सोमवार, 15 अगस्त 2022

राष्ट्रध्वज तिरंगे की प्रतिष्ठा में संघ ने दिया है बलिदान

आरएसएस और तिरंगा : भाग-3

26 जनवरी 1963 को राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के समक्ष गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 3500 स्वयंसेवक.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों के मन में राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर किसी प्रकार का भ्रम नहीं है। राष्ट्रीय गौरव के मानबिन्दुओं के लिए संघ के कार्यकर्ताओं ने अपना बलिदान तक दिया है। राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा भी ऐसा ही एक राष्ट्रीय प्रतीक है। चूंकि संघ ‘प्रसिद्धी पराङ्मुख’ के सिद्धांत पर चला है। जो मातृभूमि के लिए अनिवार्यरूप से करणीय कार्य हैं, उसका यश क्यों लेना? संघ का कार्यकर्ता इसलिए कोई काम नहीं करता है कि उसका नाम दस्तावेजों में लिखा जाये और उसको यश मिले। अपना स्वाभाविक कर्तव्य मानकर ही वह सारा कार्य करता है। अपने योगदान के दस्तावेजीकरण के प्रति संघ की उदासीनता का लाभ संघ के विरुद्ध दुष्प्रचार करनेवाले समूहों ने उठाया और उन्होंने संघ के सन्दर्भ में नाना प्रकार के भ्रम उत्पन्न करने के प्रयास किये। इस सबके बीच, जो निश्छल लोग हैं, उन्होंने संघ की वास्तविक प्रतिमा के दर्शन किये हैं किन्तु कुछ लोग राजनीतिक दुराग्रह एवं पूर्वाग्रह के कारण संघ को लेकर भ्रमित रहते हैं। ऐसा ही एक भ्रम है कि संघ के स्वयंसेवक राष्ट्रध्वज को मान नहीं देते हैं और तिरंगा नहीं फहराते हैं। इसी भ्रम में पड़कर कांग्रेस को भी संघ के दर्शन हो गए। वर्ष 2016 में जेएनयू में देशविरोधी नारे लगने के बाद यह बात निकलकर आई कि युवा पीढ़ी में देशभक्ति का भाव जगाने के लिए सभी शिक्षा संस्थानों में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लगाया जाना चाहिए। यह आग्रह कुछ लोगों को इतना चुभ गया कि वे आरएसएस और तिरंगे के संबंधों पर मिथ्याप्रचार करने लगे। इस मिथ्याप्रचार में फंसकर कांग्रेस ने 22 फरवरी, 2016 को मध्यप्रदेश के संघ कार्यालयों पर तिरंगा फहराने की योजना बनाई थी। कांग्रेस ने सोचा होगा कि संघ के कार्यकर्ता कार्यालय पर तिरंगा फहराने का विरोध करेंगे। तिरंगा फहराना था शिक्षा संस्थानों में लेकिन कांग्रेस निकल पड़ी संघ कार्यालयों की ओर। 

इंदौर में रामबाग स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय ‘अर्चना’ में एक रोचक वाकया घटित हुआ। इसकी चर्चा सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में खूब हुई। स्वयंसेवकों ने तिरंगा लेकर आये कांग्रेसी नेताओं का ‘लाल कालीन’ बिछाकर स्वागत किया। तिलक लगाकर कांग्रेसियों का अभिनंदन किया। कार्यालय पर तिरंगा फहराने में उन्होंने कांग्रेस नेताओं की सहायता की। झंडावंदन के बाद अल्पाहार भी कराया। इस दौरान संघ के संबंध में कांग्रेस की भ्रामक धारणाओं को दूर करने का प्रयास भी किया। संभवत: कांग्रेस के वर्तमान नेता यह भूल गए होंगे कि सेवानिष्ठा, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति समर्पण में संघ के कार्यकर्ताओं का आदर स्वयं कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता करते हैं।

वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध में जिस प्रकार का अदम्य साहस दिखाकर संघ के कार्यकर्ताओं ने सेना और सरकार का सहयोग किया, उससे तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की धारणा भी बदल गई। चीन के आक्रमण के समय नेहरूजी को कम्युनिस्टों से धोखा मिला, जिनका पंडितजी समर्थन करते थे। वहीं, जिस आरएसएस के प्रति नेहरूजी के भाव कटु थे, आपात स्थिति में उसी संगठन का भरपूर सहयोग शासन को मिला। संघ की देशभक्ति से प्रभावित होकर प्रधानमंत्री नेहरूजी ने आरएसएस को गणतंत्र दिवस की राष्ट्रीय परेड में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया। 1963 की राष्ट्रीय परेड में संघ के स्वयसेवकों ने तिरंगे के सामने ही कदम-से-कदम मिलकर परेड की। स्मरण रखें कि जब चीनी सेना नेफा (अब अरुणाचल प्रदेश) में आगे बढ़ रही थी, तेजपुर (असम) से कमिश्नर सहित सारा सरकारी तंत्र तथा जनसाधारण भयभीत होकर भाग गए थे। तब आयुक्त मुख्यालय पर तिरंगा फहराए रखने के लिए 16 स्वयंसेवक पूरा समय वहां डटे रहे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी राष्ट्र ध्वज का मान बढ़ाने का कार्य किया है। 1947 में जब देश का विभाजन हो गया और जम्मू-कश्मीर में विवाद प्रारंभ हो गया तब 14 अगस्त को श्रीनगर की कई इमारतों पर पाकिस्तानी झंडे फहरा दिए गए थे। ऐसी स्थिति में स्वयंसेवकों ने कुछ ही समय में तीन हजार से अधिक राष्ट्रीय ध्वज सिलवाकर श्रीनगर को तिरंगे से पाटकर स्पष्ट सन्देश दिया कि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा है, यहाँ सिर्फ तिरंगा लहराएगा। जम्मू-कश्मीर में जब कांग्रेस ने ‘दो निशान-दो विधान-दो प्रधान’ की व्यवस्था को स्वीकार कर लिया था तब भारत के तिरंगे, संविधान और संप्रभुता के लिए संघ के लोगों ने ‘एक निशान-एक विधान-एक प्रधान’ का नारा देते हुए आन्दोलन चलाया। 1952 में जम्मू संभाग में आयोजित ‘तिरंगा सत्याग्रह’ में संघ के 15 स्वयंसेवक बलिदान हुए। शेख अब्दुल्ला के इशारे पर पुलिस ने छम्ब, सुंदरवनी, हीरानगर और रामवन में ‘तिरंगा सत्याग्रहियों’ पर गोलियां चलायीं, जिसमें मेलाराम, कृष्णलाल, बिहारी और शिवा सहित 15 स्वयंसेवक मारे गए थे। जम्मू-कश्मीर में राष्ट्र ध्वज के लिए संघ ने बलिदान दिया है, कम्युनिस्टों और कांग्रेसियों ने नहीं। स्वतंत्र भारत में तिरंगा फहराने और उसकी प्रतिष्ठा के लिए संघ और भाजपा के कार्यकर्ताओं के अलावा किसका बलिदान हुआ है? संघ कार्यालयों पर तिरंगा फहराने की बहादुरी दिखानेवालों में से किसने श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने का साहस दिखाया है? यहाँ भी आतंकवादी हमले के खतरे के बाद भी जनसंघ/भारतीय जनता पार्टी के नेता राष्ट्रीय ध्वज फहराते रहे हैं। आज जम्मू-कश्मीर में शान से तिरंगा लहराता है तो इसका सारा श्रेय संघ के कार्यकर्ताओं को जाता है। इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि संघ ने आन्दोलन नहीं किया होता तो लम्बे समय तक वहां राष्ट्र ध्वज के बरक्स एक ओर झंडा फहरा रहा होगा। आखिर विभाजनकारी एवं अस्थायी अनुच्छेद-370 और 35ए को भी अब जाकर 2019 में निष्प्रभावी किया गया, यह कार्य भी भाजपा सरकार ने किया।


श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराते भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी और नरेन्द्र मोदी


दादर नगर हवेली और गोवा के भारत विलय में भी संघ द्वारा निर्णायक भूमिका का निर्वहन किया गया। 21 जुलाई, 1954 को पुर्तगालियों के कब्जे से दादर को मुक्त कराया गया। 28 जुलाई को नरोली और फिपारिया मुक्त कराये गए। पुणे के संघचालक विनायक राव आपटे के नेतृत्व में 2 अगस्त, 1954 को संघ के 100 से अधिक कार्यकर्ताओं ने सिलवासा (दादरा और नगर हवेली का मुख्यालय) में घुसकर वहां से पुर्तगाली झण्डा उखाड़कर तिरंगा फहराया था। इसी प्रकार 1955 में संघ के स्वयंसेवकों ने गोवा मुक्ति आन्दोलन में प्रभावी भूमिका का निर्वहन किया। देशभर से संघ के कार्यकर्ता राष्ट्रीय ध्वज के साथ गोवा पहुंचे थे। कर्नाटक से जगन्नाथ राव जोशी सैकड़ों कार्यकर्ताओं के साथ पणजी पहुंचे। इस आन्दोलन में सहभागिता के कारण उन्हें लगभग दो वर्ष जेल में बिताने पड़े। मध्यप्रदेश के देवास से उज्जैन के नारायण बलवंत उपाख्य ‘राजाभाऊ महाकाल’ कार्यकर्ताओं की टोली के साथ गोवा मुक्ति आन्दोलन में शामिल हुए। राजाभाऊ महाकाल तिरंगा झंडा लेकर जत्थे में सबसे आगे चल रहे थे। पुर्तगाली सैनिकों ने गोलीबारी शुरू कर दी लेकिन स्वयंसेवकों की यह टोली आगे बढ़ती रही। सबसे पहले बसंत राव ओक के पैर में गोली लगी, उसके बाद पंजाब के हरनाम सिंह के सीने पर गोली लगी। इसके बाद भी जत्था आगे बढ़ता रहा। पुर्तगाली सैनिक ने राजाभाऊ महाकाल के सिर में निशाना लगाया। गोली लगते ही राजाभाऊ महाकाल गिर पड़े लेकिन तिरंगा ज़मीन पर गिरता उससे पहले उन्होंने अपने साथी कार्यकर्ता को तिरंगा थमा दिया। चिकित्सालय में 15 अगस्त, 1955 को उनका निधन हुआ। इसी आन्दोलन के अंतर्गत पणजी सचिवालय पर तिरंगा फहराने के कारण मोहन रानाडे नाम के स्वयंसेवक को पुर्तगाली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। तिरंगा फहराने के लिए उन्हें 17 वर्ष पुर्तगाल की लिस्बन जेल में काटने पड़े थे, जबकि गोवा 1961 में पुर्तगाल के कब्जे से मुक्त हो गया था। लेकिन सरकार ने गोवा मुक्ति आन्दोलन के स्वतंत्रता सेनानियों एवं बलिदानियों की सुध ही नहीं ली। 

ऐसे अनेक प्रसंग हैं, जिनका वर्णन यहाँ किया जा सकता है। प्रत्येक प्रसंग यह सिद्ध करता है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की निष्ठा, समर्पण, श्रद्धा सर्वोपरि है। जिस तरह भारत का सामान्य देशभक्त नागरिक देश के गौरव प्रतीकों के प्रति आदर और समर्पण का भाव रखता है, ठीक उसी तरह संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक का भाव है।  

रविवार, 14 अगस्त 2022

आरएसएस में तिरंगे के प्रति पूर्ण निष्ठा, श्रद्धा और सम्मान

आरएसएस और तिरंगा : भाग-2

#HarGharTiranga हर घर तिरंगा अभियान के अंतर्गत नागपुर की जिलाधिकारी आर. विमला जी ने सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत से भेंटकर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा प्रदान किया।

राष्ट्रीय विचारधारा का विरोधी बुद्धिजीवी वर्ग अक्सर एक झूठ को समवेत स्वर में दोहराता रहता है– आरएसएस ने राष्ट्रध्वज तिरंगा का विरोध किया। संघ भगवा झंडे को तिरंगे से ऊपर मानता है। आरएसएस ने कभी अपने कार्यालयों पर तिरंगा नहीं फहराया। इस तरह के और भी मिथ्यारोप यह समूह लगाता है। हालांकि, इस संदर्भ में उनके पास कोई प्रामाणिक तथ्य नहीं है। वे एक–दो बयानों और घटनाओं के आधार पर अपने झूठ को सच के रंग से रंगने की कोशिशें करते हैं। जबकि जो भी व्यक्ति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से परिचित है, वह जानता है कि इन खोखले झूठों का कोई आधार नहीं। संघ के लिए राष्ट्रध्वज तिरंगा ही नहीं अपितु सभी राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान सर्वोपरि है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने ‘भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण’ शीर्षक से दिल्ली में आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला में पहले ही दिन यानी 17 सितम्बर, 2018 को कहा- “स्वतंत्रता के जितने सारे प्रतीक हैं, उन सबके प्रति संघ का स्वयंसेवक अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ समर्पित रहा है। इससे दूसरी बात संघ में नहीं चल सकती”। इस अवसर पर उन्होंने एक महत्वपूर्ण प्रसंग भी सुनाया। फैजपुर के कांग्रेस अधिवेशन में 80 फीट ऊँचा ध्वज स्तंभ पर कांग्रेस अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू ने तिरंगा झंडा (चरखा युक्त) फहराया। जब उन्होंने झंडा फहराया तो यह बीच में अटक गया। ऊंचे पोल पर चढ़कर उसे सुलझाने का साहस किसी का नहीं था। किशन सिंह राजपूत नाम का तरुण स्वयंसेवक भीड़ में से दौड़ा, वह सर-सर उस खंभे पर चढ़ गया, उसने रस्सियों की गुत्थी सुलझाई। ध्वज को ऊपर पहुंचाकर नीचे आ गया। स्वाभाविक ही लोगों ने उसको कंधे पर लिया और नेहरू जी के पास ले गये। नेहरू जी ने उसकी पीठ थपथपाई और कहा कि तुम आओ शाम को खुले अधिवेशन में तुम्हारा अभिनंदन करेंगे। लेकिन फिर कुछ नेता आए और कहा कि उसको मत बुलाओ वह शाखा में जाता है। बाद में जब संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी को पता चला तो उन्होंने उस स्वयंसेवक का अभिनंदन किया। यह एक घटनाक्रम बताता है कि तिरंगे के जन्म के साथ ही संघ का स्वयंसेवक उसके सम्मान के साथ जुड़ गया था। 

‘संघ और तिरंगे’ के सन्दर्भ में जो भी मिथ्याप्रचार किया गया है, उसके मूल में वे कम्युनिस्ट हैं जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद सात दशक बाद तक अपने पार्टी कार्यालयों पर राष्ट्रध्वज नहीं फहराया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने 2021 में पहली बार स्वतंत्रता दिवस मनाने और पार्टी कार्यालय में तिरंगा फहराने का निर्णय लिया। कम्युनिस्ट पार्टी ने भारत की स्वतंत्रता को अस्वीकार करते हुए नारा दिया था- ‘ये आजादी झूठी है’। जरा सोचिये, किन लोगों ने अपनी सच्चाई छिपाने के लिए राष्ट्रभक्त संगठन के सन्दर्भ में दुष्प्रचार किया? 

संविधान द्वारा 22 जुलाई, 1947 को तिरंगे को राष्ट्रध्वज के रूप में स्वीकार किये जाने के बाद कभी भी संघ ने राष्ट्रध्वज के सन्दर्भ में अपना कोई दूसरा मत व्यक्त नहीं किया। हाँ, उससे पूर्व अवश्य ही संघ का मत था कि प्राचीनकाल से भारत की पहचान बने हुए ‘भगवा ध्वज’ को ही राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। संघ का यह अभिमत ‘तिरंग का विरोध’ कतई नहीं था। अपितु समूचे देश का मत ही संघ के अभिमत के रूप में व्यक्त हुआ। 1931 में कांग्रेस ने राष्ट्रीय ध्वज के विषय में समग्र रूप से विचार करने के लिए जो समिति बनाई थी, उसने भी विभिन्न प्रान्तों से अभिमत लेकर सर्वसम्मति से राष्ट्रीय ध्वज के तौर पर एक ही रंग के, सैफ्रन यानी केसरिया (भगवा) रंग के झंडे का सुझाव दिया था। इस समिति में सरदार वल्लभ भाई पटेल, पं. जवाहरलाल नेहरू, डा. पट्टाभि सीतारमैया, डा. ना.सु. हर्डीकर, आचार्य काका कालेलकर, मास्टर तारा सिंह और मौलाना आजाद शामिल थे। क्या इस आधार पर उक्त राजनेताओं को तिरंगा विरोधी ठहराया जा सकता है? 

राष्ट्रध्वज को संवैधानिक मान्यता मिलने से पहले तक का दौर वह था, जब विभिन्न राजनेता, स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी एवं संगठन अपने दृष्टिकोण के अनुसार राष्ट्रध्वज का अभिकल्प (डिजाइन) प्रस्तुत कर रहे थे। सन् 1904 में विवेकानंद की शिष्या भगनी निवेदिता ने पहली बार एक ध्वज बनाया। यह लाल और पीले रंग से बना था। पहली बार तीन रंग वाला ध्वज 1906 में बंगाल के बँटवारे के विरोध में निकाले गए जलूस में शचीन्द्र कुमार बोस लाए। इस ध्वज में सबसे ऊपर केसरिया रंग, बीच में पीला और सबसे नीचे हरे रंग का उपयोग किया गया था। केसरिया रंग पर 8 अधखिले कमल के फूल सफ़ेद रंग में थे। नीचे हरे रंग पर एक सूर्य और चंद्रमा बना था। बीच में पीले रंग पर हिन्दी में वंदे मातरम् लिखा था। 1908 में भीकाजी कामा ने जर्मनी में तिरंगा झंडा लहराया और इस तिरंगे में सबसे ऊपर हरा रंग था, बीच में केसरिया, सबसे नीचे लाल रंग था। इस ध्वज में भी देवनागरी में वंदे मातरम् लिखा था और सबसे ऊपर 8 कमल बने थे। इस ध्वज को भीकाजी कामा, वीर सावरकर और श्यामजी कृष्ण वर्मा ने मिलकर तैयार किया था। इस ध्वज को बर्लिन कमेटी में भारतीय क्रांतिकारियों ने अपनाया था। एनी बेसेंट और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने होम रूल आंदोलन के दौरान 1917 में एक नया ध्वज फहराया। इसमें पांच लाल और चार हरी क्षैतिज लाइनें थीं। इस पर सप्तऋषि (सात तारे), यूनियन जैक और चाँद-सितारा भी अंकित था। इसी तरह 1921 में बेजवाड़ा में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति में आंध्रप्रदेश के युवा पिंगली वेंकैया ने महात्मा गांधीजी को एक झंडा दिया, जो दो रंगों का बना हुआ था- लाल और हरा। बाद में सुझाव के उपरांत इसमें सफेद रंग की पट्टी और चरखा भी जोड़े गए। इस ध्वज में सबसे ऊपर सफ़ेद, फिर हरा और सबसे नीचे भगवा रंग की पट्टी थी। वर्ष 1931 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपनी ही ध्वज समिति के भगवा रंग के ध्वज के सुझाव को ख़ारिजकर तिरंगे को स्वराज्य के झंडे के रूप में स्वीकार किया। क्या हम उपरोक्त प्रयासों को राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का विरोध कह सकते हैं? स्वाभाविक उत्तर हैं- नहीं। 

स्वतंत्रता का अवसर समीप आने पर एक बार फिर यह प्रश्न उपस्थित हुआ कि स्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय ध्वज क्या होना चाहिए? तब 1947 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व में राष्ट्रीय ध्वज तय करने के लिए एक समिति का गठन हुआ। मौलाना अबुल कलाम आजाद, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, सरोजिनी नायडू, केएम पणिक्कहर, बीआर अम्बेंडकर, उज्जंल सिंह, फ्रैंक एंथनी और एसएन गुप्ता  समिति के सदस्य थे। 10 जुलाई, 1947 को समिति की पहली बैठक हुई, जिसमें विशेष निमंत्रण पर पं. जवाहरलाल नेहरू भी उपस्थित थे। बैठक में राष्ट्रिध्वैज को लेकर व्यापक विचार-विमर्श हुआ। अंततः 22 जुलाई, 1947 को कॉन्टीर अ ट्यूशन हॉल में संविधान सभा की बैठक में वर्तमान तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार कर लिया गया। अब तिरंगे पर चरखे का स्थान अशोक चक्र ने ले लिया था। राष्ट्रीय ध्वज में यह परिवर्तन महात्मा गाँधी को पसंद नहीं आया। गांधीवादी चिन्तक एवं शोधार्थी एलएस रंगराजन के अनुसार, गांधीजी को जब मालूम हुआ कि तिरंगे से चरखे को हटाकर उसी जगह अशोक चक्र लाया जाएगा तो वो बहुत नाराज़ हुए। उन्होंने कहा- “मैं भारत के ध्वज में चरखा हटाए जाने को स्वीकार नहीं करूंगा। अगर ऐसा हुआ तो मैं झंडे को सलामी देने से मना कर दूंगा। आप सभी को मालूम है कि भारत के राष्ट्रीय ध्वज के बारे में सबसे पहले मैंने सोचा और मैं बगैर चरखा वाले राष्ट्रीय झंडे को स्वीकार नहीं कर सकता”। हालाँकि बाद में गांधीजी ने अपने विचारों को नरम कर लिया। अब क्या इस आधार पर हम महात्मा गाँधी को तिरंगा विरोधी कह सकते हैं? राष्ट्र ध्वज को लेकर उनका अपना विचार था, जो उन्होंने प्रकट किया।

भारत सरकार द्वारा ‘प्रतीक और नाम अधिनियम-1950’ को लागू किये जाने से पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने कार्यालयों पर राष्ट्रध्वज फहराया था। नागपुर में संघ के मुख्यालय और स्मृति भवन यानी संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार एवं गुरुजी गोलवलकर स्मृति स्थल पर 15 अगस्त 1947 को राष्ट्रीय ध्वज गौरव के साथ फहराया गया था। यह क्रम 26 जनवरी, 1950 तक जारी रहा लेकिन उसके बाद सरकार ने राष्ट्रीय ध्वज फहराने के सम्बन्ध में कानून कड़े कर दिए थे। सभी लोग वर्षभर राष्ट्रध्वज फहरा सकें, इसके लिए कांग्रेस के ही नेता एवं उद्योगपति नवीन जिंदल ने लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ी। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद 26 जनवरी, 2002 से सभी नागरिकों को वर्षभर तिरंगा फहराने की अनुमति मिली। इस बीच आरएसएस के विचार से अनुप्राणित सामाजिक क्षेत्र में संचालित सभी राजनैतिक, शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक संगठन संविधान के दायरे में गौरव की अनुभूति के साथ तिरंगे को फहराते रहे। 

अपने राष्ट्रध्वज को लेकर संघ का अभिमत प्रारंभ के क्या रहा है, इस बात को द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘गुरुजी’ द्वारा प्रसिद्ध अधिवक्ता एन राजनेता पंडित मौलिचंद्र जी को 10 जुलाई, 1949 को लिखे पत्र से भी समझ सकते हैं। गुरुजी लिखते हैं- “एक स्वतंत्र देश में यह प्रश्न उठना ही नहीं चाहिए। संघ का प्रत्येक सदस्य अपना सर्वस्व मातृभूमि के लिए अर्पित करने की प्रतिक्षा करता है। भारत के प्रत्येक अन्य नागरिक के समान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक देश, उसके संविधान और भारतीय स्वतंत्रता और उसके गौरव के प्रत्येक प्रतीक के प्रति निष्ठावान है। राष्ट्रीय ध्वज भी ऐसा ही एक प्रतीक है और यह जैसा कि पहिले कहा जा चुका है, भारत के प्रत्येक राष्ट्रीय के समान ही प्रत्येक स्वयंसेवक का कर्त्तव्य है कि इस ध्वज के साथ खडा़ रहे और उसके सम्मान को अक्षुण्ण रखे”। 

Swadesh Indore स्वदेश इंदौर में प्रकाशित लेख

शनिवार, 13 अगस्त 2022

ध्वज समिति की अनुशंसा, भगवा रंग का हो राष्ट्र ध्वज

आरएसएस और तिरंगा : भाग-1

#HarGharTiranga #LokendraSingh

ध्वज किसी भी राष्ट्र के चिंतन और ध्येय का प्रतीक तथा स्फूर्ति का केंद्र होता है। ध्वज, आक्रमण के समय में पराक्रम का, संघर्ष के समय में धैर्य का और अनुकूल समय में उद्यम की प्रेरणा देता है। इसलिए सदियों से ध्वज हमारे साथ रहा है। इतिहास में जाकर देखते हैं तो हमें ध्यान आता है कि लोगों को गौरव की अनुभूति कराने के लिए कोई न कोई ध्वज हमेशा रहा है। भारत के सन्दर्भ में देखें तो यहाँ की सांस्कृतिक पहचान ‘भगवा’ रंग का ध्वज रहा है। आज भी दुनिया में भगवा रंग भारत की संस्कृति का प्रतीक है। अर्थात सांस्कृतिक पताका भगवा ध्वज है। वहीं, राजनीतिक रूप से विश्व पटल पर राष्ट्र ध्वज ‘तिरंगा’ भारत की पहचान है।

भारत के ‘स्व’ से कटे हुए कुछ लोगों एवं विचार समूहों को ‘भगवा’ से दिक्कत होती है। इसलिए वे भगवा ध्वज को नकारते हैं। परन्तु उनके नकारने से भारत की सांस्कृतिक पहचान को भुलाया तो नहीं जा सकता है। राष्ट्रध्वज के रूप में ‘तिरंगा’ को संविधान द्वारा 22 जुलाई, 1947 को स्वीकार किया गया। उससे पहले विश्व में भारत की पहचान का प्रतीक ‘भगवा’ ही था। स्वहतंत्रता संग्राम के बीच एक राजनैतिक ध्व ज की आवश्यकता अनुभव होने लगी। क्रांतिकारियों से लेकर अन्य स्वतंत्रतासेनानियों एवं राजनेताओं ने 1906 से 1929 तक अपनी-अपनी कल्पना एवं दृष्टि के अनुसार समय-समय पर अनेक झंडों को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में प्रस्तुत किया गया। इन्हीं में वर्तमान राष्ट्र ध्वज तिरंगे आविर्भाव हुआ। स्वतंत्रता आन्दोलन का साझा मंच बन चुकी कांग्रेस ने 2 अप्रैल, 1931 को करांची में आयोजित कार्यसमिति की बैठक में राष्ट्रीय ध्वज के विषय में समग्र रूप से विचार करने, तीन रंग के ध्वज को लेकर की गईं आपत्तियों पर विचार करने और सर्वस्वीकार्य ध्वज के सम्बन्ध में सुझाव देने के लिए सात सदस्यों की एक समिति बनाई। समिति के सदस्य थे- सरदार वल्लभ भाई पटेल, पं. जवाहरलाल नेहरू, डा. पट्टाभि सीतारमैया, डा. ना.सु. हर्डीकर, आचार्य काका कालेलकर, मास्टर तारा सिंह और मौलाना आजाद। 

उल्लेखनीय है कि पिंगली वेंकैया ने राष्ट्रध्वज का जो प्रारंभिक अभिकल्प (डिजाइन) प्रस्तुत किया, उसमें लाल और हरा, दो ही रंग थे। कांग्रेस के दृष्टिकोण और नीति के कारण स्वाभाविक ही लोगों ने इन दोनों रंगों को हिन्दू और मुस्लिम समुदाय से जोड़कर देखा। जबकि दोनों रंगों के पीछे वेंकैया की भावना हरे रंग को समृद्धि और लाल रंग को स्वतंत्रता की लड़ाई के प्रतीक के रूप में चित्रित करने की थी। बाद में शांति और अहिंसा के प्रतीक के रूप में सफेद पट्टी जोड़ने का सुझाव मिला। जिस पर वेंकैया ने सबसे ऊपर पतली सफेद पट्टी, बीच में हरी पट्टी और सबसे नीचे लाल पट्टी रखकर तिरंगे को आकार दिया। कांग्रेसी नेताओं ने सफेद, हरा और लाल रंगों की पट्टी को क्रमश: ईसाई, इस्लाम और हिंदू धर्म के प्रतीक के रूप में व्याख्या करके तिरंगे को लेकर असहमतियां निर्मित कर दी। सिख समुदाय ने इस पर आपत्ति दर्ज की और पीले रंग को ध्वज में शामिल करने की मांग महात्मा गाँधी से की। अन्य व्यक्तियों एवं संगठनों की ओर से भी आपत्तियां आ रहीं थीं। 

ध्वज समिति ने उपरोक्त आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए देशभर से सुझाव प्राप्त करने के लिए एक प्रश्नावली तैयार की, जिसमें शामिल तीन प्रश्न इस प्रकार थे- 

  1. क्या आपके प्रांत में लोगों के किसी समूह या समुदाय के बीच राष्ट्रीय ध्वज के डिजाइन के संबंध में कोई भावना है, जिसे आपकी राय में समिति द्वारा विचार किया जाना चाहिए?
  2. ध्वज को अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए क्या आपके पास कोई विशिष्ट सुझाव हैं?
  3. क्या वर्तमान में प्रचलित ध्वज के डिजाइन में कोई दोष या खामी है जिस पर आप ध्यान देने की मांग करते हैं?

ध्वज समिति ने आन्ध्र, बिहार, बॉम्बे (सिटी), कर्नाटक, सिंध, तमिलनाड़, उत्कल और उत्तर प्रदेश की प्रांतीय कांग्रेस समितियों सहित अन्य समितियों को उक्त प्रश्नावली भेजकर व्यापक स्तर पर सुझाव एकत्रित किये। प्रांतीय कांग्रेस समितियों एवं अन्य से प्राप्त सुझावों का सब दृष्टि से विचार कर समिति ने सर्वसम्मति से अपना जो प्रतिवेदन दिया, उसमें लिखा- “हम लोगों का एक मत है कि अपना राष्ट्रीय ध्वज एक ही रंग का होना चाहिए। भारत के सभी लोगों का एक साथ उल्लेख करने के लिए उन्हें सर्वाधिक मान्य केसरिया रंग ही हो सकता है। अन्य रंगों की अपेक्षा यह रंग अधिक स्वतंत्र स्वरूप का तथा भारत की पूर्व परंपरा के अनुकूल है”। निष्कर्ष के रूप में उन्होंने आगे लिखा- “भारत का राष्ट्रीय ध्वज एक रंग का हो और उसका रंग केसरिया रहे तथा उसके दंड की ओर नीले रंग में चर्खे का चित्र रहे”। समिति ने यह भी कहा था कि तीन रंग के ध्वज से भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है क्योंकि पर्शिया और बुल्गारिया का ध्वज भी इन्हीं तीन रंग की पट्टियों वाला है। भारत का ध्वज एक रंग का होगा तो इस प्रकार का भ्रम भी उत्पन्न नहीं होगा।

ध्वज समिति का यह प्रतिवेदन राष्ट्रीय एकात्मता की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था। समिति के प्रस्ताव से स्पष्ट होता है कि ‘भगवा ध्वज’ स्वाभाविक रूप से इस देश का ध्वज है। इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि विभिन्न प्रान्तों की कांग्रेस समितियों से प्राप्त सुझावों के उपरांत ध्वज समिति जिस निर्णय पर पहुंची, उसे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बम्बई-अधिवेशन में स्वीकार नहीं किया गया। कांग्रेस कार्यसमिति ने पिंगली वेंकैया द्वारा तैयार किये गए तिरंगे को ही आंशिक परिवर्तन के साथ राष्ट्र ध्वज के रूप में मान्यता दी। विभिन्न सुझावों के आधार पर भगवा रंग को सबसे ऊपर कर दिया गया, मध्य में सफ़ेद और नीचे गहरे हरे रंग की पट्टी। इस ध्वज पर बीच में चरखा अंकित कर दिया गया। 

स्मरण रखें कि इस ध्वज समिति में उस समय के कांग्रेस के प्रभावशाली नेता शामिल थे। भगवा रंग के आयताकार ध्वज को राष्ट्र ध्वज के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माननेवाले इस प्रस्ताव पर पंडित जवाहरलाल नेहरू, मास्टर तारा सिंह और मौलाना आज़ाद की भी सहमति थी। इसलिए भगवा ध्वज को लेकर आपत्ति करनेवाले लोगों को अपनी दृष्टि को विस्तार देना चाहिए। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने ध्वज समिति के प्रस्ताव पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने प्रयास किये कि कांग्रेस की कार्यसमिति में राष्ट्र ध्वज को लेकर समिति के सुझाव को स्वीकार कर लिया जाये। उल्लेखनीय है कि डॉ. हेडगेवार संघ की स्थापना से पूर्व नागपुर कांग्रेस के प्रभावशाली नेता था, इसलिए कांग्रेस में उनका गहरा संपर्क था। डॉ. हेडगेवार को इस बात की आशंका थी कि कांग्रेस की कार्यसमिति की बैठक में ध्वज समिति के इस सुझाव को अस्वीकार किया जा सकता है। ऐसी स्थिति को टालने के लिए डॉ. हेडगेवार सक्रिय हो गए। लोकनायक बापूजी अणे कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य थे। ना.ह. पालकर ने पुस्तक ‘डॉ. हेडगेवार चरित्र’ में लिखा है कि कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक दिल्ली में होने वाली थी और लोकनायक अणे भी उसमें भाग लेने दिल्ली जाने वाले थे। वे केसरिया रंग के पक्षधर नहीं थे, भगवा रंग के पक्षधर थे। डॉ. हेडगेवार उनके पास गए और उन्हें समझाया कि केसरिया और भगवा रंग कोई दो रंग नहीं हैं। इनमें बहुत ही मामूली-सा अंतर है, मूलत: वे एक ही हैं। दोनों ही लाल एवं पीले रंग के सम्मिश्रण हैं। केसरिया रंग में लाल की तुलना में पीला रंग थोड़ा सा अधिक होता है और भगवा रंग में पीले की अपेक्षा लाल रंग थोड़ा सा अधिक होता है। अत: केसरिया ध्वज के समर्थन का अर्थ भगवा ध्वज का ही समर्थन है। डॉ. हेडगेवार ने आगे कहा- “यद्यपि काफी अध्ययन और खोज के उपरांत समिति ने केसरिया रंग का सुझाव दिया है, पर गांधीजी के सम्मुख सब मौन हो जाएंगे। गांधीजी ने केसरिया को अमान्य कर तिरंगे को ही बनाए रखने का आग्रह किया, तो ये नेता मुंह नहीं खोलेंगे। अत: आपको आगे आकर निर्भयतापूर्वक अपने पक्ष का प्रतिपादन करना चाहिए”। किन्तु डॉ. हेडगेवार के इन प्रयत्नों का कोई परिणाम नहीं निकला। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बम्बई-अधिवेशन में जब ध्वज समिति का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया तो उसने उसे अमान्य करके तिरंगे को बनाये रखने का निर्णय लिया। इतना अवश्य किया कि गहरे लाल रंग के स्थान पर केसरिया रंग मान लिया तथा इस रंग का क्रम सबसे ऊपर कर दिया। इसके पूर्व लाल रंग की पट्टी-सबसे नीचे रहती थी। साथ ही यह भी बताया गया कि तीन रंग विभिन्न सम्प्रदायों के द्योतक न होकर गुणों के प्रतीक हैं।

समिति ने यूँ ही नहीं कहा था कि केसरिया अर्थात भगवा रंग प्राचीन काल से हमारी संस्कृति और परंपरा से जुड़ा होने के कारण अधिक स्वीकार्य है। ‘भगवा ध्वज’ प्राचीनतम समय से भारत की पहचान रहा है। महाभारत में अर्जुन के रथ पर भी ‘भगवा ध्वज’ विराजमान रहा। भगवा रंग दक्षिण के चोल राजाओं, छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, महाराज छात्रसाल, गुरु गोविंद सिंह और महाराजा रंजीत सिंह की पराक्रमी परंपरा और सदा विजयी भाव का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक है। भगवा रंग उगते हुए सूर्य के समान है जो कि ज्ञान और कर्मठता का प्रतीक है। भगवा ध्वज यज्ञ की ज्वाला के अनुरूप होने के कारण त्याग, समर्पण, जन कल्याण की भावना, तप, साधना आदि का आदर्श रखता है। यह समाज हित में सर्वस्व अर्पण करने का प्रतीक है। स्वामी रामतीर्थ भगवा रंग के बारे में कहते हैं- “एक दृष्टि से मृत्यु तथा दूसरी दृष्टि से जन्म ऐसा दोहरा उद्देश्य यह रंग पूरा करता है।” 

भगवा ध्वज का सतयुग से कलयुग का संपूर्ण इतिहास देखने के बाद यह ध्यान में आता है कि हिंदू समाज और भगवा ध्वज एक-दूसरे से अलग करना संभव नहीं है। हिंदू राष्ट्र, हिंदू समाज, हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति, हिंदू जीवन पद्धति, हिंदू तत्व ज्ञान, इन सबका भगवा ध्वज से अटूट नाता है। त्याग, वैराग्य, निःस्वार्थ वृत्ति, शौर्य, देश प्रेम ऐसे सब गुणों की प्रेरणा देने का सामर्थ्य भगवा ध्वज में है। संभवतः इसलिए ही जब राष्ट्रध्वज पर विचार किया जा रहा था, तब ‘भगवा ध्वज’ पर ही सबकी सहमति बनी थी। 

स्वदेश, भोपाल समूह में 13 अगस्त 2022 को प्रकाशित

गुरुवार, 11 अगस्त 2022

गोवा मुक्ति आन्दोलन में तिरंगा थामे बलिदान हुए आरएसएस के प्रचारक राजाभाऊ महाकाल

इस वर्ष शहडोल में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग ‘द्वितीय वर्ष’ में स्वतंत्रता आंदोलन के बलिदानी राजाभाऊ महाकाल को केंद्रीय पात्र बनाकर गोवा मुक्ति आंदोलन पर एक लघु नाटिका लिखी और उसका निर्देशन भी किया। यह छोटी-सी नाटिका सबको खूब पसंद आई। 

आज सुबह स्वदेश में राजाभाऊ महाकाल पर भूपेन्द्र भारतीय जी का आलेख पढ़ा। मन प्रसन्न हो गया। कुछ नई जानकारी भी हाथ लगी। मैं कितने दिन से लिखने की सोच रहा था। अब उन पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाऊंगा। 

एक गांधीवादी सज्जन मिले थे कुछ समय पूर्व। कम्युनिस्टों की संगत का थोड़ा बहुत असर था। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर का निधन हुआ था। उनकी श्रद्धांजलि सभा में जा रहे थे तो मैंने कहा कि बाबूलाल गौर स्वतंत्रता सेनानी थे, गोवा मुक्ति आंदोलन में शामिल हुए थे। आरएसएस के लोगों ने गोवा मुक्ति आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। 

मेरा इतना कहते ही अचानक से भड़क गए– "अरे तुम लोग जबरदस्ती करते हो। गोवा मुक्ति आंदोलन तो पूरी तरह से समाजवादियों का आंदोलन था"। 

मैंने मुस्कुराते हुए कहा– "हां, समाजवादियों की प्रमुख भूमिका थी। हम कहां इनकार करते हैं। हमारी आदत नहीं किसी के योगदान को अनदेखा करने और अस्वीकार करने की। परंतु संघवालों ने गोवा मुक्ति आंदोलन में हिस्सा भी लिया और बलिदान भी दिया है। इसी कारण राम मनोहर लोहिया सहित अनेक समाजवादी नेता आरएसएस के प्रति अच्छा भाव रखने लगे थे"। 

तथ्य सामने रखे तो वे और चिढ़ गए– "अरे यार तुम रहने दो"। उन्होंने वही घिसा–पिटा डायलॉग मारा– "कोई एक नाम बता दो, जो शामिल हुआ हो"। 

मैंने थोड़ा और मुस्कुराते हुए कहा– "एक तो यही (बाबूलाल गौर) दिवंगत हो गए, जिनकी श्रद्धांजलि सभा में हम बैठे हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने उन्हें इसके लिए सम्मानित भी किया था। दूसरे, यहाँ (भोपाल) से लगभग 200 किलोमीटर दूर उज्जैन के राजाभाऊ महाकाल थे, जिनका बलिदान वहीं गोवा में हुआ। तिरंगा लेकर चल रहे थे। पुर्तगालियों ने गोली मार दी"। 

"कुछ भी कहानी सुना रहे हो"। उनको अभी भी विश्वास नहीं हुआ। होता भी कैसे, क्योंकि उनकी पढ़ा–लिखी ही अलग ढंग से हुई थी। और फिर जरूरी थोड़े है कि कोई दुनियाभर की जानकारी प्राप्त कर लिया हो। 

"अच्छा एक काम करो। आप स्वयं उज्जैन जाकर पड़ताल कर लो। महाकाल जी के परिवार से मिल आना। शहर में भी अनेक लोग बता देंगे। यह भी पता कर लेना कि आरएसएस में उनके पास क्या जिम्मेदारी थी? वे संघ के प्रचारक थे"। मैंने उन्हें आत्मसंतुष्टि करने का पूरा अवसर दिया। वे अब बिल्कुल चुप हो गए। परंतु माने अभी भी नहीं थे। 

मैंने थोड़ा और आनंद लेने के लिए कह दिए– "आप कहो तो मैं चार्टर्ड बस के टिकट करा देता हूं। सुबह जाकर शाम तक वापस आ जाइएगा"।



गुरुवार, 4 अगस्त 2022

देशाभिमान जगायेगा ‘हर घर तिरंगा’

भारत की स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान पर देश में ‘स्वाधीनता का अमृत महोत्सव’ का वातावरण है। सभी देशवासी इस अवसर पर स्वाधीनता के अपने नायकों को याद कर रहे हैं। ऐसे में एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों को गौरव की अनुभूति कराने और राष्ट्रभक्ति से जोड़ने के लिए ‘हर घर तिरंगा’ अभियान का आह्वान कर दिया है। अमृत महोत्सव के तहत 11 अगस्त से ‘हर घर तिरंगा’ अभियान की शुरुआत की जा रही है, जिसमें सभी लोग अपने घर पर तिरंगा लगाएंगे। निश्चित ही यह अभियान हमारे मन में देशाभिमान जगायेगा। इस तरह के आह्वान और अभियान का परिणाम यह होता है कि लोग अपने इतिहास, गौरव और राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ते हैं। जैसे अमृत महोत्सव के कारण बहुत से गुमनाम नायकों की कीर्ति गाथाएं हमारे सामने आयीं, ऐसे ही हर घर तिरंगा के कारण हम राष्ट्रध्वज के इतिहास से जुड़ रहे हैं।

मंगलवार, 26 जुलाई 2022

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का प्रेरक उद्बोधन

 “देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर मेरा निर्वाचन इस बात का सबूत है कि भारत का गरीब सपने देख सकता है और उसे पूरा भी कर सकता है"


देश की पहली अनुसूचित जनजाति महिला राष्ट्रपति के रूप में द्रौपदी मुर्मु ने शपथ ली तो संसद भवन का केंद्रीय कक्ष तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। इस अवसर पर उनकी सरलता-सहजता के दर्शन समूचे देश ने किये। बहुत ही सहजता के साथ उन्होंने अपना वक्तव्य हिन्दी में दिया। राष्ट्रपति के रूप में द्रौपदी मुर्मु का यह पहला उद्बोधन लम्बे समय तक याद रखा जायेगा। प्रेरणा से भरे हुए इस उद्बोधन को बार-बार पढ़ा और सुना जाना चाहिए। उनका यह उद्बोधन भारत के प्रत्येक सामान्य नागरिक के मन में सपनों के दीप जलाता है। राष्ट्रपति ने अपने पहले उद्बोधन में महत्वपूर्ण सन्देश दिया है- “देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर मेरा निर्वाचन इस बात का सबूत है कि भारत का गरीब सपने देख सकता है और उसे पूरा भी कर सकता है। मैंने अपनी जीवन यात्रा ओडिशा के एक छोटे से आदिवासी गांव से शुरू की थी। मैं जिस पृष्ठभूमि से आती हूं, वहां मेरे लिए प्रारंभिक शिक्षा हासिल करना भी सपने जैसा था लेकिन अनेक बाधाओं के बावजूद मेरा संकल्प दृढ़ रहा और मैं कॉलेज जाने वाली अपने गांव की पहली व्यक्ति थी”।

गुरुवार, 14 जुलाई 2022

अशोक स्तम्भ के सिंहों की ‘मुख मुद्रा’ पर बेतुके विरोध के बीच नयी संसद की ओर

केंद्र सरकार ने वर्तमान और भविष्य को देखते हुए ‘नये संसद भवन’ की योजना बनायी थी, जिसका निर्माण कार्य अब अपने अंतिम चरण में है। विश्वास है कि इस वर्ष के अंत तक समूचा कार्य पूरा हो जायेगा। नये संसद परिसर के लोकार्पण का क्षण ऐतिहासिक होगा। यह बात संसद भवन के निर्माण में लगे श्रमिकों को भी भली प्रकार पता है। सोमवार को जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नये संसद भवन में राष्ट्रीय प्रतीक ‘अशोक स्तम्भ’ का अनावरण किया, तब वहां उन्होंने श्रमिकों से भी बातचीत की। उन्होंने जब श्रमिकों से पूछा, “आपको क्या लगता है कि आप भवन बना रहे हैं या इतिहास?” तब सभी श्रमिकों ने सामूहिक स्वर में उत्तर दिया- “इतिहास”। यकीनन नये संसद भवन के निर्माण के साथ एक इतिहास रचा जा रहा है, जिस पर हम सबको गौरव होना चाहिए। कितना सुखद संयोग है कि देश जब अपनी स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहा है तब उसे अपना नया संसद भवन मिल रहा है।

सोमवार, 4 जुलाई 2022

पत्रकारिता की शक्ति को बताने वाली दस्तावेजी पुस्तक है ‘रतौना आन्दोलन : हिन्दू-मुस्लिम एकता का सेतुबंध’

 

- डॉ. गजेन्द्र सिंह अवास्या

भारत में पत्रकारिता का एक गौरवशाली इतिहास है। समाज जागरण से लेकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता की चेतना जगाने में पत्रकारों एवं समाचारपत्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है। भारत में पत्रकारिता के विजयी प्रसंगों में से एक है-‘रतौना आन्दोलन’। गो-संरक्षण के जुड़ा यह आन्दोलन वर्ष 1920 में मध्यप्रदेश के सागर जिले के समीप रतौना नामक स्थान से शुरू हुआ, जिसे प्रखर संपादक पंडित माखनलाल चतुर्वेदी के कलम ने शीघ्र ही राष्ट्रव्यापी आन्दोलन में परिवर्तित कर दिया। पत्रकारिता के सशक्त भूमिका के कारण यह आन्दोलन अपने परिणाम को प्राप्त कर सका। तत्कालीन मध्यभारत प्रान्त में अंग्रेजों को पहले बार पराजय का सामना करना पड़ा। ब्रिटिश सरकार को अपने निर्णय को वापस लेना पड़ा। जिस जगह प्रतिमाह ढाई लाख गोवंश के क़त्ल की योजना थी, आज वहां गोवंश की नस्ल सुधार का बड़ा केंद्र है। जहाँ गोवंश के खून की नदी बहनी थी, वहां आज इतना दुग्ध उत्पादन हो रहा है कि आस-पास के लोग शुद्ध दूध पी रहे हैं। इस सम्पूर्ण विवरण को हमारे सामने लेकर आती है, पुस्तक ‘रतौना आन्दोलन : हिन्दू-मुस्लिम एकता का सेतुबंध’।

मंगलवार, 28 जून 2022

पिपरौआ गाँव के सरपंच शैलेन्द्र सिंह यादव

जो बाबा पुष्पहार पहने हैं, चुनाव वे नहीं जीते हैं। जो शांत चित्त से पास में खड़े हैं, चेकवाली आधी बांह की शर्ट में, वे चुने गए हैं सरपंच। नेताजी शैलेंद्र सिंह यादव। सही तो है, वे कहां जीते हैं। जीत तो समूचे गांव की हुई है। हर कोई जीता है। इसलिए तो समाज से प्राप्त आशीर्वाद के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का भाव ही उनके लिए सर्वोपरि है। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा...

ये इतने ही सहज और सरल हैं। जीत का कोई अभिमान नहीं। विनम्र। हंसमुख। संवेदनशील। उनका मिलनसार व्यक्तित्व उन्हें बाकी सबसे अलग पहचान देता है। श्रेय की भूख नहीं। कर्तव्य समझकर काम किया और भूल गए। कभी बड़प्पन नहीं दिखाते। सदा छोटे बनकर रहते हैं। इसलिए समूचे गांव ने खूब सारा प्रेम दिया। ग्राम पिपरौआ ने मास्टर साहब के लड़के शैलेंद्र सिंह यादव को सरपंच चुना है, जो अपने पिता की तरह ही सुलझे हुए और गांव के विकास के लिए समर्पित हैं। 

जिस दिन पंचायत चुनाव के मैदान में नेताजी ने अपना परचम उठाया था, उसी वक्त से जीत सुनिश्चित थी, बस प्रक्रिया और परिणाम आने की औपचारिकता बाकी थी। 

लोग चुनाव जीतने के लिए विकास और सहयोग के वायदे करते हैं। यह ऐसे चुनिंदा लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने सरपंच बने बिना ही गांव की तस्वीर बदलने में अग्रणी भूमिका निभाई है। 

रिष्ठ पत्रकार अनंत विजय और शिवानन्द द्विवेदी की पुस्तक 'परिवर्तन की ओर' में जिला पंचायत भितरवार के गाँव पिपरौआ का उल्लेख

नेताजी शैलेंद्र सिंह यादव तो पहले से ही सच्चे जनप्रतिनिधि थे। अब लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने हुए सरपंच भी बन गए। 

उन्होंने अपने सामर्थ्य का उपयोग सदा ही लोगों की भलाई के लिए किया है। वे लोगों की सहायता के लिए हर समय एक फोन कॉल की दूरी पर उपलब्ध रहते हैं। समाज से ऐसा गहरा नाता है कि अनेक जरूरतमंदों की मदद स्वयं आगे बढ़कर उस समय में की, जब उन्हें कहीं से सहायता की उम्मीद नहीं थी। शासकीय योजनाओं का लाभ ग्रामीण बंधुओं को मिले, ऐसे प्रयास भी लगातार उनकी ओर से रहते हैं। 

इस विजय के साथ यह विश्वास सबको है कि गांव की तरक्की को अब और पंख लग जायेंगे। शासकीय योजनाओं का लाभ गांव के अधिकतम लोगों को मिल सकेगा। नेताजी के नेतृत्व में गांव खुशहाली की ओर बढ़ेगा और बाकी अन्य पंचायतों के सामने उदाहरण बनेगा।

ईश्वर से प्रार्थना है कि सार्वजनिक जीवन में उनकी यात्रा और आगे बढ़े। मध्यप्रदेश की राजधानी उनकी प्रतीक्षा में है...

पंचायत चुनाव में जीत के बाद पिपरौआ के ग्रामवासियों का धन्यवाद ज्ञापन एवं सम्मान करते नवनिर्वाचित सरपंच शैलेन्द्र सिंह यादव


पिपरौआ गाँव के सरपंच शैलेन्द्र सिंह यादव / Shelendra Singh Yadav

मंगलवार, 14 जून 2022

विश्वपटल पर एकजुट हो सज्जनशक्ति

चित्र प्रतीकात्मक है. पाकिस्तान के ही किसी मंदिर पर हमले का यह चित्र है.

शिवलिंग पर की जा रहीं आपत्तिजनक टिप्पणियों के विरोध में किये गए एक बयान के आधार पर भारत के विरुद्ध नकारात्मक वातावरण बनानेवाला पाकिस्तान कभी अपने गिरेबान में झाँककर देखने की कोशिश नहीं करता। हिंदुओं सहित गैर-इस्लामिक मत के अनुयायियों पर होनेवाले अत्याचार पाकिस्तान के भीतर की कालिख को उसके मुंह पर मलने के लिए पर्याप्त हैं। कट्टरता और घोर सांप्रदायिक सोच में डूबा पाकिस्तान न जाने किस मुंह से दुनिया के सबसे बड़े और सफल लोकतंत्र पर सवाल उठाता है। पाकिस्तान में जो हाल हिन्दू समुदाय का है, वही स्थिति उनके पूजास्थलों के साथ भी है। अक्सर हिन्दू मंदिर कट्टरपंथियों की हिंसा का शिकार हो जाते हैं। विगत बुधवार को एक बार फिर कराची के कोरंगी इलाके में श्री मरी माता मंदिर में मूर्तियों पर हमला हुआ। श्री मरी माता मंदिर कोरंगी पुलिस स्टेशन से कुछ ही दूरी पर स्थित है। इसका अर्थ है कि पाकिस्तान में अतिवादियों के मन में पुलिस का भी भय नहीं है।