संघ शताब्दी वर्ष : माधव सदाशिवराव गोलवलकर सबसे कम उम्र (34 वर्ष) में सरसंघचालक बने और सबसे अधिक समय (33 वर्ष) तक सरसंघचालक के रूप में स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया
स्वतंत्रता सेनानी डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम से जिस आंदोलन की शुरुआत की थी, उनके जाने के बाद उसे विस्तार देने का कार्य द्वितीय सरसंघचालक श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर ने किया, जिन्हें सब आदरपूर्वक ‘श्रीगुरुजी’ कहते थे। संघ के अब तक के इतिहास में श्रीगुरुजी सबसे युवा सरसंघचालक रहे हैं। वे केवल 34 वर्ष की आयु में ही सरसंघचालक नियुक्त हो गए थे। आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार भली प्रकार से श्रीगुरुजी की प्रतिभा को पहचानते थे, इसलिए उन्हें संघ की बागडोर सौंपते समय वे निश्चिंत थे। जब श्रीगुरुजी के नाम की विधिवत घोषणा हुई, तब उन्होंने अपने पहले ही भाषण में स्पष्ट किया कि, “सरसंघचालक का पद यह विक्रमादित्य का सिंहासन है। उस सिंहासन पर चरवाहे का लड़का आसीन हुआ और उसने यथोचित न्याय किया। डॉक्टरजी ने इस पद को ‘विक्रमादित्य का सिंहासन’ इस कोटि में बिठाया। उस पर आरूढ़ होने का अवसर मुझ जैसे साधारण नागरिक को मिला है, परंतु डॉक्टरजी मुझसे उचित रूप में ही उच्चारण तथा कृति करवा लेंगे...”। बहुत ही विनम्रता के भाव से उन्होंने सबके मन में यह विश्वास जगाया कि डॉक्टरजी ने ही इस प्रकार का मार्ग बना दिया है कि उस पर कोई भी चल सकता है। श्रीगुरुजी ने सरसंघचालक के रूप में 33 वर्षों तक स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया। उनके कार्यकाल में संघ के सामने अनेक प्रकार की चुनौतियां आईं, लेकिन वे एक कुशल नाविक की भाँति तूफानों के बीच से संघ रूपी जहाज को निकालकर ले आए। श्रीगुरुजी का जीवन राष्ट्र और समाज के लिए पूर्ण समर्पण की एक अद्भुत मिसाल है। एक मेधावी छात्र, एक समर्पित शिक्षक और एक तपस्वी के रूप में उनका जीवन दर्शन आज भी प्रेरणा का स्रोत है।
श्रीगुरुजी का मूल कुल कोंकण के गोलवली गांव का था, जहां ‘पाध्ये’ (उपाध्याय) होने की परंपरा के कारण उनका उपनाम पाध्ये पड़ गया था। इसी कुल की एक शाखा पंढरपुर जाकर बसी। इसी परिवार के पं. काशीनाथ अनंत (बाबासाहब पंडित) ने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘धर्मसिंधु’ की रचना की थी। आगे चलकर यह परिवार ‘गोलवलकर’ नाम से पहचाना जाने लगा। श्रीगुरुजी का जन्म नागपुर में रायकर परिवार के निवास स्थान पर 19 फरवरी, 1906 (विजया एकादशी) को हुआ। उनके पिता श्री सदाशिवराव (भाऊजी) एक अध्यापक थे और माता का नाम श्रीमती लक्ष्मीबाई (ताई) था। बचपन में उनका नाम ‘माधव’ रखा गया, लेकिन प्यार से उन्हें ‘मधु’ भी कहा जाता था।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी :
श्रीगुरुजी बचपन से ही अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के धनी थे। वे ‘एकपाठी’ थे, अर्थात् किसी भी बात को एक बार सुनकर या पढ़कर कंठस्थ कर लेते थे। उनके पिता ने श्रीगुरुजी को रामरक्षा स्तोत्र की पुस्तिका लाकर दी और केवल एक बार ही उसको पढ़ने की शिक्षा दी। एक-दो दिनों में ही माधव संपूर्ण रामरक्षा स्तोत्र निर्दोष रूप में गाने लगे, यह देखकर सबको सुखद अनुभूति हुई। इसी प्रकार उनके अध्यापक ने कक्षा में गोस्वामी श्री तुलसीदास के ‘श्रीरामचरितमानस’ ग्रंथ में से कुछ अंश सुनाए। उसके बाद माधव ने न केवल ‘मानस’ का संपूर्ण पठन किया, अपितु वे श्रीहनुमान की कथाएं भी अपने मित्रों को सुनाने लगे थे। कुशाग्र बुद्धि के साथ-साथ धर्म-संस्कृति के प्रति उनका अनुराग बचपन में ही दिखने लगा था।
श्रीगुरुजी का स्वाध्याय में बहुत मन रमता था। वे अपने पाठ्यक्रम से इतर भी बहुत साहित्य पढ़ते थे। एक बार कक्षा में अध्यापक अंग्रेजी कविता पढ़ा रहे थे, तभी श्रीगुरुजी ने उसका मराठी में अनुवाद कर दिया। सहपाठी मित्र ने जब अध्यापक को इसके बारे में बताया, तब अध्यापक विश्वास ही न कर सके। शिक्षक ने परीक्षा लेने के लिए उन्हें अनुवाद करने हेतु एक दूसरी कविता दी। श्रीगुरुजी ने उसका भी सरस अनुवाद वहीं कर दिया। श्रीगुरुजी ने 1922 में चंद्रपुर के ज्युबिली हाईस्कूल से प्रथम श्रेणी में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात् बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से 1926 में बी.एस.सी. और 1928 में प्राणीशास्त्र में प्रथम श्रेणी में एम.एस.सी. की डिग्री प्राप्त की।
ऐसे मिला ‘गुरुजी’ संबोधन :
मद्रास के मत्स्यालय में कुछ समय शोध करने के पश्चात् वे नागपुर लौट आए। 1929 में उन्होंने हिस्लॉप कॉलेज में प्राध्यापक के रूप में कार्य किया। अगस्त 1931 में वे पुनः बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्राणीशास्त्र के अध्यापक के रूप में गए। बनारस में रहते हुए वे छात्रों को उनकी पढ़ाई और अन्य विषयों में बहुत सहायता करते थे। उनके इस निस्वार्थ भाव और ज्ञान के कारण छात्र उन्हें आदर से ‘गुरुजी’ कहकर बुलाने लगे। आगे चलकर संस्थापक सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार भी उन्हें गुरुजी कहकर संबोधित करने लगे। फिर क्या था, संघ के अन्य अधिकारी और कार्यकर्ता भी उन्हें ‘गुरुजी’ नाम से संबोधित करने लगे और यही नाम उनकी पहचान बन गया—श्रीगुरुजी यानी माधव सदाशिवराव गोलवलकर।
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| संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 19 अप्रैल, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ |






