रविवार, 29 मार्च 2026

“मेरा यह जीवन देश सेवा के लिए समर्पित”

संघ शताब्दी वर्ष : संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार अनुशीलन समिति के प्रमुख क्रांतिकारी थे, उन्होंने आजन्म भारतमाता की सेवा करने की प्रतिज्ञा की

यह चित्र Google Gemini AI से निर्मित है।

ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए कोलकाता से बड़े पैमाने पर क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन हो रहा था। एक प्रकार से कोलकाता क्रांतिकारियों के लिए ‘काशी’ बन गया था। केशव बलिराम हेडगेवार के मन में भी एक ज्वार था- क्रांतिकारी बनकर भारत माता को ब्रितानी हुकूमत की बेढ़ियों से स्वतंत्र करना है। डॉक्टर साहब की जीवनी लिखने वाले सीपी भिशिकर लिखते हैं कि वंदेमातरम आंदोलन के समय से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में उनका मन रमने लगा था। मैट्रिकुलेशन की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने ठान लिया था कि कोलकाता जाकर मेडिकल की पढ़ाई करेंगे और वहीं क्रांतिकारी गतिविधियों में जुड़ जाएंगे। नागपुर के राष्ट्रभक्त महापुरुष भी यही चाहते थे कि केशव कोलकाता जाएं, क्रांतिकारियों से संपर्क जोड़ें और लौटकर पश्चिम भारत में क्रांतिकारी आंदोलन को संगठित करें। क्रांतिकारी रामलाल वाजपेयी ने भी अपने जीवन चरित्र में इस घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है कि “उनको कलकत्ता भेजने का असली मकसद क्रांतिकारी संगठन संबंधी जानकारी प्राप्त करना एवं मध्यप्रांत और बंगाल के बीच सेतु का काम करना था”। केशव हेडगेवार जब कलकत्ता पहुँचे तब क्रांतिकारियों पर अंग्रेजी दमन का दौर चल रहा था। सरकार राष्ट्रद्रोही सभा अधिनियम-1907, आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम-1908 और इंडियन प्रेस एक्ट-1910 के द्वारा क्रांतिकारी पत्रों, संगठनों एवं व्यक्तियों को दंडित करने, प्रतिबंधित करने एवं उन पर मुकदमा चलाने का कार्य कर रही थी। परंतु, यह दमनचक्र प्रखर क्रांतिकारी केशव बलिराम हेडगेवार के इरादों को कहाँ डिगा सकता था। 

भारत माता की सेवा के अपने स्पष्ट उद्देश्य के साथ वर्ष 1910 में केशव हेडगेवार ने कोलकाता के नेशनल मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया। बंगाल में सक्रिय क्रांतिकारी संगठनों में अनुशीलन समिति प्रमुख संगठन था। उस समय देशभर में क्रांतिकारी गतिविधियों का समन्वय अनुशीलन समिति के माध्यम से होता था। बंगाल के सभी प्रसिद्ध क्रांतिकारी इससे जुड़े हुए थे। इनमें अरविंद घोष, विपिन चंद्र पाल, त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती, नलिनीकिशोर गुह, प्रतुल गांगुली, जोगेश चंद्र चटर्जी आदि नाम उल्लेखनीय हैं। केशव ने अनुशीलन समिति के वरिष्ठ नेता पुतिन बिहारी दास से संपर्क किया। केशव ने जल्दी ही समिति में अपना विश्वसनीय स्थान बना लिया था। मशहूर क्रांतिकारी त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती ने अपनी किताब ‘जेल में 30 साल’ में अनुशीलन समिति के 30 बड़े क्रांतिकारियों का फोटो प्रकाशित किए हैं, उनमें एक चित्र डॉ. हेडगेवार भी हैं। 

अनुशीलन समिति ने हेडगेवारजी को क्रांतिकारी साहित्य एवं शस्त्र को लोगों तक पहुँचाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी, जिसे केशव ने बखूबी निभाया। वे जब भी कोलकाता से नागपुर आते थे, तब अपने साथ नागपुर के क्रांतिकारियों के लिए गोपनीय साहित्य और शस्त्र दोनों लेकर आते थे। उन्होंने उस साहित्य को नया नाम दिया ‘एनाटोमी’,  जो मेडिकल की पढ़ाई में उनका एक विषय था। क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए केशव को भी एक नया नाम दिया गया था- ‘कोकेन’।

कोलकाता के प्रेम गुजराल मार्ग पर स्थित डॉ. हेडगेवार का निवास स्थान धीरे-धीरे क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बन गया था। भूमिगत अवस्था में श्याम सुंदर चक्रवर्ती यहां यदा-कथा आया करते थे तो नलिनीकिशोर गुह सहित अनेक क्रांतिकारियों के ठहरने, छिपने, शस्त्रों को सुरक्षित रखने का स्थान भी बन गया था। श्यामसुंदर चक्रवर्ती ने लिखा है कि “जब हेडगेवार नेशनल मेडिकल के छात्र थे, तब बंगाल में लिखी गई प्रसिद्ध पुस्तक बंगलार विप्लववाद के लेखक नलिनीकिशोर गुह भी वहां पढ़ रहे थे। गुह ने ही हेडगेवार, नारायणराव सावरकर एवं अन्य छात्रों को समिति में प्रवेश दिलवाया था”।  गुह ने डॉक्टर साहब की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि “हेडगेवार सच्चे अर्थों में आदर्श क्रांतिकारी थे। समिति के सदस्यों के बीच यह रचनात्मक सोच एवं काम के लिए जाने जाते थे”। वहीं,  क्रांतिकारी हरदास ने डॉक्टर साहब के चरित्र पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि “हेडगेवार ने अपने सात्विक चरित्र प्रतिबद्धता और साधारण संगठन कौशल से नौजवान क्रांतिकारियों का दिल जीत लिया था और उनके प्रति भक्ति भाव रखने वाले देशभक्तों की एक बड़ी जमात थी”।

अनुशीलन समिति में क्रांतिकारियों को देवी माँ काली की प्रतिमा के सामने एक प्रतिज्ञा करायी जाती थी। जब केशव ने क्रांतिकारी बनने के लिए समिति द्वारा तय की गई सब प्रकार की परीक्षाएं उत्तीर्ण कर लीं और उन्हें समिति की केन्द्रीय सभा का सदस्य बनाया गया, तब देवी काली को साक्षी मानकर केशव ने प्रतिज्ञा की- “इस जन्म में मेरा जीवन देश के काम के लिए ही होगा; अपना करियर आदि सब अगली दुनिया (पुनर्जन्म) के लिए छोड़ दिया”। अपनी इस प्रतिज्ञा का उन्होंने आजन्म पालन किया। जिस बालक ने गरीबी के कारण जीवन का संघर्ष का देखा था, डॉक्टर बनने के बाद उसने एक सुविधा सम्पन्न जीवन चुनने के बजाय भारत माता की सेवा का ‘कंटकाकीर्ण मार्ग’ का चुनाव किया। मेडिकल की पढ़ाई पूरी होने पर उन्हें बर्मा (म्यांमार) में 3000 रुपये मासिक की बहुत बड़ी नौकरी का प्रस्ताव मिला था। लेकिन उन्होंने अपने महाविद्यालय के प्राचार्य से स्पष्ट कह दिया– “मुझे पैसा नहीं कमाना, मुझे देश का काम करना है”। शिक्षा पूर्ण करके जब डॉक्टर साहब नागपुर वापस पहुँचे तो चाचाजी ने विवाह का पूछा; तब भी उन्होंने स्पष्ट कह दिया – “मेरा यह विचार नहीं है। मैं देश के लिए ही काम करूँगा। मेरा रास्ता कठिन है। न जाने क्या-क्या कष्ट सहने पड़ेंगे, वह मैं सहूँगा। और किसी को साथ लेकर नहीं करूँगा, इसलिए अविवाहित ही रहना है”। उस महापुरुष ने डॉक्टरी की प्रैक्टिस भी नहीं की और विवाह भी नहीं किया। देश की सेवा के लिए अपना जीवन पूर्ण समर्पित कर दिया। 

कोलकाता से लौटकर नागपुर में डॉ. हेडगेवार ने अपने मित्र भाऊजी कर्वे के साथ मिलकर क्रांतिकारी समूह बनाया और एक सशस्त्र क्रांति की योजना बनायी। नागपुर के क्रांतिकारियों के इस दल को ‘क्रांतिदल’ के नाम से भी जाना जाता था। डॉक्टरजी और कर्वे, दोनों ने क्रांतिदल के कार्य को विस्तार देने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में प्रवास किया। क्रांतिकारियों से संपर्क कर एक नेटवर्क तैयार किया। क्रांतिकारियों के लिए हथियार इकट्ठे करने का काम किया। यवतमाल के वामनराव धर्माधिकारी याद करते हैं कि “वर्ष 1917-18 तक डॉक्टरजी ने हमें विद्रोह के लिए पूर्णरूपेण तैयार रहने को कह दिया था”। वर्ष 1918 में धर्माधिकारी को गोवा भेजा गया, क्योंकि एक समुद्री जहाज हथियारों की एक बड़ी खेप लेकर वहाँ पहुँचने वाला था। लेकिन उस जहाज को ब्रिटश नौसेना ने बीच समुद्र में ही रोक लिया। इस घटना का उल्लेख वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने भी 2018 में दिल्ली में आयोजित व्याख्यान माला में किया है।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 29 मार्च, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

रविवार, 22 मार्च 2026

यूनियन जैक को उखाड़ फेंकने के लिए खोद दी सुरंग

संघ शताब्दी वर्ष : जन्मजात देशभक्त थे संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार

यह चित्र AI प्लेटफॉर्म Google Gemini से निर्मित है।

कहते हैं कि पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करने वाले महापुरुष डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का बचपन भी कुछ ऐसा ही था, जो स्पष्ट संकेत देता था कि यह बालक बड़ा होकर भारत के नवनिर्माण की नींव रखेगा। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को ‘जन्मजात देशभक्त’ ऐसे ही नहीं कहा जाता है। उनके बचपन के अनेक प्रसंग मिलते हैं, जो उनकी देशभक्ति की केसरिया छाप को दर्शाते हैं। 13 वर्ष की उम्र में केशव ने प्लेग की महामारी में अपने माता-पिता को खो दिया। इस प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी केशव ने स्वयं को संभाले रखा। उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और क्रांति के मार्ग पर कदम बढ़ाते गए। स्कूल के दिनों में ही उनकी प्रखर देशभक्ति की मुखर अभिव्यक्ति होने लग गई थी। जीवन के संघर्ष में तपकर निखरे केशव बचपन में ही बड़ों की भाँति परिपक्व हो गए थे। 1901 में जब किंग एडवर्ड-सप्तम इंग्लैंड की राजगद्दी पर बैठे, तब नागपुर में एम्प्रेस मिल के मालिकों ने खुशी में आतिशबाजी का कार्यक्रम रखा। लगभग पूरा शहर इस आतिशबाजी को देखने के लिए एकत्रित हुआ। बच्चों को तो आतिशबाजी वैसे ही बहुत आकर्षित करती है। बड़ी संख्या में बच्चे भी आतिशबाजी का लुत्फ उठाने के लिए आए थे। लेकिन, जब केशव से आतिशबाजी देखने चलने का आग्रह किया गया तो उन्होंने अपने मित्रों से कहा- “यह शर्म की बात है कि हम एक विदेशी शासक की ताजपोशी पर जश्न मनाएं; मैं यह आतिशबाजी देखने नहीं जाऊंगा”।

बुधवार, 18 मार्च 2026

आरएसएस के साथ आई समाज की सज्जनशक्ति

सर्वव्यापी-सर्वस्पर्शी कार्य : संघ शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों में समाज का सहयोग और सहभागिता ने स्वयंसेवकों का बढ़ाया उत्साह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शताब्दी वर्ष पर कोई बड़ा उत्सव आयोजित न करके छोटे-छोटे स्थानों (मंडल/बस्ती) पर कार्यक्रमों का आयोजन किया, ताकि संघ कार्य का व्याप बढ़े। शताब्दी वर्ष के निमित्त संघ ने मुख्य रूप से दो प्रकार के कार्यक्रमों की व्यापक योजना बनाई है। इनमें पहला उद्देश्य संगठन का विस्तार करना है, जबकि दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य समाज की सज्जन शक्ति को सद्भाव और समरसता के सूत्र में पिरोकर राष्ट्र निर्माण के लिए संगठित करना है। इस ऐतिहासिक अवसर पर आयोजित संघ के कार्यक्रमों में समाज का जो अभूतपूर्व और भरपूर साथ मिल रहा है, वह संगठन की राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता का प्रमाण है। कहना होगा कि कई कार्यक्रमों का नेतृत्व तो समाज ने ही किया, संघ की शक्ति तो उनकी सहयोगी बनी। विशेष रूप से हिन्दू सम्मेलनों का आयोजन समाज की सज्जनशक्ति ने आगे रहकर किया।

सोमवार, 16 मार्च 2026

अनूठा जन्मदिन : पुस्तकों से तौले गए 8 वर्षीय मारुति

भोपाल में 8 वर्षीय बालक मारुति का जन्मदिन अनूठे ढंग से मनाया गया। पूरे उत्सव में भारतीय संस्कृति की गहरी झलक दिखाई दी। मारुति के माता-पिता और दादा-दादी ने भारतीय पद्धति के अनुसार जन्मदिन की योजना बनाई। इस उत्सव को सार्थक स्वरूप देते हुए 'पुस्तक-तुला' का आयोजन किया गया, जिसमें मारुति को पुस्तकों से तौला गया। ​तराजू के एक पलड़े में मारुति को बैठाया गया और दूसरे पलड़े में पुस्तकें रखी गईं। जो भी अतिथि आए थे, वे अपने साथ लाई गई पुस्तकें या वहां उपलब्ध पुस्तकों को दूसरे पलड़े में तब तक रखते गए, जब तक मारुति का पलड़ा ऊपर नहीं उठ गया। इस अवसर पर कई सामाजिक कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे। परिवार 'पुनरुत्थान विद्यापीठ' से जुड़ा हुआ है और इस प्रकार जन्मदिन मनाने की प्रेरणा उन्हें वहीं से प्राप्त हुई। मारुति की शिक्षा भी पुनरुत्थान विद्यापीठ के गुरुकुल में चल रही है।

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

'जादूगरनी' - जीवन, प्रेम और रिश्तों की खूबसूरत अभिव्यक्ति

वीडियो देखें : क्या एक कविता जीवन बदल सकती है?


“जब कोई कविता किसी मरते हुए को जीन का सहारा दे जाए तो वह जादूगरनी होती है”। युवा कवि सुदर्शन व्यास ने अपने नये काव्य संग्रह का नामकरण इसी भाव के साथ किया है- जादूगरनी। सच है, कविताओं में वह जादू होता है कि वे बड़े परिवर्तन की संवाहक बनती हैं। दुनिया के कितने ही बड़े आंदोलनों का आधार कविता ही बनी है। भारत के स्वाधीनता संग्राम में क्रांतिकारियों और स्वतंत्रतता सेनानियों का बीज मंत्र ‘वंदेमातरम’ भी काव्य है। ऐसा काव्य जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में नये सिरे से प्राण फूंक दिए। भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण का जीवन दर्शन काव्य के रूप में ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बहता आया है। कविता के महत्व एवं हमारे जीवन में उसकी उपस्थिति पर कवि ने उचित ही लिखा है कि “मनुष्यता के सबसे बड़े शोक में भी कविता गायी जाती है और सबसे बड़ी खुशी में भी कविता होती है। कविता हमारे जीवन का आधार है और जब कोई कविता किसी मरते हुए को जीने का सहारा दे जाए तो वह जादूगरनी होती है”।

रविवार, 8 मार्च 2026

स्वदेशी का आग्रही है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

संघ शताब्दी वर्षआरएसएस ने धरातल पर उतारकर दिखाया स्वदेशी विचार


भारत की सर्वांगीण स्वतंत्रता एवं विकास का सपना देखने वाले महापुरुषों ने ‘स्वदेशी’ का महत्व समझा और भारत को आत्मनिर्भर एवं सशक्त बनाने के लिए समाज से स्वदेशी आचरण का आग्रह किया। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि यदि हमें फिर से उन्नति करनी है, तो लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की शिक्षा देनी होगी। स्वातंत्र्यवीर सावरकर, बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय और महात्मा गांधी से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार तक, सभी ने स्वदेशी को अपनाने का आग्रह किया। भारत के निर्माण का सपना देखने वाले विचारक यह भली-भांति जानते थे कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति के मूल में स्वदेशी का आचरण ही है।

भारत को परमवैभव पर ले जाने की महान आकांक्षा के साथ 1925 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई, तब से ही संघ ने स्वदेशी को लेकर समाज का प्रबोधन प्रारंभ कर दिया था। संघ के लिए स्वदेशी केवल एक आर्थिक नारा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का मूल मंत्र है। संघ ने अपनी स्थापना के साथ ही भारत की आत्मनिर्भरता और भारतीय मूल्यों पर आधारित अर्थतंत्र की वकालत की है।

मंगलवार, 3 मार्च 2026

कहाँ है आपकी निष्ठा

खामेनेई की मौत : प्रदर्शन करनेवाले मुसलमानों की निष्ठा कहाँ है?


अमेरिका और इजराइल के हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद मध्य पूर्व में जो भू-राजनीतिक भूचाल आया है, उसकी अनुगूंज भारत के कई हिस्सों में सुनाई दे रही है। लखनऊ से लेकर श्रीनगर तक कई क्षेत्रों में हजारों मुस्लिम प्रदर्शनकारियों का सड़कों पर उतरना, अमेरिका और इजराइल के खिलाफ नारेबाजी करना, एक गहरी चिंता का विषय है। यह प्रदर्शन सवाल उठाता है कि भारत के मुसलमानों की निष्ठा आखिर कहाँ है? ईरान के सुप्रीम खामनेई की मौत के बाद भारत में प्रदर्शनों का क्या औचित्य है? अपने आप को इस्लामिक सत्ता/व्यवस्था से जोड़ने की यह बीमारी आज की नहीं है। खिलाफत आंदोलन को याद कीजिए और उसके उद्देश्य का विश्लेषण कीजिए। आखिर क्यों भारत के मुसलमानों ने खिलाफत आंदोलन चलाया था? क्या उसका कोई संबंध भारत की स्वतंत्रता से था? 

आज से आठ दशक पूर्व संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जिस कड़वे सच की ओर देश का ध्यान आकृष्ट किया था, वह आज पूरी तरह प्रासंगिक नजर आता है। उन्होंने स्पष्ट लिखा था कि मुसलमानों की निष्ठा उस देश के प्रति नहीं होती जहाँ वे रहते हैं, बल्कि उस सांप्रदायिक विश्वास पर निर्भर करती है जिसका वे हिस्सा हैं। लखनऊ से लेकर जम्मू-कश्मीर की सड़कों पर उतरकर मातम मनाने वाली भीड़ और खामेनेई को शहीद का दर्जा देने की कवायद, इसी मानसिकता का साक्षात प्रमाण है।