रविवार, 18 अक्टूबर 2026

सुदर्शन जी का सहज और निश्छल अपनत्व

संघ शताब्दी वर्ष : साधारण स्वयंसेवक के सुख-दु:ख में सहभागी होने को लेकर बहुत आग्रही थे सुदर्शन जी, स्वयं बनते थे उदाहरण


जब आरएसएस के सरसंघचालक सुदर्शन जी स्वयंसेवक के घर विवाह में झाड़ू लगाने लगे (एआई से निर्मित चित्र)

किसी भी व्यक्ति के महान व्यक्तित्व की असली पहचान उसके पद या प्रभाव से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक कुप्प. सी. सुदर्शन जी का जीवन इसी आत्मीयता, संवेदनशीलता और विनम्रता का जीवंत उदाहरण था। उनके जीवन के अनेक संस्मरण हैं, जो उनके सहज, निश्छल और अपनत्व से भरे व्यक्तित्व का दर्शन कराते हैं। एक अच्छा कार्यकर्ता कैसा होता है, उनके जीवन के प्रेरक प्रसंगों से सीखा जा सकता है। उन्होंने संघ के विचार को अपने आचरण से समाज तक पहुँचाया। विश्व के सबसे बड़े संगठन का सबसे बड़ा अधिकारी कितना सहज और सरल हो सकता है, इसकी बड़ी लकीर सुदर्शन जी खींचकर गए हैं।  

सुदर्शन जी के लिए ‘स्वयंसेवक’ केवल संगठन का कार्यकर्ता नहीं, बल्कि परिवार का अभिन्न अंग था। भोपाल के वरिष्ठ कार्यकर्ता हेमंत मुक्तिबोध अपने संस्मरण में लिखते हैं कि समिधा कार्यालय में खाना बनाने वाले एक युवक की मां बीमार हो गईं तो उनसे मिलने वे रायसेन जिले के दूरस्थ ग्राम में उनके घर जा पहुंचे। शल्य चिकित्सा के लिए उन्हें भोपाल लेकर आए और जयप्रकाश अस्पताल में भर्ती करवाया तथा रोज उन्हें देखने जाते। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद चिकित्सकीय देखरेख के लिए सुदर्शन जी ने उन्हें भोपाल में रोक लिया और पूरे परिवार के एक सप्ताह तक ठहरने की व्यवस्था की। एक सामान्य कार्यकर्ता के लिए यह कितनी बड़ी बात है कि वह जिस संगठन के लिए कार्य करता है, वहाँ सर्वोच्च अधिकारी दु:ख के क्षण में केवल साथ नहीं खड़े हैं अपितु परिवार के सदस्य की भाँति अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं। एक और घटना उल्लेखनीय है, जो उनकी संवेदनशीलता और अपनत्व की भावना का मूर्तरूप है। भोपाल की एक शाखा में जब एक शिशु स्वयंसेवक के हाथ में चोट लगी तो वे 15 मिनट तक उसकी मालिश करते रहे थे। हेमंत मुक्तिबोध लिखते हैं कि “खेलते-खेलते कोई शिशु या बाल स्वयंसेवक घायल हो जाए तो उसकी वे ऐसी चिंता करते जो शायद उसके परिजन भी न करते होंगे”।

संघ गीत : शत वर्षों की अथक तपस्या, त्याग और बलिदान | RSS Shatabdi Geet | RSS 100 Years Song | Sangh Geet

सुदर्शन जी की सहजता और निरहंकारिता का एक और प्रेरक प्रसंग भोपाल स्थित अरेरा कॉलोनी का है। अरेरा कॉलोनी में ही मध्य भारत प्रांत का कार्यालय ‘समिधा’ है। उस समय सुदर्शन जी का केन्द्र यही कार्यालय था। वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी इस प्रसंग को अकसर सुनाते हैं। उस दिन रात के लगभग 9:30 बज रहे होंगे। सुदर्शन जी प्रवास से लौटे थे। उन्होंने कार्यालय में विवाह के निमंत्रण पत्र देखे। उनमें से एक पत्र बहुत साधारण था। वह निमंत्रण पत्र एक बाल स्वयंसेवक सुदर्शन जी के लिए देकर गया था। उसकी बहन का विवाह था। उसके पिता सरकारी कार्यालय में चौकीदार थे। उसका घर सरकारी परिसर में ही था। घर क्या था, एक कमरे में ही सारा परिवार रहता था। वह बाल स्वयंसेवक रोज शाखा में आता था। सबको यह लग रहा था कि सुदर्शन जी अभी बाहर से आए हैं, थके होंगे इसलिए किसी विवाह समारोह में नहीं जाएंगे। लेकिन तभी सुदर्शन जी ने निमंत्रण पत्र दिखाते हुए कहा कि सब जल्दी से तैयार हो जाओ, इस विवाह में शामिल होने चलना है। 

कार्यकर्ताओं के साथ सुदर्शन जी विवाह में शामिल होने उस बाल स्वयंसेवक के घर पहुंचे। एक कमरे के घर में वर-वधू पक्ष के लोग जैसे-तैसे बैठे थे। यहां–वहां सामान बिखरा पड़ा था। वहाँ साफ–सफाई भी नहीं थी। यह सब देखते ही सुदर्शन जी ने स्वयं झाड़ू उठायी और घर–बाहर सफाई शुरू कर दी। उन्हें देखकर सभी कार्यकर्ता भी साफ–सफाई सहित अन्य व्यवस्थाओं को ठीक करने में जुट गए। इतने में बारात भी आ गई। उन्होंने देखा कि विवाह समारोह सम्पन्न कराने वाले पंडित बहुत जानकार नहीं हैं। फिर क्या था, उन्होंने पंडित जी की भूमिका भी निभा दी। कितना भाग्यशाली स्वयंसेवक था, जिसकी बहन के विवाह में सरसंघचालक स्वयं ‘मंत्र’ पढ़ रहे थे। उन्होंने वर-वधू को आशीर्वाद दिया और वस्त्र एवं कुछ उपहार भी भेंट किए। जैसा कि सुदर्शन जी का स्वभाव था कि ऐसे प्रसंग पर सबको भारतीय मूल्यों एवं रीति से भी परिचित कराते थे। विवाह एवं परिवार के महत्व से वर–वधू और उनके परिवारों को अवगत कराया। साथ में, हमारी जीवनशैली पर्यावरण के अनुकूल हो, इसका भी संदेश दिया। उन्होंने कहा कि विवाह रात में नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे बिजली का बहुत अपव्यय होता है। रात में डेढ़ बजे जब वे बाहर निकले तो उन्हें विदा करने के लिए घराती और बाराती, दोनों ही बाहर तक आए। सभी इसी बात पर धन्य हो रहे थे कि चौकीदारी करने वाले उनके जैसे साधारण परिवार की खुशी में इतना बड़ा व्यक्ति शामिल हुआ। निश्चित ही उस परिवार के लिए यह बड़ी बात थी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक उनके शुभ कार्य में न केवल शामिल हुए बल्कि घर के मुखिया की तरह जरूरी कार्य संभाल लिए।

उनके जीवन में इस प्रकार के अनेक प्रसंग हैं। संघ के अनेक वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने उनकी आत्मीयता और सरल व्यवहार की प्रत्यक्ष अनुभूति की है। सुदर्शन जी का यह आचरण दिखाता है कि वास्तविक समरसता भाषणों में नहीं, बल्कि ऐसे सहज कर्मों में बसती है। पद की गरिमा के साथ-साथ हृदय की विशालता और हर व्यक्ति को आत्मीय सम्मान देने की उनकी यह दृष्टि हम सबके लिए प्रेरणा का स्रोत है।

स्वदेश ज्योति में प्रकाशित साप्ताहिक कॉलम 'साधना के 100 वर्ष' में 4 अक्टूबर, 2026 को प्रकाशित लेख

शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

हिन्दू धर्म छोड़ने पर नहीं मिलेगा आरक्षण का लाभ

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कन्वर्जन के बाद आरक्षण के लाभ पर रोक लगाने का ऐतिहासिक निर्णय भारतीय संविधान की मूल भावना और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों की रक्षा करने वाला एक अत्यंत आवश्यक कदम है। मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखते हुए और तमिलनाडु सरकार की याचिका को खारिज कर शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि अनुसूचित जाति या अन्य पिछड़ा वर्ग का कोई व्यक्ति अपना मूल धर्म छोड़कर इस्लाम या ईसाई मत अपना लेता है, तो वह अपने पुराने सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर संविधान के अनुच्छेद-16(4) के तहत आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। न्यायालय की यह टिप्पणी पूरी तरह से तार्किक और वस्तुनिष्ठ है कि कन्वर्जन से पहले की जाति या सामुदायिक पहचान को स्वतः किसी दूसरे धर्म के पिछड़े वर्ग में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अतिरिक्त अन्य पंथों में सैद्धांतिक रूप से जाति व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया जाता। ऐसे में, जो संगठन जातिविहीन समाज का दावा कर निर्धन और अशिक्षित लोगों को कन्वर्ट होने का प्रलोभन देते हैं, उनके द्वारा कन्वर्जन के बाद भी जातिगत आरक्षण की मांग करना उनके अपने ही दावों के विरोधाभासी है। 

इसके साथ ही, न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी निजी धार्मिक संस्था या जमात के मात्र एक प्रमाण-पत्र के आधार पर सार्वजनिक लाभ की पात्रता तय नहीं हो सकती, और न ही पुनः मूल धर्म में लौटने पर बिना सक्षम प्राधिकारी की स्वतंत्र जांच के स्वतः आरक्षण बहाल किया जा सकता है। इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह वास्तविक वंचितों के अधिकारों में हो रही सेंधमारी को रोकेगा। लंबे समय से यह देखा जा रहा था कि मतांतरण करने वाले लोग अनुसूचित जाति या पिछड़े वर्ग के आरक्षण के साथ-साथ अल्पसंख्यकों को मिलने वाली सुविधाओं का 'दोहरा लाभ' उठा रहे थे। यह स्थिति न केवल सनातन परंपरा के वास्तविक आरक्षित वर्गों के अधिकारों में कटौती कर रही थी, बल्कि छल-कपट और लोभ-लालच के माध्यम से कराए जाने वाले कन्वर्जन को भी बढ़ावा दे रही थी।

आरक्षित वर्ग को यह देखना चाहिए कि कैसे कांग्रेस की सरकारें उनके आरक्षण के अधिकार को छीनकर उसमें किसी और को हिस्सेदारी देना चाह रही हैं। अपने वोटबैंक को खुश करने के लिए कांग्रेस सरकार अक्सर मुसलमानों और ईसाईयों को आरक्षित वर्ग में शामिल करने के प्रयास करती हैं। कांग्रेस सरकारों की यह चालाकी संविधान की मूल भावना और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के विरुद्ध है। 

इस अनीति के विरुद्ध अब समाज में भी जागृति आ रही है। लोग उठकर खड़े हो रहे हैं और डिलिस्टिंग की मांग कर रहे हैं। मध्य प्रदेश के झाबुआ और आलीराजपुर जैसे जनजाति बाहुल अंचलों में कन्वर्टेड लोगों को अनुसूचित जनजाति की सुविधाओं से वंचित करने (डिलिस्टिंग) की मांग को लेकर पिछले 15 वर्षों से आंदोलन चलया जा रहा है। वहीं, छत्तीसगढ़ के बस्तर (जगदलपुर) में तो ग्रामीणों को बीमारी ठीक करने या चमत्कार के नाम पर होने वाली चंगाई सभाओं और धर्मांतरण के खिलाफ स्वयं एकजुट होना पड़ा है, जहाँ ग्राम सभाओं ने पेसा कानून की शक्तियों का प्रयोग करते हुए बाहरी प्रचारकों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया है। 

सर्वोच्च न्यायालय का यह दूरगामी निर्णय निस्संदेह प्रलोभन आधारित कन्वर्जन की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाएगा और आरक्षण व्यवस्था की शुचिता को बनाए रखेगा। अब यह केंद्र और राज्य सरकारों का दायित्व है कि वे न्यायालय के इस स्पष्ट मार्गदर्शन के आलोक में पंथ प्रचार की स्वतंत्रता के दुरुपयोग को रोकें और यह सुनिश्चित करें कि संवैधानिक सुविधाओं का लाभ केवल उन्हीं पात्र नागरिकों तक पहुँचे, जिनके उत्थान के लिए इनका प्रावधान किया गया है। आरक्षित वर्ग भी आँखें खोलकर देखे कि उनके आरक्षण के अधिकार में कौन-से राजनीतिक दल सेंध लगा रहे हैं?

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

संघ को समझने का प्रयास है पुस्तक - आरएसएस @100

संघ शताब्दी वर्ष : प्रो. संजय द्विवेदी और डॉ. लोकेंद्र सिंह की यह पुस्तक संघ के विचार एवं दर्शन को समग्रता से प्रस्तुत करती है


- सुदर्शन व्यास (पत्रकार एवं शोधार्थी)

किसी संगठन की सौ वर्ष की यात्रा को समझना केवल उसके इतिहास के पन्ने पलटना नहीं होता। उसके विचार, कार्यपद्धति, सामाजिक सरोकार और समय के साथ बदलती चुनौतियों को भी देखना पड़ता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी के अवसर पर प्रकाशित ‘आरएसएस@100’ इसी दृष्टि से एक महत्वपूर्ण पुस्तक के रूप में सामने आती है। प्रो. संजय द्विवेदी और डॉ. लोकेंद्र सिंह के संपादन में शिल्पायन पब्लिशर्स, दिल्ली से प्रकाशित इस पुस्तक में 35 लेखकों और विचारकों के आलेख शामिल हैं। इन आलेखों के माध्यम से संघ के विचार और कार्य को अलग-अलग दृष्टियों से समझने का प्रयास किया गया है।

आरएसएस@100 पुस्तक की विशेषता केवल इसमें शामिल लेखों की संख्या नहीं, बल्कि विषय और दृष्टिकोण की विविधता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सामान्यतः एक संगठन के रूप में देखा जाता है, लेकिन उसके लगभग सौ वर्ष के विस्तार को समझने के लिए उसके पीछे की वैचारिक दृष्टि और सामाजिक कार्यपद्धति को समझना भी आवश्यक है। पुस्तक के विभिन्न आलेख इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य को सामने लाते हैं। कहीं संघ के विचार का पक्ष दिखाई देता है, कहीं उसके सामाजिक कार्य का विस्तार, तो कहीं उसके साथ जुड़े अनुभवों और विमर्शों की झलक मिलती है।

संघ की यात्रा को समझने में ‘राष्ट्र’ और ‘समाज’ की उसकी अवधारणा केंद्रीय रही है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सामाजिक समरसता संघ के सार्वजनिक विमर्श में लगातार प्रमुख विषय रहे हैं। शताब्दी वर्ष में भी संघ ने सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी और नागरिक कर्तव्य जैसे विषयों पर विशेष जोर दिया है। ऐसे समय में आरएसएस@100 का महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि यह इन व्यापक अवधारणाओं को एक ही आलेख के बजाय अनेक लेखकों की दृष्टि से देखने का अवसर देती है।

पुस्तक की एक और उपलब्धि यह है कि इसमें संघ को केवल अतीत के संदर्भ में देखने की कोशिश नहीं की गई है। सौ वर्ष की यात्रा अपने आप में महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे अधिक महत्वपूर्ण यह प्रश्न है कि बदलते भारत और बदलती दुनिया में संघ की भूमिका को किस तरह समझा जाए। तकनीक, वैश्वीकरण, सामाजिक परिवर्तन और नई पीढ़ी की बदलती आकांक्षाओं के बीच संगठन की विचार-यात्रा और सामाजिक उपस्थिति को देखने के लिए पुस्तक कई संदर्भ उपलब्ध कराती है।

विभिन्न लेखकों और विचारकों का एक साथ आना पुस्तक को संवाद का स्वरूप देता है। अलग-अलग लेखकों की भाषा, अनुभव और दृष्टिकोण पाठक को एक ही विषय के कई पहलुओं तक ले जाते हैं। यही कारण है कि यह पुस्तक केवल संघ के स्वयंसेवकों के लिए ही नहीं, बल्कि उन पाठकों के लिए भी उपयोगी हो सकती है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समझना चाहते हैं और उसके बारे में प्रचलित धारणाओं से आगे जाकर उसके विचार और कार्य को पढ़ना चाहते हैं।

प्रो. संजय द्विवेदी और डॉ. लोकेन्द्र सिंह की पुस्तक 'RSS@100'

हालांकि किसी भी बहुआयामी संगठन को एक पुस्तक में पूरी तरह समेटना संभव नहीं है। सौ वर्षों की यात्रा में अनेक घटनाएं, व्यक्तित्व, विचार-विमर्श और सामाजिक अनुभव जुड़े हैं। ऐसे में इस किताब को संघ पर अंतिम शब्द के बजाय एक महत्वपूर्ण वैचारिक पड़ाव के रूप में देखना अधिक उचित होगा। इसकी उपयोगिता इसी में है कि यह पाठक के सामने कई प्रश्न और संदर्भ रखती है तथा संघ की यात्रा को समझने के लिए आगे पढ़ने की जिज्ञासा पैदा करती है।

शताब्दी वर्ष में प्रकाशित आरएसएस@100 इसलिए महज एक स्मृति-पुस्तक नहीं, बल्कि एक वैचारिक संकलन के रूप में सामने आती है। 35 लेखकों की दृष्टियों से गुजरते हुए पाठक संघ के विचार, उसके सामाजिक कार्य और उसकी दीर्घ यात्रा को अलग-अलग कोणों से देख सकता है। संघ को जानने की इच्छा रखने वालों के लिए यह एक उपयोगी प्रवेश-द्वार है और स्वयंसेवकों के लिए अपनी यात्रा तथा विचारों को नए संदर्भों में देखने का अवसर। सौ वर्ष पूरे कर चुका संगठन जब अगले चरण की ओर बढ़ रहा है, तब उसके अतीत, वर्तमान और भविष्य पर विचार करने वाली ऐसी पुस्तक का सामने आना निश्चित रूप से समकालीन हिंदी वैचारिक साहित्य में उल्लेखनीय घटना है।

पुस्तक : आरएसएस@100

संपादक : प्रो. संजय द्विवेदी एवं डॉ. लोकेन्द्र सिंह

मूल्य : 450 रुपये0

प्रकाशक : शिल्पायन पब्लिशर्स, दिल्ली

'स्वदेश ज्योति' में 4 अक्टूबर, 2026 को प्रकाशित समीक्षा

रविवार, 4 अक्टूबर 2026

अदम्य साहस की सराहना और चयनित चुप्पी से संदेश

संकट के क्षण व्यक्ति के वास्तविक चरित्र, उसके संस्कारों और उसकी आंतरिक शक्ति की परीक्षा लेते हैं। आसमान में हजारों फीट की ऊंचाई पर, जब मौत सामने खड़ी थी और चारों तरफ हिंसा का तांडव था, तब भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छर ने जिस अप्रतिम वीरता, सूझबूझ और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया, वह केवल एक विमान चालक का पराक्रम नहीं, बल्कि भारतीय चेतना और जीवन-मूल्यों का साक्षात प्रकटीकरण है। कॉकपिट में गंभीर रूप से घायल और लहूलुहान होने के बावजूद अपने प्राणों की बाजी लगाकर यात्रियों की रक्षा करना उस मानवीय गरिमा की मिसाल है, जिसे दुनिया प्रणाम कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैप्टन स्मित मच्छर के साहस की सराहना की है। उन्होंने कैप्टन से बात भी की। प्रधानमंत्री मोदी को अपना प्रेरणास्रोत बताते हुए गंभीर चोटों और जीवन-मृत्यु के संघर्ष के बीच जब स्मित ने कहा कि उस भयावह क्षण में वे केवल ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ कर रहे थे और उसी आध्यात्मिक ऊर्जा ने उन्हें उठने और कॉकपिट का दरवाजा खोलकर स्थिति को संभालने की प्रेरणा दी, तो यह स्पष्ट हो गया कि आस्था जब आत्मबल बनती है, तो मृत्यु का भय भी परास्त हो जाता है। प्रधानमंत्री ने बिल्कुल सटीक कहा कि स्मित के परिवार ने उन्हें साक्षात गीता के निष्काम कर्म और शौर्य के संस्कार दिए हैं। यह अंतर ही भारत की आत्मा को परिभाषित करता है कि हम जान लेने वाले नहीं, अपनी जान दांव पर लगाकर दूसरों की जान बचाने वाले लोग हैं। कैप्टन स्मित की बहादुरी ने भारतीयों का मान दुनिया में बढ़ा दिया है। भारतीय मूल के नागरिकों को देखकर लोग उनके सम्मान में तालियां बजा रहे हैं, खड़े होकर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रहे हैं। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी हमारे बहादुर वीर से बात की और उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की है। यहूदी समुदाय की इस बात के लिए प्रशंसा करनी चाहिए कि वह उन लोगों को कभी नहीं भूलता, जिन्होंने उनकी सहायता की हो। यहूदी आज भी हाइफा युद्ध-1918 में भारत के योद्धाओं के बलिदान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं क्योंकि भारतीय योद्धाओं ने इजराइल की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

बहरहाल, विमान हाईजैक करके इजराइल पर आतंकी हमले की साजिश ने अमेरिका में हुए 9/11 के आतंकी हमले की यादें ताजा कर दी हैं। कह सकते हैं कि एक बार फिर आतंक और कट्टरता की निकृष्ट मानसिकता बेनकाब होकर सबके सामने है।

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

हजार स्वर्ण मंदिरों का शहर है कांचीपुरम

देखें : इस वीडियो ब्लॉग में करें कांचीपुरम के चार प्रमुख मंदिरों के दर्शन


हिन्दू आस्था का प्रमुख केंद्र है तमिलनाडु का कांचीपुरम। हिन्दू वाङ्ग्मय में मोक्षदायिनी सप्तपुरियों का वर्णन आता है, उनमें कांचीपुरम भी शामिल है। अर्थात् कांची मोक्ष की भूमि है। ज्ञान-वैराग्य की भूमि है। संभवत: यही कारण है कि कांची को दक्षिण भारत की काशी भी कहते हैं। यह सप्तपुरियां भगवान शिव और विष्णु में बराबर-बराबर बंटी हैं। सप्तपुरियों को आधा-आधा कैसे बाँटें, तब इसका रास्ता निकाला गया कि कांची नगरी आधी विष्णु को और आधी शिव को समर्पित कर दी जाए। इस प्रकार कांचीपुरम के दो भाग हैं-  शिवकांची तथा विष्णुकांची। कांचीपुरम प्राचीन मंदिरों का शहर है। एक-दो नहीं अपितु यहाँ अनेक मंदिर हैं, जिनका द्रविण शैली का स्थापत्य देखते ही बनता है। कांचीपुरम को ‘हजार मंदिरों का शहर’ या ‘हजार मंदिरों का स्वर्ण नगर’ और ‘द गोल्डन सिटी ऑफ़ 1000 टेंपल’ भी कहा जाता है। यहाँ आज भी लगभग 126 भव्य-दिव्य मंदिरों के दर्शन किए जा सकते हैं। अपनी कांचीपुरम की यात्रा में हमने यहाँ के चार प्रमुख मंदिरों के दर्शन किए- कामाक्षी अम्मन मंदिर, एकाम्बरेश्वर मंदिर, वरदराज पेरुमल मंदिर और उलगलंथा पेरुमल मंदिर। चेन्नई के दक्षिण-पश्चिम में पलार नदी के किनारे स्थित कांचीपुरम अपने रेशम के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसे ‘कांजीवरम’ कहा जाता है। यहाँ आसपास के गाँवों में आज भी घर-घर में हथकरघे लगे हैं, जहाँ स्त्री के सौंदर्य को कई गुना बढ़ाने वाली रेशम की साड़ियाँ बुनी जाती हैं। कभी चोल, पल्लव और विजयनगर साम्राज्य की राजधानी रहे कांचीपुरम की ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक विरासत के साथ हमने तीन दिन गुजारे। श्रीकांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य श्री विजेंद्र सरस्वती कहते हैं कि कांचीपुरम में दो-तीन दिन रहने से पुण्य प्राप्त होता है। पुण्य के साथ हमने अविस्मरणीय आनंद भी प्राप्त किया।

शनिवार, 26 सितंबर 2026

“मैं अंग्रेजों की नौकरी नहीं करूंगा”

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक रज्जू भैया पढ़ने में बहुत मेधावी थे, स्कूल के दिनों में ही उन्होंने भांप लिया था कि ब्रिटिश राज भारत के लिए अच्छा नहीं है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चौथे सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ का संपूर्ण जीवन प्रखर मेधा, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति का अप्रतिम उदाहरण है। बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी रज्जू भैया ने उस दौर में ब्रिटिश शासन के वैभवशाली पदों को ठुकरा दिया था, जब लोग सरकारी नौकरियों के लिए लालायित रहते थे। उन्हें स्कूल के दिनों से ही यह अनुभव होने लगा था कि ब्रिटिश राज भारत के लिए अच्छा नहीं है। अंग्रेजों से मुक्ति पाने के लिए देश में स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा है। रज्जू भैया एक घटना को याद करते हैं– “मेरठ में नौचंदी का प्रसिद्ध मेला लगता था, यदा-कदा हम लोग भी उसे देखने जाते थे। भगतसिंह और उनके दो साथी राजगुरु और सुखदेव को मृत्युदंड दिया गया था। एक दुकानदार ने उस मेले में अपनी दुकान पर उस दृश्य का एक छोटा चित्र लगा रखा था, जो मेले में आए दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया था। अगले दिन ही पुलिस ने उस चित्र को हटा दिया और हमें यह पता लगा कि उस दुकानदार को गिरफ्तार कर लिया गया है। हम उस घटना को पूरी तरह समझ पाने में सक्षम नहीं थे, किंतु अंग्रेजों के प्रति हमारे मन में रोष अवश्य उत्पन्न हुआ और हमने ‘टोडी बच्चा हाय हाय’ के नारे का भरपूर समर्थन किया।” इसी विचार के कारण उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि ब्रिटिश शासन के अधीन नौकरी नहीं करूंगा।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

श्रीगणेश की दिव्य प्रतिमा, निरंतर बढ़ रहा आकार

अमरकंटक दर्शन : पुष्पराजगढ़ के जंगलों में कलचुरीकालीन भगवान श्रीगणेश की ऐतिहासिक प्रतिमा, इन्हें बटुक गणेश भी कहते हैं


अनूपपुर के पुष्पराजगढ़ तहसील के ग्राम धरहर कला में स्थापित प्राचीन एवं दिव्य श्रीगणेश प्रतिमा

अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ विकासखंड के अंतर्गत ग्राम धरहरकला में भगवान श्रीगणेश की दिव्य एवं प्राचीन प्रतिमा है, जो श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र है। इस स्थान को बहगड़नाला भी कहते हैं। अमरकंटक स्थित माँ नर्मदा मंदिर से उत्तर दिशा की ओर लगभग 35 किलोमीटर और पुष्पराजगढ़ से लगभग सात किलोमीटर की दूरी पर भगवान श्रीगणेश की यह प्रतिमा स्थापित है। भगवान श्रीगणेश की इस प्रतिमा को लेकर लोगों के मन में अपार श्रद्धा होने के साथ-साथ कौतुहल भी है। कहते हैं कि प्रतिवर्ष तिल-तिल करके प्रतिमा का आकार बढ़ रहा है। वर्तमान में प्रतिमा का आकार लगभग 8 फीट है। हालांकि इसके कोई वैज्ञानिक एवं पुरातात्विक साक्ष्य नहीं है। लेकिन लोगों की श्रद्धा है। इस संदर्भ में यह भी जनश्रुति है कि जब प्रतिमा प्रकट हुई थी, तब इसका आकार केवल एक फीट था। इन्हीं जनश्रुतियों के कारण घने जंगल में, एकांत में विराजे धरहरकला भगवान श्रीगणेश की प्रसिद्धि दूर-दूर तक है। प्रतिवर्ष वसंत पंचमी पर यहाँ तीन दिवसीय विशाल मेला लगता है। श्रीगणेशोत्सव के दिनों में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहाँ भगवान श्रीगणेश की इस दिव्य प्रतिमा के दर्शन के लिए आते हैं। अमरकंटक में सदानीरा माँ नर्मदा के दर्शन के लिए आने वाले भक्तगण भी श्रीगणेश के दर्शन के लिए आते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि अमरकंटक में माँ नर्मदा की पूजा-अर्चना का फल भक्तों को तभी मिलता है, जब धरहरकला आकर भगवान श्रीगणेश की पूजा करते हैं। एक मान्यता यह भी है कि अमरकंटक पहुंचने से पहले धरहर के स्वयंभू गणेश महाराज के दर्शन करने के बाद ही माँ नर्मदा की पूजा-अर्चना का फल पूर्ण होता है। इन्हीं कारणों से अमरकंटक आने वाले और वहाँ से लौटने वाले श्रद्धालु धरहर कला पहुंचकर श्री गणेश जी के दर्शन और पूजन करते हैं।