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सोमवार, 19 जनवरी 2026

सनातन की ओर लौटती तरुणाई

श्रीराम मंदिर: भारतीय युवाओं की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक चेतना का नया सूर्योदय


भारत के युवाओं को लेकर देश में अलग-अलग ढंग से विमर्श चल रहे हैं। कुछ ताकतें चाहती हैं कि भारत का युवा अपनी ही संस्कृति एवं जीवन मूल्यों के विरुद्ध खड़ा हो जाए। धर्म-संस्कृति क्रियाकलापों से युवाओं को दूर करने के लिए यहाँ तक कहा गया कि “जो लोग मंदिर जाते हैं, वही लोग महिलाओं को छेड़ते हैं”। यह भी कि “सरस्वती की पूजा करने से कोई आईएएस नहीं बनता”। योलो और वोकिज्म की रंगीन अवधारणाएं भारत की जेन-जी के दिमाग में उतारने के प्रपंच रचे ही जा रहे हैं। परंतु, भारत विरोधी ताकतों को यह स्मरण नहीं रहता कि भारत की संस्कृति के पोषण में वह ताकत है कि उसकी संतति अधिक समय तक उससे दूर नहीं रह सकती। सब प्रकार के प्रपंचों से थक-हारकर, आत्मा के वास्तविक सुख की प्राप्ति के लिए वह अपनी संस्कृति की गोद में ही लौटता है। आज सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक अनुष्ठानों में युवाओं की जिस प्रकार की सक्रिय उपस्थिति दिखायी दे रही है, उसके गहरे निहितार्थ हैं। पिछले कुछ वर्षों में धर्म के प्रति युवाओं में गहरी रुचि पैदा हुई है। उनकी आध्यात्मिक चेतना को मंदिर में उमड़ रही युवाओं की भीड़ में अनुभव किया जा सकता है। ज्ञान की खोज में आश्रमों एवं गुरुकुलों में पहुँच रहे युवाओं के माथे पर उनकी जिज्ञासाओं को पढ़ा जा सकता है। युवाओं में परिवर्तन की इस लहर का प्रमुख केंद्र श्री अयोध्या धाम में, अपने भव्य मंदिर में विराजे रामलला हैं। भारत की सांस्कृतिक राजधानी श्रीअयोध्या में प्रभु श्रीराम के दिव्य मंदिर के निर्माण, रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा, शिखर पर धर्म ध्वजा की स्थापना, ये सब केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, अपितु भारतीय जनमानस की चेतना में युगांतरकारी घटनाएं हैं। कहना होगा कि 22 जनवरी, 2024 के बाद भारत के युवा मन में जो परिवर्तन दिखाई दे रहा है, वह अभूतपूर्व है। यह घटना सदियों के संघर्ष के विराम के साथ-साथ एक नये और आत्मविश्वास से भरे भारत के उदय का प्रतीक बन गई है। आज श्रीराम मंदिर केवल ईंट-पत्थरों से बना देवालय नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का केंद्र बन गया है।

शुक्रवार, 1 नवंबर 2024

तीर्थाटन का केंद्र बन रहा है मध्यप्रदेश

धर्म और अध्यात्म भारत की आत्मा है। यह धर्म ही है, जो भारत को उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक एकात्मता के सूत्र में बांधता है। भारत की सभ्यता और संस्कृति का अध्ययन करते हैं तो हमें साफ दिखायी देता है कि धार्मिक पर्यटन हमारी परंपरा में रचा-बसा है। तीर्थाटन के लिए हमारे पुरखों ने पैदल-पैदल ही इस देश को नापा है। भारत की सभ्यता एवं संस्कृति विश्व समुदाय को भी आकर्षित करती है। हम अनेक धार्मिक स्थलों पर भारतीयता के रंग में रंगे विदेशी सैलानियों को देखते ही हैं। दरअसल, भारत को दुनिया में सबसे ज्यादा धार्मिक स्थलों का देश कहा जाता है। भारत का ह्रदय ‘मध्यप्रदेश’ अपनी नैसर्गिक सुन्दरता, आध्यात्मिक ऊर्जा और समृद्ध विरासत के चलते सदियों से यात्रियों को आकर्षित करता रहा है। आत्मा को सुख देनेवाली प्रकृति, गौरव की अनुभूति करानेवाली धरोहर, रोमांच बढ़ानेवाला वन्य जीवन और विश्वास जगानेवाला अध्यात्म, इन सबका मेल मध्यप्रदेश को भारत के अन्य राज्यों से अलग पहचान देता है। मध्यप्रदेश में धर्म-अध्यात्म से जुड़े ऐसे अनेक स्थान हैं, जहाँ देशभर से लोग खिंचे चले आते हैं।

देखें: मध्यप्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थल


शुक्रवार, 8 मार्च 2024

धार्मिक-आध्यात्मिक सर्किट के रूप में विकसित होगा उज्जैन-इंदौर संभाग, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का सराहनीय निर्णय

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उज्जैन-इंदौर संभाग को धार्मिक-आध्यात्मिक सर्किट के रूप में विकसित करने का सराहनीय निर्णय लिया है। यह निर्णय मध्यप्रदेश के विकास को नयी ऊंचाईयों पर ले जाने के साथ ही उसे बड़ी पहचान देगा। यह सर्वविदित है कि उज्जैन-इंदौर संभाग सांस्कृतिक, धार्मिक एवं ऐतिहासिक रूप से समृद्ध क्षेत्र है। इस संभाग में दो ज्योतिर्लिंग प्रकाशमान हैं- महाकाल एवं ओंकारेश्वर। जिनके दर्शन के लिए देशभर से श्रद्धालु पहुँचते हैं। महाकाल लोक के निर्माण के बाद से तो उज्जैन आनेवाले श्रद्धालुओं की संख्या में कई गुना बढ़ोतरी हो गई है। इसी संभाग के मंदसौर में पशुपतिनाथ मंदिर, नलखेड़ा में बगुलामुखी माई का मंदिर, खंडवा में दादा धूनीवाले, इंदौर में खजराना गणेश मंदिर सहित अनेक और स्थान ऐसे हैं, जो धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व के स्थान है।

गुरुवार, 25 जनवरी 2024

धार्मिक पर्यटन का केंद्र है भारत

अयोध्या धाम में श्रीरामलला के दर्शन

धर्म और अध्यात्म भारत की आत्मा है। यह धर्म ही है, जो भारत को उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक एकात्मता के सूत्र में बांधता है। भारत की सभ्यता और संस्कृति का अध्ययन करते हैं तो हमें साफ दिखायी देता है कि धार्मिक पर्यटन हमारी परंपरा में रचा-बसा है। तीर्थाटन के लिए हमारे पुरखों ने पैदल-पैदल ही इस देश को नापा है। भारत की सभ्यता एवं संस्कृति विश्व समुदाय को भी आकर्षित करती है। हम अनेक धार्मिक स्थलों पर भारतीयता के रंग में रंगे विदेशी सैलानियों को देखते ही हैं। दरअसल, भारत को दुनिया में सबसे ज्यादा धार्मिक स्थलों का देश कहा जाता है। एक अनुमान के अनुसार, देशभर में पाँच हजार से अधिक सुप्रसिद्ध धार्मिक स्थल हैं। हालांकि, हमारे लिए तो प्रत्येक धार्मिक स्थल श्रद्धा का केंद्र है। भारत के शहर-शहर में कई ऐसे स्थान हैं, जहाँ देशभर से लोग पहुँचते हैं। मथुरा, वृंदावन, अयोध्या, काशी, उज्जैन, द्वारिका, त्रिवेंद्रम, कन्याकुमारी, अमृतसर, जम्मू-कश्मीर, पुरी, केदारनाथ, बद्रीनाथ इत्यादि ऐसे स्थान हैं, जहाँ न केवल भारतीय नागरिक बड़ी संख्या में पहुँचते हैं अपितु विदेशी और भारतीय मूल के नागरिक श्रद्धा के साथ आते हैं। पिछले आठ-दस वर्षों में भारत के धार्मिक पर्यटन में उत्साहजनक वृद्धि हुई है। विश्व के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने न केवल धार्मिक स्थलों को पुनर्विकसित कराया है, अपितु आगे बढ़कर धार्मिक पर्यटन का प्रचार-प्रसार भी किया है। जिसके परिणाम हमें धार्मिक पर्यटन में हो रही वृद्धि के रूप में दिखायी देते हैं। विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, देश के कुल पर्यटन में 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी धार्मिक पर्यटन की है। आज देश के पर्यटन उद्योग में 19 प्रतिशत की वृद्धि दर अर्जित की जा रही है जबकि वैश्विक स्तर पर पर्यटन उद्योग केवल 5 प्रतिशत की वृद्धि दर दर्ज कर रहा है।

बुधवार, 4 अक्टूबर 2023

‘एकात्मता की प्रतिमा’ से दुनिया में जाएगा अद्वैत एवं हिन्दुत्व का संदेश

ओंकारेश्वर में शङ्करावतरणम्


मध्यप्रदेश के ओंकारेश्वर में सुखदायिनी नर्मदा नदी के किनारे मांधाता पर्वत पर जिस समय संत-महात्मा एवं अन्य महानुभाव वैदिक यज्ञ के बाद आदि शंकराचार्य की प्रतिमा का पूजन करने आगे बढ़ रहे थे, ठीक उसी समय मेघदूतों ने आकर कुछ क्षण के लिए वर्षा की। दृश्य ऐसा था कि मानो स्वयं देवता भी आचार्य शंकर का अभिषेक करने से स्वयं को रोक नहीं पाए....

‘शङ्करावतरणम्’ समारोह के अंतर्गत स्वामी अवधेशानंद जी गिरी महाराज, परमात्मानंद जी, स्वामी स्वरूपानंद जी और स्वामी तीर्थानंद जी महाराज सहित 13 प्रमुख अखाड़ों के प्रतिनिधियों और देशभर से आए हजारों साधु-संतों की उपस्थिति में भाद्रपद, शुक्ल पक्ष षष्टी (21 सितंबर) को संस्कृतिमयी वातावरण में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आदि शंकराचार्य की 108 फीट ऊंची दिव्य एवं मोहक प्रतिमा का अनावरण किया। समारोह के दौरान ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो मांधाता पर्वत पर स्वर्ग उतर आया है और आचार्य शंकर का एक बार फिर से अवतरण हो रहा है। केरल, आसाम, ओडीसा, राजस्थान, मध्यप्रदेश इत्यादि राज्यों के कलाकारों ने अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से समारोह को अलौकिक स्वरूप प्रदान किया। वेद मंत्रों के उच्चारण ने वातावरण में वैदिक ऊर्जा का संचार किया, जिसे सहज अनुभव किया जा रहा था। सभी संतों एवं महानुभावों ने समवेत स्वर में कहा कि आदि शंकराचार्य की यह प्रतिमा देश-दुनिया में हिन्दू संस्कृति, अद्वैत के सिद्धांत, एकता और शांति के संदेश को पहुँचाएगी।

शनिवार, 12 अगस्त 2023

सामाजिक समरसता का केंद्र बने संत रविदास मंदिर

भारत को कमजोर करने के लिए जातीय द्वेष बढ़ाने में अनेक ताकतें सक्रिय हैं। उनके निशाने पर विशेषकर हिन्दू समाज है। वहीं, भारतीय समाज को एकसूत्र में बांधने के प्रयास करनेवाली संस्थाएं अंगुली पर गिनी जा सकती हैं। चिंताजनक बात यह है कि भारत विरोधी ताकतों के निशाने पर राष्ट्रीयता को मजबूत करनेवाले संगठन भी रहते हैं। ऐन-केन-प्रकारेण उनकी छवि को बिगाड़ने के प्रयास किए जाते हैं। राजनीतिक क्षेत्र में भी कमोबेश यही स्थिति है। वोटबैंक की राजनीति के चलते अनेक नेता एवं राजनीतिक दल भी हिन्दू समाज में जातीय विद्वेष को बढ़ाने के दोषी हैं। इन परिस्थितियों के बीच शिवराज सरकार ने मध्यप्रदेश के सागर जिले में संत शिरोमणि रविदास महाराज के मंदिर का निर्माण करने का सराहनीय निर्णय लिया गया है। सरकार इस मंदिर को सामाजिक समरसता के केंद्र के तौर पर विकसित करना चाहती है। समरसता मंदिर के निर्माण में संपूर्ण हिन्दू समाज की भागीदारी हो, इसके लिए सरकार के प्रयासों से प्रदेशभर में समरसता यात्राएं निकाली जा रही हैं, जो 12 अगस्त को निर्माण स्थल बड़तूमा पहुँचेंगी। यहाँ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान 100 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से बन रहे संत शिरोमणि रविदास मंदिर की नींव रखेंगे। यह मंदिर अपने उद्देश्य के अनुसार आकार ले, इसके लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। वे समरसता यात्राओं में सहभागिता कर लोगों तक संत रविदास के संदेश को पहुँचाने का भगीरथी प्रयास कर रहे हैं। आनंद की बात है कि संत रविदास समरसता यात्रा का रथ जहाँ-जहाँ से गुजर रहा है, वहाँ के लोग मंदिर निर्माण के लिये अपने क्षेत्र की मिट्टी और नदियों का जल देकर संदेश दे रहे हैं कि निश्चित ही यह स्थान सबको एकसूत्र में जोड़ने में सफल होगा।

बुधवार, 12 जनवरी 2022

भारत भक्ति से भरा मन है ‘स्वामी विवेकानंद’


स्वामी विवेकानंद ऐसे संन्यासी हैं, जिन्होंने हिमालय की कंदराओं में जाकर स्वयं के मोक्ष के प्रयास नहीं किये बल्कि भारत के उत्थान के लिए अपना जीवन खपा दिया। विश्व धर्म सम्मलेन के मंच से दुनिया को भारत के ‘स्व’ से परिचित कराने का सामर्थ्य स्वामी विवेकानंद में ही था, क्योंकि विवेकानंद अपनी मातृभूमि भारत से असीम प्रेम करते थे। भारत और उसकी उदात्त संस्कृति के प्रति उनकी अनन्य श्रद्धा थी। समाज में ऐसे अनेक लोग हैं जो स्वामी जी या फिर अन्य महान आत्माओं के जीवन से प्रेरणा लेकर भारत की सेवा का संकल्प लेते हैं। रामजी की गिलहरी के भांति वे भी भारत निर्माण के पुनीत कार्य में अपना योगदान देना चाहते हैं। परन्तु भारत को जानते नहीं, इसलिए उनका गिलहरी योगदान भी ठीक दिशा में नहीं होता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक, चिन्तक एवं वर्तमान में सह-सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य अक्सर कहते हैं कि “भारत को समझने के लिए चार बिन्दुओं पर ध्यान देने की जरूरत है। सबसे पहले भारत को मानो, फिर भारत को जानो, उसके बाद भारत के बनो और सबसे आखिर में भारत को बनाओ”। भारत के निर्माण में जो भी कोई अपना योगदान देना चाहता है, उसे पहले इन बातों को अपने जीवन में उतरना होगा। भारत को मानेंगे नहीं, तो उसकी विरासत पर विश्वास और गौरव नहीं होगा। भारत को जानेंगे नहीं तो उसके लिए क्या करना है, क्या करने की आवश्यकता है, यह ध्यान ही नहीं आएगा। भारत के बनेंगे नहीं तो बाहरी मन से भारत को कैसे बना पाएंगे? भारत को बनाना है तो भारत का भक्त बनना होगा। उसके प्रति अगाध श्रद्धा मन में उत्पन्न करनी होगी। स्वामी विवेकानंद भारत माता के ऐसे ही बेटे थे, जो उनके एक-एक धूलि कण को चन्दन की तरह माथे पर लपेटते थे। उनके लिए भारत का कंकर-कंकर शंकर था। उन्होंने स्वयं कहा है- “पश्चिम में आने से पहले मैं भारत से केवल प्रेम करता था, परंतु अब (विदेश से लौटते समय) मुझे प्रतीत होता है कि भारत की धूलि तक मेरे लिए पवित्र है, भारत की हवा तक मेरे लिए पावन है, भारत अब मेरे लिए पुण्यभूमि है, तीर्थ स्थान है”।

रविवार, 5 दिसंबर 2021

भारत में दर्शन का आधार है ‘संवाद’

सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम् । 

देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ॥2॥ 

समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम् l 

समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि ॥3॥ 

समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः । 

समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥4॥

ऋग्वेद के 10वें मंडल का यह 191वां सूक्त ऋग्वेदका अंतिम सूक्त है। इस सूक्त में सबकी अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले अग्निदेव की प्रार्थना, जो आपसी मतभेदों को भुलाकर सुसंगठित होने के लिए की गयी है। आप परस्पर एक होकर रहें, परस्पर मिलकर प्रेम से वार्तालाप करें। समान मन होकर ज्ञान प्राप्त करें। जिस प्रकार श्रेष्ठजन एकमत होकर ज्ञानार्जन करते हुए ईश्वर की उपासना करते हैं, उसी प्रकार आप भी एकमत होकर एवं विरोध त्याग करके अपना काम करें। हम सबकी प्रार्थना एकसमान हो, भेद-भाव से रहित परस्पर मिलकर रहें, अंतःकरण मन-चित्त-विचार समान हों। मैं सबके हित के लिए समान मन्त्रों को अभिमंत्रित करके हवि प्रदान करता हूँ। तुम सबके संकल्प एकसमान हों, तुम्हारे ह्रदय एकसमान हों और मन एकसमान हों, जिससे तुम्हारा कार्य परस्पर पूर्णरूपसे संगठित हों।

शनिवार, 15 अगस्त 2020

आओ, भारत को उत्साहित करें

भारत के स्वरूप पर यह कविता भी सुनें

आज भारत अपना 74वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। कोरोना महामारी ने हम सबको बांध कर रखा हुआ है। इस महामारी के कारण अनेक चिंताएं और चुनौतियां हमारे सामने हैं। लेकिन, अच्छी बात यह है कि हम हारे नहीं हैं। हमने इस महामारी के सामने घुटने नहीं टेके हैं। हम पहले दिन से संघर्ष कर रहे हैं। हम ठीक उसी तरह अपनी पूरी जान लगा कर बीमारी से लड़ रहे हैं, जैसे हम विदेशी दासता से लड़े। हमने कभी भी विदेशी शासन के सामने घुटने नहीं टेके थे। हमारा संघर्ष पहले दिन से शुरू हो गया था। चाहे फिर वे मुगल हों, पुर्तगीज हों या फिर ब्रिटिश। हमने बाहर से आए आक्रांताओं एवं लुटेरों के विरुद्ध सतत् संघर्ष किया। कभी हार नहीं मानी। हमारे संघर्ष, हौसले और हमारी विजिगीषा का परिणाम था कि 1947 में शासन के सूत्र हमारे हाथ में थे। यह दीगर बात है कि पूर्ण स्वतंत्रता और स्वराज्य के लिए संघर्ष अब भी जारी है। हमें विश्वास है कि अपने इन्हीं अद्भुत गुणों के कारण हम कोविड-19 वायरस को भी भारत से बाहर खदेड़ सकेंगे। इस दिशा में कुछ उत्साहजनक समाचारों की आहट मिलना शुरू हुई है। भारत में बन रही देसी वैक्सीन अपने पहले चरण के परीक्षण में सब प्रकार से सफल रही है। उम्मीद है कि भारत की मेधा वैक्सीन के शेष चरणों का परीक्षण भी जल्द पूरा करेगी। 

भारत के नागरिकों का यह चरित्र इसलिए है क्योंकि उसके शास्त्र यही सीख देते हैं कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धैर्य और उत्साह को क्षीण नहीं होने देना चाहिए। जिजीविषा बनाए रखना ही पराक्रमी और विजेता लोगों की पहचान है। रामायण में माता सीता के अपहरण के बाद एक स्थान पर प्रसंग आता है कि वियोग में श्रीराम गहरे दु:ख से घिर गए हैं। उनका उत्साह बिल्कुल ठंडा पड़ गया है। तब उनके अनुज लक्ष्मण उन्हें कहते हैं- 

“उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात् परं बलम्।

सोत्साहस्य हि लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्।।” (१२१ किष्किन्धाकाण्ड, प्रथम सर्ग) 

“भैया, उत्साह ही बलवान होता है। उत्साह से बढ़कर दूसरा कोई बल नहीं है। उत्साही पुरुष के लिए संसार में कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है।” सुमित्रानंदन आगे कहते हैं कि जिनके हृदय में उत्साह होता है, वे पुरुष कठिन-से-कठिन कार्य आ पडऩे पर हिम्मत नहीं हारते। आप जैसे महात्मा एवं कृतात्मा पुरुष को शोक शोभा नहीं देता। इसी तरह महाभारत का प्रसंग हमको ध्यान में आता है, जब युद्ध भूमि में वीर अजुर्न के हाथ से गांडिव छूट जाता है। रणभूमि में संगे-संबंधियों को अपने सामने देखकर अपराजेय अर्जुन का उत्साह ठंडा पड़ जाता है। वे घनघोर निराशा में डूब जाते हैं। तब योगेश्वर श्रीकृष्ण उनके भीतर उत्साह का संचार करते हैं। 

वर्तमान समय में अनेक प्रकार से अनेक महात्मा एवं राजपुरुष लोग ‘भारत’ के उत्साह को बनाए हुए हैं। इसी महान उत्साह के बल पर हमारा संघर्ष जारी है। इसी उत्साह के बल पर हम जीतेंगे। आईए, इस स्वतंत्रता दिवस पर हम संकल्प लें कि भारत को मजबूत करेंगे। भारत को श्रेष्ठ बनाने में अपना ‘गिलहारी’ (हर संभव) योगदान देंगे। हम आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को साकार करने के लिए आगे आएंगे। जयतु भारत....

इस अवसर पर यह कविता सुनें.... 

माझा भारत | मेरा भारत | भारत का आध्यात्मिक काव्य चित्रण/वर्णन


शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

बंधुत्व का प्रतीक श्रीराम मंदिर

श्रीराम जन्मभूमि, अयोध्या मंदिर में विराजे रामलला के दर्शन

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का जीवन भारतीय विचार की अभिव्यक्ति है। श्रीराम ने अपने जीवन से सामाजिक समरसता, एकात्म एवं बंधुत्व का संदेश दिया है। आज से हजारों वर्षों पूर्व त्रेतायुग में उन्होंने भारत को एक छोर से दूसरे छोर तक एकसूत्र में पिरोया। प्रभु श्रीराम ने सामाजिक समरसता को न केवल अपने शासन की आधारशिला बनाया, बल्कि उनके जीवन का सार भी यही है। इसलिए समूचा समाज राम का है और राम सबके हैं। आज के युग में उनके संदेश का केंद्र बनेगा अयोध्या में बनने जा रहा श्रीराम मंदिर। भारत का यह मंदिर बंधुत्व का प्रतीक होगा। पाँच अगस्त को श्रीराम की जन्मभूमि पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने भूमिपूजन के बाद अपने उद्बोधनों से यही संदेश दिया। 

श्रीराम मंदिर के संघर्ष को रेखांकित करते हुए दोनों महानुभावों ने कहना यही था कि श्रीराम मंदिर भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत का द्योतक होगा, अनंतकाल तक पूरी मानवता को प्रेरणा देगा और मार्गदर्शन करता रहेगा। यह भारत को जोडऩे का काम करेगा। श्रीराम मंदिर ने यह कार्य अपने निर्माण से बहुत पहले, आंदोलन के दौरान ही प्रारंभ कर दिया था। श्रीराम मंदिर आंदोलन में समूचे भारत से सभी वर्गों के लोग शामिल हुए। सबको स्मरण है कि अशोक सिंघल जी के नेतृत्व में विश्व हिंदू परिषद के प्रयासों से 1989 में श्रीराम जन्मभूमि के शिलान्यास का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ था, जिसका श्रेय अचानक से भगवा रंग में रंगी कांग्रेस लूटने का प्रयास कर रही है। शिलान्यास का वह कार्यक्रम शुद्ध तौर पर विश्व हिंदू परिषद का कार्यक्रम था, जिसमें अनेक पूज्य संत शामिल हुए थे। उस दिन भी सामाजिक समरसता का उदाहरण सबने देखा था, जब अनुसूचित जाति के कामेश्वर चौपाल के कर कमलों से शिलान्यास पूजन हुआ। 

भगवान श्रीराम के दरबार में दंडवत प्रणाम करते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

           5 अगस्त, 2020 को जब श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण कार्य का शुभारंभ हो रहा था, तब भी कार्यक्रम में लगभग 36 परंपराओं, पंथ-संप्रदायों के संत उपस्थित थे, जिनमें प्रमुख हैं- दशनामी सन्यासी परंपरा, रामानुज, निंबार्क, वल्लभ, कृष्ण प्रणामी आदि संप्रदाय निर्मले संत, लिंगायत, रविदासी संत, जैन, सिख, मत पंथ, स्वामीनारायण, चिन्मय मिशन, रामकृष्ण मिशन, एकनाथी, वनवासी संत, सिंधी संत, रामानंदी वैष्णव, माधवाचार्य, रामस्नेही, उदासीन, कबीरपंथी, वाल्मीकि संत, आर्य समाजी, बौद्ध, नाथ परंपरा, गुरु परंपरा, आचार्य सभा के प्रतिनिधि, संत कैवल्य ज्ञान, इस्कॉन, वारकरी, बंजारा संत, आदिवासी गौण, भारत सेवाश्रम संघ, संत समिति एवं अखाड़ा परिषद। इसके अतिरिक्त भी अन्य मत-संप्रदाय के प्रतिनिधि लोग वहाँ उपस्थित रहे। 

मंदिर निर्माण के लिए देश की विभिन्न नदियों से जल एवं प्रमुख स्थानों से मिट्टी लाई गई, जिनमें संत रविदास जन्मस्थली, सीतामढ़ी उत्तर प्रदेश से महर्षि वाल्मीकि आश्रम, मध्यप्रदेश के टंट्या भील की पुण्य भूमि, श्री हरमंदिर साहिब अमृतसर पंजाब, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के जन्मस्थान महू की, दिल्ली के जैन लाल मंदिर, वाल्मीकि मंदिर (जहां महात्मा गांधी 72 दिन रहे थे) इत्यादि स्थान प्रमुख हैं। इसलिए बार-बार यह कहा जा रहा है कि यह मंदिर साधारण नहीं है, यह भारत की पहचान बनेगा। निश्चित ही श्रीराम मंदिर विश्व-बंधुत्व का संदेश देने वाला सबसे बड़ा केंद्र बनेगा।


गुरुवार, 6 अगस्त 2020

रामत्व का उद्घोष

मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में जब भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत की उपस्थिति में मंदिर निर्माण कार्य प्रारंभ करने के लिए पूजन किया जा रहा था, तब चहुँ ओर हर्ष व्याप्त था। रामनाम का प्रभाव और हिंदू समाज की सांगठनिक शक्ति का प्रताप है कि राम को काल्पनिक सिद्ध करने की भरसक चेष्टा करने वाले भी राम-नाम जाप कर रहे हैं। यह अद्भुद दृश्य भारत में ही नहीं, अपितु समूची दुनिया में देखे गए। लगभग पाँच सदियों बाद साकार हो रहे स्वप्न को देखने के लिए सारा देश टेलीविजन के सामने बैठा रहा। उसका मन आल्हादित था। प्रत्येक रामभक्त की भौतिक उपस्थिति तो अपने ही घर में टेलीविजन के सामने थी, लेेकिन मन अयोध्या में विचर रहा था। प्रत्येक भारतीय मन की यही स्थिति थी। वह बीती रात से ही दीपोत्सव मना रहा था। मानो उसके राम वनवास पूरा करके अयोध्या लौट रहे हों। अयोध्या भी वैसे ही सजी-धजी थी। 

निस्संदेह यदि कारोनो संक्रमण ने लोगों के पैर न थामे होते तो पाँच अगस्त को अयोध्या में पग रखने की भी जगह न होती। महाकुंभ का आयोजन होता। अभी बेशक लोग इस महत्वपूर्ण और गर्व से भरे हुए पल के साक्षी न बन पाए हैं लेकिन राम अनादि से अनन्त तक हैं और समस्त विश्व के राम भक्त राम में ही समाये हुए हैं इसलिए जो जहाँ थे वहीं से मन ही मन तो अयोध्या में उपस्थित हुए। पूर्ण विश्वास है कि तीन वर्ष बाद उन सबको सशरीर राम के प्रांगण में उपस्थित होने का ऐसा ही अवसर मिलेगा। लगभग तीन वर्ष बाद जब श्रीराम का भव्य मंदिर बनकर तैयार हो जाएगा, तब निश्चित ही उसका उद्घाटन कार्यक्रम आयोजित होगा, तब निश्चित ही भारतीय समाज अपनी इस अभिलाषा को पूर्ण कर सकेगा और भव्य मंदिर में दिव्य रामलला के दर्शन करेगा। उस क्षण की भी तो प्रतीक्षा समाज को है, जब भव्य मंदिर के ऊंचे शिखर आसमान को छू रहे होंगे। मंदिर पर लहरा रही विजय पताकाएं भारत की पहचान को प्रकट कर रही होंगी। 

पाँच अगस्त की तिथि इतिहास में दर्ज हो गई है। यह रामत्व के उद्घोष का दिन था। भारतीय स्वाभिमान के हिमालय-सा ऊंचा उठने का अवसर था। यह भी शुभ संयोग है कि राम के मंदिर के निर्माण कार्य का शुभारंभ करने का अवसर उन महानुभावों/विचार को मिला, जिसने देशवासियों के मन में रामत्व को जगाया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो व्रत लिया था कि अयोध्या में प्रभु श्रीराम के दर्शन को तभी जाएंगे जब वहाँ मंदिर निर्माण के अपने संकल्प को पूरा करेंगे। यह उनका अकेले का संकल्प नहीं था, असंख्य देशवासियों का संकल्प था, जो अब जाकर फलित हुआ है। कहते हैं कि यदि आपका संकल्प शुभ है तो उसको पूर्ण करने में प्रकृति भी भरपूर सहयोग देती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत वहाँ उन लाखों स्वयंसेवकों के प्रतिनिधि के रूप में दिखे, जिन्होंने राममंदिर आंदोलन में संघर्ष और बलिदान किया। अयोध्या में बनने जा रहा यह श्रीराम मंदिर कोई साधारण मंदिर नहीं होगा, विश्वास है कि यह भारत की पहचान बनेगा।


गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

लोकनायक श्रीराम


मर्यादापुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम भारत की आत्मा हैं। राम भारतीय संस्कृति के भव्य-दिव्य मंदिर के न केवल चमकते शिखर हैं, अपितु वे वास्तव में उसके आधार भी हैं। इसलिए राम का जीवन उनके समय से लेकर आज तक प्रासंगिक है। उनका जीवन प्रकाश स्तम्भ की तरह है, जो अंधेरे में हमारा मार्ग प्रशस्त करता है। संसार का ऐसा कोई प्रश्न नहीं है, जिसका व्यवहारिक आदर्श उत्तर राम ने अपने आचरण से नहीं दिया हो। उनके जीवन में सारा जग समाया हुआ है। बाबा तुलसीदास लिखते हैं- ‘सिय राम मय सब जग जानी, करहु प्रणाम जोरी जुग पानी।’ राष्ट्र एवं समाज जीवन की दिशा क्या होनी चाहिए, यह रामकथा में राम के जीवन से अनुभूत की जा सकती है। वह ऐसे नरश्रेष्ठ या अवतार हैं, जिन्होंने वाणी से नहीं अपितु आचरण से जीवनदर्शन को प्रस्तुत किया। इसलिए वह सीधे लोक से जुड़ते हैं। असाधारण होकर भी अपने साधारण जीवन से समूचे लोक का नेतृत्व करते हैं। राम भारतीय संस्कृति के ऐसे नायक हैं, जिन्होंने समाज के सुख-दु:ख और उसकी रचना को नजदीक से देखा-समझा। अयोध्या के राजकुमार-राजा से कहीं अधिक बड़ी भूमिका में राम हमें एक ऐसे जननायक के रूप में दिखाई पड़ते हैं, जिन्होंने उत्तर से दक्षिण तक दुष्ट राजाओं के आतंक से भयाक्रांत भारतीय समाज के साहस को जगाया और उन्हें एकजुट किया। अन्याय के विरुद्ध प्रतिकार और पराक्रम का बल दिया। राष्ट्र के सोये हुए भाग्य को जगाने का काम लोकनायक करते हैं, वहीं प्रभु राम ने किया। 
          शक्तिशाली राज्य अयोध्या के महाराज दशरथ के वीर पुत्र और भावी सम्राट होने मात्र से राम जनता के नायक नहीं हो जाते। वह अपने व्यक्तित्व को इस प्रकार गढ़ते हैं कि जनता उन्हें स्वाभाविक तौर पर अपना नायक मानती है। जनमानस में राम के प्रति कितना समर्पण था, उनके प्रति कितनी आस्था-भक्ति थी, व्यापक स्तर पर उसका पहला प्रकटीकरण तब होता है, जब राम अयोध्या का भव्य महल छोड़कर वन की ओर निकलते हैं। अयोध्या के समस्त मार्ग अवरुद्ध हो गए हैं। राम को रोकने के लिए जनसैलाब उमड़ आया है। रथ के आगे लोग लेट गए हैं। राम उनसे दूर जाएं, अयोध्या का कोई भी जन यह स्वीकार करने को तैयार नहीं। अयोध्या में आर्तनाद छा गया। यह अगाध श्रद्धा, अपनत्व, ममत्व, स्नेह और भक्ति राम ने अपने आचरण से कमाई थी। अयोध्या का हाल देखकर भरत अपने भाई को वापस लाने के लिए चित्रकूट में पहुँचते हैं। राम से लौटकर चलने के लिए मनुहार करते हैं। करबद्ध प्रार्थना करते हैं। किंतु, राम को मर्यादा की स्थापना करनी है। वह भरत को मना कर देते हैं। परंतु, अयोध्या का क्या, जो दशरथ के बाद राम की है। राम ही अयोध्या को नेतृत्व दे सकते हैं। क्योंकि, अयोध्या की जनता सिर्फ ‘रामराज्य’ चाहती है। राम के विरह की अग्नि अभी ठण्डी भी कहाँ हुई थी? ऐसे में भरत स्वप्न में भी अयोध्या के सिंहासन पर बैठने की सोच नहीं सकते। भाई राम के प्रति भी भरत के मन में जो श्रद्धा है, वह भी इसकी अनुमति नहीं देती। भले ही माता कैकयी भरत को राजा के रूप में सिंहासन पर बैठे देखना चाहती थीं। यदि किसी दबाव में भरत यह करते तो जनमानस उनके विरुद्ध हो सकता था। अयोध्या को सिर्फ राम संभाल सकते थे। इसलिए भरत ने राम की चरणपादुकाएं लीं और अयोध्या लौट गए।  
          महल छोड़कर राम जब वन पहुँचते हैं, तब उन्हें ज्ञात होता है कि समाज किन कठिनाइयों से गुजर रहा है। हालाँकि, गुरु वशिष्ठ उन्हें पहले भी समाज की समस्याओं से साक्षात्कार करा चुके थे। समाज को अत्यंत समीप से देखने के बाद राम उसे संगठित और जागृत करना चाहते थे। इसलिए भी संभव है कि राम अयोध्यावासियों और अपने प्रिय भाई भरत की प्रार्थनाओं को अस्वीकार कर देते हैं। वह साधारण जीवन जी कर समाज के सामने अनेक प्रकार के उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते हैं। वह चाहते तो वन में किसी एक जगह सुंदर और साधन-सम्पन्न कुटिया बना कर रह सकते थे। लेकिन, उन्होंने वनगमन को राष्ट्र निर्माण के एक अवसर में बदल दिया। अपना हित छोड़ा, कष्ट सहन किए। सरलता को छोड़ा, कठिनता को चुना। आराम का त्याग किया, परिश्रम को चुना। वनवास के दौरान राम ने व्यापक जनसंपर्क किया। वनवासियों को अपने साथ जोड़ा। उन्हें अपना बनाया। सामान्य व्यक्ति जिस संघर्ष भरे जीवन को जी रहा था, उसी को राम ने भी अपनाया। इसलिए वन-ग्राम में रहने वाले सब लोगों के साथ उनका आत्मीय और विश्वास का संबंध जुड़ता। 
          वनवास खत्म होने में केवल छह-सात माह ही बचते हैं, तब माता जानकी का अपहरण रावण ने कर लिया। राम ने ऐसे कठिन समय में भी अयोध्या, मिथिला या फिर अन्य किसी मित्र राज्य से सहायता नहीं ली। वह समाज को संदेश देना चाहते थे कि समाज की एकजुटता से बिना साधन के भी रावण जैसे अत्यधिक शक्तिशाली आताताई को भी परास्त किया जा सकता है। संगठन में ही वास्तविक शक्ति है। अत्याचारी और अन्यायी ताकतों का सामना करने के लिए राज्य की सशस्त्र सेना ही आवश्यक नहीं है। हम अपनी शक्ति को एकत्र कर भी दुष्टों को धूल चटा सकते हैं। चूँकि वह मानते थे- ‘यथा हि कुरुते राजा प्रजा तमनुवर्तते’ (उत्तरकाण्ड, सर्ग ४३, श्लोक १९)। अर्थात् प्रजा अपने राजा का अनुसरण करती है। यदि राम ने सेना बुला कर रावण का अंत किया होता, तब जनमानस में ‘संगठन में शक्ति है’ का भाव कभी नहीं आ पाता, तब शायद समाज में पराक्रम का भाव नहीं जाग पाता, तब शायद सामान्य समाज अपने साहस और कौशल को हथियार नहीं बना पाता, अन्याय के सामने सिर उठाने का साहस नहीं कर पाता। वह बाहुबलियों द्वारा पददलित होना, अपना भाग्य समझ लेता। राम ने लोगों का संगठन कर उसे शक्तिशाली सेना का स्वरूप देकर समाज का भाग्य बदल दिया। उन्होंने समाज में संघर्ष और आत्मविश्वास का बीज बो दिया। राम ने आने वाले भविष्य के लिए उदाहरण प्रस्तुत कर दिया कि कितना भी बलशाली दुष्ट शासन हो, संगठित समाजशक्ति द्वारा उसका प्रतिकार किया जा सकता है। अन्यायपूर्ण शासन को जनशक्ति उखाड़ कर फेंक देती है। संगठित जनसमूह के सामने साधन-सम्पन्न दुष्ट ताकत कमजोर पड़ जाती है। अंत में विजय समाज के हिस्से आती है। 
          प्रभु राम की ईश्वरीय अवधारणा से इतर, रामकथा ऐसे जननायक की कहानी है, जिसने संपूर्ण भारत को एकसूत्र में पिरोया, समाज के विभेद को समाप्त किया, समाज में मूल्य एवं आदर्श स्थापित किए। आज भी भारत राम के नाम पर एक है। राम ऐसे लोकनायक हैं, जो सिर्फ भक्त शिरोमणि वीर हनुमान के सीने में ही नहीं बसते, वरन भारत के बच्चे-बच्चे में राम की छवि दिखती है। राम ऐसे जननायक हैं, जो आज भी प्रत्येक संकट में हमें सहारा देते हैं। उनका जीवन हमें कठिन से कठिन संकटों का सामना करने की प्रेरणा देता है। लोकनायक होने के लिए किस तरह का संकल्प चाहिए, यह राम के संपूर्ण जीवन से स्पष्ट हो जाना चाहिए। यद्धपि महाकवि भवभूति ने अपने नाटक ‘उत्तररामचरित’ में स्वयं प्रभु राम से वक्तव्य दिलाया है- “स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि, आराधनाय लोकस्य मुंचतो नास्ति मे व्यथा।” अर्थात् राम कहते हैं कि लोक की आराधना के लिए मुझे अपने स्नेह, दया, सौख्य और यहाँ तक कि जानकी का भी परित्याग करने में भी कोई व्यथा नहीं होगी। हमको ज्ञात है कि राम ने लोक की सेवा के लिए फूलों की सेज छोड़ कर कंटकाकीर्ण मार्ग चुना। अपना सर्वस्व त्यागा। राम सुखपूर्वक अपना जीवन बिता सकते थे लेकिन उन्होंने कठिन और कष्टप्रद जीवन को चुना।
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मेरा भारत साक्षात् राजा राम स्वरुप है 



सोमवार, 2 सितंबर 2019

अमरकंटक के अरण्य में विशाल शिला पर मिलेंगे ‘फरस विनायक’



पृथ्वी पर भगवान शिव का धाम (निवास) कहाँ है? यदि यह प्रश्न आपके सामने आएगा तो अधिक संभावना है कि आप क्षणभर गंवाए बिना उत्तर देंगे- और कहाँ, कैलाश।अपने उत्तर में दूसरा स्थान आप काशीभी जोड़ सकते हैं। किंतु, ‘अमरकंटकशायद ही आपके ध्यान में आए। जी हाँ, समुद्र तल से लगभग 3500 फीट की ऊंचाई पर स्थित अमरकंटक वह तीसरा स्थान है, जिसे भगवान शिव ने परिवार सहित रहने के लिए चुना है। यह उनकी पुत्री नर्मदा का उद्गम स्थल भी है। यह भूमिका इसलिए बांधी जा रही है, ताकि आपको एक महत्वपूर्ण देवस्थल फरस विनायकसे जोड़ सकूं। 
          दरअसल, अमरकंटक में भ्रमण करते हुए हमें एक दिन महादेव के पुत्र श्रीगणेश के दर्शन हो गए। तब उपरोक्त धार्मिक आख्यान ध्यान आया कि शिव ने अमरकंटक को परिवार सहित रहने के लिए चुना है। माँ नर्मदा मंदिर से दक्षिण दिशा में ऊंचे पहाड़ और घने जंगल में विशाल चट्टान पर श्री गणेश की आकृति है। सुरम्य अरण्य में ऋद्धि-सिद्धि के दाता की यह प्रतिमा प्राकृतिक रूप से निर्मित चट्टान पर किसने और कब उकेरी होगी, कहा नहीं जा सकता। निश्चित रूप से बप्पा का कोई भक्त रहा होगा, जो या तो योजनापूर्वक यहाँ आया होगा और अपने आराध्य की प्रतिमा तराशी होगी, या फिर एकांत में बैठ कर गणपति महाराज का ध्यान कर रहा होगा और अपनी मूर्ति कला के कौशल से विशाल शिला पर उन्हें प्रकट किया होगा। मूर्तिकार आनंद के भाव में रहा होगा, इसलिए प्रतिमा नृत्यमुद्रा में है। श्रीगणेश प्रतिमा के एक हाथ में फरसा है, इसलिए कहा गया- फरस विनायक। वैसे तो भगवान श्रीगणेश के प्रमुख अस्त्र अंकुश और पाश हैं। किंतु, अनेक गणेश मूर्तियों में हम उनके हाथ में फरसा भी देखते हैं।


           फरसे से श्रीगणेश का एक और प्रसंग भी जुड़ा है, उसका उल्लेख भी यहाँ कर ही देना चाहिए। एक कथा के अनुसार परशुरामजी कैलाश पधारे और उस समय भगवान शिव ध्यान में थे। ध्यान में कोई विघ्न न डाले इसकी जिम्मेदारी विघ्नहर्ता गणेश को दी गई। इसलिए श्रीगणेश ने परशुरामजी को शिवजी से मिलने से रोक दिया। फिर क्या था, परशुरामजी को क्रोध आ गया और दोनों के बीच युद्ध प्रारंभ हो गया। युद्ध के दौरान परशुरामजी के फरसे से श्रीगणेश का एक दांत टूट गया और वे एकदंत हो गए। गणेश प्रतिमा पर ध्यान दें, तो आप पाएंगे कि गणेशजी के एक हाथ में उनका टूटा हुआ दाँत भी रहता है। हालाँकि उनका दाँत कैसे टूटा, इस संदर्भ में और भी अन्य कथाएं प्रचलित हैं, जैसे अद्वितीय महाकाव्य महाभारत लिखने के लिए उन्होंने अपना दाँत तोड़ कर उसको कलम के रूप में उपयोग किया। कलम से जुड़ी हुई बात है इसलिए उल्लेख उचित होगा कि लेखन कार्य में भगवान श्रीगणेश की अत्यधिक रुचि रहती है। लिखने के लिए कलम नहीं मिलने पर अपने दाँत को तोड़ कर कलम बनाने के प्रसंग से लेखन के प्रति उनका समर्पण और लगाव स्वत: ही प्रकट होता है।
          ‘फरस विनायककी प्रतिमा इतनी मोहक है कि उसे बस निहारते रहो। चिडिय़ों का कलरव और साल के पत्तों की सरसराहट से एक मधुर संगीत उत्पन्न होता है। आनंद उत्पन्न करने वाले इस वातावरण में गणपति के ध्यान में डूबने से अच्छा और क्या हो सकता है? किसी भले मानुष ने विनायकजी को प्रसन्न करने की इच्छा से इस प्रतिमा पर सिंदूर चढ़ा दिया है। श्रद्धा से हट कर देखा जाए तो उसने एक प्रतिमा के नैसर्गिक सौंदर्य को नष्ट किया, किंतु जिसने भी यह किया वह भावनाओं में रहा होगा। उसका सौंदर्यबोध भी श्रीगणेश को सिंदूर में रंगा देखने का रहा होगा, क्योंकि प्रथमपूज्य श्रीगणेश को लाल एवं सिंदूरी रंग अत्यंत प्रिय हैं। उनकी अनेक प्रसिद्ध प्रतिमाएं सिंदूरी हैं। सिंदूर और शुद्ध घी की मालिश से भगवन शीघ्रता से प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए भक्त ने फरस विनायक को प्रसन्न करने की इच्छा से ही सिंदूर चढ़ाया होगा। चट्टान पर सिंदूर से बनाया गया स्वास्तिक भी इसका साक्षी प्रतीत होता है। शुभ का प्रतीक स्वास्तिक भी श्रीगणेश को अत्यंत प्रिय है।
          ‘फरस विनायकवाममुखी गणपति हैं। प्रतिमा में उनकी सूंड के अग्रभाग का मोड बाईं ओर है। जिस मूर्ति/चित्र में भगवान श्रीगणेश की सूंड बाईं ओर मुडी होती है, उसे वाममुखी गणेश कहते हैं। वाम से अभिप्राय उत्तर भाग भी है। मान्यता है कि उत्तर दिशा अध्यात्म के लिए पूरक और आनंददायक है। इसलिए बप्पा के अधिकतर भक्त अपने पूजाघर में वाममुखी गणपति की मूर्ति रखते हैं। इस लेख में ऊपर भी संभावना व्यक्त की गई है कि फरस विनायक की प्रतिमा को उकेरने वाला भक्त/कलाकार आनंद के भाव में रहा होगा। उसका दूसरा प्रमाण वाममुखी गणपति की प्रतिमाहै। वाममुखी गणपति की पूजा भी सामान्य नित्य की पद्धति से की जाती है। जबकि दक्षिणाभिमुखी या अन्य प्रकार की गणपति की मूर्ति की पूजा कर्मकांडी ढंग और नियम-पद्धति से की जाती है। जो आनंद के भाव में होता है, अपने ईश की अर्चना के लिए वह सहज मार्ग को ही चुनता है।
           अमरकंटक में फरस विनायकके दर्शन के लिए घने जंगल में पहाड़ चढऩे-उतरने होंगे। साधन-वाहन छोड़ कर पगडंडियों पर पैदल चलना होगा। स्थानीय निवासी का सहयोग लेकर आप आसानी से महादेव के पुत्र श्रीगणेश के दर्शन कर पाएंगे। स्थानीय नागरिक को साथ लिए बिना फरस विनायकको खोजना ठीक उसी प्रकार कठिन है, जिस प्रकार बिना गुरु के ज्ञान प्राप्ति का प्रयास किया जाता है।

रविवार, 4 अगस्त 2019

नैसर्गिक सौंदर्य के मध्य स्थित तप-स्थली ‘धूनी-पानी’




किसी भी स्थान के नामकरण के पीछे कोई न कोई कहानी होती है। धार्मिक पर्यटन स्थल पर यह नियम विशेष रूप से लागू होता है। अमरकंटक के धूनी-पानीकी कहानी भी बड़ी रोचक है। स्वाभाविक ही किसी स्थान के नाम में धूनीसे आभास होता है कि यह कोई ऐसा स्थल है जहाँ साधु-संन्यासी धूनी रमाते होंगे। पानीबताता है कि वहाँ जल का विशेष स्रोत होगा। धूनी और पानी दोनों से मिलकर ही धूनी-पानीनामकरण हुआ होगा। श्री नर्मदा मंदिर से श्री नर्मदा मंदिर से दक्षिण दिशा की ओर लगभग 5 किमी की दूरी तय करने पर हम इस स्थान पर पहुँच चुके हैं। यह स्थान चारों ओर से ऊंचे सरई, आम, जामुन और कटहल के पेड़ों से घिरा हुआ है। यहाँ नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य पूर्णता के साथ उपस्थित है। शांत-सुरम्य वन के बीच में हमें एक छोटा-सा दोमंजिला मंदिरनुमा भवन दिखाई दिया। आज इसी भवन में धूनीरमा कर साधु बैठते हैं। पूर्व में कभी आसमान के नीचे साधु खुले में धूनी रमाते रहे होंगे, बाद में बारिश से बचने के लिए भवन बना लिया। पास में ही यहाँ जलकुण्ड दिखाई देते हैं, जो यहाँ के साधुओं के लिए पानीके स्रोत हैं। नर्मदा परिक्रमावासियों के लिए भी यहाँ स्थान बना हुआ है। जहाँ वे ठहर सकते हैं और भोजन इत्यादि बना-खा सकते हैं। माँ नर्मदा की परिक्रमा के दौरान परिक्रमावासी यहाँ आते ही हैं। उन दिनों इस स्थान पर विशेष चहल-पहल रहती है। सामान्य दिनों में भी यहाँ बैठ कर प्रकृति के सान्निध्य और उसके ममत्व से उत्पन्न आनंद की सहज अनुभूति की जा सकती है।


          जून का एक दिन था, जब हम धूनी-पानीपहुँचे थे, तब एक संत यहाँ धूनी रमा कर बैठे थे। वैसे तो अमरकंटक वनप्रदेश होने के कारण अपेक्षाकृत ठंडा रहता है, फिर भी मई-जून की गर्मी के भी अपने तेवर हैं। धूनी के पास संत रामदासजी महाराज अन्य साधुओं से थोड़ा अलग ही दिखाई दे रहे थे। उनके समीप कुछ पुस्तकें रखी थीं। यहाँ बैठकर वह माँ नर्मदा की स्तुति में गीत और कविताएं रच रहे हैं। मंदिर के भीतर मन को प्रसन्न करने वाली माँ नर्मदा की मोहक प्रतिमा तो थी ही, पूजा के आले में युवा नायक स्वामी विवेकानंद का चित्र भी रखा था। उनके गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस और माँ शारदा का चित्र भी सुशोभित हो रहा था। स्वामी विवेकानंद ऐसे संन्यासी रहे, जिन्होंने सोये हुए राष्ट्र का गौरव जगाया, जिन्होंने भारतीय संस्कृति की ध्वजा विश्व पटल पर फहराई। निश्चित ही हमारे संन्यासियों को स्वामी विवेकानंद के संन्यास जीवन को अपना आदर्श बनाना चाहिए।


          अपन राम ने धूनी के पास बैठकर काफी देर तक उदासीन संत रामदासजी महाराज के साथ लंबा सत्संग किया। बहुत आनंद आया। उन्होंने यह भी बताया कि अपनी युवावस्था में वह घोर कम्युनिस्ट हुआ करते थे, एकदम नास्तिक, धर्म को अफीम मानने वाले, किंतु आज वह आध्यात्मिक जीवन जी रहे हैं।  उन्होंने ही बताया कि किसी समय में भृगु ऋषि ने यहाँ धूनी रमा कर तपस्या की थी। यहाँ पानी का स्रोत नहीं था। उन्हें पानी लेने के लिए थोड़ी ही दूर स्थित चिलम पानीजाना पड़ता था। पानी लेने जाने में संभवत: उन्हें कष्ट नहीं भी होता होगा किंतु जंगल के जीव-जन्तु जो भृगु ऋषि के साथी भी थे, उन्हें भी पानी के लिए भटकना पड़ता था। अपने साथियों की सुविधा के लिए उन्होंने जल स्रोत के लिए माँ नर्मदा से प्रार्थना की, तब धूनीके समीप ही पाँच जल स्रोत फूट पड़े। यह भारतीय संस्कृति का आधार है कि यहाँ सिर्फ अपने बारे में विचार नहीं किया जाता, बल्कि प्राणी मात्र की चिंता रहती है। आज भी यहाँ पानी के वे कुण्ड हैं। भवन के दाहिनी ओर अमृत कुण्ड और बांई ओर सरस्वती कुण्ड है। इन दोनों कुण्डों के अलावा तीन छोटे कुण्ड भी हैं- भृगु कुण्ड, नारद कुण्ड और मोहान कुण्ड। माँ नर्मदा की कृपा से धूनी के समीप पाँच जलस्रोत के प्रकट होने के कारण ही इस स्थान का नाम धूनी-पानी पड़ गया। यहाँ फलों-फूल के पेड़ों से समृद्ध बगीचा भी है। संत रामदासजी महाराज ने उस दिन हमें खूब सारे मीठे आम दिए, जो यहीं के पेड़ो से टपके थे। धूनी-पानी के संबंध में एक और महत्व की बात है। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ अनेक ऋषि-मुनियों ने यज्ञ किये थे, इसलिए आज भी यहाँ जमीन की खुदाई करने पर राख जैसी मिट्टी निकलने लगती है।
          धूनी-पानी धार्मिक तपस्थली ही नहीं, अपितु प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण स्थान भी है। निश्चित ही प्रकृति प्रेमियों को यहाँ आना सुख देगा। उनके लिए यह स्थान अत्यधिक आनंददायक है। शांत चित्त से यहाँ बैठकर अच्छा समय बिताया जा सकता है। मैं जब यहाँ से लौट रहा था, तो आँखों में माँ नर्मदा की मोहक छवि थी, ध्यान में स्वामी विवेकानंद का जीवन था और कुछ किस्से थे जो उदासीन संत रामदासजी महाराज ने सुनाए थे। थैले में मीठे आम भी थे। प्रकृति का स्नेह भी थोड़ा समेट लिया था। अंतर्मन की वह गूँज भी साफ सुनाई दे रही थी कि भविष्य में जब भी अमरकंटक प्रवास होगा, धूनी-पानी अवश्य आऊंगा।




रविवार, 21 जुलाई 2019

भृगु कमण्डल : आश्चर्यजनक! 12 माह चट्टान में रहता है पानी


अमरकंटक के जंगल में, ऊंचे पहाड़ पर एक चट्टान ऐसी है, जिसमें 12 महीने पानी रहता है। चट्टान में एक छेद है, उसमें हाथ डाल कर अंजुली भर जल निकाल सकते हैं। इस आश्चर्यजनक चट्टान को भृगु का कमंडल कहा जाता है। मेरे मित्र अशोक मरावी और मुकेश ने जब मुझे यह बताया गया, तो उस चट्टान को देखने की तीव्र जिज्ञासा मन में जागी। अगली सुबह इस अनोखी चट्टान को देखने जाने का तय किया। माँ नर्मदा मंदिर से लगभग 4 किमी दूर घने जंगल और ऊंचे पहाड़ पर भृगु कमंडल स्थित है।


          भृगु कमंडल तक पहुँचना कठिन तो नहीं है, लेकिन बाकी स्थानों की अपेक्षा यहाँ पहुँचने में थोड़ा अधिक समय और श्रम तो लगता ही है। कुछ दूरी तक आप मोटरसाइकिल या चारपहिया वाहन से जा सकते हैं, परंतु आगे का रास्ता पैदल ही तय करना होता है। भृगु कमंडल के लिए जाते समय आप एक और नैसर्गिक पर्यटन स्थल धूनी-पानी पर प्रकृति का स्नेह प्राप्त कर सकते हैं। यह स्थान रास्ते में ही पड़ता है। बहरहाल, हम मोटरसाइकिल से भृगु ऋषि की तपस्थली के लिए निकले। रास्ता कच्चा और ऊबड़-खाबड़ था। मोटरसाइकिल पर धचके खाते हुए हम उस स्थान पर पहुँच गए, जहाँ से पैदल आगे जाना था। घने जंगल के बीच स्थित भृगु कमंडल तक पहुँचने के लिए पहले पहाड़ उतरकर धूनी-पानी पहुँचे और फिर वहाँ से आगे जंगल में कीटों और पक्षियों का संगीत सुनते हुए पहाड़ चढ़ते गए। अमरकंटक के जंगलों में पेड़ों पर एक कीट सिकोड़ा पाया जाता है, जो एक विशेष प्रकार से टी-टी जैसी ध्वनि निकालता रहता है। शांत वन में पेड़ों पर झुंड में रहने वाले सिकोड़ा कीट जब टी-टी का सामुहिक उच्चार करते हैं तब विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती है। इस वर्ष जब भोपाल में भी यह ध्वनि सुनाई दी, तब मेरे मित्र हरेकृष्ण दुबोलिया ने उस पर समाचार बनाया था। उसके अनुसार यह कीड़ा हेमिपटेरा प्रजाति का है, जो पेड़ो पर रहकर उसकी छाल से पानी अवशोषित करता है और सूखी पत्तियों को अपना भोजन बनाता है। सिकोड़ा कीट उष्ण कटिबंधीय (गर्म) क्षेत्रों में पाया जाता है। इनके लिए अनुकूल तापमान 40 से 50 डिग्री सेल्सियस के बीच है। तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार जाता है, तो इनकी संख्या तेजी से बढ़ती है, किंतु तापमान जैसे ही 50 डिग्री सेल्सियस के पार जाता है, यह मरने लगते हैं।


          बहरहाल, घने जंगल और पहाड़ों से होकर हम भृगु कमण्डल तक पहुँच गए। ऊंचे पहाड़ पर यह एक निर्जन स्थान है। यहाँ कम ही लोग आते हैं। ध्यान-साधना करने वाले साधुओं का यह प्रिय स्थान है। यहाँ एक बड़ी चट्टान है, जिसे भृगु ऋषि का कमण्डल कहा जाता है। कमण्डल की आकृति की इस चट्टान में एक छेद है, जिसमें हाथ डाल श्रद्धालु पानी निकालते हैं और पास ही प्रतिष्ठित शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस स्थान पर भृगु ऋषि ने कठोर तप किया था, जिसके कारण उनके कमण्डल से एक नदी निकली, जिसे करा कमण्डल भी कहा जाता है। कहते यह भी भृगु ऋषि धूनी-पानी स्थान पर तप करते थे। बारिश के दिनों में वहाँ धूनी जलाना मुश्किल हो जाता था, तब भृगु ऋषि उस स्थान पर आए जिसे आज भृगु कमण्डल कहते हैं। जब ऋषि भृगु यहाँ आए तब उनके सामने जल का संकट खड़ा हो गया। उनकी प्रार्थना पर ही माँ नर्मदा उनके कमंडल में प्रकट हुईं। यहाँ एक सुरंग है, जिसे भृगु गुफा कहा गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि बड़ी-बड़ी चट्टानों के मेल से यह गुफा बनी है। आज भी धार्मिक पर्यटक और श्रद्धालु गुफा में एक ओर से प्रवेश करते हैं और दूसरी ओर से निकलते हैं। बारिश के मौसम में इसी गुफा में ऋषि भृगु धूनी रमा कर तप करते थे।  हमें यहाँ एक बाबा मिला, जिसने यहीं झोंपड़ी बना रखी थी। वह यहीं रहकर पूजा-पाठ करते हैं। बाबा के निर्देश पर उनके एक चेले ने हम सबके लिए चाय बनाई। चाय वाकई शानदार बनी थी। हमने बाबा और उनके चेले को धन्यवाद दिया और वहाँ से लौट पड़े।
भृगु कमंडल (चट्टान) में हाथ डालकर जल निकलता श्रद्धालु
          आश्चर्य का विषय यह है कि मई-जून की गर्मी में भी कमण्डल रूपी इस चट्टान में पानी कहाँ से आता है? ऐसे में धार्मिक मान्यता पर विश्वास करने के अलावा कोई और विकल्प रहता नहीं है। निश्चित ही यह प्रकृति का चमत्कार है। बहरहाल, चमत्कार में भरोसा और रुचि नहीं रखने वालों के लिए भी यह स्थान सुखदायक है। प्रकृति प्रेमियों को ऊंचे पहाड़ पर पेड़ों की छांव में बैठना रुचिकर लगेगा ही, साल के ऊंचे वृक्षों की बीच से होकर यहाँ तक की यात्रा भी आनंददायक है।


सोमवार, 17 जून 2019

संत कबीर साहेब की तपस्थली 'कबीर चबूतरा'

अमरकंटक की पहली पहचान माँ नर्मदा नदी के उद्गम और वन्यप्रदेश के रूप में है। लेकिन, यह सामाजिक आंदोलन के प्रख्यात संत कबीर साहेब की तपस्थली भी है। अमरकंटक में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा पर स्थित कबीर चबूतरा वह स्थान है, जहाँ कबीर की उपस्थिति को आज भी अनुभव किया जा सकता है। कबीर साहेब ऐसे संत हैं जिन्होंने सामाजिक कुरीतियों पर बिना किसी भेदभाव के चोट कर समाज को बेहतर बनाने का प्रयास किया। कबीर साहेब आज के विद्वानों की तरह संप्रदाय और जाति के आधार पर घटनाओं/परंपराओं/समस्याओं को चीन्ह-चीन्ह कर आलोचना नहीं करते थे। जब वह मूर्तिपूजक हिंदुओं की आलोचना में कहते हैं कि 'पाथर पूजे हरि मिलें तो मैं पूजू पहाड़, याते चाकी भली पीस खाये संसार' तब वह निराकार को पूजने वाले मुस्लिम समाज को भी आड़े हाथ लेते हुए कहने से चूकते नहीं हैं- 'कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई बनाय, ता चढि़ मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय।' सबको समान दृष्टि से देखने वाले ऐसे संत कबीर की तपस्थली होने के कारण कबीर चबूतरा का अपना महत्त्व है। यह केवल धार्मिक पर्यटन का प्रमुख स्थल मात्र नहीं है, बल्कि कबीर साहेब के नजदीक जाने की भी जगह है। यहाँ प्रकृति भी हमें कबीर साहेब के अहसास से मिलाने में भरपूर सहयोग करती है। कबीर चबूचरे पर आच्छादित घने साल के वृक्षों की सरसराहट, पक्षियों की आवाजें और कबीर कुण्ड से प्रवाहित जल धार, मानो सब के सब सुबह-सबरे संत कबीर के दोहे गुनगुनाते हैं। इसलिए यहाँ आने पर हमें कबीरत्व को आत्मसात करने का प्रयास अवश्य करना चाहिए। अगर हम सफल हो गए तो निश्चय जानिए कि हमारे जीवन को एक नई दिशा मिलेगी- समाज जीवन की दिशा। आप सुंदर समाज बनाने की प्रक्रिया का उपकरण बनने के लिए लालायित हो उठेंगे।
           प्राकृतिक सौंदर्य से समृद्ध इस स्थान पर महान गुरुओं की वाणी की सुवास भी हम महसूस कर सकते हैं। यह मिलन का अद्भुत स्थान है। यहाँ दो प्रदेशों का मिलन होता है। प्रकृति और दर्शन भी यहाँ एकसाथ उपस्थित होते हैं। लौकिक और अलौकिक विमर्श का स्थान भी यही है। सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण दो पंथों (कबीरपंथ और सिख पंथ) के प्रणेताओं संत कबीर साहेब और गुरु नानकदेव महाराज का मिलन भी सात्विक ऊर्जा से सम्पन्न इसी स्थान पर हुआ। लगभग 500 वर्ष पूर्व न केवल दो दिव्य आत्माओं का मिलन हुआ, बल्कि उन्होंने समाज की उन्नति के लिए यहाँ एक वटवृक्ष के नीचे बैठकर विमर्श भी किया। निश्चित ही दोनों भविष्यदृष्टाओं ने समानतामूलक समाज के निर्माण पर विमर्श किया होगा। चूँकि दोनों ही गुरु ऐसे समाज का सपना लेकर आजीवन चले, जिसमें धार्मिक असहिष्णुता, कट्टरता, कटुता, वैमनस्य, जात-पांत का भेद, ऊंच-नीच, असमानता के लिए कोई स्थान नहीं है। दोनों महापुरुषों की चिंतन के साक्षी के तौर पर वह वटवृक्ष अब भी यहाँ उपस्थित है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह बूढ़ा वटवृक्ष दोनों महान संतों का संदेश सुनाने के लिए अब तक यहाँ खड़ा है।  
कबीर वटवृक्ष : कबीर साहेब और गुरु नानकदेव के मिलन एवं सत्संग का स्थल
          वर्ष 1569 में जब सदगुरु कबीर साहेब जगन्ननाथ पुरी के लिए जा रहे थे, तब वह अमरकंटक में इस स्थान पर रुके। परंतु, उन्हें यह स्थान इतना अधिक अच्छा लगा कि कुछ समय के लिए यहीं ठहर गए। यहाँ ध्यान-साधना की और अपने शिष्यों को उपदेश दिया था। कबीर साहेब के मुख्य शिष्य धर्मदास महाराज नित्य यहीं अपने सद्गुरु के सम्मुख बैठकर उनसे पाथेय प्राप्त करते थे। सद्गुरु कबीर महाराज के सत्यलोक गमन के बाद कबीरपंथ के प्रचार की जिम्मेदारी धर्मदास महाराज ने ही संभाली थी। धर्मदास जी मध्यप्रदेश के ही बांधवगढ़ के निवासी थे। प्रारंभ से ही संत-संगति में उनका मन लगता था। सद्गुरु कबीर साहेब से उनकी पहली भेंट मथुरा में हुई थी। उसके बाद संत कबीर साहेब जी से दूसरा साक्षात्कार मोक्ष की नगरी काशी में हुआ। धर्मदास जी शुरुआत में कट्टर मूर्तिपूजक थे, लेकिन सद्गुरु कबीर साहेब जी के प्रवचन सुनकर उन्होंने निर्गुण भक्ति को अपना लिया। बहरहाल, कबीर चबूतरा में स्थित कबीर कुटी सद्गुरु कबीर धरमदास साहब वंशावली प्रतिनिधि सभा दामाखेड़ा जिला बलौदा बाजार के अधीनस्थ लगभग 500 साल पुराना आश्रम है। यहां की व्यवस्था कबीर के वंशज और गद्दी दामाखेड़ा के आचार्य द्वारा नियुक्त महंत ही करते हैं। कबीरपंथियों के लिए इस स्थान का विशेष महत्त्व है।
          नर्मदा उद्गम स्थल से कबीर चबूतरा की दूरी तकरीबन पाँच किलोमीटर है। अमरकंटक आने वाले ज्यादातर श्रद्धालु और पर्यटक कबीर चबूतरा जरूर आते हैं। यहाँ प्रमुख स्थल हैं- कबीर कुटी, कबीर कुण्ड, कबीर चबूतरा और कबीर वटवृक्ष। कबीर कुटी अब एक तरह से कबीर मंदिर है। कबीर चबूतरा वही स्थान है, जहाँ सद्गुरु अपने शिष्यों को उपदेश देते थे। कबीर चबूतरा के पास ही कबीर वटवृक्ष है, जहाँ संत कबीर साहेब और गुरु नानकदेव महाराज के बीच अध्यात्म पर चर्चा हुई। यहाँ एक कुण्ड भी है। इस कबीर कुण्ड की विशेषता यह है कि प्रात:काल इसका पानी दूधिया हो जाता है। कुण्ड में दूधिया पानी की महीन धाराएं निकलती हैं, जिसके कारण कुण्ड का पूरा जल दूधिया हो जाता है। इन धाराओं को देखने के लिए सुबह छह बजे के आसपास हमें यहाँ पहुँचना होता है। आश्रम में रहने वालों के लिए यह कुण्ड ही मुख्य जलस्रोत है।
          अपने अमरकंटक प्रवास के दौरान 1 जून 2017 को पहली बार मैं यहाँ पहुँचा। पहले ही अनुभव में प्राकृतिक-नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर इस स्थान ने अमिट छाप मन पर छोड़ दी। अच्छी बात यह है कि यहाँ अभी तक बाजार की पहुँच नहीं हुई है। इसलिए यह तीर्थ-स्थल अपने मूल को बचाए हुए है। यहाँ के वातावरण में अब तक गूँज रहे कबीर के संदेश को अनुभूत करने के लिए लगभग तीन-चार घंटे तक यहाँ रहा। यकीन मानिये, माँ नर्मदा के तट पर बैठना और यहाँ कबीरीय वातावरण में बैठना, अमरकंटक प्रवास के सबसे सुखकर अनुभव रहे। उस समय आश्रम में रह रहे कंबीरपंथी संन्यासी रुद्रदास के पास बैठकर कबीर वाणी सुनी-
कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई।
अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई ॥
अर्थात् संत कबीर कहते हैं- 'प्रेम का बादल मेरे ऊपर आकर बरस पड़ा, जिससे अंतरात्मा तक भीग गई, आस-पास पूरा परिवेश हरा-भरा हो गया, खुश हाल हो गया, यह प्रेम का अपूर्व प्रभाव है। हम इसी प्रेम में क्यों नहीं जीते।' यकीनन, कबीर की वाणी हमारी अंतरात्मा को भिगो देती है। कबीर चबूतरा से जब लौटे तो लगा कि कबीर प्रेम गहरे पैठ गया है। अंतर्मन एक अल्हदा अहसास में डूबा हुआ है।
कबीर चबूतरा : संत कबीर साहेब की तपस्थली, इसी स्थान पर उन्होंने धर्मदास महाराज को उपदेश दिए थे

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

माई की बगिया : जहाँ छुटपन में खेला करती माँ नर्मदा

- लोकेन्द्र सिंह -
नर्मदाकुंड से पूर्व दिशा की ओर लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर माई की बगिया स्थित है। यह बगिया माँ नर्मदा को समर्पित है। यह स्थान हरे-भरे बाग की तरह है। एक छोटा-सा मंदिर है। यहाँ एक कुण्ड भी है, जिसे चरणोदक कुण्ड के नाम से जाना जाता है। एक मान्यता है कि नर्मदा का वास्तविक उद्गम स्थल यही स्थान है। माई की बगिया में निकली जलधारा ही आगे जाकर वर्तमान नर्मदा उद्गम मंदिर में निकली है।
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          एक दूसरी मान्यता यह है कि इस बाग को नर्मदा मैया के खेलने-कूदने के लिए बनाया गया था। छुटपन में नर्मदा अपनी सखी जोहिला सहित अन्य के साथ यहाँ खेला करती थीं। पूजा-अर्चना के लिए भी इसी स्थान से माँ नर्मदा पुष्प चुना करती थी। दूसरी मान्यता कहीं न कहीं पहली मान्यता को स्थापित करती प्रतीत होती है। माई की बगिया परिक्रमावासियों का एक पड़ाव भी है। माँ नर्मदा की परिक्रमा के लिए निकले श्रद्धालुओं को यहाँ देखा जा सकता है। वे सब आनंद से यहाँ ठहरते हैं। थोड़ा विश्राम करते हैं। माई के भजन करते हुए भोजन प्रसादी तैयार कर उसे प्राप्त करते हैं।
          माई की बगिया का और भी महत्त्व है। नेत्र औषधि के दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण पौधे गुलबकावली की जन्म स्थली भी माई की बगिया है। गुलबकावली पुष्प के अर्क से आयुर्वेदिक 'आईड्राप' तैयार किया जाता है। अमरकंटक के वैद्य ही नहीं, अपितु सामान्य नागरिक भी बहुत सरल विधि से गुलबकावली के फूल से नेत्र औषधि तैयार कर लेते हैं। अमरकंटक इस बात के लिए भी प्रसिद्ध है कि यहाँ के जंगलों में प्रचूर मात्रा में जड़ी-बूटी पाई जाती हैं।



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मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

माँ नर्मदा मंदिर, उद्गम स्थल


- लोकेन्द्र सिंह - 
अमरकंटक में जब हम नर्मदा उद्गम स्थल के समीप पहुँचते हैं, तब धवल रंग के मंदिरों का समूह बरबस ही हमें आकर्षित करता है। 24 मंदिरों वाले इसी परिसर में स्थित है नर्मदा कुण्ड, जहाँ से सदानीरा माँ नर्मदा का उद्गम हुआ है। श्री नर्मदा मंदिर के निर्माण के संबंध में कोई प्रमाण उपलब्ध नही हैं। यह मंदिर बहुत प्राचीन हैं। मंदिरों का निर्माण किसने कराया, यह भी कहा नहीं जा सकता। चूँकि माँ नर्मदा के उद्गम कुण्ड में रेवा नायक की प्रतिमा स्थित है। इसलिए यह माना जा सकता है कि प्रारंभिक तौर पर माँ नर्मदा मंदिर का निर्माण रेवा नायक नाम के व्यक्ति ने कराया होगा। रेवा नायक के नाम पर ही माँ नर्मदा का एक नाम रेवा है। आठवीं शताब्दी में आदि गुरु शंकराचार्य ने यहाँ बंसेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना की और नर्मदा कुण्ड बनवाया। उस समय यहाँ बांस के बहुत पेड़ थे, इसलिए आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित महादेव को बंसेश्वर महादेव कहा गया। बाद में, अन्य राजाओं-महाराजाओं ने मंदिर परिसर के निर्माण में अपना योगदान दिया है। 
माँ नर्मदा मंदिर और उद्गम स्थल वीडियो में देखें - 

         

रविवार, 16 जुलाई 2017

कम्युनिज्म से अध्यात्म की यात्रा-2

तुष्टीकरण की आग में जल रहे हैं पश्चिम बंगाल के हिंदू

कबीर चबूतरा में लेखक लोकेन्द्र सिंह
 रामकृष्ण  परमहंस, स्वामी विवेकानंद, सुभाषचंद्र बोस और रविन्द्र नाथ ठाकुर की जन्मभूमि पश्चिम बंगाल आज सांप्रदायिकता की आग में जल रही है। वहाँ हिंदू समुदाय का जीना मुहाल हो गया है। यह स्थितियाँ अचानक नहीं बनी हैं। बल्कि सुनियोजित तरीके से पश्चिम बंगाल में हिंदू समाज को हाशिए पर धकेला गया है। यह काम पहले कम्युनिस्ट सरकार की सरपरस्ती में संचालित हुआ और अब ममता बनर्जी की सरकार चार कदम आगे निकल गई है। आज परिणाम यह है कि पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में हिंदू अल्पसंख्यक ही नहीं हुआ है, अपितु कई क्षेत्र हिंदू विहीन हो चुके हैं। राजनीतिक दलों की देखरेख में बांग्लादेशी मुस्लिमों ने सीमावर्ती हिस्सों में जो घुसपैठ की जा रही है, उसके भयावह परिणामों की आहट अब सुनाई देने लगी है। मालदा, उत्तरी परगना, मुर्शिदाबाद और दिनाजपुर जैसे इलाकों में जब चाहे समुदाय विशेष हंगामा खड़ा कर देता है। घर-दुकानें जला दी जाती हैं। थाना फूंकने में भी उग्रवादी भीड़ को हिचक नहीं होती है। दुर्गा पूजा की शोभायात्राओं को रोक दिया जाता है। पश्चिम बंगाल की यह स्थिति बताती है कि सांस्कृतिक और बौद्धिक रूप से समृद्ध यह राज्य सांप्रदायिकता एवं तुष्टीकरण की आग में जल रहा है।  सांप्रदायिकता की इस आग से अब पश्चिम बंगाल का हिंदू झुलस रहा है। अपने उदारवादी स्वभाव के कारण इस प्रकार के षड्यंत्रों को अनदेखा करने वाले हिंदू समाज का मानस अब बदल रहा है। भविष्य में पश्चिम बंगाल में इस बदलाव के परिणाम दिखाई दे सकते हैं। आप इस संस्मरण से भी समझ सकते हैं कि कैसे पश्चिम बंगाल का हिंदू जाग रहा है। उसे अपने हित-अहित दिखाई देने लगे हैं।