सोमवार, 31 अगस्त 2026

वैश्विक पटल पर आरएसएस

न्यूयॉर्क व्याख्यान : ‘साझा मानवता’ का व्यावहारिक मार्ग

न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आरएसएस के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेसन' (Universal Oneness Celebration) कार्यक्रम को संबोधित किया 

न्यूयॉर्क की ऐतिहासिक धरा पर ‘एक विश्व : एक मानवता शिखर सम्मेलन’ में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का उद्बोधन वस्तुतः भारत के शाश्वत आध्यात्मिक बोध और 'वसुधैव कुटुंबकम्' की युगीन अभिव्यक्ति है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जहाँ भौतिकवादी होड़, वैचारिक संकीर्णता, युद्ध की विभीषिका और अविश्वास का अंधकार संपूर्ण मानवता को ग्रस रहा है, वहाँ यह कार्य-आह्वान विश्व को विनाश के गर्त से निकालकर एकात्मता के प्रकाश की ओर ले जाने वाला एक सशक्त मार्गदर्शक सिद्ध होगा। भारत की यह सनातन परंपरा रही है कि जब-जब संसार में घृणा, विभाजन और संघर्ष की लहरें उठी हैं, तब-तब यहाँ के ऋषियों, मनीषियों और विचारकों ने संपूर्ण सृष्टि को एक परिवार मानकर शांति और एकात्मता का संदेश दिया है। ऐसे में याद आता है स्वामी विवेकानंद का शिकागो व्याख्यान। विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद ने रक्त रंजित और युद्धरत विश्व को शांति एवं सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाया था। आज जब आधुनिक सभ्यता तकनीक की पराकाष्ठा पर पहुँचकर भी मानवीय संवेदनाओं के संकट से जूझ रही है, तब सरसंघचालक जी का यह उद्बोधन वैश्विक चिंतन को एक नई दिशा प्रदान करता है।

आरएसएस के सरसंघचालक डॉ भागवत के इस उद्बोधन का सबसे गहरा और व्यावहारिक पक्ष यह है कि यह किसी थोपी गई एकरूपता की बात नहीं करता, बल्कि विविधता के भीतर अंतर्निहित एकता के सत्य को प्रतिष्ठित करता है। एकात्म मानवदर्शन और भारतीय संस्कृति का मूल स्वर सदैव यही रहा है कि मार्गों की भिन्नता सत्य की एकता को बाधित नहीं करती। सरसंघचालक जी ने इस बात को अत्यंत स्पष्टता से रेखांकित किया कि दृढ़ विश्वास और भिन्न मतों के प्रति सम्मान एक साथ सह-अस्तित्व में रह सकते हैं। जब विश्व के विभिन्न समुदाय अपने-अपने आग्रहों और हठधर्मिता के कारण परस्पर टकराव की स्थिति में हैं, तब यह विचार अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि एकता के लिए एकरूपता की आवश्यकता नहीं है, बल्कि प्रत्येक मनुष्य में उसी एकात्म चैतन्य का दर्शन करना आवश्यक है। दूसरे की मानवता और गरिमा की रक्षा करना वास्तव में अपनी ही मानवता को समृद्ध करना है। 

सरसंघचालक जी के भाषण में आत्म-निरीक्षण और उत्तरदायित्व का जो भाव प्रस्तुत किया गया है, वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उस मूल कार्यपद्धति का ही वैश्विक विस्तार है, जहाँ सुधार का आरंभ सदैव 'स्वयं' से होता है। समाज निर्माण अथवा विश्व शांति कोई बाह्य व्यवस्था नहीं है, अपितु यह व्यक्ति के भीतर से आरंभ होने वाली एक निरंतर साधना है। यह आह्वान कि हम सबसे पहले अपने ही आचरण, वचनों और संस्थाओं का परीक्षण करें, धर्म के नाम पर स्वार्थ, घृणा और हिंसा फैलाने वाली प्रवृत्तियों पर एक करारा प्रहार है। सच्चा धर्म कभी विभाजनकारी नहीं हो सकता; धर्म तो वह है जो सबको जोड़े, धारण करे और सबका अभ्युदय करे। जब कोई समाज अपने भीतर के दोषों को स्वीकार कर उन्हें दूर करने का साहस दिखाता है, तभी वह विश्व के समक्ष एक प्रामाणिक उदाहरण प्रस्तुत कर पाता है। 

सच्ची सेवा और आत्मीयता का संदेश भी इस उद्बोधन का एक प्रमुख स्तंभ है। भारतीय चिंतन में सेवा केवल कोई परोपकार या सामाजिक उपक्रम नहीं है, बल्कि वह 'नर सेवा ही नारायण सेवा' का जीवंत प्रकटीकरण है। जब हम किसी भूखे, रोगी, विस्थापित या उपेक्षित मनुष्य की सेवा करते हैं, तो हम किसी पर दया नहीं कर रहे होते, बल्कि अपने ही विराट सामाजिक स्वरूप की उपासना कर रहे होते हैं। आज जब विश्व में सेवा के नाम पर प्रतिस्पर्धा, धर्मांतरण, श्रेय लेने की होड़ और वैचारिक वर्चस्व स्थापित करने के प्रयास दिखाई देते हैं, तब यह उद्बोधन स्मरण कराता है कि सेवा का मूल तत्व निःस्वार्थ समर्पण और मानव-पीड़ा का समूचा निवारण है। विपत्ति के समय किसी अन्य समुदाय को अकेला न छोड़ना और संकट आने से पहले ही आत्मीय संबंधों का निर्माण करना ही वह सुरक्षा कवच है जो भविष्य के संघर्षों को रोक सकता है। 

सरसंघचालक जी के उद्बोधन का एक अन्य अत्यंत सामयिक और दूरगामी आयाम भविष्य के प्रति हमारे नैतिक उत्तरदायित्व तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों से जुड़ा है। तकनीक साधन हो सकती है, साध्य नहीं। यदि तकनीक का विकास मनुष्य की आध्यात्मिक चेतना, गरिमा और स्वतंत्रता का ह्रास करने लगे, तो वह प्रगति विनाशकारी सिद्ध होगी। भारत का दृष्टिकोण सदैव विज्ञान और आध्यात्मिकता के संतुलन का रहा है। विश्व को आज ऐसी प्रौद्योगिकी और नीतियों की आवश्यकता है जो विनाश के स्थान पर निर्माण करें, घृणा के स्थान पर सत्य को स्थापित करें और शक्ति के अहंकार को त्यागकर संपूर्ण सृष्टि के कल्याण में नियोजित हों। 

कहना होगा कि यह संपूर्ण उद्बोधन केवल विचारों का विमर्श नहीं, बल्कि ठोस और स्थानीय स्तर पर किए जाने वाले कर्म का संकल्प है। बड़ी-बड़ी वैश्विक संधियों और सम्मेलनों की सार्थकता इसी बात पर टिकी होती है कि वे समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में क्या परिवर्तन लाते हैं। भारतीय चिंतन सदैव 'आचारः परमो धर्मः' यानी आचरण को ही सर्वोपरि मानता आया है। विश्व के सामने आज प्रश्नों की कमी नहीं है, कमी केवल उस निष्ठा और संकल्प की है जो कथनी को करनी में बदल सके। न्यूयॉर्क के मंच से गूंजा यह स्वर भारत की उस जागृत चेतना का उद्घोष है जो विश्व को टकराव के दलदल से निकालकर एकात्मता, बंधुत्व और शांति के पथ पर अग्रसर करने का सामर्थ्य रखती है। अब समय आ गया है कि विश्व इस संदेश के मर्म को समझे और एक साझा मानव-परिवार के निर्माण के लिए सक्रिय संकल्प के साथ आगे बढ़े।

सोमवार, 24 अगस्त 2026

रक्षाबंधन : समाज की एकता, समरसता और राष्ट्र-रक्षा का पावन संदेश

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बस्तियों में जाकर वंचित वर्ग के बंधुओं को रक्षासूत्र बाँधकर अपनेपन की भावना को करते हैं प्रकट

भारत में उत्सव की अनूठी परंपरा है। ये उत्सव हमारे समाज को एक सूत्र में पिरोने और जीवन मूल्यों को जगाए रखने का काम करते हैं। हमारे प्रत्येक उत्सव की रचना में समाज के लिए जरूरी संदेश हैं। ऐसा ही एक उत्सव है- रक्षाबंधन, जो हमें सामाजिक समरसता का संदेश देता है। आमतौर पर हम इसे भाई-बहन के पवित्र प्रेम के त्योहार के रूप में जानते हैं, लेकिन इसका वास्तविक विचार इससे कहीं अधिक बड़ा और गहरा है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने रक्षाबंधन को अपने छह उत्सवों में शामिल किया है। संघ ने इस पर्व को संपूर्ण समाज को एकजुट करने, आपस में प्रेम-भाव बढ़ाने और देश की रक्षा का संकल्प लेने वाले महापर्व के रूप में देखा और उसे उसी ढंग से मनाना शुरू किया। यह पर्व हमें सिखाता है कि हम अपने समाज, संस्कृति और मातृभूमि की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहें। संघ ने समाज को स्मरण कराया कि रक्षाबंधन केवल एक धागा बांधने की रस्म नहीं है। हमारे यहाँ संबंधों की नींव विश्वास पर टिकी होती है, और यह धागा उसी विश्वास की डोर है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस तरह एक धागा बिखरे हुए अनगिनत मोतियों को जोड़कर एक सुंदर माला बना देता है, ठीक वैसे ही यह रक्षासूत्र भी समाज के अलग-अलग लोगों को आपस में जोड़कर एक कर देता है। पुराने समय में यह पर्व सिर्फ भाई-बहन तक ही सीमित नहीं था। जब भी समाज या देश पर कोई संकट आता था, तो लोग एक-दूसरे को रक्षासूत्र बांधकर साथ खड़े रहने और मदद करने का भरोसा दिलाते थे।

रविवार, 16 अगस्त 2026

आरएसएस बदल रहा है अपना ढांचा

संघ शताब्दी वर्ष : मध्यप्रदेश में अब तीन प्रांत (मध्यभारत , मालवा और महाकौशल) की जगह होंगे 7 संभाग, मध्य भारत में भोपाल एवं ग्वालियर संभाग, मालवा की जगह इंदौर और उज्जैन संभाग, महाकौशल की जगह सागर, रीवा और जबलपुर संभाग

यह आलेख 'आयुध Updates' के मार्च-अप्रैल 2026 अंक में प्रकाशित हुआ है। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर समाज में अब स्वीकार्यता के साथ-साथ एक विश्वास भी बन गया है। सज्जनशक्ति संघ के साथ मिलकर समाज परिवर्तन के आंदोलन से जुड़ना चाहती है, वहीं संघ भी अपने लक्ष्य यानी समाज के साथ एकाकार होने की ओर बढ़ना चाहता है। हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष के बाद अपने अगले पड़ाव की ओर कदम बढ़ा रहा है। शताब्दी वर्ष में अब तक आयोजित कार्यक्रमों में समाज ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया है। समाज की बड़ी ताकत संघ के संपर्क में आई है। इसलिए अपने अगले पड़ाव में संघ समाज की सज्जन शक्ति को साथ लेकर भारत के निर्माण की नयी कहानी लिखने की तैयारी कर रहा है। इसकी एक झलक हरियाणा के पट्टीकल्याणा (समालखा) में आयोजित अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों एवं भविष्य की रणनीति में देखी जा सकती है। पिछले कुछ समय से एक चर्चा बहुत जोरों से थी कि संघ अपनी भौगोलिक संरचना में बदलाव करने जा रहा है, संघ की प्रांत रचना खत्म हो जाएगी, क्षेत्र रचना में भी बदलाव होगा। इस चर्चा पर अब प्रतिनिधि सभा में मुहर लग गई है। हाँ, संघ की भौगोलिक संरचना में बदलाव हो रहा है। अब चर्चा इस बात की अधिक हो रही है कि आखिर संघ को इस परिवर्तन की आवश्यकता क्यों पड़ी?

रविवार, 9 अगस्त 2026

श्रीगुरुजी के ऐतिहासिक ‘तीन पत्र’

संघ शताब्दी वर्ष : गोलवलकर जी ने अपनी देह छोड़ने के पूर्व संघ की आगे की व्यवस्था और स्वयंसेवकों को संदेश देने के लिए तीन पत्र लिखे थे, जो उनके देवलोकगमन के बाद पढ़े गए

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ पत्र लिखने के अभ्यासी थे। पत्रों के माध्यम से श्रीगुरुजी का कार्यकर्ताओं के प्रति स्नेह, राष्ट्रप्रेम और हिन्दू समाज की एकात्मता के प्रति उनका संकल्प स्पष्ट झलकता है। उनके पत्रों में संघ कार्य के विस्तार, वैचारिक स्पष्टता, अनुशासन और व्यक्तिगत जीवन में मूल्यों को अपनाने पर जोर दिया गया है। कार्यकर्ताओं, सामाजिक एवं राजनीतिक नेतृत्व को लिखे उनके अनेक पत्र चर्चित हैं परंतु उनके ‘तीन पत्र’ अत्यंत महत्व के हैं। संघ को जानने-समझने की रुचि रखनेवाले बंधुओं को श्रीगुरुजी के ये तीनों पत्र अवश्य पढ़ना चाहिए। ये पत्र उन्होंने अपनी देह त्यागने से पूर्व लिखे थे। वर्ष 1972 में श्रीगुरुजी का स्वास्थ्य तेजी से गिरना शुरू हो गया था। परंतु, उसके बाद भी उन्होंने क्षणभर भी स्वयं को संघकार्य से अलग नहीं किया। वर्ष 1973 में जब उन्हें यह आभास होने लगा कि अब भौतिक देह से विश्राम लेने का समय आ गया है, तब उन्होंने अपने देहावसान के बाद संघ कार्य की समुचित व्यवस्था के बारे में विचार प्रारंभ कर दिया। इसी क्रम में ये तीन ऐतिहासिक पत्र लिखे गए। श्रीगुरुजी ने 2 अप्रैल 1973 को अपने हाथ से तीन पत्र लिखे और अखिल भारतीय व्यवस्था प्रमुख पांडुरंग पंत क्षीरसागर को सौंप दिए। उन्होंने क्षीरसागर जी को निर्देश दिए कि ये पत्र मेरे जाने के बाद सार्वजनिक रूप से पढ़े जाएं, जिनमें से दो पत्र बालासाहब देवरस पढ़ें। श्रीगुरुजी की इच्छा के अनुरूप तीनों पत्र सुरक्षित रख दिए गए। 5 जून 1973 को श्रीगुरुजी ने अपनी देह का त्याग किया। अगले दिन यानी 6 जून को इस पुण्य आत्मा के पार्थिव शरीर की अंत्येयात्रा प्रारंभ होने के पूर्व इन पत्रों को पढ़कर सुनाया गया। एक पत्र में उनके उत्तराधिकार की घोषणा की गई। दूसरे पत्र में आग्रह किया कि उनका कोई स्मारक नहीं बनाया जाए। वहीं, तीसरे पत्र में उनके हृदय की उदारता एवं व्यक्तित्व की महानता के दर्शन होते हैं, जिसमें वे विनयभाव से क्षमायाचना करते हैं कि उनके व्यवहार से कभी किसी का हृदय दु:खी हुआ हो, तो क्षमा करें। श्रीगुरुजी के ये तीन पत्र ‘बीज’ थे, जिन्होंने आगे चलकर संघ की कार्यपद्धति एवं संस्कृति को समृद्ध किया।

सोमवार, 3 अगस्त 2026

भगवा रंग से चिढ़ क्यों?

राष्ट्रध्वज तिरंगा में सबसे ऊपर है भगवा, भारतीय संस्कृति का का परिचायक, त्याग, वैराग्य, साहस, बलिदान और सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत है भगवा

खेल मैदान में राष्ट्रीय ध्वज के रंगों का समावेश कोई नई बात नहीं है, लेकिन भारत की राजनीति में जब भी केसरिया या नारंगी रंग की बात आती है, एक खास राजनीतिक वर्ग में असहजता साफ दिखने लगती है। आगामी हॉकी विश्व कप 2026 के लिए भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीमों की नई जर्सी लॉन्च हुई है। पारंपरिक नीले रंग की जगह इस बार नारंगी रंग को प्राथमिक किट के रूप में चुना गया है। हॉकी इंडिया के अध्यक्ष और पूर्व दिग्गज खिलाड़ी दिलीप तिर्की ने स्पष्ट किया कि नीले टर्फ पर नीले रंग की जर्सी के कारण विजिबिलिटी (दृश्यता) की व्यावहारिक समस्या आ रही थी और यह सुझाव सीधे खिलाड़ियों एवं कोचिंग स्टाफ की तरफ से आया था। इसके बावजूद, सुदीर्घ अनुभव रखनेवाले राजनीतिक दल के नेताओं और उनके समर्थकों ने इसे लेकर एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा करने का प्रयास किया है। हिन्दू पहचान से चिढ़ने वाले नेताओं का यह बयान आया है कि “देश की पहचान अहिंसा, सत्य और भाईचारे से जुड़ी है और इन्हें बदला नहीं जा सकता”। यह बयान इस बात का प्रमाण है कि कैसे एक विशुद्ध रूप से तकनीकी और खेल संबंधी फैसले को जबरन वैचारिक संघर्ष में घसीटा जा रहा है।

रविवार, 2 अगस्त 2026

गुरु के रूप में मार्गदर्शन करता है ‘भगवा ध्वज’

संघ शताब्दी वर्ष : गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर स्वयंसेवक ‘भगवा ध्वज’ के समक्ष गुरु दक्षिणा समर्पित करते हैं और संघकार्य के प्रति अपना समर्पण बढ़ाने का संकल्प लेते हैं

एआई से निर्मित प्रतीकात्मक चित्र

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भगवा ध्वज को जो स्थान दिया गया है, वह इस संगठन की विशिष्टता को दर्शाता है। संघ के लिए भगवा केवल ध्वज मात्र नहीं है, अपितु यह उसके प्रेरणा और मार्गदर्शन का केंद्र बिन्दु है। संघ में भगवा ध्वज को ‘गुरु’ के स्थान पर प्रतिष्ठित किया गया है। सामान्यतौर पर यही देखने में आता है कि किसी सांस्कृतिक/धार्मिक संगठन का संस्थापक ही उस संगठन के अनुसरणकर्ताओं के लिए गुरु के रूप में सम्मानित होता है। परंतु संघ इस सामान्य परंपरा से अलग लकीर खींचता दिखायी देता है। जिस प्रकार किसी संस्था से सम्बद्ध लोग गुरु के मार्गदर्शन के अनुसार व्यक्तिगत एवं सामाजिक क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक भगवा ध्वज से प्रेरणा प्राप्त कर सामाजिक क्षेत्र में कार्य करते हैं। संघ में गुरु के रूप में भगवा ध्वज को मान्यता दिए जाने का प्रसंग बहुत प्रेरक है। यह एक प्रसंग ही संघ के ध्येय, उसकी कार्यपद्धति और महानता को बताने के लिए पर्याप्त है।

शनिवार, 1 अगस्त 2026

शोर-शराबे में गुम हुआ छात्रों का हित, विपक्ष के निशाने पर रही हिन्दू मान्यताएं

लोकसभा और राज्यसभा में हंगामेदार चर्चा के बीच आखिरकार परीक्षा सुधार का विधेयक ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ पारित हो गया। देश के करोड़ों युवाओं और छात्रों के भविष्य को देखते हुए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दा था। उम्मीद यह थी कि जब प्रश्न पत्र लीक जैसे गंभीर विषय पर संसद में बहस होगी, तो देश को एक ठोस और सर्वसम्मति वाला समाधान देखने को मिलेगा। लेकिन संसद के दोनों सदनों में जो दृश्य देखने को मिला, वह बेहद निराशाजनक रहा। जो विपक्ष कल तक पर्चा लीक के मुद्दे को लेकर सड़कों से लेकर संसद तक हो-हल्ला मचा रहा था, जब विधेयक पर रचनात्मक चर्चा और सुझाव देने का सही समय आया, तब वह पूरी तरह दिशाहीन नजर आया। बहस का रुख परीक्षा प्रणाली के तकनीकी एवं प्रशासनिक सुधारों पर केंद्रित रहने के बजाय ऐसे विषयों की ओर मोड़ दिया गया, जिनका आम छात्रों की समस्याओं और उनके भविष्य से कोई दूर-दूर तक का लेना-देना नहीं था। विशेष रूप से मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के पास यह एक बड़ा अवसर था कि वह परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी और लीक-मुक्त बनाने के लिए अपने ठोस और व्यावहारिक सुझाव पटल पर रखती। इससे देश की जनता और युवाओं के बीच यह संदेश जाता कि विपक्ष के पास महज विरोध करने के बजाय समस्याओं का समाधान करने का एक स्पष्ट एजेंडा भी है। परंतु इस रचनात्मक भूमिका को निभाने के स्थान पर बहस को धार्मिक प्रतीकों, गोमूत्र और मनुस्मृति जैसे विषयों पर लाकर खड़ा कर दिया गया।