मंगलवार, 12 मई 2026

भगवान के प्रति भक्ति प्रकट करने का सर्वोत्तम प्रकार है सेवा-भाव

संघ शताब्दी वर्ष : श्रीगुरुजी की दृष्टि में आध्यात्मिक साधना है सेवा


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहचान केवल शाखा पर खेलने एवं कदमताल करने वाले संगठन के रूप में नहीं है। अपितु, समाजसेवी संगठन के तौर पर भी संघ को देखा जाता है। समाज में विभिन्न प्रकार के सेवा उपक्रम चलाने वाले संगठन या व्यक्ति मानते हैं कि वे कोई विशिष्ट कार्य कर रहे हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग मानते हैं कि वे सेवा करके समाज पर उपकार कर रहे हैं। संघ ने प्रारंभ से स्पष्ट किया है कि उसके लिए सेवा कार्य समाज पर उपकार नहीं हैं अपितु सेवा तो करणीय कार्य है। स्वामी विवेकानंद के दर्शन ‘नर सेवा-नारायण सेवा’ को अनुकरणीय मानकर अपने नैतिक एवं स्वाभाविक दायित्व के रूप में संघ के स्वयंसेवक सेवा कार्य करते हैं। संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ के चिंतन में सेवा की संकल्पना अत्यंत व्यापक, गूढ़ और आध्यात्मिक है। उनके दर्शन में सेवा केवल एक औपचारिकता या सामाजिक दायित्व नहीं है, बल्कि यह ईश्वर की आराधना का सबसे उत्तम और प्रत्यक्ष मार्ग है। उन्होंने सेवा को भौतिकता के धरातल से उठाकर परोपकार और ईश्वरीय साधना के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित किया।

श्रीगुरुजी का स्पष्ट मानना था कि हमारे आसपास मौजूद भूखे, निराश्रित और पीड़ित मानव साक्षात ईश्वर का ही रूप हैं। श्रीरामकृष्ण परमहंस द्वारा दिए गए ‘दरिद्रनारायण’ और उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद के ‘नर सेवा-नारायण सेवा’ के विचार को गहराई से आत्मसात करते हुए श्रीगुरुजी ने यह दर्शन दिया कि भगवान हमें अपनी सेवा का अवसर देने के लिए ही इन पीड़ित रूपों में आते हैं। जब मनुष्य के भीतर सच्ची सेवा-भावना जागृत होती है, तो उसे यह अनुभूति होने लगती है कि उसकी व्यक्तिगत और पारिवारिक सम्पत्ति केवल ‘समाज-देवता’ की पूजा का एक उपकरण मात्र है। इस अवस्था में उसका संपूर्ण जीवन समाज के लिए एक पवित्र उपहार बन जाता है।

परदुःखकातरता: का भाव जगाने का आग्रह :

श्रीगुरुजी ने सेवाभाव को जगाने के लिए ‘परदु:खकातरता’ के भाव को आत्मसात करने का आग्रह किया। जो दूसरों के दु:ख को अपना मानता है, वह दु:ख के कारणों का निवारण करने के लिए प्रयत्नशील रहता है। सेवा का स्वाभाविक व्यवहार भी उसी व्यक्ति का होता है, जो दूसरों की पीड़ा को अपनी पीड़ा मानता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के मन में ‘परदु:खकातरता’ का भाव होना ही चाहिए। श्रीगुरुजी अकसर कहते थे कि हमारे कार्यों का मूलभूत आधार दूसरों के सुख में सुख का अनुभव करना और उनके दु:ख से सौ गुना अधिक दु:खी होकर अपने व्यक्तिगत सुख-दु:ख को भूल जाना होना चाहिए। उन्होंने भारतीय मनीषा के इस प्राचीन श्लोक का उल्लेख करते हुए सच्चे सेवक की परिभाषा दी है- 

“न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम्। 

कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्।।”

अर्थात, एक सच्चे सेवक को न राज्य की कामना करनी चाहिए, न स्वर्ग की और न ही मोक्ष की; उसकी एकमात्र कामना पीड़ित प्राणियों के दु:खों का नाश करने की होनी चाहिए। श्रीगुरुजी अकसर उल्लेख करते थे कि देश के महापुरुषों ने सदा इसी सेवा-भाव को भगवान के प्रति अपनी भक्ति प्रकट करने का सबसे श्रेष्ठ माध्यम माना है।

निःस्वार्थ भाव और समाज के साथ एकरूपता :

सेवा के मार्ग में व्यक्तिगत स्वार्थ और सुख-सुविधाओं की लालसा सबसे बड़ी बाधा है। श्रीगुरुजी ने कम मेहनत कर अधिक धन और आराम पाने की व्यक्तिगत उत्कर्षवादी प्रवृत्ति का कड़ा विरोध किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि एक सेवक को समाज की भलाई के लिए सहजता से कष्ट उठाने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए। समाज के साथ पूरी तरह एकरूप होकर, उसके उत्थान में ही अपना आनंद खोजना सच्ची सेवा है।

उपेक्षितों और वनवासियों का व्यावहारिक उत्थान :

श्रीगुरुजी का सेवा भाव केवल बौद्धिक या दार्शनिक नहीं, बल्कि पूरी तरह धरातलीय और व्यावहारिक था। उन्होंने कार्यकर्ताओं से स्पष्ट आह्वान किया कि वे अपनी पूरी शक्ति से उपेक्षित और समाज के अंतिम छोर पर खड़े बंधुओं के जीवन-स्तर में सुधार लाएँ। श्रीगुरुजी कहते थे कि “गिरिकंदराओं (पहाड़ों/जंगलों) में रहने वाले वनवासी बंधुओं के पास पहुँचकर उन्हें आजीविका और शिक्षा के साधन उपलब्ध कराना तथा उनके साथ समानता का व्यवहार करना ही वास्तविक सेवा है”। हम देखते हैं कि श्रीगुरुजी की प्रेरणा से कितने ही स्वयंसेवक सुदूर क्षेत्रों में सेवा कार्य कर रहे हैं। संघ की प्रेरणा से संचालित समविचारी संगठन इन क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वावलंबन के प्रकल्प चला रहे हैं। 

संकटकाल में राष्ट्र-सेवा और मौन कर्म :

देश में जब भी राष्ट्रीय आपदा या कोई संकट आया है, संघ के स्वयंसेवकों ने अपनी पूरी शक्ति से विभिन्न मोर्चों पर देश-समाज को संभालने का कार्य किया है। युद्ध के समय में सैनिकों की सहायता करने के प्रसंग हमें स्मरण ही हैं। कोरोना महामारी के संकट में व्यापक स्तर पर संघ ने सेवा कार्यों का संचालन किया ही। कहने का अभिप्राय है कि युद्ध और संकट के समय में सेवा का दायरा अत्यंत व्यापक हो जाता है। इस संदर्भ में श्रीगुरुजी ने स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया है। 1965 के युद्ध के समय मध्यप्रदेश के महू में श्रीगुरुजी ने अपने एक भाषण में आग्रह किया कि ऐसे समय में सीमा पर लड़ रहे जवानों के परिवारों की देखभाल का जिम्मा समाज और स्वयंसेवकों को लेना चाहिए। नागरिक-सुरक्षा, घायलों के लिए रक्तदान और देश के आर्थिक उत्पादन को निरंतर बनाए रखना भी सेवा का ही अहम हिस्सा है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह सारे सेवा कार्य बिना किसी आत्म-प्रशंसा या ढोल पीटे (बिना दिखावे के) संपन्न किए जाने चाहिए।

कहना होगा कि श्रीगुरुजी के विचारों में ‘सेवा’ अपने अहं को मिटाकर ‘स्व’ से ‘समष्टि’ (समाज) तक की यात्रा है। यह एक ऐसा अनुष्ठान है जहाँ मनुष्य उपेक्षितों और पीड़ितों में ईश्वर के दर्शन करता है और बिना किसी प्रसिद्धि की चाह के, राष्ट्र के उत्थान के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर रहता है।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 10 मई, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

बुधवार, 6 मई 2026

भाजपा की ऐतिहासिक जीत, विपक्ष को आईना दिखाता जनादेश

जनता ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उसकी सामूहिक चेतना से बढ़कर कोई भी ताकत नहीं है। छल-बल और तुष्टीकरण से सत्ता हथियाने वाली ताकतों को जनता ने आईना दिखा दिया है। जैसे ही पश्चिम बंगाल में जनता को सुरक्षा का आश्वासन मिला, उसने निर्भय होकर बता दिया है कि लोकतंत्र में हिंसा, गुंडागर्दी और मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए कोई स्थान नहीं है। कहना होगा कि पाँच राज्यों (चार राज्य और एक केंद्रशासित प्रदेश) के चुनाव परिणामों ने भारतीय राजनीति के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। बंपर मतदान और मतदाताओं के अभूतपूर्व उत्साह के बीच जो परिणाम सामने आए हैं, वे न केवल चुनाव पश्चात आए सर्वेक्षण के अनुमानों पर मुहर लगाते हैं, बल्कि लोकतंत्र की जीत की कहानी भी धूमधाम से सुना रहे हैं।

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

भारतीय विचार के मजबूत स्तंभ ‘11 महानायक’

देखें : 11 महानायक : भारत के महान सपूतों की गाथा | 11 Mahanayak Book Review

भारत में महापुरुषों की एक लंबी शृंखला है। भारत के सुदीर्घ इतिहास के प्रत्येक कालखंड में हमें ऐसे नायक दिखाई देते हैं, जिन्होंने भारतीय समाज का मार्ग प्रशस्त किया। ऐसे में कुछ नायकों को चुनना और उनके व्यक्तित्व पर लिखना, अत्यंत कठिन कार्य है। अपने लेखन के दौरान प्रो. संजय द्विवेदी समय-समय पर भारत के नायकों के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर लिखते रहे हैं। उनमें से ही 11 नायकों का चयन करके उन्होंने एक पुस्तक तैयार की है, जिसका नाम है- ‘11 महानायक’। ‘संस्मय प्रकाशन’ से प्रकाशित पुस्तक ‘11 महानायक’ भारतीय इतिहास और नवजागरण के उन देदीप्यमान नक्षत्रों की गाथा है, जिन्होंने अपने त्याग, संघर्ष और वैचारिक स्पष्टता से एक सशक्त भारत की नींव रखी। यह पुस्तक ‘गागर में सागर’ भरने का एक सफल प्रयास है, जो पाठकों को भारत के महान सपूतों के जीवन-दर्शन से सीधे जोड़ती है।

रविवार, 26 अप्रैल 2026

श्रीगुरुजी को संन्यासी जीवन से वापस खींच लाया संघ कार्य

संघ शताब्दी वर्ष : श्री गोलवलकर ने स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शिष्य अखंडानंद जी से संन्यास की दीक्षा ली थी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ के जीवन का एक दौर ऐसा भी है, जब वे दुनियादारी छोड़कर अध्यात्म के मार्ग पर संन्यासी हो गए। लेकिन उनकी नियति और संघ कार्य की आवश्यकता उन्हें पुन: राष्ट्रीय आंदोलन में खींच लाई। संघ कार्य को विस्तार देते हुए भी उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन एक तपोनिष्ठ संन्यासी की भाँति ही व्यतीत किया। श्रीगुरुजी किसी आध्यात्मिक विभूति की तरह दिखाई देते थे। उनके चेहरे पर दमकता तेज भी इसका साक्ष्य देता था कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है अपितु अध्यात्म की ऊर्जा से सम्पन्न कोई पवित्र आत्मा है। श्रीगुरुजी के व्यक्तित्व का स्मरण करते हुए ‘माधव अर्चना’ गीत की रचना की गई है, जिसकी एक-एक पंक्ति उनके आध्यात्मिक व्यक्तित्व की ओर संकेत करती है। “सिन्धु सा गम्भीर मानस, थाह कब पाई किसी ने। आ गया सम्पर्क में जो, धन्यता पाई उसी ने”। श्रीगुरुजी के संपर्क में आए संघ से बाहर के बंधु भी मानते थे कि उनका जीवन केवल एक संगठनकर्ता का जीवन नहीं था, बल्कि वह भीतर से एक पूर्ण विरक्त और आध्यात्मिक साधक थे। उनका समूचा जीवन इस बात का प्रतीक है कि कैसे एक संन्यासी अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को समाज और राष्ट्र के कल्याण में समाहित कर सकता है।

रविवार, 19 अप्रैल 2026

संघ के सबसे युवा सरसंघचालक

संघ शताब्दी वर्ष : माधव सदाशिवराव गोलवलकर सबसे कम उम्र (34 वर्ष) में सरसंघचालक बने और सबसे अधिक समय (33 वर्ष) तक सरसंघचालक के रूप में स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया

स्वतंत्रता सेनानी डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम से जिस आंदोलन की शुरुआत की थी, उनके जाने के बाद उसे विस्तार देने का कार्य द्वितीय सरसंघचालक श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर ने किया, जिन्हें सब आदरपूर्वक ‘श्रीगुरुजी’ कहते थे। संघ के अब तक के इतिहास में श्रीगुरुजी सबसे युवा सरसंघचालक रहे हैं। वे केवल 34 वर्ष की आयु में ही सरसंघचालक नियुक्त हो गए थे। आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार भली प्रकार से श्रीगुरुजी की प्रतिभा को पहचानते थे, इसलिए उन्हें संघ की बागडोर सौंपते समय वे निश्चिंत थे। जब श्रीगुरुजी के नाम की विधिवत घोषणा हुई, तब उन्होंने अपने पहले ही भाषण में स्पष्ट किया कि, “सरसंघचालक का पद यह विक्रमादित्य का सिंहासन है। उस सिंहासन पर चरवाहे का लड़का आसीन हुआ और उसने यथोचित न्याय किया। डॉक्टरजी ने इस पद को ‘विक्रमादित्य का सिंहासन’ इस कोटि में बिठाया। उस पर आरूढ़ होने का अवसर मुझ जैसे साधारण नागरिक को मिला है, परंतु डॉक्टरजी मुझसे उचित रूप में ही उच्चारण तथा कृति करवा लेंगे...”। बहुत ही विनम्रता के भाव से उन्होंने सबके मन में यह विश्वास जगाया कि डॉक्टरजी ने ही इस प्रकार का मार्ग बना दिया है कि उस पर कोई भी चल सकता है। श्रीगुरुजी ने सरसंघचालक के रूप में 33 वर्षों तक स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया। उनके कार्यकाल में संघ के सामने अनेक प्रकार की चुनौतियां आईं, लेकिन वे एक कुशल नाविक की भाँति तूफानों के बीच से संघ रूपी जहाज को निकालकर ले आए। श्रीगुरुजी का जीवन राष्ट्र और समाज के लिए पूर्ण समर्पण की एक अद्भुत मिसाल है। एक मेधावी छात्र, एक समर्पित शिक्षक और एक तपस्वी के रूप में उनका जीवन दर्शन आज भी प्रेरणा का स्रोत है।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

अनादि समर : छावा के बलिदान से जाग उठा हिन्दू

देखें वीडियो : यूट्यूब चैनल 'अपना वीडियो पार्क' पर 'अनादि समर' की चर्चा


लेखक गिरीश जोशी की पुस्तक ‘अनादि समर’ छत्रपति शंभूराजे की जीवनी मात्र नहीं है, बल्कि यह भारतीय इतिहास के उस महत्वपूर्ण कालखंड का विश्लेषण है, जिसे सही ढंग से सामने नहीं लाया गया है। इस पुस्तक की पृष्ठभूमि की जानकारी मुझे ज्ञात है, इसलिए बताना चाहूँगा कि जब सुपरहिट फिल्म ‘छावा’ आई थी, तब छत्रपति शंभूराजे अर्थात् संभाजी महाराज के बारे में जानने की इच्छा लोगों के मन में अत्यंत प्रबल थी। यह एक सहज जिज्ञासा थी कि छत्रपति शंभूराजे के बलिदान के बाद क्या हुआ होगा? क्योंकि फिल्म की पटकथा हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए छत्रपति शंभूराजे के बलिदान पर खत्म हो जाती है। उस समय लेखक गिरीश जोशी जी को यह दायित्व बोध हुआ कि फिल्म जहाँ खत्म होती है, उसके आगे की कहानी वे सुनाएँगे। लोगों को यह अवश्य ही जानना चाहिए कि छत्रपति शंभूराजे के बलिदान ने किस प्रकार हिन्दुत्व की ज्वाला को और तीव्र किया। ‘अनादि समर’ के माध्यम से लेखक गिरीश जोशी ने छत्रपति शंभूराजे के मुगलों के साथ संघर्ष, उनके बलिदान और उस बलिदान के परिणामस्वरूप उपजे ‘लोकयुद्ध’ के वास्तविक इतिहास को सामने लाने का साधु कार्य किया है।

रविवार, 12 अप्रैल 2026

संघ की शाखा में आए थे बाबा साहब डॉ. अंबेडकर

संघ शताब्दी वर्ष : स्वयंसेवकों से संवाद करते हुए डॉ. अंबेडकर ने कहा- “कुछ बातों पर मतभेद हो सकते हैं। लेकिन संघ की तरफ अपनत्व की भावना से देखता हूँ”

सामाजिक समरसता के अग्रदूत बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर अपनत्व की भावना रखते थे और विश्वास करते थे कि यह संगठन सामाजिक परिवर्तन का आंदोलन बनेगा। उन्हें विश्वास था कि संघ हिन्दू समाज में एकजुटता और सामाजिक समरसता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। बाबा साहब डॉ. अंबेडकर संघ की शाखा और शिक्षा वर्ग में पहुँचकर एवं संघ के कार्यकर्ताओं से संवाद कर अपने विचार की पुष्टि करते रहते थे। डॉ. अंबेडकर का संघ के साथ पहला महत्वपूर्ण संपर्क 1935 में हुआ, जब वे पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग के सायंकालीन बौद्धिक सत्र में आए थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से हुई। इस वर्ग में उन्हें जो अनुभूति हुई, उससे संघ के प्रति अपनत्व का भाव बन गया, जो उनके मन में जीवनपर्यंत बना रहा है। संघ के साथ संपर्क-संवाद भी बना रहा।