गुरुवार, 10 सितंबर 2026

समर्पण और सादगी के प्रतीक: प्रो. राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक रज्जू भैया संघ में आने से पहले 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में शामिल हुए थे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस जी ने अपने पूर्ववर्ती सरसंघचालकों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए प्रो. राजेन्द्र सिंह उपाख्य ‘रज्जू भैया’ की चतुर्थ सरसंघचालक के रूप में घोषणा की। देवरस जी का स्वास्थ्य उनका साथ नहीं दे रहा था। संघ कार्य के लिए प्रवास करना कठिन हो गया था। संघ कार्य की गति रुके नहीं, इसलिए उन्होंने सरसंघचालक का दायित्व रज्जू भैया को सौंप दिया। 11 मार्च, 1994 का दिन है, जब बालासाहब देवरस जी ने रज्जू भैया को संघ का नेतृत्व सौंपा था। उस दिन नागपुर के रेशिमबाग स्थित डॉ. हेडगेवार सभागार में संघ की निर्णायक सर्वोच्च इकाई ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ की बैठक चल रही थी। देशभर से लगभग एक हजार प्रतिनिधि उपस्थित थे और सरकार्यवाह एचवी शेषाद्रि संघ कार्य का वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत कर रहे थे। ठीक उसी समय, सरसंघचालक बालासाहब व्हीलचेयर से बैठक में आते हैं। उन्होंने अत्यंत शांत और भावुक वातावरण में सभा को संबोधित करते हुए कहा कि “पूजनीय गुरुजी ने मुझ पर यह जिम्मेदारी 1973 में सौंपी थी। आप सबके सहयोग और समर्थन से मैं अब तक उस जिम्मेदारी को अपने कंधों पर उठा पाया, लेकिन गिरते स्वास्थ्य के कारण मेरे लिए अब यात्रा करना संभव नहीं रह गया है। इस कारण सभी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के साथ परामर्श के बाद मैंने यह निर्णय लिया है कि यह जिम्मेदारी अब प्रोफेसर राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) अपने कंधों पर लें। मुझे पूरा भरोसा है कि रज्जू भैया को भी इसी प्रकार का सहयोग और समर्थन मिलता रहेगा। मैं भी एक स्वयंसेवक की भाँति अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहूँगा”। सुबह ठीक 10:40 बजे बालासाहब देवरस जी ने पुष्प गुच्छ और नारियल भेंट कर रज्जू भैया को संघ के चतुर्थ सरसंघचालक का दायित्व सौंपा। 72 वर्ष की उम्र में सरसंघचालक बने रज्जू भैया ने 1994 से 2000 तक, अर्थात् 6 वर्ष इस दायित्व का निर्वहन किया। 

इस अवसर पर सरसंघचालक के रूप में रज्जू भैया ने संक्षिप्त उद्बोधन दिया। अपने इस भाषण में उन्होंने संघ में अपनी नयी भूमिका और जिम्मेदारी को निभाने के लिए सबसे सहयोग और समर्थन की अपेक्षा की। उल्लेखनीय है कि रज्जू भैया संघ के इतिहास में पहले ऐसे सरसंघचालक थे, जिन्होंने संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के साथ प्रत्यक्ष रूप से कार्य नहीं किया था। जबकि उनसे पहले सरसंघचालक बालासाहब देवरस जी के लिए तो कहा जाता था कि ‘जिन्होंने हेडगेवारजी को नहीं देखा, वे बालासाहब को देख लें’। वहीं, श्रीगुरुजी ने भी आद्यसरसंघचालक डॉ. हेडगेवार के साथ लंबे समय तक काम किया और द्वितीय सरसंघचालक के रूप में उनके नाम की घोषणा भी स्वयं डॉक्टरजी ने की। वर्ष 1940 में डॉक्टरजी का निधन हुआ। वर्ष 1942 में रज्जू भैया संघ के संपर्क में आए। यहाँ उल्लेखनीय है कि संघ में प्रवेश से पूर्व रज्जू भैया ने 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में हिस्सा लिया था। इस दौरान बड़े कांग्रेसी नेताओं के साथ उनका संपर्क आया, जो जीवनभर बना रहा।

बापूराव मोघे से प्रभावित होकर संघ से जुड़े :

एमएससी की पढ़ाई के दौरान रज्जू भैया अपने सहपाठी श्यामनारायण श्रीवास्तव और पड़ोसी छात्र शांताराम के माध्यम से प्रयाग के विभाग प्रचारक बापूराव मोघे के संपर्क में आए। मोघे जी के व्यक्तित्व, उनकी तार्किक शैली और संघ के सिद्धांतों की स्पष्ट व्याख्या ने रज्जू भैया को अत्यंत प्रभावित किया। रज्जू भैया ने अपने घर के पास लगने वाली शाखा में नियमित जाना प्रारंभ कर दिया।

रज्जू भैया के मन में राष्ट्रीयता और गांधीवादी साहित्य से उपजे जो भी प्रश्न व संशय थे, उनका समाधान बापूराव मोघे जी ने किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मूलभूत सिद्धांतों को समझने के लिए उन्होंने मोघे जी के सुझाव पर कई पुस्तकों का अध्ययन किया, जिनमें प्रमुख हैं– डॉ. राधा कुमुद मुखर्जी की ‘फंडामेंटल यूनिटी ऑफ इंडिया’, डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल की ‘भारत की एकता के आधारभूत सिद्धांत’, सखाराम गणेश देउस्कर की ‘देश की बात’ और स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर की ‘हिंदू पदपादशाही’। इन पुस्तकों के अध्ययन से उनके मन के सारे संशय दूर हो गए और उन्हें दृढ़ विश्वास हुआ कि उनका जीवन राष्ट्र और समाज सेवा के लिए ही समर्पित होना चाहिए।

पहले बने सरकार्यवाह फिर सह–सरकार्यवाह :

रज्जू भैया की संगठन क्षमता को देखकर उन्हें वर्ष 1977 में सह–सरकार्यवाह बनाया गया। एक वर्ष बाद ही उन्हें सरकार्यवाह की जिम्मेदारी सौंप दी गई। सरकार्यवाह के रूप में रज्जू भैया ने 9 वर्ष तक कार्य किया। देशभर में प्रवास कर संगठन के कार्य को मजबूत किया। स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने 1987 में सरकार्यवाह का दायित्व छोड़ दिया और नये सरकार्यवाह एचवी शेषाद्रि के सहयोगी के रूप में सह–सरकार्यवाह बनकर संघकार्य किया। उन्होंने स्वयंसेवकों के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया– प्रत्येक भूमिका में रहकर संघकार्य करना है। 

भारत के बाहर प्रवास पर जाने वाले पहले सरसंघचालक : 

देशभर में संघकार्य का विस्तार हो, काम की व्यापकता बढ़े और वह सुदृढ़ हो– इसके लिए अधिकारियों के प्रवास की व्यवस्था है। सभी सरसंघचालकों ने संघ कार्य के विस्तार के लिए देशभर में व्यापक प्रवास किए थे। श्रीगुरुजी के लिए तो कहा जाता था कि उनका दूसरा घर रेलगाड़ी है। स्वास्थ्य से संबंधित चुनौतियों का सामना करते हुए रज्जू भैया ने भी खूब प्रवास किए। रज्जू भैया ऐसे सरसंघचालक भी बने, जिन्होंने भारत के बाहर भी प्रवास किए। उनसे पहले कोई भी सरसंघचालक विदेश यात्रा पर नहीं गए थे। परंतु रज्जू भैया ने उन देशों में प्रवास किया, जहाँ भारत से गए स्वयंसेवक ‘हिन्दू स्वयंसेवक संघ’ के बैनर तले काम कर रहे थे। उन्होंने अमेरिका, यूरोप, ब्रिटेन, अफ्रीका और दक्षिण–पूर्व एशिया में हिन्दू समाज के बंधुओं के साथ संवाद किया। उन्होंने लगभग 40 देशों की व्यापक यात्राएँ कीं। जापान की उनकी अंतिम विदेश यात्रा का उद्देश्य हिन्दू और बौद्ध परंपराओं के बीच संबंधों को मजबूत करना था, और तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था में उनके संभावित वैश्विक महत्व को रेखांकित करना था।

प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ (1993-2000) : 

  • रज्जू भैया का जन्म 1922 में हुआ। उनके पिताजी श्री कुंवर बलवीर सिंह उत्तर प्रदेश शासन के सिंचाई विभाग में अभियन्ता थे। 
  • उनकी प्राथमिक पढ़ाई नैनीताल में हुई। बाद की शिक्षा प्रयाग विश्वविद्यालय में हुई। केवल 21 वर्ष की आयु में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भौतिक शास्त्र में एम.एस.सी. की पदवी प्राप्त की। पूरे विश्वविद्यालय में उनका द्वितीय क्रमांक था। तुरन्त ही वे विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में नियुक्त किए गए।
  • नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक डॉ. सीवी रमन एमएससी अन्तिम वर्ष की परीक्षा लेने प्रयाग आये तो वे रज्जू भैया की प्रतिभा से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें बंगलूरू चलकर अपने साथ शोध कार्य में सहायक बनने का निमंत्रण दिया।
  • उत्तर प्रदेश में संघ कार्य की बढ़ती आवश्यकता को देखकर सन् 1966 में रज्जू भैया ने स्वेच्छा से भौतिक शास्त्र विभागाध्यक्ष पद से त्यागपत्र दिया और वे संघ के प्रचारक बने। 
  • आपने स्वास्थ्य कारणों से अपने दायित्व को छोड़ते हुए 10 मार्च, 2000 को नागपुर में आयोजित अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में श्री के.एस. सुदर्शन की सरसंघचालक के नाते घोषणा की।
  • 14 जुलाई, 2003 को रज्जू भैया जी का पुणे में स्वर्गवास हो गया।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 30 अगस्त, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ 'साधना के सौ वर्ष'

प्रधानमंत्री मोदी का युवाओं से जुड़ाव

राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव को भांपकर अपनी रणनीति ढाल लेना ही किसी राजनेता की सबसे बड़ी ताकत होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर बार अपनी ऊर्जावान सक्रियता और अप्रत्याशित पहलकदमी से चौंकाते हैं। वडोदरा में ‘जेन-जी’ के छह हजार युवाओं के बीच प्रधानमंत्री की मौजूदगी महज एक सरकारी या औपचारिक संवाद नहीं थी, बल्कि यह बदलते भारत की नब्ज पर हाथ रखने की एक सोची-समझी राजनीतिक और विकासात्मक कवायद थी। मंच पर क्वीन का कालजयी गीत ‘वी विल रॉक यू’ और ‘आरी आरी’ की गूंज के बीच वाई-आकार के रैंप पर चलकर युवाओं के करीब पहुंचना यह साबित करता है कि वे आज की युवा संस्कृति और उनके तेवर को बखूबी समझते हैं।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

‘तत्त्वमसि’: संघ दर्शन और प्रचारक जीवन की कथा-यात्रा

देखें यह वीडियो : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, प्रचारक जीवन, संघ से जुड़े प्रश्नों एवं दृष्टिकोण पर केन्द्रित वरिष्ठ प्रचारक एवं साहित्यकार श्रीधर पराडकर जी का उपन्यास


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पक्ष एवं प्रतिपक्ष में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। लेकिन ‘तत्त्वमसि’ मुझे बाकी सब पुस्तकों से अलग लगती है। यह एक ऐसा उपन्यास है, जिसका कथानक संघ के प्रचारक को केंद्र में रखकर बुना गया है। ‘तत्त्वमसि’ कथा-साहित्य के माध्यम से संघ की आंतरिक कार्यप्रणाली और दर्शन को प्रस्तुत करने का एक रोचक प्रयास है। वरिष्ठ प्रचारक एवं साहित्यकार श्रीधर पराड़कर का यह उपन्यास प्रचारक जीवन, उसके त्याग और समाज-केंद्रित अध्यात्म को रेखांकित करता है।

गुरुवार, 3 सितंबर 2026

विश्व बंधुत्व का संदेश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन की यात्रा पर पहुँचे सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने अमेरिका के बाद कनाडा में भारतीय विचार को दुनिया के सामने रखा है। जिस प्रकार न्यूयॉर्क में उन्होंने दुनिया को शांति और सह-अस्तित्व के साथ चलने की राह दिखायी, उसी प्रकार उन्होंने टोरंटो में भारत के उदात्त विचार को सबके साथ साझा किया। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य जब भू-राजनीतिक तनावों, संकीर्ण राष्ट्रवाद और वैचारिक ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रहा है, तब भारत का विचार ही सही राह दिखा सकता है। प्रारंभ से लेकर आज तक विश्व में भारत की प्रतिष्ठा भी उसके दर्शन को लेकर रही है। कहना होगा कि टोरंटो में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का ‘हिंदू विश्व बंधु’ संबोधन केवल एक सांस्कृतिक व्याख्यान नहीं, बल्कि विश्व शांति के लिए एक अनिवार्य दृष्टि प्रस्तुत करता है। उनका यह कथन कि विविधता एकता की विरोधी नहीं बल्कि उसकी स्वाभाविक और सुंदर अभिव्यक्ति है, भारतीय चिंतन के उस मूल तत्त्व को रेखांकित करता है जिसे आज की खंडित दुनिया को गहराई से समझने की आवश्यकता है। भारतीय मनीषा ने विविधता को कभी संकट या विभाजन के स्रोत के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे एक ही चेतना के बहुरंगी स्वरूप के रूप में स्वीकार और सम्मानित किया है।

सोमवार, 31 अगस्त 2026

वैश्विक पटल पर आरएसएस

न्यूयॉर्क व्याख्यान : ‘साझा मानवता’ का व्यावहारिक मार्ग

न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आरएसएस के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेसन' (Universal Oneness Celebration) कार्यक्रम को संबोधित किया 

न्यूयॉर्क की ऐतिहासिक धरा पर ‘एक विश्व : एक मानवता शिखर सम्मेलन’ में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का उद्बोधन वस्तुतः भारत के शाश्वत आध्यात्मिक बोध और 'वसुधैव कुटुंबकम्' की युगीन अभिव्यक्ति है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जहाँ भौतिकवादी होड़, वैचारिक संकीर्णता, युद्ध की विभीषिका और अविश्वास का अंधकार संपूर्ण मानवता को ग्रस रहा है, वहाँ यह कार्य-आह्वान विश्व को विनाश के गर्त से निकालकर एकात्मता के प्रकाश की ओर ले जाने वाला एक सशक्त मार्गदर्शक सिद्ध होगा। भारत की यह सनातन परंपरा रही है कि जब-जब संसार में घृणा, विभाजन और संघर्ष की लहरें उठी हैं, तब-तब यहाँ के ऋषियों, मनीषियों और विचारकों ने संपूर्ण सृष्टि को एक परिवार मानकर शांति और एकात्मता का संदेश दिया है। ऐसे में याद आता है स्वामी विवेकानंद का शिकागो व्याख्यान। विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद ने रक्त रंजित और युद्धरत विश्व को शांति एवं सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाया था। आज जब आधुनिक सभ्यता तकनीक की पराकाष्ठा पर पहुँचकर भी मानवीय संवेदनाओं के संकट से जूझ रही है, तब सरसंघचालक जी का यह उद्बोधन वैश्विक चिंतन को एक नई दिशा प्रदान करता है।

सोमवार, 24 अगस्त 2026

रक्षाबंधन : समाज की एकता, समरसता और राष्ट्र-रक्षा का पावन संदेश

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बस्तियों में जाकर वंचित वर्ग के बंधुओं को रक्षासूत्र बाँधकर अपनेपन की भावना को करते हैं प्रकट

भारत में उत्सव की अनूठी परंपरा है। ये उत्सव हमारे समाज को एक सूत्र में पिरोने और जीवन मूल्यों को जगाए रखने का काम करते हैं। हमारे प्रत्येक उत्सव की रचना में समाज के लिए जरूरी संदेश हैं। ऐसा ही एक उत्सव है- रक्षाबंधन, जो हमें सामाजिक समरसता का संदेश देता है। आमतौर पर हम इसे भाई-बहन के पवित्र प्रेम के त्योहार के रूप में जानते हैं, लेकिन इसका वास्तविक विचार इससे कहीं अधिक बड़ा और गहरा है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने रक्षाबंधन को अपने छह उत्सवों में शामिल किया है। संघ ने इस पर्व को संपूर्ण समाज को एकजुट करने, आपस में प्रेम-भाव बढ़ाने और देश की रक्षा का संकल्प लेने वाले महापर्व के रूप में देखा और उसे उसी ढंग से मनाना शुरू किया। यह पर्व हमें सिखाता है कि हम अपने समाज, संस्कृति और मातृभूमि की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहें। संघ ने समाज को स्मरण कराया कि रक्षाबंधन केवल एक धागा बांधने की रस्म नहीं है। हमारे यहाँ संबंधों की नींव विश्वास पर टिकी होती है, और यह धागा उसी विश्वास की डोर है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस तरह एक धागा बिखरे हुए अनगिनत मोतियों को जोड़कर एक सुंदर माला बना देता है, ठीक वैसे ही यह रक्षासूत्र भी समाज के अलग-अलग लोगों को आपस में जोड़कर एक कर देता है। पुराने समय में यह पर्व सिर्फ भाई-बहन तक ही सीमित नहीं था। जब भी समाज या देश पर कोई संकट आता था, तो लोग एक-दूसरे को रक्षासूत्र बांधकर साथ खड़े रहने और मदद करने का भरोसा दिलाते थे।

रविवार, 16 अगस्त 2026

आरएसएस बदल रहा है अपना ढांचा

संघ शताब्दी वर्ष : मध्यप्रदेश में अब तीन प्रांत (मध्यभारत , मालवा और महाकौशल) की जगह होंगे 7 संभाग, मध्य भारत में भोपाल एवं ग्वालियर संभाग, मालवा की जगह इंदौर और उज्जैन संभाग, महाकौशल की जगह सागर, रीवा और जबलपुर संभाग

यह आलेख 'आयुध Updates' के मार्च-अप्रैल 2026 अंक में प्रकाशित हुआ है। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर समाज में अब स्वीकार्यता के साथ-साथ एक विश्वास भी बन गया है। सज्जनशक्ति संघ के साथ मिलकर समाज परिवर्तन के आंदोलन से जुड़ना चाहती है, वहीं संघ भी अपने लक्ष्य यानी समाज के साथ एकाकार होने की ओर बढ़ना चाहता है। हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष के बाद अपने अगले पड़ाव की ओर कदम बढ़ा रहा है। शताब्दी वर्ष में अब तक आयोजित कार्यक्रमों में समाज ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया है। समाज की बड़ी ताकत संघ के संपर्क में आई है। इसलिए अपने अगले पड़ाव में संघ समाज की सज्जन शक्ति को साथ लेकर भारत के निर्माण की नयी कहानी लिखने की तैयारी कर रहा है। इसकी एक झलक हरियाणा के पट्टीकल्याणा (समालखा) में आयोजित अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों एवं भविष्य की रणनीति में देखी जा सकती है। पिछले कुछ समय से एक चर्चा बहुत जोरों से थी कि संघ अपनी भौगोलिक संरचना में बदलाव करने जा रहा है, संघ की प्रांत रचना खत्म हो जाएगी, क्षेत्र रचना में भी बदलाव होगा। इस चर्चा पर अब प्रतिनिधि सभा में मुहर लग गई है। हाँ, संघ की भौगोलिक संरचना में बदलाव हो रहा है। अब चर्चा इस बात की अधिक हो रही है कि आखिर संघ को इस परिवर्तन की आवश्यकता क्यों पड़ी?