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शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2021

शिक्षक के हाथ में राष्ट्र के उत्थान-पतन की बागडोर

‘स्वतंत्र भारत के 75 वर्ष और शिक्षकों की भूमिका’




तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये।

आयासायापरं कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम्॥ - श्रीविष्णुपुराण 1-19-41

अर्थात, कर्म वही है जो बन्धन का कारण न हो और विद्या भी वही है जो मुक्ति की साधिका हो। इसके अतिरिक्त और कर्म तो परिश्रम रुप तथा अन्य विद्याएँ कला-कौशल मात्र ही हैं॥

शुक्रवार, 29 मई 2020

महात्मा गांधी की दृष्टि में स्वातंत्र्यवीर सावरकर



“सावरकर बंधुओं की प्रतिभा का उपयोग जन-कल्याण के लिए होना चाहिए। अगर भारत इसी तरह सोया पड़ा रहा तो मुझे डर है कि उसके ये दो निष्ठावान पुत्र सदा के लिए हाथ से चले जाएंगे। एक सावरकर भाई को मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूँ। मुझे लंदन में उनसे भेंट का सौभाग्य मिला था। वे बहादुर हैं, चतुर हैं, देशभक्त हैं। वे क्रांतिकारी हैं और इसे छिपाते नहीं। मौजूदा शासन प्रणाली की बुराई का सबसे भीषण रूप उन्होंने बहुत पहले, मुझसे भी काफी पहले, देख लिया था। आज भारत को, अपने देश को, दिलोजान से प्यार करने के अपराध में वे कालापानी भोग रहे हैं।” आपको किसी प्रकार का भ्रम न हो इसलिए बता देते हैं कि स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर और उनके बड़े भाई गणेश सावरकर के लिए ये विचार किसी हिंदू महासभा के नेता के नहीं हैं, बल्कि उनके लिए यह सब अपने समाचार-पत्र ‘यंग इंडिया’ में महात्मा गांधी ने 18 मई, 1921 को लिखा था। महात्मा गांधीजी ने यह सब उस समय लिखा था, जब स्वातंत्र्यवीर सावरकर अपने बड़े भाई गणेश सावरकर के साथ अंडमान में कालापानी की कठोरतम सजा काट रहे थे। (हार्निमैन और सावरकर बंधु, पृष्ठ-102, सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय)

          भारत माता के वीर सपूत सावरकर के बारे में आज अनाप-शनाप बोलने वाले कम्युनिस्टों और महात्मा गांधी के ‘नकली उत्तराधिकारियों’ को शायद यह पता ही नहीं होगा कि सावरकर बंधुओं के प्रति महात्मा कितना पवित्र और सम्मान का भाव रखते थे। गांधीजी की उपरोक्त टिप्पणी में इस बात पर गौर कीजिए, जिसमें वे कह रहे हैं कि- “मौजूदा शासन प्रणाली (ब्रिटिश सरकार) की बुराई का सबसे भीषण रूप उन्होंने (वीर सावरकर) ने बहुत पहले, मुझसे भी काफी पहले (गांधीजी से भी काफी पहले), देख लिया था।” इस पंक्ति में महात्मा वीर सावरकर की दृष्टि और उनकी निष्ठा को स्पष्ट रेखांकित कर रहे हैं। लेकिन, वीर सावरकर के विरुद्ध विषवमन करने वालों ने न तो महात्मा गांधी को ही पढ़ा है और न ही उन्हें सावरकर परिवार के बलिदान का सामान्य ज्ञान है। नकली लोग बात तो गांधीजी की करते हैं, उनकी विचारधारा के अनुयायी होने का दावा करते हैं, लेकिन उनके विचार का पालन नहीं करते हैं। जुबान पर गांधीजी का नाम है, लेकिन मन में घृणा-नफरत और हिंसा भरी हुई है। इसी घृणा और हिंसा के प्रभाव में ये लोग उस युगद्रष्ट महापुरुष की छवि को बिगाडऩे के लिए षड्यंत्र रचते हैं, जिसकी प्रशंसा स्वयं महात्मा गांधी ने की है। 
          महात्मा गांधी और विनायक दामोदर सावरकर की मुलाकात लंदन में 1909 में विजयदशमी के एक आयोजन में हुई थी। लगभग 12 वर्ष बाद भी महात्मा गांधी की स्मृति में यह मुलाकात रहती है और जब वे अपने समाचार-पत्र यंग इंडिया में सावरकर के कारावास और उनकी रिहाई के संबंध में लिखते हैं, तो पहली मुलाकात का उल्लेख करना नहीं भूलते। इसका एक ही अर्थ है कि क्रांतिवीर सावरकर और भारत की स्वतंत्रता के लिए उनके प्रयासों ने महात्मा गांधी के मन पर गहरी छाप छोड़ी थी। 

          इससे पूर्व भी महात्मा गांधी ने 26 मई, 1920 को यंग इंडिया में ‘सावरकर बंधु’ शीर्षक से एक विस्तृत टिप्पणी लिखी है। यह टिप्पणी उन सब लोगों को पढऩी चाहिए, जो क्रांतिवीर सावरकर पर तथाकथित ‘क्षमादान याचना’ का आरोप लगाते हैं। इस टिप्पणी में हम तथाकथित ‘माफीनामे’ प्रसंग को विस्तार से समझ पाएंगे और यह भी जान पाएंगे कि स्वयं महात्मा गांधीजी सावरकर बंधुओं की मुक्ति के लिए कितने आग्रही थे? सावरकर बंधुओं के साथ हो रहे अन्याय पर भी महात्माजी ने प्रश्न उठाया है। इस टिप्पणी में महात्मा गांधी ने उस ‘शाही घोषणा’ को भी उद्धृत किया है, जिसके अंतर्गत उस समय अनेक राजनीतिक बंदियों को रिहा किया जा रहा था। वे लिखते हैं कि – “भारत सरकार और प्रांतीय सरकारों ने इस संबंध में जो कार्रवाई की उसके परिणामस्वरूप उस समय कारावास भोग रहे बहुत लोगों को राजानुकम्पा का लाभ प्राप्त हुआ है। लेकिन कुछ प्रमुख ‘राजनीतिक अपराधी’ अब भी नहीं छोड़े गए हैं। इन्हीं लोगों में मैं सावरकर बंधुओं की गणना करता हूँ। वे उसी माने में राजनीतिक अपराधी हैं, जिस माने में वे लोग हैं, जिन्हें पंजाब सरकार ने मुक्त कर दिया है। किंतु इस घोषणा (शाही घोषणा) के प्रकाशन के आज पाँच महीने बाद भी इन दोनों भाइयों को छोड़ा नहीं गया है।” 
          इस टिप्पणी से स्पष्ट है कि महात्मा गांधी यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि अंग्रेज सरकार जल्द से जल्द सावरकर बंधुओं को स्वतंत्र करे। सावरकर बंधुओं के प्रकरण में अपनायी जा रही दोहरी नीति को उन्होंने अपने पत्र के माध्यम से जनता के बीच उजागर कर दिया। महात्मा गांधी अपने इस आलेख में अनेक तर्कों से यह इस सिद्ध कर रहे थे कि ब्रिटिश सरकार के पास ऐसा कोई कारण नहीं कि वह अब सावरकर बंधुओं को कैद में रखे, उन्हें तुरंत मुक्त करना चाहिए। हम जानते हैं कि महात्मा गांधी अधिवक्ता (बैरिस्टर) थे। सावरकर बंधुओं पर लगाई गईं सभी कानूनी धाराओं का उल्लेख और अन्य मामलों के साथ तुलना करते हुए गांधीजी ने इस लेख में स्वातंत्र्यवीर सावरकर बंधुओं का पक्ष मजबूती के साथ रखा है। 
          उस समय वाइसराय की काउंसिल में भी सावरकर बंधुओं की मुक्ति का प्रश्न उठाया गया था, जिसका जिक्र भी गांधीजी ने किया है। काउंसिल में जवाब में कहा गया था कि ब्रिटिश सरकार के विचार से दोनों भाइयों को छोड़ा नहीं जा सकता। इसका उल्लेख करते हुए गांधीजी ने अपने इसी आलेख के आखिर में लिखा है- “इस मामले को इतनी आसानी से ताक पर नहीं रख दिया जा सकता। जनता को यह जानने का अधिकार है कि ठीक-ठीक वे कौन-से कारण हैं जिनके आधार पर राज-घोषणा के बावजूद इन दोनों भाइयों की स्वतंत्रता पर रोक लगाई जा रही है, क्योंकि यह घोषणा तो जनता के लिए राजा की ओर से दिए गए ऐसे अधिकार पत्र के समान है जो कानून का जोर रखता है।” 
          आज जो दुष्ट बुद्धि के लोग वीर सावरकर की अप्रतिम छवि को मलिन करने का दुष्प्रयास करते हैं, उन्हें महात्मा गांधी की यह टिप्पणी इसलिए भी पढऩी चाहिए क्योंकि इसमें गांधीजी ने भारत की स्वतंत्रता के लिए दोनों भाइयों के योगदान को भी रेखांकित किया है। यह पढऩे के बाद शायद उन्हें लज्जा आ जाए और वे हुतात्मा का अपमान करने से बाज आएं। हालाँकि, संकीर्ण मानसिकता के इन लोगों की बुद्धि न भी सुधरे तो भी कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि जो भी सूरज की ओर गंदगी उछालता है, उससे उनका ही मुंह मैला होता है। क्रांतिवीर सावरकर तो भारतीय इतिहास के चमकते सूरज हैं, उनका व्यक्तित्व मलिन करना किसी के बस की बात नहीं। स्वातंत्र्यवीर सावरकर तो लोगों के दिलों में बसते हैं। युगद्रष्टा सावरकर भारत के ऐसे नायकों में शामिल हैं, जो यशस्वी क्रांतिकारी हैं, समाज उद्धारक हैं, उच्च कोटि के साहित्यकार हैं, राजनीतिक विचारक एवं प्रख्यात चिंतक भी हैं। भारत के निर्माण में उनका योगदान कृतज्ञता का भाव पैदा करता है। उनका नाम कानों में पड़ते ही मन में एक रोमांच जाग जाता है। गर्व से सीना चौड़ा हो जाता है। श्रद्धा से शीश झुक जाता है।

स्वदेश, भोपाल समूह में 28 मई, 2020 को प्रकाशित

मंगलवार, 19 मई 2020

‘देशप्रेम की साकार और व्यावहारिक अभिव्यक्ति है स्वदेशी’



मुझे आज तक एक बात समझ नहीं आई कि कुछ लोगों को स्वदेशी जैसे अनुकरणीय, उदात्त और वृहद विचार का विरोध क्यों करते हैं? स्वदेशी से उन्हें क्या दिक्कत है? आपको यह समझ आये कि ये लोग स्वदेशी का विरोध क्यों करते हैं या उसका मजाक क्यों बनाते हैं तो कृपया कमेंट बॉक्स में मुझे भी बताईयेगा।

मुझे लगता है कि स्वदेशी का विरोध वे ही लोग करते हैं जो मानसिकरूप से अभी भी गुलाम हैं या फिर उनको विदेशी उत्पाद से गहरा लगाव है। संभव है इनमें से बहुत से लोग उन संस्थाओं और संगठनों से जुड़े हों या प्रभावित हों, जो विदेशी कंपनियों से चंदा पाते हैं। 

जब से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत को आत्मनिर्भर बनाने का आह्वान किया है और लोकल के लिए वोकल होने के लिए कहा है, तब से ही कुछ लोग सोशल मीडिया पर बढ़-चढ़ कर स्वदेशी का विरोध कर रहे हैं। आप इन्हें अच्छी तरह पहचान लीजिये, ये कौन लोग हैं जो भारत में बनी वस्तुओं और उनके उपयोग को हतोत्साहित कर रहे हैं। 

स्वदेशी भारत की अनेक समस्याओं का समाधान है। स्वदेशी का विचार लोगों के मन में बैठ गया तो लाखों लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलेगा। स्थानीय प्रतिभा को आगे बढ़ने का अवसर मिलगा। हमारे कुशल कारीगरों के हाथ मजबूत होंगे। उनके उत्पाद की मांग बढ़ेगी तो किसे लाभ होगा? भारत को, भारत के लोगों को ही उसका लाभ मिलेगा। इसलिए जो लोग स्वदेशी का विरोध कर रहे हैं, असल में वे भारत का विरोध कर रहे हैं।
स्वदेशी केवल उत्पाद से जुड़ा हुआ विषय नहीं है बल्कि यह एक विचार है। एक आन्दोलन है। भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन का एक प्रमुख विचार रहा है, स्वदेशी। 

महात्मा गाँधी कहते थे- “स्वदेशी केवल रोटी, कपड़ा और मकान का नहीं अपितु सम्पूर्ण जीवन का दृष्टिकोण है। स्वदेशी देश की प्राणवायु है, स्वराज्य और स्वाधीनता की गारंटी है। गरीबी-भुखमरी और गुलामी से मुक्ति का उपाय है यह। स्वदेशी के अभाव में राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और मानसिक स्वातंत्र्य सर्वथा असंभव है।”


अपने आप को महात्मा गाँधी का उत्तराधिकारी बताते वाले ‘नकली लोगों’ को महात्मा गाँधी जी को ठीक से पढ़ना चाहिए, वे स्वदेशी के बारे में क्या सोचते थे। उनका तो पूरा जीवन ही स्वदेशी को समर्पित था। चरखे से सूत कातना और खादी के कपड़े पहनना, क्या था? विदेशी कपड़ों की होली जलना और नमक क़ानून का उल्लंघन, ये सब स्वदेशी की भावना को मजबूत करने और सब प्रकार की स्वतंत्रता प्राप्त करने के महात्मा गाँधीजी के प्रयोग थे। हम गाँधीजी के स्वदेशी के विचार को कैसे भूल सकते हैं, जबकि इस वर्ष हम उनकी 50वीं जयंती माना रहे थे। 

गाँधी-इरविन पैक्ट के समय चर्चा चल रही थी। दोपहर में चाय का समय था। वायसराय साहब के लिए चाय आई और महात्मा गाँधी के लिए नींबू पानी आया। वायसराय देख रहे थे कि गांधीजी क्या करते हैं? गांधीजी ने एक पुड़िया निकाली और उसे खोलकर उसमें से कुछ नींबू पानी में डाल दिया। वायसराय को समझ नहीं आया कि गाँधीजी ने क्या किया तो उन्होंने पूछा कि आपने यह क्या डाला पानी में? गांधीजी ने उत्तर दिया- “आपके नमक क़ानून का उल्लंघन कर मैंने जो नमक बनाया था, उस नमक की पुड़ी को मैंने इसमें डाला है।” इतना मजबूत और विस्तृत है स्वदेशी का विचार। 

स्वदेशी क्या है, उसे और विस्तार देते हुए प्रख्यात स्वदेशी चिन्तक दत्तोपंत ठेंगडी ने कहा है- “यह मानना भूल है कि ‘स्वदेशी’ का सम्बन्ध केवल माल या सेवाओं से है। यह फौरी किस्म की सोच होगी। इसका मतलब है देश को आत्मनिर्भर बनाने की प्रबल भावना, राष्ट्र की सार्वभौमिकता और स्वतंत्रता की रक्षा तथा समानता के आधार पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग।” उनका स्पष्ट मानना था कि स्वदेशी, देशप्रेम की साकार और व्यावहारिक अभिव्यक्ति है। 

स्वदेशी के विरोध में दो बहुत उथले तर्क दिए जाते हैं- एक, आप अपना मोबाइल फेंक दीजिये, टीवी फोड़ दीजिये, क्योंकि वे विदेशी उत्पाद हैं। दूसर कुतर्क है, सरकार विदेशी सामान के आयत पर प्रतिबन्ध क्यों नहीं लगा देती। पहले दूसरे कुतर्क का जवाब है कि अंतर्राष्ट्रीय नीतियों के कारण सरकार की कुछ मजबूरी हो सकती है, लेकिन हमारी क्या मजबूरी है विदेशी उत्पाद खरीदने की? हम खुद क्यों नहीं विदेशी उत्पाद से दूरी बना लेते। जब हम खरीदेंगे ही नहीं तो भविष्य में कभी वह माल बिकने के लिए यहाँ आएगा ही नहीं। 

इसको एक ऐतिहासिक उदाहरण से समझिये। एक वर्ष अमेरिका में प्रचुर मात्र में संतरे का उत्पादन हुआ। जापान की महिलाओं को संतरे बहुत पसंद थे। अमेरिका ने जापान को अपने संतरे बेचने के लिए उचित बाज़ार समझा और जापान पर दबाव बनाया कि वह अमेरिका के संतरे अपने बाज़ारों में बिकने दे। पहले तो जापान ने इनकार किया, लेकिन अमेरिका की धौंस-पट्टी के कारण उसे अपने बाज़ार खोलने पड़े। लेकिन, जैसे ही जापान की महिलाओं और अन्य नागरिकों को यह ज्ञात हुआ कि हमारे बाजारों में जो संतरे की भरी आवक दिख रही है, उसके पीछे अमेरिका की धौंस-पट्टी है तो उन्होंने बहुत पसंद होने के बाद भी संतरे नहीं खरीदे। यह है स्वदेशी के प्रति नागरिक बोध। कोई भी अंतर्राष्ट्रीय नीति या दबाव नागरिकों को मजबूर नहीं कर सकता।

पहले कुतर्क का उत्तर, स्वदेशी के लिए लम्बे समय से आन्दोलन चला रहे संगठन स्वदेशी जागरण मंच का एक नारा है- ‘चाहत से देसी, जरूरत से स्वदेशी और मजबूरी में विदेशी’। इस नारे में ही उस कुतर्क का सटीक उत्तर छिपा है, साथ में स्पष्ट सन्देश है। इसके बाद भी स्वदेशी विरोधियों को कुछ समझ न आये तो उनको कहिये कि उनसे कुछ हो न पायेगा। वे बस विरोध करते रहें। उनका विरोध भारत के कारीगरों, कामगारों और उत्पादकों के विरोध में हैं। वे नहीं चाहते कि देश के उत्पाद आगे बढ़ें, यहाँ के कारीगर-उत्पादकों का लाभ हो। 

अब जरा सोचिये, देशभक्त नागरिक होने के नाते आपको क्या करना है? बहुत सरल मंत्र प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिया है- “लोकल के लिए वोकल हो जाईये।” अपने बंधुओं द्वारा निर्मित स्वदेशी उत्पादों पर गर्व कीजिये। जहाँ तक संभव हो सके स्वदेशी वस्तुएं खरीदिये। स्वदेशी विचार को जीवन में उतरिये। 

मंगलवार, 27 अगस्त 2019

सेवा को अपने जीवन में उतारें : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

बैतूल में आरएसएस के समविचार संगठन 'विद्या भारती' द्वारा संचालित हॉस्पिटल

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने लोकप्रिय रेडियो संवाद मन की बातमें भगवान श्रीकृष्ण और महात्मा गांधी के जीवन का उल्लेख करते हुए सेवा को अपने जीवन में उतारने का आह्वान किया। भारतीय परंपरा-संस्कृति में सेवा का अत्यधिक महत्व है। हम भारतीयों का यह एक ऐसा गुण है, जो हमें एक-दूसरे से जोड़ता है। हमारे देश में सेवा को उपकार की तरह नहीं, बल्कि कर्तव्य की तरह देखा जाता है। कर्तव्य भी साधारण नहीं, अपितु विशेष। भारतीय परंपरा में सेवाअर्थात् करना ही चाहिएऐसा कार्य। सेवा हमारे यहां बदले में कुछ पाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह करणीय कार्य है। जबकि पश्चिम से जो ईसाई मिशनरीज आए उन्होंने सेवा को कन्वर्जन (धर्मान्तरण) का माध्यम बनाया है। अर्थात् वह सेवा जैसे पवित्र कार्य का भी दुरुपयोग करते हैं। जबकि हमारे लिए सेवा समाज ऋण से उऋण होने का माध्यम है।
          प्राचीन भारत के इतिहास में झांक कर देखें तो पाएंगे कि समाज के प्रतिष्ठित और साधन-सम्पन्न लोग ही नहीं, अपितु सामान्य जनमानस में भी सेवा की प्रवृत्ति थी। आधुनिकत जीवन पद्धति में कहीं न कहीं हम सेवा भावसे दूर हुए हैं। स्व-केंद्रित जीवन होने के कारण हम अपने आस-पास जरूरतमंद लोगों को देख नहीं पाते हैं। जबकि हम सहजता से उनकी विभिन्न प्रकार से मदद कर सकते हैं। यही बात देशवासियों के ध्यान में लाने का प्रयास प्रधानमंत्री मोदी ने भगवान श्रीकृष्ण और महात्मा गांधी के माध्यम से किया है। उन्होंने एक बार फिर महात्मा गांधी की 150वीं जयंती को सार्थक ढंग से मनाने का आह्वान देश से किया है।
          हम जानते हैं कि अंहिसा के बाद महात्मा गांधी का सबसे बड़ा साधन एवं मंत्र सेवाही है। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी ने उचित ही कहा कि महात्मा गांधी के जीवन से एक बात हमेशा जुड़ी रही वह है, सेवा और सेवा भाव। उनका पूरा जीवन देखने पर यह सेवा भावसदैव उनके साथ दिखाई देता है। महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में उन लोगों की सेवा की, जो नस्लीय हिंसा का शिकार थे। उस समय यह छोटी बात नहीं थी। उन्होंने उन किसानों की सेवा की, जिनके साथ चंपारण में भेदभाव किया जा रहा था। उन्होंने उन मिल मजदूरों की सेवा की, जिन्हें उचित मजदूरी नहीं दी जा रही थी। उन्होंने गरीब, बेसहारा, कमजोर और भूखे लोगों की सेवा को अपने जीवन का परम कर्तव्य माना। अहिंसा और सत्य के साथ गांधी का जितना अटूट नाता रहा है, सेवा के साथ भी उनका उतना ही अनन्य, अटूट नाता रहा। जिस किसी को जब भी जहां जरूरत पड़ी, महात्मा गांधी सेवा के लिए मौजूद रहे। उन्होंने न केवल सेवा पर बल दिया, बल्कि उसके साथ जुड़े आत्मसुख पर भी जोर दिया। सेवा शब्द की सार्थकता इसी अर्थ में है कि उसे आनंद के साथ किया जाए।
          इस महत्वपूर्ण वर्ष में जब हम महात्मा गांधी को याद कर रहे हैं, उनकी सार्धशती को उत्साहित होकर मना रहे हैं, तब सेवा को अपने आचरण में उतारना ही गांधीजी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। सेवा कोई कठिन कार्य नहीं है, बल्कि बहुत सहज है। अपने सामथ्र्य के अनुसार हम छोटे-छोटे उपक्रम करके सेवा कर सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने अनेक उपक्रम बताए ही हैं। अपने स्तर पर बहुत से लोग सेवा कार्य कर भी रहे हैं। देश में जब भी निस्वार्थ सेवा कार्यों की चर्चा चलती है तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उल्लेख अवश्य होता है/ होना भी चाहिए। संघ की प्रेरणा से देशभर में अनेक समविचारी संगठन और स्वयंसेवक डेढ़ लाख से अधिक सेवा प्रकल्प संचालित कर रहे हैं। सेवा कार्यों से समाज में क्या बदलाव आए हैं, उनकी प्रेरक कहानियां सेवागाथा डॉट ओआरजी पर पढ़ी जा सकती हैं। संघ के स्वयंसेवकों ने सेवा को अपने जीवन में उतार लिया है, सेवा कार्य करते हुए वह एक गीत भी गाते हैं- सेवा है यज्ञ कुंड, समिधा सम हम जलें। हमारे जीवन में सेवाकिस भावसे आनी चाहिए, उसको यह गीत स्पष्ट रूप में बताता है।

सोमवार, 16 जनवरी 2017

तस्वीर की जगह गांधी विचार पर बहस होनी चाहिए

 कैलेंडर  और डायरी पर महात्मा गांधी की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर से उत्पन्न विवाद बेवजह है। यह इसलिए, क्योंकि भारत में इस बात की कल्पना ही नहीं की जा सकती है कि किसी कागज के टुकड़े पर चित्र प्रकाशित नहीं होने से गांधीजी के व्यक्तित्व पर पर्दा पड़ जाएगा। यह तर्क तो हास्यास्पद ही है कि गांधीजी के चित्र की जगह प्रधानमंत्री का चित्र इसलिए प्रकाशित किया गया है, ताकि गांधी की जगह मोदी ले सकें। गांधीजी की जगह वास्तव में कोई नहीं ले सकता। आश्चर्य की बात यह है कि गांधीजी के चित्र को लेकर सबसे अधिक चिंता उन लोगों को हो रही है, जिन्होंने 70 साल में गांधीजी के विचार को पूरी तरह से दरकिनार करके रखा हुआ था। सिर्फ राजनीति की दुकान चलाने के लिए ही यह लोग गांधी नाम की माला जपते रहे हैं। वास्तव में आज जरूरत इस बात की है कि गांधीजी के विचार पर बात की जाए। इस बहस में इस पहलू को भी शामिल किया जाए कि आखिर इस देश में गांधीजी के विचार को दरकिनार करने में किसकी भूमिका रही है? आखिर अपने ही देश में गांधीजी कैलेंडर, डायरी, नोट और दीवार पर टंगे चित्रों तक ही सीमित क्यों रह गए? उनके विचार को व्यवहार में लाने की सबसे पहले जिम्मेदारी किसके हिस्से में आई थी और उन्होंने क्या किया?

शनिवार, 27 अगस्त 2016

राहुल गांधी तय कीजिए, संघ ने गांधीजी की हत्या की या नहीं

 महात्मा  गांधी की हत्या के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जिम्मेदार ठहराने के अपने बयान पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपनी स्थिति तय नहीं कर पा रहे हैं। एक तरफ, सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने हलफनामे में राहुल गांधी ने दावा किया है कि उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को एक संगठन के तौर पर कभी भी जिम्मेदार नहीं बताया है। उन्होंने संघ से जुड़े कुछ लोगों पर महात्मा गांधी की हत्या करने का आरोप लगाया था। वहीं दूसरी तरफ, न्यायालय के बाहर वह गर्जन-तर्जन कर रहे हैं कि संघ को लेकर दिए बयान पर वह कायम हैं और संघ की विचारधारा के खिलाफ उनकी लड़ाई जारी रहेगी। राहुल गांधी को समझना चाहिए कि विचारधारा की लड़ाई लडऩा अच्छा माना जा सकता है लेकिन गलत तथ्यों के आधार पर एक सम्मानित संगठन को बदनाम करना कतई उचित नहीं है। इसे राजनीतिक अपरिपक्वता ही कहा जाएगा कि पारदर्शिता के इस जमाने में वह न्यायालय में कुछ हलफनामा पेश करते हैं और न्यायालय से बाहर कुछ और बयानबाजी करते हैं। जनता उस व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखती है, जिसकी कथनी में बार-बार अंतर दिखाई देता है। राहुल गांधी यदि यह सोच रहे हैं कि जनता को भ्रमित किया जा सकता है, तब वह बहुत बड़ी गलतफहमी का शिकार हैं। संघ के लोग भी संचार माध्यमों का उपयोग करने लगे हैं, इसलिए संघ के खिलाफ किसी झूठ को गढऩा अब पहले की तरह आसान नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में दिए माफीनामे जैसा हलफनामा प्रस्तुत करते समय राहुल गांधी को इस बात का अंदाजा नहीं रहा होगा कि समूचे देश तत्काल उनके 'यू-टर्न' की खबर फैल जाएगी। इस 'यू-टर्न' को लेकर बने माहौल ने ही उन्हें फिर से संघ के खिलाफ बोलने के लिए मजबूर कर दिया। लेकिन, यहाँ भी राहुल गांधी गलत हैं। न जाने उन्हें क्यों लगता है कि उनका राजनीतिक करियर संघ को गरियाने से ही आगे बढ़ सकता है। न जाने क्यों उन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि देश उनसे गंभीर राजनीति की अपेक्षा करता है, लेकिन वह प्रत्येक अवसर पर सबको निराश कर देते हैं।

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

गांधी हत्या और आरएसएस

 राजनेताओं  को यह समझना होगा कि अपने राजनीतिक नफे-नुकसान के लिए किसी व्यक्ति या संस्था पर झूठे आरोप लगाना उचित परंपरा नहीं है। कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी शायद यह भूल गए थे कि अब वह दौर नहीं रहा, जब नेता प्रोपोगंडा करके किसी को बदनाम कर देते थे। आज पारदर्शी जमाना है। आप किसी पर आरोप लगाएंगे तो उधर से सबूत मांगा जाएगा। बिना सबूत के किसी पर आरोप लगाना भारी पड़ सकता है। भले ही कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष इस मामले पर माफी माँगने से इनकार करके मुकदमे का सामना करने के लिए तैयार दिखाई देते हैं लेकिन, कहीं न कहीं उन्हें यह अहसास हो रहा होगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर महात्मा गांधी की हत्या का अनर्गल आरोप लगाकर उन्होंने गलती की है। इसका सबूत यह भी है कि वह अदालत गए ही इसलिए थे ताकि यह प्रकरण खारिज हो जाए। गौरतलब है कि गांधी हत्या का आरोप संघ पर लगाने के मामले में कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके सीताराम केसरी को भी माफी का रास्ता चुनना पड़ा था। प्रसिद्ध स्तम्भकार एजी नूरानी को भी द स्टैटसमैन अखबार के लेख के लिए माफी मांगनी पड़ी थी। बहरहाल, वर्ष 2014 में ठाणे जिले के सोनाले में आयोजित चुनावी सभा में संघ को गांधी का हत्यारा बताने पर राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक मानहानि के मामले की सुनवाई कर रहे उच्चतम न्यायालय ने उन्हें चेतावनी देते हुए कहा है कि राहुल गांधी इस मामले में माफी माँगे या फिर मुकदमे का सामना करें। उच्चतम न्यायालय ने राहुल गांधी के भाषण पर सवाल उठाए और आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि 'उन्होंने गलत ऐतिहासिक तथ्य का उद्धरण लेकर भाषण क्यों दिया? राहुल गांधी को इस तरह एक संगठन की सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं करनी चाहिए थी।' हमें गौर करना होगा कि कांग्रेस का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति विरोध और द्वेष प्रारंभ से ही है। वैचारिक विरोध और द्वेष के कारण ही कांग्रेस का एक धड़ा अनेक अवसर पर संघ को बदनाम करने का प्रयास करता रहा है। 
  पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक संघ के प्रति वही संकीर्ण नजरिया और द्वेष कायम है। साम्यवादी विचारधारा के प्रति झुकाव रखने के कारण जवाहरलाल नेहरू संघ का विरोध करते थे। वह किसी भी प्रकार संघ को दबाना चाहते थे। वर्ष 1948 में जब नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या की, तब संघ को बदनाम करने और उसे खत्म करने का मौका प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को मिल गया। 'नाथूराम गोडसे संघ का स्वयंसेवक है और गांधीजी की हत्या का षड्यंत्र आरएसएस ने रचा है।' यह आरोप लगवाकर कांग्रेसनीत तत्कालीन सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर न केवल प्रतिबंध लगाया, बल्कि देशभर में उससे संबंद्ध नागरिकों को जेल में ठूंस दिया। परंतु, साँच को आँच क्या? तमाम षड्यंत्र के बाद भी सरकार गांधीजी की हत्या में संघ की किसी भी प्रकार की भूमिका को साबित नहीं कर सकी। संघ अग्नि परीक्षा में निर्दोष साबित हुआ। नतीजा, सरकार को संघ से प्रतिबंध हटाना पड़ा। क्या राहुल गांधी और संघ विरोधी बता सकते हैं कि जब संघ ने महात्मा गांधी की हत्या की थी, तब कांग्रेस ने ही उससे प्रतिबंध क्यों हटाया? राहुल गांधी संभवत: अब भी यह नहीं समझ पाए हैं कि गांधीजी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की थी, संघ ने नहीं। उन्हें इसके लिए उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी पर ध्यान देना होगा। न्यायालय ने कहा है कि गोडसे ने गांधी को मारा और संघ या संघ के लोगों ने गांधी को मारा, दोनों कथनों में बहुत बड़ा अंतर है। बहरहाल, नाथूराम गोडसे और संघ के संबंध में स्वयं गोडसे ने अदालत में कहा था कि वह किसी समय संघ की शाखा जाता था लेकिन बाद में उसने संघ छोड़ दिया। बहरहाल, यदि यह माना जाए कि एक समय गोडसे संघ का स्वयंसेवक था, इसलिए संघ गांधी हत्या के लिए जिम्मेदार है। तब यह भी बताना उचित होगा कि एक समय नाथूराम गोडसे कांग्रेस का पदाधिकारी रह चुका था। लेकिन, संघ विरोधियों ने नाथूराम गोडसे और कांग्रेस के संबंध को कभी भी प्रचारित नहीं किया। इससे स्पष्ट होता है कि आज की तरह उस समय का तथाकथित बौद्धिक नेतृत्व, वामपंथी लेखक/इतिहासकार और कांग्रेस का नेतृत्व ऐन केन प्रकारेण संघ को कुचलना चाहता था। यह सच है कि एक समय में नाथूराम गोडसे संघ की गतिविधियों में शामिल रहा। लेकिन, यह भी उतना ही सच है कि वह संघ की विचारधारा के साथ संतुलन नहीं बैठा सका। संभवत: वह संघ को कट्टर हिन्दूवादी संगठन समझकर उससे जुड़ा था। लेकिन, बाद में जब आरएसएस के संबंध में गोडसे की छवि ध्वस्त हुई, तब गोडसे न केवल संघ से अलग हुआ बल्कि एक हद तक संघ का मुखर विरोधी भी बन गया था। उनके समाचार पत्र 'हिन्दू राष्ट्र' में संघ विरोधी आलेख प्रकाशित होते थे। गोडसे ने संघ की आलोचना करते हुए सावरकर को पत्र भी लिखा था। इस पत्र में उसने लिखा कि संघ हिन्दू युवाओं की ऊर्जा को बर्बाद कर रहा है, इससे कोई आशा नहीं की जा सकती। स्पष्ट है कि गोडसे संघ समर्थक नहीं, बल्कि संघ विरोधी था। गांधी हत्या की जांच के लिए गठित कपूर आयोग को दी अपनी गवाही में आरएन बनर्जी ने भी इस सत्य को उद्घाटित किया था। बनर्जी की की गवाही इस मामले में बहुत महत्त्वपूर्ण थी। क्योंकि, गांधीजी की हत्या के समय आरएन बनर्जी केन्द्रीय गृह सचिव थे। बनर्जी ने अपने बयान में कहा था कि यह साबित नहीं हुआ है कि वे (अपराधीगण) संघ के सदस्य थे। वे तो संघ की गतिविधियों से संतुष्ट नहीं थे। संघ के खेलकूद, शारीरिक व्यायाम आदि को वे व्यर्थ मानते थे। वे अधिक उग्र और हिंसक गतिविधियों में विश्वास रखते थे। (कपूर आयोग रिपोर्ट खंड 1 पृष्ठ 164)
   राजनीतिक और वैचारिक षड्यंत्र के तहत ही गांधी हत्या के मामले में आरएसएस को घसीटा गया था। गांधी हत्या की प्राथमिकी (एफआईआर) तुगलक रोड थाने में दर्ज कराई गई है। इस प्राथमिकी (एफआईआर-68, दिनांक- 30 जनवरी, 1948, समय - सायंकाल 5:45 बजे ) में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कहीं कोई जिक्र नहीं है। लेकिन, गांधीजी की हत्या के बाद ही तत्कालीन प्रधानमंत्री और कांग्रेस नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने भाषणों में गांधी हत्या के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दोष देना शुरू कर दिया। इस बात से जाहिर होता है कि पंडित नेहरू आरएसएस के संबंध में पूर्वाग्रह से ग्रसित थे और उन्हें तत्कालीन वामपंथी विचारकों/नेताओं द्वारा लगातर संघ के प्रति भड़काया जा रहा था। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के भड़काऊ भाषणों से देशभर में कांग्रेस के लोग संघ से संबंध रखने वाले लोगों को प्रताडि़त करने लगे थे। संघ कार्यालयों पर पथराव हुआ, तोडफ़ोड़ हुई और कई जगह आगजनी भी की गई। लेकिन, संघ के अनुशासित स्वयंसेवकों ने कोई प्रतिकार नहीं किया। कांग्रेस की हिंसा का शांति से सामना कर उन्होंने सिद्ध कर दिया था कि संघ अंहिसक संगठन है। बहरहाल, गांधी हत्या में आरएसएस की भूमिका की पड़ताल करने के लिए तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल की निगरानी में देशभर में अनेक गिरफ्तारियां, छापेमारी और गवाहियां हुईं। इनसे धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगा कि गांधी हत्या का संघ से कोई वास्ता नहीं है। संघ पर जघन्य आरोप साबित नहीं होते देख पंडित जवाहरलाल नेहरू कुछ विचलित हुए और उन्होंने जाँच पर असंतोष जाहिर करते हुए सरदार पटेल को पत्र लिखा। उन्होंने अपने पत्र में आरोप लगाया कि दिल्ली की पुलिस और अधिकारियों की संघ के प्रति सहानुभूति है। इस कारण संघ के लोग पकड़े नहीं जा रहे। उसके कई प्रमुख नेता खुले घूम रहे हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि देशभर से जानकारियां मिली हैं और मिल रही हैं कि गांधीजी की हत्या संघ के व्यापक षड्यंत्र के कारण हुई है, परंतु उन सूचनाओं की ठीक प्रकार से जांच नहीं हो रही। जबकि यह पक्की बात है कि षड्यंत्र संघ ने ही रचा था। आदि-आदि। सरदार पटेल ने इस पत्र का क्या जवाब दिया वह बहुत महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि कुछ लोग सरदार पटेल को भी गलत अर्थों में उद्धृत करते हैं। संघ विरोधी सरदार पटेल की तत्कालीन प्रतिक्रियाओं को तो लिखते हैं, जिनमें उन्होंने भी यह माना कि गांधी हत्या में संघ की भूमिका हो सकती है। लेकिन, जाँच के बाद सरदार पटेल की क्या धारणा बनी, यह नहीं बताते। खैर, पंडित नेहरू की जिज्ञासा को शांत करने के लिए सरदार पटेल पत्र (27 फरवरी, 1948) में लिखते हैं कि गांधी जी की हत्या के सम्बन्ध में चल रही कार्यवाही से मैं पूरी तरह अवगत रहता हूं। सभी अभियुक्त पकड़े गए हैं तथा उन्होंने अपनी गतिविधियों के सम्बन्ध में लम्बे-लम्बे बयान दिए हैं। उनके बयानों से स्पष्ट है कि यह षड्यंत्र दिल्ली में नहीं रचा गया। वहां का कोई भी व्यक्ति षड्यंत्र में शामिल नहीं है। षड्यंत्र के केन्द्र बम्बई, पूना, अहमदनगर तथा ग्वालियर रहे हैं। यह बात भी असंदिग्ध रूप से उभर कर सामने आयी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इससे कतई सम्बद्ध नहीं है। यह षड्यंत्र हिन्दू सभा के एक कट्टरपंथी समूह ने रचा था। यह भी स्पष्ट हो गया है कि मात्र 10 लोगों द्वारा रचा गया यह षड्यंत्र था और उन्होंने ही इसे पूरा किया। इनमें से दो को छोड़ सब पकड़े जा चुके हैं। इस पत्र व्यवहार से भी स्पष्ट है कि कांग्रेस का एक धड़ा लगातार पंडित नेहरू को संघ के विरोध में गलत सूचनाएं उपलब्ध करा रहा था। लेकिन, वास्तविकता धीरे-धीरे स्पष्ट होती जा रही थी। 
  महात्मा गांधी की हत्या से संबंधित संवेदनशील मामले को सुनवाई के लिए न्यायमूर्ति आत्मा चरण की विशेष अदालत को सौंपा गया। प्रकरण की सुनवाई के लिए 4 मई, 1948 को विशेष न्यायालय का गठन हुआ। 27 मई से मामले की सुनवाई शुरू हुई। सुनवाई लालकिले के सभागृह में शुरू हुई। यह खुली अदालत थी। सभागृह खचाखच भरा रहता था। 24 जून से 6 नवंबर तक गवाहियां चलीं। 01 से 30 दिसंबर तक बहस हुई और 10 जनवरी 49 को फैसला सुना दिया गया। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने 149 गवाहों के बयान 326 पृष्ठों में दर्ज हुए। आठों अभियुक्तों ने लम्बे-लम्बे बयान दिए, जो 323 पृष्ठों में दर्ज हुए। 632 दस्तावेजी सबूत और 72 वस्तुगत साक्ष्य पेश किए गए। इन सबकी जांच की गयी। न्यायाधीश महोदय ने अपना निर्णय 110 पृष्ठों में लिखा। नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई। शेष पाँच को आजन्म कारावास की सजा हुई। इस मामले में कांग्रेस और वामपंथियों ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी विनायक दामोदर सावरकर को भी फंसाने का प्रयास किया था। लेकिन, उनका यह षड्यंत्र भी असफल रहा। न्यायालय से सावरकर को निर्दोष बरी किया गया। इसी फैसले में न्यायालय ने स्पष्ट तौर पर यह कहा कि महात्मा गांधी की हत्या से संघ का कोई लेना-देना नहीं है। स्पष्ट है कि उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी। लेकिन, नहीं। न्यायालय के निर्णय से कांग्रेस और वामपंथी नेता संतुष्ट नहीं हुए। संघ विरोधी लगातार न्यायालय के प्रति असम्मान प्रदर्शित करते हुए गांधी हत्या के लिए संघ को बदनाम करते रहे। बाद में, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दबाव या भरोसे में लेकर इस मामले को फिर से उखाड़ा गया। वर्ष 1965-66 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गांधी हत्या का सच सामने लाने के लिए न्यायमूर्ति जीवनलाल कपूर की अध्यक्षता में कपूर आयोग का गठन किया। दरअसल, इस आयोग के गठन का उद्देश्य गांधी हत्या का सच सामने लाना नहीं था, अपितु संघ विरोधी एक बार फिर आरएसएस को फंसाने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन, इस बार भी उन्हें मुंह की खानी पड़ी। कपूर आयोग ने तकरीबन चार साल में 101 साक्ष्यों के बयान दर्ज किए तथा 407 दस्तावेजी सबूतों की छानबीन कर 1969 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। आयोग अपनी रिपोर्ट में असंदिग्ध घोषणा करता है कि महात्मा गांधी की जघन्य हत्या के लिए संघ को किसी प्रकार जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। (रिपोर्ट खंड 2 पृष्ठ 76)  
  न्यायालय और आयोग के स्पष्ट निर्णयों के बाद भी आज तक संघ विरोधी गांधी हत्या के मामले में संघ को बदनाम करने से बाज नहीं आते। इस प्रकरण से यह भी स्पष्ट होता है कि संघ विरोधियों का भारतीय न्याय व्यवस्था, संविधान और इतिहास के प्रति क्या दृष्टिकोण है? जब यह मामला शीर्ष न्यायालय में पहुंच गया है तब न्यायालय को यह भी ध्यान देना चाहिए कि गांधी हत्या के लिए बार-बार संघ को जिम्मेदार बताने से न केवल एक संगठन पर कीचड़ उछाली जाती है, वरन भारतीय न्याय व्यवस्था के प्रति भी अविश्वास का वातावरण बनाया जाता है। उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद भी संघ को गांधी हत्या के लिए आज तक जिम्मेदार बताना, न्यायपालिका के प्रति असम्मान प्रकट करता है। न्यायालय को इस संबंध में भी संज्ञान लेना चाहिए। बहरहाल, हमें इस सच को स्वीकार करना होगा कि गांधी हत्या में संघ को बार-बार इसलिए घसीटा जाता है ताकि सत्ताधीश और वामपंथी विचारक अपने निहित स्वार्थ पूरे कर सकें। संघ विरोधियों ने अब तक गांधी हत्या प्रकरण को राजनीतिक दुधारू गाय समझ रखा था। लेकिन, उन्हें यह समझना चाहिए कि अब प्रोपेगंडा राजनीति का दौर बीत चुका है।  

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

स्वच्छ भारत अभियान का एक वर्ष

 आ ज स्वच्छ भारत अभियान का एक वर्ष पूरा हो रहा है। पिछले वर्ष महात्मा गाँधी की जयंती पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी सरकार के इस महत्वपूर्ण अभियान की शुरुआत की थी। अभियान का उद्देश्य शहरों और गाँवों को स्वच्छ बनाने का है। इसके तहत शहरों-गाँवों में शौचालयों का निर्माण, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की सुविधा, मैला ढोने की प्रथा का उन्मूलन करना, स्वच्छ और शुद्ध पेयजल का प्रबंध करना आदि शामिल है। अभियान के माध्यम से प्रधानमंत्री स्वच्छता के प्रति लोगों को जागरूक करना चाहते हैं। स्वच्छता को आदत बनाना उनका मुख्य उद्देश्य प्रतीत होता है। इसके लिए उन्हें समाज के प्रमुख और प्रभावशाली व्यक्तियों को स्वच्छ भारत अभियान से जोड़ा है। ताकि वे स्वच्छता के लिए लोगों को प्रेरित कर सकें।

शुक्रवार, 27 जून 2014

विकास के लिए जरूरी है स्वदेशी मॉडल

 भा रत १५ अगस्त, १९४७ को आजाद हुआ। प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल करने में जवाहरलाल नेहरू ने सफलता पाई। हालांकि देश सरदार वल्लभ भाई पटेल को अपना मुखिया चुनना चाहता था और चुना भी था। लेकिन, महात्मा गांधी की भूल कहें या जवाहरलाल नेहरू की जिद, सरदार को सदारत नहीं मिल सकी। बहरहाल, देश सशक्त हो, विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़े, इसके लिए जब नीतियां बनाने की बारी आई तो हमारे पहले प्रधानमंत्री ने विवेकानंद, गांधी, विनोबा और अरविन्द के विचारों की अनदेखी की। जवाहरलाल नेहरू विदेश में पढ़े-लिखे थे। उससे भी ज्यादा वे पश्चिम की चकाचौंध और साम्यवादी विचारधारा की गिरफ्त में भी थे। भारत के मानस को शायद वे नहीं समझ सके। यही कारण था कि उनके नेतृत्व में बनी नीतियों पर पश्चिमी और साम्यवादी मॉडल की स्पष्ट छाप देखी गई। गांधी के रामराज्य की परिकल्पना को कहीं अंधेरे में धकेल दिया गया। महात्मा की ग्रामवासिनी भारतमाता की चिंता भी उस व्यक्ति ने नहीं की जो गांधी के हस्तक्षेप के कारण ही प्रधानमंत्री बना। शहरों के विकास को प्राथमिकता दी गई, वह भी विकास के विदेशी मॉडल के आधार पर। गांधीजी को नजरअंदाज करने वाले जवाहरलाल नेहरू ने विवेकानंद, अरविन्द, विनोबा, दीनदयाल और लोहिया के स्वदेशी चिंतन पर क्या कान दिया होगा, आज हम आसानी से समझ सकते हैं। प्रारंभ से पड़ी लीक से हटकर स्वदेशी मॉडल को विकसित करने में अब तक किसी ने रुचि नहीं दिखाई है। पश्चिम का पिछलग्गू बनकर हम आधुनिकता में भी पिछड़े ही रह गए। दूसरे के रंग में रंगकर हमने अपनी मौलिकता भी खो दी। कोई भी देश अपने स्वाभिमान, अतीत-वर्तमान के गौरव और स्वचिंतन के आधार पर ही आगे बढ़ सकता है, इस बात को भूलना नहीं चाहिए। भारत के आसपास ही चीन और जापान सहित अन्य देश आजाद हुए थे। आज चीन और जापान कहां है और हम कहां? जापान पर तो अमरीका ने परमाणु बम गिराकर उसकी कमर तक तोड़ दी थी। इसके बावजूद उसका हौसला कम नहीं हुआ। उसने अपने विकास का अपना मॉडल बनाया। नतीजा आज वह दुनिया के शीर्षस्थ देशों में से एक है। चीन और जापान विकसित देश हैं और हम अब भी विकासशील।
          किसी भी देश की अपनी संस्कृति होती है। उसकी अपनी भाषा-बोली, संचार की व्यवस्था होती है। उसकी अपनी भौगोलिक स्थिति होती है। उसकी अपनी पारिवारिक और सामाजिक संरचना होती है। किसी भी देश के विकास की नीतियां जब बनाई जाती हैं तो ये तथ्य ध्यान में रखने होते हैं। देश के मानस को समझना होता है। कोई भी नीति जब इन तथ्यों को ताक पर रखकर और विदेशी चकाचौंध को देखकर बनाई जाती है तो उसकी सफलता संदिग्ध हो जाती है। इसे एक सहज उदाहरण से समझ सकते हैं। किर्सी स्थूलकाय आदमी के नाप से पेंट सिलाकर किसी कृषकाय व्यक्ति को पहनाई जाएगी तो हास्यास्पद स्थिति ही बनेगी। संसाधनों का उपयोग कर पेंट तो सिलवा ली लेकिन क्या वह किसी काम आ रही है? ऐसी पेंट का क्या किया जाए? इस देश में यही हुआ। सरकारों ने देश की जरूरत को नहीं समझा, उसके मानस को नहीं समझा। साठ साल में विकास का स्वदेशी मॉडल भी तय नहीं कर सके। २०० साल की गुलामी की विरासत में अंग्रेज जो सौंप गए हमारे नेता उसे ही आगे बढ़ाते रहे हैं। दरअसल दोष उनका नहीं, बल्कि उनकी शिक्षा का था। शिक्षा को लेकर मैकाले की नीति से हम सब वाकिफ हैं। भारत को सदैव मानसिक रूप से पश्चिम को गुलाम बनाने के लिए किस तरह उसने भारतीय शिक्षण प्रणाली को ध्वस्त किया। अंग्रेजियत के बुखार से पीडि़त हमारे नीति निर्माताओं के मन में यह बात गहरे पैठ गई थी कि जो कुछ पश्चिम में हुआ और हो रहा है, वह निश्चित ही श्रेष्ठ है। पश्चिम ही बेहतर है, इस व्याधि से ग्रस्त नेतृत्व क्यों स्वदेशी मॉडल की चिंता करने लगा। वह तो उसी पश्चिमी मॉडल को हम पर लादने को आतुर था, जिसकी जरूरत और समझ इस देश की ७० फीसदी आबादी को नहीं थी, लेकिन उसे पश्चिमी मॉडल से ब्लाइंड लव था। गांधीजी के स्वदेशी विकास के मॉडल में गांवों का विकास प्राथमिकता में था जबकि नेहरू की प्राथमिकता शहरों का विकास थी। भारत कृषि प्रधान देश है। उस वक्त कृषि उत्पादन में हम शीर्ष पर थे। यह हमारी ताकत थी। हमारे नेतृत्व ने इसकी अनदेखी की। जब आप अपनी ताकत की अनदेखी करते हैं तो निश्चित ही मुश्किल का सामना करना पड़ता है। बहुसंख्यक समाज की अनदेखी का ही नतीजा है कि स्थितियां बद से बदतर होती जा रही हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, जीवनस्तर, पर्यावरण, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण की क्या स्थिति है? सब वाकिफ हैं। एक भी क्षेत्र में हम मजबूती के साथ नहीं खड़े हैं। जब नींव ही खोखली है तो इमारत का कमजोर होना निश्चित है। हजारों लोगों के बलिदान और संघर्ष से हासिल स्वाधीनता के बाद व्यवस्था में हम क्या बदलाव लाए, सोचने की बात है। सत्ता सुख ध्येय हो जाए तो देश की चिंता रहती किसे है। देश के विकास के लिए नई नीतियां बनाना तो छोडि़ए हमारे राजपुरुष तो अंग्रेजों के बनाए कानूनों और व्यवस्थाओं को अब तक घसीट रहे हैं। राजनीति अब समाजसेवा का माध्यम नहीं रही बल्कि भोग-विलास का साधन बनकर रह गई है। समाज के लिए स्वयं को खपाने वाले लोग अब राजनीति में बहुत खोजने पर ही मिलेंगे। 
            अदूरदर्शी सोच और गलत नीतियों के फलस्वरूप ६० साल बाद हम कहां खड़े हैं? गरीब और गरीब होता जा रहा है। अमीर दोगुनी-चौगुनी गति से अमीर हो रहा है। एक छोटा-सा घर तो छोडि़ए जनाब ६० फीसदी से अधिक आबादी को दो जून की रोटी जुटाना मुश्किल हो रहा है। पश्चिमी मॉडल के कारण आज पर्यावरण जो क्षति पहुंची है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है। युवा ताकत को हम पहचान नहीं रहे, उनके हाथों को काम नहीं दे पा रहे हैं, हमारी सरकारों ने समय के साथ बेरोजगारों की फौज खड़ी कर दी है। तकनीक और उत्पादन में हम कहां हैं? शिक्षा का स्तर क्या है? भारत कितना स्वस्थ है? ऐसे तमाम सवाल हैं जो हुक्कामों का मुंह नोंचने के लिए छटपटा रहे हैं। वाजिब सवाल निरुत्तर खड़े बैचेन-से हैं। होना यह था कि जब हमारे हाथ में सत्ता की चाबी आई थी तब ही तय करना था कि हमें जाना किधर है? भारत के मानस को समझकर विकास का मॉडल तय करना चाहिए था। एकात्म मानववाद के जनक पं. दीनदयाल उपाध्याय के कतार के अंतिम व्यक्ति की चिंता का मॉडल बनना चाहिए था। महात्मा गांधी के रामराज्य की अवधारणा को समझना चाहिए था। भारत की तासीर को पहचान कर, महसूस करके, उसके अनुरूप नीतियां बनानी थी। ऐसा मॉडल बनना चाहिए था जिसमें व्यक्ति, परिवार, समाज, नगर, राज्य और देश की जरूरतों को ध्यान में रखा जाता। स्वदेशी और सर्वस्पर्शी मॉडल के जरिए ही हम दुनिया के सामने 'मॉडल' के रूप में स्थापित हो सकते थे।