शुक्रवार, 5 जून 2026

स्कूल की छुट्टियां : नानी का घर बनाम गैजेट्स की दुनिया

ग्रीष्मकालीन अवकाश : सीखने, समझने और निखरने का उत्तम अवसर


गर्मी की छुट्टियों की प्रतीक्षा किसे नहीं होती है। भले ही समय बदल गया है, पीढ़ी बदल गई है, लेकिन गर्मी की छुट्टियों को लेकर रोमांच कम नहीं हुआ है। छुट्टियों के नाम से आज भी हमारे चेहरों पर एक प्यारी-सी मुस्कान तैर जाती है। हर बच्चे के मन में वार्षिक परीक्षा के बाद आने वाली लंबी छुट्टियों को लेकर अपने-अपने सपने होते हैं। हालांकि इन सपनों या कहें योजनाओं में बड़ा बदलाव आया है। बदलते समय ने हमारे जीने के तरीके को जितना बदला है, उतना ही असर इन छुट्टियों के आनंद पर भी डाला है। एक वह दौर था जब अप्रैल का महीना आते ही मन किसी पंछी की तरह उड़ने को बेताब हो जाता था। फुर्र से उड़कर नानी के आंगन, वहाँ से दादी के घर। खेत-खलियान। नीम की छांव। चाचा के साथ मटरगस्ती। मामा के साथ नदी में छलाँग। भाई-बहनों के साथ अष्टा-चंगा, गिल्ली-डंडा, छुपन-छुपाई, सांप-सीढ़ी और न जाने कितने देशी खेल। एक से मन भरे, दूसरे में आए आनंद। रात में तारों की छांव में सोना। नाना-नानी की किस्सागोई में सिनेमा से बढ़कर मनोरंजन। रोज नई कहानी। नया संस्कार। आम के आम, गुठलियों के दाम। छुट्टियों का आनंद भी और समाज जीवन की शिक्षा-संस्कार भी। एक आज का दौर है, जहाँ छुट्टियां तो हैं, लेकिन उनका रंग-रूप पूरी तरह बदल चुका है। नानी-दादी का घर तो है लेकिन हम जाते चार दिन के लिए ही हैं। मामा, चाचा-ताऊ के बच्चे यानी हमारे भाई-बहनों की मंडली तो है लेकिन हम देशी खेल नहीं खेलते, गैजेट्स में डूबे रहते हैं। जो हम खेल-खेल में सीख लेते थे, उसके लिए हॉबी क्लासेस लगा रहे हैं। कुछ समय तो समर कैम्प भी जीम लेता है। जो आनंद हमें नानी-दादी के घर आता था, उसे मोटी फीस देकर भी हम समर कैम्प में नहीं पा सकते। हालांकि, इस सबका अभिप्राय यह नहीं है कि समर कैम्प और हॉबी क्लासेस का महत्व नहीं है। बदली परिस्थितियों में यह हमारी छुट्टियों को उपयोगी बनाते हैं।

यह आलेख विवेकानंद केन्द्र की मासिक पत्रिका 'केन्द्र भारती' के मई-2026 अंक में कवर स्टोरी के रूप में प्रकाशित हुआ है।

दादी-नानी के घर का वो सुनहरा बचपन :

अगर हम अपने बचपन की ओर पलटकर देखें, तो गर्मी की छुट्टियों का सीधा-सा अर्थ होता था- नानी या दादी का घर। परीक्षाएं खत्म होते ही टिकट बुक होना, रेलगाड़ी या बस के सफर का वह रोमांच। स्टेशन पर मामा या चाचा का इंतजार करना, यह किसी उत्सव से कम नहीं था। पूरे तीन महीने की छुट्टियां आनंद में बीतती थीं। वहाँ पहुंचते ही भाई-बहनों की एक पूरी फौज का मिलना, दोपहर की चिलचिलाती धूप में छुपकर आम के बागों में जाना, कच्चे आम (कैरी) तोड़कर नमक-मिर्च लगाकर खाना, यही हमारा सबसे बड़ा एडवेंचर था। तब वीडियो गेम नहीं थे, लेकिन गिल्ली-डंडा, लुका-छिपी, सांप-सीढ़ी, लूडो, शतरंज और कैरम ने हमें कभी बोरियत का अहसास नहीं होने दिया। रात को आंगन या छत पर पानी छिड़क कर खटिया बिछाना, तारों से भरे आसमान को देखते हुए दादी-नानी से राजा-रानी और परियों की कहानियां सुनना और एक मीठी सी नींद की गोद में चले जाना... वह एक अलग ही दुनिया थी। आज भी जब हम उस दौर को याद करते हैं, तो वह निश्छल आनंद हमें भीतर तक रोमांचित कर देता है। अपनों के साथ समय बिताने से, रिश्तों में जो आत्मीयता आती थी, वह जीवनभर चलती थी। 

बदलते परिवेश में छुट्टियों का नया स्वरूप :

आज के परिवेश में छुट्टियों का अर्थ पूरी तरह से बदल गया है। अब नानी के आंगन की जगह ‘समर कैम्प’ ने ले ली है। आज माता-पिता इस बात को लेकर अधिक चिंतित रहते हैं कि इन दो महीनों में बच्चा क्या नया सीख सकता है। कोडिंग क्लासेस, रोबोटिक्स, पर्सनैलिटी डेवलपमेंट और हॉबी क्लासेस के टाइम-टेबल में बच्चों की छुट्टियां भी एक रूटीन बनकर रह गई हैं। लगता ही नहीं कि छुट्टियां लगी हैं। स्कूल की जगह ये हॉबी क्लासेस ले लेती हैं। हम यह भूल गए हैं कि अपनों के साथ रहकर भी बच्चे बहुत कुछ सीखते थे। हम जीवन के जरूरी सबक सीखते थे। पारिवारिक और जीवन मूल्य अपने आप ही हमारे आचरण में जुड़ते जाते थे। अपनी सांस्कृतिक विरासत से भी परिचित होते थे। मुझे याद है कि इन्हीं दिनों में गाँव में रामलीला और रासलीला का मंचन होता था। रात में रामलीला देखते और दिन में अपने दोस्तों के साथ उसके मंचन को चौपाल पर दोहराते। कब राम-लक्ष्मण के किरदार हमारे भीतर उतर आते, पता ही नहीं चलता था। श्रीमद्भागवत कथाओं के आयोजन का अवसर भी यही होता था। 

आज के दौर में टेलीविजन, स्मार्टफोन, आईपैड और डिजिटल गेम्स ने ऐसा मायावी संसार रच दिया है, बच्चे उसमें उलझ गए हैं। मस्ती का सारा समय स्क्रीन टाइम में बदल गया है। अब बच्चे धूप में पसीना बहाने के बजाय एसी कमरों में बैठकर ऑनलाइन मल्टीप्लेयर गेम खेलना ज्यादा पसंद करते हैं। चार बच्चे एक साथ इकट्ठे भी होते हैं, तो वह स्मार्टफोन पर ऑनलाइन गेम खेलना ही अधिक पसंद करते हैं। इसके अलावा हाई लाइफ स्टाइल दिखाने की होड़ में विदेश या किसी महंगे रिसॉर्ट में छुट्टियां बिताकर सोशल मीडिया पर तस्वीरें डालने का अभ्यास भी बढ़ गया है।

क्या आज के बच्चे पहले वाले आनंद से अछूते हैं :

यह एक ऐसा सवाल है जो हर उस व्यक्ति के मन में उठता है जिसने 80 या 90 के दशक की गर्मियां जी हैं। अगर सच्चाई और बेबाकी से कहा जाए, तो हाँ, आज के बच्चे उस नैसर्गिक आनंद से बहुत हद तक अछूते हैं। उन्हें सुख-सुविधाएं तो हमसे कई गुना ज्यादा मिल रही हैं, लेकिन वो स्वतंत्रता नहीं मिल रही जो हमें हासिल थी। बिना घड़ी देखे खेलने की स्वतंत्रता, मिट्टी में सने होने पर भी बेफिक्र रहने की स्वतंत्रता और संयुक्त परिवार के उस शोरगुल और प्यार को महसूस करने की स्वतंत्रता। आज का बच्चा आभासी तरीके में तो दुनिया भर के लोगों से जुड़ा है, लेकिन चचेरे-ममेरे भाई-बहनों के साथ होने वाली वो छोटी-छोटी तकरारें और गहरे भावनात्मक जुड़ाव उससे कहीं पीछे छूट गए हैं। 

हालांकि, यह भी समझने की बात है कि हर दौर का अपना एक अलग रंग होता है। आज के बच्चों का आनंद उनके गैजेट्स और नई तकनीक में है, जिसे पूरी तरह गलत भी नहीं कहा जा सकता। लेकिन, जब हम अपनी पुरानी स्मृतियों के झरोखे से झांकते हैं, तो यह बात पूरी तरह सच साबित होती है कि जो सुकून नानी की कहानियों और आंगन की मिट्टी में था, वह आज के वाई-फाई कनेक्शन और एयर-कंडीशंड कमरों में कहीं खो गया है। शायद हमें जरूरत है कि हम अपने बच्चों को स्क्रीन की दुनिया से थोड़ा बाहर निकालें, ताकि वे भी समझ सकें कि ‘गर्मी की छुट्टी’ असल में जिंदगी को खुलकर जीने का दूसरा नाम है। उन्हें नानी-दादी के यहाँ भेजें। उन्हें देशी खेल सिखाएं। उन्हें बताएं कि गैजेट्स के बिना भी जीवन का आनंद लिया जा सकता है। इस बार कोशिश करें कि छुट्टियों को छुट्टियों की तरह जीएं। थोड़ा पीछे जाएं और अतीत के आनंद को वर्तमान में खींचकर लाएं।


आइए, इन छुट्टियों के कैनवास पर भरें कुछ नए रंग:

संस्कारों की छांव और व्यक्तित्व का निखार: अपनी जड़ों से जुड़ने और जीवन-मूल्यों को गहराई से समझने के लिए राष्ट्रीय विचार वाले संगठनों के ग्रीष्मकालीन शिविरों का हिस्सा बनें। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिक्षा वर्ग, विवेकानंद केंद्र के संस्कार और योग शिविर, संस्कृत भारती के संस्कृत संभाषण शिविर, सेवा भारती, भारत विकास परिषद और सूर्या फाउंडेशन के व्यक्तित्व विकास शिविरों में शामिल होकर आप बहुत कुछ नया सीख सकते हैं।

मैदान की मस्ती और बौद्धिक विकास : गैजेट्स को छोड़कर अपने घर के आसपास लगने वाली ‘संघ की शाखा’ में जाएं। वहाँ होने वाले विविध खेल, व्यायाम और बौद्धिक चर्चाएं आपकी छुट्टियों को शारीरिक और मानसिक रूप से ऊर्जावान बना देंगी।

हुनर को दें नई उड़ान : यह समय आपके भीतर छिपी प्रतिभा को तराशने का है। कला, संगीत या अपने किसी पसंदीदा खेल का विधिवत प्रशिक्षण लेने के लिए किसी स्थानीय अकादमी से जुड़ें।

शब्दों से करें पक्की दोस्ती : अपनी कल्पनाओं को कागज पर उकेरें। कहानी, कविताएं या कहीं घूमने गए हैं तो उसका यात्रा वृत्तांत लिखने का अभ्यास करें। अपनी इन रचनाओं को स्कूल की पत्रिका या किसी बाल-साहित्य पत्रिका में प्रकाशन के लिए भेजें; छपे हुए अपने नाम को देखने का रोमांच अद्भुत होता है।

करुणा का भाव एवं प्रकृति से जुड़ाव : अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक छोटा-सा क्लब बनाएं और भीषण गर्मी में छतों व पेड़ों पर पक्षियों के लिए सकोरों में दाना-पानी रखने का अभियान चलाएं। 

प्रतिभा को मंच और नेतृत्व की क्षमता : अपने मोहल्ले में ‘बाल सभा’ आयोजित करें, जहाँ आपके साथी अपनी प्रतिभा (गायन, नाटक, कविता) बेझिझक मंच पर दिखा सकें।

कुटम्ब जीवन की सीख : केवल फोन पर नहीं, बल्कि सपरिवार अपने मित्रों और रिश्तेदारों के घर चाय-नाश्ते पर जाएं और उन्हें भी अपने घर आमंत्रित करें। यह अभ्यास आपकी दोस्ती को गहरा करेगा और एक-दूसरे से सीखने के अवसर भी देगा।

रसोई के नए स्वाद : माँ के साथ रसोई के कामों में थोड़ा हाथ बंटाएं और अपनी पसंद की एक-दो चीज़ें बनाना जरूर सीखें।

पिता की दुनिया को समझें : किसी दिन अपने पिता के साथ उनके ऑफिस या कार्यस्थल पर पूरा दिन बिताएं। देखें और समझें कि वे कितनी मेहनत और जिम्मेदारी के साथ अपना काम करते हैं। व्यवसाय कैसे होता है, इसकी समझ भी बढ़ेगी।

गाँव की माटी से जुड़ाव : इन सबके बीच, कुछ दिन अपने गाँव में जाकर जरूर बिताएं। आपका गाँव न हो तो किसी रिश्तेदार के गाँव में जाएं। वहां की साफ हवा, खुले खेत और सादगी भरा जीवन आपको वह सुकून देगा, जो शहर की भीड़भाड़ में कहीं खो गया है। इसके साथ ही ग्राम संस्कृति के प्रति समझ और संवेदनशीलता भी बढ़ेगी।

स्कूल की छुट्टियों पर यह कविता लिखी है, आप भी इसका आनंद लीजिए। यह कविता आपको उस दौर में लेकर जाएगी, जब गर्मी की छुट्टियों का मतलब बहुत कुछ होता था- 

स्कूल की छुट्टियां


बुधवार, 3 जून 2026

खेत बचाओ अभियान : मिट्टी बचेगी, तभी बचेगा किसान और देश का भविष्य

केन्द्र सरकार ने मिट्टी के संरक्षण के लिए जनांदोलन खड़ा करने का संकल्प लिया है। यह अत्यंत आवश्यक आंदोलन है, जिसे केवल सरकार के प्रयास से नहीं अपितु जनता (विशेषकर किसानों) की भागीदारी एवं समझदारी से ही सफल बनाया जा सकता है। मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के ग्राम रमासिया से केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राष्ट्रव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ की घोषणा की है। स्मरण रहे कि कृषि मंत्री स्वयं भी कृषक परिवार से आते हैं, इसलिए खेती के बारे में उनकी समझ अधिक जमीन और वास्तविक है। आज कृषि भूमि की जो स्थिति है, उसको लेकर सब ओर अनुत्तरित चिंता पसरी दिखायी देती है। 

“मिट्टी बचेगी तो खेती बचेगी, किसान बचेगा”- यह केवल एक राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि यह हमारे कृषि क्षेत्र के अस्तित्व की सबसे बड़ी सच्चाई है। पिछले कुछ दशकों में अधिक उत्पादन की होड़ में हमने रासायनिक खादों और कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग किया है। हरित क्रांति के दौर में इसका तात्कालिक लाभ तो हमें मिला; देश खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हुआ, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम अब भयावह रूप में सामने आ रहे हैं। रसायनों के अत्यधिक प्रयोग से ‘धरती माता’ की प्राकृतिक उर्वरक क्षमता घट रही है और मिट्टी में मौजूद लाभदायक सूक्ष्म जीव नष्ट हो गए हैं। इसका सीधा असर यह हुआ है कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि उत्पादन और मुनाफा घट रहा है। 

यहाँ उल्लेख करना होगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी इस दिशा में अपने स्तर पर जन जागरूकता के प्रयास कर रहा है, जो उसकी समाजोन्मुखी दृष्टि को रेखांकित करता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देशव्यापी ‘भूमि सुपोषण अभियान’ चला रखा है, जिसके तहत संघ के कार्यकर्ता सीधे किसानों के बीच जा रहे हैं और उन्हें भूमि के संरक्षण के लिए जागरूक और प्रोत्साहित कर रहे हैं। इस अभियान में भूमि के प्रति मातृत्व का भाव पैदा करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। संघ के इन प्रयासों का सकारात्मक परिणाम भी मिल रहा है लेकिन अभी भी इस आंदोलन को और व्यापक आधार देने की आवश्यकता है। 

मध्यप्रदेश के गोविंदनगर में भूमि सुपोषण का प्रशिक्षण देते आरएसएस के कार्यकर्ता

किसानों को धैर्य के साथ आत्मचिंतन और स्व-मूल्यांकन करना होगा कि जिस भूमि/मिट्टी से उनकी पहचान है, उसके स्वास्थ्य की स्थिति क्या है? उन्हें यह भी विचार करना होगा कि इसी प्रकार अंधाधुंध रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग होता रहा है, तो क्या खेत बचेंगे और खेत नहीं बचेंगे, तब क्या किसान बचेंगे? किसान नहीं बचेंगे, तब देश का भविष्य क्या होगा? 

‘खेत बचाओ अभियान’ की सफलता सीधे तौर पर किसानों की सहभागिता और उनकी जागरूकता पर निर्भर करती है। 1 से 30 जून तक देशभर में चलाया जा रहा यह अभियान, समय की मांग के अनुरूप उठाया गया सार्थक कदम है। इस अभियान का सबसे मजबूत पक्ष यह है कि यह केवल सरकारी कार्यालयों तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि वैज्ञानिकों, विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञों और अधिकारियों को सीधे गांवों और खेतों तक पहुंचाने की योजना है। 

इस अभियान के अंतर्गत हर किसान के लिए ‘मृदा स्वास्थ्य कार्ड’ की अनिवार्यता इस दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगी। जैसे मनुष्यों को स्वस्थ रहने के लिए अपनी शारीरिक कमियों के अनुसार पोषण की आवश्यकता होती है, वैसे ही मिट्टी को भी आवश्यकता के हिसाब से उर्वरक चाहिए। जब किसान अपनी मिट्टी की प्रकृति और उसकी वास्तविक आवश्यकता को समझेगा, तभी वह संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करेगा। इससे बेवजह रसायनों पर खर्च होने वाला पैसा बचेगा और खेती की लागत घटेगी। इसका सीधा लाभ किसान को मिलेगा। 

इस पूरे अभियान को महिला सशक्तिकरण से जोड़ना भी एक दूरदर्शी कदम है। कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी सर्वाधिक होती है; ऐसे में स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से उन्हें प्रशिक्षण, वित्तीय सहयोग और स्वरोजगार से जोड़ना ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ को मजबूत करेगा। कुल मिलाकर कहना है कि ‘खेत बचाओ अभियान’ को केवल एक महीने के सरकारी कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह धरती को बंजर होने से बचाने का एक राष्ट्रीय संकल्प है। जन-प्रतिनिधियों, वैज्ञानिकों और सबसे बढ़कर स्वयं किसानों को इस महायज्ञ में सक्रिय रूप से भाग लेना होगा। जब किसान जागरूक होगा और पारंपरिक ज्ञान के साथ वैज्ञानिक पद्धतियों का तालमेल बिठाएगा, तभी हमारी मिट्टी की खोई हुई सेहत वापस लौटेगी और भारतीय कृषि एक सुरक्षित, टिकाऊ एवं समृद्ध भविष्य की ओर कदम बढ़ा सकेगी। सही मायने में, मिट्टी की सेहत ही देश के सुरक्षित भविष्य की गारंटी है।

मध्यप्रदेश के गंजबासौदा के ग्राम झूकर जोगी में किसानों को 'भूमि सुपोषण' का महत्व बताते आरएसएस के कार्यकर्ता

सोमवार, 1 जून 2026

भोपाल विलीनीकरण आंदोलन में आरएसएस का मौन किंतु प्रखर संघर्ष

स्वतंत्रता आंदोलन और आरएसएस : जनांदोलन के आगे नवाब ने घुटने टेके, 1 जून 1949 को भोपाल रियासत का भारत में हुआ विलय

भोपाल में स्थिति विलीनीकरण स्मारक : विलीनीकरण शहीद स्मृति द्वार

हम भारत के लोगों ने स्वतंत्रता के लिए लगभग 1000 वर्ष संघर्ष किया। 15 अगस्त, 1947 को वह दिन आया, जिसके लिए पीढ़ियों ने संघर्ष किया। इसे विडम्बना ही कहेंगे कि एक ओर 15 अगस्त 1947 को पूरा देश स्वतंत्रता का उत्सव मना रहा था, वहीं दूसरी ओर झीलों की नगरी भोपाल पर नवाब की हठधर्मिता का काला साया मंडरा रहा था। नवाब ‘स्वतंत्रता’ का अपहरण कर लेना चाहता था। पाकिस्तान परस्त नवाब हमीदुल्लाह खान ने 24 अगस्त, 1947 को भोपाल को ‘स्वतंत्र देश’ बनाए रखने की घोषणा कर दी। भोपाल की जनता ने नवाब के इस निर्णय का विरोध किया। जिस नवाब ने अपने दिमाग के दरवाजे बंद कर लिए हों, उसे भला लोगों के मन की बात कहाँ सुनायी देती। उसने जनता के विरोध को जूतों तले रौंदने का प्रयास किया। परंतु, नवाब सफल नहीं हो सका क्योंकि भोपाल विलीनीकरण आंदोलन का एक सिरा संघ के स्वयंसेवकों ने भी थाम लिया था। आम जनता के साथ अब संघ के कार्यकर्ता भी इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में आ गए थे। संघ जिस काम को हाथ में लेता है, उसमें सफलता सुनिश्चित रहती ही है।

रविवार, 31 मई 2026

संघ शिक्षा वर्ग में डॉ. अंबेडकर ने देखी समरसता

संघ शताब्दी वर्ष : वर्ष 1939 में पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग के सायंकालीन बौद्धिक सत्र में बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने स्वयंसेवकों को किया था संबोधित

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से आयोजित शिक्षा वर्गों में स्वयंसेवक क्या सीख रहे हैं, इसकी प्रत्यक्ष अनुभूति कराने के लिए संघ-सृष्टि के बाहर के महानुभावों को वर्ग में आमंत्रित करने की परंपरा प्रारंभ से रही है। प्रारंभ में बौद्धिक या समापन समारोह की अध्यक्षता के लिए महानुभावों को आमंत्रित किया जाता था, लेकिन अब तो वर्ग के बीच में भी समाज के प्रमुखजनों को ‘वर्ग दर्शन’ कराने की योजना रहती है। जब स्वयंसेवक सामूहिक रूप से मैदान पर अभ्यास कर रहे होते हैं या भोजन कर रहे होते हैं, उस समय विशिष्ट अतिथियों को आमंत्रित करके उन्हें वर्ग दर्शन कराया जाता है। आपको यह जानकर अच्छा लगेगा कि संघ शिक्षा वर्ग का दर्शन करने के लिए महात्मा गांधी से लेकर बाबा साहब डॉ. अंबेडकर तक आ चुके हैं। सामाजिक क्रांति के अग्रदूत बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर संघ शिक्षा वर्ग की प्रत्यक्ष अनुभूति करने के लिए वर्ष 1939 में पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग में आए थे। शिक्षा वर्ग की व्यवस्थाएँ, स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण और उनके व्यक्तित्व में आए परिवर्तन देखकर बाबा साहब अत्यंत प्रसन्न हुए थे।

देखें वीडियो : आरएसएस की शाखा में आए डॉ. भीमराव अंबेडकर


सामाजिक समरसता स्थापित करने के लिए अथक प्रयास कर रहे बाबा साहब डॉ. अंबेडकर ने यह सुन रखा था कि अस्पृश्यता निवारण में आरएसएस को उल्लेखनीय सफलता मिली है। इस बात की अनुभूति बाबा साहब ने संघ शिक्षा वर्ग में बहुत समीप से की। पुणे के संघ शिक्षा वर्ग के सायंकालीन बौद्धिक सत्र में डॉ. अंबेडकर आए थे। उस समय वर्ग में संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार भी उपस्थित थे। वर्ग में लगभग 525 स्वयंसेवक संघ कार्य का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे। डॉ. अंबेडकर ने डॉ. हेडगेवार से सबसे पहला प्रश्न यही किया कि इन 525 स्वयंसेवकों में से अस्पृश्य कितने हैं? डॉ. हेडगेवार ने उनसे कहा कि आप स्वयं ही इनसे पूछ लीजिए। बाबा साहब स्वयंसेवकों के बीच में गए, लेकिन पूर्ण गणवेश पहने सभी स्वयंसेवक एक समान ही दिख रहे थे। उनमें कौन स्पृश्य (सवर्ण) है और कौन अस्पृश्य, यह पहचाना ही नहीं जा सकता था। बाबा साहब भी नहीं पहचान पाए। तब बाबा साहब ने स्वयंसेवकों से कहा कि आपमें से जो अस्पृश्य हों, वे एक कदम आगे आएँ। लेकिन कतारबद्ध स्वयंसेवकों के बीच कोई हलचल नहीं हुई। एक भी स्वयंसेवक पंक्ति से बाहर नहीं आया।

गुरुवार, 28 मई 2026

संघ शिक्षा वर्ग बनाम समर कैंप

संघ शताब्दी वर्ष : ‘मैं’ से ‘हम’ के बोध की यात्रा में लेकर जाते हैं संघ शिक्षा वर्ग, जीवन को सार्थक बनाने की मिलती है सीख

व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया में ‘समर कैंप’ हमारे जीवन का हिस्सा बन गए हैं। गर्मी की छुट्टियां लगते ही युवा अपने व्यक्तित्व को निखारने, नया कौशल सीखने और समय का सदुपयोग करने के लिए अपनी अभिरुचि के अनुसार ‘समर कैंप’ में जाते हैं। नि:संदेह ये समर कैंप युवाओं को बहुत कुछ सिखाते हैं। इसलिए रचनाधर्मी और उत्साही युवाओं के बीच समर कैंप के प्रति आकर्षण बढ़ा है। वहीं, जब हम समर कैंप की तुलना संघ शिक्षा वर्ग से करते हैं, तब स्वयंसेवकों के उत्साह को देखकर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि इन वर्गों में न केवल व्यक्तित्व का विकास होता है, अपितु राष्ट्र साधना के लिए भी उनका मन तैयार होता है। भारत माँ की सेवा का जो संकल्प स्वयंसेवकों ने धारण किया है, उसको निभाने का प्रशिक्षण भी इन वर्गों में मिलता है। समर कैंप की तुलना करते हुए संघ शिक्षा वर्गों के संबंध में एक बात कहनी हो तो- संघ शिक्षा वर्ग सोने पर सुहागा हैं। यहाँ युवा समय प्रबंधन, कार्यक्रम प्रबंधन, अनुशासन, सामंजस्य, योग, कौशल, कला, संवेदनशीलता, वक्तृत्व कला इत्यादि गुण तो सीखता ही है, इसके अलावा वह अपनी गौरवशाली संस्कृति से परिचित होता है, राष्ट्रप्रेम का भाव और गहरा होता है, नेतृत्व करने की क्षमता का विकास होता है। इस सबके साथ युवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे यशस्वी आंदोलन को समाज में ले जाने का प्रशिक्षण भी प्राप्त करते हैं। संघ शिक्षा वर्ग में प्रशिक्षित युवा ही आगे चलकर संघ के बड़े दायित्व का निर्वहन करने के लिए तैयार होते हैं। हाँ, उनके मन में एक साधारण स्वयंसेवक की भाँति समर्पित भाव से संघ कार्य करने का दायित्व बोध भी गहरा होता है।

रविवार, 24 मई 2026

संघ शिक्षा वर्ग : संघ कार्य के प्रशिक्षण की प्रयोगशाला

संघ शताब्दी वर्ष : मई-जून में देशभर में आयोजित होते हैं, 1927 में नागपुर में लगा था पहला वर्ग

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को एक अनुशासित और राष्ट्रव्यापी संगठन बनाने में ‘संघ शिक्षा वर्गों’ का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ये केवल प्रशिक्षण शिविर नहीं हैं, बल्कि ये संघ कार्य की साधना की प्रयोगशालाएं हैं। चयनित एवं दायित्ववान स्वयंसेवक संघ शिक्षा वर्गों में एक साधक की तरह रहते हैं और संघ कार्य के लिए संगठनात्मक एवं बौद्धिक प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। इन वर्गों से स्वयंसेवक केवल संघ चलाने की पद्धति नहीं सीखते, अपितु उनके व्यक्तित्व का भी सर्वांगीण विकास होता है। वर्ग में रहकर स्वयंसेवक सफल जीवन के लिए अनुशासन, समय प्रबंधन, दिनचर्या पालन, कार्यक्रम कुशलता, सामंजस्य और वक्तृत्व कला जैसे गुणों को समझता और सीखता है। सबके साथ मिलकर रहने से स्वयंसेवकों में सहयोग और सामंजस्य की भावना का विकास होता है। सोचने-समझने, तर्क करने, समस्या का समाधान खोजने, निर्णय लेने की क्षमता का विकास, अपनी भावनाओं को प्रकट करने का अभ्यास, सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का महत्व, दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, ये सब बातें भी संघ शिक्षा वर्ग से प्रशिक्षित स्वयंसेवक के व्यक्तित्व में दिखने लगती हैं। इसलिए संघ शिक्षा वर्गों को लेकर स्वयंसेवकों में भी खूब उत्साह रहता है।

मंगलवार, 12 मई 2026

भगवान के प्रति भक्ति प्रकट करने का सर्वोत्तम प्रकार है सेवा-भाव

संघ शताब्दी वर्ष : श्रीगुरुजी की दृष्टि में आध्यात्मिक साधना है सेवा


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहचान केवल शाखा पर खेलने एवं कदमताल करने वाले संगठन के रूप में नहीं है। अपितु, समाजसेवी संगठन के तौर पर भी संघ को देखा जाता है। समाज में विभिन्न प्रकार के सेवा उपक्रम चलाने वाले संगठन या व्यक्ति मानते हैं कि वे कोई विशिष्ट कार्य कर रहे हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग मानते हैं कि वे सेवा करके समाज पर उपकार कर रहे हैं। संघ ने प्रारंभ से स्पष्ट किया है कि उसके लिए सेवा कार्य समाज पर उपकार नहीं हैं अपितु सेवा तो करणीय कार्य है। स्वामी विवेकानंद के दर्शन ‘नर सेवा-नारायण सेवा’ को अनुकरणीय मानकर अपने नैतिक एवं स्वाभाविक दायित्व के रूप में संघ के स्वयंसेवक सेवा कार्य करते हैं। संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ के चिंतन में सेवा की संकल्पना अत्यंत व्यापक, गूढ़ और आध्यात्मिक है। उनके दर्शन में सेवा केवल एक औपचारिकता या सामाजिक दायित्व नहीं है, बल्कि यह ईश्वर की आराधना का सबसे उत्तम और प्रत्यक्ष मार्ग है। उन्होंने सेवा को भौतिकता के धरातल से उठाकर परोपकार और ईश्वरीय साधना के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित किया।