक्षा है कि सुदीप्तो इस पर एक वेबसीरीज लेकर आएं।

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

आतंक के निशाने पर राष्ट्रवादी

देश के दो अलग-अलग हिस्सों में मंगलवार को दो हमले हुए। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में भारतीय जनता पार्टी के विधायक भीमा मंडावी पर नक्सल आतंकी हमला और जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता चंद्रकांत शर्मा पर इस्लामिक आतंकी हमला। इन हमलों में भाजपा विधायक भीमा मंडावी और संघ के जम्मू-कश्मीर प्रांत के सह सेवा प्रमुख चंद्रकांत शर्मा का बलिदान हो गया। प्रश्न यह है कि देश के प्रत्येक हिस्से में नक्सली, माओवादी, कम्युनिज्म और इस्लामिक आतंकवाद के निशाने पर राष्ट्रवादी विचारधारा के कार्यकर्ता क्यों हैं? 
          संभव है कि बहुत लोगों को यह प्रश्न बेमानी और अतार्किक प्रतीत हो। किंतु, इस प्रश्न की गंभीरता को समझने के लिए हमें कर्नाटक, केरल, पंजाब, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश सहित दूसरे अन्य राज्यों की घटनाओं का अध्ययन कर लेना चाहिए। जहाँ भी भारत विरोधी ताकतों को अवसर मिला है, उन्होंने राष्ट्रीय विचार से जुड़े लोगों को समाप्त करने के लिए हिंसा का सहारा लिया है। दरअसल, उधार के विचार से भारतीय विचार पर विजय प्राप्त करना उनके लिए मुश्किल होता है। भारत विरोधी ताकतों की राह में 'राष्ट्रत्व' अकाट्य चट्टान बन कर खड़ा है। राष्ट्रत्व से ओतप्रोत साधारण कार्यकर्ता भी 'भारत को हजार घाव देने की बुरी नीयत वाली ताकतों' के विरुद्ध दम-खम से खड़ा है। 'भारत के टुकड़े-टुकड़े' करने के उनके मंसूबों को पूरा होने में राष्ट्रत्व का मंत्र लेकर जीने वाले लोग बड़ी बाधा बन गए हैं। राष्ट्रत्व का भाव एवं विचार दिनों-दिन मजबूत हो रहा है। अपने मंसूबे पूरे नहीं होने से हताश कट्टर विचारधाराओं ने अब भारतीय विचार के कार्यकर्ताओं को भयभीत करने के लिए उनकी हत्याएं करने का षड्यंत्र रचा है। भारत से पहले अब वह भारत के विचार को परास्त करना चाहते हैं। किंतु, यह संभव नहीं है। 
चंद्रकांत शर्मा अपने परिवार के साथ
          राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हो या उसके समविचारी संगठनों के कार्यकर्ता, मृत्यु से भयभीत होकर कभी अपने कर्मपथ से डिगे नहीं हैं। 'भारत में एक विधान, एक प्रधान और एक निशान' की माँग के साथ भारतीय संविधान एवं राष्ट्रध्वज तिरंगे के सम्मान में इन्हीं भारतीय विचार के कार्यकर्ताओं ने जम्मू-कश्मीर में अपना बलिदान दिया है। केरल में एक के बाद एक कार्यकर्ता भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए अपना बलिदान दे रहे हैं। पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट और तृणमूल कांग्रेस की हिंसा का सामना भी यही लोग डटकर कर रहे हैं। भारत की रक्षा के लिए जिन्होंने अपना सर्वस्व अर्पण करने का प्रण लिया हो, उन्हें हिंसा से डराना संभव नहीं। इन कार्यकर्ताओं का बलिदान देश को जगाने का काम करता है। उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। भारत को हराने के लिए एकजुट ताकतें, निश्चित तौर पर राष्ट्रत्व से हारेंगी। 
          राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से जारी शोक संदेश में कहा गया है- 'दंतेवाड़ा में बलिदान हुए भाजपा विधायक भीमा मंडावी जनजातीय समाज के सुख-दु:ख में समरस, सादगी और सरलतापूर्ण जीवन एवं आचरण के कारण संपूर्ण समाज में अत्यंत लोकप्रिय थे। वे अपने साहसी स्वभाव और देशभक्ति पूर्ण विचारों के कारण माओवादियों की निगाह में सदैव खटकते थे। वहीं, किश्तवाड़ में बलिदान हुए चन्द्रकांत शर्मा बाल्यकाल से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे। उनका परिवार प्रारंभ से ही समाजसेवा के कार्यों में सक्रिय था। वह लोगों में देशभक्ति की भावना को जगा रहे थे। इस कारण वे लंबे समय से अलगाववादी और आतंकवादी संगठनों के निशाने पर थे।' दोनों महानुभावों के बलिदान से एक विचार कुल के साथ-साथ देश को बड़ी क्षति हुई है। यह लोग समाज को बेहतर बनाने की दिशा में अग्रसर थे। इस क्षति को पूरा तो नहीं किया जा सकता, लेकिन उनके छूटे कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए शेष समाज को आगे आना चाहिए। 
नक्सली हमले में शहीद हुए भाजपा नेता भीमा मंडावी

बुधवार, 27 जून 2018

खूंटी सामूहिक बलात्कार के पीछे चर्च और नक्सलियों का खतरनाक गठजोड़

- लोकेन्द्र सिंह
झारखंड के खूंटी जिले में पाँच महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं से सामूहिक बलात्कार और पुरुष कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट एवं उन्हें पेशाब पिलाने का अत्यंत घृणित कृत्य सामने आया है। यह बहुत दु:खद और डरावनी घटना है। पीडि़त महिलाएं एवं पुरुष अनुसूचित जाति-जनजाति समाज से हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के लोगों के साथ होने वाली मारपीट की घटनाओं एवं उनके शोषण पर जिस प्रकार आवाजें बुलंद होती हैं, उनसे एक उम्मीद जागती है कि वर्षों से शोषित इस समाज हो ताकत देने के लिए देशभर में एक वातावरण बन रहा है। सभी वर्गों के लोग पीडि़तों के साथ खड़े हैं। ऐसी स्थिति में खूंटी गैंगरेप और शोषण के मामले पर पसरा सन्नाटा खतरनाक लगता है। यह डराता है। देश का तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग और टीआरपी के लिए भूखे बैठे समाचार चैनल्स भी एक अजब-सी चुप्पी साधे हुए हैं। मानो हमारी संवेदनाओं पर भी अब राजनीति हावी हो गई है। अपराधी का धर्म देखकर अब विरोध के सुर का स्तर तय होता है। चूँकि इसमें शोषणकर्ता/आरोपी के वस्त्रों का रंग गेरुआ नहीं है, इसलिए रंगकर्मी भी 'शर्मिंदगी का बोर्ड' थाम कर फोटोसेशन नहीं करा रहे हैं। जबकि पाँचों लड़कियां और उनके साथी लड़के उनके कर्मक्षेत्र से ही आते हैं। पीडि़त रंगकर्मी हैं और वनवासी समाज को जागरूक करने के लिए नुक्कड़ नाटक करते हैं। कथित प्रबुद्ध वर्ग की यह प्रवृत्ति सभ्य समाज के लिए दु:खद ही नहीं, अपितु खतरनाक ही है। चूँकि इस अपराध में प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के प्रिय कम्युनिस्ट-नक्सली और चर्च शामिल है, इसलिए वह अपना मुंह नहीं खोल पा रहे हैं। त्रिशूल को कॉन्डम पहनाने जैसी सृजनशीलता भी नहीं दिखा पा रहे हैं। यह घटना खतरनाक इसलिए भी है, क्योंकि इसके पीछे जो विचार है, वह बहुत ही वहशी है। अपने विरोधी को डराने और उसे चुप कराने के लिए लोग मारपीट करते हैं, धमकाते हैं, अधिकतम उसकी हत्या कर देते हैं। किंतु, यहाँ अपने विरोधियों को डराने/चुप कराने के लिए उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया है। यानी लड़कियों के शरीर की नहीं, बल्कि उनकी आत्मा की हत्या करने का दुस्साहस किया गया है। विचार प्रक्रिया के सबसे निचले स्तर पर जाकर ही अपने विरोधी के प्रति ऐसा बर्ताब करने का ख्याल आता है। इस अपराध का मुख्य आरोपी उग्रवादी संगठन पीएलएफआई का नेता एवं पत्थलगड़ी का समर्थक जॉर्ज जोनास किडो है और मुख्य सहयोगी आरसी मिशन चर्च द्वारा कोचांग में संचालित स्टॉपमन मेमोरियल मिडिल स्कूल के प्रभारी सह सचिव फादर अल्फोंस आइंद को बताया जा रहा है। पीडि़तों की शिकायत पर इनके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की गई है। 

सोमवार, 11 जून 2018

प्रधानमंत्री की हत्या का षड्यंत्र और हमारी राजनीति का स्तर


- लोकेन्द्र सिंह 
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या का षड्यंत्र रचे जाने की बात सामने आई है। माओवादी कम्युनिस्ट पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या करना चाहते हैं। भारत सरकार को तत्काल गंभीरता से इस मामले की जाँच करनी चाहिए और इस षड्यंत्र में शामिल लोगों को गिरफ्तार करना चाहिए। यह बहुत चिंताजनक और गंभीर मामला है। किंतु, इस मामले पर विपक्षी दलों की टिप्पणियां दुर्भाग्यपूर्ण हैं। हमारे नेता प्रधानमंत्री की हत्या के षड्यंत्र की बात पर व्यग्ंय और गैर-जिम्मेदार टिप्पणियां कर रहे हैं, जबकि हमने अपने दो प्रधानमंत्री और कई राजनेता इसी प्रकार की राजनीतिक हिंसा में खो दिए हैं। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के महासचिव सीताराम येचुरी से लेकर कांग्रेस के बड़बोले नेता संजय निरूपम ने बहुत ही हल्की टिप्पणी इस मुद्दे पर की हैं। उन्होंने इसे लोकप्रियता पाने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हथकंडा बताया है।

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

नक्सली हिंसा पर खामोशी

 देश  में असहिष्णुता और हिंसा पर आजकल बहुत बहस हो रही है। विशेषकर, जब किसी कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े या विशेष समुदाय के व्यक्ति के साथ हिंसा होती है, तब असहिष्णुता का भूत अचानक से प्रकट होता है। जबकि अन्य हत्याओं पर न हमें असहिष्णुता दिखाई देती है और नहीं किसी प्रकार हमारे माथे पर बल पड़ता है। पश्चिम बंगाल की ममता सरकार में हिंदू समाज के साथ हो रही ज्यादती भी असहिष्णुता की श्रेणी में नहीं आती है और केरल में एक के बाद एक राष्ट्रीय विचारधारा से संबंद्ध व्यक्तियों की हत्याएं भी हमें विचलित नहीं करती हैं। नक्सली हिंसा पर तो तमाम बुद्धिजीवी गजब की खामोशी साध जाते हैं। अनेक अवसर पर तो प्रसन्नता भी जाहिर करते हैं। नक्सलियों द्वारा 76 जवानों की हत्या के दौरान अपने यह कम्युनिस्टों को जश्न मनाते देखा है। कम्युनिस्ट विचारधारा के नेता, लेखक एवं पत्रकार नक्सलियों की हिंसा का बचाव करते दिखते हैं। जबकि यह खूंखार किस्म के असहिष्णु हैं। कम्युनिस्ट नक्सलियों का बचाव इसलिए करते हैं, क्योंकि वैचारिक रूप से दोनों सहोदर हैं। नक्सलियों की बर्बरता को देखकर इन्हें किसी भी प्रकार आतंकवादियों से कमतर नहीं माना जा सकता। बीते रविवार झारखंड के गुमला में पति-पत्नी को गोलियों से भूनकर इस बात को सिद्ध कर दिया है।

सोमवार, 23 मई 2016

जेएनयू के शिक्षकों और नक्सलियों के बीच क्या रिश्ता है?

 एक बार फिर जेएनयू चर्चा में है। यह चर्चा फिर से 'देशद्रोह' से जुड़ी है। जेएनयू के प्रोफेसरों पर आरोप है कि उन्होंने बस्तर के कई गांवों में सभाएं लेकर ग्रामीणों को सरकार का विरोध और नक्सलियों का समर्थन करने के लिए धमकाया है। हालांकि, एक-दो समाचार वाहनियों (चैनलों) और समाचार-पत्रों को छोड़ दें तो यह चर्चा मुख्यधारा के मीडिया में कम ही है। 'देशद्रोह' के आरोपी छात्रों का साक्षात्कार लेने के लिए कतारबद्ध सूरमा पत्रकार भी इस खबर पर मुंह में दही जमाकर बैठे हैं। वह तो शुक्र है कि आज के दौर में सोशल मीडिया है। सोशल मीडिया के जरिए ही जेएनयू के प्रोफेसरों की 'देशद्रोही' करतूत उजागर हो रही है। हम सब जानते हैं कि जेएनयू की छवि वामपंथ के गढ़ के रूप में है। जेएनयू यानी लालगढ़, यह आम धारणा बन गई है। वामपंथी नक्सलियों के पोषक हैं, यह भी सच्चाई है। वामपंथी इस सच्चाई को छिपाने की भी कोशिश करें, तो छिपा नहीं पाएंगे। जेएनयू के शिक्षकों पर नक्सल समर्थक होने के आरोप पहली बार लगे हैं, ऐसा नहीं है। अनेक अवसर पर वहाँ के शिक्षकों और विद्यार्थियों पर नक्सलवादी विचारधारा के प्रवर्तक और समर्थक होने के आरोप लगते रहे हैं। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि जेएनयू के शिक्षकों और विद्यार्थियों पर इस तरह के आरोप अकारण नहीं लगते हैं। इसके पीछे कुछ तो सच्चाई है। माना कि पूरा जेएनयू नक्सल/वाम का गढ़ नहीं है। यह इसलिए भी मानना चाहिए, क्योंकि समूचा जेएनयू वामपंथ की विचारधारा से ग्रसित होता तब उसकी चाहरदीवारी से सच लाँघकर हमारे सामने नहीं आ पाता। 'देशद्रोही नारेबाजी' को देश के सामने लाने का काम जेएनयू के ही देशभक्त छात्रों ने किया था। वहीं दूसरी ओर, जेएनयू की वामपंथी लॉबी किस हद तक नक्सलवादियों (आतंकवादियों) की समर्थक है, इसे वर्ष 2010 के एक घटनाक्रम से समझा जा सकता है। नक्सली आतंकवादियों ने जब दंतेवाड़ा में बेरहमी से 76 जवानों की हत्या की थी, तब जेएनयू में जश्न मनाया गया था। देश के 76 जवानों की मौत पर दु:खी होने की जगह पूरी निर्लज्जता के साथ नक्सलियों की कायराना जीत का उत्सव मनाया गया।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

नक्सलियों की क्रूरता के खिलाफ बच्चियों का आक्रोश

 ज ब कभी पुलिस के हाथों कोई नक्सली मारा जाता है, तब तमाम मानवाधिकारी और वामपंथी विचारक आसमान सिर पर उठा लेते हैं। लेकिन, नक्सलियों की क्रूरता के खिलाफ इनके होंठ सिल जाते हैं। धिक्कार है ऐसे वामपंथी विचारकों और मानवाधिकारियों के प्रति जिन्होंने एक दुधमुंही बच्ची की हत्या पर शर्मनाक तरीके से खामोशी की चादर ओढ़ रखी है। गौरतलब है कि बीजापुर जिले में क्रूर नक्सलियों ने चार माह की दुधमुंही बच्ची की जघन्य हत्या कर दी थी। आखिर कोई बता सकता है कि उस दुधमुंही बच्ची ने किसी का क्या बिगाड़ा होगा? नक्सलियों से उसकी क्या दुश्मनी रही होगी? कोई इतना निर्दयी कैसे हो सकता है कि एक नन्हीं कली को ही मसल दिया? इस तरह की हिंसा किस तरह के समाज का निर्माण करेगी? इस नक्सलवाद ने खूबसूरत बस्तर को नर्क बना दिया है। नक्सलियों की इस बर्बरता पर भले ही मीडिया, वामपंथी बुद्धिजीवियों और मानवाधिकारी खामोश रह गए हों लेकिन बस्तर की बच्चियों ने साहस दिखाया है। उन्होंने नक्सलवाद का घिनोना चेहरा दुनिया को दिखाने का प्रयास किया है। 

शनिवार, 16 मार्च 2013

नक्सलियों को खुली चुनौती

 रा म-कृष्ण, बुद्ध और गांधी के देश में हिंसक संघर्ष बर्दाश्त नहीं है। ध्येय कितना भी ऊंचा, पवित्र और जनहित का हो लेकिन उसे पाने के लिए उचित माध्यम होना जरूरी है। बुलेट की ताकत पर बदलाव संभव नहीं होता। बदलाव तो स्वत: स्फूर्त होना चाहिए। बंदूक की नाल से तो डराया जाता है। जिसके हाथ में बंदूक होती है वह कब, किस तरफ उसे मोड़ दे, कोई नहीं जानता। यही नक्सलवाद और माओवाद के नाम पर किया जाता रहा है। व्यवस्था के खिलाफ शुरू हुआ संघर्ष अब निरीह जनता के खिलाफ हो गया है। लोग तंग आ गए हैं। नक्सलवाद भ्रष्ट हो गया है। उसका शिकार आदिवासी समाज ही बन रहा है। नक्सलियों के आतंक से तंग वनवासी समाज ने खुला पत्र लिख है। इस पत्र में बस्तर आदिवासी रक्षा समिति ने नक्सलियों से घोटपाल मड़ई विस्फोट में घायल हुए तीन ग्रामीणों को मुआवजा देने की मांग की है। समिति ने आदिवासी संस्कृति व परम्पराओं को भविष्य में आघात नहीं पहुंचाने की माओवादियों से लिखित गारंटी भी मांगी है। वनवासियों ने साफ कहा है कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो नक्सली कड़ी कार्रवाई के लिए तैयार रहें। संभवत: यह पहला मौका है जब वनवासियों ने नक्सलियों के खिलाफ इस तरह का खुला पत्र जारी किया है। हालात बदल रहे हैं। वनवासी अब और अधिक नक्सल आतंक सहन करने के मूड में नहीं दिख रहे। यह महज एक मांग पत्र नहीं है बल्कि नक्सलियों को खुली चुनौती है। आओ, अब देखते हैं तुम्हें। सचेत उन्हें भी हो जाना चाहिए जो गाए-बगाहे लाल हिंसा का समर्थन करते हैं। तथाकथित बुद्धिजीवियों को वनवासी समुदाय की पीड़ा समझनी होगी और उनके हित में अपनी लेखनी का उपयोग करना चाहिए। स्थितियां बिगड़े उससे पहले सरकार को भी चेतना होगा। आम नागरिकों के हित की रक्षा करना सरकार की ही जिम्मेदारी है। यह नौबत नहीं आनी चाहिए कि नक्सलवाद से लडऩे के लिए जनता को हथियार उठाने पड़ें। भारत सरकार के पास मौका है नक्सल आतंक को जड़ से उखाड़ फेंकने का। पीडि़त और शोषित वनवासी सरकार के साथ आने को तैयार हैं, यदि सरकार की नीयत साफ हो तो।
    वनवासी समाज की चिंता इस बात से भी बढ़ गई है कि नक्सलवाद के नाम पर धीमे-धीमे उनकी संस्कृति को भी निशाना बनाया जा रहा है। उनके लोगों का खून तो बह ही रहा है। नक्सलवाद भले ही वर्ष १९६७ में पश्चिम बंगाल के गांव नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ हो लेकिन इसके नेताओं की वैचारिक प्रेरणा का केन्द्र विदेशी है। नक्सवाद के जन्म के साथ ही इसके प्रारंभिक नेताओं ने राष्ट्र विरोधी नारा लगाया था- 'चेयरमैन माओ ही हमारा चेयरमैन है।' माओ त्से तुंग चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक और चीनी क्रांति का नेता था। जगजाहिर है कि चीन की तथाकथित ग्रेट प्रोलेटोरियन कल्चरल रिवोल्यूशन यानी सांस्कृतिक क्रांति में लाखों लोगों की जान व्यर्थ चली गई थी। करीब २० लाख लोगों की मौत, ४० लाख लोगों को बंदी बनाया गया और चीनी जनता पर बंदूक-तोप की दम पर वामपंथी विचारधारा थोपी गई। स्टालिन (शासन काल १९२४-१९५३) के समय सोवियत संघ में और पॉल पॉट के शासनकाल १९७५-८० के बीच कंबोडिया में निर्दोष लोगों को विचारधारा के नाम पर कत्ल किया गया।   तथाकथित भारतीय नक्सलवाद का कनेक्शन भी अंतरराष्ट्रीय वामपंथी आंदोलनों से है। विदेशी प्रेरणा केन्द्र होने के कारण नक्सलवाद का भारतीय परंपराओं और संस्कृति से कोई सरोकार नहीं है। खासकर हिन्दुत्व के तो ये विरोधी ही हैं। दरअसल, हिन्दुत्व राष्ट्रवाद की सीख देता है और नक्सलवाद की इसमें कोई रुचि नहीं है। दंतेवाड़ा जिले के ग्राम घोटपाल में आंगा देव व ग्राम्य देवता पर श्रद्धा के चलते वार्षिक मड़ई मनाया जाता है। इसी मेले में नक्सलियों ने विस्फोट किया। जिससे दो आदिवासी युवतियों और एक ग्रामीण घायल हो गया है। चार पुलिस जवान भी घायल हुए। इस विस्फोट को वनवासियों ने अपने आराध्य आंगा देव का अपमान  माना है। तीखी प्रतिक्रिया करते हुए रक्षा समिति ने देवताओं का अपमान करने पर आंध्रप्रदेश के नक्सलियों को फांसी देने की भी मांग की है। हालांकि नक्सली पहले भी वनवासी लोगों को निशाना बनाते रहे हैं। मुखबिरी का आरोप लगाकर मासूम-कोमल बच्चों सहित पूरे परिवार को जला दिया जाता है। बेरहमी से उनका कत्ल कर दिया जाता रहा है। तथाकथित नक्सली आंदोलन में शामिल करने के लिए बच्चों को जबरन उठाकर ले जाया जाता है। जवान लड़कियों के साथ दुराचार के मामले भी सामने आने लगे हैं। अब तो इनकी हरकतें बेहद घृणित हो गईं हैं। सुरक्षा जवान की हत्या कर उसके मृत शरीर में बम लगाने की हरकत, नजीर है कि नक्सलवाद विचार का पतन कितना हो चुका है।
    दरअसल, भारत में सक्रिय नक्सली समूह वास्तव में देश के विरुद्ध परोक्ष युद्ध लड़ रहे हैं। पुलिस रक्षक दल पर आक्रमण करना, वनवासियों में दबदबा बनाने के लिए अबोध नागरिकों की निर्मम हत्या, राजनीति का संरक्षण पाने के लिए राजनेताओं की हत्या, धन उगाही के लिए व्यवसायियों को धमकाना, सरकार की विकासोन्मुखी योजनाओं के कार्यान्वयन को रोकना, स्कूल की इमारतों में बम विस्फोट और शिक्षकों का अपहरण कर हत्या करना ऐसी सभी घटनाएं यही संकेत करती हैं। नक्सलियों की लोकतंत्र में आस्था नहीं। वे लोकतंत्र को उखाड़कर अतिवादी व निरंकुश कम्युनिष्ट शासन स्थापित करना चाहते हैं।   अब तक लाल आतंक के नाम पर नक्सली लाखों लोगों का खून बहा चुके हैं। इनमें पुलिस के जवान, सरकारी अफसर, नेता, व्यवसायी, उद्योगपतियों सहित आम नागरिक भी शामिल हैं।
    भारत में ८ प्रतिशत से अधिक वनवासी आबादी है। नक्सलवाद इन्हीं के बीच केंद्रित है। अब तक की सरकारों को १५ प्रतिशत मुस्लिमों की तो चिंता है लेकिन वनांचल में रहने वाले अबोध वनवासियों की फिक्र नहीं। १५ प्रतिशत लोगों के लिए तो अरबों रुपए की योजनाएं चलाई जा रही हैं लेकिन वनवासियों के लिए सिर्फ दिखावा। ये भोले-भाले वनवासी अल्पसंख्यकों की तरह मुखिर नहीं हैं, ये अब तक की केन्द्र सरकारों के वोट बैंक भी नहीं है। क्या इसीलिए इनकी उपेक्षा की जाती है। नक्सलबाड़ी से निकलकर देश के ५० से अधिक जिलों में नक्सलवाद के फैलने के लिए अब तक की सरकारों की उदासीनता ही जिम्मेदार है। बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओड़ीसा, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के जनजातीय और पिछड़े क्षेत्रों में नक्सली गतिविधियां अधिक हैं।  इसे ही रेड कॉरिडोर के नाम से जाना जाता है यानी लाल आतंक का गढ़। हालांकि उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में भी इनकी हिंसक घटनाएं सामने आती हैं। नक्सलवाद से निपटने के लिए सरकारी स्तर पर मजबूती के साथ प्रयास होने चाहिए। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भूमि सुधार, गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेलकूद और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देकर वनवासियों का विश्वास जीतना होगा। वनवासी क्षेत्रों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने होंगे। सड़क, इमारतों और रेल की पटरियों को नुकसान पहुंचाने वाले नक्सलियों से भी कड़ाई से निपटना होगा। सरकार को चाहिए कि वह सेना की भी मदद ले क्योंकि नक्सलवाद अब नासूर बन गया है।  यही नहीं पुलिस का भी आधुनिकीकरण करना होगा। नक्सलियों के पास एके-४७ से लेकर अति आधुनिक हथियार हैं लेकिन पुलिस के पास पुरानी तकनीक की बंदूकें, ऐसे में पुलिस भी कैसे मुकाबले करे। हालांकि नक्सल आतंक से निपटने के नाम पर सरकार के पास नीति है लेकिन नीयत नहीं है। नक्सल प्रभावित इन क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए सरकारों को पुरजोर कोशिश करनी होगी। आधे-अधूरे मन के साथ बदलाव संभव नहीं। लाल आतंक के चगुंग में फंसे वनवासी सुकून चाहते हैं जो उनके नसीब में नहीं।

मंगलवार, 1 जून 2010

उफ! कोई इन्हें भी फांसी दे दे

या तो हमारी सरकार का खून सूख गया है या फिर उसकी नक्सलियों से कोई गुप्त संधि है। वरना इतने बेगुनाहों का खून सड़कों पर, रेल की पटरियों पर और छोटे से घर के बाहर बने नाले में बहते देख सरकार का हृदय पिघलता जरूर। वह सिर्फ बातें नहीं करती, कुछ कड़े कदम भी उठाती। हाल ही की तीन बड़ी घटनाओं ने पूरे देश को हिला कर रख दिया है। और उन निरीह गरीबों की तो जान कलेजे में हैं जहां नक्सलियों की सरकार खुल के चलती है। जिसकी चाहे जान ले लेते हैं, चाहे जिस बच्चे को उठाकर ले जाते हैं उसके निश्छल मन में अपनी ही मिट्टी और अपने ही लोगों के खिलाफ बैर भर देते हैं। पिछले दिनों मामला सामने आया था कि एक लड़की ने नक्सलियों की शैतानी सेना में शामिल होने से इनकार किया तो इन्हीं नक्सलियों ने उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। सात-आठ माह पुरानी घटना है किसी व्यक्ति के समूल परिवार (जिसमें मासूम दूध पीते बच्चे भी शामिल थे) को झौंपड़े के अंदर बंद कर आग से जला दिया। कारण बताया कि उस परिवार के एक व्यक्ति ने उनकी मुखबरी की थी। माना की भी हो तो उन मासूमों का क्या दोष था जो अभी अपनी मां को मां और पिता को बाप भी नहीं कहना सीख पाए थे। और दंतेवाड़ा में ७० जवान की हत्या, उसके बाद बस में विस्फोट कर ३५ लोगों की जान ली और अब रेल को खून से लाल करके करीब सवा सौ लोगों की जिंदगी छीन ली। माफ करना सवा सौ लोगों की जिंदगी नहीं संख्या और अधिक है। उनकी भी मौत हुई है जो इनसे प्रेम करते थे, जो इन पर आश्रित थे। 
कौन है नक्सली- 'नक्सलियों  का अर्थ में उन लोगों से लगाता हूं 'जिनकी नस्ल खराब हो गई है।  इनका कहना है कि इन्होंने हथियार गरीब और वंचितों के लिए उठाए हैं (शायद उन्हें जान से मारने के लिए)। लेकिन हकीकत यह है कि ये डाकू हैं, लुटेरे हैं, लूट-लूट के खाना पसंद करते हैं। यदि किसी ने इनकी बात नहीं मानी तो वो चाहे गरीब ही क्यों न हो वे उसे मार डालते हैं, इतना ही नहीं उसके परिवार का समूल नाश भी करने से नहीं चूकते। ये नहीं चाहते कि पिछड़े क्षेत्रों में विकास हो। तभी रेल की पटरियां उखाड़ते हैं, सड़कें खोदते हैं, स्कूल भवन को बम से उडाते हैं। इतना ही नहीं कहीं उन गरीबों के बच्चे पढ़-लिख कर समझदार न हो जाएं (हो गए तो इनके खिलाफ आवाज बुलंद करेंगे) इसलिए ये बच्चों को पढ़ाने आने वाले मास्टर को ही उठवा लेते हैं और क्रूरता से उसकी हत्या कर देते हैं। इन्हें ही कहते हैं हम नक्सली।
इनके पैरोकार- इस देश में सब तरह के लोग हैं। आंतकवादी का सम्मान करने वालों से लेकर इन खूनी दरिंदों के लिए चिल्ला-चिल्लाकर गला और लिख-लिखकर कलम की स्याही सुखाने वाले भी। ये ऐसे इसलिए कर पाते हैं क्योंकि इनके भीतर की भी मानवीय संवेदनाएं मर गईं हैं। साथ ेमें इस देश के प्रति प्यार भी नहीं बचा। और कभी नक्सलियों ने इनके घरों के दुधमुहें बच्चों को गोली नहीं मारी, वरना ये तथाकथित सेक्यूलर ऐसा कभी नहीं कह पाते।
सरकार जाग जाए वरना..... अब हद हो चुकी है। जनता और नहीं सहेगी। जनता खून से भरे गले से रो-रोकर कह रही है कोई है जो इन दुष्टों को भी फांसी देगा, कोई है जो इन्हें भी बुलेट को जबाव बुलेट से देगा। अगर सरकार ने नक्सलियों को खत्म करने के लिए हथियार नहीं उठाए तो मजबूरन भोली जनता को ये कदम उठाना पड़ेगा। और जब जनता उठाएगी तो फिर सरकार को भी नहीं छोड़ेगी। क्योंकि वे भोले मानुष सरकार से भी त्रस्त हैं। पंजाब में उग्रवाद का खात्मा करने के लिए जैसे कठोर निर्णय लेने पड़े थे वैसे ही खूनी हो चुके नक्सलवाद को खत्म करने के लिए लेने होंगे।

पंचू पंच- पंचू से किसी ने कहा कि मप्र में भी नक्सलवादियों की आहट हो गई है। वे तेरे गांव व शहर में भी आ सकते हैं। तब उसने क्या कहा सुन लें..........
'आने तो देओ वाये... ससुर के नाती को मूड़ (सिर) लठिया से फोर-फोर के लाल कर दंगो... मेरे गांम के एकऊ मोड़ा-मोड़ा (लड़का-लड़की) को हाथ लगायो तो सारे के हाथ कुलाई (कुल्हाड़ी) से काट दुंगो। आए तो सही न पनारे (घर से निकली नाली) में उल्टो करके गाप देंगो।