श्री अयोध्या धाम के भव्य श्रीराम मंदिर के कोष में हुई चोरी की घटना निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है। इस कृत्य से संपूर्ण हिन्दू समाज का आहत और हतप्रभ होना स्वाभाविक है। मंदिर की सुरक्षा, व्यवस्थापन और दान के प्रबंधन पर सवाल उठना भी स्वाभाविक है। हिन्दू समाज एवं हिन्दू संगठनों की एक राय है कि इस मामले में दोषियों पर कठोर कार्रवाई होनी ही चाहिए। लेकिन, इस पूरी घटना के बाद जो सबसे अधिक आश्चर्यजनक और वैचारिक रूप से खोखला पहलू उभर कर सामने आया है, वह है उन राजनेताओं और तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं की अति-सक्रियता, जो जीवनभर भगवान श्रीराम और उनकी जन्मभूमि पर श्रीराम मंदिर निर्माण के विरोधी रहे हैं। यह ध्यान देने वाली बात है कि आज मंदिर के धन की चिंता में जो लोग सबसे ज्यादा मुखर हैं, यह वही वर्ग है जिसका न तो कभी भगवान श्रीराम में विश्वास था और न ही वे उस पवित्र भूमि पर मंदिर निर्माण के पक्षधर थे।
जब श्रीराम जन्मभूमि मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था, तब इसी वर्ग द्वारा ज्ञान दिया जाता था कि उस स्थान पर मंदिर की क्या आवश्यकता है, वहां अस्पताल, विश्वविद्यालय या शौचालय बना देना चाहिए। इतना ही नहीं, इन्होंने देश की सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा देकर भगवान श्रीराम के अस्तित्व को ही काल्पनिक ठहराने का प्रयास किया था। आज जब उसी मंदिर के कोष में सेंधमारी हुई है, तो अचानक इन राम विरोधियों के भीतर का ‘भक्त’ जाग उठा है। उनका यह विलाप किसी आस्था से नहीं, बल्कि विशुद्ध राजनीतिक अवसरवाद से प्रेरित है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ऐसे अवसरवादी नेताओं को बिल्कुल सही आईना दिखाया है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पर उनका प्रहार सटीक और तथ्यों पर आधारित है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि जो लोग कल तक ‘रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’ का उद्घोष करने वाले निहत्थे रामभक्तों पर गोलियां और लाठियां चलवाते थे, वे ही आज आस्था की वकालत कर रहे हैं। 2017 से पहले उत्तर प्रदेश में ‘जय श्रीराम’ बोलने पर लाठियां बरसती थीं, लेकिन आज वही लोग ‘राम तो सबके हैं’ का राग अलापते हुए अयोध्या जाने को व्याकुल हैं। यह किसी वैचारिक परिवर्तन का नहीं, बल्कि हिन्दू समाज के वोटबैंक की सामूहिक ताकत का परिणाम है, जिसने इन दलों को घुटने टेकने और उनका पिछलग्गू बनने पर मजबूर कर दिया है।
राम विरोधियों के अति सक्रिय होकर इस मुद्दे को उठाने का एक और कारण है- हिन्दू समाज को भ्रमित करना और हिन्दुत्व के आधार पर बनी एकता को खंडित करना। क्योंकि ये जानते हैं कि हिन्दू समाज की एकता के कारण उनकी राजनीतिक दाल गल नहीं पा रही है। इन राम विरोधी नेताओं एवं सोशल एक्टिविस्टों के कर्कश शोर में उनकी नीयत को साफ देखा जा सकता है। ये लोग तब भी भगवान श्रीराम और उनके मंदिर को लेकर समाज में एक विरोध का वातावरण बनाना चाहते थे, आज भी वे यही कर रहे हैं कि किसी प्रकार से श्रीराम मंदिर के प्रति हिन्दू समाज के मन में निराशा और उपेक्षा का भाव आ जाए। कैसे भी करके भगवान श्रीराम और उनके मंदिर की प्रतिष्ठा कम हो जाए। अन्यथा उनके अचानक से रामभक्त बनने का और कोई कारण नजर नहीं आता है।
विपक्षी दलों की चिढ़ यह भी है कि जिस राम मंदिर आंदोलन और जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का उन्होंने अपनी पूरी ताकत लगाकर विरोध किया, वहाँ आज भव्य मंदिर कैसे बन गया? उनकी पीड़ा यह भी है कि श्रीराम मंदिर संपूर्ण देश को जोड़ने का केन्द्र बिन्दु कैसे बन गया? इसलिए उन्हें जब भी मौका मिल रहा है, वे अयोध्याजी और श्रीराम मंदिर की प्रतिष्ठा को धूमिल करने का प्रयास कर रहे हैं।
कहना होगा कि दशकों तक जिस सनातन आस्था को हाशिए पर रखा गया, आज उसका पुनर्जागरण हो रहा है। जब ये दल इस सांस्कृतिक उत्थान को रोक नहीं पाए, तो अब चोरी जैसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं की आड़ में झूठ और भ्रम का सहारा लेकर जनता को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं। वास्तव में यह लोग छल-कपटी ‘कालनेमि’ जैसे हैं। हिन्दू समाज को इन लोगों से सावधान रहना चाहिए।
श्रीराम मंदिर के कोष में हुई चोरी प्रशासन और ट्रस्ट की एक गंभीर चूक है, जिसकी निष्पक्ष जाँच और व्यवस्था में सुधार नितांत आवश्यक है। हिन्दू समाज, जिसने अपनी पाई-पाई जोड़कर इस मंदिर का निर्माण कराया है, वह इस पर सवाल पूछने का पूरा अधिकार रखता है। लेकिन, उन लोगों को राम के नाम पर राजनीति करने या घड़ियाली आंसू बहाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है, जिन्होंने रामकाज में हमेशा बाधा डाली हो। प्रभु श्रीराम भली-भांति जानते हैं कि कौन वास्तविक भक्त है और कौन छद्मवेशी ‘कालनेमि’। रामभक्त भी अब इनके राजनीतिक पाखंड को पूरी तरह समझ रहे हैं।





