सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

मातृभाषाओं के संरक्षण का पक्षधर है संघ

संघ शताब्दी वर्ष : सभी भारतीय भाषाएं, राष्ट्रीय भाषाएं हैं। किसी की अनदेखी न हो, सबको समान स्तर प्राप्त हो


वैश्विक मानचित्र पर भाषाई दृष्टि से भारत की स्थिति विशिष्ट है। हमारे यहाँ उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक भाषाओं के विविध रंग फैले हुए दिखायी देते हैं। भारत की ये भाषाएं क्षेत्रीय या स्थानीय भाषाएं नहीं है, अपितु सभी भाषाएं राष्ट्रीय हैं। उनका एकसमान महत्व है। राजनीतिक स्वार्थ हावी होने से पहले भारत में कभी भाषाई विभाजन दिखायी नहीं दिया। दरअसल, जिस प्रकार भारत की संस्कृति के विविध पक्ष एक–दूसरे के साथ एकात्म हैं, उसी भाँति हमारी भाषाओं में भी आपस में गहरा नाता है। विविधता में एकात्मता का उत्सव मनाने वाले देश भारत में भाषाओं का सुंदर पुष्पगुच्छ है, जिसकी सुगंध से भारत की संस्कृति महकती रही है। भारत को कमजोर करने वाली ताकतें अकसर हमारी भाषाओं को एक–दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयास करती हैं। वहीं, भारत के प्रति श्रद्धा रखने वाले संगठन भारत की सभी मातृभाषाओं के बीच स्वाभाविक एकात्म को गहरा करने में विश्वास रखते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐसा ही संगठन है, जिसने सदैव भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और उनके एकात्म पर जोर दिया है। संघ ने सभी भारतीय भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा माना है, जो भारत की समृद्ध संस्कृति की संवाहिकाएं हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर देश की सभी भाषाओं को चिरजीवी मानते थे। आम समाज से लेकर राजकाज के व्यवहार में मातृभाषा का उपयोग होना चाहिए, इसके वे प्रबल पक्षधर थे। इस संदर्भ में वे छत्रपति शिवाजी महाराज का उदाहरण देते थे। विशेषरूप से छत्रपति शिवाजी महाराज के उदाहरण से उन लोगों को सीखना चाहिए जो आज कहते हैं कि हमारे दैनिक व्यवहार में अंग्रेजी और अन्य बाह्य भाषाओं का प्रभाव इतना अधिक बढ़ गया है कि अब उन्हें हटाना संभव नहीं है। श्रीगुरुजी कहते थे– “राज्य स्थापना के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज ने सामान्य व्यवहार में घुसे फारसी, अरबी शब्दों को निकालने का काम किया। उस समय की स्थिति का विचार करने पर दिखाई देगा कि फारसी, अरबी के बिना काम ही नहीं चलता था। छत्रपति छत्रपति शिवाजी महाराज ने मिलावट की प्रवृत्ति को दूर करने और अपनी भाषा को शुद्ध रूप में लाने का प्रयत्न किया। उनके काल का ‘राज्य व्यवहार-कोश’ प्रसिद्ध है”। हमारे सामने छत्रपति शिवाजी महाराज का उदाहरण था लेकिन इसके बाद भी स्वाधीनता के बाद हमारे सत्ताधीशों ने अंग्रेजी के सामने घुटने टेक दिए। दुनिया में कई देशों के उदाहरण हैं, जिन्होंने सत्ता के सूत्र संभालते ही अपनी भाषा में राजकाज किया। मातृभाषा के प्रति गौरव का भाव जगाते समय श्रीगुरुजी भी ऐसे देशों का उदाहरण देते थे। उनका स्पष्ट मत था कि जो देश अंग्रेजों की दासता से मुक्त हुए, उन सभी देशों ने अपने देश की भाषाओँ को ग्रहण किया। ब्रह्मदेश ने ब्रह्मी और श्रीलंका ने सिंहली को स्वीकार किया। सत्ता हाथों में आते ही उन्होंने भाषा बदल दी। दक्षिण अफ्रीका में विभिन्न 14-16 भाषाएँ हैं तथा प्रत्येक समुदाय को अपनी भाषा पर गर्व है। फिर भी सर्वसम्मति से उन्होंने ‘स्वाहिली’ भाषा को राष्ट्रीय भाषा के रूप में ग्रहण किया। उनका सब-कुछ ठीक चल रहा है। इस संबंध में इजराइल और तुर्की के उदाहरण भी प्रेरक हैं।

भारतीय भाषाओं के लेकर संघ का दृष्टिकोण बहुत व्यापक है। यही कारण है कि संघ ने समय–समय पर अपनी भाषाओं के संदर्भ में समाज और सरकार का प्रबोधन किया है। जब राजनीति स्वार्थों के चलते देश में भारतीय भाषाओं को आपस में लड़ाने–भिड़ाने का अपराध किया जा रहा था, तब संघ ने भाषाई समन्वय का आग्रह किया। संघ की सर्वोच्च ईकाइ ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ ने 1958 में ‘राष्ट्रीय भाषा–नीति’ प्रस्ताव पारित किया, जिसमें कहा गया है– “यह अत्यंत दुर्भाग्य का विषय है की राजभाषा के विवाद में पड़े कुछ लोग हटवादिता से अपना संतुलन खो बैठे हैं और राष्ट्रजीवन में विषाक्त वातावरण उत्पन्न कर रहे हैं। आज की यह स्थिति सरकार द्वारा संविधान में निर्देशित तत्वों का पालन न किए जाने से ही उत्पन्न हुई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्पष्ट मत है कि किसी भी स्वतंत्र देश का कामकाज किसी भी विदेशी भाषा में नहीं चलाया जा सकता। जब तक भारत अपने सामान्य एवं राज्य व्यवहार के लिए अंग्रेजी का उपयोग करता रहेगा वह मानसिक दासता से मुक्त नहीं हो सकता। उसके कारण शासन और जनता के बीच खाई बनी रहेगी। राष्ट्रीय जीवन का विकास भी नहीं होगा और अपनी वैशिष्ट्यपूर्ण देन को भी वह संसार को देने में असमर्थ रहेगी”। उल्लेखनीय है कि जब अन्य देश स्वतंत्रता के बाद अपनी भाषा में राजकाज चला सकते हैं, तब हमारे सामने क्या संकोच था? यदि कोई यह तर्क देता है कि भारत में अनेक भाषाएं हैं, इसके कारण यह संभव नहीं है। यदि ऐसा है तब अंग्रेजी में राजकाज कैसे चल सकता है? अंग्रेजी का विरोध क्यों नहीं? यही औपनिवेशिक मानसिक दासता की निशानी है। इससे मुक्त हुए बिना हमारा कल्याण नहीं हो सकता। बहरहाल, संघ किसी एक भाषा का पक्षधर नहीं है अपितु वह तो सभी भारतीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन की बात करता है। संघ सदैव से ही भारत की सभी भाषाओं को राष्ट्रीय मानता आया है और उसका विश्वास है कि भले ही ऊपर से कुछ भिन्नता दिखती है पर उनमें आत्म एक है और एक ही भारतीय संस्कृति के मूल्यों की प्रतिष्ठापना उनके साहित्य द्वारा हुई है। उनका प्रभाव अपने प्रदेशों से बाहर संपूर्ण भारत व्यापी रहा है। इन सभी को समान रूप से सब की जननी राष्ट्रभारती संस्कृति से पोषण मिलता रहा है। 

शासन की भाषा–नीति क्या होनी चाहिए? इस संदर्भ में संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने 1963 में एक बार फिर प्रस्ताव पारित किया। संघ ने चिंता व्यक्त की– “यह दुर्भाग्य की बात है कि हमारी स्वतंत्रता के 16 वर्ष पश्चात भी देश के प्रशासन में अंग्रेजी प्रभुत्व के स्थान पर बैठी हुई है। हमारे पास कई राष्ट्रीय भाषाएं होने के बाद भी हमारे शासन की कोई भाषा–नीति नहीं है”। वर्ष 1965 में संघ की प्रतिनिधि सभा ने ‘भाषा–नीति’ के शीर्षक से देश के समक्ष प्रस्ताव रखा कि स्वतंत्रता की यह मांग है कि “देश का प्रशासन हमारी अपनी भाषा में चलाया जाए। विदेशी भाषा राष्ट्र की प्रतिभा को अभिव्यक्त नहीं कर सकती, न ही उसके विकास में सहायक हो सकती है”। इस प्रस्ताव में संघ ने स्पष्टतौर पर दोहराया है कि भारत की सभी मातृभाषाएं राष्ट्रीय हैं, सभी को समान स्तर मिले, किसी के साथ अन्याय न हो। हिन्दी केन्द्र में और क्षेत्रीय भाषाएँ अपने-अपने प्रान्त में प्रशासनिक भाषा के रूप में प्रयुक्त हों। उनका प्रयोग तुरन्त प्रारम्भ हो। अंग्रेजी के प्रभुत्व के कारण हमारी भाषाओं के सामने कितने प्रकार के संकट खड़े हो गए हैं, इससे हम सब अवगत हैं। संघ ने कभी भी इस चिंता से मुंह नहीं मोड़ा। वर्ष 2015 एवं 2018 में भी प्रतिनिधि सभा ने ‘भारतीय भाषाओं के संरक्षण’ पर आवश्यक प्रस्ताव पारित किए। मातृभाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन के प्रभावी उपाय इन प्रस्तावों में संघ ने समाज और सरकार के सामने विचारार्थ रखे हैं। यह सुखद है कि संघ के निरंतर प्रयासों का परिणाम सबदूर दिखाई देने लगे हैं। नागरिक भी अपनी भाषाओं को लेकर सजग हुए हैं और सरकार ने भी इस दिशा में सराहनीय प्रयास किए हैं।

देश में भाषा की उलझनों पर विचार करते हुए श्री गुरूजी कहते हैं कि “मेरे विचार में आज जो उलझन निर्माण की गई है, वह केवल देश की अन्यान्य सभी भाषाओं को समान रूप से राष्ट्रीय न मानने के कारण ही है। चाहे वह तमिल हो अथवा बंगला, मराठी हो या पंजाबी सभी हमारी समान श्रद्धा की पात्र हैं। मैं तो यही चाहूँगा कि हममें से प्रत्येक को अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त देश की अन्यान्य भाषाओं में से कम से कम एक और भाषा का अध्ययन अवश्यमेव करना चाहिए”। यह अनुकरणीय विचार है। अकसर विवाद तभी होता है जब हम अपनी भाषा के सामने दूसरी भाषाओं को कमतर मानने लगते हैं। हमारे मन में यह बात एकदम स्पष्ट रहनी चाहिए कि भारत की सभी भाषाएं समान महत्व की हैं और सभी भाषाएं राष्ट्रीय स्तर की हैं। श्रीगुरुजी का मानना था कि हमारी सभी भाषाएं, चाहे वह तमिल हो या बांग्ला, मराठी हो या पंजाबी, हमारी राष्ट्रभाषाएं हैं। सभी भाषाएं और उपभाषाएं खिले हुए पुष्पों के समान हैं, जिनसे हमारी राष्ट्रीय संस्कृति की सुरभि प्रसारित होती है। इन सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत भाषाओं की रानी देववाणी संस्कृत रही है।  

वर्ष 1962 में तमिल संस्कृति के महान समर्थक तथा मदुरै से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार-पत्र के संपादक कारिमुत्तु त्यागराज चेटियर ने श्रीगुरुजी को चाय के लिए आमंत्रित किया था। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के प्रश्न को लेकर उन दिनों (सन्‌ 1962) दक्षिण भारत में बडा विवाद उठ खडा हुआ था। उन्होंने बडे साहस के साथ श्रीगुरुजी से पूछा- “हमारे देश के लिए हिन्दी को ही राष्ट्रभाषा बनाने की क्या आवश्यकता है?” इस पर श्रीगुरुजी ने कहा- “क्यों? मेरे विचार से देश की सभी भाषाएं, जिन्होंने हमारी संस्कृति के महान विचारों को प्रस्तुत किया है, शत-प्रतिशत राष्ट्रीय हैं। हमारे देश की राष्ट्रभाषा केवल हिन्दी ही नहीं है। अतः तमिल भी राष्ट्रभाषाओं में से एक है। लेकिन मुख्य बात यह है कि इतने बडे देश के लिए एक सामान्य व्यवहार की भाषा की आवश्यकता है, जो आजकल विदेशी भाषा (अंग्रेजी) का स्थान ले सके। क्या आप इस आवश्यकता का अनुभव नहीं करते?” श्रीगुरुजी के उत्तर से पूर्णतया समाधान पाकर श्री चेटियर ने साधुवाद द्वारा मुक्तकंठ से उसकी यथार्थता स्वीकार की। यदि हम आज भी इस दृष्टिकोण से विचार करें, तो भाषा का विवाद उत्पन्न नहीं होगा। यह विचार सभी भाषाई समाज के बीच जाना चाहिए। आखिर हम आपस में संवाद के लिए विदेशी भाषा पर आश्रित क्यों रहें? क्या हम अपनी ही एक भाषा को अंग्रेजी के स्थान पर संपर्क की भाषा नहीं बना सकते? 

वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत भी अकसर भारतीय भाषाओं पर संघ के दृष्टिकोण को समाज के सम्मुख रखते हुए कहते हैं– “सभी भारतीय भाषाएं हमारी भाषाएं हैं। क्षेत्रीय मुद्दों को राजनेता केवल अपना वोट-बैंक बढ़ाने के लिए भड़काते हैं”। श्रीगुरुजी की भाँति वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत भी आग्रह करते हैं कि हमें अपनी मातृभाषा के साथ–साथ भारत की कोई अन्य भाषा भी सीखनी चाहिए। कामकाज की दृष्टि से हम सब संपूर्ण भारत में प्रवास करते हैं। नौकरी के लिए अलग–अलग स्थानों पर जाकर लंबे समय तक रहते भी हैं। ऐसे में होना यह चाहिए कि हम अपनी मातृभाषा के संरक्षण के साथ–साथ अपनी वहाँ की भाषा को सीखें और बोलें। सरसंघचालक डॉ. भागवत कहते हैं– “अपनी मातृभाषा पूरी आनी चाहिए। जहाँ मैं रहता हूँ, वहाँ की भाषा आत्मसात करनी चाहिए और पूरे भारत की एक भाषा जो हम बनाएंगे। वह श्रेष्ठ है इसलिए नहीं, आज के समय में वह सर्वाधिक उपयुक्त है, इसलिए बनाएंगे। उसको भी सीखना चाहिए और फिर आपकी रुचि है और आवश्यकता है तो कोई भी विदेश की भाषा सीखिए। उसमें विदेशी लोगों से ज्यादा प्रवीण बनिए। उसमें भारत का गौरव है”।

कुल मिलाकर निष्कर्ष निकलता है कि संघ भारतीय भाषाओं के संरक्षण का पक्षधर है। वह सभी भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा मानता है। सभी भाषाओं के बीच समन्वय का आग्रह करता है। संघ का स्पष्ट मानना है कि भारत को भारत बनाने के लिए प्रशासन से लेकर आम जीवन में मातृभाषा में व्यवहार होना चाहिए। विदेशी भाषा पर आश्रित होकर हम सर्वांगीण उन्नति नहीं कर सकते। संघ का यह भी आग्रह है कि प्रत्येक भारतीय अपनी मातृभाषा में पारंगत हो, अपने निवास स्थान की प्रादेशिक भाषा को आत्मसात करे और पूरे देश को जोड़ने वाली एक संपर्क भाषा सीखे।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 22 फरवरी, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ


शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

भारत के हो, तो गाओ गर्व से ‘वंदेमातरम्’

राष्ट्रगीत को मिला उसका सम्मान, गृह मंत्रालय ने ‘वंदेमातरम्’ के सम्मान के संबंध में जारी किए दिशा-निर्देश


मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते कभी कांग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन के मंत्र और राष्ट्रीय गीत ‘वंदेमातरम’ के सम्मान के साथ समझौता कर लिया था। राष्ट्रगान को जो सम्मान दिया गया, राष्ट्रगीत को उससे वंचित कर दिया गया। संविधान के अनुच्छेद 51ए में राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करने को मौलिक कर्तव्य के रूप में रेखांकित किया गया है लेकिन इसमें राष्ट्रगीत के संबंध में कोई निर्देश नहीं मिलता है। राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 3 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रगान के गायन को रोकता है या गा रहे लोगों के बीच अशांति पैदा करता है, तो उसे 3 साल तक की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। इस अधिनियम में भी राष्ट्रगीत का अपमान करने पर सजा का कोई प्रावधान नहीं किया गया है। राष्ट्रगीत के सम्मान के प्रति यह उदासीनता क्यों रखी गई? इसका उत्तर सब जानते हैं। इसलिए सभी राष्ट्रभक्त देशवासियों के मन में कसक थी कि आखिर वह दिन कब आएगा जब हम अपने राष्ट्रगीत को वह सम्मान देंगे, जिसका वह प्रारंभ से अधिकारी है। याद रखें कि जिनके मन में भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान नहीं था, वे लोग तो पाकिस्तान चले गए थे। आज जिन्हें भारत में रहकर वंदेमातरम गाने और उसके सम्मान में खड़े होने में दिक्कत है, उन्हें अपने बारे में विचार करना चाहिए। भारत में रहना है तो फिर वंदेमातरम तो गाना पड़ेगा। मोदी सरकार को साधुवाद कि उसने राष्ट्रीय गीत को उसका खोया हुआ स्वाभिमान एवं प्रतिष्ठा लौटाई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘वंदेमातरम’ के गायन को लेकर आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करके अच्छा कदम उठाया है। इस आदेश के तहत अब जब भी राष्ट्रगीत एवं राष्ट्रगान, दोनों एक साथ बजाए जाएंगे, तो पहले ‘वंदे मातरम्’ (राष्ट्रगीत) के सभी छह छंद गाए जाएंगे और उसके बाद ‘जन-गण-मन’ (राष्ट्रगान) होगा। यह बदलाव केवल प्रक्रियात्मक नहीं है, बल्कि इसके ऐतिहासिक और संवैधानिक निहितार्थ भी हैं। हमें सदैव याद रखना चाहिए कि वंदेमातरम का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अद्वितीय स्थान रहा है। बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित इस गीत ने क्रांतिकारियों में जो ऊर्जा भरी, वह इतिहास में दर्ज है।

देखें : आरएसएस के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव हेडगेवार ने चलाया वंदेमातरम आंदोलन

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

पर्यटक की डायरी से अधिक इतिहास की याद दिलाने वाला दस्तावेज है 'हिन्दवी स्वराज्य दर्शन'

- सुमंत विद्वांस

दिसंबर में जब मैं बालाघाट में था, तब भोपाल से मेरे मित्र लोकेन्द्र जी ने बहुत स्नेहपूर्वक अपनी तीन पुस्तकें मेरे लिए उपहार में भेजी थीं। साथ ही उन्होंने यह सुझाव भी भेजा कि इन तीनों में सबसे पहले ‘हिन्दवी स्वराज्य दर्शन’ को पढ़ूँ।

आज मैंने यह पुस्तक पढ़कर पूरी की।

इसे यात्रा वर्णन कहा गया है और यह बात बिल्कुल ठीक भी है। लेकिन यह पुस्तक किसी पर्यटक की डायरी नहीं है। यह इतिहास की याद दिलाने वाला दस्तावेज भी है और अपने नाम के अनुरूप ही छत्रपति शिवाजी महाराज के स्वराज्य का ‘दर्शन’ करवाने वाली पुस्तक भी है। 

शिवाजी महाराज के जीवन और कार्य के बारे में अनेक भाषाओं में सैकड़ों पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। उनमें से अनेक पुस्तकें बहुत शोधपूर्ण एवं गहन हैं। ऐसे में अगर आप सोचें कि इस पुस्तक को क्यों पढ़ा जाए, तो मैं कहूँगा कि यदि आपको सरल शब्दों में शिवाजी महाराज के कुछ महत्वपूर्ण किलों की प्राथमिक जानकारी पानी हो, तो यह पुस्तक आपके लिए बहुत काम की है। इसमें आपको सिंहगढ़ और रायगढ़ जैसे प्रसिद्ध किलों की जानकारी तो मिलेगी ही, पर साथ ही खान्देरी और कोलाबा जैसे जलदुर्गों व पुरंदर व मल्हारगढ़ जैसे किलों के बारे में भी पता चलेगा। इसके अलावा इसमें पुणे के शनिवारवाड़ा, लाल महल और पाचाड में जीजाबाई के समाधि-स्थल का भी परिचय मिल जाएगा।

मैं लगभग 15 वर्षों तक नासिक और पुणे में रहा हूँ, और उनमें से भी सात वर्ष पुणे शहर में ही रहा हूँ, इसलिए इनमें से कई स्थानों पर मैं जा चुका हूँ। इस पुस्तक को पढ़ते समय अनायास ही मेरी भी कई पुरानी यादें ताजा हो गईं और बहुत-सी नई जानकारी भी मिल गई।

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

समाज परिवर्तन का केंद्र बनी शाखाएं

संघ शताब्दी वर्ष : जहाँ संघ की शाखा लगती है, वहाँ समाज में सकारात्मक परिवर्तन दिखायी देते हैं


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा केवल खेलने-कूदने और योगाभ्यास का स्थान नहीं है। किसी शाखा में भले ही 100 स्वयंसेवक नित्य आते होंगे, लेकिन अच्छी शाखा उसे ही माना जाता है, जिसके कारण से शाखा क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव आए हों। हिन्दू समाज में जागृति आई हो। समाज अपनी चुनौतियों का समाधान करने में स्वयं सक्षम हो गया हो। शाखा की सफलता इसी में है कि वह समाज परिवर्तन का केंद्र बने। इसलिए संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता कहते हैं कि जिन क्षेत्रों में संघ की अच्छी शाखा चलती है, वहाँ की अनेक समस्याओं का समाधान स्वयं ही हो जाता है। शाखा आने वाले स्वयंसेवक अपने क्षेत्र की समस्याओं को चिह्नित करते हैं और समाज की सज्जनशक्ति को साथ लेकर उसका समाधान निकालने का प्रयास करते हैं। संघ शाखा की सफलता की अनेक कहानियां हैं। यहाँ हम मध्यभारत की कुछ शाखाओं का उल्लेख कर रहे हैं, जिन्होंने समाज परिवर्तन के अनुकरणीय उदाहरण समाज के सामने प्रस्तुत किए हैं।

भोपाल में शाखाओं के माध्यम से पर्यावरण, शिक्षा एवं सेवा के कई प्रकल्प चलाए जाते हैं। ऐसा ही एक प्रकल्प है- एम्स में संचालित ‘सार्थक सेवा केंद्र’। विद्युत भाग की ‘वीर मंगल पांडेय शाखा’ के स्वयंसेवकों ने अनुभव किया कि एम्स में दूर-दूर से मरीजों का आना होता है लेकिन यहाँ परिजनों के लिए रात्रि विश्राम की व्यवस्था नहीं है। इस कारण मरीजों के साथ उनके परिजनों को भी असुविधा होती थी। उन्हें मजबूरी में पार्क के किनारे बैठकर रात गुजारनी पड़ती थी। यह सब देखकर शाखा टोली की बैठक में निर्णय लिया गया कि एम्स में एक सहायता केंद्र प्रारंभ किया जाए। कुछ स्वयंसेवक चिन्हित किए गए और 13 मई 2022 से यहाँ ‘सार्थक सेवा केंद्र’ शुरू कर दिया गया। 10 से 12 स्वयंसेवकों ने दो पालियों में यानी सुबह 8 बजे से 11 बजे तक और उसके बाद 11 से 2 बजे तक समय देने कि योजना बनाई। आज यह प्रकल्प रैन बसेरा, व्हीलचेयर एवं स्ट्रेचर, रक्तदान और एम्बुलेंस की सुविधाएं उपलब्ध कराता है। वहीं, बुधनी के सिविल अस्पताल में भेरुंदा नगर की ‘बजरंग शाखा’ गरम पानी एवं रोगी सहायता केंद्र का संचालन करती है। अस्पताल में आए दिन मरीजों को गर्म पानी, दूध एवं अन्य चीजों के लिए परेशान होना पड़ता था। इसी प्रकार का प्रकल्प ग्वालियर के कमलाराजा अस्पताल में भी चलाया जाता है। यहीं, जयारोग्य चिकित्सालय में सर्दी के समय मरीज के परिजनों को ठंड से बचाने के लिए ‘कंबल केंद्र’ का संचालन किया जाता है।

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

स्वातंत्र्यवीर सावरकर हैं 'भारत रत्न'

इतिहास के पृष्ठों पर कुछ ऐसे व्यक्तित्वों की अमर कहानियां दर्ज हैं, जिनका कद किसी पुरस्कार या सम्मान से कहीं अधिक बड़ा होता है। स्वातंत्र्यवीर सावरकर ऐसा ही एक नाम है, जिन्होंने अपना सर्वस्व भारत माता की सेवा में समर्पित कर दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने बीते दिन मुंबई में जो बात कही, वह न केवल वीर सावरकर के प्रति श्रद्धा रखनेवाले बंधुओं की भावनाओं का प्रतिबिंब है, बल्कि राष्ट्र के उस उत्तरदायित्व की ओर भी संकेत है जिसे पूरा किया जाना बाकी है। उनका यह कथन कि "वीर सावरकर को भारत रत्न दिया जाता है, तो यह सम्मान खुद इस पुरस्कार की गरिमा को बढ़ाएगा," भारत के नायकों के प्रति अपनी कृतज्ञता का स्मरण कराता है। वीर सावरकर का गौरवपूर्ण स्मरण करने में किंचित भी संकोच नहीं होना चाहिए। वीर सावरकर और उनके परिवार ने भारत की स्वतंत्रता और समाज सेवा के लिए जिस प्रकार का बलिदान दिया, उसकी किसी के साथ तुलना नहीं की जा सकती। यही कारण है कि कुछ कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों के दुष्प्रचार के बावजूद राष्ट्रभक्त नागरिकों के हृदय में वीर सावरकर के प्रति अथाह श्रद्धा है। इसलिए देश को बेसब्री से प्रतीक्षा है कि वीर सावरकर को यथाशीघ्र भारत रत्न से सम्मानित किया जाए। करोड़ों लोगों की इसी आकांक्षा को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्वर दिया है।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

‘जलकुंभी से भरी नदी में’ संवेदनाओं और सरोकारों का बोध

देखें वीडियो ब्लॉग : युवा कवि पुरु शर्मा के काव्य संग्रह की चर्चा

हिन्दी साहित्य के विस्तृत आकाश में जब कोई युवा हस्ताक्षर अपनी पहली कृति के साथ उपस्थित होता है, तो उससे कई उम्मीदें जुड़ जाती हैं। अशोकनगर, मध्यप्रदेश के युवा कवि पुरु शर्मा का पहला काव्य संग्रह ‘जलकुंभी से भरी नदी में’ उन उम्मीदों पर न केवल खरा उतरता है, बल्कि भविष्य के प्रति आश्वस्त भी करता है। यह संग्रह एक ऐसे युवा मन का दर्पण है जो अपने अध्ययन और समाज के प्रति गहरी संवेदनशीलता के धागों से बुना गया है। पुरु की कविताओं में कोमलता का अहसास है। अपने समय की पीढ़ी से जनसरोकारों पर सीधा संवाद है। पर्यावरण संरक्षण की चिंता उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। अपनी विरासत को लेकर गौरव की अनुभूति है। अपनी कविता के माध्यम से पुरु साहित्य के धुंरधरों से साहित्य के धर्म की बात करते हैं। कहना होगा कि पुरु शर्मा की कविताएँ केवल व्यक्तिगत अनुभूतियों का बयान नहीं हैं, बल्कि वे अपने समय, समाज, संस्कृति और पर्यावरण के प्रति एक सजग नागरिक की चिंताएँ हैं। संग्रह के शीर्षक से ही पर्यावरण के प्रति कवि का गहरा सरोकार स्पष्ट होता है। एक युवा कवि का अपने देश और संस्कृति के प्रति ऐसा अनुराग देखकर सुखद आश्चर्य होता है।

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

शाखा में नित्य आने से होता है समग्र व्यक्तित्व विकास

संस्कार केंद्र है संघ शाखा : खेल-खेल में स्वयंसेवक सीख जाते हैं प्रबंधन के सूत्र, संगठन शास्त्र, परोपकार, सेवाभाव, पारिवारिक आत्मीयता, सामुहिकता और समन्वय जैसे गुण


संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने व्यक्ति निर्माण के लिए शाखा के रूप में अनूठी कार्यपद्धति दी है। शाखा की सामान्य-सी दिखनेवाली गतिविधियों में वह जादू है कि नित्य शाखा आने वाले स्वयंसेवकों के व्यक्तित्व में व्यापक परिवर्तन आता है। स्वयंसेवक का समग्र व्यक्तित्व विकास होता है। शाखा के संस्कार से स्वयंसेवकों के मन में पारिवारिक आत्मीयता, सामाजिक उत्तरदायित्व, परोपकार, देशभक्ति, संवेदनशीलता, साहस, सेवा और प्रबंधन जैसे अनेक गुण विकसित होते हैं। संघ विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी अपनी पुस्तक ‘कार्यकर्ता’ में लिखते हैं- “संघशाखा पर प्रतिदिन एकत्रीकरण, यह अपनी कार्यपद्धति के संगठनसूत्र का बुनियादी पहलू है। उसमें से ही, आनेवाले स्वयंसेवकों के मन में एक पारिवारिक आत्मीयता का भाव विकसित होता है। इस पारिवारिकता के कारण ही एकसाथ काम करने की उमंग मन में पैदा होती है। सामूहिक कार्यक्रमों के माध्यम से ही सामूहिक मानसिकता का निर्माण होता है, इस मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त के प्रकाश में सामूहिक कार्यक्रम हम करते हैं। संघशाखा यह एक संस्कार केंद्र है”। 

सामान्यतौर पर संघ की शाखा 60 मिनट की रहती है। यह 60 मिनट स्वयंसेवक एक अनुशासित व्यवस्था में व्यतीत करते हैं। शाखा पर होने वाले सभी शारीरिक एवं बौद्धिक कार्यक्रमों का पूर्व नियोजन होता है। प्रत्येक कार्यक्रम के लिए कालखंड विभाजित हैं। ऐसा नहीं होता कि स्वयंसेवकों को खेलने में आनंद आ रहा है, तो उस दिन शाखा पर केवल खेल ही होंगे। सामान्यतौर पर 40 मिनट शारीरिक, 10 मिनट बौद्धिक और शेष 10 मिनट शाखा लगाने एवं विकिर (शाखा छोड़ने) के लिए तय रहते हैं। सबसे पहले स्वयंसेवक संघस्थान पर एकत्र होते हैं। उसके पश्चात आचार पद्धति से शाखा लगाने का कार्य मुख्य शिक्षक सम्पन्न करता है। पहले स्वयंसेवक गुरु ‘भगवा ध्वज’ को प्रणाम करते हैं, उसके बाद ही शाखा में शारीरिक और बौद्धिक कार्यक्रमों की रचना होती है। प्रारंभ में शाखा पर उपस्थित स्वयंसेवकों की उम्र को ध्यान में रखकर व्यायाम, सूर्यनमस्कार, योग एवं आसान कराए जाते हैं। उसके बाद, लगभग 15 मिनट विभिन्न प्रकार के खेल खिलाए जाते हैं। शारीरिक कार्यक्रमों में समता, दंड संचालन, नियुद्ध इत्यादि भी शामिल रहते हैं। उसके बाद 10 मिनट बौद्धिक कार्यक्रम (गीत, सुभाषित, अमृतवचन, समाचार समीक्षा इत्यादि) सम्पन्न कराए जाते हैं। सबसे अंत में, सभी स्वयंसेवक प्रार्थना करते हैं और ‘भारत माता की जय’ बोलते हुए अप्रत्यक्ष रूप से बहुत सारे गुणों को अपने साथ लेकर समाज में जाते हैं।