गुरुवार, 30 मई 2019

पत्रकारिता की प्राथमिकता को टटोलने का समय

हिंदी पत्रकारिता दिवस, 30 मई 1826
'हिंदुस्थानियों के हित के हेत' इस उद्देश्य के साथ 30 मई, 1826 को भारत में हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी जाती है। पत्रकारिता के अधिष्ठाता देवर्षि नारद के जयंती प्रसंग (वैशाख कृष्ण पक्ष द्वितीया) पर हिंदी के पहले समाचार-पत्र 'उदंत मार्तंड' का प्रकाशन होता है। सुअवसर पर हिंदी पत्रकारिता का सूत्रपात होने पर संपादक पंडित युगलकिशोर समाचार-पत्र के पहले ही पृष्ठ पर अपनी प्रसन्नता प्रकट करते हुए उदंत मार्तंड का उद्देश्य स्पष्ट करते हैं। आज की तरह लाभ कमाना उस समय की पत्रकारिता का उद्देश्य नहीं था। भारत की स्वतंत्रता से पूर्व प्रकाशित ज्यादातर समाचार-पत्र आजादी के आंदोलन के माध्यम बने। अंग्रेज सरकार के विरुद्ध मुखर रहे। यही रुख उदंत मार्तंड ने अपनाया। अत्यंत कठिनाईयों के बाद भी पंडित युगलकिशोर उदंत मार्तंड का प्रकाशन करते रहे। किंतु, यह संघर्ष लंबा नहीं चला। हिंदी पत्रकारिता के इस बीज की आयु 79 अंक और लगभग डेढ़ वर्ष रही। इस बीज की जीवटता से प्रेरणा लेकर बाद में हिंदी के अन्य समाचार-पत्र प्रारंभ हुए। आज भारत में हिंदी के समाचार-पत्र सबसे अधिक पढ़े जा रहे हैं। प्रसार संख्या की दृष्टि से शीर्ष पर हिंदी के समाचार-पत्र ही हैं। किंतु, आज हिंदी पत्रकारिता में वह बात नहीं रह गई, जो उदंत मार्तंड में थी। संघर्ष और साहस की कमी कहीं न कहीं दिखाई देती है। दरअसल, उदंत मार्तंड के घोषित उद्देश्य 'हिंदुस्थानियों के हित के हेत' का अभाव आज की हिंदी पत्रकारिता में दिखाई दे रहा है। हालाँकि, यह भाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन बाजार के बोझ तले दब गया है। व्यक्तिगत तौर पर मैं मानता हूँ कि जब तक अंश मात्र भी 'देशहित' पत्रकारिता की प्राथमिकता में है, तब तक ही पत्रकारिता जीवित है। आवश्यकता है कि प्राथमिकता में यह भाव पुष्ट हो, उसकी मात्रा बढ़े। समय आ गया है कि एक बार हम अपनी पत्रकारीय यात्रा का सिंहावलोकन करें। अपनी पत्रकारिता की प्राथमिकताओं को जरा टटोलें। समय के थपेडों के साथ आई विषंगतियों को दूर करें। समाचार-पत्रों या कहें पूरी पत्रकारिता को अपना अस्तित्व बचाना है, तब उदंत मार्तंड के उद्देश्य को आज फिर से अपनाना होगा। अन्यथा सूचना के डिजिटल माध्यम बढऩे से समूची पत्रकारिता पर अप्रासंगिक होने का खतरा मंडरा ही रहा है।    
          असल में आज की पत्रकारिता के समक्ष अनेक प्रकार की चुनौतियां मुंहबांए खड़ी हैं। यह चुनौतियां पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों से डिगने के कारण उत्पन्न हुई हैं। पूर्वजों ने जो सिद्धांत और मूल्य स्थापित किए थे, उनको साथ लेकर पत्रकारिता मिशन से प्रोफेशन की ओर जाती, तब संभवत: कम समस्याएं आतीं। क्योंकि मूल्यों और सिद्धांतों की उपस्थिति में प्रत्येक व्यवसाय में मर्यादा और नैतिकता का ख्याल रखा जाता है। किंतु, जैसे ही हम तय सिद्धांतों से हटते हैं, मर्यादा को लांघते हैं, तब स्वाभाविक तौर पर चुनौतियां सामने आने लगती हैं। नैतिकता के प्रश्न भी खड़े होने लगते हैं। यही आज मीडिया के साथ हो रहा है। मीडिया के समक्ष अनेक प्रश्न खड़े हैं। स्वामित्व का प्रश्न। भ्रष्टाचार का प्रश्न। मीडिया संस्थानों में काम करने वाले पत्रकारों के शोषण, स्वाभिमान और स्वतंत्रता के प्रश्न हैं। वैचारिक पक्षधरता के प्रश्न हैं। 'भारतीय भाव' को तिरोहित करने का प्रश्न। इन प्रश्नों के कारण उत्पन्न हुआ सबसे बड़ा प्रश्न- विश्वसनीयता का है। 
          यह सब प्रश्न उत्पन्न हुए हैं पूँजीवाद के उदर से। सामान्य-सा फलसफा है कि बड़े लाभ के लिए बड़ी पूँजी का निवेश किया जाता है। आज अखबार और न्यूज चैनल का संचालन कितना महंगा है, हम सब जानते हैं। अर्थात् मौजूदा दौर में मीडिया पूँजी का खेल हो गया है। एक समय में पत्रकारिता के व्यवसाय में पैसा 'बाय प्रोडक्ट' था। लेकिन, उदारीकरण के बाद बड़ा बदलाव मीडिया में आया है। 'बाय प्रोडक्ट' को प्रमुख मान कर अधिक से अधिक धन उत्पन्न करने के लिए धन्नासेठों ने समाचारों का ही व्यवसायीकरण कर दिया है। यही कारण है कि मीडिया में कभी जो छुट-पुट भ्रष्टाचार था, अब उसने संस्थागत रूप ले लिया है। वर्ष 2009 में सामने आया कि समाचार के बदले अब मीडिया संस्थान ही पैसा लेने लगे हैं। स्थिति यह बनी की देश के नामी-गिरामी समाचार-पत्रों को 'नो पेड न्यूज' का ठप्पा लगाकर समाचार-पत्र प्रकाशित करने पड़े। संपादक गर्वित होकर बताते हैं कि पूरे चुनाव अभियान के दौरान उनके समाचार-पत्र के विरुद्ध पेड न्यूज की एक भी शिकायत नहीं आई। मालिकों के आर्थिक स्वार्थ समाज हितैषी पत्रकारिता पर हावी नहीं होते, तब यह स्थिति ही नहीं बनती।  
          केवल मालिकों की धन लालसा के कारण ही मीडिया की विश्वसनीयता और प्राथमिकता पर प्रश्न नहीं उठ रहे हैं, बल्कि पत्रकारों की भी भूमिका इसमें है। देखने में आ रहा है कि कुछ पत्रकार राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ता की तरह व्यवहार कर रहे हैं। ऑन स्क्रीन ही नहीं, बल्कि ऑफ स्क्रीन भी न्यूज रूम में वह आपस में राजनीतिक प्रवक्ताओं की भांति संबंधित पार्टी का पक्ष लेते हैं। कांग्रेस बीट कवर करने वाला पत्रकार कांग्रेस को और भाजपा बीट देखने वाला पत्रकार भाजपा को सही ठहराने के लिए भिड़ जाता है। वामपंथी पार्टियों के प्रवक्ता तो और भी अधिक हैं। भले ही देश के प्रत्येक कोने से कम्युनिस्ट पार्टियां खत्म हो रही हैं, लेकिन मीडिया में अभी भी कम्युनिस्ट विचारधारा के समर्थक पत्रकारों की संख्या जरा ज्यादा है। हालात यह हैं कि मौजूदा दौर में समाचार माध्यमों की वैचारिक धाराएं स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। देश के इतिहास में यह पहली बार है, जब आम समाज यह बात कर रहा है कि फलां चैनल/अखबार कांग्रेस का है, वामपंथियों का है और फलां चैनल/अखबार भाजपा-आरएसएस की विचारधारा का है। समाचार माध्यमों को लेकर आम समाज का इस प्रकार चर्चा करना पत्रकारिता की विश्वसनीयता के लिए ठीक नहीं है। कोई समाचार माध्यम जब किसी विचारधारा के साथ नत्थी कर दिया जाता है, तब उसके समाचारों के प्रति दर्शकों/पाठकों में एक पूर्वाग्रह रहता है। वह समाचार माध्यम कितना ही सत्य समाचार प्रकाशित/प्रसारित करे, समाज उसे संदेह की दृष्टि से देखेगा। समाचार माध्यमों को न तो किसी विचारधारा के प्रति अंधभक्त होना चाहिए और न ही अंध विरोधी। 
          हालांकि यह भी सर्वमान्य तर्क है कि तटस्थता सिर्फ सिद्धांत ही है। निष्पक्ष रहना संभव नहीं है। हालांकि भारत में पत्रकारिता का एक सुदीर्घ सुनहरा इतिहास रहा है, जिसके अनेक पन्नों पर दर्ज है कि पत्रकारिता पक्षधरिता नहीं है। निष्पक्ष पत्रकारिता संभव है। कलम का जनता के पक्ष में चलना ही उसकी सार्थकता है। यदि किसी के लिए निष्पक्षता संभव नहीं भी हो तो न सही। भारत में पत्रकारिता का एक इतिहास पक्षधरता का भी है। इसलिए भारतीय समाज को यह पक्षधरता भी स्वीकार्य है लेकिन, उसमें राष्ट्रीय अस्मिता को चुनौती नहीं होनी चाहिए। किसी का पक्ष लेते समय और विपरीत विचार पर कलम तानते समय इतना जरूर ध्यान रखें कि राष्ट्र की प्रतिष्ठा पर आँच न आए। हमारी कलम से निकल बहने वाली पत्रकारिता की धारा भारतीय स्वाभिमान, सम्मान और सुरक्षा के विरुद्ध न हो। कहने का अभिप्राय इतना-सा है कि हमारी पत्रकारिता में भी 'राष्ट्र सबसे पहले' का भाव जागृत होना चाहिए। वर्तमान पत्रकारिता में इस भाव की अनुपस्थिति दिखाई दे रही है। यदि पत्रकारिता में 'राष्ट्र सबसे पहले' का भाव जाग गया तब पत्रकारिता के समक्ष आकर खड़ी हो गईं ज्यादातर चुनौतियां स्वत: ही समाप्त हो जाएंगी। हिंदी के पहले समाचार पत्र उदंत मार्तंड का जो ध्येय वाक्य था- 'हिंदुस्थानियों के हित के हेत'। अर्थात् देशवासियों का हित-साधन। यही तो 'राष्ट्र सबसे पहले' का भाव है। समाज के सामान्य व्यक्ति के हित की चिंता करना। उसको न्याय दिलाना। उसकी बुनियादी समस्याओं को हल करने में सहयोगी होना। न्यायपूर्ण बात कहना।  

शनिवार, 25 मई 2019

केंद्र सरकार की योजनाओं का दस्तावेज 'विकास के पथ पर भारत'

लेखक और मीडिया शिक्षक डॉ. सौरभ मालवीय की पुस्तक 'विकास के पथ पर भारत' केंद्र सरकार की महत्वपूर्ण योजनाओं का दस्तावेज है। यह पुस्तक सामान्य जन से लेकर उन सबके लिए महत्वपूर्ण साबित होगी जो देश में चल रहीं लोक कल्याणकारी योजनाओं को समझना चाहते हैं। यह उन अध्येताओं, सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए भी उपयोगी है, जो देश की जनता तक सरकारी योजनाओं को पहुँचाने का माध्यम बनते हैं। सरल और सहज भाषा में लिखी गई इस पुस्तक में युवा, महिला, किसान, गरीब, गाँव, शहर इत्यादि के विकास और सशक्तिकरण पर केंद्रित केंद्र सरकार की प्रमुख 34 योजनाओं को शामिल किया गया है। यह पूर्वाग्रह रखना अनुचित होगा कि मोदी सरकार की उपलब्धियों को रेखांकित करने के उद्देश्य से यह पुस्तक लिखी गई है। लेखक ने मनोगत में पुस्तक की संकल्पना को स्पष्ट किया है- “अकसर ऐसा होता है कि अज्ञानता और अशिक्षा के कारण लोगों तक सरकार की जन हितैषी योजनाओं की जानकारी नहीं होती है, जिसके कारण वे इन योजनाओं का लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं। इस पुस्तक का उद्देश्य यही है कि लोग उन सभी योजनाओं का लाभ उठाएं, जो सरकार उनके कल्याण के लिए चला रही है।”

          पुस्तक में लेखक ने योजनाओं का संकलन मात्र नहीं किया है, अपितु उन योजनाओं की आवश्यकता को सरलता के साथ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है। योजना कब शुरू हुई, उसका उद्देश्य क्या है, बजट कितना है और परिणाम क्या प्राप्त हो रहे हैं, यह सब उन्होंने अपने प्रत्येक आलेख में समेटने का प्रयास किया है। महात्मा गाँधी अकसर कहते थे कि गाँव के बिना भारत का विकास नहीं हो सकता। यकीनन भारत को विकास के पथ पर तेज गति से आगे बढ़ना है तो गाँव और किसान की चिंता करनी ही पड़ेगी। हम सिर्फ शहरों को 'स्मार्ट' बना कर देश नहीं बना सकते। भारत के निर्माण के लिए आवश्यक है कि 'स्मार्ट सिटी' के साथ-साथ 'स्मार्ट विलेज' के प्रयास भी करने होंगे। यह बात वर्तमान केंद्र सरकार ने समझी है। किसानों की आय बढ़ाने का मसला हो या फिर गाँवों तक आधुनिक सुविधाएं पहुँचाने का मुद्दा, सरकार की प्राथमिकता में शामिल हैं। गाँव और किसान के विकास के लिए मोदी सरकार ने कई योजनाएं प्रारंभ की हैं। अपनी पुस्तक का नामकरण करते समय लेखक ने भी अनुभव किया होगा कि गाँव को प्राथमिकता में रखे बिना 'विकास के पथ पर भारत' नहीं बढ़ सकता। संभवत: इसलिए ही पुस्तक के पहले हिस्से में लेखक ने गाँव, किसान और कृषि को समर्पित नौ योजनाओं का विवरण दिया है। पुस्तक का आवरण पृष्ठ भी यही कहता है। राष्ट्रीय मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, परंपरागत खेती विकास योजना, दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, राष्ट्रीय कृषि बाजार यानी ई-नाम जैसी योजनाएं गाँव और किसान के जीवन को बेहतर बना रही हैं। प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना ने अनेक बेघरों को घर दिए हैं तो अनेक लोगों के कच्चे मकान अब पक्के हो गए हैं। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ने किसानों को एक भरोसा दिया है। गरीबी उन्मूलन और रोजगार सृजन की दो महत्वपूर्ण योजनाओं का विवरण भी पुस्तक में शामिल है। ग्रामीण क्षेत्र में दीनदयाल अंत्योदय योजना और दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना के महत्व को लेखक ने रेखांकित किया है।
           महिला सशक्तिकरण का ध्यान रखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार की योजना 'बेटी बचाओ' को एक कदम आगे लेकर गए- 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ।' इसके अलावा मातृत्व वंदना योजना और महिला शक्ति केंद्र योजना की जानकारी भी शामिल की गई है। मोदी सरकार ने मुस्लिम महिलाओं को जागरूक और सशक्त करने के पर्याप्त प्रयास किए हैं। तीन तलाक जैसी अमानवीय व्यवस्था को बंद करने के लिए सरकार ने कानून तक लागू कर दिया है। हालाँकि पुस्तक में तीन तलाक पर विस्तार से कोई जानकारी नहीं है क्योंकि यह कानून है, योजना नहीं। किंतु, मुस्लिम समुदाय की महिलाओं को सशक्त करने की योजना 'हज नीति' का विवरण मिलता है। सरकार की नयी हज नीति के कारण अब महिलाएं अकेले भी हज के लिए जा सकती हैं। बहरहाल, लेखक ने 'आयुष्मान भारत' और 'उज्ज्वला योजना' जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं पर भी महत्वपूर्ण आलेख तैयार किए हैं। इन दोनों योजनाओं के अब तक के परिणाम भी सराहनीय है। प्रमुख 34 योजनाओं के अतिरिक्त लेखक डॉ. सौरभ मालवीय ने पुस्तक प्रकाशित होते-होते कई और महत्वपूर्ण योजनाओं की अद्यतन जानकारी बुलेट प्वाइंट के रूप में दी है। निश्चित तौर उनके द्वारा किया गया यह प्रयास सामान्य लोगों को लाभ पहुँचाएगा। लेखक ने सरकार और जनता के बीच एक सेतु का निर्माण किया है। 
          पुस्तक जिस समय आई है, वह भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। संभवत: समय का चयन प्रकाशक की योजना में रहा हो। यह पुस्तक ऐसे समय में आई है, जब बार-बार यह प्रश्न उठाया जाता है कि मोदी सरकार ने पाँच साल में क्या किया? आपके सामने यदि कोई यह सवाल उठाए तो उसे डॉ. मालवीय की पुस्तक 'विकास के पथ पर भारत' पढऩे की सलाह दीजिएगा। पुस्तक नये भारत की उस तस्वीर को रखने में यथासंभव सफल होती है, जहाँ बेहतरी के लिए बुनियादी कदम उठाए जा रहे हैं। सकारात्मक ढंग से योजनाओं का प्रस्तुत किया गया है। योजनाओं में नुक्ता-चीनी करने के लिए वैसे भी अनेक लोग लगे हुए हैं। इस बीच, जनता को उन योजनाओं की जानकारी देने के प्रयासों का भी स्वागत होना चाहिए, जो योजनाएं जनता के लिए ही हैं। यह पुस्तक यश पब्लिकेशंस, दिल्ली से प्रकाशित है। 160 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 395 रुपये (साजिल्द) है। 
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पुस्तक - विकास के पथ पर भारत
लेखक -  डॉ. सौरभ मालवीय
प्रकाशक - यश पब्लिकेशंस, दिल्ली
मूल्य - 395 रुपये (साजिल्द)

शनिवार, 18 मई 2019

कालिदास के मेघदूत भी यहाँ आकर ठहरे

अमरकंटक को मध्यप्रदेश के वनप्रदेश की उपमा प्राप्त है। आम, महुआ और साल सहित नाना प्रकार के वृक्ष मैकाल पर्वत का श्रृंगार करते हैं। अमरकंटक के जंगलों में आम के वृक्ष अधिक होने के कारण प्राचीन ग्रंथों में आम्रकूट के नाम से भी इस स्थान का वर्णन आता है। वृक्षों से आच्छादित यह वनभूमि प्रकृति प्रेमियों को सदैव ही आकर्षित करती है। यहाँ आकर मन, मस्तिष्क और शरीर प्रफुल्लित हो जाते हैं। प्रकृति के सान्निध्य से मानसिक तनाव और शारीरिक थकान दूर हो जाती है। अमरकंटक आकर अंतरमन आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है। कालिदास के मेघदूत जब लंबी यात्रा पर निकले थे, तब उन्होंने अपनी थकान मिटाने के लिए अमरकंटक को ही अपना पड़ाव बनाया था। कवि कालिदास ने 'मेघदूत' में लिखा है कि रामगिरि पर कुछ देर रुकने के बाद तुम (मेघदूत) आम्रकूट (अमरकंटक) पर्वत जाकर रुकना। अमरकंटक ऊंचे शिखरों वाला पर्वत है। वह अपने ऊंचे शिखर पर ही तुम्हारा स्वागत करेगा। मार्ग में जंगलों में लगी आग को तुमने बुझाया होगा, इसलिए तुम थक गए होगे। एक छोटे से छोटा व्यक्ति भी उसका स्वागत करता है, जिसने कभी उसके साथ उपकार किया था। फिर अमरकंटक जैसों की क्या बात कहना, जो स्वयं इतना महान है। जब महान कवि कालिदास अपने मेघदूत को अमरकंटक में ठहरने के लिए कह रहे हैं, तब मेरा यही सुझाव है कि हमें भी कुछ दिन अमरकंटक में गुजारने चाहिए। यह स्थान प्रकृति प्रेमियों, पर्वतरोहियों, रोमांचक यात्रा पर जाने वाले युवाओं के साथ-साथ धार्मिक मन के व्यक्तियों के लिए भी सर्वोत्तम स्थान है।
          प्राकृतिक रूप से समृद्ध होने के साथ-साथ अमरकंटक का धार्मिक महत्त्व भी बहुत अधिक है। पुराणों में अमरकंटक का महात्म वर्णित है। अमरकंटक के आध्यात्मिक और धार्मिक महत्त्व को इस बात से समझा जा सकता है कि भगवान शिव ने धरती पर परिवार सहित रहने के लिए कैलाश और काशी के बाद अमरकंटक को चुना है। महादेव शिव की बेटी नर्मदा का उद्गम स्थल भी यही है। नर्मदा के साथ ही अमरकंटक शोणभद्र और जोहिला नदी का उद्गम स्थल भी है। नर्मदा और शोणभद्र के विवाह की कथाएं भी यहाँ के जनमानस में प्रचलित हैं। हालाँकि यह विवाह सम्पन्न नहीं हो सका था। इसकी अपनी रोचक कहानी है। स्कंदपुराण में भी अमरकंटक का वर्णन आता है। स्कंदपुराण में कहा गया है कि 'अमर' यानी देवता और 'कट' यानी शरीर। यह पर्वत देवताओं के शरीर से आच्छादित है, इसलिए अमरकंटक कहलाता है। मत्स्यपुराण में अमरकंटक को कुरुक्षेत्र से भी अधिक महत्त्वपूर्ण और पवित्र माना गया है। पद्मपुराण में अमरकंटक की महिमा का वर्णन करते हुए देवर्षि नारद महाराज युधिष्ठर से कहते हैं कि अमरकंटक पर्वत के चारों ओर कोटि रुद्रों की प्रतिष्ठा हुई है। यहाँ स्नान करके पूजा करने से महादेव रुद्र प्रसन्न होते हैं। नर्मदा को शिव का इतना आशीर्वाद प्राप्त है कि उसकी धारा में पाए जाने वाले शिवलिंग की स्थापना के लिए प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं पड़ती। नर्मदा में पाए जाने वाले शिवलिंग बाण शिवलिंग कहलाते हैं। अमरकंटक के संबंध में यह भी मान्यता है कि जो साधु-संन्यासी यहाँ देह त्यागता है, वह सीधे स्वर्ग को प्राप्त होता है। 
          अमरकंटक का महत्त्व जीवनदायिनी नर्मदा के बिना अधूरा है। दोनों एक-दूसरे के पर्याय हैं। समुद्र तल से लगभग 3500 फुट की ऊंचाई पर स्थित अमरकंटक के पहाड़ों से निकल बहने वाली नर्मदा भारत की सबसे प्राचीन नदियों में से एक है। पुण्यदायिनी मां नर्मदा की जयंती प्रतिवर्ष माघ शुक्ल सप्तमी को 'नर्मदा जयंती महोत्सव' के रूप में मनाई जाती है। नर्मदा की महत्ता को इस प्रकार बताया गया है कि जो पुण्य गंगा में स्नान करने से या यमुना का आचमन करने से मिलते हैं, वह नर्मदा का नाम स्मरण करने मात्र से मिल जाता है। नर्मदा नदी का उल्लेख अनेक धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। स्कंद पुराण में नर्मदा का वर्णन रेवा खंड के अंतर्गत किया गया है। कालिदास के 'मेघदूतम्' में नर्मदा को रेवा का संबोधन मिला है। रामायण तथा महाभारत में भी अनेक स्थान पर नर्मदा के महात्म को बताया गया है। शतपथ ब्राह्मण, मत्स्य पुराण, पद्म पुराण, कूर्म पुराण, नारदीय पुराण और अग्नि पुराण में भी नर्मदा का जिक्र आया है। नर्मदा की धार्मिक महत्ता के कारण प्रदेश का बहुत बड़ा वर्ग नर्मदा के प्रति अगाध श्रद्धा रखता है। नर्मदा के प्रति मध्यप्रदेश के लोगों की गहरी आस्था है। दरअसल, नर्मदा मध्यप्रदेश का पोषण करती है। मध्यप्रदेश की जीवनरेखा है। असल मायनों में नर्मदा मध्यप्रदेश के नागरिकों की माँ है।
         अमरकंटक में प्राकृतिक और धार्मिक महत्त्व के दर्शनीय स्थल हैं। विशेषकर, नर्मदा, शोण (सोन) और जोहिला नदियों के उद्गम अमरकंटक के प्रमुख पर्यटन स्थल हैं। जब नर्मदा पहाड़ों से उछलते-कूदते मैदान की तरफ प्रवाहित होती हैं, तब अनेक स्थानों पर छोटे-बड़े जलप्रपात बनते हैं। अमरकंटक में ही कपिलधारा और दूधधारा दो प्रमुख जलप्रपात हैं। वर्षभर यहाँ पर्यटक आते हैं। लेकिन, अमरकंटक में जलप्रपात और प्रकृति सौंदर्य का भरपूर आनंद लेना है, तब यहाँ अगस्त के बाद आना अधिक उचित होगा। बारिश के बाद जल प्रपातों में जलराशि बढ़ जाती है। नर्मदा के प्रवाह के संबंध में अनूठी बात यह है कि यह भारत की इकलौती नदी है, जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है। नर्मदा किसी ग्लैशियर से नहीं निकली है। बल्कि पेड़ों की जड़ से निकला बूंद-बूंद पानी ही नर्मदा की अथाह जलराशि है। 
         
            भारत की सबसे बड़ी पाँच नदियों में शामिल नर्मदा अपने उद्गम स्थल पानी की एक पतली-सी लकीर की तरह हैं। मानो अपने उद्गम स्थल पर नर्मदा नन्हीं बालिका के रूप में हो। बहरहाल, माँ नर्मदा के किनारे आकर मन प्रसन्न हो जाता है। नर्मदा के जल को छूकर आने वाले ठण्डी हवा के झौंके अपने साथ मन-मस्तिष्क से विकारों को उड़ाकर ले जाते हैं। रामघाट पर बैठना, टहलना और एकटक माँ नर्मदा को निहारना अद्भुत सुख की अनुभूति है। कंठीमाला फेरे बिना, घंटी टनटनाए बिना, देवता को धूप-दीप दिखाए बिना ही मन आध्यात्मिक आनंद प्राप्त करता है। अमरकंटक पहुँचने के लिए पेंड्रा रोड या अनूपपुर रेलवे स्टेशन पर उतर सकते हैं। यहाँ से अमरकंटक तक जाने के लिए बस और जीप/कार उपलब्ध रहते हैं। अमरकंटक तक पहुंचने के लिए घने और हरे-भरे जंगल से होकर सफर पूरा करना होता है। यह मार्ग बहुत खूबसूरत और रोमांचक है। ऊँचे-नीचे पहाड़। सरसराती ठंडी हवाएं। गहरी खाईयां। अंधे मोड़। 
           वनप्रदेश अमरकंटक में प्रकृति मनमोहनी की तरह हमारे सामने उपस्थित होती है। वह अपने रूप और रंग से हमारे मन के मरुस्थल को प्रेम से सिंचित कर हरितप्रदेश में बदल देती है। अमरकंटक की साँझ अनूठी है। अध्यात्म और त्याग के पवित्र रंग भगवा में डूबी सात्विक संध्या दुनिया के कंटकों से मन का पिंड छुड़ाकर असीम शांति प्रदान करती है। कोटी तीर्थ की धरती पर भगवा और धवल वस्त्रों में लिपटे साधु-संन्यासी यहाँ अपनी धुन में रमे आपको दिखेंगे, तब उसी वक्त सूर्य देवता भी भगवामय हो उठते हैं। देवी नर्मदा के दर्शन के लिए वह भी भगवा वस्त्र ओढ़कर आते हैं। मानो वह भी हमारी-तुम्हारी तरह नर्मदा की आरती में उपस्थित होने के लिए आए हों। अमरकंटक की मनोहारी संध्या को जब हम निहारते हैं, उसको अनुभूत करते हैं, उसकी सुगंध को अपनी साँसों में उतारते हैं, तब धीरे-धीरे हमें अहसास होता है कि हमसे क्या छूट रहा है? अमरकंटक की यह तस्वीरें हम सबके लिए हैं। यह तस्वीरें हमारे अशांत चित्त को शांत करेंगी, जीवन की आपा-धापी के बीच थोड़ा सुकून देंगी और हमारे व्यथित मन को आराम पहुँचाएंगी। 
           अमरकंटक के प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं- नर्मदा उद्गम मंदिर, प्राचीन मंदिर समूह, कपिल धारा, दूध धारा, पंच धारा, शम्भू धारा, दुर्गा धारा, चक्रतीर्थ, अरण्यक आश्रम मंदिर, कबीर चबूतरा, भृगु कमण्डल, धूनी-पानी, श्रीयंत्र मंदिर, फरस विनायक, सोनमूड़ा, माई की बगिया, श्री दिगम्बर जैन सर्वोदय तीर्थ क्षेत्र, प्राचीन जलेश्वर मंदिर, अमरेश्वर मंदिर, और माई का मंडप।
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बुधवार, 1 मई 2019

बूढ़ा दरख्त


फोटो विश्व प्रसिद्द बौद्ध स्थल 'साँची' परिसर का है

बारिश की बेरुखी
और चिलचिलाती धूप में
वो बूढ़ा दरख्त सूख गया है
साखों पर बने घोंसले उजड़ गए
उजड़े घोंसलों के बाशिन्दे/ परिन्दे
नए ठिकाने/ आबाद दरख्त
की तलाश में उड़ चले
बूढ़ा दरख्त तन्हा रह गया
आंसू बहाता, चिलचिलाती धूप में।
सोच ही रहा था, इस ओर
शायद ही अब कोई लौटकर आए
तभी उसे दूर दो अक्स दिखे
कुल्हाड़ी और आरी लिए
ये वही हैं, जिन्हें कभी उसने
आशियाना बनाने के लिए लकड़ी
जीने के लिए हवा-पानी-खाना दिया
वो बूढ़ा दरख्त इसी सोच में
और सूख गया
दुनिया से अभी भी काम का हूंकहकर
अलविदा कह गया, चिलचिलाती धूप में। 

- लोकेन्द्र सिंह 
(काव्य संग्रह 'मैं भारत हूँ' से) 

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