शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

गाय को मिले राष्ट्रीय पशु का दर्जा

भारत में प्राचीनकाल से गाय का बहुत महत्व रहा है। गाय भारतीय संस्कृति की प्रतीक होने के साथ ही अर्थव्यवस्था की धुरी भी रही है। हिन्दुओं के लिए गाय आस्था का केंद्र भी है। यही कारण रहा है कि हिन्दू विरोधी मानसिकता के लोग हिन्दुओं की भावनाओं को आहत करने और उनकी आस्था पर चोट पहुँचाने के लिए गाय की हत्या करने का घिनौना काम करते हैं। देश में एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो गोमांस खाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। इसके पीछे उसकी मंशा उदरपूर्ति नहीं बल्कि हिन्दुओं को दु:ख पहुँचाना की रहती है। रामचंद्र गुहा जैसे बुद्धिजीवी तो मांसाहारी नहीं होने के बाद भी बीफ की प्लेट सोशल मीडिया में शेयर करते हैं, सिर्फ इसलिए ताकि गाय के प्रति श्रद्धा रखने वालों को आहत किया जा सके। केरल के कांग्रेसी चौराहे पर गाय काटकर तो कम्युनिस्ट ‘बीफ फेस्ट’ का आयोजन करके हिन्दुओं की आस्था पर सीधे चोट पहुँचाते हैं। ऐसे ही अनेक बुद्धिजीवी लोग गोमांस खाने को अपना मौलिक अधिकार समझते हैं। इलाहबाद उच्च न्यायालय ने ऐसे लोगों को आईना दिखाने का काम किया है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि गोमांस खाना किसी का मौलिक अधिकार नहीं हो सकता। अपितु गो-संरक्षण को माननीय न्यायालय ने मौलिक अधिकार कहा है। 

यह महत्वूर्ण प्रश्न है, जो मांसाहारी लोगों को अपने हृदय से पूछना ही चाहिए कि स्वाद और उदरपूर्ति के लिए किसी मूक प्राणी के जीवन को समाप्त करना मौलिक अधिकार हो सकता है क्या? गाय का संरक्षण करना सब प्रकार से मनुष्य के हित में है। इसलिए भी गो-हत्या पर कठोर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। गाय के संदर्भ में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की टिप्पणी न्याय व्यवस्था में सदैव के लिए मिसाल बनने वाली है। माननीय उच्च न्यायालय ने गो हत्या के आरोपी जावेद की जमानत अर्जी को अस्वीकृत करते हुए गाय के महत्व का भली प्रकार वर्णन किया है। भारतीय शास्त्रों, पुराणों एवं धर्मग्रंथ में गाय के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए माननीय न्यायालय ने कहा कि “भारत में विभिन्न धर्मों के नेताओं और शासकों ने भी हमेशा गो संरक्षण की बात की है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 48 में भी कहा गया है कि गाय नस्ल को संरक्षित करेगा और दुधारू एवं भूखे जानवरों सहित गो हत्या पर रोक लगाएगा। भारत के 29 राज्यों में से 24 में गो हत्या पर प्रतिबंध है”। 

एक बात सबको ध्यान में रखना चाहिए कि गाय के संरक्षण का विषय सिर्फ हिन्दुओं का प्रश्न नहीं है। बल्कि सभी मत-संप्रदाय के लोगों को गो-संरक्षण के लिए आगे आना होगा। मध्यप्रदेश में रतौना आंदोलन इस बात का साक्षी है कि गो-संरक्षण के विषय पर हिन्दू-मुसलमानों ने एकसाथ होकर आंदोलन किया और अंग्रेज सरकार को तत्कालीन मध्यभारत प्रांत में घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। वर्ष 1920 के इस आंदोलन में गाय माता हिन्दू-मुस्लिम एकता का सेतु बन गई थी। मुस्लिम संप्रदाय के लोगों ने आगे आकर इस आंदोलन से प्रेरित होकर गोवध से दूरी बना ली थी। यहाँ तक कि कई कसाईखाने भी बंद कर दिए थे। उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय भी गोहत्या और गोमांस बिक्री पर रोक लगाने का महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था। हिमाचल उच्च न्यायालय ने भी केंद्र सरकार को पूरे देश में गोहत्या और गोमांस बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानून बनाने का सुझाव दिया था।

रतौना आंदोलन | ब्रिटिश सरकार को देखना पड़ा हार का मुंह | हिंदी पत्रकारिता की जीत

बुधवार, 1 सितंबर 2021

खेलों को प्रोत्साहन : “सब खेलें, सब खिलें”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के 80वें संस्करण में देश की जनता से खेलों पर बात की। देश के सर्वाधिक लोकप्रिय प्रधानमंत्री द्वारा खेलों पर बात करने से निश्चित ही देश में खेल संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा। उन परिवारों में भी खेल के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण पैदा होगा, जो अपने बच्चों को सिर्फ पढ़ाई तक सीमित करना चाहते हैं। पढ़ाई पर अत्यधिक जोर के कारण ज्यादातर परिवारों में बच्चों के खेलने पर एक तरह से अघोषित प्रतिबंध रहता है। खेलों का संबंध अच्छे करियर से तो है ही, उससे अधिक खेलों के माध्यम से संपूर्ण व्यक्तित्व विकास होता है। पढ़ाई के साथ खेलों में रुचि रखने वाले युवा शारीरिक और मानसिक स्तर पर अधिक मजबूत होते हैं। खेल हमारे भीतर निर्णय लेने, सामूहिक रूप से काम करने और नेतृत्व लेने की क्षमता का विकास करते हैं। खेल प्रत्येक परिस्थिति में धैर्य और उत्साह रखने का गुण पैदा करते हैं। खेल हमारे आत्मविश्वास को बढ़ाने के साथ ही सकारात्मक दृष्टिकोण देते हैं।

मंगलवार, 31 अगस्त 2021

पैरालिंपिक : हौसलों का स्वर्ण

टोक्यो ओलिंपिक-2020 के बाद अब टोक्यो पैरालिंपिक-2020 में भारतीय खिलाड़ी अपने चमक बिखेर रहे हैं। टोक्यो पैरालिंपिक में भारत के हिस्से में 31 अगस्त तक दो स्वर्ण पदक सहित 10 पदक आ चुके हैं। पैरालिंपिक में भारतीय दल ऐतिहासिक प्रदर्शन कर रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि टोक्यो ओलिंपिक-2020 में भारतीय दल ने अपने प्रदर्शन को जिस स्तर पर छोड़ा था, पैरालिंपिक में भाग ले रहे दल ने उसी ऊंचाई से अपनी विजय यात्रा शुरू की है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर अवनि लेखरा ने शूटिंग में और सुमित अंतिल ने जेवलिन थ्रो में भारत को स्वर्ण पदक दिलाकर इतिहास रच दिया। शूटिंग में स्वर्ण पदक जीतने के साथ ही अवनि देश की पहली महिला खिलाड़ी बन गई, जिसने ओलिंपिक या पैरालिंपिक में स्वर्ण पदक जीता हो। इसी तरह पैरालिंपिक में जेवलिन थ्रो में स्वर्ण पदक जीतने वाले सुमित पहले भारतीय खिलाड़ी हैं। टोक्यो ओलिंपिक में जेवलिन थ्रो में ही नीरज चौपड़ा ने भारत को स्वर्ण पदक दिलाया था।

सोमवार, 16 अगस्त 2021

स्वदेशी से स्वनिर्भर


स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सबका ध्यान एक ओर लाल किले की प्राचीर से दिए जाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संबोधन पर था, तो वहीं दूसरी ओर सबकी उत्सुकता यह जानना भी थी कि इस महत्वपूर्ण प्रसंग पर विश्व के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत क्या मार्गदर्शन देंगे? प्रधानमंत्री मोदी ने अपना संबोधन पिछले छह-सात वर्ष के विकास पर केंद्रित किया। शुरुआत में उन्होंने स्वतंत्रता के नायकों का स्मरण किया। आखिर में उन्होंने नये भारत के निर्माण के लिए अपने ही दिए नारे को और विस्तार दिया- "सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास और सबका प्रयास"। निश्चित ही कोई देश अपने सपनों को तब ही पूरा कर सकता है, जब वह सपना सबकी आँखों में बसे और सब उसको साकार करने के लिए मिलकर प्रयत्न करें। वहीं, सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने मुंबई के एक विद्यालय में ध्वजारोहण किया और इस अवसर पर उन्होंने जो कुछ कहा, उसे हमें गाँठ बांध लेना चाहिए। वही एक रास्ता है, जो हमें मजबूत बनाएगा और सामर्थ्यशाली भी। वह रास्ता है- स्वदेशी का।

सोमवार, 9 अगस्त 2021

ओलिंपिक में भारत के लिए ‘स्वर्ण’ की शुरुआत


टोक्यो ओलिंपिक में भारत के सुनहरे सफर का समापन स्वर्ण पदक के साथ हुआ। भारतीय सेना के जवान एवं खिलाड़ी नीरज चोपड़ा ने 121 वर्ष की लंबी प्रतीक्षा के बाद एथलेटिक्स में पहला स्वर्ण पदक दिलाया है। भाला फेंक प्रतियोगिता में उन्होंने अपने परिश्रम से भारत के भाल को स्वर्ण से अलंकृत कर दिया। टोक्यो ओलिंपिक भारत के लिए अब तक का सबसे सफल ओलिंपिक रहा है। भारत ने एक स्वर्ण और दो रजत पदक सहित कुल 7 पदक जीते हैं। इससे पहले हमने लंदन ओलिंपिक में 6 पदक जीते थे। इस बार नीरज चोपड़ा के स्वर्ण के अलावा मीराबाई चानू ने भारोत्तोलन में रजत, कुश्ती में रवि दहिया ने रजत, कुश्ती में ही बजरंग पूनिया ने कांस्य, पीवी सिंधु ने बैडमिंटन में कांस्य और लवलिना बोरगोहेन ने मुक्केबाजी में कांस्य पदक भारत के नाम किए। हालाँकि भारत से और अधिक बेहतर प्रदर्शन की अपेक्षा थी। टोक्यो ओलिंपिक भारत के लिए अब तक का सबसे सफल ओलिंपिक रहा, इसके पीछे मोदी सरकार की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।

सोमवार, 2 अगस्त 2021

मध्यप्रदेश में टीके का कुशल प्रबंधन


देश के कई राज्यों में कुप्रबंधन की वजह से कोरोनारोधी टीका बर्बाद हो रहा है, वहीं मध्यप्रदेश टीकाकरण में एक के बाद एक कीर्तिमान बना रहा है। जब समूचे देश में 21 जून से कोरोनारोधी टीकाकरण अभियान के रूप में शुरू हुआ था, तब मध्यप्रदेश में पहले दिन ही यानी 21 जून को मात्र 10 घंटे में लगभग 16 लाख 95 हजार लोगों को टीका लगाने का इतिहास रचा गया। उस दिन मध्यप्रदेश टीकाकरण में देश के अन्य सभी राज्यों से बहुत आगे खड़ा था। इतना ही नहीं, अभी तक एक दिन में इतनी संख्या में दुनिया के किसी भी शहर में टीकाकरण नहीं हुआ है। मध्यप्रदेश की इस उपलब्धि को वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज किया गया है। उसके बाद भी मध्यप्रदेश टीकाकरण में लगातार रिकॉर्ड बनाता रहा। अब एक बार फिर मध्यप्रदेश के टीकाकरण के कुशल प्रबंधन एवं संचालन की चर्चा देश में हो रही है। मध्यप्रदेश में अब तक चार करोड़ से अधिक लोगों को टीका लगाया जा चुका है। इसमें लगभग ढाई करोड़ लोग ऐसे हैं, जिन्हें पहला टीका लगाया जा चुका है और 50 लाख से अधिक लोगों को दूसरा टीका भी लगाया जा चुका है।

रविवार, 1 अगस्त 2021

भारत को भारतीय दृष्टि से देखने का प्रयास है ‘भारत-बोध’

देखें, डॉ. सौरभ मालवीय की पुस्तक 'भारत बोध' की चर्चा


भारत में लेखकों, साहित्यकारों एवं इतिहासकारों का एक ऐसा वर्ग रहा है, जिसने समाज को ‘भारत बोध’ से दूर ले जाने का प्रयास किया। उन्होंने पश्चिम की दृष्टि से भारत को देखा और अपने लेखन में वैसे ही प्रस्तुत किया। उन्होंने इस प्रकार के विमर्श खड़े किए, जिनसे उपजे भ्रम के वातावरण में भारतीय समाज अपने मूल स्वरूप को विस्मृत करने की दिशा में बढ़ गया। अपनी लेखनी एवं मेधा का उपयोग इस वर्ग ने देश को उसकी मूल संस्कृति से काटने के लिए किया। परंतु, भारत की वास्तविक पहचान को मिटा देना इतना आसान कार्य भी नहीं है। अनेक राजनीतिक एवं सांस्कृतिक आक्रमणों के बाद भी भारत अपनी पहचान के साथ उन्नत हिमालय की तरह खड़ा हुआ है। थोड़ी-बहुत जो धुंध छा गई थी, उसे हटाने का प्रयास भारतीयता से ओतप्रोत लेखक वर्ग कर ही रहा है। पत्रकारिता के प्राध्यापक एवं लेखक डॉ. सौरभ मालवीय की नयी पुस्तक ‘भारत बोध’ भारत को भारतीय दृष्टि से देखने के प्रयासों में महत्वपूर्ण प्रयास है। डॉ. मालवीय ने अपनी पुस्तक में 41 आलेखों के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक धारा के कुछ आयामों को प्रस्तुत किया है। भारत की संस्कृति, त्योहार एवं उनकी अवधारणा, रीति-रिवाजों में सामाजिक एवं राष्ट्रीय बोध, पर्यावरण एवं प्रकृति के प्रति भारतीय मानस और भारत में राष्ट्र की संकल्पना जैसे समसामयिक विमर्श के अनेक बिन्दुओं पर उनके विचारों का निर्मल प्रवाह दिखाई देता है। 

लेखक डॉ. सौरभ मालवीय ने अपनी पीएचडी ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ जैसे महत्वपूर्ण विषय पर की है। संभवत: यही कारण रहा होगा कि उनके लेखों से गुजरने पर गहन अध्ययन की अनुभूति होती है। भारतीय वांग्मय से सूत्र और प्रसंग लेकर डॉ. मालवीय ने अपनी बातों को आधार दिया है। राष्ट्र, संस्कृति, पर्यावरण और मीडिया जैसे विषयों पर भी जब उन्होंने लेखन किया है, तो उनको समझने एवं समझाने के लिए लेखक ने भारतीय वांग्मय के पृष्ठ ही पलट कर देखे हैं। संस्कृति, राष्ट्र और राष्ट्रवाद को समझने के लिए उन्होंने पाश्चात्य विद्वानों एवं पाश्चात्य दृष्टि की अपेक्षा भारतीय मनीषियों के चिंतन को श्रेष्ठ माना है। यही सही भी है। भारत के संदर्भ में जब बात आए, तब हमें अपने पुरखों को अवश्य पढऩा चाहिए कि आखिर उन्होंने भारत की व्याख्या किस तरह की है? उनका भारत बोध क्या था? ‘भारत की अवधारणा’ को समझाते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह एवं विचारक डॉ. मनमोहन वैद्य कहते हैं कि “भारत को समझने के लिए चार बिन्दुओं पर ध्यान देने की जरूरत है। सबसे पहले भारत को मानो, फिर भारत को जानो, उसके बाद भारत के बनो और सबसे आखिर में भारत को बनाओ”। लेखक डॉ. सौरभ मालवीय की पुस्तक ‘भारत बोध’ इन चार चरणों से होकर गुजरती है। इसलिए यह पुस्तक हमें भारत की वास्तविक पहचान के निकट ले जाने के प्रयास में सफल होती दिखती है। 

वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. अरुण कुमार भगत ने ठीक ही लिखा है कि “डॉ. मालवीय ने इस पुस्तक हेतु अपने जिन निबंधों का चयन किया है, वे सभी भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत की पहचान को सुनिश्चित और संस्थापित करने वाले हैं”। पुस्तक के संदर्भ में एक और बात महत्वपूर्ण है कि इसमें शामिल लेखों की भाषा सहज, सरल और सरस है। भाषा की सरलता के कारण आज की युवा पीढ़ी भी पुस्तक में शामिल विषयों की गहराई में उतर पाएगी। आलेखों में प्रस्तुत विचारों में भी एक प्रवाह है, जो पाठकों को बांधे रखने में सफल रहेगा। 

‘भारत बोध’ का प्रकाशन यश पब्लिकेशंस, दिल्ली ने किया है। पुस्तक में 176 पृष्ठ हैं और मूल्य 220 रुपये है। पुस्तक के संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बिहार क्षेत्र के प्रचारक सूबेदार जी और वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. अरुण कुमार भगत ने महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं, जिन्हें पुस्तक में शामिल किया गया है। ‘भारत बोध’ की प्रस्तावना भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने लिखी है, जिन्होंने स्वयं भी ‘भारत बोध’ के संदर्भ में विपुल लेखन किया है। बहरहाल, डॉ. सौरभ मालवीय की यह पुस्तक भारत को भारतीय दृष्टि से देखने का महत्वपूर्ण प्रयास है। उनका यह प्रयास भारत की वास्तविक संकल्पना को समाज तक पहुँचाने में सफल हो, ऐसी कामना है। इसके साथ ही यह पुस्तक इस दिशा में चल रहे विमर्श में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है। 

पुस्तक : भारत बोध

लेखक : डॉ. सौरभ मालवीय

पृष्ठ : 176

मूल्य : 220 रुपये (पेपरबैक)

प्रकाशक : यश पब्लिकेशंस,

1/10753, गली नं. 3, सुभाष पार्क, 

नवीन शाहदरा, दिल्ली-32

स्वदेश, भोपाल समूह में प्रकाशित 'भारत बोध' की समीक्षा-लोकेन्द्र सिंह

सोमवार, 26 जुलाई 2021

आज की आवश्यकता है 'भारत जोड़ो आंदोलन'

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में देश के नागरिकों से महत्वपूर्ण आह्वान किए हैं। प्रधानमंत्री की पहल पर समूचा देश स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूर्ण होने पर 'आजादी का अमृत महोत्सव' मना रहा है। देश के ऐसे बलिदानियों को याद किया जा रहा है, जिन्हें इतिहास की पुस्तकों या अन्यत्र वह स्थान नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था। इस उत्सव को और अधिक विस्तार देने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री मोदी ने अपील की है कि यह किसी राजनीतिक दल या सरकार का आयोजन नहीं है बल्कि यह सभी भारतवासियों का कार्यक्रम है। इसलिए सभी लोगों को अमृत महोत्सव से जुडऩा चाहिए और महापुरुषों का स्मरण करें। यकीनन जब हम अपने महापुरुषों को याद करेंगे, तब उनके व्यक्तित्व के साथ उनका कृतित्व का स्मरण भी करेंगे, जो हमें गौरव की अनुभूति से भरेगा। साथ ही यह भी ध्यान आएगा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए हमने कितना संघर्ष किया है। स्वतंत्रता का मूल्य क्या है? अपने महापुरुषों का स्मरण करेंगे तब हम भारत, भारतीयता और भारतीय मूल्यों के अधिक नजदीक भी जाएंगे। 

'मन की बात' के 79वें संस्करण में प्रधानमंत्री मोदी ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण और सामयिक आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि "बात जब आजादी के आंदोलन और खादी की हो तो पूज्य बापू का स्मरण होना स्वाभाविक है। जैसे बापू के नेतृत्व में 'भारत छोड़ो आंदोलन' चला था, वैसे ही आज हर देशवासी को 'भारत जोड़ो आंदोलन' का नेतृत्व करना है"। 'भारत जोड़ो आंदोलन' यदि जनांदोलन बन जाता है तब उसके अनेक सुखद परिणाम आएंगे। पहला, अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत जिस तेजी और मजबूती से आगे बढ़ रहा है, उसमें भारत की स्थिति और सशक्त होगी। दूसरा, भारत में सक्रिय 'ब्रेकिंग इंडिया ब्रिगेड' के मनसूबे ध्वस्त होंगे और भारत आंतरिक तौर पर और अधिक शक्तिशाली हो जाएगा। यह आंतरिक शक्ति भारत को प्रत्येक क्षेत्र में मजबूत करेगी। 

पिछले कुछ समय को गौर से देखें तो ऐसी अनेक भारत विरोधी ताकतें सक्रिय हैं, जो वर्ग, जाति, संप्रदाय एवं अन्य प्रकार के संघर्ष उत्पन्न करने की साजिशें रच रही हैं। उन उसको मुंहतोड़ जवाब देने के लिए 'भारत जोड़ो आंदोलन' की अनिवार्यता नजर आ रही है। भारत को स्वतंत्र कराने के लिए महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के विरुद्ध 'भारत छोड़ो आंदोलन' खड़ा किया। आज उसी स्वतंत्रता को मजबूत करने के लिए भी 'भारत जोड़ो आंदोलन' की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री मोदी के इस आह्वान के साथ सभी देशवासियों को जुडऩा चाहिए और इस आंदोलन को ऐतिहासिक रूप देकर भारत को मजबूत बनाने में अपनी भूमिका का निर्वाहन करना चाहिए। 

बुधवार, 21 जुलाई 2021

भारत की संस्कृति के साक्षी

भारत की मूल संस्कृति क्या है? इसको लेकर दिग्भ्रिमित करने वाले अनेक विमर्श चलते रहते हैं। एक शायर ने तो यहाँ तक कह दिया कि यहाँ सब किराएदार हैं, कोई मकान मालिक नहीं। उनके कहने का आशय यही था कि भारत में अलग-अलग समय में लोग आते गए और बस गए। भारतीय मूल का कोई नहीं है। दरअसल, वे आर्य-द्रविणवाली कपोल कल्पना के लिए गढ़े गए झूठ के या तो वाहक थे या फिर उसके फेर में फंस गए होंगे। भारत के मूल लोग कौन थे, उनकी संस्कृति क्या थी, जीवन पद्धति क्या थी, धर्म क्या था, यह सब कोई शायर नहीं बता सकता, बल्कि भारत की मिट्टी इसका स्वयं जवाब देती है कि उसमें किसका रक्त शामिल है। अयोध्या से लेकर मथुरा, राखीगढ़ी से लेकर उज्जैन तक खुदाई में भारतीय संस्कृति के प्रमाण मिलते हैं।

शनिवार, 17 जुलाई 2021

बेहतर जीवन के लिए आवश्यक है जनसंख्या नियंत्रण

उत्तरप्रदेश की योगी सरकार देश में सर्वाधिक जनसंख्या वाले प्रदेश के लिए जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने जा रही है। 11 जुलाई को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तरप्रदेश जनसंख्या विधेयक-2021 के मसौदे के बारे में स्वयं लोगों को जानकारी दी। दरअसल, विपक्षी राजनीतिक एवं उनके सहयोगी बुद्धिजीवी अत्यंत आवश्यक कानून को भी सांप्रदायिक रंग देने का प्रयास करने लगे थे। तथाकथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी वर्ग का दोगलापन एवं पाखंड अब खुलकर सामने आ गया है। उत्तरप्रदेश जनसंख्या विधेयक किसी एक संप्रदाय की जनसंख्या को रोकने का एजेंडा नहीं है। यह कानून सब पर एक समान रूप से लागू होगा। यह कानून किसी विशेष संप्रदाय को लक्षित करके तैयार नहीं किया गया है। इसके बावजूद विपक्षी नेता एवं अन्य लोग जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास को मुुस्लिम विरोधी बता रहे हैं। जबकि यही लोग यह दावा भी करते हैं कि मुस्लिमों की जनसंख्या दर में हिन्दुओं की अपेक्षा कमी आई है। यानी अब मुस्लिम भी सात-आठ बच्चे पैदा नहीं कर रहे बल्कि वे भी हम दो-हमारे दो की अवधारणा पर चल रहे हैं। जब यह सच है कि मुसलमानों ने आधुनिक सोच के साथ कदमताल करना शुरू कर दिया है, तब यह कानून उनके विरुद्ध कैसे हो सकता है?