लोकसभा और राज्यसभा में हंगामेदार चर्चा के बीच आखिरकार परीक्षा सुधार का विधेयक ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ पारित हो गया। देश के करोड़ों युवाओं और छात्रों के भविष्य को देखते हुए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दा था। उम्मीद यह थी कि जब प्रश्न पत्र लीक जैसे गंभीर विषय पर संसद में बहस होगी, तो देश को एक ठोस और सर्वसम्मति वाला समाधान देखने को मिलेगा। लेकिन संसद के दोनों सदनों में जो दृश्य देखने को मिला, वह बेहद निराशाजनक रहा। जो विपक्ष कल तक पर्चा लीक के मुद्दे को लेकर सड़कों से लेकर संसद तक हो-हल्ला मचा रहा था, जब विधेयक पर रचनात्मक चर्चा और सुझाव देने का सही समय आया, तब वह पूरी तरह दिशाहीन नजर आया। बहस का रुख परीक्षा प्रणाली के तकनीकी एवं प्रशासनिक सुधारों पर केंद्रित रहने के बजाय ऐसे विषयों की ओर मोड़ दिया गया, जिनका आम छात्रों की समस्याओं और उनके भविष्य से कोई दूर-दूर तक का लेना-देना नहीं था। विशेष रूप से मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के पास यह एक बड़ा अवसर था कि वह परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी और लीक-मुक्त बनाने के लिए अपने ठोस और व्यावहारिक सुझाव पटल पर रखती। इससे देश की जनता और युवाओं के बीच यह संदेश जाता कि विपक्ष के पास महज विरोध करने के बजाय समस्याओं का समाधान करने का एक स्पष्ट एजेंडा भी है। परंतु इस रचनात्मक भूमिका को निभाने के स्थान पर बहस को धार्मिक प्रतीकों, गोमूत्र और मनुस्मृति जैसे विषयों पर लाकर खड़ा कर दिया गया।
शनिवार, 1 अगस्त 2026
मंगलवार, 3 मार्च 2026
कहाँ है आपकी निष्ठा
खामेनेई की मौत : प्रदर्शन करनेवाले मुसलमानों की निष्ठा कहाँ है?
अमेरिका और इजराइल के हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद मध्य पूर्व में जो भू-राजनीतिक भूचाल आया है, उसकी अनुगूंज भारत के कई हिस्सों में सुनाई दे रही है। लखनऊ से लेकर श्रीनगर तक कई क्षेत्रों में हजारों मुस्लिम प्रदर्शनकारियों का सड़कों पर उतरना, अमेरिका और इजराइल के खिलाफ नारेबाजी करना, एक गहरी चिंता का विषय है। यह प्रदर्शन सवाल उठाता है कि भारत के मुसलमानों की निष्ठा आखिर कहाँ है? ईरान के सुप्रीम खामनेई की मौत के बाद भारत में प्रदर्शनों का क्या औचित्य है? अपने आप को इस्लामिक सत्ता/व्यवस्था से जोड़ने की यह बीमारी आज की नहीं है। खिलाफत आंदोलन को याद कीजिए और उसके उद्देश्य का विश्लेषण कीजिए। आखिर क्यों भारत के मुसलमानों ने खिलाफत आंदोलन चलाया था? क्या उसका कोई संबंध भारत की स्वतंत्रता से था?
आज से आठ दशक पूर्व संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जिस कड़वे सच की ओर देश का ध्यान आकृष्ट किया था, वह आज पूरी तरह प्रासंगिक नजर आता है। उन्होंने स्पष्ट लिखा था कि मुसलमानों की निष्ठा उस देश के प्रति नहीं होती जहाँ वे रहते हैं, बल्कि उस सांप्रदायिक विश्वास पर निर्भर करती है जिसका वे हिस्सा हैं। लखनऊ से लेकर जम्मू-कश्मीर की सड़कों पर उतरकर मातम मनाने वाली भीड़ और खामेनेई को शहीद का दर्जा देने की कवायद, इसी मानसिकता का साक्षात प्रमाण है।
मंगलवार, 20 जनवरी 2026
रहमान का ‘सांप्रदायिक सुर’
भारत के लोगों ने संगीतकार एआर रहमान को वर्षों बिना किसी भेदभाव के अथाह प्रेम दिया है, जबकि सबको पता है कि रहमान कन्वर्टेड मुसलमान हैं। आज तक किसी ने भी रहमान को लेकर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की है। परंतु, रहमान ने खुद ही स्वयं को लेकर विवाद खड़ा कर लिया है। एक विदेशी मीडिया संस्थान को दिए गए साक्षात्कार में उनका यह कहना कि बॉलीवुड में उन्हें काम न मिलने की वजह ‘सांप्रदायिक’ हो सकती है, बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निराशाजनक है। जिस कलाकार को पूरे देश ने बिना किसी धर्म या जाति के भेदभाव के, आंखों पर बिठाया हो, ऐसी विक्टिम हुड (पीड़ित भाव) की बातें करना उनकी गरिमा के अनुकूल नहीं है। एक प्रकार से कहना होगा कि रहमान के मन में ही कहीं सांप्रदायिक सोच बैठी हुई थी, जो अब जाकर सामने आई है। रहमान जैसे लोगों को इसका जवाब भी देना चाहिए कि अनेक हिन्दू संगीतकार भी बॉलीवुड से बाहर हो चुके हैं, उसका कारण क्या है? क्या उन्हें भी मुस्लिम गिरोहबंदी के कारण काम मिलना बंद हुआ है? भारतीय सिनेमा में मुस्लिम कलाकारों का जिस प्रकार का वर्चस्व है, वह किसी से छिपा नहीं है। इसके बाद भी रहमान हिन्दुओं के माथे पर सांप्रदायिका का लेबल चस्पा करने की कोशिश करे रहे हैं, तो इसे एक प्रकार से बेईमानी ही कहना चाहिए।
गुरुवार, 8 जनवरी 2026
हिन्दुओं के मानवाधिकारों पर वैश्विक चुप्पी
गरिमामयी जीवन जीने के लिए मनुष्य होने के नाते हमारे कुछ अधिकार हैं। वैश्विक स्तर पर मनुष्यों के अधिकारों की रक्षा हो सके, इस उद्देश्य के साथ संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 10 दिसंबर, 1948 को ‘मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा’ की। यह दस्तावेज मानव जीवन, स्वतंत्रता, विचार की अभिव्यक्ति, धर्म, शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों को परिभाषित करता है। भारत के संविधान में भी कई अनुच्छेद मानवाधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। मानवाधिकारों का हनन रोकने, उनकी निगरानी करने एवं इससे जुड़े अन्य मामलों पर हस्तक्षेप करने के लिए राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थाएँ भी गठित की गई हैं। परंतु, विडंबना यह है कि इन संस्थाओं को अन्य समुदायों के मानवाधिकारों की चिंता तो होती है, लेकिन हिंदुओं के मानवाधिकार इन्हें संभवतः दिखाई ही नहीं देते। विश्व के विभिन्न देशों में हिंदुओं के मानवाधिकारों का खुलेआम हनन हो रहा है, लेकिन कहीं कोई घोर आपत्ति सुनाई नहीं देती। एक प्रकार से वैश्विक चुप्पी छाई हुई है। यह स्थिति चिंताजनक है। यह चुप्पी हिंदू समाज के मन में आक्रोश पैदा करती है और सांप्रदायिक भेद भी बढ़ाती है।
मंगलवार, 6 जनवरी 2026
बांग्लादेश में निशाने पर हिन्दू
बांग्लादेश से आ रहे समाचार न केवल विचलित करने वाले हैं, बल्कि पड़ोसी देश में कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति और विशेष रूप से हिन्दू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। बांग्लादेश के जेस्सोर जिले में पत्रकार राणा प्रताप बैरागी की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या और अगले ही दिन एक हिन्दू दुकानदार शरत चक्रवर्ती मणि की धारदार हथियार से हत्या कर दी गई। 18 दिन में 6 हिन्दुओं की हत्याओं की घटनाएं सामने आई हैं। मारपीट और शोषण के मामले भी सामने आ रहे हैं। ये घटनाएं महज आंकडे नहीं हैं, बल्कि उस सांप्रदायिक सोच के गवाह हैं, जिसने पिछले कुछ हफ्तों में वहां के हिन्दू समुदाय को दहशत के साये में जीने को मजबूर कर दिया है। घटनाओं की प्रकृति और उनमें अपनाए गए तरीके अत्यंत बर्बर और अमानवीय हैं। एक तरफ जहां राणा प्रताप को सरेआम गोली मारी गई, वहीं शरीयतपुर में व्यापारी खोकन चंद्र दास के साथ जो हुआ, वह इंसानियत को शर्मसार करने वाला है। धारदार हथियारों से हमला करना और फिर पेट्रोल डालकर जिंदा जला देना, अपराधियों के मन में बैठे गहरे सांप्रदायिक जहर को दर्शाता है।
शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025
हिन्दुओं की मॉब लिंचिंग पर चुप्पी
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार पर वैसी मुखरता दिखायी नहीं दे रही, जैसी अन्य मामलों में दिखायी देती है। हालिया उदाहरण गाजा का लिया जा सकता है, जहाँ दो देशों की आपसी संघर्ष में सैन्य हमलों का शिकार बने मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए भारत में प्रदर्शन किए गए। हालांकि, यहाँ भी चयनित पाखंड देखा गया था। इस्लामिक चरमपंथियों की ओर से यहूदी महिलाओं एवं लोगों के साथ किए गए घिनौने कृत्यों पर यहाँ भी चुप्पी साध ली गई थी। बांग्लादेश के प्रकरण में केवल भाजपा और राष्ट्रीय विचार के लोग ही हिन्दुओं के हितों की चिंता करते हुए दिखाई दे रहे हैं। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसी चयनात्मक चुप्पी को कठघरे में खड़ा किया है। विधानसभा के शीतकालीन सत्र में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों और उस पर विपक्ष की चुप्पी को मुद्दा बनाया। उनका यह सवाल वाजिब है कि जो राजनीतिक दल गाजा की घटनाओं पर कैंडल मार्च निकालते हैं, वे पड़ोसी देशों (पाकिस्तान और बांग्लादेश) में हिंदुओं और सिखों के नरसंहार पर मौन क्यों साध लेते हैं?
गुरुवार, 25 दिसंबर 2025
बांग्लादेश में कट्टरपंथ का आतंक
बांग्लादेश आज एक ऐसे अंधेरे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ मानवता और कानून का शासन कट्टरपंथ एवं भीड़ तंत्र के सामने आत्मसमर्पण कर चुका है। अल्पसंख्यक हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की जघन्य हत्या ने न केवल पड़ोसी देश की अंतरिम सरकार की स्थिरता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि भारत के धैर्य की भी परीक्षा ली है। दीपू दास को उग्र भीड़ द्वारा जिंदा जला दिया जाना सभ्य समाज के माथे पर कलंक है, लेकिन इससे भी अधिक भयावह वे वीडियो साक्ष्य हैं जो बताते हैं कि मारे जाने से पहले दास स्थानीय पुलिस की हिरासत में था। यह संदेह गहराना स्वाभाविक है कि क्या रक्षकों ने ही उसे कट्टरपंथियों के हवाले कर दिया? दीपू चंद्र दास की नृशंस हत्या करते समय भीड़ ने जिस प्रकार की नारेबाजी की, उससे साफ पता चलता है कि इस्लामिक चरमपंथी, मुस्लिम बाहुल्य राज्य या देश में गैर-मुस्लिमों को स्वीकार ही नहीं कर सकते हैं। सबसे अधिक खतरनाक और डराने वाली बात यह है कि दीपू की सुनियोजित हत्या में उसके मुस्लिम मित्र भी शामिल रहे हैं। यह जेहादी सोच या तो गैर-मुस्लिमों को इस्लाम में कन्वर्ट कर लेना चाहती है या फिर उन्हें वहाँ से खदेड़ देती है।
सोमवार, 8 दिसंबर 2025
बाबर की औलादें
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में तृणमूल कांग्रेस के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने कथित तौर पर बाबरी मस्जिद की नींव रखकर ‘बाबर की औलादों’ को जिंदा कर दिया है। अब तहरीक मुस्लिम शब्बन नाम के संगठन ने ग्रेटर हैदराबाद में बाबरी स्मारक बनाने का ऐलान किया है। ये घटनाएं केवल अपने मत-संप्रदाय के प्रति अपना विश्वास प्रकट करने का विषय नहीं है, बल्कि देश की न्यायिक व्यवस्था, सांप्रदायिक सौहार्द और संवैधानिक मूल्यों को चुनौती देने की कोशिश के तौर पर इन्हें देखना चाहिए। यह एक प्रकार से अलगाववादी सोच है, जो पहले भी भारत का विभाजन करा चुकी है। यह सोच इसलिए और भी अधिक खतरनाक दिखायी दे रही है क्योंकि ये किसी सिरफिरे कट्टरपंथियों की घोषणा मात्र नहीं है, अपितु इस विचार के पीछे मुसलमानों की अच्छी-खासी भीड़ भी खड़ी दिखायी दे रही है। कथित बाबरी मस्जिद की नींव रखने के लिए जिस तरह सिर पर ईंटें ढोकर लाते मुसलमानों की भीड़ दिखायी दी, उसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर’ के नारों के बीच लाखों समर्थकों का जुटना और बाबरी मस्जिद के निर्माण की बात दोहराना, साफ तौर पर मुस्लिम समुदाय की सांप्रदायिक लामबंदी को स्पष्टतौर पर रेखांकित करता है।
सोमवार, 8 सितंबर 2025
अशोक स्तंभ को तोड़ना, भारत की आत्मा और संविधान पर हमला है
जम्मू-कश्मीर की हजरतबल दरगाह में राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तम्भ को तोड़ा जाना एक गहरी चिंता का विषय है। इस घटना पर राष्ट्रीय स्तर पर विचार-मंथन होना चाहिए। ईद-ए-मिलाद जैसे मौके पर, एक नवनिर्मित शिलापट्ट से राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ को तोड़ना केवल एक राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि धार्मिक कट्टरता और राष्ट्र-विरोधी भावना का शर्मनाक प्रदर्शन है। यह कृत्य एक विशेष प्रकार की मानसिकता की ओर संकेत करता है, जिसका प्रदर्शन अफगानिस्तान के बामियान में बुद्ध प्रतिमाओं से लेकर पाकिस्तान-बांग्लादेश के हिन्दू मंदिरों और भारत में जम्मू-कश्मीर की हजरतबल दरगाह में अशोक स्तंभ पर हमले में होता है। इसी कट्टरपंथी सोच ने भारत में अनेक मंदिरों को निशाना बनाया है। इस मानसिकता ने संप्रदाय के नाम पर दुनियाभर में मूर्तियों और प्रतीकों को ध्वस्त किया है। सोचिए कि जो सोच प्रतीक चिह्नों से इनती नफरत करती है, उसने मनुष्यों के साथ किस तरह का बर्बर व्यवहार किया गया होगा।
सोमवार, 21 जुलाई 2025
न्यायालय की सुने समाज- लव जिहाद के विरुद्ध भय और संकोच छोड़कर सच बोलना ही होगा
लव जिहाद की साजिश जिस तरह सामाजिक संरचना को चोट पहुँचा रही है, उसे देखकर अब न्यायालय भी चिंतित दिखायी देने लगा है। हरियाणा के एक प्रकरण में ‘लव जिहाद’ के दोषी मुस्लिम युवक को सजा सुनाते हुए फास्ट ट्रैक कोर्ट की न्यायमूर्ति रंजना अग्रवाल ने जो चिंता व्यक्त की है, उसे समाज के प्रबुद्ध वर्ग को ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए। लव जिहाद पर न्यायालय की चिंता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। न्यायालय ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि “यह भी प्रामाणिक तथ्य है कि पिछले कई वर्षों से मुस्लिम पुरुष प्रेम के नाम पर भोली-भाली हिंदू लड़कियों को किसी न किसी तरह से बहकाकर उनसे विवाह कर लेते हैं और फिर इस्लाम में मतांतरित कर लेते हैं। यदि इस प्रक्रिया को उदार दृष्टिकोण अपनाकर जारी रहने दिया गया तो यह हमारे देश की सुरक्षा और अस्तित्व के लिए खतरा बन जाएगा। यह मामला दर्शाता है कि हरियाणा में लव जिहाद एक वास्तविकता है”। न्यायालय की यह टिप्पणी उन सबको सुननी चाहिए, जो स्वयं को सेकुलर दिखाने के चक्कर में लव जिहाद की घटनाओं को स्वीकार ही नहीं करना चाहता है।
शुक्रवार, 11 जुलाई 2025
जिहादियों के निशाने पर भारत और हिन्दू
कन्वर्जन के नेटवर्क का एक छोटा-सा प्यादा है जमालुद्दीन उर्फ छांगुर
भारत को ‘गजवा-ए-हिंद’ बनाने और ‘लव जिहाद’ की साजिशें केवल गल्प नहीं है, बल्कि हिन्दू धर्म और भारत के लिए इन्हें बड़े खतरे के तौर पर देखा जाना चाहिए। ‘गजवा-ए-हिंद’ और ‘लव जिहाद’ की अवधारणाओं को नकारना एक प्रकार से सच्चाई से मुंह मोड़ना है। यह आत्मघाती प्रवृत्ति है। सच को स्वीकार करके उसका समाधान निकालने का प्रयत्न करना ही एक जागृत समाज की पहचान है। भारत में प्रतिदिन ही इस प्रकार के मामले सामने आ रहे हैं, जिससे यह स्थापित होता है कि लव जिहाद और गजवा-ए-हिंद के पीछे बड़े कट्टरपंथी गिरोह शामिल हैं। उत्तरप्रदेश में पकड़ा गया बहुस्तरीय कन्वर्जन का नेटवर्क चलानेवाला फेरीवाला जमालुद्दीन उर्फ छांगुर बाबा, इस व्यापक नेटवर्क का एक प्यादा भर है। अभी हाल ही में हिन्दू लड़कियों से लव जिहाद के लिए मुस्लिम लड़कों की फंडिंग करने के आरोप कांग्रेस के मुस्लिम नेता एवं पार्षद अनवर कादरी पर लगे हैं। जरा सोचकर देखिए कि भारत में हिन्दुओं को कर्न्वट करने का धंधा कितने बड़े पैमाने पर चल रहा है।
हिन्दुओं को कन्वर्ट करने के इस खेल में केवल इस्लामिक संस्थाएं ही नहीं है अपितु चर्च भी शामिल है। पूर्वोत्तर के राज्यों में चर्च ने अपने पैर किस तरह फैलाए हैं, यह किसी से छिपी हुई बात नहीं है। जनजातीय क्षेत्रों में चर्च व्यापक स्तर पर कन्वर्जन का धंधा चला रहा है। चर्च ने पंजाब को अपना हॉट स्पॉट बना रखा है। पंजाब के कितने ही गाँव ईसाई बन गए हैं। इसकी अनेक कहानियां बिखरी पड़ी हैं। हिन्दुओं को कन्वर्ट करने के लिए इस्लामिक संस्थाओं और मिशनरीज को बड़े पैमाने पर विदेशों से फंडिंग होती है। छांगुर बाबा की गिरफ्तारी के बाद हो रहे खुलासों में यह सब सामने आ रहा है। केवल 5-6 साल में ही कन्वर्जन का धंधा फैलाकर साइकिल पर सामान बेचनेवाला फेरीवाला जमालुद्दीन ने छांगुर बाबा बनकर आलीशान कोठी, लग्जरी गाड़ियों और कई फर्जी संस्थाओं का मालिक बन गया है। जांच एजेंसियों के अनुसार, जमालुद्दीन खुद को हाजी पीर जलालुद्दीन बताता था। लड़कियों को बहला-फुसलाकर जबरन उनका धर्मांतरण करवाता।
मंगलवार, 29 अप्रैल 2025
यह लव जिहाद नहीं तो क्या है?
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| साभार : स्वदेश ज्याेति |
भोपाल और इंदौर से लव जिहाद के जिस प्रकार के मामले सामने आए हैं, वे एक खतरनाक प्रवृत्ति की ओर संकेत कर रहे हैं। यह मामले अनिवार्य रूप से उस मानसिकता का संकेत दे रहे हैं जिसमें मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा अपने मजहबी काम के तौर पर हिन्दू और गैर-इस्लामिक युवतियों को साजिश पूर्वक अपने जाल में फंसाया जाता है, उनका शारीरिक-मानसिक शोषण किया जाता जाता है। उसके बाद उन्हें या तो आपराधिक जगत में धकेल दिया जाता है या फिर इस्लाम में कन्वर्ट करके सम्प्रदाय के विस्तार के लिए उनका दुरुपयोग किया जाता है। चिंता की बात यह है कि ये मामले केवल भोपाल और इंदौर तक सीमित नहीं होंगे। मामले की गहराई से पड़ताल की जाए तो इस तरह के गिरोह मध्यप्रदेश के अन्य जिलों में भी सक्रिय मिलेंगे, जो मजहबी मानसिकता से हिन्दू युवतियों को अपना शिकार बना रहे होंगे। इस लव जिहाद के पीछे बड़ा तंत्र है, जिसके तार हमें देशभर में फैले दिखाई देते हैं। फ़िल्म 'द केरल स्टोरी' के माध्यम से पहली बार लव जिहाद की साजिश को बड़े स्तर पर समाज के सामने लाया गया। उससे पहले केरल के उच्च न्यायालय ने 'लव जिहाद' शब्द का पहली बार उपयोग करते हुए, इस प्रवृत्ति पर अपनी चिंता जताई थी। परंतु हमने बीमारी को पहचान करके उसका उपचार करने की बजाय बीमारी को नकारने में अपनी पूरी ऊर्जा खर्च कर दी। भोपाल के प्रकरण में भी पुलिस प्रशासन ने यही गलती की। यदि मीडिया ने खोज-पड़ताल करके इस समाचार को प्रकाशित नहीं किया होता, तब पुलिस मामले को यूँ ही रफा-दफा कर देती। कहना होगा कि हम हर बार इस प्रकार के मामलों में सेकुलर दिखने की चक्कर में शुतुरमुर्ग बन जाते हैं।
शनिवार, 7 सितंबर 2024
कांग्रेसी मंत्री ने स्वीकारा अवैध घुसपैठ और लव जिहाद का सच
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| हिमाचल प्रदेश के संजौली में मस्जिद के अवैध निर्माण, घुसपैठ और लव जिहाद की जानकारी विधानसभा के पटल पर रखते हुए कांग्रेस के मंत्री अनिरुद्ध सिंह |
भारतीय राजनीति में वोटबैंक की राजनीति के चलते कांग्रेस ने सांप्रदायिक चुनौतियों को हमेशा नजरअंदाज किया है। अपितु जिसने भी अवैध घुसपैठ और लव जिहाद जैसे मुद्दों को उठाया है, कांग्रेस ने उन्हें ही सांप्रदायिक ठहराने पर जोर दिया है। जबकि होना यह चाहिए था कि कांग्रेस जैसा राजनीतिक दल समाज की इन चुनौतियों को स्वीकार करके उनके समाधान पर चर्चा करता। सच को अस्वीकार करके सेकुलरिज्म को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। अवैध घुसपैठ, अतिक्रमण, लव जिहाद, लैंड जिहाद जैसे मुद्दों की अनदेखी करके या उनका बचाव करके सेकुलरिज्म नहीं अपितु सांप्रदायिकता का ही पोषण होता है। जिसकी अनुभूति अब हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता एवं मंत्रीगण कर रहे हैं।
बुधवार, 31 जुलाई 2024
बरेली में हिन्दू युवक की पीट-पीटकर हत्या पर सेकुलर बिरादरी में खामोशी
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| साभार : पाञ्चजन्य / Panchjanya |
भारत में सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने में अपने आप को सेकुलर एवं प्रगतिशील कहनेवाले वर्ग की प्रमुख भूमिका है। जिस प्रकार से एक-दो घटनाओं को आधार बनाकर हिन्दू समाज के प्रति अभियान चलाए जाते हैं और मुस्लिम समाज को भड़काने एवं हिन्दुओं के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयास किए जाते हैं, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि वास्तव में सेकुलर वर्ग ही सांप्रदायिक है। सेकुलर बिरादरी के कारण जिस प्रकार का नकारात्मक वातावरण बना है, उसके कारण से हिन्दुओं पर लगातार हमले बढ़ रहे हैं। अभी हाल में उत्तरप्रदेश के बरेली जिले के गाँव गौसगंज में मुस्लिम समुदाय ने हिन्दू समुदाय पर पथराव कर दिया, लोगों को घेरकर पीटा गया और तोड़फोड़ की गई। असामाजिक तत्वों की यह भीड़ गाँव के युवक तेजराम को घसीटकर मस्जिद में ले गए और वहाँ उसकी पीट-पीटकर हत्या कर दी। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि समूचा सेकुलर वर्ग तेजराम की मॉब लिंचिंग पर मुंह में दही जमाकर बैठा हुआ है।
अखलाक की मौत की बात सारी दुनिया में हुई और लेफ्ट मीडिया ने भारत को लिंचिस्तान घोषित कर दिया।
— Ashok Shrivastav (@AshokShrivasta6) July 30, 2024
लेकिन तेजाराम को मस्जिद में लिंच करके मार दिया गया, पर इसके चर्चे कहीं नहीं हुए pic.twitter.com/NecSziTeLb
आखिर क्या कारण हैं कि मुस्लिम बंधुओं के साथ होनेवाली ऐसी ही घटना पर हो-हल्ला मचानेवाले हिन्दुओं की मॉब लिंचिंग पर खामोशी की चादर ओढ़ लेते हैं? जिस समय में मुस्लिम भीड़ मस्जिद में तेजराम की पीट-पीटकर हत्या कर रही थी, उसी वक्त यह सेकुलर वर्ग कांवड़ियों द्वारा तोड़-फोड़ की एक-दो घटनाओं को आधार बनाकर समूचे कांवड़ियों और हिन्दुओं को बदनाम करने में लगे हुए हैं। यह किस तरह का चयनित दृष्टिकोण है? इसे सेकुलर बिरादरी के लेखकों एवं पत्रकारों का दोगला आचरण क्यों नहीं माना जाना चाहिए? इसे सांप्रदायिकता का पोषण करनेवाली प्रवृत्ति क्यों नहीं मानी जानी चाहिए?
मंगलवार, 14 जून 2022
विश्वपटल पर एकजुट हो सज्जनशक्ति
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| चित्र प्रतीकात्मक है. पाकिस्तान के ही किसी मंदिर पर हमले का यह चित्र है. |
शिवलिंग पर की जा रहीं आपत्तिजनक टिप्पणियों के विरोध में किये गए एक बयान के आधार पर भारत के विरुद्ध नकारात्मक वातावरण बनानेवाला पाकिस्तान कभी अपने गिरेबान में झाँककर देखने की कोशिश नहीं करता। हिंदुओं सहित गैर-इस्लामिक मत के अनुयायियों पर होनेवाले अत्याचार पाकिस्तान के भीतर की कालिख को उसके मुंह पर मलने के लिए पर्याप्त हैं। कट्टरता और घोर सांप्रदायिक सोच में डूबा पाकिस्तान न जाने किस मुंह से दुनिया के सबसे बड़े और सफल लोकतंत्र पर सवाल उठाता है। पाकिस्तान में जो हाल हिन्दू समुदाय का है, वही स्थिति उनके पूजास्थलों के साथ भी है। अक्सर हिन्दू मंदिर कट्टरपंथियों की हिंसा का शिकार हो जाते हैं। विगत बुधवार को एक बार फिर कराची के कोरंगी इलाके में श्री मरी माता मंदिर में मूर्तियों पर हमला हुआ। श्री मरी माता मंदिर कोरंगी पुलिस स्टेशन से कुछ ही दूरी पर स्थित है। इसका अर्थ है कि पाकिस्तान में अतिवादियों के मन में पुलिस का भी भय नहीं है।
शनिवार, 11 जून 2022
नूपुर शर्मा विवाद : प्रदर्शन और मानसिकता
शनिवार, 8 जनवरी 2022
सूर्य नमस्कार का मूर्खतापूर्ण विरोध
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के निर्णय एवं प्रस्ताव स्पष्ट करते हैं कि मुस्लिम समुदाय को पिछड़ा रखने एवं उसमें सांप्रदायिक कट्टरता को बढ़ावा देने में इस संस्था की बड़ी भूमिका है। अपनी सांप्रदायिक सोच एवं प्रस्तावों के कारण यह संस्था विवादों में रहती है। पिछले दिनों भारत में पाकिस्तान के घोर सांप्रदायिक ‘ईशनिंदा कानून’ को भारत में लागू करने की माँग करके मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड विवादों में रहा था। उस समय देशभर में इस सांप्रदायिक माँग का विरोध किया गया। लेकिन उसके बाद भी बोर्ड ने अपनी सोच को बदला नहीं है। अब बोर्ड ने सूर्य नमस्कार का विरोध करके जता दिया है कि उसे कथित ‘गंगा-जमुनी संस्कृति’ से उसको कोई लेना-देना नहीं है। सबको मिलकर ऐसी कट्टर और संकीर्ण विचारों का विरोध करना चाहिए। इस तरह के विचारों को हतोत्साहित करना सभी समुदायों के हित में है।
बुधवार, 1 दिसंबर 2021
इस्लामिक कानूनों की माँग का औचित्य
शनिवार, 19 जून 2021
झूठ के सहारे सांप्रदायिक तनाव की साजिश
गाजियाबाद में ‘जय श्रीराम’ नहीं कहने पर एक मुस्लिम बुजुर्ग के साथ मारपीट की गई और उसकी दाढ़ी काट दी गई। इस आशय का एक वीडियो वायरल कर देश की तथाकथित सेकुलर बिरादरी ने एक बार फिर भारत और हिन्दू धर्म पर हमला बोल दिया। देश में सांप्रदायिक तनाव पैदा करने के उद्देश्य से फैलाए गए इस झूठ को उन तथाकथित पत्रकारों एवं वेबसाइट्स ने भी साझा किया, जो स्वयं को ‘फैक्ट-चेकर’ (Fact Checker) बताते हैं। ‘कौव्वा कान ले गया’ की तर्ज पर विपक्षी दलों के नेता लोग भी इस झूठ को ले उड़े। मानो कि हिन्दू समाज को कठघरे में खड़ा करने के लिए ये लोग तैयार बैठे रहते हैं। गाजियाबाद पुलिस ने तत्काल मामले की पड़ताल कर यह स्पष्ट कर दिया कि यह आपसी विवाद का मामला है और उसमें आरोपी सिर्फ हिन्दू नहीं है बल्कि तीन मुस्लिम (आरिफ, आदिल और मुशाहिद) भी पकड़े गए हैं, जिन्होंने बुजुर्ग के साथ मारपीट की और कथित तौर पर उसकी दाढ़ी काटी। अब भला मुस्लिम लोग ही मुस्लिम बुजुर्ग को ‘जय श्रीराम’ नहीं कहने पर क्यों पीटेंगे? हिन्दू ऐसा करेंगे, यह सवाल ही बेकार है। अब तक इस तरह के जितने भी मामले आये हैं, वे फर्जी निकले या उनका सच कुछ और था।
सोमवार, 14 जून 2021
मदरसे में बम विस्फोट से उपजे सवाल
बिहार के बांका जिले के मदरसे में हुए विस्फोट से अनेक प्रश्न उठने लगे हैं। यह स्वाभाविक ही है। क्योंकि उसके मूल में दो बातें हैं- एक, मदरसे संदिग्ध गतिविधियों को लेकर पहले भी सवालों के घेरे में आते रहे हैं। दो, यह बड़ा सवाल है कि शिक्षा संस्थान में विस्फोटक सामग्री का क्या उपयोग किया जा रहा था? बांका के मदरसे में विस्फोट के बाद जिस तरह की संदिग्ध गतिविधियों को अंजाम दिया गया, उनसे भी अनेक संदेह उत्पन्न हो रहे हैं। सांप्रदायिक शिक्षा के नाम पर देशभर में संचालित मदरसे केवल अपनी कट्टरवादी तालीम के लिए ही बदनाम नहीं है, बल्कि हिंसक गतिविधियों एवं विस्फोटक सामग्री के भंडारण केंद्र होने के आरोप पहले भी मदरसों पर लगते रहे हैं। पूर्व में भी मदरसों में बम विस्फोट की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले के खागरागढ़ के एक मदरसे में हुए बम विस्फोट में तो दो आतंकियों की मौत हुई थी और उस विस्फोट के तार बांग्लादेश के आतंकी गिरोह जमात-उल-मुजाहिदीन से जुड़े थे। बिहार के बांके जिले के मदरसे में हुए बम विस्फोट को भी उसी तरह की घटना माना जा रहा है।
अब तक सामने आई जानकारी के अनुसार अवैध ढंग से बने इस मदरसे में धमाका कंटेनर में रखे एक देसी बम के फटने से हुआ है। मौलाना के मौत की वजह दम घुटना बताया गया है। विस्फोट इतना जबरदस्त था कि मदरसे का भवन पूरी तरह ध्वस्त हो गया और इलाका धमाके से थर्रा गया था। मौके पर बम बाँधने में उपयोग की जाने वाली सुतली, कील और कंटेनर के प्रमाण मिले हैं। ये प्रमाण संकेत देते हैं कि मदरसे में बम बनाने का कार्य किया जा रहा था। विस्फोटक सामग्री भी भारी मात्रा में रही होगी, तभी इतना बड़ा धमाका संभव हो सका। सोचिए, यदि उस समय वहाँ बच्चे पढ़ रहे होते, तब क्या स्थिति बनती? ये मदरसे बच्चों का भविष्य संवारने के केंद्र हैं या फिर उनके जीवन को सब प्रकार के नष्ट करने के अड्डे?
कुछ स्थानीय लोगों के हवाले से बताया गया था कि मौलाना बम बनाता था और तीन युवक उसका सहयोग करते थे। क्षेत्र में छोटी-छोटी बात पर बमबारी होती थी। भागलपुर से बारूद लाकर काम किया जाता था। यह भी तथ्य सामने आ रहे हैं कि मौलाना का संबंध तबलीगी जमात से था और उसका बांग्लादेश आना-जाना भी था।
बहरहाल, इस घटना की जाँच राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी द्वारा कराई जानी चाहिए। यह छोटी और सामान्य घटना नहीं है। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। बांका की घटना से सबक लेकर देश के अन्य राज्यों में संचालित मदरसों की जाँच भी समय रहते करनी चाहिए और उनकी निगरानी बढ़ानी चाहिए। अब समय आ गया है कि मदरसों के संचालन के लिए स्पष्ट और पारदर्शी व्यवस्था बने। मदरसों पर सरकार का पूरा नियंत्रण हो। वहाँ सरकार द्वारा तय पाठ्यक्रम ही पढ़ाया जाए। प्रशासन को लगातार मदरसों का औचक निरीक्षण करना चाहिए ताकि सांप्रदायिक तालीम की आड़ में वहाँ चलने वाली संदिग्ध एवं खतरनाक गतिविधियों को रोका जा सके।














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