सोमवार, 3 अगस्त 2026

भगवा रंग से चिढ़ क्यों?

राष्ट्रध्वज तिरंगा में सबसे ऊपर है भगवा, भारतीय संस्कृति का का परिचायक, त्याग, वैराग्य, साहस, बलिदान और सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत है भगवा

खेल मैदान में राष्ट्रीय ध्वज के रंगों का समावेश कोई नई बात नहीं है, लेकिन भारत की राजनीति में जब भी केसरिया या नारंगी रंग की बात आती है, एक खास राजनीतिक वर्ग में असहजता साफ दिखने लगती है। आगामी हॉकी विश्व कप 2026 के लिए भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीमों की नई जर्सी लॉन्च हुई है। पारंपरिक नीले रंग की जगह इस बार नारंगी रंग को प्राथमिक किट के रूप में चुना गया है। हॉकी इंडिया के अध्यक्ष और पूर्व दिग्गज खिलाड़ी दिलीप तिर्की ने स्पष्ट किया कि नीले टर्फ पर नीले रंग की जर्सी के कारण विजिबिलिटी (दृश्यता) की व्यावहारिक समस्या आ रही थी और यह सुझाव सीधे खिलाड़ियों एवं कोचिंग स्टाफ की तरफ से आया था। इसके बावजूद, सुदीर्घ अनुभव रखनेवाले राजनीतिक दल के नेताओं और उनके समर्थकों ने इसे लेकर एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा करने का प्रयास किया है। हिन्दू पहचान से चिढ़ने वाले नेताओं का यह बयान आया है कि “देश की पहचान अहिंसा, सत्य और भाईचारे से जुड़ी है और इन्हें बदला नहीं जा सकता”। यह बयान इस बात का प्रमाण है कि कैसे एक विशुद्ध रूप से तकनीकी और खेल संबंधी फैसले को जबरन वैचारिक संघर्ष में घसीटा जा रहा है। 

जर्सी का रंग बदलने से देश के नैतिक मूल्य कैसे खतरे में पड़ सकते हैं? भगवा रंग से अहिंसा, सत्य और भाईचारे की पहचान कैसे बदल सकती है? यह तर्क न केवल हास्यास्पद है, बल्कि खेल और खिलाड़ियों की जरूरतों का अपमान भी है। क्या इन राजनेताओं को यह नहीं पता कि भगवा रंग भारत की पहचान है? वास्तव में भगवा रंग तो अहिंसा, सत्य और भाईचारे की पहचान है। यह रंग शांति, त्याग और शौर्य की भी पहचान है। वैभव और वैराग्य दोनों का प्रतिनिधि यह भगवा रंग है। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय आसमान से सबको मोहित करने वाला रंग भगवा ही है। कौन भूल सकता है कि इसी रंग के वस्त्र पहने युवा संन्यास स्वामी विवेकानंद ने 'विश्व धर्म संसद' के मंच से दुनिया को शांति और भाईचारे का पाठ पढ़ाया था। 

भारत के प्रति श्रद्धा रखने वाले किसी भी व्यक्ति को यह समझ नहीं आ रहा है कि इन नेताओं और उनके समर्थकों को किसने बताया कि भगवा रंग से अहिंसा, सत्य और भाईचारे को खतरा पैदा हो जाएगा? अगर ऐसा है, तब भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे पर सबसे ऊपर यह रंग क्यों है? हमारे पूर्वजों ने भगवा रंग को इतना महत्व क्यों दिया कि तिरंगे में उसे सबसे ऊपर स्थान दिया? उल्लेखनीय है कि ध्वज समिति को देशभर से सुझाव तो यही आया था कि हमारे देश का ध्वज एक ही रंग का हो और वह रंग केसरिया हो। यह रंग सदियों से भारत की पहचान है। इसलिए जब तीन रंग का ध्वज चुना गया तब भी भगवा को शीर्ष पर सुशोभित किया गया। 

यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि भ्रमित राजनीति ने मुस्लिम तुष्टीकरण के चक्कर में भगवा रंग को संकीर्ण मानसिकता के साथ देखना शुरू कर दिया है। जबकि ऐसा है नहीं कि मुसलमान चाहते हों कि राजनीतिक दल उनकी खुशामद करने के लिए भगवा रंग से उसी तरह चिढ़ें, जैसे लाल रंग देखकर सांड भड़क उठता है। अपनी कुंठा और हताशा को सही साबित करने के लिए भगवा विरोधी इस गिरोह ने 'भगवा आतंकवाद' जैसी बेसिरपैर की अवधारणा को स्थापित करने के लिए कितनी गहरी साजिश की थी, यह भी सबके सामने है। इसलिए जब भगवा को देखकर इनकी बौखलाहट सामने आती है, तब किसी को कोई आश्चर्य नहीं होता।

याद रहे कि यह पहली बार नहीं है जब भगवा विरोधी गिरोह ने किसी खेल किट में नारंगी रंग के प्रयोग पर आपत्ति जताई हो। 2019 के क्रिकेट विश्व कप के दौरान जब भारतीय टीम इंग्लैंड के खिलाफ अपनी वैकल्पिक नारंगी जर्सी पहनकर मैदान पर उतरी थी, तब भी संकीर्ण मानसिकता के लोगों ने इसे ‘मोदी सरकार का भगवाकरण एजेंडा’ करार देकर बवाल काटा था। जब हम सब यह देखकर विचार करते हैं तब मन में यही सवाल उठता है कि आखिर इन लोगों को नारंगी या भगवा रंग से इतनी समस्या क्यों होती है? 

उल्लेखनीय है कि यह पहली बार नहीं है जब भारतीय हॉकी टीम ने अपनी जर्सी में बदलाव किया हो। इससे पहले भी टीम पीली और हल्के नीले रंग की जर्सी पहनकर खेल चुकी है। वर्ष 2014 के हॉकी विश्वकप के दौरान विजिबिलिटी और तकनीकी जरूरतों के कारण जर्सी का रंग बदलकर पीला कर दिया गया था।इसी प्रकार वर्ष 2018 के विश्वकप में टीम की जर्सी का रंग बदलकर एक नए डिजाइन के साथ आसमानी नीला (स्काई ब्लू) किया गया था। इस संबंध में दो बार के ओलिंपिक कांस्य पदक विजेता प्रसिद्ध गोलकीपर श्रीजेश ने भी संपूर्ण विवाद पर हैरानी जताते हुए कहा है कि "जर्सी का रंग 2014 और 2018 विश्व कप के लिए भी बदला था। यहाँ तक कि हमारी ट्रेनिंग की एक किट भी केसरिया रंग की थी। इस बार विश्व कप से पहले इस पर इतनी चर्चा क्यों हो रही है? क्या इसलिए कि ये केसरिया रंग की है या इसलिए कि रंग बदल गया है"। श्रीजेश ने आग्रह किया है कि जर्सी से जुड़े विवादों को पीछे छोड़कर 50 वर्षों से चला आ रहा पदक का सूखा खत्म करने की ओर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

नईदुनिया (दैनिक जागरण समूह) में 03 अगस्त, 2026 को प्रकाशित समाचार

इसलिए जर्सी का रंग बदलने पर वितंडावाद कर रहे नेताओं को अपनी मानसिकता में बदलाव करना चाहिए। खेल को खेल के मैदान तक ही सीमित रहने देना चाहिए। जब भारतीय खिलाड़ी मैदान में उतरते हैं, तो उनका एकमात्र लक्ष्य देश का गौरव बढ़ाना होता है, न कि किसी राजनीतिक दल के एजेंडे को आगे बढ़ाना। तिरंगे में शामिल केसरिया रंग को नफरत या संदेह की नजरों से देखना खुद राष्ट्र के प्रतीकों का अनादर है। राजनीतिक दलों एवं उसके नेताओं को यह समझना होगा कि हर नारंगी या भगवा रंग राजनीति से प्रेरित नहीं होता, और राष्ट्रीय ध्वज और भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधि रंग से परहेज करके वे अपनी ही राजनीतिक सोच को कटघरे में खड़ा करते हैं।

रविवार, 2 अगस्त 2026

गुरु के रूप में मार्गदर्शन करता है ‘भगवा ध्वज’

संघ शताब्दी वर्ष : गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर स्वयंसेवक ‘भगवा ध्वज’ के समक्ष गुरु दक्षिणा समर्पित करते हैं और संघकार्य के प्रति अपना समर्पण बढ़ाने का संकल्प लेते हैं

एआई से निर्मित प्रतीकात्मक चित्र

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भगवा ध्वज को जो स्थान दिया गया है, वह इस संगठन की विशिष्टता को दर्शाता है। संघ के लिए भगवा केवल ध्वज मात्र नहीं है, अपितु यह उसके प्रेरणा और मार्गदर्शन का केंद्र बिन्दु है। संघ में भगवा ध्वज को ‘गुरु’ के स्थान पर प्रतिष्ठित किया गया है। सामान्यतौर पर यही देखने में आता है कि किसी सांस्कृतिक/धार्मिक संगठन का संस्थापक ही उस संगठन के अनुसरणकर्ताओं के लिए गुरु के रूप में सम्मानित होता है। परंतु संघ इस सामान्य परंपरा से अलग लकीर खींचता दिखायी देता है। जिस प्रकार किसी संस्था से सम्बद्ध लोग गुरु के मार्गदर्शन के अनुसार व्यक्तिगत एवं सामाजिक क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक भगवा ध्वज से प्रेरणा प्राप्त कर सामाजिक क्षेत्र में कार्य करते हैं। संघ में गुरु के रूप में भगवा ध्वज को मान्यता दिए जाने का प्रसंग बहुत प्रेरक है। यह एक प्रसंग ही संघ के ध्येय, उसकी कार्यपद्धति और महानता को बताने के लिए पर्याप्त है। 

विजयादशमी के पर्व पर 1925 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई, तब इसके संबंध में बहुत बातें तय नहीं की गईं। बस हिन्दुओं का संगठन करना है, हिन्दू राष्ट्र को स्वतंत्रत कराना है और उसे परम वैभव पर पहुँचाना है, इसी संकल्प के साथ डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ शुरू कर दिया था। संघ कार्य बढ़ने के साथ ही उसके स्थायित्व एवं दृढ़ीकरण के संबंध में डॉक्टर साहब ने अनेक प्रकार से विचार करना प्रारंभ कर दिया। उन्होंने विचार किया कि संगठन को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना चाहिए। अर्थ के लिए किसी पर आश्रित रहने पर यह संगठन अपने ध्येय पथ पर आगे नहीं बढ़ पाएगा। इस संबंध में डॉक्टर साहब ने उस समय के स्वयंसेवकों के साथ गहन विचार-विमर्श किया। स्वयंसेवकों ने अनेक प्रकार से अपने मत को प्रकट किया, किसी ने चंदा लेने का सुझाव दिया, किसी ने सदस्यता शुल्क, किसी ने दान तो किसी ने अपने ही खर्च से कटौती कर कुछ राशि संघ कार्य के लिए देने का सुझाव दिया। सबके विचार सुनने के बाद दूरदृष्टा डॉ. हेडगेवार ने संघ को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ‘गुरु पूजन एवं समर्पण’ की अभिनव पद्धति की संकल्पना स्वयंसेवकों के सामने रखी और आग्रह किया कि हम भी संघ कार्य के लिए अर्थ पूर्ति के लिए इस पद्धति को स्वीकार करें। 

गुरु पूजन के उत्सव में संघ के स्वयंसेवक एकत्र आते हैं। बौद्धिक होता है। उसके बाद सब भगवा ध्वज को गुरु दक्षिणा समर्पित करते हैं।

समाज में गुरु पूर्णिमा मनाने की परंपरा है। गुरु पूजन के साथ ही लोग अपने गुरु के सामने समर्पण करते हैं। हम भी संघ कार्य के लिए गुरु दक्षिणा करेंगे। डॉक्टरजी की इस संकल्पना से सभी स्वयंसेवकों के विचार को एक नयी दिशा मिली और विशुद्ध भावना से ‘गुरुदक्षिणा’ समर्पण का विचार सभी स्वयंसेवकों के हृदय में बस गया। दो दिन बाद ही व्यास पूर्णिमा थी। इसलिए डॉक्टरजी ने स्वयंसेवकों तक सूचना पहुँचाई कि व्यास पूर्णिमा के दिन सुबह ही स्नान आदि विधि पूर्णकर हम सारे स्वयंसेवक एकत्रित आयेंगे और श्री गुरुपूर्णिमा एवं श्री गुरुदक्षिणा का उत्सव मनाएंगे। डॉक्टरजी की यह सूचना पाते ही स्वभाविक रूप से ही स्वयंसेवकों के मन में विचार चलने लगा कि हम गुरु के नाते किसकी पूजा करेंगे? स्वयंसेवकों का गुरु कौन होगा? सबके मन में यह विचार आया कि डॉक्टरजी के सिवा हमारा गुरु कौन हो सकता है? उन्होंने ही इस संगठन को शुरू किया है। इसलिए उनके प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करने का यह महान अवसर हमें मिला है। हम गुरुपूजन उत्सव में उन्हीं का पूजन करेंगे। कुछ स्वयंसेवकों के विचार में, राष्ट्रगुरु तो समर्थ रामदास स्वामी हैं। प्रार्थना के बाद नित्य हम उनकी जय जयकार करते हैं। उस समय प्रार्थना के बाद समर्थ रामदास स्वामी का जयकारा लगाया जाता था। इस तरह के अनेक विचार स्वयंसेवकों के मन में आ रहे थे। यह स्वभाविक ही था। 

आखिर वह दिन आ गया, जब संघ का पहला गुरु पूजन उत्सव मनाने के लिए स्वयंसेवक एकत्र आए। सबके मन में अपार हर्ष और उत्साह था। परंतु जैसे ही डॉक्टर हेडगेवार ने अपने भाषण में कहा कि- “गुरु के रूप में हम परम पवित्र भगवा ध्वज का पूजन करेंगे और उसके सामने ही समर्पण करेंगे”, तो स्वयंसेवक अचंभित रह गए। भगवा ध्वज को ही गुरु के रूप में मनाने का विचार क्यों बना, इसको स्पष्ट करते हुए डॉक्टरजी ने कहा- ‘‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी भी व्यक्ति को गुरु न मानकर परम पवित्र भगवा ध्वज को ही गुरु मानता है। व्यक्ति कितना भी महान हो फिर भी उसमें अपूर्णता रह सकती है। इसके अतिरिक्त यह नहीं कहा जा सकता कि व्यक्ति सदैव ही अडिग रहेगा। तत्त्व सदा अटल रहता है। उस तत्त्व का प्रतीक भगवा ध्वज भी अटल है। इस ध्वज को देखते ही राष्ट्र का सम्पूर्ण इतिहास, संस्कृति और परम्परा हमारी आँखों के सामने आ जाती है। जिस ध्वज को देखकर मन में स्फूर्ति का संचार होता है वह अपना भगवा ध्वज ही अपने तत्त्व के प्रतीक के नाते हमारे गुरु-स्थान पर है। संघ इसिलए किसी भी व्यक्ति को गुरु-स्थान पर रखना नहीं चाहता’’। भाषण के उपरान्त सर्वप्रथम डॉक्टरजी ने स्वयं गुरु पूजन किया। तदनन्तर समवेत स्वयंसेवकों ने एक-एक करके पूजा की। इस तरह 1928 में नागपुर में हुए पहले गुरु पूर्णिमा उत्सव में केवल 84 रुपये और कुछ आने ही गुरु दक्षिणा आई। आज भी संघ कार्य का व्यय गुरु दक्षिणा की राशि से ही होता है।

एक समय जब कुछ लोगों ने डॉक्टरजी के सम्मुख यह सुझाव रखा कि संघ के ध्वज का आकार बदलकर उसमें कुछ अभिनवता लानी चाहिए, तब डॉक्टरजी ने इस सुझाव का जो उत्तर दिया उससे प्रकट होता है कि ध्वज के सम्बन्ध में उनके मन में कितनी निश्चित और स्पष्ट कल्पना थी। उन्होंने कहा- ‘‘भगवा ध्वज का इतिहास तीन सौ वर्ष का न होकर बहुत पुराना है। कम-से-कम आद्य शंकराचार्य ने तो अपनी दिग्विजय इसी ध्वज की छत्रछाया में की थी। इस विषय में किसी को शंका होने का कारण नहीं है। उससे भी कितने पहले तक इस ध्वज का इतिहास जा सकता है इसका विचार संशोधकों को अवश्य करना चाहिए। हिन्दू राष्ट्र अति पुराना राष्ट्र है। अतः उसका ध्वज भगवा ध्वज भी उतना ही पुरातन है”। कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भगवा ध्वज की राष्ट्रीय, सांस्कृतिक, तात्विक, आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण ही उसे अपने गुरु के स्थान पर सुशोभित किया है। 

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 02 अगस्त, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ 'साधना के सौ वर्ष'

शनिवार, 1 अगस्त 2026

शोर-शराबे में गुम हुआ छात्रों का हित, विपक्ष के निशाने पर रही हिन्दू मान्यताएं

लोकसभा और राज्यसभा में हंगामेदार चर्चा के बीच आखिरकार परीक्षा सुधार का विधेयक ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ पारित हो गया। देश के करोड़ों युवाओं और छात्रों के भविष्य को देखते हुए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दा था। उम्मीद यह थी कि जब प्रश्न पत्र लीक जैसे गंभीर विषय पर संसद में बहस होगी, तो देश को एक ठोस और सर्वसम्मति वाला समाधान देखने को मिलेगा। लेकिन संसद के दोनों सदनों में जो दृश्य देखने को मिला, वह बेहद निराशाजनक रहा। जो विपक्ष कल तक पर्चा लीक के मुद्दे को लेकर सड़कों से लेकर संसद तक हो-हल्ला मचा रहा था, जब विधेयक पर रचनात्मक चर्चा और सुझाव देने का सही समय आया, तब वह पूरी तरह दिशाहीन नजर आया। बहस का रुख परीक्षा प्रणाली के तकनीकी एवं प्रशासनिक सुधारों पर केंद्रित रहने के बजाय ऐसे विषयों की ओर मोड़ दिया गया, जिनका आम छात्रों की समस्याओं और उनके भविष्य से कोई दूर-दूर तक का लेना-देना नहीं था। विशेष रूप से मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के पास यह एक बड़ा अवसर था कि वह परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी और लीक-मुक्त बनाने के लिए अपने ठोस और व्यावहारिक सुझाव पटल पर रखती। इससे देश की जनता और युवाओं के बीच यह संदेश जाता कि विपक्ष के पास महज विरोध करने के बजाय समस्याओं का समाधान करने का एक स्पष्ट एजेंडा भी है। परंतु इस रचनात्मक भूमिका को निभाने के स्थान पर बहस को धार्मिक प्रतीकों, गोमूत्र और मनुस्मृति जैसे विषयों पर लाकर खड़ा कर दिया गया।

सावधान! अब ई20 पर भड़काने की तैयारी

नीट परीक्षा में गड़बड़ी को लेकर हुए कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन की गर्मी अभी शांत भी नहीं हुई है कि आंदोलनजीवियों ने जनता को भ्रमित करने एवं भड़काने के लिए दूसरा विषय खोजना शुरू कर दिया है। पिछले कुछ महीनों से एथनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर एक नकारात्मक नैरेटिव खड़ा करने का प्रयास किया गया है। परिणामस्वरूप, एथनॉल मिश्रित पेट्रोल की नीति को लेकर उठ रही आपत्तियों और राजनीतिक बयानों ने एक बार फिर ऊर्जा संक्रमण की इस प्रक्रिया को व्यापक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। एक तरफ जहां सरकार इसे पर्यावरण संरक्षण, विदेशी मुद्रा की बचत और किसानों की आय बढ़ाने वाले दूरगामी कदम के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों, ट्रांसपोर्ट यूनियनों और आम वाहन चालकों के विरोध प्रदर्शनों ने नीति के व्यावहारिक क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

सोमवार, 27 जुलाई 2026

“यदि अस्पृश्यता (छुआछूत) गलत नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है” – बालासाहब देवरस

संघ शताब्दी वर्ष : हिन्दू एकता एवं समरसता पर बालासाहब के क्रांतिकारी विचार


हिन्दू समाज की एकता और सामाजिक समरसता पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस के विचार अत्यंत स्पष्ट, प्रखर और क्रांतिकारी थे। ‘वसंत व्याख्यानमाला’ का उनका भाषण विश्व के ऐतिहासिक एवं महान भाषणों में शामिल किया जा सकता है। 8 मई, 1974 में पुणे में हुए अपने इस भाषण में छुआछूत (अस्पृश्यता) को लेकर बालासाहब ने जो कहा, वैसा खरा-खरा शायद ही किसी ने बोला हो। अब्राहम लिंकन के प्रसिद्ध विचार- “अगर गुलामी अनैतिक या गलत नहीं है, तो फिर कुछ भी गलत नहीं है”- का उल्लेख करते हुए बालासाहब ने कहा- “अगर छुआछूत गलत नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है”। जातिगत भेदभाव के निर्मूलन के लिए काम करने वाले महानुभाव अक्सर इस ओर या उस ओर खड़े दिखाई देते हैं। उनके विचारों में राजनीति, परस्पर द्वेष और कटुता रहती है। लेकिन बालासाहब के विचारों में स्पष्टता के साथ-साथ आत्मीयता और बंधुता की झलक दिखाई देती है। सामाजिक समरसता पर उनके विचार समाधानमूलक और व्यावहारिक हैं। बालासाहब जी का मानना था कि “विषमता नष्ट करने के प्रयासों में सभी का सहभाग अपेक्षित है। संयम के साथ उत्तम व्यवहार के द्वारा यह प्रयास होंगे तभी उसमें सफलता मिलेगी”।

बुधवार, 22 जुलाई 2026

आंदोलन को बदनाम करते हिंसक प्रदर्शन

अराजक तत्वों ने हड़प लिए छात्रों के जरूरी मुद्दे, उनके मंच पर कब्जाकर अपना नैरेटिव चलाने का किया प्रयास


देश में प्रमुख परीक्षाओं की पारदर्शिता और लाखों युवाओं का भविष्य अत्यंत संवेदनशील विषय हैं। परीक्षाओं के आयोजन में लगातार हो रही गड़बड़ियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार को इस पर कोई ठोस रणनीति बनानी ही चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि नीट परीक्षा को लेकर उठी चिंताएं पूरी तरह उचित हैं। एक अभिभावक की भाँति उन्होंने युवाओं को आश्वस्त किया है कि उनके भविष्य से खिलवाड़ करने वाले किसी भी दोषी को छोड़ा नहीं जाएगा और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत कठोर कार्रवाई की जाएगी। उल्लेखनीय है कि सरकार ने नीट परीक्षा में हुई गड़बड़ी पर संज्ञान लेकर उसका फिर से व्यवस्थित आयोजन कराया है। इसके बावजूद, इस संवेदनशील मुद्दे की आड़ में जिस तरह दिल्ली की सड़कों पर हिंसा, उपद्रव और ‘चलो संसद’ के नाम पर अराजकता फैलाई गई, वह देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

“जिन्होंने हेडगेवारजी को नहीं देखा, वे बालासाहब को देख लें”

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस के लिए कहा जाता था कि वे संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की प्रतिमूर्ति थे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस उपाख्य बालासाहब देवरस संघ की पहली शाखा के स्वयंसेवक थे। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर के मोहिते बाड़े में जो शाखा लगाई थी, बालासाहब उसी शाखा के स्वयंसेवक थे। डॉक्टर साहब के संपर्क में आने के बाद 1927 में केवल 11 वर्ष की आयु में बालासाहब देवरस ने शाखा जाना प्रारंभ कर दिया। संघ शिल्पी डॉक्टर साहब ने स्वयं अपने हाथों से बालासाहब के व्यक्तित्व को गढ़ा और उन्हें प्रशिक्षित किया। उन्होंने संघ रूपी बीज बालासाहब के हृदय में बोया। जिस प्रकार छत्रपति शिवाजी महाराज ने ‘हिन्दवी स्वराज्य’ का सपना अपने मित्रों के हृदय में जैसे का तैसा उतार दिया था, उसी प्रकार डॉक्टर साहब ने भी स्वयंसेवकों के पहले समूह के मन-मस्तिष्क में संघ की विराट अवधारणा को उतार दिया था। देवरस जी ने डॉक्टर साहब की आँखों से ही संघ को देखा, उनकी दृष्टि के अनुरूप ही संघ की सृष्टि का विकास एवं विस्तार किया। 12 वर्ष से लेकर 70 वर्ष की आयु तक बालासाहब ने एक तपस्वी और सच्चे स्वयंसेवक की भाँति अपना जीवन जिया। उन्होंने सबके सामने उदाहरण प्रस्तुत किया कि राष्ट्र के लिए किस प्रकार जिया जाता है। संघ के स्वयंसेवक बालासाहब में संघ सृष्टि के निर्माता डॉक्टर साहब की छवि देखते थे। वर्ष 1943 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रशिक्षण शिविर (संघ शिक्षा वर्ग) पुणे में चल रहा था, जहाँ एक दिन बालासाहब देवरस का बौद्धिक होना था। बौद्धिक से पहले वक्ता का परिचय कराने के लिए तत्कालीन सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ खड़े हुए। बालासाहब के परिचय में उन्होंने कहा कि “आपमें से कइयों ने डॉ. हेडगेवारजी को नहीं देखा होगा। अगर आप बालासाहब देवरस को देखेंगे तो आपके सामने डॉ. हेडगेवारजी खड़े नजर आएंगे”।