बुधवार, 18 मार्च 2026

आरएसएस के साथ आई समाज की सज्जनशक्ति

सर्वव्यापी-सर्वस्पर्शी कार्य : संघ शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों में समाज का सहयोग और सहभागिता ने स्वयंसेवकों का बढ़ाया उत्साह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शताब्दी वर्ष पर कोई बड़ा उत्सव आयोजित न करके छोटे-छोटे स्थानों (मंडल/बस्ती) पर कार्यक्रमों का आयोजन किया, ताकि संघ कार्य का व्याप बढ़े। शताब्दी वर्ष के निमित्त संघ ने मुख्य रूप से दो प्रकार के कार्यक्रमों की व्यापक योजना बनाई है। इनमें पहला उद्देश्य संगठन का विस्तार करना है, जबकि दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य समाज की सज्जन शक्ति को सद्भाव और समरसता के सूत्र में पिरोकर राष्ट्र निर्माण के लिए संगठित करना है। इस ऐतिहासिक अवसर पर आयोजित संघ के कार्यक्रमों में समाज का जो अभूतपूर्व और भरपूर साथ मिल रहा है, वह संगठन की राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता का प्रमाण है। कहना होगा कि कई कार्यक्रमों का नेतृत्व तो समाज ने ही किया, संघ की शक्ति तो उनकी सहयोगी बनी। विशेष रूप से हिन्दू सम्मेलनों का आयोजन समाज की सज्जनशक्ति ने आगे रहकर किया। 

विजयादशमी उत्सव ने बनाया उत्साहजनक वातावरण :

शताब्दी वर्ष का सबसे पहला कार्यक्रम विजयदशमी उत्सव एवं पथ संचलन था, जिसमें स्वयंसेवकों ने ही नहीं अपितु समाज के लोगों ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया। इन पथ संचलनों में शीर्ष स्तर के चिकित्सक, प्राध्यापक, व्यवसायी, समाजसेवी और अन्य क्षेत्र के बंधु संघ की पूर्ण गणवेश पहनकर शामिल हुए। देशभर में लगभग 62 हजार 555 स्थानों पर विजयादशमी के उत्सव आयोजित किए गए, जिनमें लगभग 32 लाख 45 हजार 141 स्वयंसेवकों ने सहभागिता की। इसी तरह पथ संचलन लगभग 22 हजार 656 स्थानों पर निकाले गए, जिनमें 25 लाख 45 हजार 818 स्वयंसेवक गणवेश पहनकर शामिल हुए। समाज की ओर से इन पथ संचलनों का जमकर स्वागत किया गया। 

घर-घर तक पहुँचा संघ का विचार :

विजयादशमी उत्सव से बने उत्साहपूर्ण वातावरण में संघ के विचार को प्रत्येक घर तक पहुँचाने के उद्देश्य से ‘व्यापक गृह संपर्क अभियान’ चलाया गया। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में रखे गए वृत्त के अनुसार अब तक 46 में से 37 प्रांतों के आंकड़े एकत्र हुए हैं, जिनके अनुसार 10 करोड़ से अधिक घरों तक स्वयंसेवक संघ का विचार लेकर पहुँचे हैं। इस अभियान के दौरान स्वयंसेवकों के द्वारा तीन लाख नब्बे हजार गांवों तक संपर्क किया जा चुका है। जब स्वयंसेवक घरों में पहुँचे तो कुछ राष्ट्रीय साहित्य भी साथ लेकर गए। लगभग 84 लाख 13 हजार 552 पुस्तकें लोगों तक पहुँची हैं, जिनमें संघ की सौ वर्षों की विकास यात्रा को बताने वाली पुस्तक भी शामिल है। व्यापक गृह संपर्क अभियान की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि स्वयंसेवकों ने बिना किसी पूर्वाग्रह के हर दरवाजे पर दस्तक दी और संघ के विचारों पर आत्मीय संवाद किया। इसका सबसे जीवंत और सकारात्मक उदाहरण केरल राज्य में देखने को मिला, जहां 55 हजार से अधिक मुस्लिम घरों और 54 हजार से अधिक ईसाई परिवारों से संपर्क किया गया। इन सभी अल्पसंख्यक परिवारों ने न केवल स्वयंसेवकों का गर्मजोशी से स्वागत किया, बल्कि संघ के विचारों को जानने में गहरी रुचि भी दिखाई।

हिन्दू सम्मेलनों में स्वाभिमान की अभिव्यक्ति :

समाज जागरण के इस क्रम में देशभर (37 प्रांतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार) में अब तक 37 हजार से अधिक स्थानों पर हिन्दू सम्मेलनों का सफल आयोजन हो चुका है, जिनमें लगभग साढ़े तीन करोड़ लोगों ने अपनी सहभागिता दर्ज कराई है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर दुर्गम और जनजातीय क्षेत्रों तक आयोजित इन सम्मेलनों ने समाज को एक सूत्र में बांधने का काम किया है। अरुणाचल प्रदेश के एक अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में हुए हिन्दू सम्मेलन का वह प्रसंग विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जहां स्थानीय लोगों ने भावुक होकर कहा कि वे जीवन में पहली बार इस स्तर की आत्मीयता और जुड़ाव का अनुभव कर रहे हैं। 

प्रमुखजन गोष्ठी में ‘पंच परिवर्तन’ का संदेश :

संघ शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की शृंखला में सज्जन शक्ति को संगठित करने की दृष्टि से ‘प्रमुख जन संगोष्ठियां’ आयोजित की गईं। स्वयं सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने देशभर में समाज के प्रमुखजनों के साथ सीधा संवाद किया। सरसंघचालक जी ने केवल चार महानगरों में आयोजित कार्यक्रमों में नागरिकों के साथ संवाद करते हुए एक हजार से अधिक प्रश्नों के उत्तर दिए तथा इस प्रश्नोत्तर में 20 घंटे से अधिक का समय लगा। इन प्रमुख जन संगोष्ठियों के माध्यम से संघ समाज में ‘पंच परिवर्तन’ का व्यापक और महत्वाकांक्षी आह्वान कर रहा है। इन पांच परिवर्तनों में सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, स्व बोध, कुटुंब प्रबोधन और नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूकता शामिल हैं। संघ का दृढ़ मत है कि पंच परिवर्तन के माध्यम से देश और समाज में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। 

संघ की शाखाओं में उत्साहजनक वृद्धि :

शताब्दी वर्ष पर संगठनात्मक कार्य में भी उत्साहजनक वृद्धि हुई है। पिछले एक वर्ष में शाखाओं की संख्या में ऐतिहासिक वृद्धि दर्ज की गई है। प्रतिनिध सभा में प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के अनुसार, जहां पिछले वर्ष 51, 740 स्थानों पर 83,129 शाखाएं संचालित हो रही थीं। अब यह संख्या बढ़कर 55,683 स्थानों पर 88,949 शाखाओं तक पहुंच गई है। मात्र एक वर्ष की अल्पावधि में 3943 नए स्थानों का जुड़ना और शाखाओं की संख्या में 5820 की वृद्धि होना, यह स्पष्ट रूप से उद्घोष कर रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘पंच परिवर्तन’ के संकल्प को सम्पूर्ण भारतीय समाज का असीम स्नेह और पूर्ण समर्थन प्राप्त हो रहा है।

शताब्दी वर्ष से आगे :

संघ शताब्दी वर्ष के अभी कुछ कार्यक्रम शेष हैं, जिनमें सामाजिक सद्भाव बैठकें एवं अधिकतम स्थानों पर शाखा लगाने का उपक्रम शामिल है। दो कार्यक्रम 46 प्रांतों ने अपने-अपने प्रांत की योजना से तय किए हैं। अर्थात् अभी संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त संघ की विभिन्न गतिविधियां अक्टूबर-2026 तक जारी रहेंगी। अभी तक सामने आई जानकारी के आधार पर कहा जा सकता है कि संघ के मार्ग में अब बड़ी बाधा नहीं है क्योंकि समाज की नेतृत्वकारी सज्जन शक्ति इस राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बन रही है। संघ अब और तेज गति से समाज की सज्जनशक्ति को एकत्र कर राष्ट्र निर्माण के कार्य में आगे बढ़ेगा। 

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 15 मार्च, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

सोमवार, 16 मार्च 2026

अनूठा जन्मदिन : पुस्तकों से तौले गए 8 वर्षीय मारुति

भोपाल में 8 वर्षीय बालक मारुति का जन्मदिन अनूठे ढंग से मनाया गया। पूरे उत्सव में भारतीय संस्कृति की गहरी झलक दिखाई दी। मारुति के माता-पिता और दादा-दादी ने भारतीय पद्धति के अनुसार जन्मदिन की योजना बनाई। इस उत्सव को सार्थक स्वरूप देते हुए 'पुस्तक-तुला' का आयोजन किया गया, जिसमें मारुति को पुस्तकों से तौला गया। ​तराजू के एक पलड़े में मारुति को बैठाया गया और दूसरे पलड़े में पुस्तकें रखी गईं। जो भी अतिथि आए थे, वे अपने साथ लाई गई पुस्तकें या वहां उपलब्ध पुस्तकों को दूसरे पलड़े में तब तक रखते गए, जब तक मारुति का पलड़ा ऊपर नहीं उठ गया। इस अवसर पर कई सामाजिक कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे। परिवार 'पुनरुत्थान विद्यापीठ' से जुड़ा हुआ है और इस प्रकार जन्मदिन मनाने की प्रेरणा उन्हें वहीं से प्राप्त हुई। मारुति की शिक्षा भी पुनरुत्थान विद्यापीठ के गुरुकुल में चल रही है।

​ज्ञान ही व्यक्ति को ऊपर उठाता है :

​'पुस्तक-तुला' कार्यक्रम का एक संदेश यह भी था कि पुस्तकों का ज्ञान ही व्यक्ति के जीवन को ऊपर उठाता है। व्यक्ति का जीवन ज्ञान से ही प्रकाशित होता है। जैसे-जैसे दूसरे पलड़े में पुस्तकें बढ़ती जा रही थीं, वैसे-वैसे मारुति का पलड़ा ऊपर उठ रहा था।

​बच्चों को वितरित की जाएंगी पुस्तकें :

​मारुति के 'पुस्तक-तुला' में एकत्र पुस्तकें सेवा बस्ती के बच्चों के साथ-साथ अध्ययन में रुचि रखने वाले अन्य बच्चों एवं पुस्तक प्रेमियों को बांटी जाएंगी। इन पुस्तकों में बाल साहित्य, कुटुंब प्रबोधन का साहित्य, भारतीय वांग्मय, उपन्यास और पुनरुत्थान विद्यापीठ, कर्णावती का साहित्य शामिल है।

​मोमबत्ती बुझाने की जगह जलाए दीप :

​भारतीय संस्कृति में शुभ अवसर पर दीप प्रज्वलन की परंपरा है। हमारी संस्कृति में फूंक मारकर दीप बुझाने को शुभ नहीं माना जाता। इस बात का ध्यान रखते हुए मारुति के जन्मदिन पर 8 दीपक जलाए गए। सभी ने गायत्री मंत्र का पाठ कर प्रार्थना की कि यह प्रकाश मारुति के जीवन को सदैव आलोकित करे।

सामाजिक उत्तरदायित्व और समरसता का संदेश :

​अपने जन्मदिन पर मारुति ने कन्याओं के चरण पखारे और उनका तिलक किया। यह प्रयोग बहनों के प्रति सम्मान का भाव जगाने के उद्देश्य से किया गया। सामाजिक समरसता का उदाहरण देते हुए, प्रतिदिन स्वच्छता के लिए आने वाले नगर निगम के कर्मचारियों का भी स्वागत व सम्मान किया गया।

'स्वदेश ज्योति' में 16 मार्च, 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

'जादूगरनी' - जीवन, प्रेम और रिश्तों की खूबसूरत अभिव्यक्ति

वीडियो देखें : क्या एक कविता जीवन बदल सकती है?


“जब कोई कविता किसी मरते हुए को जीन का सहारा दे जाए तो वह जादूगरनी होती है”। युवा कवि सुदर्शन व्यास ने अपने नये काव्य संग्रह का नामकरण इसी भाव के साथ किया है- जादूगरनी। सच है, कविताओं में वह जादू होता है कि वे बड़े परिवर्तन की संवाहक बनती हैं। दुनिया के कितने ही बड़े आंदोलनों का आधार कविता ही बनी है। भारत के स्वाधीनता संग्राम में क्रांतिकारियों और स्वतंत्रतता सेनानियों का बीज मंत्र ‘वंदेमातरम’ भी काव्य है। ऐसा काव्य जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में नये सिरे से प्राण फूंक दिए। भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण का जीवन दर्शन काव्य के रूप में ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बहता आया है। कविता के महत्व एवं हमारे जीवन में उसकी उपस्थिति पर कवि ने उचित ही लिखा है कि “मनुष्यता के सबसे बड़े शोक में भी कविता गायी जाती है और सबसे बड़ी खुशी में भी कविता होती है। कविता हमारे जीवन का आधार है और जब कोई कविता किसी मरते हुए को जीने का सहारा दे जाए तो वह जादूगरनी होती है”।

रविवार, 8 मार्च 2026

स्वदेशी का आग्रही है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

संघ शताब्दी वर्षआरएसएस ने धरातल पर उतारकर दिखाया स्वदेशी विचार


भारत की सर्वांगीण स्वतंत्रता एवं विकास का सपना देखने वाले महापुरुषों ने ‘स्वदेशी’ का महत्व समझा और भारत को आत्मनिर्भर एवं सशक्त बनाने के लिए समाज से स्वदेशी आचरण का आग्रह किया। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि यदि हमें फिर से उन्नति करनी है, तो लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की शिक्षा देनी होगी। स्वातंत्र्यवीर सावरकर, बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय और महात्मा गांधी से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार तक, सभी ने स्वदेशी को अपनाने का आग्रह किया। भारत के निर्माण का सपना देखने वाले विचारक यह भली-भांति जानते थे कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति के मूल में स्वदेशी का आचरण ही है।

भारत को परमवैभव पर ले जाने की महान आकांक्षा के साथ 1925 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई, तब से ही संघ ने स्वदेशी को लेकर समाज का प्रबोधन प्रारंभ कर दिया था। संघ के लिए स्वदेशी केवल एक आर्थिक नारा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का मूल मंत्र है। संघ ने अपनी स्थापना के साथ ही भारत की आत्मनिर्भरता और भारतीय मूल्यों पर आधारित अर्थतंत्र की वकालत की है।

मंगलवार, 3 मार्च 2026

कहाँ है आपकी निष्ठा

खामेनेई की मौत : प्रदर्शन करनेवाले मुसलमानों की निष्ठा कहाँ है?


अमेरिका और इजराइल के हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद मध्य पूर्व में जो भू-राजनीतिक भूचाल आया है, उसकी अनुगूंज भारत के कई हिस्सों में सुनाई दे रही है। लखनऊ से लेकर श्रीनगर तक कई क्षेत्रों में हजारों मुस्लिम प्रदर्शनकारियों का सड़कों पर उतरना, अमेरिका और इजराइल के खिलाफ नारेबाजी करना, एक गहरी चिंता का विषय है। यह प्रदर्शन सवाल उठाता है कि भारत के मुसलमानों की निष्ठा आखिर कहाँ है? ईरान के सुप्रीम खामनेई की मौत के बाद भारत में प्रदर्शनों का क्या औचित्य है? अपने आप को इस्लामिक सत्ता/व्यवस्था से जोड़ने की यह बीमारी आज की नहीं है। खिलाफत आंदोलन को याद कीजिए और उसके उद्देश्य का विश्लेषण कीजिए। आखिर क्यों भारत के मुसलमानों ने खिलाफत आंदोलन चलाया था? क्या उसका कोई संबंध भारत की स्वतंत्रता से था? 

आज से आठ दशक पूर्व संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जिस कड़वे सच की ओर देश का ध्यान आकृष्ट किया था, वह आज पूरी तरह प्रासंगिक नजर आता है। उन्होंने स्पष्ट लिखा था कि मुसलमानों की निष्ठा उस देश के प्रति नहीं होती जहाँ वे रहते हैं, बल्कि उस सांप्रदायिक विश्वास पर निर्भर करती है जिसका वे हिस्सा हैं। लखनऊ से लेकर जम्मू-कश्मीर की सड़कों पर उतरकर मातम मनाने वाली भीड़ और खामेनेई को शहीद का दर्जा देने की कवायद, इसी मानसिकता का साक्षात प्रमाण है।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

छत्रपति शिवाजी महाराज से सीखें जल प्रबंधन

सह्याद्रि के उत्तुंग शिखरों पर आसमान से बातें करनेवाले गिरिदुर्ग हों या फिर समुद्री लहरों के बीच मुस्कुराते जलदुर्ग, उनकी व्यवस्थाएं देखकर ध्यान आता है कि हिन्दवी स्वराज्य के योजनाकार, वास्तुकार, अभियंता और निर्माण में योगदान करनेवाले सभी शिल्पकार एवं श्रमिक अपने कार्य-कौशल में सिद्धस्थ थे। सुरक्षा पक्ष हो या फिर कला पक्ष, सबका बारीकी से विचार किया गया। इसके साथ ही बुनियादी आवश्यकताओं की चिंता भी की गई। भारत में जहाँ भी आपने दुर्ग देखे होंगे, उनमें जलस्रोत की व्यवस्था देखी ही होगी। परंतु हिन्दवी स्वराज्य के किलों में जलस्रोतों का प्रबंधन रचनात्मक ढंग से किया गया है। हजारों फीट की ऊंचाई पर बारह महीने पानी की व्यवस्था बनाए रखना चुनौतीपूर्ण था। कुशल योजनाकारों ने बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से दुर्गों पर जलाशयों का निर्माण किया है। किसी भी दुर्ग पर एक-दो नहीं अपितु अलग-अलग हिस्सों में कई जलाशयों का निर्माण किया जाता था। हम हिन्दवी स्वराज्य की राजधानी दुर्गदुर्गेश्वर श्रीरायगढ़ की ही बात करें, तो वहाँ छोटे-बड़े 84 जलाशयों का निर्माण किया गया है। चूँकि रायगढ़ पर अधिक संख्या में लोग रहते थे इसलिए यहाँ बड़ी संख्या में जल निकायों का निर्माण किया गया। श्रीरायगढ़ के प्रसिद्ध जल निकाय हैं- गंगा सागर तालाब, हत्ती तालाब, कुशावर्त तालाब, हनुमान टांकी, बारह टांकी इत्यादि।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

मातृभाषाओं के संरक्षण का पक्षधर है संघ

संघ शताब्दी वर्ष : सभी भारतीय भाषाएं, राष्ट्रीय भाषाएं हैं। किसी की अनदेखी न हो, सबको समान स्तर प्राप्त हो


वैश्विक मानचित्र पर भाषाई दृष्टि से भारत की स्थिति विशिष्ट है। हमारे यहाँ उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक भाषाओं के विविध रंग फैले हुए दिखायी देते हैं। भारत की ये भाषाएं क्षेत्रीय या स्थानीय भाषाएं नहीं है, अपितु सभी भाषाएं राष्ट्रीय हैं। उनका एकसमान महत्व है। राजनीतिक स्वार्थ हावी होने से पहले भारत में कभी भाषाई विभाजन दिखायी नहीं दिया। दरअसल, जिस प्रकार भारत की संस्कृति के विविध पक्ष एक–दूसरे के साथ एकात्म हैं, उसी भाँति हमारी भाषाओं में भी आपस में गहरा नाता है। विविधता में एकात्मता का उत्सव मनाने वाले देश भारत में भाषाओं का सुंदर पुष्पगुच्छ है, जिसकी सुगंध से भारत की संस्कृति महकती रही है। भारत को कमजोर करने वाली ताकतें अकसर हमारी भाषाओं को एक–दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयास करती हैं। वहीं, भारत के प्रति श्रद्धा रखने वाले संगठन भारत की सभी मातृभाषाओं के बीच स्वाभाविक एकात्म को गहरा करने में विश्वास रखते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐसा ही संगठन है, जिसने सदैव भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और उनके एकात्म पर जोर दिया है। संघ ने सभी भारतीय भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा माना है, जो भारत की समृद्ध संस्कृति की संवाहिकाएं हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर देश की सभी भाषाओं को चिरजीवी मानते थे। आम समाज से लेकर राजकाज के व्यवहार में मातृभाषा का उपयोग होना चाहिए, इसके वे प्रबल पक्षधर थे। इस संदर्भ में वे छत्रपति शिवाजी महाराज का उदाहरण देते थे। विशेषरूप से छत्रपति शिवाजी महाराज के उदाहरण से उन लोगों को सीखना चाहिए जो आज कहते हैं कि हमारे दैनिक व्यवहार में अंग्रेजी और अन्य बाह्य भाषाओं का प्रभाव इतना अधिक बढ़ गया है कि अब उन्हें हटाना संभव नहीं है। श्रीगुरुजी कहते थे– “राज्य स्थापना के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज ने सामान्य व्यवहार में घुसे फारसी, अरबी शब्दों को निकालने का काम किया। उस समय की स्थिति का विचार करने पर दिखाई देगा कि फारसी, अरबी के बिना काम ही नहीं चलता था। छत्रपति छत्रपति शिवाजी महाराज ने मिलावट की प्रवृत्ति को दूर करने और अपनी भाषा को शुद्ध रूप में लाने का प्रयत्न किया। उनके काल का ‘राज्य व्यवहार-कोश’ प्रसिद्ध है”। हमारे सामने छत्रपति शिवाजी महाराज का उदाहरण था लेकिन इसके बाद भी स्वाधीनता के बाद हमारे सत्ताधीशों ने अंग्रेजी के सामने घुटने टेक दिए। दुनिया में कई देशों के उदाहरण हैं, जिन्होंने सत्ता के सूत्र संभालते ही अपनी भाषा में राजकाज किया। मातृभाषा के प्रति गौरव का भाव जगाते समय श्रीगुरुजी भी ऐसे देशों का उदाहरण देते थे। उनका स्पष्ट मत था कि जो देश अंग्रेजों की दासता से मुक्त हुए, उन सभी देशों ने अपने देश की भाषाओँ को ग्रहण किया। ब्रह्मदेश ने ब्रह्मी और श्रीलंका ने सिंहली को स्वीकार किया। सत्ता हाथों में आते ही उन्होंने भाषा बदल दी। दक्षिण अफ्रीका में विभिन्न 14-16 भाषाएँ हैं तथा प्रत्येक समुदाय को अपनी भाषा पर गर्व है। फिर भी सर्वसम्मति से उन्होंने ‘स्वाहिली’ भाषा को राष्ट्रीय भाषा के रूप में ग्रहण किया। उनका सब-कुछ ठीक चल रहा है। इस संबंध में इजराइल और तुर्की के उदाहरण भी प्रेरक हैं।