शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

आधुनिक लेखन, चित्रपट एवं कलाओं में श्रीराम

जरूर देखिए - विश्व के प्रेरणा स्रोत हैं भगवान राम | दुनियाभर में हैं राम को माननेवाले लोग


श्रीराम भारतीय जनमानस की चेतना में केवल एक ऐतिहासिक चरित्र नहीं, बल्कि मर्यादा, कर्तव्य और आदर्श के शाश्वत प्रतीक हैं। इसलिए भारत और भारत के बाहर भी, राम पर विपुल लेखन हुआ, सिनेमा एवं नाट्य रचे गए, कला-संस्कृति में भी श्रीराम के संदेश की छाप है। हम कह सकते हैं कि आधुनिक साहित्य, सिनेमा और दृश्य कलाओं में नए सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टिकोणों के साथ रामकथा पुनर्परिभाषित हुई है। राम की कहानी है ही ऐसी कि हम सब जितनी बार सुनते, देखते और पढ़ते हैं, उतनी बार जीवन के वास्तविक आनंद की अनुभूति होती है। इसी अलौकित आनंद की अनुभूति के लिए हम बार-बार रामकथा में डूबना चाहते हैं। 

आधुनिक साहित्य एवं लेखन :

भगवान श्रीराम पर कितना विपुल लेखन किया जा चुका है। आनंद की बात है कि श्रीराम पर आज भी खूब लिखा जा रहा है और आगे भी लिखा जाता रहेगा। आधुनिक लेखकों ने नये ढंग से और अपने ढंग से राम कहानी सुनाने का प्रयास किया है। वे श्रीराम को अलौकिक ईश्वर के रूप में भी प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही उनको एक संघर्षशील मानव, संवेदनशील शासक और अंतर्द्वंद्वों से जूझते नायक के रूप में भी दिखाने का प्रयास किया गया है। ‘राम की शक्ति-पूजा’ में सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने राम को सामान्य मनुष्य के रूप में चित्रित किया जो युद्धक्षेत्र में रावण की महाशक्ति से मुकाबला करते हुए संशय और निराशा के दौर से गुजरते हैं। आत्मशक्ति की खोज करते हैं। श्रीराम का यह रूप मानव संघर्ष, आत्मसंशय पर विजय और राष्ट्र जागरण का प्रतीक बन जाता है। इसी प्रकार, प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. नरेंद्र कोहली ने रामकथा को पारंपरिक धार्मिक या भक्तिकाव्य के रूप में नहीं, बल्कि एक यथार्थवादी, वैज्ञानिक और आधुनिक मानवीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। उनकी रामकथा में ऋषि-मुनि केवल पूजा-पाठ करने वाले तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्हें वैज्ञानिक, रणनीतिकार और समाज को आत्मनिर्भर बनाने वाले बुद्धिजीवी के रूप में दिखाया गया है। उनके अनुसार राक्षस कोई अलग जीव नहीं थे, बल्कि समाज का शोषण करने वाली और मानवीय शांति में बाधक बनने वाली 'प्रवृत्ति' के प्रतीक थे, जिसे उन्होंने आज के अखबारों की घटनाओं से जोड़कर समझाया है। युवाओं के प्रिय लेखक अमीश त्रिपाठी ने ‘रामचंद्र शृंखला’ में राम को नियमों के पालनकर्ता, कानून के प्रति प्रतिबद्ध और समाज सुधारक के रूप में प्रस्तुत किया है।

देखें यह वीडियो : श्रीराम तीर्थ वाल्मीकि मंदिर, अमृतसर | Shri Ram Tirath Valmiki Mandir Amritsar | यही लिखी गई थी रामायण

चित्रपट एवं दृश्य माध्यम (सिनेमा व टेलीविजन) :

भगवान श्रीराम और उनकी कहानी के अन्य पात्रों पर सिनेमा, धारावाहिक और नाटकों की एक लंबी शृंखला है। रामकथा पर सिनेमा रचने में केवल भारतीय ही शामिल नहीं है, अपितु विदेशी निर्माता भी शामिल हैं। रामानंद सागर ने ‘रामायण’ पर अमर चित्रपट बनाकर इतिहास रच दिया। दूरदर्शन पर प्रसारित इस धारावाहिक में अरुण गोविल द्वारा निभाया गया राम का शांत, सौम्य और करुणामय रूप भारतीय जनमानस में स्थायी रूप से अंकित हो गया। रामानंद सागर ने एक ऐसी लकीर खींची है कि उसके आगे जाना मुश्किल हो रहा है। अभी दो-तीन वर्ष पहले कुछ निर्माताओं ने रामायण पर अपने ढंग से फिल्म बनाई। उनके प्रयोगों को दर्शकों ने नकार दिया। अब नयी टीम मैदान में है, 4000 करोड़ के बजट के साथ रामायण की कहानी सुनाने आ रहे हैं। 

जापानी फिल्म निर्माता युगो साको ने बच्चों के लिए ‘रामायण: द लीजेंड ऑफ प्रिंस राम (1992)’ का निर्माण किया। लेकिन यह केवल बच्चों को नहीं, अपितु सबको पसंद आई। इसे जापानी एनीमेशन और भारतीय कथा के अनूठे समन्वय के तौर पर देखा गया। 

मणिरत्नम की फिल्म रावण (2010) जैसे प्रयोगों में राम, सीता और रावण के प्रतीकों को आधुनिक पुलिस अधिकारी, बंधक और विद्रोही के जटिल द्वंद्व के रूप में प्रस्तुत किया गया। तमिल, तेलगू, गुजराती, मराठी और कन्नड सहित अन्य भारतीय भाषाओं में भी रामकथा पर सिनेमा रचा गया है।

मध्यप्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग की ओर से आयोजित 'अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक सम्मेलन' में यह विषय प्रस्तुत किया।

तेलुगू सिनेमा : संपूर्ण रामायणमु (Sampoorna Ramayanamu, 1958) – एन. टी. रामाराव (श्रीराम)। सीताराम कल्याणम (Seetha Rama Kalyanam, 1961) – एन. टी. रामाराव (रावण) और हरनाथ (राम)। लव कुश (Lava Kusa, 1963) – यह तेलुगू सिनेमा की मील का पत्थर मानी जाने वाली रंगीन फिल्म है, जिसमें एन. टी. रामाराव ने श्रीराम और अंजलि देवी ने सीता का अभिनय किया था। श्री राम राज्यम (Sri Rama Rajyam, 2011) – बापू द्वारा निर्देशित, जिसमें नंदमुरी बालकृष्ण (श्रीराम) और नयनतारा (सीता) मुख्य भूमिका में थे।

तमिल सिनेमा : सीता कल्याणम (Seetha Kalyanam, 1934) – प्रभात टॉकीज और मुरुगादास द्वारा निर्देशित प्रारंभिक काल की प्रसिद्ध फिल्म।

कन्नड़ सिनेमा : वाल्मीकि (Valmiki, 1963) – महर्षि वाल्मीकि के जीवन और रामायण रचना पर केंद्रित फिल्म (डॉ. राजकुमार मुख्य भूमिका में)। श्री राम पूजा (Sri Rama Pooja, 1955)। दशहरा (Dashavatara, 1960) – भगवान विष्णु के दशावतारों में रामावतार प्रसंग।

मराठी सिनेमा  : लंका दहन (Lanka Dahan, 1917) – दादा साहेब फाल्के द्वारा निर्मित ऐतिहासिक मूक फिल्म, जिसमें अन्ना सालुंके ने श्रीराम और सीता दोनों की भूमिका निभाई थी। सेतु बंधन (Setu Bandhan, 1932) – बाबूराव पेंटर और भालजी पेंढारकर द्वारा निर्देशित। रामराज्य (Ram Rajya, 1943) – विजय भट्ट द्वारा मराठी और हिंदी दोनों में एक साथ बनाई गई। यह एकमात्र ऐसी फिल्म मानी जाती है जिसे महात्मा गांधी ने देखा था।

गुजराती सिनेमा : संपूर्ण रामायण (Sampoorna Ramayan, 1970 के दशक) – गुजराती में डब व रूपांतरित रूप में प्रदर्शित। सीता हरण / सती सीता (Sati Sita) – गुजराती धार्मिक सिनेमा के दौर में निर्मित।

मलयालम : कंचन सीता (Kanchana Sita, 1977) – जी. अरविंदम द्वारा निर्देशित समांतर (Parallel) सिनेमा की विश्वप्रसिद्ध कलात्मक फिल्म, जो सी. एन. श्रीकंटन नायर के नाटक पर आधारित है। इसमें प्रकृति को सीता का रूप मानकर राम के अंतर्द्वंद्व को दिखाया गया है। सीता स्वयंवरम (Seetha Swayamvaram, 1976)।

बंगाली : सीता (Seeta, 1933/1934) – देबकी बोस द्वारा निर्देशित, जो अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह (वेनिस) में सम्मानित होने वाली प्रारंभिक भारतीय फिल्मों में से एक थी। मेघनाद वध (Meghnad Badh) – माइकल मधुसूदन दत्त के प्रसिद्ध महाकाव्य पर आधारित विभिन्न नाट्य और सिनेमाई रूपांतरण।

असमिया / ओड़िया : सीता बिबाह (Seeta Bibaha, 1936) – ओड़िया सिनेमा की पहली सवाक (बोलती) फिल्म, जो पूरी तरह श्रीराम और सीता के विवाह प्रसंग पर ही आधारित थी।

अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक सम्मेलन में मंचस्थ अतिथि- डॉ. लोकेन्द्र सिंह, फिल्म अभिनेता राजा बुंदेला, वीर भारत न्यास के सचिव श्रीराम तिवारी और थाईलैंड के संस्कृत विद्वान डॉ. चिरापत प्रपंडविद्या

कला एवं आधुनिक चित्रांकन :

परंपरागत लघुचित्र शैलियों (कांगड़ा, मेवाड़, मधुबनी) से आगे बढ़कर आधुनिक चित्रकारों ने रामकथा को नए कैनवास पर उकेरा। श्री अयोध्या धाम के नवीन राम मंदिर में स्थापित अरुण योगीराज द्वारा निर्मित 'बालक राम' की श्याम शिला मूर्ति पारंपरिक शिल्पशास्त्र (होयसल शैली के प्रभाव) और आधुनिक सूक्ष्म मानवीय भावों का उत्कृष्ट उदाहरण है। 

आधुनिक युग में श्रीराम का स्वरूप केवल उपासना तक सीमित न रहकर न्याय, मर्यादा, मानवीय करुणा और कर्तव्यबोध के ऐसे जीवंत आदर्श के रूप में विकसित हुआ है, जो हर नए माध्यम के साथ प्रासंगिक बना रहता है। 

मंगलवार, 3 नवंबर 2026

स्वदेशी मेला : वोकल फॉर लोकल का जीवंत मंच

कॉर्पोरेट चमक से दूर, जन-जन के विश्वास और आत्मनिर्भरता का उत्सव


झीलों की नगरी भोपाल को यदि मेलों का शहर कहा जाए, तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस शांत और खूबसूरत शहर के किसी न किसी कोने में हमेशा कोई न कोई मेला अपनी रौनक बिखेरता मिल ही जाता है। विशेषकर मानसून की विदाई और गुलाबी ठंड की आहट के साथ ही समूचा भोपाल जैसे उत्सव के एक जीवंत कैनवास में बदल जाता है। भोपाल का आसमान अभी गणेश उत्सव और नवरात्रि के मेलों की रोशनी को समेट भी नहीं पाया था कि व्यापारिक मेलों ने अपनी आमद दर्ज करा दी है। मेलों की चमक-धमक में ‘स्वदेशी मेला’ अपने अलग ठाठ-बाट के साथ आकर विराजमान हो गया है। स्वदेशी मेला अपने आप में अनूठा है क्योंकि यह मेले की पारंपरिक भारतीय संकल्पना को सच्चे अर्थों में साकार करता है। स्वदेशी मेले के पीछे एक उदात्त भावना है। एक पवित्र विचार है। भारत को आत्मनिर्भर बनाने की संकल्पना है। भारतीय व्यावसायियों को पहचान दिलाने और उनके हाथ मजबूत करने का सपना है। यह स्वदेशी के विचार को जन-जन तक पहुँचाने का उत्सव है। यह मेला केवल खरीदारी का बाजार भर नहीं है, बल्कि अपनी मिट्टी, अपनी संस्कृति और अपने कौशल से परिचित होने का एक संवेदनशील माध्यम है।

देखें : वीडियो रिपोर्ट

कॉर्पोरेट चमक-दमक से परे, समाज का अपना मेला :

स्वदेशी जागरण मंच की पहल पर भोपाल में ही नहीं, अपितु देशभर में लगभग 130 स्वदेशी मेलों का आयोजन हो रहा है। स्वदेशी के विचार को जनांदोलन और भारत को आत्मनिर्भर बनाने के महान लक्ष्य के साथ वर्ष 1991 में स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना की गई थी। उसके अलगे वर्ष से ही, यानी 1992 से ही मंच ने स्वदेशी मेलों का आयोजन प्रारंभ कर दिया था। चूँकि मेला हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है। मेलों के माध्यम से केवल व्यापार नहीं होता, अपितु विचार का भी प्रसार होता है। एक ओर कॉर्पोरेट घरानों के बड़े-बड़े मेले हैं, जिनकी चमक-दमक का वर्णन क्या ही किया जाए। वहीं दूसरी ओर, स्वदेशी मेला अपनी सादगी और उद्देश्य के कारण प्रतिष्ठित हो रहा है। स्वदेशी जागरण मंच और स्वदेशी के प्रति श्रद्धा रखने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं के साझे प्रयासों से प्रारंभ हुए ये मेले अपनत्व के भाव की साकार अभिव्यक्ति हैं।

परंपरा, स्वाद और आधुनिकता का संगम :

शाम ढलते ही भोपाल का एम.वी.एम. कॉलेज ग्राउंड दूधिया रोशनी और रंग-बिरंगी झालरों से नहा उठता है। मेले में कदम रखते ही हवा में तैरती पारंपरिक व्यंजनों की सोंधी खुशबू बरबस ही अपनी ओर खींच लेती है। कहीं शुद्ध देसी घी की जलेबियां छन रही हैं, तो कहीं पारंपरिक क्षेत्रीय व्यंजनों के स्टॉल पर लोगों का तांता लगा है। मालवा के गराडू का स्वाद, बीकानेर के साबूदाने के बड़े एवं खिचड़ी और बनारस के मंगोड़े से लेकर टॉप एंड टाउन की आइसक्रीम के स्वाद का लुत्फ हम यहाँ उठा सकते हैं। उज्जैन की प्रसिद्ध तंदूरी चाय की तो बात ही अलग है। इसका स्वाद तो जितना लाजवाब है ही, उससे अधिक आकर्षण तंदूरी चाय को बनाने की प्रक्रिया है। मेले में उज्जैन की तंदूरी चाय का स्वाद तो अनिवार्य रूप से लेना ही चाहिए।  

फूड कोर्ट के पास ही झूलों की दुनिया आपकी बाट जोह रही है। चरखी, नाव और जाइंट व्हील पर बैठकर भोपाल की ठंडी हवा का लुत्फ उठाना हर किसी के चेहरे पर खिलखिलाहट बिखेर देता है। कुछ नये ढंग के झूले भी यहाँ आए हैं। झूला झूलना आसान काम नहीं है।

कौशल को सम्मान, संस्कृति को पहचान :

मेले के सांस्कृतिक मंच पर हर शाम एक नया रंग बिखरता है। कभी स्थानीय लोकनृत्यों की थाप पर दर्शक झूमते हैं, तो कभी हमारे आसपास की बस्तियों के बाल कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देते हैं। इसी मंच पर उन प्रतिभाओं और कर्मठ हाथों का सम्मान भी किया जाता है, जिन्होंने स्वदेशी उत्पादन और सामाजिक उत्थान के क्षेत्र में अनुकरणीय कार्य किया है। हथकरघा के बने कपड़े, मिट्टी के नक्काशीदार बर्तन, जैविक उत्पाद, हस्तनिर्मित साज-सज्जा की वस्तुएं और घरेलु मसाले, मेले का हर स्टॉल किसी भारतीय कारीगर के श्रम और स्वाभिमान की कहानी कहता है। 

उपभोक्ता और विक्रेता के बीच आत्मीय रिश्ता :

स्वदेशी मेले में खरीदारी करते समय उपभोक्ता और विक्रेता के बीच केवल पैसों का लेन-देन नहीं होता, बल्कि एक आत्मीय रिश्ता बनता है। एक युवा ने यहाँ बुक स्टॉल लगाया है। वह अकेला ही अपने स्टॉल पर इधर से उधर भाग रहा है। मैंने उससे पूछा कि तुम सब ग्राहकों पर नजर कैसे रखते होगे, कुछ लोग तो बिना पैसा दिए ही किताबें ले जाते होंगे? उसका उत्तर बहुत प्रेरक और आत्मीयता भरा था- “भाई साहब, किताबें कौन चुराकर ले जाता है। अगर कोई ले भी जाएगा, तो अच्छा है। कुछ अच्छा पढ़ लेगा”। पंजाब से आए अचार-पापड़ वाले एक बंधु प्रत्येक ग्राहक को प्रेम से अपने विशिष्ट पापड़ों का स्वाद चखा रहे थे। उनके मन में यह भेद नहीं था कि जो खरीदने का इच्छुक होगा, उसे ही अपने उत्पाद चखने के लिए दिए जाएं। सेवा भारती के स्टॉल पर दीपावली और घर की सजावट का सामान था। यह स्टॉल महिलाओं के सशक्तिकरण का साक्षी था। सेवा भारती के प्रयासों से भोपाल के अलग-अलग हिस्सों में घरेलु महिलाएं अपने घर पर ही लाइट, दीपक, रूई की बाती और खिलौने इत्यादि बना रही हैं। 

आत्मनिर्भर भारत की जीवंत धड़कन :

भोपाल का यह स्वदेशी मेला सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि एक आंदोलन का उत्सव है। यह इस बात का प्रमाण है कि विकास और आधुनिकीकरण के दौर में भी हम अपनी जड़ों, अपनी परंपराओं और अपने देशवासियों के श्रम का सम्मान करना नहीं भूले हैं। रोशनी, स्वाद, उल्लास और वैचारिक संकल्प की इस त्रिवेणी में भोपाल का यह मेला हर शाम खुशियों का एक नया रंग भर रहा है।

भोपाल में आयोजित स्वदेशी मेला में 1 नवंबर, 2026 को दिए गए भाषण पर आधारित समाचार

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

खुलकर सामने आ रहे हैं ‘दिमागी नक्सल’

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन लोगों को ‘दिमागी नक्सल’ की संज्ञा दी थी, जो सभ्य समाज में छिपकर बैठे हैं और सांप्रदायिक, तानाशाही तथा हिंसक विचारधारा को आगे बढ़ाते हैं। दिमागी नक्सल कम्युनिज्म की हिंसक विचारधारा के पोषक भी होते हैं। विडंबना यह है कि ऐसे ही कुछ तत्व अब बौखलाहट के कारण खुलकर सामने आने लगे हैं। अपने अभिनय के कारण प्रसिद्ध नसीरुद्दीन शाह अनेक अवसरों पर अपनी मानसिकता को प्रकट कर चुके हैं, लेकिन अब तो वे खुलकर कह रहे हैं- “मैं फख्र के साथ कहता हूं, मैं दिमागी नक्सल हूं”। उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में छात्र संघ बहाली की मांग का समर्थन करते हुए अपनी बौखलाहट प्रदर्शित की है, जबकि छात्र संघ की बहाली पर विश्वविद्यालय प्रशासन विद्यार्थियों की मांग को पहले ही स्वीकार कर चुका है। स्वयं को ‘दिमागी नक्सल’ बताकर मोदी सरकार पर हमला बोल रहे नसीरुद्दीन को यह बताना चाहिए कि आखिर विश्वविद्यालय में छात्र संघ के चुनाव किसने रोके थे? क्या 2006 में जब छात्र संघ के चुनाव रोके गए थे, तब भी नसीर साहब ने इसी तरह सरकार को आड़े हाथ लिया था या तब वे सरकार की गोद में बैठकर अभिनय कर रहे थे?

मोदी सरकार पर शिक्षण संस्थानों की बर्बादी का आरोप लगाने वाले नसीर और इस जमात के अन्य बुद्धिजीवी बताएं कि 2011 में जामिया को अल्पसंख्यक संस्थान बनाने पर उन्होंने चुप्पी क्यों साध ली थी? विपक्षी राजनीतिक दलों एवं वैचारिक समूहों को भी इस बात का उत्तर देना चाहिए कि आखिर जामिया में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का आरक्षण बंद करके तत्कालीन सरकार ने किसके उत्थान का मार्ग प्रशस्त किया था? क्या यह सीधे तौर पर वंचित वर्ग के अधिकारों पर कुठाराघात नहीं था? जामिया में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए भी कोटा नहीं है। बात-बे-बात अपनी राजनीतिक दुकान चमकाने के लिए ओबीसी का हितैषी बनने का प्रयास कर रहा कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व इसका जवाब दे।

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026

'विश्वगुरु भारत' के निर्माण का पाथेय

संघ दर्शन : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष की पूर्णता पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने रखी भविष्य की रणनीति


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में विजयादशमी पर सरसंघचालक के बौद्धिक का विशेष महत्त्व है। चूँकि विजयादशमी संघ की स्थापना का दिन है, इसलिए इस दिन होने वाले उद्बोधन में भविष्य के लिए पाथेय रहता है। इस बार सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का उद्बोधन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण था क्योंकि एक प्रकार से यह संघ के शताब्दी वर्ष की पूर्णता का प्रसंग भी था। विगत एक वर्ष में संघ रूपी राष्ट्रीय आंदोलन की 100 वर्ष की यात्रा पूर्ण होने पर देशभर में संघ शताब्दी वर्ष मनाया गया। शताब्दी वर्ष के बाद संघ की रीति-नीति क्या रहेगी, यह केवल स्वयंसेवकों की जिज्ञासा का विषय नहीं है, अपितु समूचा देश जानना चाहता है कि संघ कार्य किस रूप में आगे बढ़ेगा। सरसंघचालक डॉ. भागवत जी के उद्बोधन में इस संदर्भ में पर्याप्त संकेत मिलते हैं। उनका विजयादशमी बौद्धिक भारत के आत्मबोध, संगठित पुरुषार्थ और भावी दिशा का व्यापक दर्शन प्रस्तुत करता है। उनके पूरे उद्बोधन को सार रूप में प्रस्तुत करना हो तो हम कह सकते हैं कि संघ की यह शतकपूर्ति केवल एक यात्रा का पड़ाव नहीं, बल्कि भारत को उसकी मौलिक अस्मिता (स्व) और वैश्विक उत्तरदायित्व के साथ पुनः प्रतिष्ठित करने का संकल्प-पर्व है।

देखें यह वीडियो : विजयादशमी और आरएसएस - संगठित शक्ति, शस्त्र पूजन और सीमोल्लंघन का वास्तविक अर्थ

सरसंघचालक जी ने कहा कि संविधान की प्रस्तावना में हम स्वयं को ‘हम भारत के लोग’ के रूप में संबोधित करते हैं। यह संबोधन केवल राजनीतिक शब्दावली नहीं, बल्कि विविधताओं से भरे समाज को भावनात्मक रूप से एकरस सूत्र में पिरोने का संकल्प है। भारत की सनातन दृष्टि की विशेषता यही रही है कि इसने सृष्टि की बाह्य विविधता को सहज स्वीकार किया, किंतु उसके भीतर प्रवाहित शाश्वत एकता को अटल सत्य माना। जब-जब हम इस एकात्मता के प्रति सजग रहे, भारत विश्वगुरु पद पर आरूढ़ रहा; और जब आत्मविस्मृति, आपसी फूट और संकीर्णता ने घर किया, तब देश ने सदियों की पराधीनता झेली। आज स्वाधीनता के बाद प्रगति की राह पर बढ़ते हुए हमें उसी आत्मबोध को पुनः जागृत करना होगा।

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

आरएसएस में विजयादशमी पर्व : शक्ति, संस्कार और संगठन का महापर्व

संघ शताब्दी वर्ष 

"श्रद्धा, आशा और उत्साह से भरा संगठित बल यदि देश में निर्माण कर सकें, तो सारे संकटों को हँसते-खेलते ठुकरा सकेंगे। यही विजयादशमी का संदेश है"। – श्री गुरुजी


भारतीय संस्कृति में विजयादशमी केवल बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक भर नहीं है, बल्कि यह आत्मविस्मृति से आत्मबोध, बलोपासना और राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण का पावन पर्व है। यह पर्व ‘विजिगीषु वृत्ति’ अर्थात् जीतने की आकांक्षा के भाव को प्रबल करता है। यही कारण है कि स्वतंत्रतासेनानी डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने हिंदू समाज को संगठित करने, उसके भीतर विजिगीषु वृत्ति और आत्मबोध का भाव जागृत करने के उद्देश्य से जिस संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की संकल्पना को देश के सामने रखा, उसको प्रारंभ करने के लिए विजयादशमी के पावन अवसर को चुना। इसलिए संघ में विजयादशमी पर्व का विशेष महत्व है। हालांकि, संघ ने विजयादशमी उत्सव को छह उत्सवों में केवल इसलिए शामिल नहीं किया है कि यह उसका स्थापना दिवस है। दरअसल, विजयादशमी का पर्व समाज को सब प्रकार से सबल होने की प्रेरणा देता है। जिस दौर में डॉ. हेडगेवार के मन में भारत की अक्षुण्ण स्वतंत्रता का स्वप्न पल रहा था, उस समय हिंदू समाज आत्मदैन्य की अवस्था में था। हिन्दुओं को आत्मदैन्य की अवस्था से बाहर निकालकर विजिगीषु वृत्ति के समाज में परिवर्तित करने के लिए आवश्यक था कि भारत के लोगों तक विजयादशमी का संदेश वास्तविक अर्थों में पहुँचे। विजय की आकांक्षा रखने वाला और संगठित हिंदू समाज ही देश की सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान कर सकता है।

रविवार, 18 अक्टूबर 2026

सुदर्शन जी का सहज और निश्छल अपनत्व

संघ शताब्दी वर्ष : साधारण स्वयंसेवक के सुख-दु:ख में सहभागी होने को लेकर बहुत आग्रही थे सुदर्शन जी, स्वयं बनते थे उदाहरण


जब आरएसएस के सरसंघचालक सुदर्शन जी स्वयंसेवक के घर विवाह में झाड़ू लगाने लगे (एआई से निर्मित चित्र)

किसी भी व्यक्ति के महान व्यक्तित्व की असली पहचान उसके पद या प्रभाव से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक कुप्प. सी. सुदर्शन जी का जीवन इसी आत्मीयता, संवेदनशीलता और विनम्रता का जीवंत उदाहरण था। उनके जीवन के अनेक संस्मरण हैं, जो उनके सहज, निश्छल और अपनत्व से भरे व्यक्तित्व का दर्शन कराते हैं। एक अच्छा कार्यकर्ता कैसा होता है, उनके जीवन के प्रेरक प्रसंगों से सीखा जा सकता है। उन्होंने संघ के विचार को अपने आचरण से समाज तक पहुँचाया। विश्व के सबसे बड़े संगठन का सबसे बड़ा अधिकारी कितना सहज और सरल हो सकता है, इसकी बड़ी लकीर सुदर्शन जी खींचकर गए हैं।  

सुदर्शन जी के लिए ‘स्वयंसेवक’ केवल संगठन का कार्यकर्ता नहीं, बल्कि परिवार का अभिन्न अंग था। भोपाल के वरिष्ठ कार्यकर्ता हेमंत मुक्तिबोध अपने संस्मरण में लिखते हैं कि समिधा कार्यालय में खाना बनाने वाले एक युवक की मां बीमार हो गईं तो उनसे मिलने वे रायसेन जिले के दूरस्थ ग्राम में उनके घर जा पहुंचे। शल्य चिकित्सा के लिए उन्हें भोपाल लेकर आए और जयप्रकाश अस्पताल में भर्ती करवाया तथा रोज उन्हें देखने जाते। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद चिकित्सकीय देखरेख के लिए सुदर्शन जी ने उन्हें भोपाल में रोक लिया और पूरे परिवार के एक सप्ताह तक ठहरने की व्यवस्था की। एक सामान्य कार्यकर्ता के लिए यह कितनी बड़ी बात है कि वह जिस संगठन के लिए कार्य करता है, वहाँ सर्वोच्च अधिकारी दु:ख के क्षण में केवल साथ नहीं खड़े हैं अपितु परिवार के सदस्य की भाँति अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं। एक और घटना उल्लेखनीय है, जो उनकी संवेदनशीलता और अपनत्व की भावना का मूर्तरूप है। भोपाल की एक शाखा में जब एक शिशु स्वयंसेवक के हाथ में चोट लगी तो वे 15 मिनट तक उसकी मालिश करते रहे थे। हेमंत मुक्तिबोध लिखते हैं कि “खेलते-खेलते कोई शिशु या बाल स्वयंसेवक घायल हो जाए तो उसकी वे ऐसी चिंता करते जो शायद उसके परिजन भी न करते होंगे”।

शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

हिन्दू धर्म छोड़ने पर नहीं मिलेगा आरक्षण का लाभ

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कन्वर्जन के बाद आरक्षण के लाभ पर रोक लगाने का ऐतिहासिक निर्णय भारतीय संविधान की मूल भावना और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों की रक्षा करने वाला एक अत्यंत आवश्यक कदम है। मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखते हुए और तमिलनाडु सरकार की याचिका को खारिज कर शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि अनुसूचित जाति या अन्य पिछड़ा वर्ग का कोई व्यक्ति अपना मूल धर्म छोड़कर इस्लाम या ईसाई मत अपना लेता है, तो वह अपने पुराने सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर संविधान के अनुच्छेद-16(4) के तहत आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। न्यायालय की यह टिप्पणी पूरी तरह से तार्किक और वस्तुनिष्ठ है कि कन्वर्जन से पहले की जाति या सामुदायिक पहचान को स्वतः किसी दूसरे धर्म के पिछड़े वर्ग में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अतिरिक्त अन्य पंथों में सैद्धांतिक रूप से जाति व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया जाता। ऐसे में, जो संगठन जातिविहीन समाज का दावा कर निर्धन और अशिक्षित लोगों को कन्वर्ट होने का प्रलोभन देते हैं, उनके द्वारा कन्वर्जन के बाद भी जातिगत आरक्षण की मांग करना उनके अपने ही दावों के विरोधाभासी है।