रविवार, 4 अक्टूबर 2026

अदम्य साहस की सराहना और चयनित चुप्पी से संदेश

संकट के क्षण व्यक्ति के वास्तविक चरित्र, उसके संस्कारों और उसकी आंतरिक शक्ति की परीक्षा लेते हैं। आसमान में हजारों फीट की ऊंचाई पर, जब मौत सामने खड़ी थी और चारों तरफ हिंसा का तांडव था, तब भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छर ने जिस अप्रतिम वीरता, सूझबूझ और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया, वह केवल एक विमान चालक का पराक्रम नहीं, बल्कि भारतीय चेतना और जीवन-मूल्यों का साक्षात प्रकटीकरण है। कॉकपिट में गंभीर रूप से घायल और लहूलुहान होने के बावजूद अपने प्राणों की बाजी लगाकर यात्रियों की रक्षा करना उस मानवीय गरिमा की मिसाल है, जिसे दुनिया प्रणाम कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैप्टन स्मित मच्छर के साहस की सराहना की है। उन्होंने कैप्टन से बात भी की। प्रधानमंत्री मोदी को अपना प्रेरणास्रोत बताते हुए गंभीर चोटों और जीवन-मृत्यु के संघर्ष के बीच जब स्मित ने कहा कि उस भयावह क्षण में वे केवल ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ कर रहे थे और उसी आध्यात्मिक ऊर्जा ने उन्हें उठने और कॉकपिट का दरवाजा खोलकर स्थिति को संभालने की प्रेरणा दी, तो यह स्पष्ट हो गया कि आस्था जब आत्मबल बनती है, तो मृत्यु का भय भी परास्त हो जाता है। प्रधानमंत्री ने बिल्कुल सटीक कहा कि स्मित के परिवार ने उन्हें साक्षात गीता के निष्काम कर्म और शौर्य के संस्कार दिए हैं। यह अंतर ही भारत की आत्मा को परिभाषित करता है कि हम जान लेने वाले नहीं, अपनी जान दांव पर लगाकर दूसरों की जान बचाने वाले लोग हैं। कैप्टन स्मित की बहादुरी ने भारतीयों का मान दुनिया में बढ़ा दिया है। भारतीय मूल के नागरिकों को देखकर लोग उनके सम्मान में तालियां बजा रहे हैं, खड़े होकर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रहे हैं। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी हमारे बहादुर वीर से बात की और उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की है। यहूदी समुदाय की इस बात के लिए प्रशंसा करनी चाहिए कि वह उन लोगों को कभी नहीं भूलता, जिन्होंने उनकी सहायता की हो। यहूदी आज भी हाइफा युद्ध-1918 में भारत के योद्धाओं के बलिदान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं क्योंकि भारतीय योद्धाओं ने इजराइल की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

बहरहाल, विमान हाईजैक करके इजराइल पर आतंकी हमले की साजिश ने अमेरिका में हुए 9/11 के आतंकी हमले की यादें ताजा कर दी हैं। कह सकते हैं कि एक बार फिर आतंक और कट्टरता की निकृष्ट मानसिकता बेनकाब होकर सबके सामने है। एक निहत्थे विमान और बेकसूर यात्रियों पर हमला करने वाली सोच यह साबित करती है कि आतंकवाद का न कोई मानवीय चेहरा होता है और न ही कोई तर्क। यह सिर्फ विनाश, नफरत और अंधकार की पैदाइश है, जो किसी भी हद तक गिर सकती है। रक्तपात को अपना मजहब समझने वाली इस कायरता के सामने स्मित मच्छर की भाँति सबको एक अभेद्य दीवार बनकर खड़े होना होगा। आतंकवाद पर इधर-उधर की बातें करके नियंत्रण नहीं पाया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि आतंकी हमाम अल-हमामी मजहबी आतंकी है। वह अलकायदा जैसे आतंकी संगठन से प्रेरित है। कट्टरता की जड़ पर खुलकर बात करनी होगी। 

इस पूरे घटनाक्रम में एक और पहलू है जो बेहद चिंताजनक और पीड़ादायक है- वह है हमारे ही समाज और बौद्धिक विमर्श के एक खास तबके की रहस्यमयी खामोशी। जो लोग दुनिया भर की छोटी-से-छोटी घटना पर मानवाधिकार, सहिष्णुता और उदारवाद के लंबे-चौड़े व्याख्यान देने लगते हैं, जिन्होंने अपनी संवेदनाओं का ठेका ले रखा है, वे आज कैप्टन स्मित मच्छर के साहस की सराहना में दो शब्द तक नहीं बोल पा रहे हैं। यह चुप्पी अनायास नहीं है; यह एक चुभने वाली वैचारिक संकीर्णता का प्रमाण है। क्या उनकी प्रशंसा की स्याही इसलिए सूख गई क्योंकि संकट के समय उस नौजवान ने हनुमान चालीसा से शक्ति पाई? क्या उनकी संवेदनाएं इसलिए कुंद हो गईं क्योंकि देश के प्रधानमंत्री ने आगे बढ़कर उस वीर सपूत और उसके माता-पिता का मान बढ़ाया और 140 करोड़ देशवासियों की भावना को स्वर दिया? या फिर इसलिए कि आतंकी घटना को अंजाम देने का प्रयास करने वाला मुस्लिम समुदाय से है। जब किसी नायक की पहचान, उसकी आस्था और राष्ट्रभक्ति आपके वैचारिक खांचे में फिट नहीं बैठती, तो मुंह फेर लेना निष्पक्षता नहीं, बल्कि नैतिक दिवालियापन है। 

जरा सोचिए, कैप्टन मच्छर की जगह यह कारनामा किसी और संप्रदाय से संबंध रखने वाले पायलट ने किया होता, तब पूरा इको-सिस्टम किस तरह आगे बढ़कर नैरेटिव बनाते। यकीन मानिए तब फिलिस्तीन का झोला उठाने वाले नेता हमाम अल-हमामी की टी-शर्ट पहनकर नाच रहे होते। यदि ऐसा होता, तब नि:संदेह, उसकी सराहना होनी ही चाहिए थी। अच्छा काम कोई भी करे, उसकी सराहना करनी ही चाहिए। लेकिन, कैप्टन स्मित के साहस पर चुप्पी क्यों? आखिर हमारे नेता यह कैसे तय कर लेते हैं कि इस प्रकार की आतंकी घटना की निंदा करने से उनका मुस्लिम वोटबैंक नाराज हो जाएगा? नेताओं के इस प्रकार की सोच से भी समूचा मुस्लिम समुदाय बदनाम होता है। संकीर्ण सोच के नेताओं को आँखें खोलकर देखना चाहिए इस घटनाक्रम की निंदा और कैप्टन स्मित मच्छर की सहराहना दुनिया के प्रमुख मुस्लिम चेहरे भी कर रहे हैं। दुबई के क्राउन प्रिंस शेख हमदान बिन मोहम्मद अल मकतूम ने अस्पताल जाकर भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छर से मुलाकात की, उनका माथा चूमा और उनकी बहादुरी की जमकर सराहना की। 

दरअसल, कैप्टन स्मित मच्छर का यह अदम्य साहस किसी दल, पंथ या संकीर्ण दायरे से परे संपूर्ण मानवता की विजय है। जिन्होंने संकट के समय अपना कर्तव्य निभाया, वे इतिहास के पन्नों में अमर हो गए; लेकिन जो ऐसे गौरवशाली क्षणों में भी अपनी संकीर्णताओं के चलते मौन साधे बैठे रहे, इतिहास उनके इस पाखंड को भी कभी माफ नहीं करेगा। भारत अपने इस साहसी बेटे पर गर्व करता है, जिसने दुनिया को दिखा दिया कि भारतीय संस्कार संकट में भी प्राण रक्षा का धर्म निभाना जानते हैं।


शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

हजार स्वर्ण मंदिरों का शहर है कांचीपुरम

देखें : इस वीडियो ब्लॉग में करें कांचीपुरम के चार प्रमुख मंदिरों के दर्शन


हिन्दू आस्था का प्रमुख केंद्र है तमिलनाडु का कांचीपुरम। हिन्दू वाङ्ग्मय में मोक्षदायिनी सप्तपुरियों का वर्णन आता है, उनमें कांचीपुरम भी शामिल है। अर्थात् कांची मोक्ष की भूमि है। ज्ञान-वैराग्य की भूमि है। संभवत: यही कारण है कि कांची को दक्षिण भारत की काशी भी कहते हैं। यह सप्तपुरियां भगवान शिव और विष्णु में बराबर-बराबर बंटी हैं। सप्तपुरियों को आधा-आधा कैसे बाँटें, तब इसका रास्ता निकाला गया कि कांची नगरी आधी विष्णु को और आधी शिव को समर्पित कर दी जाए। इस प्रकार कांचीपुरम के दो भाग हैं-  शिवकांची तथा विष्णुकांची। कांचीपुरम प्राचीन मंदिरों का शहर है। एक-दो नहीं अपितु यहाँ अनेक मंदिर हैं, जिनका द्रविण शैली का स्थापत्य देखते ही बनता है। कांचीपुरम को ‘हजार मंदिरों का शहर’ या ‘हजार मंदिरों का स्वर्ण नगर’ और ‘द गोल्डन सिटी ऑफ़ 1000 टेंपल’ भी कहा जाता है। यहाँ आज भी लगभग 126 भव्य-दिव्य मंदिरों के दर्शन किए जा सकते हैं। अपनी कांचीपुरम की यात्रा में हमने यहाँ के चार प्रमुख मंदिरों के दर्शन किए- कामाक्षी अम्मन मंदिर, एकाम्बरेश्वर मंदिर, वरदराज पेरुमल मंदिर और उलगलंथा पेरुमल मंदिर। चेन्नई के दक्षिण-पश्चिम में पलार नदी के किनारे स्थित कांचीपुरम अपने रेशम के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसे ‘कांजीवरम’ कहा जाता है। यहाँ आसपास के गाँवों में आज भी घर-घर में हथकरघे लगे हैं, जहाँ स्त्री के सौंदर्य को कई गुना बढ़ाने वाली रेशम की साड़ियाँ बुनी जाती हैं। कभी चोल, पल्लव और विजयनगर साम्राज्य की राजधानी रहे कांचीपुरम की ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक विरासत के साथ हमने तीन दिन गुजारे। श्रीकांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य श्री विजेंद्र सरस्वती कहते हैं कि कांचीपुरम में दो-तीन दिन रहने से पुण्य प्राप्त होता है। पुण्य के साथ हमने अविस्मरणीय आनंद भी प्राप्त किया।

शनिवार, 26 सितंबर 2026

“मैं अंग्रेजों की नौकरी नहीं करूंगा”

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक रज्जू भैया पढ़ने में बहुत मेधावी थे, स्कूल के दिनों में ही उन्होंने भांप लिया था कि ब्रिटिश राज भारत के लिए अच्छा नहीं है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चौथे सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ का संपूर्ण जीवन प्रखर मेधा, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति का अप्रतिम उदाहरण है। बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी रज्जू भैया ने उस दौर में ब्रिटिश शासन के वैभवशाली पदों को ठुकरा दिया था, जब लोग सरकारी नौकरियों के लिए लालायित रहते थे। उन्हें स्कूल के दिनों से ही यह अनुभव होने लगा था कि ब्रिटिश राज भारत के लिए अच्छा नहीं है। अंग्रेजों से मुक्ति पाने के लिए देश में स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा है। रज्जू भैया एक घटना को याद करते हैं– “मेरठ में नौचंदी का प्रसिद्ध मेला लगता था, यदा-कदा हम लोग भी उसे देखने जाते थे। भगतसिंह और उनके दो साथी राजगुरु और सुखदेव को मृत्युदंड दिया गया था। एक दुकानदार ने उस मेले में अपनी दुकान पर उस दृश्य का एक छोटा चित्र लगा रखा था, जो मेले में आए दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया था। अगले दिन ही पुलिस ने उस चित्र को हटा दिया और हमें यह पता लगा कि उस दुकानदार को गिरफ्तार कर लिया गया है। हम उस घटना को पूरी तरह समझ पाने में सक्षम नहीं थे, किंतु अंग्रेजों के प्रति हमारे मन में रोष अवश्य उत्पन्न हुआ और हमने ‘टोडी बच्चा हाय हाय’ के नारे का भरपूर समर्थन किया।” इसी विचार के कारण उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि ब्रिटिश शासन के अधीन नौकरी नहीं करूंगा।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

श्रीगणेश की दिव्य प्रतिमा, निरंतर बढ़ रहा आकार

अमरकंटक दर्शन : पुष्पराजगढ़ के जंगलों में कलचुरीकालीन भगवान श्रीगणेश की ऐतिहासिक प्रतिमा, इन्हें बटुक गणेश भी कहते हैं


अनूपपुर के पुष्पराजगढ़ तहसील के ग्राम धरहर कला में स्थापित प्राचीन एवं दिव्य श्रीगणेश प्रतिमा

अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ विकासखंड के अंतर्गत ग्राम धरहरकला में भगवान श्रीगणेश की दिव्य एवं प्राचीन प्रतिमा है, जो श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र है। इस स्थान को बहगड़नाला भी कहते हैं। अमरकंटक स्थित माँ नर्मदा मंदिर से उत्तर दिशा की ओर लगभग 35 किलोमीटर और पुष्पराजगढ़ से लगभग सात किलोमीटर की दूरी पर भगवान श्रीगणेश की यह प्रतिमा स्थापित है। भगवान श्रीगणेश की इस प्रतिमा को लेकर लोगों के मन में अपार श्रद्धा होने के साथ-साथ कौतुहल भी है। कहते हैं कि प्रतिवर्ष तिल-तिल करके प्रतिमा का आकार बढ़ रहा है। वर्तमान में प्रतिमा का आकार लगभग 8 फीट है। हालांकि इसके कोई वैज्ञानिक एवं पुरातात्विक साक्ष्य नहीं है। लेकिन लोगों की श्रद्धा है। इस संदर्भ में यह भी जनश्रुति है कि जब प्रतिमा प्रकट हुई थी, तब इसका आकार केवल एक फीट था। इन्हीं जनश्रुतियों के कारण घने जंगल में, एकांत में विराजे धरहरकला भगवान श्रीगणेश की प्रसिद्धि दूर-दूर तक है। प्रतिवर्ष वसंत पंचमी पर यहाँ तीन दिवसीय विशाल मेला लगता है। श्रीगणेशोत्सव के दिनों में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहाँ भगवान श्रीगणेश की इस दिव्य प्रतिमा के दर्शन के लिए आते हैं। अमरकंटक में सदानीरा माँ नर्मदा के दर्शन के लिए आने वाले भक्तगण भी श्रीगणेश के दर्शन के लिए आते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि अमरकंटक में माँ नर्मदा की पूजा-अर्चना का फल भक्तों को तभी मिलता है, जब धरहरकला आकर भगवान श्रीगणेश की पूजा करते हैं। एक मान्यता यह भी है कि अमरकंटक पहुंचने से पहले धरहर के स्वयंभू गणेश महाराज के दर्शन करने के बाद ही माँ नर्मदा की पूजा-अर्चना का फल पूर्ण होता है। इन्हीं कारणों से अमरकंटक आने वाले और वहाँ से लौटने वाले श्रद्धालु धरहर कला पहुंचकर श्री गणेश जी के दर्शन और पूजन करते हैं।

गुरुवार, 24 सितंबर 2026

‘हनुमान अंश’ ने भारतीय सिनेमा को दिखाई राह

भारतीय सिनेमाई परिदृश्य में जब भी किसी फिल्म की सफलता का आकलन होता है, तो अमूमन भारी-भरकम बजट, चमचमाते सितारे और आक्रामक प्रचार तंत्र का उल्लेख किया जाता है। बड़े प्रोडक्शन हाउस अक्सर औसत दर्जे की कहानियों को भी पीआर रणनीतियों और मल्टी-सिटी टूर के शोर में ‘ब्लॉकबस्टर’ का चोगा पहनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन नीम करोली बाबा के जीवन और दर्शन से प्रेरित फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने स्थापित व्यावसायिक नैरेटिव्स को ध्वस्त कर यह सिद्ध कर दिया है कि जब कथ्य में आत्मीयता, सांस्कृतिक जुड़ाव और सादगी हो, तो समाज उसे न केवल स्वीकारता है, बल्कि सिर-आंखों पर बिठाता है। रिलीज के सातवें सप्ताह और 47वें दिन के बाद भी सिनेमाघरों में दर्शकों की बढ़ती भीड़ इस बात का प्रमाण है कि यह कोई क्षणिक कौतूहल नहीं, बल्कि भारतीय दर्शकों के अंतर्मन का सच्चा प्रकटीकरण है।

बुधवार, 23 सितंबर 2026

ब्रह्मांड को मापने वाले भगवान का मंदिर

उलगलंथा पेरुमल मंदिर में भगवान विष्णु के वामन अवतार के दर्शन

‘उलगलंथा पेरुमल’ का अर्थ है ‘ब्रह्मांड को मापने वाला भगवान’। यह नाम भगवान विष्णु के पाँचवे अवतार ‘वामन अवतार’ से जुड़ता है। भगवान वामन को समर्पित मंदिर बमुश्किल ही आपने देखे होंगे। मेरे लिए तो यह पहला मंदिर है, जहाँ मंदिर के मुख्य देवता के रूप में भगवान वामन की पूजा होती है। उलगलंथा पेरुमल मंदिर कांचीपुरम के सबसे प्राचीन मंदिरों में शामिल है। इतिहासकार बताते हैं कि इस मंदिर का निर्माण राजेन्द्र चोल प्रथम (1012-1044 ई.) ने कराया था। एक और महत्वपूर्ण तथ्य इस मंदिर को विशेष बनाता है कि यह मंदिर 108 दिव्य देसमों (विष्णु के पवित्र निवास) में से एक है। मंदिर का गोपुरम् आकर्षक है।

दर्शन करें : कांचीपुरम के मंदिरों का दर्शन करें

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

न्यूजरूम के यथार्थ से जोड़ती संपादन-कला

पुस्तक चर्चा : सोशल मीडिया और आधुनिक पत्रकारिता के दौर में सामग्री परिमार्जन का प्रामाणिक पाठ है प्रो. अरुण कुमार भगत की पुस्तक ‘संपादन-कला : सिद्धांत से व्यवहार तक’


सोशल मीडिया के इस दौर में एक बात सबको साफ़ समझ आ गई है कि पत्रकारिता में संपादन का बहुत महत्व है। पत्रकारिता केवल रिपोर्टिंग नहीं है। यह सत्य है कि पत्रकारिता में जानकारी एकत्र करके लाना सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण कार्य है यह तय करना कि उस जानकारी को किस प्रकार से प्रसारित करना है, या प्रसारित करना भी है या नहीं? संपादन की अच्छी समझ होने पर ही हम उस जानकारी को लोकोपयोगी बना सकते हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पत्रकारिता की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता बहुत हद तक उसके संपादन पक्ष पर टिकी होती है। इसलिए संपादन-कला का कौशल सबको सीखना चाहिए। सूचनाओं के प्रचार-प्रसार में शामिल सभी लोगों को संपादन की बुनियादी बातें पता होनी चाहिए। मीडिया के आचार्य रहे वरिष्ठ लेखक एवं बिहार लोक सेवा आयोग के सदस्य प्रो. अरुण कुमार भगत की पुस्तक ‘संपादन-कला : सिद्धांत से व्यवहार तक’ इन बुनियादी बातों को सिखाने में बहुत उपयोगी साबित होगी। पुस्तक के शीर्षक और उसकी विषय-वस्तु को देखकर यह अनुमान न लगाएं कि यह केवल पत्रकारिता के विद्यार्थियों के उपयोग की पुस्तक है। यह उन सबके लिए उपयोगी है, जो सोशल मीडिया में लिख-पढ़ रहे हैं।