शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

भारत के हो, तो गाओ गर्व से ‘वंदेमातरम्’

राष्ट्रगीत को मिला उसका सम्मान, गृह मंत्रालय ने ‘वंदेमातरम्’ के सम्मान के संबंध में जारी किए दिशा-निर्देश


मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते कभी कांग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन के मंत्र और राष्ट्रीय गीत ‘वंदेमातरम’ के सम्मान के साथ समझौता कर लिया था। राष्ट्रगान को जो सम्मान दिया गया, राष्ट्रगीत को उससे वंचित कर दिया गया। संविधान के अनुच्छेद 51ए में राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करने को मौलिक कर्तव्य के रूप में रेखांकित किया गया है लेकिन इसमें राष्ट्रगीत के संबंध में कोई निर्देश नहीं मिलता है। राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 3 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रगान के गायन को रोकता है या गा रहे लोगों के बीच अशांति पैदा करता है, तो उसे 3 साल तक की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। इस अधिनियम में भी राष्ट्रगीत का अपमान करने पर सजा का कोई प्रावधान नहीं किया गया है। राष्ट्रगीत के सम्मान के प्रति यह उदासीनता क्यों रखी गई? इसका उत्तर सब जानते हैं। इसलिए सभी राष्ट्रभक्त देशवासियों के मन में कसक थी कि आखिर वह दिन कब आएगा जब हम अपने राष्ट्रगीत को वह सम्मान देंगे, जिसका वह प्रारंभ से अधिकारी है। याद रखें कि जिनके मन में भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान नहीं था, वे लोग तो पाकिस्तान चले गए थे। आज जिन्हें भारत में रहकर वंदेमातरम गाने और उसके सम्मान में खड़े होने में दिक्कत है, उन्हें अपने बारे में विचार करना चाहिए। भारत में रहना है तो फिर वंदेमातरम तो गाना पड़ेगा। मोदी सरकार को साधुवाद कि उसने राष्ट्रीय गीत को उसका खोया हुआ स्वाभिमान एवं प्रतिष्ठा लौटाई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘वंदेमातरम’ के गायन को लेकर आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करके अच्छा कदम उठाया है। इस आदेश के तहत अब जब भी राष्ट्रगीत एवं राष्ट्रगान, दोनों एक साथ बजाए जाएंगे, तो पहले ‘वंदे मातरम्’ (राष्ट्रगीत) के सभी छह छंद गाए जाएंगे और उसके बाद ‘जन-गण-मन’ (राष्ट्रगान) होगा। यह बदलाव केवल प्रक्रियात्मक नहीं है, बल्कि इसके ऐतिहासिक और संवैधानिक निहितार्थ भी हैं। हमें सदैव याद रखना चाहिए कि वंदेमातरम का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अद्वितीय स्थान रहा है। बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित इस गीत ने क्रांतिकारियों में जो ऊर्जा भरी, वह इतिहास में दर्ज है। 

देखें : आरएसएस के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव हेडगेवार ने चलाया वंदेमातरम आंदोलन

भारत के इतिहास में वह एक दुर्भाग्यपूर्ण दिन था जब कांग्रेस के अधिवेशन में मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए वंदेमातरम के गायन को सीमित किया गया। कांग्रेस की यह सोच स्वतंत्रता के बाद भी जारी रही। इसलिए संविधान सभा में इसके केवल पहले दो छंदों को ही आधिकारिक मान्यता दी गई थी। मुस्लिम तुष्टीकरण का प्रभाव ही रहा होगा कि राष्ट्रगान की भाँति राष्ट्रगीत के सम्मान के संबंध में किसी प्रकार के दिशा-निर्देश जारी नहीं किए गए थे। इसका दुरुपयोग सांप्रदायिक ताकतों ने खूब किया। स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं होने के कारण भारत विरोधी समूहों ने राष्ट्रगीत ‘वंदेमातरम’ की अनेक अवसरों पर अवमानना की। भारत की स्वतंत्रता के क्रांतिगीत ‘वंदेमातरम’ की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने के सुअवसर पर मोदी सरकार ने अपने राजधर्म का पालन करते हुए राष्ट्रगीत की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने का सराहनीय कार्य किया है।  

गृह मंत्रालय का नया आदेश अब आधिकारिक कार्यक्रमों में सभी छह छंदों (कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकंड) के गायन की व्यवस्था देता है। साथ ही, इसके सम्मान में ‘सावधान’ की मुद्रा में खड़े होने का निर्देश भी दिया गया है। अकसर मुसलमान अपनी धार्मिक आस्थाओं का हवाला देकर राष्ट्रगीत की अवमानना करते थे। याद रखें कि यह सोच केवल वंदेमातरम तक नहीं रुकती है अपितु अनेक अवसरों पर राष्ट्रगान का विरोध भी इसी कुतर्क के साथ मुस्लिम समाज के कट्टरपंथी तत्वों की ओर से किया गया है। क्योंकि भारत की वंदना तो राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ में भी है। उसमें भी भारत को भाग्यविधाता माना गया है और उसकी जय-जयकार की गई है। इसलिए जब कोई वंदेमातरम का विरोध करता है, तब उसके पीछे तर्क कम अपितु सांप्रदायिक एवं विभाजनकारी मानसिकता का प्रभाव अधिक दिखायी देता है। 

वंदेमातरम के गायन एवं उसके प्रति सम्मान प्रकट करने से जो भी इनकार करता है, भारत के प्रति उसकी निष्ठा पर संदेह होना स्वाभाविक है। इसी देश में ऐसे भी मुसलमान हुए हैं, जिन्होंने रामकथा का गायन भी किया है और वंदेमातरम का जयघोष भी लेकिन इसके बाद भी उनकी अपनी धार्मिक निष्ठा में कोई कमी नहीं आई। हम सबको याद रखना चाहिए कि अपना विचार एवं संप्रदाय, भारत के स्वाभिमान से बढ़कर नहीं हो सकता है। भारत सरकार ने वंदेमातरम के सम्मान को सुनिश्चित करने के लिए दिशा-निर्देश जारी करते समय संतुलित दृष्टिकोण दिखाया है। गृह मंत्रालय ने अपने आदेश में वंदेमातरम के सम्मान से जुड़े दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान नहीं रखा है। इसका संदेश यही है कि लोग मनपूर्वक राष्ट्रगीत का सम्मान करें। राष्ट्रगीत को पूरा सम्मान देने और उसके गायन को व्यवस्थित करने की सरकार की इस पहल का उद्देश्य राष्ट्रीय गौरव को बढ़ाना है। ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन-गण-मन’ दोनों ही हमारी साझा विरासत हैं, और इनका सम्मान किसी नियम से अधिक हमारी अंतरात्मा की आवाज होनी चाहिए। यही सरकार और देशभक्त नागरिकों की आकांक्षा है।

राष्ट्रगीत को लेकर सरकार के दिशा-निर्देश :

• यदि किसी कार्यक्रम में राष्ट्रगान (जन-गण-मन) और राष्ट्रगीत (वंदे मातरम्) दोनों का गायन होना है, तो प्रोटोकॉल के अनुसार ‘वंदे मातरम्’ को पहले गाया/बजाया जाएगा और उसके बाद राष्ट्रगान होगा।

• सरकारी समारोहों में ‘वंदे मातरम्’ का पूरा संस्करण (सभी 6 अंतरे) गाया या बजाया जाएगा। इससे पहले अक्सर केवल पहले दो अंतरों का ही गायन होता था, लेकिन अब आधिकारिक आयोजनों के लिए पूर्ण संस्करण को अनिवार्य कर दिया गया है।

• राष्ट्रगीत के सभी 6 छंदों की कुल अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड निर्धारित है।

• जब भी राष्ट्रगीत का आधिकारिक संस्करण गाया या बजाया जा रहा हो, तो उपस्थित सभी लोगों को सावधान की मुद्रा में खड़ा होना अनिवार्य है।

• अपवाद: यदि यह किसी फिल्म, न्यूज़रील या डॉक्यूमेंट्री के हिस्से के रूप में बज रहा हो, तो दर्शकों का खड़ा होना अपेक्षित नहीं है, ताकि प्रदर्शन में बाधा न आए।

• यदि राष्ट्रगीत को पुलिस या मिलिट्री बैंड द्वारा बजाया जा रहा है, तो इसकी शुरुआत से पहले ड्रम रोल होना चाहिए।

सरकारी आयोजनों में अनिवार्य होगा ‘वंदे मातरम्’ :

• पद्म पुरस्कार जैसे नागरिक सम्मान समारोहों में।

• राष्ट्रपति के किसी भी कार्यक्रम में, उनके आगमन और प्रस्थान के समय।

• राष्ट्रपति या राज्यपालों के आगमन, प्रस्थान तथा उनके भाषण से पहले और बाद में।

• तिरंगा फहराने के अवसर पर।

• स्कूलों को सलाह दी गई है कि वे अपने दिन की शुरुआत राष्ट्रगीत के सामूहिक गायन से करें ताकि छात्रों में राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान बढ़े।

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

पर्यटक की डायरी से अधिक इतिहास की याद दिलाने वाला दस्तावेज है 'हिन्दवी स्वराज्य दर्शन'

- सुमंत विद्वांस

दिसंबर में जब मैं बालाघाट में था, तब भोपाल से मेरे मित्र लोकेन्द्र जी ने बहुत स्नेहपूर्वक अपनी तीन पुस्तकें मेरे लिए उपहार में भेजी थीं। साथ ही उन्होंने यह सुझाव भी भेजा कि इन तीनों में सबसे पहले ‘हिन्दवी स्वराज्य दर्शन’ को पढ़ूँ।

आज मैंने यह पुस्तक पढ़कर पूरी की।

इसे यात्रा वर्णन कहा गया है और यह बात बिल्कुल ठीक भी है। लेकिन यह पुस्तक किसी पर्यटक की डायरी नहीं है। यह इतिहास की याद दिलाने वाला दस्तावेज भी है और अपने नाम के अनुरूप ही छत्रपति शिवाजी महाराज के स्वराज्य का ‘दर्शन’ करवाने वाली पुस्तक भी है। 

शिवाजी महाराज के जीवन और कार्य के बारे में अनेक भाषाओं में सैकड़ों पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। उनमें से अनेक पुस्तकें बहुत शोधपूर्ण एवं गहन हैं। ऐसे में अगर आप सोचें कि इस पुस्तक को क्यों पढ़ा जाए, तो मैं कहूँगा कि यदि आपको सरल शब्दों में शिवाजी महाराज के कुछ महत्वपूर्ण किलों की प्राथमिक जानकारी पानी हो, तो यह पुस्तक आपके लिए बहुत काम की है। इसमें आपको सिंहगढ़ और रायगढ़ जैसे प्रसिद्ध किलों की जानकारी तो मिलेगी ही, पर साथ ही खान्देरी और कोलाबा जैसे जलदुर्गों व पुरंदर व मल्हारगढ़ जैसे किलों के बारे में भी पता चलेगा। इसके अलावा इसमें पुणे के शनिवारवाड़ा, लाल महल और पाचाड में जीजाबाई के समाधि-स्थल का भी परिचय मिल जाएगा।

मैं लगभग 15 वर्षों तक नासिक और पुणे में रहा हूँ, और उनमें से भी सात वर्ष पुणे शहर में ही रहा हूँ, इसलिए इनमें से कई स्थानों पर मैं जा चुका हूँ। इस पुस्तक को पढ़ते समय अनायास ही मेरी भी कई पुरानी यादें ताजा हो गईं और बहुत-सी नई जानकारी भी मिल गई।

लोकेन्द्र जी ने बिल्कुल ठीक लिखा है कि शिवाजी महाराज के किलों को देखे बिना उनके कार्य को ठीक से समझ पाना असंभव है। मुझे लगता है कि यह बात भारत के कई अन्य शासकों के सम्बन्ध में भी सही है। मैं छात्रों और युवाओं को विशेष रूप से सुझाव देना चाहता हूँ कि अपने जीवन में कम से कम 10 किलों को अवश्य देखें। मेरे जीवन का बहुत-सा हिस्सा ऐसे ही भ्रमण और यात्राओं में बीता है और मैं जीवन में जो कुछ भी हूँ, उसमें इन अनुभवों का बड़ा हाथ है। आज अपने फोन पर आप केवल दुनिया भर की ही नहीं, बल्कि दूसरे ग्रहों की और अंतरिक्ष व ब्रह्माण्ड की जानकारी भी देख सकते हैं। लेकिन जो ज्ञान, अनुभव और समझदारी आपको पर्यटन और ऐतिहासिक स्थलों पर जाने से मिलेगी, उसकी बराबरी किसी यूट्यूब वीडियो या इंटरनेट पर किसी वेबसाइट से नहीं हो सकती।

लेकिन एक और सुझाव मैं हर किसी के लिए देना चाहता हूँ कि अगर आप स्वयं ऐसे स्थलों पर जा नहीं सकते, तो भी हर हफ्ते यूट्यूब पर भारत के ऐसे किसी न किसी ऐतिहासिक किले, महल, मंदिर आदि के बारे में एकाध वीडियो जरूर देखें। ऐसे ऐतिहासिक स्थल केवल महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि पूरे भारत में फैले हुए हैं। उनके बारे में जानना और दूसरों को भी बताना एक बहुत अच्छा और महत्वपूर्ण काम है, जो आप घर बैठे कर सकते हैं। इससे अपने ही देश और इतिहास के बारे में आपकी जानकारी भी बढ़ेगी और आज की कुछ समस्याओं व परिस्थितियों की समझ भी बढ़ेगी।

लोकेन्द्र जी ने इन किलों की उपेक्षा और दुर्दशा के बारे में भी कुछ बात की है। मैं उनकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ। हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के नाम पर राजनीति करने वाले कई संगठन और पार्टियां हैं, पर अपनी धरोहरों को संभालने और संरक्षित रखने की चिंता किसी को नहीं है। महाराष्ट्र में तो कई राजनैतिक परिवार पीढ़ियों से केवल शिवाजी महाराज और मराठी के नाम पर लोगों की भावनाओं का लाभ उठाकर अपनी दुकानें चला रहे हैं, पर उन्हें भी इन ऐतिहासिक धरोहरों से कोई सरोकार नहीं है।

इन्हीं लोगों के बारे में मैं एक और बात जोड़ना चाहता हूँ।

खुद को शिवाजी महाराज का अनुयायी बताने वाले जो लोग महाराष्ट्र में हर चुनाव से पहले गुंडागर्दी और उप्र या तमिलनाडु वालों को भगाने की बात कहते रहते हैं, उन्हें एक बार शिवाजी महाराज की जीवनी ठीक से पढ़नी चाहिए।

तब उन्हें सबसे पहले यह बात समझ आएगी कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने साम्राज्य को मराठी साम्राज्य या मराठा साम्राज्य नहीं, बल्कि हिंदवी स्वराज्य क्यों कहा था। दूसरी बात उन्हें यह याद आएगी कि काशी के पंडित गागाभट्ट से लेकर कवि भूषण, परमानंद और कलश जैसे कवियों तक और महाराजा छत्रसाल से लेकर कुंवर रामसिंह तक उत्तरी भारत के कितने सारे लोगों का शिवाजी महाराज से निकट संपर्क या उनके कार्यों में सहयोग रहा। इसी तरह दक्षिणी भारत में कर्नाटक और तंजावूर तक भी उनके संपर्क थे। आपको वाकई शिवाजी महाराज की धरोहर पर दावा करना है, तो कम से कम उनके बारे में ठीक से जान लीजिए और उनके व्यवहार का आचरण करके दिखाइए।

मेरा ध्यान इस बात पर भी गया कि पुस्तक में लोकेन्द्र जी ने रोप-वे और ट्रॉफी जैसे आम अंग्रेजी शब्दों को लिखते समय रज्जू-मार्ग और वैजयंती जैसे हिन्दी अर्थ भी साथ ही दे दिए हैं। यह मुझे बड़ा अच्छा और रोचक भी लगा। कई अंग्रेजी और उर्दू शब्द हमारी आदत में इस प्रकार जुड़ चुके हैं कि अक्सर उनके मूल हिन्दी या संस्कृत शब्द हमें याद ही नहीं आते या फिर पता ही नहीं होते हैं। मैं स्वयं भी कई बार इस समस्या में उलझता हूँ। अपनी भाषा को बढ़ाने और बचाने के लिए अपने शब्दों का उपयोग सबसे सरल और प्रभावी उपाय है।

मैं कई भाषाएँ बोलता और समझता हूँ, इसलिए मैं इस बात का पूरा समर्थक हूँ कि आप अंग्रेजी भी सीखें और चाहें तो जर्मन, जापानी, चीनी या किसी दूसरे ग्रह की दो-चार भाषाएँ भी सीख लीजिए, पर यदि आप अपनी ही भाषा ठीक से नहीं जानते हैं तो कम से कम अपने इस अज्ञान को छिपाकर रखिए और अपनी भाषा सीख लीजिए।

भारत अकेला देश है, जहाँ लोग इस बात को उपलब्धि के रूप में गर्व से बताते हैं कि उन्हें या उनके बच्चों को तो अपनी भाषा आती ही नहीं, सिर्फ अंग्रेजी ही आती है। ऐसा बोलकर वे एक बार मेरी नजरों में शर्मिंदा होते हैं और फिर जब मैं धाराप्रवाह अंग्रेजी में बात करता हूँ और वे लड़खड़ा जाते हैं, तब वे मेरी नजरों में दोबारा भी शर्मिंदा हो जाते हैं। मेरा आपको सुझाव है कि आप पचासों भाषाएं सीख लीजिए पर अपने लोगों से अपनी भारतीय भाषाओं में बात कीजिए, चाहे टूटी फूटी ही सही। 

लेकिन उसके लिए आपको अच्छी पुस्तकें पढ़नी पड़ेंगी और लोकेन्द्र जी की यह पुस्तक भी वैसी ही एक अच्छी पुस्तक है। सादर!


रविवार, 15 फ़रवरी 2026

समाज परिवर्तन का केंद्र बनी शाखाएं

संघ शताब्दी वर्ष : जहाँ संघ की शाखा लगती है, वहाँ समाज में सकारात्मक परिवर्तन दिखायी देते हैं


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा केवल खेलने-कूदने और योगाभ्यास का स्थान नहीं है। किसी शाखा में भले ही 100 स्वयंसेवक नित्य आते होंगे, लेकिन अच्छी शाखा उसे ही माना जाता है, जिसके कारण से शाखा क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव आए हों। हिन्दू समाज में जागृति आई हो। समाज अपनी चुनौतियों का समाधान करने में स्वयं सक्षम हो गया हो। शाखा की सफलता इसी में है कि वह समाज परिवर्तन का केंद्र बने। इसलिए संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता कहते हैं कि जिन क्षेत्रों में संघ की अच्छी शाखा चलती है, वहाँ की अनेक समस्याओं का समाधान स्वयं ही हो जाता है। शाखा आने वाले स्वयंसेवक अपने क्षेत्र की समस्याओं को चिह्नित करते हैं और समाज की सज्जनशक्ति को साथ लेकर उसका समाधान निकालने का प्रयास करते हैं। संघ शाखा की सफलता की अनेक कहानियां हैं। यहाँ हम मध्यभारत की कुछ शाखाओं का उल्लेख कर रहे हैं, जिन्होंने समाज परिवर्तन के अनुकरणीय उदाहरण समाज के सामने प्रस्तुत किए हैं।

भोपाल में शाखाओं के माध्यम से पर्यावरण, शिक्षा एवं सेवा के कई प्रकल्प चलाए जाते हैं। ऐसा ही एक प्रकल्प है- एम्स में संचालित ‘सार्थक सेवा केंद्र’। विद्युत भाग की ‘वीर मंगल पांडेय शाखा’ के स्वयंसेवकों ने अनुभव किया कि एम्स में दूर-दूर से मरीजों का आना होता है लेकिन यहाँ परिजनों के लिए रात्रि विश्राम की व्यवस्था नहीं है। इस कारण मरीजों के साथ उनके परिजनों को भी असुविधा होती थी। उन्हें मजबूरी में पार्क के किनारे बैठकर रात गुजारनी पड़ती थी। यह सब देखकर शाखा टोली की बैठक में निर्णय लिया गया कि एम्स में एक सहायता केंद्र प्रारंभ किया जाए। कुछ स्वयंसेवक चिन्हित किए गए और 13 मई 2022 से यहाँ ‘सार्थक सेवा केंद्र’ शुरू कर दिया गया। 10 से 12 स्वयंसेवकों ने दो पालियों में यानी सुबह 8 बजे से 11 बजे तक और उसके बाद 11 से 2 बजे तक समय देने कि योजना बनाई। आज यह प्रकल्प रैन बसेरा, व्हीलचेयर एवं स्ट्रेचर, रक्तदान और एम्बुलेंस की सुविधाएं उपलब्ध कराता है। वहीं, बुधनी के सिविल अस्पताल में भेरुंदा नगर की ‘बजरंग शाखा’ गरम पानी एवं रोगी सहायता केंद्र का संचालन करती है। अस्पताल में आए दिन मरीजों को गर्म पानी, दूध एवं अन्य चीजों के लिए परेशान होना पड़ता था। इसी प्रकार का प्रकल्प ग्वालियर के कमलाराजा अस्पताल में भी चलाया जाता है। यहीं, जयारोग्य चिकित्सालय में सर्दी के समय मरीज के परिजनों को ठंड से बचाने के लिए ‘कंबल केंद्र’ का संचालन किया जाता है।

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

स्वातंत्र्यवीर सावरकर हैं 'भारत रत्न'

इतिहास के पृष्ठों पर कुछ ऐसे व्यक्तित्वों की अमर कहानियां दर्ज हैं, जिनका कद किसी पुरस्कार या सम्मान से कहीं अधिक बड़ा होता है। स्वातंत्र्यवीर सावरकर ऐसा ही एक नाम है, जिन्होंने अपना सर्वस्व भारत माता की सेवा में समर्पित कर दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने बीते दिन मुंबई में जो बात कही, वह न केवल वीर सावरकर के प्रति श्रद्धा रखनेवाले बंधुओं की भावनाओं का प्रतिबिंब है, बल्कि राष्ट्र के उस उत्तरदायित्व की ओर भी संकेत है जिसे पूरा किया जाना बाकी है। उनका यह कथन कि "वीर सावरकर को भारत रत्न दिया जाता है, तो यह सम्मान खुद इस पुरस्कार की गरिमा को बढ़ाएगा," भारत के नायकों के प्रति अपनी कृतज्ञता का स्मरण कराता है। वीर सावरकर का गौरवपूर्ण स्मरण करने में किंचित भी संकोच नहीं होना चाहिए। वीर सावरकर और उनके परिवार ने भारत की स्वतंत्रता और समाज सेवा के लिए जिस प्रकार का बलिदान दिया, उसकी किसी के साथ तुलना नहीं की जा सकती। यही कारण है कि कुछ कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों के दुष्प्रचार के बावजूद राष्ट्रभक्त नागरिकों के हृदय में वीर सावरकर के प्रति अथाह श्रद्धा है। इसलिए देश को बेसब्री से प्रतीक्षा है कि वीर सावरकर को यथाशीघ्र भारत रत्न से सम्मानित किया जाए। करोड़ों लोगों की इसी आकांक्षा को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्वर दिया है।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

‘जलकुंभी से भरी नदी में’ संवेदनाओं और सरोकारों का बोध

देखें वीडियो ब्लॉग : युवा कवि पुरु शर्मा के काव्य संग्रह की चर्चा

हिन्दी साहित्य के विस्तृत आकाश में जब कोई युवा हस्ताक्षर अपनी पहली कृति के साथ उपस्थित होता है, तो उससे कई उम्मीदें जुड़ जाती हैं। अशोकनगर, मध्यप्रदेश के युवा कवि पुरु शर्मा का पहला काव्य संग्रह ‘जलकुंभी से भरी नदी में’ उन उम्मीदों पर न केवल खरा उतरता है, बल्कि भविष्य के प्रति आश्वस्त भी करता है। यह संग्रह एक ऐसे युवा मन का दर्पण है जो अपने अध्ययन और समाज के प्रति गहरी संवेदनशीलता के धागों से बुना गया है। पुरु की कविताओं में कोमलता का अहसास है। अपने समय की पीढ़ी से जनसरोकारों पर सीधा संवाद है। पर्यावरण संरक्षण की चिंता उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। अपनी विरासत को लेकर गौरव की अनुभूति है। अपनी कविता के माध्यम से पुरु साहित्य के धुंरधरों से साहित्य के धर्म की बात करते हैं। कहना होगा कि पुरु शर्मा की कविताएँ केवल व्यक्तिगत अनुभूतियों का बयान नहीं हैं, बल्कि वे अपने समय, समाज, संस्कृति और पर्यावरण के प्रति एक सजग नागरिक की चिंताएँ हैं। संग्रह के शीर्षक से ही पर्यावरण के प्रति कवि का गहरा सरोकार स्पष्ट होता है। एक युवा कवि का अपने देश और संस्कृति के प्रति ऐसा अनुराग देखकर सुखद आश्चर्य होता है।

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

शाखा में नित्य आने से होता है समग्र व्यक्तित्व विकास

संस्कार केंद्र है संघ शाखा : खेल-खेल में स्वयंसेवक सीख जाते हैं प्रबंधन के सूत्र, संगठन शास्त्र, परोपकार, सेवाभाव, पारिवारिक आत्मीयता, सामुहिकता और समन्वय जैसे गुण


संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने व्यक्ति निर्माण के लिए शाखा के रूप में अनूठी कार्यपद्धति दी है। शाखा की सामान्य-सी दिखनेवाली गतिविधियों में वह जादू है कि नित्य शाखा आने वाले स्वयंसेवकों के व्यक्तित्व में व्यापक परिवर्तन आता है। स्वयंसेवक का समग्र व्यक्तित्व विकास होता है। शाखा के संस्कार से स्वयंसेवकों के मन में पारिवारिक आत्मीयता, सामाजिक उत्तरदायित्व, परोपकार, देशभक्ति, संवेदनशीलता, साहस, सेवा और प्रबंधन जैसे अनेक गुण विकसित होते हैं। संघ विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी अपनी पुस्तक ‘कार्यकर्ता’ में लिखते हैं- “संघशाखा पर प्रतिदिन एकत्रीकरण, यह अपनी कार्यपद्धति के संगठनसूत्र का बुनियादी पहलू है। उसमें से ही, आनेवाले स्वयंसेवकों के मन में एक पारिवारिक आत्मीयता का भाव विकसित होता है। इस पारिवारिकता के कारण ही एकसाथ काम करने की उमंग मन में पैदा होती है। सामूहिक कार्यक्रमों के माध्यम से ही सामूहिक मानसिकता का निर्माण होता है, इस मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त के प्रकाश में सामूहिक कार्यक्रम हम करते हैं। संघशाखा यह एक संस्कार केंद्र है”। 

सामान्यतौर पर संघ की शाखा 60 मिनट की रहती है। यह 60 मिनट स्वयंसेवक एक अनुशासित व्यवस्था में व्यतीत करते हैं। शाखा पर होने वाले सभी शारीरिक एवं बौद्धिक कार्यक्रमों का पूर्व नियोजन होता है। प्रत्येक कार्यक्रम के लिए कालखंड विभाजित हैं। ऐसा नहीं होता कि स्वयंसेवकों को खेलने में आनंद आ रहा है, तो उस दिन शाखा पर केवल खेल ही होंगे। सामान्यतौर पर 40 मिनट शारीरिक, 10 मिनट बौद्धिक और शेष 10 मिनट शाखा लगाने एवं विकिर (शाखा छोड़ने) के लिए तय रहते हैं। सबसे पहले स्वयंसेवक संघस्थान पर एकत्र होते हैं। उसके पश्चात आचार पद्धति से शाखा लगाने का कार्य मुख्य शिक्षक सम्पन्न करता है। पहले स्वयंसेवक गुरु ‘भगवा ध्वज’ को प्रणाम करते हैं, उसके बाद ही शाखा में शारीरिक और बौद्धिक कार्यक्रमों की रचना होती है। प्रारंभ में शाखा पर उपस्थित स्वयंसेवकों की उम्र को ध्यान में रखकर व्यायाम, सूर्यनमस्कार, योग एवं आसान कराए जाते हैं। उसके बाद, लगभग 15 मिनट विभिन्न प्रकार के खेल खिलाए जाते हैं। शारीरिक कार्यक्रमों में समता, दंड संचालन, नियुद्ध इत्यादि भी शामिल रहते हैं। उसके बाद 10 मिनट बौद्धिक कार्यक्रम (गीत, सुभाषित, अमृतवचन, समाचार समीक्षा इत्यादि) सम्पन्न कराए जाते हैं। सबसे अंत में, सभी स्वयंसेवक प्रार्थना करते हैं और ‘भारत माता की जय’ बोलते हुए अप्रत्यक्ष रूप से बहुत सारे गुणों को अपने साथ लेकर समाज में जाते हैं।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

भावाक्षर : संवेदनाओं और जीवन के यथार्थ की काव्यात्मक अभिव्यक्ति

यह वीडियो ब्लॉग भी देखें : युवा कवि डॉ. कपिल भार्गव के काव्य संग्रह 'भावाक्षर' की समीक्षा


साहित्य का मूल उद्देश्य मनुष्य की संवेदनाओं को शब्द देना है। जब एक संवेदनशील मन अपने परिवेश, राष्ट्र, समाज और निजी अनुभूतियों को शब्दों के धागे में पिरोता है, तो ‘भावाक्षर’ जैसा संग्रह जन्म लेता है। युवा कवि और संस्कृत के मर्मज्ञ विद्वान डॉ. कपिल भार्गव का काव्य संग्रह ‘भावाक्षर’ महज कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि जीवन के विविध रंगों का एक कोलाज है। जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अपने भावों को काव्य के रूप में प्रस्तुत करने का कौशल इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता है। कुल 77 कविताओं के इस गुलदस्ते में कवि ने सामाजिक सरोकारों से लेकर मानवीय पहलुओं, और राष्ट्रभक्ति से लेकर पर्यटन तक के विषयों को स्पर्श किया है। संस्कृत के विद्वान होने के नाते डॉ. कपिल की भाषा में सहज संयम और संस्कार दिखाई देता है। उन्होंने समाचारपत्र में प्रकाशित बुजुर्ग की तस्वीर पर कविता लिखी है तो प्रकृति पर हो रहे आघात पर अपनी पीड़ा को शब्द दिए हैं, यह उनके संवेदनशील कवि होने का प्रमाण है। ‘महानायक चार्ली चैपलिन’ और ‘विवाह की तृतीय वर्षगाँठ’ जैसी कविताएं बताती हैं कि कवि का मन छोटी-बड़ी हर घटना से प्रभावित होता है।