संघ शताब्दी वर्ष : श्री गोलवलकर ने स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शिष्य अखंडानंद जी से संन्यास की दीक्षा ली थी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ के जीवन का एक दौर ऐसा भी है, जब वे दुनियादारी छोड़कर अध्यात्म के मार्ग पर संन्यासी हो गए। लेकिन उनकी नियति और संघ कार्य की आवश्यकता उन्हें पुन: राष्ट्रीय आंदोलन में खींच लाई। संघ कार्य को विस्तार देते हुए भी उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन एक तपोनिष्ठ संन्यासी की भाँति ही व्यतीत किया। श्रीगुरुजी किसी आध्यात्मिक विभूति की तरह दिखाई देते थे। उनके चेहरे पर दमकता तेज भी इसका साक्ष्य देता था कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है अपितु अध्यात्म की ऊर्जा से सम्पन्न कोई पवित्र आत्मा है। श्रीगुरुजी के व्यक्तित्व का स्मरण करते हुए ‘माधव अर्चना’ गीत की रचना की गई है, जिसकी एक-एक पंक्ति उनके आध्यात्मिक व्यक्तित्व की ओर संकेत करती है। “सिन्धु सा गम्भीर मानस, थाह कब पाई किसी ने। आ गया सम्पर्क में जो, धन्यता पाई उसी ने”। श्रीगुरुजी के संपर्क में आए संघ से बाहर के बंधु भी मानते थे कि उनका जीवन केवल एक संगठनकर्ता का जीवन नहीं था, बल्कि वह भीतर से एक पूर्ण विरक्त और आध्यात्मिक साधक थे। उनका समूचा जीवन इस बात का प्रतीक है कि कैसे एक संन्यासी अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को समाज और राष्ट्र के कल्याण में समाहित कर सकता है।
श्रीगुरुजी के मन में वैराग्य और संन्यास की ओर झुकाव उच्च शिक्षा अर्जित करने के दौरान ही दिखाई दे गया था। अध्यात्म का संस्कार उन्हें परिवार से विरासत में प्राप्त हुआ था, जो निरंतर उनके हृदय में पल्लवित होता रहा। विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके मन में यह द्वंद्व चलने लगा था कि क्या उन्हें एकांतवासी बन जाना चाहिए और हिमालय में जाकर स्वत: ज्ञान प्राप्त करना चाहिए अथवा यहीं पर रहकर समाज की सेवा करनी चाहिए? उन्होंने अपने मित्र तेलंग को 20 मार्च, 1929 को लिखे पत्र में इस संबंध में चर्चा की थी- “मेरी इच्छा एक आम सांसारिक जीवन जीने की नहीं है। जो मैं चाहता हूँ, वह है इस जीवन की डोर को मैं और अधिक परिशुद्धि स्वर तक ले जा पाऊँ”। चूँकि देश की परिस्थितियाँ और हिन्दू समाज की चुनौतियाँ उनको अपने सामने दिखायी दे रही थीं। इसलिए ब्रह्म की खोज में अपने जीवन को हिमालय की कंदराओं में समर्पित कर देने का विचार भी उन्हें जँच नहीं रहा था। यही कारण था कि उनके मन में द्वंद्व था कि हिमालय में जाकर साधना करें या फिर समाज के बीच में रहकर संन्यासी भाव से अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन करें।
डॉ. हेडगेवार से श्रीगुरुजी का संपर्क :
वर्ष 1932 में श्रीगुरुजी का संपर्क संघ के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के साथ हुआ। डॉक्टरजी ने श्रीगुरुजी की प्रतिभा को पहचान कर उन्हें संघ कार्य से जोड़ दिया। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन के साथ ही श्रीगुरुजी ने संघ कार्य में रुचि लेना प्रारंभ कर दिया। 1933 में वे वापस नागपुर लौटे। 1934 में डॉक्टरजी ने उन्हें संघ कार्य के लिए मुंबई भेजा। 1935 में उन्हें अकोला में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग के सर्वाधिकारी की जिम्मेदारी सौंपी गई।
श्रीगुरुजी को मकर संक्रांति पर प्राप्त हुई दीक्षा :
कह सकते हैं कि श्रीगुरुजी का मन संघ कार्य में रम गया था। यद्धपि उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति उन्हें अध्यात्म और वैराग्य की ओर खींच रही थी। संघकार्य करते हुए श्रीगुरुजी नागपुर के ही धामतोली में स्थित रामकृष्ण आश्रम के संपर्क में आ गए। वहाँ आश्रम के प्रमुख संन्यासी स्वामी भास्करेश्वरानंद जी के साथ उनकी निकटता हो गई। उन्होंने आध्यात्मिकता की खोज में अधिक से अधिक समय आश्रम में व्यतीत करना शुरू कर दिया। 1936 की गर्मियों में वह दिन भी आ गया, जब श्रीगुरुजी सब कुछ त्यागने का संकल्प लेने के बाद बंगाल के सारगाछी आश्रम चले गए। यहाँ उन्होंने स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शिष्य और स्वामी विवेकानंद के गुरु भाई स्वामी अखंडानंद जी की सेवा में अपना समय व्यतीत किया। आश्रम का जीवन अत्यंत कठिन था। श्रीगुरुजी रात के डेढ़ बजे तक गुरुसेवा में लीन रहते थे और फिर भी सुबह चार बजे उठकर अपने गुरु के पैरों के पास खड़ाऊँ लेकर उपस्थित हो जाते थे। इसके अलावा श्रीगुरुजी आश्रम के बाकी कार्य, जैसे- पानी भरना, झाड़ू लगाना, बर्तन माँजना इत्यादि भी मनोयोग से करते थे। स्वामी अखंडानंद जी उनकी कड़ी परीक्षा लेते थे। कभी-कभी वे उन्हें घंटों तक एक ही आसन में बैठाए रखते या बिना कोई काम बताए एक ही जगह पर घंटों खड़ा रहने का निर्देश देते। श्रीगुरुजी ने बिना किसी शिकायत के इन सभी परीक्षाओं को पार किया। अंतत: मकर संक्रांति के पावन पर्व पर, 13 जनवरी, 1937 को श्रीगुरुजी को स्वामी अखंडानंद जी से ‘दीक्षा’ प्राप्त हो गई।
मैं आपको वापस वहाँ ले जा रहा हूँ, जहाँ से मैं आपको लेकर आया था :
दीक्षा विधि के केवल तीन सप्ताह बाद ही स्वामी अखंडानंद जी का निर्वाण हो गया। अमिताभ महाराज श्रीगुरुजी को अपने उन सहयोगियों से मिलाने के लिए कोलकाता स्थित बेलूर मठ लेकर गए, जो स्वामी रामकृष्ण परमहंस के समय से थे। यहाँ स्वामी अभेदानंद जी और श्रीगुरुजी के जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय घटता है। श्रीगुरुजी के तेज और उनके भीतर के वैराग्य को देखकर स्वामी अभेदानंद जी ने एक सटीक भविष्यवाणी की थी- “तुम त्यागी के समान ही जीवनयापन करोगे”। उस समय श्रीगुरुजी ने बेलूर मठ में ही रहने की इच्छा व्यक्त की, तब अमिताभ महाराज उन्हें एकांत में लेकर गए और कहा- “आपको रामकृष्ण मिशन में नहीं रहना है”। स्वामी अखंडानंद जी श्रीगुरुजी से क्या चाहते थे, इसकी चर्चा उन्होंने की। तब श्रीगुरुजी ने भी कहा कि “गुरुदेव ने कहा था कि जब कभी मुश्किल हो तब आपसे विचार-विमर्श करूं। मेरे लिए आपके मन में क्या योजना है?” अमिताभ महाराज ने उत्तर दिया- “मैं आपको वापस वहाँ ले जा रहा हूँ, जहाँ से मैं आपको लेकर आया था”।
संघ के लिए पूरी तरह समर्पित श्रीगुरुजी :
अमिताभ महाराज के माध्यम से अपने गुरुदेव की ही यह इच्छा जानकर कि उन्हें समाज-कार्य करना चाहिए, श्रीगुरुजी मार्च 1937 में वापस नागपुर लौट आए। वे यहाँ अमिताभ महाराज के साथ रामकृष्ण आश्रम में लगभग एक महीना रहे। इसी बीच श्रीगुरुजी और डॉ. हेडगेवार के बीच मुलाकातों एवं संवाद की लंबी शृंखला चली। अंतत: श्रीगुरुजी ने ‘समाज को ही परमेश्वर’ मान लिया और स्वयं को पूरी तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य के लिए समर्पित कर दिया। उनका मानना था कि राष्ट्र-देवता की सेवा ही सबसे बड़ी ईश्वरीय साधना है।
संघ के सर्वोच्च दायित्व (सरसंघचालक) का निर्वहन करते हुए भी श्रीगुरुजी का जीवन कभी सत्ता, पद या प्रतिष्ठा के इर्द-गिर्द नहीं घूमा। उन्होंने आजीवन एक परिव्राजक संन्यासी (निरंतर भ्रमण करने वाला साधु) की भाँति ही अपना जीवन व्यतीत किया। उनके पास न तो किसी पद की लालसा थी, न ही धन का कोई मोह और न ही उन्होंने जीवन में किसी भौतिक वस्तु का व्यक्तिगत संग्रह किया। श्रीगुरुजी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि संन्यास का अर्थ केवल जंगलों में जाकर आँखें बंद करना नहीं है, बल्कि अपनी संपूर्ण आध्यात्मिक ऊर्जा और निस्वार्थ भाव को समाज के उत्थान में लगा देना ही सच्चा संन्यास है। वे बाहर से एक संगठनकर्ता और भीतर से पूर्णतः त्याग और वैराग्य की सजीव मूर्ति थे।
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