रविवार, 26 अप्रैल 2026

श्रीगुरुजी को संन्यासी जीवन से वापस खींच लाया संघ कार्य

संघ शताब्दी वर्ष : श्री गोलवलकर ने स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शिष्य अखंडानंद जी से संन्यास की दीक्षा ली थी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ के जीवन का एक दौर ऐसा भी है, जब वे दुनियादारी छोड़कर अध्यात्म के मार्ग पर संन्यासी हो गए। लेकिन उनकी नियति और संघ कार्य की आवश्यकता उन्हें पुन: राष्ट्रीय आंदोलन में खींच लाई। संघ कार्य को विस्तार देते हुए भी उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन एक तपोनिष्ठ संन्यासी की भाँति ही व्यतीत किया। श्रीगुरुजी किसी आध्यात्मिक विभूति की तरह दिखाई देते थे। उनके चेहरे पर दमकता तेज भी इसका साक्ष्य देता था कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है अपितु अध्यात्म की ऊर्जा से सम्पन्न कोई पवित्र आत्मा है। श्रीगुरुजी के व्यक्तित्व का स्मरण करते हुए ‘माधव अर्चना’ गीत की रचना की गई है, जिसकी एक-एक पंक्ति उनके आध्यात्मिक व्यक्तित्व की ओर संकेत करती है। “सिन्धु सा गम्भीर मानस, थाह कब पाई किसी ने। आ गया सम्पर्क में जो, धन्यता पाई उसी ने”। श्रीगुरुजी के संपर्क में आए संघ से बाहर के बंधु भी मानते थे कि उनका जीवन केवल एक संगठनकर्ता का जीवन नहीं था, बल्कि वह भीतर से एक पूर्ण विरक्त और आध्यात्मिक साधक थे। उनका समूचा जीवन इस बात का प्रतीक है कि कैसे एक संन्यासी अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को समाज और राष्ट्र के कल्याण में समाहित कर सकता है।

श्रीगुरुजी के मन में वैराग्य और संन्यास की ओर झुकाव उच्च शिक्षा अर्जित करने के दौरान ही दिखाई दे गया था। अध्यात्म का संस्कार उन्हें परिवार से विरासत में प्राप्त हुआ था, जो निरंतर उनके हृदय में पल्लवित होता रहा। विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके मन में यह द्वंद्व चलने लगा था कि क्या उन्हें एकांतवासी बन जाना चाहिए और हिमालय में जाकर स्वत: ज्ञान प्राप्त करना चाहिए अथवा यहीं पर रहकर समाज की सेवा करनी चाहिए? उन्होंने अपने मित्र तेलंग को 20 मार्च, 1929 को लिखे पत्र में इस संबंध में चर्चा की थी- “मेरी इच्छा एक आम सांसारिक जीवन जीने की नहीं है। जो मैं चाहता हूँ, वह है इस जीवन की डोर को मैं और अधिक परिशुद्धि स्वर तक ले जा पाऊँ”। चूँकि देश की परिस्थितियाँ और हिन्दू समाज की चुनौतियाँ उनको अपने सामने दिखायी दे रही थीं। इसलिए ब्रह्म की खोज में अपने जीवन को हिमालय की कंदराओं में समर्पित कर देने का विचार भी उन्हें जँच नहीं रहा था। यही कारण था कि उनके मन में द्वंद्व था कि हिमालय में जाकर साधना करें या फिर समाज के बीच में रहकर संन्यासी भाव से अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन करें। 

डॉ. हेडगेवार से श्रीगुरुजी का संपर्क :

वर्ष 1932 में श्रीगुरुजी का संपर्क संघ के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के साथ हुआ। डॉक्टरजी ने श्रीगुरुजी की प्रतिभा को पहचान कर उन्हें संघ कार्य से जोड़ दिया। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन के साथ ही श्रीगुरुजी ने संघ कार्य में रुचि लेना प्रारंभ कर दिया। 1933 में वे वापस नागपुर लौटे। 1934 में डॉक्टरजी ने उन्हें संघ कार्य के लिए मुंबई भेजा। 1935 में उन्हें अकोला में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग के सर्वाधिकारी की जिम्मेदारी सौंपी गई। 

श्रीगुरुजी को मकर संक्रांति पर प्राप्त हुई दीक्षा :

कह सकते हैं कि श्रीगुरुजी का मन संघ कार्य में रम गया था। यद्धपि उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति उन्हें अध्यात्म और वैराग्य की ओर खींच रही थी। संघकार्य करते हुए श्रीगुरुजी नागपुर के ही धामतोली में स्थित रामकृष्ण आश्रम के संपर्क में आ गए। वहाँ आश्रम के प्रमुख संन्यासी स्वामी भास्करेश्वरानंद जी के साथ उनकी निकटता हो गई। उन्होंने आध्यात्मिकता की खोज में अधिक से अधिक समय आश्रम में व्यतीत करना शुरू कर दिया। 1936 की गर्मियों में वह दिन भी आ गया, जब श्रीगुरुजी सब कुछ त्यागने का संकल्प लेने के बाद बंगाल के सारगाछी आश्रम चले गए। यहाँ उन्होंने स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शिष्य और स्वामी विवेकानंद के गुरु भाई स्वामी अखंडानंद जी की सेवा में अपना समय व्यतीत किया। आश्रम का जीवन अत्यंत कठिन था। श्रीगुरुजी रात के डेढ़ बजे तक गुरुसेवा में लीन रहते थे और फिर भी सुबह चार बजे उठकर अपने गुरु के पैरों के पास खड़ाऊँ लेकर उपस्थित हो जाते थे। इसके अलावा श्रीगुरुजी आश्रम के बाकी कार्य, जैसे- पानी भरना, झाड़ू लगाना, बर्तन माँजना इत्यादि भी मनोयोग से करते थे। स्वामी अखंडानंद जी उनकी कड़ी परीक्षा लेते थे। कभी-कभी वे उन्हें घंटों तक एक ही आसन में बैठाए रखते या बिना कोई काम बताए एक ही जगह पर घंटों खड़ा रहने का निर्देश देते। श्रीगुरुजी ने बिना किसी शिकायत के इन सभी परीक्षाओं को पार किया। अंतत: मकर संक्रांति के पावन पर्व पर, 13 जनवरी, 1937 को श्रीगुरुजी को स्वामी अखंडानंद जी से ‘दीक्षा’ प्राप्त हो गई।

मैं आपको वापस वहाँ ले जा रहा हूँ, जहाँ से मैं आपको लेकर आया था :

दीक्षा विधि के केवल तीन सप्ताह बाद ही स्वामी अखंडानंद जी का निर्वाण हो गया। अमिताभ महाराज श्रीगुरुजी को अपने उन सहयोगियों से मिलाने के लिए कोलकाता स्थित बेलूर मठ लेकर गए, जो स्वामी रामकृष्ण परमहंस के समय से थे। यहाँ स्वामी अभेदानंद जी और श्रीगुरुजी के जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय घटता है। श्रीगुरुजी के तेज और उनके भीतर के वैराग्य को देखकर स्वामी अभेदानंद जी ने एक सटीक भविष्यवाणी की थी- “तुम त्यागी के समान ही जीवनयापन करोगे”। उस समय श्रीगुरुजी ने बेलूर मठ में ही रहने की इच्छा व्यक्त की, तब अमिताभ महाराज उन्हें एकांत में लेकर गए और कहा- “आपको रामकृष्ण मिशन में नहीं रहना है”। स्वामी अखंडानंद जी श्रीगुरुजी से क्या चाहते थे, इसकी चर्चा उन्होंने की। तब श्रीगुरुजी ने भी कहा कि “गुरुदेव ने कहा था कि जब कभी मुश्किल हो तब आपसे विचार-विमर्श करूं। मेरे लिए आपके मन में क्या योजना है?” अमिताभ महाराज ने उत्तर दिया- “मैं आपको वापस वहाँ ले जा रहा हूँ, जहाँ से मैं आपको लेकर आया था”। 

संघ के लिए पूरी तरह समर्पित श्रीगुरुजी :

अमिताभ महाराज के माध्यम से अपने गुरुदेव की ही यह इच्छा जानकर कि उन्हें समाज-कार्य करना चाहिए, श्रीगुरुजी मार्च 1937 में वापस नागपुर लौट आए। वे यहाँ अमिताभ महाराज के साथ रामकृष्ण आश्रम में लगभग एक महीना रहे। इसी बीच श्रीगुरुजी और डॉ. हेडगेवार के बीच मुलाकातों एवं संवाद की लंबी शृंखला चली। अंतत: श्रीगुरुजी ने ‘समाज को ही परमेश्वर’ मान लिया और स्वयं को पूरी तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य के लिए समर्पित कर दिया। उनका मानना था कि राष्ट्र-देवता की सेवा ही सबसे बड़ी ईश्वरीय साधना है। 

संघ के सर्वोच्च दायित्व (सरसंघचालक) का निर्वहन करते हुए भी श्रीगुरुजी का जीवन कभी सत्ता, पद या प्रतिष्ठा के इर्द-गिर्द नहीं घूमा। उन्होंने आजीवन एक परिव्राजक संन्यासी (निरंतर भ्रमण करने वाला साधु) की भाँति ही अपना जीवन व्यतीत किया। उनके पास न तो किसी पद की लालसा थी, न ही धन का कोई मोह और न ही उन्होंने जीवन में किसी भौतिक वस्तु का व्यक्तिगत संग्रह किया। श्रीगुरुजी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि संन्यास का अर्थ केवल जंगलों में जाकर आँखें बंद करना नहीं है, बल्कि अपनी संपूर्ण आध्यात्मिक ऊर्जा और निस्वार्थ भाव को समाज के उत्थान में लगा देना ही सच्चा संन्यास है। वे बाहर से एक संगठनकर्ता और भीतर से पूर्णतः त्याग और वैराग्य की सजीव मूर्ति थे।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 26 अप्रैल, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ


रविवार, 19 अप्रैल 2026

संघ के सबसे युवा सरसंघचालक

संघ शताब्दी वर्ष : माधव सदाशिवराव गोलवलकर सबसे कम उम्र (34 वर्ष) में सरसंघचालक बने और सबसे अधिक समय (33 वर्ष) तक सरसंघचालक के रूप में स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया

स्वतंत्रता सेनानी डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम से जिस आंदोलन की शुरुआत की थी, उनके जाने के बाद उसे विस्तार देने का कार्य द्वितीय सरसंघचालक श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर ने किया, जिन्हें सब आदरपूर्वक ‘श्रीगुरुजी’ कहते थे। संघ के अब तक के इतिहास में श्रीगुरुजी सबसे युवा सरसंघचालक रहे हैं। वे केवल 34 वर्ष की आयु में ही सरसंघचालक नियुक्त हो गए थे। आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार भली प्रकार से श्रीगुरुजी की प्रतिभा को पहचानते थे, इसलिए उन्हें संघ की बागडोर सौंपते समय वे निश्चिंत थे। जब श्रीगुरुजी के नाम की विधिवत घोषणा हुई, तब उन्होंने अपने पहले ही भाषण में स्पष्ट किया कि, “सरसंघचालक का पद यह विक्रमादित्य का सिंहासन है। उस सिंहासन पर चरवाहे का लड़का आसीन हुआ और उसने यथोचित न्याय किया। डॉक्टरजी ने इस पद को ‘विक्रमादित्य का सिंहासन’ इस कोटि में बिठाया। उस पर आरूढ़ होने का अवसर मुझ जैसे साधारण नागरिक को मिला है, परंतु डॉक्टरजी मुझसे उचित रूप में ही उच्चारण तथा कृति करवा लेंगे...”। बहुत ही विनम्रता के भाव से उन्होंने सबके मन में यह विश्वास जगाया कि डॉक्टरजी ने ही इस प्रकार का मार्ग बना दिया है कि उस पर कोई भी चल सकता है। श्रीगुरुजी ने सरसंघचालक के रूप में 33 वर्षों तक स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया। उनके कार्यकाल में संघ के सामने अनेक प्रकार की चुनौतियां आईं, लेकिन वे एक कुशल नाविक की भाँति तूफानों के बीच से संघ रूपी जहाज को निकालकर ले आए। श्रीगुरुजी का जीवन राष्ट्र और समाज के लिए पूर्ण समर्पण की एक अद्भुत मिसाल है। एक मेधावी छात्र, एक समर्पित शिक्षक और एक तपस्वी के रूप में उनका जीवन दर्शन आज भी प्रेरणा का स्रोत है।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

अनादि समर : छावा के बलिदान से जाग उठा हिन्दू

देखें वीडियो : यूट्यूब चैनल 'अपना वीडियो पार्क' पर 'अनादि समर' की चर्चा


लेखक गिरीश जोशी की पुस्तक ‘अनादि समर’ छत्रपति शंभूराजे की जीवनी मात्र नहीं है, बल्कि यह भारतीय इतिहास के उस महत्वपूर्ण कालखंड का विश्लेषण है, जिसे सही ढंग से सामने नहीं लाया गया है। इस पुस्तक की पृष्ठभूमि की जानकारी मुझे ज्ञात है, इसलिए बताना चाहूँगा कि जब सुपरहिट फिल्म ‘छावा’ आई थी, तब छत्रपति शंभूराजे अर्थात् संभाजी महाराज के बारे में जानने की इच्छा लोगों के मन में अत्यंत प्रबल थी। यह एक सहज जिज्ञासा थी कि छत्रपति शंभूराजे के बलिदान के बाद क्या हुआ होगा? क्योंकि फिल्म की पटकथा हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए छत्रपति शंभूराजे के बलिदान पर खत्म हो जाती है। उस समय लेखक गिरीश जोशी जी को यह दायित्व बोध हुआ कि फिल्म जहाँ खत्म होती है, उसके आगे की कहानी वे सुनाएँगे। लोगों को यह अवश्य ही जानना चाहिए कि छत्रपति शंभूराजे के बलिदान ने किस प्रकार हिन्दुत्व की ज्वाला को और तीव्र किया। ‘अनादि समर’ के माध्यम से लेखक गिरीश जोशी ने छत्रपति शंभूराजे के मुगलों के साथ संघर्ष, उनके बलिदान और उस बलिदान के परिणामस्वरूप उपजे ‘लोकयुद्ध’ के वास्तविक इतिहास को सामने लाने का साधु कार्य किया है।

रविवार, 12 अप्रैल 2026

संघ की शाखा में आए थे बाबा साहब डॉ. अंबेडकर

संघ शताब्दी वर्ष : स्वयंसेवकों से संवाद करते हुए डॉ. अंबेडकर ने कहा- “कुछ बातों पर मतभेद हो सकते हैं। लेकिन संघ की तरफ अपनत्व की भावना से देखता हूँ”

सामाजिक समरसता के अग्रदूत बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर अपनत्व की भावना रखते थे और विश्वास करते थे कि यह संगठन सामाजिक परिवर्तन का आंदोलन बनेगा। उन्हें विश्वास था कि संघ हिन्दू समाज में एकजुटता और सामाजिक समरसता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। बाबा साहब डॉ. अंबेडकर संघ की शाखा और शिक्षा वर्ग में पहुँचकर एवं संघ के कार्यकर्ताओं से संवाद कर अपने विचार की पुष्टि करते रहते थे। डॉ. अंबेडकर का संघ के साथ पहला महत्वपूर्ण संपर्क 1935 में हुआ, जब वे पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग के सायंकालीन बौद्धिक सत्र में आए थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से हुई। इस वर्ग में उन्हें जो अनुभूति हुई, उससे संघ के प्रति अपनत्व का भाव बन गया, जो उनके मन में जीवनपर्यंत बना रहा है। संघ के साथ संपर्क-संवाद भी बना रहा।

मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

कांग्रेस अधिवेशन में डॉ. हेडगेवार ने रखा पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव

संघ शताब्दी वर्ष : संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने कांग्रेस में शामिल होकर राजनीतिक आंदोलन में भी बढ़-चढ़कर भाग लिया था


यह प्रतीकात्मक चित्र AI से निर्मित है।

नागपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में लोकमान्य तिलक का बहुत प्रभाव था। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार प्रारंभ से ही तिलक जी को आदर्श राजनेता और स्वतंत्रतासेनानी के तौर पर देखते थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नागपुर इकाई में तिलक के समर्थकों का प्रभाव था, उन्होंने मिलकर अलग से ‘राष्ट्रीय मंडल’ भी बना रखा था। इस राष्ट्रीय मंडल की ओर से नागपुर में राजनीतिक गतिविधियों का आयोजन किया जाता, जिनमें डॉ. हेडगेवार भी हिस्सा लेते थे। एक ओर जहाँ अन्य कांग्रेसी नेता एवं कार्यकर्ता ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत एक स्वतंत्र औपनिवेशिक राज्य की माँग करते थे, वहीं डॉ. हेडगेवार इकलौते थे जो पूर्ण स्वराज्य की माँग को आगे बढ़ाते थे। डॉक्टर जी अपने भाषणों से युवाओं के मन में पूर्ण स्वतंत्रता की भावना को प्रज्वलित कर रहे थे। बहुत कम समय में डॉ. हेडगेवार नागपुर कांग्रेस के प्रमुख नेता बन गए। कांग्रेस की नागपुर शहर इकाई के संयुक्त सचिव की जिम्मेदारी डॉक्टर साहब के पास आ गई थी। वर्ष 1919 में कांग्रेस के अधिवेशन में भी शामिल होने डॉक्टर साहब अमृतसर भी गए और वहाँ उन्होंने जलियांवाला बाग की मिट्टी को माथे से लगाकर देश को अंग्रेजों के अत्याचार से मुक्त कराने के अपने संकल्प को और दृढ़ किया।

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

संघ की वैचारिक यात्रा का ऐतिहासिक दस्तावेज ‘आरएसएस @100’

जनसंचार के सरोकारों को समर्पित पत्रिका 'मीडिया विमर्श' का संघ शताब्दी वर्ष विशेषांक 

- पुरु शर्मा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्ष की यात्रा पूरी होने पर देशभर में संघ की विचारधारा, उसकी उपलब्धियों एवं योगदान को लेकर चर्चा है। ऐसे में ‘मीडिया विमर्श’ का विशेषांक ‘आरएसएस@100’ का आना महत्वपूर्ण है। मीडिया विमर्श का यह विशेषांक संघ से संबंधित सामयिक एवं चर्चित विषयों पर प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध कराता है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक एवं लेखक डॉ. लोकेन्द्र सिंह इसके अतिथि संपादक हैं। संघ विषयों पर वे निरंतर लिखते हैं। संघ पर केंद्रित उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें- संघ दर्शन : अपने मन की अनुभूति और राष्ट्रध्वज एवं आरएसएस भी उल्लेखनीय हैं। डॉ. सिंह के कुशल संपादन में तैयार मीडिया विमर्श का विशेषांक संघ की एक सदी की यात्रा को केवल एक संगठन के इतिहास के रूप में नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण की गाथा के रूप में प्रस्तुत करता है। यह विशेषांक उन सबके लिए उपयोगी है, जो संघ को जानना-समझना चाहते हैं। कहना होगा कि यह एक संदर्भ ग्रंथ की भाँति है।

रविवार, 29 मार्च 2026

“मेरा यह जीवन देश सेवा के लिए समर्पित”

संघ शताब्दी वर्ष : संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार अनुशीलन समिति के प्रमुख क्रांतिकारी थे, उन्होंने आजन्म भारतमाता की सेवा करने की प्रतिज्ञा की

यह चित्र Google Gemini AI से निर्मित है।

ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए कोलकाता से बड़े पैमाने पर क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन हो रहा था। एक प्रकार से कोलकाता क्रांतिकारियों के लिए ‘काशी’ बन गया था। केशव बलिराम हेडगेवार के मन में भी एक ज्वार था- क्रांतिकारी बनकर भारत माता को ब्रितानी हुकूमत की बेढ़ियों से स्वतंत्र करना है। डॉक्टर साहब की जीवनी लिखने वाले सीपी भिशिकर लिखते हैं कि वंदेमातरम आंदोलन के समय से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में उनका मन रमने लगा था। मैट्रिकुलेशन की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने ठान लिया था कि कोलकाता जाकर मेडिकल की पढ़ाई करेंगे और वहीं क्रांतिकारी गतिविधियों में जुड़ जाएंगे। नागपुर के राष्ट्रभक्त महापुरुष भी यही चाहते थे कि केशव कोलकाता जाएं, क्रांतिकारियों से संपर्क जोड़ें और लौटकर पश्चिम भारत में क्रांतिकारी आंदोलन को संगठित करें। क्रांतिकारी रामलाल वाजपेयी ने भी अपने जीवन चरित्र में इस घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है कि “उनको कलकत्ता भेजने का असली मकसद क्रांतिकारी संगठन संबंधी जानकारी प्राप्त करना एवं मध्यप्रांत और बंगाल के बीच सेतु का काम करना था”। केशव हेडगेवार जब कलकत्ता पहुँचे तब क्रांतिकारियों पर अंग्रेजी दमन का दौर चल रहा था। सरकार राष्ट्रद्रोही सभा अधिनियम-1907, आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम-1908 और इंडियन प्रेस एक्ट-1910 के द्वारा क्रांतिकारी पत्रों, संगठनों एवं व्यक्तियों को दंडित करने, प्रतिबंधित करने एवं उन पर मुकदमा चलाने का कार्य कर रही थी। परंतु, यह दमनचक्र प्रखर क्रांतिकारी केशव बलिराम हेडगेवार के इरादों को कहाँ डिगा सकता था।