बुधवार, 1 अप्रैल 2026

संघ की वैचारिक यात्रा का ऐतिहासिक दस्तावेज ‘आरएसएस @100’

जनसंचार के सरोकारों को समर्पित पत्रिका 'मीडिया विमर्श' का संघ शताब्दी वर्ष विशेषांक 

- पुरु शर्मा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्ष की यात्रा पूरी होने पर देशभर में संघ की विचारधारा, उसकी उपलब्धियों एवं योगदान को लेकर चर्चा है। ऐसे में ‘मीडिया विमर्श’ का विशेषांक ‘आरएसएस@100’ का आना महत्वपूर्ण है। मीडिया विमर्श का यह विशेषांक संघ से संबंधित सामयिक एवं चर्चित विषयों पर प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध कराता है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक एवं लेखक डॉ. लोकेन्द्र सिंह इसके अतिथि संपादक हैं। संघ विषयों पर वे निरंतर लिखते हैं। संघ पर केंद्रित उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें- संघ दर्शन : अपने मन की अनुभूति और राष्ट्रध्वज एवं आरएसएस भी उल्लेखनीय हैं। डॉ. सिंह के कुशल संपादन में तैयार मीडिया विमर्श का विशेषांक संघ की एक सदी की यात्रा को केवल एक संगठन के इतिहास के रूप में नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण की गाथा के रूप में प्रस्तुत करता है। यह विशेषांक उन सबके लिए उपयोगी है, जो संघ को जानना-समझना चाहते हैं। कहना होगा कि यह एक संदर्भ ग्रंथ की भाँति है। 

‘मीडिया विमर्श’ के सलाहकार संपादक प्रो. संजय द्विवेदी ने संपादकीय लेख ‘दिल से समझिए आरएसएस को’ में बहुत ही स्पष्टता के साथ उन भ्रांतियों पर प्रहार किया है जो अक्सर बौद्धिक जगत में संघ के विरुद्ध प्रचारित की जाती हैं। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया है कि संघ अपनी कार्यपद्धति के कारण प्रचार से दूर रहता है, जिसके कारण उसकी वास्तविक छवि और सेवा कार्यों का पूरा सच अक्सर सामने नहीं आ पाता। इस विशेषांक की सबसे बड़ी विशेषता इसका व्यापक फलक है, जिसमें देश के शीर्ष नेतृत्व से लेकर संघ के वरिष्ठ प्रचारकों के विचारों को सम्मिलित किया गया है। डॉ. लोकेन्द्र सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से लेकर संघ के वरिष्ठ प्रचारकों श्रीधर पराड़कर, निखिलेश माहेश्वरी, कैलाश चंद्र, सदानंद सप्रे और हितानंद शर्मा के विचारों को शामिल करके संघ के दृष्टिकोण को यथार्थ रूप में पाठकों के सामने लाने का प्रयास किया गया है। इसके अलावा संघ को नजदीक से देखने और उससे जुड़े अन्य लेखकों के आलेख भी विशेषांक में हैं। संघ के वर्तमान सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले और अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों के वक्तव्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि संघ का उद्देश्य समाज में कोई अलग गुट बनाना नहीं, बल्कि पूरे समाज को ही संगठित और सामर्थ्यवान बनाना है। वहीं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने आलेख में संघ को ‘अनादि राष्ट्र चेतना का पुण्य अवतार’ बताते हुए व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की इसकी अनूठी कार्यपद्धति की सराहना की है। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने डॉ. हेडगेवार और बाबा साहेब अंबेडकर के विचारों में निहित समानता को उजागर करते हुए संघ की सर्व-समावेशी समाज-दृष्टि का प्रमाण प्रस्तुत किया है। संपादक डॉ. लोकेन्द्र सिंह ने अपने लेख में संघ के सौ वर्षों को पांच चरणों में विभाजित कर यह समझाया गया है कि कैसे यह संगठन उपहास, उपेक्षा और विरोध के कठिन अवरोधों को पार करते हुए आज समाज की सज्जनशक्ति के साथ ‘एकरस’ होने की स्थिति में पहुँचा है। 

विशेषांक के विभिन्न लेखों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि संघ के लिए ‘हिन्दू’ शब्द कोई उपासना पद्धति नहीं, बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान है जो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के मर्म को आत्मसात करती है। शिक्षा, सेवा और समाज सुधार के क्षेत्र में संघ के योगदान पर भी इस अंक में विस्तार से चर्चा की गई है। डॉ. सदानन्द दामोदर सप्रे ने अपने लेख में बहुत ही तार्किक ढंग से उन भ्रांतियों का निवारण किया है जिनमें संघ को किसी विशेष जाति या वर्ग का संगठन माना जाता है। निखिलेश माहेश्वरी के लेख में विद्या भारती के माध्यम से मैकाले की शिक्षा पद्धति के विकल्प के रूप में भारतीय मूल्य-आधारित शिक्षा के सफल प्रयोग को दर्शाया गया है। ‘पंच परिवर्तन’ की संघ की संकल्पना के एक-एक संकल्प पर विस्तार से चर्चा यह विशेषांक करता है। विशेषांक के आखिर में ‘अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों’ को शामिल किया गया है, जो संघ को लेकर एक स्पष्ट सोच बनाते हैं। इसके साथ अन्य पठनीय पुस्तकों की सूची देकर उन पाठकों की सहायता की है, जो संघ के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं। कुल मिलाकर कहना होगा कि डॉ. लोकेन्द्र सिंह जैसे विद्वानों ने संघ, सत्ता और समाज के अंतर्संबंधों तथा शताब्दी वर्ष की चुनौतियों का सारगर्भित विश्लेषण प्रस्तुत कर इस अंक को एक पूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज बना दिया है। 

(समीक्षक युवा साहित्यकार हैं।)

विशेषांक : आरएसएस@100

संपादक : डॉ. लोकेन्द्र सिंह

पृष्ठ : 264

प्रकाशक : मीडिया विमर्श

रविवार, 29 मार्च 2026

“मेरा यह जीवन देश सेवा के लिए समर्पित”

संघ शताब्दी वर्ष : संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार अनुशीलन समिति के प्रमुख क्रांतिकारी थे, उन्होंने आजन्म भारतमाता की सेवा करने की प्रतिज्ञा की

यह चित्र Google Gemini AI से निर्मित है।

ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए कोलकाता से बड़े पैमाने पर क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन हो रहा था। एक प्रकार से कोलकाता क्रांतिकारियों के लिए ‘काशी’ बन गया था। केशव बलिराम हेडगेवार के मन में भी एक ज्वार था- क्रांतिकारी बनकर भारत माता को ब्रितानी हुकूमत की बेढ़ियों से स्वतंत्र करना है। डॉक्टर साहब की जीवनी लिखने वाले सीपी भिशिकर लिखते हैं कि वंदेमातरम आंदोलन के समय से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में उनका मन रमने लगा था। मैट्रिकुलेशन की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने ठान लिया था कि कोलकाता जाकर मेडिकल की पढ़ाई करेंगे और वहीं क्रांतिकारी गतिविधियों में जुड़ जाएंगे। नागपुर के राष्ट्रभक्त महापुरुष भी यही चाहते थे कि केशव कोलकाता जाएं, क्रांतिकारियों से संपर्क जोड़ें और लौटकर पश्चिम भारत में क्रांतिकारी आंदोलन को संगठित करें। क्रांतिकारी रामलाल वाजपेयी ने भी अपने जीवन चरित्र में इस घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है कि “उनको कलकत्ता भेजने का असली मकसद क्रांतिकारी संगठन संबंधी जानकारी प्राप्त करना एवं मध्यप्रांत और बंगाल के बीच सेतु का काम करना था”। केशव हेडगेवार जब कलकत्ता पहुँचे तब क्रांतिकारियों पर अंग्रेजी दमन का दौर चल रहा था। सरकार राष्ट्रद्रोही सभा अधिनियम-1907, आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम-1908 और इंडियन प्रेस एक्ट-1910 के द्वारा क्रांतिकारी पत्रों, संगठनों एवं व्यक्तियों को दंडित करने, प्रतिबंधित करने एवं उन पर मुकदमा चलाने का कार्य कर रही थी। परंतु, यह दमनचक्र प्रखर क्रांतिकारी केशव बलिराम हेडगेवार के इरादों को कहाँ डिगा सकता था।

रविवार, 22 मार्च 2026

यूनियन जैक को उखाड़ फेंकने के लिए खोद दी सुरंग

संघ शताब्दी वर्ष : जन्मजात देशभक्त थे संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार

यह चित्र AI प्लेटफॉर्म Google Gemini से निर्मित है।

कहते हैं कि पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करने वाले महापुरुष डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का बचपन भी कुछ ऐसा ही था, जो स्पष्ट संकेत देता था कि यह बालक बड़ा होकर भारत के नवनिर्माण की नींव रखेगा। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को ‘जन्मजात देशभक्त’ ऐसे ही नहीं कहा जाता है। उनके बचपन के अनेक प्रसंग मिलते हैं, जो उनकी देशभक्ति की केसरिया छाप को दर्शाते हैं। 13 वर्ष की उम्र में केशव ने प्लेग की महामारी में अपने माता-पिता को खो दिया। इस प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी केशव ने स्वयं को संभाले रखा। उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और क्रांति के मार्ग पर कदम बढ़ाते गए। स्कूल के दिनों में ही उनकी प्रखर देशभक्ति की मुखर अभिव्यक्ति होने लग गई थी। जीवन के संघर्ष में तपकर निखरे केशव बचपन में ही बड़ों की भाँति परिपक्व हो गए थे। 1901 में जब किंग एडवर्ड-सप्तम इंग्लैंड की राजगद्दी पर बैठे, तब नागपुर में एम्प्रेस मिल के मालिकों ने खुशी में आतिशबाजी का कार्यक्रम रखा। लगभग पूरा शहर इस आतिशबाजी को देखने के लिए एकत्रित हुआ। बच्चों को तो आतिशबाजी वैसे ही बहुत आकर्षित करती है। बड़ी संख्या में बच्चे भी आतिशबाजी का लुत्फ उठाने के लिए आए थे। लेकिन, जब केशव से आतिशबाजी देखने चलने का आग्रह किया गया तो उन्होंने अपने मित्रों से कहा- “यह शर्म की बात है कि हम एक विदेशी शासक की ताजपोशी पर जश्न मनाएं; मैं यह आतिशबाजी देखने नहीं जाऊंगा”।

बुधवार, 18 मार्च 2026

आरएसएस के साथ आई समाज की सज्जनशक्ति

सर्वव्यापी-सर्वस्पर्शी कार्य : संघ शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों में समाज का सहयोग और सहभागिता ने स्वयंसेवकों का बढ़ाया उत्साह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शताब्दी वर्ष पर कोई बड़ा उत्सव आयोजित न करके छोटे-छोटे स्थानों (मंडल/बस्ती) पर कार्यक्रमों का आयोजन किया, ताकि संघ कार्य का व्याप बढ़े। शताब्दी वर्ष के निमित्त संघ ने मुख्य रूप से दो प्रकार के कार्यक्रमों की व्यापक योजना बनाई है। इनमें पहला उद्देश्य संगठन का विस्तार करना है, जबकि दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य समाज की सज्जन शक्ति को सद्भाव और समरसता के सूत्र में पिरोकर राष्ट्र निर्माण के लिए संगठित करना है। इस ऐतिहासिक अवसर पर आयोजित संघ के कार्यक्रमों में समाज का जो अभूतपूर्व और भरपूर साथ मिल रहा है, वह संगठन की राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता का प्रमाण है। कहना होगा कि कई कार्यक्रमों का नेतृत्व तो समाज ने ही किया, संघ की शक्ति तो उनकी सहयोगी बनी। विशेष रूप से हिन्दू सम्मेलनों का आयोजन समाज की सज्जनशक्ति ने आगे रहकर किया।

सोमवार, 16 मार्च 2026

अनूठा जन्मदिन : पुस्तकों से तौले गए 8 वर्षीय मारुति

भोपाल में 8 वर्षीय बालक मारुति का जन्मदिन अनूठे ढंग से मनाया गया। पूरे उत्सव में भारतीय संस्कृति की गहरी झलक दिखाई दी। मारुति के माता-पिता और दादा-दादी ने भारतीय पद्धति के अनुसार जन्मदिन की योजना बनाई। इस उत्सव को सार्थक स्वरूप देते हुए 'पुस्तक-तुला' का आयोजन किया गया, जिसमें मारुति को पुस्तकों से तौला गया। ​तराजू के एक पलड़े में मारुति को बैठाया गया और दूसरे पलड़े में पुस्तकें रखी गईं। जो भी अतिथि आए थे, वे अपने साथ लाई गई पुस्तकें या वहां उपलब्ध पुस्तकों को दूसरे पलड़े में तब तक रखते गए, जब तक मारुति का पलड़ा ऊपर नहीं उठ गया। इस अवसर पर कई सामाजिक कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे। परिवार 'पुनरुत्थान विद्यापीठ' से जुड़ा हुआ है और इस प्रकार जन्मदिन मनाने की प्रेरणा उन्हें वहीं से प्राप्त हुई। मारुति की शिक्षा भी पुनरुत्थान विद्यापीठ के गुरुकुल में चल रही है।

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

'जादूगरनी' - जीवन, प्रेम और रिश्तों की खूबसूरत अभिव्यक्ति

वीडियो देखें : क्या एक कविता जीवन बदल सकती है?


“जब कोई कविता किसी मरते हुए को जीन का सहारा दे जाए तो वह जादूगरनी होती है”। युवा कवि सुदर्शन व्यास ने अपने नये काव्य संग्रह का नामकरण इसी भाव के साथ किया है- जादूगरनी। सच है, कविताओं में वह जादू होता है कि वे बड़े परिवर्तन की संवाहक बनती हैं। दुनिया के कितने ही बड़े आंदोलनों का आधार कविता ही बनी है। भारत के स्वाधीनता संग्राम में क्रांतिकारियों और स्वतंत्रतता सेनानियों का बीज मंत्र ‘वंदेमातरम’ भी काव्य है। ऐसा काव्य जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में नये सिरे से प्राण फूंक दिए। भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण का जीवन दर्शन काव्य के रूप में ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बहता आया है। कविता के महत्व एवं हमारे जीवन में उसकी उपस्थिति पर कवि ने उचित ही लिखा है कि “मनुष्यता के सबसे बड़े शोक में भी कविता गायी जाती है और सबसे बड़ी खुशी में भी कविता होती है। कविता हमारे जीवन का आधार है और जब कोई कविता किसी मरते हुए को जीने का सहारा दे जाए तो वह जादूगरनी होती है”।

रविवार, 8 मार्च 2026

स्वदेशी का आग्रही है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

संघ शताब्दी वर्षआरएसएस ने धरातल पर उतारकर दिखाया स्वदेशी विचार


भारत की सर्वांगीण स्वतंत्रता एवं विकास का सपना देखने वाले महापुरुषों ने ‘स्वदेशी’ का महत्व समझा और भारत को आत्मनिर्भर एवं सशक्त बनाने के लिए समाज से स्वदेशी आचरण का आग्रह किया। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि यदि हमें फिर से उन्नति करनी है, तो लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की शिक्षा देनी होगी। स्वातंत्र्यवीर सावरकर, बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय और महात्मा गांधी से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार तक, सभी ने स्वदेशी को अपनाने का आग्रह किया। भारत के निर्माण का सपना देखने वाले विचारक यह भली-भांति जानते थे कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति के मूल में स्वदेशी का आचरण ही है।

भारत को परमवैभव पर ले जाने की महान आकांक्षा के साथ 1925 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई, तब से ही संघ ने स्वदेशी को लेकर समाज का प्रबोधन प्रारंभ कर दिया था। संघ के लिए स्वदेशी केवल एक आर्थिक नारा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का मूल मंत्र है। संघ ने अपनी स्थापना के साथ ही भारत की आत्मनिर्भरता और भारतीय मूल्यों पर आधारित अर्थतंत्र की वकालत की है।