मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

कांग्रेस अधिवेशन में डॉ. हेडगेवार ने रखा पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव

संघ शताब्दी वर्ष : संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने कांग्रेस में शामिल होकर राजनीतिक आंदोलन में भी बढ़-चढ़कर भाग लिया था


यह प्रतीकात्मक चित्र AI से निर्मित है।

नागपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में लोकमान्य तिलक का बहुत प्रभाव था। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार प्रारंभ से ही तिलक जी को आदर्श राजनेता और स्वतंत्रतासेनानी के तौर पर देखते थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नागपुर इकाई में तिलक के समर्थकों का प्रभाव था, उन्होंने मिलकर अलग से ‘राष्ट्रीय मंडल’ भी बना रखा था। इस राष्ट्रीय मंडल की ओर से नागपुर में राजनीतिक गतिविधियों का आयोजन किया जाता, जिनमें डॉ. हेडगेवार भी हिस्सा लेते थे। एक ओर जहाँ अन्य कांग्रेसी नेता एवं कार्यकर्ता ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत एक स्वतंत्र औपनिवेशिक राज्य की माँग करते थे, वहीं डॉ. हेडगेवार इकलौते थे जो पूर्ण स्वराज्य की माँग को आगे बढ़ाते थे। डॉक्टर जी अपने भाषणों से युवाओं के मन में पूर्ण स्वतंत्रता की भावना को प्रज्वलित कर रहे थे। बहुत कम समय में डॉ. हेडगेवार नागपुर कांग्रेस के प्रमुख नेता बन गए। कांग्रेस की नागपुर शहर इकाई के संयुक्त सचिव की जिम्मेदारी डॉक्टर साहब के पास आ गई थी। वर्ष 1919 में कांग्रेस के अधिवेशन में भी शामिल होने डॉक्टर साहब अमृतसर भी गए और वहाँ उन्होंने जलियांवाला बाग की मिट्टी को माथे से लगाकर देश को अंग्रेजों के अत्याचार से मुक्त कराने के अपने संकल्प को और दृढ़ किया। 

कांग्रेस का 35वां अधिवेशन 1920 में नागपुर में होना तय था। सबके मन में था कि इस अधिवेशन की अध्यक्षता लोकमान्य तिलक से करायी जाएगी। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। 31 जुलाई, 1920 की रात में तिलक जी का निधन हो गया। तिलक समर्थकों के सामने प्रश्न था कि अब अधिवेशन की अध्यता कौन करेगा? तब डॉक्टर साहब ने श्री अरविंद घोष को अधिवेशन का अध्यक्ष बनाए जाने का प्रस्ताव रखा, जिसे स्वीकार कर लिया गया। डॉ. बालकृष्ण शिवराम मुंजे और डॉ. हेडगेवार, दोनों श्री अरविंद से मिलने के लिए पुदुच्चेरी (पूर्व में पांडिचेरी) गए। दोनों ने उन्हें सक्रिय राजनीति में लौटने एवं कांग्रेस की कमान संभालने के लिए मनाने का प्रयास किया परंतु संन्यासी जीवन व्यतीत कर रहे श्री अरविंद ने विनम्रतापूर्वक उनके प्रस्ताव को इनकार कर दिया। बार-बार आग्रह के बाद श्री अरविंद ने डॉ. मुंजे को 30 अगस्त 1920 को पत्र लिखकर अपनी असमर्थता व्यक्त की। डॉ. हेडगेवार ने लोगों से श्री अरविंद घोष को पत्र एवं टेलीग्राम भेजकर अपने निर्णय पर पुनर्विचार का आग्रह करने के लिए प्रेरित किया। तब उन्होंने 20 सितंबर 1920 को टेलीग्राम द्वारा जवाब दिया-‘पुनर्विचार असंभव है’। यानी अब पूरी तरह स्पष्ट हो गया था कि श्री अरविंद के स्थान पर अन्य किसी विकल्प पर विचार करना होगा। 

प्रांतीय कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए विजयराघवाचार्य, चित्तरंजन दास, मुहम्मद अली और क्रांतिकारी श्यामसुंदर चक्रवर्ती के नामों पर भी विचार किया जा रहा था। इनमें से विजयराघवाचार्य के नाम पर पंजाब, बिहार, दिल्ली, मध्यप्रांत, मद्रास, मुंबई और संयुक्त प्रांत ने अपना भारी समर्थन जताया। यहाँ तक कि डॉ. मुंजे भी उन्हीं के पक्ष में थे। परंतु, डॉ. हेडगेवार इस नाम से बिल्कुल सहमत नहीं थे। 10 अक्टूबर 1920 को नागपुर में स्वागत समिति की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई, जिसमें पूरे प्रांत के लगभग 550 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इस बैठक में डॉ. हेडगेवार ने विजयराघवाचार्य की उम्मीदवारी का कड़ा विरोध किया। अपने विरोध का कारण स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि “जब जलियांवाला बाग नरसंहार की बर्बरता के कारण पूरा देश ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ भारी आक्रोश में डूबा था, ठीक उसी वक्त विजयराघवाचार्य मद्रास के राज्यपाल के निमंत्रण पर उनकी ‘चाय पार्टी’ में शामिल हो रहे थे”। भरी सभा में डॉ. हेडगेवार ने एक चुभता हुआ सवाल किया- “जो व्यक्ति देश की जनभावनाओं और साम्राज्यवाद के क्रूर चरित्र को ही नहीं समझता, वह भला कांग्रेस का अध्यक्ष कैसे हो सकता है?” हालांकि, डॉक्टर जी का विरोध काम नहीं आया। डॉ. मुंजे के प्रभाव के कारण विजयराघवाचार्य को अध्यक्ष चुन लिया गया। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि डॉ. हेडगेवार के पक्ष में स्वागत समिति के युवा सदस्यों ने समर्थन किया, जो उनके प्रभाव को रेखांकित करता है। उनके समर्थन में कई समाचार पत्रों ने संपादकीय लिखे। मुंबई में प्रकाशित ‘संदेश’ ने विजयराघवाचार्य के नाम पर बहुमत होने को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए लिखा था- “एक अयोग्य व्यक्ति कांग्रेस का अध्यक्ष हो गया”।

बहरहाल, जब विजयराघवाचार्य अध्यक्ष निर्वाचित हो गए, तो डॉ. हेडगेवार ने अपनी शंकाओं को अधिवेशन की तैयारी में अवरोध नहीं बनने दिया। डॉ. हेडगेवार और डॉ. परांजपे को प्रतिनिधियों के भोजन तथा रहने की व्यवस्था का दायित्व सौंपा गया। उन्होंने इस कार्य को कुशलता से संपादित करने के लिए लगभग 1200 स्वयंसेवकों की भर्ती एवं प्रशिक्षण देने का कार्य किया। नागपुर अधिवेशन अब तक का सबसे बड़ा अधिवेशन था। इसमें तीस हजार लोगों ने भाग लिया था, जिसमें बीस हजार प्रतिनिधि थे। डॉ. हेडगेवार एक सफल संगठनकर्ता के रूप में सामने आए। देशभर से आए प्रतिनिधि भोजन और आवास की व्यवस्थाएं देखकर आश्चर्यचकित थे। 

इस अधिवेशन में विषय समिति की बैठक में डॉ. हेडगेवार ने एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया। इस प्रस्ताव में कहा गया था कि “कांग्रेस का उद्देश्य भारतीय गणतंत्र की स्थापना करना एवं पूंजीवादी अत्याचार से राष्ट्रों को मुक्त कराना है”। डॉ. हेडगेवार ने कांग्रेस के बड़े नेताओं से आग्रह किया कि अधिवेशन में इस प्रस्ताव को पारित किया जाए, जो पूर्ण स्वराज्य की माँग करता है। लेकिन, तब तक कांग्रेस के नेतृत्व में पूर्ण स्वराज्य को लेकर कोई स्पष्टता नहीं थी। इसलिए यह प्रस्ताव खारिज कर दिया गया। मॉडर्न रिव्यू ने प्रस्ताव को खारिज करने के निर्णय की आलोचना की। इस समाचारपत्र ने यह भी लिखा कि नागपुर कांग्रेस स्वागत समिति में ‘रिपब्लिकन’ चरित्र वाले लोग विद्यमान हैं। उल्लेखनीय है कि डॉ. हेडगेवार ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को विश्व के सभी पीड़ित, शोषित एवं साम्राज्यवादी शिकंजे में आए राष्ट्रों से जोड़ने का प्रयास किया था। इस घटनाक्रम से उनके दृष्टिकोण की विशालता का पता भी चलता है। 

नागपुर अधिवेशन के बाद डॉ. हेडगेवार प्रांत के महत्वपूर्ण नेताओं में गिने जाने लगे थे। कैसा अनूठा संयोग है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के एक सप्ताह पूर्व डॉ. हेडगेवार एवं उनके सहयोगी हरेकृष्ण (आप्पाजी) जोशी प्रांतीय कांग्रेस समिति के लिए चुने गए थे। डॉक्टर साहब को संयुक्त सचिव नियुक्त किया गया। तब से लेकर 1928 के अंत तक डॉ. हेडगेवार प्रांतीय कांग्रेस समिति से जुड़े रहे। डॉ. हेडगेवार का प्रांतीय कांग्रेस के कार्यक्रमों के निर्धारण एवं कार्यान्वयन में महत्त्वपूर्ण योगदान होता था। अंग्रेज सरकार भारतीय सेना को चीन भेज रही थी। इसके विरोध में 30 जनवरी 1927 को नागपुर शहर कांग्रेस ने जनसभा बुलाई। इस सभा में सरकार के इस कदम के खिलाफ एक कड़ा प्रस्ताव पास किया गया। प्रस्ताव की रूपरेखा डॉ. हेडगेवार ने तैयार की थी और इसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता ल. वा. परांजपे ने सभा के सामने प्रस्तुत किया था। प्रस्ताव के माध्यम से देश के सभी नागरिकों से अपील की गई थी कि “सरकार अपने सैन्य स्वार्थों के लिए भारतीयों का जो इस्तेमाल कर रही है, हम सबको मिलकर उसका डटकर विरोध करना चाहिए। इस विरोध के लिए जन-प्रदर्शन, प्रचार-प्रसार और निंदा प्रस्तावों जैसे सभी उचित तरीकों का सहारा लिया जाना चाहिए”। कहना होगा कि राजनीतिक क्षेत्र में भी डॉ. हेडगेवार प्रखर सोच के साथ सक्रिय रहे। भारत की पूर्ण स्वतंत्रता ही उनके मन-मस्तिष्क में थी। उसके लिए ही वे दिन-रात प्रयत्न करते थे।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 05 अप्रैल, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

संघ की वैचारिक यात्रा का ऐतिहासिक दस्तावेज ‘आरएसएस @100’

जनसंचार के सरोकारों को समर्पित पत्रिका 'मीडिया विमर्श' का संघ शताब्दी वर्ष विशेषांक 

- पुरु शर्मा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्ष की यात्रा पूरी होने पर देशभर में संघ की विचारधारा, उसकी उपलब्धियों एवं योगदान को लेकर चर्चा है। ऐसे में ‘मीडिया विमर्श’ का विशेषांक ‘आरएसएस@100’ का आना महत्वपूर्ण है। मीडिया विमर्श का यह विशेषांक संघ से संबंधित सामयिक एवं चर्चित विषयों पर प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध कराता है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक एवं लेखक डॉ. लोकेन्द्र सिंह इसके अतिथि संपादक हैं। संघ विषयों पर वे निरंतर लिखते हैं। संघ पर केंद्रित उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें- संघ दर्शन : अपने मन की अनुभूति और राष्ट्रध्वज एवं आरएसएस भी उल्लेखनीय हैं। डॉ. सिंह के कुशल संपादन में तैयार मीडिया विमर्श का विशेषांक संघ की एक सदी की यात्रा को केवल एक संगठन के इतिहास के रूप में नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण की गाथा के रूप में प्रस्तुत करता है। यह विशेषांक उन सबके लिए उपयोगी है, जो संघ को जानना-समझना चाहते हैं। कहना होगा कि यह एक संदर्भ ग्रंथ की भाँति है।

रविवार, 29 मार्च 2026

“मेरा यह जीवन देश सेवा के लिए समर्पित”

संघ शताब्दी वर्ष : संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार अनुशीलन समिति के प्रमुख क्रांतिकारी थे, उन्होंने आजन्म भारतमाता की सेवा करने की प्रतिज्ञा की

यह चित्र Google Gemini AI से निर्मित है।

ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए कोलकाता से बड़े पैमाने पर क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन हो रहा था। एक प्रकार से कोलकाता क्रांतिकारियों के लिए ‘काशी’ बन गया था। केशव बलिराम हेडगेवार के मन में भी एक ज्वार था- क्रांतिकारी बनकर भारत माता को ब्रितानी हुकूमत की बेढ़ियों से स्वतंत्र करना है। डॉक्टर साहब की जीवनी लिखने वाले सीपी भिशिकर लिखते हैं कि वंदेमातरम आंदोलन के समय से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में उनका मन रमने लगा था। मैट्रिकुलेशन की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने ठान लिया था कि कोलकाता जाकर मेडिकल की पढ़ाई करेंगे और वहीं क्रांतिकारी गतिविधियों में जुड़ जाएंगे। नागपुर के राष्ट्रभक्त महापुरुष भी यही चाहते थे कि केशव कोलकाता जाएं, क्रांतिकारियों से संपर्क जोड़ें और लौटकर पश्चिम भारत में क्रांतिकारी आंदोलन को संगठित करें। क्रांतिकारी रामलाल वाजपेयी ने भी अपने जीवन चरित्र में इस घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है कि “उनको कलकत्ता भेजने का असली मकसद क्रांतिकारी संगठन संबंधी जानकारी प्राप्त करना एवं मध्यप्रांत और बंगाल के बीच सेतु का काम करना था”। केशव हेडगेवार जब कलकत्ता पहुँचे तब क्रांतिकारियों पर अंग्रेजी दमन का दौर चल रहा था। सरकार राष्ट्रद्रोही सभा अधिनियम-1907, आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम-1908 और इंडियन प्रेस एक्ट-1910 के द्वारा क्रांतिकारी पत्रों, संगठनों एवं व्यक्तियों को दंडित करने, प्रतिबंधित करने एवं उन पर मुकदमा चलाने का कार्य कर रही थी। परंतु, यह दमनचक्र प्रखर क्रांतिकारी केशव बलिराम हेडगेवार के इरादों को कहाँ डिगा सकता था।

रविवार, 22 मार्च 2026

यूनियन जैक को उखाड़ फेंकने के लिए खोद दी सुरंग

संघ शताब्दी वर्ष : जन्मजात देशभक्त थे संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार

यह चित्र AI प्लेटफॉर्म Google Gemini से निर्मित है।

कहते हैं कि पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करने वाले महापुरुष डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का बचपन भी कुछ ऐसा ही था, जो स्पष्ट संकेत देता था कि यह बालक बड़ा होकर भारत के नवनिर्माण की नींव रखेगा। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को ‘जन्मजात देशभक्त’ ऐसे ही नहीं कहा जाता है। उनके बचपन के अनेक प्रसंग मिलते हैं, जो उनकी देशभक्ति की केसरिया छाप को दर्शाते हैं। 13 वर्ष की उम्र में केशव ने प्लेग की महामारी में अपने माता-पिता को खो दिया। इस प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी केशव ने स्वयं को संभाले रखा। उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और क्रांति के मार्ग पर कदम बढ़ाते गए। स्कूल के दिनों में ही उनकी प्रखर देशभक्ति की मुखर अभिव्यक्ति होने लग गई थी। जीवन के संघर्ष में तपकर निखरे केशव बचपन में ही बड़ों की भाँति परिपक्व हो गए थे। 1901 में जब किंग एडवर्ड-सप्तम इंग्लैंड की राजगद्दी पर बैठे, तब नागपुर में एम्प्रेस मिल के मालिकों ने खुशी में आतिशबाजी का कार्यक्रम रखा। लगभग पूरा शहर इस आतिशबाजी को देखने के लिए एकत्रित हुआ। बच्चों को तो आतिशबाजी वैसे ही बहुत आकर्षित करती है। बड़ी संख्या में बच्चे भी आतिशबाजी का लुत्फ उठाने के लिए आए थे। लेकिन, जब केशव से आतिशबाजी देखने चलने का आग्रह किया गया तो उन्होंने अपने मित्रों से कहा- “यह शर्म की बात है कि हम एक विदेशी शासक की ताजपोशी पर जश्न मनाएं; मैं यह आतिशबाजी देखने नहीं जाऊंगा”।

बुधवार, 18 मार्च 2026

आरएसएस के साथ आई समाज की सज्जनशक्ति

सर्वव्यापी-सर्वस्पर्शी कार्य : संघ शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों में समाज का सहयोग और सहभागिता ने स्वयंसेवकों का बढ़ाया उत्साह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शताब्दी वर्ष पर कोई बड़ा उत्सव आयोजित न करके छोटे-छोटे स्थानों (मंडल/बस्ती) पर कार्यक्रमों का आयोजन किया, ताकि संघ कार्य का व्याप बढ़े। शताब्दी वर्ष के निमित्त संघ ने मुख्य रूप से दो प्रकार के कार्यक्रमों की व्यापक योजना बनाई है। इनमें पहला उद्देश्य संगठन का विस्तार करना है, जबकि दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य समाज की सज्जन शक्ति को सद्भाव और समरसता के सूत्र में पिरोकर राष्ट्र निर्माण के लिए संगठित करना है। इस ऐतिहासिक अवसर पर आयोजित संघ के कार्यक्रमों में समाज का जो अभूतपूर्व और भरपूर साथ मिल रहा है, वह संगठन की राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता का प्रमाण है। कहना होगा कि कई कार्यक्रमों का नेतृत्व तो समाज ने ही किया, संघ की शक्ति तो उनकी सहयोगी बनी। विशेष रूप से हिन्दू सम्मेलनों का आयोजन समाज की सज्जनशक्ति ने आगे रहकर किया।

सोमवार, 16 मार्च 2026

अनूठा जन्मदिन : पुस्तकों से तौले गए 8 वर्षीय मारुति

भोपाल में 8 वर्षीय बालक मारुति का जन्मदिन अनूठे ढंग से मनाया गया। पूरे उत्सव में भारतीय संस्कृति की गहरी झलक दिखाई दी। मारुति के माता-पिता और दादा-दादी ने भारतीय पद्धति के अनुसार जन्मदिन की योजना बनाई। इस उत्सव को सार्थक स्वरूप देते हुए 'पुस्तक-तुला' का आयोजन किया गया, जिसमें मारुति को पुस्तकों से तौला गया। ​तराजू के एक पलड़े में मारुति को बैठाया गया और दूसरे पलड़े में पुस्तकें रखी गईं। जो भी अतिथि आए थे, वे अपने साथ लाई गई पुस्तकें या वहां उपलब्ध पुस्तकों को दूसरे पलड़े में तब तक रखते गए, जब तक मारुति का पलड़ा ऊपर नहीं उठ गया। इस अवसर पर कई सामाजिक कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे। परिवार 'पुनरुत्थान विद्यापीठ' से जुड़ा हुआ है और इस प्रकार जन्मदिन मनाने की प्रेरणा उन्हें वहीं से प्राप्त हुई। मारुति की शिक्षा भी पुनरुत्थान विद्यापीठ के गुरुकुल में चल रही है।

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

'जादूगरनी' - जीवन, प्रेम और रिश्तों की खूबसूरत अभिव्यक्ति

वीडियो देखें : क्या एक कविता जीवन बदल सकती है?


“जब कोई कविता किसी मरते हुए को जीन का सहारा दे जाए तो वह जादूगरनी होती है”। युवा कवि सुदर्शन व्यास ने अपने नये काव्य संग्रह का नामकरण इसी भाव के साथ किया है- जादूगरनी। सच है, कविताओं में वह जादू होता है कि वे बड़े परिवर्तन की संवाहक बनती हैं। दुनिया के कितने ही बड़े आंदोलनों का आधार कविता ही बनी है। भारत के स्वाधीनता संग्राम में क्रांतिकारियों और स्वतंत्रतता सेनानियों का बीज मंत्र ‘वंदेमातरम’ भी काव्य है। ऐसा काव्य जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में नये सिरे से प्राण फूंक दिए। भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण का जीवन दर्शन काव्य के रूप में ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बहता आया है। कविता के महत्व एवं हमारे जीवन में उसकी उपस्थिति पर कवि ने उचित ही लिखा है कि “मनुष्यता के सबसे बड़े शोक में भी कविता गायी जाती है और सबसे बड़ी खुशी में भी कविता होती है। कविता हमारे जीवन का आधार है और जब कोई कविता किसी मरते हुए को जीने का सहारा दे जाए तो वह जादूगरनी होती है”।