रविवार, 24 अप्रैल 2022

केरल में बेलगाम राजनीतिक हिंसा


केरल में राजनीतिक हिंसा के लिए कम्युनिस्ट सरकार की अक्षमता जिम्मेदार है या फिर यह कम्युनिस्ट विचारधारा के रक्तचरित्र का प्रकटीकरण। जब से केरल में कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में आई है, तब से वैचारिक असहमतियों को क्रूरतापूर्ण ढंग से खत्म करने एवं दबाने के प्रयास बढ़ गए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने केरल को पूरी तरह से कम्युनिस्ट विचारधारा के ‘प्रैक्टिकल’ की प्रयोगशाला बना दिया है। भारत में ही नहीं अपितु दुनिया में जहाँ भी कम्युनिस्ट शासन व्यवस्था रही हैं, वहां हिंसा के बल पर उन्होंने अपने विरोधियों को समाप्त करने का प्रयास किया है। भारत में केरल, त्रिपुरा एवं पश्चिम बंगाल सहित विभिन्न राज्यों के कुछ हिस्सों में भी यही दिखाई देता है। 

केरल में जब से कम्युनिस्ट सत्ता में आए हैं, तब से कानून का राज दिख नहीं रहा है। जिस तरह चिह्नित करके राष्ट्रीय विचार के साथ जुड़े लोगों की हत्याएं की जा रही हैं, उसे देख कर यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि केरल में जंगलराज आ गया है। लाल आतंक अपने चरम की ओर बढ़ रहा है। ‘ईश्वर का घर’ किसी बूचडख़ाने में तब्दील होता जा रहा है। 16 अप्रैल को एक बार फिर गुण्डों की भीड़ ने केरल के पलक्कड़ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता की हत्या कर दी है। वहीं, पलक्कड़ में ही एक जगह और हुई हिंसा में संघ के ही एक अन्य कार्यकर्ता के घायल होने की भी सूचना है। केरल मं, लगातार राजनीतिक हत्याएं हो रही हैं। संघ कार्यकर्ता श्रीनिवासन संगठन के शारीरिक शिक्षण प्रमुख के पद पर यह चुके थे। एक दुकान के पास उनकी हत्या हुई। तीन बाइक पर आए पाँच बदमाशों ने 20 बार से अधिक तलवार से वार करके उन्हें मार डाला। 

दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि केरल में हो रही राजनीतिक हिंसा पर तथाकथित बौद्धिक जगत चुप्पी साधकर बैठ जाता है। संघ के कार्यकर्ता की क्रूरता से की गई हत्या किसी को अवार्ड वापस करने एवं असहिष्णुता के विरोध में आंदोलन करने के लिए प्रेरित नहीं करेगी। दिल्ली से उठते अभिव्यक्ति की आजादी और असहिष्णुता के नारे केरल क्यों नहीं पहुंचते? राष्ट्रभक्त लोगों के लहू से लाल हो रही देवभूमि क्यों किसी को दिखाई नहीं दे रही है? यह चुप्पी तो यही बताती है कि ये तथाकथित बुद्धिजीवी, लेखक, कलाकार एवं पत्रकार भी कम्युनिस्ट राज्य की हिंसा के पक्षधर हों। 

केरल में पिछले लगभग 60 वर्षों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय सेविका समिति सहित अन्य सभी राष्ट्रीय विचार से संबंद्ध संगठनों के सामान्य स्वयंसेवकों की हत्या की जा रही है। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ता सहित इस्लामिक चरमपंथी गुटों द्वारा इन हत्याओं को अंजाम दिया जा रहा है। केरल में भयंकर रूप धारण कर चुके लाल आतंक के खिलाफ अब देश को उठकर खड़ा हो जाना चाहिए।

गुरुवार, 14 अप्रैल 2022

इस्लाम के कठोर आलोचक थे बाबा साहेब

बाबा साहेब डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर द्वारा की गईं हिन्दू धर्म की आलोचनात्मक टीकाओं को खूब उभारा जाता है, इसके पीछे की मंशा ठीक नहीं होती। बाबा साहेब ने हिन्दू धर्म में व्याप्त जातिप्रथा, जातिगत भेदभाव और उसके लिए जिम्मेदार प्रसंगों की आलोचना की, उसके मानवीय कारण हैं। उनकी आलोचनाओं को हिन्दू समाज ने स्वीकार भी किया क्योंकि उन आलोचनाओं के पीछे पवित्र नीयत थी। किन्तु जो लोग हिन्दू धर्म को लक्षित करके नुकसान पहुँचाने के लिए बाबा साहेब के कंधों का दुरुपयोग करने का प्रयत्न करते हैं, वे भूल जाते हैं कि बाबा साहेब ने सिर्फ हिन्दू धर्म की कमियों की ही आलोचना नहीं की, बल्कि उन्होंने ईसाई और इस्लाम संप्रदाय को भी उसके दोषों के लिए कठघरे में खड़ा किया है। ‘बहिष्कृत भारत’ में 1 जुलाई, 1927 को लिखे अपने लेख ‘दु:ख में सुख’ में बाबा साहेब लिखते हैं- “ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आदि प्रकार के भेद सिर्फ हिन्दू धर्म में ही हैं, ऐसी बात नहीं, बल्कि इस तरह के भेद ईसाई और इस्लाम में भी दिखाई देते हैं”। इस्लाम पर तो बाबा साहेब ने खूब कलम चलाई है। परंतु यहाँ तथाकथित प्रगतिशील बौद्धिक जगत एवं अन्य लोगों की बौद्धिक चालाकी उजागर हो जाती है, जब वे इस्लाम के संबंध में बाबा साहेब के विचारों पर या तो चुप्पी साध जाते हैं या फिर उन विचारों पर पर्दा डालने का असफल प्रयास करते हैं। आज बाबा साहेब होते तो वे निश्चित ही ‘भीम-मीम’ का खोखला, झूठा और भ्रामक नारा देने वालों को आड़े हाथों लेते।