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शुक्रवार, 26 जून 2026

ऑस्ट्रेलिया के बाद ब्रिटेन में भी लगाई गई ‘फादर ऑफ सर्जरी’ महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा

भारत की ज्ञान-परंपरा की प्रतिष्ठा : भारत के ज्ञान-विज्ञान की वैश्विक स्वीकृति, प्रत्येक भारतीय के लिए है गर्व की बात

स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग स्थित दुनिया के सबसे पुराने ‘रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स’ में महर्षि सुश्रुत की भव्य प्रतिमा का स्थापित होना हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। अब जरा कल्पना कीजिए कि यदि महर्षि सुश्रुत की यह प्रतिमा स्कॉटलैंड या मेलबर्न के बजाय भारत के एम्स या किसी अन्य प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में स्थापित की जाती, तो क्या होता? यह तय है कि देश के स्वघोषित प्रगतिशील बुद्धिजीवियों, वामपंथी विचारकों और लिबरल जमात के बीच एक भारी ‘हाय-तौबा’ मच जाती। इसे ‘शिक्षा के भगवाकरण’, ‘विज्ञान में धर्म के हस्तक्षेप’ और ‘अंधविश्वास को बढ़ावा देने’ का नाम दे दिया जाता। यह मानसिकता भारत के उस बौद्धिक वर्ग की सबसे बड़ी त्रासदी है, जो अभी तक ‘औपनिवेशिक हैंगओवर’ से बाहर नहीं आ पाया है। इस वर्ग की समस्या यह है कि वे ‘भारतीय ज्ञान-परंपरा’ को केवल कर्मकांडों और मिथकों के चश्मे से देखते हैं। उनका पैमाना यह बन गया है कि जो कुछ भी प्राचीन भारत का है, वह अवैज्ञानिक है; और जो कुछ भी पश्चिम से आता है, वही परम सत्य है। जब तक कोई विदेशी संस्थान या विदेशी वैज्ञानिक हमारे प्राचीन ज्ञान पर अपनी मुहर नहीं लगाता, तब तक हमारे अपने बुद्धिजीवी उसे सिरे से खारिज करते रहते हैं।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

छत्रपति शिवाजी महाराज से सीखें जल प्रबंधन

सह्याद्रि के उत्तुंग शिखरों पर आसमान से बातें करनेवाले गिरिदुर्ग हों या फिर समुद्री लहरों के बीच मुस्कुराते जलदुर्ग, उनकी व्यवस्थाएं देखकर ध्यान आता है कि हिन्दवी स्वराज्य के योजनाकार, वास्तुकार, अभियंता और निर्माण में योगदान करनेवाले सभी शिल्पकार एवं श्रमिक अपने कार्य-कौशल में सिद्धस्थ थे। सुरक्षा पक्ष हो या फिर कला पक्ष, सबका बारीकी से विचार किया गया। इसके साथ ही बुनियादी आवश्यकताओं की चिंता भी की गई। भारत में जहाँ भी आपने दुर्ग देखे होंगे, उनमें जलस्रोत की व्यवस्था देखी ही होगी। परंतु हिन्दवी स्वराज्य के किलों में जलस्रोतों का प्रबंधन रचनात्मक ढंग से किया गया है। हजारों फीट की ऊंचाई पर बारह महीने पानी की व्यवस्था बनाए रखना चुनौतीपूर्ण था। कुशल योजनाकारों ने बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से दुर्गों पर जलाशयों का निर्माण किया है। किसी भी दुर्ग पर एक-दो नहीं अपितु अलग-अलग हिस्सों में कई जलाशयों का निर्माण किया जाता था। हम हिन्दवी स्वराज्य की राजधानी दुर्गदुर्गेश्वर श्रीरायगढ़ की ही बात करें, तो वहाँ छोटे-बड़े 84 जलाशयों का निर्माण किया गया है। चूँकि रायगढ़ पर अधिक संख्या में लोग रहते थे इसलिए यहाँ बड़ी संख्या में जल निकायों का निर्माण किया गया। श्रीरायगढ़ के प्रसिद्ध जल निकाय हैं- गंगा सागर तालाब, हत्ती तालाब, कुशावर्त तालाब, हनुमान टांकी, बारह टांकी इत्यादि।

गुरुवार, 25 जनवरी 2024

धार्मिक पर्यटन का केंद्र है भारत

अयोध्या धाम में श्रीरामलला के दर्शन

धर्म और अध्यात्म भारत की आत्मा है। यह धर्म ही है, जो भारत को उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक एकात्मता के सूत्र में बांधता है। भारत की सभ्यता और संस्कृति का अध्ययन करते हैं तो हमें साफ दिखायी देता है कि धार्मिक पर्यटन हमारी परंपरा में रचा-बसा है। तीर्थाटन के लिए हमारे पुरखों ने पैदल-पैदल ही इस देश को नापा है। भारत की सभ्यता एवं संस्कृति विश्व समुदाय को भी आकर्षित करती है। हम अनेक धार्मिक स्थलों पर भारतीयता के रंग में रंगे विदेशी सैलानियों को देखते ही हैं। दरअसल, भारत को दुनिया में सबसे ज्यादा धार्मिक स्थलों का देश कहा जाता है। एक अनुमान के अनुसार, देशभर में पाँच हजार से अधिक सुप्रसिद्ध धार्मिक स्थल हैं। हालांकि, हमारे लिए तो प्रत्येक धार्मिक स्थल श्रद्धा का केंद्र है। भारत के शहर-शहर में कई ऐसे स्थान हैं, जहाँ देशभर से लोग पहुँचते हैं। मथुरा, वृंदावन, अयोध्या, काशी, उज्जैन, द्वारिका, त्रिवेंद्रम, कन्याकुमारी, अमृतसर, जम्मू-कश्मीर, पुरी, केदारनाथ, बद्रीनाथ इत्यादि ऐसे स्थान हैं, जहाँ न केवल भारतीय नागरिक बड़ी संख्या में पहुँचते हैं अपितु विदेशी और भारतीय मूल के नागरिक श्रद्धा के साथ आते हैं। पिछले आठ-दस वर्षों में भारत के धार्मिक पर्यटन में उत्साहजनक वृद्धि हुई है। विश्व के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने न केवल धार्मिक स्थलों को पुनर्विकसित कराया है, अपितु आगे बढ़कर धार्मिक पर्यटन का प्रचार-प्रसार भी किया है। जिसके परिणाम हमें धार्मिक पर्यटन में हो रही वृद्धि के रूप में दिखायी देते हैं। विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, देश के कुल पर्यटन में 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी धार्मिक पर्यटन की है। आज देश के पर्यटन उद्योग में 19 प्रतिशत की वृद्धि दर अर्जित की जा रही है जबकि वैश्विक स्तर पर पर्यटन उद्योग केवल 5 प्रतिशत की वृद्धि दर दर्ज कर रहा है।

शुक्रवार, 25 अगस्त 2023

अब सूरज की ओर... अंतरिक्ष में भारत के बढ़ते कदम

पिछले कुछ वर्षों में अंतरिक्ष विज्ञान में मिली बड़ी सफलताओं ने भारत के वैज्ञानिकों को नया हौसला दिया है। चंद्रयान–3 की सफलता के बाद से तो अब विश्व भी भारत की ओर आशा से देखने लगा है। भारत की जिस प्रकार की तैयारी है, उसे देखकर कहा जा सकता है कि नया भारत दुनिया को निराश नहीं करेगा। चंद्रमा पर अपना झंडा गाड़ने के बाद अब भारत सूरज की ओर अपने कदम बढ़ाने को तैयार है। भारतीय अंतरिक्ष शोध संस्थान (इसरो) के वैज्ञानिकों ने इसकी पूरी तैयारी कर ली है। इसी सितंबर में सूर्य तक पहुंचने के लिए आदित्य एल-1 की लॉन्चिंग हो सकती है।

शुक्रवार, 2 जून 2023

‘भारत के स्वराज्य’ का उद्घोष था श्रीशिवराज्याभिषेक

स्वराज्य 350 : आज से प्रारंभ हो रहा है छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक एवं हिन्दू साम्राज्य की स्थापना का 350वाँ वर्ष



आज का दिन बहुत पावन है। आज से ‘हिन्दवी स्वराज्य’ की स्थापना का 350वां वर्ष प्रारंभ हो रहा है। विक्रम संवत 1731, ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी (6 जून, 1674) को स्वराज्य के प्रणेता एवं महान हिन्दू राजा श्रीशिव छत्रपति के राज्याभिषेक और हिन्दू पद पादशाही की स्थापना से भारतीय इतिहास को नयी दिशा मिली। कहते हैं कि यदि छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म न होता और उन्होंने हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना न की होती, तब भारत अंधकार की दिशा में बहुत आगे चला जाता। महान विजयनगर साम्राज्य के पतन के बाद भारतीय समाज का आत्मविश्वास निचले तल पर चला गया। अपने ही देश में फिर कभी हमारा अपना शासन होगा, जो भारतीय मूल्यों से संचालित हो, लोगों ने यह कल्पना करना ही छोड़ दिया। तब शिवाजी महाराज ने कुछ वीर पराक्रमी मित्रों के साथ ‘स्वराज्य’ की स्थापना का संकल्प लिया और अपने कृतित्व एवं विचारों से जनमानस के भीतर भी आत्मविश्वास जगाया। विषबेल की तरह फैलते मुगल शासन को रोकने और उखाड़ फेंकने का साहस शिवाजी महाराज ने दिखाया। गोविन्द सखाराम सरदेसाई अपनी पुस्तक ‘द हिस्ट्री ऑफ द मराठाज-शिवाजी एंड हिज टाइम’ के वॉल्यूम-1 के पृष्ठ 97-98 पर लिखते हैं कि ‘मुस्लिम शासन में घोर अन्धकार व्याप्त था। कोई पूछताछ नहीं, कोई न्याय नहीं। अधिकारी जो मर्जी करते थे। महिलाओं के सम्मान का उल्लंघन, हिंदुओं की हत्याएं और धर्मांतरण, उनके मंदिरों को तोड़ना, गोहत्या और इसी तरह के घृणित अत्याचार उस सरकार के अधीन हो रहे थे।। निज़ाम शाह ने जिजाऊ माँ साहेब के पिता, उनके भाइयों और पुत्रों की खुलेआम हत्या कर दी। बजाजी निंबालकर को जबरन इस्लाम कबूल कराया गया। अनगिनत उदाहरण उद्धृत किए जा सकते हैं। हिन्दू सम्मानित जीवन नहीं जी सकते थे’। ऐसे दौर में मुगलों के अत्याचारी शासन के विरुद्ध शिवाजी महाराज ने ऐसे साम्राज्य की स्थापना की जो भारत के ‘स्व’ पर आधारित था। उनके शासन में प्रजा सुखी और समृद्ध हुई। धर्म-संस्कृति फिर से पुलकित हो उठी।

बुधवार, 21 जुलाई 2021

भारत की संस्कृति के साक्षी

भारत की मूल संस्कृति क्या है? इसको लेकर दिग्भ्रिमित करने वाले अनेक विमर्श चलते रहते हैं। एक शायर ने तो यहाँ तक कह दिया कि यहाँ सब किराएदार हैं, कोई मकान मालिक नहीं। उनके कहने का आशय यही था कि भारत में अलग-अलग समय में लोग आते गए और बस गए। भारतीय मूल का कोई नहीं है। दरअसल, वे आर्य-द्रविणवाली कपोल कल्पना के लिए गढ़े गए झूठ के या तो वाहक थे या फिर उसके फेर में फंस गए होंगे। भारत के मूल लोग कौन थे, उनकी संस्कृति क्या थी, जीवन पद्धति क्या थी, धर्म क्या था, यह सब कोई शायर नहीं बता सकता, बल्कि भारत की मिट्टी इसका स्वयं जवाब देती है कि उसमें किसका रक्त शामिल है। अयोध्या से लेकर मथुरा, राखीगढ़ी से लेकर उज्जैन तक खुदाई में भारतीय संस्कृति के प्रमाण मिलते हैं।

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016

राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस का सराहनीय निर्णय

 हमें  स्वाधीनता जरूर 15 अगस्त, 1947 को मिल गई थी, लेकिन हम औपनिवेशिक गुलामी की बेडिय़ाँ नहीं तोड़ पाए थे। अब तक हमें औपनिवेशिकता जकड़े हुए थी। पहली बार हम औपनिवेशिकता से मुक्ति की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। हम कह सकते हैं कि भारत नये सिरे से अपनी 'डेस्टिनी' (नियति) लिख रहा है। यह बात ब्रिटेन के ही सबसे प्रभावशाली समाचार पत्र 'द गार्जियन' ने 18 मई, 2014 को अपनी संपादकीय में तब लिखा था, जब राष्ट्रीय विचार को भारत की जनता ने प्रचंड बहुमत के साथ विजयश्री सौंपी थी। गार्जियन ने लिखा था कि अब सही मायने में अंग्रेजों ने भारत छोड़ा है (ब्रिटेन फाइनली लेफ्ट इंडिया)। आम चुनाव के नतीजे आने से पूर्व नरेन्द्र मोदी का विरोध करने वाला ब्रिटिश समाचार पत्र चुनाव परिणाम के बाद लिखता है कि भारत अंग्रेजियत से मुक्त हो गया है। अर्थात् एक युग के बाद भारत में सुराज आया है। भारत अब भारतीय विचार से शासित होगा।

मंगलवार, 13 सितंबर 2016

सोमनाथ मंदिर को सोने से सजाकर अपनी चमक बढ़ा रहे हैं नरेन्द्र मोदी

 हिंदुओं  की आस्था के प्रमुख मानबिंदु सोमनाथ मंदिर को स्वर्ण से सुसज्जित किया जा रहा है। अब तक 105 किलो सोने से मंदिर के अंदरूनी हिस्से और शिखर को सजाया जा चुका है। यह सोना एक भक्त ने दान में दिया है। सरकार ने इस काम में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं। दरअसल, सरकार इस दीपावली तक सोमनाथ मंदिर को सोने से जगमग कर देना चाहती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि सोमनाथ को स्वर्णमयी करने के इस महत्त्वपूर्ण कार्य पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विशेष नजर है। बीते दिनों दिल्ली में प्रधानमंत्री निवास पर नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट की बैठक हुई है। मंदिर को भव्यता प्रधान करने की इस परियोजना में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दिलचस्पी से महत्त्वपूर्ण संकेत समाज में जा रहे हैं। एक, भव्य मंदिर की सौगात देकर गुजरात के लोगों को भरोसा दिलाना चाहते हैं कि गुजरात अब भी उनकी प्राथमिकताओं में है। दो, उन्हें हिंदू हितों की चिंता है। तीन, हिंदुओं के आस्था स्थलों को प्रतिष्ठा दिलाने के अपने संकल्प पर भारतीय जनता पार्टी कायम है। इसका एक संदेश यह भी हो सकता है कि भविष्य में अवसर आने पर राममंदिर का निर्माण भी इसी भव्यता के साथ किया जाएगा। यह काम कोई और नहीं कर सकता। इसका सबूत यह है कि पिछले वर्षों में सोमनाथ मंदिर को भव्य रूप प्रदान करने की पहल किसी ने नहीं की। यदि लौहपुरुष सरदार पटेल न होते तब यह भी संभव था कि सोमनाथ मंदिर का निर्माण ही नहीं होता, क्योंकि सेकुलरवाद किसी भी सूरत में मंदिर निर्माण की इजाजत देने के लिए तैयार नहीं था।

बुधवार, 22 जून 2016

भारत बन गया विश्व'योग'गुरु

 अतंरराष्ट्रीय  योग दिवस के अवसर पर दुनिया ने बाँहें फैलाकर भारत के ज्ञान का सुख लिया। विश्व के 192 देशों में द्वितीय अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया। 21 जून को दुनियाभर में लोगों ने धरती पर माथा टेकते हुए और सूर्य को नमस्कार करते हुए भारत की तकरीबन पाँच हजार साल पुरानी योग परंपरा को अंगीकर किया। भारत की योग विद्या पहले से ही दुनिया को आकर्षित करती रही है। लेकिन, प्रथम अंतरराष्ट्रीय योग दिवस से द्वितीय अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अंतराल में योग अभूतपूर्व ढंग से लोकप्रिय हुआ है। यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों से बीते दो वर्षों में भारत विश्व के लिए योग गुरु बन गया है। चंडीगढ़ में आयोजित मुख्य कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि योग एक बहुत बड़े कारोबार के रूप में भी विकसित हो रहा है। दुनिया के हर देश में योग प्रशिक्षकों की जरूरत है। निश्चित ही विश्व की यह माँग भारत बेहतर तरीके से पूरी कर सकता है। भारतीय युवाओं के लिए योग ने करियर की नई राह खोल दी है। हालाँकि भारतीय दर्शन योग को कारोबार नहीं मानता, बल्कि योग तो जीवनशैली का एक हिस्सा है। लेकिन, वर्तमान समय में यदि योग किसी के रोजगार में सहायक हो सकता है, तब यह आनंद का विषय होना चाहिए।

मंगलवार, 21 जून 2016

योगमय दुनिया

 अंतरराष्ट्रीय  योग दिवस के अवसर पर दुनिया में भारत के ज्ञान-विज्ञान का परचम फहरेगा। एक बार फिर दुनिया भारतीय संस्कृति के रंग में रंगी दिखाई देगी। 21 जून को विश्व योगमय हो जाएगा। आनंद के साथ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने के लिए भारत में ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में तैयारियां चल रही हैं। प्रत्येक भारतीय को गर्व होना चाहिए कि योग और आयुर्वेद भारत की ओर से समूचे मानव समाज के लिए श्रेष्ठ उपहार हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा कि विशेषता है कि चर-अचर के हित के किसी भी प्रकार ज्ञान को हमने रोककर नहीं रखा, उसको बांधकर नहीं रखा, उसे दुनिया से छिपाया नहीं, बल्कि दुनिया उसे दुनिया में फैलाया है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमेरिका यात्रा के दौरान इस बात को कहा भी कि भारत ने कभी योग के पेटेंट के लिए प्रयास नहीं किया है। दरअसल, भारत के मनीषी समूची सृष्टि को ध्यान में रखकर चिंतन और सृजन करते थे। भारतीय चिंतन परंपरा ने सदैव विश्व को एक परिवार की तरह देखा है। अपने इसी व्यापक दृष्टिकोण के कारण हमने कभी मानव कल्याण के ज्ञान-विज्ञान पर अपना एकाधिकार नहीं थोपा।

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

वैचारिक महाकुम्भ साबित होगा सिंहस्थ-2016

महापर्व कुम्भ 'सिंहस्थ' से इस बार 'वैचारिक कुम्भ' की परिपाटी शुरू होगी। प्रदेश सरकार को धन्यवाद दिया जाना चाहिए कि उसने कुम्भ के धार्मिक महात्म्य के साथ सामाजिक स्वरूप को पुनर्जीवित करने का प्रण लिया है। भारत के स्वर्णिम इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि देश और समाज को सन्मार्ग पर लाने के लिए हमारे मनीषी कुम्भ का उपयोग करते थे। समय के अनुसार समाज को किन बातों को अपनाना चाहिए और किन बातों को त्याग देना चाहिए, कुम्भ में इस संबंध में विमर्श किया जाता था। समाज में मूल्य और धर्म (कर्तव्य) की हानि तो नहीं हो रही, इस दिशा में ऋषि, महर्षि, संत-महात्मा गहन मंथन करते थे। इस वैचारिक मंथन से ही अमृत की बूंदें निकलती थीं, जो समाज को पुष्ट करती थीं। देशभर से कुम्भ में आने वाले लोग इन अमृत की बूंदों को लेकर समाज में जाते थे। इस तरह कुम्भ समाज में मूल्य और धर्म की स्थापना के लिए विमर्श केन्द्र थे।

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

आयुर्वेद को प्रोत्साहन

 य ह सुखद बात है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद के प्रति प्रतिबद्धता जताई है। केरल के कोझिकोड में वैश्विक आयुर्वेद महोत्सव को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आयुर्वेद की संभावनाओं का पूरा उपयोग अब तक नहीं हो सका है। जबकि इस भारतीय चिकित्सा पद्धति में अनेक स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान की क्षमता है। उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार आयुर्वेद जैसी पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को प्रोत्साहित करने के लिए प्रतिबद्ध है। भारत इस संबंध में चीन जैसे दूसरे देशों के अनुभवों से सीखने का प्रयास करेगा, जिन्होंने अपनी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को प्रोत्साहित करने के लिए नीतियां बनाईं हैं। हम भली प्रकार जानते हैं कि अब तक भारत में अपनी ही उन्नत चिकित्सा पद्धति की अनदेखी क्यों की गई? अब तक के नीति निर्माताओं को भारतीय ज्ञान-परंपरा पर विश्वास नहीं था। कई अवसर पर आयुर्वेद सहित समस्त भारतीय ज्ञान परंपराओं की जानबूझकर अनदेखी की गई है। पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति के तीव्र विस्तार के कारण भी आयुर्वेद पर ध्यान नहीं दिया गया। परिणाम, आयुर्वेद जैसी अद्भुत चिकित्सा पद्धति का विकास उसके अपने ही देश में अवरुद्ध हो गया।

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

कोहिनूर लौटाएगा न माफी मांगेगा ब्रिटेन

 भा रत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नवंबर में ब्रिटेन जाने वाले हैं। यह दौरा भारत से अधिक ब्रिटेन के लिए महत्वपूर्ण है। एक जमाने में व्यापार के बहाने भारत में घुसने वाला ब्रिटेन फिर भारत के साथ व्यापार बढ़ाने के लिए प्रयासरत है। अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए भारत से गहरी दोस्ती ब्रिटेन की जरूरत भी है। बहरहाल, हाल में बार-बार ब्रिटेन का जिक्र हो रहा है। भारत के सांसद शशि थरूर ने ब्रिटेन को उसके ही घर में उसे असली चेहरा दिखा दिया। ऑक्सफोर्ड यूनियन सोसायटी में 'ब्रिटिश शासन' की धज्जियां उड़ाता हुआ महज 15 मिनट का उनके भाषण का वीडियो वायरल हो गया। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि ब्रिटेन ने 200 साल तक भारत में लूट मचाई। ब्रिटेन को समृद्ध करने के लिए भारत के खजाने लूटे गए थे। इसलिए ब्रिटेन से भारत को मुआवजा मिलना चाहिए। ब्रिटेन पर भारत का नैतिक कर्ज भी है। थरूर ने बताया कि जब अंग्रेज भारत आए तब दुनिया की इकोनॉमी में भारत का हिस्सा 23 प्रतिशत था। जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा तब यह आंकड़ा महज चार फीसदी रह गया। वैसे, एक अध्ययन के मुताबिक 14वीं शताब्दी तक दुनिया की अर्थव्यवस्था में भारत का हिस्सा 66 फीसदी था। गांधीवादी विचारक और प्रख्यात इतिहासकार धर्मपाल ने लम्बे समय तक ब्रिटिश दस्तावेजों का अध्ययन कर यह बात सिद्ध भी की है कि अंग्रेजों के आने तक भारत प्रत्येक क्षेत्र में समृद्ध था। अंग्रेजों ने यहां के कपड़ा मिल, लोहा निर्माण के कारखाने, उत्पादन के अन्य उपक्रम और गांव-गांव में संचालित पाठशालाएं, सबको खत्म कर दिया। यह पहली बार है जब किसी कांग्रेसी सांसद ने ब्रिटेन के बारे में इस तरह बेबाकी से सच बोला है। प्रधानमंत्री सहित पूरे देश ने शशि थरूर की प्रशंसा की है। वरना तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल चुके पी. चिदम्बरम तो ब्रिटेन के सामने नतमस्तक थे। बल्कि इन्होंने तो यह तक कहा था कि हम धन्य हैं कि अंग्रेज हम पर शासन करने आए। 

सोमवार, 15 जून 2015

राष्ट्रीय योग दिवस कब?

 भा रत सरकार 21 जून को 'पहले अंतरराष्ट्रीय योग दिवस' को दुनियाभर में व्यापक पैमाने पर मनाने की तैयारी कर रही है। 21 जून को दुनिया भारत के साथ योग करेगी। यह सुखद समाचार है। भारतीय संस्कृति और उसकी पहचान के लिए इसे 'अच्छे दिनों' की शुरुआत माना जा सकता है। पिछले वर्ष (2014) 27 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा था। यह पहली बार था कि भारत सरकार की ओर से अपनी सांस्कृतिक पहचान को दुनिया में स्थापित करने के लिए इस तरह का प्रयास किया गया। प्रधानमंत्री के इस प्रस्ताव को ईसाई और मुस्लिम देशों सहित करीब 177 देशों का अभूतपूर्व समर्थन मिला। पहली बार पश्चिमी देशों सहित अन्य देशों ने भारतीय वैज्ञानिक परंपरा का स्वागत किया था। 11 दिसम्बर, 2014 को महासभा के 193 सदस्यों ने 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाए जाने के प्रस्ताव का समर्थन किया। संयुक्त राष्ट्र महासभा में यह पहली बार ही हुआ था कि किसी प्रस्ताव को इस कदर बहुमत मिला। यह भी पहली बार हुआ कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में किसी विशेष दिवस प्रस्ताव को मात्र 90 दिन में स्वीकृति मिल गई।

सोमवार, 6 अप्रैल 2015

भारत के उजले पक्ष को दिखाएं साहित्यकार : श्री महेश श्रीवास्तव

लोकेन्द्र सिंह के काव्य संग्रह 'मैं भारत हूं' का विमोचन
भोपाल, 04 अप्रैल। अपने देश को हमें हीन भावना से प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। अपने लेखन में भारतीय वाग्ंमय और भारतीय उदाहरणों को प्रस्तुत करना चाहिए। ताकि प्रत्येक भारतवासी को अपने देश पर गौरव हो और दुनिया भी जाने की भारत एक महान देश है। यह पुरानी कहावत है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। लेकिन, धन और बाजारवाद का प्रभाव बढ़ रहा है, जिससे ये दर्पण कुछ दरक गया है। इस कारण बिम्ब कुछ धुंधले बन रहे हैं। साहित्यकारों को भारत के उजले पक्ष को दिखाना चाहिए। ये विचार प्रख्यात कवि और वरिष्ठ पत्रकार श्री महेश श्रीवास्तव ने व्यक्त किए। वे युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह के काव्य संग्रह 'मैं भारत हूं' के विमोचन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित थे। समारोह का आयोजन 'एक भारतीय आत्मा' पं. माखनलाल चतुर्वेदी की जयंती प्रसंग पर मीडिया विमर्श पत्रिका के तत्वावधान में किया गया। समारोह की अध्यक्षता माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने की। वरिष्ठ पत्रकार श्री अक्षत शर्मा भी बतौर विशिष्ट अतिथि मौजूद रहे।

मंगलवार, 24 मार्च 2015

अपनी जड़ों में लौटना होगा

ग्वालियर में नववर्ष के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम.
 वे लेन्टाइन डे (वीक) के रोज-डे और हग-डे से लेकर किस-डे तक की जानकारी रखने वाले आज के कूल डूड और हॉट बेबीज को भारतीय त्योहारों की न्यूनतम जानकारी है। यदि आप उनसे पूछ लें कि भारतीय नववर्ष कब है तो सबके सब 'जीरो' नजर आएंगे। अभारतीय संस्कृति और बाजारवाद के 'डे' (त्योहार) मनाने में आज की पीढ़ी इतनी व्यस्त है कि अपनी संस्कृति के पन्ने पलटने की फुरसत उन्हें नहीं है। 31 दिसम्बर की रात से 'हुड़दंग' के साथ ग्रेगेरियन कैलेण्डर का स्वागत करना ही उनके लिए नववर्ष का उत्सव है। बहरहाल, आज की पीढ़ी को अपने नववर्ष का पता भी कैसे होगा? लम्बे समय से भारतीय मानस सुप्त अवस्था में है। उसे भान ही नहीं है कि उसके पूर्वजों ने भी कैलेण्डर बनाया था, वह भी अन्य की अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक। अंग्रेजों की लिखीं इतिहास की किताबों या इन किताबों को पढ़कर तैयार हुए 'स्वतंत्र इतिहासकारों' ने हमेशा यही बताया कि विज्ञान का सूरज तो पश्चिम में ही उगा था, भारत के लोग तो सदैव गाय चराने में ही व्यस्त रहे। भारत लम्बे समय तक दासता में रहा है। उसका कुप्रभाव भारतीय मानस पर अब तक है। बार-बार चेताने पर भी वह सजग नहीं हो रहा है। यदि कोई व्यक्ति भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ पलटकर आज की पीढ़ी को अपने अतीत से प्रेरणा लेने की बात करता है तो उस व्यक्ति को 'स्वतंत्र इतिहासकार' ढकोसलावादी और भ्रम फैलाने वाला करार दे देते हैं। मुंबई में आयोजित राष्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस में विद्वान कैप्टन आनंद जे. बोडास और अमेय जाधव ने अपने शोधपत्र में तथ्यों के आधार पर बताया कि प्राचीन भारत का विज्ञान बहुत उन्नत था। उस समय की विमान तकनीक के आसपास भी आज की विमान तकनीक पहुंच नहीं सकी है। लेकिन, उनके शोध को वामपंथियों और दूसरी विचारधाराओं के लोगों ने लेख पर लेख लिखकर और भाषण दे-देकर कूड़ा साबित करने का प्रयास किया। बोडास और जाधव के शोध को आगे बढ़ाने की बात किसी ने नहीं की, जिसने की, उसे इन्होंने अवैज्ञानिक करार दे दिया। इसी तरह जब भी भारतीय कैलेण्डर की बात निकलती है, अंग्रेजियत से प्रभावित और भारतीय संस्कृति की चमक से पीडि़त बुद्धिजीवियों की बिरादरी उत्तेजित हो जाती है। वे इस तथ्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते की भारत का अपना शानदार इतिहास रहा है। वे भारतीय नववर्ष और उसकी वैज्ञानिक गणना पर प्रश्न चिह्न खड़ा कर देते हैं? भारतीय नववर्ष मनाने का आग्रह करने वालों की हँसी उड़ाने का प्रयास करते हैं।

बुधवार, 31 दिसंबर 2014

हैप्पी न्यू ईयर या नववर्ष, तय कीजिए

 दृ श्य एक। सुबह के पांच बजे का समय है। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि यानी वर्ष प्रतिपदा का मौका है। ग्वालियर शहर के लोग शुभ्रवेश में जल विहार की ओर बढ़े जा रहे हैं। जल विहार के द्वार पर धवल वस्त्र पहने युवक-युवती खड़े हैं। उनके हाथ में एक कटोरी है। कटोरी में चंदन का लेप है। वे आगंतुकों के माथे पर चंदन लगा रहे हैं। भारतीय संगीत की स्वर लहरियां गूंज रही हैं। सुर-ताल के बेजोड़ मेल से हजारों मन आल्हादित हो रहे हैं। बहुत से लोगों ने तांबे के लोटे उठाए और जल कुण्ड के किनारे पूर्व की ओर मुंह करके खड़े हो गए। सब अघ्र्य देकर नए वर्ष के नए सूर्य का स्वागत करने को तत्पर हैं। तभी सूर्यदेव ने अंगडाई ली। बादलों की चादर को होले से हटाया। अपने स्वागत से शायद सूर्यदेव बहुत खुश हैं। तभी उनके चेहरे पर विशेष लालिमा चमक रही है। सूर्यदेव के आते ही जोरदार संघोष हुआ। सबने आत्मीय भाव से, सकारात्मक ऊर्जा से भरे माहौल में एक-दूसरे को नववर्ष की शुभकामनाएं दीं। 
       दृश्य दो। दिसम्बर की आखिरी रात। पुलिस परेशान है कि 'हैप्पी न्यू ईयर वालों' को कैसे संभाला जाएगा? शराब पीकर बाइक-कार को हवाईजहाज बनाने वालों को कैसे आसानी से लैंड कराया जा सकेगा? खैर पुलिस के तनाव के बीच जैसे ही रात १२ बजे घड़ी की दोनों सुईयां एक जगह सिमटीं, जोरदार धमाकों की आवाज आती है। आसमान आतिशबाजी से जगमग हो उठा। आस-पास के घरों से म्यूजिक सिस्टम पर कान-फोडू संगीत बज उठा है। देर शाम से नए साल के स्वागत में शराब पी रहे लौंडे अपने बाइक पर निकल पड़े हैं। कुछ बाइकर्स कॉलोनी में भी आए हैं। सीटी बजाते हुए, चीखते-चिल्लाते हुए, धूम मचा रहे हैं। नारीवादी आंदोलन के कारण खुद को 'ठीक से' पहचान सकीं लड़कियों ने भी लड़कों से पीछे नहीं रहने की कसम खा रखी है। शोर-शराबे के बीच जैसे-तैसे सो सके। सुबह उठे तो अखबार में फोटो-खबर देख-पढ़कर जाना कि नए साल का स्वागत बड़ा जोरदार हुआ। कई लीटर शराब पी ली गई। बहुत-से मुर्गे-बकरे भी निपट गए। कुछ लोग पीकर सड़क किनारे गटर के ढक्कन पर पाए गए तो कुछ लोग सड़क दुर्घटना में घायल हो गए, जिनकी एक जनवरी अस्पताल में बीती। और भी बहुत कुछ है बताने को। 
       दो तस्वीर आपने देखीं। इनमें नया कुछ नहीं है। कुछ दिन से यह सब बताने वाले चित्र आपके फेसबुक पेज और व्हाट्सअप पर आ रहे होंगे। हो सकता है आपने इन्हें लाइक-शेयर-कमेन्ट भी किया हो। हो सकता है आप थोड़ी देर के लिए भारतीय हो गए हों और आपने इन्हें आगे बढ़ा दिया हो। आपको अचानक से अपनी संस्कृति खतरे में नजर आई हो। बहरहाल, समस्या यहां सिर्फ संस्कृति संरक्षण की नहीं है। यहां यह प्रश्न भी नहीं है कि मेरी संस्कृति अच्छी, उनकी संस्कृति घटिया। यहां प्रश्न लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी नहीं है। असल में प्रश्न तो यह है कि हमें किस तरफ आगे बढ़ाना चाहिए? हमें भारतीय मूल्यों, भारतीय चिंतन और भारतीय संस्कृति की ओर बढ़ाना चाहिए या फिर पश्चिम से आए कचरे को भी सिर पर रखकर दौड़ लगा देना है? क्या भारतीय संस्कृति पुरातनपंथी है? क्या वर्ष प्रतिपदा 'बैकवर्ड' समाज का त्योहार है और न्यू ईयर 'फॉरवर्ड' का? प्रश्न तो यह भी है कि वास्तव में हमारा आत्म गौरव कब जागेगा? कब हमारी तरुणाई अंगडाई लेगी? कब हम अपने मूल्यों में अधिक भरोसा दिखाएंगे? कब हम अपनी चीजों को दुनिया से सामने प्रतिष्ठित करेंगे? 
       समय तो तय करना पड़ेगा, खुद को बदलने का। सोचते-सोचते, भाषण देते-देते, कागज कारे करते-करते बहुत वक्त बीत गया है। अब समय आ गया है कि हम भारतीय हो जाएं। आखिर कब तक प्रगतिशील दिखने के लिए दूसरे का कोट-जैकेट पहने रहेंगे? अब हम जान रहे हैं कि एक जनवरी को हमारा नववर्ष नहीं है। कारण भी क्या हैं कि एक जनवरी को नववर्ष मनाया जाए? सिर्फ यही कि अंग्रेजी कैलेण्डर बदलता है। अब तय कीजिए क्या यह हमारे लिए उत्सव मनाने का कारण हो सकता है? यदि हो सकता है तो निश्चित ही हमारे पुरखे तय कर गए होते। हम तो वैसे भी उत्सवधर्मी हैं, त्योहार मनाने के मौके खोजते हैं। लेकिन, हमने इस नववर्ष को उत्सव घोषित नहीं किया, क्योंकि हमारे लिए एक जनवरी को नया साल मनाने का कोई कारण नहीं था। हिन्दू जीवनशैली पूर्णत: वैज्ञानिक है। यह तथ्य सिद्ध हो चुका है। इसीलिए भारतीय मनीषियों ने प्रकृति के चक्र को समझकर बताया कि चैत्र से नववर्ष शुरू होता है। उस वक्त मौसम बदलता है। वसंत ऋतु का आगमन होता है। प्रकृति फूलों से मुस्काती है। फसल घर आती है तो किसानों के चेहरे पर खुशी चमकती है। दुनिया के दूसरे कैलेण्डर से भारतीय कैलेण्डर की तुलना करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि भारतीय मनीषियों की कालगणना कितनी सटीक और बेहतर थी। वर्ष प्रतिपदा को ही नववर्ष मनाने का एक प्रमुख कारण यह है कि भारतीय कालगणना के मुताबिक इसी दिन पृथ्वी का जन्म हुआ था। 
       बहुत से विद्वान कहते हैं कि जब ईस्वी सन् ही प्रचलन में है तो क्यों भारतीय नववर्ष को मनाने पर जोर दिया जाए। जब एक जनवरी से ही कामकाज का कैलेण्डर बदल रहा है तो इसे ही नववर्ष मनाया जाना चाहिए। जवाब वही है, सनातन। जब सब काम ग्रेगेरियन कैलेण्डर से ही किए जा रहे हैं तो फिर निजी जीवन में जन्म से लेकर अंतिम संस्कार तक की सभी प्रक्रियाओं के लिए पंचाग क्यों देखा जाता है। क्योंकि अंतर्मन में विश्वास बैठा है कि कालगणना में भारतीय श्रेष्ठ थे। भारतीय कैलेण्डर का पूर्णत: पालन करने पर कोई क्या कहेगा, इसकी चिंता हमें खाए जाती है। सारी चिंताएं छोड़कर अपने कैलेण्डर को प्रचलन में लाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। एक मौका हाथ आया था लेकिन पाश्चात्य प्रेम में फंसे हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वह मौका खो दिया था। वर्ष 1952 में वैज्ञानिक और औद्योगिक परिषद ने पंचाग सुधार समिति की स्थापना की थी। समिति ने 1955 में अपनी रिपोर्ट में विक्रम संवत को भी स्वीकार करने की सिफारिश प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से की थी। लेकिन, पंडितजी ने इस सिफारिश को नजरअंदाज कर दिया। खुद को सेक्यूलर कहने वाले प्रधानमंत्री ने ऐसे कैलेण्डर को मान्यता दी, जिसका संबंध एक सम्प्रदाय से है। जनवरी से शुरू होने वाले नववर्ष का संबंध ईसाई सम्प्रदाय और ईसा मसीह से है। रोम के सम्राट जूलियस सीजर इसे प्रचलन में लाए। जबकि भारतीय नववर्ष का संबंध हिन्दू धर्म से न होकर प्रकृति से है। यानी खुद को सेक्यूलर कहने वाले विद्वानों को भी अंग्रेजी नववर्ष का विरोध कर पंथ निरपेक्ष भारतीय कैलेण्डर के प्रचलन के लिए आंदोलन करना चाहिए। 
       बहरहाल, खुद से सवाल कीजिए कि अपने नववर्ष को भूल जाना कहां तक उचित है? अगर भारतीयपन बचा होगा तो निश्चित ही आप जरा सोचेंगे। यह भी सोचेंगे कि वास्तव में उत्सव के रंग एक जनवरी के नववर्ष में दिखते हैं या फिर चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा में। उत्सव मनाने का तरीका पाश्चात्य का अच्छा है या भारत का? कब तक गुलामी के प्रतीकों को गले में डालकर घूमेंगे? अब अपने मूल्यों, अपनी संस्कृति, अपनी पहचान और अपने ज्ञान-विज्ञान को दुनिया में स्थापित करने का वक्त आ गया है। 

शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

विश्व बंधुत्व और शांति का संदेश देता है सांची


साँची स्थित मुख्य स्तूप (स्तूप क्रमांक-1) फोटो : लोकेन्द्र सिंह/Lokendra /Singh 
 जी वन में चलने वाले रोज-रोज के युद्धों से आपका मन अशांत है, आपकी आत्मा व्यथित है, आपका शरीर थका हुआ है तो बौद्ध तीर्थ सांची चले आइए आपके मन को असीम शांति मिलेगी। आत्मा अलौकिक आनंद की अनुभूति करेगी। शरीर सात्विक ऊर्जा से भर उठेगा। सांची के बौद्ध स्तूप प्रेम, शांति, विश्वास और बंधुत्व के प्रतीक हैं। मौर्य सम्राट अशोक को बौद्ध धर्म की शिक्षा-दीक्षा के लिए प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर एकान्त स्थल की तलाश थी। ताकि एकांत वातावरण में बौद्ध भिक्षु अध्ययन कर सकें। सांची में उनकी यह तलाश पूरी हुई। जिस पहाड़ी पर सांची के बौद्ध स्मारक मौजूद हैं उसे पुरातनकाल में बेदिसगिरि, चेतियागिरि और काकणाय सहित अन्य नामों से जाना जाता था। यह ध्यान, शोध और अध्ययन के लिए अनुकूल स्थल है। कहते हैं महान सम्राट अशोक की महारानी ने उन्हें सांची में बौद्ध स्मारक बनाने का सुझाव दिया था। महारानी सांची के निकट ही स्थित समृद्धशाली नगरी विदिशा के एक व्यापारी की पुत्री थीं। सम्राट अशोक के काल में ही बौद्ध धर्म के अध्ययन और प्रचार-प्रसार की दृष्टि से सांची कितना महत्वपूर्ण स्थल हो गया था, इसे यूं समझ सकते हैं कि सम्राट अशोक के पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा ने भी कुछ समय यहीं रहकर अध्ययन किया। दोनों भाई-बहन बौद्ध धर्म की शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार के लिए सांची से ही बोधि वृक्ष की शाखा लेकर श्रीलंका गए थे। सांची के स्तूप सिर्फ बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए ही श्रद्धा के केन्द्र नहीं हैं बल्कि दुनियाभर के लोगों के लिए आकर्षण का केन्द्र हैं। ये स्तूप आज भी भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को देश-दुनिया में पहुंचा रहे हैं। दुनिया को शांति, सह अस्तित्व और विश्व बंधुत्व की भावना के साथ रहने का संदेश दे रहे हैं।

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

मध्यप्रदेश की धड़कन है माण्डू

जहाज महल फोटो : लोकेन्द्र सिंह 
 जि सने माण्डू नहीं देखा, उसने मध्यप्रदेश में देखा क्या? इसलिए भारत का दिल देखने निकलो तो माण्डव जाना न भूलिएगा। बादशाह अकबर हो या जहांगीर, सबको यह ठिया पसंद आया है। अबुल फजल तो सम्मोहित होकर कह गया था कि माण्डू पारस पत्थर की देन है। माण्डू प्रकृति की गोद में खूब दुलार पा रहा है। ऐसा लगता है कि वर्षा ऋतु तो माण्डू का सोलह श्रंगार करने के लिए ही यहां आती है। बारिश में तो यह अल्हड़ नवयौवन की तरह अंगड़ाई लेता नजर आता है। यहां आकर आपका दिल भी आशिक मिजाज हो ही जाएगा। रानी रूपमति के महल से दिखने वाला नैसर्गिक सौंदर्य आपको प्रेम सिखा ही देगा। जहाज महल पर खड़े होकर आप असीम सुकून की अनुभूति करेंगे। हिन्डोला महल में आपका मन डोले बिना नहीं रहेगा। होशंगशाह का मकबरा मन को मोह लेगा और ताजमहल की याद दिलाएगा। आल्हा-ऊदल की कथाएं रोमांच बढ़ा देंगी, आपकी भुजाओं की मछलियां बाहर आने को मचल उठेंगी। ईको प्वाइंट पर खड़े होकर जब आप जोर से अपना नाम पुकारेंगे तो लगेगा कि दुनिया आपको सुन रही है। अद्भुत है माण्डू। रानी रूपमति और बाज बहादुर की खूबसूरत मोहब्बत की तरह माण्डू भी बेहद हसीन है।

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

हिन्दी के सम्मान के दिन

 भा रतीयों के लिए खुशी की बात है कि उनका प्रधानमंत्री दुनिया से हिन्दी में बात कर रहा है। हिन्दी के सौंदर्य, सौम्यता और समृद्धि से दुनिया को परिचित करा रहा है। विदेशी भाषा में बोलने वाले भारत का सिर, अब स्वाभिमान से थोड़ा ऊंचा हुआ है। अपनी भाषा में संवाद करके वह गौरव का अनुभव कर रहा है। अपनी जुबान पाकर वह सबसे खुलकर हंस-बोल रहा है। हिन्दी के प्रति प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आग्रह प्रसंशनीय और सराहनीय है। उनका स्वागत है, वंदन है। वे महज हिन्दी के ही हामी नहीं हैं, भारतीय भाषाओं के संरक्षण-संवर्धन की भी उन्हें चिंता है। हिन्दी और भारतीय भाषाओं का सम्मान अंग्रेजी को टा-टा बाय-बाय बोले बिना संभव नहीं है। लम्बे अरसे बाद देसीपन की महक समेटकर चलने वाले प्रधानमंत्री के कारण सरकार की सभी महत्वपूर्ण वेबसाइट हिन्दी में अपडेट होना शुरू हो गईं हैं। सोशल मीडिया पर नेताओं और मंत्रियों ने भी अपनी निज भाषा में चहकना शुरू कर दिया है। प्रधानमंत्री ने तो पूरी तैयारी कर ली है कि वे दुनिया से अब सिर्फ हिन्दी में ही बात करेंगे। शपथ ग्रहण समारोह में आए विभिन्न देशों के राजनयिकों से हिन्दी में बात करके उन्होंने हिन्दी को सम्मान दिलाने की शुरुआत कर दी थी। अब विदेशी दौरों पर भी वे अपने प्रण का पालन कर रहे हैं। नेपाल, भूटान और अब जापान में सबसे हिन्दी में बात की है। अंग्रेजी भाषी अमरीका से भी बुलावा उन्हें आ चुका है, वहां भी वे हिन्दी में ही बात करेंगे, यह भरोसा है।  
यह मान लिया गया है अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय भाषा है। जबकि वास्तविकता यह नहीं है, यह तो महज एक भ्रम है। दुनिया से संवाद करने के लिए यह एकमात्र खिड़की भी नहीं है। दुनिया में तमाम देश हैं जहां बहुत पढ़े-लिखे लोग भी अंग्रेजी में अंगूठाछाप हैं, उन्हें अंग्रेजी की जरूरत भी नहीं है। अच्छी अंग्रेजी बोलने में सक्षम नरेन्द्र मोदी ने भी यही साबित करने का प्रयास किया है कि संवाद करने के लिए भाषा का कोई बंधन नहीं है। आप अपनी भाषा में बोलिए, लोग सुनेंगे और मानेंगे भी। दुनिया सम्मान भी करेगी कि आप अपनी भाषा में संवाद करते हैं, आपकी अपनी बोली है, दुनिया से संवाद करने के लिए आप किसी और की भाषा के मोहताज नहीं। अपनी भाषा से परहेज और अंग्रेजी भाषा से प्रेम के कारण भारत को कई बार अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ा है। विजयलक्ष्मी पण्डित जब राजदूत का पद ग्रहण करने रूस गईं थी तब अंग्रेजी में लिखे उनके परिचय-पत्र को स्तालिन ने उठाकर फेंक दिया था। स्तालिन ने विजयलक्ष्मी पण्डित से पूछा था कि क्या आपकी अपनी कोई भाषा नहीं है? दुनियाभर में तमाम देश हैं, जहां उनकी मातृभाषा ही संवाद और कामकाज की भाषा है। यहूदी तो अपनी भूमि-भाषा दोनों खो चुके थे लेकिन मातृभूमि और मातृभाषा से अटूट प्रेम का ही परिणाम था कि यहूदियों ने अपनी जमीन (इजराइल) भी वापस पाई और अपनी भाषा (हिब्रू) को भी जीवित किया। करीब सवा सौ साल पहले तक फिनलैंड के निवासी स्वीडी भाषा का इस्तेमाल करते थे लेकिन एक दिन उन्होंने तय किया कि अपनी भाषा को सम्मान देंगे। तभी से फिनी भाषा में वहां सारा कामकाज चल रहा है। इसी तरह जार के जमाने में रूस में फ्रांसीसी भाषा का दबदबा था। लेकिन अब वहां रूसी भाषा सर्वोपरि है। शिक्षा, व्यापार, अनुसंधान-आविष्कार अपनी भाषा में संभव ही नहीं बल्कि अधिक सहज भी है, यह इन देशों ने साबित करके दिखा दिया है। लेकिन, स्वतंत्रता के ६० साल बाद तक भी अंग्रेजी के मोहपाश में फंसे हम भारतीय यह ही समझते रहे कि यही एकमात्र भाषा है जो हमारा कल्याण कर सकती है। वर्ष १९५९ में भारतीय संसद में एक दु:खद प्रकरण हुआ। संसद में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अहिन्दी भाषी राज्यों को यह आश्वासन दे दिया कि जब तक ये राज्य चाहेंगे संघ के कार्यों में अंग्रेजी का रुतबा कायम रहेगा। अपनी भाषा को स्थापित करने की जगह हमने स्वार्थों और वोट बैंक की दूषित राजनीति के कारण भाषाई विवाद खड़े कर दिए। आपसी झगड़े के कारण अंग्रेजी धीरे-धीरे भारतीय भाषाओं के माथे पर चढ़ गई और उनके वजूद के लिए खतरा बन गई है। मजबूत इरादों वाले नरेन्द्र मोदी से उम्मीद है कि वे राजभाषा में संसोधन कराएंगे और हिन्दी को उसका हक दिलाएंगे। हिन्दी को सिंहासन पर बैठाने के लिए आम सहमति बनाने के लिए भी नरेन्द्र मोदी प्रयास करेंगे, ऐसी उनसे उम्मीद है, वे यह कर सकते हैं।
यह स्पष्ट कर देना उचित है कि अंग्रेजी से किसी को दिक्कत नहीं है। भाषाएं जितनी भी सीखी जाएं, अच्छा ही है। दिक्कत तो अंग्रेजियत से है। अंग्रेजी भाषा के साथ जो अंग्रेजियत जुड़ी है, उससे सबसे अधिक नुकसान हो रहा है। महज दो प्रतिशत अंग्रेजी बोलने वाले अंग्रेजीदां लोगों के कारण अन्य भारतीयों को उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है। सरकार-व्यवस्था में इन अंग्रेजीदां लोगों का वर्चस्व है। काले अंग्रेजों ने अंग्रेजी को इतना महिमामंडित कर रखा है कि हिन्दी अपने ही देश में दोयम दर्जे की भाषा हो गई है। अंग्रेजी महारानी हो गई, महारानी हिन्दी दासी हो गई। अंग्रेजीदां लोगों द्वारा हिन्दी भाषियों के अपमान-उपहास की घटनाएं अकसर सामने आती रही हैं। कॉन्वेंट स्कूलों में हिन्दी भाषी बच्चों को मानसिक तौर पर प्रताडि़त किया जाना आम बात है। कॉन्वेंट स्कूलों में अंग्रेजी नहीं बोलने पर 'मैं हिन्दी बोलता हूं, मैं गधा हूं' लिखी तख्तियां मासूम बच्चों के गले में लटका दी जाती हैं। चाय-समोसा बेचने वाले साधारण आदमी पर भी अंग्रेजी का इतना दबाव है कि वह 'चिल्लर या खुल्ले पैसे' नहीं बल्कि 'चेंज' मांगता है। आज के 'कूल डूड' को पैंतालीस समझ नहीं आता, उन्हें तो बस 'फोर्टीफाइव' ही मामूल है। 'हाय-हैल्लो' कहने वाले उनके 'फास्टफ्रेंड' हैं, नमस्ते से स्वागत करने वाले को ये 'एटीट्यूड' दिखाते हैं। अंग्रेजी परवरिश में पले-बढ़े ये नौजवान हिन्दी परिवार से आए युवाओं के सामने ऐसा माहौल खड़ा कर देते हैं कि मजबूरन उन्हें भी 'राम-राम' की जगह 'गुड मोर्निंग' कहना पड़ता है। अंग्रेजी के दबाव में हिन्दी भाषी युवाओं की स्थिति यह हो जाती है कि उन्हें अंग्रेजी में एक वाक्य भी शुद्ध बोलना भले न आता हो लेकिन ये सेव को 'एप्पल', भिण्डी को 'लेडीज फिंगर', कुत्ते को 'डॉगी' और रूमाल को 'हैंकी' जरूर कहते हैं। यह सब अंग्रेजी के वर्चस्व का ही प्रतीक तो है। यह सर्वमान्य सत्य है कि व्यक्ति अपनी भाषा में अधिक रचनात्मक हो सकता है, अधिक शिक्षा प्राप्त कर सकता है, सीख सकता है और समझ सकता है लेकिन भारतीय शिक्षा संस्थानों में स्थिति उलट है। उच्च शिक्षा में अंग्रेजी का बोलबाला है। निश्चित ही शिक्षा संस्थानों में हिन्दी की अनदेखी का खामियाजा भारत उठा रहा है। 
भारतीय भाषाओं और उन्हें जीने वाले देसी लोगों को अंग्रेजी के आगे झुकना नहीं पड़े, अंग्रेजी के कारण रुकना नहीं पड़े, अंग्रेजी के कारण शर्मिंदा नहीं होना पड़े बल्कि अपनी मातृभाषा में संवाद करने के लिए दूसरों को भी प्रेरित करने के भाव को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। दरअसल, हिन्दी के अच्छे दिन लाकर वे भारतीयों का स्वाभिमान तो जगा ही रहे हैं, गुलामी की खुरचन को भी साफ करने की कोशिश कर रहे हैं। वर्ष २०१३ में एक सर्वेक्षण में खुलासा किया गया था कि २०६० तक अंग्रेजी से आगे निकल जाएगी हिन्दी। कारण, हिन्दी सर्वसमावेशी है। हिन्दी के पास भारतीय भाषाओं और बोलियों की अपार संपदा है। कई भाषाओं से नए-नए शब्दों को स्वीकार करने के कारण हिन्दी समय के साथ और अधिक समृद्ध होती जा रही है। भारतीय लोक भाषा सर्वेक्षण ने पहली बार यह सर्वेक्षण कराया था। हिन्दी के लिए लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जज्बे को देखकर तो लगता है अंग्रेजी के भूत को भगाने का यह सपना २०६० नहीं बल्कि उससे कहीं पहले पूरा हो जाएगा। हिन्दी और भारतीय भाषाओं के लिए काम कर रहे योद्धाओं के साथ ही आमजन को भी प्रधानमंत्री के साथ हो लेना चाहिए। अपने आम जीवन में हमें हिन्दी के उपयोग को बढ़ा देना चाहिए। यह बहुत आसान है। अपने बच्चे को 'काऊ को रोटी खिलाना' नहीं सिखाएं बल्कि उसे 'गाय को रोटी खिलाना' ही सिखाएं। हस्ताक्षर हिन्दी में करें। बैंक में धन निकासी की पर्ची हिन्दी में भरने का अभ्यास करें। अगर आपकी दुकान-मकान पर नाम पट्टिका अंग्रेजी में है तो उसे बदलकर हिन्दी में कर दें। घर के बाहर 'वेलकम' की जगह 'सुस्वागत' लिखें। अभिवादन भारतीय परंपरा से करें। आपसी संवाद हिन्दी में करें। निमंत्रण-पत्र हिन्दी में ही छपवाएं। ऐसे अनेक छोटे-छोटे प्रयोग हैं, जिनकी मदद से हम अपने स्तर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ हो सकते हैं। हिन्दी को ही नहीं वरन सभी भारतीय भाषाओं के सम्मान को लौटा सकते हैं। सार्थक बदलाव का छोटा प्रयास भी बड़ा आंदोलन बन जाता है इसलिए आप आगे तो आइए। गौरवशाली भारत के 'शक्तिशाली' प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हौसला बढ़ाइए। 
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