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बुधवार, 5 मार्च 2025

रोहित का मोटापा नहीं, उनके रिकॉर्ड्स देखिए

भारतीय क्रिकेट टीम आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी में बेहतरीन खेल का प्रदर्शन कर रही है, लेकिन कांग्रेस की नेता डॉ. शमा मोहम्मद ने देश और खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाने की जगह भारतीय क्रिकेट दल के कप्तान रोहित शर्मा की सेहत को लेकर ओछी टिप्पणी करके विवाद खड़ा कर दिया है। कांग्रेस प्रवक्ता डॉ. शमा मोहम्मद ने भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रोहित शर्मा के शरीर को लेकर आपत्तिजनक एवं निंदनीय बयान दिया है। यही कारण है कि कांग्रेस ने तत्काल उनके बयान से किनारा किया। डॉ. शमा ने लिखा कि “रोहित शर्मा एक खिलाड़ी के तौर पर मोटे हैं। उन्हें वजन कम करने की जरूरत है। निश्चित रूप से यह भारत का अब तक का सबसे निराशाजनक कप्तान”। कोई भी सभ्य नागरिक किसी के शरीर को लेकर इस प्रकार की टिप्पणी नहीं कर सकता। दरअसल, ऐसा लगता है कि नफरत और नकारात्मकता की आग कांग्रेस के खेमे में इस हद तक फैल गई है कि उसके दायरे में अब केवल भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नहीं है अपितु उसके निशाने पर कोई भी आ सकता है। कांग्रेस की प्रवक्ता की इस टिप्पणी के बाद उनकी जमकर आलोचना हो रही है। डॉ. शमा को भी मजबूरी में यह टिप्पणी हटानी पड़ी है। हालांकि अपनी ओछी एवं संकीर्ण मानसिकता के लिए उन्होंने अब तक सार्वजनिक रूप से माफी नहीं माँगी है। यह बताता है कि उन्होंने अपने नेताओं के दबाव में पोस्ट तो हटा ली लेकिन उनका मौलिक दृष्टिकोण नकारात्मक ही है।

सोमवार, 16 अक्टूबर 2023

ओलंपिक की मेजबानी करने उत्साहित है भारत

मोदी सरकार के कार्यकाल में अन्य क्षेत्रों की भाँति खेल के क्षेत्र में भी भारत ने उत्साहवर्धक प्रगति की है। देश में खेलों को लेकर एक सकारात्मक वातावरण बन गया है। जिसका परिणाम हैं कि भारत के खिलाड़ी राष्ट्रीय एवं अतंरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। खेलों में भारतीय खिलाड़ियों की उपलब्धियों से उत्साहित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बीते शनिवार को ओलंपिक समिति के एक सत्र को संबोधित करते हुए वह बात कह दी, जिसको सुनने की प्रतीक्षा भारत के नागरिक लंबे समय से कर रहे थे। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि 2036 में ओलंपिक खेलों की मेजबानी भारत करना चाहेगा। ओलंपिक की मेजबानी प्राप्त करने के लिए भारत कोई कसर नहीं छोड़ेगा। यदि भारत ओलंपिक खेलों की मेजबानी प्राप्त करने में सफल होता है, तब यह एक बड़ी उपलब्धि होगी।

बुधवार, 1 सितंबर 2021

खेलों को प्रोत्साहन : “सब खेलें, सब खिलें”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के 80वें संस्करण में देश की जनता से खेलों पर बात की। देश के सर्वाधिक लोकप्रिय प्रधानमंत्री द्वारा खेलों पर बात करने से निश्चित ही देश में खेल संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा। उन परिवारों में भी खेल के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण पैदा होगा, जो अपने बच्चों को सिर्फ पढ़ाई तक सीमित करना चाहते हैं। पढ़ाई पर अत्यधिक जोर के कारण ज्यादातर परिवारों में बच्चों के खेलने पर एक तरह से अघोषित प्रतिबंध रहता है। खेलों का संबंध अच्छे करियर से तो है ही, उससे अधिक खेलों के माध्यम से संपूर्ण व्यक्तित्व विकास होता है। पढ़ाई के साथ खेलों में रुचि रखने वाले युवा शारीरिक और मानसिक स्तर पर अधिक मजबूत होते हैं। खेल हमारे भीतर निर्णय लेने, सामूहिक रूप से काम करने और नेतृत्व लेने की क्षमता का विकास करते हैं। खेल प्रत्येक परिस्थिति में धैर्य और उत्साह रखने का गुण पैदा करते हैं। खेल हमारे आत्मविश्वास को बढ़ाने के साथ ही सकारात्मक दृष्टिकोण देते हैं।

मंगलवार, 31 अगस्त 2021

पैरालिंपिक : हौसलों का स्वर्ण

टोक्यो ओलिंपिक-2020 के बाद अब टोक्यो पैरालिंपिक-2020 में भारतीय खिलाड़ी अपने चमक बिखेर रहे हैं। टोक्यो पैरालिंपिक में भारत के हिस्से में 31 अगस्त तक दो स्वर्ण पदक सहित 10 पदक आ चुके हैं। पैरालिंपिक में भारतीय दल ऐतिहासिक प्रदर्शन कर रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि टोक्यो ओलिंपिक-2020 में भारतीय दल ने अपने प्रदर्शन को जिस स्तर पर छोड़ा था, पैरालिंपिक में भाग ले रहे दल ने उसी ऊंचाई से अपनी विजय यात्रा शुरू की है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर अवनि लेखरा ने शूटिंग में और सुमित अंतिल ने जेवलिन थ्रो में भारत को स्वर्ण पदक दिलाकर इतिहास रच दिया। शूटिंग में स्वर्ण पदक जीतने के साथ ही अवनि देश की पहली महिला खिलाड़ी बन गई, जिसने ओलिंपिक या पैरालिंपिक में स्वर्ण पदक जीता हो। इसी तरह पैरालिंपिक में जेवलिन थ्रो में स्वर्ण पदक जीतने वाले सुमित पहले भारतीय खिलाड़ी हैं। टोक्यो ओलिंपिक में जेवलिन थ्रो में ही नीरज चौपड़ा ने भारत को स्वर्ण पदक दिलाया था।

शनिवार, 13 जुलाई 2019

ईमानदार समीक्षा के बाद आगे बढ़ें



क्रिकेट की सबसे बड़ी प्रतियोगिता विश्वकपके सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड से हारने के बाद भारतीय टीम की जमकर आलोचना हो रही है। हार का ठीकरा फोडऩे के लिए अलग-अलग सिर तलाशे जा रहे हैं। कुछ लोग विराट कोहली की कप्तानी, टीम के चयन और कुछ लोग धोनी की धीमे खेल पर अंगुली उठा रहे हैं। यह बात सही है कि सेमीफाइनल में भारत की टीम ने वैसा प्रदर्शन नहीं किया, जिसकी उससे अपेक्षा थी। इस विश्वकप में भारतीय टीम को सबसे अधिक मजबूत माना जा रहा था। विश्वकप के पहले चरण में सात मुकाबले जीतकर भारतीय क्रिकेट टीम ने अपनी दावेदारी को और प्रबल किया। हालाँकि, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और इंग्लैंड से हुए मुकाबले में भारतीय क्रिकेट दल की कमजोरियाँ उजागर भी हुई। शीर्ष क्रम के धराशाही होने पर समूची टीम लडख़ड़ा जाती है।
          धीमे खेल के लिए जो लोग पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की आलोचना कर रहे हैं, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि अगर धोनी न होते तो कई मैच में सम्मानजनक स्कोर तक पहुँचना मुश्किल हो जाता। धोनी बहुत अनुभवी खिलाड़ी हैं, वह परिस्थितियों को समझते हैं। इस बात का आश्चर्य जरूर है कि सेमीफाइनल में उन्हें ऊपर क्यों नहीं भेजा गया? विश्वकप-2011 के फाइनल मुकाबले को याद कीजिए, जब धोनी कप्तान थे। सचिन तेंदुलकर और सहवाग के जल्दी आउट होने पर कप्तान धोनी चौथे क्रम पर बल्लेबाजी करने आए और भारत की विजय सुनिश्चित की।
          क्रिकेट संभावनाओं का खेल होने के साथ ही अनुभव, रणनीति और धैर्य का भी खेल है। इसलिए पूरी संभावना है कि यदि न्यूजीलैंड के विरुद्ध शीर्ष क्रम के बिखरने के बाद ऋषभ या कार्तिक की जगह धोनी आए होते तो परिणाम कुछ और होता। धोनी खुद तो भारतीय पारी को संभालते ही, अलबत्ता साथी खिलाड़ी को भी समझाइश देते रहते, जैसा कि उन्होंने रवीन्द्र जडेजा को दीं।
          ‘बीती ताही बिसार दे, आगे की सुधि लेयकहावत पर चलते हुए भारतीय टीम को भविष्य की तैयारियों पर जोर देना चाहिए। क्रिकेट की सबसे बड़ी इस प्रतियोगिता में एक बात साफतौर पर समझ में आई है कि भारतीय टीम का मध्यमक्रम बहुत कमजोर है। वहाँ अनुभवी और अच्छे बल्लेबाज की जरूरत है। मध्यमक्रम में इसी प्रतियोगिता में भारत ने कई प्रयोग करके देख दिए, लेकिन सफलता नहीं मिली। भारतीय टीम को अपनी इस कमजोरी को अविलंब दूर करना चाहिए।
          संभव है कि क्रिकेट के भीतर चलने वाली राजनीति के कारण टीम को पूर्ण आकार देने में दिक्कत आ रही हो। केएल राहुल, विजय शंकर, केदार जाधव, यजुवेंद्र चहल को लगातार अवसर देते रहना, इसी ओर इशारा कर रहे हैं। अंबाती रायडु के अचानक संन्यास लेने से इस बात की चर्चा भी है कि चहेतोंको लगातार अवसर दिए जा रहे हैं। भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड और अन्य समितियों को इस दिशा में तत्काल ध्यान देना चाहिए। भारतीय टीम किसी एक-दो व्यक्ति की पसंद से नहीं चुनी जा सकती। करोड़ो भारतीयों की उम्मीदें इसके साथ जुड़ी होती हैं। इसलिए किस खिलाड़ी को कितना अवसर दिया जाएगा, इस संबंध में एक स्पष्ट और पारदर्शी नीति बनानी चाहिए। ताकि यह भाव किसी भी खिलाड़ी के मन में न आए कि वह चहेता नहीं है, इसलिए उसे कम अवसर दिए गए। सबको समान अवसर मिलना चाहिए।
          भारतीय टीम ने विश्वकप में एक अनुशासित और संगठित दल के रूप में प्रदर्शन किया, उसके कारण ही पहले चरण में शानदार सफलताएं प्राप्त हुईं। टीम में यह अनुशासन बना रहना चाहिए। किसी एक पर हार का ठीकरा फोडऩे से ज्यादा अच्छा है कि ईमानदार समीक्षा के बाद भविष्य की तैयारियाँ प्रारंभ की जाएं।

शनिवार, 24 जून 2017

पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाने वाले लोग कौन हैं?

 आईसीसी  चैंपियंस ट्रॉफी में भारत पर पाकिस्तान की जीत के बाद जम्मू-कश्मीर में ही नहीं, बल्कि देश के अनेक हिस्सों में जश्न मनाया गया, पाकिस्तानी झंडे फहराए गए और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे बुलंद किए गए।  पाकिस्तान की जीत पर आतिशबाजी भी की गई। भारत की हार पर पटाखों का यह शोर और पाकिस्तान की जय-जयकार किस बात का प्रकटीकरण है? आखिर भारत में कोई पाकिस्तान से इतनी मोहब्बत कैसे कर सकता है कि उसका विजयोत्सव मनाए? पाकिस्तान परस्त चंद लोगों की यह प्रवृत्ति एक पूरे समुदाय की निष्ठा और देशभक्ति पर प्रश्न चिह्न खड़ा करती है। दुनिया का कोई हिस्सा ऐसा नहीं होगा, जहाँ अपने देश की पराजय पर हर्ष व्यक्त किया जाता हो। भारत में पाकिस्तान परस्ती मानसिकता को परास्त करने की आवश्यकता है। पाकिस्तान की जय-जयकार करने वाले देशद्रोहियों को उनकी सही जगह दिखाने की आवश्यकता है। सुखद बात है कि पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाने वालों को पकड़कर जेल की हवा खिलाई जा रही है। सबसे पहले मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले के मोहद गाँव से 15 युवकों को पकड़ा गया, जो पाकिस्तान की जीत के बाद उन्माद फैला रहे थे। देश में अन्य जगहों पर भी धरपकड़ जारी है। कर्नाटक के कोडागू जिले से तीन लोगों को पकड़ा गया है। उत्तराखंड के मसूरी में भी पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने वाले तीन किशोरों को पकड़ा गया है। पाकिस्तान परस्त मानसिकता को हतोत्साहित करने के लिए इस प्रकार की कार्रवाई स्वागत योग्य है। यकीनन समाजकंटकों में कानून का डर होना चाहिए। देशविरोधियों को ऐसा सबक सिखाया जाना चाहिए कि देश को पीड़ा पहुँचाने की हरकत करने से पहले वह दस बार सोचें। दरअसल, इस प्रकार की प्रवृत्ति का दमन इसलिए भी आवश्यक है ताकि दो समुदायों के बीच बढ़ रही खाई की चौड़ाई को रोका जा सके।

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

शोभा डे की अशोभनीय टिप्पणी

 रियो  ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे खिलाडिय़ों के संबंध में विवादित लेखिका शोभा डे ने ट्वीटर पर अशोभनीय टिप्पणी करके अपनी ओछी मानसिकता का प्रदर्शन किया है। भारतीय दल के शुरुआती प्रदर्शन पर उन्होंने लिखा कि 'ओलंपिक में भारतीय खिलाडिय़ों के लक्ष्य हैं- रियो जाओ, सेल्फी लो, खाली हाथ वापस आओ, पैसे और मौकों की बरबादी।' जिस वक्त समूचा देश रियो में भारत के बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रार्थना कर रहा है, तब इन महोदया के दिमाग में इस घटिया विचार का जन्म होता है। शोभा डे की इस बेहूदगी की सब ओर से निंदा की गई। यहाँ तक कि ओलंपिक में हिस्सा ले रहे खिलाड़ी भी आहत होकर खुद को शोभा डे के विरोध में टिप्पणी करने से नहीं रोक सके। निशानेबाज अभिनव बिंद्रा ने नसीहत देते हुए कहा कि शोभा डे यह थोड़ा अनुचित है। आपको अपने खिलाडिय़ों पर गर्व होना चाहिए, जो पूरी दुनिया के सामने मानवीय श्रेष्ठता हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं। पूर्व हॉकी कप्तान वीरेन रसकिन्हा ने सही ही कहा कि हॉकी के मैदान में 60 मिनट तक दौड़कर देखिए, अभिनव और गगन की राइफल ही उठाकर देख लीजिए, आपको समझ आ जाएगा कि आप जैसा सोचती हैं, यह काम उससे कहीं अधिक कठिन है। कुछ मिलाकर सब जगह शोभा डे की भद्द पिट रही है।

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

बीसीसीआई में स्वच्छता अभियान शुरू

 भा रतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की 85वीं वार्षिक आम सभा (एजीएम) की बैठक में क्रिकेट को साफ-सुथरा बनाने के लिए कुछ अहम फैसले लिए गए। आर्थिक अनियमितता और स्पॉट फिक्सिंग जैसे गंभीर आरोप झेल रहे एन. श्रीनिवासन को बीसीसीआई ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट बोर्ड (आईसीसी) के अध्यक्ष पद से हटा दिया है। अब बीसीसीआई अध्यक्ष शशांक मनोहर श्रीनिवासन की जगह वर्ष 2016 तक आईसीसी का अध्यक्ष पद संभालेंगे। आईपीएल की टीम चैन्नई सुपर किंग के मालिक रहे श्रीनिवासन के कारण पिछले कुछ समय में भारतीय क्रिकेट नकारात्मक खबरों में रही है। श्रीनिवासन प्रकरण के कारण क्रिकेट और खिलाडिय़ों के प्रति खेल प्रेमियों का भरोसा कम हुआ है। जिसे संभावनाओं का खेल माना जाता था, उसमें लोगों को आशंकाएं अधिक नजर आने लगीं। किसी मैच में अप्रत्याशित तरीके से उलट-फेर हो जाए तो उसमें 'फिक्सिंग' के सूत्र तलाशे जाने लगते हैं। हम कह सकते हैं कि क्रिकेट के प्रत्येक मैच को संदिग्ध नजर से देखा जाने लगा है। यह भारतीय क्रिकेट के लिए खतरनाक संकेत हैं।

सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

शशांक मनोहर का अध्यक्ष बनना

 भा रतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अध्यक्ष के तौर पर शशांक मनोहर के नाम पर अंतिम मोहर लग गई है। बीसीसीआई के सबसे ताकतवर और प्रभावशाली अध्यक्ष जगमोहन डालमिया के दुनिया से जाने के बाद नए अध्यक्ष को लेकर खेल जगत से लेकर भारतीय राजनीति और मीडिया में खूब खबरें चल रही थीं। नागपुर के वकील और बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष शशांक मनोहर के फिर से अध्यक्ष बनने की खबरों को अधिक प्रमाणिक माना जा रहा था, जो आखिर सच साबित हुईं। शशांक मनोहर के मुकाबले एन. श्रीनिवासन मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन, रविवार को होने वाली एसजीएम की बैठक से पहले ही श्रीनिवास खेमे ने हथियार डाल दिए। ईस्ट जोन के छह संगठनों ने शशांक मनोहर के नाम पर मोहर लगाई है। बोर्ड की बैठक में अध्यक्ष के लिए एकमात्र नाम होने से उन्हें सर्वसमत्ति से चुन लिया गया।

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

और खूंखार हो गए सचिन

चिन के बारे में सिद्ध हो चुका है कि वे अपने आलोचकों को जवाब माइक से नहीं बल्कि अपने बल्ले से देते हैं। सचिन के खेल पर जब-जब किसी ने ऊंगली उठाई है, तब-तब उन्होंने इसका करारा जबाव बल्ले से दिया है।  अभी-अभी 168 वें मैच में पांचवा दोहरा शतक ठोककर उन्होंने सुनील गावस्कर (टेस्ट में चार दोहरे शतक) को पीछे छोड़ते हुए राहुल द्रविड़ की बराबरी कर ली है। टेस्ट क्रिकेट में अब उनके 48 शतक हो गए हैं।  इसके साथ ही टेस्ट और वनडे में उनके कुल 94 शतक हो चुके हैं और वे शतकों के शतक से महज 6 कदम पीछे हैं।  पिछले तीन सालों से उन्होंने जो गति पकड़ी है उसे देखकर तो लगता है वे जल्द ही शतकों के शतक की चोटी पर होंगे। श्रीलंका के खिलाफ इस दूसरे मैच में सचिन ने 19 वीं बार 150 से या इससे अधिक रन बनाने का सर डान बै्रडमैन का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया। इम मामले में वे अब वेस्टइंडीज के लारा की बराबरी पर हैं।
.       उनका यह दोहरा शतक उन लोगों के लिए जवाब है जो उन्हें बूढ़ा (सचिन की दाड़ी के बाल सफेद पक गए हैं।) मानकर कह रहे थे कि श्रीलंका का यह दौरा सचिन का आखिरी दौरा होगा। सचिन के बल्ले ने लगातार रनों की बारिश कर जता दिया कि उनकी उम्र जरूर 37 हो गई है, लेकिन मन तो अभी बच्चा है जी!  पिछले तीन सालों से उनके खेल को देखकर तो लगता है कि वे जवानी के दिनों से अधिक खूंखार हो गए हैं। क्रिकेट का कोई-सा भी फोर्मेट हो, उनका जोश काबिल-ए-तारीफ है। वनडे, 20-20 और टेस्ट सभी में वे लगातार बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे हैं। पिछले तीन सालों में उनका टेस्ट क्रिकेट का औसत 97 रहा है। वर्ष 2010 में अब तक छह टेस्ट मैंचों में पांच शतक लगा चुके हैं। हम आशा और प्रार्थना करते हैं कि सचिन इससे भी बेहतर प्रदर्शन करते रहें। ताकि अन्य देश के गेंदबाजों के दिल में भारत के इस शेर का खौफ बना रहे।
.           चलते-चलते मित्रों को एक जानकारी और दे देता हूं। हालांकि वह पहले ही आप तक पहुंच गई होगी। सचिन की आत्मकथा की विशेष प्रतियों में उनके खून के प्रयोग की बात निराधार है। सचिन ने मीडिया को यह जानकारी दी है कि किताब के पृष्ठ तैयार करने के लिए उनके रक्त के उपयोग की जानकारी बेबुनियाद है। वे ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं। यदि प्रकाशन मंडल ऐसी कोई योजना बना रहा है तो वे इस बात का समर्थन नहीं करेंगे। सचिन के फैन्स को इस खबर से कुछ राहत मिली है। सुनने में आ रहा था कि कई फैंस को किताब में खून के प्रयोग की बात अच्छी नहीं लग रही थी। 
वनडे में सचिन के दोहरे शतक का आंखो देखा हाल पढऩे के लिए क्लिक करें........ 

बुधवार, 21 जुलाई 2010

सचिन की आत्मकथा से करोड़ो प्रशंसकों को निराशा

 चिन के प्रशंसको के एक वर्ग को खासी प्रसन्नता हो सकती है यह जानकर कि सचिन की आत्मकथा छपकर आने जा रही है। किताब के रूप में वे सचिन को अपने पास सहेजकर रख सकेंगे। महान खिलाड़ी के प्रशंसकों का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसे इस खबर से प्रसन्नता से अधिक निराशा हो रही है उसके अपने-अपने कारण हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि वे शायद ही सचिन की आत्मकथा को खरीद सके और तो और शायद ही उन्हें यह पढऩे को नसीब हो, क्योंकि सचिन की आत्मकथा की कीमत बहुत अधिक है। 
   ........ अद्भुत सचिन की तरह उनकी आत्मकथा को भी अद्भुत बनाया जा रहा है। किताब का नाम होगा तेंदुलकर ओपस (Tendulkar opus) आत्मकथा के प्रारंभिक दस संस्करण बहुत ही खास रहने वाले हैं। इनके हस्ताक्षर पृष्ठ में सचिन के खून के कतरे मिलाए जाएंगे। सचिन का खून कागज तैयार करते समय उसकी लुगदी में मिलाया जाएगा। इस पृष्ठ का रंग हल्का लाल रहेगा। उनके डीएनए की जानकारी भी इस किताब में शामिल रहेगी। इसमें 852 पृष्ठ होंगे। खास बात यह रहेगी कि इसमें सचिन से संबंधित ऐसे फोटोग्राफ्स होंगे जो पहले कहीं भी प्रकाशित नहीं हुए हैं। 2011 के क्रिकेट विश्वकप से पहले इसके बाजार में आने की उम्मीद है।
     ........ अब अगर आप इस खास किताब को खरीदने का मन बना रहे हैं तो आपको निराशा ही हाथ लगने वाली है। इसका कारण है कि इस खास संस्करण की एक प्रति की कीमत करीब 35 लाख रुपए है। अब 35 लाख रुपए एक किताब के लिए खर्च करना शायद आपके बस की बात न हो, मान लो आपके बस की है भी तो भी आप नहीं खरीद सकते क्योंकि ये सभी दस किताबों अभी से बुक हो चुकी हैं। इसके अलावा इस किताब करीब एक हजार सस्ते संस्करण निकाले जाने हैं। ये कितने सस्ते हैं यह तो इनकी कीमत सुनकर आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं। इनकी कीमत 90 हजार से लेकर सवा लाख रुपए तक रहने वाली है। अब ऐसे में सचिन के ऐसे करोड़ो लोगों के लिए तो इस खबर से निराशा ही होगी जो दो जून की रोटी की जुगाड़ बमुश्किल कर पाते हैं। हम-तुम जो उनसे थोड़े सी ठीक स्थिति में हैं, मन होते हुए भी किताब खरीदने की हैसियत में नहीं। अब आम पाठक यह सोचे की चलो किसी पुस्तकालय में बैठकर ही सचिन की आत्मकथा पढ़ लेंगे तो शायद यह भी संभव न हो, क्योंकि इतनी मंहगी किताब बेजार हो रहे पुस्तकालय शायद ही खरीद पाएं। सो दोस्तो सचिन की आत्मकथा पढऩे का खयाल दिल से निकालना ही बेहतर होगा।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

सपोर्टिंग इनिंग्स ; लोकेन्द्र सिंह

 Lokendra Singh Rajput                                                     महान सचिन की महान पारी - मेरे प्यारे शहर में मेरे पसंदीदा प्लेयर ने अद्भुत काम कर दिया। बड़े अरमान से मैच देखने कैप्टन रूप सिंह स्टेडियम पहुंचा। बड़े दिनों से लगी थी सचिन से दौ सौ रन बनाने की उम्मीद, आज अपनी उपस्थिति में पूरी होते देखी। जैसे ही सचिन ने १८० रन पार किए उसके बाद तो गजब का रोमांच मैदान में था। सचिन के हर शॉट पर स्टेडियम में उपस्थित हरेक दर्शक उछल-उछल पड़ रहा था। अहा! क्या नजारा था। अद्वितीय सचिन ने अद्भुत कारनामा कर दिया। पूरा ग्वालियर झूम उठा। बिना संगीत के  ही सारा स्टेडियम नाचने लगा। मानो सचिन के बल्ले से स्वर लहरी फूट पड़ी हो। चौके-छक्के पर बल्ले से निकलने वाली आवाज यूं लगी की डीजे की धमक हो। सचिन की ऐतिहासिक कारनामें का गवाह सारा शहर बना और मैं भी, इसी सोच के साथ मन प्रफुल्लित होता रहा।
बेइज्ती करा दी- यूं तो मैच में खूब मजा आया, बस एक क्षण ऐसा काला रहा कि दिल दुख गया। भारतीय टीम बल्लेबाजी कर रही थी और सचिन का बल्ला आग उगल रहा था। उसी बीच किसी चिरकुट टाइप के लड़के ने जो हरकत की उसने सारे ग्वालियर को शर्मसार कर दिया। किसी ने भारी सुरक्षा के एक दक्षिण अफ्रीकी खिलाड़ी को पत्थर फेंक कर मार दिया। उसके बाद पुलिस को मोर्चा संभालना पड़ा। मेहमानों को सॉरी कहना पड़ा। शहर के युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को अभद्रता न करने की अपील करनी पड़ी। जो भी था उसकी पहचान तो नहीं हो सकी लेकिन, अंतर्राष्ट्रीय पटल पर ग्वालियर की छवि धूमिल हो गई। हमारे बीच भी कई चिरकुट बैठे थे जिन्हें हम लोग संभाल रहे थे। चूंकि हम दस-बारह लोग थे सो उनको हमारी बात माननी पड़ रही थी। जब मैंने एक को अभद्रता करने से रोका तो वो मुझ पर ही बन बैठा होता पर जैसे ही उसने देखा की ये पूरी फौज के साथ ही तो पूरे मैच में शांत रहा।
सुरक्षा व्यवस्था में लगाई सेंध-मैच शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो सके इसके लिए भारी फोर्स तैनात किया गया था। सुरक्षाधिकारियों ने दावा किया था कि मैच में परिंदा भी पर नहीं फडफ़ड़ा सकेगा। सब दावों के बीच परिंदों ने पर फडफ़ड़ाए और बीट भी की। बीट करने वाले का तो ऊपर वर्णन आ ही गया है। पेन-पेंसिल से लेकर मोबाइल तक स्टेडियम में ले जाना प्रतिबंधित था। लेकिन सारी सुरक्षा व्यवस्था को धत्ता बताकर कई लोग अंदर मोबाइल लेकर पहुंचे। जबकि पुलिस ने कम से कम छह जगह चैकिंग बिठा रखी थी। इतनी चैकिंग के बावजूद कैसे लोग मोबाइल अंदर लेकर पहुंचे, यह बात सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाती है। शायद ऐसी ही सुरक्षा व्यवस्था है हमारे पास तभी हम आंतकवाद और नक्सलवाद के हमलों को रोकने में नाकामयाब हैं। हम तो घर से बढिय़ा घी के बने हुए मैथी के परांठे ले गए थे लेकिन बाहर ही छीन लिए गए सुरक्षा व्यवस्था का हवाला देकर।