मंगलवार, 28 जून 2022

पिपरौआ गाँव के सरपंच शैलेन्द्र सिंह यादव

जो बाबा पुष्पहार पहने हैं, चुनाव वे नहीं जीते हैं। जो शांत चित्त से पास में खड़े हैं, चेकवाली आधी बांह की शर्ट में, वे चुने गए हैं सरपंच। नेताजी शैलेंद्र सिंह यादव। सही तो है, वे कहां जीते हैं। जीत तो समूचे गांव की हुई है। हर कोई जीता है। इसलिए तो समाज से प्राप्त आशीर्वाद के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का भाव ही उनके लिए सर्वोपरि है। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा...

ये इतने ही सहज और सरल हैं। जीत का कोई अभिमान नहीं। विनम्र। हंसमुख। संवेदनशील। उनका मिलनसार व्यक्तित्व उन्हें बाकी सबसे अलग पहचान देता है। श्रेय की भूख नहीं। कर्तव्य समझकर काम किया और भूल गए। कभी बड़प्पन नहीं दिखाते। सदा छोटे बनकर रहते हैं। इसलिए समूचे गांव ने खूब सारा प्रेम दिया। ग्राम पिपरौआ ने मास्टर साहब के लड़के शैलेंद्र सिंह यादव को सरपंच चुना है, जो अपने पिता की तरह ही सुलझे हुए और गांव के विकास के लिए समर्पित हैं। 

जिस दिन पंचायत चुनाव के मैदान में नेताजी ने अपना परचम उठाया था, उसी वक्त से जीत सुनिश्चित थी, बस प्रक्रिया और परिणाम आने की औपचारिकता बाकी थी। 

लोग चुनाव जीतने के लिए विकास और सहयोग के वायदे करते हैं। यह ऐसे चुनिंदा लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने सरपंच बने बिना ही गांव की तस्वीर बदलने में अग्रणी भूमिका निभाई है। 

वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय और शिवानन्द द्विवेदी की पुस्तक 'परिवर्तन की ओर' में जिला पंचायत भितरवार के गाँव पिपरौआ का उल्लेख

नेताजी शैलेंद्र सिंह यादव तो पहले से ही सच्चे जनप्रतिनिधि थे। अब लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने हुए सरपंच भी बन गए। 

उन्होंने अपने सामर्थ्य का उपयोग सदा ही लोगों की भलाई के लिए किया है। वे लोगों की सहायता के लिए हर समय एक फोन कॉल की दूरी पर उपलब्ध रहते हैं। समाज से ऐसा गहरा नाता है कि अनेक जरूरतमंदों की मदद स्वयं आगे बढ़कर उस समय में की, जब उन्हें कहीं से सहायता की उम्मीद नहीं थी। शासकीय योजनाओं का लाभ ग्रामीण बंधुओं को मिले, ऐसे प्रयास भी लगातार उनकी ओर से रहते हैं। 

इस विजय के साथ यह विश्वास सबको है कि गांव की तरक्की को अब और पंख लग जायेंगे। शासकीय योजनाओं का लाभ गांव के अधिकतम लोगों को मिल सकेगा। नेताजी के नेतृत्व में गांव खुशहाली की ओर बढ़ेगा और बाकी अन्य पंचायतों के सामने उदाहरण बनेगा।

ईश्वर से प्रार्थना है कि सार्वजनिक जीवन में उनकी यात्रा और आगे बढ़े। मध्यप्रदेश की राजधानी उनकी प्रतीक्षा में है...

पंचायत चुनाव में जीत के बाद पिपरौआ के ग्रामवासियों का धन्यवाद ज्ञापन एवं सम्मान करते नवनिर्वाचित सरपंच शैलेन्द्र सिंह यादव


पिपरौआ गाँव के सरपंच शैलेन्द्र सिंह यादव / Shelendra Singh Yadav

मंगलवार, 14 जून 2022

विश्वपटल पर एकजुट हो सज्जनशक्ति

चित्र प्रतीकात्मक है. पाकिस्तान के ही किसी मंदिर पर हमले का यह चित्र है.

शिवलिंग पर की जा रहीं आपत्तिजनक टिप्पणियों के विरोध में किये गए एक बयान के आधार पर भारत के विरुद्ध नकारात्मक वातावरण बनानेवाला पाकिस्तान कभी अपने गिरेबान में झाँककर देखने की कोशिश नहीं करता। हिंदुओं सहित गैर-इस्लामिक मत के अनुयायियों पर होनेवाले अत्याचार पाकिस्तान के भीतर की कालिख को उसके मुंह पर मलने के लिए पर्याप्त हैं। कट्टरता और घोर सांप्रदायिक सोच में डूबा पाकिस्तान न जाने किस मुंह से दुनिया के सबसे बड़े और सफल लोकतंत्र पर सवाल उठाता है। पाकिस्तान में जो हाल हिन्दू समुदाय का है, वही स्थिति उनके पूजास्थलों के साथ भी है। अक्सर हिन्दू मंदिर कट्टरपंथियों की हिंसा का शिकार हो जाते हैं। विगत बुधवार को एक बार फिर कराची के कोरंगी इलाके में श्री मरी माता मंदिर में मूर्तियों पर हमला हुआ। श्री मरी माता मंदिर कोरंगी पुलिस स्टेशन से कुछ ही दूरी पर स्थित है। इसका अर्थ है कि पाकिस्तान में अतिवादियों के मन में पुलिस का भी भय नहीं है।

          पाकिस्तान में मंदिर पर हमले का यह पहला मामला नहीं है, बल्कि वहाँ लगातार हिन्दू मंदिरों पर जेहादियों की भीड़ हमले करती रहती है। इससे पहले अज्ञात लोगों ने लरकाना में मंदिर में तोड़फोड़ की थी। अक्टूबर में कोटरी में सिंधु नदी के किनारे स्थिति ऐतिहासिक मंदिर पर अज्ञात लोगों ने कथित तौर पर हमला कर दिया था। यह श्रृंखला बहुत लंबी है। पाकिस्तान ऐसा देश है, जहां गैर-मुस्लिम समुदायों की जनसंख्या लगातार कम होती गई है। इसके कारणों कि पड़ताल करेंगे तो ध्यान आएगा कि पाकिस्तान में शासन की शह पाकर कट्टरपंथी ताकतों ने गैर-मुस्लिमों का जबरन कंवर्जन किया है और जेहादियों के अत्याचारों से भयाक्रांत लोग पलायन को मजबूर हुए हैं। पाकिस्तान की सांप्रदायिक परिस्थितियों के जीवंत प्रमाण समूची दुनिया है बिखरे हुए हैं। 

          दु:ख की बात यह है कि किसी को हिंदुओं सहित अन्य समुदायों की यह दयनीय स्थिति दिखाई नहीं देती है। जबकि महज एक बयान, एक कार्टून और एक किताब के विरोध में दुनियाभर की इस्लामिक ताकतें एकजुट हो जाती हैं। कट्टरपंथ और सांप्रदायिकता से लड़ने के लिए इस प्रकार की एकजुटता, सद्भाव में विश्वास करने वाले ताकतों के बीच भी चाहिए। विश्वपटल पर सज्जनशक्ति की ताकत भी दिखनी चाहिए। अन्यथा इस प्रकार से इस्लामिक ताकतें न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतान्त्रिक मूल्यों एवं व्यवस्थाओं को प्रभावित करेंगी अपितु किसी भी देश के आंतरिक मुद्दों पर दखल देने कि प्रवृत्ति भी बढ़ जाएगी। ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न देशों के मध्य कटुता बढ़ेगी। संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि सज्जनशक्ति भी एकजुट हो और इस्लामिक देशों की अतिवादी सोच और सांप्रदायिकता के उपचार के लिए दबाव बनाए।

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शनिवार, 11 जून 2022

नूपुर शर्मा विवाद : प्रदर्शन और मानसिकता


कथित विवादास्पद टिप्पणी के मामले में मुस्लिम समुदाय की ओर से किए जा रहे प्रदर्शन रुकने की बजाय हिंसक होते जा रहे हैं। यह स्थिति चिंताजनक है। इन प्रदर्शनों से भविष्य के लिए गंभीर संकेत मिल रहे हैं। जिस छोटे से घटनाक्रम का पटाक्षेप भाजपा प्रवक्ताओं के खेद प्रकट करने के साथ ही हो जाना चाहिए था, वह प्रवक्ताओं के निलंबन और पुलिस प्रकरण दर्ज होने के बाद भी थम नहीं रहा है। शुक्रवार को नमाज के बाद जिस तरह देश के विभिन्न शहरों में सड़कों पर निकलकर धर्मांध भीड़ ने हिंसक प्रदर्शन किए हैं, उससे इस वर्ग की मानसिकता भी प्रकट होती है। एक ऐसी टिप्पणी पर यह वर्ग हिंसातुर हो गया है, जिसका जिक्र उनकी किताबों में है और प्रमुख मुस्लिम प्रवक्ता उस बात का उल्लेख करते रहते हैं। जबकि इस वर्ग के लोगों की ओर से पिछले दिनों में भगवान शिव के लिए कितनी ही ओछी और अश्लील बातें कही गई हैं, लेकिन न तो हिन्दू समाज ने हिंसक प्रदर्शन किए और न ही किसी का सिर काटने पर ईनाम की घोषणा की। किसी हिन्दू संगठन या हिन्दू धर्मगुरु ने सड़कों पर हिंसा करने के लिए उकसाने वाले भाषण भी नहीं दिए हैं। शिव की तरह हिन्दू समाज गरल को अपने कंठ में धारण करके बैठ गया है। मानवता के लिए कुछ कड़वी बातों को सहन कर ही लेना उचित होता है। यह धैर्य अन्य संप्रदायों को हिन्दू समाज से सीखना चाहिए।