मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

आरएसएस में विजयादशमी पर्व : शक्ति, संस्कार और संगठन का महापर्व

संघ शताब्दी वर्ष 

"श्रद्धा, आशा और उत्साह से भरा संगठित बल यदि देश में निर्माण कर सकें, तो सारे संकटों को हँसते-खेलते ठुकरा सकेंगे। यही विजयादशमी का संदेश है"। – श्री गुरुजी


भारतीय संस्कृति में विजयादशमी केवल बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक भर नहीं है, बल्कि यह आत्मविस्मृति से आत्मबोध, बलोपासना और राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण का पावन पर्व है। यह पर्व ‘विजिगीषु वृत्ति’ अर्थात् जीतने की आकांक्षा के भाव को प्रबल करता है। यही कारण है कि स्वतंत्रतासेनानी डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने हिंदू समाज को संगठित करने, उसके भीतर विजिगीषु वृत्ति और आत्मबोध का भाव जागृत करने के उद्देश्य से जिस संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की संकल्पना को देश के सामने रखा, उसको प्रारंभ करने के लिए विजयादशमी के पावन अवसर को चुना। इसलिए संघ में विजयादशमी पर्व का विशेष महत्व है। हालांकि, संघ ने विजयादशमी उत्सव को छह उत्सवों में केवल इसलिए शामिल नहीं किया है कि यह उसका स्थापना दिवस है। दरअसल, विजयादशमी का पर्व समाज को सब प्रकार से सबल होने की प्रेरणा देता है। जिस दौर में डॉ. हेडगेवार के मन में भारत की अक्षुण्ण स्वतंत्रता का स्वप्न पल रहा था, उस समय हिंदू समाज आत्मदैन्य की अवस्था में था। हिन्दुओं को आत्मदैन्य की अवस्था से बाहर निकालकर विजिगीषु वृत्ति के समाज में परिवर्तित करने के लिए आवश्यक था कि भारत के लोगों तक विजयादशमी का संदेश वास्तविक अर्थों में पहुँचे। विजय की आकांक्षा रखने वाला और संगठित हिंदू समाज ही देश की सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान कर सकता है।

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विजयादशमी भारतीय इतिहास की उस परंपरा को संजोए हुए है जहाँ सज्जन-शक्ति ने दुर्जन-शक्ति पर विजय पाई। जब रावण के अत्याचारों और अनैतिक शासन से संपूर्ण जगत त्रस्त था, तब भगवान श्रीराम ने समाज के सामान्य लोगों को संगठित कर उस महाबलशाली राक्षसराज का अंत किया। जरा सोचिए संगठन में कितनी शक्ति है? कल तक जो समाज रावण के आतंक से भयाक्रांत था, जिसके पास रावण के अन्याय से बचने का कोई मार्ग नहीं था, संगठित होकर उसी समाज ने सब प्रश्नों का समाधान कर दिया। यह प्रसंग सिखाता है कि बड़े-बड़े भौतिक संसाधनों से संपन्न शत्रु को भी निष्ठा और संगठित बल से परास्त किया जा सकता है। विजयादशमी पर हम महाभारत के एक प्रसंग को भी याद करते हैं। अज्ञातवास के समय पांडवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र शमी वृक्ष के कोटर में सुरक्षित रख दिए थे। अज्ञातवास पूर्ण होने पर अर्जुन ने उन्हीं शस्त्रों को निकाल कर विधिवत पूजन किया और विराट नगर पर आक्रमण करने वाली कौरव सेना को पराजित किया। तभी से विजयादशमी पर शस्त्र-पूजन की परंपरा चली आ रही है। विजयादशमी शक्ति की अभिव्यक्ति का भी पर्व है। विजयादशमी से पूर्व हम विजय की कामना के साथ नौ दिन तक भगवती की उपासना करके शक्ति का संचयन करते हैं। हम स्मरण करते हैं कि शक्ति स्वरूपा देवी ने महिषासुर का संहार करके सृष्टि का कल्याण किया था। इसी दिन राजा रघु और कौत्स ऋषि के प्रसंग की स्मृति में शमी पत्रों को ‘सोना’ मानकर परस्पर बांटने और सामाजिक सौहार्द एवं आत्मीयता को सुदृढ़ करने की परंपरा रही है। 

संगठित शक्ति का संदेश :

द्वितीय सरसंघचालक श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ के अनुसार, विजयादशमी का मूल मर्म संगठित शक्ति में निहित है। उनका मानना था कि रावण नवग्रहों, राजा-महाराजाओं और देवताओं तक को भयभीत करने वाला महापराक्रमी था। उसके पास उस काल की सभी संहारक भौतिक शक्तियाँ थीं। परंतु भगवान श्रीराम ने उन वनवासियों को, जिनके पास वृक्ष और पत्थरों के अतिरिक्त कोई साधन नहीं था, एक सूत्र में पिरोया और एक ऐसी अजेय संगठित शक्ति खड़ी की जिसके आगे रावण का अहंकार टिक न सका। श्रीगुरुजी का स्पष्ट मत था कि यदि समाज में श्रद्धा, आशा और उत्साह से भरा संगठित बल निर्माण हो जाए, तो देश हर आंतरिक और बाह्य संकट को हँसते-खेलते पार कर सकता है। उन्होंने विजयादशमी को आत्मविस्मृत और पराभूत हिंदू राष्ट्र में पुनः चैतन्य और बलोपासना की आकांक्षा जगाने का परंपरा-सम्मत साधन माना। 

जब हेडगेवार ने समझाया सीमोल्लंघन का अर्थ :

विजयादशमी पर्व पराक्रम का संदेश भी देता है। यह पर्व सिखाता है कि अपनी सीमाओं का विस्तार करके हम अच्छे कार्यों को सर्वत्र पहुँचाएं। प्राचीन काल में राजा और वीर योद्धा इस दिन विजय-अभियान के लिए ‘सीमोल्लंघन’ करते थे। डॉ. हेडगेवार की दृष्टि में सीमोल्लंघन का अर्थ केवल राज्य की सीमाओं का विस्तार नहीं था। मध्यप्रदेश के रामपायली में वर्ष 1908 में आयोजित विजयादशमी के उत्सव में शामिल होकर युवा हेडगेवार ने बहुचर्चित भाषण दिया था, जिसके लिए उन पर अंग्रेजों ने मुकदमा भी चलाया था। सीमोल्लंघन का देश–काल–परिस्थिति के अनुरूप अर्थ समझाते हुए उन्होंने भाषण दिया कि “अंग्रेजों को सात समुद्र पार भेज देना ही सीमोल्लंघन का वास्तविक अर्थ होगा। रावण-वध का आज तात्पर्य अंग्रेजी राज का अंत करना है”।

अनुशासन की शक्ति और पथ-संचलन की परंपरा : 

लेखक ना.ह. पालकर के अनुसार, प्रत्येक वर्ष विजयादशमी पर संघ ने अपनी कार्य-परिधि का विस्तार करके ‘सीमोल्लंघन’ का प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत किया। नागपुर में जब डॉ. हेडगेवार ने पथ-संचलन और घोष विभाग (बैंड) की योजना बनाई, तब लगभग पाँच-छह सौ स्वयंसेवक अनुशासित रूप से संचलन कर रहे थे। उस अवसर पर स्वतंत्रता सेनानी श्री विट्ठलभाई पटेल नागपुर आए और डॉक्टर जी के निमंत्रण पर मोहिते संघस्थान पहुँचे। स्वयंसेवकों के अनुशासन को देखकर वे अत्यंत प्रभावित हुए। तब विट्ठलभाई पटेल ने स्वयंसेवकों को पाथेय देते हुए कहा था कि यह कार्य उनके लिए नवीन है, लेकिन इसने उनके विचारों को नई दिशा दी है। जगत् में ईश्वर को छोड़कर किसी से डरो मत तथा अपने कार्य पर अविचल निष्ठा रखकर तीव्र गति से कार्य का विस्तार करो। 

राष्ट्रहित में समर्पित होने का आह्वान :

आज जब समाज जाति-भेद, क्षेत्रीयता, स्वार्थ, भ्रष्टाचार और धर्मांतरण जैसी विसंगतियों से जूझ रहा है और सीमा पार से अनेक चुनौतियाँ मुँह बाए खड़ी हैं, तब विजयादशमी का यह पर्व समाज के क्षात्रतेज और सुप्त चेतना को जगाने का माध्यम बनता है। विजयादशमी पर स्वयंसेवकों द्वारा किया जाने वाला पूर्ण गणवेश में पथ-संचलन और शस्त्र-पूजन वास्तव में समाज की सज्जन-शक्ति को संगठित और निर्भय होकर राष्ट्रहित में समर्पित होने का प्रत्यक्ष आह्वान है।

स्वदेश ज्योति में प्रकाशित साप्ताहिक कॉलम 'साधना के 100 वर्ष' में 18 अक्टूबर, 2026 को प्रकाशित लेख

रविवार, 18 अक्टूबर 2026

सुदर्शन जी का सहज और निश्छल अपनत्व

संघ शताब्दी वर्ष : साधारण स्वयंसेवक के सुख-दु:ख में सहभागी होने को लेकर बहुत आग्रही थे सुदर्शन जी, स्वयं बनते थे उदाहरण


जब आरएसएस के सरसंघचालक सुदर्शन जी स्वयंसेवक के घर विवाह में झाड़ू लगाने लगे (एआई से निर्मित चित्र)

किसी भी व्यक्ति के महान व्यक्तित्व की असली पहचान उसके पद या प्रभाव से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक कुप्प. सी. सुदर्शन जी का जीवन इसी आत्मीयता, संवेदनशीलता और विनम्रता का जीवंत उदाहरण था। उनके जीवन के अनेक संस्मरण हैं, जो उनके सहज, निश्छल और अपनत्व से भरे व्यक्तित्व का दर्शन कराते हैं। एक अच्छा कार्यकर्ता कैसा होता है, उनके जीवन के प्रेरक प्रसंगों से सीखा जा सकता है। उन्होंने संघ के विचार को अपने आचरण से समाज तक पहुँचाया। विश्व के सबसे बड़े संगठन का सबसे बड़ा अधिकारी कितना सहज और सरल हो सकता है, इसकी बड़ी लकीर सुदर्शन जी खींचकर गए हैं।  

सुदर्शन जी के लिए ‘स्वयंसेवक’ केवल संगठन का कार्यकर्ता नहीं, बल्कि परिवार का अभिन्न अंग था। भोपाल के वरिष्ठ कार्यकर्ता हेमंत मुक्तिबोध अपने संस्मरण में लिखते हैं कि समिधा कार्यालय में खाना बनाने वाले एक युवक की मां बीमार हो गईं तो उनसे मिलने वे रायसेन जिले के दूरस्थ ग्राम में उनके घर जा पहुंचे। शल्य चिकित्सा के लिए उन्हें भोपाल लेकर आए और जयप्रकाश अस्पताल में भर्ती करवाया तथा रोज उन्हें देखने जाते। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद चिकित्सकीय देखरेख के लिए सुदर्शन जी ने उन्हें भोपाल में रोक लिया और पूरे परिवार के एक सप्ताह तक ठहरने की व्यवस्था की। एक सामान्य कार्यकर्ता के लिए यह कितनी बड़ी बात है कि वह जिस संगठन के लिए कार्य करता है, वहाँ सर्वोच्च अधिकारी दु:ख के क्षण में केवल साथ नहीं खड़े हैं अपितु परिवार के सदस्य की भाँति अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं। एक और घटना उल्लेखनीय है, जो उनकी संवेदनशीलता और अपनत्व की भावना का मूर्तरूप है। भोपाल की एक शाखा में जब एक शिशु स्वयंसेवक के हाथ में चोट लगी तो वे 15 मिनट तक उसकी मालिश करते रहे थे। हेमंत मुक्तिबोध लिखते हैं कि “खेलते-खेलते कोई शिशु या बाल स्वयंसेवक घायल हो जाए तो उसकी वे ऐसी चिंता करते जो शायद उसके परिजन भी न करते होंगे”।

शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

हिन्दू धर्म छोड़ने पर नहीं मिलेगा आरक्षण का लाभ

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कन्वर्जन के बाद आरक्षण के लाभ पर रोक लगाने का ऐतिहासिक निर्णय भारतीय संविधान की मूल भावना और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों की रक्षा करने वाला एक अत्यंत आवश्यक कदम है। मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखते हुए और तमिलनाडु सरकार की याचिका को खारिज कर शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि अनुसूचित जाति या अन्य पिछड़ा वर्ग का कोई व्यक्ति अपना मूल धर्म छोड़कर इस्लाम या ईसाई मत अपना लेता है, तो वह अपने पुराने सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर संविधान के अनुच्छेद-16(4) के तहत आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। न्यायालय की यह टिप्पणी पूरी तरह से तार्किक और वस्तुनिष्ठ है कि कन्वर्जन से पहले की जाति या सामुदायिक पहचान को स्वतः किसी दूसरे धर्म के पिछड़े वर्ग में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अतिरिक्त अन्य पंथों में सैद्धांतिक रूप से जाति व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया जाता। ऐसे में, जो संगठन जातिविहीन समाज का दावा कर निर्धन और अशिक्षित लोगों को कन्वर्ट होने का प्रलोभन देते हैं, उनके द्वारा कन्वर्जन के बाद भी जातिगत आरक्षण की मांग करना उनके अपने ही दावों के विरोधाभासी है।

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

संघ को समझने का प्रयास है पुस्तक - आरएसएस @100

संघ शताब्दी वर्ष : प्रो. संजय द्विवेदी और डॉ. लोकेंद्र सिंह की यह पुस्तक संघ के विचार एवं दर्शन को समग्रता से प्रस्तुत करती है


- सुदर्शन व्यास (पत्रकार एवं शोधार्थी)

किसी संगठन की सौ वर्ष की यात्रा को समझना केवल उसके इतिहास के पन्ने पलटना नहीं होता। उसके विचार, कार्यपद्धति, सामाजिक सरोकार और समय के साथ बदलती चुनौतियों को भी देखना पड़ता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी के अवसर पर प्रकाशित ‘आरएसएस@100’ इसी दृष्टि से एक महत्वपूर्ण पुस्तक के रूप में सामने आती है। प्रो. संजय द्विवेदी और डॉ. लोकेंद्र सिंह के संपादन में शिल्पायन पब्लिशर्स, दिल्ली से प्रकाशित इस पुस्तक में 35 लेखकों और विचारकों के आलेख शामिल हैं। इन आलेखों के माध्यम से संघ के विचार और कार्य को अलग-अलग दृष्टियों से समझने का प्रयास किया गया है।

आरएसएस@100 पुस्तक की विशेषता केवल इसमें शामिल लेखों की संख्या नहीं, बल्कि विषय और दृष्टिकोण की विविधता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सामान्यतः एक संगठन के रूप में देखा जाता है, लेकिन उसके लगभग सौ वर्ष के विस्तार को समझने के लिए उसके पीछे की वैचारिक दृष्टि और सामाजिक कार्यपद्धति को समझना भी आवश्यक है। पुस्तक के विभिन्न आलेख इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य को सामने लाते हैं। कहीं संघ के विचार का पक्ष दिखाई देता है, कहीं उसके सामाजिक कार्य का विस्तार, तो कहीं उसके साथ जुड़े अनुभवों और विमर्शों की झलक मिलती है।

संघ की यात्रा को समझने में ‘राष्ट्र’ और ‘समाज’ की उसकी अवधारणा केंद्रीय रही है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सामाजिक समरसता संघ के सार्वजनिक विमर्श में लगातार प्रमुख विषय रहे हैं। शताब्दी वर्ष में भी संघ ने सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी और नागरिक कर्तव्य जैसे विषयों पर विशेष जोर दिया है। ऐसे समय में आरएसएस@100 का महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि यह इन व्यापक अवधारणाओं को एक ही आलेख के बजाय अनेक लेखकों की दृष्टि से देखने का अवसर देती है।

रविवार, 4 अक्टूबर 2026

अदम्य साहस की सराहना और चयनित चुप्पी से संदेश

संकट के क्षण व्यक्ति के वास्तविक चरित्र, उसके संस्कारों और उसकी आंतरिक शक्ति की परीक्षा लेते हैं। आसमान में हजारों फीट की ऊंचाई पर, जब मौत सामने खड़ी थी और चारों तरफ हिंसा का तांडव था, तब भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छर ने जिस अप्रतिम वीरता, सूझबूझ और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया, वह केवल एक विमान चालक का पराक्रम नहीं, बल्कि भारतीय चेतना और जीवन-मूल्यों का साक्षात प्रकटीकरण है। कॉकपिट में गंभीर रूप से घायल और लहूलुहान होने के बावजूद अपने प्राणों की बाजी लगाकर यात्रियों की रक्षा करना उस मानवीय गरिमा की मिसाल है, जिसे दुनिया प्रणाम कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैप्टन स्मित मच्छर के साहस की सराहना की है। उन्होंने कैप्टन से बात भी की। प्रधानमंत्री मोदी को अपना प्रेरणास्रोत बताते हुए गंभीर चोटों और जीवन-मृत्यु के संघर्ष के बीच जब स्मित ने कहा कि उस भयावह क्षण में वे केवल ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ कर रहे थे और उसी आध्यात्मिक ऊर्जा ने उन्हें उठने और कॉकपिट का दरवाजा खोलकर स्थिति को संभालने की प्रेरणा दी, तो यह स्पष्ट हो गया कि आस्था जब आत्मबल बनती है, तो मृत्यु का भय भी परास्त हो जाता है। प्रधानमंत्री ने बिल्कुल सटीक कहा कि स्मित के परिवार ने उन्हें साक्षात गीता के निष्काम कर्म और शौर्य के संस्कार दिए हैं। यह अंतर ही भारत की आत्मा को परिभाषित करता है कि हम जान लेने वाले नहीं, अपनी जान दांव पर लगाकर दूसरों की जान बचाने वाले लोग हैं। कैप्टन स्मित की बहादुरी ने भारतीयों का मान दुनिया में बढ़ा दिया है। भारतीय मूल के नागरिकों को देखकर लोग उनके सम्मान में तालियां बजा रहे हैं, खड़े होकर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रहे हैं। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी हमारे बहादुर वीर से बात की और उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की है। यहूदी समुदाय की इस बात के लिए प्रशंसा करनी चाहिए कि वह उन लोगों को कभी नहीं भूलता, जिन्होंने उनकी सहायता की हो। यहूदी आज भी हाइफा युद्ध-1918 में भारत के योद्धाओं के बलिदान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं क्योंकि भारतीय योद्धाओं ने इजराइल की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

बहरहाल, विमान हाईजैक करके इजराइल पर आतंकी हमले की साजिश ने अमेरिका में हुए 9/11 के आतंकी हमले की यादें ताजा कर दी हैं। कह सकते हैं कि एक बार फिर आतंक और कट्टरता की निकृष्ट मानसिकता बेनकाब होकर सबके सामने है।

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

हजार स्वर्ण मंदिरों का शहर है कांचीपुरम

देखें : इस वीडियो ब्लॉग में करें कांचीपुरम के चार प्रमुख मंदिरों के दर्शन


हिन्दू आस्था का प्रमुख केंद्र है तमिलनाडु का कांचीपुरम। हिन्दू वाङ्ग्मय में मोक्षदायिनी सप्तपुरियों का वर्णन आता है, उनमें कांचीपुरम भी शामिल है। अर्थात् कांची मोक्ष की भूमि है। ज्ञान-वैराग्य की भूमि है। संभवत: यही कारण है कि कांची को दक्षिण भारत की काशी भी कहते हैं। यह सप्तपुरियां भगवान शिव और विष्णु में बराबर-बराबर बंटी हैं। सप्तपुरियों को आधा-आधा कैसे बाँटें, तब इसका रास्ता निकाला गया कि कांची नगरी आधी विष्णु को और आधी शिव को समर्पित कर दी जाए। इस प्रकार कांचीपुरम के दो भाग हैं-  शिवकांची तथा विष्णुकांची। कांचीपुरम प्राचीन मंदिरों का शहर है। एक-दो नहीं अपितु यहाँ अनेक मंदिर हैं, जिनका द्रविण शैली का स्थापत्य देखते ही बनता है। कांचीपुरम को ‘हजार मंदिरों का शहर’ या ‘हजार मंदिरों का स्वर्ण नगर’ और ‘द गोल्डन सिटी ऑफ़ 1000 टेंपल’ भी कहा जाता है। यहाँ आज भी लगभग 126 भव्य-दिव्य मंदिरों के दर्शन किए जा सकते हैं। अपनी कांचीपुरम की यात्रा में हमने यहाँ के चार प्रमुख मंदिरों के दर्शन किए- कामाक्षी अम्मन मंदिर, एकाम्बरेश्वर मंदिर, वरदराज पेरुमल मंदिर और उलगलंथा पेरुमल मंदिर। चेन्नई के दक्षिण-पश्चिम में पलार नदी के किनारे स्थित कांचीपुरम अपने रेशम के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसे ‘कांजीवरम’ कहा जाता है। यहाँ आसपास के गाँवों में आज भी घर-घर में हथकरघे लगे हैं, जहाँ स्त्री के सौंदर्य को कई गुना बढ़ाने वाली रेशम की साड़ियाँ बुनी जाती हैं। कभी चोल, पल्लव और विजयनगर साम्राज्य की राजधानी रहे कांचीपुरम की ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक विरासत के साथ हमने तीन दिन गुजारे। श्रीकांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य श्री विजेंद्र सरस्वती कहते हैं कि कांचीपुरम में दो-तीन दिन रहने से पुण्य प्राप्त होता है। पुण्य के साथ हमने अविस्मरणीय आनंद भी प्राप्त किया।

शनिवार, 26 सितंबर 2026

“मैं अंग्रेजों की नौकरी नहीं करूंगा”

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक रज्जू भैया पढ़ने में बहुत मेधावी थे, स्कूल के दिनों में ही उन्होंने भांप लिया था कि ब्रिटिश राज भारत के लिए अच्छा नहीं है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चौथे सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ का संपूर्ण जीवन प्रखर मेधा, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति का अप्रतिम उदाहरण है। बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी रज्जू भैया ने उस दौर में ब्रिटिश शासन के वैभवशाली पदों को ठुकरा दिया था, जब लोग सरकारी नौकरियों के लिए लालायित रहते थे। उन्हें स्कूल के दिनों से ही यह अनुभव होने लगा था कि ब्रिटिश राज भारत के लिए अच्छा नहीं है। अंग्रेजों से मुक्ति पाने के लिए देश में स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा है। रज्जू भैया एक घटना को याद करते हैं– “मेरठ में नौचंदी का प्रसिद्ध मेला लगता था, यदा-कदा हम लोग भी उसे देखने जाते थे। भगतसिंह और उनके दो साथी राजगुरु और सुखदेव को मृत्युदंड दिया गया था। एक दुकानदार ने उस मेले में अपनी दुकान पर उस दृश्य का एक छोटा चित्र लगा रखा था, जो मेले में आए दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया था। अगले दिन ही पुलिस ने उस चित्र को हटा दिया और हमें यह पता लगा कि उस दुकानदार को गिरफ्तार कर लिया गया है। हम उस घटना को पूरी तरह समझ पाने में सक्षम नहीं थे, किंतु अंग्रेजों के प्रति हमारे मन में रोष अवश्य उत्पन्न हुआ और हमने ‘टोडी बच्चा हाय हाय’ के नारे का भरपूर समर्थन किया।” इसी विचार के कारण उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि ब्रिटिश शासन के अधीन नौकरी नहीं करूंगा।