शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

‘तत्त्वमसि’: संघ दर्शन और प्रचारक जीवन की कथा-यात्रा

देखें यह वीडियो : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, प्रचारक जीवन, संघ से जुड़े प्रश्नों एवं दृष्टिकोण पर केन्द्रित वरिष्ठ प्रचारक एवं साहित्यकार श्रीधर पराडकर जी का उपन्यास


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पक्ष एवं प्रतिपक्ष में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। लेकिन ‘तत्त्वमसि’ मुझे बाकी सब पुस्तकों से अलग लगती है। यह एक ऐसा उपन्यास है, जिसका कथानक संघ के प्रचारक को केंद्र में रखकर बुना गया है। ‘तत्त्वमसि’ कथा-साहित्य के माध्यम से संघ की आंतरिक कार्यप्रणाली और दर्शन को प्रस्तुत करने का एक रोचक प्रयास है। वरिष्ठ प्रचारक एवं साहित्यकार श्रीधर पराड़कर का यह उपन्यास प्रचारक जीवन, उसके त्याग और समाज-केंद्रित अध्यात्म को रेखांकित करता है। 

उपन्यास का कथानक तीन मुख्य पात्रों के पारस्परिक संवाद और संपर्क के इर्द-गिर्द विकसित होता है। परितोष बाबू- एक समर्पित, शांतचित्त और अनुभवी संघ प्रचारक। सदानंद- प्रचारक जीवन पर शोध कर रहा एक अकादमिक अध्येता। स्नेहल- संघ को समझने और साक्षात्कार लेने आई एक युवा पत्रकार। उपन्यास के पात्र यथार्थवादी और सजीव हैं। परितोष बाबू का चरित्र केवल एक प्रचारक का नहीं, बल्कि समाज के प्रति समर्पित एक मार्गदर्शक का रूप प्रस्तुत करता है। वहीं, सदानंद और स्नेहल उस नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो बिना किसी पूर्वाग्रह के संघ के बारे में तटस्थ जानकारी पाना चाहती है। उपन्यास में इन दोनों पात्रों के माध्यम से समाज, बौद्धिक वर्ग और आलोचकों के मन में उठने वाले स्वाभाविक प्रश्नों को सामने लाया गया है, जैसे- संघ की स्थापना का मूल उद्देश्य क्या है, प्रचारक कौन होते हैं, उनका जीवन संन्यास से कैसे भिन्न है, शाखा में व्यक्ति-निर्माण किस प्रकार होता है? क्या संघ सांप्रदायिक संगठन है? परितोष बाबू इन प्रश्नों का उत्तर तार्किक, सहज और व्यावहारिक ढंग से देते हैं। 

संवाद इस उपन्यास का सबसे सशक्त तत्व हैं। संवादों में दार्शनिकता और व्यावहारिकता का संतुलन दिखाई देता है। जब सदानंद पूछता है कि संघ समाज में फैले भ्रमों का निराकरण क्यों नहीं करता, तो परितोष बाबू का यह कथन उपन्यास का वैचारिक मर्म प्रकट करता है- “यदि भ्रम हो तो उसका निराकरण किया जाए। जानबूझकर भ्रम उत्पन्न किए गए हों तो उनका निरसन संभव नहीं है”। वास्तव में यही तो दिखाई देता है। घिसे-पिटे प्रश्नों का कई बार तार्किक उत्तर दिया जा चुका है लेकिन इसके बाद भी कुछ लोग अपने वैचारिक एवं राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए बार-बार उन्हीं प्रश्नों एवं आरोपों को दोहराते रहते हैं। हम सब जानते हैं कि संघ को लेकर पूछे जाने वाले ज्यादातर प्रश्न या आरोप, बेसिर-पैर होते हैं, जो राजनैतिक एवं वैचारिक द्वेष से प्रेरित हैं। 

इस उपन्यास की एक और विशेषता यह है कि यह केवल संघ से बाहर के लोगों की जिज्ञासाओं का शमन नहीं करता, बल्कि स्वयंसेवकों एवं प्रचारकों के मन में उठने वाली आशंकाओं का भी समाधान प्रस्तुत करता है। इसलिए कहना होगा कि ‘तत्त्वमसि’ न केवल गैर-संघ पृष्ठभूमि वाले पाठकों और शोधार्थियों के लिए पठनीय एवं विचारोत्तेजक कृति है, बल्कि यह स्वयंसेवकों के लिए भी उतनी ही उपयोगी है। संगठन कार्य के दौरान आने वाली विभिन्न चुनौतियों एवं परिस्थितियों में धैर्य, संयम और सम्यक दृष्टि के साथ कैसे कार्य किया जाए, इसका व्यावहारिक मार्गदर्शन यह उपन्यास देता है। 

श्रीधर पराड़कर का स्वयं संघ प्रचारक होना इस कृति को प्रामाणिक और आत्मकथात्मक गहराई प्रदान करता है। उपन्यास की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और परिष्कृत खड़ी बोली हिंदी है। लेखक ने जटिल दार्शनिक और संगठनात्मक विषयों को अत्यंत रोचक कथा-शैली में ढाला है, जिससे पाठक की जिज्ञासा अंत तक बनी रहती है। यह उपन्यास संघ से जुड़े पूर्वाग्रहों को दूर कर उसकी वास्तविक कार्यपद्धति और जीवन-मूल्यों से साक्षात्कार कराता है। संघ के शताब्दी वर्ष के परिप्रेक्ष्य में यह कृति समकालीन हिंदी साहित्य और सामाजिक विमर्श में एक महत्वपूर्ण योगदान सिद्ध होती है। अंत में कहना चाहूँगा कि संघ को समझने में रुचि रखनेवाले लोगों को यह उपन्यास अवश्य ही पढ़ना चाहिए। संघ शताब्दी वर्ष में यह उपन्यास पढ़ना आपको अच्छा अनुभव देगा। 

पुस्तक : तत्त्वमसि

लेखक: श्रीधर पराड़कर

विधा: उपन्यास

प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली

पृष्ठ संख्या: 176

मूल्य: ₹350

मुम्बई से प्रकाशित मासिक पत्रिका 'हिन्दी विवेक' के सितंबर-2026 के अंक में प्रकाशित आरएसएस प्रचारक श्रीधर पराडकर की पुस्तक 'तत्वमसि' की समीक्षा

गुरुवार, 3 सितंबर 2026

विश्व बंधुत्व का संदेश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन की यात्रा पर पहुँचे सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने अमेरिका के बाद कनाडा में भारतीय विचार को दुनिया के सामने रखा है। जिस प्रकार न्यूयॉर्क में उन्होंने दुनिया को शांति और सह-अस्तित्व के साथ चलने की राह दिखायी, उसी प्रकार उन्होंने टोरंटो में भारत के उदात्त विचार को सबके साथ साझा किया। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य जब भू-राजनीतिक तनावों, संकीर्ण राष्ट्रवाद और वैचारिक ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रहा है, तब भारत का विचार ही सही राह दिखा सकता है। प्रारंभ से लेकर आज तक विश्व में भारत की प्रतिष्ठा भी उसके दर्शन को लेकर रही है। कहना होगा कि टोरंटो में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का ‘हिंदू विश्व बंधु’ संबोधन केवल एक सांस्कृतिक व्याख्यान नहीं, बल्कि विश्व शांति के लिए एक अनिवार्य दृष्टि प्रस्तुत करता है। उनका यह कथन कि विविधता एकता की विरोधी नहीं बल्कि उसकी स्वाभाविक और सुंदर अभिव्यक्ति है, भारतीय चिंतन के उस मूल तत्त्व को रेखांकित करता है जिसे आज की खंडित दुनिया को गहराई से समझने की आवश्यकता है। भारतीय मनीषा ने विविधता को कभी संकट या विभाजन के स्रोत के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे एक ही चेतना के बहुरंगी स्वरूप के रूप में स्वीकार और सम्मानित किया है।

सोमवार, 31 अगस्त 2026

वैश्विक पटल पर आरएसएस

न्यूयॉर्क व्याख्यान : ‘साझा मानवता’ का व्यावहारिक मार्ग

न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आरएसएस के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेसन' (Universal Oneness Celebration) कार्यक्रम को संबोधित किया 

न्यूयॉर्क की ऐतिहासिक धरा पर ‘एक विश्व : एक मानवता शिखर सम्मेलन’ में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का उद्बोधन वस्तुतः भारत के शाश्वत आध्यात्मिक बोध और 'वसुधैव कुटुंबकम्' की युगीन अभिव्यक्ति है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जहाँ भौतिकवादी होड़, वैचारिक संकीर्णता, युद्ध की विभीषिका और अविश्वास का अंधकार संपूर्ण मानवता को ग्रस रहा है, वहाँ यह कार्य-आह्वान विश्व को विनाश के गर्त से निकालकर एकात्मता के प्रकाश की ओर ले जाने वाला एक सशक्त मार्गदर्शक सिद्ध होगा। भारत की यह सनातन परंपरा रही है कि जब-जब संसार में घृणा, विभाजन और संघर्ष की लहरें उठी हैं, तब-तब यहाँ के ऋषियों, मनीषियों और विचारकों ने संपूर्ण सृष्टि को एक परिवार मानकर शांति और एकात्मता का संदेश दिया है। ऐसे में याद आता है स्वामी विवेकानंद का शिकागो व्याख्यान। विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद ने रक्त रंजित और युद्धरत विश्व को शांति एवं सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाया था। आज जब आधुनिक सभ्यता तकनीक की पराकाष्ठा पर पहुँचकर भी मानवीय संवेदनाओं के संकट से जूझ रही है, तब सरसंघचालक जी का यह उद्बोधन वैश्विक चिंतन को एक नई दिशा प्रदान करता है।

सोमवार, 24 अगस्त 2026

रक्षाबंधन : समाज की एकता, समरसता और राष्ट्र-रक्षा का पावन संदेश

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बस्तियों में जाकर वंचित वर्ग के बंधुओं को रक्षासूत्र बाँधकर अपनेपन की भावना को करते हैं प्रकट

भारत में उत्सव की अनूठी परंपरा है। ये उत्सव हमारे समाज को एक सूत्र में पिरोने और जीवन मूल्यों को जगाए रखने का काम करते हैं। हमारे प्रत्येक उत्सव की रचना में समाज के लिए जरूरी संदेश हैं। ऐसा ही एक उत्सव है- रक्षाबंधन, जो हमें सामाजिक समरसता का संदेश देता है। आमतौर पर हम इसे भाई-बहन के पवित्र प्रेम के त्योहार के रूप में जानते हैं, लेकिन इसका वास्तविक विचार इससे कहीं अधिक बड़ा और गहरा है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने रक्षाबंधन को अपने छह उत्सवों में शामिल किया है। संघ ने इस पर्व को संपूर्ण समाज को एकजुट करने, आपस में प्रेम-भाव बढ़ाने और देश की रक्षा का संकल्प लेने वाले महापर्व के रूप में देखा और उसे उसी ढंग से मनाना शुरू किया। यह पर्व हमें सिखाता है कि हम अपने समाज, संस्कृति और मातृभूमि की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहें। संघ ने समाज को स्मरण कराया कि रक्षाबंधन केवल एक धागा बांधने की रस्म नहीं है। हमारे यहाँ संबंधों की नींव विश्वास पर टिकी होती है, और यह धागा उसी विश्वास की डोर है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस तरह एक धागा बिखरे हुए अनगिनत मोतियों को जोड़कर एक सुंदर माला बना देता है, ठीक वैसे ही यह रक्षासूत्र भी समाज के अलग-अलग लोगों को आपस में जोड़कर एक कर देता है। पुराने समय में यह पर्व सिर्फ भाई-बहन तक ही सीमित नहीं था। जब भी समाज या देश पर कोई संकट आता था, तो लोग एक-दूसरे को रक्षासूत्र बांधकर साथ खड़े रहने और मदद करने का भरोसा दिलाते थे।

रविवार, 16 अगस्त 2026

आरएसएस बदल रहा है अपना ढांचा

संघ शताब्दी वर्ष : मध्यप्रदेश में अब तीन प्रांत (मध्यभारत , मालवा और महाकौशल) की जगह होंगे 7 संभाग, मध्य भारत में भोपाल एवं ग्वालियर संभाग, मालवा की जगह इंदौर और उज्जैन संभाग, महाकौशल की जगह सागर, रीवा और जबलपुर संभाग

यह आलेख 'आयुध Updates' के मार्च-अप्रैल 2026 अंक में प्रकाशित हुआ है। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर समाज में अब स्वीकार्यता के साथ-साथ एक विश्वास भी बन गया है। सज्जनशक्ति संघ के साथ मिलकर समाज परिवर्तन के आंदोलन से जुड़ना चाहती है, वहीं संघ भी अपने लक्ष्य यानी समाज के साथ एकाकार होने की ओर बढ़ना चाहता है। हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष के बाद अपने अगले पड़ाव की ओर कदम बढ़ा रहा है। शताब्दी वर्ष में अब तक आयोजित कार्यक्रमों में समाज ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया है। समाज की बड़ी ताकत संघ के संपर्क में आई है। इसलिए अपने अगले पड़ाव में संघ समाज की सज्जन शक्ति को साथ लेकर भारत के निर्माण की नयी कहानी लिखने की तैयारी कर रहा है। इसकी एक झलक हरियाणा के पट्टीकल्याणा (समालखा) में आयोजित अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों एवं भविष्य की रणनीति में देखी जा सकती है। पिछले कुछ समय से एक चर्चा बहुत जोरों से थी कि संघ अपनी भौगोलिक संरचना में बदलाव करने जा रहा है, संघ की प्रांत रचना खत्म हो जाएगी, क्षेत्र रचना में भी बदलाव होगा। इस चर्चा पर अब प्रतिनिधि सभा में मुहर लग गई है। हाँ, संघ की भौगोलिक संरचना में बदलाव हो रहा है। अब चर्चा इस बात की अधिक हो रही है कि आखिर संघ को इस परिवर्तन की आवश्यकता क्यों पड़ी?

रविवार, 9 अगस्त 2026

श्रीगुरुजी के ऐतिहासिक ‘तीन पत्र’

संघ शताब्दी वर्ष : गोलवलकर जी ने अपनी देह छोड़ने के पूर्व संघ की आगे की व्यवस्था और स्वयंसेवकों को संदेश देने के लिए तीन पत्र लिखे थे, जो उनके देवलोकगमन के बाद पढ़े गए

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ पत्र लिखने के अभ्यासी थे। पत्रों के माध्यम से श्रीगुरुजी का कार्यकर्ताओं के प्रति स्नेह, राष्ट्रप्रेम और हिन्दू समाज की एकात्मता के प्रति उनका संकल्प स्पष्ट झलकता है। उनके पत्रों में संघ कार्य के विस्तार, वैचारिक स्पष्टता, अनुशासन और व्यक्तिगत जीवन में मूल्यों को अपनाने पर जोर दिया गया है। कार्यकर्ताओं, सामाजिक एवं राजनीतिक नेतृत्व को लिखे उनके अनेक पत्र चर्चित हैं परंतु उनके ‘तीन पत्र’ अत्यंत महत्व के हैं। संघ को जानने-समझने की रुचि रखनेवाले बंधुओं को श्रीगुरुजी के ये तीनों पत्र अवश्य पढ़ना चाहिए। ये पत्र उन्होंने अपनी देह त्यागने से पूर्व लिखे थे। वर्ष 1972 में श्रीगुरुजी का स्वास्थ्य तेजी से गिरना शुरू हो गया था। परंतु, उसके बाद भी उन्होंने क्षणभर भी स्वयं को संघकार्य से अलग नहीं किया। वर्ष 1973 में जब उन्हें यह आभास होने लगा कि अब भौतिक देह से विश्राम लेने का समय आ गया है, तब उन्होंने अपने देहावसान के बाद संघ कार्य की समुचित व्यवस्था के बारे में विचार प्रारंभ कर दिया। इसी क्रम में ये तीन ऐतिहासिक पत्र लिखे गए। श्रीगुरुजी ने 2 अप्रैल 1973 को अपने हाथ से तीन पत्र लिखे और अखिल भारतीय व्यवस्था प्रमुख पांडुरंग पंत क्षीरसागर को सौंप दिए। उन्होंने क्षीरसागर जी को निर्देश दिए कि ये पत्र मेरे जाने के बाद सार्वजनिक रूप से पढ़े जाएं, जिनमें से दो पत्र बालासाहब देवरस पढ़ें। श्रीगुरुजी की इच्छा के अनुरूप तीनों पत्र सुरक्षित रख दिए गए। 5 जून 1973 को श्रीगुरुजी ने अपनी देह का त्याग किया। अगले दिन यानी 6 जून को इस पुण्य आत्मा के पार्थिव शरीर की अंत्येयात्रा प्रारंभ होने के पूर्व इन पत्रों को पढ़कर सुनाया गया। एक पत्र में उनके उत्तराधिकार की घोषणा की गई। दूसरे पत्र में आग्रह किया कि उनका कोई स्मारक नहीं बनाया जाए। वहीं, तीसरे पत्र में उनके हृदय की उदारता एवं व्यक्तित्व की महानता के दर्शन होते हैं, जिसमें वे विनयभाव से क्षमायाचना करते हैं कि उनके व्यवहार से कभी किसी का हृदय दु:खी हुआ हो, तो क्षमा करें। श्रीगुरुजी के ये तीन पत्र ‘बीज’ थे, जिन्होंने आगे चलकर संघ की कार्यपद्धति एवं संस्कृति को समृद्ध किया।

सोमवार, 3 अगस्त 2026

भगवा रंग से चिढ़ क्यों?

राष्ट्रध्वज तिरंगा में सबसे ऊपर है भगवा, भारतीय संस्कृति का का परिचायक, त्याग, वैराग्य, साहस, बलिदान और सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत है भगवा

खेल मैदान में राष्ट्रीय ध्वज के रंगों का समावेश कोई नई बात नहीं है, लेकिन भारत की राजनीति में जब भी केसरिया या नारंगी रंग की बात आती है, एक खास राजनीतिक वर्ग में असहजता साफ दिखने लगती है। आगामी हॉकी विश्व कप 2026 के लिए भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीमों की नई जर्सी लॉन्च हुई है। पारंपरिक नीले रंग की जगह इस बार नारंगी रंग को प्राथमिक किट के रूप में चुना गया है। हॉकी इंडिया के अध्यक्ष और पूर्व दिग्गज खिलाड़ी दिलीप तिर्की ने स्पष्ट किया कि नीले टर्फ पर नीले रंग की जर्सी के कारण विजिबिलिटी (दृश्यता) की व्यावहारिक समस्या आ रही थी और यह सुझाव सीधे खिलाड़ियों एवं कोचिंग स्टाफ की तरफ से आया था। इसके बावजूद, सुदीर्घ अनुभव रखनेवाले राजनीतिक दल के नेताओं और उनके समर्थकों ने इसे लेकर एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा करने का प्रयास किया है। हिन्दू पहचान से चिढ़ने वाले नेताओं का यह बयान आया है कि “देश की पहचान अहिंसा, सत्य और भाईचारे से जुड़ी है और इन्हें बदला नहीं जा सकता”। यह बयान इस बात का प्रमाण है कि कैसे एक विशुद्ध रूप से तकनीकी और खेल संबंधी फैसले को जबरन वैचारिक संघर्ष में घसीटा जा रहा है।