संघ शताब्दी वर्ष : संघ कार्य के विस्तार और शाखाओं के सुदृढ़ीकरण के शिल्पी थे बालासाहब देवरस, उनकी पहल पर ही सातों दिन शाखा लगना शुरू हुई, सुबह की शाखा भी उनकी देन है
संघ कार्य के विस्तार, शाखाओं के विकास एवं सुदृढ़ीकरण में तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस (मधुकर दत्तात्रेय देवरस) का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला रहा है। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार अकसर स्वयंसेवकों से कहते थे कि शाखा अच्छी चलेगी तो समाज के सब काम होंगे। समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में काम करने के लिए राष्ट्रीय विचार से ओत-प्रोत कार्यकर्ता शाखा से ही तैयार होंगे। इसलिए अच्छी शाखा चलना जरूरी है। एक बार युवकों के साथ बातचीत के दौरान डॉक्टर साहब ने प्रश्न किया कि “आदर्श शाखा का लक्षण क्या है?” इसके उत्तर में बालासाहब ने जो कहा, वह उनके विचारों की स्पष्टता को दर्शाता है। उन्होंने कहा- “संघ कार्य को अपना जीवित कार्य समझकर, संघ कार्य के लिए सारा समय लगाने के लिए प्रस्तुत युवक जिस शाखा से विपुल संख्या में खड़े होंगे, ऐसी शाखा को मेरी दृष्टि से ‘आदर्श शाखा’ कहना उचित होगा”। संघ कार्य को राष्ट्रव्यापी बनाना है, तो उसके लिए जरूरी है कि आदर्श शाखाएं खड़ी हों। डॉक्टर साहब की शाखाओं की संकल्पना को धरातल पर उतारने और शाखाओं का व्यापक नेटवर्क खड़ा करने में बालासाहब देवरस ने जो संगठनात्मक कौशल दिखाया, वह अनुकरणीय है। बालासाहब की संगठन कुशलता से डॉक्टर साहब भली प्रकार परिचित थे। इसलिए उन्होंने नागपुर में संघ कार्य की जिम्मेदारी बालासाहब को सौंपी थी। संघ के कार्य को नागपुर से बाहर लेकर जाने के लिए यह आवश्यक था कि नागपुर में अच्छा काम चले। नागपुर के कार्यवाह के रूप में बालासाहब ने जिस प्रकार से संघ कार्य को आधार दिया, उस आधार पर ही आगे चलकर संघ कार्य राष्ट्रव्यापी हुआ।
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प्रारंभ से डॉक्टर साहब के सान्निध्य में रहने के कारण बालासाहब को संघ कार्य की गहरी समझ थी। कहा जा सकता है कि उन्होंने डॉक्टर साहब के विचार, दर्शन, क्रियान्वयन के मार्ग और समाज निर्माण के स्वप्न को आत्मसात कर लिया था। डॉक्टर साहब ने जो सपना देखा था, उसे साकार करने के लिए शाखाओं का व्यापक नेटवर्क आवश्यक था। बालासाहब ने नागपुर कार्यवाह से लेकर सरसंघचालक के दायित्व में रहने के दौरान शाखा पर विशेष जोर दिया। नागपुर में संघ कार्य की जिम्मेदारी संभालते समय उन्होंने अधिकतम बस्तियों में शाखाएं प्रारंभ कराईं। शाखा ठीक चले इसके लिए प्रति सोमवार डॉ. हेडगेवार के निवास पर शाखा कार्यवाह और मुख्य शिक्षकों की बैठकें शुरू की गईं। एक बड़ा काम उन्होंने यह किया कि शाखा को संघ कार्य की साधना का अखंड केन्द्र बना दिया। प्रारंभिक दौर में समाज की मानसिकता प्रतिदिन एक ही स्थान पर एकत्रित होने की नहीं थी। लोग अकसर सवाल करते थे- “प्रतिदिन एक साथ आने की क्या जरूरत है? क्या किसी का अपना काम नहीं है?” लेकिन डॉक्टरजी और बालासाहब यह भली-भांति जानते थे कि शाखा कोई सामान्य एकत्रीकरण नहीं, बल्कि एक ‘सतत साधना’ है। साधना में खंड पड़ने का अर्थ है नित्य संस्कारों में बाधा आना। बालासाहब के नागपुर कार्यवाह बनने से पहले, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाएं सप्ताह में केवल छह दिन लगती थीं। रविवार को छुट्टी का दिन होता था। इतना ही नहीं, श्रावण के पवित्र महीने में रविवार के साथ सोमवार को भी छुट्टी रहती थी। बालासाहब ने महसूस किया कि इस खंडित दिनचर्या से कार्य में शिथिलता आती है। शाखा तो नित्य का कार्य है। यह तो साधना है। इसमें अवकाश कैसा? उन्होंने रविवार और श्रावण सोमवार के अवकाश बंद कर दिए। अब शाखा सप्ताह के सातों दिन वर्ग के 365 दिन बिना किसी अवकाश के लगना प्रारंभ हो गईं। आज संघ की जो 365 दिन की अविरत शाखा की परंपरा है, वह बालासाहब के ही दूरदर्शी निर्णय का परिणाम है।
‘प्रभात शाखा’ की पहल :
बालासाहब ने देखा कि कई व्यावसायिक, नौकरीपेशा लोग और प्रौढ़ आयु के व्यक्ति शाखा आना तो चाहते हैं, लेकिन शाम की शाखा में शामिल होने का उनके पास समय नहीं होता था। काम-धंधे में लगते ही कई पुराने स्वयंसेवकों का भी सायं शाखा में आना अनियमित या बंद हो जाता था। उल्लेखनीय है कि प्रारंभ में शाखा केवल शाम के समय लगती थीं। इस समस्या का समाधान बालासाहब ने ‘प्रभात शाखा’ (प्रातःकालीन शाखा) के रूप में उपलब्ध कराया। 1938 में ‘सोमवार बैठक’ में इस विषय पर गहन विचार-विमर्श हुआ। बालासाहब के कहने पर वर्ष 1938 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रथम प्रातःकालीन शाखा नागपुर में ‘मोहिते बाड़ा’ संघस्थान पर शुरू की गई। तात्याजी बाविस्कर को इस प्रभात शाखा का कार्यवाह और बाबूराव वाघ को मुख्य शिक्षक नियुक्त किया गया। चूंकि इस शाखा में अपेक्षाकृत अधिक उम्र के प्रौढ़ स्वयंसेवक आते थे, इसलिए इसकी गतिविधियां सायं शाखा की गतिविधियों से अपेक्षाकृत शारीरिक रूप से कम थकाने वाली रखी गईं। इस एक निर्णय शाखा में नवाचार की नींव रखी। बाद में चलकर सबको शाखा से जोड़ने के लिए समय से लेकर शाखा के कार्यक्रम में अनेक प्रयोग हुए। ‘प्रभात शाखा’ ने संघ कार्य को मजबूत करने और समाज के प्रत्येक वर्ग (विशेषकर नौकरीपेशा और बुद्धिजीवी वर्ग) को संघ से जोड़ने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अपनी बस्ती की शाखा में जाने का नियम :
प्रारंभ में उपशाखाएं सीमित थीं, इसलिए कई स्वयंसेवक दूर की शाखाओं में जाते थे। लेकिन जब धीरे-धीरे उपशाखाएं बढ़ने लगीं, तब भी एक प्रवृत्ति देखी गई कि स्वयंसेवक अपनी बस्ती में प्रारंभ हुई नई शाखा में न जाकर अपनी पुरानी (मुख्य) शाखा में ही जाते थे। इससे नई बस्ती की शाखा के लिए उनका योगदान शून्य हो जाता था और एक ही शाखा में स्वतंत्र काम कर सकने वाले सक्षम कार्यकर्ताओं का जमावड़ा लग जाता था। बालासाहब ने इस विसंगति को पहचाना और यह निर्णय लिया गया कि “स्वयंसेवक अपनी बस्ती में लगने वाली शाखा में ही जाएंगे”। इस नियम से कार्यकर्ताओं का विकेंद्रीकरण हुआ, नई शाखाओं को योग्य नेतृत्व मिला और संघ कार्य का हर मोहल्ले-बस्ती में तेजी से विस्तार संभव हो सका। एक साथ 15 शाखाएं प्रारंभ करने के लिए भी बालासाहब का उदाहरण दिया जाता है। उनके प्रयास से नागपुर की इतवारी शाखा के प्रशिक्षित 15 स्वयंसेवकों ने एक साथ 15 नई शाखाएं प्रारंभ कीं।
संघ शिक्षा वर्ग और दैनिक शाखाओं में संतुलन :
संघ कार्य मूलतः दैनंदिन शाखा पर आधारित है। बालासाहब सदैव यह चिंता करते थे कि किसी भी परिस्थिति में दैनिक शाखा का कार्य बाधित नहीं होना चाहिए। उन दिनों नागपुर में संघ शिक्षा वर्ग 40 दिनों तक चलता था। वर्ग की व्यवस्था में शहर के सभी प्रमुख कार्यकर्ता जुट जाते थे, जिससे वे अपनी शाखा पर ध्यान नहीं दे पाते थे। इस कमी को दूर करने के लिए बालासाहब ने एक नई व्यवस्था लागू की। उन्होंने वर्ग की कालावधि में भी दैनिक शाखा की ओर ध्यान देने के लिए अलग से विशेष कार्यकर्ता नियुक्त करने का उपक्रम कार्यान्वित किया।
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| संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 12 जुलाई, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ |

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