बुधवार, 5 अक्तूबर 2022

संघ : बीज से वटवृक्ष

डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में विजयादशमी के दिन शुभ संकल्प के साथ एक छोटा बीज बोया था, जो आज विशाल वटवृक्ष बन चुका है। दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक-सामाजिक संगठन के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमारे सामने है। नन्हें कदम से शुरू हुई संघ की यात्रा समाज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पहुँची है, न केवल पहुँची है, बल्कि उसने प्रत्येक क्षेत्र में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। ऐसे अनेक क्षेत्र हैं, जहाँ संघ की पहुँच न केवल कठिन थी, बल्कि असंभव मानी जाती थी। किंतु, आज उन क्षेत्रों में भी संघ नेतृत्व की भूमिका में है। बीज से वटवृक्ष बनने की संघ की यात्रा आसान कदापि नहीं रही है। 1925 में जिस जमीन पर संघ का बीज बोया गया था, वह उपजाऊ कतई नहीं थी। जिस वातावरण में बीज का अंकुरण होना था, वह भी अनुकूल नहीं था। किंतु, डॉक्टर हेडगेवार को उम्मीद थी कि भले ही जमीन ऊपर से बंजर दिख रही है, पंरतु उसके भीतर जीवन है। जब माली अच्छा हो और बीज में जीवटता हो, तो प्रतिकूल वातावरण भी उसके विकास में बाधा नहीं बन पाता है। भारतीय संस्कृति से पोषण पाने के कारण ही अनेक संकटों के बाद भी संघ पूरी जीवटता से आगे बढ़ता रहा। अनेक झंझावातों और तूफानों के बीच अपने कद को ऊंचा करता रहा। अनेक व्यक्तियों, विचारों और संस्थाओं ने संघ को जड़ से उखाड़ फेंकने के प्रयास किए, किंतु उनके सब षड्यंत्र विफल हुए। क्योंकि, संघ की जड़ों के विस्तार को समझने में वह हमेशा भूल करते रहे। आज भी स्थिति कमोबेश वैसी ही है। आज भी अनेक लोग संघ को राजनीतिक चश्मे से ही देखने की कोशिश करते हैं। पिछले 90 बरस में इन लोगों ने अपना चश्मा नहीं बदला है। इसी कारण यह संघ के विराट स्वरूप का दर्शन करने में असमर्थ रहते हैं। जबकि संघ इस लंबी यात्रा में समय के साथ सामंजस्य बैठाता रहा और अपनी यात्रा को दसों दिशाओं में लेकर गया। 

आरएसएस पर लेखक लोकेन्द्र सिंह की पुस्तक 'संघ दर्शन : अपने मन की अनुभूति'

संघ के स्वयंसेवक एक गीत गाते हैं- 'दसों दिशाओं में जाएं, दल बादल से छा जाएं, उमड़-घुमड़ कर हर धरती पर नंदनवन-सा लहराएं।' इसके साथ ही संघ में कहा जाता है- 'संघ कुछ नहीं करेगा और संघ का स्वयंसेवक कुछ नहीं छोड़ेगा।' इस गीत और कथन, दोनों का अभिप्राय स्पष्ट है कि संघ के स्वयंसेवक प्रत्येक क्षेत्र में जाएंगे और उसे भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के साथ समृद्ध करने का प्रयत्न करेंगे। संघ का मूल कार्य शाखा के माध्यम से संस्कारित और ध्येयनिष्ठ नागरिक तैयार करना है। अपनी स्थापना के पहले दिन से संघ यही कार्य कर रहा है। यह ध्येयनिष्ठ स्वयंसेवक ही प्रत्येक क्षेत्र में संघ के विचार को लेकर पहुँचे हैं और वहाँ उन्होंने संघ की प्रेरणा से समविचारी संगठन खड़े किए हैं। आज की स्थिति में समाज जीवन का कोई भी क्षेत्र संघ के स्वयंसेवकों ने खाली नहीं छोड़ा है। संघ से प्रेरणा प्राप्त समविचारी संगठन प्रत्येक क्षेत्र में राष्ट्रीय हितों का संरक्षण करते हुए सकारात्मक परिवर्तन के ध्वज वाहक बने हुए हैं। शिक्षा, कला, फिल्म, साहित्य, संस्कृति, खेल, उद्योग, विज्ञान, आर्थिक क्षेत्र सहित मजदूर, इंजीनियर, डॉक्टर, प्राध्यापक, किसान, वनवासी इत्यादि वर्ग के बीच में भी संघ के समविचारी संगठन प्रामाणिकता से कार्य कर रहे हैं। आज संघ की विचारधारा से अनुप्रमाणित विभिन्न क्षेत्रों में जो संगठन कार्यरत हैं, उन सबका उल्लेख करना कठिन कार्य है। इनमें से कुछेक ही प्रमुख संगठनों की जानकारी यहाँ प्रस्तुत है- 

विद्यार्थियों का सबसे बड़ा संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद : 

छात्र शक्ति को रचनात्मक दिशा देकर, राष्ट्र निर्माण निर्माण में सहयोगी बनाने के उद्देश्य से 9 जुलाई, 1949 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप या एबीवीपी) की स्थापना हुई। परिषद का ध्येय वाक्य है- 'ज्ञान-शील-एकता'। भारत के प्रत्येक प्रांत में विद्यार्थी परिषद शिक्षा संस्थानों में सक्रिय है। अभाविप विद्यार्थियों के बीच में कार्य करने वाला सबसे बड़ा संगठन है। जब देश के कुछ छात्र संगठन युवा शक्ति को गलत दिशा देकर शिक्षा संस्थानों का वातावरण विषाक्त कर रहे हैं, तब विद्यार्थी परिषद ही उनके षड्यंत्रों को उजागर करता है और उनके सामने चट्टान की तरह खड़ा होने का साहस दिखाता है। 1973 में जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने 'भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन' प्रारंभ किया तो उसको प्राणवायु अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने ही दी। उनके आंदोलन को सफल बनाने में विद्यार्थी परिषद की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आपातकाल के दौरान भी जब संघ सहित दूसरे राष्ट्रवादी संगठनों के कार्यकर्ताओं को जेल में ठेला जा रहा था, तब विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता समाज को जागृत कर रहे थे। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में भी परिषद की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

सरकार के बाद शिक्षा के क्षेत्र में सबसे अधिक योगदान कर रही है विद्या भारती : 

हिन्दू जीवन दर्शन के अधिष्ठान पर भारतीय शिक्षा दर्शन का विकास करने के उद्देश्य को लेकर सन् 1977 में 'विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान' का गठन किया गया। यद्यपि शिक्षा की अलख जगाकर समाज को जागृत, संस्कारिता एवं सुशिक्षित बनाने के प्रयास संघ के स्वयंसेवकों ने 1952 में देश के विभिन्न स्थानों पर 'सरस्वती शिशु मंदिर' विद्यालय की स्थापना के साथ शुरू कर दिए थे। विद्या भारती के माध्यम से उन प्रयासों को संगठित किया गया एवं मजबूती दी गई। विद्या भारती एवं राष्ट्र भक्त शिक्षा शास्त्रियों का यह स्पष्ट मत है कि शिक्षा तभी व्यक्ति एवं राष्ट्र के जीवन के लिए उपयोगी होगी जब वह भारत के राष्ट्रीय जीवन दर्शन पर अधिष्ठित होगी जो मूलत: हिन्दू जीवन दर्शन है। इस समय शिक्षा के क्षेत्र सरकार के बाद विद्या भारती सबसे बड़ा शिक्षा संस्थान है, जो नगरों और गाँवों तक सीमित नहीं है, बल्कि वनवासी क्षेत्रों में भी शिक्षा का उजियारा फैला रहा है। आज लगभग सम्पूर्ण भारत में 86 प्रांतीय एवं क्षेत्रीय समितियाँ विद्या भारती से संलग्न हैं। इनके अंतर्गत कुल मिलाकर 23 हजार 320 शिक्षण संस्थाओं में 1 लाख 46 हजार 643 शिक्षकों के मार्गदर्शन में 34 लाख से अधिक विद्यार्थी शिक्षा एवं संस्कार ग्रहण कर रहे हैं। इनमें से 49 शिक्षक प्रशिक्षक संस्थान एवं महाविद्यालय, 633 पूर्व प्राथमिक, 4 हजार 639 प्राथमिक, 4 हजार 558 माध्यमिक, 935 उच्चतर माध्यमिक, 2 हजार 232 उच्च विद्यालय हैं। इन सबके साथ ही 6 हजार 127 एकल शिक्षक विद्यालय एवं 3 हजार 679 संस्कार केंद्रों के माध्यम से विद्या भारती नगरों और ग्रामों में, वनवासी और पर्वतीय क्षेत्रों में और झुग्गी-झोंपडिय़ों में शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत है। 

शिक्षा में भारतीय मूल्यों की पुनर्स्थापना एवं अनुसंधान में नवाचार के लिए संकल्पित भारतीय शिक्षण मंडल : 

शिक्षा क्षेत्र में भारतीय मूल्यों की स्थापना के उद्देश्य को लेकर रामनवमी के अवसर पर 1969 में भारतीय शिक्षण मंडल का कार्य प्रारंभ हुआ। भारतीय शिक्षण मंडल मानता है कि भारत ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में विश्वगुरु था, लेकिन पाश्चात्य शिक्षा व्यवस्था ने ज्ञान आधारित भारत की शिक्षा व्यवस्था को नष्ट कर दिया। शिक्षा क्षेत्र में राष्ट्रीय गौरव का भाव जागृत करने, अनुसंधान में भारतीय दृष्टिकोण को विकसित करने, विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के व्यक्तित्व में भारत के सांस्कृतिक मूल्य प्रकट हों, इस उद्देश्य को लेकर भारतीय शिक्षण मंडल देश के लगभग 22 राज्यों में कार्य कर रहा है। अनुसंधान के क्षेत्र में 'रिसर्च फॉर रिसर्जेंस फांउडेशन' के माध्यम से सराहनीय प्रयास पिछले दिनों में प्रारंभ हुए हैं। भारतीय शिक्षण मंडल का कार्य केवल शिक्षा परिसरों तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवार से ही बदलाव के लिए प्रसासरत है। 'परिवार बनें पाठशाला' बीएसएम का प्रमुख आयाम है। इसके अलावा युवाओं के बीच में 'मी फॉर माय नेशन' की संकल्पना लेकर कार्य प्रारंभ किया है। देश में जब भी शिक्षा नीति को लेकर विचार-विमर्श हुआ है, भारतीय शिक्षण मंडल ने उस विमर्श में अग्रणी भूमिका निभाई है। 

शिक्षकों को संगठित करता अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ :

'राष्ट्र के हित में शिक्षा, शिक्षा के हित में शिक्षक और शिक्षक के हित में समाज' के ध्येय को सामने रखकर 1987 में देश के प्रमुख शिक्षक संगठनों ने अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ की स्थापना की। वर्तमान में 24 राज्यों के 35 राज्य स्तरीय शिक्षा-संगठन इससे सम्बद्ध हैं तथा 50 से अधिक विश्वविद्यालयों में इसका कार्य है। इसके सदस्यों की छह लाख से अधिक है। यह महासंघ शिक्षकों को संगठित करने के साथ-साथ प्राचीन भारतीय गणित और विज्ञान की उपलब्धियों को उजागर करने, पौढ़ शिक्षा तथा साक्षरता अभियान में भी सहयोग करता है। 

हिन्दू समाज के भेद खत्म कर उसे संगठित कर रहा है विश्व हिन्दू परिषद : 

हिन्दू समाज के खोये हुए स्वाभिमान को जगाने और समय के साथ व्याप्त भेदभाव को समाप्त कर समरसता लाने के लिए विश्व हिन्दू परिषद बड़े फलक पर कार्य कर रहा है। विश्व हिन्दू परिषद वह संगठन है, जिसने उन क्षेत्रों में अनुसूचित जाति-जनजाति के बंधुओं को मंदिर में प्रवेश दिलाया, जहाँ सामाजिक खाई बहुत गहरी थी। हिन्दू संत-महात्माओं को एक मंच पर लाकर 'हिन्दव: सोदरा: सर्वे, न हिन्दू: पतितो भवेत' का संदेश समाज को दिया। हिन्दुओं के विभिन्न मत-पंथों को एक मंच पर लाने की दृष्टि से 'धर्म संसद' का गठन उल्लेखनीय है। धर्म संसद के निर्णयानुसार ही विश्व हिन्दू परिषद ने श्रीराम एवं श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति, काशी-विश्वनाथ मन्दिर का उद्धार, कारसेवा आदि के कार्यक्रम हाथ में लिए। परिषद अयोध्या में श्रीराम मन्दिर के निर्माण के लिए कृतसंकल्पित है तथा इसके लिए पत्थर तराशने का काम प्रगति पर है।  श्रीरामजन्मभूमि मंदिर आंदोलन को अखिल भारतीय स्वरूप देने में विश्व हिन्दू परिषद की भूमिका से सब परिचित हैं। 

सन् 1964 में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना हुई। मुम्बई में स्थापित हुआ यह संगठन आज विशाल रूप ले चुका हैं। इसका कार्य भारत सहित 70 अन्य देशों में चलता है। भारत के सभी जिलों तथा 4 हजार प्रखण्डों में इसकी इकाइयाँ सक्रिय हैं। युवाओं के लिए बजरंग दल और युवतियों के लिए दुर्गावाहिनी का गठन भी अनेक स्थानों पर हो चुका है। 

शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन एवं स्वाभिमान की अलख जगा रहा है वनवासी कल्याण आश्रम :

वनवासियों की सेवा करते हुए उन्हें राष्ट्र की मुख्यधारा से जोडऩे के लिए श्री गुरुजी एवं ठक्कर बाप्पा की प्रेरणा से रमाकांत केशव देशपाण्डे ने छत्तीसगढ़ के जशपुर में वनवासी कल्याण आश्रम का कार्य शुरू किया था। 1952 से 1977 तक यह कार्य जशपुर तक ही सीमित रहा। 1977 में कल्याण आश्रम की रजत जयंती मनाई गई, इसके बाद कल्याण आश्रम को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया गया। स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार छात्रावास, विद्यालय, बालवाड़ी आदि प्रकल्प प्रारम्भ किए गए। 1978 से लेकर 2003 तक कार्य का इतना विस्तार हुआ है कि आज लक्षद्वीप और गोवा को छोड़कर देश के सभी जनजातीय बहुल प्रांतों में कार्य पहुंच गया है। आज 1 लाख 43 हजार 358 वनवासी गांवों में से आज 37 हजार से अधिक गांव कल्याण आश्रम के सम्पर्क में हैं। 10 हजार से अधिक गांवों में समितियां बनी हुई हैं। लगभग एक हजार पूर्णकालिक कार्यकर्ता (प्रचारक) इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, जिनमें से 700 कार्यकर्ता जनजातीय समाज के ही हैं। वनांचलों में वनवासी कल्याण आश्रम से सम्बद्ध 38 पंजीबद्ध संस्थाएं अपनी सेवा दे रही हैं। इन संस्थाओं के द्वारा देश के 12 हजार से अधिक स्थानों पर शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, खेलकूद जैसे समाज जीवन के कई आयामों के 17 हजार से अधिक सेवा प्रकल्प हैं। वनवासी कल्याण आश्रम के समग्र सेवा प्रकल्पों का आर्थिक व्यय का भार समाज ही वहन करता है। आज वनवासी कल्याण आश्रम के तहत शिक्षा, चिकित्सा, उद्योग प्रशिक्षण और धर्म तथा राष्ट्रभाव जागरण से जुड़े 10 हजार से अधिक प्रकल्प चल रहे हैं शिक्षा के लिए अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र, प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालय, बाल-बाडिय़ाँ, छात्रावास, वाचनालय एवं पुस्तकालय चलते हैं। आश्रम ने वनवासियों के स्वास्थ्य की रक्षा और चिकित्सा हेतु दवाखाने एवं अस्पताल खोले हैं। इसके अलावा आश्रम की ओर से कृषि विका केन्द्र, रोजगार प्रशिक्षण केन्द्र, खेलकूद केन्द्र आदि भी व्यापक स्तर पर जा रहे हैं। अलगाववाद से ग्रस्त नागालैण्ड, त्रिपुरा, मणिपुर जैसे राज्यों में भी आश्रम के कार्यकर्ता चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच डटे रह कर कार्य कर रहे हैं।

राजनीति नहीं, मजदूरों के अधिकार के लिए संकल्पित है भारतीय मजदूर संघ :

भारतीय मजदूर संघ भारत का सबसे बड़ा केंद्रीय श्रमिक संगठन है। राष्ट्र हित को सर्वोपरि मानकर राष्ट्र निर्माण के लिए श्रमिकों को संगठित करने के उद्धेश्य से दत्तोपंत ठेंगड़ी ने 23 जुलाई, 1955 को भारतीय मजदूर संघ की स्थापना की। भारतीय मजदूर संघ की स्थापना से पूर्व भारत में जितने भी मजदूर संगठन कार्यरत थे, वे सब किसी न किसी राजनीतिक दल के हिस्से थे। अर्थात् उन मजदूर संगठनों का उद्देश्य श्रमिक वर्ग का भला करना कम, बल्कि अपने राजनीतिक दल के राजनीतिक हितों की पूर्ति करना अधिक था। इसलिए भारतीयता की भावना के साथ श्रमिक वर्ग के उत्थान के लिए भारतीय मजदूर संघ ने काम प्रारंभ किया, तो जल्द ही उसने सबको मीलों पीछे छोड़ दिया। भारतीय मजदूर संघ का कार्य भारत के सभी राज्यों तथा 44 उद्योगों में है। यह 1989 की सदस्यता सत्यापन के आधार पर पहली बार 1996 में देश का नम्बर एक मजदूर संगठन घोषित हुआ। वर्ष 2002 की सदस्यता सत्यापन के अन्तरिम परिणाम की घोषणा के अनुसार भारतीय मजदूर संघ 62 लाख से भी अधिक संख्या के साथ अब भी देश का सबसे अधिक सदस्यों वाला मजदूर संगठन है। समाज में एकता बढ़ाने के लिए 'सर्व पंथ समादर मंच' इसका सहयोगी संगठन है। यह संगठन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के द्वारा देश पर लादी जा रही आर्थिक दासता के खिलाफ है। डंकल प्रस्तावों के विरोध में मजदूर संघ ने 20 अप्रैल, 1993 को दिल्ली के लाल किले पर एक लाख से अधिक श्रमिकों का विराट प्रदर्शन किया था। इस संगठन ने राष्ट्र के पुननिर्माण के लिए 'राष्ट्र हित' एवं 'श्रमिक हित' का त्रिसूत्र आदर्श रूप में अपनाया है। भारतीय मजदूर संघ के उद्घोष और दूसरे संगठनों के नारों को देखेंगे तो दोनों के उद्देश्य के बीच में अंतर स्पष्ट दिखाई देगा। अन्य मजदूर संगठनों का नारा है- दुनिया के मजदूरों एक हो। जबकि भारतीय मजदूर संघ का नारा है- मजदूरो दुनिया को एक करो। अन्य मजदूर संगठनों का नारा है- चाहे जो मजबूरी हो, माँग हमारी पूरी हो। जबकि भारतीय मजदूर संघ का नारा है- देश के हित में करेंगे काम, काम के लेंगे पूरे दाम। 

किसानों की बेहतरी के लिए कार्यरत भारतीय किसान संघ :

भारत कृषि प्रधान देश है। फिर भी यहाँ किसानों एवं कृषि की स्थिति संतोषजनक नहीं है। किसानों की स्थिति को सुधारने और उनको राष्ट्रहित में संगठित करने के लिए संघ के स्वयंसेवकों ने मार्च, 1979 में कोटा में 'भारतीय किसान संघ' की स्थापना ही। इस कार्य में दत्तोपंत ठेंगड़ी की प्रेरणा और भाऊ साहब भुस्कुटे की प्रभावी भूमिका रही। भारतीय किसान संघ, किसानों की विविध समस्याओं का निराकरण, गोवंश संरक्षण प्राचीन कृषिशास्त्र पर अनुसंधान जैसे कई विशिष्ट कार्यों में लगा है। पिछले 21 वर्षों में किसान संघ का कार्य देश के एक लाख गाँवों तक पहुँचा है। यह संगठन आज किसानों का सबसे बड़ा अखिल भारतीय संगठन है। यह राष्ट्रहित तथा कृषक हित में संतुलन रखते हए राजनीति से पृथक रहने का पक्षधर है। यह अपने आंदोलनों में विध्वंस, तोड़-फोड़ तथा आमरण अनशन जैसी प्रवृतियों से दूर रहता है। भारतीय किसान संघ ने कृषि समर्थन मूल्य, किसानों को उचित मूल्य पर विद्युत उपलब्ध कराने, फसल तथा ऋण बीमा योजना शुरू करने आदि के लिए समय-समय पर प्रभावी आन्दोलन किए हैं। भारतीय किसान संघ का उद्घोष है- 'हर किसान हमारा नेता है।'

'नर सेवा नारायण सेवा' का मंत्र लेकर समाजसेवा में सक्रिय है सेवा भारती :

सेवा भारती एक अखिल भारतीय स्वैच्छिक सेवा संगठन है। इसका कार्यक्षेत्र ऐसी सेवा-बस्तियां हैं, जिन्हें लोग सामान्यत: कच्ची, गंदी एवं पिछड़ी व उपेक्षित बस्तियों के नाम से पुकारते हैं। सेवा का लक्ष्य है- विभिन्न कारणों से पिछड़ गए वर्ग में स्वाभिमान का संचार कर, उसे स्वावलम्बी बनाना तथा सेवा प्रकल्पों के माध्यम से सामाजिक समरसता का भाव जाग्रत करना ताकि प्रत्येक राष्ट्र निर्माण में सहभागी हो सकें। सेवा भारती द्वारा बिना किसी राजकीय अनुदान व सहयोग के देश भर में लगभग पौने दो लाख सेवाकार्य संचालित किए जा रहे हैं। संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस ने कहा था कि यदि अस्पृश्यता पाप नहीं है तो दुनिया मे कुछ भी पाप नहीं है। उन्होंने 1978 में दिल्ली के स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए कहा था कि सेवाकार्यों को संघ की कार्यपद्धिति में शामिल किया जाए। इसी प्रेरणा से 1980 में दिल्ली में 'सेवा भारती' की स्थापना की गयी। डॉ. हेडगेवार जन्म शताब्दी के अवसर पर सवाकार्यों को विशेष गति मिली। उस समय देशभर में सेवानिधि एकत्रित की गई और सेवा कार्य प्रारम्भ हुए। संघ में 'सेवा विभाग' भी जोड़ा गया। 'एक शाखा-एक सेवा कार्य' का विचार रखा गया, जिससे सेवाकार्यों में तेजी आई। 

स्वदेशी को बढ़ावा देता स्वदेशी जागरण मंच :

'भूमण्डलीयकरण' और 'उदारीकरण' के नाम पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बढ़ते खतरे को भाँपकर 1991 में दतोपंत ठेंगड़ी के मार्गदर्शन में नागपुर में 'स्वदेशी जागरण मंच' की स्थापना हुई। मंच ने आर्थिक स्वाधीनता के विषय को लेकर जन-जागरण के कई कार्यक्रम हाथ में लिए। 'स्वदेशी वस्तुओं' के उपयाग को बढ़ावा देने हेतु मंच द्वारा प्रसारित 'स्वदेशी एवं विदेशी उत्पादों की सूची' का अच्छा प्रभाव हुआ है। इसी तरह 1994 में 'स्वदेशी सुरक्षा पखवाड़े' में चले राष्ट्र व्यापी अभियान में 2 लाख गांवों में सम्पर्क किया गया। बहुराष्ट्रीय बिजली उत्पादक कम्पनी एनरॉन के विरोध में मंच ने प्रबल जनांदोलन खड़ा किया। सादा नमक पर केन्द्र सरकार द्वारा लगाये गये प्रतिबंध को हटावाने में भी मंच को उल्लेखनीय सफलता मिली है। चीनी उत्पादों के विरुद्ध समाज में जनचेतना लाने में मंच की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।  

महिलाओं के बीच संगठन सक्रिय है राष्ट्र सेविका समिति : 

भारतीय समाज का ताना-बाना मातृशक्ति के आस-पास ही बुना हुआ दिखता है। श्रीमदभगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने समाज धारणा के लिए नारी की सुप्त शक्तियों को आधार रूप माना है। उस शक्ति का जागरण करते हुए, शक्ति को संघटित करते हुए, उसे राष्ट्र निर्माण कार्य में लगाने के उद्देश्य को लेकर श्रीमती लक्ष्मीबाई केलकर ने 1936 में राष्ट्रीय सेविका समिति की स्थापना की थी। संघ की तरह ही विजयादशमी के दिन वर्धा में समिति की स्थापना हुई थी। समिति की गतिविधियां लगभग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरह ही संचालित होती हैं। नित्य शाखा, प्रार्थना से लेकर प्रशिक्षण शिविर तक की रचना है। राष्ट्र सेविका समिति का ध्येयसूत्र है - 'स्त्री राष्ट्र की आधारशीला है।'

राष्ट्रवादी मुस्लिमों का संगठन मुस्लिम राष्ट्रीय मंच : 

राष्ट्रीय मुस्लिम मंच राष्ट्रवादी मुस्लमानों को एक मंच पर लाने का प्रयास करता है। संघ के प्रचारक इंद्रेश कुमार और प्रख्यात पत्रकार मुजफ्फर हुसैन के प्रयासों से राष्ट्रीय मुस्लिम मंच की स्थापना 24 दिसंबर, 2002 में दिल्ली में की गई। मुस्लिमों को संघ की विचारधारा से जोडऩे की प्रेरणा संघ के पूर्व सरसंघचालक केएस सुदर्शन ने दी। 24 दिसंबर को जिस कार्यक्रम में मंच की स्थापना की भूमिका बनाई गई थी, उसमें श्री सुदर्शन, संघ विचारक एमजी वैद्य और संघ प्रचाकर इंद्रेश कुमार एवं मदन दास उपस्थित थे। अल्प समय में भी इस संगठन ने अपनी पहचान बना ली है और महत्वपूर्ण कार्य किए हैं।

गुरुवाणी के प्रचार-प्रसार में जुटी राष्ट्रीय सिख संगत :

उग्रवाद और अलगाववाद से पीडि़त पंजाब की चिन्ताजनक स्थिति में एकता का भाव जगाने के लिए 1986 में 'राष्ट्रीय सिख संगत' की स्थापना हुई। सिख संगत श्री गुरु ग्रन्थ साहब और श्री गुरुवाणी के प्रचार-प्रसार हेतु भी विशेष प्रयत्नशील है। वर्तमान में देश विदेश में 500 स्थानों पर संगत का कार्य चल रहा है। 1989 में आयोध्या में श्रीराम मन्दिर के शिलान्यास में सरदार शमशेर सिंह जी ने सम्पूर्ण सिख समुदाय की ओर से शिला रखी थी। 

ललित कलाओं में राष्ट्रीय चेतना ला रही है संस्कार भारती :

'संस्कार भारती' रंगमंच एवं ललित कलाओं की साधना की अखिल भारतीय संस्था है। इसका उद्धेश्य ललित कला के क्षेत्र में राष्ट्रीय चेतना लाना है। इसका शुभारम्भ 1981 में लखनऊ में हुआ था। इसकी दो हजार से अधिक इकाइयाँ देशभर में कार्यरत हैं। संगीत, नाटक साहित्य, चित्रकला आदि विविध क्षेत्रों के अत्यंत प्रसिद्ध शीर्षस्थ कलाकार, गायक, अभिनेता, कवि, रंगकर्मी और शिल्पी तथा इन कलाओं में रुचि रखने वाले नागरिक तथा उदीयमान कलाकार बड़ी संख्या में संस्कार भारती से जुड़े हुए हैं।

देश का शारीरिक स्वास्थ्य सुधारने सक्रिय आरोग्य भारती : 

संघ के समविचारी संगठन देश के सांस्कृतिक-सामाजिक स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, अपितु नागरिकों के शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी प्रयासरत हैं। स्वस्थ व्यक्ति के द्वारा ही राष्ट्र समृद्ध एवं गौरवशाली बन सकता है। इसी चिंतन को ध्यान में रखकर 2 नवम्बर, 2002 (कार्तिक कृष्ण 13, युगाब्द 5104) को धन्वन्तरी जयन्ती के पावन दिवस पर कोच्ची में आरोग्य भारती की स्थापना हुई। आरोग्य भारती का काम संघ की दृष्टि से देश के 38 प्रांतों में संचालित है। आरोग्य भारती नगरों से अधिक गाँव में सक्रिय है और स्वास्थ्य को लेकर समाज में जनजाग्रति एवं स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान के लिए प्रयासरत है। स्वास्थ्य संवर्धन के लिए आरोग्य भारती की योजना से जो गतिविधियां संचालित की जाती हैं, उनमें प्रमुख हैं- विद्यालय के बालकों का आरोग्य परीक्षण, छात्रों, शिक्षकों एवं पालकों का आरोग्य संवर्धन हेतु प्रवोधन, आहार-विहार मार्गदर्शन, प्रथमोपचार प्रशिक्षण, महिलाओं को घरेलू उपचार की जानकारी, औषधीय वनस्पति परिचय एवं उनका रोपण, हर व्यक्ति को व्यायाम तथा योग का प्रशिक्षण, इस हेतु सूर्य नमस्कार का प्रचार एवं आरोग्य मित्र प्रशिक्षण कार्यक्रम। 

स्वदेशी खेलों को प्रोत्साहित करने में सबसे आगे है क्रीडा भारती : 

'क्रीडा से निर्माण चरित्र का, चरित्र से निर्माण राष्ट्र का' इस बोध वाक्य के साथ खेलों के माध्यम से आरोग्य संपन्न राष्ट्र निर्माण के लिए क्रीडा भारती की स्थापना पुणे में वर्ष 1992 में की गई। क्रीडा भारती का मुख्य उद्देश्य देश के अन्य स्थापित खेलों के साथ स्वदेशी खेलों एवं ग्रामीण क्षेत्रों के परम्परागत खेलों को बढ़ावा देना है, ताकि समाज के सभी वर्ग मैदान पर आकर खेलें। खेलों के माध्यम से स्वस्थ शरीर, तीक्ष्ण बुद्धि व उत्तम संस्कार प्राप्त कर खिलाडिय़ों में राष्ट्रीयता की भावना का निर्माण हो। प्रारंभ में क्रीडा भारती के कार्य का विस्तार महाराष्ट्र तक सीमित था, देश के शेष प्रांतों में कार्य की गति एवं विस्तार कम ही था। परंतु, वर्ष 2009 के बाद क्रीडा भारती के अखिल भारतीय स्वरूप का प्रगटीकरण होता है और वर्तमान में क्रीडा भारती की गतिविधियां लगभग सभी प्रांतों में संचालित हैं। क्रीडा भारती ने पंचसूत्री कार्यक्रम तय किए हैं- 1. सूर्य नमस्कार, प्रत्येक व्यक्ति की दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा बनाने का प्रयास। 2. राष्ट्रीय खेल दिवस (29 अगस्त), भारत के महान देशभक्त हॉकी खिलाड़ी ध्यानचंद के जन्मदिवस के अवसर पर विभिन्न खेलों व प्रतियोगिताओं का आयोजन। 3. हनुमान जयन्ती (चैत्री पूर्णिमा), यह क्रीडा भारती का स्थापना दिवस है। इस अवसर पर संपर्क कार्यक्रम आयोजित होते हैं। 4. वीरमाता जीजामाता पुरस्कार, छत्रपति शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व निर्माण में माँ जीजाबाई द्वारा किए गए लालन-पालन का महत्व है। उसी भावना को जाग्रत रखने की दृष्टि से क्रीडा क्षेत्र में प्रांतीय, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय खेलों में सफलता के लिए पुरस्कार प्राप्त करने वाले खिलाडिय़ों की माता का सम्मान 'वीरमाता जीजामाता पुरस्कार' देकर क्रीडा भारती करती है। 5. क्रीडा ज्ञान परीक्षा, बच्चों की खेल-कूद में रुचि बढ़ाने की दृष्टि विद्यालयों में क्रीडा ज्ञान परीक्षा का आयोजन। 

भारत के सम्पन्न वर्ग को राष्ट्रजीवन की दिशा से जोड़ता भारत विकास परिषद : 

समाज के प्रबुद्ध तथा सम्पन्न वर्ग के लोगों को मातृभूमि की सेवा में सक्रिय करने के लिए स्वामी विवेकानंद की जन्मशताब्दी के अवसर पर 1963 में 'भारत विकास परिषद' की स्थापना हुई। वर्तमान में इसकी देशभर में 800 से अधिक शाखाएँ तथा 40 हजार से भी अधिक सदस्य हैं। परिषद का कार्य भारत के बाहर भी चलता है। परिषद के कार्य के पाँच मुख्य सूत्र हैं- सम्पर्क, सहयोग, संस्कार, सेवा एवं समर्पण। परिषद विकलांग पुनर्वास, वनवासी कल्याण, पर्यावरण एवं स्वास्थ्य, निर्धन कन्याओं का सामूहिक विवाह एवं निर्धन मेधावी छात्रों की सहायता से अनेक काम करती है।  

भारत के स्वर्णिम इतिहास को सामने लाने के लिए संकल्पित है इतिहास संकलन योजना : 

अंग्रेजों और वामपंथी इतिहासकारों ने भारत के इतिहास को स्वार्थपूर्ति के लिए तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया। ऐसे में देश के सही और प्रेरणादायी इतिहास को सामने लाने के लिए बाबा साहब आप्टे की स्मृति में 1973 में 'भारतीय इतिहास संकलन योजना' के नाम से कार्य आरंभ हुआ। इसे आर्यों के भारत में बाहर से आने की धारण को निर्मूल सिद्ध करने तथा विलुप्त वैदिक नदी-सरस्वती की खोज में विशेष सफलता मिली है। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के कई अनछुए पहलुओं को भी समिति ने उजागर किया है। भारत एवं विदेशों में रह रहे इतिहास एवं पुरातत्व के विद्वान, विश्वविद्यालयों में कार्यरत प्राध्यापक, अध्यापक, अनुसन्धान-केन्द्रों के संचालक, भूगोल, खगोल, भौतिशास्त्र आदि अनेक क्षेत्रों के विद्वान तथा वैज्ञानिक एवं इतिहास में रुचि रखनेवाले विद्वान इस कार्य से जुड़े हुए हैं।

देश की अर्थव्यवस्था को गति देने में सक्रिय सहकार भारती :

सहकारी आन्दोलन और देश की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए संघ के प्रचारक लक्ष्मण राव इनामदार की प्रेरणा से गणेश चतुर्थी के दिन 1978 में 'सहकार भारती' का कार्य महाराष्ट्र से शुरू हुआ। इसके संस्थापक अध्यक्ष माधवराव गोडबोले थे, जिन्होंने 1935 में सांगली में जनता सहकारी बैंक की शुरुआत की थी। आज महाराष्ट्र में 1,200 से अधिक सहकारी बैंक और सहकारी संस्थाएँ इससे जुड़ चुकी हैं। इनमें से विशेष रूप से जनता सहकारी बैंक और सहकारी ग्राहक भण्डार सफलतापूर्वक चल रहे हैं। पुणे का 'जनता सहकारी बैंक' तो एशिया के प्रथम पाँच बैंको में आता है। धीरे-धीरे सहकार भारती का काम सम्पूर्ण देश में बढ़ रहा है।

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लघु उद्योग के प्रोत्साहन में जुटा लघु उद्योग भारती : 

परम्परागत रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार रहे लघु उद्योगों को संगठित करने एवं उन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चंगुल से मुक्त कराने के उद्धेश्य से 1994 में 'लघु उद्योग भारती' की स्थापना हुई। यह संगठन लघु उद्यमियों को मार्गदर्शन व सहायता देने, उन्हें अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने आदि की दिशा में प्रयत्नशील है। संस्था के साथ एक हजार से अधिक पंजीकृत सदस्य जुड़े हैं। देश के लगभग प्रत्येक राज्य एवं जिले में संस्था का काम है। 

समाज को सुरक्षा के प्रति चेता रही है सीमा जनकल्याण समिति :

सीमावर्ती क्षेत्रों में चलने वाली राष्ट्र विरोधी गतिविधियों से चितिंत कुछ कार्यकर्ताओं ने 1985 में जोधपुर में 'सीमा जनकल्याण समिति' की स्थापना की। यह संगठन सुरक्षा के उपायों में समाज को सहभागी बनाने और सीमा क्षेत्र में प्रखर राष्ट्र भाव जगाने में लगा है। हाल ही में सीमावर्ती क्षेत्रों के भीषण अकाल के समय इसके राहत कार्यों में सराहनीय भूमिका निभाई। 

विज्ञान के क्षेत्र में सक्रिय है विज्ञान भारती :

प्राचीन भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों को सामने लाने तथा विश्वमंच पर भारतीय विज्ञान को प्रतिष्ठित करने को उद्धेश्य से 1992 में जबलपुर में 'विज्ञान भारती' की स्थापना हुई। यह संस्था विज्ञान के बारे में अनेक पुस्तकें प्रकाशित कर चुकी है। विज्ञान भारती का उद्देश्य स्वदेशी विज्ञान को बढ़ावा देना, आधुनिक विज्ञान और प्राचीन विज्ञान के बीच एक सेतु बनाना, विज्ञान में लोककल्याण की भावना को स्थापित करना है। 

जन-जन को संस्कृत सिखा रही है संस्कृत भारती :

बाबासाहब आप्टे के प्रयासों से संघ के स्वयंसेवकों ने संस्कृत के प्रचार-प्रसार का कार्य प्रारंभ किया। प्रारंभ में प्रान्तीय तथा स्थानीय स्तर पर भारत संस्कृत परिषद्, स्वाध्याय मंडलम्, विश्व संस्कृत प्रतिष्ठान इत्यादि अनेक कार्य प्रारम्भ किए गए। फरवरी, 1996 में संस्कृत के क्षेत्र में कार्य करने वाले देश के सभी कार्यकर्ता दिल्ली में एकत्रित हुए जहां सभी संस्थाओं का विलय करके अखिल भारतीय स्तर पर 'संस्कृत भारती' की स्थापना हुई। संस्कृत को जनभाषा बनाना, अपनी संस्कृति से जोडऩा और संस्कृत के महत्व को स्थापित करना संस्कृत भारती का उद्देश्य है। सामान्य लोगों को संस्कृत सिखाने के लिए संस्कृत भारती अनेक प्रयास करती है, जिनमें संस्कृत संभाषण शिविर प्रमुख है। यह संगठन 1 लाख 20 हजार संभाषण शिविर के माध्यम से 10 करोड़ से अधिक लोगों को आम बोल-चाल में उपयोग आने वाली संस्कृत सिखा चुका है। इसके साथ ही एक लाख से अधिक शिक्षकों को संस्कृत का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। संस्कृत भारती के प्रयासों से देश के चार गाँव पूरी तरह संस्कृत मय हो चुके हैं। इन गाँवों में प्रत्येक व्यक्ति सहजता से संस्कृत में बातचीत करता है। भारत और भारत के बाहर संस्कृत भारती 4 हजार 500 से अधिक संस्कृत केंद्र संचालित करती है। 

इस प्रकार जब हम समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में नजर दौड़ाते हैं, तो प्रत्येक क्षेत्र में संघ की विचारधारा की मजबूत उपस्थिति पाते हैं। आज ढूंढऩे से भी ऐसा क्षेत्र नहीं मिलेगा, जहाँ संघ कार्य नहीं पहुँचा है। संघ की शाखा से निकल कर स्वयंसेवकों ने प्रत्येक क्षेत्र में समविचारी संगठनों के माध्यम से कार्य प्रारंभ किया है। अखिल भारतीय साहित्य परिषद, विवेकानंद केंद्र, हिंदू स्वयंसेवक संघ, विश्व संवाद केंद्र, इस प्रकार के बड़े संगठनों के नामों की श्रृंखला बहुत बड़ी है। संघ के स्वयंसेवक जिस गीत (दसों दिशाओं में जाएं...) को दोहराते हैं, उसको वह जी रहे हैं और सिद्ध भी कर रहे हैं।

RSS aur Tiranga | आरएसएस करता है तिरंगे का सम्मान | भविष्य का भारत- मोहन भागवत



सोमवार, 3 अक्तूबर 2022

स्वाधीनता आंदोलन में त्याग, बलिदान और साहस की प्रतीक बन गई थी मातृशक्ति

स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका | Role of women in freedom movement


प्रत्येक कालखंड में मातृशक्ति ने भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है। समाज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वह पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चली है अपितु अनेक अवसर पर अग्रणी भूमिका में भी रही है। आज जबकि समूचा देश भारत के स्वाधीनता आंदोलन का अमृत महोत्सव मना रहा है तब मातृशक्ति के योगदान/बलिदान का स्मरण अवश्य करना चाहिए। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के पृष्ठ पलटेंगे और मातृशक्ति की भूमिका को देखेंगे तो निश्चित ही हमारे मन गौरव की अनुभूति से भर जाएंगे। भारत के प्रत्येक हिस्से और सभी वर्गों से, महिलाओं ने स्वाधीनता आंदोलन में हिस्सा लिया। अध्यात्म, सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय होने के साथ ही क्रांतिकारी गतिविधियों में भी महिलाएं शामिल रहीं। यानी उन्होंने ब्रिटिश शासन व्यवस्था को उखाड़ फेंकने और ‘स्व’ तंत्र की स्थापना के लिए प्रत्येक क्षेत्र से भारत के स्वर एवं उसके संघर्ष को बुलंद किया। आंदोलन के कुछ उपक्रम तो ऐसे रहे, जिनके संचालन की पूरी बागडोर मातृशक्ति के हाथ में रही। भारतीय स्वाधीनता संग्राम का एक भी अध्याय ऐसा नहीं है, जिस पर मातृशक्ति के त्याग, बलिदान और साहस की गाथाएं अंकित न हो।  

स्वतंत्रता का समर, वैसे तो तब से ही प्रारंभ हो गया था, जब पहली बार भारतवर्ष के एक छोटे-से हिस्से पर विदेशी आक्रांताओं ने कब्जा किया। परंतु इस संघर्ष का महत्वपूर्ण पड़ाव रहे 1857 के स्वातंत्र्य समर में रानी लक्ष्मीबाई जैसा नेतृत्व चमकती तलवार की तरह सामने आता है। उनके साथ इस संघर्ष में कदम से कदम मिलाने वाली झलकारी बाई जैसी वीरांगना के साहस के आगे ब्रिटिश सैनिक पानी माँगते नजर आए। वहीं, मध्यप्रदेश के सिवनी जनपद में जन्मी और रामगढ़ की रानी अवंतीबाई लोधी की तलवार की धार के सामने अंग्रेज टिक नहीं सके। अंग्रेजी पलटन भाग खड़ी हुई। जिस अंग्रेज कैप्टन वाडिग्टन ने रानी के सामने युद्ध के मैदान में घुटने टेककर प्राणों की भीख माँगी, बाद में रीवा नरेश के साथ मिलकर धोखे से रानी अवंतीबाई पर हमला बोला। अंतत: रानी अवंतीबाई ने अंग्रेजों के हाथ आने की अपेक्षा रणक्षेत्र में अपने प्राणों की आहुति दे दी। रानी अवंतीबाई का स्मरण इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि उन्होंने न केवल स्वयं स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया अपितु मध्यप्रदेश के अन्य राजाओं एवं जागीरदारों को भी स्वतंत्रता आंदोलन में सम्मिलित होने के लिए तैयार किया। उनके प्रयासों से शंकरशाह-रघुनाथशाह, उमराव सिंह लोधी, बहादुरसिंह लोधी, जगत सिंह, किशोर सिंह लोधी, कर्णदेव, ठाकुर सरयूप्रसाद सहित अन्य राजा ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध उठ खड़े हुए। 

महलों का सुख छोड़ स्वधर्म की रक्षा के लिए उठ खड़ी हुईं भारत की बेटियां :

पंजाब के कपूरथला में जन्मी राजकुमारी अमृत कौर उन नायिकाओं में शामिल हैं, जिन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने के लिए संघर्ष किया और स्वाधीन भारत के नवनिर्माण का दायित्व भी निभाया। अमृत कौर चाहती तों आलीशान महल में सुख से जीवन व्यतीत कर सकती थीं। परंतु, महात्मा गांधी के संपर्क में आने के बाद उन्होंने राजमहल का सुख छोड़कर कंटक पथ को चुनना स्वीकार किया। नमक सत्याग्रह-1930 और भारत छोड़ो आंदोलन-1942 में उनकी भूमिका नेतृत्वकारी रही, जिसके कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया। स्वतंत्र भारत की सरकार में उन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान जैसी विश्व स्तरीय स्वास्थ्य संस्था की स्थापना का श्रेय देश की पहली स्वास्थ्य मंत्री अमृत कौर को ही है। उन्होंने दुनियाभर से एम्स के लिए धन एकत्र किया। यहाँ तक कि अपना शिमला का घर भी दान दे दिया। वहीं, नागालैण्ड में भी एक चिंगारी चमक रही थी- रानी गाइदिन्ल्यू। कतिपय कारणों से उनका संघर्ष-समर्पण शेष भारत के लिए अल्पज्ञात रहा। परंतु अब देश उनके बारे में जानने लगा है। मात्र 13 वर्ष की उम्र में ही रानी गाइदिन्ल्यू अंग्रेजों के सब प्रकार के षड्यंत्र के विरुद्ध डटकर खड़ी हो गईं। नागालैण्ड में ब्रिटिश सरकार के सहयोग से ईसाई मिशनरीज नागाओं का जबरन कन्वर्जन कर रहे थे अैर उन पर अपनी जीवनशैली थोप रहे थे। स्व-शासन एवं स्वधर्म के संदर्भ में रानी गाइदिन्ल्यू कहती थीं- “धर्म को खो देना, अपनी संस्कृति को खो देना है। अपनी संस्कृति को खोना यानी अपनी पहचान को खोना”। रानी गाइदिन्ल्यू ने 17 वर्ष की अल्पायु में ही अपने अनुयाइयों के साथ अंग्रेजों के खिलाफ गोरिल्ला युद्ध छेड़ कर उन्हें पराजित किया। 1942 में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। भारत की स्वतंत्रता के बाद ही रानी गाइदिन्ल्यू को जेल से मुक्ति मिली। 

भारत की बेटियों ने अंग्रेजों को दिखा दी अपनी शक्ति :

ब्रिटिश अधिकारियों ने स्वप्र में भी यह कल्पना नहीं की होगी कि भारत में उनका वास्ता इतनी साहसी महिलाओं से पड़ेगा। उन्हें शायद ही इसका अंदाजा रहा हो कि महलों से लेकर साधारण घरों की महिलाएं एक-दूसरे का हाथ पकड़कर ब्रिटिश क्राउन की जड़ों को हिला देंगी। धरती पर जिस सत्ता का सूरज नहीं डूबता था, उसको दिन में तारे दिखाने का कार्य भारत के वीरांगनाओं ने किया। अंग्रेजों का यह पूर्वाग्रह भली प्रकार दूर हो गया कि भारत में महिलाएं घूंघट में रहती हैं और उनकी भूमिका सिर्फ चूल्हे-चौके तक सीमित है। भारत की बेटियां तो सत्ता के समस्त सूत्र अपने हाथ में संभाल रही थीं। रणक्षेत्र में चण्डी बनकर अरिदल का संहार कर रही थीं। जो माँ चौके-चूल्हे तक सीमित रहकर परिवार का पोषण करती है, वहीं समाज के पोषण की बागडोर भी संभाल रही है। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान जहाँ जैसी भूमिका, वहाँ मातृशक्ति का वैसा अवतार दिखा।

भारत की महान क्रांतिकारी महिलाएं :

अपने प्राणों की किंचित भी चिंता किए बगैर क्रांति जैसे कठोर संकल्प को निभाने का कार्य भी भारत की मातृशक्ति ने किया। सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी दुर्गा भाभी का नाम तो सबको स्मरण रहता ही है। चन्द्रशेखर आजाद और भगत सिंह जैसे यशस्वी क्रांतिकारियों का सहयोग उन्होंने किया। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को जेल से मुक्त कराने के लिए उन्होंने बम की फैक्ट्री ही बना दी। दुर्गा भाभी की भाँति ही क्रांति के कठोर पथ पर अनेक वीरांगनाएं निकली थीं, जिनमें बंगाल की बेटियों की संख्या अधिक रही। बीना दास, प्रीती लता, उज्ज्वला मजूमदार, कल्पना दत्ता, चारूशिला देवी, टुकड़ीबाला, मीरा दत्त, रेणु सेन, वनलतादास गुप्ता, शांति घोष, सुनीति चौधरी, शोभारानी दत्त और सुहासिनी गांगुली सहित अनेक नाम हैं, जिनके बलिदान के कारण आज हम स्वतंत्रता का उत्सव मना पा रहे हैं। क्रूर अंग्रेज अफसरों के सामने पिस्तौल तानकर खड़े होने के लिए जिस साहस की आवश्यकता होती थी, वह इन वीरांगनाओं में कूट-कूटकर भरा हुआ था। क्रांति का कठोर प्रशिक्षण प्राप्त किया, अंग्रेजों का संधान किया, अंधेरी कोठरी की यातनाएं भोगी और प्राणोत्सर्ग भी किया परंतु अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के प्रयास नहीं छोड़े। मैडम भीकाजी कामा ने तो निष्कासित जीवन व्यतीत करते हुए विदेश में भारत की लड़ाई को जीवित रखा। विदेशी धरती पर पहली बार राष्ट्रीय ध्वज को फहराने का अभूतपूर्व कार्य मैडम भीकाजी कामा ने किया। यानी मातृशक्ति जहाँ रहीं, वहाँ से उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता के प्रयास किए।  

जब महिलाओं ने जला दिए अपने कपड़े और दान कर दिए आभूषण :

आंध्रप्रदेश की दुर्गाबाई देशमुख का योगदान कैसे भूल सकते हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए अपने बहुमूल्य आभूषण महात्मा गांधी को समर्पित कर दिए। एक स्त्री को अपने विवाह की निशानियां कितनी प्रिय होती हैं, इसकी कल्पना करना कठिन नहीं है। परंतु, दुर्गाबाई ने स्वदेशी आंदोलन में अपने विवाह के सभी विदेशी कपड़े जला दिए। इसी तरह, प्रसिद्ध उद्योगपति जमनालाल बजाज की पत्नी श्रीमती जानकी देवी बजाज ने अपने घर की सभी विदेशी वस्तुओं को जला दिया था। मानो, मातृशक्ति में स्वदेशी आंदोलन की पवित्र अग्नि में विदेशी शासन को स्वाह करने की होड़ लगी हो। क्रांतिकारी सुशीला दीदी ने भी तो काकारी कांड के प्रकरण में हो रहे व्यय का प्रबंध करने के लिए अपने सभी आभूषण दान कर दिए थे। नेताजी सुभाषचंद्र बोस के आह्वान पर कितनी ही महिलाएं और युवतियां अपने आभूषण दान करने के लिए एक पैर पर दौड़ पड़ी थीं। नेताजी ने जिस आजाद हिंद फौज का गठन किया, उसमें महिलाओं की एक पूरी टुकड़ी थी- रानी लक्ष्मीबाई रेजीमेंट। कैप्टन लक्ष्मी सहगल को इस रेजीमेंट का कमांडर बनाया गया था। वहीं, बहुत चाहते हुए भी इंदुमति चटगाँव शस्त्रागार हमले में प्रत्यक्ष शामिल नहीं हो पायीं तो उन्होंने हमले के मामले में बंदी क्रांतिकारियों के मुकदमे की पैरवी के लिए बंगाल के कोने-कोने और दूसरे प्रांतों में जाकर चंदा एकत्र किया।  

वारांगना से वीरांगना बनी अजीजनबाई :

स्वाधीनता आंदोलन में हिस्सा लेकर अपना जीवन धन्य करने की प्रतिस्पर्धा मातृशक्ति के बीच जोरों पर थी। प्रत्येक जाति, संप्रदाय, क्षेत्र एवं वर्ग से महिलाएं आगे आईं। वारांगना से वीरांगना बनने के प्रेरक प्रसंग भी सामने आए। ऐसी नायिकाओं में प्रमुख नाम है-अजीजन बाई। कानपुर के कोठे की नर्तकी अजीजन बाई देहव्यापार से जुड़ी थी। लेकिन जब कानपुर क्रांति का प्रमुख केंद्र बन गया, तब अजीजनबाई के जीवन में भी परिवर्तन आया। विलासिता पूर्ण जीवन त्यागकर उन्होंने राष्ट्रसेवा का संकल्प लिया। क्रांति नायक तात्या टोपे के कहने पर अजीजनबाई ने अपनी समूची प्रतिभा का उपयोग भारत के स्वाधिनता आंदोलन के लिए किया। मस्तानी मंडली का गठन किया और इससे जुड़ी सभी महिलाओं को स्वयं ही प्रशिक्षित किया। अंग्रेजों की छावनी में घुसकर नाच-गाकर गोपनीय सूचनाओं को लाना आसान कार्य नहीं था। मस्तानी मंडली की महिलाएं पुरुष भेष धारणकर युद्ध के मैदान में भी मोर्चा लेती थीं। अंग्रेजों ने यूँ ही अजीजनबाई को गोली से नहीं उड़ाया था। अजीजनबाई से ब्रिटिश सरकार भयाक्रांत हो गई थी। 

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेनेवाली महिलाओं की लंबी शृंखला :

स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी सहभागिता एवं अग्रणी भूमिका से मातृशक्ति ने भारतीय दर्शन को सिद्ध करते हुए समूची दुनिया के सामने घोषित कर दिया कि वह शक्तिस्वरूपा है। जैसे आदिशक्ति ने समय-समय पर विभिन्न रूप लेकर अनेक अन्यायी और अत्याचारियों का विनाश किया, वैसे भूमिका वह अवसर आने पर आधुनिक भारत में भी निभाती रही है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी जीवन-आहुति देनेवाली महिलाओं की एक लंबी शृंखला है। संन्यासी विद्रोह की देवी चौधरानी, चुआड़ की रानी शिरोमणि, कित्तूर की रानी चेनम्मा, शिवगंगा राज्य की विद्रोही बेलुनाचियार, भारत छोड़ो आंदोलन की प्रमुख महिला नेतृत्व अरुणा आसफ अली, टीटागढ़ कांड की सरोजदास चौधरी और भूमिगत स्वयंसेवक दल की संस्थापक सुचेता कृपलानी, रानी ईश्वरी कुमारी, ननीबाला, पार्वती देवी, प्रफुल्ल नलिनी बह्म, मणिबेन वल्लभभाई पटेल, माया घोष, मृदुलाबेन साराभाई, सरलादेवी साराभाई, सावित्री देवी, हजरत महल और माता स्वरूपरानी ऐसे ही प्रमुख मातृशक्ति के नाम हैं, जिनका स्मरण आज की पीढ़ी में ऊर्जा, साहस और समर्पण का संचार कर सकता है। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि मातृशक्ति के बलिदान के कारण भी भारत की स्वाधीनता संभव हो सकी। भारत के स्वाधीनता आंदोलन का मूल्यांकन मातृशक्ति की भूमिका को अनदेखा करके नहीं किया जा सकता। 

दैनिक जागरण समाचारपत्र समूह के देशभर में प्रकाशित सभी संस्करणों में 13 अगस्त, 2022 को यह आलेख प्रकाशित हुआ।

मंगलवार, 27 सितंबर 2022

समग्र पर्यटन का केंद्र है मध्यप्रदेश

 मध्यप्रदेश के पर्यटन मानचित्र पर बिखरे हैं प्रकृति, वन्य जीवन, धरोहर और अध्यात्म के चटख रंग

भारत का ह्रदय ‘मध्यप्रदेश’ अपनी नैसर्गिक सुन्दरता, आध्यात्मिक ऊर्जा और समृद्ध विरासत के चलते सदियों से यात्रियों को आकर्षित करता रहा है। आत्मा को सुख देनेवाली प्रकृति, गौरव की अनुभूति करानेवाली धरोहर, रोमांच बढ़ानेवाला वन्य जीवन और विश्वास जगानेवाला अध्यात्म, इन सबका मेल मध्यप्रदेश को भारत के अन्य राज्यों से अलग पहचान देता है। इस प्रदेश में प्रत्येक श्रेणी के पर्यटकों के लिए कई चुम्बकीय स्थल हैं, जो उन्हें बरबस ही अपनी ओर खींच लेते हैं। यह प्रदेश उस बड़े ह्रदय के मेजबान की तरह है, जो किसी भी अतिथि को निराश नहीं करता है। 

वैभव की इस भूमि पर पराक्रम की गाथाएं सुनाते और आसमान का मुख चूमते दुर्ग हैं। भारत का जिब्राल्टर ‘ग्वालियर का किला’, महेश्वर में लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर का राजमहल, मांडू का जहाज महल, दतिया में सतखंडा महल, रायसेन का दुर्ग, दुर्गावती का मदन महल, जलमग्न रहनेवाला रानी कमलापति का महल और गिन्नौरगढ़ सहित अनेक किले हैं, जो मध्यप्रदेश के स्थापत्य की विविधता का बखान करते हैं। देवों के चरण भी इस धरा पर पड़े हैं। उज्जैन, जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण पढ़े। चित्रकूट, जहाँ प्रभु श्रीराम माता सीता और भ्राता लखन सहित वनवास में रहे। ओंकारेश्वर, जहाँ आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने आचार्य गोविन्द भगवत्पाद से दीक्षा ली। मध्यप्रदेश में दो ज्योतिर्लिंग- महाकाल और ओंकारेश्वर हैं। इसके साथ ही भगवान शिव ने कैलाश और काशी के बाद अमरकंटक को परिवार सहित रहने के लिए चुना है। एक ओर जहाँ द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण प्रतिवर्ष मुरैना में आकर ढ़ाई दिन रहते हैं तो वहीं ओरछा में राजा राम का शासन है। महारानी कुंवर गणेश के पीछे-पीछे श्रीराम अयोध्या से ओरछा तक चले आये थे। ओरछा राजाराम के मंदिर के लिए ही नहीं, अपितु अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए भी प्रसिद्ध है।

रविवार, 25 सितंबर 2022

अमरकंटक का प्राचीन मंदिर समूह ‘रंगमहला’

अमरकंटक दर्शन - 12


आदि शंकराचार्य ने स्थापित किया शिवलिंग, अभिषेक करने आती हैं माँ नर्मदा



कोटि तीर्थ माँ नर्मदा उद्गम स्थल के समीप प्राचीन काल के मंदिरों का एक समूह है। ये मंदिर हमें अपने पास बुलाते हैं, नर्मदा के उद्गम की कहानी सुनाने के लिए। हम शांत चित्त से यहाँ बैठें तो पाएंगे कि थोड़ी देर में ये मंदिर हमसे बात करने लगते हैं। वे बताते हैं कि यहाँ जगतगुरु आदि शंकराचार्य आये थे। जगतगुरु आदि शंकराचार्य। मंदिर परिसर से सट कर बने आदि शंकराचार्य आश्रम की ओर इशारा करते हैं- देखिए वह है हिन्दू धर्म और हिंदुस्थान को एकसूत्र में पिरोने वाले भगवान का आश्रम। और फिर इसके बाद वह एक-एक करके अपने निर्माण की कथा सुनाते हैं। यहाँ पातालेश्वर मंदिर, कर्ण मंदिर, शिव मंदिर और एक पुरातन काल का सूर्य कुंड भी है। एक मंदिर में महावीर बजरंगबली भी विराजे हैं।

शुक्रवार, 16 सितंबर 2022

असाधारण, कुशल एवं प्रभावी वक्ता-प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

सार्वजनिक जीवन में संवाद कला का बहुत महत्व है। व्यक्तिगत स्तर और छोटे समूह में लोगों को आकर्षित करना एवं उन्हें अपने से सहमत करना अपेक्षाकृत आसान होता है। किंतु, जन (मास) को अपने विचारों से सहमत करना और अपने प्रति उसका विश्वास अर्जित करना कठिन बात है। सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले लोग किसी न किसी माध्यम से ही जन सामान्य तक अपनी पहुँच बनाते हैं। इस प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण है, व्यक्ति किस प्रकार अपने विचार प्रस्तुत करता है। आवश्यक है कि वह जिस रूप में सोच रहा है, वह उसी रूप में जनता के बीच पहुँचे। जो लोग इस प्रकार संवाद कला को साध लेते हैं, वह जनसामान्य से जुड़ जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसी संवाद कला को सिद्ध कर लिया है। वह असाधारण वक्ता और प्रभावी संचारक हैं। प्रधानमंत्री मोदी संचार के 7-सी के सिद्धांत को जीते हैं। संचार के विशेषज्ञ फ्रांसिस बेटजिन ने बताया है कि 7-सी के सिद्धांत का उपयोग कर संचारक बहुत ही सरलता और प्रभावी ढंग से जन (मास) के मस्तिष्क में अपनी बात (संदेश) को पहुंचा सकता है। बहुत बड़े जनसमुदाय से अपनत्व स्थापित कर सकता है। इस सिद्धांत की सातों सी- स्पष्टता (Clarity), संदर्भ (Context), निरंतरता (Continuty), विश्वसनीयता (Credibility), विषय वस्तु (Content), माध्यम (Channel) और पूर्णता (Completeness) प्रधानमंत्री मोदी के भाषण में झलकती हैं।

बुधवार, 14 सितंबर 2022

भारतीय भाषाओं के प्रति संघ का दृष्टिकोण


तुर्की जब स्वतंत्र हुआ, तब आधुनिक तुर्की के संस्थापक कमालपाशा ने जिन बातों पर गंभीरता से ध्यान दिया, उनमें से एक भाषा भी थी। कमालपाशा ने विरोध के बाद भी बिना समय गंवाए शिक्षा से विदेशी भाषा को हटा कर तुर्की को अनिवार्य कर दिया। क्योंकि, वह तुर्की के लोगों में राष्ट्रीयता की भावना का विस्तार करना चाहते थे, इसके लिए उन्हें अपनी भाषा की आवश्यकता थी। चूँकि उस समय तुर्की अरबी लिपि में लिखी जाती थी, इसलिए उन्होंने एक घोषणा और की जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे लोग सरकारी नौकरी से वंचित कर दिए जाएंगे, जिन्हें लैटिन लिपि का ज्ञान नहीं होगा। इसी प्रकार दुनिया भर में बिखरे यहूदियों को जब उनकी भूमि प्राप्त हुई, तो उन्होंने भी अपनी भाषा ‘हिब्रू’ को ही अपनाया। सोचिए, भूमिहीन यहूदियों की भाषा कहीं लिखत-पढ़त के व्यवहार में नहीं थी। इसके बाद भी जब यहूदियों ने इजराइल का नवनिर्माण किया तो राख के ढेर में दबी अपनी भाषा हिब्रू को जिंदा किया। आज जिस अंग्रेजी की अनिवार्यता भारत में स्थापित करने का प्रयास किया जाता है, उसके स्वयं के देश ब्रिटेन में वह एक जमाने में फ्रेंच की दासी थी। बाद में ब्रिटेन के लोगों ने आंदोलन कर अपनी भाषा ‘अंग्रेजी’ को उसका स्थान दिलाया। अपनी भाषा में समस्त व्यवहार करने वाले यह देश आज अग्रणी पंक्ति में खड़े हैं। अपनी भाषा में शिक्षा-दीक्षा के कारण ही यहाँ के नागरिक अपने देश की उन्नति में अधिक योगदान दे सके। अपनी भाषा का महत्व दुनिया के लगभग सभी देश समझते हैं। इसलिए उनकी आधिकारिक भाषा उनकी अपनी मातृभाषा है। किंतु, हम अभागे लोग जब स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भी मानसिक दासिता से मुक्ति नहीं पा सके। महात्मा गांधी के आग्रह के बाद भी अंग्रेजी का मोह नहीं छोड़ सके।

रविवार, 4 सितंबर 2022

गुलामी के चिह्न मिटाकर ‘स्व’ की स्थापना

नया भारत विश्व क्षितिज पर अपनी उपस्थिति को मजबूत करने के साथ ही अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है। अपनी जड़ों से जुड़कर ही भारत अनंत आकाश को नाप सकेगा। स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद जब भारतीय नौसेना को अपना प्रथम स्वदेशी विमान वाहक पोत मिला तब नया भारत एक नया इतिहास लिख रहा था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उसे कुछ इस तरह अभिव्यक्ति दी- ‘‘केरल के समुद्री तट पर पूरा भारत एक नए भविष्य के सूर्योदय का साक्षी बन रहा है। आईएनएस विक्रांत पर हो रहा यह आयोजन, विश्व क्षितिज पर भारत के बुलंद होते हौसलों की हुंकार है’’। प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में विश्वास की गूंज है, जो अब दूर-दूर तक सुनाई दे रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को सक्षम बनाने के लिए ‘आत्मनिर्भर भारत’ का जो सपना देखा और दिखाया, अब हम उसकी ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।