शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

श्रीगणेश की दिव्य प्रतिमा, निरंतर बढ़ रहा आकार

अमरकंटक दर्शन : पुष्पराजगढ़ के जंगलों में कलचुरीकालीन भगवान श्रीगणेश की ऐतिहासिक प्रतिमा, इन्हें बटुक गणेश भी कहते हैं


अनूपपुर के पुष्पराजगढ़ तहसील के ग्राम धरहर कला में स्थापित प्राचीन एवं दिव्य श्रीगणेश प्रतिमा

अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ विकासखंड के अंतर्गत ग्राम धरहरकला में भगवान श्रीगणेश की दिव्य एवं प्राचीन प्रतिमा है, जो श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र है। इस स्थान को बहगड़नाला भी कहते हैं। अमरकंटक स्थित माँ नर्मदा मंदिर से उत्तर दिशा की ओर लगभग 35 किलोमीटर और पुष्पराजगढ़ से लगभग सात किलोमीटर की दूरी पर भगवान श्रीगणेश की यह प्रतिमा स्थापित है। भगवान श्रीगणेश की इस प्रतिमा को लेकर लोगों के मन में अपार श्रद्धा होने के साथ-साथ कौतुहल भी है। कहते हैं कि प्रतिवर्ष तिल-तिल करके प्रतिमा का आकार बढ़ रहा है। वर्तमान में प्रतिमा का आकार लगभग 8 फीट है। हालांकि इसके कोई वैज्ञानिक एवं पुरातात्विक साक्ष्य नहीं है। लेकिन लोगों की श्रद्धा है। इस संदर्भ में यह भी जनश्रुति है कि जब प्रतिमा प्रकट हुई थी, तब इसका आकार केवल एक फीट था। इन्हीं जनश्रुतियों के कारण घने जंगल में, एकांत में विराजे धरहरकला भगवान श्रीगणेश की प्रसिद्धि दूर-दूर तक है। प्रतिवर्ष वसंत पंचमी पर यहाँ तीन दिवसीय विशाल मेला लगता है। श्रीगणेशोत्सव के दिनों में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहाँ भगवान श्रीगणेश की इस दिव्य प्रतिमा के दर्शन के लिए आते हैं। अमरकंटक में सदानीरा माँ नर्मदा के दर्शन के लिए आने वाले भक्तगण भी श्रीगणेश के दर्शन के लिए आते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि अमरकंटक में माँ नर्मदा की पूजा-अर्चना का फल भक्तों को तभी मिलता है, जब धरहरकला आकर भगवान श्रीगणेश की पूजा करते हैं। एक मान्यता यह भी है कि अमरकंटक पहुंचने से पहले धरहर के स्वयंभू गणेश महाराज के दर्शन करने के बाद ही माँ नर्मदा की पूजा-अर्चना का फल पूर्ण होता है। इन्हीं कारणों से अमरकंटक आने वाले और वहाँ से लौटने वाले श्रद्धालु धरहर कला पहुंचकर श्री गणेश जी के दर्शन और पूजन करते हैं।

धरहर में स्थापित श्रीगणेश प्रतिमा अपने विशिष्ट स्वरूप के कारण सामान्य गणेश प्रतिमाओं से अलग मानी जाती है। दक्षिण मुखी कलचुरी कालीन यह प्रतिमा दुनिया भर मे पाई जाने वाली सामान्य चतुर्भुज श्रीगणेश प्रतिमाओं से अलग दिखाई देते हैं। बालस्वरूप होने के कारण यह प्रतिमा द्विभुज है, जिसके बाएं हाथ में एक पात्र है। प्रतिमा में श्रीगणेश को जनेऊ धारण किए हुए दिखाया गया है।  धार्मिक विषयों के जानकार इस स्वरूप को सनातन परंपरा में उपनयन संस्कार के बाद बटुक को शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजे जाने की परंपरा से जोड़कर देखते हैं। इसलिए इन्हे बटुक गणेश भी कहा जाता है।

दर्शन करें : अमरकंटक के जंगलों में करें फरस विनायक के दर्शन

श्रीगणेश मंदिर का यह स्थान प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है। ऊंचे वृक्ष, हरे-भरे पहाड़, पक्षिओं का कलरव और सघन वन क्षेत्र की नैसर्गिक सुंदरता के कारण यहाँ आत्मिक शांति की अनुभूति होती है। जब हम यहाँ पहुँचे तो किसी स्कूल के बच्चे पिकनिक के लिए यहाँ आए हुए थे। छोटे बच्चों की चहल-पहल ने शांत वातावरण में सुर-लहरियाँ उत्पन्न कर दी थीं। यहाँ मिले साधु-संन्यासी ने बताया कि भगवान शिव की तपस्या के लिए माता पार्वती इसी स्थान पर आई थीं। यहाँ एक बने एक कुण्ड और गुफा माता पार्वती के नाम पर है- गौरी कुण्ड और गौरी गुफा। गौरी कुण्ड में सदैव शीतल जल रहता है। श्रद्धालु भगवान श्रीगणेश की पूजा में इसी कुण्ड के जल का उपयोग करते हैं। स्थानीय लोगों ने बताया कि जब इस स्थान को खोजा गया था, तब भगवान श्रीगणेश की यह प्रतिमा खुले स्थान पर थी। बाद में, श्रद्धालुओं ने मंदिर का निर्माण कराया। प्राचीन प्रतिमा की सुरक्षा हो और अपने भगवान को छत मिल जाए, संभवत: यह विचार करके ही श्रद्धालुओं और ग्रामवासियों ने मंदिर बनाया था। 

श्रीगणेश मंदिर के पास ही एक प्राचीन खंडित मंदिर ने मुझे आकर्षित किया। गणेश जी के दर्शन कर मैं उस ओर बढ़ा। देखा तो पाया कि वह एक खंडित शिव मंदिर था, जो किसी समय में शिव भक्तों ने बनाया होगा। निश्चित ही यह घना और वीरान जंगल में शिव की साधना करने वाले साधु-संतों का तपस्थली रहा होगा। इसके साथ ही यहाँ ब्रह्मा और विष्णु की प्राचीन मूर्तियों भी मिली हैं। यह सब प्रतिमाएं कल्चुरीकालीन बताई जाती हैं। अमरकंटक के रंगमहला (प्राचीन मंदिर समूह परिसर) में बने शिव मंदिरों से इसका वास्तु मिलता है। चूँकि रंगमहला के मंदिर कल्चुरीकालीन हैं, इसलिए यह भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर भी उसी काल में बनाया गया होगा। इसके निकट ही गौरी कुण्ड तथा गौरी गुफा है। गौरीगुफा का द्वार शिवदाबा (शिव पहाड़ी) में जाकर खुलता है। 

धरहर कला के भगवान श्रीगणेश की इस दिव्य प्रतिमा का दर्शन करके जब हम लौट रहे थे, तो मन में सुखद अनुभूति थी। एक सात्विक ऊर्जा का अनुभव हो रहा था।

देखें : अमरकंटक का प्रसिद्ध एवं प्राचीन मंदिर समूह- रंगमहला

गुरुवार, 24 सितंबर 2026

‘हनुमान अंश’ ने भारतीय सिनेमा को दिखाई राह

भारतीय सिनेमाई परिदृश्य में जब भी किसी फिल्म की सफलता का आकलन होता है, तो अमूमन भारी-भरकम बजट, चमचमाते सितारे और आक्रामक प्रचार तंत्र का उल्लेख किया जाता है। बड़े प्रोडक्शन हाउस अक्सर औसत दर्जे की कहानियों को भी पीआर रणनीतियों और मल्टी-सिटी टूर के शोर में ‘ब्लॉकबस्टर’ का चोगा पहनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन नीम करोली बाबा के जीवन और दर्शन से प्रेरित फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने स्थापित व्यावसायिक नैरेटिव्स को ध्वस्त कर यह सिद्ध कर दिया है कि जब कथ्य में आत्मीयता, सांस्कृतिक जुड़ाव और सादगी हो, तो समाज उसे न केवल स्वीकारता है, बल्कि सिर-आंखों पर बिठाता है। रिलीज के सातवें सप्ताह और 47वें दिन के बाद भी सिनेमाघरों में दर्शकों की बढ़ती भीड़ इस बात का प्रमाण है कि यह कोई क्षणिक कौतूहल नहीं, बल्कि भारतीय दर्शकों के अंतर्मन का सच्चा प्रकटीकरण है। 

केवल दो करोड़ रुपये के सीमित बजट में तैयार हुई इस फिल्म ने देश-विदेश मिलाकर 366 करोड़ रुपये से अधिक का धन संग्रह कर 13 हजार प्रतिशत से अधिक का लाभ कमाया है। जिस दौर में बड़े सितारों एवं बड़े प्रोडक्शन हाउस की फिल्में एक सप्ताह में पर्दे से उतर जा रही हों, तब अनाम कलाकारों के अभिनय से सजी, सार्थक संदेश देने वाली यह फिल्म हर दिन एक नया कीर्तिमान रच रही है। इसी मंगलवार (22 सितंबर) को ही सोमवार के मुकाबले 18 प्रतिशत से अधिक का उछाल और शो की संख्या का 7,700 के पार पहुंच जाना, भारतीय बॉक्स ऑफिस के इतिहास की दुर्लभतम घटनाओं में से एक है।

हनुमान अंश की इस अभूतपूर्व सफलता का सबसे उजला पक्ष इसका प्रचार तंत्र रहा। निर्माताओं ने किसी भारी-भरकम बजट के आक्रामक प्रचार का सहारा नहीं लिया; फिल्म के वास्तविक प्रचारक खुद आम दर्शक बने। दर्शक जब भाव-विभोर होकर थियेटर से बाहर निकले, तो उन्होंने ‘माउथ पब्लिसिटी’ के जरिए इस फिल्म को घर-घर पहुंचा दिया। फिल्म का सुरीला, अर्थपूर्ण गीत-संगीत जनमानस की जुबान पर चढ़ गया। यह इस बात का स्पष्ट संदेश है कि भारतीय समाज आज भी अपनी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जड़ों से बेहद मजबूती से जुड़ा हुआ है। यह बात अन्य फिल्म निर्माता जितनी जल्दी समझ लें, उतना अच्छा। 

कहना होगा कि ‘हनुमान अंश’ की सफलता ने पूरे फिल्म उद्योग को आईना दिखाया है। अब तक मुख्यधारा का सिनेमा जिस आस्था और अध्यात्म को हाशिए पर रखता आया था, वही आज मुख्यधारा का केंद्र बनने जा रहा है। इस फिल्म की गूंज का ही परिणाम है कि ‘रामायण’, ‘चिरंजीवी हनुमान’, ‘महा अवतार परशुराम’, ‘श्रीमद् भागवतम’ और संत प्रेमानंद महाराज पर केंद्रित ‘राधा अंश’ जैसी कृतियों पर काम तेज हो गया है। छठी मैया, साईं बाबा, खाटूश्याम और महाकाली पर बनने वाली आगामी फिल्में यह दर्शाती हैं कि भक्ति और सांस्कृतिक सिनेमा अब कोई उप-धारा नहीं, बल्कि एक सशक्त सांस्कृतिक पुनर्जागरण का माध्यम बन रहा है। 

फिल्मकारों के लिए ‘हनुमान अंश’ की सबसे बड़ी सीख यही है कि भारत की कहानी को भारत के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाए। जब तक सिनेमा आयातित विचारों और सतही चमक-दमक के सहारे अपनी ही संस्कृति से विमुख होकर रचा जाएगा, वह जनसाधारण के दिल तक नहीं पहुंच सकता। ‘हनुमान अंश’ ने यह भरोसा लौटाया है कि सच्चाई और निष्ठा से गढ़ी गई एक छोटी सी कहानी भी बड़े-बड़े मिथकों को तोड़कर इतिहास रच सकती है। भारतीय सिनेमा के लिए यह समय अपनी जड़ों की ओर लौटने का है। 

बुधवार, 23 सितंबर 2026

ब्रह्मांड को मापने वाले भगवान का मंदिर

उलगलंथा पेरुमल मंदिर में भगवान विष्णु के वामन अवतार के दर्शन

‘उलगलंथा पेरुमल’ का अर्थ है ‘ब्रह्मांड को मापने वाला भगवान’। यह नाम भगवान विष्णु के पाँचवे अवतार ‘वामन अवतार’ से जुड़ता है। भगवान वामन को समर्पित मंदिर बमुश्किल ही आपने देखे होंगे। मेरे लिए तो यह पहला मंदिर है, जहाँ मंदिर के मुख्य देवता के रूप में भगवान वामन की पूजा होती है। उलगलंथा पेरुमल मंदिर कांचीपुरम के सबसे प्राचीन मंदिरों में शामिल है। इतिहासकार बताते हैं कि इस मंदिर का निर्माण राजेन्द्र चोल प्रथम (1012-1044 ई.) ने कराया था। एक और महत्वपूर्ण तथ्य इस मंदिर को विशेष बनाता है कि यह मंदिर 108 दिव्य देसमों (विष्णु के पवित्र निवास) में से एक है। मंदिर का गोपुरम् आकर्षक है।

दर्शन करें : कांचीपुरम के मंदिरों का दर्शन करें

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

न्यूजरूम के यथार्थ से जोड़ती संपादन-कला

पुस्तक चर्चा : सोशल मीडिया और आधुनिक पत्रकारिता के दौर में सामग्री परिमार्जन का प्रामाणिक पाठ है प्रो. अरुण कुमार भगत की पुस्तक ‘संपादन-कला : सिद्धांत से व्यवहार तक’


सोशल मीडिया के इस दौर में एक बात सबको साफ़ समझ आ गई है कि पत्रकारिता में संपादन का बहुत महत्व है। पत्रकारिता केवल रिपोर्टिंग नहीं है। यह सत्य है कि पत्रकारिता में जानकारी एकत्र करके लाना सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण कार्य है यह तय करना कि उस जानकारी को किस प्रकार से प्रसारित करना है, या प्रसारित करना भी है या नहीं? संपादन की अच्छी समझ होने पर ही हम उस जानकारी को लोकोपयोगी बना सकते हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पत्रकारिता की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता बहुत हद तक उसके संपादन पक्ष पर टिकी होती है। इसलिए संपादन-कला का कौशल सबको सीखना चाहिए। सूचनाओं के प्रचार-प्रसार में शामिल सभी लोगों को संपादन की बुनियादी बातें पता होनी चाहिए। मीडिया के आचार्य रहे वरिष्ठ लेखक एवं बिहार लोक सेवा आयोग के सदस्य प्रो. अरुण कुमार भगत की पुस्तक ‘संपादन-कला : सिद्धांत से व्यवहार तक’ इन बुनियादी बातों को सिखाने में बहुत उपयोगी साबित होगी। पुस्तक के शीर्षक और उसकी विषय-वस्तु को देखकर यह अनुमान न लगाएं कि यह केवल पत्रकारिता के विद्यार्थियों के उपयोग की पुस्तक है। यह उन सबके लिए उपयोगी है, जो सोशल मीडिया में लिख-पढ़ रहे हैं।

रविवार, 13 सितंबर 2026

हिन्दी समाचारपत्र में अंग्रेजी शब्दों पर ‘लाल गोले’ लगाकर संपादक के पास पहुँच गए थे सुदर्शन जी

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पाँचवें सरसंघचालक श्री कुप्पहल्ली सीतारामय्या सुदर्शन स्वभाषा के प्रबल पक्षधर थे, हिन्दी में अंग्रेजी की मिलावट वे पसंद नहीं करते थे


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक कुप्प. सी. सुदर्शन भाषा की शुद्धता और व्याकरण को लेकर बेहद संवेदनशील थे। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में वर्तनी एवं व्याकरण की अशुद्धियों को वे कतई नजरअंदाज नहीं करते थे। भले ही उनकी अपनी मातृभाषा तमिल थी, लेकिन जन्मभूमि एवं कर्मभूमि हिन्दी भाषी क्षेत्र रहा। शायद इसलिए ही हिन्दी से उन्हें गहरा प्रेम था। हालांकि, सुदर्शनजी लगभग 12 भाषाओं पर अधिकार रखते थे। परिवार तमिल था लेकिन पूर्वज वर्षों पहले तमिलनाडु से स्थानांतरित होकर कर्नाटक में बस गए थे इसलिए कन्नड़ ही उनके परिवार की मुख्य भाषा बन गई थी। भाषा प्रेम को लेकर सुदर्शन जी के अनेक प्रेरक प्रसंग प्रचलित हैं। ऐसा ही एक किस्सा भोपाल का है, जब वे सरसंघचालक के दायित्व से मुक्त होकर ‘एक साधारण स्वयंसेवक’ की भाँति रह रहे थे। हिन्दी के हृदय प्रदेश, ‘मध्यप्रदेश’ से प्रकाशित हिन्दी के प्रमुख समाचार पत्र में जब उन्होंने अंग्रेजी के शब्दों की भरमार देखी, तो उन्हें क्षोभ हुआ। समाचारपत्र अपनी प्रतिष्ठा तो इस नाते करता है कि वह हिन्दी का सबसे बड़ा और सबसे अधिक प्रसारित समाचार पत्र है लेकिन हिन्दी भाषा के साथ न्याय नहीं करता है। उन्होंने लाल कलम से भाषा की त्रुटियों और अंग्रेजी के शब्दों पर गोले लगाए। उस रंगे-पुते समाचारपत्र को लेकर संपादक के कक्ष में भी पहुँच गए। सुदर्शनजी ने समाचारपत्र की वह प्रति संपादक की मेज पर रखकर उन्हें हिन्दी में अनावश्यक अंग्रेजी मिलावट के प्रति सचेत किया। यह बातचीत आक्रोश या अभिमान के साथ नहीं हो रही थी, बल्कि उसमें अपनत्व था। संपादक ने भी स्वीकार किया और विश्वास दिलाया कि हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों की मिलावट और वर्तनी की अशुद्धियों के प्रति सावधान रहेंगे।

शनिवार, 12 सितंबर 2026

उच्च कोटि के वैज्ञानिक थे ‘रज्जू भैया’

संघ शताब्दी वर्ष : ‘रज्जू भैया’ को न्यूक्लियर फिजिक्स पर शोध के लिए अपने साथ लेकर जाना चाहते थे नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर सीवी रमन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चौथे सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ के बारे में कहा जाता है कि यदि वे संघ के प्रचारक नहीं होते तो निश्चित ही देश के महान वैज्ञानिक होते। यह बात यूँ ही नहीं कही जाती है अपितु इसके पीछे ठोस आधार है। रज्जू भैया की वैज्ञानिक प्रतिभा को पहचान कर ही भारत के महान वैज्ञानिक एवं भौतिकी के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक सर चंद्रशेखर वेंकट रमन (सीवी रमन) उन्हें अपने साथ न्यूक्लियर फिजिक्स में शोध कार्य के लिए बेंगलूरु ले जाना चाहते थे। जब डॉ. होमी जहाँगीर भाभा भारत के उभरते परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए देश के शीर्ष भौतिकशास्त्रियों को जोड़ रहे थे, तब भी सर सीवी रमन ने उन्हें रज्जू भैया का नाम सुझाया था। डॉ. भाभा ने भी रज्जू भैया से अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना के साथ जुड़ने का आग्रह किया। परंतु, रज्जू भैया तो पहले ही भौतिक वैज्ञानिक नहीं अपितु समाज वैज्ञानिक बनने का विचार पक्का कर चुके थे। प्रसिद्ध लेखक देवेन्द्र स्वरूप और बृजकिशोर शर्मा द्वारा लिखित रज्जू भैया की जीवनी ‘हमारे रज्जू भैया’ में उल्लेख आता है कि मुंबई प्रवास के दौरान जब डॉ. होमी भाभा की भेंट श्री गुरुजी से हुई, तो उन्होंने यह उलाहना देते हुए कहा था- “गुरुजी, आपके कारण भारत ने एक शीर्ष न्यूक्लियर फिजिसिस्ट (परमाणु वैज्ञानिक) खो दिया”। इस पर श्री गुरुजी ने सहज भाव से उत्तर दिया था- “डॉ. भाभा, रज्जू भैया ने वैज्ञानिक बनना नहीं छोड़ा है; अंतर केवल इतना है कि वह अब भौतिक प्रयोगशाला के बजाय ‘समाज की प्रयोगशाला’ में मनुष्यों को गढ़ने का वैज्ञानिक प्रयोग कर रहे हैं”।

गुरुवार, 10 सितंबर 2026

समर्पण और सादगी के प्रतीक: प्रो. राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक रज्जू भैया संघ में आने से पहले 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में शामिल हुए थे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस जी ने अपने पूर्ववर्ती सरसंघचालकों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए प्रो. राजेन्द्र सिंह उपाख्य ‘रज्जू भैया’ की चतुर्थ सरसंघचालक के रूप में घोषणा की। देवरस जी का स्वास्थ्य उनका साथ नहीं दे रहा था। संघ कार्य के लिए प्रवास करना कठिन हो गया था। संघ कार्य की गति रुके नहीं, इसलिए उन्होंने सरसंघचालक का दायित्व रज्जू भैया को सौंप दिया। 11 मार्च, 1994 का दिन है, जब बालासाहब देवरस जी ने रज्जू भैया को संघ का नेतृत्व सौंपा था। उस दिन नागपुर के रेशिमबाग स्थित डॉ. हेडगेवार सभागार में संघ की निर्णायक सर्वोच्च इकाई ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ की बैठक चल रही थी। देशभर से लगभग एक हजार प्रतिनिधि उपस्थित थे और सरकार्यवाह एचवी शेषाद्रि संघ कार्य का वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत कर रहे थे। ठीक उसी समय, सरसंघचालक बालासाहब व्हीलचेयर से बैठक में आते हैं। उन्होंने अत्यंत शांत और भावुक वातावरण में सभा को संबोधित करते हुए कहा कि “पूजनीय गुरुजी ने मुझ पर यह जिम्मेदारी 1973 में सौंपी थी। आप सबके सहयोग और समर्थन से मैं अब तक उस जिम्मेदारी को अपने कंधों पर उठा पाया, लेकिन गिरते स्वास्थ्य के कारण मेरे लिए अब यात्रा करना संभव नहीं रह गया है। इस कारण सभी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के साथ परामर्श के बाद मैंने यह निर्णय लिया है कि यह जिम्मेदारी अब प्रोफेसर राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) अपने कंधों पर लें। मुझे पूरा भरोसा है कि रज्जू भैया को भी इसी प्रकार का सहयोग और समर्थन मिलता रहेगा। मैं भी एक स्वयंसेवक की भाँति अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहूँगा”। सुबह ठीक 10:40 बजे बालासाहब देवरस जी ने पुष्प गुच्छ और नारियल भेंट कर रज्जू भैया को संघ के चतुर्थ सरसंघचालक का दायित्व सौंपा। 72 वर्ष की उम्र में सरसंघचालक बने रज्जू भैया ने 1994 से 2000 तक, अर्थात् 6 वर्ष इस दायित्व का निर्वहन किया।