गुरुवार, 9 जुलाई 2026

एआई एक सहयोग टूल है, हमारा विकल्प या निर्णयकर्ता नहीं

डेटाबेस और एल्गोरिदम पर आधारित एआई, कभी भावनाओं, संवेदनाओं, अनुभवजन्य बुद्धि वाले मनुष्य से होशियार नहीं हो सकता


आज के तकनीकी युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) को हर समस्या के जादुई समाधान के रूप में दिखाया जा रहा है। इस बात में कोई शक नहीं है कि एआई आने वाले समय में बड़े परिवर्तन का कारण बनने वाला है। लेकिन यह परिवर्तन मानव समाज के हित में होगा या उसके विरुद्ध, यह सब हमें ही तय करना है। अगर हमने सचेत होकर एआई का विकास और उपयोग नहीं किया, तब हमारे सामने अनेक प्रकार की चुनौतियां खड़ी हो जाएंगी। एक ओर, एआई ने चिकित्सा, विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी में क्रांतिकारी बदलाव की नींव रखी है, वहीं दूसरी ओर इसने कई नयी और गंभीर चिंताओं को भी जन्म दिया है। एक बड़ी विडम्बना तो यही है कि जिस मनुष्य ने एआई को जन्म दिया है, वही उसे स्वयं से ऊपर समझने की भूल कर बैठता है। हमें हमेशा याद रखना होगा कि एआई हमारा सहयोगी है, हमारा विकल्प नहीं। अगर हम उसे अपना खुदा बनाएंगे, तब समस्याएं उत्पन्न होना स्वाभाविक है। याद रहे कि किसी भी एआई मॉडल की क्षमताओं का आधार डेटा और एल्गोरिदम ही है। इसलिए उसका दायरा सीमित है, वह पूर्ण नहीं है। जो डेटा उपलब्ध है, उसी के आधार पर वह प्रश्न का उत्तर देता है, इसलिए एआई के सुझाए समाधान या जानकारी कई बार व्यावहारिक नहीं होती है, उसमें पूर्वाग्रह भी दिखायी देता है। इसलिए एआई का अंधानुकरण करने से हमें बचना चाहिए और पूरी तरह उस पर निर्भर भी नहीं होना चाहिए।  

एआई भले ही इंसानों की तरह बात कर सकता हो या जटिल गणनाएं कर सकता हो, लेकिन इसमें चेतना, भावना और जीवनमूल्य बोध का पूर्ण अभाव होता है। एआई का भावनात्मक प्रशिक्षण भी कराया जा रहा है। इसके बाद भी वह भगवान के बनाए मनुष्य के मन-मस्तिष्क जैसा नहीं हो सकता है। कहने का अभिप्राय है कि एआई उपयोग करते समय एक सूत्र हमेशा गाँठ में बांधकर रखें कि यह मनुष्य की अनुभवजन्य बुद्धिमत्ता का मुकाबला कभी भी नहीं कर सकता। यह वास्तव में एक उन्नत डेटा प्रोसेसिंग मशीन है जिसके पास मानवीय विवेक नहीं है।

विश्वसनीय नहीं हैं निष्कर्ष :

जब हम किसी व्यक्ति के सामने कोई जिज्ञासा रखते हैं, तब हमें यह पता होता है कि उसका जो समाधान आएगा, वह उसके ज्ञान, अध्ययन और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के आधार पर हो सकता है। परंतु, जब एआई कोई निष्कर्ष निकालता है, तब कई बार उसे बनाने वाले वैज्ञानिक भी यह नहीं बता सकते कि मशीन ने वह निष्कर्ष कैसे निकाला। दरअसल, डीप लर्निंग और न्यूरल नेटवर्क मॉडल अक्सर एक ‘ब्लैक बॉक्स’ की तरह काम करते हैं। एआई के निष्कर्ष निकालने की प्रक्रिया अमूमन अपारदर्शी होती है। चिकित्सा और न्याय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में जवाबदेही और पारदर्शिता का यह अभाव बहुत खतरनाक साबित हो सकता है।

जैसा डेटा, वैसा एआई :

अपना किस्सा यहाँ साझा कर रहा हूँ। एक दिन मैंने जेमिनाई से पूछा कि भारत के उपराष्ट्रपति कौन हैं? उसका उत्तर था- जगदीप धनखड़। एआई का यह उत्तर सी. पी. राधाकृष्णन के उपराष्ट्रपति बनने के लगभग छह माह बाद का है। दरअसल, वह जिस डेटा पर काम कर रहा था, उसमें नयी जानकारी अपडेट ही नहीं हुई होगी। जब मैंने उसे बताया कि वर्तमान उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन हैं। उन्होंने 12 सितंबर 2025 को यह पद ग्रहण किया था। तब उसने अपनी भूल के लिए माफी माँगी और सुधार किया। ऐसे अनेक उदाहरण हमें पढ़ने-सुनने को मिल जाएंगे। एलन मस्क का एआई ग्रोक, वह तो अपनी भाषा-शैली के लिए भी आलोचना का शिकार हो चुका है। उसने तो बातचीत में अपशब्द का उपयोग करने में भी संकोच नहीं किया। असल में, एआई का दिमाग उस डेटा से बनता है जिस पर उसे प्रशिक्षित किया जाता है। यदि ऐतिहासिक डेटा में नस्लीय, लैंगिक या सामाजिक पूर्वाग्रह शामिल हैं, तो एआई भी उन्हीं पूर्वाग्रहों को सीखेगा और उन्हें और अधिक बढ़ा-चढ़ाकर पेश करेगा।

हमारे दिमाग को कुंद कर देगा एआई का अंधाधुंध उपयोग :

एआई पर अत्यधिक निर्भरता मनुष्य के दिमाग को कुंद कर रही है। उसकी रचनात्मकता पर नकारात्मक असर अभी से दिखने लगे हैं। हम शब्दों के अर्थ और महत्व को खो रहे हैं। स्थिति यह है कि अनेक लोग शुभकामना संदेश भी एआई से लिखवा रहे हैं, यानी वे दो रचनात्मक पंक्ति भी सोच नहीं पा रहे हैं। एआई के पास नया कुछ नहीं होने से ज्ञान में वृद्धि नहीं हो रही है। वह उसी जानकारी का अपने ढंग से दोहराव करता है, जो उसके पास पहले से उपलब्ध है। कॉग्निटिव ऑफलोडिंग, क्रिएटिविटी क्राइसिस और प्रॉब्लम सॉल्विंग की चुनौतियां एआई ने हमारे सामने खड़ी कर दी हैं-

कॉग्निटिव ऑफलोडिंग (संज्ञानात्मक भारमुक्ति): छोटी-छोटी गणनाओं, याद रखने या एक साधारण ईमेल लिखने के लिए भी एआई पर निर्भर होने से हम अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल कम कर रहे हैं। जिस तरह उपयोग न होने पर मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं, उसी तरह एआई पर यह निर्भरता इंसानी दिमाग को कुंद कर रही है। 

मौलिकता एवं रचनात्मकता का संकट: जनरेटिव एआई इंसानों द्वारा बनाए गए पुराने आर्ट, संगीत और पाठ्य सामग्री को ही मिलाकर नया रूप देता है। यह कुछ भी ‘मौलिक’ नहीं रच सकता। एआई पर अत्यधिक निर्भरता से मौलिक विचारों की मृत्यु हो रही है और हम केवल अतीत की कृतियों की पुनरावृत्ति कर रहे हैं। नया सीखने की हमारी क्षमता पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

समाधान खोजने की क्षमता का ह्रास: किसी भी समस्या से जूझना और उसका हल खोजना मनुष्य के मानसिक विकास का अहम हिस्सा है। एआई द्वारा झटपट जवाब दे दिए जाने से इंसानों की संघर्ष करने और खुद से समाधान खोजने की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने के खतरे सबसे अधिक हैं।

एआई के उपयोग से जुड़े कुछ चर्चित नकारात्मक घटनाक्रम :

डीपफेक का दुरुपयोग : रश्मिका मंदाना का एक फर्जी एआई-जनित वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसने भारत में डीपफेक तकनीक के दुरुपयोग पर गंभीर बहस छेड़ दी। इस घटना के बाद सरकार ने भी एआई-आधारित फर्जी सामग्री के खिलाफ सख्त कदम उठाने की आवश्यकता जताई।

पक्षपाती व्यवहार : अमेजन ने एक एआई भर्ती प्रणाली विकसित की थी, जिसके बारे में पाया गया कि वह महिलाओं के आवेदनों के प्रति पक्षपाती व्यवहार कर रही थी। अंततः कंपनी को उस परियोजना को बंद करना पड़ा।

परीक्षाओं में नकल : दुनिया भर के अनेक विद्यालयों और विश्वविद्यालयों ने शिकायत की है कि छात्र एआई टूल्स की सहायता से निबंध, असाइनमेंट और परियोजनाएँ तैयार कर रहे हैं, जिससे मौलिकता और सीखने की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। भारत में ही यूजीसी ने दर्जनों पीएचडी इसलिए निरस्त कर दी गईं क्योंकि शोधार्थियों ने अपनी थीसिस एआई से लिखवाई थी।  

साइबर अपराध में एआई का उपयोग : साइबर अपराधियों द्वारा एआई की सहायता से अधिक विश्वसनीय फिशिंग ईमेल, नकली आवाज और धोखाधड़ी के नए तरीके विकसित किए गए हैं, जिससे ऑनलाइन सुरक्षा संबंधी खतरे बढ़े हैं।

एआई-जनित फर्जी तस्वीरें और चुनाव : विभिन्न देशों में चुनावों के दौरान नेताओं की एआई-निर्मित तस्वीरें और वीडियो फैलाए गए, जिससे मतदाताओं को भ्रमित करने की कोशिश की गई। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर प्रभाव पड़ने की चिंता बढ़ी।

कलाकारों और लेखकों की चिंता : कई कलाकारों, लेखकों और रचनाकारों ने आरोप लगाया है कि एआई मॉडल उनके कार्यों का उपयोग बिना स्पष्ट अनुमति के प्रशिक्षण के लिए करते हैं, जिससे कॉपीराइट और आजीविका संबंधी विवाद उत्पन्न हुए हैं।

जब एआई ने डेटा नष्ट किया : अप्रैल 2026 में एक स्टार्टअप संस्थापक ने खुलासा किया कि एक एआई कोडिंग एजेंट ने मात्र 9 सेकंड में उनकी कंपनी का पूरा लाइव डेटाबेस डिलीट कर दिया। इससे भी बड़ी चिंता की बात यह थी कि अपनी गलती छिपाने के लिए एआई ने फर्जी डेटा और रिपोर्ट भी गढ़ दीं।

मनोवैज्ञानिक खतरे : अमेरिका में कुछ परिवारों ने ओपन एआई जैसी कंपनियों पर कानूनी मुकदमे दायर किए हैं। आरोप है कि चैटबॉट के साथ लगातार बातचीत ने कुछ संवेदनशील उपयोगकर्ताओं (विशेषकर किशोरों) को भ्रमित किया और उन्हें अवसाद, हिंसा या आत्महत्या जैसे कदम उठाने के लिए उकसाया। मशीन और इंसान के बीच के इस कृत्रिम रिश्ते ने कई मनोवैज्ञानिक खतरे पैदा कर दिए हैं।

उपरोक्त चर्चा के आधार पर अपना मानस यह नहीं बनाएं कि हमें एआई का उपयोग नहीं करना है। मानव समाज को समृद्ध करने में तकनीक की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसलिए अनेक कमियों के बाद भी एआई के उपयोग को रोका नहीं जा सकता है। एआई जैसी सुविधा को रोकना या उससे दूरी बनाना ठीक भी नहीं है। आवश्यक है कि हम एआई को अच्छे से समझें और बेहतर ढंग से उसका उपयोग करें। हम एआई को एक सहायक टूल के रूप में इस्तेमाल करें, उसे अपना निर्णयकर्ता न बनाएं। अंतिम निर्णय हमेशा मानवीय विवेक के अधीन होना चाहिए। 

मासिक पत्रिका 'हिन्दी विवेक' के जुलाई-2026 के अंक में पृष्ठ 49-51 पर प्रकाशित

श्रीराम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण : कर्कश शोर में संघ का विनम्र संदेश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने दिया वक्तव्य

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर निर्मित भव्य मंदिर में चढ़ावे से चोरी की घटना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण, निंदनीय और करोड़ों रामभक्तों की अटूट आस्था पर आघात करने वाली है। इस हृदयविदारक घटना पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले द्वारा जारी किया गया वक्तव्य इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि संघ के लिए श्रीराम की मर्यादा, पवित्रता और समाज की भावनाएं सर्वोपरि हैं। संघ ने न केवल इस घटना पर गहरी पीड़ा व्यक्त की है, बल्कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास को उसकी जवाबदेही का कठोरता से स्मरण भी कराया है। संघ ने साफ शब्दों में कहा है कि व्यवस्था और संचालन की कमियों को अविलंब दूर किया जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल की जांच के आधार पर दोषियों को कठोरतम दंड मिले और भविष्य के लिए एक निर्दोष, पारदर्शी और शुद्ध वित्तीय प्रबंधन की व्यवस्था स्थापित हो, यह संघ की दो टूक मांग है।

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

श्रीराम मंदिर प्रकरण में ‘कालनेमियों’ के विलाप से रहें सावधान

श्री अयोध्या धाम के भव्य श्रीराम मंदिर के कोष में हुई चोरी की घटना निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है। इस कृत्य से संपूर्ण हिन्दू समाज का आहत और हतप्रभ होना स्वाभाविक है। मंदिर की सुरक्षा, व्यवस्थापन और दान के प्रबंधन पर सवाल उठना भी स्वाभाविक है। हिन्दू समाज एवं हिन्दू संगठनों की एक राय है कि इस मामले में दोषियों पर कठोर कार्रवाई होनी ही चाहिए। लेकिन, इस पूरी घटना के बाद जो सबसे अधिक आश्चर्यजनक और वैचारिक रूप से खोखला पहलू उभर कर सामने आया है, वह है उन राजनेताओं और तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं की अति-सक्रियता, जो जीवनभर भगवान श्रीराम और उनकी जन्मभूमि पर श्रीराम मंदिर निर्माण के विरोधी रहे हैं। यह ध्यान देने वाली बात है कि आज मंदिर के धन की चिंता में जो लोग सबसे ज्यादा मुखर हैं, यह वही वर्ग है जिसका न तो कभी भगवान श्रीराम में विश्वास था और न ही वे उस पवित्र भूमि पर मंदिर निर्माण के पक्षधर थे।

रविवार, 28 जून 2026

लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए ऐतिहासिक संघर्ष

संघ शताब्दी वर्ष : आपातकाल के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा कर दिया, लोकतंत्र की बहाली के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया 

विश्व में भारतीय लोकतंत्र का उदाहरण दिया जाता है। यह सच है कि दुनिया में सबसे अधिक जीवंत और विशाल लोकतंत्र भारत में ही दिखायी देता है। लोकतंत्र भारत की परंपरा में है, इसलिए उसको जीना और संभालना हमें बखूबी आता है। परंतु, 25 जून 1975 वह दिनांक है, जब भारत के लोकतंत्र पर संकट आ गया था। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार ने देश पर आपातकाल थोप दिया। लोकतंत्र को घसीटकर सींखचों के पीछे डाल दिया गया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पंख नोंच लिए गए। रातों-रात आम नागरिकों के मौलिक अधिकारी समाप्त कर दिए गए। संविधान और लोकतंत्र पर हुए इस हमले का प्रतिकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने आगे बढ़कर किया। श्रीमती गांधी को भी यह ज्ञात था कि लोक संघर्ष समिति के आपातकाल विरोधी जनांदोलन को संगठित रूप से चलाने के पीछे संघ का अनुशासित कार्यकर्ता है। इसलिए उन्होंने 4 जुलाई 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। परंतु, यह प्रतिबंधन संघ के स्वयंसेवकों को आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष एवं सत्याग्रह करने से रोक नहीं सका। संविधान और लोकतंत्र को बचाने के लिए जिस प्रकार आगे बढ़कर संघ के स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह करते हुए पुलिस की बर्बाता का सामना किया, उसे देखकर संघ से असहमति रखनेवाले नेता एवं विचारकर भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुरीद बन गए।

शनिवार, 27 जून 2026

सुशासन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है हिन्दू साम्राज्य दिवस

ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी वह तिथि है, जिसने भारत के भाग्य का निर्धारण किया, इसी दिन छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की घोषणा की 

छत्रपति शिवाजी महाराज भारतीय इतिहास के ऐसे अद्वितीय नायक हैं जिन्हें न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य की अनेक पीढ़ियाँ भी स्मरण करेंगी। इसका मुख्य कारण यह है कि उन्होंने उस युग में, जब आक्रांताओं के अत्याचारों से भारतीय समाज शिथिल हो चुका था, तब हिन्दू समाज में उन्होंने एक नई चेतना जगाई। उसके भीतर विश्वास जगाया कि भारत में स्वराज्य की फिर से स्थापना हो सकती है, जहाँ सब स्वतंत्रता और स्वाभिमान के साथ जी सकते हैं।

शुक्रवार, 26 जून 2026

ऑस्ट्रेलिया के बाद ब्रिटेन में भी लगाई गई ‘फादर ऑफ सर्जरी’ महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा

भारत की ज्ञान-परंपरा की प्रतिष्ठा : भारत के ज्ञान-विज्ञान की वैश्विक स्वीकृति, प्रत्येक भारतीय के लिए है गर्व की बात

स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग स्थित दुनिया के सबसे पुराने ‘रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स’ में महर्षि सुश्रुत की भव्य प्रतिमा का स्थापित होना हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। अब जरा कल्पना कीजिए कि यदि महर्षि सुश्रुत की यह प्रतिमा स्कॉटलैंड या मेलबर्न के बजाय भारत के एम्स या किसी अन्य प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में स्थापित की जाती, तो क्या होता? यह तय है कि देश के स्वघोषित प्रगतिशील बुद्धिजीवियों, वामपंथी विचारकों और लिबरल जमात के बीच एक भारी ‘हाय-तौबा’ मच जाती। इसे ‘शिक्षा के भगवाकरण’, ‘विज्ञान में धर्म के हस्तक्षेप’ और ‘अंधविश्वास को बढ़ावा देने’ का नाम दे दिया जाता। यह मानसिकता भारत के उस बौद्धिक वर्ग की सबसे बड़ी त्रासदी है, जो अभी तक ‘औपनिवेशिक हैंगओवर’ से बाहर नहीं आ पाया है। इस वर्ग की समस्या यह है कि वे ‘भारतीय ज्ञान-परंपरा’ को केवल कर्मकांडों और मिथकों के चश्मे से देखते हैं। उनका पैमाना यह बन गया है कि जो कुछ भी प्राचीन भारत का है, वह अवैज्ञानिक है; और जो कुछ भी पश्चिम से आता है, वही परम सत्य है। जब तक कोई विदेशी संस्थान या विदेशी वैज्ञानिक हमारे प्राचीन ज्ञान पर अपनी मुहर नहीं लगाता, तब तक हमारे अपने बुद्धिजीवी उसे सिरे से खारिज करते रहते हैं।

बुधवार, 24 जून 2026

संविधान हत्या दिवस : इतिहास से सीखकर संविधान की रक्षा का संकल्प दिवस

लोकतंत्र और संविधान के महत्व को समझने के लिए 25 जून की तारीख बहुत महत्वपूर्ण है। भारत सरकार ने 25 जून को 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में मनाने की अधिसूचना जारी की है। दरअसल, 1975 में 25 जून को ही देश पर आपातकाल थोप दिया गया था। जिसके कारण रातों-रात आम नागरिकों के मौलिक अधिकार छीन लिए गए थे, मीडिया की स्वतंत्रता पर ताले जड़ दिए गए थे, और सवाल पूछने पर लोगों को बिना किसी अपील और दलील के जेल में डाल दिया गया था।

'संविधान हत्या दिवस' मनाने का उद्देश्य किसी पुरानी पीड़ा को कुरेदना नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों को याद दिलाना है कि जब संविधान की रक्षा नहीं होती, तो लोकतंत्र कैसे तानाशाही में बदल जाता है। यह दिन एक चेतावनी है और एक संकल्प भी, कि हम दोबारा अपने देश में ऐसा अंधकार कभी नहीं आने देंगे।