शनिवार, 23 सितंबर 2023

आरएसएस के विचार से परिचित कराती ‘संघ दर्शन : अपने मन की अनुभूति’


- डॉ. मयंक चतुर्वेदी

लेखक लोकेन्‍द्र सिंह की पुस्‍तक ‘संघ दर्शन : अपने मन की अनुभूति’ को आप राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ को समझने का एक आवश्‍यक और सरल दस्तावेज़ समझ सकते हैं। वैसे तो संघ के कार्य और उसे समझने के लिए आपको अनेक पुस्‍तकें बाजार में मिल जाएंगी किंतु लोकेन्‍द्र सिंह के लेखन की जो विशेषता विषय के सरलीकरण की है, वह हर उस पाठक के मन को संतुष्टि प्रदान करने का कार्य करती है, जिसे किसी भी विषय को सरल और सीधे-सीधे समझने की आदत है। लोकेन्‍द्र सिंह की पुस्‍तक पढ़ते समय आपको हिन्‍दी साहित्य के बड़े विद्वान आचार्य रामचंद्र शुक्ल की लिखी यह बात अवश्‍य याद आएगी- “लेखक अपने मन की प्रवृत्ति के अनुसार स्वच्छंद गति से इधर-उधर फूटी हुई सूत्र शाखाओं पर विचरता चलता है। यही उसकी अर्थ सम्बन्धी व्यक्तिगत विशेषता है। अर्थ-संबंध-सूत्रों की टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएँ ही भिन्न-भिन्न लेखकों के दृष्टि-पथ को निर्दिष्ट करती हैं। एक ही बात को लेकर किसी का मन किसी सम्बन्ध-सूत्र पर दौड़ता है, किसी का किसी पर। इसी का नाम है एक ही बात को भिन्न दृष्टियों से देखना। व्यक्तिगत विशेषता का मूल आधार यही है”। इसी तरह से  ‘हिन्दी साहित्य कोश’ कहता है कि “लेखक बिना किसी संकोच के अपने पाठकों को अपने जीवन-अनुभव सुनाता है और उन्हें आत्मीयता के साथ उनमें भाग लेने के लिए आमंत्रित करता है। उसकी यह घनिष्ठता जितनी सच्ची और सघन होगी, उसका लेखन पाठकों पर उतना ही सीधा और तीव्र असर करेगा”। वस्‍तुत: इन दो अर्थों की कसौटी पर बात यहां लोकेन्‍द्र सिंह के लेखन को लेकर की जाए तो उनकी यह पुस्‍तक पूरी तरह से अपने साथ न्‍याय करती हुई देखाई देती है। संघ पर लिखी अब तक की अनेक किताबों के बीच यह पुस्‍तक आपको अनेक भाव-विचारों के बीच गोते लगाते हुए इस तरह से संघ समझा देती है कि आप पूरी पुस्‍तक पढ़ जाते हैं और लगता है कि अभी तो बहुत थोड़ा ही हमने पढ़ा है। काश, लोकेन्‍द्र सिंह ने आगे भी इसका विस्‍तार किया होता!

संघ के वरिष्ठ प्रचारक एवं प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक श्री जे. नन्द कुमार ने पुस्तक की समीक्षा लिखी है। प्रस्तावना के अंत में जब वे लिखते हैं कि मेरा विश्वास है कि यह पुस्तक संघ के दृष्टिकोण, विचारों और संघ दर्शन समझने में सभी सुधीजन पाठकों के लिए सहायक सिद्ध होगी, तो उनके यह लिखे शब्‍द अक्षरशः सत्‍य ही हैं। ‘संघ दर्शन : अपने मन की अनुभूति’, वस्तुत: सभी राष्ट्रीय विचार रखनेवालों के मन की अनुभूति है। लेखक लोकेन्द्र सिंह ने ‘राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ’ को इतनी सरलता से समझाया है कि आप अनेक प्रकार के भ्रमों के बीच भी संघ की वास्तविक प्रतिमा के दर्शन कर सकते हैं। लोगों के मन में अनेक प्रश्‍न उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं कि संघ आखिर है क्‍या? ऐसा क्‍या है इसमें कि अनेक लोग अपना जीवन समर्पित करके ‘मन मस्त फकीरी धारी है, अब एक ही धुन जय जय भारत’ के गान में लगे हैं अथवा ‘संघ किरण घर-घर देने को अगणित नंदादीप जले, मौन तपस्वी साधक बन कर हिमगिरि सा चुपचाप गले’, का भाव धर अनेक कार्यकर्ता अपने जीवन का उत्‍सर्ग करने में दिन-रात लगे हुए हैं। इस तरह के अनेक प्रश्‍नों के उत्तर आपको इस पुस्तक में मिलते हैं। संघ को लेकर उठते अनेक प्रकार के अन्य प्रश्नों के उत्तर भी इस पुस्तक में हैं।

संघ स्थापना को आज से दो वर्ष बाद 100 वर्ष पूरे हो जाएंगे। संघकार्य के लिए जीवन अर्पण करने वाले ऋषितुल्य प्रचारक हों या गृहस्थ जीवन की साधना के साथ संघमार्ग पर बने रहने की तपस्या करने वाले स्वयंसेवक, वास्‍वत में यह उनकी सतत तपश्‍चर्या का ही परिणाम है जो आज समाज जीवन में, प्रत्‍येक दिशा में संघ विचार और प्रेरणा से भरे कार्यकर्ता, प्रकल्प और संस्थाएं दिखाई देती  हैं। वस्‍तुत: लेखक लोकेन्‍द्र सिंह की पुस्‍तक उन तमाम सेवा के संघनिष्‍ठ संगठनों और प्रकल्‍पों से परिचित कराती है, जो आज राष्‍ट्र जीवन को एक नई और श्रेष्‍ठ दिशा देने का कार्य तो कर ही रहे हैं साथ ही भविष्‍य के उस भारत के प्रति आश्‍वस्‍ती देते हैं जोकि विश्‍व का सिरमौर होगा।

पुस्‍तक यह भी स्‍पष्‍ट करती जाती है कि ऐसा कोई भी सकारात्मक कार्य नहीं है जिसे स्वयंसेवक पूर्णता प्रदान नहीं कर सकते या नहीं कर रहे हैं। इसके साथ ही यह पुस्‍तक बतलाती है कि कैसे हम ‘स्वत्व’ से दूर रहे और ‘स्व’ पर ‘तंत्र’ हावी होता चला गया। स्वामी विवेकानंद, दयानंद सरस्वती से लेकर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार तक ने स्वत्व के जागरण के लिए काम किया। जब-जब, जहां पर भी सत्व के जागरण के लिए कार्य होगा, इसके अंतर्गत आप कोई भी परिवर्तन कीजिए वह समाज का भला ही करेगा। कुल निष्‍कर्ष रूप में भारत का उत्‍थान ‘स्‍व’ के जागरण में ही निहित है।

यहाँ प्रमाण सहित यह भी बताया गया है कि संघ की महत्ता दर्शन और विचार को केवल राष्ट्रप्रेमी ही नहीं अपितु कांग्रेस जैसे विरोधी और विपक्षी भी स्वीकारते दिखते हैं। जिसका बड़ा उदाहरण स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री का युद्ध के समय संघ से सहायता मांगना है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जैसे अनेक श्रेष्‍ठजन हैं जिन्‍होंने संघ के महत्व को समझा और यह प्रक्रिया सतत प्रवाहमान है।  देश की स्वतंत्रता से लेकर वर्तमान समय तक के अनेक प्रश्‍नों के समाधान यह छोटी सी दिखनेवाली पुस्‍तक करने में सक्षम है। जो लोग भूलवश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को राजनीतिक से जोड़ देते हैं, पुस्‍तक उनकी जिज्ञासाओं का भी समाधान कर देती है।

संघ मानता है कि भारत उन सभी का है, जिनका यहां जन्म हुआ और यहां रहते हैं, फिर चाहे वे किसी भी मत पंथ या संप्रदाय के हों। भारत के राजनीतिक भविष्य के संदर्भ में संघ अनुभव करता है कि यहां बहुत से राजनीतिक दल होंगे, किंतु वे सब प्राचीन भारतीय परंपरा एवं श्रद्धालुओं का सम्मान करेंगे। आधारभूत मूल्य तथा हिन्दू सांस्कृतिक परंपराओं के संबंध में एकमत होंगे, मतभेद तो होंगे लेकिन ये केवल देश के विकास के प्रारूपों के संदर्भ में ही होंगे। संघ को समझने और संघ की दृष्टि में हिंदुत्व की संकल्पना को सरल और अल्प शब्दों में समझाने का उदार प्रयास इस पुस्‍तक के माध्‍यम से हुआ है। कह सकते हैं कि लेखक लोकेन्द्र सिंह ने संघ के विचारों का सामयिक विश्लेषण इसमें किया है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि यह पुस्तक, जो संघ से परिचित हैं उनकी समझ को और अच्छा बनाने का सामर्थ्‍य रखती है। जो अपरिचित हैं, उन्हें संघ से परिचित कराती है। जो संघ विरोधी हैं, उनके विरोध के कारणों का समाधान एवं उनके लिए स्‍पष्‍ट उत्‍तर प्रस्‍तुत करती है। यह ठीक ढंग से समझा देती है कि अपनी मिथ्या धारणाओं से मुक्त होकर इस राष्ट्रीय विचार के संगठन को समझने का प्रयास करें। पुस्‍तक अर्चना प्रकाशन, भोपाल से प्रकाशित है। कुल कीमत 160 रुपए रखी गई है।

समीक्षक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

पुस्तक : संघ दर्शन : अपने मन की अनुभूति

लेखक : लोकेन्द्र सिंह

मूल्य : 160 रुपये (पेपरबैक) और 250 रुपये (साजिल्द)

पृष्ठ : 156

प्रकाशक : अर्चना प्रकाशन, भोपाल

पुस्तक खरीदने के लिए संपर्क करें : 0755-4236865


रविवार, 17 सितंबर 2023

तमाशबीन नहीं, हमें है जागृत समाज की आवश्यकता


देश के विभिन्न हिस्सों से सामने आनेवाली कुछ घटनाओं को लेकर सामाजिक एवं राजनीतिक नेतृत्व को चिंतित होना चाहिए। ये घटनाएं सामान्य नहीं हैं, इनमें गंभीर आशंकाएं छिपी हैं। इन स्थितियों को बदले बिना हम अपने देश को आगे नहीं ले जा सकेंगे। दिल्ली में साहिल नाम का लड़का नृशंसता से 16 वर्ष की नाबालिग लड़की की हत्या कर देता है। इस घटना ने देश का झकझोर दिया था। इस घटना का विश्लेषण करते समय केवल हत्या करने के वहसी तौर-तरीके तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि इस घटना का सबसे डरावना पक्ष यह है कि साहिल जब किशोरी पर चाकुओं से वार कर रहा था, उसके सिर को पत्थर से कुचल रहा था तब इस सबसे वहाँ खड़े लोगों पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। लोग बहुत ही सहजता से यह सब होते हुए न केवल देख रहे थे, बल्कि वहाँ से ऐसे गुजर रहे थे कि जैसे सबकुछ सामान्य है। इसे समाज की संवेदनहीनता कहें या कायरता।  

दिल्ली की यह अकेली घटना नहीं है, इससे पहले भी इस प्रकार की अनेक घटनाएं सामने आ चुकी हैं। उत्तरी दिल्ली के सब्जी मंडी रेलवे स्टेशन में 20 साल के युवक की सरेआम तीन लोगों ने पीट-पीट कर हत्या कर दी थी। पुलिस ने बताया कि जिस समय युवक को पीटा जा रहा था, तब स्टेशन पर मौजूद किसी व्यक्ति ने उसे बचाने का प्रयास नहीं किया। मध्यप्रदेश के शिवपुरी का भी ऐसा ही एक मामला सामने आया है। अजमत खान, वकील खान, आरिफ, शाहिद, इस्लाम खान, रहीशा बानो, साइना बानो ने अनुसूचित जाति के दो युवकों को सरेराह बेरहमी से पीटा और गले में जूतों की माला डालकर गांव में घुमाया। आरोपियों पर युवकों को गंदगी खिलाने का भी आरोप है। जब वे युवकों के साथ यह अमानवीय व्यवहार कर रहे थे, तब कई लोग यह देख रहे थे। किसी ने यह पूछा भी कि इन्हें इस तरह क्यों पीट रहे हो, तब वह इतने उत्तर से संतुष्ट होकर चला गया कि दोनों युवक आरोपियों के परिवार की किसी लड़की को छेड़ रहे थे। राजस्थान के टोंक जिले से भी मानवता को शर्मसार करनेवाला और हमारे समाज की नपुंसकता को दिखानेवाला मामला सामने आया, जिसमें जयपुर-कोटा राजमार्ग पर एक युवक की मामूली विवाद को लेकर लातों-घूसों से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। इस दौरान आसपास के लोग तमाशबीन बनकर यह घटना देखते रहे। लेकिन किसी ने भी उस युवक को बचाने की कोशिश नहीं की। ये घटनाएं प्रतीक मात्र हैं। इन्हें दिल्ली, राजस्थान और मध्यप्रदेश तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए बल्कि इस प्रकार की घटनाएं केरल, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र में भी हुई हैं। जैसे ‘द केरल स्टोरी’ में दिखायी गई लव जेहाद की वास्तविक कहानियां केवल तीन नहीं है और न ही ये केरल तक सीमित हैं। समाचारपत्र उठाकर देख लीजिए, देश के किसी न किसी प्रदेश में लव जेहाद की नित्य कोई घटना आपको मिल जाएगी। चूँकि समाज इसका प्रतिकार नहीं कर रहा। वह मूक होकर यह सब होते हुए देख रहा है, इसलिए यह कैंसर की तरह फैल रहा है। भले ही आज तमाशबीनों के घर में आग नहीं लगी है, लेकिन यही हालात रहे तो वह दिन दूर नहीं होगा, जब इस आग में वे भी जल रहे होंगे। सहायता के लिए पुकारेंगे लेकिन कोई आगे नहीं आएगा। उन अंतिम क्षणों में उन्हें याद आएगा कि वे भी कभी किसी को मरते हुए देख रहे थे, कुछ बोले नहीं थे, प्रतिकार नहीं किया था, साहस नहीं दिखाया था। 

स्मरण रखें कि अपराध को इस तरह चुपचाप देखते रहने की यह जो स्थिति है, वह जीवंत समाज का लक्षण नहीं है। ऐसे समाज के साथ देश कैसे आगे बढ़ेगा? एक कुशल और दूरदृष्टा नेतृत्व के साथ ही किसी भी राष्ट्र की नियति उसका समाज तय करता है। समाज जैसा होगा, वैसा ही वह देश भी बनेगा। जब-जब हमारा समाज कमजोर हुआ है, देश अंधकार में गया है। इसलिए हमें इतिहास में दिखायी पड़ता है कि बड़े परिवर्तन की ओर कदम बढ़ाने से पहले हमारे पुरुखों ने सुप्त समाज को जगाने का काम किया। मुगलिया सल्तनत के अत्याचार को समाप्त करने के लिए महाराणा प्रताप से लेकर छत्रपति शिवाजी महाराज तक ने समाज को लड़ना सिखाया। स्वतंत्रता का आंदोलन चलाने से पहले महात्मा गांधी ने देश का भ्रमण करके समाज की नब्ज को समझा और उसे ब्रिटिश शासन व्यवस्था के दोषों के प्रति जागरूक किया। अंग्रेजों से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद यह देश फिर से किसी बाह्य आक्रमण का शिकार न बन जाए, इसलिए क्रांतिकारी राजनेता डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने इस देश के हिन्दू समाज के मन में आत्मविश्वास जगाने एवं उसे एकजुट करने का काम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रूप में प्रारंभ किया। संघ का ध्येय ही है कि स्थायी परिवर्तन समाज को बदले बिना नहीं आ सकता। इसलिए आज भी हमें यह तमाशबीन समाज नहीं चाहिए, हमें चाहिए जागृत समाज, जो अन्याय और अत्याचार को होते हुए देखकर चुप न रहें बल्कि उसका प्रतिकार करें। चूँकि यह हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना का 350वां वर्ष है इसलिए हमें स्वाभाविक रूप से इतिहास के पन्ने पलटकर देखना चाहिए कि आत्मविस्मृत समाज की कमोबेश ऐसी ही स्थिति उस समय भी थी। आदिलशाही, निजामशाही, कुतुबशाही और औरंगजेब की मुगलिया सल्तनत में मनसबदारों एवं इस्लामिक फौज के अत्याचारों को लोग चुपचाप सहते और देखते रहते। समाज को इस दैन्य भाव से निकालने का काम छत्रपति शिवाजी महाराज ने किया। उन्होंने समाज को जागरूक किया और अत्याचार के विरुद्ध लड़ना सिखाया। उसका परिणाम यह हुआ कि मुगलिया छाप अत्याचारों में एकदम से कमी आ गई। जो लोग अपने को असुरक्षित महसूस करते थे, उन्होंने हिन्दवी स्वराज्य में सुकून की सांस लेना शुरू कर दिया। वे निर्भर हो गए क्योंकि समाज एकजुट और सजग हो गया। वह तमाशबीन नहीं रहा, वह साहस करके अत्याचारी के सामने सीना तानकर खड़ा हो गया। समाज के मन में यह विश्वास पैदा करना होगा कि जितने भी अत्याचारी होते हैं, वे डरपोक भी होते हैं। जब उन्हें समाज में एकजुटता दिखायी देती है, तो उनकी हिम्मत जवाब दे जाती है। 

वर्तमान परिस्थितियों में समाज का राजनीतिक एवं सामाजिक नेतृत्व करनेवाली सज्जनशक्ति को गंभीरता से विचार करना होगा कि इस तमाशबीन समाज को कैसे जागरूक समाज में बदला जाए। कैसे इस भीरुता को मिटाकर, साहस का संचार किया जाए। 

मुंबई से प्रकाशित मासिक पत्रिका 'हिन्दी विवेक' के अगस्त-2023 के अंक में प्रकाशित



गुरुवार, 14 सितंबर 2023

हिन्दी की दुनिया में सबका स्वागत


विश्व में करीब तीन हजार भाषाएं हैं। इनमें से हिन्दी ऐसी भाषा है, जिसे मातृभाषा के रूप में बोलने वाले दुनिया में दूसरे स्थान पर हैं। मातृभाषा की दृष्टि से पहले स्थान पर चीनी है। बहुभाषी भारत के हिन्दी भाषी राज्यों की जनसंख्या 46 करोड़ से अधिक है। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की 1.2 अरब जनसंख्या में से 41.03 प्रतिशत की मातृभाषा हिन्दी है। हिन्दी को दूसरी भाषा के तौर पर उपयोग करने वाले अन्य भारतीयों को मिला लिया जाए तो देश के लगभग 75 प्रतिशत लोग हिन्दी बोल सकते हैं। भारत के इन 75 प्रतिशत हिन्दी भाषियों सहित पूरी दुनिया में लगभग 80 करोड़ लोग ऐसे हैं जो इसे बोल या समझ सकते हैं। भारत के अलावा हिन्दी को नेपाल, मॉरिशस, फिजी, सूरीनाम, यूगांडा, दक्षिण अफ्रीका, कैरिबियन देशों, ट्रिनिदाद एवं टोबेगो और कनाडा आदि में बोलने वालों की अच्छी खासी संख्या है। इसके अलावा इंग्लैंड, अमेरिका, मध्य एशिया में भी इसे बोलने और समझने वाले लोग बड़ी संख्या में हैं।