रविवार, 8 मार्च 2026

स्वदेशी का आग्रही है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

संघ शताब्दी वर्षआरएसएस ने धरातल पर उतारकर दिखाया स्वदेशी विचार


भारत की सर्वांगीण स्वतंत्रता एवं विकास का सपना देखने वाले महापुरुषों ने ‘स्वदेशी’ का महत्व समझा और भारत को आत्मनिर्भर एवं सशक्त बनाने के लिए समाज से स्वदेशी आचरण का आग्रह किया। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि यदि हमें फिर से उन्नति करनी है, तो लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की शिक्षा देनी होगी। स्वातंत्र्यवीर सावरकर, बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय और महात्मा गांधी से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार तक, सभी ने स्वदेशी को अपनाने का आग्रह किया। भारत के निर्माण का सपना देखने वाले विचारक यह भली-भांति जानते थे कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति के मूल में स्वदेशी का आचरण ही है।

भारत को परमवैभव पर ले जाने की महान आकांक्षा के साथ 1925 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई, तब से ही संघ ने स्वदेशी को लेकर समाज का प्रबोधन प्रारंभ कर दिया था। संघ के लिए स्वदेशी केवल एक आर्थिक नारा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का मूल मंत्र है। संघ ने अपनी स्थापना के साथ ही भारत की आत्मनिर्भरता और भारतीय मूल्यों पर आधारित अर्थतंत्र की वकालत की है। 

वैश्वीकरण के दौर में जब दुनिया एक बाजार बन रही थी, तब संघ ने स्वदेशी के आग्रह को एक आंदोलन का रूप दिया। आज उसका महत्व दुनिया को समझ आ रहा है। संघ के सह-सरकार्यवाह श्री अरुण कुमार कहते हैं, “भारत में जब हमने स्वदेशी का आंदोलन खड़ा किया, तब कहा गया कि स्वदेशी का आंदोलन दकियानूसी विचार है। यह पुरातनपंथी बात है। जब दुनिया वैश्विक परिवार में बदल रही है, तब स्वदेशी की बात करके हम अलग-थलग पड़ जाएंगे। कोई देश स्वदेशी के आधार पर जिंदा नहीं रह सकता। आज क्या हो रहा है? दुनियाभर के देश अपने यहाँ स्वदेशी को आगे बढ़ाने के लिए आयात शुल्क बढ़ा रहे हैं।” मतलब साफ है कि इस वैश्विक प्रतिस्पर्धा में यदि किसी देश को अपनी स्थिति मजबूत रखनी है, तो उसका आत्मनिर्भर होना आवश्यक है और इसके लिए स्वदेशी के विचार का अनुसरण करना ही होगा।

देखें : क्या है आरएसएस का पंच परिवर्तन का एजेंडा


आज भारत में स्वदेशी के प्रति जो जागरण दिखाई दे रहा है, उसके मूल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रयास हैं। संघ के प्रयासों से भारत में लंबे समय तक स्वदेशी का आंदोलन चलता रहा है। अपने शताब्दी वर्ष में संघ ने समाज से ‘पंच परिवर्तन’ का आग्रह किया है। इस पंच परिवर्तन का एक सबसे महत्वपूर्ण आग्रह ‘स्वदेशी’ का है। संघ के लिए स्वदेशी का आग्रह केवल अर्थ तक सीमित नहीं है, अपितु उसके दायरे में भाषा से लेकर विचार तक शामिल हैं। स्वदेशी की अवधारणा का अभिप्राय स्वयं को दुनिया से अलग-थलग करना भी नहीं है। स्वदेशी को ‘स्वदेश प्रेम और देश-भक्ति का आविष्कार’ बताते हुए संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी कहते थे कि “स्वदेशी देश को विश्व से काटती नहीं है, बल्कि विश्व के साथ चलने की सामर्थ्य प्रदान करती है”।

संघ के विचारकों, विशेषकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय और दत्तोपंत ठेंगड़ी ने स्वदेशी की एक स्पष्ट परिभाषा गढ़ी। उनके अनुसार, स्वदेशी का अर्थ दुनिया से कटना नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर दुनिया से जुड़ना है। स्वदेशी केवल वस्तुओं के क्रय-विक्रय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देशभक्ति की साकार अभिव्यक्ति और राष्ट्रीय स्वाभिमान का एक व्यापक विचार है। संघ का मानना है कि अर्थव्यवस्था का केंद्र बड़ी मशीनें या बहुराष्ट्रीय कंपनियां नहीं, बल्कि मानव होना चाहिए। इसके साथ ही संघ का आग्रह रहा है कि भारत को पश्चिमी पूंजीवाद या साम्यवाद की नकल करने के बजाय अपने पारंपरिक कुटीर उद्योगों और कौशल पर आधारित ‘तीसरा विकल्प’ तैयार करना चाहिए।

संघ ने स्वदेशी के विचार को केवल सैद्धांतिक रूप से ही मजबूत नहीं किया, अपितु समाज में धरातल पर भी उतारने का भगीरथी कार्य किया है। जब 1990 के दशक में भारत में उदारीकरण और वैश्वीकरण की शुरुआत हुई, तो संघ को आभास हुआ कि इससे भारतीय कुटीर उद्योग और छोटे व्यापारी नष्ट हो सकते हैं। इसके प्रतिकार और विकल्प के रूप में 1991 में दत्तोपंत ठेंगड़ी की प्रेरणा से ‘स्वदेशी जागरण मंच’ की स्थापना हुई। स्वदेशी जागरण मंच ने डंकेल प्रस्तावों और विश्व व्यापार संगठन की उन नीतियों का कड़ा विरोध किया, जो भारत के हित में नहीं थीं। इसी प्रकार, संघ से जुड़े भारतीय मजदूर संघ ने भी हमेशा इस बात पर जोर दिया कि विनिवेश के नाम पर देश की रणनीतिक संपत्ति विदेशी हाथों में न जाए। जब विदेशी कंपनियां हल्दी, नीम, बासमती और बीजों का पेटेंट कराकर भारतीय कृषि और पारंपरिक ज्ञान पर एकाधिकार जमाना चाहती थीं, तब स्वदेशी आंदोलन के माध्यम से संघ के कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया।

देखें : पीएम नरेन्द्र मोदी ने कहा, RSS ने दी देश के लिए जीने की प्रेरणा


मीडिया में जब विदेशी निवेश की बात आई, तब संघ के तत्कालीन सरसंघचालक कु.सी. सुदर्शन जी ने विदेशी निवेश का स्पष्ट विरोध किया। चीन के साथ हमारे संबंध बिगड़ने से पहले ही संघ ने चीन को लेकर भारतीय नागरिकों को सजग करने का प्रयास किया था। सस्ते चीनी सामान ने जब भारतीय बाजार को निगलना शुरू किया, तब संघ ही था जो उसके विरोध में सबसे आगे खड़ा रहा। संघ की प्रेरणा से जब चीनी सामान के बहिष्कार के लिए व्यापक जन-जागरण अभियान शुरू हुए, तब अन्य लोग मजाक बना रहे थे, लेकिन राष्ट्रभक्त नागरिक इस आंदोलन को मजबूत कर रहे थे। इसका परिणाम यह रहा कि अब स्थानीय उत्पाद निर्माताओं एवं विक्रेताओं को फिर से ग्राहक मिल रहे हैं और बाजार में भारतीय उत्पादों की मांग बढ़ गई है। 

संघ के प्रयासों का सुफल यह भी है कि स्वदेशी को लेकर सरकार का मानस भी बदला है। सरकार की ओर से स्वदेशी को प्रोत्साहित किया जाने लगा है। संघ के विचारों से संस्कारित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहलकदमी पर वर्तमान केंद्र सरकार ने ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ का नारा देकर संघ के स्वदेशी दर्शन का ही व्यावहारिक और नीतिगत विस्तार किया है। सरकार के इस दृष्टिकोण और आग्रह का सुफल यह भी है कि अभी हाल में पाकिस्तान के साथ हुए सीमित युद्ध ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में स्वदेशी हथियारों ने दुश्मन देश के छक्के तो छुड़ाए ही, दुनिया की महाशक्तियों का ध्यान भी आकर्षित किया। कभी रक्षा उपकरणों के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर रहने वाला भारत आज स्वदेशी मिसाइलों, तेजस विमानों और रक्षा उपकरणों का न केवल निर्माण कर रहा है, बल्कि निर्यात भी कर रहा है। स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित किया। इसके पीछे भी संघ का ही स्वदेशी विचार है। दरअसल, संघ ‘स्व-रोजगार’ के आग्रह के माध्यम से युवाओं में नौकरी मांगने के बजाय नौकरी देने की मानसिकता को बढ़ावा देने का प्रयास करता है। जिस खादी को हम स्वदेशी की पहचान मानते हैं, उसे फैशन और मुख्यधारा में लाने का श्रेय संघ के कार्यकर्ताओं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जाता है।

स्पष्ट तौर पर यह कहना होगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वदेशी आंदोलन केवल विदेशी वस्तुओं को जलाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने एक स्वाभिमानी आर्थिक सोच को जन्म दिया। संघ के प्रयासों का ही परिणाम है कि आज ‘मेड इन इंडिया’ एक ब्रांड बन चुका है और भारत अपनी शर्तों पर वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सेदार बन रहा है। स्वदेशी का यह आग्रह भविष्य में भारत को एक आर्थिक महाशक्ति बनाने में नींव का पत्थर साबित हो सकता है।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 8 मार्च, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ


मंगलवार, 3 मार्च 2026

कहाँ है आपकी निष्ठा

खामेनेई की मौत : प्रदर्शन करनेवाले मुसलमानों की निष्ठा कहाँ है?


अमेरिका और इजराइल के हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद मध्य पूर्व में जो भू-राजनीतिक भूचाल आया है, उसकी अनुगूंज भारत के कई हिस्सों में सुनाई दे रही है। लखनऊ से लेकर श्रीनगर तक कई क्षेत्रों में हजारों मुस्लिम प्रदर्शनकारियों का सड़कों पर उतरना, अमेरिका और इजराइल के खिलाफ नारेबाजी करना, एक गहरी चिंता का विषय है। यह प्रदर्शन सवाल उठाता है कि भारत के मुसलमानों की निष्ठा आखिर कहाँ है? ईरान के सुप्रीम खामनेई की मौत के बाद भारत में प्रदर्शनों का क्या औचित्य है? अपने आप को इस्लामिक सत्ता/व्यवस्था से जोड़ने की यह बीमारी आज की नहीं है। खिलाफत आंदोलन को याद कीजिए और उसके उद्देश्य का विश्लेषण कीजिए। आखिर क्यों भारत के मुसलमानों ने खिलाफत आंदोलन चलाया था? क्या उसका कोई संबंध भारत की स्वतंत्रता से था? 

आज से आठ दशक पूर्व संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जिस कड़वे सच की ओर देश का ध्यान आकृष्ट किया था, वह आज पूरी तरह प्रासंगिक नजर आता है। उन्होंने स्पष्ट लिखा था कि मुसलमानों की निष्ठा उस देश के प्रति नहीं होती जहाँ वे रहते हैं, बल्कि उस सांप्रदायिक विश्वास पर निर्भर करती है जिसका वे हिस्सा हैं। लखनऊ से लेकर जम्मू-कश्मीर की सड़कों पर उतरकर मातम मनाने वाली भीड़ और खामेनेई को शहीद का दर्जा देने की कवायद, इसी मानसिकता का साक्षात प्रमाण है।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

छत्रपति शिवाजी महाराज से सीखें जल प्रबंधन

सह्याद्रि के उत्तुंग शिखरों पर आसमान से बातें करनेवाले गिरिदुर्ग हों या फिर समुद्री लहरों के बीच मुस्कुराते जलदुर्ग, उनकी व्यवस्थाएं देखकर ध्यान आता है कि हिन्दवी स्वराज्य के योजनाकार, वास्तुकार, अभियंता और निर्माण में योगदान करनेवाले सभी शिल्पकार एवं श्रमिक अपने कार्य-कौशल में सिद्धस्थ थे। सुरक्षा पक्ष हो या फिर कला पक्ष, सबका बारीकी से विचार किया गया। इसके साथ ही बुनियादी आवश्यकताओं की चिंता भी की गई। भारत में जहाँ भी आपने दुर्ग देखे होंगे, उनमें जलस्रोत की व्यवस्था देखी ही होगी। परंतु हिन्दवी स्वराज्य के किलों में जलस्रोतों का प्रबंधन रचनात्मक ढंग से किया गया है। हजारों फीट की ऊंचाई पर बारह महीने पानी की व्यवस्था बनाए रखना चुनौतीपूर्ण था। कुशल योजनाकारों ने बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से दुर्गों पर जलाशयों का निर्माण किया है। किसी भी दुर्ग पर एक-दो नहीं अपितु अलग-अलग हिस्सों में कई जलाशयों का निर्माण किया जाता था। हम हिन्दवी स्वराज्य की राजधानी दुर्गदुर्गेश्वर श्रीरायगढ़ की ही बात करें, तो वहाँ छोटे-बड़े 84 जलाशयों का निर्माण किया गया है। चूँकि रायगढ़ पर अधिक संख्या में लोग रहते थे इसलिए यहाँ बड़ी संख्या में जल निकायों का निर्माण किया गया। श्रीरायगढ़ के प्रसिद्ध जल निकाय हैं- गंगा सागर तालाब, हत्ती तालाब, कुशावर्त तालाब, हनुमान टांकी, बारह टांकी इत्यादि।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

मातृभाषाओं के संरक्षण का पक्षधर है संघ

संघ शताब्दी वर्ष : सभी भारतीय भाषाएं, राष्ट्रीय भाषाएं हैं। किसी की अनदेखी न हो, सबको समान स्तर प्राप्त हो


वैश्विक मानचित्र पर भाषाई दृष्टि से भारत की स्थिति विशिष्ट है। हमारे यहाँ उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक भाषाओं के विविध रंग फैले हुए दिखायी देते हैं। भारत की ये भाषाएं क्षेत्रीय या स्थानीय भाषाएं नहीं है, अपितु सभी भाषाएं राष्ट्रीय हैं। उनका एकसमान महत्व है। राजनीतिक स्वार्थ हावी होने से पहले भारत में कभी भाषाई विभाजन दिखायी नहीं दिया। दरअसल, जिस प्रकार भारत की संस्कृति के विविध पक्ष एक–दूसरे के साथ एकात्म हैं, उसी भाँति हमारी भाषाओं में भी आपस में गहरा नाता है। विविधता में एकात्मता का उत्सव मनाने वाले देश भारत में भाषाओं का सुंदर पुष्पगुच्छ है, जिसकी सुगंध से भारत की संस्कृति महकती रही है। भारत को कमजोर करने वाली ताकतें अकसर हमारी भाषाओं को एक–दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयास करती हैं। वहीं, भारत के प्रति श्रद्धा रखने वाले संगठन भारत की सभी मातृभाषाओं के बीच स्वाभाविक एकात्म को गहरा करने में विश्वास रखते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐसा ही संगठन है, जिसने सदैव भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और उनके एकात्म पर जोर दिया है। संघ ने सभी भारतीय भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा माना है, जो भारत की समृद्ध संस्कृति की संवाहिकाएं हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर देश की सभी भाषाओं को चिरजीवी मानते थे। आम समाज से लेकर राजकाज के व्यवहार में मातृभाषा का उपयोग होना चाहिए, इसके वे प्रबल पक्षधर थे। इस संदर्भ में वे छत्रपति शिवाजी महाराज का उदाहरण देते थे। विशेषरूप से छत्रपति शिवाजी महाराज के उदाहरण से उन लोगों को सीखना चाहिए जो आज कहते हैं कि हमारे दैनिक व्यवहार में अंग्रेजी और अन्य बाह्य भाषाओं का प्रभाव इतना अधिक बढ़ गया है कि अब उन्हें हटाना संभव नहीं है। श्रीगुरुजी कहते थे– “राज्य स्थापना के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज ने सामान्य व्यवहार में घुसे फारसी, अरबी शब्दों को निकालने का काम किया। उस समय की स्थिति का विचार करने पर दिखाई देगा कि फारसी, अरबी के बिना काम ही नहीं चलता था। छत्रपति छत्रपति शिवाजी महाराज ने मिलावट की प्रवृत्ति को दूर करने और अपनी भाषा को शुद्ध रूप में लाने का प्रयत्न किया। उनके काल का ‘राज्य व्यवहार-कोश’ प्रसिद्ध है”। हमारे सामने छत्रपति शिवाजी महाराज का उदाहरण था लेकिन इसके बाद भी स्वाधीनता के बाद हमारे सत्ताधीशों ने अंग्रेजी के सामने घुटने टेक दिए। दुनिया में कई देशों के उदाहरण हैं, जिन्होंने सत्ता के सूत्र संभालते ही अपनी भाषा में राजकाज किया। मातृभाषा के प्रति गौरव का भाव जगाते समय श्रीगुरुजी भी ऐसे देशों का उदाहरण देते थे। उनका स्पष्ट मत था कि जो देश अंग्रेजों की दासता से मुक्त हुए, उन सभी देशों ने अपने देश की भाषाओँ को ग्रहण किया। ब्रह्मदेश ने ब्रह्मी और श्रीलंका ने सिंहली को स्वीकार किया। सत्ता हाथों में आते ही उन्होंने भाषा बदल दी। दक्षिण अफ्रीका में विभिन्न 14-16 भाषाएँ हैं तथा प्रत्येक समुदाय को अपनी भाषा पर गर्व है। फिर भी सर्वसम्मति से उन्होंने ‘स्वाहिली’ भाषा को राष्ट्रीय भाषा के रूप में ग्रहण किया। उनका सब-कुछ ठीक चल रहा है। इस संबंध में इजराइल और तुर्की के उदाहरण भी प्रेरक हैं।

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

भारत के हो, तो गाओ गर्व से ‘वंदेमातरम्’

राष्ट्रगीत को मिला उसका सम्मान, गृह मंत्रालय ने ‘वंदेमातरम्’ के सम्मान के संबंध में जारी किए दिशा-निर्देश


मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते कभी कांग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन के मंत्र और राष्ट्रीय गीत ‘वंदेमातरम’ के सम्मान के साथ समझौता कर लिया था। राष्ट्रगान को जो सम्मान दिया गया, राष्ट्रगीत को उससे वंचित कर दिया गया। संविधान के अनुच्छेद 51ए में राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करने को मौलिक कर्तव्य के रूप में रेखांकित किया गया है लेकिन इसमें राष्ट्रगीत के संबंध में कोई निर्देश नहीं मिलता है। राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 3 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रगान के गायन को रोकता है या गा रहे लोगों के बीच अशांति पैदा करता है, तो उसे 3 साल तक की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। इस अधिनियम में भी राष्ट्रगीत का अपमान करने पर सजा का कोई प्रावधान नहीं किया गया है। राष्ट्रगीत के सम्मान के प्रति यह उदासीनता क्यों रखी गई? इसका उत्तर सब जानते हैं। इसलिए सभी राष्ट्रभक्त देशवासियों के मन में कसक थी कि आखिर वह दिन कब आएगा जब हम अपने राष्ट्रगीत को वह सम्मान देंगे, जिसका वह प्रारंभ से अधिकारी है। याद रखें कि जिनके मन में भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान नहीं था, वे लोग तो पाकिस्तान चले गए थे। आज जिन्हें भारत में रहकर वंदेमातरम गाने और उसके सम्मान में खड़े होने में दिक्कत है, उन्हें अपने बारे में विचार करना चाहिए। भारत में रहना है तो फिर वंदेमातरम तो गाना पड़ेगा। मोदी सरकार को साधुवाद कि उसने राष्ट्रीय गीत को उसका खोया हुआ स्वाभिमान एवं प्रतिष्ठा लौटाई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘वंदेमातरम’ के गायन को लेकर आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करके अच्छा कदम उठाया है। इस आदेश के तहत अब जब भी राष्ट्रगीत एवं राष्ट्रगान, दोनों एक साथ बजाए जाएंगे, तो पहले ‘वंदे मातरम्’ (राष्ट्रगीत) के सभी छह छंद गाए जाएंगे और उसके बाद ‘जन-गण-मन’ (राष्ट्रगान) होगा। यह बदलाव केवल प्रक्रियात्मक नहीं है, बल्कि इसके ऐतिहासिक और संवैधानिक निहितार्थ भी हैं। हमें सदैव याद रखना चाहिए कि वंदेमातरम का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अद्वितीय स्थान रहा है। बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित इस गीत ने क्रांतिकारियों में जो ऊर्जा भरी, वह इतिहास में दर्ज है।

देखें : आरएसएस के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव हेडगेवार ने चलाया वंदेमातरम आंदोलन

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

पर्यटक की डायरी से अधिक इतिहास की याद दिलाने वाला दस्तावेज है 'हिन्दवी स्वराज्य दर्शन'

- सुमंत विद्वांस

दिसंबर में जब मैं बालाघाट में था, तब भोपाल से मेरे मित्र लोकेन्द्र जी ने बहुत स्नेहपूर्वक अपनी तीन पुस्तकें मेरे लिए उपहार में भेजी थीं। साथ ही उन्होंने यह सुझाव भी भेजा कि इन तीनों में सबसे पहले ‘हिन्दवी स्वराज्य दर्शन’ को पढ़ूँ।

आज मैंने यह पुस्तक पढ़कर पूरी की।

इसे यात्रा वर्णन कहा गया है और यह बात बिल्कुल ठीक भी है। लेकिन यह पुस्तक किसी पर्यटक की डायरी नहीं है। यह इतिहास की याद दिलाने वाला दस्तावेज भी है और अपने नाम के अनुरूप ही छत्रपति शिवाजी महाराज के स्वराज्य का ‘दर्शन’ करवाने वाली पुस्तक भी है। 

शिवाजी महाराज के जीवन और कार्य के बारे में अनेक भाषाओं में सैकड़ों पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। उनमें से अनेक पुस्तकें बहुत शोधपूर्ण एवं गहन हैं। ऐसे में अगर आप सोचें कि इस पुस्तक को क्यों पढ़ा जाए, तो मैं कहूँगा कि यदि आपको सरल शब्दों में शिवाजी महाराज के कुछ महत्वपूर्ण किलों की प्राथमिक जानकारी पानी हो, तो यह पुस्तक आपके लिए बहुत काम की है। इसमें आपको सिंहगढ़ और रायगढ़ जैसे प्रसिद्ध किलों की जानकारी तो मिलेगी ही, पर साथ ही खान्देरी और कोलाबा जैसे जलदुर्गों व पुरंदर व मल्हारगढ़ जैसे किलों के बारे में भी पता चलेगा। इसके अलावा इसमें पुणे के शनिवारवाड़ा, लाल महल और पाचाड में जीजाबाई के समाधि-स्थल का भी परिचय मिल जाएगा।

मैं लगभग 15 वर्षों तक नासिक और पुणे में रहा हूँ, और उनमें से भी सात वर्ष पुणे शहर में ही रहा हूँ, इसलिए इनमें से कई स्थानों पर मैं जा चुका हूँ। इस पुस्तक को पढ़ते समय अनायास ही मेरी भी कई पुरानी यादें ताजा हो गईं और बहुत-सी नई जानकारी भी मिल गई।

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

समाज परिवर्तन का केंद्र बनी शाखाएं

संघ शताब्दी वर्ष : जहाँ संघ की शाखा लगती है, वहाँ समाज में सकारात्मक परिवर्तन दिखायी देते हैं


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा केवल खेलने-कूदने और योगाभ्यास का स्थान नहीं है। किसी शाखा में भले ही 100 स्वयंसेवक नित्य आते होंगे, लेकिन अच्छी शाखा उसे ही माना जाता है, जिसके कारण से शाखा क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव आए हों। हिन्दू समाज में जागृति आई हो। समाज अपनी चुनौतियों का समाधान करने में स्वयं सक्षम हो गया हो। शाखा की सफलता इसी में है कि वह समाज परिवर्तन का केंद्र बने। इसलिए संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता कहते हैं कि जिन क्षेत्रों में संघ की अच्छी शाखा चलती है, वहाँ की अनेक समस्याओं का समाधान स्वयं ही हो जाता है। शाखा आने वाले स्वयंसेवक अपने क्षेत्र की समस्याओं को चिह्नित करते हैं और समाज की सज्जनशक्ति को साथ लेकर उसका समाधान निकालने का प्रयास करते हैं। संघ शाखा की सफलता की अनेक कहानियां हैं। यहाँ हम मध्यभारत की कुछ शाखाओं का उल्लेख कर रहे हैं, जिन्होंने समाज परिवर्तन के अनुकरणीय उदाहरण समाज के सामने प्रस्तुत किए हैं।

भोपाल में शाखाओं के माध्यम से पर्यावरण, शिक्षा एवं सेवा के कई प्रकल्प चलाए जाते हैं। ऐसा ही एक प्रकल्प है- एम्स में संचालित ‘सार्थक सेवा केंद्र’। विद्युत भाग की ‘वीर मंगल पांडेय शाखा’ के स्वयंसेवकों ने अनुभव किया कि एम्स में दूर-दूर से मरीजों का आना होता है लेकिन यहाँ परिजनों के लिए रात्रि विश्राम की व्यवस्था नहीं है। इस कारण मरीजों के साथ उनके परिजनों को भी असुविधा होती थी। उन्हें मजबूरी में पार्क के किनारे बैठकर रात गुजारनी पड़ती थी। यह सब देखकर शाखा टोली की बैठक में निर्णय लिया गया कि एम्स में एक सहायता केंद्र प्रारंभ किया जाए। कुछ स्वयंसेवक चिन्हित किए गए और 13 मई 2022 से यहाँ ‘सार्थक सेवा केंद्र’ शुरू कर दिया गया। 10 से 12 स्वयंसेवकों ने दो पालियों में यानी सुबह 8 बजे से 11 बजे तक और उसके बाद 11 से 2 बजे तक समय देने कि योजना बनाई। आज यह प्रकल्प रैन बसेरा, व्हीलचेयर एवं स्ट्रेचर, रक्तदान और एम्बुलेंस की सुविधाएं उपलब्ध कराता है। वहीं, बुधनी के सिविल अस्पताल में भेरुंदा नगर की ‘बजरंग शाखा’ गरम पानी एवं रोगी सहायता केंद्र का संचालन करती है। अस्पताल में आए दिन मरीजों को गर्म पानी, दूध एवं अन्य चीजों के लिए परेशान होना पड़ता था। इसी प्रकार का प्रकल्प ग्वालियर के कमलाराजा अस्पताल में भी चलाया जाता है। यहीं, जयारोग्य चिकित्सालय में सर्दी के समय मरीज के परिजनों को ठंड से बचाने के लिए ‘कंबल केंद्र’ का संचालन किया जाता है।