मैं हूँ



लोकेन्द्र सिंह
लेखक लम्बे अरसे से अपनी लेखनी के जरिए सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। उनकी लेखनी से राष्ट्रवाद सहज ही बहता है। कलम चलाते वक्त उनके दिमाग में कोई द्वंद्व नहीं होता, उन्हें पता है कि सच्चाई का पक्ष लेना है और किसी भी शर्त पर सही बातों को बिना लाग-पलेट के कहना है। लेखक का मानना है कि साहित्यकार देश का बौद्धिक नेतृत्व करते हैं। साहित्यकारों की कलम और उनके शब्दों का जनमानस पर जादुई असर होता है। इसलिए समाज को प्रोत्साहित करना, सकारात्मक वातावरण का निर्माण करना और परम्परा-संस्कृति से जोड़े रखना ही साहित्यकारों का पहला और अंतिम उद्देश्य होना चाहिए।
          गालव ऋषि की तपोभूमि और वीरांगना लक्ष्मीबाई की रणभूमि ग्वालियर में 14 जनवरी, 1984 को मकर संक्रांति के दिन लोकेन्द्र सिंह का जन्म हुआ। अपने समाज को नजदीक से देखने-समझने की तीव्र चाह उन्हें पत्रकारिता में खींचकर लाई। दैनिक स्वदेश, ग्वालियर में पत्रकारिता का ककहरा सीखा। उन्होंने नईदुनिया, दैनिक भास्कर और पत्रिका में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वहन किया।
         उनकी पुस्तक 'देश कठपुतलियों के हाथ में' राजनीति और पत्रकारिता के क्षेत्र में खासी चर्चित है। इस पुस्तक के लिए 'राष्ट्रीय पत्र लेखक मंच' ने उनका अभिनंदन किया। उनके काव्य संग्रह 'मैं भारत हूँ' ने भी साहित्य जगत का ध्यान खींचा है। वे ब्लॉग 'अपनापंचू' के माध्यम से ब्लॉग जगत में भी सक्रिय हैं। ब्लॉगिंग के लिए दिल्ली की संस्था ‘शोभना वेलफेयर सोसायटी’ द्वारा ‘ब्लॉग रत्न’ सम्मान से सम्मानित। समसामयिक विषयों पर उनके आलेख, कविता, कहानी और यात्रा वृतांत देशभर के पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशित होते हैं।
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