सोमवार, 24 अगस्त 2026

रक्षाबंधन : समाज की एकता, समरसता और राष्ट्र-रक्षा का पावन संदेश

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बस्तियों में जाकर वंचित वर्ग के बंधुओं को रक्षासूत्र बाँधकर अपनेपन की भावना को करते हैं प्रकट

भारत में उत्सव की अनूठी परंपरा है। ये उत्सव हमारे समाज को एक सूत्र में पिरोने और जीवन मूल्यों को जगाए रखने का काम करते हैं। हमारे प्रत्येक उत्सव की रचना में समाज के लिए जरूरी संदेश हैं। ऐसा ही एक उत्सव है- रक्षाबंधन, जो हमें सामाजिक समरसता का संदेश देता है। आमतौर पर हम इसे भाई-बहन के पवित्र प्रेम के त्योहार के रूप में जानते हैं, लेकिन इसका वास्तविक विचार इससे कहीं अधिक बड़ा और गहरा है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने रक्षाबंधन को अपने छह उत्सवों में शामिल किया है। संघ ने इस पर्व को संपूर्ण समाज को एकजुट करने, आपस में प्रेम-भाव बढ़ाने और देश की रक्षा का संकल्प लेने वाले महापर्व के रूप में देखा और उसे उसी ढंग से मनाना शुरू किया। यह पर्व हमें सिखाता है कि हम अपने समाज, संस्कृति और मातृभूमि की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहें। संघ ने समाज को स्मरण कराया कि रक्षाबंधन केवल एक धागा बांधने की रस्म नहीं है। हमारे यहाँ संबंधों की नींव विश्वास पर टिकी होती है, और यह धागा उसी विश्वास की डोर है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस तरह एक धागा बिखरे हुए अनगिनत मोतियों को जोड़कर एक सुंदर माला बना देता है, ठीक वैसे ही यह रक्षासूत्र भी समाज के अलग-अलग लोगों को आपस में जोड़कर एक कर देता है। पुराने समय में यह पर्व सिर्फ भाई-बहन तक ही सीमित नहीं था। जब भी समाज या देश पर कोई संकट आता था, तो लोग एक-दूसरे को रक्षासूत्र बांधकर साथ खड़े रहने और मदद करने का भरोसा दिलाते थे। 

अपनी स्थापना के एक वर्ष के भीतर ही आरएसएस ने 1926 में अपना पहला रक्षाबंधन उत्सव मनाया था। नागपुर के तुलसी बाग में आयोजित एक बैठक के स्वरूप में रक्षाबंधन का पहला उत्सव मनाया गया। इस अवसर पर रक्षाबंधन के सामाजिक समरसता के व्यापक स्वरूप पर भी प्रबोधन किया गया। उसके बाद से प्रतिवर्ष संघ में रक्षाबंधन का उत्सव बहुत आत्मीय और व्यापक रूप से मनाया जाता है। इस दिन शाखाओं में स्वयंसेवक सबसे पहले अपने परम पवित्र भगवा ध्वज को रक्षासूत्र बांधते हैं। भगवा ध्वज हमारे देश के त्याग, शौर्य और उच्च सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतीक है। ध्वज को राखी बांधने का मतलब यह संकल्प लेना है कि हम मिलकर अपने समाज के अच्छे मूल्यों, परंपराओं और धर्म की रक्षा करेंगे, क्योंकि जब हम धर्म और समाज की रक्षा करेंगे, तभी वह हम सबकी रक्षा कर सकेगा। इस संबंध में श्री गुरुजी का मानना था कि जब कोई किसी को राखी बांधता है, तो उसका यह कर्तव्य बन जाता है कि वह अपनी जान देकर भी राखी बांधने वाले की रक्षा करे। स्वयंसेवक जब ध्वज को राखी बांधते हैं, तो वे यह तय करते हैं कि वे अपने देश के गौरव को दुनिया में हमेशा ऊँचा रखेंगे। स्वयंसेवक अपने पवित्र ध्वज को राखी बाँधकर यह निश्चय करते हैं कि वे अपने इस ध्वज को सारे संसार में ऊँचा लहराएँगे, जिसका गौरव स्थायी रखने के लिए पूर्वकाल में असंख्य वीरों ने खून बहाया है।

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत को राखी बांधता एक कार्यकर्ता

बस्ती में जाकर रक्षाबंधन मनाते हैं स्वयंसेवक:

भगवा ध्वज को रक्षासूत्र बांधने के बाद सभी स्वयंसेवक एक-दूसरे को स्नेह की डोर बांधते हैं। यहाँ किसी की जाति, भाषा, पैसे या ऊँच-नीच का कोई भेद नहीं होता। यह छोटा-सा धागा सभी को एक परिवार के रूप में बांध देता है। शाखा के कार्यक्रम के बाद स्वयंसेवक अपने आस-पास की उन बस्तियों में जाते हैं, जो वर्षों से उपेक्षित या अभाव में रही हैं। स्वयंसेवक वहाँ रहने वाले परिवारों के बीच बैठते हैं, उन्हें प्यार से रक्षासूत्र बांधते हैं और बंधवाते हैं। स्वयंसेवकों का यह प्रयास समाज में सबको बराबर मानने की सच्ची भावना को जमीन पर उतारता है। रक्षाबंधन उत्सव के इन अनुकरणीय प्रयासों से हिन्दू समाज के अंदर ऐक्य एवं सामरस्य भाव-संचार का गुणात्मक परिवर्तन दिखाई देने लगा है। यह भाव कैसे आता है, इस संबंध में संघ के प्रचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी कहते हैं कि रक्षाबंधन आपसी विश्वास का पर्व है। इस पर्व पर जो-जो सक्षम हैं, वे अन्य को विश्वास दिलाते हैं कि वे निर्भय रहें, किसी भी संकट में वे उनके साथ खड़े रहेंगे। संघ ने इस उत्सव और अपने करोड़ों स्वयंसेवकों के माध्यम से इसी विश्वास को समाज में पुनर्स्थापित करने का श्रेयस्कर कार्य किया है।

आज के समय में रक्षाबंधन का महत्व :

रक्षाबंधन उत्सव पर संघ का अनुकरण करके हम हिन्दू समाज में एकता स्थापित कर सकते हैं। जिस जातीय या वर्ग भेद को उभारकर हिन्दू विरोधी ताकतें हिन्दुओं को एक-दूसरे के विरुद्ध लड़ाने का प्रयास कर रही हैं, उस साजिश को एक झटके में रक्षाबंधन उत्सव समाप्त कर सकता है। हिन्दू समाज के जिन वर्गों को कमतर बताकर उन्हें अलग-थलग करने का प्रयास किया जाता है, तब उनके पास जाकर, उन्हें रक्षासूत्र बांधकर, उनका विश्वास जीता जा सकता है। हिन्दुओं को बाँटने के लिए उठ रहे शोर के बीच रक्षासूत्र बाँधने के लिए आगे बढ़े हाथ का स्पर्श उन्हें अहसास कराएगा कि हम सब एक हैं, हम एक-दूसरे का हाथ थामकर किसी भी परिस्थिति का सामना कर लेंगे। उन्हें लगेगा कि हमें थामने वाले हमारे ही अपने हिन्दू समाज के बंधु हमारे आस-पास खड़े हैं। आरएसएस ने रक्षाबंधन के माध्यम से सीधा और सच्चा संदेश देने का प्रयास किया है कि समाज के आखिरी व्यक्ति तक सुरक्षा, सम्मान और अपनापन पहुँचे। जब हम सब मिलकर एक-दूसरे का हाथ थामेंगे और अपने देश एवं समाज की भलाई के लिए खड़े होंगे, तभी एक सुखी, सशक्त और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण हो सकेगा।

रक्षाबंधन का इतिहास और इसकी पुरानी परंपरा :

प्राचीन समय में हमारे देश में रक्षाबंधन को शिक्षा और ज्ञानार्जन से जोड़कर देखा जाता था। उस जमाने में आज की तरह आने-जाने के साधन नहीं होते थे। गुरुकुल नगरों से दूर शांत जंगलों में बने होते थे। बारिश के दिनों में जब गुरुकुलों में पढ़ाई बंद हो जाती थी, तब गुरु और शिष्य मिलकर श्रावण पूर्णिमा से स्वाध्याय और ज्ञान बढ़ाने के लिए एक बड़ा अनुष्ठान शुरू करते थे, जो कई महीनों तक चलता था। इसलिए रक्षाबंधन को श्रावणी भी कहा जाता है। समय के साथ इस पर्व के मनाने के तौर-तरीकों में भी बदलाव आया। स्कंद पुराण में बताया गया है कि श्रावण पूर्णिमा की सुबह लोग पवित्र सरोवरों और नदियों में स्नान करके नया जनेऊ पहनते थे। इसके बाद ऋषि-मुनियों और पूर्वजों का तर्पण करके राजाओं, मित्रों और यजमानों के हाथों पर रक्षा का पवित्र धागा बांधते हुए उनकी भलाई की कामना करते थे।

पौराणिक कथाओं में रक्षा का संदेश :

रक्षाबंधन से जुड़ी कई प्रसिद्ध कथाएं हमारे ग्रंथों में मिलती हैं, जो इस धागे की शक्ति और महत्व को दर्शाती हैं। भविष्य पुराण की एक कथा के अनुसार, एक बार देवताओं और असुरों के बीच बारह वर्षों तक लंबा युद्ध चला। इस युद्ध में देवताओं की हार होने लगी। दुखी होकर देवराज इंद्र अपने गुरु बृहस्पति के पास गए। वहाँ इंद्र की पत्नी शचि भी मौजूद थीं। इंद्र की परेशानी देखकर उन्होंने कहा कि वे विधिपूर्वक एक रक्षासूत्र तैयार करेंगी, जिसे गुरुदेव से बंधवाकर इंद्र युद्ध में जाएं। इंद्र ने गुरु बृहस्पति से वह रक्षाविधान करवाया और उसकी शक्ति से देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की। महाभारत में भी इसका एक सुंदर प्रसंग आता है। जब भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी शिशुपाल का वध किया, तो सुदर्शन चक्र के लौटने पर श्रीकृष्ण की अंगुली में चोट लग गई और खून बहने लगा। यह देखकर द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर भगवान की अंगुली पर बांध दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने इस स्नेह के बदले द्रौपदी की रक्षा का वचन दिया और जब भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया गया, तब श्रीकृष्ण ने उनकी लाज रखकर उस वचन को निभाया।

एक अन्य कथा में देवी लक्ष्मी ने राजा बलि की कलाई पर पवित्र धागा बांधकर उन्हें अपना भाई माना था और इसके बदले में भगवान विष्णु को अपने साथ वैकुंठ ले जाने का वचन पूरा करवाया था। जब भी पुरोहित अपने यजमानों को रक्षासूत्र बांधते हैं, तो वे वही श्लोक दोहराते हैं जिसमें राजा बलि को बांधे जाने वाले रक्षासूत्र का स्मरण किया जाता है और यह कामना की जाती है कि यह धागा हमेशा रक्षा करे।

देश के अलग-अलग कोनों में रक्षाबंधन के रूप :

  • महाराष्ट्र और समुद्र किनारे के इलाकों में इसे नारियल पूर्णिमा कहते हैं, जहाँ लोग समुद्र देवता को नारियल चढ़ाकर पूजा करते हैं।
  • बुंदेलखंड में इसे कजरी पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है, जहाँ सातों दिन माँ भगवती की पूजा होती है और जौ-धान बोया जाता है।
  • गुजरात में इसे पवित्रोपन और राखी पूर्णिमा के रूप में मनाते हैं।
  • ओडिशा में यह गम्हा पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है, जहाँ खेती-बाड़ी, हल और मवेशियों की पूजा की जाती है।
  • पश्चिम बंगाल में इसे झूलन पूर्णिमा के रूप में राधा-कृष्ण के प्रेम के प्रतीक के तौर पर मनाया जाता है।
  • मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में किसान अपनी पत्नियों के साथ मिलकर धरती माँ और मिट्टी की पूजा करते हैं।
  • दक्षिण भारत के तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में इस दिन उपाकर्म की परंपरा निभाई जाती है और लोग नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं।
  • राजस्थान में भाइयों के साथ-साथ भाभियों की चूड़ियों में भी सुंदर लुम्बा राखी बांधी जाती है।
  • उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा और झारखंड में यह भाई-बहन के अटूट स्नेह और राखी के पारंपरिक रूप में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। नाम भले ही अलग हों, लेकिन इस त्योहार की मूल भावना हर जगह प्रेम और सुरक्षा की ही है।
संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 23 अगस्त, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ 'साधना के सौ वर्ष'

रविवार, 16 अगस्त 2026

आरएसएस बदल रहा है अपना ढांचा

संघ शताब्दी वर्ष : मध्यप्रदेश में अब तीन प्रांत (मध्यभारत , मालवा और महाकौशल) की जगह होंगे 7 संभाग, मध्य भारत में भोपाल एवं ग्वालियर संभाग, मालवा की जगह इंदौर और उज्जैन संभाग, महाकौशल की जगह सागर, रीवा और जबलपुर संभाग

यह आलेख 'आयुध Updates' के मार्च-अप्रैल 2026 अंक में प्रकाशित हुआ है। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर समाज में अब स्वीकार्यता के साथ-साथ एक विश्वास भी बन गया है। सज्जनशक्ति संघ के साथ मिलकर समाज परिवर्तन के आंदोलन से जुड़ना चाहती है, वहीं संघ भी अपने लक्ष्य यानी समाज के साथ एकाकार होने की ओर बढ़ना चाहता है। हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष के बाद अपने अगले पड़ाव की ओर कदम बढ़ा रहा है। शताब्दी वर्ष में अब तक आयोजित कार्यक्रमों में समाज ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया है। समाज की बड़ी ताकत संघ के संपर्क में आई है। इसलिए अपने अगले पड़ाव में संघ समाज की सज्जन शक्ति को साथ लेकर भारत के निर्माण की नयी कहानी लिखने की तैयारी कर रहा है। इसकी एक झलक हरियाणा के पट्टीकल्याणा (समालखा) में आयोजित अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों एवं भविष्य की रणनीति में देखी जा सकती है। पिछले कुछ समय से एक चर्चा बहुत जोरों से थी कि संघ अपनी भौगोलिक संरचना में बदलाव करने जा रहा है, संघ की प्रांत रचना खत्म हो जाएगी, क्षेत्र रचना में भी बदलाव होगा। इस चर्चा पर अब प्रतिनिधि सभा में मुहर लग गई है। हाँ, संघ की भौगोलिक संरचना में बदलाव हो रहा है। अब चर्चा इस बात की अधिक हो रही है कि आखिर संघ को इस परिवर्तन की आवश्यकता क्यों पड़ी?

रविवार, 9 अगस्त 2026

श्रीगुरुजी के ऐतिहासिक ‘तीन पत्र’

संघ शताब्दी वर्ष : गोलवलकर जी ने अपनी देह छोड़ने के पूर्व संघ की आगे की व्यवस्था और स्वयंसेवकों को संदेश देने के लिए तीन पत्र लिखे थे, जो उनके देवलोकगमन के बाद पढ़े गए

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ पत्र लिखने के अभ्यासी थे। पत्रों के माध्यम से श्रीगुरुजी का कार्यकर्ताओं के प्रति स्नेह, राष्ट्रप्रेम और हिन्दू समाज की एकात्मता के प्रति उनका संकल्प स्पष्ट झलकता है। उनके पत्रों में संघ कार्य के विस्तार, वैचारिक स्पष्टता, अनुशासन और व्यक्तिगत जीवन में मूल्यों को अपनाने पर जोर दिया गया है। कार्यकर्ताओं, सामाजिक एवं राजनीतिक नेतृत्व को लिखे उनके अनेक पत्र चर्चित हैं परंतु उनके ‘तीन पत्र’ अत्यंत महत्व के हैं। संघ को जानने-समझने की रुचि रखनेवाले बंधुओं को श्रीगुरुजी के ये तीनों पत्र अवश्य पढ़ना चाहिए। ये पत्र उन्होंने अपनी देह त्यागने से पूर्व लिखे थे। वर्ष 1972 में श्रीगुरुजी का स्वास्थ्य तेजी से गिरना शुरू हो गया था। परंतु, उसके बाद भी उन्होंने क्षणभर भी स्वयं को संघकार्य से अलग नहीं किया। वर्ष 1973 में जब उन्हें यह आभास होने लगा कि अब भौतिक देह से विश्राम लेने का समय आ गया है, तब उन्होंने अपने देहावसान के बाद संघ कार्य की समुचित व्यवस्था के बारे में विचार प्रारंभ कर दिया। इसी क्रम में ये तीन ऐतिहासिक पत्र लिखे गए। श्रीगुरुजी ने 2 अप्रैल 1973 को अपने हाथ से तीन पत्र लिखे और अखिल भारतीय व्यवस्था प्रमुख पांडुरंग पंत क्षीरसागर को सौंप दिए। उन्होंने क्षीरसागर जी को निर्देश दिए कि ये पत्र मेरे जाने के बाद सार्वजनिक रूप से पढ़े जाएं, जिनमें से दो पत्र बालासाहब देवरस पढ़ें। श्रीगुरुजी की इच्छा के अनुरूप तीनों पत्र सुरक्षित रख दिए गए। 5 जून 1973 को श्रीगुरुजी ने अपनी देह का त्याग किया। अगले दिन यानी 6 जून को इस पुण्य आत्मा के पार्थिव शरीर की अंत्येयात्रा प्रारंभ होने के पूर्व इन पत्रों को पढ़कर सुनाया गया। एक पत्र में उनके उत्तराधिकार की घोषणा की गई। दूसरे पत्र में आग्रह किया कि उनका कोई स्मारक नहीं बनाया जाए। वहीं, तीसरे पत्र में उनके हृदय की उदारता एवं व्यक्तित्व की महानता के दर्शन होते हैं, जिसमें वे विनयभाव से क्षमायाचना करते हैं कि उनके व्यवहार से कभी किसी का हृदय दु:खी हुआ हो, तो क्षमा करें। श्रीगुरुजी के ये तीन पत्र ‘बीज’ थे, जिन्होंने आगे चलकर संघ की कार्यपद्धति एवं संस्कृति को समृद्ध किया।

सोमवार, 3 अगस्त 2026

भगवा रंग से चिढ़ क्यों?

राष्ट्रध्वज तिरंगा में सबसे ऊपर है भगवा, भारतीय संस्कृति का का परिचायक, त्याग, वैराग्य, साहस, बलिदान और सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत है भगवा

खेल मैदान में राष्ट्रीय ध्वज के रंगों का समावेश कोई नई बात नहीं है, लेकिन भारत की राजनीति में जब भी केसरिया या नारंगी रंग की बात आती है, एक खास राजनीतिक वर्ग में असहजता साफ दिखने लगती है। आगामी हॉकी विश्व कप 2026 के लिए भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीमों की नई जर्सी लॉन्च हुई है। पारंपरिक नीले रंग की जगह इस बार नारंगी रंग को प्राथमिक किट के रूप में चुना गया है। हॉकी इंडिया के अध्यक्ष और पूर्व दिग्गज खिलाड़ी दिलीप तिर्की ने स्पष्ट किया कि नीले टर्फ पर नीले रंग की जर्सी के कारण विजिबिलिटी (दृश्यता) की व्यावहारिक समस्या आ रही थी और यह सुझाव सीधे खिलाड़ियों एवं कोचिंग स्टाफ की तरफ से आया था। इसके बावजूद, सुदीर्घ अनुभव रखनेवाले राजनीतिक दल के नेताओं और उनके समर्थकों ने इसे लेकर एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा करने का प्रयास किया है। हिन्दू पहचान से चिढ़ने वाले नेताओं का यह बयान आया है कि “देश की पहचान अहिंसा, सत्य और भाईचारे से जुड़ी है और इन्हें बदला नहीं जा सकता”। यह बयान इस बात का प्रमाण है कि कैसे एक विशुद्ध रूप से तकनीकी और खेल संबंधी फैसले को जबरन वैचारिक संघर्ष में घसीटा जा रहा है।

रविवार, 2 अगस्त 2026

गुरु के रूप में मार्गदर्शन करता है ‘भगवा ध्वज’

संघ शताब्दी वर्ष : गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर स्वयंसेवक ‘भगवा ध्वज’ के समक्ष गुरु दक्षिणा समर्पित करते हैं और संघकार्य के प्रति अपना समर्पण बढ़ाने का संकल्प लेते हैं

एआई से निर्मित प्रतीकात्मक चित्र

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भगवा ध्वज को जो स्थान दिया गया है, वह इस संगठन की विशिष्टता को दर्शाता है। संघ के लिए भगवा केवल ध्वज मात्र नहीं है, अपितु यह उसके प्रेरणा और मार्गदर्शन का केंद्र बिन्दु है। संघ में भगवा ध्वज को ‘गुरु’ के स्थान पर प्रतिष्ठित किया गया है। सामान्यतौर पर यही देखने में आता है कि किसी सांस्कृतिक/धार्मिक संगठन का संस्थापक ही उस संगठन के अनुसरणकर्ताओं के लिए गुरु के रूप में सम्मानित होता है। परंतु संघ इस सामान्य परंपरा से अलग लकीर खींचता दिखायी देता है। जिस प्रकार किसी संस्था से सम्बद्ध लोग गुरु के मार्गदर्शन के अनुसार व्यक्तिगत एवं सामाजिक क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक भगवा ध्वज से प्रेरणा प्राप्त कर सामाजिक क्षेत्र में कार्य करते हैं। संघ में गुरु के रूप में भगवा ध्वज को मान्यता दिए जाने का प्रसंग बहुत प्रेरक है। यह एक प्रसंग ही संघ के ध्येय, उसकी कार्यपद्धति और महानता को बताने के लिए पर्याप्त है।

शनिवार, 1 अगस्त 2026

शोर-शराबे में गुम हुआ छात्रों का हित, विपक्ष के निशाने पर रही हिन्दू मान्यताएं

लोकसभा और राज्यसभा में हंगामेदार चर्चा के बीच आखिरकार परीक्षा सुधार का विधेयक ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ पारित हो गया। देश के करोड़ों युवाओं और छात्रों के भविष्य को देखते हुए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दा था। उम्मीद यह थी कि जब प्रश्न पत्र लीक जैसे गंभीर विषय पर संसद में बहस होगी, तो देश को एक ठोस और सर्वसम्मति वाला समाधान देखने को मिलेगा। लेकिन संसद के दोनों सदनों में जो दृश्य देखने को मिला, वह बेहद निराशाजनक रहा। जो विपक्ष कल तक पर्चा लीक के मुद्दे को लेकर सड़कों से लेकर संसद तक हो-हल्ला मचा रहा था, जब विधेयक पर रचनात्मक चर्चा और सुझाव देने का सही समय आया, तब वह पूरी तरह दिशाहीन नजर आया। बहस का रुख परीक्षा प्रणाली के तकनीकी एवं प्रशासनिक सुधारों पर केंद्रित रहने के बजाय ऐसे विषयों की ओर मोड़ दिया गया, जिनका आम छात्रों की समस्याओं और उनके भविष्य से कोई दूर-दूर तक का लेना-देना नहीं था। विशेष रूप से मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के पास यह एक बड़ा अवसर था कि वह परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी और लीक-मुक्त बनाने के लिए अपने ठोस और व्यावहारिक सुझाव पटल पर रखती। इससे देश की जनता और युवाओं के बीच यह संदेश जाता कि विपक्ष के पास महज विरोध करने के बजाय समस्याओं का समाधान करने का एक स्पष्ट एजेंडा भी है। परंतु इस रचनात्मक भूमिका को निभाने के स्थान पर बहस को धार्मिक प्रतीकों, गोमूत्र और मनुस्मृति जैसे विषयों पर लाकर खड़ा कर दिया गया।

सावधान! अब ई20 पर भड़काने की तैयारी

नीट परीक्षा में गड़बड़ी को लेकर हुए कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन की गर्मी अभी शांत भी नहीं हुई है कि आंदोलनजीवियों ने जनता को भ्रमित करने एवं भड़काने के लिए दूसरा विषय खोजना शुरू कर दिया है। पिछले कुछ महीनों से एथनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर एक नकारात्मक नैरेटिव खड़ा करने का प्रयास किया गया है। परिणामस्वरूप, एथनॉल मिश्रित पेट्रोल की नीति को लेकर उठ रही आपत्तियों और राजनीतिक बयानों ने एक बार फिर ऊर्जा संक्रमण की इस प्रक्रिया को व्यापक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। एक तरफ जहां सरकार इसे पर्यावरण संरक्षण, विदेशी मुद्रा की बचत और किसानों की आय बढ़ाने वाले दूरगामी कदम के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों, ट्रांसपोर्ट यूनियनों और आम वाहन चालकों के विरोध प्रदर्शनों ने नीति के व्यावहारिक क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल उठाए हैं।