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बुधवार, 12 जनवरी 2022

भारत भक्ति से भरा मन है ‘स्वामी विवेकानंद’


स्वामी विवेकानंद ऐसे संन्यासी हैं, जिन्होंने हिमालय की कंदराओं में जाकर स्वयं के मोक्ष के प्रयास नहीं किये बल्कि भारत के उत्थान के लिए अपना जीवन खपा दिया। विश्व धर्म सम्मलेन के मंच से दुनिया को भारत के ‘स्व’ से परिचित कराने का सामर्थ्य स्वामी विवेकानंद में ही था, क्योंकि विवेकानंद अपनी मातृभूमि भारत से असीम प्रेम करते थे। भारत और उसकी उदात्त संस्कृति के प्रति उनकी अनन्य श्रद्धा थी। समाज में ऐसे अनेक लोग हैं जो स्वामी जी या फिर अन्य महान आत्माओं के जीवन से प्रेरणा लेकर भारत की सेवा का संकल्प लेते हैं। रामजी की गिलहरी के भांति वे भी भारत निर्माण के पुनीत कार्य में अपना योगदान देना चाहते हैं। परन्तु भारत को जानते नहीं, इसलिए उनका गिलहरी योगदान भी ठीक दिशा में नहीं होता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक, चिन्तक एवं वर्तमान में सह-सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य अक्सर कहते हैं कि “भारत को समझने के लिए चार बिन्दुओं पर ध्यान देने की जरूरत है। सबसे पहले भारत को मानो, फिर भारत को जानो, उसके बाद भारत के बनो और सबसे आखिर में भारत को बनाओ”। भारत के निर्माण में जो भी कोई अपना योगदान देना चाहता है, उसे पहले इन बातों को अपने जीवन में उतरना होगा। भारत को मानेंगे नहीं, तो उसकी विरासत पर विश्वास और गौरव नहीं होगा। भारत को जानेंगे नहीं तो उसके लिए क्या करना है, क्या करने की आवश्यकता है, यह ध्यान ही नहीं आएगा। भारत के बनेंगे नहीं तो बाहरी मन से भारत को कैसे बना पाएंगे? भारत को बनाना है तो भारत का भक्त बनना होगा। उसके प्रति अगाध श्रद्धा मन में उत्पन्न करनी होगी। स्वामी विवेकानंद भारत माता के ऐसे ही बेटे थे, जो उनके एक-एक धूलि कण को चन्दन की तरह माथे पर लपेटते थे। उनके लिए भारत का कंकर-कंकर शंकर था। उन्होंने स्वयं कहा है- “पश्चिम में आने से पहले मैं भारत से केवल प्रेम करता था, परंतु अब (विदेश से लौटते समय) मुझे प्रतीत होता है कि भारत की धूलि तक मेरे लिए पवित्र है, भारत की हवा तक मेरे लिए पावन है, भारत अब मेरे लिए पुण्यभूमि है, तीर्थ स्थान है”।

सोमवार, 1 जून 2015

व्यक्ति और राष्ट्र हित में मूल्यपरक शिक्षा

 शि क्षा के अभाव से कितनी समस्याएं और विसंगतियां उत्पन्न होती हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। विशेषकर मूल्यहीन शिक्षा व्यवस्था के कारण तो कई प्रकार की नई समस्याएं जन्म ले लेती हैं। अपनी बौद्धिक और तर्क क्षमता से दुनिया पर विजय प्राप्त करने वाले युवा संन्यासी स्वामी विवेकानन्द तो यहां तक कहते हैं- 'यदि शिक्षा से सम्पन्न राष्ट्र होता तो आज हम पराभूत मन:स्थिति में न आए होते।' इस देश का सबसे अधिक नुकसान शिक्षा के अभाव के कारण ही हुआ है। भारत के संदर्भ में शिक्षा का अभाव ही एकमात्र चुनौती नहीं है बल्कि उचित शिक्षा का अभाव ज्यादा गंभीर मसला है। इस बात से किसी को इनकार नहीं है कि एक समर्थ राष्ट्र के निर्माण में शिक्षा व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह कहना ज्यादा उचित होगा कि राष्ट्र निर्माण में शिक्षा पहली और अनिवार्य आवश्यकता है। लेकिन, यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत को कैसी शिक्षा की आवश्यकता है? सब लोग पढऩा-लिखना सीख लें, अंगूठे की जगह हस्ताक्षर करना सीख लें, केवल इतना भर शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए क्या? मनुष्य अपने हित-अहित के संबंध में जागरूक हो जाए, उसे इतना शिक्षित करने मात्र से काम चलेगा क्या? अच्छे-भले मनुष्य को पैसा कमाने की मशीन बना देना, शिक्षा है क्या? अच्छी नौकरी पाने के योग्य हो जाना, अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो जाना, किताबें पढऩा-लिखना सीख लेना ही शिक्षा और शिक्षा का उद्देश्य नहीं है, तो भला क्या है?

सोमवार, 12 जनवरी 2015

शिक्षा नीति में दिखे विवेकानन्द का चिंतन

 यु वा नायक स्वामी विवेकानन्द को याद करते ही बुद्धि, हृदय और शरीर में ऊर्जा का संचार होने लगता है। स्वामी विवेकानन्द सबके प्रेरणा स्रोत हैं। लेकिन, युवाओं के तो वे हृदय सम्राट हैं। यही कारण है कि उनकी जयंती (१२ जनवरी) युवा दिवस के रूप में मनाई जाती है। देश की वर्तमान परिस्थितियों के हिसाब से देखें तो स्वामी विवेकानन्द, उनके विचार, उनका चिंतन, उनकी सीख आज बहुत प्रासंगिक हैं। दरअसल, भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। निकट भविष्य में हम और अधिक जवां होंगे। लेकिन, क्या ये तरुणाई हमारी ताकत बन सकेगी? यह बड़ा प्रश्न है। ये तरुणाई देश को शक्ति तभी दे सकेगी जब इनकी आस्था भारत में होगी। फिर एक सवाल उठता है कि क्या आज की शिक्षा नीति ऐसी है कि जिससे युवाओं में राष्ट्र के प्रति श्रद्धा के भाव जागृत होते हैं? समर्पण की बात आती है? 'राष्ट्र सबसे पहले' यह भाव जागृत होता है क्या? यही नहीं, क्या हम अपनी तरुणाई को राष्ट्र के उद्देश्य के अनुरूप शिक्षित कर रहे हैं? हमारी शिक्षा नीति क्या राष्ट्र के उद्देश्य के अनुरूप है? स्वामी विवेकानन्द ने जिस मैन मेकिंग एजुकेशन की बात कही है, क्या आज की शिक्षा नीति वैसी है? आज की शिक्षा विद्यार्थी को मनुष्य बनाने की प्रक्रिया की ओर ले जाती है या पैसा कमाने की मशीन बनाने का प्रयास करती है। स्वामी विवेकानन्द अर्थवादी शिक्षा व्यवस्था का कड़ा विरोध करते थे लेकिन, आज की शिक्षा व्यवस्था तो पूरी तरह अर्थ आधारित होकर रह गई है। क्या इस अर्थवादी शिक्षा नीति से हम अपने राष्ट्र को फिर से शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी बना सकेंगे? मैकाले की शिक्षा पद्धति का उद्देश्य मनी मेकिंग, पैसा बनाने की शिक्षा देना था और स्वामी विवेकानन्द की शिक्षा का उद्देश्य मैन मेकिंग, व्यक्ति निर्माण था। हमें मैकाले की शिक्षा नीति पर आगे बढऩा चाहिए या फिर स्वामी विवेकानन्द के विचारों को भारत की शिक्षा नीति में शामिल करना चाहिए? यदि हम सही अर्थों में भारत निर्माण करना चाहते हैं, भारत को शिक्षा के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व करते हुए देखना चाहते हैं तो भारत की शिक्षा नीति में स्वामी विवेकानन्द के विचारों का समावेश होना ही चाहिए। शिक्षा नीति में परिवर्तन समय की मांग है और यह परिर्वतन स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा संबंध उपदेशों को ध्यान में रखकर होना चाहिए। 
       स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षा पर बहुत बल दिया था। उनका स्पष्ट मानना था कि भारत का सबसे अधिक नुकसान किसी ने किया है तो वह अशिक्षा ने किया। चंद लोगों के मस्तिष्क तक शिक्षा के सीमित रह जाने से भी भारत का अनिष्ट हुआ है। इस संबंध में २४ अप्रैल १८९७ को 'भारती' की सम्पादक सरला घोषाल को दार्जिलिंग से लिखे उनके पत्र को देखना होगा। स्वामीजी लिखते हैं- 'भारत के सत्यानाश का मूल कारण यही है कि देश की सम्पूर्ण विद्या-बुद्धि राजशासन और दम्भ के बल से केवल मुट्ठीभर लोगों के अधिकार में रखी गई है। यदि हमें फिर से उन्नति करनी है, तो हमको उसी मार्ग पर चलना होगा अर्थात् जनता में विद्या का प्रचार करना होगा।' सम्पूर्ण भारत को शिक्षित करने का चिंतन जब स्वामी विवेकानन्द करते हैं तो वे प्रत्येक उपाय पर विचार करते हैं। गांव-गांव, नगर-नगर घूम रहे साधु और संन्यासियों को भी वे उनका मूल काम याद दिलाने का प्रयास करते हैं। भारत को शिक्षित करने के अपने संकल्प को पूरा करने के लिए वे इन्हें शिक्षा अभियान से जोडऩे की बात करते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने २३ जून १८९४ को शिकागो से मैसूर के महाराजा को पत्र लिखा कि मान लीजिए महाराज आपने हरएक गांव में एक नि:शुल्क पाठशाला खोल दी, तो भी इससे कुछ काम न होगा। क्योंकि, भारत में इतनी अधिक गरीबी है कि गरीब लड़के पाठशाला आने की बजाय खेतों में अपने माता-पिता को मदद देना या दूसरे किसी उपाय से रोटी कमाने का प्रयत्न करना अधिक पसंद करेंगे। यदि पहाड़ मुहम्मद के पास न आये, तो मुहम्मद ही पहाड़ के पास क्यों न जाय? यदि गरीब लड़का शिक्षा के मन्दिर तक न आ सके, तो शिक्षा को ही उसके पास जाना चाहिए। हमारे देश में हजारों एकनिष्ठ और त्यागी साधु हैं, जो गांव-गांव धर्म की शिक्षा देते फिरते हैं। यदि उनमें से कुछ लोग सुनियन्त्रित रूप से ऐहिक विषयों के भी शिक्षक बनाये जाएं तो गांव-गांव, दर-दर जाकर वे केवल धर्मशिक्षा ही नहीं देंगे, बल्कि ऐहिक शिक्षा भी दिया करेंगे। 
      ऐहिक शिक्षा के साथ ही धर्मशिक्षा पर भी स्वामी जी का जोर था। वे विज्ञान की शिक्षा के साथ-साथ अध्यात्म की शिक्षा को भी अनिवार्य मानते थे। शिक्षा के विषय में समय-समय पर दिए गए उनके विचारों से यह परिलक्षित होता था। तीन जनवरी १८९५ को शिकागो से सर एस. सुब्रह्मण्य अय्यर को पत्र में स्वामी विवेकानन्द लिखते हैं- 'बहुत सोच-विचार के बाद मेरे मन ने तय किया है कि पहले मद्रास में धर्मशिक्षा के लिए एक विद्यालय खोलना ठीक होगा, फिर इसका कार्यक्षेत्र धीरे-धीरे बढ़ाया जाएगा। नवयुवकों को वेदों, विभिन्न भाष्यों और दर्शनों की पूरी शिक्षा देनी होगी, जगत् के अन्य धर्मों का ज्ञान भी इसमें शामिल होगा।' लेकिन, हमने क्या किया? शिक्षा को धर्मविहीन कर दिया। सेकुलरिज्म के चक्कर में फंस कर हमने स्वामी विवेकानन्द के विचारों को खूंटी पर टांग दिया। शिक्षा को नैसर्गिक नहीं रहने दिया। यही कारण है कि आज अभिभावक, शिक्षक, राजनेता और प्रबुद्ध वर्ग मूल्य आधारित शिक्षा की जरूरत महसूस कर रहे हैं। समाज की 'गति' देखकर धर्मविहीन, मूल्यहीन, असंवेदनशील शिक्षा में परिवर्तन की बात हर कोई कर रहा है। स्वामी विवेकानन्द के लिए धर्म अंग्रेजी का शब्द 'रिलीजन' नहीं था। स्वामीजी ने धर्म की व्याख्या उन नियमों और संहिताओं के रूप में की, जो प्रकृति में करोंड़ों वर्षों से प्रचलित हैं। इसलिए देश की तथाकथित सेकुलर बिरादरी को धर्मशिक्षा की बात से बिदकने की जरूरत नहीं है। स्वामी विवेकानन्द ने बार-बार बल दिया है कि धर्म ही भारत की आत्मा है। उन्होंने कहा है -'मैं धर्म को शिक्षा का सबसे आंतरिक सारतत्व मानता हूं।' धर्मविहीन वर्तमान शिक्षा मनुष्य को डॉक्टर, इंजीनियर, टेक्नोक्रेट, ब्यूरोक्रेट आदि बनने के लिए प्रेरित करती है। जबकि वास्तव में मनुष्य की शिक्षा का उद्देश्य स्वयं को पहचानने का होना चाहिए। यूनेस्को ने भी शिक्षा पर प्रकाशित अपनी रिपोर्ट का शीर्षक दिया था- 'कुछ होने के लिए सीखना, न कि कुछ बनने के लिए सीखना।' स्वामीजी भी बार-बार कहते रहे कि विद्यार्थी को कुछ बनाने की जरूरत नहीं है। उसके भीतर सबकुछ है, बस उसे बाहर आने दो। 
      यह बात जग जाहिर है कि एक समय में भारत शिक्षा के क्षेत्र में सबसे आगे था। भारत में विश्वविद्यालय जैसे संस्थाएं थीं, जिनमें शिक्षा प्राप्त करने के लिए दुनियाभर से विद्यार्थी आते थे। नगरों में ही नहीं ग्रामीण क्षेत्रों में भी पाठशालाएं थीं, यह बात प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक धर्मपाल ने भी अपने शोध से प्रमाणित की है। धर्मपाल ने अपनी पुस्तक 'अ ब्यूटीफुल ट्री' में बताया है कि अंग्रेजों के सर्वे के मुताबिक १८वीं सदी में भारत में लाखों की संख्या में स्कूल थे। भारतीयों ने चिंतन, अध्यात्म, सामाजिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, कला ही नहीं परंतु विज्ञान के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व उपलब्धियां अर्जित की थीं। मैकाले की शिक्षा नीति के प्रभाव में आकर भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में अपना नेतृत्व तो खोया ही, स्वाभिमान भी खो दिया। स्वामी विवेकानन्द लगातार भारतीयों से आग्रह करते रहे कि अपने तईं भेड़-बकरी होने का भ्रम दूर करो। खुद को पहचानो, तुम सिंह हो, अमृत के पुत्र हो। अत्यंत अल्पायु में बहुत कुछ मार्गदर्शन देकर स्वामीजी चले गए। अब उनके मार्गदर्शन पर आगे बढऩे का काम हमारा होना चाहिए। हमारे शिक्षाविदों के सामने ऐसी शिक्षा नीति बनाने की चुनौती है, जिसमे बूते फिर से हम शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी हो जाएं। लेकिन, शिक्षा नीति तय करने से पहले यह जान लेना जरूरी होगा कि स्वामी विवेकानन्द असल में शिक्षा किसे मानते थे? स्वामी विवेकानन्द देवघर (वैद्यनाथ) से २३ दिसम्बर १९०० को एक बंगाली महिला को पत्र में लिखते हैं कि आखिर शिक्षा क्या है? क्या वह केवल कुछ पुस्तकों का पठन-पाठन ही है? नहीं। फिर क्या विविध विषयों का ज्ञान? वह भी नहीं है। शिक्षा तो वह है, जिसके सहारे इच्छाशक्ति का प्रवाह एवं उसकी अभिव्यक्ति संयत की जाती है। अब यह विचार कीजिए कि क्या वह शिक्षा कहलाने के योग्य है, जिसके फलस्वरूप इच्छाशक्ति पीढिय़ों से बलपूर्वक अनवरत अवरुद्ध होकर आज मृतप्राय हो रही है। जिसके प्रभाव से नवीन विचारों की कौन कहे, पुराने तक एक-एक करके विलुप्त होते जा रहे हैं? क्या वह शिक्षा है, जो धीरे-धीरे मनुष्य को मशीन बना दे रही है? मेरे विचार से यंत्रवत् अच्छे होने की अपेक्षा स्वतन्त्र इच्छा और बुद्धि द्वारा प्रेरित होकर एक बार गलती भी कर लेना अधिक श्रेयस्कर है। 
     बहरहाल, स्वामी विवेकानन्द के विचार-दर्शन से होकर गुजरते हैं तो यह स्पष्ट होता है कि उनके विचारों का प्रमुख केन्द्र जीविकोपार्जन की शिक्षा, तकनीकी ज्ञान और विज्ञान की शिक्षा नहीं था, वे सबसे पहले व्यक्ति के अंदर निहित क्षमताओं को उजागर करने की शिक्षा देना चाहते थे। वे तकनीकी ज्ञान और विज्ञान की शिक्षा के साथ-साथ चरित्र निर्माण की शिक्षा पर अधिक बल देते थे। शिक्षा के संबंध में उनका महत्वपूर्ण कथन है - 'शिक्षा मनुष्य में निहित सम्पूर्णता की अभिव्यक्ति है।'

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

'सिटी ऑफ जॉय' : कोलकाता

 को लकाता अपनी सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत के लिए जितना प्रसिद्ध है, उतना ही अपनी भव्य इमारतों और दौड़ती-भागती जिन्दगी के लिए भी। यह दीगर बात है कि ज्यादातर भव्य इमारतें बूढ़ी हो चुकी हैं। ये ठीक वैसे ही दुर्दशा की शिकार हैं, जैसे नालायक औलाद की अनदेखी से बूढ़े मां-बाप का हाल होता है। साक्षात मां काली इस ऐतिहासिक शहर की संरक्षक देवी हैं। यह भगवान रामकृष्ण परमहंस और युवा नायक स्वामी विवेकानन्द की साधना-स्थली भी है। नजदीक ही हावड़ा स्थित बेलूर मठ में आत्मिक सुख की अनुभूति होती है। यहां पक्षियों की चहचहाहट क्लासिकल संगीत का सुख देती है। दक्षिणेश्वरी और कालीघाट के काली मंदिर में आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है। मैदान में हुगली (गंगा) किनारे टहलते हुए दिल बाग-बाग हो उठता है। कोलकाता के कॉफी हाउस आज भी बौद्धिक बहसों के अड्डे हैं। पुराने बाजारों का अपना ही ठाठ है। मिष्टी दोई, संदेश, रॉसगुल्ला का स्वाद और खुशबू कोलकाता से मोहब्बत करने के लिए काफी है।

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

शिक्षक कौन?

 भा रतीय संस्कृति में पुरातनकाल से ही अपने शिक्षकों के आदर-सम्मान की परम्परा चली आ रही है। हिन्दुस्थान में शिक्षकों को देवतुल्य बताया गया है। विद्यार्थी उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में पूजते रहे हैं। समाज में उनका सर्वोच्च स्थान रहा है। लेकिन, क्या आज ऐसी स्थिति है? क्या आज शिक्षक वास्तव में शिक्षक हैं? क्या शिक्षकों को देवतुल्य मानकर उन्हें सर्वोच्च स्थान दिया जा रहा है? क्या विद्यार्थी भी पहले जैसे हैं, अनुशासित, समर्पित, संयमी? गौरवशाली गुरु-शिष्य परंपरा कहां खो गई? शिक्षा संस्थानों से पढ़-लिखकर निकलने वाली फौज महज डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक और अन्य प्रोफेशनल्स ही नहीं होते हैं बल्कि समाज में उनकी भूमिका बहुत बड़ी है। शिक्षा संस्थानों वे भारत का नेतृत्व करने के लिए तैयार होते हैं। गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से उन्हें गौरवशाली भारतीय संस्कृति से परिचित भी कराया जाता है। ताकि वे अपनी संस्कृति के संवाहक बन सकें। इसलिए गुरु पूर्णिमा हो या शिक्षक दिवस, ये सवाल उठते हैं। इन सवालों के जवाब खोजना बेहद जरूरी है। ये भारत के भविष्य और उसके अस्तित्व से जुड़ी चिंताएं हैं।
            गुरु-शिष्य परंपरा में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी शिक्षक है। शिक्षक है कौन? उसके दायित्व क्या हैं? उसका महत्व क्या है? इन सवालों के जवाब खोजने जब निकलते हैं तो पता चलता है कि शिक्षक वह है जो विद्यार्थी में निहित गुणों को उजागर करके सामने ला देता है, ताकि वह सही दिशा में आगे जा सके और समाज में अपनी भूमिका का निर्वाहन प्रभावी तरीके से कर सके। युवा नायक स्वामी विवेकानन्द का भी यही मानना था कि जिस तरह एक नन्हें बीज के भीतर विशाल वृक्ष छिपा हुआ है, उसे उपजाऊ भूमि में बोया जाए और उचित वातावरण मुहैया कराया जाए तो वह स्वत: ही पहले पौधा और फिर वृक्ष बन जाता है। ठीक इसी तरह किसी भी विद्यार्थी में उसकी प्रतिभा छिपी हुई है, इसलिए उस प्रतिभा को सामने लाने का कार्य शिक्षक का है। लगभग यही बात महर्षि अरविन्द ने कही है कि शिक्षक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते हैं। वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से सींच कर उन्हें शक्ति में निर्मित करते हैं।
            सिखाना शिक्षक का असल कार्य नहीं है। सीख तो विद्यार्थी स्वयं ही जाता है। दुनियाभर की किताबों से लाइब्रेरी भरीं पड़ी हैं। जानकारियों का नया खजाना इंटरनेट हो गया है। किताबी और पाठ्यक्रम की पढ़ाई तो विद्यार्थी किताबों और इंटरनेट से पूरी कर लेगा। लेकिन, जीवन क्या है और क्यों है? यह सिखाना जरूरी है। जीवन जीने की कला सिखा दी जाए तो किसी भी व्यक्ति को अपना रास्ता साफ नजर आ जाएगा। अपने ४० वर्ष आदर्श शिक्षक के रूप में जीने वाले डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी अपनी कक्षाओं में विद्यार्थियों को जीवन सिखाते थे। वे छोटी-छोटी आनंददायक कहानियों के माध्यम से उच्च नैतिक मूल्यों को अपने जीवन में उतारने के लिए विद्यार्थियों को प्रेरित करते थे। विद्यार्थियों के साथ उनके मैत्रीपूर्ण संबंध रहते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि शिक्षक और विद्यार्थी के बीच कोई संकोच नहीं होगा तो सहजता के साथ अध्ययन-अध्यापन का कार्य हो सकता है। इसलिए शिक्षक को महज यह करना चाहिए कि विद्यार्थी को वह अधिक से अधिक जिज्ञासु बना दे। उसके अंतर्मन में सवाल पैदा होंगे तो उनके प्रश्न खोजने के लिए वह खुद आगे आएगा। उसकी जिज्ञासाओं का समाधान कहां और कैसे हो सकता है, यह मार्गदर्शन जरूर शिक्षक कर सकता है। यह एक लम्बी प्रक्रिया है। आज-कल या एक दिन में शिक्षक और विद्यार्थी के बीच यह सार्थक परंपरा विकसित नहीं हो सकती। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में यही खामी है। पश्चिम की परिभाषा के मुताबिक जो 'टीचर' है, प्रत्येक छह माह में बदल जाता है। एक सेमेस्टर में कोई पढ़ाता है तो दूसरे सेमेस्टर में कोई दूसरा 'टीचर'। ऐसे में विद्यार्थियों की नैसर्गिक प्रतिभा और दक्षता से शिक्षक ही परिचित नहीं हो पाता तो वह उन विद्यार्थियों को कैसे अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित कर सकता है। छात्रों से 'टीचर' का नाता सिर्फ 'क्लास रूम' तक सीमित है। कक्षा के बाहर उसे कोई मतलब नहीं कि उसका विद्यार्थी क्या कर रहा है? जबकि भारतीय अवधारणा के मुताबिक शिक्षक प्रत्येक मौके पर विद्यार्थी को प्रेरित करने का कार्य करता है। क्योंकि विद्यार्थियों की कामयाबी ही शिक्षक को समाज में अमर बनाती है, सम्मान का स्थान दिलाती है। इसलिए शिक्षक लगातार विद्यार्थी में आ रहे परिवर्तनों पर नजर रखता है। विद्यार्थी में अच्छे बदलाव आ रहे हैं तो उसे उस दिशा में आगे बढऩे के लिए प्रेरित किया जाता है और विद्यार्थी अनैतिक आचरण की ओर बढ़ रहा है तो उसे सही राह दिखाने की कोशिश शिक्षक करता है।
            भारतीय परंपरा में गुरु की महत्ता इसलिए भी अधिक है क्योंकि वह गुरु ही है जो अपने जीवनभर का अनुभव अपने शिष्य को दे देना चाहता है। जो कुछ उसने अपने जीवन में अर्जित किया, उसे विद्यार्थी के मन में बैठा देता चाहता है। गुरु हमें द्विज बनाता है, पुनर्जन्म देता है। आंखें खोलता है। अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करता है। हम क्या हैं? हमारे कर्तव्य क्या हैं? हमारे दायित्व क्या हैं? हमें कहां जाना है? यह सब तो शिक्षक ही बताता है। यदि शिक्षक यह न बताए तो व्यक्ति अंधेरी गुफा में भटकता रहेगा। इसलिए विद्यार्थियों को भी चाहिए कि वे अपना समूचा अहंकार त्याग कर शिक्षक के समक्ष उपस्थित हों। उपभोग की संस्कृति आज के युवाओं पर इतनी हावी है कि वे अपने संस्कार भूल गए हैं। मर्यादा भूल गए हैं। शिक्षक ही नहीं वरन अपने से बड़ों का सम्मान भूल गए हैं। उन्हें युवा जोश का अहंकार है। टेक्नोक्रेट होने का अहंकार है। आजादी का अहंकार है। उन्हें अपने अधिकारों का तो ज्ञान है लेकिन अपने कर्तव्यों का भान नहीं है। पश्चिम से आ रही आंधी से उनके होश उड़े हुए हैं। इस बे-होशी की हालत में वे अपने शिक्षकों का सम्मान ही नहीं कर पा रहे हैं। यही कारण है कि बदले हालातों में शिक्षक भी अपने आप को सीमित कर रहे हैं। वे भी 'क्लास रूम स्टडी' पर ही पूरा ध्यान दे रहे हैं। बाहर की दुनिया का ज्ञान देने का प्रयत्न करने से वे बच रहे हैं। जीवन सिखाने से वे बच रहे हैं। उन्हें डर है कि पता नहीं किस घड़ी छात्रों की कोई हरकत उन्हें अपमान सहने के लिए मजबूर कर दे। यही कारण है कि शिक्षा संस्थानों से डॉक्टर-इंजीनियर तो निकल रहे हैं लेकिन जिम्मेदार नागरिक नहीं निकल रहे। विद्यार्थियों, शिक्षकों और शिक्षा नीति निर्धारकों को अपनी भूमिका को ठीक से समझना होगा। महर्षि अरविन्द ने शिक्षक को राष्ट्र का वास्तविक निर्माता बताया है। इसलिए तमाम प्रतिकूल समय के बावजूद शिक्षक को तो अपने कर्म, अपनी भूमिका के साथ न्याय करना ही होगा। देश के निर्माण की बागडोर उसके हाथ में है। 

सोमवार, 13 जनवरी 2014

युवा नायक स्वामी

 म हज ३९ साल की आयु में दुनिया का दिल जीतकर चले जाना आसान नहीं होता। निश्चिततौर पर ऐसा कोई असाधारण व्यक्ति ही कर सकता है। असाधारण होना नायक होने का पहला और नैसर्गिक गुण है। नायक प्रभावशाली होता है, वह लोगों की भीड़ को अपनी बातों से सम्मोहित कर सकता है। नायक अपने तेज से लोगों को अपनी ओर खींच सकता है। वह नई राह बनाता है लोगों के चलने के लिए। उसके पास समस्याएं नहीं बल्कि उनके हल होते हैं। नायक विचारवान, तर्कशील और तत्काल निर्णय लेने में सक्षम होता है। वह साहस, उत्साह और ऊर्जा से लबरेज रहता है। नायक कुशलता से लोगों का नेतृत्व करता है। इसके साथ ही तमाम दूसरे गुण कथनी-करनी में ईमानदार, आकर्षक व्यक्तित्व, न्याय प्रियता, निरपेक्षता, निर्लिप्तता, त्याग, संयम, शुचिता, वीरता, ओज, क्षमाभाव, प्रेम, समन्वयीकरण, प्रबंधन, परोपकार, परहित चिंता, दृढ़ता और इच्छाशक्ति भी नायक को औरों से अलग करते हैं। 
       स्वामी विवेकानंद ने 39 वर्ष की अल्पायु में नायक के इन सब गुणों का प्रगटीकरण किया। अब विचार करने की बात है कि स्वामी विवेकानंद नायक किसके? स्वामी विवेकानंद यूं तो सबके नायक साबित होते हैं। उनको लेकर कहीं कोई भेद नहीं है। न जाति के आधार पर उन्हें किसी ने बांटा है, न विचारधारा के नाम पर। लिंग और आयुवर्ग के आधार पर भी वे किसी एक के नायक नहीं है। वे तो सबकी बात करते हैं। फिर भी स्वामी विवेकानंद युवाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। दरअसल, स्वामी विवेकानंद के चिंतन में सदैव युवा केन्द्रीय बिन्दु रहा। स्वामी जी कहते थे कि मेरी आशा युवाओं में, इनमें से ही मेरे कार्यकर्ता आएंगे। स्वामी भली-भांति जानते थे कि भारत और हिन्दू धर्म के उत्थान में ओजस्वी और बलशाली युवाओं की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। युवा यदि देश और धर्म से विमुख होगा तो स्थितियां बदतर हो जाएंगी। इसलिए स्वामी जी अकसर युवाओं का आव्हान करते थी कि उठो और अपनी जिम्मेदारी संभालो। जागो युवा साथियो, अपनी कमर कसकर खड़े हो जाओ। भारत मां की सेवा के लिए सामथ्र्य जुटाओ।  
       स्वामी विवेकानंद बेहद आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे। उनकी बातों में जादू था। तभी तो 11 सितंबर 1893 को शिकागो में उनका जादू सिर चढ़कर बोला था। महज कुछ पलों में अपनी बात रखने का मौका स्वामी विवेकानंद को मिला था। इन चंद पलों में ही भारत के विवेक ने अमेरिका और दुनियाभर से जमा लोगों की बीच आनंद की लहर पैदा कर दी। इसके बाद तो धर्मसभा के आयोजकों ने उनका बड़े रोचक तरीके से इस्तेमाल किया। जब किसी के भाषण से श्रोताओं का मन ऊबने लगता और वे जाने को होते तब बीच में मंच पर आकर आयोजक उद्घोषणा करते कि एक भाषण के बाद स्वामी विवेकानंद बोलेंगे, इतना सुनते ही भीड़ वहीं ठिठक जाती। यह जादू आज भी बरकरार है। रामकृष्ण मिशन और विवेकानंद केन्द्र सहित स्वामी जी के विचारों को लेकर काम कर रहे अलग-अलग संगठनों के मुताबिक आज भी स्वामीजी को पढऩे और समझने के लिए युवा लालायित रहते हैं। इन संगठनों से युवा बड़ी संख्या में जुड़कर काम भी कर रहे हैं। दरअसल, युवा स्वामी विवेकानंद को औरों की अपेक्षा अपने अधिक निकट पाते हैं। युवाओं के मन में स्वामीजी की युवा संन्यासी, देशभक्त युवक और क्रांतिकारी प्रणेता की छवि बसी हुई है। स्वामी विवेकानंद भी अकसर अपने भाषणों में आव्हान करते थे कि संसार को बस कुछ सौ साहसी युवतियों-युवकों की जरूरत है। स्वामी जी युवाओं में साहस भी असीम चाहते थे। समुद्र को पी जाने का साहस, समुद्र तल से मोती लेकर आने का साहस, मृत्यु का सामना कर सकने का साहस और पहाड़-सी चुनौतियों को स्वीकार कर सकने का साहस स्वामी जी युवाओं में चाहते थे। स्वामीजी हिन्दू संन्यासी होकर युवाओं से मंदिर में बैठकर माला जपने और देवता के आगे अगरबत्ती लगाने की बात नहीं कहते थे। वे हमेशा युवाओं के मन की बात करते थे, सिर्फ मन की नहीं असल में युवाओं के उत्थान की, राष्ट्र के विकास की और समाज के सुदृढि़करण की बात। उनका तो मानना था कि सबसे पहले हमारे तरुणों को मजबूत बनना चाहिए। धर्म इसके बाद की वस्तु है। युवा शक्तिशाली होगा, नशे-व्यसन से दूर होगा और कर्मशील होगा तो बाकी सब समस्याओं को दूर भगाना आसान होगा। स्वामी जी युवाओं को संबोधित करते हैं - 'मेरे मित्रो, शक्तिशाली बनो, मेरी तुम्हें यही सलाह है। तुम गीता के अध्याय की अपेक्षा फुटबाल के द्वारा ही स्वर्ग के अधिक समीप पहुंच सकोगे। ये कड़े शब्द हैं लेकिन मैं उन्हें कहना चाहता हूं क्योंकि मैं तुम्हें प्यार करता हूं। तुम्हारे स्नायु और मांसपेशियां अधिक मजबूत होने पर तुम गीता अधिक अच्छी तरह समझ सकोगे। इसलिए जाओ मैदान में फुटबाल खेलो।' 
      अपनी ओजस्वी वाणी और तर्क के आधार पर विश्व में भारत की आध्यात्मिक परंपरा का डंका बजाने वाले स्वामी विवेकानंद तरुणों में ही लोकप्रिय नहीं है, वे युवतियों के भी हीरो हैं। इस युवा संन्यासी ने भारत की स्त्री शक्ति की भी चिंता की। उनकी महत्ता प्रतिपादित की। स्त्रियों को उनका अस्तित्व याद दिलाया। फलत: अमेरिका सहित यूरोप की कई स्त्रियां उनकी अनुयायी बन गईं। स्वामीजी के मार्ग पर चल निकलीं। स्त्रियों के साथ उस समय हो रहे दोयम दर्जे के व्यवहार पर विवेकानंद ने रोष प्रकट किया और पुरुष सत्ता को संभलने की चेतावनी दी। स्वामीजी कहते थे कि स्त्रियों की स्थिति में सुधार हुए बिना संसार के कल्याण की कोई संभावना नहीं है। एक पक्षी का केवल एक पंख के सहारे उड़ पाना संभव नहीं है। यहां स्पष्ट कर देना होगा कि स्वामीजी भारत में स्त्रियों की स्थिति को लेकर ही चिंतित नहीं थे वरन् उनकी चिंता दुनियाभर में स्त्रियों के साथ हो रहे अन्याय को लेकर थी। स्वामीजी सीधे स्त्रियों से भी अपेक्षा करते थे कि वे अपने काम स्वयं करें, पुरुषों के भरोसे रहे ही नहीं। उनका स्पष्ट मत था कि स्त्रियों में अवश्य ही यह क्षमता होनी चाहिए कि वे अपनी समस्याएं अपने ढंग से हल कर सकें। उनका यह कार्य न कोई दूसरा कर सकता है और न ही दूसरे को करना चाहिए। स्त्रियों को शिक्षित करने की दिशा में भी स्वामी जी की चिंता स्पष्ट दिखती है। वे जानते थे कि स्त्री शिक्षा के मायने क्या हैं। परिवार और समाज निर्माण की बुनियाद स्त्रियों के हाथ में पुरुषों की अपेक्षा कुछ अधिक रहती है। स्पष्ट है ऐसे में घर में मां और बहन का पढ़ा-लिखा होना कितना जरूरी है। स्वामी विवेकानंद ने अपनी प्रिय शिष्या भगिनी निवेदिता (मार्गरेट नोबल) को भारत में नए सिरे से नारी शिक्षा की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया। स्वामी विवेकानंद की प्रेरणा से ही भगिनी निवेदिता ने सारदा बालिका विद्यालय की स्थापना की। साथ ही देशभर में नारी शिक्षा को मजबूत करने के लिए आंदोलन भी चलाया। 
       साहस, उत्साह और ऊर्जा के पुंज स्वामी विवेकानंद के क्रांतिकारी विचार उनके समय से अब तक युवाओं को आत्मविश्वास से भर देते हैं। विवेकानंद का नाम मस्तिष्क में आते ही हृदय स्फूर्ति और उत्साह से भर जाता है। स्वामीजी के ओजस्वी विचार आज भी युवाओं को प्रेरणा देते हैं। 'उठो जागो और तब तक न रुको जब तक मंजिल न प्राप्त हो जाए' स्वामी विवेकानंद का यह वाक्य आज भी दुनियाभर के युवाओं का मार्गदर्शन करने का काम करता है। विद्यार्थी जीवन में तो अधिकतर युवा इस वाक्य को सदैव अपने अध्ययन की मेज के सामने लिखकर ही रखते हैं। युवाओं को स्वामी विवेकानंद अपने नायक तो दिखते ही हैं, मित्र की तरह भी महसूस होते हैं। युवाओं में स्वामी विवेकानंद की लोकप्रियता का कारण है कि उनकी जयंती को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। हालांकि यह भी सच है कि वर्तमान युवा पीढ़ी उन्हें आदर्श जरूर मानती है लेकिन उनके विचारों और सिद्धांतों का पालन करने में बहुत पीछे है। जरूरत इस बात की है युवा आगे आएं और अपने नायक को अपने जीवन में उतारें। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि भारत को फिर से विश्वगुरु कोई बना सकता है तो वह है भारत की युवाशक्ति। स्वामी विवेकानंद के स्वप्न को साकार करने की महती जिम्मेदारी भारत की युवा पीढ़ी पर है, वे ऐसा कर सकते हैं, बस उन्हें जरूरत है अपने हीरो विवेकानंद के बताए मार्ग पर आगे बढऩे की। भारत की युवा शक्ति को जागृत करने और नई सोच देने के लिए विवेकानंद बहुत कुछ कह गए हैं। आज के युवा उसे पढ़ें, समझें और तब तक नहीं रुकें, जब तक स्वामी जी के स्वप्न साकार नहीं हो जाएं।