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गुरुवार, 9 जुलाई 2026

एआई एक सहयोग टूल है, हमारा विकल्प या निर्णयकर्ता नहीं

डेटाबेस और एल्गोरिदम पर आधारित एआई, कभी भावनाओं, संवेदनाओं, अनुभवजन्य बुद्धि वाले मनुष्य से होशियार नहीं हो सकता


आज के तकनीकी युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) को हर समस्या के जादुई समाधान के रूप में दिखाया जा रहा है। इस बात में कोई शक नहीं है कि एआई आने वाले समय में बड़े परिवर्तन का कारण बनने वाला है। लेकिन यह परिवर्तन मानव समाज के हित में होगा या उसके विरुद्ध, यह सब हमें ही तय करना है। अगर हमने सचेत होकर एआई का विकास और उपयोग नहीं किया, तब हमारे सामने अनेक प्रकार की चुनौतियां खड़ी हो जाएंगी। एक ओर, एआई ने चिकित्सा, विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी में क्रांतिकारी बदलाव की नींव रखी है, वहीं दूसरी ओर इसने कई नयी और गंभीर चिंताओं को भी जन्म दिया है। एक बड़ी विडम्बना तो यही है कि जिस मनुष्य ने एआई को जन्म दिया है, वही उसे स्वयं से ऊपर समझने की भूल कर बैठता है। हमें हमेशा याद रखना होगा कि एआई हमारा सहयोगी है, हमारा विकल्प नहीं। अगर हम उसे अपना खुदा बनाएंगे, तब समस्याएं उत्पन्न होना स्वाभाविक है। याद रहे कि किसी भी एआई मॉडल की क्षमताओं का आधार डेटा और एल्गोरिदम ही है। इसलिए उसका दायरा सीमित है, वह पूर्ण नहीं है। जो डेटा उपलब्ध है, उसी के आधार पर वह प्रश्न का उत्तर देता है, इसलिए एआई के सुझाए समाधान या जानकारी कई बार व्यावहारिक नहीं होती है, उसमें पूर्वाग्रह भी दिखायी देता है। इसलिए एआई का अंधानुकरण करने से हमें बचना चाहिए और पूरी तरह उस पर निर्भर भी नहीं होना चाहिए।

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

संघ की वैचारिक यात्रा का ऐतिहासिक दस्तावेज ‘आरएसएस @100’

जनसंचार के सरोकारों को समर्पित पत्रिका 'मीडिया विमर्श' का संघ शताब्दी वर्ष विशेषांक 

- पुरु शर्मा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्ष की यात्रा पूरी होने पर देशभर में संघ की विचारधारा, उसकी उपलब्धियों एवं योगदान को लेकर चर्चा है। ऐसे में ‘मीडिया विमर्श’ का विशेषांक ‘आरएसएस@100’ का आना महत्वपूर्ण है। मीडिया विमर्श का यह विशेषांक संघ से संबंधित सामयिक एवं चर्चित विषयों पर प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध कराता है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक एवं लेखक डॉ. लोकेन्द्र सिंह इसके अतिथि संपादक हैं। संघ विषयों पर वे निरंतर लिखते हैं। संघ पर केंद्रित उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें- संघ दर्शन : अपने मन की अनुभूति और राष्ट्रध्वज एवं आरएसएस भी उल्लेखनीय हैं। डॉ. सिंह के कुशल संपादन में तैयार मीडिया विमर्श का विशेषांक संघ की एक सदी की यात्रा को केवल एक संगठन के इतिहास के रूप में नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण की गाथा के रूप में प्रस्तुत करता है। यह विशेषांक उन सबके लिए उपयोगी है, जो संघ को जानना-समझना चाहते हैं। कहना होगा कि यह एक संदर्भ ग्रंथ की भाँति है।

शनिवार, 8 नवंबर 2025

रील्स और शॉर्ट्स से बनाएं दूरी, पुस्तकों से करें दोस्ती

रील खा रही आपका कीमती समय, 
पुस्तकों की ओर लौटने का है समय

Gemini AI द्वारा निर्मित छवि

रील्स और शॉर्ट वीडियो अब सामाजिक विमर्श का हिस्सा हो गए हैं। समाज का प्रबुद्ध वर्ग लघु वीडियो के बढ़ते उपभोग और उसके प्रभावों को लेकर चिंतित है। यह चिंता स्वभाविक भी है। जिनका बचपन और किशोरवय कहानी-कविताओं की किताबों के पन्ने पलटाते हुए बीता हो, वे जब देखते हैं कि नयी पीढ़ी की अंगुलियां किताब के पन्नों पर नहीं अपितु मोबाइल पर 10-15 सेकंड के वीडियो को स्क्रॉल करने में व्यस्त हैं, तब उनके मन में प्रश्नों की झड़ी लग जाती है। लोगों का इस तरह किताबों से दूर होना अच्छी बात नहीं है। हमारे बुजुर्ग कहते थे कि जीवन में सबसे अच्छी दोस्त पुस्तकें होती हैं। उनका ऐसा कहने के पीछे बहुत से कारण थे। किताबें वास्तविक ज्ञान की स्रोत होने के साथ ही स्वस्थ मनोरंजन का साधन भी हैं। जब हम कहानियां या अन्य पाठ्य सामग्री पढ़ते हैं तब हमारा मस्तिष्क अधिक क्रियाशील होता है। पुस्तकें हमारी कल्पनाशीलता को बढ़ाती हैं। हमारी जिज्ञासा को जगाती हैं। एक पुस्तक या लेख पढ़ते समय हमारा मस्तिष्क पढ़ी गई सामग्री का विश्लेषण करता है और उसे मौजूदा ज्ञान से जोड़ता है। जबकि रील्स हमें सूचना को ‘उपभोग’ करने के लिए प्रेरित करती हैं, न कि ‘चिंतन’ करने के लिए। इससे हमारी अंतर्दृष्टि और गहन अनुभूति की क्षमता क्षीण होती जाती है। यह सच स्वीकार करना चाहिए कि 10-15 सेंकड के वीडियो हमें किसी भी विषय पर पर्याप्त जानकारी नहीं दे पाते। हमें सटीक और यथार्थ जानकारी चाहिए तब रील्स की आदत को छोड़कर पुन: किताबों से दोस्ती करनी होगी। हमें किताबों की गरिमा को वापस स्थापित करना होगा, क्योंकि किताबें हमें दुनिया को देखने के लिए आँखें नहीं, बल्कि उसे समझने के लिए विवेक और हृदय देती हैं। हमारे बुजुर्गों की कहावत आज भी प्रासंगिक है कि “पुस्तकें हमारी सबसे अच्छी मित्र होती हैं”।

रविवार, 31 अगस्त 2025

विज्ञापन क्षेत्र का ‘अ से ज्ञ’ सिखाती है- विज्ञापन का जादू

पुस्तक चर्चा : मीडिया शिक्षक डॉ. आशीष द्विवेदी की पुस्तक-विज्ञापन का जादू


मीडिया शिक्षक डॉ. आशीष द्विवेदी अपनी पुस्तक ‘विज्ञापन का जादू’ में लिखते हैं- “विज्ञापन की दुनिया बड़ी अनूठी और अजीब है। यदि हम इसको समझना चाहते हैं तो शुरुआती दौर से ही उसके अंदर झांकना होगा। जब तक हमारी विज्ञापन को लेकर सारी अवधारणाएं स्पष्ट नहीं हो जातीं, हम विषय की खोह में नहीं जा सकते”। यह सही बात है कि विज्ञापन की अवधारणा को समझना है, तब उसकी दुनिया के हर हिस्से से परिचित होना जरूरी है। डॉ. आशीष द्विवेदी ने अपनी पुस्तक ‘विज्ञापन का जादू’ में यही काम किया है। वे हमें विज्ञापन की दुनिया के अंदर ले जाते हैं और वहाँ की उन गलियों की सैर कराते हैं, जहाँ विज्ञापन कब, कहाँ, क्यों, कैसे और किसलिए की इबारत दर्ज है। विज्ञापन के संसार का संपूर्ण अक्षर ज्ञान ‘अ से ज्ञ’ इस पुस्तक में है। यह हमें विज्ञापन के इतिहास, उसके वर्तमान एवं भविष्य से भी परिचित कराती है। इसके साथ ही विज्ञापन के प्रकार एवं स्वरूप की जानकारी भी देती है। विज्ञापन में रुचि रखनेवाले और पत्रकारिता की पढ़ाई करनेवाले विद्यार्थियों के लिए यह अत्यंत उपयोगी पुस्तक है। भाषा में सरलता और सहजता है। एक रोचक विषय को रोचक ढंग से ही प्रस्तुत किया गया है। विज्ञापन के प्रभाव, उपयोग एवं महत्व को समझाने के लिए लोकप्रिय विज्ञापनों का विश्लेषण किया गया है।

शनिवार, 15 फ़रवरी 2025

पाश्चात्य मीडिया के भारत विरोध नैरेटिव को उजागर करने वाले पत्रकार

 भारतीय पक्ष का पहरुआ पत्रकार : उमेश उपाध्याय

छवि निर्माण में मीडिया की प्रभावी भूमिका होती है। इसलिए मीडिया का कार्य बहुत जिम्मेदारी और जवाबदेही का है। मीडिया से अपेक्षा की जाती है कि वह पत्रकारिता के सिद्धांतों एवं मूल्यों का पालन करते हुए समाचारों एवं अन्य सामग्री का प्रसार करे। समाचारों के निर्माण, प्रकाशन एवं प्रसारण में निष्पक्षता, संतुलन एवं सत्यता जैसी बुनियादी बातों का पालन करे। परंतु ध्यान आता है कि मीडिया का एक हिस्सा अपने निहित एजेंडा को लेकर कार्य करता है। भारत में ही नहीं अपितु विदेश में भी मीडिया का एक वर्ग ऐसा है, जो भारत के प्रति दुराग्रहों से भरा हुआ है। विदेशी मीडिया में भारत विरोधी नैरेटिव पर वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय बारीक नजर रखते थे। उन्होंने अपने विश्लेषणों से सिद्ध किया कि भारत के संदर्भ में रिपोर्टिंग करते समय विदेशी मीडिया की कलम तंगदिली से चलती है। भारत के ऐसे पत्रकारों को विदेशी मीडिया खूब स्थान देती है, जो भारत की छवि को बिगाड़ने के लिए वास्तविक तथ्यों की अनदेखी करके लेखन करते हैं। इसी वर्ष (2024) उनकी पुस्तक ‘वेस्टर्न मीडिया नैरेटिव ऑन इंडिया: फ्रॉम गांधी टू मोदी’ प्रकाशित होकर आई थी, जिसने पत्रकारिता एवं अकादमिक जगत में सबका ध्यान आकर्षित किया। अगस्त, 2024 में जब भोपाल में उनसे भेंट हुई, तब मैंने आग्रह किया कि यह पुस्तक हिन्दी पाठकों के लिए भी अनुवादित होकर आनी चाहिए। हिन्दी दुनिया के पाठकों को भी विदेशी मीडिया की संकीर्ण मानसिकता के बारे में जानकारी होनी चाहिए। मीडिया को परिभाषित करते हुए पाश्चात्य विद्वानों ने इसे ‘वॉचडॉग’ कहा है। उमेश जी के विश्लेषण पढ़ने के बाद ध्यान आता है कि इस ‘वॉचडॉग’ की निगरानी भी आवश्यक है। अन्यथा यह किसी के प्रभाव में बहककर निर्दोष को अपना शिकार बना सकता है। पुस्तक लिखने से पूर्व भी उमेश जी भारत के संदर्भ में पाश्चात्य मीडिया के पक्षपाती दृष्टिकोण को अपने लेखों एवं व्याख्यानों के माध्यम से लगातार उजागर करते रहे हैं।

रविवार, 5 जनवरी 2025

अखिल विश्व के प्रेरणास्रोत राम

देखें यह वीडियो- इंडोनेशिया से लेकर कंबोडिया तक और थाईलैंड से तुर्किस्तान तक ‘सिय राम मय सब जग जानी’


मानव देह में भगवान श्रीराम ने जिन शाश्वत जीवन मूल्यों की स्थापना की, वे सार्वभौमिक, सर्वकालिक एवं सार्वदेशिक हैं। इसलिए राम केवल भारत में ही नहीं अपितु दुनियाभर में आराध्य हैं। जीवन की अलग-अलग भूमिकाओं में मनुष्य का आचरण कैसा होना चाहिए, इसका आदर्श राम ने प्रस्तुत किया है। प्रो. फादर कामिल बुल्के ने लिखा है- “मेरे एक मित्र ने जावा के किसी गाँव में एक मुस्लिम शिक्षक को रामायण पढ़ते देखकर पूछा था कि आप रामायण क्यों पढ़ते है? उत्तर मिला कि मैं और अच्छा मनुष्य बनने के लिए रामायण पढ़ता हूँ”। इस प्रसंग से ही स्पष्ट हो जाता है कि दुनिया में राम के नाम की महिमा क्यों है? क्यों दुनियाभर में उन्हें पढ़ा और पूजा जाता है। राम का जीवन मर्यादा सिखाता है। सहिष्णुता एवं सह-अस्तित्व का भाव जगाता है। राम का संदेश मनुष्य को देवत्व की ओर लेकर जाता है। संपूर्ण विश्व में रामराज्य की अवधारणा साकार हो, मूल्य आधारित समाज व्यवस्था निर्मित हो, इसलिए सब अपने यहाँ राम का चरित्र लेकर गए हैं। भारत के स्वाभिमान श्रीराम के स्वरूप एवं संदेश का प्रसार नेपाल, श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार से लेकर लाओस तक की संस्कृति में स्पष्ट दिखायी पड़ता है। गैर-हिन्दू समुदाय भी उन्हें उतनी ही श्रद्धाभाव से पूजते हैं, जितना कि हिन्दू। इंडोनेशिया दुनिया का सबसे अधिक मुस्लिम आबादी का देश है। लेकिन भारत की भाँति यहाँ भी कण-कण में राम व्याप्त हैं। दुनिया की सबसे बड़ी रामायण का मंचन इंडोनेशिया में किया जाता है। इंडोनेशिया के मुस्लिम भगवान राम को अपना नायक, आदर्श और प्रेरणास्रोत मानते हैं।

बुधवार, 23 नवंबर 2022

समाज के लिए घातक है मूल्यविहीन पत्रकारिता

"जिस तरह मनुष्य के जीवन को सार्थकता प्रदान करने के लिए जीवन मूल्य आवश्यक हैं, उसी तरह मीडिया को भी दिशा देने और उसको लोकहितैषी बनाने के लिए मूल्यों की आवश्यकता रहती है"।

मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मूल्यों की आवश्यकता है। मूल्यों का प्रकाश हमें प्रत्येक क्षेत्र में राह दिखता है। मूल्यों के अभाव में हमारे जीवन की यात्रा अँधेरी सुरंग से गुजरने जैसी होगी, जिसमें हम दीवारों से तो कभी राह में आई बाधाओं से टकराते हुए आगे बढ़ते हैं। जीवन मूल्य हमें बताते हैं कि समाज जीवन कैसा होना चाहिए, परिवार एवं समाज में अन्य व्यक्तियों के प्रति हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए, करणीय क्या है और अकरणीय क्या है? मूल्यों के अनुरूप आचरण करनेवाले व्यक्ति सज्जन पुरुषों की श्रेणी में आते हैं। वहीं, जो लोग मूल्यों की परवाह नहीं करते, उनका जीवन व्यर्थ हो जाता है, ऐसे कई लोग समाजकंटक के रूप में सबके लिए परेशानी का कारण बन जाते हैं। अर्थात मूल्यों के अभाव में मानव समाज स्वाभाविक रूप से गतिशील नहीं हो सकता। मूल्यों के अभाव में सकारात्मकता का लोप होकर नकारात्मकता हावी हो जाती है।

रविवार, 30 जनवरी 2022

हंगामा नहीं, सत्यान्वेषण कीजिये

Lokendra Singh / लोकेन्द्र सिंह

पत्रकारिता के संबंध में कुछ विद्वानों ने यह भ्रम पैदा कर दिया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में वह विपक्ष है। जिस प्रकार विपक्ष ने हंगामा करने और प्रश्न उछालकर भाग खड़े होने को ही अपना कर्तव्य समझ लिया है, ठीक उसी प्रकार कुछ पत्रकारों ने भी सनसनी पैदा करना ही पत्रकारिता का धर्म समझ लिया है। लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की विराट भूमिका से हटाकर न जाने क्यों पत्रकारिता को हंगामाखेज विपक्ष बनाने का प्रयत्न किया जा रहा है? यह अवश्य है कि लोकतंत्र में संतुलन बनाए रखने के लिए चारों स्तम्भों को परस्पर एक-दूसरे की निगरानी करनी है। पत्रकारिता को भी सत्ता के कामकाज की समीक्षा करनी है और उसको आईना दिखाना है। हम पत्रकारिता की इस भूमिका को देखते हैं, तब हमें वह हंगामाखेज नहीं अपितु समाधानमूलक दिखाई देती है। भारतीय दृष्टिकोण से जब हम संचार की परंपरा को देखते हैं, तब प्रत्येक कालखंड में संचार का प्रत्येक स्वरूप लोकहितकारी दिखाई देता है। संचार का उद्देश्य समस्याओं का समाधान देना रहा है।

गुरुवार, 20 मई 2021

स्वातंत्र्यवीर सावरकर पर 'द वीक' का माफीनामा

वीडियो रिपोर्ट देखें : 'The Week' magazine apologies for defaming Veer Savarkar

'द वीक' पत्रिका ने स्वातंत्र्यवीर सावरकर पर लिखे गए झूठे और अपमानजनक लेख के लिए माफी मांगी है। ‘द वीक’ की यह माफ़ी राष्ट्रभक्त लोगों की जीत है और महापुरुषों का अपमान करने वाले संकीर्ण मानसिकता के लोगों की पराजय। निरंजन टाकले नाम के पत्रकार का एक लेख ‘द वीक’ ने 24 जनवरी, 2016 को प्रकाशित किया, जिसका शीर्षक ‘लैंब लायोनाइज्ड’ था। वीर सावरकर की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के उद्देश्य से लिखे गए इस लेख में मनगढ़ंत और तथ्यहीन बातें लिखी गयीं। तथ्यों को तोड़-मरोड़कर कर भी प्रस्तुत किया गया। ‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक’ ने इस आलेख को चुनौती दी। सबसे पहले 23 अप्रैल, 2016 को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया में इसकी लिखित शिकायत की गई। परन्तु प्रेस काउंसिल कहाँ, इस तरह के मामलों पर संज्ञान लेती है। राष्ट्रीय विचार से जुड़े विषयों पर उसकी उदासीनता सदैव ही देखने को मिली है, उसका कारण सब जानते ही हैं। उसके बाद स्मारक इस लेख के विरुद्ध याचिका लेकर न्यायालय पहुँच गया और हम देखते हैं कि न्यायालय में झूठ टिक नहीं सका। इससे पहले वीर सावरकर के सम्बन्ध में आपत्तिजनक कार्यक्रम के प्रसारण के लिए एबीपी माझा भी लिखित माफी मांग चुका है। सोचिये, इतिहास में इस तरह के लोगों ने कितना और किस प्रकार का झूठ परोसा होगा? 

सोमवार, 18 मई 2020

‘नागरिक पत्रकारिता’ की आवश्यकता को रेखांकित करती पुस्तक



सूचनाओं का आदान-प्रदान करना हम सबका मानव स्वभाव है। इस प्रवृत्ति का एक ही अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर किसी न किसी रूप में ‘एक पत्रकार’ बैठा है। किसी मीडिया संस्थान के प्रशिक्षित पत्रकार की भाँति वह भी समाज को सूचनाएं/समाचार देना अपना दायित्व समझता है या सूचनाएं देने की इच्छा रखता है। इंटरनेट और स्मार्टफोन की सहज उपलब्धता के कारण अब तो उसके पास जनसंचार माध्यम भी हैं। इंटरनेट पर ब्लॉग, फेसबुक, ट्वीटर और यूट्यूब इत्यादि के माध्यम से सामान्य व्यक्ति व्यापक पहुँच रखता है। कई बार उसके पास ऐसे समाचार, चित्र और वीडियो होते हैं, जो किसी भी बड़े से बड़े मीडिया संस्थान के पास नहीं होते। इस कारण बड़े मीडिया संस्थानों ने भी विशाल नागरिक संसाधन का उपयोग प्रारंभ किया है। उन्होंने भी अपने माध्यम से पत्रकारिता के लिए नागरिकों को स्थान देना आरंभ किया है। नागरिक पत्रकारिता का इतना अधिक महत्व और प्रयोग बढऩे से इस विषय पर व्यापक प्रबोधन की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। इस दृष्टि से जनसंचार एवं मीडिया के शिक्षण-प्रशिक्षण से जुड़े डॉ. पवन सिंह मलिक की पुस्तक ‘नागरिक पत्रकारिता’ महत्वपूर्ण है। डॉ. मलिक एक दशक से भी अधिक समय से मीडिया शिक्षा एवं मीडिया के क्षेत्र से जुड़े हैं। वर्तमान में वे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में वरिष्ठ सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। 
          पुस्तक ‘नागरिक पत्रकारिता’ में इस विधा के लगभग उन सब आयोगों को शामिल किया गया है, जिनकी जानकारी एक नागरिक को बतौर पत्रकार होनी चाहिए। पुस्तक का पहला अध्याय ही इस प्रश्न के साथ प्रारंभ होता है कि ‘हम नागरिक पत्रकार क्यों बनें?’ संयोग से यह अध्याय मुझे (लोकेन्द्र सिंह) ही लिखने का अवसर प्राप्त हुआ है। इस अध्याय में मैंने उन सब कारणों का उल्लेख किया है, जिनके कारण से आज समाज में नागरिक पत्रकार की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। नागरिक पत्रकारिता को अपनाने का मन बनाने वाले साथियों के सामने इस दायित्व की जवाबदेही, गंभीरता एवं उद्देश्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। नागरिक पत्रकारिता के क्षेत्र में कितनी संभावनाएं हैं, किन माध्यमों का उपयोग हम समाचार/विचार सामग्री के प्रसारण हेतु कर सकते हैं और मुख्यधारा के मीडिया में बतौर नागरिक पत्रकार हम कैसे अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकते हैं, इन बिन्दुओं को छूने का भी प्रयास किया है। 
          नागरिक पत्रकारिता का बखूबी उपयोग करने वाले प्रशांत बाजपेई ने अपने अध्याय में नागरिक पत्रकारिता की आधुनिक समाज में भूमिका को विस्तार से बताया है। उन्होंने नागरिक पत्रकारिता के भविष्य को उज्ज्वल बताया है। मीडिया के शिक्षक अनिल कुमार पाण्डेय ने अपने आलेख में न केवल नागरिक पत्रकारिता के प्रकारों का उल्लेख किया है बल्कि विस्तार के उसके लिए उपयुक्त माध्यम का जिक्र किया है और उनके अभ्यास पर प्रकार डाला है। उन्होंने अपने अध्याय में नागरिक पत्रकारिता के विभिन्न माध्यमों की विशेषताओं का उदाहरण सहित वर्णन किया है। इससे नागरिक पत्रकारिता में प्रवेश करने वाले लोगों को अपनी रुचि का माध्यम चुनने में सहायता मिलेगी। 
          लेखक दिनेश कुमार ने अपने आलेख में बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया है। उन्होंने उन बातों की ओर संकेत किया है, जिनकी कमी नागरिक पत्रकारिता में दिखाई देती है। यदि उनके सुझावों पर अमल किया जाए तो बहुत हद तक नागरिक पत्रकार किसी विशेषज्ञ पत्रकार की तरह काम करने लगेंगे और उनके द्वारा प्रसारित सामग्री भी अधिक विश्वसनीय एवं संतुलित होगी। मीडिया शोधार्थी अमरेन्द्र कुमार आर्य ने अपने आलेख में बताया है कि नागरिक पत्रकारिता लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का मंच बन गया है। नि:संदेह नागरिक पत्रकारिता ने मुख्यधारा के मीडिया को न केवल अधिक लोकतांत्रिक बनाया है अपितु समाचारों के चयन एवं प्रसारण के उसके एकाधिकार को चुनौती भी दी है। आज किसी भी समाचार चैनल या समाचार-पत्र पर सोशल मीडिया (नागरिक पत्रकारिता) द्वारा उठाये गए मुद्दों का दबाव रहता है। समाचारों के प्रसारण में यह स्पष्टतौर पर दिखाई देता है। मीडिया न तो किसी मुद्दे को अब अनदेखा कर सकता है और न ही किसी मुद्दे दबा सकता है। हमारे सामने अनेक उदाहरण हैं जब नागरिक पत्रकारों द्वारा सामने लाई सूचनाओं पर व्यावसायिक मीडिया ने ध्यान दिया।


          वरिष्ठ फोटो पत्रकार डॉ. प्रदीप तिवारी का आलेख नागरिक पत्रकारिता में प्रवेश करने वाले लोगों का हौसला बढ़ाता है। इस लेख में उन्होंने अनेक सुविख्यात पत्रकारों का उदाहरण देकर बताया है कि कैसे उन्होंने अपनी शुरुआत बतौर नागरिक पत्रकार की थी और बाद में वे बड़े संस्थानों तक पहुँचे। हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय की सहायक प्राध्यापक डॉ. भारती बत्तरा ने नागरिक पत्रकारिता में सूचना का अधिकार कानून के महत्व को रेखांकित किया है। अर्थात् नागरिक पत्रकार आरटीआई की मदद से महत्वपूर्ण सूचनाएं प्राप्त कर भंडाफोड़ कर सकते हैं। उन्होंने इसके चर्चित उदाहरण भी दिए हैं। पुस्तक के आखिरी अध्याय में मीडिया शिक्षक डॉ. अमित भारद्वाज ने नागरिक पत्रकारिता प्रशिक्षण के महत्व को रेखांकित किया है। 
          मीडिया शिक्षक डॉ. पवन सिंह मलिक की पुस्तक ‘नागरिक पत्रकारिता’ में कुल 15 अध्याय/आलेख शामिल हैं। पुस्तक की प्रस्तावना वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय ने लिखी है। उनकी यह प्रस्तावना ही नागरिक पत्रकारिता की उपयोगिता, आवश्यकता एवं उसके महत्व को भली प्रकार सिद्ध कर देती है। वह लिखते हैं कि नागरिक पत्रकारिता ने पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं, जैसे- सूचना एकत्रीकरण के नए जरिए पैदा किए, सूचनाओं पर एकाधिकार समाप्त किया, सूचनाओं के संप्रेषण के लिए नए रास्ते और तकनीक अपनाई एवं नए तरह के मीडियाकर्मी पैदा किए। यह पुस्तक न केवल उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो नागरिक पत्रकारिता के प्रति उत्साही हैं, बल्कि यह उनको भी एक दृष्टि देती है जो पत्रकारिता के विद्यार्थी हैं। पत्रकारिता के विद्यार्थी भी इस पुस्तक के अध्ययन से नागरिक पत्रकारिता में अपनी संभावनाएं तलाश सकते हैं। यश पब्लिकेशंस, दिल्ली ने पुस्तक का प्रकाशन किया है।



पुस्तक : नागरिक पत्रकारिता (सिटीजन जर्नलिज्म)
संपादक : डॉ. पवन सिंह मलिक 
मूल्य : 350 रुपये (साजिल्द)
पृष्ठ : 142 
प्रकाशक : यश पब्लिकेशंस 
1/10753, सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032
दूरभाष : 011-40018100
ई-मेल : yashpublisherprivatelimited@gmail.com 

रविवार, 19 अप्रैल 2020

‘राष्ट्रवाद और मीडिया’ पर स्पष्ट दृष्टिकोण पैदा करती पुस्तक

- सुरेश हिंदुस्थानी 
राष्ट्रवाद सदैव से चर्चा एवं आकर्षण का विषय रहा है। आज के परिदृश्य में तो यह और अधिक चर्चित है। सब जानना चाहते हैं कि आखिर राष्ट्रवाद क्या है? राष्ट्रवाद पर इतनी बहस क्यों होती है? क्यों कुछ लोग राष्ट्रवाद का विरोध करते हैं? राष्ट्रवाद और मीडिया के बीच क्या संबंध है? राष्ट्रवाद के अध्येयता डॉ. सौरभ मालवीय एवं लोकेंद्र सिंह की पुस्तक ‘राष्ट्रवाद और मीडिया’ ने इन सब प्रश्नों के उत्तर देने का यथासंभव प्रयास किया है। यह पुस्तक सर्वथा उचित समय पर प्रकाशित हुई है। विशेषकर इस पुस्तक के माध्यम से ‘राष्ट्रवादी पत्रकारिता’ को भली प्रकार समझा जा सकता है। ज्यादातर पाठ ‘पत्रकारिता’ के स्वरूप पर ही केंद्रित हैं। इसलिए यह पुस्तक राष्ट्रवाद का अध्ययन करने वालों के साथ ही पत्रकारिता में रुचि रखने वाले लोगों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। वर्तमान समय में विशेष प्रकार के लोगों ने कुछ टेलीविजन न्यूज चैनल्स, समाचारपत्र-पत्रिकाओं एवं वेबसाइट्स पर ‘राष्ट्रवादी’ होने का ठप्पा लगाना शुरू कर दिया है। ये लोग स्वयं तो कहते हैं कि उन्हें किसी से देशभक्ति, सेक्युलर या फिर अन्य किसी प्रकार का प्रमाण-पत्र नहीं चाहिए, किंतु विडम्बना देखिए कि ये स्वयं ही दूसरों के माथे पर ठप्पा लगाने का धंधा करते हैं। इन लोगों के कारण भी ‘राष्ट्रवादी मीडिया’ या ‘राष्ट्रवादी पत्रकारिता’ को लेकर अनेक प्रकार के भ्रम उत्पन्न हुए हैं। राष्ट्रवादी मीडिया/पत्रकारिता के संबंध में फैली अनेक प्रकार की भ्रांतियों को दूर करने का का यह पुस्तक बखूबी करती है। 
          पुस्तक में कुछ 32 पाठ/आलेख हैं, जिन्हें वरिष्ठ पत्रकारों, लेखकों एवं स्तम्भकारों ने लिखा है। प्रस्तावना में लोकसभा टीवी के सीईओ एवं वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार डॉ. आशीष जोशी और पुस्तक के पहले आलेख ‘हम और हमारा राष्ट्रवाद’ में मीडिया आचार्य एवं राजनीतिक विश्लेषक प्रो. संजय द्विवेदी ने यह एकदम स्पष्ट कर दिया है कि असल में भारत का राष्ट्रवाद क्या है? भारत के राष्ट्रवाद की तुलना पश्चिम के राष्ट्रवाद से नहीं की जा सकती। यकीनन, जहाँ पश्चिम का राष्ट्रवाद राजनीति के गर्भ से उत्पन्न हुआ है, वहीं भारत का राष्ट्रवाद अपनी अनूठी एवं सर्वसमावेशक संस्कृति की कोख से जन्मा है। इसलिए दोनों राष्ट्रवाद में जमीन-आसमान का अंतर है। इसलिए दोनों को एक नहीं माना जा सकता। इसलिए पश्चिम की परिभाषाओं की कसौटी पर भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को नहीं कसा जा सकता। प्रो. द्विवेदी ने उचित ही लिखा है कि भारत का राष्ट्रवाद विविधता को साधने वाला, बहुलता को आदन देने वाला ओर समाज को सुख देने वाला है। 
          राष्ट्रवादी विचारधारा के पत्रकार और पत्रकारिता को लेकर जो गलत धारणा समाज में स्थापित करने की साजिश हुई है, उस पर वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी ने गहराई से कलम चलाई है। श्री चतुर्वेदी ने उचित ही कहा है कि पत्रकारिता की दुनिया में आने के बाद राष्ट्रवादी सोच वाले लोगों ने कहीं अधिक लचीला और जनपेक्षी रुख अख्तियार किया है। वैचारिकता की छौंक उनकी रिपोर्टिंग में उस हद तक नहीं दिखती, जिस हद तक एक खास विचारधारा (वामपंथी) के प्रति समर्पित शख्सियतों की पत्रकारिता में दिखती है। यकीनन यह सत्य है। उसका एक कारण यह भी है, जो इस आलेख में बताया भी गया है कि वामपंथी पत्रकार राष्ट्रवादी पत्रकारों को अपने संस्थान में टिकने ही नहीं देते थे। वरिष्ठ स्तंभकार हरिहर शर्मा ने अनेक प्रसंग, तथ्य एवं प्रमाण देकर कहा है कि “प्रजातंत्र के चतुर्थ स्तम्भ में लगी दीमक को समाप्त करना ही होगा”। उन्होंने स्पष्ट किया है कि विदेशों में भारत को लेकर अनेक किस्म के मनगढ़ंत किस्से प्रचलित हैं, उसके लिए भारत का मीडिया दोषी है। शक्तिशाली एवं प्रगत देशों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया है कि उनकी प्रगति एवं शक्ति बढ़ाने में वहाँ की राष्ट्रवादी मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसके लिए अमेरिका एवं ब्रिटेन और उनकी मीडिया के उदाहरण ही पर्याप्त हैं। श्री शर्मा यह सब बताते हुए आग्रह करना चाहते हैं कि निजी स्वार्थ और वैचारिक दुराग्रह छोड़कर भारत के राष्ट्रीय मीडिया को भी राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखना चाहिए। पत्रकार एवं मीडिया शिक्षक अमरेन्द्र कुमार आर्य ने ‘पत्रकारिता का राष्ट्रवादी प्रवाह और भारतवर्ष’ पर अपने विचार रखे हैं। जबकि डॉ. शशि प्रकाश राय, उमापति मिश्र, डॉ. मंजरी शुक्ला, शिवेन्दु राय, अजीत पंवार, अखिलेश द्विवेदी, डॉ. सीमा वर्मा, डॉ. मयंक चतुर्वेदी एवं अन्य ने वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रवादी पत्रकारिता पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उनके आलेख मीडिया और राष्ट्रवाद पर सोच को व्यापक संदर्भ में समझने में सहायता करते हैं। वरिष्ठ पत्रकार संतोष कुमार पाठक ने भी अपने आलेख ‘राष्ट्रवाद और मीडिया’ वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रवादी मीडिया के उभार और उसके सामने खड़ी चुनौतियों को लेकर तार्किक एवं तथ्यात्मक बातें कही हैं। उन्होंने उन ताकतों की ओर भी संकेत किया है, जो ऐन-केन-प्रकारेण भारतीय राष्ट्रवाद को सरकारवाद साबित करना चाहती हैं। यह ताकतें राष्ट्रवादी मीडिया के विरुद्ध लगातार अभियान चलाकर उसे कमजोर और अविश्वसनीय साबित करना चाहती हैं। उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण बात कही है- “राष्ट्र हमेशा सर्वोपरि होता है, सर्वोच्च होता है। राष्ट्र है तो मीडिया है, जनता है, सरकार है। राष्ट्र ही नहीं रहेगा तो फिर क्या बचेगा।” आज आवश्यकता है कि भारत की जनता, सरकारें एवं मीडिया इस विचार को ध्यान में रखकर अपना व्यवहार एवं भूमिका तय करें। 
          डॉ. सौरभ मालवीय एवं लोकेंद्र सिंह की इस पुस्तक ने देश की राजधानी दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेला-2020 में ही सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया था। पुस्तक के संपादक और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अध्येता डॉ. सौरभ मालवीय एवं सह-संपादक लोकेंद्र सिंह को साधुवाद। उनके प्रयत्नों से एक सामयिक और ज्वलंत विषय पर पठनीय, संग्रहणीय, उल्लेखनीय सामग्री ‘राष्ट्रवाद और मीडिया’ पुस्तक के रूप में समाज के समक्ष प्रस्तुत है। यह भी स्तुत्य है कि पुस्तक के संपादकों ने प्रतिविचार को भी स्थान दिया है, ताकि राष्ट्रवाद की बहस को और अधिक तार्किक ढंग से समझा जा सके। पुस्तक में कुल जमा 32 आलेख शामिल हैं। पृष्ठ संख्या 152 है। पुस्तक को प्रकाशित किया है यश पब्लिकेशंस, दिल्ली ने। साजिल्द पुस्तक का मूल्य 399 रुपये है।
(समीक्षक, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।)
पुस्तक : राष्ट्रवाद और मीडिया 
संपादक : डॉ. सौरभ मालवीय एवं लोकेन्द्र सिंह 
मूल्य : 399 रुपये (साजिल्द)
प्रकाशक : यश पब्लिकेशंस, 
1/10753, गली न. 3, सुभाष पार्क, 
नवीन शाहदरा, दिल्ली-32
संपर्क : 9599483885, 86, 87, 88
ईमेल : yashpublicationdelhi@gmail.com 

बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

भारतीय दृष्टि से ‘राष्ट्रवाद’ को परिभाषित करती पुस्तक


डॉ. सौरभ मालवीय और लोकेंद्र सिंह की पुस्तक ‘राष्ट्रवाद और मीडिया’ का विमोचन

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अध्येता डॉ. सौरभ मालवीय एवं लोकेन्द्र सिंह की पुस्तक ‘राष्ट्रवाद और मीडिया’ का विमोचन मीडिया विमर्श की ओर से आयोजित पं. बृजलाल द्विवेदी अखिल भारतीय साहित्यिक सम्मान समारोह में हुआ। भोपाल स्थित गाँधी भवन में पुस्तक विमोचन के लिए मंच पर प्रख्यात समाजवादी चिन्तक रघु ठाकुर, वरिष्ठ संपादक प्रो. कमल दीक्षित, सप्रे संग्रहालय के संस्थापक विजयदत्त श्रीधर, मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के पूर्व निदेशक डॉ. उमेश कुमार सिंह, व्यंग्यकार श्री गिरीश पंकज, संपादक कमलनयन पाण्डेय, मीडिया आचार्य प्रो. संजय द्विवेदी, डॉ. बीके रीना और साहित्यकार पूनम माटिया उपस्थित रहे। 
          इस अवसर पर समाजवादी विचारक एवं लेखक रघु ठाकुर ने कहा कि एक सच्चा राष्ट्रवाद वही होगा जो सच्चा विश्ववादी होगा। अगर सभी देश अपनी सीमाओं को छोड़ने के लिए तैयार हो जाए तभी असली राष्ट्रवाद की नींव रखी जा सकती है। उन्होंने कहा कि मीडिया और राष्ट्रवाद के बीच संघर्ष की स्थिति नहीं होनी चाहिए। वहीं, प्रख्यात साहित्यकार एवं व्यंग्यकार गिरीश पंकज ने पुस्तक के संबंध में कहा कि आज भारत माता की जय बोलने पर और राष्ट्रवादी शब्द का प्रयोग करने पर लोग घूरने लगते हैं। ये लोग अविलम्ब आपको दक्षिणपंथी बोल देंगे और सर्टिफिकेट दे देंगे। ऐसे समय में जब सब ओर राष्ट्रवाद की चर्चा है और कुछ मीडिया घरानों पर भी राष्ट्रवादी होने के ठप्पे लगाये जा रहे हैं, तब इस पुस्तक का प्रकाशित होकर आना अत्यधिक प्रासंगिक हो जाता है। 
           मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के पूर्व निदेशक एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. उमेश कुमार सिंह ने कहा कि भारत एक सनातन राष्ट्र है। यहाँ दृष्टि रही है, दर्शन रहा है लेकिन कभी वाद नहीं रह है। उन्होंने कहा कि कोई एक वाद इस राष्ट्र का पर्याय नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद पाश्चात्य दृष्टि का शब्द है। उन्होंने कहा कि लेखकों ने पुस्तक में भारतीय राष्ट्रवाद को सही अर्थों में परिभाषित करने का प्रयास किया है। उन्होंने राष्ट्रवाद की जगह ‘राष्ट्रत्व’ या ‘राष्ट्रीय विचार’ शब्द का उपयोग करने पर जोर दिया है। 
          पुस्तक में वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रवाद, राष्ट्रवाद एवं मीडिया के सम्बन्ध, मीडिया की भूमिका जैसे विषयों पर मीडिया विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ स्तम्भकारों के महत्वपूर्ण आलेख इस पुस्तक में शामिल किये गए हैं। इस पुस्तक में प्रो. संजय द्विवेदी, संतोष कुमार पाठक, डॉ. मयंक चतुर्वेदी, डॉ. शशि प्रकाश राय, डॉ. साधना श्रीवास्तव, डॉ. मंजरी शुक्ला, डॉ. मनोज कुमार तिवारी, डॉ. मीता उज्जैन, डॉ. सीमा वर्मा, उमेश चतुर्वेदी, अमरेंद्र आर्य, अनिल पांडेय आदि के लेख शामिल हैं। यश प्रकाशन, नईदिल्ली ने पुस्तक का प्रकाशन किया है।
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शनिवार, 2 नवंबर 2019

भाषाई पत्रकारिता पर संदर्भ सामग्री से भरपूर मीडिया विमर्श का 'मलयालम मीडिया विशेषांक'

भारतीय भाषाओं के सम्मान का अनुष्ठान


यूँ तो मीडिया विमर्श का हर अंक ही विशेष होता है। हर अंक पठनीय और संदर्भ सामग्री से भरा पड़ा संग्रहणीय। कई ऐसे विषयों पर भी मीडिया विमर्श ने विशेषांक निकाले हैं, जिनकी मीडिया में भी अत्यंत कम चर्चा होती है और होती भी है तो वही पुराने किस्से/तथ्यों के साथ, नया कुछ नहीं होता। मीडिया विमर्श उन विषयों को नए तथ्यों के साथ हम सबके सामने लेकर आया है।
          बहरहाल, भारतीय भाषायी पत्रकारिता के यशस्वी योगदान को रेखांकित करने में भी 'मीडिया विमर्श' अग्रणी और महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर रहा है। अभी जो अंक (दिसम्बर, 2019) आ रहा है, वह 'मलयालम भाषा की पत्रकारिता' पर केंद्रित है। अतिथि संपादक डॉ. सी. जयशंकर बाबु (पांडिचेरी) ने 'मलयालम मीडिया विशेषांक' का संपादन किया है। निश्चित तौर पर मीडिया विमर्श का यह अंक अध्ययनशील पत्रकारों, पत्रकारिता के शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण होगा। इससे पूर्व डॉ. सी. जयशंकर बाबु ने मीडिया विमर्श के 'तेलुगु मीडिया विशेषांक' का बखूबी संपादन किया था। उनके उस संपादन से हम कल्पना कर सकते हैं कि मलयालम भाषा पर केन्द्रित यह अंक भी अच्छा बन पड़ा होगा।
          उल्लेखनीय है कि 'भारतीय भाषायी पत्रकारिता' के विस्तार को रेखांकित करने के अपने महत्वपूर्ण प्रयासों में मीडिया विमर्श इससे पूर्व उर्दू पत्रकारिता, गुजराती पत्रकारिता और तेलुगु पत्रकारिता पर विशेषांक प्रकाशित कर चुका है। हिंदी पत्रकारिता पर तो उसका हर अंक उपयोगी सामग्री लेकर आता है। मलयालम चौथी भारतीय भाषा है, जिस पर 'मीडिया विमर्श' पत्रिका का नया अंक आया है। इन सब यशस्वी प्रयासों के पीछे मीडिया गुरु प्रो. संजय द्विवेदी हैं, जो मीडिया विमर्श के कार्यकारी संपादक भी हैं।

शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

संभावना और चुनौतियों के बीच मूल्यानुगत मीडिया का आग्रह


सक्रिय पत्रकारिता और उसके शिक्षण-प्रशिक्षण के सशक्त हस्ताक्षर प्रो. कमल दीक्षित की नयी पुस्तक मूल्यानुगत मीडिया : संभावना और चुनौतियांऐसे समय में आई है, जब मीडिया में मूल्यहीनता दिखाई पड़ रही है। मीडिया में मूल्यों और सिद्धांतों की बात तो सब कर रहे हैं, लेकिन उस तरह का व्यवहार मीडिया का दिखाई नहीं दे रहा है। मीडिया के जरिये कर्ता-धर्ता मालिक/पत्रकार अपने व्यावसायिक और वैचारिक हित साधने में लगे हुए हैं। उन्होंने अपने नये मूल्य गढ़ लिये हैं। मूल्यहीनता के इस अंधकार को दूर करने का काम यह पुस्तक कर सकती है। प्रो. कमल दीक्षित की लेखकी में यह शक्ति है। वे निरंतर अपनी लेखनी के प्रवाह से यह करते आ रहे हैं। उनके शब्दों में सत्याग्रह है। वे आध्यात्मिक पुरुष भी हैं। जो वह कह रहे हैं, उसे उन्होंने जिया भी है। विभिन्न समाचार पत्रों का संपादन करते हुए उन्होंने मूल्यों और सिद्धांतों को कभी नहीं छोड़ा। प्रत्येक स्थिति में मूल्यों की पत्रकारिता को आगे बढ़ाया। पत्रकारिता के अध्यापन एवं प्रशिक्षण में भी अपनी भावी पीढ़ी को मिशनरी पत्रकारिता के तत्व ही हस्तांतरित किए। शायद इसलिए ही प्रो. कमल दीक्षित जिस मूल्यानुगत मीडिया की बात कर रहे हैं, अनेक चुनौतियों के बाद भी वैसी मीडिया के अस्तित्व की भरपूर संभावना दिखाई देती है।
            पुस्तक में शामिल अनेक आलेखों में प्रो. कमल दीक्षित की चिंता/बेचैनी दिखाई देती है। वह मानते हैं कि सामाजिक बदलाव के लिए मीडिया की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। मीडिया इसमें कहीं चूक रहा है। मीडिया से वह अपेक्षा करते हैं कि उसे अपने कर्तव्य पथ पर वापस लौटना चाहिए। वे लिखते हैं कि मीडिया ने अपने मूल्यों को दरकिनार किया है तथा मानवीय मूल्यों से भी उसके संबंध कमजोर हुए हैं। उसने भारतीय तथा जातीय संस्कृति को प्रभावित करते हुए पाश्चात्य तथा उपभोक्तावादी संस्कृति का विस्तार किया है।हिंदी के समाचार पत्र-पत्रिका जिस तरह भाषा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, उस पर भी उनकी बेचैनी साफ नजर आती है। उनका मानना है कि हमारे समाचार पत्रों ने भाषा के साथ ही बेसमझ और फूहड़ व्यवहार किया है।यह पीड़ा हर उस पाठक की है, जो भाषा के प्रति थोड़ा-सा भी संवेदनशील है। विशेषतौर पर हिंदी के समाचार-पत्रों ने जिस तरह से आम बोल-चाल की भाषा के नाम पर हिंदीका स्वरूप बिगाड़ा है, वह असहनीय है। समाचार-पत्र धड़ल्ले से हिंदी की अस्मिता पर चोट कर रहे हैं। अच्छी भाषा भी एक मूल्य है। समाचार-पत्रों को भाषा की अनदेखी नहीं करनी चाहिए, बल्कि उसके संवर्द्धन की जिम्मेदारी का निर्वहन करना चाहिए।
            पुस्तक के पहले आलेख का शीर्षक है- अभी संभावना है।यह शीर्षक ही इस पुस्तक के मूल विचार, भाव और तत्व का प्रतिनिधि है। यह शीर्षक उन लोगों को झकझोरता है, जो यह मान बैठे हैं कि कॉरपोरेट ने पत्रकारिता को चौपट कर दिया और अब मीडिया में मूल्यों के लिए कोई स्थान शेष नहीं। यह शीर्षक उस विश्वास को पक्का करता है, जो यह मानता है कि घोर व्यावयायिकता और गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा के दौर में सबकुछ नष्ट नहीं हुआ है, अभी बहुत संभावनाएं शेष हैं। पुस्तक में शामिल सभी आलेखों में लेखक ने मूल्यों और सिद्धांतों को टटोलते हुए उनकी अनुपस्थिति पर जिम्मेदारों से प्रश्न भी पूछे हैं तो पत्रकारिता में मूल्यों की स्थापना के लिए प्रयासरत सज्जनों को प्रोत्साहित भी किया है, ताकि वह अपने पथ पर आगे बढ़ते रहें। बहरहाल, बाकी सबको भी ‘अभी संभावना है’ इसको मंत्र बनाकर पत्रकारिता में मूल्योन्मुखी वातावरण बनाने के लिए जुटना चाहिए। यह भारतीय पत्रकारिता के वर्तमान और भविष्य, दोनों के लिए आवश्यक है। भारतीय पत्रकारिता का स्वर्णिम इतिहास है। पत्रकारिता ने न केवल भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को धार दी, अपितु समाज जागरण का दायित्व भी निभाया है। इसलिए समाज आज भी पत्रकारिता से उसी भूमिका की अपेक्षा करता है। प्रो. दीक्षित लिखते हैं कि “समाचार पत्र-पत्रिकाओं को अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का स्मरण करना चाहिए। उसे अपने कंटेंट के विकास और पत्र के संचालन के बारे में कुछ ऐसी नीतियां तय करनी होंगी जिससे उसकी आर्थिक स्थिति भी ठीक रहे। बाजार उसका सहयोग तो उसके उपभोक्ताओं के आधार पर ले सके पर उसे बाजार की शर्तों पर अपने मूल्यों और आदर्शों को बदलना नहीं पड़े।”
            पुस्तक में मूल्यानुगत मीडिया के आचार्य प्रो. दीक्षित के 60 चुनिंदा आलेखों को शामिल किया गया है। पुस्तक का पहला आलेख ‘अभी संभावना है’ और अंतिम आलेख ‘यह प्रवाह बना रहे’ है। पुस्तक में प्रवाहित चिंतनधारा के इस ओर-छोर (पहला और अंतिम आलेख के शीर्षक) पर खड़े लेखक ने अपने चिरपरिचित आध्यात्मिक अंदाज में महत्वपूर्ण संदेश दिया है। दोनों लेखों का यह क्रम लेखक के दार्शनिक पक्ष को भी सामने लाता है। सारगर्भित ढंग से लेखक ने अपने पाठकों और उन सब लोगों का मार्गदर्शन किया है, जो मूल्यानुगत मीडिया की स्थापना एवं विस्तार का ध्येय लेकर चल रहे हैं। उनके लिए संदेश है- सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है। फिर से पत्रकारिता के मूल स्वरूप को जाग्रत किया जा सकता है। अभी संभावना है। छोटी से छोटी संभावना भी हमारे प्रोत्साहन का आधार बने। इसलिए पत्रकारिता जगत में अनेक लोगों ने मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए जो प्रयास प्रारंभ किए हैं, हर हाल में उनका प्रवाह बना रहना चाहिए।

           
पुस्तक : मूल्यानुगत मीडिया : संभावना और चुनौतियां
लेखक : प्रो. कमल दीक्षित
मूल्य250 रुपये 
प्रकाशक : सृजन बिंब प्रकाशन
                301, सनशाइन-2, के.टी. नगर, 
                काटोल रोड, नागपुर – 440013
मोबाइल : 8208529489
ईमेल : Srijanbimb.2017@gmail.com

रविवार, 30 सितंबर 2018

तेलुगु मीडिया की विकास यात्रा पर महत्वपूर्ण सामग्री से भरपूर मीडिया विमर्श का "तेलुगु मीडिया विशेषांक"

भाषायी पत्रकारिता पर मीडिया विमर्श का एक और महत्वपूर्ण प्रयास
- लोकेन्द्र सिंह - 
पत्रकारिता एवं संचार क्षेत्र से जुड़े लोगों को मीडिया विमर्श के प्रत्येक अंक का बेसब्री से इंतजार रहता है। मीडिया विमर्श का प्रत्येक अंक न केवल अपने पाठकों एवं प्रबुद्ध वर्ग की कसौटी पर खरा उतरता है, बल्कि और अधिक अपेक्षाएं बढ़ा देता है। 12 वर्ष से यह क्रम जारी है। एक के बाद एक महत्वपूर्ण विशेषांक हमारे सामने आए हैं। इस सबके पीछे मीडिया विमर्श के कार्यकारी संपादक प्रो. संजय द्विवेदी हैं। 
          भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता की समृद्ध विरासत और प्रयोगों को हिंदी जगत के सामने लाने का उल्लेखनीय कार्य भी मीडिया विमर्श के माध्यम से प्रो. संजय द्विवेदी ने अपने हाथों में संभाल रखा है। वह सबसे पहले उर्दू पत्रकारिता पर चर्चित विशेषांक लेकर आए। उसके बाद गुजराती पत्रकारिता पर एक उल्लेखनीय विशेषांक उपलब्ध कराया। अब नये विशेषांक के माध्यम से उन्होंने हिंदी मीडिया के जगत को तेलुगु मीडिया से परिचित कराने का प्रयत्न किया है। 
           हम सब जानते हैं कि तेलुगु भाषा का एक बड़ा परिवार है। तेलुगु भारत की प्राचीनतम भाषाओं में से एक है। भारत में तेलुगु बोलने वालों की संख्या 15 करोड़ से अधिक है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के अलावा संपूर्ण भारत में तेलुगु भाषी रहते हैं। यही नहीं, भारत के बाहर भी तेलुगु बोलने वालों की बड़ी संख्या है। ऐसे में तेलुगु मीडिया को समझना और उसको जानना जरूरी हो जाता है। इस काम में मीडिया विमर्श का यह अंक बहुत ही सहयोगी और महत्वपूर्ण सिद्ध होगा। 
          तेलुगु मीडिया विशेषांक के अतिथि संपादक हैं- सी. जयशंकर बाबु, जिन्हें अकसर हम मीडिया विमर्श में पढ़ते रहे हैं। उन्होंने अपनी जिम्मेदारी का बखूबी निर्वाहन किया है। तेलगू मीडिया के विविध आयामों पर इस विशेषांक में सामग्री है। भारतीय भाषायी पत्रकारिता का जगत कितना वृहद और समृद्ध है, यह समझाने में मीडिया विमर्श की यह श्रृंखला साधुवाद की पात्र है। मीडिया विमर्श की यह श्रृंखला अनवरत चलती रहनी चाहिए... यही शुभकामनाएं हैं।  
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मीडिया विमर्श के "तेलुगु मीडिया विशेषांक" पर यूट्यूब चैनल "अपना वीडियो पार्क" में चर्चा देखिये.... 


शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

'संघ और समाज' के आत्मीय संबंध को समझने में मदद करते हैं मीडिया विमर्श के दो विशेषांक

 लेखक  एवं राजनीतिक विचारक प्रो. संजय द्विवेदी के संपादकत्व में प्रकाशित होने वाली जनसंचार एवं सामाजिक सरोकारों पर केंद्रित पत्रिका 'मीडिया विमर्श' का प्रत्येक अंक किसी एक महत्वपूर्ण विषय पर समग्र सामग्री लेकर आता है। ग्यारह वर्ष की अपनी यात्रा में मीडिया विमर्श के अनेक अंक उल्लेखनीय हैं- हिंदी मीडिया के हीरो, बचपन और मीडिया, उर्दू पत्रकारिता का भविष्य, नये समय का मीडिया, भारतीयता का संचारक : पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति अंक, राष्ट्रवाद और मीडिया इत्यादि। मीडिया विमर्श का पिछला और नया अंक 'संघ और समाज विशेषांक-1 और 2' के शीर्षक से हमारे सामने है। यूँ तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (संघ) सदैव से जनमानस की जिज्ञासा का विषय बना हुआ है। क्योंकि, संघ के संबंध में संघ स्वयं कम बोलता है, उसके विरोधी एवं मित्र अधिक बहस करते हैं। इस कारण संघ के संबंध में अनेक प्रकार के भ्रम समाज में हैं। विरोधियों ने सदैव संघ को किसी 'खलनायक' की तरह प्रस्तुत किया है। जबकि समाज को संघ 'नायक' की तरह ही नजर आया है। यही कारण है कि पिछले 92 वर्ष में संघ 'छोटे से बीज से वटवृक्ष' बन गया। अनेक प्रकार षड्यंत्रों और दुष्प्रचारों की आंधी में भी संघ अपने मजबूत कदमों के साथ आगे बढ़ता रहा। 

रविवार, 5 नवंबर 2017

हिंदी मीडिया के चर्चित चेहरों से मुलाकात कराती किताब

 हम  जिन्हें प्रतिदिन न्यूज चैनल पर बहस करते-कराते देखते हैं। खबरें प्रस्तुत करते हुए देखते हैं। अखबारों और पत्रिकाओं में जिनके नाम से प्रकाशित खबरों और आलेखों को पढ़कर हमारा मानस बनता है। मीडिया गुरु और लेखक संजय द्विवेदी की किताब 'हिंदी मीडिया के हीरो' पत्रकारिता के उन चेहरों और नामों को जानने-समझने का मौका उपलब्ध कराती है। किताब में देश के 101 मीडिया दिग्गजों की सफलता की कहानी है। किन परिस्थितियों में उन्होंने अपनी पत्रकारिता शुरू की? कैसे-कैसे सफलता की सीढिय़ां चढ़ते गए? उनका व्यक्तिगत जीवन कैसा है? टेलीविजन पर तेजतर्रार नजर आने वाले पत्रकार असल जिन्दगी में कैसे हैं? उनके बारे में दूसरे दिग्गज क्या सोचते हैं? ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब यह किताब देती है। किताब को पढ़ते वक्त आपको महसूस होगा कि आप अपने चहेते मीडिया हीरो को नजदीक से जान पा रहे हैं। यह किताब पत्रकारिता के छात्रों सहित उन तमाम युवाओं के लिए भी महत्वपूर्ण है जो आगे बढऩा चाहते हैं। पुस्तक में जमीन से आसमान तक पहुंचने की कई कहानियां हैं। पत्रकारों का संघर्ष प्रेरित करता है। पत्रकारिता के क्षेत्र में आ रहे युवाओं को यह भी समझने का अवसर किताब उपलब्ध कराती है कि मीडिया में डटे रहने के लिए कितनी तैयारी लगती है। इस तरह के शीर्षक से कोई सामग्री किताब में नहीं है, यह सब तो अनजाने और अनायस ही पत्रकारों के जीवन को पढ़ते हुए आपको जानने को मिलेगा।

रविवार, 2 जुलाई 2017

मोदी राजनीति का दस्तावेज 'मोदी युग'

 यह  मानने में किसी को कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि हमारे समय में भारतीय राजनीति के केंद्र बिन्दु नरेन्द्र मोदी हैं। राजनीतिक विमर्श उनसे शुरू होकर उन पर ही खत्म हो रहा है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस से लेकर बाकि राजनीतिक दलों की राजनीतिक रणनीति में नरेन्द्र मोदी प्राथमिक तत्व हैं। विधानसभा के चुनाव हों या फिर नगरीय निकायों के चुनाव, भाजपा मोदी नाम का दोहन करने की योजना बनाती है, जबकि दूसरी पार्टियां मोदी की काट तलाशती हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समर्थक जहाँ प्रत्येक सफलता को नरेन्द्र मोदी के प्रभाव और योजना से जोड़कर देखते हैं, वहीं मोदी आलोचक (विरोधी) प्रत्येक नकारात्मक घटना के पीछे मोदी को प्रमुख कारक मानते हैं। इसलिए जब राजनीतिक विश्लेषक संजय द्विवेदी भारतीय राजनीति के वर्तमान समय को 'मोदी युग' लिख रहे हैं, तब वह कोई अतिशयोक्ति नहीं है। अपनी नई पुस्तक 'मोदी युग : संसदीय लोकतंत्र का नया अध्याय' में उन्होंने वर्तमान समय को उचित ही संज्ञा दी है। ध्यान कीजिए, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) और कांग्रेसनीत केंद्र सरकार को कब और कितना 'मनमोहन सरकार' कहा जाता था? उसे तो संप्रग के अंग्रेजी नाम 'यूनाइटेड प्रोगेसिव अलाइंस' के संक्षिप्त नाम 'यूपीए सरकार' से ही जाना जाता था। इसलिए जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) और भाजपानीत सरकार को 'मोदी सरकार' कहा जा रहा है, तब कहाँ संदेह रह जाता है कि भारतीय राजनीति यह वक्त 'मोदीमय' है। हमें यह भी निसंकोच स्वीकार कर लेना चाहिए कि आने वाला समय नेहरू, इंदिरा और अटल युग की तरह मोदी युग को याद करेगा। यह समय भारतीय राजनीति की किताब के पन्नों पर हमेशा के लिए दर्ज हो रहा है। भारतीय राजनीति में इस समय को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। इसलिए 'मोदीयुग' पर आई राजनीतिक चिंतक संजय द्विवेदी की किताब महत्वपूर्ण है और उसका अध्ययन किया जाना चाहिए।

सोमवार, 5 सितंबर 2016

डिजिटल इंडिया : जीवन होगा सुगम

यह आलेख मीडिया विमर्श के सितंबर-2016 के अंक में प्रकाशित हुआ है।

नरेन्द्र मोदी सरकार की महत्त्वाकांक्षी परियोजना है, डिजिटल इंडिया। इस परियोजना का मूल उद्देश्य है 'भारत को डिजिटली सशक्त समाज और ज्ञान अर्थव्यवस्था के रूप में परिवर्तित करना।' डिजिटल इंडिया के जरिए सरकार पारदर्शी व्यवस्था कायम करना चाहती है। यानी सुशासन। सरकार के लिए यह सिर्फ नारा नहीं है, बल्कि लोगों के जीवन को सुगम बनाने का दृढ़ संकल्प है। यह इसलिए कहा जा सकता है, क्योंकि सरकार ने इस लोक कल्याणकारी उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक चरणबद्ध योजना भी तैयार की है। 21 अगस्त, 2014 से प्रारंभ हुए इस कार्यक्रम को केंद्र सरकार ने अगले पाँच वर्ष में पूरा करने की योजना बनाई है। यह उम्मीद की जा रही है कि डिजिटल इंडिया कार्यक्रम 2019 तक गाँवों समेत देशभर में पूरी तरह से लागू हो जाएगा। सरकार इस दिशा में प्रभावी ढंग से कदम बढ़ा रही है। अनेक मोर्चों पर सरकार सफल भी हुई है। फिर भी कहना होगा कि मंजिल अभी दूर है। दरअसल, गाँव में बसने वाले भारत के प्रत्येक क्षेत्र में अभी इंटरनेट ही नहीं पहुँचा है। जहाँ पहुँचा भी है, वहाँ इंटरनेट की गति (डाउनलोड-अपलोड स्पीड) ही इतनी धीमी है कि उपयोगकर्ता उदासीन हो जाता है।

सोमवार, 7 सितंबर 2015

सबसे सरल

 सं पादक की सत्ता को जब प्रबंधन ने हिला रखा हो, संपादक खुद भी जब मैनेजर हो गए हों, तब एक शख्स ने संपादक  के पद की गरिमा को बनाए ही नहीं रखा बल्कि उसका संवर्धन भी किया। वह शख्स कोई ओर नहीं, हिन्दी पत्रकारिता के पद्मश्री आलोक मेहता ही है। आसमान की बुलन्दियां छू चुके आलोक मेहता सादगी के लिबास में लिपटे आपको कहीं भी मिल जाएंगे। वे सहज हैं, सरल हैं और मिलनसार भी हैं।