गुरुवार, 22 अगस्त 2019

आरक्षण और संघ के विरुद्ध दुष्प्रचार


किसी भी अच्छे विचार पर अनावश्यक राजनीतिक विवाद कैसे खड़ा किया जाता है, इसका सटीक उदाहरण है- सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के आरक्षण संबंधी विचार पर खड़ा किया गया नकारात्मक विमर्श। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति दुराग्रह रखने वाला वर्ग संघ के विचार को गंभीरता से सुने बिना ही कौव्वा कान ले गयाकी तर्ज पर हो-हल्ला करने लगता है। इससे यही सिद्ध होता है कि यह वर्ग आरएसएस को ऐन-केन-प्रकारेण विवाद में घसीटने की ताक में बैठा रहता है। भारत में राजनीतिक स्वार्थ ने आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न को विवादास्पद बना दिया है। यह एक संवेदनशील विषय है। हमने देखा है कि पूर्व में कैसे टुकड़े-टुकड़े गैंगने आरक्षण पर अफवाह और भ्रम फैलाकर हिंदू समाज को तोडऩे के प्रयास किए हैं। विभाजनकारी सोच ने सामाजिक मुद्दे का इस तरह से राजनीतिकरण किया है कि अच्छी बात कहना भी कठिन हो गया है। परंतु, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामने किसी प्रकार का राजनीतिक जोखिम नहीं है, क्योंकि राजनीति न तो उसके काम का आधार है और न ही लक्ष्य, इसलिए वह बार-बार आरक्षण पर सकारात्मक समाधान प्रस्तुत करने को तैयार रहता है। दिल्ली में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा आयोजित ज्ञानोत्सव-2076’ के समापन सत्र में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा भी कि आरक्षण पर पहले भी उनके कथन को गलत ढंग से प्रस्तुत कर राजनीतिक विवाद खड़ा किया गया, लेकिन संघ इस प्रकार के विवाद से डरता नहीं है। आरक्षण पर पूछे गए प्रश्न का उत्तर देते समय सरसंघचालक को यह कल्पना थी कि उनके वक्तव्य को तोड़-मरोड़ कर एक बार फिर से विवाद खड़ा किया जाएगा, किंतु उन्होंने विवाद की चिंता न करते हुए महत्वपूर्ण विषय पर समाज का मार्गदर्शन किया।
            किंतु, तथाकथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी-पत्रकार, कम्युनिस्ट सहित अन्य राजनीतिक दल तो तैयार बैठे रहते हैं, संघ को दलित विरोधी, आरक्षण विरोधी सिद्ध करने के लिए। इस बार भी उन्होंने यही प्रयास किया, लेकिन वह भूल जाते हैं कि समय बदल गया है। अब झूठ चलता नहीं। पारदर्शी जमाना है। डिजिटल युग में सच तक आम आदमी की पहुँच हो गई है। इसलिए उसके दिमाग में पहले की तरह झूठ नहीं बैठाया जा सकता। इस वर्ग के द्वारा बार-बार यह राग आलापना मूर्खता ही कहा जाएगा कि संघ आरक्षण का विरोधी है और वह आरक्षण खत्म करना चाहता है, जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बार-बार पूर्ण स्पष्टता के साथ कह चुका है कि वह अनुसूचित जाति-जनजाति और पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का पूर्ण समर्थन करता है। एक बार फिर से संघ ने इस विषय पर अपना विचार स्पष्ट किया है कि वह कमजोर वर्ग को दिए जा रहे आरक्षण का पूर्ण समर्थन करता है।


            अब यहाँ यह जानना आवश्यक है कि सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा क्या था कि उसे आरक्षण समाप्त करने का संघ का मंतव्य बताया जा रहा है। अपने संबोधन में सरसंघचालक ने कहा-आरक्षण के प्रश्न का हल सद्भावना में ही है। आरक्षण के पक्ष के लोग, आरक्षण के विपक्ष के लोगों का विचार करके जब कुछ बोलेंगे-करेंगे और आरक्षण के विपक्ष में जो लोग हैं, वो आरक्षण के पक्ष के लोगों का विचार करके कुछ करेंगे-बोलेंगे, तब इसका हल एक मिनट में निकल आएगा। बिना कानून के, बिना नियम के। इस प्रकार की सद्भावना जब तक संपूर्ण समाज में खड़ी नहीं होती, इस प्रश्न का हल कोई नहीं दे सकता। यह सद्भावना खड़ा करने का प्रयास करना पड़ेगा, जो कि संघ कर रहा है।




            आरोप लगाने वालों से पूछना चाहिए कि इस वक्तव्य में सरसंघचालक या आरएसएस ने आरक्षण खत्म करने की बात कहाँ कही है? लेकिन अपनी आदत से मजबूर सेक्युलर, लिबरल, वामपंथी और कांग्रेस नेताओं, पत्रकारों ने संघ के खिलाफ दुष्प्रचार शुरू कर दिया। पूर्व की घटनाओं की भांति मोहन भागवत जी के कथन को अपनी सुविधा अनुसार तोडऩा शुरू कर दिया। सरसंघचालक के भाषण के एक हिस्से पर जो अनावश्यक विवाद खड़ा किया जा रहा है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। याद करना होगा कि लगभग एक साल पहले ही नयी दिल्ली के विज्ञान भवन में आरएसएस की ओर से एक व्याख्यान माला का आयोजन किया गया था। इस तीन दिवसीय आयोजन में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने स्वयं पूरे समय उपलब्ध रह कर संघ के बारे में फैलाये जाने वाले भ्रमों को दूर किया। उस समय भी आरक्षण के प्रश्न पर सरसंघचालक ने कहा था कि संघ का मानना है कि सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए आरक्षण की जो व्यवस्था हमारे संविधान में की गयी है, वह जारी रहनी चाहिए।

विज्ञान भवन में आयोजित व्याख्यान माला 'भविष्य काभारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' में सरसंघचालक ने क्या कहा था, सुनिए (1:27:23 मिनट पर) –


            राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सर्वोच्च समिति अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’, जो संघकार्य-विचार की दिशा-नीति तय करती है, उसने भी आरक्षण पर बाकायदा प्रस्ताव पारित किया है। संघ में सर्वसम्मति से पारित यह प्रस्ताव भी आरक्षण पर प्रोपोगंडा करने वालों को पढऩा चाहिए। 1981 में जब गुजरात और अन्य प्रदेशों में आरक्षण की मांग के कारण तनावपूर्ण स्थितियां निर्मित हुईं थी, तब संघ ने आरक्षण पर चिंता व्यक्त की थी। उससे पहले भी आरक्षण संघ के विमर्श का हिस्सा रहा है। 1981 में संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में आरक्षण पर एक प्रस्ताव पारित हुआ था। उस प्रस्ताव में कहा गया था- ‘संघ यह मानता है कि शताब्दियों से सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए बंधुओं को शेष समाज के समकक्ष लाने के लिए आरक्षण व्यवस्था को अभी बनाये रखना आवश्यक है।

            आरएसएस के विरुद्ध व्यापक स्तर पर दुष्प्रचार होने के बाद भी संघ के विचार की स्वीकार्यता बढ़ती जा रही है, उसका कारण है कि समाज 94 वर्षों से संघ को नजदीक से देख-समझ रहा है, इसलिए उसे संघ को लेकर कोई भ्रम नहीं है। संघ के प्रति समाज का जो भरोसा बना है, उसके ही कारण संघ को लेकर जो लोग/वर्ग दुष्प्रचार करते हैं, उनके सब प्रयत्न बेकार जाते हैं। संघ ने अपने आचार-व्यवहार से लंबे समय में समाज का विश्वास अर्जित किया है। उसको इस प्रकार क्षति नहीं पहुँचाई जा सकती है। विरोधियों की इस प्रकार की हरकतों से संघ के प्रति तो अविश्वास का वातावरण नहीं बनता, बल्कि यह वर्ग स्वयं ही झूठा और समाजद्रोही साबित हो जाता है।

रविवार, 4 अगस्त 2019

नैसर्गिक सौंदर्य के मध्य स्थित तप-स्थली ‘धूनी-पानी’




किसी भी स्थान के नामकरण के पीछे कोई न कोई कहानी होती है। धार्मिक पर्यटन स्थल पर यह नियम विशेष रूप से लागू होता है। अमरकंटक के धूनी-पानीकी कहानी भी बड़ी रोचक है। स्वाभाविक ही किसी स्थान के नाम में धूनीसे आभास होता है कि यह कोई ऐसा स्थल है जहाँ साधु-संन्यासी धूनी रमाते होंगे। पानीबताता है कि वहाँ जल का विशेष स्रोत होगा। धूनी और पानी दोनों से मिलकर ही धूनी-पानीनामकरण हुआ होगा। श्री नर्मदा मंदिर से श्री नर्मदा मंदिर से दक्षिण दिशा की ओर लगभग 5 किमी की दूरी तय करने पर हम इस स्थान पर पहुँच चुके हैं। यह स्थान चारों ओर से ऊंचे सरई, आम, जामुन और कटहल के पेड़ों से घिरा हुआ है। यहाँ नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य पूर्णता के साथ उपस्थित है। शांत-सुरम्य वन के बीच में हमें एक छोटा-सा दोमंजिला मंदिरनुमा भवन दिखाई दिया। आज इसी भवन में धूनीरमा कर साधु बैठते हैं। पूर्व में कभी आसमान के नीचे साधु खुले में धूनी रमाते रहे होंगे, बाद में बारिश से बचने के लिए भवन बना लिया। पास में ही यहाँ जलकुण्ड दिखाई देते हैं, जो यहाँ के साधुओं के लिए पानीके स्रोत हैं। नर्मदा परिक्रमावासियों के लिए भी यहाँ स्थान बना हुआ है। जहाँ वे ठहर सकते हैं और भोजन इत्यादि बना-खा सकते हैं। माँ नर्मदा की परिक्रमा के दौरान परिक्रमावासी यहाँ आते ही हैं। उन दिनों इस स्थान पर विशेष चहल-पहल रहती है। सामान्य दिनों में भी यहाँ बैठ कर प्रकृति के सान्निध्य और उसके ममत्व से उत्पन्न आनंद की सहज अनुभूति की जा सकती है।


          जून का एक दिन था, जब हम धूनी-पानीपहुँचे थे, तब एक संत यहाँ धूनी रमा कर बैठे थे। वैसे तो अमरकंटक वनप्रदेश होने के कारण अपेक्षाकृत ठंडा रहता है, फिर भी मई-जून की गर्मी के भी अपने तेवर हैं। धूनी के पास संत रामदासजी महाराज अन्य साधुओं से थोड़ा अलग ही दिखाई दे रहे थे। उनके समीप कुछ पुस्तकें रखी थीं। यहाँ बैठकर वह माँ नर्मदा की स्तुति में गीत और कविताएं रच रहे हैं। मंदिर के भीतर मन को प्रसन्न करने वाली माँ नर्मदा की मोहक प्रतिमा तो थी ही, पूजा के आले में युवा नायक स्वामी विवेकानंद का चित्र भी रखा था। उनके गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस और माँ शारदा का चित्र भी सुशोभित हो रहा था। स्वामी विवेकानंद ऐसे संन्यासी रहे, जिन्होंने सोये हुए राष्ट्र का गौरव जगाया, जिन्होंने भारतीय संस्कृति की ध्वजा विश्व पटल पर फहराई। निश्चित ही हमारे संन्यासियों को स्वामी विवेकानंद के संन्यास जीवन को अपना आदर्श बनाना चाहिए।


          अपन राम ने धूनी के पास बैठकर काफी देर तक उदासीन संत रामदासजी महाराज के साथ लंबा सत्संग किया। बहुत आनंद आया। उन्होंने यह भी बताया कि अपनी युवावस्था में वह घोर कम्युनिस्ट हुआ करते थे, एकदम नास्तिक, धर्म को अफीम मानने वाले, किंतु आज वह आध्यात्मिक जीवन जी रहे हैं।  उन्होंने ही बताया कि किसी समय में भृगु ऋषि ने यहाँ धूनी रमा कर तपस्या की थी। यहाँ पानी का स्रोत नहीं था। उन्हें पानी लेने के लिए थोड़ी ही दूर स्थित चिलम पानीजाना पड़ता था। पानी लेने जाने में संभवत: उन्हें कष्ट नहीं भी होता होगा किंतु जंगल के जीव-जन्तु जो भृगु ऋषि के साथी भी थे, उन्हें भी पानी के लिए भटकना पड़ता था। अपने साथियों की सुविधा के लिए उन्होंने जल स्रोत के लिए माँ नर्मदा से प्रार्थना की, तब धूनीके समीप ही पाँच जल स्रोत फूट पड़े। यह भारतीय संस्कृति का आधार है कि यहाँ सिर्फ अपने बारे में विचार नहीं किया जाता, बल्कि प्राणी मात्र की चिंता रहती है। आज भी यहाँ पानी के वे कुण्ड हैं। भवन के दाहिनी ओर अमृत कुण्ड और बांई ओर सरस्वती कुण्ड है। इन दोनों कुण्डों के अलावा तीन छोटे कुण्ड भी हैं- भृगु कुण्ड, नारद कुण्ड और मोहान कुण्ड। माँ नर्मदा की कृपा से धूनी के समीप पाँच जलस्रोत के प्रकट होने के कारण ही इस स्थान का नाम धूनी-पानी पड़ गया। यहाँ फलों-फूल के पेड़ों से समृद्ध बगीचा भी है। संत रामदासजी महाराज ने उस दिन हमें खूब सारे मीठे आम दिए, जो यहीं के पेड़ो से टपके थे। धूनी-पानी के संबंध में एक और महत्व की बात है। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ अनेक ऋषि-मुनियों ने यज्ञ किये थे, इसलिए आज भी यहाँ जमीन की खुदाई करने पर राख जैसी मिट्टी निकलने लगती है।
          धूनी-पानी धार्मिक तपस्थली ही नहीं, अपितु प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण स्थान भी है। निश्चित ही प्रकृति प्रेमियों को यहाँ आना सुख देगा। उनके लिए यह स्थान अत्यधिक आनंददायक है। शांत चित्त से यहाँ बैठकर अच्छा समय बिताया जा सकता है। मैं जब यहाँ से लौट रहा था, तो आँखों में माँ नर्मदा की मोहक छवि थी, ध्यान में स्वामी विवेकानंद का जीवन था और कुछ किस्से थे जो उदासीन संत रामदासजी महाराज ने सुनाए थे। थैले में मीठे आम भी थे। प्रकृति का स्नेह भी थोड़ा समेट लिया था। अंतर्मन की वह गूँज भी साफ सुनाई दे रही थी कि भविष्य में जब भी अमरकंटक प्रवास होगा, धूनी-पानी अवश्य आऊंगा।




मंगलवार, 23 जुलाई 2019

चंद्रमा पर भारत का स्वाभिमान


अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत नित-नयी सफलताएं प्राप्त कर रहा है। भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरोने 22 जुलाई को चंद्रयान-2 का प्रक्षेपण करके अंतरिक्ष में सफलता की एक और लंबी छलांग लगाई है। इस उपलब्धि से सभी भारतीयों का स्वाभिमान भी चंद्रमा पर पहुंच गया है। भारत के वैज्ञानिकों ने अपनी मेधा से उस अभिजात्य सोच को जोरदार जवाब दिया है, जो भारत को कमतर आंकती है। अमेरिका के प्रमुख समाचार-पत्र द न्यूयार्क टाइम्सने 28 सितंबर, 2014 को एक कार्टून प्रकाशित किया था, जिसमें दिखाया गया कि एलिट स्पेस क्लबमें प्रवेश के लिए भारतीय किसान अपनी गाय को लेकर पहुँचा है। वह किसान दरवाजा खटखटा रहा है और भीतर एलिट स्पेस क्लब में बैठ कर दो अमेरिकन भारतीय बजट में मंगल अभियानकी घोषणा को पढ़ रहे हैं। कार्टूनिस्ट महाशय हेंग किम सोंग ने अपनी अभिजात्य सोच को कार्टून में प्रकट किया।
          दरअसल, भारत के संबंध में उनकी राय वही है, जो उन जैसे पश्चिम के अन्य लोगों के दिमाग में बैठाई गई कि यह देश साँप-सपेरों और गो-पालकों का है। आश्चर्य है कि जब वह भारत का उपहास उड़ाने के लिए यह कार्टून बना रहे थे, तब उनके दिमाग में इसरो की सफलताओंकी गूँज कैसे नहीं पहुंची थी? हम 24 सितंबर, 2014 में मंगलयान की सफलतम लॉन्चिंग कर चुके थे। भारत दुनिया का एकमात्र देश है, जो मंगल पर पहुंचने के अपने पहले ही प्रयास में सफल रहा। कहीं, महाशय हेंग इसी बात से आहत तो नहीं कि भारत जैसे देश अंतरिक्ष में उनसे ऊंची छलांग कैसे लगा रहे हैं? देश-विदेश से भारत के स्वाभिमानी लोगों ने द न्यूयार्क टाइम्स के प्रबंधन को अपनी आपत्तियां भेंजी और सोशल मीडिया पर अभियान भी चलाया। परिणाम यह हुआ कि द न्यूयार्क टाइम्स के संपादकीय पृष्ठ के संपादक एंड्रयू रोसेंथल को इस कार्टून के लिए माफी माँगनी पड़ी। उसने स्वीकार किया कि हजारों पाठकों ने प्रतिक्रिया देकर कार्टून पर आपत्ति जताई थी। मंगलयान के बाद एंटी सैटेलाइट मिसाइल और अब चंद्रयान-2 ऐसी ही ओछी सोच को जोरदार उत्तर है।
          पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में वह कर दिखाया, जो शेष विश्व अपेक्षा नहीं करता। चंद्रयान-2 भारत की विशेष उपलब्धि है। चंद्रयान-1 की खोजों को आगे बढ़ाने के लिए चंद्रयान-2 को भेजा गया है। चंद्रमा की सतह पर, उसके नीचे और अति विरल वातावरण में पानी के अणुओं के वितरण का अध्ययन करना चंद्रयान-2 का मुख्य उद्देश्य है। उल्लेखनीय है कि चंद्रयान-1 ने चंद्रमा पर पानी के अणुओं की खोज की थी। चंद्रयान-2 चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा। चंद्रमा का यह ऐसा क्षेत्र है, जिसकी अब तक सीधे कोई जांच नहीं हुई है। अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों ने भी अभी तक यहां कोई यान नहीं भेजा है।
          चंद्रयान-2 की सफलता के लिए इसरो के वैज्ञानिक निश्चय ही बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने इसके लिए अथक परिश्रम किया और शुरुआती असफलताओं के बावजूद अपना धैर्य बनाए रखा। हमें भरोसा है कि हमारे वैज्ञानिक वह कर दिखाएंगे, जो अब तक कोई नहीं कर सका है। प्रत्येक नागरिक को अपने वैज्ञानिकों का हौसला बढ़ाना चाहिए।

रविवार, 21 जुलाई 2019

भृगु कमण्डल : आश्चर्यजनक! 12 माह चट्टान में रहता है पानी


अमरकंटक के जंगल में, ऊंचे पहाड़ पर एक चट्टान ऐसी है, जिसमें 12 महीने पानी रहता है। चट्टान में एक छेद है, उसमें हाथ डाल कर अंजुली भर जल निकाल सकते हैं। इस आश्चर्यजनक चट्टान को भृगु का कमंडल कहा जाता है। मेरे मित्र अशोक मरावी और मुकेश ने जब मुझे यह बताया गया, तो उस चट्टान को देखने की तीव्र जिज्ञासा मन में जागी। अगली सुबह इस अनोखी चट्टान को देखने जाने का तय किया। माँ नर्मदा मंदिर से लगभग 4 किमी दूर घने जंगल और ऊंचे पहाड़ पर भृगु कमंडल स्थित है।


          भृगु कमंडल तक पहुँचना कठिन तो नहीं है, लेकिन बाकी स्थानों की अपेक्षा यहाँ पहुँचने में थोड़ा अधिक समय और श्रम तो लगता ही है। कुछ दूरी तक आप मोटरसाइकिल या चारपहिया वाहन से जा सकते हैं, परंतु आगे का रास्ता पैदल ही तय करना होता है। भृगु कमंडल के लिए जाते समय आप एक और नैसर्गिक पर्यटन स्थल धूनी-पानी पर प्रकृति का स्नेह प्राप्त कर सकते हैं। यह स्थान रास्ते में ही पड़ता है। बहरहाल, हम मोटरसाइकिल से भृगु ऋषि की तपस्थली के लिए निकले। रास्ता कच्चा और ऊबड़-खाबड़ था। मोटरसाइकिल पर धचके खाते हुए हम उस स्थान पर पहुँच गए, जहाँ से पैदल आगे जाना था। घने जंगल के बीच स्थित भृगु कमंडल तक पहुँचने के लिए पहले पहाड़ उतरकर धूनी-पानी पहुँचे और फिर वहाँ से आगे जंगल में कीटों और पक्षियों का संगीत सुनते हुए पहाड़ चढ़ते गए। अमरकंटक के जंगलों में पेड़ों पर एक कीट सिकोड़ा पाया जाता है, जो एक विशेष प्रकार से टी-टी जैसी ध्वनि निकालता रहता है। शांत वन में पेड़ों पर झुंड में रहने वाले सिकोड़ा कीट जब टी-टी का सामुहिक उच्चार करते हैं तब विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती है। इस वर्ष जब भोपाल में भी यह ध्वनि सुनाई दी, तब मेरे मित्र हरेकृष्ण दुबोलिया ने उस पर समाचार बनाया था। उसके अनुसार यह कीड़ा हेमिपटेरा प्रजाति का है, जो पेड़ो पर रहकर उसकी छाल से पानी अवशोषित करता है और सूखी पत्तियों को अपना भोजन बनाता है। सिकोड़ा कीट उष्ण कटिबंधीय (गर्म) क्षेत्रों में पाया जाता है। इनके लिए अनुकूल तापमान 40 से 50 डिग्री सेल्सियस के बीच है। तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार जाता है, तो इनकी संख्या तेजी से बढ़ती है, किंतु तापमान जैसे ही 50 डिग्री सेल्सियस के पार जाता है, यह मरने लगते हैं।


          बहरहाल, घने जंगल और पहाड़ों से होकर हम भृगु कमण्डल तक पहुँच गए। ऊंचे पहाड़ पर यह एक निर्जन स्थान है। यहाँ कम ही लोग आते हैं। ध्यान-साधना करने वाले साधुओं का यह प्रिय स्थान है। यहाँ एक बड़ी चट्टान है, जिसे भृगु ऋषि का कमण्डल कहा जाता है। कमण्डल की आकृति की इस चट्टान में एक छेद है, जिसमें हाथ डाल श्रद्धालु पानी निकालते हैं और पास ही प्रतिष्ठित शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस स्थान पर भृगु ऋषि ने कठोर तप किया था, जिसके कारण उनके कमण्डल से एक नदी निकली, जिसे करा कमण्डल भी कहा जाता है। कहते यह भी भृगु ऋषि धूनी-पानी स्थान पर तप करते थे। बारिश के दिनों में वहाँ धूनी जलाना मुश्किल हो जाता था, तब भृगु ऋषि उस स्थान पर आए जिसे आज भृगु कमण्डल कहते हैं। जब ऋषि भृगु यहाँ आए तब उनके सामने जल का संकट खड़ा हो गया। उनकी प्रार्थना पर ही माँ नर्मदा उनके कमंडल में प्रकट हुईं। यहाँ एक सुरंग है, जिसे भृगु गुफा कहा गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि बड़ी-बड़ी चट्टानों के मेल से यह गुफा बनी है। आज भी धार्मिक पर्यटक और श्रद्धालु गुफा में एक ओर से प्रवेश करते हैं और दूसरी ओर से निकलते हैं। बारिश के मौसम में इसी गुफा में ऋषि भृगु धूनी रमा कर तप करते थे।  हमें यहाँ एक बाबा मिला, जिसने यहीं झोंपड़ी बना रखी थी। वह यहीं रहकर पूजा-पाठ करते हैं। बाबा के निर्देश पर उनके एक चेले ने हम सबके लिए चाय बनाई। चाय वाकई शानदार बनी थी। हमने बाबा और उनके चेले को धन्यवाद दिया और वहाँ से लौट पड़े।
भृगु कमंडल (चट्टान) में हाथ डालकर जल निकलता श्रद्धालु
          आश्चर्य का विषय यह है कि मई-जून की गर्मी में भी कमण्डल रूपी इस चट्टान में पानी कहाँ से आता है? ऐसे में धार्मिक मान्यता पर विश्वास करने के अलावा कोई और विकल्प रहता नहीं है। निश्चित ही यह प्रकृति का चमत्कार है। बहरहाल, चमत्कार में भरोसा और रुचि नहीं रखने वालों के लिए भी यह स्थान सुखदायक है। प्रकृति प्रेमियों को ऊंचे पहाड़ पर पेड़ों की छांव में बैठना रुचिकर लगेगा ही, साल के ऊंचे वृक्षों की बीच से होकर यहाँ तक की यात्रा भी आनंददायक है।


शनिवार, 13 जुलाई 2019

ईमानदार समीक्षा के बाद आगे बढ़ें



क्रिकेट की सबसे बड़ी प्रतियोगिता विश्वकपके सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड से हारने के बाद भारतीय टीम की जमकर आलोचना हो रही है। हार का ठीकरा फोडऩे के लिए अलग-अलग सिर तलाशे जा रहे हैं। कुछ लोग विराट कोहली की कप्तानी, टीम के चयन और कुछ लोग धोनी की धीमे खेल पर अंगुली उठा रहे हैं। यह बात सही है कि सेमीफाइनल में भारत की टीम ने वैसा प्रदर्शन नहीं किया, जिसकी उससे अपेक्षा थी। इस विश्वकप में भारतीय टीम को सबसे अधिक मजबूत माना जा रहा था। विश्वकप के पहले चरण में सात मुकाबले जीतकर भारतीय क्रिकेट टीम ने अपनी दावेदारी को और प्रबल किया। हालाँकि, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और इंग्लैंड से हुए मुकाबले में भारतीय क्रिकेट दल की कमजोरियाँ उजागर भी हुई। शीर्ष क्रम के धराशाही होने पर समूची टीम लडख़ड़ा जाती है।
          धीमे खेल के लिए जो लोग पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की आलोचना कर रहे हैं, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि अगर धोनी न होते तो कई मैच में सम्मानजनक स्कोर तक पहुँचना मुश्किल हो जाता। धोनी बहुत अनुभवी खिलाड़ी हैं, वह परिस्थितियों को समझते हैं। इस बात का आश्चर्य जरूर है कि सेमीफाइनल में उन्हें ऊपर क्यों नहीं भेजा गया? विश्वकप-2011 के फाइनल मुकाबले को याद कीजिए, जब धोनी कप्तान थे। सचिन तेंदुलकर और सहवाग के जल्दी आउट होने पर कप्तान धोनी चौथे क्रम पर बल्लेबाजी करने आए और भारत की विजय सुनिश्चित की।
          क्रिकेट संभावनाओं का खेल होने के साथ ही अनुभव, रणनीति और धैर्य का भी खेल है। इसलिए पूरी संभावना है कि यदि न्यूजीलैंड के विरुद्ध शीर्ष क्रम के बिखरने के बाद ऋषभ या कार्तिक की जगह धोनी आए होते तो परिणाम कुछ और होता। धोनी खुद तो भारतीय पारी को संभालते ही, अलबत्ता साथी खिलाड़ी को भी समझाइश देते रहते, जैसा कि उन्होंने रवीन्द्र जडेजा को दीं।
          ‘बीती ताही बिसार दे, आगे की सुधि लेयकहावत पर चलते हुए भारतीय टीम को भविष्य की तैयारियों पर जोर देना चाहिए। क्रिकेट की सबसे बड़ी इस प्रतियोगिता में एक बात साफतौर पर समझ में आई है कि भारतीय टीम का मध्यमक्रम बहुत कमजोर है। वहाँ अनुभवी और अच्छे बल्लेबाज की जरूरत है। मध्यमक्रम में इसी प्रतियोगिता में भारत ने कई प्रयोग करके देख दिए, लेकिन सफलता नहीं मिली। भारतीय टीम को अपनी इस कमजोरी को अविलंब दूर करना चाहिए।
          संभव है कि क्रिकेट के भीतर चलने वाली राजनीति के कारण टीम को पूर्ण आकार देने में दिक्कत आ रही हो। केएल राहुल, विजय शंकर, केदार जाधव, यजुवेंद्र चहल को लगातार अवसर देते रहना, इसी ओर इशारा कर रहे हैं। अंबाती रायडु के अचानक संन्यास लेने से इस बात की चर्चा भी है कि चहेतोंको लगातार अवसर दिए जा रहे हैं। भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड और अन्य समितियों को इस दिशा में तत्काल ध्यान देना चाहिए। भारतीय टीम किसी एक-दो व्यक्ति की पसंद से नहीं चुनी जा सकती। करोड़ो भारतीयों की उम्मीदें इसके साथ जुड़ी होती हैं। इसलिए किस खिलाड़ी को कितना अवसर दिया जाएगा, इस संबंध में एक स्पष्ट और पारदर्शी नीति बनानी चाहिए। ताकि यह भाव किसी भी खिलाड़ी के मन में न आए कि वह चहेता नहीं है, इसलिए उसे कम अवसर दिए गए। सबको समान अवसर मिलना चाहिए।
          भारतीय टीम ने विश्वकप में एक अनुशासित और संगठित दल के रूप में प्रदर्शन किया, उसके कारण ही पहले चरण में शानदार सफलताएं प्राप्त हुईं। टीम में यह अनुशासन बना रहना चाहिए। किसी एक पर हार का ठीकरा फोडऩे से ज्यादा अच्छा है कि ईमानदार समीक्षा के बाद भविष्य की तैयारियाँ प्रारंभ की जाएं।

बुधवार, 10 जुलाई 2019

छत्तीसगढ़ी संस्कृति का जीवंत संग्रहालय ‘पुरखौती मुक्तांगन’

चिलचिलाती गर्मी में कहीं घूमने निकलना कतई आनंददायक नहीं होता है। परंतु, अपन तो ठहरे यात्रा प्रेमी। संयोग से जून के पहले सप्ताह में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर पहुँच गए। जब पहुँच गए तो फिर अपन राम का मन कहाँ होटल के आरामदेह बिस्तर पर लगता। जिस कार्य से रायपुर पहुँचे थे, सबसे पहले सुबह उसे पूर्ण किया। फिर दोपहर भोजन के बाद नये रायपुर की ओर निकल पड़े। नया रायपुर मुख्य शहर से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर बसाया गया है, जिसे अब अटल नगर के नाम से जाना जाता है। छत्तीसगढ़ की पूर्व सरकार ने भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के देहावसान के बाद उनके प्रति कृतज्ञता एवं श्रद्धा व्यक्त करने के लिए नये रायपुर का नाम अटल नगरकर दिया। उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बनाये जाने की माँग लंबे समय से उठती रही, जो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वर्ष 2000 में 1 नवंबर को मान्य हुई और मध्यप्रदेश की गोद से निकलकर 26वें राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ ने अपनी यात्रा प्रारंभ की। उस समय छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े शहर रायपुर को राजधानी बनाया गया। अब प्रशासकीय मुख्यालय के लिए नियोजित ढंग से नये रायपुर को विकसित किया जा रहा है। आठ जून की शाम को पुरखौती मुक्तागंन देखने के लिए हम नये रायपुर आये थे।


           पुरखौती मुक्तांगन नया रायपुर स्थित एक पर्यटन केंद्र है। इसका लोकार्पण भारत के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने वर्ष 2006 में किया था। मुक्तांगन 200 एकड़ भूमि पर फैला एक तरह का खुला संग्रहालय है, जहाँ पुरखों की समृद्ध संस्कृति को संजोया गया है। यह परिसर बहुत ही सुंदर ढंग से हमें छतीसगढ़ की लोक-संस्कृति से परिचित करता है। वनवासी जीवन शैली और ग्राम्य जीवन के दर्शन भी यहाँ होते हैं। छत्तीसगढ़ के प्रमुख पर्यटन केंद्रों की जानकारी भी यहाँ मिल जाती है- जैसे चित्रकोट का विशाल जलप्रपात जिसे भारत का नियाग्रा फॉलभी कहा जाता है, दंतेवाडा के समीप घने जंगल में ढोलकल की पहाड़ी पर विराजे भगवान श्रीगणेश, कबीरधाम जिले के चौरागाँव का प्रसिद्ध प्राचीन भोरमदेव मंदिर इत्यादि। मुक्तांगन में छतीसगढ़ के पर्यटन स्थलों की यह प्रतिकृतियां दो उद्देश्य पूर्ण करती हैं। एक, आप उक्त स्थानों पर जाये बिना भी उनकी सुंदरता एवं महत्व को अनुभव कर सकते हैं। दो, यह प्रतिकृतियां मुक्तांगन में आने वाले पर्यटकों को अपने मूल पर आने के लिए आमंत्रित करती हैं।

            जैसे ही हम पुरखौती मुक्तांगन पहुँचे, तो उसकी बाहरी दीवार को देखकर ही मन प्रफुल्लित हो उठा। क्या सुंदर चित्रकारी बाहरी दीवार पर की गई है, अद्भुत। दीवार पर छत्तीसगढ़ की परंपरागत चित्रकारी से लोक-कथाओं को प्रदर्शित किया गया है। भीतर जाने से पहले सोचा कि बाहरी दीवार को ही अच्छे से निहार लिया जाए और उस पर बनाए गए चित्रों से भी छत्तीसगढ़ी संस्कृति की कहानी को देख-सुन लिया जाए। मुक्तांगन में प्रवेश के लिए टिकट लगता है, जिसका जेब पर कोई बोझ नहीं आता। अत्यंत कम खर्च में हम अपनी विरासत का साक्षात्कार कर पाते हैं। हम तीन लोग थे- शुभम गुप्ता, जो रायपुर में एक कम्प्युटर शिक्षण संस्थान एवं स्कूल का संचालन करते हैं और इंद्रभूषण मिश्र, जो पत्रकार हैं, फिलहाल हरिभूमि समूह को सेवाएं दे रहे हैं। इंद्रभूषण बिहार प्रांत से हैं। जैसे ही हमने भीतर प्रवेश किया, आदमकद प्रतिमाओं ने हमारा स्वागत किया। एक लंबा रास्ता हमें ‘छत्तीसगढ़ चौक’ तक लेकर जाता है, जिसके दोनों ओर लोक-जीवन को अभिव्यक्त करतीं आदमकद प्रतिमाएं खड़ी हैं। चौक से एक राह ‘आमचो बस्तर’ की ओर जाती है, जहाँ बस्तर की लोक-संस्कृति को प्रदर्शित किया गया है। दूसरी ओर छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण स्थानों एवं नृत्य की झलकियाँ प्रदर्शित हैं, जिसमें पंथी नृत्य, गेड़ी नृत्य, सुवा नृत्य और राउत नाच इत्यादि को आदमकद प्रतिमाओं के जरिये दिखाया गया है। थोड़ा डूब कर देखो तो लगने लगेगा कि यह प्रतिमाएं स्थिर नहीं हैं, सचमुच नाच रही हैं। मूर्तियों के चेहरों के भाव जीवंत दिखाई देते हैं। आनंद से सराबोर हाव-भाव देखकर अपना भी नाचने का मन हो उठे। छत्तीसगढ़ के निर्माण में जिन महापुरुषों का योगदान है, उनकी आदमकद प्रतिमाएं भी इस मुक्तांगन में हैं। 


            ‘आमचो बस्तर’ नाम से विकसित प्रखंड में बस्तर की जीवन शैली और संस्कृति के जीवंत दर्शन होते हैं। जीवंत इसलिए, क्योंकि इस प्रखंड के निर्माण एवं इसको सुसज्जित करने में बस्तर अंचल के ही जनजातीय लोक कलाकारों एवं शिल्पकारों का सहयोग लिया गया है। यही कारण है कि यहाँ बनाई गई गाँव की प्रतिकृतियां बनावटी नहीं लगतीं। आमचो बस्तर का द्वार जगदलपुर के राजमहल का सिंग डेउढ़ी जैसा बनाया गया है। समीप में ही विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरे का रथ भी रखा गया है। एक गोलाकार मण्डप में चित्रों के माध्यम से बस्तर दशहरे के संपूर्ण विधान को भी प्रदर्शित किया गया है। इस प्रखंड में धुरवा होलेक, मुरिया लोन, कोया लोन, जतरा, अबूझमाडिय़ा लोन, गुन्सी रावदेव, बूढ़ी माय, मातागुड़ी, घोटुल, फूलरथ, नारायण मंदिर, गणेश विग्रह, राव देव, डोलकल गणेश, पोलंग मट्टा, उरूसकाल इत्यादि को प्रदर्शित किया गया है। होलेक और लोन अर्थात् आवास गृह। एक स्थान पर लोहा गलाकर औजार बनाने की पारंपरिक विधि ‘घानासार’ को भी यहाँ प्रदर्शित किया गया है। पुरखौती मुक्तांगन को अभी और विकसित किया जाना है। पूर्ववर्ती सरकार की इच्छा इसे आदिवासी अनुसंधान केंद्र एवं संग्रहालय के रूप में विकसित करने की थी।


पारंपरिक छत्तीसगढ़ी खान-पान का ठिहाँ- गढ़ कलेवा :
पुरखौती मुक्तांगन की यादों को समेट कर हम वहाँ से निकले और छत्तीसगढ़ के पारंपरिक खान-पान का स्वाद लेने के लिए पहुँच गए ‘गढ़ कलेवा’। यह स्थान महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय, रायपुर के परिसर में है। रायपुर आने वाले पर्यटकों और जो लोग अपने पारंपरिक खान-पान से दूर हो चुके हैं, उन्हें छत्तीसगढ़ी व्यंजन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 26 जनवरी, 2016 को गढ़ कलेवा का शुभारंभ हुआ। गढ़ कलेवा का संचालन महिला स्व-सहायता समूह द्वारा किया जाता है। यहाँ भी छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति का अनुभव किया जा सकता है। बैठने के लिए बनाए गए कक्षों/स्थानों के नाम इसी प्रकार के रखे गए हैं, यथा- पहुना, संगवारी, जंवारा इत्यादि। गढ़ कलेवा परिसर में आंतरिक सज्जा ग्रामीण परिवेश की है। बरगद पर मचान बनाया गया है। बैठने के बनाए गए कक्षों को रजवार समुदाय के शिल्पियों ने मिट्टी की जालियां और भित्ति चित्र से सज्जित किया है। बस्तर के मुरिया वनवासियों ने लकड़ी की उत्कीर्ण बेंच, स्टूल, बांस के मूढ़े बनाये हैं। अपन राम ने यहाँ चीला, फरा, बफौरी जैसे छत्तीसगढ़ी व्यंजन का स्वाद लिया। इसके अलावा चौसेला, घुसका, हथफोड़वा, माड़ा पीठा, पान रोटी, गुलगुला, बबरा, पिडिय़ा, डेहरौरी, पपची इत्यादि भी उपलब्ध थे, लेकिन बफौरी थोड़ी भारी हो गई। पेट ने इस तरह जवाब किया कि ‘चहा पानी ठिहाँ’ पर चाह कर भी करिया चाय, दूध चाय, गुड़ चाय और काके पानी का स्वाद नहीं ले सका। अधिक खाने के बाद उसे पचाने के लिए तेलीबांधा तालाब पर विकसित ‘मरीन ड्राइव’ टहलने का आनंद भी उठाया जा सकता है। शाम के बाद यहाँ टहलने के लिए बड़ी संख्या में लोग आते हैं। रायपुर की मरीन ड्राइव देर रात तक गुलजार रहती है।


            कुल मिलाकर रायपुर के प्रवास को ‘पुरखौती मुक्तांगन’ और ‘गढ़ कलेवा’ ने यादगार बना दिया। यदि आप कभी रायपुर जायें तो इन दोनों जगह जाना न भूलियेगा। पुरखौती मुक्तांगन में आपको तीन-चार घंटे का समय लेकर जाना चाहिए। गर्मी के दिनों में जाएं तो शाम के समय का चयन करें। सर्दी में किसी भी समय जा सकते हैं।




मंगलवार, 25 जून 2019

बेटी के लिए कविता-7

मैं भी जाऊंगी स्कूल

इक स्वप्न था
तुम्हारी आँखों में उस रात
सोते समय
कहानी नहीं सुनी तुमने
कंधे पर टिका कर सिर
सोने की ज़िद भी नहीं की तुमने
प्यार से बालों में
अंगुलियां फिराने की चाह भी
कहाँ की तुमने।
उस रात, उस समय
नींद की गोद में जाने से पहले
इक भरोसा, इक वायदा
चाहती थी तुम।
रख कर मेरी बड़ी हथेली पर
अपना नन्हा-सा हाथ
आश्वस्त होकर
कही अपने मन की बात
ख्वाब को कर दिया बयां
पिताजी,
मैं भी जाऊंगी स्कूल।
तैर गई
एक हल्की मुस्कान
मेरे चेहरे पर
हौले से थपकी दी मैंने
और तुम समझ गईं
अगली भोर में
इक नयी सुबह
इक नया सूरज आएगा।

- लोकेन्द्र सिंह 

सोमवार, 17 जून 2019

संत कबीर की तपस्थली 'कबीर चबूतरा'


अमरकंटक की पहली पहचान माँ नर्मदा नदी के उद्गम और वन्यप्रदेश के रूप में है। लेकिन, यह सामाजिक आंदोलन के प्रख्यात संत कबीर महाराज की तपस्थली भी है। अमरकंटक में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा पर स्थित कबीर चबूतरा वह स्थान है, जहाँ कबीर की उपस्थिति को आज भी अनुभव किया जा सकता है। कबीर ऐसे संत हैं जिन्होंने सामाजिक कुरीतियों पर बिना किसी भेदभाव के चोट कर समाज को बेहतर बनाने का प्रयास किया। कबीर आज के विद्वानों की तरह संप्रदाय और जाति के आधार पर घटनाओं/परंपराओं/समस्याओं को चीन्ह-चीन्ह कर आलोचना नहीं करते थे। जब वह मूर्तिपूजक हिंदुओं की आलोचना में कहते हैं कि 'पाथर पूजे हरि मिलें तो मैं पूजू पहाड़, याते चाकी भली पीस खाये संसार' तब वह निराकार को पूजने वाले मुस्लिम समाज को भी आड़े हाथ लेते हुए कहने से चूकते नहीं हैं- 'कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई बनाय, ता चढि़ मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय।' सबको समान दृष्टि से देखने वाले ऐसे संत कबीर की तपस्थली होने के कारण कबीर चबूतरा का अपना महत्त्व है। यह केवल धार्मिक पर्यटन का प्रमुख स्थल मात्र नहीं है, बल्कि कबीर के नजदीक जाने की भी जगह है। यहाँ प्रकृति भी हमें कबीर के अहसास से मिलाने में भरपूर सहयोग करती है। कबीर चबूचरे पर आच्छादित घने साल के वृक्षों की सरसराहट, पक्षियों की आवाजें और कबीर कुण्ड से प्रवाहित जल धार, मानो सब के सब सुबह-सबरे कबीर के दोहे गुनगुनाते हैं। इसलिए यहाँ आने पर हमें कबीरत्व को आत्मसात करने का प्रयास अवश्य करना चाहिए। अगर हम सफल हो गए तो निश्चय जानिए कि हमारे जीवन को एक नई दिशा मिलेगी- समाज जीवन की दिशा। आप सुंदर समाज बनाने की प्रक्रिया का उपकरण बनने के लिए लालायित हो उठेंगे।
           प्राकृतिक सौंदर्य से समृद्ध इस स्थान पर महान गुरुओं की वाणी की सुवास भी हम महसूस कर सकते हैं। यह मिलन का अद्भुत स्थान है। यहाँ दो प्रदेशों का मिलन होता है। प्रकृति और दर्शन भी यहाँ एकसाथ उपस्थित होते हैं। लौकिक और अलौकिक विमर्श का स्थान भी यही है। सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण दो पंथों (कबीरपंथ और सिख पंथ) के प्रणेताओं संत कबीरदास और गुरु नानकदेव महाराज का मिलन भी सात्विक ऊर्जा से सम्पन्न इसी स्थान पर हुआ। लगभग 500 वर्ष पूर्व न केवल दो दिव्य आत्माओं का मिलन हुआ, बल्कि उन्होंने समाज की उन्नति के लिए यहाँ एक वटवृक्ष के नीचे बैठकर विमर्श भी किया। निश्चित ही दोनों भविष्यद्रताओं ने समानतामूलक समाज के निर्माण पर विमर्श किया होगा। चूँकि दोनों ही गुरु ऐसे समाज का सपना लेकर आजीवन चले, जिसमें धार्मिक असहिष्णुता, कट्टरता, कटुता, वैमनस्य, जात-पांत का भेद, ऊंच-नीच, असमानता के लिए कोई स्थान नहीं है। दोनों महापुरुषों की चिंतन के साक्षी के तौर पर वह वटवृक्ष अब भी यहाँ उपस्थित है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह बूढ़ा वटवृक्ष दोनों महान संतों का संदेश सुनाने के लिए अब तक यहाँ खड़ा है।  
कबीर वटवृक्ष : कबीर महाराज और गुरु नानकदेव के मिलन एवं सत्संग का स्थल
          वर्ष 1569 में जब सदगुरु कबीरदास जी महाराज जगन्ननाथ पुरी के लिए जा रहे थे, तब वह अमरकंटक में इस स्थान पर रुके। परंतु, उन्हें यह स्थान इतना अधिक अच्छा लगा कि कुछ समय के लिए यहीं ठहर गए। यहाँ ध्यान-साधना की और अपने शिष्यों को उपदेश दिया था। कबीर साहेब के मुख्य शिष्य धर्मदास महाराज नित्य यहीं अपने सद्गुरु के सम्मुख बैठकर उनसे पाथेय प्राप्त करते थे। सद्गुरु कबीर महाराज के सत्यलोक गमन के बाद कबीरपंथ के प्रचार की जिम्मेदारी धर्मदास महाराज ने ही संभाली थी। धर्मदास जी मध्यप्रदेश के ही बांधवगढ़ के निवासी थे। प्रारंभ से ही संत-संगति में उनका मन लगता था। सद्गुरु कबीर महाराज से उनकी पहली भेंट मथुरा में हुई थी। उसके बाद संत कबीरदास जी से दूसरा साक्षात्कार मोक्ष की नगरी काशी में हुआ। धर्मदास जी शुरुआत में कट्टर मूर्तिपूजक थे, लेकिन सद्गुरु कबीरदास जी के प्रवचन सुनकर उन्होंने निर्गुण भक्ति को अपना लिया। बहरहाल, कबीर चबूतरा में स्थित कबीर कुटी सद्गुरु कबीर धरमदास साहब वंशावली प्रतिनिधि सभा दामाखेड़ा जिला बलौदा बाजार के अधीनस्थ लगभग 500 साल पुराना आश्रम है। यहां की व्यवस्था कबीर के वंशज और गद्दी दामाखेड़ा के आचार्य द्वारा नियुक्त महंत ही करते हैं। कबीरपंथियों के लिए इस स्थान का विशेष महत्त्व है।
          नर्मदा उद्गम स्थल से कबीर चबूतरा की दूरी तकरीबन पाँच किलोमीटर है। अमरकंटक आने वाले ज्यादातर श्रद्धालु और पर्यटक कबीर चबूतरा जरूर आते हैं। यहाँ प्रमुख स्थल हैं- कबीर कुटी, कबीर कुण्ड, कबीर चबूतरा और कबीर वटवृक्ष। कबीर कुटी अब एक तरह से कबीर मंदिर है। कबीर चबूतरा वही स्थान है, जहाँ सद्गुरु अपने शिष्यों को उपदेश देते थे। कबीर चबूतरा के पास ही कबीर वटवृक्ष है, जहाँ संत कबीरदास और गुरु नानकदेव महाराज के बीच अध्यात्म पर चर्चा हुई। यहाँ एक कुण्ड भी है। इस कबीर कुण्ड की विशेषता यह है कि प्रात:काल इसका पानी दूधिया हो जाता है। कुण्ड में दूधिया पानी की महीन धाराएं निकलती हैं, जिसके कारण कुण्ड का पूरा जल दूधिया हो जाता है। इन धाराओं को देखने के लिए सुबह छह बजे के आसपास हमें यहाँ पहुँचना होता है। आश्रम में रहने वालों के लिए यह कुण्ड ही मुख्य जलस्रोत है।
          अपने अमरकंटक प्रवास के दौरान 1 जून 2017 को पहली बार मैं यहाँ पहुँचा। पहले ही अनुभव में प्राकृतिक-नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर इस स्थान ने अमिट छाप मन पर छोड़ दी। अच्छी बात यह है कि यहाँ अभी तक बाजार की पहुँच नहीं हुई है। इसलिए यह तीर्थ-स्थल अपने मूल को बचाए हुए है। यहाँ के वातावरण में अब तक गूँज रहे कबीर के संदेश को अनुभूत करने के लिए लगभग तीन-चार घंटे तक यहाँ रहा। यकीन मानिये, माँ नर्मदा के तट पर बैठना और यहाँ कबीरीय वातावरण में बैठना, अमरकंटक प्रवास के सबसे सुखकर अनुभव रहे। उस समय आश्रम में रह रहे कंबीरपंथी संन्यासी रुद्रदास के पास बैठकर कबीर वाणी सुनी-
कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई।
अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई ॥
अर्थात् कबीर कहते हैं- 'प्रेम का बादल मेरे ऊपर आकर बरस पड़ा, जिससे अंतरात्मा तक भीग गई, आस-पास पूरा परिवेश हरा-भरा हो गया, खुश हाल हो गया, यह प्रेम का अपूर्व प्रभाव है। हम इसी प्रेम में क्यों नहीं जीते।' यकीनन, कबीर की वाणी हमारी अंतरात्मा को भिगो देती है। कबीर चबूतरा से जब लौटे तो लगा कि कबीर प्रेम गहरे पैठ गया है। अंतर्मन एक अल्हदा अहसास में डूबा हुआ है।
कबीर चबूतरा : कबीर की तपस्थली, इसी स्थान पर उन्होंने धर्मदास महाराज को उपदेश दिए थे

रविवार, 16 जून 2019

पिता का साथ

पिता का साथ
दम भर देता है
सीने में
पकड़कर उसका हाथ
कोई मुश्किल नहीं होती
जीने में।

पिता के कंधे चढ़कर
सूरज को भींच सकता हूं
मुट्ठी में
उसकी मौजूदगी संबल देती है
पहाड़ों से भी टकरा सकता हूं
रास्तों में।

पिता पेड़ है बरगद का
सुकून मिलता है उसकी
छांव में
मुसीबत की भले बारिश हो
कोई डर नहीं, वो छत है
घर में।
- लोकेन्द्र सिंह -
(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)


वीडियो देखिये... 

शुक्रवार, 14 जून 2019

अभिव्यक्ति की सीमाएं याद दिलाने का समय


'अभिव्यक्ति की आजादी' पर एक बार फिर देशभर में विमर्श प्रारंभ हो गया है। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर विवादित टिप्पणी करने और वीडियो शेयर करने के मामले में एक स्वतंत्र पत्रकार प्रशांत कनौजिया की गिरफ्तारी से यह बहस प्रारंभ हुई है। इस बहस में एक जरूरी पक्ष 'अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाएं एवं मर्यादा' पर तथाकथित प्रगतिशीलों को छोड़कर हर कोई बात कर रहा है। प्रशांत 'द वायर' जैसी प्रोपोगंडा वेबसाइट के लिए काम कर चुके हैं। जब पत्रकारों ने प्रशांत के फेसबुक और ट्वीटर पेज देखे, तब ज्यादातर की राय यही थी कि वह एक पत्रकार की भूमिका में काम नहीं कर रहा। उसकी ज्यादातर टिप्पणियां आपत्तिजनक और पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। पत्रकार की भूमिका निष्पक्ष होकर सत्य को समाज के सामने लाने की होती है, न कि अफवाहों को फैलाना। प्रशांत अकसर मोदी सरकार, हिंदू समाज एवं हिंदू संगठनों के संबंध में भ्रामक जानकारियां अपने सोशल मीडिया मंचों से जारी करता रहा है। यह सब जानने के बाद भी उदारता दिखाते हुए पत्रकारों ने कहा कि प्रशांत की टिप्पणियां सही नहीं हैं, लेकिन उत्तरप्रदेश पुलिस को उसे गिरफ्तार नहीं करना चाहिए था। जब सर्वोच्च न्यायालय में यह प्रकरण पहुँचा तब वहाँ भी माननीय न्यायमूर्तियों ने इसी तरह की टिप्पणी की- 'हम पत्रकार के ट्वीट की सराहना नहीं करते लेकिन उनकी गिरफ्तारी नहीं हो सकती।'
            सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तरप्रदेश सरकार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की याद दिलाई और कहा कि लोगों की आजादी से कोई समझौता संभव नहीं है। यह संविधान की ओर से दिया गया अधिकार है जिसका कोई उल्लंघन नहीं कर सकता। अब यहाँ एक संकट खड़ा हो जाता है कि क्या संविधान किसी को अभिव्यक्ति की इतनी अधिक आजादी देता है कि वह किसी के चरित्र की हत्या कर दे? क्या किसी का मान-मर्दन करना अभिव्यक्ति की आजादी है? हम भूल जाते हैं कि संविधान के जिस अनुच्छेद 19(1) में हमें अभिव्यक्ति की आजादी का मौलिक अधिकार दिया गया है, उसी संविधान के अनुच्छेद 19(2) में उस पर युक्ति-युक्त प्रतिबंध लगाया गया है। संविधान निर्माता जानते थे कि मनुष्य अधिकार पाकर अमर्यादित व्यवहार कर सकता है, जो राष्ट्रीय और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए नुकसानदेह हो सकता है। किसी व्यक्ति की गरिमा का हनन करने की स्वतंत्रता भारतीय संविधान नहीं देता है। इसलिए ही संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 19(2) में इस बात की व्यवस्था कर दी कि वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहाँ तक है। यहाँ सर्वोच्च न्यायालय को इस बात का समाधान भी देना चाहिए कि आखिर अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग कैसे रोका जाए? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में अपने विरोधी की प्रतिष्ठा और उसकी छवि को बिगाडऩे वाले लोगों को कैसे सबक सिखाया जाए?
            यह आश्चर्यजनक नहीं है, बल्कि स्वाभाविक ही है कि एडिटर्स गिल्ड जैसी संस्था प्रशांत के समर्थन में खड़ी हो गई है। क्या सिर्फ इसलिए किसी का पक्ष लेना चाहिए कि वह हमपेशे से जुड़ा हुआ है? इस तरह फिर 'गलत को गलत कहने' के पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांत का क्या होगा? क्या एडिटर्स गिल्ड को एक खुला पत्र प्रशांत कनौजिया जैसे पत्रकारों के नाम नहीं लिखना चाहिए, जो पत्रकारिता के सिद्धांतों को तार-तार कर रहे हैं? एडिटर्स गिल्ड को इस समय पत्रकारों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाएं बतानी चाहिए थीं, जो उसने नहीं किया।
            यह भी देखने में आया है कि विशेष प्रकरणों में ही इस प्रकार की संस्थाएं और तथाकथित बुद्धिजीवी सक्रिय दिखाई देते हैं। चूँकि मामला भाजपा शासित राज्य और भाजपा के मुख्यमंत्री से जुड़ा हुआ है, इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर बहस हो रही है। जबकि केरल में कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री पिनरई विजयन और एलडीएफ के दूसरे नेताओं के खिलाफ टिप्पणी के चलते लगभग 138 प्रकरण दर्ज किए गए हैं। किंतु, अभी तक एक भी प्रकरण पर आपत्ति या राष्ट्रव्यापी विरोध दर्ज नहीं कराया गया है। एक ही प्रकार के मामलों में यह अलग-अलग रवैया भी आपत्तिजनक है। एक प्रकार के विरोध में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता असीमित और अनियंत्रित चाहिए और दूसरे प्रकार के विरोध में यह मर्यादित होनी चाहिए। यह दोहरी व्यवस्था क्यों हो? वास्तव में होना यह चाहिए कि संविधान के अनुरूप ही अभिव्यक्ति की आजादी का उपयोग हो। यह उपयुक्त समय है कि प्रशांत कनौजिया के प्रकरण से शुरू हुई बहस में जिम्मेदार संस्थाएं और व्यक्ति अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाएं तय करें। अन्यथा यह मौलिक अधिकार विद्रूप हो जाएगा।

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