मंगलवार, 23 अक्तूबर 2018

अब प्रयाग 'राज'


- लोकेन्द्र सिंह 
भारतीयता को स्थापित करने के मामले में उत्तरप्रदेश सरकार के प्रयास सराहनीय हैं। गत वर्ष से अयोध्या में दीपावली मनाने की शुरुआत कर उत्तरप्रदेश की योगी सरकार ने इस दिशा में बड़ी पहल प्रारंभ की थी। अब ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के शहर को उसका वास्तविक एवं गौरवशाली नाम 'प्रयागराज' लौटा कर अनुकरणीय कार्य किया है। भले ही एक समय में राजनीतिक और सांप्रदायिक ताकत ने प्रयागराज का नाम बदल कर इलाहाबाद कर दिया हो, लेकिन जनमानस के अंतर्मन में वह प्रयागराज ही रहा। इसलिए जब हम तर्पण करने के लिए इलाहाबाद जाते हैं, तो यह कभी नहीं करते कि इलाहाबाद जा रहे हैं, मुंह से हमेशा यही निकला- 'तर्पण के लिए प्रयाग जा रहे हैं।' भारतीय ज्ञान-परंपरा और अध्यात्म का सबसे बड़ा मानव संगम 'कुंभ' जिन चार शहरों में आयोजित होता है, उनके नाम हैं- हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक। भले ही सन् 1583 में अकबर ने सरकारी दस्तावेज से प्रयागराज को मिटाकर उसकी जगह इलाहाबाद नाम लिख दिया हो, लेकिन इससे भारतीय मानस में अंकित 'प्रयागराज' कभी नहीं मिटा। वह अब तक अमिट रहा। कुंभ का आयोजन बाहरी तौर पर इलाहाबाद में होता रहा, लेकिन उसकी सांस्कृतिक भूमि हमेशा से प्रयाग ही रही। कुंभ में पवित्र स्नान के लिए देश के कोने-कोने से आने वाले श्रद्धालु कभी भी इलाहाबाद नहीं, बल्कि प्रयाग ही आए। इससे सिद्ध होता है कि सांस्कृतिक पहचान कभी जोर-जबरदस्ती से नहीं मिटती। वह उस संस्कृति के मानने वालों के मन में सदैव के लिए जिंदा रहती हैं। आज वह अवसर आया है जब प्रयाग को पुन: उसकी वास्तविक पहचान मिली। 
          निश्चित ही उत्तरप्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस कदम से कुछ अभारतीय विचार के लोग आहत हुए होंगे। भारतीयता को स्थापित करने वाले प्रत्येक प्रयास से इन सबको अथाह पीड़ा होती ही है। आश्चर्य की बात है कि कलकत्ता का नाम कोलकाता किया गया तब किसी को आपत्ति नहीं हुई। बंबई का नाम मुंबई किया गया तो किसी को दिक्कत नहीं हुई। मद्रास बिना किसी विवाद के चेन्नई हो गया। दिल्ली के महत्वपूर्ण स्थान कनाट प्लेस का नाम बदल कर राजीव चौक हो जाता है। पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल में भी कई स्थानों, भवनों और मार्गों के नाम आतातायियों के नाम पर रख दिए जाते हैं, तब भी कहीं कोई विवाद/बहस नहीं होती। किंतु, जैसे ही औरंगजेब रोड की जगह एपीजे अब्दुल कलाम रोड किया जाता है, जब गुडगाँव को गुरुग्राम कहा जाता है, जब मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय रेलवे स्टेशन किया जाता है, तब तथाकथित प्रगतिशील लोग वितंडावाद खड़ा करना प्रारंभ कर देते हैं। प्रयागराज के संदर्भ में भी यह जमात यही काम कर रही है। 
           कुछ लोग इसे नाम बदलना कह रहे हैं, जबकि वास्तविकता में यह नाम बदलना नहीं है, बल्कि बदले हुए नाम को सही करने का प्रयास है। जो बदले गए, उन्हें पूर्ववत किया जा रहा है। अच्छी बात यह है कि उनके कुतर्क का जवाब सरकार की जगह आम जनता दे रही है। सामान्य जन के तर्क के सामने उनके बौद्धिक पाखंड की धज्जियां उड़ रही हैं। दरअसल, हिंदू समाज वर्षों से इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज करने की माँग कर रहा था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी पहली भारतीय सरकार के सामने यह माँग रखी गई थी। किंतु, जैसा कि हम जानते हैं कि अब तक हिंदुओं की जनभावनाओं की उपेक्षा ही हुई थी। अब जब उन्हें उनकी सांस्कृतिक पहचान के मानबिंदु पुन: प्राप्त हो रहे हैं, तब वह हर प्रकार के बौद्धिक पाखंड का मुकाबला करने को उत्साहित है।  

शनिवार, 20 अक्तूबर 2018

ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता के गौरवशाली 51 वर्ष

पत्रकारिता में श्रेष्ठ मूल्यों की स्थापना करने वाले स्वदेश के प्रधान संपादक श्री राजेन्द्र शर्मा का मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में आयोजित गरिमामय समारोह में आत्मीय अभिनंदन

पत्रकारिता जब मिशन से हटकर व्यावसायिकता की पटरी चढ़ चुकी है, तब भी सिद्धांतों से डिगे बिना 51 वर्ष की लंबी यात्रा पूरी करने वाले स्वदेश (भोपाल समूह) के प्रधान संपादक श्री राजेन्द्र शर्मा को देखकर एक विश्वास पक्का हो जाता है कि पत्रकारिता अब भी मिशनरी मोड में है। निष्कलंक, निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता की यह यात्रा अब भी जारी है। लोकतंत्र के इस चौथे खंबे की ओर उम्मीदों से देखने वाला समाज चाहता है कि पत्रकारिता के यह गौरवशाली और ध्येयनिष्ठ 51 वर्ष 101 हो जाएं। पत्रकारिता के निरभ्र आकाश में दैदीप्यमान नक्षत्र ध्रुव की भांति श्री राजेन्द्र शर्मा न केवल आम जनमानस की आवाज बनें, बल्कि लोकहित के अपने पथ से भ्रष्ट होती पत्रकारिता का मार्गदर्शन भी करते रहें। उनके सान्निध्य में अनेक भारतीय कलम तैयार हुई हैं, जिनके लिए पत्रकारिता में समाज और राष्ट्र सर्वोपरि रहे। जिस प्रकार प्रतिकूल परिस्थितियों भी श्री शर्मा अपने पत्रकारिता धर्म पर अड़े रहे, अपने मूल्यों को साधे रहे, उसी तरह उनसे सीख कर पत्रकारिता जगत में आए पत्रकारों की कलम भी कभी झुकी नहीं। इस तरह स्वदेश परिवार के मुखिया श्री राजेन्द्र शर्मा ने न केवल अपनी कलम से देश की सेवा की, अपितु अपने गुरु दायित्व से भी राष्ट्र की उन्नति में योगदान दिया है। उनके त्याग, संघर्ष और मूल्यनिष्ठ पत्रकारीय जीवन को समाज भी मान्यता देता है। सम्मान करता है। 2018 में उनकी पत्रकारिता के 51 वर्ष पूर्ण होने पर उनके योगदान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने और समूची यात्रा को आज की पीढ़ी से समक्ष उपस्थित करने के उद्देश्य से आम समाज ने 01 सितंबर को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में अभिनंदन समारोह का आयोजन किया। इस सारस्वत आयोजन में मंच पर देश की सम्मानित विभूतियों और अपेक्स बैंक के सभागार ‘समन्वय भवन’ में गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति यह बयान करने के लिए पर्याप्त थी कि श्री राजेन्द्र शर्मा एवं उनकी निष्कलंक पत्रकारिता के प्रति समाज के सुधिजनों में अपार श्रद्धा-आदर है। मंच पर भारतीय ज्ञान-परंपरा के प्रख्यात चिंतक, राजनीतिज्ञ एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी, त्रिपुरा के राज्यपाल प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी, केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री श्री नरेन्द्र सिंह तोमर, एकात्म मानव दर्शन अनुसंधान एवं विकास संस्थान के निदेशक डॉ. महेश चंद्र शर्मा, पूर्व मुख्यमंत्री श्री कैलाश जोशी, श्री बाबूलाल गौर, पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री सुरेश पचौरी, नगरीय प्रशासन एवं शहरी विकास मंत्री श्रीमती माया सिंह, भोपाल महापौर श्री आलोक शर्मा, सांसद श्री आलोक संजर, आयोजन समिति के कार्याध्यक्ष मूर्धन्य साहित्यकार श्री कैलाशचंद्र पंत, पूर्व सांसद रघुनंदन शर्मा, श्रीमती अरुणा शर्मा (श्री शर्मा की सहधर्मिणी) और स्वदेश के प्रबंध संपादक श्री अक्षत शर्मा उपस्थित रहे।

- चित्रों में देखें पूरी यात्रा - 

         
         

शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2018

श्रीराम मंदिर निर्माण और आरएसएस


- लोकेन्द्र सिंह 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक वर्षभर में प्रमुख छह उत्सव मनाता है, इनमें से एक विजयादशमी है। यह सभी उत्सव सामाजिक महत्व के हैं। विजयादशमी समाज की विजय की प्रवृत्ति को जगा कर रखने वाला उत्सव है। यह प्रत्येक बुराई से जीतने की प्रेरणा देता है। संभवत: यही कारण है कि भारतीय समाज समय-समय पर अनेक बुराइयों को निकाल बाहर करता है। विजयादशमी के दिन सरसंघचालक का जो उद्बोधन होता है, वह संघ के स्वयंसेवकों के लिए तो पाथेय का कार्य करता ही है, संघ की नीति और सामयिक मुद्दों पर उसकी दृष्टि को भी स्पष्ट करता है। इसलिए विजयादशमी का उद्बोधन विशेष महत्व रखता है। नागपुर में 18 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई गई। मंच पर इस बार नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित थे। निश्चित ही संघ विरोधी अब कैलाश सत्यार्थी और उनके काम को निशाना बनाएंगे। खैर, महत्व की बात यह है कि कैलाश सत्यार्थी ने भी अपने उद्बोधन में उन सब बातों को शामिल किया, जिन्हें संघ दोहराता आया है। उन्होंने संघ के प्रति विश्वास जताते हुए स्वयंसेवकों से स्वाभिमानी, संवेदनशील, समावेशी, सुरक्षित और स्वावलंबी भारत बनाने का आह्वान किया।

रविवार, 30 सितंबर 2018

तेलुगु मीडिया की विकास यात्रा पर महत्वपूर्ण सामग्री से भरपूर मीडिया विमर्श का "तेलुगु मीडिया विशेषांक"

भाषायी पत्रकारिता पर मीडिया विमर्श का एक और महत्वपूर्ण प्रयास
- लोकेन्द्र सिंह - 
पत्रकारिता एवं संचार क्षेत्र से जुड़े लोगों को मीडिया विमर्श के प्रत्येक अंक का बेसब्री से इंतजार रहता है। मीडिया विमर्श का प्रत्येक अंक न केवल अपने पाठकों एवं प्रबुद्ध वर्ग की कसौटी पर खरा उतरता है, बल्कि और अधिक अपेक्षाएं बढ़ा देता है। 12 वर्ष से यह क्रम जारी है। एक के बाद एक महत्वपूर्ण विशेषांक हमारे सामने आए हैं। इस सबके पीछे मीडिया विमर्श के कार्यकारी संपादक प्रो. संजय द्विवेदी हैं। 
          भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता की समृद्ध विरासत और प्रयोगों को हिंदी जगत के सामने लाने का उल्लेखनीय कार्य भी मीडिया विमर्श के माध्यम से प्रो. संजय द्विवेदी ने अपने हाथों में संभाल रखा है। वह सबसे पहले उर्दू पत्रकारिता पर चर्चित विशेषांक लेकर आए। उसके बाद गुजराती पत्रकारिता पर एक उल्लेखनीय विशेषांक उपलब्ध कराया। अब नये विशेषांक के माध्यम से उन्होंने हिंदी मीडिया के जगत को तेलुगु मीडिया से परिचित कराने का प्रयत्न किया है। 
           हम सब जानते हैं कि तेलुगु भाषा का एक बड़ा परिवार है। तेलुगु भारत की प्राचीनतम भाषाओं में से एक है। भारत में तेलुगु बोलने वालों की संख्या 15 करोड़ से अधिक है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के अलावा संपूर्ण भारत में तेलुगु भाषी रहते हैं। यही नहीं, भारत के बाहर भी तेलुगु बोलने वालों की बड़ी संख्या है। ऐसे में तेलुगु मीडिया को समझना और उसको जानना जरूरी हो जाता है। इस काम में मीडिया विमर्श का यह अंक बहुत ही सहयोगी और महत्वपूर्ण सिद्ध होगा। 
          तेलुगु मीडिया विशेषांक के अतिथि संपादक हैं- सी. जयशंकर बाबु, जिन्हें अकसर हम मीडिया विमर्श में पढ़ते रहे हैं। उन्होंने अपनी जिम्मेदारी का बखूबी निर्वाहन किया है। तेलगू मीडिया के विविध आयामों पर इस विशेषांक में सामग्री है। भारतीय भाषायी पत्रकारिता का जगत कितना वृहद और समृद्ध है, यह समझाने में मीडिया विमर्श की यह श्रृंखला साधुवाद की पात्र है। मीडिया विमर्श की यह श्रृंखला अनवरत चलती रहनी चाहिए... यही शुभकामनाएं हैं।  
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मीडिया विमर्श के "तेलुगु मीडिया विशेषांक" पर यूट्यूब चैनल "अपना वीडियो पार्क" में चर्चा देखिये.... 


सोमवार, 24 सितंबर 2018

सहिष्णुता और सादगी से प्रश्न करती ‘हम असहिष्णु लोग’

- सुदर्शन वीरेश्वर प्रसाद व्यास
‘हम असहिष्णु लोग’...यकीनन, पुस्तक के शीर्षक से यह तो पूर्व में ही आभास हो जाता है कि लेखक इस पुस्तक के पाठकों से प्रत्यक्ष संवाद के साथ ही एक अप्रत्यक्ष संवाद उन लोगों से भी करना चाहते हैं जो एक विचारधारा (वर्ग) विशेष के प्रति ‘असहिष्णु’ शब्द की रट लगाए बैठे हैं। हालांकि, पुस्तक चर्चा से पूर्व हमें यह अच्छी तरह से जान लेना चाहिए कि असल में इस ‘असहिष्णु’ शब्द के मायने क्या हैं? देशभर के ख्यातिलब्ध विद्वानों ने इस शब्द को अपने हिसाब से विभिन्न परिभाषाओं में गढ़ा है, किसी का मानना है कि दूसरे धर्म या विचार से असहमति ही असहिष्णुता है, कोई कहता है कि अनायास क्रोधित होकर तेश में आना असहिष्णुता है, किसी का मानना है दूसरों की आवाज़ दबाकर अपनी आवाज़ बुलन्द करना असहिष्णुता है तो किसी का मानना है कि जो पसन्द न हो, उसे बर्दाश्त करना असहिष्णुता है। सरल शब्दों में कहा जाए तो जो व्यक्ति को निजी तौर पर पसंद ना हो, उसके खिलाफ जाना या उसे बर्दाश्त ना कर पाना असहिष्णुता है। इसके अतिरिक्त किसी के विचारों से सहमत न हो पाना तथा बिना किसी कारण के उनकी काट करना (सिरे से नकारना) असहिष्णुता का प्रतीक है। या कहें कि उसे सहन ना करना, जो अपने से भिन्न हो, फिर चाहे वह धार्मिक हो, सांस्कृतिक हो, नस्लीय हो या किसी अन्य प्रकार से भिन्न हो, उसे बर्दाश्त ना करना असहिष्णुता कहलाती है। असहिष्णुता को अंग्रेजी में इनटॉलरेंस (Intolerance) कहा जाता है।

रविवार, 23 सितंबर 2018

हैरतंगेज और रोमांचक नृत्य भवई

- लोकेन्द्र सिंह
भवई, राजस्थान के पारंपरिक लोक नृत्यों में से एक है। यह नृत्य बहुत कठिन है। हैरतंगेज और अत्यंत रोमांचक भी। जब नर्तकियां भवई की प्रस्तुति देती हैं, तो लोग दाँतों तले अंगुलियां दबा कर उनकी प्रस्तुति देखते हैं। भवई नृत्य के लिए लंबी नृत्य साधना की आवश्यकता होती है। कुशल कलाकार ही इस नृत्य की प्रस्तुति दे सकते हैं। भवई नृत्य में नर्तकियां अपने सिर पर 7 से 8 घड़े एक के ऊपर एक रखकर संतुलन बनाते हुए नाचती हैं। उसके बाद इस नृत्य को और अधिक रोमांचक बनाने के लिए यह नर्तकियां सिर पर घड़े रख कर काँच या अन्य धातु के गिलास पर पैर रखकर नाचती हैं। दर्शक सबसे अधिक हैरत में तब पड़ जाते हैं, जब यह कुशल नर्तकियां नंगी तलवारों के ऊपर चढ़ कर नाचती हैं। 
          मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में 11-12 अगस्त, 2018 को आयोजित 'यंग थिंकर्स कॉन्क्लेव' में राजस्थानी कलाकारों की भवई नृत्य की एक प्रस्तुति दी। उस शानदार प्रस्तुति की छोटी-सी वीडियो क्लिप की लिंक यहाँ दी हुई है। उस लिंक पर क्लिक करके आप भी रोमांचित करने वाले भवई नृत्य का आनंद ले सकते हैं। उल्लेखनीय है कि भवई नृत्य में पुरुष संगीतकार नर्तकियों के लिए पृष्ठभूमि संगीत बजाता है। संगीत के लिए कई यंत्र जैसे पखावज, ढोलक, झांझर, सारंगी और हार्मोनियम बजाए जाते हैं। आमतौर पर इसके साथ ही मधुर राजस्थानी लोक गीत भी संगीतकारों द्वारा गाया जाता है। नर्तकियों सहित सभी कलाकार राजस्थान के पारंपरिक रंगीन और सुंदर कपड़े पहनते हैं। 
          यह रहा भवई नृत्य का लिंक। 

शनिवार, 22 सितंबर 2018

समाधानमूलक प्रश्नोत्तरी

भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण
- लोकेन्द्र सिंह
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 'भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' व्याख्यान माला में अंतिम दिन अभ्यागतों के प्रश्नों के उत्तर दिए। प्रश्न वही थे, जो हमेशा संघ से पूछे जाते हैं किंतु इस बार यह प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण थे क्योंकि उनको समाधानमूलक उत्तरों ने पूर्ण कर दिया। संघ ने 'सनातन प्रश्नों' के उत्तर अधिकृत एवं सर्वोच्च पदाधिकारी के माध्यम से संपूर्ण समाज के सम्मुख रख दिए हैं। भले ही कोई उनसे सहमत हो या असहमत, किंतु अब कम से कम अनेक प्रश्नों पर संघ का अधिकृत पक्ष तो सार्वजनिक हो गया है। हालाँकि अनेक प्रश्नों के उत्तर संघ पूर्व में भी अपने कार्य-व्यवहार, अधिकृत वक्तव्यों एवं प्रस्तावों के माध्यम से समाज के सामने रख चुका है। कुल मिलाकर इस बौद्धिक यज्ञ की पूर्णाहुति लोक-विमर्श और लोक-व्यवहार को दिशा देने वाली रही। व्याख्यानमाला में शामिल अभ्यागतों के 215 प्रश्नों के उत्तर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने दिए। तीसरे दिन के आयोजन को कुछ नाम देना हो तो 'समाधानमूलक प्रश्नोत्तरी' दिया जा सकता है।

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

हिंदुत्व का अर्थ

भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण-3
- लोकेन्द्र सिंह 
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 'भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ का दृष्टिकोण' में हिंदुत्व पर बहुत ही महत्वपूर्ण विचार देश के सामने रखे हैं। उनके विचार हिंदुत्व की भारतीय संकल्पना को पूर्ण रूप से स्पष्ट करते हैं। 'हिंदुत्व' गाहे-बगाहे बौद्धिक और राजनीतिक जगत में चर्चा का विषय बना रहता है। दुर्भाग्य से भारत में कुछ ऐसी ताकतें हैं, जो भारतीय अवधारणाओं के प्रति सामान्य जन के मन में घृणा उत्पन्न करने का प्रयास करती रहती हैं। राष्ट्रवाद और हिंदुत्व ऐसे ही शब्द हैं, जिनको लेकर भारत विरोधी विचार से प्रेरित लोग सदैव नकारात्मक ढंग से बात करते हैं। हिंदुओं की नाराजगी से बचने के लिए आजकल उन्होंने 'हिंदुत्व' पर रणनीति बदल ली है। अब वह दो हिंदुत्व बताते हैं- कट्टर हिंदुत्व और सॉफ्ट हिंदुत्व। हिंदुत्व को श्रेणीबद्ध करते समय वह आगे कहते हैं कि आरएसएस का हिंदुत्व कट्टर है। हिंदुत्व को बदनाम करने के लिए चलने वाले इस षड्यंत्र के मुकाबले सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने बहुत ही सहजता से हिंदुत्व के विराट, उदार, सहिष्णु स्वरूप के दर्शन सबको कराए हैं। उन्होंने सकारात्मक ढंग से अपना विचार रखा।

बुधवार, 19 सितंबर 2018

संघ एक परिचय

'भविष्य का भारत: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' - 2 
- लोकेन्द्र सिंह
संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 'भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' विषय पर पहले दिन के व्याख्यान में संघ का परिचय प्रस्तुत किया। संघ की विकास यात्रा को देश-दुनिया के महानुभावों के सम्मुख रखा। सहज संवाद में अनेक प्रश्नों के उत्तर दिए। सबसे महत्वपूर्ण बात अपने संबोधन के प्रारंभ में उन्होंने कही- 'मैं यहां आपको सहमत करने नहीं आया, बल्कि संघ के बारे में वस्तुस्थिति बताने आया हूं।' यह कहते हुए उन्होंने बताया कि आप संघ के संबंध में अपना विचार बनाने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन, संघ के संबंध में वस्तुस्थिति जानकार आप अपना मत रखेंगे तो अच्छा होगा। उनका यह कहना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ज्यादातर लोग संघ के संबंध में टिप्पणी तो करते हैं किंतु उसके संबंध में बुनियादी जानकारी भी नहीं रखते हैं। इस संबंध में उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव का हालिया वक्तव्य उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है। व्याख्यानमाला का आमंत्रण मिलने पर उन्होंने कहा कि वह संघ के बारे में अधिक नहीं जानते हैं। स्वयं उन्होंने स्वीकारा कि वह संघ के संबंध में अधिक नहीं जानते, इसके बाद भी वह आगे कहते हैं कि वह इस आयोजन में नहीं जाएंगे, क्योंकि संघ पर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने प्रतिबंध लगाया था और जिन कारणों से प्रतिबंध लगाया गया था, वह कारण अभी तक समाप्त नहीं हुए हैं। यह एकमात्र उदाहरण नहीं है। देश के ज्यादातर राजनेता एवं अन्य लोग संघ के संबंध में जानकारी रखते नहीं है, इसके बाद भी संघ पर अनर्गल टिप्पणी करते हैं।

सोमवार, 17 सितंबर 2018

संघ की पहल

'भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' - 1
- लोकेन्द्र सिंह 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम पर सबकी नजर है। देश में भी और देश के बाहर भी। सब जानना चाहते हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा सांस्कृतिक संगठन आरएसएस ‘भविष्य का भारत’ को किस तरह देखता है? संघ का ‘भारत का विचार’ क्या है? दरअसल, यह उत्सुकता इसलिए भी है क्योंकि पिछले 93 वर्षों में कुछेक राजनीतिक/वैचारिक खेमों से संबद्ध राजनेताओं, लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर अनेक मिथक गढ़ दिए हैं। किंतु, संघ सब प्रकार के दुष्प्रचारों की चिंता न करते हुए समाज के बीच कार्य करता रहा और तमाम आरोपों का उत्तर अपने आचरण/कार्य से देता रहा। परिणामस्वरूप आज संघ का विस्तार ‘दशों दिशाओं...’ में हो गया है। उसके निष्ठावान स्वयंसेवक सबदूर ‘दल बादल...’ से छा गए हैं। इसके बावजूद व्यापक स्तर पर किए गए दुष्प्रचार के कारण समाज के कुछ हिस्सों में संघ को लेकर स्पष्टता नहीं है। एक विश्वास व्यक्त किया जा रहा है कि इस महत्वपूर्ण आयोजन से बहुत हद तक भ्रम और मिथक के बादल छंट जाएंगे।

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