शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

न्यूजरूम के यथार्थ से जोड़ती संपादन-कला

पुस्तक चर्चा : सोशल मीडिया और आधुनिक पत्रकारिता के दौर में सामग्री परिमार्जन का प्रामाणिक पाठ है प्रो. अरुण कुमार भगत की पुस्तक ‘संपादन-कला : सिद्धांत से व्यवहार तक’


सोशल मीडिया के इस दौर में एक बात सबको साफ़ समझ आ गई है कि पत्रकारिता में संपादन का बहुत महत्व है। पत्रकारिता केवल रिपोर्टिंग नहीं है। यह सत्य है कि पत्रकारिता में जानकारी एकत्र करके लाना सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण कार्य है यह तय करना कि उस जानकारी को किस प्रकार से प्रसारित करना है, या प्रसारित करना भी है या नहीं? संपादन की अच्छी समझ होने पर ही हम उस जानकारी को लोकोपयोगी बना सकते हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पत्रकारिता की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता बहुत हद तक उसके संपादन पक्ष पर टिकी होती है। इसलिए संपादन-कला का कौशल सबको सीखना चाहिए। सूचनाओं के प्रचार-प्रसार में शामिल सभी लोगों को संपादन की बुनियादी बातें पता होनी चाहिए। मीडिया के आचार्य रहे वरिष्ठ लेखक एवं बिहार लोक सेवा आयोग के सदस्य प्रो. अरुण कुमार भगत की पुस्तक ‘संपादन-कला : सिद्धांत से व्यवहार तक’ इन बुनियादी बातों को सिखाने में बहुत उपयोगी साबित होगी। पुस्तक के शीर्षक और उसकी विषय-वस्तु को देखकर यह अनुमान न लगाएं कि यह केवल पत्रकारिता के विद्यार्थियों के उपयोग की पुस्तक है। यह उन सबके लिए उपयोगी है, जो सोशल मीडिया में लिख-पढ़ रहे हैं।

प्रो. भगत ने अपने अनुभव का निचोड़ इस पुस्तक में उतार दिया है। उन्होंने संपादन को एक जीवंत शिल्प, सौंदर्य और प्रबंधन कौशल के रूप में प्रस्तुत किया है। पुस्तक के आरंभ में लेखक ने संपादन के अर्थ और अवधारणा को परिभाषित किया है ताकि कोई भी संपादन कला को केवल सामग्री की काट-छाँट तक सीमित करके न देखे। सामान्य तौर पर संपादन का अर्थ यह लगाया जाता है कि किसी समाचार या पाठ्य सामग्री को छोटा करने के साथ-साथ उसे चुस्त-दुरुस्त करना। संपादन का अर्थ अनेक अवसरों पर सामग्री का विस्तार करना भी होता है। सामग्री में तथ्यों की कोई कमी दिखे तो उसे जोड़ना भी संपादन है।

अपनी पुस्तक 'संपादन कला : सिद्धांत से व्यवहार तक' भेंट करते प्रो. अरुण कुमार भगत एवं साथ में हैं मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे।

लेखक ने संपादन कला को और सरल ढंग से समझाने के लिए बताया है कि जिस प्रकार माली बगीचे को सजाता है और मूर्तिकार अनगढ़ पत्थर को तराशकर सजीव बना देता है, उसी प्रकार संपादक कच्ची सामग्री को परिमार्जित कर उसे पठनीय और संप्रेषणीय बनाता है। इसमें केवल सामग्री का संक्षेपण ही नहीं, बल्कि आवश्यकतानुसार ‘वैल्यू एडिशन’ (पल्लवन) और संदर्भ जोड़ना भी शामिल है।

लेखक प्रो. भगत ने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि पुस्तक संपादन के सैद्धांतिक पक्ष से परिचय कराने के साथ-साथ व्यावहारिक कौशल भी सिखाए। कहना होगा कि यह पुस्तक पाठकों को सीधे न्यूजरूम की कार्यप्रणाली से जोड़ती है। इसलिए पाठकों को पत्र-पत्रिकाओं के आंतरिक कार्यालयीन स्वरूप, संपादकीय कक्ष की संरचना, पदानुक्रम और कार्य-प्रणाली का सूक्ष्म विवरण मिलता है। एक अध्याय में आकर्षक शीर्षक लिखने के सूत्र भी दिए गए हैं। आपने अच्छी कहानी या समाचार लिखा है लेकिन उसके शीर्षक में दम नहीं है, तब आपको अपेक्षित संख्या में पाठक नहीं मिलेंगे। पाठकों को आमंत्रित करने का काम शीर्षक ही करता है। इसलिए इस अध्याय में हम शीर्षक की आत्मा, उसके प्रकार, तकनीक और सौंदर्य को जानने के साथ ही आकर्षक एवं तथ्यपरक शीर्षक गढ़ने की कला सीखते हैं। पुस्तक में संपादन के साथ-साथ सामग्री के प्रस्तुतिकरण, ले-आउट एवं डिजाइन पर उपयोगी सैद्धांतिक सामग्री दी गई है।

भाषा-शैली और दृष्टि :

लेखक प्रो. भगत की लेखन-शैली की सबसे बड़ी खूबी उनकी प्रांजल, प्रवाहपूर्ण और मानक हिंदी है। वे जटिल तकनीकी अवधारणाओं को भी सहज और ग्राह्य उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट करते हैं। पुस्तक में सैद्धांतिक परिभाषाओं के साथ-साथ व्यावहारिक सुझावों का जो संतुलन साधा गया है, वह लेखक के अकादमिक और व्यावहारिक अनुभव की गहरी छाप छोड़ता है। एक और बहुत महत्व की बात है—लेखक ने विदेशी विद्वानों की अपेक्षा भारत के मूर्धन्य पत्रकारों एवं लेखकों के दृष्टिकोण से संपादन कला को परिभाषित किया है। सामान्य तौर पर लेखक किसी भी विषय के सैद्धांतिक पक्ष को परिभाषित करने के लिए विदेशी विद्वानों को उद्धृत करते हैं।

हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में संपादन पर पुस्तकों का अभाव नहीं है, परंतु ऐसी कृतियाँ कम हैं जो संपादकीय डेस्क के दैनिक दबाव, समय-सीमा (डेडलाइन), पुनर्लेखन की चुनौतियों और विजुअल एस्थेटिक्स को एक साथ समाहित करती हों। यह पुस्तक इस शून्यता को प्रभावी ढंग से भरती है। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित प्रो. अरुण कुमार भगत की पुस्तक ‘संपादन कला : सिद्धांत से व्यवहार तक’ पत्रकारिता एवं जनसंचार के विद्यार्थियों, शोधार्थियों, मीडिया प्राध्यापकों और मुख्यधारा की पत्रकारिता में कार्यरत उप-संपादकों के लिए एक उपयोगी एवं मार्गदर्शक पुस्तक सिद्ध होगी।

पुस्तक : संपादन कला : सिद्धांत से व्यवहार तक

लेखक: अरुण कुमार भगत

प्रकाशक: वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली

पृष्ठ संख्या: 160

मूल्य: ₹325

स्वदेश ज्योति में 12 सितंबर, 2026 को प्रकाशित प्रो. अरुण कुमार भगत की पुस्तक 'संपादन कला : सिद्धांत से व्यवहार तक' की समीक्षा। समीक्षक हैं- डॉ. लोकेन्द्र सिंह

रविवार, 13 सितंबर 2026

हिन्दी समाचारपत्र में अंग्रेजी शब्दों पर ‘लाल गोले’ लगाकर संपादक के पास पहुँच गए थे सुदर्शन जी

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पाँचवें सरसंघचालक श्री कुप्पहल्ली सीतारामय्या सुदर्शन स्वभाषा के प्रबल पक्षधर थे, हिन्दी में अंग्रेजी की मिलावट वे पसंद नहीं करते थे


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक कुप्प. सी. सुदर्शन भाषा की शुद्धता और व्याकरण को लेकर बेहद संवेदनशील थे। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में वर्तनी एवं व्याकरण की अशुद्धियों को वे कतई नजरअंदाज नहीं करते थे। भले ही उनकी अपनी मातृभाषा तमिल थी, लेकिन जन्मभूमि एवं कर्मभूमि हिन्दी भाषी क्षेत्र रहा। शायद इसलिए ही हिन्दी से उन्हें गहरा प्रेम था। हालांकि, सुदर्शनजी लगभग 12 भाषाओं पर अधिकार रखते थे। परिवार तमिल था लेकिन पूर्वज वर्षों पहले तमिलनाडु से स्थानांतरित होकर कर्नाटक में बस गए थे इसलिए कन्नड़ ही उनके परिवार की मुख्य भाषा बन गई थी। भाषा प्रेम को लेकर सुदर्शन जी के अनेक प्रेरक प्रसंग प्रचलित हैं। ऐसा ही एक किस्सा भोपाल का है, जब वे सरसंघचालक के दायित्व से मुक्त होकर ‘एक साधारण स्वयंसेवक’ की भाँति रह रहे थे। हिन्दी के हृदय प्रदेश, ‘मध्यप्रदेश’ से प्रकाशित हिन्दी के प्रमुख समाचार पत्र में जब उन्होंने अंग्रेजी के शब्दों की भरमार देखी, तो उन्हें क्षोभ हुआ। समाचारपत्र अपनी प्रतिष्ठा तो इस नाते करता है कि वह हिन्दी का सबसे बड़ा और सबसे अधिक प्रसारित समाचार पत्र है लेकिन हिन्दी भाषा के साथ न्याय नहीं करता है। उन्होंने लाल कलम से भाषा की त्रुटियों और अंग्रेजी के शब्दों पर गोले लगाए। उस रंगे-पुते समाचारपत्र को लेकर संपादक के कक्ष में भी पहुँच गए। सुदर्शनजी ने समाचारपत्र की वह प्रति संपादक की मेज पर रखकर उन्हें हिन्दी में अनावश्यक अंग्रेजी मिलावट के प्रति सचेत किया। यह बातचीत आक्रोश या अभिमान के साथ नहीं हो रही थी, बल्कि उसमें अपनत्व था। संपादक ने भी स्वीकार किया और विश्वास दिलाया कि हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों की मिलावट और वर्तनी की अशुद्धियों के प्रति सावधान रहेंगे।

शनिवार, 12 सितंबर 2026

उच्च कोटि के वैज्ञानिक थे ‘रज्जू भैया’

संघ शताब्दी वर्ष : ‘रज्जू भैया’ को न्यूक्लियर फिजिक्स पर शोध के लिए अपने साथ लेकर जाना चाहते थे नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर सीवी रमन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चौथे सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ के बारे में कहा जाता है कि यदि वे संघ के प्रचारक नहीं होते तो निश्चित ही देश के महान वैज्ञानिक होते। यह बात यूँ ही नहीं कही जाती है अपितु इसके पीछे ठोस आधार है। रज्जू भैया की वैज्ञानिक प्रतिभा को पहचान कर ही भारत के महान वैज्ञानिक एवं भौतिकी के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक सर चंद्रशेखर वेंकट रमन (सीवी रमन) उन्हें अपने साथ न्यूक्लियर फिजिक्स में शोध कार्य के लिए बेंगलूरु ले जाना चाहते थे। जब डॉ. होमी जहाँगीर भाभा भारत के उभरते परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए देश के शीर्ष भौतिकशास्त्रियों को जोड़ रहे थे, तब भी सर सीवी रमन ने उन्हें रज्जू भैया का नाम सुझाया था। डॉ. भाभा ने भी रज्जू भैया से अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना के साथ जुड़ने का आग्रह किया। परंतु, रज्जू भैया तो पहले ही भौतिक वैज्ञानिक नहीं अपितु समाज वैज्ञानिक बनने का विचार पक्का कर चुके थे। प्रसिद्ध लेखक देवेन्द्र स्वरूप और बृजकिशोर शर्मा द्वारा लिखित रज्जू भैया की जीवनी ‘हमारे रज्जू भैया’ में उल्लेख आता है कि मुंबई प्रवास के दौरान जब डॉ. होमी भाभा की भेंट श्री गुरुजी से हुई, तो उन्होंने यह उलाहना देते हुए कहा था- “गुरुजी, आपके कारण भारत ने एक शीर्ष न्यूक्लियर फिजिसिस्ट (परमाणु वैज्ञानिक) खो दिया”। इस पर श्री गुरुजी ने सहज भाव से उत्तर दिया था- “डॉ. भाभा, रज्जू भैया ने वैज्ञानिक बनना नहीं छोड़ा है; अंतर केवल इतना है कि वह अब भौतिक प्रयोगशाला के बजाय ‘समाज की प्रयोगशाला’ में मनुष्यों को गढ़ने का वैज्ञानिक प्रयोग कर रहे हैं”।

गुरुवार, 10 सितंबर 2026

समर्पण और सादगी के प्रतीक: प्रो. राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक रज्जू भैया संघ में आने से पहले 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में शामिल हुए थे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस जी ने अपने पूर्ववर्ती सरसंघचालकों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए प्रो. राजेन्द्र सिंह उपाख्य ‘रज्जू भैया’ की चतुर्थ सरसंघचालक के रूप में घोषणा की। देवरस जी का स्वास्थ्य उनका साथ नहीं दे रहा था। संघ कार्य के लिए प्रवास करना कठिन हो गया था। संघ कार्य की गति रुके नहीं, इसलिए उन्होंने सरसंघचालक का दायित्व रज्जू भैया को सौंप दिया। 11 मार्च, 1994 का दिन है, जब बालासाहब देवरस जी ने रज्जू भैया को संघ का नेतृत्व सौंपा था। उस दिन नागपुर के रेशिमबाग स्थित डॉ. हेडगेवार सभागार में संघ की निर्णायक सर्वोच्च इकाई ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ की बैठक चल रही थी। देशभर से लगभग एक हजार प्रतिनिधि उपस्थित थे और सरकार्यवाह एचवी शेषाद्रि संघ कार्य का वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत कर रहे थे। ठीक उसी समय, सरसंघचालक बालासाहब व्हीलचेयर से बैठक में आते हैं। उन्होंने अत्यंत शांत और भावुक वातावरण में सभा को संबोधित करते हुए कहा कि “पूजनीय गुरुजी ने मुझ पर यह जिम्मेदारी 1973 में सौंपी थी। आप सबके सहयोग और समर्थन से मैं अब तक उस जिम्मेदारी को अपने कंधों पर उठा पाया, लेकिन गिरते स्वास्थ्य के कारण मेरे लिए अब यात्रा करना संभव नहीं रह गया है। इस कारण सभी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के साथ परामर्श के बाद मैंने यह निर्णय लिया है कि यह जिम्मेदारी अब प्रोफेसर राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) अपने कंधों पर लें। मुझे पूरा भरोसा है कि रज्जू भैया को भी इसी प्रकार का सहयोग और समर्थन मिलता रहेगा। मैं भी एक स्वयंसेवक की भाँति अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहूँगा”। सुबह ठीक 10:40 बजे बालासाहब देवरस जी ने पुष्प गुच्छ और नारियल भेंट कर रज्जू भैया को संघ के चतुर्थ सरसंघचालक का दायित्व सौंपा। 72 वर्ष की उम्र में सरसंघचालक बने रज्जू भैया ने 1994 से 2000 तक, अर्थात् 6 वर्ष इस दायित्व का निर्वहन किया।

प्रधानमंत्री मोदी का युवाओं से जुड़ाव

राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव को भांपकर अपनी रणनीति ढाल लेना ही किसी राजनेता की सबसे बड़ी ताकत होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर बार अपनी ऊर्जावान सक्रियता और अप्रत्याशित पहलकदमी से चौंकाते हैं। वडोदरा में ‘जेन-जी’ के छह हजार युवाओं के बीच प्रधानमंत्री की मौजूदगी महज एक सरकारी या औपचारिक संवाद नहीं थी, बल्कि यह बदलते भारत की नब्ज पर हाथ रखने की एक सोची-समझी राजनीतिक और विकासात्मक कवायद थी। मंच पर क्वीन का कालजयी गीत ‘वी विल रॉक यू’ और ‘आरी आरी’ की गूंज के बीच वाई-आकार के रैंप पर चलकर युवाओं के करीब पहुंचना यह साबित करता है कि वे आज की युवा संस्कृति और उनके तेवर को बखूबी समझते हैं।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

‘तत्त्वमसि’: संघ दर्शन और प्रचारक जीवन की कथा-यात्रा

देखें यह वीडियो : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, प्रचारक जीवन, संघ से जुड़े प्रश्नों एवं दृष्टिकोण पर केन्द्रित वरिष्ठ प्रचारक एवं साहित्यकार श्रीधर पराडकर जी का उपन्यास


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पक्ष एवं प्रतिपक्ष में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। लेकिन ‘तत्त्वमसि’ मुझे बाकी सब पुस्तकों से अलग लगती है। यह एक ऐसा उपन्यास है, जिसका कथानक संघ के प्रचारक को केंद्र में रखकर बुना गया है। ‘तत्त्वमसि’ कथा-साहित्य के माध्यम से संघ की आंतरिक कार्यप्रणाली और दर्शन को प्रस्तुत करने का एक रोचक प्रयास है। वरिष्ठ प्रचारक एवं साहित्यकार श्रीधर पराड़कर का यह उपन्यास प्रचारक जीवन, उसके त्याग और समाज-केंद्रित अध्यात्म को रेखांकित करता है।

गुरुवार, 3 सितंबर 2026

विश्व बंधुत्व का संदेश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन की यात्रा पर पहुँचे सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने अमेरिका के बाद कनाडा में भारतीय विचार को दुनिया के सामने रखा है। जिस प्रकार न्यूयॉर्क में उन्होंने दुनिया को शांति और सह-अस्तित्व के साथ चलने की राह दिखायी, उसी प्रकार उन्होंने टोरंटो में भारत के उदात्त विचार को सबके साथ साझा किया। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य जब भू-राजनीतिक तनावों, संकीर्ण राष्ट्रवाद और वैचारिक ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रहा है, तब भारत का विचार ही सही राह दिखा सकता है। प्रारंभ से लेकर आज तक विश्व में भारत की प्रतिष्ठा भी उसके दर्शन को लेकर रही है। कहना होगा कि टोरंटो में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का ‘हिंदू विश्व बंधु’ संबोधन केवल एक सांस्कृतिक व्याख्यान नहीं, बल्कि विश्व शांति के लिए एक अनिवार्य दृष्टि प्रस्तुत करता है। उनका यह कथन कि विविधता एकता की विरोधी नहीं बल्कि उसकी स्वाभाविक और सुंदर अभिव्यक्ति है, भारतीय चिंतन के उस मूल तत्त्व को रेखांकित करता है जिसे आज की खंडित दुनिया को गहराई से समझने की आवश्यकता है। भारतीय मनीषा ने विविधता को कभी संकट या विभाजन के स्रोत के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे एक ही चेतना के बहुरंगी स्वरूप के रूप में स्वीकार और सम्मानित किया है।