मंगलवार, 14 जुलाई 2026

मातुश्री का दर्शन है ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’

पुस्तक चर्चा : पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होल्कर के जीवन के सभी पहलुओं को देखने के लिए पढ़ें यह पुस्तक


“सनातन संस्कृति में सर्वश्रेष्ठ धर्म है ‘मानव धर्म’। मानवता की स्थापना करना ही धर्म की स्थापना करना है। देवी अहिल्याबाई होल्कर ने धर्म की स्थापना हेतु अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया। समस्त प्रजा को वात्सल्य से सींचने वाली देवी अहिल्याबाई होल्कर पूरे मालवा की मातुश्री कहलाई। त्याग, तपस्या, समर्पण, अनुशासन एवं न्याय- मानव धर्म के मूल आधार हैं। इन्हीं आधारभूत कर्तव्यों का पालन समाज में समरसता और व्यवस्था को स्थापित करता है। अहिल्याबाई का संपूर्ण जीवन न्याय प्रियता, सद्चरित्र, संस्कार अनुशासन और धर्म के स्तंभों पर मजबूती से खड़ा है”। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. साधना बलवटे की पुस्तक ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ का केंद्रीय भाव यही है। नाट्यरूप में प्रस्तुत पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर के जीवन से उन्होंने भारत की बेटी के संघर्ष, साहस और नेतृत्व की कहानी सुनाई है। यह गाथा आपको प्रारंभ से अंत तक बाँधे रखती है, फिर भले ही आपने देवी अहिल्याबाई की कहानी पहले से सुन भी क्यों न रखी हो। पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर के 300वें जयंती वर्ष में यह पुस्तक अवश्य पढ़ी जानी चाहिए। इस पुस्तक की एक ओर विशेषता है कि इसका पाठक वर्ग बहुत विशाल है यानी हर कोई इस पुस्तक को पढ़ सकता है।

‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ की प्रस्तावना भी पठनीय और महत्वपूर्ण है। लेखिका डॉ. साधना बलवटे ने प्रस्तावना में ही अपने पाठकों को देवी अहिल्याबाई होल्कर के व्यक्तित्व और उनके द्वारा किए गए महान कार्यों का संक्षिप्त परिचय कराया है। इस प्रस्तावना को मैं इस नाटक के सारांश के तौर पर देखता हूँ, जो सीधे तौर पर पुस्तक के पाठकों के लिए है। यह प्रस्तावना अहिल्या कथा का साररूप है। यूं तो पुण्यश्लोक का जीवन दर्शन इतना विराट है कि उसे किसी पुस्तक, ग्रंथ या निबंध में समेटना अत्यंत कठिन है। फिर भी कहना चाहूंगा कि आज की पीढ़ी- जो अपने नायकों को नहीं जानती, जानना भी चाहती है तो थोड़े में अधिक जानना चाहती है। ऐसे सभी लोगों को डॉ. साधना बलवटे की पुस्तक ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ अवश्य पढ़नी चाहिए। इस पुस्तक की प्रस्तावना पढ़कर भी अहिल्याबाई होल्कर के जीवन से परिचित हो सकते हैं। जैसे शिखर दर्शन से मंदिर की भव्यता और दिव्यता की अनुभूति होती, वैसे इस पुस्तक को पढ़कर लोगों के मन मंदिर में सुशोभित देवी अहिल्याबाई होल्कर के जीवन के दर्शन होते हैं।

इस पुस्तक के माध्यम से एक महत्वपूर्ण तथ्य हमारे सामने आता है। आखिर हम एक रानी के लिए पुण्यश्लोक जैसे विशेषण का उपयोग क्यों करते हैं? यह जानकार भी गौरव की अनुभूति होती है कि भगवान विष्णु, धर्मराज युधिष्ठिर और राजा नल के पश्चात देवी अहिल्याबाई होल्कर ही एकमात्र व्यक्तित्व हैं जिन्हें उनकी उज्ज्वल छवि, शुभ चरित्र के कारण पुण्यश्लोक की उपाधि प्राप्त हुई है। 

इस नाटक को पढ़ते हुए बौद्धिक बेईमानों की कारगुजारियां भी याद आती हैं। कैसे भारत के महान चरित्रों को उन्होंने अपने वैचारिक एवं राजनीतिक स्वार्थपूर्ति के चक्कर में इतिहास लेखन के दौरान उपेक्षित किया है। वहीं, आक्रांताओं को उज्ज्वल चरित्र के नायक के तौर पर प्रस्तुत करने के लिए मनगढंत कहानियां लिख डालीं। तथाकथित इतिहासकारों ने एक क्रूर और अत्याचारी शासक औरंगजेब का महिमामंडन करने के लिए नैरेटिव बनाया कि वह टोपी सिलकर अपना खर्चा निकलता था। सत्ता के लिए अपने भाइयों की गर्दनें उतारने वाला शासक कैसी टोपियां सिलता होगा, हम सहज अंदाज लगा सकते हैं। अगर इतिहासकारों को त्यागपूर्ण भाव से शासन करने के उदाहरण ही प्रस्तुत करने थे, तब उनको झूठी कहानियां लिखने की बजाय देवी अहिल्याबाई की कथा सुननी चाहिए थी। राज्य की संपत्ति के विषय में अहिल्याबाई होल्कर की दृष्टि कितनी उदात्त थी, उसका वर्णन इस पुस्तक में आया है। मातुश्री अहिल्याबाई का मानना था कि राज्य की संपत्ति प्रजा के कल्याण के लिए होती है। इसका उपयोग राज परिवार का कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तिगत कार्य के लिए नहीं कर सकता। हम देवी अहिल्याबाई होल्कर को धार्मिक कार्यों के लिए आगे बढ़कर दान करने वाली नायिका के तौर पर जानते हैं। आपको जानकर सुखद आनंद की अनुभूति होगी कि उन्होंने जो धर्म संबंधी निर्माण कार्य कराए, उसका व्यय उन्होंने अपने निजी खर्च से किया, जिसे खासगी कहते थे।

अधिक जानकारी के लिए देखें यह वीडियो : पुण्यश्लोक राजमाता देवी अहिल्याबाई होलकर

आज आवश्यकता है लोकमाता अहिल्याबाई के जीवन पृष्ठों को पुनः पढ़ा जाए और उनका अनुकरण किया जाए। डॉ. बलवटे ने अपनी पुस्तक में एक स्थान पर उचित ही लिखा है कि शक्ति, विद्या, बुद्धि, लक्ष्मी और मातृत्व का समवेत रूप यदि किसी में देखना हो या किसी एक व्यक्तित्व को, इन शक्तियों का नाम देना हो तो वह एक ही होगा ‘मातुश्री अहिल्याबाई होलकर’। 

लेखिका ने इस नाटक में मानकोजी और सुशीला बाई की बेटी, शिव की अनन्य भक्त पुण्यश्लोक, लोकमाता देवी अहिल्याबाई के जीवन के सभी पहलुओं को दिखाने का प्रयास किया गया है। एक कुशल एवं लोक कल्याणकारी शासक के रूप में उनकी छवि ‘नारी सशक्तिकरण’ का सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करती है। स्त्री सेना का गठन, कपास की फसल को प्रोत्साहन, बुनकरों का प्रशिक्षण एवं हथकरघा उद्योग की स्थापना, स्त्री शिक्षा, विधवा स्त्रियों को अधिकार, प्रजा के साथ न्याय करने के लिए अपने पुत्र को भी दंड देने वाली और समय पड़ने पर युद्ध लड़कर शत्रुओं को परास्त करने वाली तथा अपनी सूझबूझ से युद्ध को टाल देने का समर्थ रखने वाली देवी अहिल्याबाई होलकर के संपूर्ण जीवन को अभिव्यक्त करने का प्रयास है पुस्तक ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ में किया गया है।

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के पूर्व संगठन मंत्री श्रद्धेय श्रीधर पराड़कर ने इस नाटिका को अपना आशीर्वाद देते हुए उचित ही लिखा है- “प्रस्तुत लघु नाटिका में अहिल्याबाई के यशस्वी जीवन को दर्शकों के सामने रखा गया है। नाटक की भाषा सहज, सरल, बोधगम्य है”। अहिल्याबाई की मातृभाषा मराठी थी इस कारण मराठी भाषा के कई शब्दों का प्रयोग संवादों में किया गया है। उसी प्रकार उनके कार्य क्षेत्र निमाड़ था, जिस कारण निमाड़ी बोली के शब्द तथा गीतों का प्रयोग भी किया गया है। अक्सर लेखक अपना बौद्धिक सामर्थ्य प्रदर्शित करने के लिए कठिनतम शब्दों का प्रयोग करते हैं। उस कालखंड की कहानी लिखने के लिए सामान्यतौर पर लेखक उस समय में प्रचलित शब्दावली का उपयोग करते हैं। भाषा का अतिरिक्त श्रृंगार करते हैं। थोड़ा उसे दरबारी स्वरूप देते हैं। ऐसा करते समय लेखक अपने समय के पाठकों से बहुत दूर चला जाता है। इस पुस्तक की अच्छी बात यह है कि लेखिका डॉ. साधना बलवटे ने भाषाशैली के माध्यम से अपनी बौद्धिक क्षमता को प्रदर्शित करने का प्रयास नहीं किया। इस कारण यह पुस्तक आज के पाठकों को आसानी से अपने साथ जोड़ लेगी। सबको समझ में आने वाली हिन्दी में संवादों की रचना की गई है। फिर चाहे संवाद राजा का हो या सामान्य नागरिक का।

यह पुस्तक केवल एक कहानी नहीं बुनती है, बल्कि वर्तमान समय में समाज के सामने मुंह बाए खड़ी चुनौतियों के समाधान की ओर भी संकेत करती है। किसी रचना का महत्व इसी बात में अधिक होता है कि वह वर्तमान समय से कैसे जुड़ती है। आज परिवार प्रबोधन की आवश्यकता सब अनुभव कर रहे हैं। पति-पत्नी के बीच के संबंधों में संतुलन, परस्पर सम्मान और सहयोग की भावना कैसे आ सकती है। बहुत कुशलता से इस ज्वलंत विषय की ओर संकेत किया गया है। अहिल्याबाई अपने पति खांडेराव के साथ विद्या अध्ययन और शस्त्र विद्या का प्रशिक्षण लेती हैं। अहिल्याबाई तीव्र बुद्धि की होने के कारण जल्दी ही दोनों विधाओं में पारंगत हो गई किंतु खांडेराव से मित्रता करने के लिए वह प्राय: खांडेराव से सहायता मांग लिया करती या कुछ सीखने की इच्छा दिखाया करती थीं। यहाँ संकेत है कि हम स्वयं को अधिक होशियार दिखाकर मित्रता नहीं कर सकते। सच्ची मित्रता तो एक-दूसरे को समझने और एक-दूसरे के सम्मान में है। 

विश्व संवाद केन्द्र, मध्यप्रदेश में पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होल्कर की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में साहित्यकार डॉ. साधना बलवटे की पुस्तक 'अहिल्या रूपेण संस्थिता' पर अपने विचार रखते हुए डॉ. लोकेन्द्र सिंह

सावन में काँवड़ यात्रा की परंपरा अपने देश में सदियों से रही है। आज एक वर्ग काँवड़ यात्रा पर वितंडावाद करता है। जब यह विषय उठाया जाता है कि एक संप्रदाय के कुछ कट्टरपंथी एवं असामाजिक तत्व काँवड़ यात्रियों पर हमले करते हैं, उन्हें परेशान करते हैं, तब वास्तविक दोषियों की मानसिकता की चर्चा करने की जगह काँवड़ियों को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। पथराव या अन्य प्रकार से काँवड़ यात्रा में व्यवधान डालने का प्रश्न आज का नहीं है। देवी अहिल्याबाई के समय से या कहें कि उसके पहले से भी यह समस्या चली आ रही है। इसके समाधान की दृष्टि क्या हो? इस संबंध में हमें अहिल्याबाई का दृष्टिकोण देखना चाहिए। जब उनके सामने यह विषय आया कि काशी से रामेश्वर तक गंगाजल की काँवड़ पहुंचने के समय रास्ते में निजाम के सैनिक काँवड़ियों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं तब अहिल्याबाई ने हैदराबाद के निजाम को पत्र लिखा- “हुजूर को अहिल्याबाई होल्कर का नमस्कार पहुंचे। विदित हो कि सनातनी समाज ने कभी भी आपकी पूजा स्थानों, जुलूसों और त्योहार पर किसी प्रकार की बाधा डालने की चेष्टा नहीं की है। हुजूर से आग्रह है कि वह भी काँवड़ यात्रियों के साथ कोई दुर्व्यवहार न करें। अन्यथा कठोर कदम उठाने में हमें भी संकोच नहीं होगा”। 

कुल मिलाकर कहना है कि ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ ऐसी पुस्तक है, जो हमें भारत की महान शासक पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई के जीवन से भी परिचित कराती है और वर्तमान समय की चुनौतियों के समाधान की ओर भी संकेत करती है। अपनी संस्कृति, अपने नायकों एवं अपने इतिहास को समझने में जिनकी रुचि है, उन सबको यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए। नाट्य विधा से जुड़े रंगकर्मियों के लिए यह बढ़िया पुस्तक है। इस नाटक को मंच पर खेलकर समाज के प्रबोधन के जरूरी कार्य में वे अपना योगदान दे सकते हैं। ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ का प्रकाशन राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने कया है। यह 54 पृष्ठ की पुस्तक है, जिसे आप एक बैठक में पढ़ सकते हैं। 

पुस्तक : अहिल्या रूपेण संस्थिता

लेखक : डॉ. साधना बलवटे

मूल्य : 120 रुपये

प्रकाशक : राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नईदिल्ली

भोपाल से प्रकाशित समाचारपत्र 'स्वदेश ज्योति' में 4 जुलाई, 2026 को प्रकाशित डॉ. साधना बलवटे की पुस्तक 'अहिल्या रूपेण संस्थिता' की समीक्षा। समीक्षक हैं डॉ. लोकेन्द्र सिंह

सोमवार, 13 जुलाई 2026

बालासाहब ने शाखा को बनाया ‘अखंड साधना’ का केंद्र

संघ शताब्दी वर्ष : संघ कार्य के विस्तार और शाखाओं के सुदृढ़ीकरण के शिल्पी थे बालासाहब देवरस, उनकी पहल पर ही सातों दिन शाखा लगना शुरू हुई, सुबह की शाखा भी उनकी देन है


संघ कार्य के विस्तार, शाखाओं के विकास एवं सुदृढ़ीकरण में तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस (मधुकर दत्तात्रेय देवरस) का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला रहा है। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार अकसर स्वयंसेवकों से कहते थे कि शाखा अच्छी चलेगी तो समाज के सब काम होंगे। समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में काम करने के लिए राष्ट्रीय विचार से ओत-प्रोत कार्यकर्ता शाखा से ही तैयार होंगे। इसलिए अच्छी शाखा चलना जरूरी है। एक बार युवकों के साथ बातचीत के दौरान डॉक्टर साहब ने प्रश्न किया कि “आदर्श शाखा का लक्षण क्या है?” इसके उत्तर में बालासाहब ने जो कहा, वह उनके विचारों की स्पष्टता को दर्शाता है। उन्होंने कहा- “संघ कार्य को अपना जीवित कार्य समझकर, संघ कार्य के लिए सारा समय लगाने के लिए प्रस्तुत युवक जिस शाखा से विपुल संख्या में खड़े होंगे, ऐसी शाखा को मेरी दृष्टि से ‘आदर्श शाखा’ कहना उचित होगा”। संघ कार्य को राष्ट्रव्यापी बनाना है, तो उसके लिए जरूरी है कि आदर्श शाखाएं खड़ी हों। डॉक्टर साहब की शाखाओं की संकल्पना को धरातल पर उतारने और शाखाओं का व्यापक नेटवर्क खड़ा करने में बालासाहब देवरस ने जो संगठनात्मक कौशल दिखाया, वह अनुकरणीय है। बालासाहब की संगठन कुशलता से डॉक्टर साहब भली प्रकार परिचित थे। इसलिए उन्होंने नागपुर में संघ कार्य की जिम्मेदारी बालासाहब को सौंपी थी। संघ के कार्य को नागपुर से बाहर लेकर जाने के लिए यह आवश्यक था कि नागपुर में अच्छा काम चले। नागपुर के कार्यवाह के रूप में बालासाहब ने जिस प्रकार से संघ कार्य को आधार दिया, उस आधार पर ही आगे चलकर संघ कार्य राष्ट्रव्यापी हुआ। 

देखें यह वीडियो - आरएसएस और राजनीति पर सटीक विश्लेषण

प्रारंभ से डॉक्टर साहब के सान्निध्य में रहने के कारण बालासाहब को संघ कार्य की गहरी समझ थी। कहा जा सकता है कि उन्होंने डॉक्टर साहब के विचार, दर्शन, क्रियान्वयन के मार्ग और समाज निर्माण के स्वप्न को आत्मसात कर लिया था। डॉक्टर साहब ने जो सपना देखा था, उसे साकार करने के लिए शाखाओं का व्यापक नेटवर्क आवश्यक था। बालासाहब ने नागपुर कार्यवाह से लेकर सरसंघचालक के दायित्व में रहने के दौरान शाखा पर विशेष जोर दिया। नागपुर में संघ कार्य की जिम्मेदारी संभालते समय उन्होंने अधिकतम बस्तियों में शाखाएं प्रारंभ कराईं। शाखा ठीक चले इसके लिए प्रति सोमवार डॉ. हेडगेवार के निवास पर शाखा कार्यवाह और मुख्य शिक्षकों की बैठकें शुरू की गईं। एक बड़ा काम उन्होंने यह किया कि शाखा को संघ कार्य की साधना का अखंड केन्द्र बना दिया। प्रारंभिक दौर में समाज की मानसिकता प्रतिदिन एक ही स्थान पर एकत्रित होने की नहीं थी। लोग अकसर सवाल करते थे- “प्रतिदिन एक साथ आने की क्या जरूरत है? क्या किसी का अपना काम नहीं है?” लेकिन डॉक्टरजी और बालासाहब यह भली-भांति जानते थे कि शाखा कोई सामान्य एकत्रीकरण नहीं, बल्कि एक ‘सतत साधना’ है। साधना में खंड पड़ने का अर्थ है नित्य संस्कारों में बाधा आना। बालासाहब के नागपुर कार्यवाह बनने से पहले, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाएं सप्ताह में केवल छह दिन लगती थीं। रविवार को छुट्टी का दिन होता था। इतना ही नहीं, श्रावण के पवित्र महीने में रविवार के साथ सोमवार को भी छुट्टी रहती थी। बालासाहब ने महसूस किया कि इस खंडित दिनचर्या से कार्य में शिथिलता आती है। शाखा तो नित्य का कार्य है। यह तो साधना है। इसमें अवकाश कैसा? उन्होंने रविवार और श्रावण सोमवार के अवकाश बंद कर दिए। अब शाखा सप्ताह के सातों दिन वर्ग के 365 दिन बिना किसी अवकाश के लगना प्रारंभ हो गईं। आज संघ की जो 365 दिन की अविरत शाखा की परंपरा है, वह बालासाहब के ही दूरदर्शी निर्णय का परिणाम है।

‘प्रभात शाखा’ की पहल :

बालासाहब ने देखा कि कई व्यावसायिक, नौकरीपेशा लोग और प्रौढ़ आयु के व्यक्ति शाखा आना तो चाहते हैं, लेकिन शाम की शाखा में शामिल होने का उनके पास समय नहीं होता था। काम-धंधे में लगते ही कई पुराने स्वयंसेवकों का भी सायं शाखा में आना अनियमित या बंद हो जाता था। उल्लेखनीय है कि प्रारंभ में शाखा केवल शाम के समय लगती थीं। इस समस्या का समाधान बालासाहब ने ‘प्रभात शाखा’ (प्रातःकालीन शाखा) के रूप में उपलब्ध कराया। 1938 में ‘सोमवार बैठक’ में इस विषय पर गहन विचार-विमर्श हुआ। बालासाहब के कहने पर वर्ष 1938 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रथम प्रातःकालीन शाखा नागपुर में ‘मोहिते बाड़ा’ संघस्थान पर शुरू की गई। तात्याजी बाविस्कर को इस प्रभात शाखा का कार्यवाह और बाबूराव वाघ को मुख्य शिक्षक नियुक्त किया गया। चूंकि इस शाखा में अपेक्षाकृत अधिक उम्र के प्रौढ़ स्वयंसेवक आते थे, इसलिए इसकी गतिविधियां सायं शाखा की गतिविधियों से अपेक्षाकृत शारीरिक रूप से कम थकाने वाली रखी गईं। इस एक निर्णय शाखा में नवाचार की नींव रखी। बाद में चलकर सबको शाखा से जोड़ने के लिए समय से लेकर शाखा के कार्यक्रम में अनेक प्रयोग हुए। ‘प्रभात शाखा’ ने संघ कार्य को मजबूत करने और समाज के प्रत्येक वर्ग (विशेषकर नौकरीपेशा और बुद्धिजीवी वर्ग) को संघ से जोड़ने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अपनी बस्ती की शाखा में जाने का नियम :

प्रारंभ में उपशाखाएं सीमित थीं, इसलिए कई स्वयंसेवक दूर की शाखाओं में जाते थे। लेकिन जब धीरे-धीरे उपशाखाएं बढ़ने लगीं, तब भी एक प्रवृत्ति देखी गई कि स्वयंसेवक अपनी बस्ती में प्रारंभ हुई नई शाखा में न जाकर अपनी पुरानी (मुख्य) शाखा में ही जाते थे। इससे नई बस्ती की शाखा के लिए उनका योगदान शून्य हो जाता था और एक ही शाखा में स्वतंत्र काम कर सकने वाले सक्षम कार्यकर्ताओं का जमावड़ा लग जाता था। बालासाहब ने इस विसंगति को पहचाना और यह निर्णय लिया गया कि “स्वयंसेवक अपनी बस्ती में लगने वाली शाखा में ही जाएंगे”। इस नियम से कार्यकर्ताओं का विकेंद्रीकरण हुआ, नई शाखाओं को योग्य नेतृत्व मिला और संघ कार्य का हर मोहल्ले-बस्ती में तेजी से विस्तार संभव हो सका। एक साथ 15 शाखाएं प्रारंभ करने के लिए भी बालासाहब का उदाहरण दिया जाता है। उनके प्रयास से नागपुर की इतवारी शाखा के प्रशिक्षित 15 स्वयंसेवकों ने एक साथ 15 नई शाखाएं प्रारंभ कीं।  

संघ शिक्षा वर्ग और दैनिक शाखाओं में संतुलन :

संघ कार्य मूलतः दैनंदिन शाखा पर आधारित है। बालासाहब सदैव यह चिंता करते थे कि किसी भी परिस्थिति में दैनिक शाखा का कार्य बाधित नहीं होना चाहिए। उन दिनों नागपुर में संघ शिक्षा वर्ग 40 दिनों तक चलता था। वर्ग की व्यवस्था में शहर के सभी प्रमुख कार्यकर्ता जुट जाते थे, जिससे वे अपनी शाखा पर ध्यान नहीं दे पाते थे। इस कमी को दूर करने के लिए बालासाहब ने एक नई व्यवस्था लागू की। उन्होंने वर्ग की कालावधि में भी दैनिक शाखा की ओर ध्यान देने के लिए अलग से विशेष कार्यकर्ता नियुक्त करने का उपक्रम कार्यान्वित किया।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 12 जुलाई, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

शनिवार, 11 जुलाई 2026

तीजन बाई: भारतीय सांस्कृतिक विरासत की राजदूत

भारत की सांस्कृतिक विरासत की सशक्त पहचान और पंडवानी गायन की जादुई आवाज अब खामोश हो गई है, लेकिन उसकी गूंज सदियों तक भारतीय संस्कृति के आकाश में गूंजती रहेगी। पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का 70 वर्ष की आयु में 5 जुलाई, 2026 को रायपुर एम्स में निधन केवल एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि भारतीय लोक कला के एक सुनहरे अध्याय का विश्राम लेना है। अपने नाना से महाभारत की कथाएं सुनकर बड़ी हुई तीजन बाई ने जब तंबूरा हाथ में थामा, तो उन्होंने केवल गीत नहीं गाए, बल्कि महाभारत के चरित्रों को अपनी सशक्त आवाज और प्रभावशाली अभिनय से मंच पर जीवंत कर दिया। उनकी कला और जीवन यात्रा हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो संघर्षों से पार पाना चाहता है। एक ऐसे दौर में जब महिलाओं का मंच पर आकर तेज स्वर में गाना और अभिनय करना आसान नहीं था, उन्होंने सामाजिक बंधनों और रूढ़ियों की परवाह न करते हुए अपनी राह चुनी।

गुरुवार, 9 जुलाई 2026

एआई एक सहयोग टूल है, हमारा विकल्प या निर्णयकर्ता नहीं

डेटाबेस और एल्गोरिदम पर आधारित एआई, कभी भावनाओं, संवेदनाओं, अनुभवजन्य बुद्धि वाले मनुष्य से होशियार नहीं हो सकता


आज के तकनीकी युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) को हर समस्या के जादुई समाधान के रूप में दिखाया जा रहा है। इस बात में कोई शक नहीं है कि एआई आने वाले समय में बड़े परिवर्तन का कारण बनने वाला है। लेकिन यह परिवर्तन मानव समाज के हित में होगा या उसके विरुद्ध, यह सब हमें ही तय करना है। अगर हमने सचेत होकर एआई का विकास और उपयोग नहीं किया, तब हमारे सामने अनेक प्रकार की चुनौतियां खड़ी हो जाएंगी। एक ओर, एआई ने चिकित्सा, विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी में क्रांतिकारी बदलाव की नींव रखी है, वहीं दूसरी ओर इसने कई नयी और गंभीर चिंताओं को भी जन्म दिया है। एक बड़ी विडम्बना तो यही है कि जिस मनुष्य ने एआई को जन्म दिया है, वही उसे स्वयं से ऊपर समझने की भूल कर बैठता है। हमें हमेशा याद रखना होगा कि एआई हमारा सहयोगी है, हमारा विकल्प नहीं। अगर हम उसे अपना खुदा बनाएंगे, तब समस्याएं उत्पन्न होना स्वाभाविक है। याद रहे कि किसी भी एआई मॉडल की क्षमताओं का आधार डेटा और एल्गोरिदम ही है। इसलिए उसका दायरा सीमित है, वह पूर्ण नहीं है। जो डेटा उपलब्ध है, उसी के आधार पर वह प्रश्न का उत्तर देता है, इसलिए एआई के सुझाए समाधान या जानकारी कई बार व्यावहारिक नहीं होती है, उसमें पूर्वाग्रह भी दिखायी देता है। इसलिए एआई का अंधानुकरण करने से हमें बचना चाहिए और पूरी तरह उस पर निर्भर भी नहीं होना चाहिए।

श्रीराम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण : कर्कश शोर में संघ का विनम्र संदेश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने दिया वक्तव्य

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर निर्मित भव्य मंदिर में चढ़ावे से चोरी की घटना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण, निंदनीय और करोड़ों रामभक्तों की अटूट आस्था पर आघात करने वाली है। इस हृदयविदारक घटना पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले द्वारा जारी किया गया वक्तव्य इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि संघ के लिए श्रीराम की मर्यादा, पवित्रता और समाज की भावनाएं सर्वोपरि हैं। संघ ने न केवल इस घटना पर गहरी पीड़ा व्यक्त की है, बल्कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास को उसकी जवाबदेही का कठोरता से स्मरण भी कराया है। संघ ने साफ शब्दों में कहा है कि व्यवस्था और संचालन की कमियों को अविलंब दूर किया जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल की जांच के आधार पर दोषियों को कठोरतम दंड मिले और भविष्य के लिए एक निर्दोष, पारदर्शी और शुद्ध वित्तीय प्रबंधन की व्यवस्था स्थापित हो, यह संघ की दो टूक मांग है।

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

श्रीराम मंदिर प्रकरण में ‘कालनेमियों’ के विलाप से रहें सावधान

श्री अयोध्या धाम के भव्य श्रीराम मंदिर के कोष में हुई चोरी की घटना निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है। इस कृत्य से संपूर्ण हिन्दू समाज का आहत और हतप्रभ होना स्वाभाविक है। मंदिर की सुरक्षा, व्यवस्थापन और दान के प्रबंधन पर सवाल उठना भी स्वाभाविक है। हिन्दू समाज एवं हिन्दू संगठनों की एक राय है कि इस मामले में दोषियों पर कठोर कार्रवाई होनी ही चाहिए। लेकिन, इस पूरी घटना के बाद जो सबसे अधिक आश्चर्यजनक और वैचारिक रूप से खोखला पहलू उभर कर सामने आया है, वह है उन राजनेताओं और तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं की अति-सक्रियता, जो जीवनभर भगवान श्रीराम और उनकी जन्मभूमि पर श्रीराम मंदिर निर्माण के विरोधी रहे हैं। यह ध्यान देने वाली बात है कि आज मंदिर के धन की चिंता में जो लोग सबसे ज्यादा मुखर हैं, यह वही वर्ग है जिसका न तो कभी भगवान श्रीराम में विश्वास था और न ही वे उस पवित्र भूमि पर मंदिर निर्माण के पक्षधर थे।

रविवार, 28 जून 2026

लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए ऐतिहासिक संघर्ष

संघ शताब्दी वर्ष : आपातकाल के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा कर दिया, लोकतंत्र की बहाली के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया 

विश्व में भारतीय लोकतंत्र का उदाहरण दिया जाता है। यह सच है कि दुनिया में सबसे अधिक जीवंत और विशाल लोकतंत्र भारत में ही दिखायी देता है। लोकतंत्र भारत की परंपरा में है, इसलिए उसको जीना और संभालना हमें बखूबी आता है। परंतु, 25 जून 1975 वह दिनांक है, जब भारत के लोकतंत्र पर संकट आ गया था। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार ने देश पर आपातकाल थोप दिया। लोकतंत्र को घसीटकर सींखचों के पीछे डाल दिया गया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पंख नोंच लिए गए। रातों-रात आम नागरिकों के मौलिक अधिकारी समाप्त कर दिए गए। संविधान और लोकतंत्र पर हुए इस हमले का प्रतिकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने आगे बढ़कर किया। श्रीमती गांधी को भी यह ज्ञात था कि लोक संघर्ष समिति के आपातकाल विरोधी जनांदोलन को संगठित रूप से चलाने के पीछे संघ का अनुशासित कार्यकर्ता है। इसलिए उन्होंने 4 जुलाई 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। परंतु, यह प्रतिबंधन संघ के स्वयंसेवकों को आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष एवं सत्याग्रह करने से रोक नहीं सका। संविधान और लोकतंत्र को बचाने के लिए जिस प्रकार आगे बढ़कर संघ के स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह करते हुए पुलिस की बर्बाता का सामना किया, उसे देखकर संघ से असहमति रखनेवाले नेता एवं विचारकर भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुरीद बन गए।