संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पाँचवें सरसंघचालक श्री कुप्पहल्ली सीतारामय्या सुदर्शन स्वभाषा के प्रबल पक्षधर थे, हिन्दी में अंग्रेजी की मिलावट वे पसंद नहीं करते थे
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक कुप्प. सी. सुदर्शन भाषा की शुद्धता और व्याकरण को लेकर बेहद संवेदनशील थे। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में वर्तनी एवं व्याकरण की अशुद्धियों को वे कतई नजरअंदाज नहीं करते थे। भले ही उनकी अपनी मातृभाषा तमिल थी, लेकिन जन्मभूमि एवं कर्मभूमि हिन्दी भाषी क्षेत्र रहा। शायद इसलिए ही हिन्दी से उन्हें गहरा प्रेम था। हालांकि, सुदर्शनजी लगभग 12 भाषाओं पर अधिकार रखते थे। परिवार तमिल था लेकिन पूर्वज वर्षों पहले तमिलनाडु से स्थानांतरित होकर कर्नाटक में बस गए थे इसलिए कन्नड़ ही उनके परिवार की मुख्य भाषा बन गई थी। भाषा प्रेम को लेकर सुदर्शन जी के अनेक प्रेरक प्रसंग प्रचलित हैं। ऐसा ही एक किस्सा भोपाल का है, जब वे सरसंघचालक के दायित्व से मुक्त होकर ‘एक साधारण स्वयंसेवक’ की भाँति रह रहे थे। हिन्दी के हृदय प्रदेश, ‘मध्यप्रदेश’ से प्रकाशित हिन्दी के प्रमुख समाचार पत्र में जब उन्होंने अंग्रेजी के शब्दों की भरमार देखी, तो उन्हें क्षोभ हुआ। समाचारपत्र अपनी प्रतिष्ठा तो इस नाते करता है कि वह हिन्दी का सबसे बड़ा और सबसे अधिक प्रसारित समाचार पत्र है लेकिन हिन्दी भाषा के साथ न्याय नहीं करता है। उन्होंने लाल कलम से भाषा की त्रुटियों और अंग्रेजी के शब्दों पर गोले लगाए। उस रंगे-पुते समाचारपत्र को लेकर संपादक के कक्ष में भी पहुँच गए। सुदर्शनजी ने समाचारपत्र की वह प्रति संपादक की मेज पर रखकर उन्हें हिन्दी में अनावश्यक अंग्रेजी मिलावट के प्रति सचेत किया। यह बातचीत आक्रोश या अभिमान के साथ नहीं हो रही थी, बल्कि उसमें अपनत्व था। संपादक ने भी स्वीकार किया और विश्वास दिलाया कि हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों की मिलावट और वर्तनी की अशुद्धियों के प्रति सावधान रहेंगे।
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक, लेखक एवं ब्लॉगर लोकेन्द्र सिंह को 'राष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी सम्मान-2025' से सम्मानित किया गया। मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग की ओर से भोपाल के रवींद्र भवन में आयोजित अलंकरण समारोह में उन्हें यह सम्मान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, संस्कृति मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी और लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने प्रदान किया। सरकार यह सम्मान प्रतिवर्ष हिन्दी सॉफ्टवेयर सर्च इंजिन, वेब डिजाइनिंग, डिजीटल भाषा प्रयोगशाला, प्रोग्रामिंग, सोशल मीडिया, डिजीटल ऑडियो विजुअल एडीटिंग आदि में उत्कृष्ट योगदान के लिए देती है। उल्लेखनीय है कि ग्वालियर में जन्मे लोकेन्द्र सिंह देश के जाने-माने ब्लॉगर हैं। सोशल मीडिया और डिजीटल ऑडियो-वीडियो प्रोडक्शन में उनकी सक्रियता है। उनकी डॉक्युमेंट्री फिल्में राष्ट्रीय पुरस्कारों से पुरस्कृत हैं। नागरिकों को सोशल मीडिया का प्रशिक्षण देने में भी उनकी सक्रियता रहती है। इससे पूर्व मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी भी ‘फेसबुक/ब्लॉग/नेट’ हेतु ‘अखिल भारतीय नारद मुनि’ पुरस्कार से अलंकृत कर चुकी है। वर्तमान में आप माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में सहायक प्राध्यापक हैं।
युवाओं को साहित्य से जोड़े रखने के लिए आपने सोशल मीडिया के माध्यम से ऑडियो-विजुअल सामग्री का उपयोग करके अनूठे प्रयोग किए हैं। लेखक लोकेन्द्र सिंह का कहना है कि नयी पीढ़ी ऑडियो-वीडियो कंटेंट बहुत देख-सुन रही है। इसलिए लेखकों को प्रयास करना चाहिए कि हिन्दी साहित्य की अच्छी सामग्री को लोगों तक पहुंचाने के लिए ऑडियो-वीडियो प्रारूप को अपनाएं। सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग करके नयी पीढ़ी का प्रबोधन किया जा सकता है। लेखक लोकेन्द्र सिंह का कहना है कि जब उन्होंने इस प्रकार के प्रयास किए तो प्रारंभ में ही उत्साहजनक परिणाम प्राप्त हुए। उनकी डाक्युमेंट्री फिल्म ‘बाचा : द राइजिंग विलेज’ को राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। गाय पर बनायी फिल्म ‘गो-वर’ को खूब सराहा गया। इसी तरह छोटे कद को लेकर बनायी फिल्म ‘कद : हाइट डजन्ट मैटर’ ने भी फिल्म क्रिटिक की सराहना बटोरी है।
लेखक-ब्लॉगर लोकेन्द्र सिंह को सम्मानित करते मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री धर्मेन्द्र सिंह लोधी एवं लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह
मध्यप्रदेश से हिन्दी ब्लॉगिंग में उनका नाम राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित है। उन्होंने ऑनलाइन माध्यमों में वर्ष 2006-07 से लेखन प्रारंभ कर दिया था। ब्लॉग पर समसामयिक विषयों पर आलेखों के अतिरिक्त कहानी, कविता, ललित निबंध, रेखाचित्र, पुस्तक समीक्षाएं और यात्रा वृत्तांत प्रकाशित हैं। विभिन्न संस्थाओं की ओर से जारी की जाने वाली सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉग डायरेक्टरी में आपका ब्लॉग शामिल रहता है। ब्लॉगिंग पर चर्चा के लिए गूगल भी आपको आमंत्रित कर चुका है। आपकी पहचान ट्रैवल ब्लॉगर के रूप में भी है। नयी पीढ़ी ऑडियो-वीडियो सामग्री बहुत देख-सुन रही है।
सम्मान समारोह में मंच पर उपस्थित हैं- मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, संस्कृति एवं पर्यटन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री धर्मेंद्र सिंह लोधी, लोक निर्माण मंत्री श्री राकेश सिंह, विधायक श्री भगवानदास सबनानी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलगुरु श्री विजय मनोहर तिवारी, संचालक संस्कृति श्री एमपी नामदेव, वीर भारत न्यास के न्यासी सचिव श्रीराम तिवारी सहित सम्मानित हुए साहित्यकार।
इन महानुभावों को मिले सम्मान-
राष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी सम्मान : श्री प्रशांत पोळ-जबलपुर (2024) एवं श्री लोकेन्द्र सिंह राजपूत- भोपाल (2025)
राष्ट्रीय निर्मल वर्मा सम्मान : सुश्री रीता कौशल-ऑस्ट्रेलिया (2024) एवं डॉ. वंदना मुकेश- इंग्लैण्ड (2025)
राष्ट्रीय फादर कामिल बुल्के सम्मान : डॉ. इंदिरा गाजिएवा-रूस (2024) एवं श्रीमती पदमा जोसेफिन वीरसिंघे (2025)
राष्ट्रीय गुणाकर मुले सम्मान : डॉ. राधेश्याम नापित-शहडोल (2024) एवं डॉ. सदानंद दामोदर सप्रे-भोपाल (2025)
राष्ट्रीय हिन्दी सेवा सम्मान : डॉ. के.सी. अजय कुमार-तिरुवनंतपुरम् (2024) एवं डॉ. विनोद बब्बर-दिल्ली (2025)
16 सितंबर, 2025 को भोपाल से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र 'लोकसत्य' में प्रकाशित समाचार
वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय (26 अगस्त, 1960- 1 सितंबर, 2024)
श्रद्धेय उमेश उपाध्याय जी भारतीय पत्रकारिता के उजले सितारों में से एक थे। सभी माध्यमों की पत्रकारिता में उनका एक सम्मानित स्थान था। यही कारण है कि उनके असमय निधन पर विभिन्न क्षेत्रों के पत्रकार बंधु दुःखी मन से उनके साथ बिताए अविस्मरणीय एवं प्रेरणादायी प्रसंगों का स्मरण कर रहे हैं।
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के साथ उनका गहरा और आत्मीय जुड़ाव था। विगत 14-15 वर्षों से विश्वविद्यालय को उनके अनुभव का लाभ मिल रहा था। वे विश्वविद्यालय की महापरिषद के सम्मानित सदस्य थे। विद्या परिषद एवं अन्य समितियों में भी उनके विजन का लाभ विश्वविद्यालय को मिला है। अनेक अवसरों पर विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों का प्रबोधन उन्होंने किया। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की ओर से दिए जानेवाला प्रतिष्ठित ‘गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार’ भी उन्हें प्रदान किया गया था।
तुर्की जब स्वतंत्र हुआ, तब आधुनिक तुर्की के संस्थापक कमालपाशा ने जिन बातों पर गंभीरता से ध्यान दिया, उनमें से एक भाषा भी थी। कमालपाशा ने विरोध के बाद भी बिना समय गंवाए शिक्षा से विदेशी भाषा को हटा कर तुर्की को अनिवार्य कर दिया। क्योंकि, वह तुर्की के लोगों में राष्ट्रीयता की भावना का विस्तार करना चाहते थे, इसके लिए उन्हें अपनी भाषा की आवश्यकता थी। चूँकि उस समय तुर्की अरबी लिपि में लिखी जाती थी, इसलिए उन्होंने एक घोषणा और की जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे लोग सरकारी नौकरी से वंचित कर दिए जाएंगे, जिन्हें लैटिन लिपि का ज्ञान नहीं होगा। इसी प्रकार दुनिया भर में बिखरे यहूदियों को जब उनकी भूमि प्राप्त हुई, तो उन्होंने भी अपनी भाषा ‘हिब्रू’ को ही अपनाया। सोचिए, भूमिहीन यहूदियों की भाषा कहीं लिखत-पढ़त के व्यवहार में नहीं थी। इसके बाद भी जब यहूदियों ने इजराइल का नवनिर्माण किया तो राख के ढेर में दबी अपनी भाषा हिब्रू को जिंदा किया। आज जिस अंग्रेजी की अनिवार्यता भारत में स्थापित करने का प्रयास किया जाता है, उसके स्वयं के देश ब्रिटेन में वह एक जमाने में फ्रेंच की दासी थी। बाद में ब्रिटेन के लोगों ने आंदोलन कर अपनी भाषा ‘अंग्रेजी’ को उसका स्थान दिलाया। अपनी भाषा में समस्त व्यवहार करने वाले यह देश आज अग्रणी पंक्ति में खड़े हैं। अपनी भाषा में शिक्षा-दीक्षा के कारण ही यहाँ के नागरिक अपने देश की उन्नति में अधिक योगदान दे सके। अपनी भाषा का महत्व दुनिया के लगभग सभी देश समझते हैं। इसलिए उनकी आधिकारिक भाषा उनकी अपनी मातृभाषा है। किंतु, हम अभागे लोग जब स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भी मानसिक दासिता से मुक्ति नहीं पा सके। महात्मा गांधी के आग्रह के बाद भी अंग्रेजी का मोह नहीं छोड़ सके।
प्रखर संपादक माणिकचंद्र वाजपेयी उपाख्य ‘मामाजी’ की 101वीं जयंती पर विशेष
‘मन समर्पित, तन समर्पित और यह जीवन समर्पित। चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ’। कवि रामावतार त्यागी की यह पंक्तियां यशस्वी संपादक माणिकचंद्र वाजपेयी उपाख्य ‘मामाजी’ के जीवन/व्यक्तित्व पर सटीक बैठती हैं। मामाजी ने अपने ध्येय की साधना में सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। उनका जीवन आज की पीढ़ी के लिए संदेश बन गया है। सादगी, सरलता और निश्छलता के पर्याय मामाजी ने अपने मौलिक चिंतन और धारदार लेखनी से पत्रकारिता में भारतीय मूल्यों एवं राष्ट्रीय विचार को प्रतिष्ठित किया। मामाजी उन विरले पत्रकारों में शामिल हैं, जिन्होंने पत्रकारिता के मिशनरी स्वरूप को जीवित रखा। उन्होंने कभी भी पत्रकारिता को एक प्रोफेशन के तौर पर नहीं लिया, बल्कि उन्होंने पत्रकारिता को देश, समाज और राष्ट्रीय विचार की सेवा का माध्यम बनाया। सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर उन्होंने सदैव समाज को जागरूक किया। आपातकाल, हिन्दुत्व, जम्मू-कश्मीर, स्वदेशी, श्रीराम जन्मभूमि, जातिवाद, छद्म धर्मनिरपेक्षता, कन्वर्जन, शिक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और देश के स्वाभिमान से जुड़े विषयों पर लेखन कर उन्होंने समाज को मतिभ्रम की स्थिति से बाहर निकाला। सामाजिक, राजनीतिक और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर उन्होंने विपुल लेखन किया है, जो आज भी प्रासंगिक है। स्वदेश में प्रकाशित उनकी लेखमालाएं ‘केरल में मार्क्स नहीं महेश’, ‘आरएसएस अपने संविधान के आईने में’, ‘समय की शिला पर’ इत्यादि बहुत चर्चित हुईं। ये लेखमालाएं आज भी पठनीय हैं।
मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी का पत्रकारीय जीवन लगभग 40 वर्ष का रहा। वैसे तो पत्रकारिता में उनका प्रवेश भिंड में ही हो चुका था, जहाँ वे ‘देश-मित्र’ समाचारपत्र का संचालन कर रहे थे। लेकिन, एक सजग एवं प्रखर पत्रकार के रूप में उनकी पहचान स्वदेश से जुडऩे के बाद ही बनी। 1966 में विजयदशमी के शुभ अवसर पर इंदौर में दैनिक समाचारपत्र ‘स्वदेश’ की स्थापना हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक सुदर्शनजी की प्रेरणा से प्रारंभ हुए इस महत्वपूर्ण समाचारपत्र के संपादक की जब खोज प्रारंभ हुई तो वह मामाजी के नाम पर जाकर पूरी हुई। स्थापना वर्ष से ही मामाजी ‘स्वदेश’ से जुड़ गए लेकिन संपादक का दायित्व उन्होंने 1968 से संभाला। 17 वर्ष तक वे स्वदेश, इंदौर के संपादक रहे। अपने संपादकीय कौशल से उन्होंने मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में भारतीयता की एक सशक्त धारा प्रवाहित कर दी। मामाजी की लेखनी का ही प्रताप था कि स्वदेश शीघ्र ही मध्यप्रदेश का प्रमुख समाचारपत्र बन गया। प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी स्वदेश की माँग होने लगी। ग्वालियर में राजमाता विजयाराजे सिंधिया की प्रेरणा से दैनिक समाचारपत्र ‘हमारी आवाज’ प्रकाशित हो रहा था। 1970 में राजमाता ने इंदौर प्रवास के दौरान स्वदेश का प्रभाव देखा, तब उन्होंने सुदर्शनजी के सामने प्रस्ताव रखा कि ग्वालियर से भी स्वदेश का प्रकाशन होना चाहिए और राजमाता का समाचारपत्र ‘हमारी आवाज’ अब ‘स्वदेश’ के रूप में प्रकाशित होने लगा। मामाजी से प्रेरित प्रखर संपादक राजेन्द्र शर्मा के नेतृत्व में स्वदेश (ग्वालियर) ने लोकप्रियता के कीर्तिमान रच दिए। बाद में, राजेन्द्र जी ने भोपाल से स्वदेश की शुरुआत की। इंदौर से सेवानिवृत्त होने के बाद मामाजी स्वदेश (ग्वालियर) के संपादक एवं प्रधान संपादक रहे और स्वदेश (भोपाल) के साथ भी सलाहकार संपादक के रूप में जुड़े। मामाजी अपने जीवन के अंतिम समय तक स्वदेश से जुड़े रहे। पत्रकारिता जगत में मामाजी और स्वदेश, एक-दूसरे के पर्याय हो गए थे।
मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी ने ध्येय के प्रति अपना जीवन समर्पित करके न केवल स्वदेश की स्थापना की बल्कि इस समाचारपत्र के माध्यम से उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता का वातावरण ही बदल दिया। मामाजी ने किस तरह के वातावरण में राष्ट्रीय विचार को केंद्र में रखते हुए स्वदेश को प्रतिष्ठा दिलाई और उनके लिए पत्रकारिता का क्या अर्थ था, यह समझने के लिए हमें उनके ही विचार प्रवाह से होकर गुजरना चाहिए। स्वदेश (ग्वालियर) के 25 वर्ष पूर्ण होने पर प्रकाशित स्मारिका में अपने आलेख में मामाजी लिखते हैं- “आजादी के बाद भी ‘स्व’ उपेक्षित और प्रताडि़त था। तुष्टीकरण की जिस आत्मघाती नीति के कारण देश का विभाजन हुआ, उसे ही कल्याणकारी साबित करने की होड़ लगी थी। छद्म धर्मनिरपेक्षिता का सर्वत्र बोलबाला था। राष्ट्रवाद को साम्प्रदायिक घोषित कर दिया गया था। प्रगतिशीलता के नाम पर हिन्दुत्व यानी भारतीयत्व की खिल्ली उड़ाई जा रही थी। समाज को तोडऩे वाली नीतियों एवं कार्यक्रमों को संरक्षण मिल रहा था। पत्रकारिता भी इन्हीं तुष्टीकरण तथा छद्म धर्मनिरपेक्षता वादियों की चेरी बनी हुई थी। वह गांधी, तिलक, अरविंद, दीनदयाल उपाध्याय और दादा माखनलाल चतुर्वेदी के मार्ग से हट गई थी, भटक गई थी। भारतीय राष्ट्रीयता के पर्यायवाची हिन्दुत्व के विचार से वह ऐसे बिचकती थी, जैसे लाल कपड़े को देखकर साड़। सड़ी लाश मानकर वह उससे घृणा करती थी। जनता भ्रमित थी तथा सत्ता निरंकुश। ऐसी विषम स्थिति में स्वदेश ने अपने जन्मकाल से ही राष्ट्रवाद के पक्ष में खड़े होने का संकल्प लिया। उसी कण्टकाकीर्ण मार्ग को उसने अपने लिए चुना। उसके जन्म का उद्देश्य ही वही था”।
मामाजी ने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। प्रत्येक परिस्थिति में सच के साथ खड़े रहे। जब समूची पत्रकारिता भ्रमित होकर भारतीय मूल्यों के विरुद्ध ही प्रचार करने लगती, तब भी मामाजी की लेखनी भटकती नहीं। वे धारा के साथ बहने वाले लोगों में नहीं थे। जब गो-हत्या बंद करने की माँग को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे हजारों साधु-संतों पर गोलियां चलाई गईं, तब पत्रकारिता में एक बड़ा वर्ग गो-भक्तों के विरोध में खड़ा था। जब पत्रकारिता के माध्यम से इन साधु-संन्यासियों एवं गो-भक्तों को सांप्रदायिक और दंगाई सिद्ध करने के प्रयत्न हो रहे थे, तब मामाजी ने मध्यप्रदेश में गो-भक्तों के पक्ष में स्वदेश के माध्यम से आवाज उठाई। परिणाम यह हुआ कि मध्यप्रदेश में गोवंश हत्या को रोकने के लिए प्रभावी कानून बन गया। इसी तरह इंदौर में हिन्द केसरी मास्टर चंदगीराम के सम्मान में निकाली गई शोभायात्रा पर जब लीगी गुण्डों ने हमला किया, तब केवल मामाजी का स्वदेश ही था जिसने लीगी मानसिकता का पर्दाफाश किया। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन और तथाकथित बाबरी ढंाचा गिरने पर भी मामाजी की लेखनी ने हिन्दू समाज को जागरूक किया तथा उन्हें कम्युनिस्टों के प्रोपोगंडा से भ्रमित होने से बचाया। हिन्दुत्व को बदनाम करने के प्रयत्न जिसने भी किए, मामाजी की लेखनी ने उसकी जमकर खबर ली। उनकी लेखनी ने भारतीय मूल्यों एवं हिन्दुत्व के विरोध में चलने वाले सभी अपप्रचारों का तथ्यों एवं तर्कों के आधार पर भंडाफोड़ किया।
वर्ष 1975 में मौलिक अधिकारों एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हत्या कर देश पर थोपे गए आपातकाल के दौरान सरकार के भय से प्रतिष्ठित समाचारपत्रों और संपादकों की कलम झुक गई थी लेकिन प्रखर राष्ट्रभक्त मामाजी भूमिगत रहकर भी लेखन कार्य करते रहे। इंदिरा गांधी की तानाशाही के विरोध में स्वदेश मुखर ही रहा। परिणाम यह हुआ कि स्वदेश के कार्यालय पर ताला लगा दिया गया और संपादक यानी मामाजी के नाम मीसा का वारंट जारी हो गया था। पुलिस ने मामाजी को पकड़ कर जेल में डाल दिया। परंतु, धुन के पक्के मामाजी कहाँ मानते, उन्होंने जेल में बंदियों को पढ़ाना शुरू कर दिया। मामाजी ने जेल में रहकर हस्तलिखित ‘मीसा समाचार पत्र’ निकालना प्रारंभ कर दिया। बाद में जब उच्च न्यायालय के आदेश पर स्वदेश के ताले खुल गए तो मामाजी ने जेल के भीतर से ही किसी प्रकार संपादकीय भिजवाने की व्यवस्था जमा ली। उनकी बेबाक संपादकीयों के कारण स्वदेश की खूब प्रतिष्ठा बढ़ी। इमरजेंसी के दौरान लोकतंत्र के सिपाहियों को स्वतंत्र भारत की सरकार ने किस प्रकार की नारकीय यातनाएं दी, इस पर तो उन्होंने एक अमर कृति ही तैयार कर दी। उनकी पुस्तक ‘आपातकाल की संघर्षगाथा’ लोकतंत्र की बहाली के लिए किए गए आंदोलन का प्रमाणित दस्तावेज है।
बौद्धिकता का आडम्बर रचने के लिए उन्होंने कभी नहीं लिखा। उनका समूचा लेखन समाज को जागरूक करने के लिए था। उस समय में उन्होंने अपनी सीधी, सहज, सरल लेकिन धारधार भाषा-शैली से पाठकों का दिल जीत लिया था। वे अपने लेखन में आम बोलचाल की भाषा का उपयोग करते थे। वे ऐसी भाषा लिखते थे, जिसे सामान्य व्यक्ति भी समझ सके। गंभीर विषयों को सरलता से समझाने के लिए मामाजी अपने संपादकीय एवं अग्रलेखों में मुहावरों, कहानियों, प्रसंगों का बखूबी उपयोग करते थे। अनेक लेखों में तो उन्होंने लघु कथाएं स्वयं ही रच दी हैं, ताकि पाठक के मन-मस्तिष्क में विषय को सरलता से उतारा जा सके। यह उनके लेखन की विशेषता है। संपादकीय एवं अग्रलेखों में इस तरह के प्रयोग उन्हें बाकी संपादकों, लेखकों एवं पत्रकारों से अलग पहचान भी देते हैं। उनके आलेख बोझिल नहीं होते थे। पाठकों को बाँधे रखने की कला उनके अच्छे से आती थी।
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से प्रकाशित पुस्तक ‘पत्रकारिता के युग निर्माता : माणिकचंद्र वाजयेयी’ में लेखक कैलाश गौड़ लिखते हैं कि मामाजी की दृष्टि में कार्य की गुणवत्ता ही अधिक महत्वपूर्ण थी न कि समाचारपत्र की साज-सज्जा और कलेवर। समाचारपत्र के संबंध में वे प्राय: कहा करते थे कि उसका रंग-रोगन या कागज का चिकनापन महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि महत्वपूर्ण है उसमें छपे समाचारों का सही सटीक होना और उनका एकदम ताजा होना। मामाजी संपादकीय, अग्रलेखों और संपादक के नाम आए पत्रों को अत्यधिक महत्व देते थे। उनका कहना होता था कि “संपादकीय तो समाचारपत्र की जान है, वह जितना पढ़ा जाएगा और चर्चित होगा, समझ लो अखबार उतना ही सफल होगा। इसलिए संपादकीय सामयिक और धारदार होना चाहिए”। पाठकों के पत्रों को वे समाचारपत्र की लोकप्रियता का पैमाना मानते थे। जितने अधिक पाठकों के पत्र, समझ लो उतना ही लोकप्रिय। संपादक के नाम आए पत्रों को जनता का संपादकीय कहते थे और उन्हें प्राथमिकता प्रदान करने का निर्देश दिया करते थे।
मामाजी 1978 से 80 तक इंदौर प्रेस क्लब के अध्यक्ष भी रहे। उनके कार्यकाल में इंदौर प्रेस क्लब अपनी गतिविधियों के लिए काफी चर्चित हुआ। उन्होंने पुराने हो चुके बेकार कानूनों को खत्म करने की माँग इसी प्रेस क्लब के माध्यम से उठाई। पत्रकारों के प्रशिक्षण की भी चिंता उन्हें रहती थी। वे पत्रकारों को प्रशिक्षण देने के लिए प्रतिवर्ष कोई न कोई आयोजन कराते थे। इसके साथ ही पत्रकारिता को अपना करियर बनाने वाले युवकों को वे बहुत प्रोत्साहित करते थे। वे पत्रकारिता की चलती-फिरती पाठशाला थे। उनके संपर्क में आए अनेक युवकों ने पत्रकारिता में नाम कमाया। उनका एक स्वभाव था कि वे अपनी संपादकीय पढऩे और प्रूफ सुधारने के लिए युवा पत्रकारों को दे दिया करते थे। उन्हें इतनी छूट देते थे कि जो भी त्रुटि नजर आए बेहिचक उसे ठीक करके छपने के लिए भेज दें। मामाजी संपादक के लिए तय कुर्सी पर कभी-कभार ही बैठा करते थे। वे तो नवागत पत्रकारों के प्रशिक्षण की दृष्टि से उनके बीच में ही अधिक समय बिताया करते थे। मामाजी नये पत्रकारों के बीच अकसर कोई विषय चर्चा के लिए छेड़ देते थे और देखते थे कि वे क्या सोचते हैं? सब प्रकार के विचार सुनने के बाद अंत में उस घटना या मुद्दे पर सबका प्रबोधन भी करते थे। वे सबके विचारों का सम्मान करते थे। मामाजी के संपर्क में रहकर अनेक युवाओं ने पत्रकारिता का ककहरा सीखा लेकिन उन्होंने कभी किसी पर अपनी विचारधारा नहीं थोपी। सबका सहयोग ही किया।
मामाजी का जन्म 7 अक्टूबर, 1919 को आगरा जिले के बटेश्वर गाँव में हुआ। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी इसी गाँव से थे। बटेश्वर में मामाजी और अटलजी का घर आमने-सामने है। दोनों ही महापुरुषों का बचपन यमुना की गोद में अटखेलियां करते बीता है। 2002 में जब अटलजी प्रधानमंत्री थे, तब स्वदेश (इंदौर) की योजना से दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास पर मामाजी का अभिनंदन समारोह ‘अमृत महोत्सव’ का आयोजन किया गया। उस दिन भार-विभोर होकर छल-छलाती आँखों से भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भरी सभा में मामाजी के चरणस्पर्श करने की अनुमति माँगी, तब वहाँ स्पंदित कर देने वाला वातावरण बन गया। भारत की राजसत्ता त्याग, समर्पण और निष्ठा के पर्याय साधु स्वभाव के मामाजी के सामने नतमस्तक थी। यह मामाजी संबोधन से प्रसिद्ध व्यक्ति का नहीं वरन उस लेखनी का सम्मान था, जिसने हिन्दी पत्रकारिता में भारतीय मूल्यों को स्वीकार्यता दिलाई। वर्ष 2005 में पत्रकारिता एवं लेखकीय सेवाओं के लिए उन्हें कोलकाता में डॉक्टर हेडगेवार प्रज्ञा पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। हालाँकि, यह सब सम्मान/पुरस्कार, उनके लिए कोई मोल नहीं रखते थे। उनका व्यक्तित्व इन सबसे कहीं ऊपर और विराट था। मामाजी ने कभी अपने लिए सम्मान और पुरस्कार की आकांक्षा नहीं की। वे तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उस मंत्र को जीते थे, जिसमें कहा गया है कि कार्यकर्ता को ‘प्रसिद्धि परांगमुख’ होना चाहिए।
पत्रकारिता में श्रेष्ठ मूल्यों की स्थापना करने वाले स्वदेश के प्रधान संपादक श्री राजेन्द्र शर्मा का मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में आयोजित गरिमामय समारोह में आत्मीय अभिनंदन
पत्रकारिता जब मिशन से हटकर व्यावसायिकता की पटरी चढ़ चुकी है, तब भी सिद्धांतों से डिगे बिना 51 वर्ष की लंबी यात्रा पूरी करने वाले स्वदेश (भोपाल समूह) के प्रधान संपादक श्री राजेन्द्र शर्मा को देखकर एक विश्वास पक्का हो जाता है कि पत्रकारिता अब भी मिशनरी मोड में है। निष्कलंक, निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता की यह यात्रा अब भी जारी है। लोकतंत्र के इस चौथे खंबे की ओर उम्मीदों से देखने वाला समाज चाहता है कि पत्रकारिता के यह गौरवशाली और ध्येयनिष्ठ 51 वर्ष 101 हो जाएं। पत्रकारिता के निरभ्र आकाश में दैदीप्यमान नक्षत्र ध्रुव की भांति श्री राजेन्द्र शर्मा न केवल आम जनमानस की आवाज बनें, बल्कि लोकहित के अपने पथ से भ्रष्ट होती पत्रकारिता का मार्गदर्शन भी करते रहें। उनके सान्निध्य में अनेक भारतीय कलम तैयार हुई हैं, जिनके लिए पत्रकारिता में समाज और राष्ट्र सर्वोपरि रहे। जिस प्रकार प्रतिकूल परिस्थितियों भी श्री शर्मा अपने पत्रकारिता धर्म पर अड़े रहे, अपने मूल्यों को साधे रहे, उसी तरह उनसे सीख कर पत्रकारिता जगत में आए पत्रकारों की कलम भी कभी झुकी नहीं। इस तरह स्वदेश परिवार के मुखिया श्री राजेन्द्र शर्मा ने न केवल अपनी कलम से देश की सेवा की, अपितु अपने गुरु दायित्व से भी राष्ट्र की उन्नति में योगदान दिया है। उनके त्याग, संघर्ष और मूल्यनिष्ठ पत्रकारीय जीवन को समाज भी मान्यता देता है। सम्मान करता है। 2018 में उनकी पत्रकारिता के 51 वर्ष पूर्ण होने पर उनके योगदान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने और समूची यात्रा को आज की पीढ़ी से समक्ष उपस्थित करने के उद्देश्य से आम समाज ने 01 सितंबर को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में अभिनंदन समारोह का आयोजन किया। इस सारस्वत आयोजन में मंच पर देश की सम्मानित विभूतियों और अपेक्स बैंक के सभागार ‘समन्वय भवन’ में गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति यह बयान करने के लिए पर्याप्त थी कि श्री राजेन्द्र शर्मा एवं उनकी निष्कलंक पत्रकारिता के प्रति समाज के सुधिजनों में अपार श्रद्धा-आदर है। मंच पर भारतीय ज्ञान-परंपरा के प्रख्यात चिंतक, राजनीतिज्ञ एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी, त्रिपुरा के राज्यपाल प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी, केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री श्री नरेन्द्र सिंह तोमर, एकात्म मानव दर्शन अनुसंधान एवं विकास संस्थान के निदेशक डॉ. महेश चंद्र शर्मा, पूर्व मुख्यमंत्री श्री कैलाश जोशी, श्री बाबूलाल गौर, पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री सुरेश पचौरी, नगरीय प्रशासन एवं शहरी विकास मंत्री श्रीमती माया सिंह, भोपाल महापौर श्री आलोक शर्मा, सांसद श्री आलोक संजर, आयोजन समिति के कार्याध्यक्ष मूर्धन्य साहित्यकार श्री कैलाशचंद्र पंत, पूर्व सांसद रघुनंदन शर्मा, श्रीमती अरुणा शर्मा (श्री शर्मा की सहधर्मिणी) और स्वदेश के प्रबंध संपादक श्री अक्षत शर्मा उपस्थित रहे।
चित्र में - गिरीश उपाध्याय (वरिष्ठ पत्रकार), जे. नन्दकुमार (राष्ट्रीय संयोजक, प्रज्ञा प्रवाह), बल्देव भाई शर्मा (अध्यक्ष, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास), राम पाल सिंह (मंत्री, लोक निर्माण विभाग, मध्यप्रदेश शासन), अशोक पाण्डेय (मध्य भारत प्रान्त सह संघचालक, आरएसएस)
हम सब जानते हैं कि विश्व संवाद केंद्र, भोपाल पत्रकारिता के क्षेत्र में भारतीय मूल्यों को लेकर सक्रिय है। विश्व संवाद केंद्र का प्रयास है कि पत्रकारिता में मूल्य बचे रहें। प्रबुद्ध वर्ग में चलने वाले विमर्शों को आधार माने तब पत्रकारों के दृष्टिकोण में बदलाव की आवश्यकता प्रतीत होती है। व्यावसायिक प्रतिस्पद्र्धा ने उनके मन में कुछ बातें बैठा दी हैं। आज विशेष जोर देकर पत्रकारों को यह सिखाया जा रहा है कि 'समाचार सबसे पहले' और 'समाचार किसी भी कीमत पर' ही किसी पत्रकार का धर्म है। परंतु, क्या प्रत्येक परिस्थिति में पत्रकार के लिए इस धर्म का निर्वहन आवश्यक है? एक प्रश्न यह भी कि क्या वास्तव में यही पत्रकार का धर्म है? इन दोनों प्रश्नों का विचार करते समय जरा हमें पत्रकारिता के पुरोधाओं के जीवन को देखना चाहिए। उनकी कलम से बहकर निकलने वाली पत्रकारिता की दिशा को समझना चाहिए।
हम जिन्हें प्रतिदिन न्यूज चैनल पर बहस करते-कराते देखते हैं। खबरें प्रस्तुत करते हुए देखते हैं। अखबारों और पत्रिकाओं में जिनके नाम से प्रकाशित खबरों और आलेखों को पढ़कर हमारा मानस बनता है। मीडिया गुरु और लेखक संजय द्विवेदी की किताब 'हिंदी मीडिया के हीरो' पत्रकारिता के उन चेहरों और नामों को जानने-समझने का मौका उपलब्ध कराती है। किताब में देश के 101 मीडिया दिग्गजों की सफलता की कहानी है। किन परिस्थितियों में उन्होंने अपनी पत्रकारिता शुरू की? कैसे-कैसे सफलता की सीढिय़ां चढ़ते गए? उनका व्यक्तिगत जीवन कैसा है? टेलीविजन पर तेजतर्रार नजर आने वाले पत्रकार असल जिन्दगी में कैसे हैं? उनके बारे में दूसरे दिग्गज क्या सोचते हैं? ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब यह किताब देती है। किताब को पढ़ते वक्त आपको महसूस होगा कि आप अपने चहेते मीडिया हीरो को नजदीक से जान पा रहे हैं। यह किताब पत्रकारिता के छात्रों सहित उन तमाम युवाओं के लिए भी महत्वपूर्ण है जो आगे बढऩा चाहते हैं। पुस्तक में जमीन से आसमान तक पहुंचने की कई कहानियां हैं। पत्रकारों का संघर्ष प्रेरित करता है। पत्रकारिता के क्षेत्र में आ रहे युवाओं को यह भी समझने का अवसर किताब उपलब्ध कराती है कि मीडिया में डटे रहने के लिए कितनी तैयारी लगती है। इस तरह के शीर्षक से कोई सामग्री किताब में नहीं है, यह सब तो अनजाने और अनायस ही पत्रकारों के जीवन को पढ़ते हुए आपको जानने को मिलेगा।
सहजता, सरलता, सादगी और बेबाकी इन सबको मिला दिया जाए तो एक बेहद उम्दा इंसान आपके सामने होगा। लोकेन्द्र पाराशर। जो उनके भीतर है, वह ही बाहर भी। कथनी-करनी में किंचित भी अंतर नहीं। खरा-खरा कहना, चाहे किसी को बुरा लगे या भला। आपसे मित्रवत मिलेंगे और हर संभव आपकी मदद करने को हर पल तैयार। समाजकंटकों के लिए अपनी लेखनी की आग और समाजचिंतकों के लिए अपनी आंखों के पानी के लिए वे देशभर में ख्यात हैं। वे लम्बे समय तक पत्रकारिता की पाठशाला कहे जाने वाले दैनिक स्वदेश (ग्वालियर) के संपादक रहे हैं। उनका चिंतन राष्ट्रवादी है। वे समाज और देशहित से जुड़े मुद्दों पर गहरी पकड़ रखते हैं। ग्रामवासी होने के कारण भारत को औरों की अपेक्षा कहीं अधिक नजदीक से देखते और समझते हैं। उनका चिंतन, उनकी सोच और उनके विचार उनके लेखन में झलकता है।
सं पादक की सत्ता को जब प्रबंधन ने हिला रखा हो, संपादक खुद भी जब मैनेजर हो गए हों, तब एक शख्स ने संपादक के पद की गरिमा को बनाए ही नहीं रखा बल्कि उसका संवर्धन भी किया। वह शख्स कोई ओर नहीं, हिन्दी पत्रकारिता के पद्मश्री आलोक मेहता ही है। आसमान की बुलन्दियां छू चुके आलोक मेहता सादगी के लिबास में लिपटे आपको कहीं भी मिल जाएंगे। वे सहज हैं, सरल हैं और मिलनसार भी हैं।
व्या वसायिक पत्रकारिता में रहकर निरन्तर करुणा, बुद्धि और विवेक के चिन्तन की परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। आधुनिकरण के नाम पर जब देश-समाज अपना 'स्व-भाव' खो रहा है तब गुलाब कोठारी अपने नियमित स्तम्भ 'स्पंदन' और 'मानस' में लगातार भारतीय मूल्यों, परंपराओं और संस्कृति के संरक्षक के तौर पर निरन्तर लिखते हैं। अपनी लेखनी के साथ ही अपने कर्म-वचन से भी वे भारतीय संस्कृति के पैरोकार, अग्रदूत और हितचिंतक के रूप में दिखते हैं। उनकी संवेदनशीलता को पौत्री 'आद्या' को सम्बोधित करते हुए लिखी गईं कविताओं में अनुभूत किया जा सकता है। देश के शीर्ष दस समाचार-पत्र समूहों में शामिल 'राजस्थान पत्रिका समूह' के मालिक और प्रधान संपादक श्री कोठारी इतने सहज हैं कि किसानों के हित में सड़क पर उतर गए। मध्यप्रदेश भाजपा और भारतीय किसान संघ में जब संघर्ष हुआ तो समझौते के लिए गुलाब कोठारी ने प्रभावी भूमिका निभाई थी। राजस्थान पत्रिका समूह एक परिवार की तरह है और गुलाब कोठारी उसके मुखिया हैं। इस परिवार के छोटे-बड़े सभी सदस्य श्री कोठारी को 'बड़े भाईसाहब' कहकर सम्बोधित करते हैं। मालिक और कर्मचारी का संबंध कहीं गौण हो जाता है।
आजादी के दो बरस बाद 6 जनवरी, 1949 को जन्मे गुलाब कोठारी भारत के स्वाभिमान को देश-दुनिया में बढ़ा रहे हैं। आम आदमी के जीवन में नैतिक मूल्यों की स्थापना के लिए गुलजारीलाल नंदा फाउण्डेशन उन्हें नैतिक सम्मान-2006 से नवाज चुका है। जबकि तिरुपति (आंध्रप्रदेश) स्थित ब्रह्मचारी आश्रम के आचार्य गुरुजी गुरुवानंदजी ने वर्ष 2007 में उन्हें राष्ट्र गौरव अवार्ड से सम्मानित किया। देश में जितना प्यार और सम्मान गुलाब कोठारी को मिलता है उतना ही मान उन्हें देश के बाहर भी मिलता है। इटली की ओकीदो जिक्कोकई मिक्यो योगा संस्थान उन्हें सम्मानित कर चुका है। नीदरलैण्ड की इंटरकल्चरल ओपन यूनिवर्सिटी ने 'समाचार-पत्र का प्रबंधन' विषय पर पीएचडी करने वाले गुलाब कोठारी को 2002 में यही यूनिवर्सिटी 'दर्शनशास्त्र' में डीलिट की मानद उपाधि से नवाजती है। एक खास बात का जिक्र करना बेहद जरूरी है, जिससे हिन्दी और हिन्दी पत्रकारिता में उनके महत्वपूर्ण योगदान की तस्वीर सबके सामने आती है। गुलाब कोठारी की पहचान राजस्थान पत्रिका समूह के मालिक से अधिक एक सम्मानित पत्रकार और लेखक के रूप में है। गुलाब कोठारी की लिखी गईं पुस्तकें आम आदमी और समाज को तनाव भरे आज के जीवन में खुशियों के साथ संतुलित जीवन जीने की राह दिखाती हैं। वैदिक परम्पराओं की हामी भरती हैं।
जिस दौर में पत्रकारिता मिशन को मीलों पीछे छोड़कर प्रोफेशन हो गई है। प्रोफेशन से भी आगे आकर मीडिया इडस्ट्री हो गई है तब मूल्य आधारित पत्रकारिता के प्रतिमान स्थापित कर रहे गुलाब कोठारी दरअसल राजस्थान पत्रिका के संस्थापक कर्पूर चंन्द्र कुलिश की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
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"गुलाब कोठारी ने स्वतंत्रचेता, मौलिक एवं प्रबुद्ध विचारक-पत्रकार के रूप में प्रतिष्ठा अर्जित की है। उनका समस्त लेखन अध्यात्म और आधुनिक जीवन मूल्यों से अनुप्रमाणित है। सामाजिक सरोकारों से जुड़े उनके पत्रकार कर्म ने कभी बाजारवादी ताकतों से समझौता नहीं किया।"
- संजीव भानावत, मीडिया शिक्षक एवं लेखक
- जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख।
प्र ख्यात लोहियावादी-समाजवादी चिंतक राजकिशोर को क्रांतिकारी पत्रकार, लेखक और साहित्यकार कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा। अपने समय की राजनीति, पत्रकारिता, साहित्य और समाज व्यवस्था पर अपनी कलम को पैना करना और तमाम सवालों की खोज में उनके समाधान प्रस्तुत करते हुए नए सवाल खड़े करना सचमुच एक क्रांतिकारी कदम ही तो है। राजकिशोर द्वारा संपादित लोकप्रिय पुस्तक शृंखला 'आज के प्रश्न' इसका जीता-जागता उदाहरण है। इस शृंखला के अंतर्गत अब तक 17 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ये पुस्तकें आज के प्रश्नों के उत्तर तो देती ही हैं साथ ही प्रत्येक विषय पर एक नई बहस जो जन्म भी देती हैं।
02 जनवरी 1947 को कलकत्ता में जन्मे राजकिशोर ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी.कॉम (ऑनर्स), एलएलबी और एमए (हिन्दी) किया। इतना पढ़-लिखने के बाद वे चाहते तो कहीं बेहतर स्तर पर शासन व्यवस्था का हिस्सा हो सकते थे। लेकिन, अगस्त 1977 में आनंद बाजार पत्रिका समूह द्वारा प्रकाशित प्रतिष्ठित हिन्दी साप्ताहिक 'रविवार' से उन्होंने अपने पत्रकारिता के सफर की शुरुआत की। 1986-87 में इत्यादी प्रकाशन से प्रकाशित हिन्दी साप्ताहिक 'परिवर्तन' का संपादन किया। नवभारत टाइम्स दिल्ली में 1990 से 1996 तक वरिष्ठ सहायक संपादक रहे। इसके बाद उन्होंने जुलाई 1996 से सितंबर 1998 तक प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की त्रैमासिक पत्रिका 'विदुर' में बतौर संयुक्त संपादक काम किया। उन्होंने फरवरी 1997 से फरवरी 1998 तक 'दूसरा शनिवार' और 1998 से इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की मासिक पत्रिका 'पंचायती राज का अपडेट' का भी संपादन किया।
कुछ अलग, कुछ सार्थक, वर्तमान की समस्याओं को सुलझाने के साथ ही आने वाले भविष्य को भी कुछ राह दिखा सके, ऐसा कुछ रचने की खदबदाहट उनके मन को व्यथित कर रही थी। सक्रिय पत्रकारिता के बीच ही 1996 से स्वतंत्र पत्रकारिता एवं स्तम्भ लेखन की शुरुआत राजकिशोर ने कर दी थी। पत्रकारिता और लेखन के प्रति अपने समर्पण, मेधा और कठिन परिश्रम से उनके ख्वाब कुछ बुनते हुए नजर आए। राजकिशोर द्वारा लिखित और संपादित तमाम पुस्तकों से होकर ये ख्वाब हमारी आंखों में भी उतर रहे हैं। पत्रकारीय लेखन में उनकी सक्रियता को देखकर उम्मीद ही नहीं भरोसा है कि और भी कुछ सार्थक ख्वाब वे भविष्य के लिए बोएंगे। विचार-क्रांति की अलख जगाती उनकी कुछ चुनिंदा पुस्तक हैं - आजादी एक अधूरा शब्द है, एक अहिन्दू का घोषणा-पत्र, हिन्दी लेखक और उसका समाज, स्त्री-पुरुष : कुछ पुनर्विचार, उदारीकरण की राजनीति, समाजवाद का भविष्य, रोशनी कहां है और तुम्हारा सुख (उपन्यास)। 'जाति कौन तोड़ेगा' पुस्तक के लिए तो उन्हें हिन्दी अकादमी, दिल्ली की ओर से साहित्यिक कृति पुरस्कार भी प्रदान किया गया है। इसके अलावा लोहिया पुरस्कार (1988), हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा साहित्यकार सम्मान (1990), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद द्वारा राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता पुरस्कार (1995) सहित अन्य सम्मान भी उनके माध्यम से हिन्दी पत्रकारिता को गौरवान्वित कर चुके हैं।
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"साहित्य, राजनीति और पत्रकारिता में उनकी बराबर की गति है। उनका ज्यादा झुकाव सांस्कृतिक और साहित्यिक है।"
- डॉ. विजय बहादुर सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार
- जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख।
------------ राजकिशोर के प्रति मेरा अद्यतन अभिमत
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राज किशोर जी का बहुत सम्मान है। ये पढ़ने-लिखने वाले वामपंथियों में प्रमुख हैं। आज से पहले मैं भी इनका बहुत सम्मान करता था। लेकिन, यह भी फ्रस्टेड हैं। उनकी इस टिप्पणी की भाषा "असहमति" के प्रति इनकी भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है।
अभद्र भाषा और शब्दावली कम्युनिस्ट खेमे की पहचान है। यह बात इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि इस खेमे के न केवल साधारण व्यक्ति इस भाषा में संवाद करते हैं, अपितु शीर्ष नामवालों का भी यही हाल है।
मुझे दुःख है कि मैंने कभी इनके वैचारिक (कम्युनिस्ट) लिखत-पढ़त को सम्मान दिया था। हिंदी ब्लॉग अपनापंचू और मीडिया विमर्श पत्रिका के 'हिंदी के हीरो' विशेषांक में प्रकाशित अपने इस लेख में व्यक्त अपनी भावनाओं और शब्दों को मैं वापस लेता हूँ।
यह टिपण्णी मैंने (लोकेन्द्र सिंह) अपने फेसबुक पर 3 फरवरी, 2018 को उस समय लिखी जब मैंने राजकिशोर के फेसबुक पर यह अभद्र टिप्पणी पढ़ी।
द मदार लेखन शैली और प्रभावशाली वक्तृत्व कला डॉ. वेदप्रताप वैदिक की ताकत है। लेकिन, हिन्दी के सम्मान के लिए लड़ाई उनकी पहचान है। रूसी, फारसी, अंग्रेजी और संस्कृत सहित अन्य भारतीय भाषाओं को जानने वाले डॉ. वेदप्रताप वैदिक अपने हिन्दी प्रेम को लेकर सर्वाधिक चर्चित तब हुए जब उन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर अपना शोध प्रबंध हिन्दी में लिखा। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के प्रशासन ने उनके शोध प्रबंध को अस्वीकार कर दिया। उनसे कहा गया कि जाइए, अपना शोध प्रबंध अंग्रेजी में लिखकर लाइए। लेकिन, महज 13 साल की उम्र में हिन्दी के लिए सत्याग्रह कर जेल जाने वाले डॉ. वैदिक क्या यूं ही हार मान जाते। यह मामला भारत के सर्वोच्च सदन भारतीय संसद तक पहुंचा। वर्ष 1966-67 में संसद में जबर्दस्त हंगामा हुआ। डॉ. राममनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी, मधु लिमये, आचार्य कृपलानी, हीरेन मुखर्जी और चन्द्रशेखर सहित तमाम राजनेताओं ने डॉ. वैदिक का समर्थन किया। आखिर में इन्दिरा गांधी की पहल पर जेएनयू के संविधान में संशोधन हुआ। डॉ. वैदिक के शोध प्रबंध को स्वीकार किया गया। तब से देशभर में डॉ. वेदप्रताप वैदिक की पहचान हिन्दी के योद्धा की हो गई। देशभर में घूम-घूमकर, हिन्दी में भाषण देकर आवाम को सम्मोहित करने वाले नरेन्द्र मोदी ने जब ऐतिहासिक विजय के बाद राष्ट्रपति को अंग्रेजी में पत्र लिखा तो उनका विरोध करने वालों में डॉ. वेदप्रताप वैदिक सबसे आगे रहे। जबकि आम चुनाव-2014 से पूर्व वे मोदी के समर्थन में लेख पर लेख लिखे जा रहे थे।
पत्रकारिता में 50 साल से अधिक समय बिताने वाले डॉ. वैदिक के चिंतन और विचारों का जादू भारत में ही नहीं विदेश में भी चलता है। दुनियाभर में, असरदार शख्शियतें छोटे कद के लेकिन ऊंचे माथे वाले डॉ. वैदिक से प्रभावित हैं। पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के शासनकाल में राजनेता न होने के बाद भी डॉ. वैदिक को डिप्टी पीएम कहा जाता रहा। इंदिरा गांधी से अटल बिहारी वाजपेयी तक उनके मुरीद रहे। बाबा रामदेव के 'कालाधन वापस लाओ' अभियान के तो वे सेनापति रहे हैं।
करीब 80 देशों की यात्रा कर चुके डॉ. वेदप्रताप वैदिक की हाल ही में पाकिस्तान यात्रा काफी हंगामाखेज रही। मुम्बई ब्लास्ट के मास्टर माइंड हाफिज सईद के साथ मुलाकात ने डॉ. वैदिक की देशभक्ति पर ही प्रश्न चिह्न खड़े करवा दिए। हालांकि सब जानते हैं कि डॉ. वैदिक एशिया महाद्वीप में शांति के लिए प्रयासरत हैं।
इंदौर में 30 दिसम्बर, 1944 को जन्मे डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने 1958 में बतौर प्रूफ रीडर पत्रकारिता कदम रखा था। इसके बाद तो उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता को नित नई ऊंचाइयां दीं। वे 12 साल तक नवभारत टाइम्स में पहले सह सम्पादक फिर सम्पादक के पद पर रहे। उन्होंने हिन्दी समाचार एजेन्सी भाषा के संस्थापक सम्पादक के रूप में एक दशक तक प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया में काम किया। फिलवक्त भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष और नेटजाल डाट काम के सम्पादकीय निदेशक हैं।
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"वेदप्रताप वैदिक के संस्कार समाजवादी और हिन्दी के रहे हैं। इसलिए उनके लेखन में सदैव प्रखरता और आक्रामकता रही है। उनकी राष्ट्रवादिता संदेह से परे है और उनके उद्देश्यों पर कभी शक नहीं किया जा सकता।"
- रघु ठाकुर, प्रख्यात समाजवादी चिन्तक
- जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख।
दु नियाभर का काम, सांसद होने से बाय प्रोडक्ट मिली तमाम व्यस्तताएं और सामाजिक गतिविधियों में सक्रियता के बाद भी आप उन्हें नियमित पढ़ पाते हैं, राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व का मजबूती से पक्ष रखने के लिए कटिबद्ध तरुण विजय ही यह कर सकते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साप्ताहिक समाचार-पत्र पाञ्चजन्य के पूर्व संपादक के नाते भी हम सब उन्हें जानते हैं। वर्ष 1961 में जन्मे तरुण विजय महज 25 वर्ष की आयु में दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन आरएसएस के मुखपत्र 'पाञ्चजन्य' के संपादक हो गए और लगातार 22 साल तक यहां रहे।
तरुण विजय के तर्क, विमर्श क्षमता, स्वाध्याय और लेखनी की ताकत है कि वामपंथी विचारधार की ओर झुके समाचार-पत्र जनसत्ता में उनका कॉलम 'दक्षिणावर्त' सर्वाधिक लोकप्रिय है। वे अपने विरोधियों को तर्कों से चित करते हैं। वे खुलेमन के हैं, विरोधियों का स्वागत करते हैं, उनसे सार्थक संवाद की परम्परा बनाने की कोशिश करते हैं। तरुण विजय और पाञ्चजन्य तब बहुत चर्चा में आए जब उन्होंने कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का साक्षात्कार पाञ्चजन्य में छाप दिया। मीडिया, कांग्रेस, भाजपा और आरएसएस में हंगामा खड़ा हो गया। लेकिन, यही तो सच्चा लोकतंत्र है, जहां विरोधी की बात भी सुनी जाती है और उसे समझने का प्रयास भी किया जाता है।
संवेदनशील पत्रकार एवं लेखक तरुण विजय पाञ्चजन्य से अलग होने के बाद संघ के प्रचारक होकर वनवासियों के बीच काम करने के लिए दादरा और नगर हवेली चले गए। वंचित और मुख्यधारा से पिछड़े समाज के लिए बेहतर करने की उनकी हमेशा से कोशिश रही है। दलित और जनजातीय समुदाय के लोगों को सम्मान दिलाने के लिए उन्होंने प्रशिक्षित और योग्यता प्राप्त दलित एवं जनजातीय पुजारियों को हिन्दू मंदिरों के गर्भगृह में देवपूजन तथा कर्मकाण्ड का अधिकार प्रदान करने के लिए राज्यसभा में अधिनियम पेश किया।
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे तरुण विजय ने अपने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत प्रतिष्ठित अखबार ब्लिट्ज से की थी। बाद में, खुद को स्वतंत्र पत्रकार के रूप में स्थापित किया। वे टाइम्स ऑफ इंडिया, पायोनियर और जनसत्ता सहित देशभर के तमाम अखबारों और पत्रिकाओं के लिए लिखते रहे हैं। उन्होंने वामपंथी कलुषगाथा, समरसता के सूत्र, मानसरोवर यात्रा सहित कई किताबों का संपादन और लेखन भी किया है। श्री विजय जितने बड़े पत्रकार, विचारक और लेखक हैं, उतने ही उम्दा फोटोग्राफर भी हैं। सिंध नदी और हिमालय की धवल चोटियां उन्हें फोटोग्राफी के लिए बुलाती हैं। उनके मुताबिक सिंधु नदी की शीतल बयार, कैलास पर शिवमंत्रोच्चार, चुशूल की चढ़ाई या बर्फ से जमे झंस्कार पर चहलकदमी - इन सबको मिला दें तो कुछ-कुछ तरुण विजय नजऱ आएंगे।
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"तरुण जी की पत्रकारिता इस मायने में प्रशंसनीय है कि यहाँ राजनीति का 'र' राष्ट्र के 'र' पर हावी नहीं होता। नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए अनुकरणीय यह वह लीक है जहाँ कलम स्वार्थ के लिए नहीं स्वदेश के लिए उठी है।"
प त्रकारिता के गिरते मूल्यों और घटती साख के बीच राहुल देव एक ऐसा नाम है जो पत्रकारिता के सामाजिक सरोकारों और भारतीय भाषाओं के वजूद के लिए लम्बी लड़ाई लड़ रहा है। हिन्दी पत्रकारिता में राहुल देव का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने 30 साल से भी अधिक वक्त इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया में बिताया है। इतने लम्बे सफर के दौरान एक दिन भी ऐसा नहीं आया, जब उन पर किसी ने कोई आरोप लगाया हो। झक सफेद दाड़ी और बालों के बीच चमकता राहुल देव का भाल धवल पत्रकारिता का पैरोकार है।
वर्ष 1997 में सुरेन्द्र प्रताप सिंह की मृत्यु के बाद लोकप्रिय न्यूज चैनल 'आजतक' पर एंकरिंग की जिम्मेदारी सम्भालने वाले राहुल देव पत्रकारिता में भाषा के स्वरूप और उसके संस्कार को लेकर बेहद संजीदा हैं। समाचार-पत्रों और न्यूज चैनल्स में भाषा के सरलीकरण और बोलचाल की भाषा के नाम पर भारतीय भाषाओं के साथ हो रहे खिलवाड़ से चिंतित नजर आते हैं। 'भारतीय भाषाओं का भविष्य और हमारी भूमिका' विषय पर ग्वालियर में आयोजित व्याख्यान में उन्होंने कहा था कि अंग्रेजियत के कारण मात्र हिन्दी ही नहीं वरन् भारतीय भाषाओं के वजूद पर संकट आ गया है। हमारी भाषाओं में जबरन अंग्रेजी के शब्द ठूंसे जा रहे हैं। उनका मानना है कि भाषा कोई भी हो, उसकी पवित्रता बनी रहनी चाहिए। अंग्रेजी बोलो तो शुद्ध। हिन्दी में बाचतीत करो तो फिर वह भी हिन्दी ही हो, उसमें अंगे्रजी के शब्द न हों। उनका मानना है कि मीडिया की भाषा के कारण नई पीढ़ी गंभीर और परिष्कृत भाषा से विमुख हो रही है। मीडिया में हिंग्लिश के प्रयोग से काफी दिक्कतें खड़ी हो रही हैं। इस खतरनाक प्रयोग को रोकने की जरूरत है। भारतीय भाषाओं के भविष्य को लेकर चिंतित राहुल देव सम्यक फाउण्डेशन के मार्फत एक मुहिम चला रहे हैं। वे इस फाउण्डेशन के संस्थापक एवं अध्यक्ष हैं। उनका कहना है कि भाषा के साथ व्यक्ति और समाज के संस्कार भी बदलते हैं। हिन्दी के भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने आशंका जताई कि अगर हिन्दी की स्थिति यही रही तो 2050 तक भारत में लिखाई और पढ़ाई के सारे गंभीर काम अंग्रेजी में किए जा रहे होंगे और हिन्दी सिर्फ मनोरंजन की भाषा बनकर रह जाएगी। 'सम्यक फाउण्डेशन' के माध्यम से वे सामाजिक विकास, शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, एचआईवी-एड्स और सामाजिक मूल्यों के प्रति भी लोगों को जागरूक करने में लगे हैं। इसके साथ ही युवाओं को समाजोन्मुखी पत्रकारिता का प्रशिक्षण देना और उन्हें शोधकार्य करने का अभ्यास भी वे बखूबी करा रहे हैं।
खुद का प्रोडक्शन हाऊस शुरू कर कई न्यूज चैनल्स के लिए बेहतरीन कार्यक्रम और महत्वपूर्ण वृत्तचित्र बनाने वाले राहुल देव ने अनेक पत्र-पत्रिकाओं और न्यूज चैनल्स में काम किया। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर उनकी गहरी पकड़ है। दि पायोनियर, करेंट, दि इलस्ट्रेटड वीकली, दि वीक, प्रोब, माया, जनसत्ता और आज समाज में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालने के अलावा उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी लम्बे समय तक काम किया। टीआरपी की जगह हर हाल में कंटेंट को प्राथमिकता देने वाले राहुल देव ने आजतक, दूरदर्शन, जी न्यूज, जनमत और सीएनईबी न्यूज चैनल में शानदार सफर गुजारा है।
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"बाजारवाद के प्रभाव में जब भारतीय भाषाओं, खासकर हिन्दी की गरिमा को क्षति पहुंचाई जा रही है, तब राहुल देव भाषाओं की गरिमा के लिए लड़ रहे हैं। यह अपने आप में अनूठी और साहस की बात है।"
- जयंत सिंह तोमर, गांधीवादी चिन्तक
- जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख।
स फल लोग कभी कुर्सी पर बैठकर आराम नहीं कर सकते। उन्हें लगातार काम में व्यस्त रहने में ही आराम मिलता है। जिस उम्र में अधिकतर लोग अपने काम से ही नहीं अपनी जिम्मेदारियों से भी सेवानिवृत्ति ले लेते हैं, 71 वर्षीय विजय सहगल आज भी पत्रकारिता, लेखन और अध्यापन में सक्रिय हैं। उनके उत्साह और ऊर्जा को देखकर युवाओं को भी रश्क हो जाए। भारतीय जीवन मूल्यों और पत्रकारिता के उच्च आदर्शों को लेकर जीने वाले विजय सहगल का समूचा जीवन प्रखर पत्रकार, संवेदनशील साहित्यकार और प्रेरक मीडिया अध्यापक का अनूठा मिश्रण है।
सुबाथू (हिमाचल प्रदेश) के प्रसिद्ध लेखक, प्रकाशक, समाजसेवी और स्वतंत्रता सेनानी प्रेमचंद सहगल के घर 16 जुलाई, 1943 को जन्मे विजय सहगल करीब चार दशक से पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने जालंधर से प्रकाशित वीर प्रताप से बतौर उप-संपादक अपनी पत्रकारिता की सार्थक पारी की शुरुआत की। इसके बाद श्री सहगल ने टाइम्स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्स, धर्मयुग और मुम्बई से प्रकाशित सारिका में काम किया। खबरों पर उनकी पकड़, भाषा की गहरी समझ और कुशल नेतृत्व क्षमता जैसे गुणों के चलते 1978 में दैनिक ट्रिब्यून की स्थापना पर उन्हें सहायक सम्पादक की महती जिम्मेदारी सौंपी गई। वर्ष 1990-2003 तक बतौर सम्पादक विजय सहगल दैनिक ट्रिब्यून को नई ऊंचाइयां देते रहे। फिलहाल वे दिव्य हिमाचल के राजनीतिक समीक्षक और सलाहकार सम्पादक हैं।
मानवीय और सामाजिक सरोकारों की पूंजी के सहारे विजय सहगल ने हिन्दी पत्रकारिता और साहित्य के सफर में जो मुकाम हासिल किया है, वह कम लोगों को ही नसीब होता है। साहित्य में कहानीकार के तौर पर खास पहचान रखने वाले श्री सहगल का उपन्यास 'बादलों के साए', कहानी संग्रह 'आधा सुख' और यात्रा वृत्तांत 'आस्था की डगर' बेहद चर्चित हैं। भारत में हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास, हिन्दी पत्रकारिता के विविध आयाम, हिन्दी पत्रकारिता - दिशा और दशा जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों के सहलेखक होने के साथ ही उन्होंने हिमाचल में हिन्दी पत्रकारिता के उद्भव व विकास पर शोधग्रंथ लिखकर अभूतपूर्व योगदान दिया है। वे चंडीगढ़ साहित्य अकादमी, नेशनल बुक ट्रस्ट और इंडियन सोसायटी ऑफ ऑथर्स सहित पत्रकारिता से संबंधित संस्थाओं से जुड़े रहे हैं। श्री सहगल फोकस हरियाणा, ईटीवी, डे एण्ड नाइट न्यूज और ए-1 तहलका सहित अन्य टीवी चैनल्स पर विभिन्न विषयों पर होने वाले विमर्शों में शामिल रहते हैं।
उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, बुरकिना फासो अर्जेंटीना, घाना, मलेशिया, अमरीका और कनाडा का प्रवास कर चुके विजय सहगल को उनकी उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए मातृश्री पत्रकारिता पुरस्कार, यशपाल साहित्य परिषद सम्मान, उदंत मार्तंड पत्रकारिता पुरस्कार और पंजाब कला साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई सम्मानों से नवाजा जा चुका है। श्री सहगल हिन्दी पत्रकारिता के सुनहरे हस्ताक्षरों में से एक हैं।
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"वैचारिक जगत की सभी वैचारिक धाराओं का समन्वय करते हुए वास्तविकता की पत्रकारिता करने वाले पुरोधा श्री विजय सहगल एक अत्यंत सहज एवं सरल व्यक्ति हैं। उनकी प्रकृति में बंधुत्व एवं संवेदनाओं का आनंददायी समिश्रण हर कोई अनुभव करता हैं।"
- प्रो. बृजकिशोर कुठियाला, कुलपति, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल
- जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख।
ल गभग 50 साल से पत्रकारिता में सक्रिय श्रवण गर्ग हिन्दी मीडिया के नायाब हीरे हैं। वे उस कुम्हार की तरह हैं, जो काली-पीली मिट्टी से बेहद खूबसूरत और जरूरी बर्तनों को आकार देता है। हिन्दी पत्रकारिता में दैनिक भास्कर को ब्रांडनेम बनाने के लिए उन्हें सदैव याद रखा जाएगा। लोहे को छूकर सोना बना देने की उनकी पारसमणि की अलौकिक क्षमता का उपयोग फिलहाल जागरण ग्रुप कर रहा है। जागरण ग्रुप ने छजलानी बंधु से देश का प्रतिष्ठित समाचार-पत्र नईदुनिया खरीदा और उसे फिर से शिखर पर पहुंचाने की महती जिम्मेदारी रौबदार और संजीदा संपादक श्रवण गर्ग को सौंप दी है।
67 वर्ष में भी 'युवा ऊर्जा' से भरे श्रवण गर्ग के बारे में कहा जाता है कि उन्हें ना सुनने की आदत नहीं है। श्री गर्ग समस्याएं और बहाने नहीं सुनते, वे समाधान प्रिय सम्पादक हैं। गुस्से के तेज लेकिन अमूमन शांत दिखने वाले श्रवण गर्ग के कैबिन में अधूरा काम लेकर जाने की हिम्मत बड़े-बड़े धुरंधर भी नहीं कर पाते हैं। समाधानकारक और सकारात्मक सोच की मदद से ही उन्होंने दैनिक भास्कर को मध्यप्रदेश से निकालकर देशभर में जमाया और बड़ा नाम बनाया। यह कोई आसान काम नहीं था। स्थितियों और लोगों को पहचानने की उनकी क्षमता अद्भुत है। हिन्दी मीडिया को उन्होंने कई संपादक और पत्रकार चुनकर-गढक़र दिए हैं। दैनिक भास्कर के संपादक रहे श्रवण गर्ग हिन्दी पत्रकारिता जगत में महज एक चर्चित नाम ही नहीं है बल्कि वे अच्छा और बड़ा काम करने वालों के लिए उदाहरण एवं प्रेरणा पुंज बन गए हैं। हिन्दी पत्रकारिता के बेजोड़ सम्पादक श्रवण गर्ग बाहर से जितने कड़े दिखते हैं, भीतर से उतने ही मुलायम हैं। लिखने-पढऩे के अलावा वे घुम्मकड़ी और फोटोग्राफी के भी शौकीन हैं।
भारत की आजादी के साल में 14 मई को इंदौर में जन्मे श्रवण गर्ग की प्रारंभिक शिक्षा मिनी मुंबई के नाम से मशहूर इसी शहर में हुई। इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग में डिप्लोमा प्राप्त श्री गर्ग को उनके माता-पिता इंजीनियर बनाना चाहते थे। कलकत्ता में इंजीनियरिंग में उनकी अच्छी-भली सरकारी नौकरी भी लग गई लेकिन हिन्दी मीडिया बांहें पसारे उन्हें बुला रहा था। सरकारी नौकरी छोडक़र वे अपने पसंदीदा क्षेत्र में काम करने चले आए। उन्होंने भारतीय विद्या भवन, दिल्ली से अंग्रेजी में पत्रकारिता का डिप्लोमा हासिल किया और वापस इंदौर लौट आए। नईदुनिया में काम शुरू किया। इसके बाद फ्री प्रेस, एमपी क्रॉनिकल (भोपाल) और कुछ समय इंडियन एक्सप्रेस समूह में भी बिताया। प्रभाष जी के साथ मिलकर दिल्ली में इंडियन एक्सप्रेस समूह का 'प्रजानीति' अखबार निकाला। बाद में यह बंद हो गया। बाद में जब दैनिक भास्कर के साथ जुड़े तो फिर श्रवण गर्ग भास्कर के पर्याय हो गए। एक तरह से दैनिक भास्कर के ब्रांड एम्बेसडर।
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"श्रवण गर्ग साहब संपादक नाम की संस्था के संभवतः आख़िरी वारिस हैं। एक ऐसे संपादक, जो हर हाल में बेहतर नतीज़े के लिए न केवल सिर्फ जूझते हैं, बल्कि अपनी पूरी टीम को झोंके रखते हैं। उनकी सम्पादकीय समझ का ही नतीज़ा है कि कई बड़े अख़बार सिर्फ इस कारण बड़े हो पाए क्यूंकि उनके संपादक श्रवण जी थे।"
- प्रवीण दुबे, वरिष्ठ पत्रकार
- जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख।
ए क युवक, जिसे डॉक्टरों के मुताबिक 12-13 साल पहले करीब 30 वर्ष की आयु में ही दुनिया को अलविदा कह देना था। अंग्रेजी दवाओं के साइड इफैक्ट से जिसका शरीर खोखला हो चुका था। फेफड़े और लीवर डैमेज की स्थिति में थे। वह युवक छोटी उम्र से डायबिटीज जैसी बीमारी से जूझ रहा था। आंखों की रोशनी ऐसी हो गई थी कि उसे लगता था जैसे कि वह कुहासे के भीतर से देख रहा हो। वर्षों तक 2-3 घण्टे ही बमुश्किल सो सकता था। अल्सर और एसिडिटी का हाल यह था जैसे पेट में आग जल रही हो। अपने हौसले, अपने लड़ाका स्वभाव और नियमित छोटे-छोटे प्रयोगों के अभ्यास से वह युवक आज न केवल स्वस्थ है बल्कि शारीरिक और वैचारिक स्तर पर समाज को भी स्वस्थ करने की दिशा में प्रयत्नशील है। संत समीर समाजकर्मी हैं, आंदोलनकारी हैं और लड़ाका किस्म के पत्रकार हैं। अपनी बीमारियों से लड़ते-लड़ते समाजशास्त्र से स्नातकोत्तर करने वाले समीर जी स्वदेशी चिकित्सक भी हो गए।
उत्तरप्रदेश के भगवानपुर गांव में 10 जुलाई, 1970 को जन्मे संत समीर फिलहाल हिन्दुस्तान टाइम्स समूह की प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका कादम्बिनी के मुख्य कॉपी संपादक हैं। नब्बे के दशक में वैकल्पिक पत्रकारिता के रास्ते उन्होंने खबरों की दुनिया में कदम रखा। प्रतिष्ठित फीचर सर्विस 'स्वदेशी संवाद सेवा' में समीर जी ने करीब आठ साल तक संपादन कार्य किया। वे बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद, वैश्वीकरण और डब्ल्यूटीओ जैसे मुद्दों पर बहस की शुरुआत करने वाली इलाहाबाद से प्रकाशित पत्रिका 'नई आजादी उद्घोष' के संपादक और सलाहकार संपादक भी रहे। आजाद भारत में पहली बार बहुराष्ट्रीय उपनिवेश के खिलाफ अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में स्वदेशी-स्वावलंबन का आंदोलन खड़ा करने वालों में भी संत समीर का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। बहरहाल, व्यावसायिक पत्रकारिता के तौर पर उन्होंने सबसे पहले पूर्वी उत्तरप्रदेश के अखबार 'जनमोर्चा' के लिए खबरनवीसी की। बाद में न्यूज एजेंसी 'ईएमएस' और क्रॉनिकल समूह के पाक्षिक 'प्रथम प्रवक्ता' से जुड़े।
'हिन्दी की वर्तनी' और 'अच्छी हिन्दी कैसे लिखें' सहित कई चर्चित किताबों के लेखक संत समीर के तमाम लेखों की अनुगूंज विधानसभाओं और संसद तक पहुंची है। हाल ही में दिल्ली चुनाव के बाद 'आप के विधायकों के नाम खुला खत' शीर्षक से लिखी गई उनकी लम्बी चिट्ठी खासी चर्चित हुई। सही मायने में यह चिट्ठी न केवल आम आदमी पार्टी बल्कि भ्रष्ट होती जा रही समूची भारतीय राजनीति के लिए एक दिशाबोध भी थी। बेहद संवेदनशील और विनम्र स्वभाव के संत समीर जिंदगी को बड़े करीब से जीते हैं। गरीब बच्चों को पढ़ाना, नि:शुल्क चिकित्सकीय परामर्श के साथ होम्योपैथी दवाएं बांटना और जिंदगी से निराश हो चुके लोगों का हौसला बढ़ाना, उनकी दिनचर्या का हिस्सा हो गए हैं।
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"हिंदी पत्रकारिता में भाषा-संहार के इस युग में संत समीर उन विरले पत्रकारों में से हैं जो शुद्ध भाषा के आग्रही हैं और अच्छी हिंदी लिखने के लिए सहायक ग्रंथों की रचना भी कर रहे हैं।
ध रती पर अगर स्वर्ग कहीं है तो वह है जम्मू-कश्मीर। लेकिन, जम्मू-कश्मीर की बड़ी आबादी को भयंकर कष्ट भोगने को विवश होना पड़ रहा है। स्वर्ग का सुख उनके नसीब में नहीं है। लाखों की संख्या में कश्मीरी पण्डितों को अपने ही देश में विस्थापित होकर बसर करना पड़ रहा है। अपने ही देश में पराए बनकर खुशी से रहा जाता है क्या? जम्मू-कश्मीर के धवल शिखरों को जब आतंकवादियों और अलगाववादियों ने लाल रंग में रंगना शुरू किया, खासकर कश्मीरी पण्डितों को निशाना बनाया गया तो मजबूरन उन्हें अपना आशियाना छोडऩा पड़ा। इस विस्थापन में अपने परिवार के साथ एक बच्चे ने भी घर छोड़ा था। आज यह बच्चा देश का सम्मानित और प्रख्यात टीवी पत्रकार है। नाम है राजेश रैना। दुनिया के तमाम संघर्ष से तपकर आगे आए राजेश रैना सदैव दूसरों की मदद के लिए तैयार रहते हैं। वे सौम्य हैं, सरल हैं और सहज हैं।
जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के खूबसूरत गांव सलिया में 01 अक्टूबर, 1970 को जन्मे राजेश रैना के दिल में आज भी अपनी धरती से जुदा होने का दर्द है। भले ही वे देश के सबसे बड़े रीजनल न्यूज नेटवर्क समूह ईटीवी के समूह सम्पादक हो गए हों। लेकिन, आज भी वे अपनी जमीन को शिद्दत से याद करते हैं, महसूस करते हैं। अपनी जमीन के लिए उनके मन की तड़प को कुछ यूं भी समझ सकते हैं कि श्री रैना जम्मू से अपनी पढ़ाई पूरी करने के तत्काल बाद दूरदर्शन के न्यूज कास्टर बनकर सीधे श्रीनगर की खूबसूरत वादियों में पहुंच गए। तमाम आशंकाओं और खतरों के बीच यहां करीब छह साल तक उन्होंने पत्रकारिता की। इसके बाद एक निजी टीवी चैनल का हिस्सा होकर दिल्ली चले आए। लेकिन, दिल्ली में उनका दिल ज्यादा लगा नहीं। जम्मू-कश्मीर के बाद हैदराबाद को उन्होंने अपना दूसरा घर बना लिया। रामोजी राव के टीवी नेटवर्क ईटीवी (अब टीवी१८ ग्रुप का हिस्सा) से जुड़ गए। इसके बाद उन्होंने पीछे मुडक़र नहीं देखा। रामोजी राव से प्रेरित होकर अपनी मेहनत, लगन और प्रतिभा के दम पर राजेश रैना ने जो मुकाम हासिल किया है, मीडिया जगत में उसे पाने के सपने कई लोग देखते हैं।
हिन्दी, कश्मीरी, तेलगू, उर्दू और अंग्रेजी, पांच भाषाओं के जानकार और एक दशक से अधिक वक्त से इलेक्ट्रोनिक मीडिया में सक्रिय राजेश रैना ने ईटीवी के उर्दू चैनल को नई ऊंचाइयां दी हैं। 15 अगस्त, 2014 को उर्दू ईटीवी की 13वीं वर्षगांठ शानदार अंदाज में पूरी हुई है। उनके गरिमापूर्ण नेतृत्व में ईटीवी उर्दू, ईटीवी कन्नड़ और ईटीवी गुजराती को सफलतापूर्वक लांच किया गया। शिखर पर पहुंचने के बाद भी मिलनसार स्वभाव के राजेश रैना जमीन से जुड़े हुए हैं। वे खुलकर लोगों से मिलते हैं, उन्हें पूरी तन्मयता के साथ सुनते और समझते हैं।
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"राजेश रैना उस शख्सियत का नाम है, जो सबको साथ लेकर चलते हैं और सबके साथ चलते हैं। ईटीवी उर्दू को ऊंचाईयां देने में उन्होंने जो मेहनत की है वह काबिले तारीफ है।"
- तहसीन मुनव्वर, पत्रका
- जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख।
उ न्हें पत्रकार, संगठक, लेखक, चिंतक, विचारक, शिक्षाविद और साहित्यकार के रूप में पहचाना जाता है। उनको चाहने वाले हर भूमिका में उन्हें फिट पाते हैं। उन्होंने भी प्रत्येक जिम्मेदारी को पूरी तरह निभाया है। पत्रकारिता के सर्वाधिक प्रतिष्ठित संस्थान माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के संस्थापक कुलपति (तब महानिदेशक) होने का गौरव उन्हें हासिल है। जी हां, हम बात कर रहे हैं ध्येयनिष्ठ पत्रकार राधेश्याम शर्मा की। उन्होंने अपने चार साल के कार्यकाल में शैक्षणिक गुणवत्ता और अकादमिक गतिविधियों से विश्वविद्यालय को देशभर में पहचान दिलाई। आज शायद ही देश का कोई मीडिया हाउस होगा जहां इस विश्वविद्यालय के विद्यार्थी पत्रकारिता को नये आयाम न दे रहे हों।
राजस्थान के गांव जोनाइचकलां में 01 मार्च 1934 को जन्मे श्री शर्मा पत्रकारिता और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के हित की सदैव चिंता करते रहे हैं। विद्यार्थियों के बीच रहना उन्हें बहुत भाता है। वे माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय से ही नहीं वरन् पंजाब यूनिवर्सिटी, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर, रानी अहिल्याबाई यूनिवर्सिटी इंदौर, गुरु घासीदास यूनिवर्सिटी बिलासपुर में भी पत्रकारिता के अध्यापन से जुड़े रहे हैं। किताबें नई राह दिखाती हैं, दिमाग की खिड़कियां खोलती हैं और ज्ञान का विस्तार करती हैं। किताबें एक से दूसरे हाथ पहुंचे, विद्यार्थी उनका लाभ ले सकें, इसीलिए उन्होंने अपनी किताबी दौलत माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय को समर्पित कर दी। साहित्य अकादमी हरियाणा से प्रकाशित 'जनसंचार' और 'हिंदी पत्रकारिता एवं विविध आयाम' उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं।
वर्ष 1952 में काशी हिंदी विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए बनारस से प्रकाशित जनसत्ता से बतौर संवाददाता पत्रकारीय जीवन की शुरुआत करने वाले राधेश्याम शर्मा ने भविष्य में पत्रकारिता को नए आयाम दिए। वे छह साल तक जबलपुर से प्रकाशित युगधर्म के संपादक रहे। 1978 में वे दैनिक ट्रिब्यून, चंडीगढ़ से जुड़ गए और 1982 से 90 तक वहां संपादक रहे। 1997 में चंडीगढ़ और धर्मशाला से प्रकाशित दिव्य हिमाचल के संपादकीय सलाहकार रहे। देश के बड़े अखबारों में शुमार दैनिक भास्कर समूह ने भी चंडीगढ़ संस्करण को मजबूत करने के लिए लम्बे सफर के दौरान पत्रकारिता में कमाए श्री शर्मा के अनुभव का लाभ लिया। साहित्यिक अभिरुचि और पत्रकारिता जगत में उनकी प्रतिष्ठा को देखते हुए हरियाणा सरकार ने 2005 में उनको हरियाणा साहित्य अकादमी का निदेशक नियुक्त किया। दो साल के सेवाकाल में उन्होंने अपनी संगठक दक्षता से युवा साहित्यकारों, कवियों और लेखकों को अच्छी संख्या में अकादमी से जोड़ा।
हिन्दी पत्रकारिता में श्री शर्मा के योगदान को भारतीय पत्रकार जगत तो सदैव याद करेगा ही, मध्यप्रदेश सरकार ने भी मामा माणिकचंद वाजपेयी राष्ट्रीय पुरस्कार से उनकी ध्येयनिष्ठ, मूल्याधारित और उद्देश्यपूर्ण पत्रकारिता का सम्मान किया है। श्री शर्मा को बलराज साहनी, मातुश्री, राज बदलेव, बाबू बालममुकुंद गुप्त सहित गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकारिता पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
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"राष्ट्रवादी विचारक, सत्य को समर्पित पत्रकार, अध्यापक के रूप में गुरु एवं एक मार्गदर्शक मित्र श्री राधेश्याम शर्मा का समग्र व्यक्तित्व आज की पीढ़ी के लिए अनुकरणीय है। - प्रो. बृजकिशोर कुठियाला, कुलपति, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल
- जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख।