शनिवार, 18 अगस्त 2018

अटल कभी मरते नहीं

- लोकेन्द्र सिंह 

'हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय'
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ राजनीति के एक युग का अवसान हो गया है। यह युग भारतीय राजनीति के इतिहास के पन्नों पर अमिट स्याही से दर्ज हो गया है। भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों, आदर्शों और सिद्धांतों को जानने के लिए अटल अध्याय से होकर गुजरना ही होगा। अटल युग की चर्चा और अध्ययन के बिना भारतीय राजनीति को पूरी तरह समझना किसी के लिए भी मुश्किल होगा। उन्होंने भारतीय राजनीति को एक दिशा दी। उन्होंने वह कर दिखाया, जिसकी कल्पना भी कठिन थी। उस भारतीय जनता पार्टी को पहले मुख्य विपक्षी दल बनाया और बाद में सत्ता के शिखर पर पहुँचाया, जिसके साथ लंबे समय तक 'अछूत' की तरह व्यवहार किया गया। उन्होंने भाजपा के साथ अनेक राजनीतिक दलों को एकसाथ एक मंच पर लाकर सही अर्थों में 'गठबंधन' के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। अपने सिद्धांतों पर अटल रहकर भी कैसे सबको साथ लेकर चला जाता है, यह दिवंगत वाजपेयी जी के राजनीतिक जीवन से सीखना होगा। 

प्रखर और ओजस्वी वक्ता :
एक सांसद के रूप में अपने पहले कार्यकाल में ही अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में जो भाषण दिया था, उसे सुनकर तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी अत्यधिक प्रभावित हुए थे, उन्होंने कह दिया था कि वह एक दिन देश के प्रधानमंत्री बनेंगे। नियती ने उसी युवा अटल को पहले 13 दिन, फिर 13 माह और उसके बाद एक पूर्ण कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री के पद पर आसीन कर दिया। हम सब जानते हैं कि वह प्रखर और ओजस्वी वक्ता थे। अपनी वक्तत्व कला से वह सबको स्तब्ध और सम्मोहित कर देते थे। उनकी आवाज में ऐसा जादू था कि उनको सुनने के लिए दूर-दूर से लोग एकत्र आते थे। उनके देहांत के बाद जब उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा गया तब भी देश के कोने-कोने से ही नहीं अपितु विदेश से भी अनेक लोग आए। मानो, वे सब अंतिम बार अटल आवाज को सुनना चाहते हों। 

देश का नेता कैसा हो, अटल बिहारी जैसा हो :
जननायक की अंतिम यात्रा में शामिल जनसमूह ने संदेश दिया है कि अटल जी सक्रिय राजनीति में थे तब और अब जब वह रहे नहीं तब भी देश की जनता उन्हें अपार प्रेम करती है। उनके जाने के बाद से देश में शोक की लहर है। लंबे समय बाद किसी नेता के जाने पर देश इस प्रकार शोक संतप्त है। सब अपने-अपने ढंग से अपने प्रिय नेता को याद कर रहे हैं। उन सबके पुण्य स्मरण का मिला-जुला संदेश यही है कि 'देश का नेता कैसा हो, अटल बिहारी जैसा हो।' जन-गण-मन से उठ रही यह गूँज आज के सभी राजनीतिक दलों और राजनेताओं को सुननी चाहिए। भले ही अटल सदैव के लिए गो-लोक धाम चले गए हों, किंतु जनता चाहती है कि उनका आचरण-चरित्र भारतीय राजनीति में उपस्थित रहे। 


भारतीयता के 'अटल' प्रतिनिधि :
निश्चित ही अटलजी अजातशत्रु थे, जैसा कि उनके संबंध में कहा भी जा रहा है। उन्होंने कभी किसी से बैर नहीं ठाना। किसी के प्रति उनके मन में द्वेष और घृणा नहीं थी। वह व्यक्ति के विरोधी नहीं थे। बुराई के विरोधी थे। यद्यपि यह और बात है कि उनके वैचारिक विरोधी विशेषकर कम्युनिस्ट सदैव ही उनके प्रति ईर्ष्या का भाव रखते थे। अटल जी का प्रभाव और सामर्थ्य सदैव उनके वैचारिक विरोधियों की आँखों में किरकिरी बना रहा। यह लोग बहस के निचले स्तर पर जाकर अटल जी के प्रति अनर्गल टिप्पणियां करते रहे हैं। बहरहाल, जिसकी जैसी प्रवृत्ति, विचार और चिंतन होगा, उसका व्यवहार में उसी का प्रकटीकरण होगा। भारतीयता के 'अटल' प्रतिनिधि स्व. वाजपेयी जी ने सदैव अपने आचरण से राष्ट्रवादी विचार को प्रतिपादित किया। अपने विचार का विस्तार किया। उन्होंने अपनी वाणी और कर्म से भारत की चिति 'हिन्दुत्व' को देश-दुनिया के सामने रखा। उन्होंने अपने चरित्र से सबको हिन्दुत्व से परिचत कराया- 'हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय।' 


विचार के रूप में सदैव उपस्थित रहेंगे अटलजी :
एक पत्रकार से राजपुरुष तक की उनकी यात्रा कई मायनों में अद्भुत और अकल्पनीय रही है। उनके द्वारा खींची लकीर सदैव भारतीय राजनीति का मार्गदर्शन करेगी, यह विश्वास किया जा सकता है। अटलजी ने एक सपना देखा था कि उनकी पार्टी और विचार की गूँज देश के हर कोने से आए, आज जब उनका यह सपना साकार हो गया है, तब इस भरोसे के साथ उन्हें अंतिम विदाई कि वह भारतीय राजनीति में अपने विचार के रूप में सदैव उपस्थित रहेंगे।


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सोमवार, 13 अगस्त 2018

देहरी छूटी, घर छूटा


कविता का भरपूर आनंद लेने के लिए यूट्यूब चैनल "apna video park" पर अवश्य जाएँ...  आग्रह है कि चैनल को सब्सक्राइब भी करें, नि:शुल्क है)
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काम-धंधे की तलाश में
देहरी छूटी, घर छूटा
गलियां छूटी, चौपाल छूटा
छूट गया अपना प्यारा गांव
मिली नौकरी इक बनिया की
सुबह से लेकर शाम तक
रगड़म-पट्टी, रगड़म-पट्टी
बन गया गधा धोबी राम का।

आ गया शहर की चिल्ल-पों में
शांति छूटी, सुकून छूटा
सांझ छूटी, सकाल छूटा
छूट गया मुर्गे की बांग पर उठना
मिली चख-चख चिल्ला-चौंट
ऑफिस से लेकर घर के द्वार तक
बॉस की चें-चें, वाहनों की पों-पों
कान पक गया अपने राम का।

सीमेन्ट-कांक्रीट से खड़े होते शहर में
माटी छूटी, खेत छूटा
नदी छूटी, ताल छूटा
छूट गया नीम की छांव का अहसास
मिला फ्लैट ऊंची इमारत में
आंगन अपना न छत अपनी
पैकबंद, चकमुंद दिनभर
बन गया कैदी बाजार की चाल का।

रविवार, 5 अगस्त 2018

दोस्ती क्या है?


दोस्ती क्या है? 
उसे कुछ यूं समझें...
वह पहला रिश्ता है 
रक्त संबंधों से इतर
लेकिन, उतना ही या 
शायद उनसे अधिक गहरा।

दोस्ती क्या है? 
उसे कुछ यूं समझें...
पहली बारिश के बाद
भुरभुरी मिट्टी से उठी
सौंधी सुगंध-सा या
शायद उससे भी ऊंचा अहसास।

दोस्ती क्या है? 
उसे कुछ यूं समझें...
सूरज के डूबने के बाद
धरा पर अंधेरे से लड़ती
दीपक की ज्योति-सा या
शायद उससे भी तेज प्रकाश।

दोस्ती क्या है?
उसे कुछ यूं समझें...
वह एकमात्र तिजोरी है
उसके दिल में राज हमारा
सुरक्षा की पूरी गारंटी या
शायद उससे भी पक्का विश्वास।
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इस कविता का आनंद मराठी में भी ले सकते हैं... मराठी में अनुवाद किया है, आपला यश की संपादक अपर्णा पाटिल जी ने और उसे बोल दिए हैं अनिल वल्संगकर जी ने 

सोमवार, 30 जुलाई 2018

सेकुलर-लिबरल साहित्यकारों की असहिष्णुता को उजागर करती एक पुस्तक ‘हम असहिष्णु लोग’


- विनय कुशवाहा 
“आप तो मां सरस्वती के पुत्र हो, तर्क के आधार पर सरकार को कठघरे में खड़े कीजिए। वरना समाज तो यही कहेगा कि आप साहित्य को राजनीति में घसीट रहे हैं।“ इन्हीं तथ्यपरक बातों के साथ देश में फैली अराजकता पर कटाक्ष करती एक पुस्तक 'हम असहिष्णु लोग'। अर्चना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक लोकेन्द्र सिंह ने लिखी है। यह पुस्तक असहिष्णुता के नाम पर देश में हो रहे कथित आंदोलनों और मुहिमों की ईमानदारी से पड़ताल करती है और उनके दूसरे पक्ष को उजागर करती है। लेखक ने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित अपने लेखों के संग्रह को एक पुस्तक की शक्ल दी है।

रविवार, 29 जुलाई 2018

चिंतनशील युवाओं को जोड़ने का प्रयास है "यंग थिंकर्स कॉन्क्लेव"


- लोकेन्द्र सिंह
भारत आज दुनिया का सबसे युवा देश है। भारत के पास युवा ऊर्जा का भंडार है। लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि हम अपनी इस ऊर्जा को किस तरह देखते हैं। दुनिया तो मान रही है कि भारत आने वाली सदी का राजा है। उसका भविष्य स्वर्णिम है। उसका ऐसा मानने के पीछे हमारे देश की युवा जनसंख्या है, जो लगभग 60 प्रतिशत है। हमारी युवा पीढ़ी को यह विचार करना चाहिए कि क्या वास्तव में वह देश के लिए ताकत है? इसका मूल्यांकन स्वयं भारत के युवाओं को करना चाहिए। यदि युवा का समर्पण उसके देश के प्रति नहीं होगा, उसके विचार में, उसके चिंतन में, उसके कर्म में, राष्ट्र पहले नहीं होगा; तब क्या ऐसा युवा भारत की ताकत बन सकता है? आज देश जो सपना देख रहा है, उसे पूरा करने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी युवाओं के कंधे पर है।

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

हामिद अंसारी का शरीयत और जिन्ना प्रेम

- लोकेन्द्र सिंह 
पूर्व उपराष्ट्रपति और कांग्रेस के मुस्लिम नेता हामिद अंसारी एक बार फिर अपनी संकीर्ण सोच के कारण विवादों में हैं। कबीलाई समय के शरीयत कानून और भारत विभाजन के गुनहगार मोहम्मद अली जिन्ना के संदर्भ में उनके विचार आश्चर्यजनक हैं। यह भरोसा करना मुश्किल हो जाता है कि हामिद अंसारी कभी दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के उपराष्ट्रपति रहे हैं। किंतु, यह सच है। समय-समय पर उनके विचार जान कर यह सच ही प्रतीत होता है कि पूर्व उपराष्ट्रपति को भारत के संविधान और कानून व्यवस्था में भरोसा नहीं है। वह मुस्लिम समाज को मुख्यधारा में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने की जगह उनके लिए आधुनिक समय में आदम युग का कानून चाहते हैं। वह देश के प्रत्येक जिले में ऐसी शरिया अदालतों की स्थापना के पक्षधर हैं, जिनमें महिलाओं के लिए न्याय की कोई व्यवस्था नहीं है। शरिया अदालतों पर हामिद अंसारी के वक्तव्य से यह क्यों नहीं समझा जाए कि उन्हें भारत के आम मुसलमानों के मन में भारत की न्याय व्यवस्था के प्रति संदेह उत्पन्न करना चाहते हैं। शरिया कानून के साथ ही मोहम्मद अली जिन्ना के प्रति प्रेम भी संविधान के प्रति हामिद अंसारी की निष्ठा को संदिग्ध बनाता है।

रविवार, 15 जुलाई 2018

कांग्रेस से छूट नहीं पा रही हिंदू विरोध और मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति


- लोकेन्द्र सिंह 
कोई भी व्यक्ति या संगठन बनावटी व्यवहार अधिक दिन तक नहीं कर सकता है। क्योंकि, उसका डीएनए इसकी अनुमति नहीं देता है। यदि स्वभाव के विपरीत चलने का प्रयास किया जाए तो अंतर्मन में बनावटी एवं वास्तविक आचरण में एक प्रकार का संघर्ष प्रारंभ हो जाता है। कांग्रेस के साथ भी यही हो रहा है। अपने कथित सेकुलर (मुस्लिम तुष्टीकरण और हिंदुओं की उपेक्षा) के कारण ही कांग्रेस कथित 'सॉफ्ट हिंदुत्व' (सुविधाजनक हिंदू समर्थन) की राह पर चलने में असहज है। कांग्रेस के शीर्ष नेता अकसर ऐसे बयान दे देते हैं, जिससे सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर साध-साध कर रखे जा रहे उसके कदम डगमगा जाते हैं। या यह कहना उचित होगा कि कांग्रेस के नेता सुनियोजित ढंग से समय-समय पर अपने परंपरागत मुस्लिम वोटबैंक को यह भरोसा दिलाते रहते हैं कि उसका 'सॉफ्ट हिंदुत्व' सिर्फ भ्रम है, वास्तविकता में कांग्रेस मुस्लिम तुष्टीकरण पर ही दृढ़ता से टिकी हुई है। मुस्लिम समुदाय कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की मंदिर यात्राओं से खिन्न न हो जाए, इसलिए उसे भरोसे में बनाए रखने के लिए कांग्रेस ने पी. चिदंबरम, दिग्विजय सिंह, मणिशंकर अय्यर, सैफुद्दीन सोज, सुशील कुमार शिंदे, सलमान खुर्शीद और पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी को यह जिम्मेदारी दे रखी है। अब इस सूची में शशि थरूर का नया नाम और जुड़ गया है।

कठघरे में चर्च से संचालित संस्थाएं


- लोकेन्द्र सिंह 
भारत में ईसाई मिशनरीज संस्थाएं सेवा की आड़ में किस खेल में लगी हैं, अब यह स्पष्ट रूप से सामने आ गया है। वेटिकन सिटी से संत की उपाधि प्राप्त 'मदर टेरेसा' द्वारा कोलकाता में स्थापित 'मिशनरीज ऑफ चैरिटी' की संलिप्तता मानव तस्करी में पाई गई है। बच्चे चोरी करना और उन्हें बाहर बेचने जैसे अपराध में ये संस्थाएं घिनौने स्तर तक गिर चुकी हैं। दुष्कर्म पीडि़त युवतियों की कोख को भी ईसाई कार्यकर्ताओं/ननों ने बेचा है। यह अमानवीयता है। ईसाई मिशनरीज के अपराधों का पहली बार खुलासा नहीं हुआ है। सेवा की आड़ में सुदूर वनवासी क्षेत्रों से लेकर शहरों में सक्रिय ईसाई संस्थाओं पर धर्मांतरण और चर्च में महिलाओं के उत्पीडऩ के आरोप पहले भी सिद्ध होते रहे हैं। अभी हाल ही में केरल और अन्य राज्यों से समाचार आये हैं कि वहां के चर्च में पादरियों ने महिला कार्यकर्ताओं का शारीरिक शोषण किया है। झारखंड के खूंटी जिले में समाज जागरण के लिए नुक्कड़ नाटक करने वाले समूह की पांच युवतियों के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना में भी चर्च की भूमिका सामने आई है। खूंटी सामूहिक बलात्कार प्रकरण नक्सली-माओवादी और चर्च के खतरनाक गठजोड़ को भी उजागर करता है।

रविवार, 8 जुलाई 2018

पहली बारिश की सौंधी सुगंध-सी हैं 'रिश्तों की बूंदें'


- लोकेन्द्र सिंह 
कवि के कोमल अंतस् से निकलती हैं कविताएं। इसलिए कविताओं में यह शक्ति होती है कि वह पढऩे-सुनने वाले से हृदय में बिना अवरोध उतर जाती हैं। कवि के हृदय से पाठक-श्रोता के हृदय तक की यात्रा पूर्ण करना ही मेरी दृष्टि में श्रेष्ठ काव्य की पहचान है। युवा कवि सुदर्शन व्यास के प्रथम काव्य संग्रह 'रिश्तों की बूंदें' में ऐसी ही निर्मल एवं सरल कविताएं हैं। उनकी कविताओं में युवा हृदय की धड़कन है, रक्त में ज्वार है, भावनाओं में संवेदनाएं हैं। सुदर्शन की कविताओं में अपने समाज के प्रति चेतना है, सरोकार है और सकारात्मक दृष्टिकोण है। उनकी कविताओं में दायित्वबोध भी स्पष्ट दिखता है। उनकी तमाम कविताओं में रिश्तों की सौंधी सुगंध उसी तरह व्याप्त है, जैसे कि पहली बारिश की बूंदें धरती को छूती हैं, तब उठती है- सौंधी सुगंध। उनके इस काव्य संग्रह की प्रतिनिधि कविता 'रिश्तों की बूंदें' के साथ ही 'अनमोल रिश्ते' और 'मुंह बोले रिश्ते' सहित अन्य कविताओं में भी रिश्तों गर्माहट को महसूस किया जा सकता है। कुल जमा एक सौ साठ पन्नों में समृद्ध सुदर्शन का काव्य संग्रह चार हिस्सों में विभक्त है। पहले हिस्से में श्रृंगार से ओत-प्रोत कविताएं हैं, दूसरे हिस्से में सामाजिक संदेश देती कविताएं शामिल हैं। वहीं, तीसरे और चौथे हिस्से में गीत और गज़ल को शामिल किया गया है। काव्य के व्याकरण की कसौटी पर यह कविताएं कितनी खरी उतरती हैं, वह आलोचक तय करेंगे, लेकिन भाव की कसौटी पर कविताएं चौबीस कैरेट खरी हैं। कविताओं में भाव का प्रवाह ऐसा है कि पढऩे-सुनने वाला स्वत: ही उनके साथ बहता है। सुदर्शन की कविताओं पर किसी प्रकार की 'बन्दिशें' नहीं हैं। उन्होंने लिखा भी है- 'बन्दिशें भाषा की होती हैं/ एहसासों की नहीं। बन्दिशें होती हैं शब्दों में/ भावनाओं में नहीं।' उनकी पहली कृति में एहसास/भाव बिना किसी बन्दिश के अविरल बहे हैं, सदानीरा की तरह।

बुधवार, 27 जून 2018

खूंटी सामूहिक बलात्कार के पीछे चर्च और नक्सलियों का खतरनाक गठजोड़

- लोकेन्द्र सिंह
झारखंड के खूंटी जिले में पाँच महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं से सामूहिक बलात्कार और पुरुष कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट एवं उन्हें पेशाब पिलाने का अत्यंत घृणित कृत्य सामने आया है। यह बहुत दु:खद और डरावनी घटना है। पीडि़त महिलाएं एवं पुरुष अनुसूचित जाति-जनजाति समाज से हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के लोगों के साथ होने वाली मारपीट की घटनाओं एवं उनके शोषण पर जिस प्रकार आवाजें बुलंद होती हैं, उनसे एक उम्मीद जागती है कि वर्षों से शोषित इस समाज हो ताकत देने के लिए देशभर में एक वातावरण बन रहा है। सभी वर्गों के लोग पीडि़तों के साथ खड़े हैं। ऐसी स्थिति में खूंटी गैंगरेप और शोषण के मामले पर पसरा सन्नाटा खतरनाक लगता है। यह डराता है। देश का तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग और टीआरपी के लिए भूखे बैठे समाचार चैनल्स भी एक अजब-सी चुप्पी साधे हुए हैं। मानो हमारी संवेदनाओं पर भी अब राजनीति हावी हो गई है। अपराधी का धर्म देखकर अब विरोध के सुर का स्तर तय होता है। चूँकि इसमें शोषणकर्ता/आरोपी के वस्त्रों का रंग गेरुआ नहीं है, इसलिए रंगकर्मी भी 'शर्मिंदगी का बोर्ड' थाम कर फोटोसेशन नहीं करा रहे हैं। जबकि पाँचों लड़कियां और उनके साथी लड़के उनके कर्मक्षेत्र से ही आते हैं। पीडि़त रंगकर्मी हैं और वनवासी समाज को जागरूक करने के लिए नुक्कड़ नाटक करते हैं। कथित प्रबुद्ध वर्ग की यह प्रवृत्ति सभ्य समाज के लिए दु:खद ही नहीं, अपितु खतरनाक ही है। चूँकि इस अपराध में प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के प्रिय कम्युनिस्ट-नक्सली और चर्च शामिल है, इसलिए वह अपना मुंह नहीं खोल पा रहे हैं। त्रिशूल को कॉन्डम पहनाने जैसी सृजनशीलता भी नहीं दिखा पा रहे हैं। यह घटना खतरनाक इसलिए भी है, क्योंकि इसके पीछे जो विचार है, वह बहुत ही वहशी है। अपने विरोधी को डराने और उसे चुप कराने के लिए लोग मारपीट करते हैं, धमकाते हैं, अधिकतम उसकी हत्या कर देते हैं। किंतु, यहाँ अपने विरोधियों को डराने/चुप कराने के लिए उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया है। यानी लड़कियों के शरीर की नहीं, बल्कि उनकी आत्मा की हत्या करने का दुस्साहस किया गया है। विचार प्रक्रिया के सबसे निचले स्तर पर जाकर ही अपने विरोधी के प्रति ऐसा बर्ताब करने का ख्याल आता है। इस अपराध का मुख्य आरोपी उग्रवादी संगठन पीएलएफआई का नेता एवं पत्थलगड़ी का समर्थक जॉर्ज जोनास किडो है और मुख्य सहयोगी आरसी मिशन चर्च द्वारा कोचांग में संचालित स्टॉपमन मेमोरियल मिडिल स्कूल के प्रभारी सह सचिव फादर अल्फोंस आइंद को बताया जा रहा है। पीडि़तों की शिकायत पर इनके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की गई है। 

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