रविवार, 9 अगस्त 2026

श्रीगुरुजी के ऐतिहासिक ‘तीन पत्र’

संघ शताब्दी वर्ष : गोलवलकर जी ने अपनी देह छोड़ने के पूर्व संघ की आगे की व्यवस्था और स्वयंसेवकों को संदेश देने के लिए तीन पत्र लिखे थे, जो उनके देवलोकगमन के बाद पढ़े गए

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ पत्र लिखने के अभ्यासी थे। पत्रों के माध्यम से श्रीगुरुजी का कार्यकर्ताओं के प्रति स्नेह, राष्ट्रप्रेम और हिन्दू समाज की एकात्मता के प्रति उनका संकल्प स्पष्ट झलकता है। उनके पत्रों में संघ कार्य के विस्तार, वैचारिक स्पष्टता, अनुशासन और व्यक्तिगत जीवन में मूल्यों को अपनाने पर जोर दिया गया है। कार्यकर्ताओं, सामाजिक एवं राजनीतिक नेतृत्व को लिखे उनके अनेक पत्र चर्चित हैं परंतु उनके ‘तीन पत्र’ अत्यंत महत्व के हैं। संघ को जानने-समझने की रुचि रखनेवाले बंधुओं को श्रीगुरुजी के ये तीनों पत्र अवश्य पढ़ना चाहिए। ये पत्र उन्होंने अपनी देह त्यागने से पूर्व लिखे थे। वर्ष 1972 में श्रीगुरुजी का स्वास्थ्य तेजी से गिरना शुरू हो गया था। परंतु, उसके बाद भी उन्होंने क्षणभर भी स्वयं को संघकार्य से अलग नहीं किया। वर्ष 1973 में जब उन्हें यह आभास होने लगा कि अब भौतिक देह से विश्राम लेने का समय आ गया है, तब उन्होंने अपने देहावसान के बाद संघ कार्य की समुचित व्यवस्था के बारे में विचार प्रारंभ कर दिया। इसी क्रम में ये तीन ऐतिहासिक पत्र लिखे गए। श्रीगुरुजी ने 2 अप्रैल 1973 को अपने हाथ से तीन पत्र लिखे और अखिल भारतीय व्यवस्था प्रमुख पांडुरंग पंत क्षीरसागर को सौंप दिए। उन्होंने क्षीरसागर जी को निर्देश दिए कि ये पत्र मेरे जाने के बाद सार्वजनिक रूप से पढ़े जाएं, जिनमें से दो पत्र बालासाहब देवरस पढ़ें। श्रीगुरुजी की इच्छा के अनुरूप तीनों पत्र सुरक्षित रख दिए गए। 5 जून 1973 को श्रीगुरुजी ने अपनी देह का त्याग किया। अगले दिन यानी 6 जून को इस पुण्य आत्मा के पार्थिव शरीर की अंत्येयात्रा प्रारंभ होने के पूर्व इन पत्रों को पढ़कर सुनाया गया। एक पत्र में उनके उत्तराधिकार की घोषणा की गई। दूसरे पत्र में आग्रह किया कि उनका कोई स्मारक नहीं बनाया जाए। वहीं, तीसरे पत्र में उनके हृदय की उदारता एवं व्यक्तित्व की महानता के दर्शन होते हैं, जिसमें वे विनयभाव से क्षमायाचना करते हैं कि उनके व्यवहार से कभी किसी का हृदय दु:खी हुआ हो, तो क्षमा करें। श्रीगुरुजी के ये तीन पत्र ‘बीज’ थे, जिन्होंने आगे चलकर संघ की कार्यपद्धति एवं संस्कृति को समृद्ध किया। 

चित्र वास्तविक नहीं है, प्रतीकात्मक है। यह एआई से निर्मित चित्र है।

पहला पत्र (नवीन सरसंघचालक की नियुक्ति) : 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने अंतिम विश्राम लेने से पूर्व संघ कार्य को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी श्रीगुरुजी को सौंपी थी। उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए श्रीगुरुजी ने पत्र लिखकर संघ के अगले सरसंघचालक की नियुक्ति की। इस पत्र का वाचन महाराष्ट्र प्रांत के संघचालक बाबाराव भिड़े ने किया। श्रीगुरुजी के प्रति श्रद्धाभाव से भरे हुए स्वयंसेवकों के बीच श्री भिड़े ने भावुक होकर यह पत्र पढ़ा- “मेरे सभी आत्मीय स्वयंसेवक बंधुओं के लिए, गत एक माह से शरीर का शक्ति-क्षय द्रुत-गति से हो रहा है। डॉक्टर बंधु निराश हो गए हैं। सबके मन में एक ही विचार आ रहा प्रतीत होता है कि यह शरीर अब अत्यल्प काल का साथी है। तब अपने संघकार्य की व्यवस्था का एक महत्त्व का प्रश्न सामने आता है। संघकार्य अपने संविधान के अनुसार सुचारू रूप से चलेगा ही। उसी संविधान के अनुसार नूतन सरसंघचालक की योजना करने का वह प्रश्न है। अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल के जिन सदस्यों से मिलकर मैंने इस संबंध में विचार किया, वे सब पुराने, दीर्घ काल के अनुभवी मँजे हुए कार्यकर्ता हैं और भिन्न-भिन्न प्रांतों के संघचालक के रूप में कार्य कर रहे हैं। सबसे बातें होने पर उन सबका सारभूत निर्णय प्रकट करने का मेरा सद्यःकालीन सरसंघचालक के नाते दायित्व है। उस दायित्व को पूरा करते हुए मैं यह निर्णय प्रकट कर रहा हूँ कि मेरे शरीर के शांत होने के पश्चात्, सरसंघचालक की जिम्मेदारी श्री मधुकर दत्तात्रेय उपाख्य बालासाहेब देवरस संभालेंगे, जिन्हें आप सब जानते हैं”। यहाँ उल्लेखनीय है कि बालासाहेब को इस पत्र के पढ़े जाने के बाद ही यह पता चला कि वे अब सरसंघचालक होंगे। बालासाहेब देवरस जी के प्रति सब स्वयंसेवकों के मन में पहले से अपार श्रद्धा थी। श्रीगुरुजी के चयन से सबमें संतोष था। यद्यपि श्रीगुरुजी ने संघ की परंपरा का स्मरण कराते हुए इसी पत्र के आखिरी हिस्से में स्वयंसेवकों से कहा कि “अपने कार्य की स्नेहपूर्ण एकात्मता की पद्धति, व्यक्ति-निरपेक्षता, ध्येयनिष्ठा आदि विशेषताओं को ध्यान में रखकर सब छोटे-बड़े स्वयंसेवक बंधु अपने परम पूज्य सरसंघचालकजी के मार्गदर्शन में संघकार्य की पूर्ति हेतु काया-वाचा-मनसा जुटे रहेंगे और कार्य शीघ्र लक्ष्यपूर्ति कर सकेगा, ऐसा मेरा विश्वास है। सब बंधुओं को सादर नमस्कार। इति शम्”।

नागपुर में रेशिमबाग स्थित स्मृति मंदिर (डॉ. हेडगेवार एवं श्रीगुरुजी का समाधि स्थल)

दूसरा पत्र (स्मारक आवश्यक नहीं) :

दूसरे पत्र के माध्यम से श्रीगुरुजी ने यह सुनिश्चित किया कि संघ में व्यक्तियों के स्मारक बनाए जाने की परंपरा प्रारंभ न हो जाए। संघकार्य व्यक्तिनिष्ठ न होकर तत्व निष्ठ है। आमतौर पर सभी नेतृत्वकर्ताओं के मन में अभिलाषा रहती है कि उनके जाने के पश्चात लोग उनका भव्य स्मारक बनाएं। परंतु, संघ का संस्कार अलग है। श्रीगुरुजी ने अगर यह पत्र नहीं लिखा होता, तब निश्चित ही उनका भव्य स्मारक बनाया जाता। यह भी संभव है कि यह परंपरा भी बन जाती। हालांकि, हमें यह भी याद रखना होगा कि तृतीय सरसंघचालक बालासाहेब देवरस ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाया। इस संबंध में उन्होंने कहा कि “मेरे सहित किसी भी सरसंघचालक जी का अंतिम संस्कार इस स्थान (रेशिमबाग) पर नहीं होगा। इस स्थान को सरसंघचालक जी का दाहगृह या राजघाट जैसा स्वरूप नहीं देना है। उनका अंतिम संस्कार वहीं होगा, जहाँ सामान्य लोगों का होता है”। इसलिए उसके पश्चात बालासाहेब देवरस, चौथे सरसंघचालक राजेन्द्र सिंह उपाख्य रज्जूभैया और पांचवे सरसंघचालक केएस सुदर्शन का अंतिम संस्कार आम श्मशान में हुआ। इसके साथ ही उन्होंने एक और बात कही कि “संघ के किसी भी कार्यक्रम में केवल दो ही फोटो रहेंगे - एक पूजनीय डॉक्टर जी का और दूसरा पूजनीय गुरुजी का”। यहाँ उल्लेखनीय है कि रज्जूभैया ने तो एक कदम और आगे बढ़कर यह सुनिश्चित किया कि “जिस शहर या गाँव में मेरा देहावसान होगा, उसी गाँव में मेरा अंतिम संस्कार होगा”। उनका देह शांत हुआ पुणे में, इसलिए पुणे में ही रज्जूभैया का अंतिम संस्कार हुआ था।  

श्रीगुरुजी का यह दूसरा पत्र नवीन सरसंघचालक बालासाहेब देवरस ने पढ़ा, जिसमें उन्होंने आग्रह किया था कि “अपना कार्य राष्ट्र-पूजक है, ध्येय-पूजक है, व्यक्ति-पूजा को उसमें स्थान नहीं है। मेरा शरीर अल्पकाल का साथी रहा है, ऐसा डॉक्टर बंधुओं का मंतव्य प्रतीत होता है। शरीर नश्वर तो है ही, कभी न कभी जाएगा। उसके जाने पर शेष शव का शृंगार आदि बातें विचित्र लगती हैं। वैसे ही संघ का ध्येय और उस ध्येय का दर्शन करानेवाले संघनिर्माता, इनके अतिरिक्त और किसी व्यक्ति का व्यक्ति इस नाते से महत्त्व बढ़ाना, उसके स्मारक बनाना आवश्यक नहीं है। मैंने तो ब्रह्मकपाल में अपना स्वतः का भी श्राद्ध कर रखा है, जिससे बाद में किसी पर श्राद्धादि का बोझ न रहे। ये अति थोड़े में कहा है। इसका विस्तार से अर्थ सब समझ सकेंगे, यह मेरा पूरा विश्वास है। इति।” नागपुर स्थित रेशिमबाग में डॉ. हेडगेवार का स्मारक बना है, जिसे स्वयं श्रीगुरुजी ने डिजाइन किया था। डॉक्टर साहब की प्रतिमा के समक्ष ही श्रीगुरुजी का अंतिम संस्कार सम्पन्न हुआ। उसके बाद स्वयंसेवकों एवं अधिकारियों ने विचारपूर्वक वहाँ श्रीगुरुजी की समाधि को ‘यज्ञवेदी’ के रूप में स्थापित किया। श्रीगुरुजी की इच्छा का सम्मान करते हुए उसे स्मारक का स्वरूप नहीं दिया गया है। चूँकि श्रीगुरुजी का जीवन आध्यात्मिक एवं संन्यासी सरीखा था, इसलिए उनके समाधि स्थल को यज्ञवेदी का स्वरूप दिया गया है। 

स्मृति मंदिर, रेशिमबाग, नागपुर (आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का स्मारक एवं द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर 'श्रीगुरुजी' का समाधि स्थल) | फोटो : डॉ. लोकेन्द्र सिंह 

तीसरा पत्र (करबद्ध क्षमायाचना) :

तीसरे पत्र का वाचन भी बालासाहेब जी ने किया। इस पत्र में श्रीगुरुजी ने संघकार्य में स्वयंसेवकों से मिले सहयोग के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया और आग्रह किया है कि जिस प्रकार का सहयोग उन्हें मिला, वैसा ही नये सरसंघचालक को मिले। श्रीगुरुजी लिखते हैं- “परम प्रिय आदरणीय स्वयंसेवक बंधुगण! 21 जून 1940 को परमपूजनीय डॉ. हेडगेवारजी का शरीर शांत हो गया और उनकी इच्छा के अनुसार सरसंघचालक पद का गुरुभार मुझ पर आ पड़ा। मैं तो कुछ भी जानता नहीं था। तो भी सब पुराने कार्यकर्ताओं ने बड़े प्रेम से सहकार्य किया, मार्गदर्शन किया और इतने दीर्घकाल तक, लगभग ३३ वर्ष, मैं इस भार को वहन करता आया। अब भगवान की इच्छा दिखती है कि दूसरे योग्य व्यक्ति को यह दायित्व देकर, कार्य अधिक अच्छी प्रकार और अधिक द्रुत गति से पूर्णता की ओर बढ़ावें। और अब वह योजना हो रही है”। जिस कार्य को उन्होंने अपने जीवन में कभी भी जानबूझकर नहीं किया, उसके प्रति क्षमायाचना करके उन्होंने अपने विनम्र स्वभाव का ही परिचय दिया है। पत्र में वे आगे लिखते हैं- “इस दीर्घ काल में मेरे स्वभाव-वैचित्र्य के कारण या अन्यान्य न्यूनताओं के, दोषों के कारण अपने अनेक कार्यकर्ताओं को मानसिक दुःख हुआ होगा। मैं सब से करबद्ध क्षमा-याचना करता हूँ”। अपनी भावनाओं को, अपने स्वभाव के अनुरूप आध्यात्मिक आधार देते हुए पत्र के अंत में उन्होंने श्रीसंत तुकारामजी का वचन उद्धृत किया है, जिसका हिन्दी भावार्थ है- “अरे संतो और पवित्र लोगो, मेरी इस अंतिम प्रार्थना को ईश्वर तक पहुँचा दो। हे ईश्वर, मुझे भूलना मत। मैं और क्या कह सकता हूँ? आप मेरे प्रभु, सर्वज्ञानी हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ। मुझे अपनी गौरवमयी शरण में ले लो”। यह अंतिम संदेश श्रीगुरुजी समाधि पर भी अंकित है।

सोमवार, 3 अगस्त 2026

भगवा रंग से चिढ़ क्यों?

राष्ट्रध्वज तिरंगा में सबसे ऊपर है भगवा, भारतीय संस्कृति का का परिचायक, त्याग, वैराग्य, साहस, बलिदान और सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत है भगवा

खेल मैदान में राष्ट्रीय ध्वज के रंगों का समावेश कोई नई बात नहीं है, लेकिन भारत की राजनीति में जब भी केसरिया या नारंगी रंग की बात आती है, एक खास राजनीतिक वर्ग में असहजता साफ दिखने लगती है। आगामी हॉकी विश्व कप 2026 के लिए भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीमों की नई जर्सी लॉन्च हुई है। पारंपरिक नीले रंग की जगह इस बार नारंगी रंग को प्राथमिक किट के रूप में चुना गया है। हॉकी इंडिया के अध्यक्ष और पूर्व दिग्गज खिलाड़ी दिलीप तिर्की ने स्पष्ट किया कि नीले टर्फ पर नीले रंग की जर्सी के कारण विजिबिलिटी (दृश्यता) की व्यावहारिक समस्या आ रही थी और यह सुझाव सीधे खिलाड़ियों एवं कोचिंग स्टाफ की तरफ से आया था। इसके बावजूद, सुदीर्घ अनुभव रखनेवाले राजनीतिक दल के नेताओं और उनके समर्थकों ने इसे लेकर एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा करने का प्रयास किया है। हिन्दू पहचान से चिढ़ने वाले नेताओं का यह बयान आया है कि “देश की पहचान अहिंसा, सत्य और भाईचारे से जुड़ी है और इन्हें बदला नहीं जा सकता”। यह बयान इस बात का प्रमाण है कि कैसे एक विशुद्ध रूप से तकनीकी और खेल संबंधी फैसले को जबरन वैचारिक संघर्ष में घसीटा जा रहा है।

रविवार, 2 अगस्त 2026

गुरु के रूप में मार्गदर्शन करता है ‘भगवा ध्वज’

संघ शताब्दी वर्ष : गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर स्वयंसेवक ‘भगवा ध्वज’ के समक्ष गुरु दक्षिणा समर्पित करते हैं और संघकार्य के प्रति अपना समर्पण बढ़ाने का संकल्प लेते हैं

एआई से निर्मित प्रतीकात्मक चित्र

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भगवा ध्वज को जो स्थान दिया गया है, वह इस संगठन की विशिष्टता को दर्शाता है। संघ के लिए भगवा केवल ध्वज मात्र नहीं है, अपितु यह उसके प्रेरणा और मार्गदर्शन का केंद्र बिन्दु है। संघ में भगवा ध्वज को ‘गुरु’ के स्थान पर प्रतिष्ठित किया गया है। सामान्यतौर पर यही देखने में आता है कि किसी सांस्कृतिक/धार्मिक संगठन का संस्थापक ही उस संगठन के अनुसरणकर्ताओं के लिए गुरु के रूप में सम्मानित होता है। परंतु संघ इस सामान्य परंपरा से अलग लकीर खींचता दिखायी देता है। जिस प्रकार किसी संस्था से सम्बद्ध लोग गुरु के मार्गदर्शन के अनुसार व्यक्तिगत एवं सामाजिक क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक भगवा ध्वज से प्रेरणा प्राप्त कर सामाजिक क्षेत्र में कार्य करते हैं। संघ में गुरु के रूप में भगवा ध्वज को मान्यता दिए जाने का प्रसंग बहुत प्रेरक है। यह एक प्रसंग ही संघ के ध्येय, उसकी कार्यपद्धति और महानता को बताने के लिए पर्याप्त है।

शनिवार, 1 अगस्त 2026

शोर-शराबे में गुम हुआ छात्रों का हित, विपक्ष के निशाने पर रही हिन्दू मान्यताएं

लोकसभा और राज्यसभा में हंगामेदार चर्चा के बीच आखिरकार परीक्षा सुधार का विधेयक ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ पारित हो गया। देश के करोड़ों युवाओं और छात्रों के भविष्य को देखते हुए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दा था। उम्मीद यह थी कि जब प्रश्न पत्र लीक जैसे गंभीर विषय पर संसद में बहस होगी, तो देश को एक ठोस और सर्वसम्मति वाला समाधान देखने को मिलेगा। लेकिन संसद के दोनों सदनों में जो दृश्य देखने को मिला, वह बेहद निराशाजनक रहा। जो विपक्ष कल तक पर्चा लीक के मुद्दे को लेकर सड़कों से लेकर संसद तक हो-हल्ला मचा रहा था, जब विधेयक पर रचनात्मक चर्चा और सुझाव देने का सही समय आया, तब वह पूरी तरह दिशाहीन नजर आया। बहस का रुख परीक्षा प्रणाली के तकनीकी एवं प्रशासनिक सुधारों पर केंद्रित रहने के बजाय ऐसे विषयों की ओर मोड़ दिया गया, जिनका आम छात्रों की समस्याओं और उनके भविष्य से कोई दूर-दूर तक का लेना-देना नहीं था। विशेष रूप से मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के पास यह एक बड़ा अवसर था कि वह परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी और लीक-मुक्त बनाने के लिए अपने ठोस और व्यावहारिक सुझाव पटल पर रखती। इससे देश की जनता और युवाओं के बीच यह संदेश जाता कि विपक्ष के पास महज विरोध करने के बजाय समस्याओं का समाधान करने का एक स्पष्ट एजेंडा भी है। परंतु इस रचनात्मक भूमिका को निभाने के स्थान पर बहस को धार्मिक प्रतीकों, गोमूत्र और मनुस्मृति जैसे विषयों पर लाकर खड़ा कर दिया गया।

सावधान! अब ई20 पर भड़काने की तैयारी

नीट परीक्षा में गड़बड़ी को लेकर हुए कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन की गर्मी अभी शांत भी नहीं हुई है कि आंदोलनजीवियों ने जनता को भ्रमित करने एवं भड़काने के लिए दूसरा विषय खोजना शुरू कर दिया है। पिछले कुछ महीनों से एथनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर एक नकारात्मक नैरेटिव खड़ा करने का प्रयास किया गया है। परिणामस्वरूप, एथनॉल मिश्रित पेट्रोल की नीति को लेकर उठ रही आपत्तियों और राजनीतिक बयानों ने एक बार फिर ऊर्जा संक्रमण की इस प्रक्रिया को व्यापक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। एक तरफ जहां सरकार इसे पर्यावरण संरक्षण, विदेशी मुद्रा की बचत और किसानों की आय बढ़ाने वाले दूरगामी कदम के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों, ट्रांसपोर्ट यूनियनों और आम वाहन चालकों के विरोध प्रदर्शनों ने नीति के व्यावहारिक क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

सोमवार, 27 जुलाई 2026

“यदि अस्पृश्यता (छुआछूत) गलत नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है” – बालासाहब देवरस

संघ शताब्दी वर्ष : हिन्दू एकता एवं समरसता पर बालासाहब के क्रांतिकारी विचार


हिन्दू समाज की एकता और सामाजिक समरसता पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस के विचार अत्यंत स्पष्ट, प्रखर और क्रांतिकारी थे। ‘वसंत व्याख्यानमाला’ का उनका भाषण विश्व के ऐतिहासिक एवं महान भाषणों में शामिल किया जा सकता है। 8 मई, 1974 में पुणे में हुए अपने इस भाषण में छुआछूत (अस्पृश्यता) को लेकर बालासाहब ने जो कहा, वैसा खरा-खरा शायद ही किसी ने बोला हो। अब्राहम लिंकन के प्रसिद्ध विचार- “अगर गुलामी अनैतिक या गलत नहीं है, तो फिर कुछ भी गलत नहीं है”- का उल्लेख करते हुए बालासाहब ने कहा- “अगर छुआछूत गलत नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है”। जातिगत भेदभाव के निर्मूलन के लिए काम करने वाले महानुभाव अक्सर इस ओर या उस ओर खड़े दिखाई देते हैं। उनके विचारों में राजनीति, परस्पर द्वेष और कटुता रहती है। लेकिन बालासाहब के विचारों में स्पष्टता के साथ-साथ आत्मीयता और बंधुता की झलक दिखाई देती है। सामाजिक समरसता पर उनके विचार समाधानमूलक और व्यावहारिक हैं। बालासाहब जी का मानना था कि “विषमता नष्ट करने के प्रयासों में सभी का सहभाग अपेक्षित है। संयम के साथ उत्तम व्यवहार के द्वारा यह प्रयास होंगे तभी उसमें सफलता मिलेगी”।

बुधवार, 22 जुलाई 2026

आंदोलन को बदनाम करते हिंसक प्रदर्शन

अराजक तत्वों ने हड़प लिए छात्रों के जरूरी मुद्दे, उनके मंच पर कब्जाकर अपना नैरेटिव चलाने का किया प्रयास


देश में प्रमुख परीक्षाओं की पारदर्शिता और लाखों युवाओं का भविष्य अत्यंत संवेदनशील विषय हैं। परीक्षाओं के आयोजन में लगातार हो रही गड़बड़ियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार को इस पर कोई ठोस रणनीति बनानी ही चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि नीट परीक्षा को लेकर उठी चिंताएं पूरी तरह उचित हैं। एक अभिभावक की भाँति उन्होंने युवाओं को आश्वस्त किया है कि उनके भविष्य से खिलवाड़ करने वाले किसी भी दोषी को छोड़ा नहीं जाएगा और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत कठोर कार्रवाई की जाएगी। उल्लेखनीय है कि सरकार ने नीट परीक्षा में हुई गड़बड़ी पर संज्ञान लेकर उसका फिर से व्यवस्थित आयोजन कराया है। इसके बावजूद, इस संवेदनशील मुद्दे की आड़ में जिस तरह दिल्ली की सड़कों पर हिंसा, उपद्रव और ‘चलो संसद’ के नाम पर अराजकता फैलाई गई, वह देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े करती है।