संघ शताब्दी वर्ष : मई-जून में देशभर में आयोजित होते हैं, 1927 में नागपुर में लगा था पहला वर्ग
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को एक अनुशासित और राष्ट्रव्यापी संगठन बनाने में ‘संघ शिक्षा वर्गों’ का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ये केवल प्रशिक्षण शिविर नहीं हैं, बल्कि ये संघ कार्य की साधना की प्रयोगशालाएं हैं। चयनित एवं दायित्ववान स्वयंसेवक संघ शिक्षा वर्गों में एक साधक की तरह रहते हैं और संघ कार्य के लिए संगठनात्मक एवं बौद्धिक प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। इन वर्गों से स्वयंसेवक केवल संघ चलाने की पद्धति नहीं सीखते, अपितु उनके व्यक्तित्व का भी सर्वांगीण विकास होता है। वर्ग में रहकर स्वयंसेवक सफल जीवन के लिए अनुशासन, समय प्रबंधन, दिनचर्या पालन, कार्यक्रम कुशलता, सामंजस्य और वक्तृत्व कला जैसे गुणों को समझता और सीखता है। सबके साथ मिलकर रहने से स्वयंसेवकों में सहयोग और सामंजस्य की भावना का विकास होता है। सोचने-समझने, तर्क करने, समस्या का समाधान खोजने, निर्णय लेने की क्षमता का विकास, अपनी भावनाओं को प्रकट करने का अभ्यास, सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का महत्व, दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, ये सब बातें भी संघ शिक्षा वर्ग से प्रशिक्षित स्वयंसेवक के व्यक्तित्व में दिखने लगती हैं। इसलिए संघ शिक्षा वर्गों को लेकर स्वयंसेवकों में भी खूब उत्साह रहता है।
स्वयंसेवकों के प्रशिक्षण के महत्व को संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार भली प्रकार समझते थे। इसलिए संघ की स्थापना के दो वर्ष बाद ही डॉक्टर साहब ने संघ शिक्षा वर्ग की नींव रख दी थी। पहला वर्ग 1927 में नागपुर में लगाया गया। शुरुआती दौर में तीन सप्ताह तक चलने वाले इन वर्गों को ‘ग्रीष्मकालीन वर्ग’ कहा जाता था। समय के साथ इसके नाम में बदलाव आया। इन्हें ‘अधिकारी शिक्षा वर्ग (ओटीसी)’ भी कहा गया। वर्ष 1950 में इन्हें वर्तमान नाम ‘संघ शिक्षा वर्ग’ मिला। पूर्व रचना में प्राथमिक वर्ग के अलावा संघ शिक्षा वर्ग- प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष के नाम से होते थे। अब संघ शिक्षा वर्ग प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय वर्ष की जगह संघ शिक्षा वर्ग, कार्यकर्ता विकास वर्ग-1 और कार्यकर्ता विकास वर्ग-2 की रचना है। संघ कार्य के प्रशिक्षण के लिए तीन दिन से लेकर 25 दिन तक के वर्गों की रचना है-
- प्रारंभिक वर्ग : यह वर्ग तीन दिन का रहता है। यह नये कार्यकर्ताओं के लिए होता है।
- प्राथमिक वर्ग : यह सात दिन का होता है, यह जिला स्तर पर आयोजित होता है।
- संघ शिक्षा वर्ग : यह 15 दिन का होता है, जो प्रांत के स्तर पर आयोजित किया जाता है।
- कार्यकर्ता विकास वर्ग-1 : यह 20 दिन का होता है। क्षेत्र स्तर पर आयोजित होता है।
- कार्यकर्ता विकास वर्ग-2 : यह 25 दिन का होता है और इसका स्वरूप अखिल भारतीय होता है। यह वर्ग रेशमबाग स्थित हेडगेवार स्मृति मंदिर परिसर में लगता है। इस वर्ग में देशभर के स्वयंसेवक शामिल होते हैं।
प्रारंभिक और प्राथमिक वर्ग को छोड़कर शेष संघ शिक्षा वर्गों को आयुसीमा के आधार पर दो श्रेणी में बाँटा गया है- सामान्य और विशेष। सामान्य वर्ग में 18 से 40 वर्ष की उम्र के स्वयंसेवक भाग लेते हैं। वहीं, जिन स्वयंसेवकों की उम्र 40 वर्ष से 65 वर्ष तक होती है, वे विशेष वर्ग में प्रशिक्षण लेते हैं। सामान्य वर्ग शारीरिक प्रधान और विशेष वर्ग बौद्धिक प्रधान होते हैं। सामान्यतौर पर संघ शिक्षा वर्ग मई और जून में ही आयोजित किए जाते हैं। दरअसल, इस समय विद्यालयों और महाविद्यालयों में परीक्षा होने के बाद ग्रीष्मकालीन अवकाश रहता है। युवाओं को इस खाली समय में संघ की कार्यविधि से परिचित कराने के लिए यह सबसे उपयुक्त समय माना गया और यह व्यवस्था प्रारंभ से आज तक कायम है। पिछले कुछ वर्षों में विशेष वर्गों का आयोजन सितंबर से दिसंबर के बीच भी किया जाने लगा है।
प्रारंभिक दौर की चुनौतियां :
संघ शिक्षा वर्ग जब प्रारंभ हुए थे, तब अनेक प्रकार की चुनौतियां थीं। शिक्षार्थियों के रहने के लिए आवास, भोजन और प्रशिक्षण के लिए मैदान, इनकी व्यवस्था करना आसान नहीं होता था। नागपुर में आयोजित होने वाले तृतीय वर्ष (अब कार्यकर्ता विकास वर्ग-2) की बात करें तो प्रारंभ में इस वर्ग के लिए देशभर से आने वाले शिक्षार्थियों का निवास स्थानीय पाठशालाओं (जैसे लोकांचीशाला, मिल सिटी स्कूल/धनवटे नगर विद्यालय और न्यू इंग्लिश स्कूल) में होता था, जो नि:शुल्क उपलब्ध थीं। भोजन आस-पड़ोस के घरों से आता था। चिकित्सा, बिजली और जल जैसे बुनियादी खर्चों के लिए स्वयंसेवकों से नाममात्र शुल्क लिया जाता था। आज भी संघ शिक्षा वर्ग में शामिल होने के लिए स्वयंसेवक शुल्क देते हैं।
नागपुर से देशव्यापी विस्तार की यात्रा :
- 1934: पुणे में वर्गों का आयोजन शुरू हुआ।
- 1938: महाराष्ट्र से बाहर लाहौर (अविभाजित भारत) में शुरुआत हुई।
- 1940: नागपुर के शिक्षा वर्ग में उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक के स्वयंसेवकों ने हिस्सा लिया, जिसने इसे अखिल भारतीय स्वरूप दे दिया।
जब संघ शिक्षा वर्ग रोकने पड़े :
कार्यकर्ता निर्माण के इस अबाध प्रवाह को कई बार राष्ट्रीय आपात स्थितियों के कारण रोकना भी पड़ा है। वर्ष 1948-1949 में संघ पर प्रतिबंध और 1976-1977 में आपातकाल के दौरान प्रतिबंध, 1993 में प्रतिबंध और 1991 में विशेष राष्ट्रीय परिस्थितियों (पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या और लोकसभा चुनाव) के दौरान यह वर्ग अवरुद्ध हुए थे। देश में जब कोरोना महामारी का प्रकोप था और संघ के स्वयंसेवक कोरोना योद्धा के रूप में समाज की सेवा कर रहे थे, तब भी 2020-2021 में संघ शिक्षा वर्गों को स्थगित करना पड़ा था।
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| संघ शिक्षा वर्ग में नियुद्ध (जूडो-कराटे) सीखते आरएसएस के स्वयंसेवक |
जीवन जीने की कला सिखाते हैं संघ शिक्षा वर्ग :
- सामाजिक समरसता : देशभर से स्वयंसेवक बिना किसी जातीय या रंग-रूप के भेदभाव के एकत्र होते हैं।
- सामूहिक जीवन : एक साथ रहना और बिना भेदभाव के सामूहिक भोजन करना।
- अखिल भारतीय दृष्टि : देश के विभिन्न हिस्सों से आए लोगों से मिलकर राष्ट्रव्यापी दृष्टिकोण विकसित होता है।
- स्वावलंबन : अपना कार्य स्वयं करने की आदत, जिससे आत्मनिर्भरता आती है।
- संगठन और अनुशासन : अनुशासन के प्रति जागरूकता और सभी के प्रति अपनेपन (बंधुत्व) का भाव पैदा होता है।
- राष्ट्रीय चुनौतियों का बोध : समाज और राष्ट्र के सामने मौजूद चुनौतियों को समझना और उनके समाधान खोजना।
- राष्ट्रभक्ति : बौद्धिक, कहानियों, गीतों और प्रसंगों के माध्यम से स्वयंसेवक राष्ट्रभक्ति का पाठ सीखते हैं।
- सेवा : संघ शिक्षा वर्ग में विभिन्न प्रयोगों के माध्यम से सेवा का भाव भी स्वयंसेवकों के भीतर उतारा जाता है।
- समर्पण : स्वयंसेवकों के जीवन में समाज, देश, धर्म के लिए समर्पण की भावना बढ़ती है।
- श्रम साधना : वर्ग में स्वयंसेवक श्रम करना सीखते हैं।
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| संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 17 मई, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ |







