शनिवार, 27 जून 2026

सुशासन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है हिन्दू साम्राज्य दिवस

ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी वह तिथि है, जिसने भारत के भाग्य का निर्धारण किया, इसी दिन छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की घोषणा की 

छत्रपति शिवाजी महाराज भारतीय इतिहास के ऐसे अद्वितीय नायक हैं जिन्हें न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य की अनेक पीढ़ियाँ भी स्मरण करेंगी। इसका मुख्य कारण यह है कि उन्होंने उस युग में, जब आक्रांताओं के अत्याचारों से भारतीय समाज शिथिल हो चुका था, तब हिन्दू समाज में उन्होंने एक नई चेतना जगाई। उसके भीतर विश्वास जगाया कि भारत में स्वराज्य की फिर से स्थापना हो सकती है, जहाँ सब स्वतंत्रता और स्वाभिमान के साथ जी सकते हैं।

उल्लेखनीय है कि उस कालखंड में विदेशी आक्रमणकारियों ने जबरन धर्मांतरण, सांस्कृतिक विनाश और धार्मिक स्थलों का विध्वंस कर भारतीय सभ्यता को नष्ट करने का प्रयास किया। भारत के स्वाभिमान को झुकाने का प्रयास किया। ऐसी स्थिति में छत्रपति शिवाजी महाराज ने एक शक्तिशाली हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना कर इन विघटनकारी शक्तियों को परास्त किया। हिन्दू साम्राज्य की स्थापना करके छत्रपति शिवाजी महाराज ने दुनिया को संदेश दिया कि भारत में हिन्दुओं का राज्य है।

देखें यह वीडियो : छत्रपति शिवाजी महाराज कि 'स्व'-राज नीति

हम आज भी हिन्दू साम्राज्य दिवस को क्यों मनाते हैं? हिन्दू साम्राज्य के स्मरण से हमें ध्यान आता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने भारत के स्व को केन्द्र में रखकर राज्य की नीतियां बनायीं। अपने संघर्ष के दौरान उन्होंने न केवल सैन्य दृष्टि से अद्वितीय रणनीतियाँ अपनाईं, बल्कि प्रशासन, कृषि, भाषा, मुद्रा और धार्मिक व्यवस्था में भी भारतीय सनातन परंपराओं के अनुरूप दूरदर्शी सुधार किए। उनका शासन केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं था, बल्कि वह भारतीय आत्मगौरव, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और धर्मरक्षा का प्रतीक बन गया।

छत्रपति शिवाजी महाराज ने प्रशासनिक भाषा में से अरबी-फारसी के शब्दों को निकालकर स्वभाषा के गौरव को स्थापित किया। प्रशासनिक व्यवस्था में मुगलों की बनायी व्यवस्थाओं को खत्म कर स्वराज्य की नई व्यवस्थाएं खड़ी कीं। कृषि में सुधार भी किसानों के हितों को ध्यान में रखकर किए। राज्य के सुचारू संचालन के लिए अष्टप्रधान मंडल का गठन किया, जिसका वर्णन भारतीय आख्यानों में भी आता है। अर्थव्यवस्था में भी आमूलचूल परिवर्तन किए। मुगलों की मुद्राएं बंद करके, स्वराज्य के सिक्के जारी किए। समुद्री सीमाओं को सुरक्षित किया। तोपखाना एवं नौसेना के गठन में स्वदेशी को अधिक महत्व दिया। 

हिन्दवी स्वराज्य की नींव एवं विस्तार के केन्द्र में स्वबोध था, इसलिए हम उनके राज्य से आज भी प्रेरणा लेते हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार जदुनाथ सरकार लिखते हैं कि “शिवाजी के राजनीतिक आदर्श ऐसे थे जिन्हें हम आज भी बिना किसी परिवर्तन के स्वीकार कर सकते हैं। उनका उद्देश्य था अपनी प्रजा को शांति देना, सभी जातियों और धर्मों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना, एक कल्याणकारी, सक्रिय और निष्पक्ष प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करना, व्यापार को बढ़ावा देने के लिए नौसेना का विकास करना, और मातृभूमि की रक्षा के लिए एक प्रशिक्षित सेना तैयार करना”। 


हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की घोषणा और छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक, ये भारतीय इतिहास की असाधारण घटनाएं हैं। इन घटनाओं ने भारत की तस्वीर को बदल दिया। हिन्दू साम्राज्य की स्थापना से पहले आम धारणा थी कि मुगल साम्राज्य ही भारत की संप्रभुता का प्रतीक है। मुगलों के साथ होने वाली संधियों को भारत के साथ की गई संधियाँ माना जाता था।  

छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके मंत्रियों ने लंबे समय से यह महसूस किया था कि राजा के रूप में राज्याभिषेक न होने के व्यावहारिक नुकसान हैं। यह सच है कि उन्होंने कई क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की थी और काफी संपत्ति इकट्ठा की थी; उनके पास एक मजबूत सेना और नौसेना थी और वे स्वतंत्र शासक की तरह समाज हित के निर्णय लेते थे। लेकिन उस समय के अन्य राजाओं और मुगल बादशाह के लिए वे केवल एक जमींदार थे; आदिलशाह के लिए वे एक जागीरदार के विद्रोही पुत्र थे। 

इस मानसिकता को तोड़ने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज राज्याभिषेक के लिए तैयार हुए। अपने राज्याभिषेक के साथ ही महाराज ने हिन्दू पदपादशाही और हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की घोषणा भी कर दी। यानी अब भारत में केवल मुगलों का नहीं अपितु हिन्दुओं का भी राज्य है। भारत की प्राचीन और सम्मानित परंपरा के अनुसार छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक सम्पन्न हुआ था। छत्रपति शिवाजी महाराज दूरदृष्टा थे, उन्हें मालूम था कि उनके बाद हिन्दवी स्वराज्य का विस्तार तभी हो सकता है, जब उसकी वैधता हो। इसलिए भी औपचारिक रूप से सिंहासनारूढ़ होकर हिन्दू साम्राज्य को वैधता प्रदान की।

छत्रपति शिवाजी महाराज ऐसे नायक थे, जिन्होंने अपने सपने को अपने साथियों के हृदय में जैसा का तैसा उतार दिया। यही कारण रहा कि उनके जाने के बाद भी हिन्दवी स्वराज्य का सपना मरा नहीं, अपितु और अधिक पल्लवित-पुष्पित हुआ। एक महान नायक की हृदय भूमि पर अंकुरित हुए बीज ने विशाल वटवृक्ष का रूप धरकर भारत को उसकी पहचान लौटाई। उनके जाने के बाद हिन्दवी स्वराज्य के योद्धाओं ने भगवा परचम को संपूर्ण भारत पर फहरा दिया था। 



शुक्रवार, 26 जून 2026

ऑस्ट्रेलिया के बाद ब्रिटेन में भी लगाई गई ‘फादर ऑफ सर्जरी’ महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा

भारत की ज्ञान-परंपरा की प्रतिष्ठा : भारत के ज्ञान-विज्ञान की वैश्विक स्वीकृति, प्रत्येक भारतीय के लिए है गर्व की बात

स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग स्थित दुनिया के सबसे पुराने ‘रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स’ में महर्षि सुश्रुत की भव्य प्रतिमा का स्थापित होना हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। अब जरा कल्पना कीजिए कि यदि महर्षि सुश्रुत की यह प्रतिमा स्कॉटलैंड या मेलबर्न के बजाय भारत के एम्स या किसी अन्य प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में स्थापित की जाती, तो क्या होता? यह तय है कि देश के स्वघोषित प्रगतिशील बुद्धिजीवियों, वामपंथी विचारकों और लिबरल जमात के बीच एक भारी ‘हाय-तौबा’ मच जाती। इसे ‘शिक्षा के भगवाकरण’, ‘विज्ञान में धर्म के हस्तक्षेप’ और ‘अंधविश्वास को बढ़ावा देने’ का नाम दे दिया जाता। यह मानसिकता भारत के उस बौद्धिक वर्ग की सबसे बड़ी त्रासदी है, जो अभी तक ‘औपनिवेशिक हैंगओवर’ से बाहर नहीं आ पाया है। इस वर्ग की समस्या यह है कि वे ‘भारतीय ज्ञान-परंपरा’ को केवल कर्मकांडों और मिथकों के चश्मे से देखते हैं। उनका पैमाना यह बन गया है कि जो कुछ भी प्राचीन भारत का है, वह अवैज्ञानिक है; और जो कुछ भी पश्चिम से आता है, वही परम सत्य है। जब तक कोई विदेशी संस्थान या विदेशी वैज्ञानिक हमारे प्राचीन ज्ञान पर अपनी मुहर नहीं लगाता, तब तक हमारे अपने बुद्धिजीवी उसे सिरे से खारिज करते रहते हैं। 

एडिनबर्ग में सुश्रुत की प्रतिमा स्थापित होना कई अर्थों में महत्वपूर्ण है- यह भारत की ज्ञान-परंपरा के प्रति वैश्विक स्वीकृति को रेखांकित करती है और भारत के तथाकथित प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को आँखें खोलने का अवसर भी देती है। याद करें कि भारतबोध से अनुप्राणित बुद्धिजीवी जब यह कहते हैं कि एक समय में भारत में विज्ञान का उज्ज्वल सूर्य चमकता था, तब औपनिवेशिक मानसिक दासता से घिरे बुद्धिजीवी इसे कपोल कल्पनाएं कहकर खारिज करने में अपनी ऊर्जा लगाता था। ऐसे लोगों को अवश्य देखना चाहिए कि कैसे विश्व भारत की ज्ञान-परंपरा को स्वीकार कर रहा है। 

उल्लेखनीय है कि ब्रिटेन पहला देश नहीं है, जहाँ महर्षि सुश्रुत को ‘शल्य चिकित्सा के जनक’ (फादर ऑफ सर्जरी) के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। इससे पहले ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में स्थित ‘रॉयल ऑस्ट्रेलियन कॉलेज ऑफ सर्जन्स’ के मुख्यालय में भी महर्षि सुश्रुत की भव्य संगमरमर की प्रतिमा ‘फादर ऑफ सर्जरी’ के रूप में स्थापित की जा चुकी है। यह सुखद है कि इन वैश्विक और प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों ने बिना किसी हिचकिचाहट के महर्षि सुश्रुत को ‘फादर ऑफ सर्जरी’ के रूप में मान्यता दी है। इससे हमारे अन्य वैज्ञानिक ऋषियों के विज्ञान क्षेत्र में किए गए योगदान की वैश्विक स्वीकृति का मार्ग भी बनेगा। 

जब दुनिया के बड़े हिस्से में चिकित्सा विज्ञान का जन्म भी नहीं हुआ था, तब काशी की धरती पर महर्षि सुश्रुत ने ‘सुश्रुत संहिता’ के रूप में आधुनिक विज्ञान और आयुर्वेद की एक मजबूत नींव रख दी थी। आज अंग प्रत्यारोपण और जटिल सर्जरी भले ही आधुनिक विज्ञान के चमत्कार लगते हों, लेकिन महर्षि सुश्रुत ने लगभग 2500 साल पहले ही इसके सिद्धांत दे दिए थे। एनसीबीआई पर मौजूद शोध भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि महर्षि सुश्रुत ने उस दौर में 1120 खास बीमारियों का विस्तार से वर्णन किया था। उन्होंने दुनिया को 101 धार रहित और 20 पैने सर्जिकल उपकरणों का ज्ञान दिया।

आज दुनिया भर में करोड़ों लोग डायबिटीज (मधुमेह) से जूझ रहे हैं। यह जानकर आश्चर्य होता है कि 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व में महर्षि सुश्रुत ने इसे ‘मधुमेह’ (शहद जैसा पेशाब) का नाम दिया था। उन्होंने केवल इसके लक्षण (पेशाब का मीठा और चिपचिपा होना, चींटियों का आकर्षित होना) ही नहीं बताए, बल्कि इसके मूल कारणों को भी स्पष्ट किया। उन्होंने लिखा कि यह बीमारी अत्यधिक चावल, मिठाई और अनाज के सेवन से होती है और मुख्य रूप से सुविधा संपन्न वर्ग को अपना शिकार बनाती है। यह आज के आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की ‘जीवनशैली आधारित बीमारी’ की अवधारणा का शत-प्रतिशत प्राचीन स्वरूप है।

विज्ञान और विरासत का मेल जरूरी :

किसी भी देश का भविष्य तभी मजबूत होता है जब उसकी जड़ें उसके इतिहास में गहराई तक धंसी हों। प्राचीन भारतीय ज्ञान का सम्मान करने का अर्थ आधुनिक विज्ञान को नकारना नहीं है, बल्कि उस वैज्ञानिक चेतना को पहचानना है जो हमारी सभ्यता का हिस्सा रही है। स्कॉटलैंड और मेलबर्न के संस्थानों ने सुश्रुत की प्रतिमा लगाकर कोई धार्मिक कार्य नहीं किया है, बल्कि उन्होंने चिकित्सा विज्ञान के विकास-क्रम के एक ऐतिहासिक सत्य को स्वीकार किया है। यह भारत के उन आलोचकों के लिए एक सबक है जो अपनी ही वैज्ञानिक विरासत का उपहास उड़ाने में बौद्धिकता तलाशते हैं। समय आ गया है कि भारत का बौद्धिक समाज अपनी हीन भावना से बाहर निकले। हमें अपनी प्राचीन वैज्ञानिक उपलब्धियों को केवल इतिहास की किताबों या श्लोकों तक सीमित रखने के बजाय, उन पर गर्व करना और उन्हें आधुनिक संदर्भों में परखना सीखना होगा। यदि विदेशी सर्जन हमारे ‘फादर ऑफ सर्जरी’ को अपना सकते हैं, तो हमें अपनी ही ज्ञान-परंपरा पर गर्व करने में संकोच क्यों होना चाहिए?

बुधवार, 24 जून 2026

संविधान हत्या दिवस : इतिहास से सीखकर संविधान की रक्षा का संकल्प दिवस

लोकतंत्र और संविधान के महत्व को समझने के लिए 25 जून की तारीख बहुत महत्वपूर्ण है। भारत सरकार ने 25 जून को 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में मनाने की अधिसूचना जारी की है। दरअसल, 1975 में 25 जून को ही देश पर आपातकाल थोप दिया गया था। जिसके कारण रातों-रात आम नागरिकों के मौलिक अधिकार छीन लिए गए थे, मीडिया की स्वतंत्रता पर ताले जड़ दिए गए थे, और सवाल पूछने पर लोगों को बिना किसी अपील और दलील के जेल में डाल दिया गया था।

'संविधान हत्या दिवस' मनाने का उद्देश्य किसी पुरानी पीड़ा को कुरेदना नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों को याद दिलाना है कि जब संविधान की रक्षा नहीं होती, तो लोकतंत्र कैसे तानाशाही में बदल जाता है। यह दिन एक चेतावनी है और एक संकल्प भी, कि हम दोबारा अपने देश में ऐसा अंधकार कभी नहीं आने देंगे।

पाकिस्तान की गीदड़ भभकियां

पाकिस्तान के बड़बोले रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने सिंधु नदी का पानी नहीं मिलने पर भारत पर हमला करने की धमकी दी है, उनका यह बयान पाकिस्तान की गहरी निराशा और बौखलाहट को ही दर्शाता है। इस समय पाकिस्तान अनेक प्रकार की आंतरिक चुनौतियों से घिरा हुआ है। इसलिए वह अपने देश की आवाम का ध्यान भटकाने के लिए कभी परमाणु बम की धमकी देते हैं तो कभी कभी जल युद्ध की हुंकार भरते हैं। दुनिया जानती है कि यह पाकिस्तान की गीदड़ भभकियां हैं। जो देश ऑपरेशन सिंदूर से घबराकर अमेरिका के चरणों में जाकर भारत से बचाने की गुहार लगा चुका हो, उसे इस प्रकार की बातें शोभा नहीं देती हैं। गीदड़ भभकी देने वाले पाकिस्तान को भी पता है कि यह नया भारत है, जो अपने नुकसान की कीमत ब्याज सहित वसूल करता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत केवल रक्षात्मक रुख नहीं अपनाता बल्कि आक्रामक जवाब देना भी जानता है।

सोमवार, 22 जून 2026

करोड़ों देशभक्त नागरिकों के दिलों में है आरएसएस का पंजीयन

संघ शताब्दी वर्ष : भारत का संविधान अपने नागरिकों को संगठन, आंदोलन, विचार समूह बनाने का अधिकार देता है। इसके लिए राज्य से पंजीकरण कराना अनिवार्य नहीं है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पंजीकृत क्यों नहीं है? यह अपने आय-व्यय का हिसाब-किताब क्यों नहीं देता है? आरएसएस पारदर्शिता नहीं रखता है। ये ऐसे सवाल हैं, जो संघ को बदनाम करने या उसके प्रति समाज में संदेह पैदा करने के लिए अकसर उछाले जाते हैं। हालांकि, इन सवालों का कोई औचित्य नहीं है। समाज से लेकर न्यायालय तक इन्हें खारिज कर चुके हैं। मजेदार और हास्यास्पद बात यह है कि जो लोग संविधान लहराते हुए घूम रहे हैं, उन्हें यह भी नहीं पता है कि संविधान ही यह अधिकार देता है कि भारत के नागरिक बिना किसी पंजीयन के संगठन, समिति, समूह बनाकर समाज में काम कर सकते हैं। इसलिए कहा जाता है कि संविधान लहराने की वस्तु नहीं है, अपितु उसका अध्ययन करना चाहिए और पालन भी। लेकिन नहीं, उन्हें तो प्रोपेगेंडा खड़ा करने में ही आनंद आता है। जरा सोचिए, यदि आरएसएस के लिए पंजीयन अनिवार्य होता तब क्या कांग्रेस बिना पंजीयन संघ को इतने वर्ष चलने देती? कांग्रेस की सरकारों ने संघ को तीन बार प्रतिबंधित किया लेकिन उसको पंजीयन के लिए कभी बाध्य नहीं किया। महात्मा गांधी की हत्या के झूठे आरोप लगाकर जब संघ पर प्रतिबंध लगाया था, तब उसके विरुद्ध स्वयंसेवकों के राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा कर दिया। सरकार को बिना शर्त संघ से प्रतिबंध हटाना पड़ा। सरकार ने अपने आपको शर्मिंदगी से बचाने के लिए संघ से उसके संविधान की लिखित कॉपी तो मांगी, लेकिन उस समय भी पंजीयन नहीं माँगा। यह स्थिति तब है जबकि उस समय की सरकार येन-केन-प्रकारेण संघ को कुचलना या उस पर अपना नियंत्रण चाहती थी। बहरहाल, उसके बाद भी सरकार ने कभी संघ का पंजीयन नहीं माँगा। हाँ, संघ को रोकने के सारे हथकंडे अवश्य अपनाए गए, आज भी अपनाए जा रहे हैं। लेकिन समाज का विश्वास जीतकर संघ अजेय शक्ति के रूप में आगे बढ़ रहा है। इस मामले में सच यह है कि आज भी पंजीयन की माँग नहीं होती अपितु इस फर्जी प्रश्न की आड़ में अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने का प्रयास किया जाता है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संदर्भ में प्रारंभ से यह स्पष्ट किया जाता रहा है कि संघ भारत के सभी कानूनों का सम्मान करता है और उनके दायरे में रहकर ही कार्य करता है।

शनिवार, 20 जून 2026

श्रीगुरुजी के सरसंघचालक बनने की कहानी

संघ शताब्दी वर्ष : “सरसंघचालक का दायित्व विक्रमादित्य के सिंहासन जैसा है। अगर कोई अज्ञानी लड़का भी इस पर बैठता है, तो वह भी इस पर बैठकर एक बराबर न्याय करेगा” - श्रीगुरुजी


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (डॉक्टर साहब) के बाद इस राष्ट्रीय विचार के आंदोलन की बागडोर कौन संभालेगा? अगला सरसंघचालक कौन होगा? यह प्रश्न जब किसी के मन में भी नहीं आया था, तब से डॉक्टर साहब ने सरसंघचालक के लिए योग्य व्यक्ति की खोज प्रारंभ कर दी थी। यह बहुत आवश्यक था कि संघ का नेतृत्व ऐसे व्यक्तित्व को सौंपा जाए, जिसके प्रति श्रद्धा हो। जिसके नेतृत्व में संघ सरिता का वेग बढ़े, न कि उसमें बहता पानी ही सूख जाए। डॉक्टर साहब की आँखों के सामने से ऐसे अनेक संगठनों की कहानियां गुजर रही थीं, जो एक व्यक्ति की संकल्पना के साथ शुरू हुए और उनके जाने के साथ ही धुंधले पड़ गए। हालांकि, डॉक्टर साहब ने राष्ट्रीय आंदोलन की जो कहानी लिखी थी, उसके बीज उन्होंने अनेक लोगों के मन में बो दिए थे। अब भारत को परम वैभव पर पहुँचाने का संघ का सपना केवल डॉक्टर साहब का सपना नहीं रह गया था, यह सपना सबका अपना सपना बन गया था। डॉ. हेडगेवार व्यक्तियों के बड़े पारखी थे। कोई हीरा व्यापारी भी असली हीरा पहचानने में धोखा खा सकता है लेकिन डॉक्टर साहब व्यक्ति की पहचान में सिद्ध थे। संन्यास जीवन से वापस सामाजिक क्षेत्र में लौटे माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ को अपना उत्तरदायित्व सौंपने का निर्णय वे अपने मन में कर ही चुके थे। डॉक्टर साहब ने संघ में सामूहिक निर्णय की कार्यपद्धति का निर्माण किया था, इसलिए उन्होंने अपने निर्णय को संघ पर थोपा नहीं अपितु उस समय के अन्य दायित्ववान कार्यकर्ताओं से भी इस संबंध में परामर्श किया। श्रीगुरुजी के संबंध में जो विचार डॉक्टर साहब के थे, अन्य साथियों के मन में भी उन्होंने वही भाव पाया।

सोमवार, 15 जून 2026

अपने समय से संवाद का नाम है ‘संजय उवाच’

मीडिया प्राध्यापक एवं लेखक प्रो. संजय द्विवेदी की नई पुस्तक ‘संजय उवाच’ उनके चुनिंदा और सारगर्भित भाषणों का उत्कृष्ट संग्रह है। अकादमिक जगत से लेकर सार्वजनिक कार्यक्रमों में उन्होंने जो व्याख्यान दिए, उनको पाठकों के लिए संपादित कर पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया है। ज्यादातर व्याख्यान मीडिया, भाषा और शिक्षा के मुद्दों पर केंद्रित हैं। इसलिए यह पुस्तक मीडिया के विद्यार्थियों एवं इस क्षेत्र में रुचि रखनेवालों को अवश्य ही पढ़नी चाहिए। जिस दौर में मीडिया को लेकर अनेक प्रकार की बहस हवा में तैर रही हैं, तब उस बहस में भारतीय दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप प्रो. संजय द्विवेदी का नजर आता है। संवाद से सुंदर बनेगी दुनिया,  जड़ों की ओर लौटे मीडिया और जरूरी है मीडिया का भारतीयकरण- ये व्याख्यान मीडिया पर चल रही बहस को सार्थक दिशा देने का प्रयास हैं। इसके अलावा इस पुस्तक में भारत के नायकों, साहित्यकारों और समसामयिक विमर्श पर भी सारगर्भित विचार पढ़े जा सकते हैं। एक पंक्ति में कहें तो, इस पुस्तक में संकलित व्याख्यान पत्रकारिता, समाज, शिक्षा, भाषा और आज के समाज के विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर एक सार्थक और सकारात्मक विमर्श प्रस्तुत करते हैं। प्रो. संजय द्विवेदी ने अपने समय के साथ जो संवाद किया है, उसको संकलित और संपादित करके ‘संजय उवाच’ के रूप में अपने पाठकों के सामने प्रस्तुत कर दिया है। यह एक प्रकार से प्रो. द्विवेदी के बौद्धिक हस्तक्षेप का दस्तावेजीकरण है।