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बुधवार, 24 मार्च 2021

हर बूँद अनमोल

Lokendra Singh

विश्व जल दिवस पर जल शक्ति अभियान की शुरुआत कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मनुष्यता एवं प्रकृति-पर्यावरण के हित में एक महत्वपूर्ण शुरुआत की है। जल संरक्षण और जल प्रबंधन एक-दूसरे के पूरक हैं। बिना जल संरक्षण किए अगर हम जल का दोहन करेंगे, तो आने वाले समय में जल संकट की समस्या उत्पन्न हो जाएगी। भारत के अनेक हिस्सों में अब हम इस संकट का सामना करने की स्थिति में आ चुके हैं। यह संभलने का समय है। यह अभियान हमें संभलने का अवसर देता है। इस अभियान को ‘कैच द रैन’ नाम दिया गया है। वर्षा जल का संचयन करना, इसका उद्देश्य है। 

शहरीकरण की प्रक्रिया में एक बड़ी चूक पिछले वर्षों में हुई है कि वर्षा जल के संचयन की प्राकृतिक एवं नैसर्गिक संरचनाओं को हमने ध्वस्त कर दिया या बदहाल होने दिया। स्थिति यह है कि वर्षा जल का ज्यादातर हिस्सा बह कर शहर से बाहर चला जाता है, जबकि उसको वहाँ की भूमि में समाना चाहिए था। भू-जल स्तर को बनाए रखने में वर्षा जल का बहुत महत्व है। थोड़ी जागरूकता एवं थोड़े ही प्रयासों से हम वर्षा जल का संचयन कर सकते हैं। इसलिए इस अभियान को वर्षा जल के संचयन से जोडऩा अनुकरणीय है। 

मध्यप्रदेश में अनेक स्वयंसेवी संस्थाएं एवं समाजसेवी वर्षा जल के संचयन के लिए क्रांतिकारी पहल प्रारंभ कर चुके हैं। मध्यप्रदेश के बैतूल में पर्यावरण पुरुष मोहन नागर बारिश के पानी को सहजने के लिए ग्रामवासियों के सहयोग से ‘गंगा अवतरण अभियान’ एवं ‘बोरी बंधान’ जैसे परंपरागत वैज्ञानिक प्रयोगों का संचालन करते हैं। इन प्रयोगों के कारण जिन गाँवों में कभी जल संकट भयावह हो जाता था, आज वहाँ संग्रहित वर्षा जल का उपयोग सिंचाई के लिए भी होने लगा है। वहीं, झाबुआ में शिव गंगा अभियान के चला कर पद्मश्री महेश शर्मा ने एक लाख से अधिक जल संरचनाएं खड़ी कर दीं। दोनों ही महानुभाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरणा लेकर पर्यावरण संरक्षण के महती अभियान में जुटे हुए हैं। 

पर्यावरण पुरुष मोहन नागर के प्रयासों पर केन्द्रित फिल्म 


यह ठीक बात है कि सरकार ने वर्षा जल संरक्षण की चिंता की है लेकिन यह जब तक समाज की चिंता का विषय नहीं बनेगा, तब तक वांछित लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता। जल संरक्षण प्रत्येक मनुष्य का दायित्व होना चाहिए। जीवन में जल का क्या महत्व है, हमारी संस्कृति में, ऋषियों ने इसे भली प्रकार रेखांकित किया है। उन्होंने बताया है कि पृथ्वी का आधार जल और जंगल है। इसलिए उन्होंने पृथ्वी की रक्षा के लिए वृक्ष और जल को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा है- “वृक्षाद् वर्षति पर्जन्य: पर्जन्यादन्न सम्भव:” अर्थात् वृक्ष जल है, जल अन्न है, अन्न जीवन है। हिन्दुओं के चार वेदों में से एक अथर्ववेद में बताया गया है कि आवास के समीप शुद्ध जलयुक्त जलाशय होना चाहिए। जल दीर्घायु प्रदायक, कल्याणकारक, सुखमय और प्राणरक्षक होता है। छान्दोग्योपनिषद् में अन्न की अपेक्षा जल को उत्कृष्ट कहा गया है। महर्षि नारद ने भी कहा है कि पृथ्वी भी मूर्तिमान जल है। अन्तरिक्ष, पर्वत, पशु-पक्षी, देव-मनुष्य, वनस्पति सभी मूर्तिमान जल ही हैं। जल ही ब्रह्मा है। 

आधुनिक जीवनशैली में हम अपनी संस्कृति की सीखों को पीछे छोड़ते आए हैं, जिसके कारण आज अनेक प्रकार के संकटों का सामना कर रहे हैं। जल शक्ति अभियान के माध्यम से हमारे पास एक अवसर आया है कि हम अपनी संस्कृति के संदेशों को आत्मसात करें, दुनिया के सामने आचरण हेतु प्रस्तुत करें और प्रकृति के साथ अपने आत्मीय संबंध को पुन: प्रगाढ़ करें। याद रखें, जल का कोई विकल्प नहीं है। इसलिए इसका संरक्षण एवं संचयन अनिवार्य है।

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

मध्यप्रदेश में पौधारोपण का विश्व कीर्तिमान

 प्रकृति  के बिना मनुष्य के जीवन की कल्पना संभव नहीं है। जल-जंगल के बिना जन का जीवन संभव है क्या? साधारण बुद्धि का व्यक्ति भी इस प्रश्न का उत्तर जानता है। लेकिन, लालच से वशीभूत आदमी प्रकृति का संवर्द्धन करने की जगह निरंतर उसका शोषण कर रहा है। हालाँकि वास्तविकता यही है कि वह प्रकृति को चोट नहीं पहुँचा रहा है, वरन स्वयं के जीवन के लिए कठिनाइयाँ उत्पन्न कर रहा है। देर से ही सही अब दुनिया को यह बात समझ आने लगी है। पर्यावरण बचाने के लिए दुनिया में चल रहा चिंतन इस बात का प्रमाण है। भारत जैसे प्रकृति पूजक देश में भी पर्यावरण पर गंभीर संकट खड़े हैं। प्रमुख नदियों का अस्तित्व संकट में है। जंगल साफ हो रहे हैं। पानी का संकट है। हवा प्रदूषित है। वन्य जीवों का जीवन खतरे में आ गया है। पर्यावरण बचाने की दिशा में गैर-सरकारी संगठन और पर्यावरणविद् एवं प्रेमी व्यक्तिगत स्तर पर कुछ प्रयास कर रहे हैं। लम्बे संघर्ष के बाद उनके प्रयासों का परिणाम दिखाई भी दिया है। पर्यावरण के मसले पर समाज जाग्रत हुआ है। प्रकृति के प्रति लोगों को अपने कर्तव्य याद आ रहे हैं। पर्यावरण चिंतकों की ईमानदार आवाजों का ही परिणाम है कि सरकारों ने भी 'वोटबैंक की पॉलिटिक्स' के नजरिए से शुष्क क्षेत्र पर्यावरण पर गंभीरता से ध्यान देना शुरू किया है।

मंगलवार, 23 मई 2017

मिशन बन गई है नर्मदा सेवा यात्रा

 सदानीरा  नर्मदा मध्यप्रदेश की जीवन-रेखा है। मध्यप्रदेश की समृद्धि नर्मदा से ही है। नर्मदा के दुलार से ही देश के हृदय प्रदेश का दिल धड़कता है। मध्यप्रदेश के साथ-साथ माँ नर्मदा अपने अमृत-जल से गुजरात का भी पोषण करती है। नर्मदा का महत्त्व दोनों प्रदेश भली प्रकार समझते हैं। माँ नर्मदा का अधिक से अधिक स्नेह प्राप्त करने के लिए दोनों प्रदेश वर्षों तक आपस में झगड़े भी। यह संयोग ही है कि नर्मदा के तट पर पैदा हुए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उसके जल से आचमन करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, दोनों नर्मदा के उद्गम स्थल पर आकर उसके ऋण से उऋण होने का संकल्प लेते हैं। मध्यप्रदेश में 148 दिन से संचालित 'नमामि देवी नर्मदे : नर्मदा सेवा यात्रा' का पूर्णता कार्यक्रम वन प्रदेश अमरकंटक में 15 मई, 2017 को आयोजित किया गया। परंतु, वास्तव में यह पूर्णता कार्यक्रम कम था, बल्कि नदियों के महत्त्व के प्रति जन-जागरण की मजबूत नींव पर नदी संरक्षण के भव्य स्मारक के निर्माण कार्य का शुभारम्भ था। नर्मदा सेवा यात्रा की पूर्णता पर नर्मदा सेवा मिशन की घोषणा यहाँ की गई। कृषकाय हो रही नर्मदा को संवारने का संकल्प दोनों लोकप्रिय नेताओं ने स्वयं ही नहीं लिया, अपितु नर्मदा के लाखों पुत्रों को भी कराया। ऐसी मान्यता है कि यदि हमारे संकल्प शुभ हों, तब प्रकृति भी उनको पूरा करने में हमारी मदद करती है। पर्यावरण और नदी संरक्षण का यह शुभ संकल्प तो प्रकृति की गोद में बसे अमरकंटक की पावन धरती पर ही लिया गया है, इसलिए इसके फलित होने की संभावना स्वत: ही बढ़ गई है।

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

जीवित मनुष्य से बढ़कर हैं नदियाँ

 माँ  गंगा और यमुना के बाद अब नर्मदा नदी को भी मनुष्य के समान अधिकार प्राप्त होंगे। देवी नर्मदा भी अब जीवित इंसानों जैसी मानी जाएगी। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसकी घोषणा की है। जल्द ही विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर नर्मदा नदी को इंसान का दर्जा दे दिया जाएगा। यह शुभ घोषणा है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन, जीवनदायिनी नदियों को मनुष्य के समकक्ष स्थापित करने से पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि हमारे ग्रंथों में नदियों का स्थान बहुत ऊँचा है। वेदों में नदियों को माँ और देवी माना गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने नदियों को लेकर यह मान्यता इसलिए स्थापित की थी, ताकि हम नदियों के प्रति अधिक संवेदनशील रहें। उनके प्रति कृतज्ञ रहें। नदियों के प्रति अतिरिक्त आदर भाव रहे। जब मनुष्य नदियों को माँ मानेगा और उन्हें दैवीय स्थान पर रखेगा, तब उसको नुकसान नहीं पहुँचाएगा। यह हमारे समाज का दुर्भाग्य है कि हम अपने पुरखों की सीख को विसर्जित कर कर्मकांड तक सीमित होकर रह गए। सम्मान के सर्वोच्च स्थान 'माँ' के प्रति भी हम लापरवाह हो गए। हमारी यह लापरवाही नदियों के जीवन के लिए खतरा बन गई। आज न्यायालयों और सरकारों को नदियों को न्याय दिलाने के लिए उन्हें मनुष्य की तरह जीवंत मानने को मजबूर होना पड़ रहा है। जबकि हमारे यहाँ सदैव से नदियों को जीवंत ही माना गया है।

सोमवार, 14 मार्च 2016

विश्व संस्कृति महोत्सव : विरोध के पीछे क्षुद्र मानसिकता

 वि घ्न संतोषियों के अनेक प्रकार के कुप्रचार के बावजूद अपने पूरे वैभव और गौरव के साथ यमुना के तट पर विश्व संस्कृति महोत्सव सम्पन्न हो गया। अभूतपूर्व सांस्कृतिक आयोजन में शामिल होने आए करीब 122 देशों के प्रतिनिधि निश्चित ही भारतीय धर्म, सांस्कृतिक एकता, शांति और अहिंसा का संदेश लेकर लौटे होंगे। आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर महाराज और उनकी संस्था आर्ट ऑफ लिविंग की सराहना की जानी चाहिए कि उन्होंने दुनिया की विभिन्न संस्कृतियों को यमुना के तीर एकत्र कर भारत को उनका नेतृत्व करने का अवसर दिया। हमें यह खुले दिल से स्वीकार करना चाहिए कि इस महोत्सव ने भारत को विश्व में गौरव दिलाने का काम किया है। भारत की सांस्कृतिक विविधता और उनके बीच अनूठी एकता का संदेश भी दुनिया में गया है। भारत ने लम्बे समय तक विश्वगुरु की भूमिका का निर्वाहन किया है। विश्व संस्कृति का नेतृत्व करने की भारत की उसी क्षमता का प्रदर्शन दिल्ली में यमुना किनारे हुआ। लेकिन, क्षुद्र मानसिकता के लोगों ने न केवल इस महत्वपूर्ण आयोजन को बदनाम करने का षड्यंत्र रचा, बल्कि इसे रद्द तक कराने की कोशिशें कीं।

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

नदी नहीं बची तो हम कहां बचेंगे

 स ब जानते हैं कि नदियों के किनारे ही अनेक मानव सभ्यताओं का जन्म और विकास हुआ है। नदी तमाम मानव संस्कृतियों की जननी है। प्रकृति की गोद में रहने वाले हमारे पुरखे नदी-जल की अहमियत समझते थे। निश्चित ही यही कारण रहा होगा कि उन्होंने नदियों की महिमा में ग्रंथों तक की रचना कर दी और अनेक ग्रंथों-पुराणों में नदियों की महिमा का बखान कर दिया। भारत के महान पूर्वजों ने नदियों को अपनी मां और देवी स्वरूपा बताया है। नदियों के बिना मनुष्य का जीवन संभव नहीं है, इस सत्य को वे भली-भांति जानते थे। इसीलिए उन्होंने कई त्योहारों और मेलों की रचना ऐसी की है कि समय-समय पर समस्त भारतवासी नदी के महत्व को समझ सकें। नदियों से खुद को जोड़ सकें। नदियों के संरक्षण के लिए चिंतन कर सकें। हर तीन साल में देश के चार अलग-अलग संगम स्थलों पर लगने वाला कुंभ भी इसी चिंतन परंपरा का सबसे बड़ा उदाहरण है। 'नद्द: रक्षति रक्षित:' (नदी संरक्षण) विषय पर आहूत 'मीडिया चौपाल' को ऐसे ही उदाहरण की श्रेणी में रखा जा सकता है। नदी संरक्षण के लिए वेब संचालकों, ब्लॉगर्स एवं जन-संचारकों के जुटान का स्वागत किया जाना चाहिए। 'विकास की बात विज्ञान के साथ : नये मीडिया की भूमिका' और 'जन-जन के लिए विज्ञान और जन-जन के लिए मीडिया' जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर पिछले दो वर्षों में मीडिया चौपाल का सफल आयोजन भोपाल में हो चुका है। तीसरी मीडिया चौपाल दिल्ली में भारतीय जनसंचार संस्थान के परिसर में जमेगी। भारत की लगभग सभी नदियों और उससे जुड़े जीवों (मनुष्य भी शामिल) के सम्मुख जब जीवन का संकट खड़ा हो तब संवाद के नए माध्यम 'सोशल मीडिया' की पहुंच, प्रयोग और प्रभाव का नदी संरक्षण के लिए उपयोग करने पर मंथन करना अपने आप में महत्वपूर्ण और आवश्यक पहल है। 
         नदी संरक्षण में सोशल मीडिया की कितनी अहम भूमिका हो सकती है, इसे सब समझते हैं। सोशल मीडिया की ताकत और प्रभाव की अनदेखी शायद ही कोई करे। पिछले चार-पांच वर्षों में सोशल मीडिया का प्रभाव जोरदार तरीके से बढ़ा है। सस्ते स्मार्टफोन की बाढ़ ने तो ज्यादातर लोगों को सोशल मीडिया का सिपाही बना दिया है। यह आम आदमी का अपना अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया है। इसका उपयोग सहज है, इसलिए यह मीडिया अधिक सोशल हो गया है। दोतरफा संवाद, बिना रोक-टोक के अपनी बात कहने की आजादी और सहज उपलब्धता के कारण आम आदमी ने इसे हाथों-हाथ लिया है। स्वयं को अभिव्यक्त करने के साथ-साथ आदमी यहां सार्थक संवाद भी कर रहा है। पिछली सरकार को अपने कई फैसले इसलिए वापस लेने पड़े क्योंकि सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ जमकर माहौल बनाया गया था। लोक कल्याण के लिए बनाई गईं कमजोर नीतियों पर जोरदार बहस आयोजित हुईं। सोशल मीडिया का ही असर है कि समाज में फिर से राजनीतिक चेतना बढ़ी है। राजनीति को कीचड़ की संज्ञा देकर इससे बचने वाले युवा भी सोशल मीडिया के माध्यम से भारतीय राजनीति का स्वास्थ्य सुधारने का प्रयास कर रहे हैं। क्रांति की अलख जगा रहे हैं। भारत के संदर्भ में देखें तो अन्ना हजारे के आंदोलन को खाद-पानी सोशल मीडिया ने ही दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसका सबसे बेहतर उपयोग कर इसकी ताकत और लोकप्रियता को जग-जाहिर कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी की अभूतपूर्व जीत और कांग्रेस की ऐतिहासिक हार की कहानी कहीं न कहीं सोशल मीडिया पर ही लिखी जा रही थी। 'तहलका' की एक रिपोर्ट के मुताबिक पेशेवर आंदोलनकारी भी सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। यानी इस प्रभावशाली माध्यम का उपयोग हर कोई कर रहा है। राजनेता से लेकर अभिनेता और तमाम चर्चित शख्सियतें रोज ट्विटर, फेसबुक और ब्लॉग सहित अन्य सोशल मंचों से जुड़ रहे हैं। इन सबके बीच पर्यावरण से जुड़े लोग ही कहीं पीछे खड़े दिखते हैं। नदी और मानव जाति का कल बचाने के लिए उन्हें और हमें भी सोशल मीडिया पर सक्रियता बढ़ानी होगी। सोशल मीडिया के माध्यम से जन जागरण करना होगा। आखिर नदी बचाने के लिए हमें अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को स्पष्टतौर पर समझना ही होगा। सामाजिक जिम्मेदारी तय करने के लिए संचार के सामाजिक माध्यम से अच्छा मंच कहां हो सकता है। बस, जरूरत है इस दिशा में सार्थक और सामूहिक प्रयास करने की। मीडिया चौपाल के प्रयास से यह संभव हो सके तो कितना सुखद होगा। 
        अब जरा एक नजर नदियों की स्थिति पर भी डाल लेते हैं ताकि हम अपनी जिम्मेदारी को ठीक से समझ लें और उसे अधिक वक्त के लिए टालें नहीं बल्कि तत्काल नदी संरक्षण में अपनी भूमिका तलाश लें। नदियां हमें जीवन देती हैं लेकिन विडम्बना देखिए कि हम उन्हें नाला बनाए दे रहे हैं। मोक्षदायिनी श्री गंगा भी इससे अछूति नहीं है। मां गंगा का आंचल उसके स्वार्थी पुत्रों ने कुछ जगहों पर इतना मैला कर दिया है कि उसके वजूद पर ही संकट खड़ा हो गया है। धार्मिक क्रियाकलापों से गंगा उतनी दूषित नहीं हो रही जितनी कि तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या, जीवन के निरंतर ऊंचे होते हुए मानकों, औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के हुए अत्यधिक विकास के कारण मैली हो रही है। गंगा सहित अन्य नदियों के प्रदूषित होने का सबसे बड़ा कारण सीवेज है। बड़े पैमाने पर शहरों से निकलने वाला मल-जल नदियों में मिलाया जा रहा है जबकि उसके शोधन के पर्याप्त इंतजाम ही नहीं हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपने अध्ययन में कहा है कि देशभर के ९०० से अधिक शहरों और कस्बों का ७० फीसदी गंदा पानी पेयजल की प्रमुख स्रोत नदियों में बिना शोधन के ही छोड़ दिया जाता है। कारखाने और मिल भी नदियों को प्रदूषित कर रहे हैं। हमने जीवनदायिनी नदियों को मल-मूत्र विसर्जन का अड्डा बनाकर रख दिया है। नदियों में सीवेज छोडऩे की गंभीर भूल के कारण ग्वालियर की दो नदियां स्वर्णरेखा नदी और मुरार नदी आज नाला बन गई हैं। इंदौर की खान नदी भी गंदे नाले में तब्दील हो गई है। कभी इन नदियों में पितृ तर्पण, स्नान और अठखेलियां करने वाले लोग अब उनके नजदीक से गुजरने पर नाक-मुंह सिकोड़ लेते हैं। यह स्थिति देश की और भी कई नदियों के साथ हुई है। देश की ७० फीसदी नदियां प्रदूषित हैं और मरने के कगार पर हैं। इनमें गुजरात की अमलाखेड़ी, साबरमती और खारी, आंध्रप्रदेश की मुंसी, दिल्ली में यमुना, महाराष्ट्र की भीमा, हरियाणा की मारकंडा, उत्तरप्रदेश की काली और हिंडन नदी सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं। गंगा, नर्मदा, ताप्ती, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी, ब्रह्मपुत्र, सतलुज, रावी, व्यास, झेलम और चिनाब भी बदहाल स्थिति में हैं।
         भारत सरकार ने करोड़ों रुपये जल और नदी के संरक्षण पर खर्च कर दिए हैं लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही है। नदियां साफ-स्वच्छ होने की जगह और अधिक मैली ही होती गई हैं। आखिर नदियों को बचाने की रणनीति में कहां चूक होती रही है? क्यों हम अपनी नदियों को मैला होने से नहीं बचा पा रहे हैं? क्या किया जाए कि नदियों का जीवन बच जाए? क्या उपाय करें कि नदियां नाला न बनें? इन सब सवालों पर मंथन जरूरी है। समाज का जन जागरण जरूरी है। प्रत्येक भारतवासी को यह याद दिलाने की जरूरत है कि नदी नहीं बचेगी तो हम भी कहां बचेंगे? नदी के जल की कल-कल है तो कल है और जीवन है। नदियों में मल-मूत्र (सीवेज) और औद्योगिक कचरा छोडऩा सरकार को तत्काल प्रतिबंधित करना चाहिए। नदियों के संरक्षण के अभियान में अब तक समाज की भागीदारी कभी सुनिश्चित नहीं की गई। जबकि समाज को उसकी जिम्मेदारी का आभास कराए बगैर नदियों का संरक्षण और शुद्धिकरण संभव ही नहीं है। यह आंदोलन है, भले ही सरकारी योजना की शक्ल में है। हम जानते हैं कि समाज की सक्रिय भागीदारी के बिना कोई भी आंदोलन अपने लक्ष्य को नहीं पा सकता। मीडिया चौपाल पर होने वाले मंथन में इन सब सवालों पर गंभीर विमर्श होना चाहिए। जन संचार के माध्यमों से जुड़े लोगों को अपनी भूमिका तय करने के साथ ही इस आंदोलन को समाज के बीच ले जाने के लिए भी प्रयास करने चाहिए। 'हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।' कवि दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां मीडिया चौपाल में सबसे लिए प्रेरणा और पथ-प्रदर्शन का काम करें तो निश्चित ही नदी संरक्षण की दिशा में एक बड़ी मुहिम शुरू हो सकती है।