शनिवार, 9 जनवरी 2021

लक्ष्य : हार और जीत ही काफी नहीं जिंदगी में...

यूट्यूब चैनल 'अपना वीडियो पार्क' पर देखें 


हार और जीत ही काफी नहीं
जिंदगी में मेरे लिए
मीलों दूर जाना है अभी मुझे।
निराशा के साथ बंधी
आशा की इक डोर थामे
उन्नत शिखर की चोटी पर चढ़ जाना है मुझे।
हार और जीत ही....


है अंधेरा घना लेकिन
इक दिया तो जलता है रोशनी के लिए
उसी रोशनी का सहारा लिए
भेदकर घोर तमस का सीना
उस दिये का हाथ बंटाना है मुझे।
हार और जीत ही...


चांद पर पहुंच पाऊंगा या नहीं
ये सोच अभी नहीं रुकना है मुझे
चलता रहा विजय की उम्मीद लिए
तो चांद पर न सही
तारों के बीच टिमटिमाना है मुझे।
हार और जीत ही...

- लोकेन्द्र सिंह -

(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से) 

बुधवार, 30 दिसंबर 2020

आओ, आत्मनिर्भरता का संकल्प लें

स्वदेशी का विरोध करने वाले असल में भारत विरोधी


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में ‘आत्मनिर्भर भारत का संकल्प’ लेने का बहुत महत्वपूर्ण आह्वान किया है। कोविड-19 ने हमें बहुत नुकसान पहुँचाया है, तो कई महत्वपूर्ण सबक भी दिए हैं, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण है- आत्मनिर्भरता का सबक। देश में जब लॉकडाउन था, तब प्रधानमंत्री मोदी ने देश को ‘लोकल फॉर वोकल’ का नारा दिया था, जिसका असर पिछले कुछ महीनों में देखा गया है। भारत के नागरिकों में स्वदेशी के प्रति भावना प्रबल हुई है। इस वर्ष बड़े त्यौहारों पर भी लोगों ने बाहरी कंपनियों की जगह स्थानीय उत्पाद खरीदने में रुचि दिखाई। यही कारण है कि हमारी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। लॉकडाउन में काम-धंधा बंद होने से स्थानीय व्यावसायी और कामगारों के मन में उपजी निराशा ‘लोकल फॉर वोकल’ के कारण दूर हो रही है। यदि हम ही अपने उत्पादों को प्रोत्साहित नहीं करेंगे, तब देश आर्थिक तौर पर कैसे सशक्त होगा?

आश्चर्य होता है कि कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों को स्वदेशी को बढ़ावा देने से चिढ़ क्यों होती है? वे विदेशी कंपनियों के पक्षधर और स्वदेशी कंपनियों के विरोधी नजर आते हैं। स्वदेशी कंपनियों के विरुद्ध नकारात्मक वातावरण बनाने में बुद्धिजीवियों का एक वर्ग सदैव अग्रणी रहता है। उनके इस विमर्श को समझने की आवश्यकता है। यह मानसिक गुलामी की स्थिति है या फिर विदेशी फंडिंग का प्रभाव? दोनों ही स्थितियां त्याज्य हैं। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के निर्माताओं और उद्योग जगत से आग्रह किया है कि “देश के लोगों ने मजबूत कदम आगे बढ़ाया है, वोकल फॉर लोकल आज घर-घर में गूंज रहा है। ऐसे में अब यह सुनिश्चित करने का समय है कि हमारे उत्पाद विश्वस्तरीय हों। जो भी वैश्विक स्तर पर श्रेष्ठ है, उसे हम भारत में बनाकर दिखाएं। इसके लिए हमारे उद्यामी साथियों को आगे आना है। स्टार्टअप को भी आगे आना है”। प्रधानमंत्री मोदी के इस आह्वान में देश को आर्थिक शक्ति बनाने का बड़ा संकल्प शामिल है। आत्मनिर्भर भारत के शुभ संकल्प की पूर्ति में भारत के आम नागरिकों एवं सज्जनशक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका रहने वाली है। स्वदेशी के विरुद्ध चलने वाले सभी प्रकार के नकारात्मक विमर्शों को निष्प्रभावी करके ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में आगे बढऩा होगा। अपने स्थानीय एवं स्वदेशी उद्यमियों को प्रोत्साहित करना होगा। 

एक जनवरी पर नये कैलेंडर वर्ष के लिए संकल्प लेने का चलन बन गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने एक सकारात्मक विचार हमारे सामने रखा है कि क्या हम नये वर्ष में भारत में बने उत्पादों का उपयोग करने का संकल्प ले सकते हैं? उन्होंने कहा- “मैं देशवासियों से आग्रह करूंगा कि दिनभर इस्तेमाल होने वाली चीजों की आप एक सूची बनाएं। उन सभी चीजों की विवेचना करें और यह देखें कि अनजाने में कौन-सी विदेश में बनी चीजों ने हमारे जीवन में प्रवेश कर लिया है तथा एक प्रकार से हमें बंदी बना दिया है। भारत में बने इनके विकल्पों का पता करें और यह भी तय करें कि आगे से भारत में बने, भारत के लोगों के पसीने से बने उत्पादों का हम इस्तेमाल करें”।

   

         स्वदेशी जागरण मंच का नारा है- ‘चाहत से देसी, जरूरत से स्वदेशी और मजबूरी में विदेशी’। स्वदेशी के इस सूत्र को ध्यान में रखकर हमें एक सूची बनानी चाहिए कि इस वर्ष हम किन स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करेंगे? यह भी सूची बना सकते हैं कि किन वस्तुओं को भारत में बनाए जाने की अपेक्षा आप भारत के निर्माताओं, उद्योग जगत और स्टार्टअप से करते हैं। इससे भारत का उद्योग जगत आपकी अपेक्षाओं से भी अवगत हो सकेगा। यदि हम सही में भारत को सशक्त करना चाहते हैं, तब हमें स्वदेशी के विचार को न केवल मजबूत बनाना होगा, बल्कि अपनी जीवन में भी उतारना होगा।

मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

ये चाय बहुत खास है

भारत में कुछ बुद्धिजीवियों ने गाय को विवाद विषय बना दिया है, जबकि गाय तो प्रेम और वात्सल्य की मूर्ति है। यह तो दिलों का मेल कराती है। 

गाँव में अपरिचित परिवार में सुबह-सुबह यह चाय गाय माता ने ही नसीब कराई है। 

हुआ यह कि हम पांच लोग इंदौर से ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए निकले।

एक गाँव से गुजर रहे थे तो सड़क किनारे एक घर देखा, वहां चार-पांच गाय थी। सुबह का समय था तो गांव के शुद्ध वातावरण में गाय के शुद्ध दूध की चाय पीने का मन हुआ। हमने गाड़ी रोकी। हमारे साथ अभियंता श्री संजय चौधरी थे, उन्होंने गाड़ी से उतर कर सूर्य देवता को नमन किया। इसी क्रम में अपन राम ने गाड़ी में बैठे-बैठे गाय माता को प्रणाम किया। 

संजय जी ने आंगन में पहुंच कर आवाज दी। घर से एक पुरुष बाहर निकल कर आया। संजय जी ने उसको निवेदन किया कि "भाई साहब, यदि गाय के दूध की चाय मिल जाये तो दिन बन जायेगा"। उन सज्जन ने कहा कि हम चाय बनाने का काम नहीं करते हैं। हालांकि, सड़क किनारे घर होने से कई बार लोग पूछते हैं। हम सबको मना कर देते हैं। लेकिन, आपको अवश्य पिलायेंगे"। यह कहते हुए उस सज्जन के चेहरे पर आत्मीयता और आतिथ्य का भाव स्पष्ट दिख रहा था। 

हम उनकी यह बात सुनकर हैरान हुए कि ये किसी चाय नहीं बनाते, लेकिन हमारे लिए बना रहे हैं। ऐसा क्यों है? 

हम सबकी चाय पीने की इच्छा पूरी हो रही थी। ऐसे में यह प्रश्न बेमानी था कि वे हमारे लिए चाय बनवाने के लिए तैयार क्यों हुए? परंतु मैं अपनी इस जिज्ञासा को अधिक देर तक दबा नहीं सका। 

मैंने उत्सुकता दिखाते हुए पूछ ही लिया कि "आपकी इस कृपा का कारण क्या है"?

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा- "यह मेरी कृपा नहीं, बल्कि गाय माता की कृपा है। मैंने आपको गाय को प्रणाम करते हुए देख लिया था। मन में विचार आया कि ये भले लोग हैं जो गाय के प्रति श्रद्धा रखते हैं। अन्यथा, आजकल तो लोग गाय का मांस खाने की होड़ लगाते हैं। जब मैंने अपनी पत्नी को कहा कि दो गाड़ियां हमारे घर बाहर आकर खड़ी हुई हैं। उसमें बैठे लोगों ने हमारी गायों के सामने झुककर हाथ जोड़े हैं। उसे भी अच्छा लगा"। 

हमारी बातचीत चल ही रही थी कि उस किसान की पत्नी और घर की मालकिन बाहर ट्रे में चाय के कप लेकर निकलीं। कप से उठ रही वाष्प के साथ अदरक और इलायची की सुगंध भी बता रही थी कि यह चाय बहुत विशेष है। 

हम सबने उस गोसेवी किसान परिवार के आंगन में बैठकर चाय की चुस्कियां लीं। बाद में, जब हम जाने लगे तो संजय जी ने उन सज्जन को सौ रुपये देना चाहा लेकिन उन्होंने मना कर दिया। संजय जी ने घर की मालकिन को अपनी बहन मानते हुए उसको पैसे देने का प्रयास किया तो उसने भी कह दिया- "भला कोई बहन चाय के बदले अपने भाइयों से पैसे लेगी"। 

हम सबके लिए वह क्षण एक आत्मीय और मन को आनंदित करने वाला बन गया। यकीनन, भारत गांव में बसता है। गांव और गाय, हमारे जीवन के अभिन्न अंग हैं। 

गो-माता की जय... 

रविवार, 13 दिसंबर 2020

‘आरएसएस 360’: संघ की पूर्ण प्रतिमा

इस वीडियो ब्लॉग में देखें 'आरएसएस 360' की जानकारी


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस, 2025 में अपनी यात्रा के 100 वर्ष पूरे कर लेगा। यह किसी भी संगठन के लिए महत्वपूर्ण बात होती है कि इतने लंबे कार्यकाल में उसका निरंतर विस्तार होता रहे। अपने 100 वर्ष की यात्रा में संघ ने समाज का विश्वास जीता है। यही कारण है कि जब मीडिया में आरएसएस को लेकर भ्रामक जानकारी आती है, तब सामान्य व्यक्ति चकित हो उठता है, क्योंकि उसके जीवन में आरएसएस सकारात्मक रूप में उपस्थित रहता है, जबकि आरएसएस विरोधी ताकतों द्वारा मीडिया में उसकी नकारात्मक छवि प्रस्तुत की जाती है। संघ ने लंबे समय तक इस प्रकार के दुष्प्रचार का खण्डन नहीं किया। अब भी बहुत आवश्यकता होने पर ही संघ अपना पक्ष रखता है। दरअसल, इसके पीछे संघ का विचार रहा है कि- ‘कथनी नहीं, व्यवहार से स्वयं को समाज के समक्ष प्रस्तुत करो’। 1925 के विजयदशमी पर्व से अब तक संघ के स्वयंसेवकों ने यही किया। परिणामस्वरूप, सुनियोजित विरोध, कुप्रचार और षड्यंत्रों के बाद भी संघ अपने ध्येय पथ पर बढ़ता रहा। इसी संदर्भ में यह भी देखना होगा कि जब भी संघ को जानने या समझने का प्रश्न आता है, तब वरिष्ठ प्रचारक यही कहते हैं- ‘संघ को समझना है तो शाखा में आना होगा’। अर्थात् शाखा आए बिना संघ को नहीं समझा जा सकता। यह सत्य है कि किसी पुस्तक को पढ़ कर संघ की वास्तविक प्रतिमा से परिचित नहीं हुआ जा सकता। किंतु, संघ को नजदीक से देखने वाले लेखक जब कुछ लिखते हैं, तब उनकी पुस्तकें संघ के संबंध में प्राथमिक और सैद्धांतिक परिचय करा ही देती हैं। इस क्रम में सुप्रसिद्ध लेखक रतन शारदा की पुस्तक ‘आरएसएस 360’ हमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के और नजदीक ले जाती है। यह पुस्तक संघ पर उपलब्ध अन्य पुस्तकों से भिन्न है। दरअसल, पुस्तक में संघ के किसी एक पक्ष को रेखांकित नहीं किया गया है और न ही एक प्रकार के दृष्टिकोण से संघ को देखा गया है। पुस्तक में संघ के विराट स्वरूप को दिखाने का प्रयास लेखक ने किया है। 

लेखक रतन शारदा (Ratan Sharda)

लेखक रतन शारदा ने संघ की अविरल यात्रा का निकट से अनुभव किया है। उन्होंने संघ में लगभग 50 वर्ष विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया है। इसलिए उनकी पुस्तक में संघ की यात्रा के लगभग सभी पड़ाव शामिल हो पाए हैं। चूँकि संघ का स्वरूप इतना विराट है कि उसको एक पुस्तक में प्रस्तुत कर देना संभव नहीं है। इसके बाद भी यह कठिन कार्य करने का प्रयास किया गया है। यह पुस्तक भ्रम के उन जालों को भी हटाने का महत्वपूर्ण कार्य करती है, जो हिटलर के प्रचार मंत्री गोएबल्स की संतानों ने फैलाए हैं। आज बहुत से लोग संघ के संबंध में प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं। ऐसे जिज्ञासु लोगों के लिए यह पुस्तक बहुत महत्वपूर्ण है। स्वयं लेखक ने लिखा है कि “इस पुस्तक का जन्म मेरी उस इच्छा से हुआ था कि जो लोग संघ से नहीं जुड़े हैं या जिनको जानकारी नहीं है, उन्हें आरएसएस के बारे में बताना चाहिए”। पुस्तक पढ़ने के बाद संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से लेकर प्रबुद्ध वर्ग की प्रतिक्रियाएं भी इस बात की पुष्टी करती हैं कि पुस्तक अपने उद्देश्य की पूर्ति करती है। सुप्रसिद्ध लेखिका मधु पूर्णिमा किश्वर ने पुस्तक की प्रस्तावना लिखी है। उन्होंने भी उन ताकतों की ओर इशारा किया है, जो संघ के विरुद्ध तो दुष्प्रचार करती ही हैं, संघ की प्रशंसा करने वाले लोगों के प्रति भी घोर असहिष्णुता प्रकट करती हैं।

पुस्तक की सामग्री को तीन मुख्य भागों में बाँटा गया है। भाग-1 को ‘आत्मा’ शीर्षक दिया गया है, जो सर्वथा उपयुक्त है। लेखक ने इस भाग में संघ के संविधान का सारांश प्रस्तुत किया है और संघ की आवश्यकता को रेखांकित किया है। इसी अध्याय में उस पृष्ठभूमि का उल्लेख आता है, जिसमें डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ की स्थापना की और संघ की स्थापना के उद्देश्य को स्पष्ट किया। संघ का उद्देश्य क्या है? अकसर इस बात को लेकर कुछेक लोगों द्वारा खूब अपप्रचार किया जाता है। संघ का उद्देश्य उसकी प्रार्थना में प्रकट होता है, जिसे संघ स्थान पर प्रतिदिन स्वयंसेवक उच्चारित करते हैं। उस प्रार्थना के भाव को भी इस अध्याय में समझाने का प्रयत्न किया गया है। भाग-2 ‘स्वरूप’ शीर्षक से है, जिसमें संघ के विराट स्वरूप को सरलता से प्रस्तुत किया गया है। शाखा का महत्व, आरएसएस की संगठनात्मक संरचना और प्रचारक पद्धति पर लेखक ने विस्तार से लिखा है। यह अध्याय हमें संघ की बुनियादी संरचना और जानकारी देता है। ‘अभिव्यक्ति’ शीर्षक से भाग-3 में आरएसएस के अनुषांगिक संगठनों की जानकारी है, जिससे हमें पता चलता है कि वर्तमान परिदृश्य में संघ के स्वयंसेवक कितने क्षेत्रों में निष्ठा, समर्पण और प्रामाणिकता से कार्य कर रहे हैं। ‘राष्ट्र, समाज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ में लेखक रतन शारदा ने संघ के उन कार्यों का उल्लेख किया है, जिनको अपना कर्तव्य मान कर संकोचवश संघ बार-बार बताता नहीं है। 1947 में विभाजन की त्रासदी में लोगों का जीवन बचाने का उपक्रम हो, या फिर 1948 और 1962 के युद्ध में सुरक्षा बलों का सहयोग, संघ के स्वयंसेवक सदैव तत्पर रहे। देश में आई बड़ी आपदाओं में भी संघ ने आगे बढ़ कर राहत कार्य किए हैं। कोरोना महामारी का यह दौर हमारे सामने है ही, जब सबने देखा कि कैसे संघ ने बड़े पैमाने पर सेवा और राहत कार्यों का संचालन किया। बहरहाल, सामाजिक समरसता और सेवा के क्षेत्र में किए गए कार्यों का प्रामाणिक विवरण ‘आरएसएस 360’ में हमें मिलता है। इसके अतिरिक्त ‘आपातकाल में लोकतंत्र के लिए संघ की लड़ाई’ और ‘संघ कार्य में मील के पत्थर’ जैसे महत्वपूर्ण विवरण के साथ पुस्तक का आरंभ होता है और अंत में पाँच अत्यंत महत्वपूर्ण परिशिष्ट शामिल किए गए हैं। इनमें संघ के अब तक के सरसंघचालकों की संक्षिप्त जानकारी, 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में संघ की भूमिका, 1948 में संघ पर प्रतिबंध की पृष्ठभूमि, प्रतिबंध के विरुद्ध सत्याग्रह के साथ ही संघ, पटेल और नेहरू के पत्राचार को शामिल किया गया है। 

निस्संदेह लेखक रतन शारदा की पुस्तक ‘आरएसएस 360’ पाठकों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंध में न केवल आधारभूत जानकारी देती है बल्कि उसके दर्शन, उसकी कार्यपद्धति और उसके उद्देश्य का समीप से परिचय कराती है। आरएसएस के संघर्षपूर्ण इतिहास के पृष्ठ भी हमारे सामने खोलती है। समाज, देश और लोकतंत्र को मजबूत बनाने में संघ के कार्यों का विवरण भी देती है। पूर्व में यह पुस्तक अंग्रेजी में ‘सीक्रेट्स ऑफ आरएसएस डिमिस्टिफायिंग-संघ’ शीर्षक से आई थी, जिसे बहुत स्वागत हुआ। हिन्दी जगत में ऐसी पुस्तक की आवश्यकता थी, इसलिए यहाँ भी यह भरपूर सराही जाएगी। पुस्तक का प्रकाशन ब्लूम्सबरी भारत ने किया है। पुस्तक में लगभग 350 पृष्ठ हैं और इसका मूल्य 599 रुपये है।

स्वदेश में प्रकाशित 

बुधवार, 25 नवंबर 2020

'स्व' की ओर बढ़ते भारत को 'पाथेय'



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ रहा है। अपनी स्थापना के प्रारंभ से ही विजयादशमी पर सरसंघचालक के उद्बोधन की परंपरा है। वैसे तो विजयादशमी का उद्बोधन स्वयंसेवकों के लिए पाथेय होता है परंतु यह संघ के दृष्टिकोण को भी प्रकट करता है और भविष्य की राह की ओर इंगित करता है। इसलिए संघ के स्वयंसेवकों का ही नहीं अपितु देश के प्रबुद्ध वर्ग का ध्यान भी सरसंघचालक के विजयादशमी के उद्बोधन पर रहता है। 25 अक्टूबर को वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने जो उद्बोधन दिया, वह बहुत महत्वपूर्ण है। भारत अपने 'स्व' की ओर बढ़ रहा है, इस बात की आश्वस्ति उनके संबोधन में थी और भविष्य की चुनौतियां की ओर संकेत और उनसे निपटने की तैयारियों का आग्रह भी। इसलिए उनके इस उद्बोधन की देशव्यापी चर्चा होनी चाहिए। भारत हितचिंतकों के वर्ग में विमर्श होने चाहिए। शासन स्तर पर भी उनकी विचारों के अनुपालन में नीतियां बनाई जा सकती हैं। भारत के संदर्भ में 2020 महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक वर्ष है। ऐसा वर्ष, जिसे ऐतिहासिक घटनाओं, उपलब्धियों और सामर्थ्य के लिए याद किया जाएगा। किंतु, कोरोना संक्रमण के कारण गौरव की अनुभूति कराने वाले अवसरों की चर्चा अधिक नहीं होने दी। सरसंघचालक ने उचित ही ध्यान दिलाया कि पिछली विजयादशमी से अब तक बहुत महत्व की बातें देश में हुई हैं। भारत के स्वाभिमान के प्रतीक श्रीराम मंदिर पर निर्णय, श्रीरामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण हेतु भूमिपूजन, पड़ोसी देशों में धार्मिक आधार पर उत्पीडऩ झेल रहे हिन्दुओं को भारत की नागरिकता एवं स्वाभिमान से जीने का अधिकार देने वाले कानून का निर्माण, यह सब इसी बीच में हुआ। शैव दर्शन की भूमि पर अलगाव का कारण और विकास में अवरोध बने अस्थायी अनुच्छेद-370 को निष्प्रभावी करने वाला निर्णय हालांकि कुछ पहले ही हो चुका था, लेकिन इस बीच ऐतिहासिक निर्णय का असर भी दिखा। 

अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर बनाने के लिए भारत के लोग उसी दिन से संघर्ष कर रहे थे जब एक आक्रांता ने हमारे गौरव को पददलित करने की मानसिकता से श्रीराम मंदिर को ध्वस्त किया और तथाकथित मस्जिद का ढांचा खड़ा कर दिया। भारतीय समाज कितना सहिष्णु है, यह आंदोलन इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है। ऐसा कोई विरला ही समाज/देश होगा, जिसने अपने ही मानबिंदु को प्राप्त करने के लिए धैर्यपूर्वक संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया। वर्षों की प्रतीक्षा पूर्ण होने के ऐतिहासिक अवसर पर किसी प्रकार की उत्तेजना को प्रकट न करते हुए संयमित व्यवहार प्रदर्शित किया। भूमिपूजन के दिन 'भारत का नियति से भेंट का अवसर' का स्वागत भी शांत, सौम्य, सात्विक, पवित्र और स्नेहिल वातावरण में किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जब इस ऐतिहासिक अवसर का वर्णन कर रहे थे, तब भारत के मूल स्वभाव का बखूबी चित्रण जनमानस में पहुंचा। 

हम सबने देखा कि कोरोना संक्रमण के कारण देश-दुनिया में सबकुछ ठप हो गया। एक निराशा का वातावरण बनने लगा, मानो अब सब समाप्त हो जाएगा। भारत में तो अपने ही समाज के एक बड़े वर्ग के सामने जीवनयापन और दो वक्त की रोटी का संकट उपस्थित हो गया। तब दुनिया ने 'भाव' को अनुभूत किया। 'खुद दर्द में होते हुए दूसरों के जख्मों को सिलते हुए' भारत को दुनिया ने बहुत करीब से देखा। सरसंघचालक जी ने इस ओर भी सबका ध्यान आकर्षित किया। यह अनुकरणीय बात है और संघ के विराट लक्ष्य को प्रकट करता है कि देश में सबसे अधिक सेवा और राहत कार्यों का संचालन करने वाले संगठन के मुखिया ने इसका श्रेय स्वयं के संगठन को न देकर, सेवाभावी भारतीय समाज को दिया। इस संदर्भ में उनका वह उद्बोधन भी सबको स्मरण में रखना चाहिए, जो घरवास (लॉकडाउन) के समय में उन्होंने दिया था। तब उन्होंने संघ के सेवाकार्यों की स्पष्ट संकल्पना प्रस्तुत की थी। संघ के स्वयंसेवकों के लिए सेवाकार्य कोई उपकार या यश प्राप्त करने का प्रयोजन नहीं है, बल्कि उनके लिए तो सेवा 'करणीय कार्य' हैं। सरसंघचालक डॉ. भागवत ने कोरोनयोद्धाओं के सेवाभाव, कर्तव्य परायणता और समर्पण की स्तुति करते हुए कहा कि "प्रशासन के कर्मचारी, विभिन्न उपचार पद्धतियों के चिकित्सक तथा सुरक्षा और सफाई सहित सभी काम करने वाले कर्मचारी उच्चतम कर्तव्यबोध के साथ रुग्णों की सेवा में जुटे रहे। स्वयं को कोरोना वायरस की बाधा होने की जोखिम उठाकर उन्होंने दिन-रात अपने घर परिवार से दूर रहकर युद्ध स्तर पर सेवा का काम किया। नागरिकों ने भी अपने समाज बंधुओं की सेवा के लिए स्वयंस्फूर्ति के साथ जो भी समय की आवश्यकता थी, उसको पूरा करने में प्रयासों की कमी नहीं होने दी। समाज की मातृशक्ति भी स्वप्रेरणा से सक्रिय हुई। महामारी के कारण पीडि़त होकर जो लोग विस्थापित हो गए, जिनको घर में वेतन और रोजगार बंद होने से विपन्नता का और भूख का सामना करना पड़ा, वह भी प्रत्यक्ष उस संकट को झेलते हुए अपने धैर्य और सहनशीलता को बनाकर रखते रहे। अपनी पीड़ा व कठिनाई को किनारे करते हुए दूसरों की सेवा में वे लग गए, ऐसे कई प्रसंग अनुभव में आए। विस्थापितों को घर पहुंचाना, यात्रा पथ पर उनके भोजन विश्राम आदि की व्यवस्था करना, पीडि़त विपन्न लोगों के घर पर भोजन आदि सामग्री पहुँचाना, इन आवश्यक कार्यों में सम्पूर्ण समाज ने महान प्रयास किए। एकजुटता एवं संवेदनशीलता का परिचय देते हुए जितना बड़ा संकट था, उससे अधिक बड़ा सहायता का उद्यम खड़ा किया।" सरसंघचालक ने इस ओर भी सबका ध्यान आकर्षित किया कि भौतिकवाद की अंधी दौड़ में व्यस्त इस दुनिया को कोरोना महामारी ने भारतीय संस्कृति की सर्वोच्चता और उसकी आवश्यकता से परिचित कराया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति के जीवन में स्वच्छता, स्वास्थ्य तथा रोगप्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने वाली अपनी कुछ परंपरागत आदतें एवं आयुर्वेद जैसे शास्त्र भी इस समय उपयुक्त सिद्ध हुए। अब तो यह चिकित्सकीय प्रक्रिया से भी सिद्ध हुआ कि कोरोना मरीजों को सबसे अधिक लाभ आयुर्वेद से हुआ है। 

संघ सिर्फ तात्कालिक परिस्थिति में सक्रिय नहीं होता है, बल्कि उससे सीखकर आगे की योजना-रचना भी करता है। निसंदेह कोरोना के कारण बहुत नुकसान हुआ है। भारत अब उससे उबरता दिख भी रहा है। स्थितियों को सामान्य बनाने के लिए अब सबके सहयोग की आवश्यकता है। इसलिए उन्होंने आह्वान किया है कि "इस परिस्थिति से उबरने के लिए अब दूसरे प्रकार की सेवाओं की आवश्यकता है। विद्यालयों का प्रारम्भ, शिक्षकों के वेतन तथा बच्चों की शिक्षा के लिए कुछ सेवा सहायता करनी पड़ेगी। विस्थापन के कारण रोजगार चला गया, नए क्षेत्र में रोजगार पाना है। अत: रोजगार का प्रशिक्षण व रोजगार का सृजन करना पड़ेगा। इस सारी परिस्थिति के चलते घरों में एवं समाज में तनाव बढऩे की परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में अपराध, अवसाद, आत्महत्या आदि कुप्रवृत्तियां ना बढ़ें, इसलिए समुपदेशन की व्यापक आवश्यकता है।" सरसंघचालक के उद्बोधन के इस हिस्से में वे वृहद समाज के सचेत अभिभावक के रूप में नज़र आये। 

पर्यावरण की चिंता करने का आग्रह भी उनके उद्बोधन में दिखा। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे हमने अपनी प्रकृति को नुकसान पहुंचाया है। इसकी अनुभूति भी कोरोना काल में हुई है। उन्होंने कहा- "कोरोना महामारी की परिस्थिति के चलते जीवन लगभग थम सा गया। कई नित्य की क्रियाएं बंद हो गईं। उनको देखते हैं तो ध्यान में आता है कि जो कृत्रिम बातें मनुष्य जीवन में प्रवेश कर गई थीं, वे बंद हो गईं और जो मनुष्य जीवन की शाश्वत आवश्यकताएं हैं, वास्तविक आवश्यकताएं हैं, वे चलती रहीं। कुछ कम मात्रा में चली होंगी, लेकिन चलती रहीं। अनावश्यक और कृत्रिम वृत्ति से जुड़ी हुई बातों के बंद होने से एक हफ्ते में ही हमने हवा में ताजगी का अनुभव किया। झरने, नाले, नदियों का पानी स्वच्छ होकर बहता हुआ देखा। खिड़की के बाहर बाग-बगीचों में पक्षियों की चहक फिर से सुनाई देने लगी। अधिक पैसों के लिए चली अंधी दौड़ में, अधिकाधिक उपभोग प्राप्त करने की दौड़ में हमने अपने आपको जिन बातों से दूर कर लिया था, कोरोना परिस्थिति के प्रतिकार में वही बातें काम की होने के नाते हमने उनको फिर स्वीकार कर लिया और उनके आनंद का नए सिरे से अनुभव लिया। उन बातों की महत्ता हमारे ध्यान में आ गई। नित्य व अनित्य, शाश्वत और तात्कालिक, इस प्रकार का विवेक करना कोरोना की इस परिस्थिति ने विश्व के सभी मानवों को सिखा दिया है। विश्व के लोग अब फिर से कुटुम्ब व्यवस्था की महत्ता, पर्यावरण के साथ मित्र बन कर जीने का महत्त्व समझने लगे हैं। यह सोच कोरोना की मार की प्रतिक्रिया में तात्कालिक सोच है या शाश्वत रूप में विश्व की मानवता ने अपनी दिशा में थोड़ा परिवर्तन किया है यह बात तो समय बताएगा। परन्तु इस तात्कालिक परिस्थिति के कारण शाश्वत मूल्यों की ओर व्यापक रूप में विश्व मानवता का ध्यान खींचा गया है, यह बात निश्चित है।" 

सरसंघचालक ने 'देशविरोधी ताकतों' को भी आड़े हाथ लिया और देशभक्त जनता को उनके षड्यंत्रों से सावधान रहने का आग्रह किया। पड़ोसी देशों में कट्टरता और धार्मिक अत्याचार से पीड़ित हिन्दू समाज सहित अन्य अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने का कानून भारत सरकार ने बनाया, जिसके विरोध में दिल्ली के 'शाहीनबाग' से लेकर देशभर में निर्लज्ज प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों की आड़ में साम्प्रदायिक ताकतों ने देश को हिंसा में झौंकने का षड्यंत्र रचा। देश के सौहार्द को बिगाड़ने के लिए असामाजिक तत्व सक्रिय हो गए। भारतीय मुसलमानों के मन में द्वेष और भय पैदा करने का प्रयास किया। देशवासियों ने इस सबको नज़दीक से देखा। भविष्य में ऐसी ताकतें फिर से सिर न उठाएं का समाज विभाजन पैदा करने के षड्यंत्र न रच पाएं, इसके लिए सरसंघचालक ने बाबा साहब अंबेडकर का उल्लेख करते हुए कहा- "25 नवम्बर, 1949 के संविधान सभा में दिये अपने भाषण में श्रद्धेय डॉ. बाबासाहब अंबेडकर ने ऐसे तरीकों को 'अराजकता का व्याकरण' कहा था। ऐसे छद्मवेषी उपद्रव करने वालों को पहचानना एवं उनके षड्यंत्रों को नाकाम करना तथा भ्रमवश उनका साथ देने से बचना समाज को सीखना पड़ेगा।" 

विपक्षी राजनैतिक दलों के लिए भी उन्होंने मार्गदर्शन दिया। वर्तमान परिस्थितियों में उनके विचार को सभी राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को सुनना और उस पर चिंतन करना चाहिए। आखिर राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का व्यवहार और नीति कैसी होनी चाहिए? सरसंघचालक कहते हैं- "सत्ता से जो वंचित रहे हैं, ऐसे सत्ता चाहने वाले राजनीतिक दलों के पुन: सत्ता प्राप्ति के प्रयास, यह प्रजातंत्र में चलने वाली एक सामान्य बात है। लेकिन उस प्रक्रिया में भी एक विवेक का पालन अपेक्षित है कि वह राजनीति में चलने वाली आपस की स्पर्धा है, शत्रुओं में चलने वाला युद्ध नहीं। स्पर्धा चले, स्वस्थ चले, परंतु उसके कारण समाज में कटुता, भेद, दूरियों का बढऩा, आपस में शत्रुता खड़ी होना, यह नहीं होना चाहिए। ध्यान रहे, इस स्पर्धा का लाभ लेने वाली, भारत को दुर्बल या खण्डित बनाकर रखना चाहने वाली, भारत का समाज सदा कलहग्रस्त रहे इसलिए उसकी विविधताओं को भेद बता कर, या पहले से चलती आई हुई दुर्भाग्यपूर्ण भेदों की स्थिति को और विकट व संघर्षयुक्त बनाते हुए, आपस में झगड़ा लगाने वाली शक्तियां, विश्व में हैं व उनके हस्तक भारत में भी हैं। उनको अवसर देने वाली कोई बात अपनी ओर से ना हो, यह चिंता सभी को करनी पड़ेगी।" 

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में स्वदेशी के विचार पर प्रकाश डाला। उसकी आवश्यकता को रेखांकित किया। चीन के सामने पूर्ण सामर्थ्य के साथ खड़े होने के लिए सरकार की नीति की सराहना की। उन्होंने दोहराया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सम्पूर्ण देश में बंधुता, पुरुषार्थ तथा न्याय, नीतिपूर्ण व्यवहार का वातावरण चतुर्दिक खड़ा करने का प्रयास अपनी स्थापना के समय से कर रहा है। उन्होंने आह्वान किया कि अपने संविधान को यशस्वी करने के लिए पूरे समाज में स्पष्ट दृष्टि, परस्पर समरसता, एकात्मता की भावना तथा देश हित सर्वोपरि मानकर किया जाने वाला व्यवहार इस संघ कार्य से ही खड़ा होगा। इस पवित्र कार्य में प्रामाणिकता से, निस्वार्थ बुद्धि से एवं तन-मन-धन पूर्वक देशभर में लक्षावधि स्वयंसेवक लगे हैं। आपको भी उनके सहयोगी कार्यकर्ता बनकर देश के नवोत्थान के इस अभियान के रथ में हाथ लगाने का आवाहन करता हूँ।" 

निस्संदेह, सरसंघचालक मोहन भागवत का यह उद्बोधन देश की सज्जन शक्ति के मध्य विमर्श का विषय बनना चाहिए। उनके विचारों को आधार बनाकर 'विश्वगुरु भारत' की राह बनानी चाहिए। संगठित होकर देश को मजबूत करने की आधारशिला रखनी चाहिये। उनके आग्रह/आह्वान को अपने जीवन में उतार कर श्रेष्ठ भारत के नवनिर्माण के प्रयत्न करने चाहिए। संघ के इस 'ईश्वरीय कार्य' में सहस्त्रों राष्ट्रभक्त नागरिकों के सहयोग की आवश्यकता है। अपने उद्बोधन को उन्होंने प्रेरक गीत की दो पंक्तियों के साथ पूरा किया- 

"प्रश्न बहुत से उत्तर एक, कदम मिलाकर बढ़ें अनेक।

वैभव के उत्तुंग शिखर पर, सभी दिशा से चढ़ें अनेक।

शनिवार, 21 नवंबर 2020

बेटी के लिए कविता-9

यह कविता ऋष्वी के 6वें जन्मदिवस पर

पसीने की बूंदें

याद है तुम्हें
बी-फॉल की सीढिय़ां उतरते हुए
मेरी गोद में थी तुम
देखकर माथे पर पसीने की बूंदें 
तुमने कहा था- 
“ध्यान रखना पिताजी, 
ये पसीना मुझ पर न गिरे”

तुम्हारे चेहरे पर निश्छल हंसी 
और देखकर एक विश्वास 
मंद-मंद मुस्काया था मैं
तुम्हें पसीना न बहाना पड़े
सुनिश्चित करूंगा यह 
परंतु, पसीने का मूल्य
उसकी ताकत और ताप 
पता होना ही चाहिए तुम्हें
ताकि पसीने का सम्मान
कर पाओ तुम। 

किसान का पसीना गिरता है खेत में
लहराता है धरती का आंचल
मजदूर के पसीने की बूंदें
करती हैं निर्माण बुलंद भारत का
कलाकार का पसीना
निखारता है कला-संस्कृति को
शिक्षक अपने पसीने से
गढ़ता है भारत के भविष्य को
चिकित्सक पसीने की बूंदों से
बचाता है लोगों का जीवन
बाकी सब की तरह ही
माता-पिता के पसीने की बूंदों से
पोषित होता है संतति का जीवन।

सुनिश्चित करूंगा मैं
अपने पसीने की बूंदों से
तुम्हारे जीवन में सुख लाऊं
चेहरे की इस हंसी को,
चमक और धमक को बढ़ाऊं
मेरा पसीना गिरे जहाँ
उठ खड़े हों बाग-बगीचे वहाँ
पसीने से सिंचित पुष्पों से
सुंगधित हो जीवन तुम्हारा 
एक-एक बूंद से समृद्ध हो,
सुरक्षित हो, जीवन तुम्हारा। 
परंतु, शर्त एक यही है
निरादर न करना कभी
पसीने की बूंदों का।

शनिवार, 31 अक्तूबर 2020

पुलवामा पर बेनकाब पाकिस्तान

पुलवामा हमले पर बार-बार झूठ बोलने वाले पाकिस्तान की कलई खुल गई है। पाकिस्तान की संसद में इमरान खान सरकार के मंत्री फवाद चौधरी ने आत्मविश्वास के साथ पुलवामा हमले को पाकिस्तार सरकारी की कामयाबी के तौर पर प्रस्तुत किया है। मंत्री चौधरी ने कहा है कि पाकिस्तान ने भारत को घुसकर मारा है। पुलवामा में जो हमारी कामयाबी है, वह प्रधानमंत्री इमरान खाने के नेतृत्व में पूरे देश की कामयाबी है। उसके हिस्सेदार आप (विपक्ष) भी हैं। दरअसल, विपक्ष ने इमरान सरकार की कमजोरी पर प्रश्न उठाए थे। विपक्ष के सांसद अयाज सादिक ने संसद में कहा था कि जब बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद भारत के विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान पाकिस्तान की कैद में थे, तब पाकिस्तान सरकार को डर सता रहा था कि भारत हमले की तैयारी कर रहा है। उन्होंने दावा किया था कि विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने विपक्षी दलों से कहा था कि अभिनंदन को जाने दें, वरना भारत रात 9 बजे हमला कर देगा। विपक्ष के इस दावे के बाद अपनी सरकार की छवि को बचाने के लिए इमरान खान के मंत्री फवाद चौधरी ने वह सच बोल दिया, जिस पर पाकिस्तान अब तक झूठ बोल रहा था। भारत की ओर से प्रमाण प्रस्तुत करने के बाद भी पाकिस्तान बेशर्मी से इस बात से इनकार करता था कि पुलवामा आतंकी हमले में उसकी कोई मिलीभगत रही। लेकिन, अब तो पाकिस्तान की संसद में स्वयं सरकार ने ही स्वीकार कर लिया है कि पुलवामा हमला उसकी ‘कामयाबी’ है। 

आतंकियों और आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घिर चुके पाकिस्तान की मुसीबत अब और बढ़ सकती है। पाकिस्तान सरकार की इस स्वीकारोक्ति को भारत को दमदारी के साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाना चाहिए। इमरान सरकार की यह स्वीकारोक्ति इस बात का प्रमाण है कि पाकिस्तान ने अपने चरित्र में कोई बदलाव नहीं किया है। भारत के साथ सीधे युद्ध से डरने वाला पाकिस्तान आतंकियों के सहयोग से भारत के विरुद्ध छद्म युद्ध चला रहा है। पाकिस्तान की जमीन पर आतंकी संरक्षण पा रहे हैं, यह आतंकी दुनिया के लिए खतरा बन चुके हैं। इस स्वीकारोक्ति के बाद भारत को पाकिस्तान के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्यवाही के लिए प्रयास करने चाहिए। उल्लेखनीय है कि भारत ने पिछले पाँच-छह वर्षों में पाकिस्तान को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है, जिसके कारण वह आर्थिक प्रतिबंध झेलने की स्थिति में पहुँच चुका है।

पाकिस्तान का यह सच भारत के उन तथाकथित बुद्धिजीवियों, पत्रकारों एवं नेताओं के मुंह पर भी करारा तमाचा है, जो पुलवामा में भारतीय सैनिकों पर हमले के पीछे पाकिस्तान के हाथ से इनकार करते रहे। जवानों के बलिदान, उनके शौर्य, सर्जिकल और एयर स्ट्राइक के सबूत माँगने वाली इस ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ को स्वयं पाकिस्तान की संसद ने सबूत दे दिया है। पाकिस्तान से अधिक बेशर्म तो हमारे यहाँ का यह वर्ग था, जो पुलवामा आतंकी हमले को भारत सरकार की ही साजिश बता रहा था। बहरहाल, पाकिस्तान की संसद में इस खुलासे के साथ एक और सच भी सामने आया कि जब पाकिस्तान के लड़ाकू विमान को मार गिराते वक्त भारतीय वायुसेना के जाबांज कमांडर अभिनंदन पाकिस्तान की सीमा में पहुँच गए और पाकिस्तान की पकड़ में आ गए तब भारत के नेतृत्व और सेना के शौर्य से भयभीत पाकिस्तान की सरकार एवं सेना के पाँव कांप रहे थे। नि:संदेह पिछले छह वर्षों में भारत की छवि एक सशक्त देश के रूप में बनी है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के मुद्दों पर कोई समझौता नहीं करता।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पुलवामा हमले पर देश विरोधी बयानबाज़ी और देश विरोधी राजनीति करने वालों को आड़े हाथ लिया

मंगलवार, 27 अक्तूबर 2020

एफसीआरए फंडिंग के नए नियमों पर आपत्ति क्यों?

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बेशलेट ने एफसीआरए फंडिंग संबंधी भारत सरकार के नये नियमों पर आपत्ति जताई है। मिशेल ने भारत सरकार से विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम की समीक्षा करने की अपील की और खेद व्यक्त किया कि इसका उपयोग 'मानवाधिकार रिपोर्टिंग के लिए गैर सरकारी संगठनों को रोकने या दंडित करने के लिए’ किया जा रहा था। उनकी टिप्पणियां मीडिया में सुर्खियाँ बनी। 

इस बयान पर भारत ने मिशेल को सटीक उत्तर दिया है। भारत की ओर से कहा गया है कि मानवाधिकार के बहाने कानून का उल्लंघन माफ नहीं किया जा सकता। संयुक्त राष्ट्र इकाई से मामले को लेकर अधिक सुविज्ञ मत की आशा थी। 

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बेशलेट ने एफसीआरए फंडिंग के बहाने नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में किए गए अतार्किक और हिंसक आंदोलनों को भी मानवाधिकारों से जोडऩे की कोशिश की। संदिग्ध गतिविधियों में पकड़े गए कैथोलिक पादरी स्टेन स्वामी का मामला भी उन्होंने उठाया है। 

कुल मिलाकर मिशेल बेशलेट के बयान को देखें तो वह पूर्वाग्रह, ईसाई मिशनरीज और भारत विरोधी ताकतों से प्रभावित लगता है।

अगर इस शर्त से आपत्ति है तब यह माना जा सकता है कि एनजीओ का उद्देश्य समाज हित नहीं, कुछ और है। यह भी माना जा सकता है कि विदेशी फंडिंग का उपयोग असामाजिक और देशविरोधी गतिविधियों में हो रहा है। 

जाँच-पड़ताल में सामने आया है कि विदेशी अनुदान का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा ईसाई एनजीओ के पास आता है। ये संस्थाएं इस राशि का उपयोग कन्वर्जन में करती हैं, जो कि गैर-कानूनी है। पिछले माह ही गृह मंत्रालय द्वारा कन्वर्जन में लिप्त लगभग एक दर्जन संगठनों के लाइसेंस रद किए गए। 

इन गैर सरकारी संगठनों की ताकत का अंदाजा इसी से चलता है कि ओबामा और ट्रंप सरकारों ने ईसाई संगठन कंपैशन इंडिया के अंशदान पर लगी रोक को हटाने के लिए भारत पर भरपूर, किंतु असफल दबाव बनाया था। 

यह नोटिस करके की बात है कि जब भी ईसाई मिशनरीज के कन्वर्जन के खेल में बाधा पहुँचती है, अमेरिकी या अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं सक्रिय हो जाती हैं। हमने पहले भी भारत के सन्दर्भ में अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की झूठी रिपोर्ट का विश्लेषण किया है, जिसे आपको देखना चाहिए।

Reality of USCIRF Annual Report 2020 on International Religious Freedom

खैर, एफसीआरए लाइसेंसी संगठन राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर भी सवालों के घेरे में आते रहे हैं। भीमा कोरेगांव मामले की जांच कर रही एजेंसियों को मिशनरी संगठनों द्वारा प्राप्त हुए धन के नक्सलवादियों तक पहुंचने के सुबूत मिले हैं। यह भी तथ्य सामने आए हैं कि एनजीओ को प्राप्त हो रहे विदेशी अनुदान का बड़ा हिस्सा जासूसी गतिविधियों पर खर्च किया जा रहा था। 

क्या देश की सुरक्षा और संप्रभुता को सुनिश्चित करने के लिए अनियमित विदेशी अनुदान को पारदर्शी बनाकर मोदी सरकार ने किसी प्रकार के मानवाधिकारों पर हमला किया है? इसका एक ही उत्तर है, नहीं। भारत के सामाजिक-धार्मिक तानेबाने और आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए यह एक आवश्यक कदम था, जिसे बहुत पहले उठाया जाना चाहिए था। 

अब इस समाचार से जुड़ी एक और जानकारी आपको देते हैं। 

भारत के ही नेता ने मिशेल बेशलेट को भारत आमंत्रित करते हुए लिखा है कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त भारत आयें और लोगों से बात करके जाने कि किस तरह सरकार यहाँ मानवाधिकारों को कुचल रही है।

अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसी सोच का नेता कौन है। खैर, इसे छोडिये कि वो कौन है, आप यह तय कीजिये कि ऐसी सोच के नेताओं का आपको क्या करना है?

रविवार, 25 अक्तूबर 2020

राष्ट्रीय विचारों का पुण्य प्रवाह ‘स्वदेश’

चित्र स्वदेश समूह के स्वर्ण जयंती समारोह और स्वदेश भोपाल समूह के 35 वर्ष पूर्ण होने के अवसर का

राष्ट्रीय विचारों का ध्वज वाहक दैनिक समाचारपत्र ‘स्वदेश’ हिन्दी पत्रकारिता का प्रमुख स्तम्भ है। विजयादशमी के अवसर पर शुभ संकल्प के साथ प्रारंभ हुए ‘स्वदेश’ ने सदैव ही, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों और आपातकाल जैसे संवैधानिक संकट के समय में भी राष्ट्रीय विचार की पत्रकारिता की विजय पताका को नील गगन में फहराया है। स्वदेश ने बाजारवाद और कड़ी प्रतिस्पद्र्धा के दौर में भी यह स्थापित करके दिखाया है कि मूल्य और सिद्धाँतों की पत्रकारिता संभव है। समूचे पत्रकारिता जगत में स्वदेश का अपना वैशिष्ट्य है। स्वदेश की पहचान राष्ट्रीय प्रहरी के तौर पर भी है।  

लखनऊ में जिस स्वदेश की नींव एकात्म मानवदर्शन के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने रखी थी, मध्यप्रदेश में वही स्वदेश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक सुदर्शन जी की प्रेरणा से शुरू हुआ। इंदौर और ग्वालियर में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराने के बाद स्वदेश ने भोपाल की राह चुनी। 1966 में जब इंदौर से स्वदेश की शुरुआत हुई, तब राष्ट्रीय विचार की पत्रकारिता के लिए अनुकूल परिस्थितियां नहीं थी। राष्ट्रीय विचारधारा से ओत-प्रोत संगठनों के समाचार या फिर राष्ट्रीय विचारधारा को पुष्ट करने वाली जनसामान्य की विराट अभिव्यक्ति को भी समाचारपत्रों में स्थान मिलना मुश्किल रहता था। लेकिन, स्वदेश ने राष्ट्रीय विचारधारा से जुड़े समाचारों और विचारों को प्रमुखता से स्थान दिया। यशस्वी संपादक मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी ने अपने संपादकीय कौशल और ओजस्वी शैली से मध्यप्रदेश की पत्रकारिता को विवश कर दिया कि वह अपनी दशा-दिशा में बदलाव लाए और अपनी दृष्टि को व्यापक करे। 

स्वदेश के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले ‘मामाजी’ ने अपने एक आलेख में लिखा था कि जो पत्रकारिता तुष्टीकरण तथा छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों की चेरी बन गई थी, जो पत्रकारिता गांधी, तिलक, अरविंद, दीनदयाल उपाध्याय और दादा माखनलाल चतुर्वेदी के मार्ग से हट गई थी, जो पत्रकारिता भारतीय राष्ट्रीयता के पर्यायवाची हिन्दुत्व के विचार से बिचकती थी, अब वह पत्रकारिता पूर्व की भाँति भ्रांत धर्मनिरपेक्षतावादियों की चेरी या चारण नहीं है। वह अब राष्ट्रवादी विचार को अस्पृश्य नहीं मानती है। उसे गंभीरता से लेती है। उसे डांटती है तो पीठ भी थपथपाती है। कोई अब उसकी उपेक्षा नहीं करता-नहीं कर सकता। कोई उसे अनदेखा नहीं कर सकता। यकीनन, मध्यप्रदेश के पत्रकारिता जगत में यह परिवर्तन स्वदेश की प्रखर राष्ट्रीय विचारधारा के कारण ही आया। स्वदेश ने राष्ट्रीय स्वाभिमान से जुड़े प्रश्नों को जिस तरह उठाया, उस अंदाज ने समाज के सामान्य पाठक से लेकर प्रबुद्धजनों को सोचने पर विवश कर दिया। स्वदेशी, गो-संरक्षण, श्रीराम मंदिर आंदोलन, सांप्रदायिकता, तुष्टीकरण, आंतरिक सुरक्षा और लोकतंत्र इत्यादि विषयों पर स्वदेश ने राष्ट्रीय दृष्टिकोण को समाज के समक्ष प्रस्तुत किया। समाज का प्रबोधन किया। देशविरोधी ताकतों द्वारा चलाए जाने वाले भ्रामक विमर्श के प्रति लोगों को जागरूक किया। हालाँकि, मध्यप्रदेश में स्वदेश की नींव को मजबूत करने वाले मामाजी बड़प्पन दिखाते हुए कहते थे कि “आज जो सुखद परिवर्तन समाज के चिंतन में आया है, उसका श्रेय स्वदेश को नहीं है, उन असंख्य नींव के पत्थरों को है, जिन्होंने राष्ट्र जागरण के पावन कार्य में अपने जीवन खपा दिए हैं। उनके विचारों व कार्यों के प्रामाणिक प्रचार-प्रसार व उनके पक्ष में जनमत निर्माण में स्वदेश की भूमिका सेतुबंध के समय सक्रिय तुच्छ गिलहरी के बराबर भी रही हो, तो स्वदेश अपने को धन्य मानेगा”।

स्वदेश ने अपनी बेबाकी और राष्ट्रीय विचार के प्रति निष्ठा की कीमत भी चुकायी है। स्वदेश, भोपाल समूह ने केवल वैचारिक हमलों ही सामना नहीं किया बल्कि उस पर कट्टरवादी मानसिकता के समूहों ने प्रत्यक्ष हमले भी किए हैं। इस संदर्भ में एक घटना उल्लेखनीय है, जब स्वदेश, भोपाल का कार्यालय मारवाड़ी रोड पर था। उस समय एक समाचार के चिढ़ कर स्वार्थी और हिंसक गिरोह ने स्वदेश के कार्यालय पर हमला कर दिया था और तोड़-फोड़ मचा कर बहुत नुकसान पहुँचाया। लेकिन, उसके बाद भी स्वदेश के तेवर ढीले नहीं हुए। उसने उसी मुखरता से देश-समाज विरोधी ताकतों के विरुद्ध समाचार एवं विचार प्रकाशित करना जारी रखा। अपनी स्पष्टवादिता के कारण स्वदेश को आर्थिक संकटों का भी सामना करना पड़ा है। आज भी स्थिति कमोबेश वैसी ही है। राष्ट्रीय विचारधारा के विरोधियों की आँखों में आज भी स्वदेश खटकता है। उनको जब भी अवसर मिलता है, वे स्वदेश को क्षति पहुँचाने का प्रयत्न ही करते हैं। स्वदेश के विचार से जुड़े लोगों को प्रारंभ से पता था कि उसका मार्ग बाकी समाचारपत्रों की तरह आसान नहीं रहने वाला है। जिनके भी हाथ में स्वदेश की बागडोर रही, उन्हें पता था कि हमें सिद्धाँतों पर अडिग़ रहना है। इसलिए ही महान संकट से समय में भी स्वदेश ने पत्रकारिता के सिद्धांतों, मानदण्डों और वैचारिक अधिष्ठान को नहीं बदला। पूरी निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ स्वदेश पत्रकारिता के भारतीय मूल्यों को समृद्ध करता रहा है। 

स्वदेश, भोपाल समूह का नेतृत्व ऐसे यशस्वी संपादक श्रीमान राजेन्द्र शर्मा जी के हाथों में है, जिनके पत्रकारीय जीवन को ही पाँच दशक से अधिक समय हो गया है। राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर आज भी उनकी लेखनी हम सबका मार्गदर्शन करती है। वे और स्वदेश पत्रकारिता की पाठशाला हैं। उनके प्रयासों से 1981 में भोपाल से स्वदेश प्रारंभ हुआ। उनके कुशल संपादन में स्वदेश ने मध्यप्रदेश के उस शहर (राजधानी) की पत्रकारिता में अपनी स्थिति मजबूत कर ली, जहाँ से शेष प्रदेश में विमर्श बनता है। ठीक 10 वर्ष की यात्रा के बाद स्वदेश भोपाल की यात्रा में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव आया, जब इस समूह ने 1991 में अपने सांध्यकालीन संस्करण ‘सायंकालीन स्वदेश’ का प्रकाशन प्रारंभ किया। आज स्वदेश भोपाल समूह के जबलपुर, सागर, रायपुर और बिलासपुर से भी विभिन्न संस्करण निकल रहे हैं। सागर से यह ‘स्वदेश ज्योति’ के नाम से प्रकाशित होता है। स्वदेश की एक ओर परंपरा है, जो इसे विशिष्ट बतानी है, वह है इसके संग्रहणीय विशेषांकों की समृद्ध शृंखला। प्रधान संपादक श्रीमान राजेन्द्र शर्मा के संपादन एवं मार्गदर्शन में श्री अटल बिहारी वाजपेयी के अमृत महोत्सव पर ‘अटल विशेषांक’, राजमाता सिंधिया की स्मृति में ‘पुण्य स्मरण’, श्रीगुरुजी जन्म शताब्दी वर्ष पर ‘राष्ट्रऋषि श्री गुरुजी’, मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी की स्मृति में ‘पुष्पांजलि’, सुदर्शन स्मृति और वंदनीय विवेकानंद जैसे संग्रहणीय विशेषांक प्रकाशित हुए हैं।  

यह सुखद अवसर है जब अपने उद्देश्य और ध्येय की ध्वजा को लेकर 39 वर्ष सफलता से पूर्ण कर अब स्वदेश 40वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। आज तकनीक के कारण पत्रकारिता का परिदृश्य बदला हुआ है। हमें भरोसा है कि स्वदेश इस बदले हुए परिदृश्य में भी राष्ट्रीय विचारों का संवाहक बनेगा और डिजिटल पत्रकारिता में भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराएगा। 40वें स्थापना दिवस के शुभ अवसर पर यही आकांक्षा और शुभकामनाएं हैं कि स्वदेश की यह गौरवपूर्ण यात्रा अनवरत जारी रहे... 

शनिवार, 17 अक्तूबर 2020

अपने लोगों को ताकत दें, स्थानीय बाजार से खरीदारी करें


हमारे देश में दीपावली से पहले बड़े स्तर पर खरीदारी शुरू हो जाती है। दरअसल, शारदीय नवरात्र के साथ ही त्योहारों और शुभ अवसरों की एक शृंखला प्रारंभ होती है, जो दीपावली के बाद तक जारी रहती है। इन शुभ प्रसंगों पर हम आवश्यक वस्तुएं, उपहार और चल-अचल संपत्ति क्रय करते हैं। विजय की आकांक्षा जगाने वाला पर्व विजयादशमी पर भी बाज़ारों में रौनक रहती है। सुख-समृद्धि और आरोग्य का प्रतीक पर्व धनतेरस भी दीपावली से ठीक दो दिन पूर्व ही आता है, जब हमारे बाजार विशेष तौर पर सजाए जाते हैं। इस दिन बड़ी संख्या में लोग बर्तन, सोना-चांदी, जेवरात इत्यादि संपत्ति खरीदते हैं। 

कुल मिलाकर यह एक ऐसा अवसर आ रहा है, जब हम सही मायने में ‘वोकल फॉर लोकल’ के अपने शुभ संकल्प को परख सकते हैं। क्या हम यह तय कर सकते हैं कि इस बार हम अपने स्थानीय व्यवसायियों के हाथ मजबूत करेंगे? अपनी आवश्यकता का सामान अपने आसपास के बाजार से खरीदेंगे। 

  • स्थानीय सुनार से आभूषण तैयार कराएंगे। 
  • स्थानीय इलेक्ट्रीशियन को सजावटी लाइट तैयार करने को कहेंगे। 
  • साज-सज्जा की सामग्री किसी मॉल या शो-रूम से नहीं, बल्कि अपने शिल्पियों से खरीदेंगे। 
  • कुम्हार के चाक को गति देंगे और उससे दीये खरीदेंगे। 
  • शहर के मोची से जूते-चप्पल बनवाएंगे। 
  • फर्नीचर अपने बढ़ई से तैयार कराएंगे। 
  • अपने हलवाई से मिठाई बनवाएंगे। 

क्या हम तय कर सकते हैं कि अब हम ब्रांडेड के चक्कर में न पड़ कर स्थानीय उत्पाद को प्रोत्साहित करेंगे। अपने स्थानीय उत्पाद को ब्रांड बनाएंगे। स्थानीय उत्पाद को न केवल खरीदेंगे अपितु उपयोग के बाद संतुष्ट होने पर उसका प्रचार भी करेंगे। अपने परिचितों के साथ और अपने सोशल मीडिया मंचों के माध्यम से उस उत्पाद की खूबियां सबके साथ साझा करेंगे। 

हम ऐसा विज्ञापन करेंगे कि उन देशी-विदेशी बड़े ब्रांडों को शर्म आ जाए, जो प्रचार में भी हिन्दू समाज पर आघात करते हैं। यह लगातार देखने में आ रहा है कि विभिन्न देशी-विदेशी कंपनियां अपने उत्पाद का प्रचार करने के लिए ऐसी झूठी कहानियां प्रस्तुत कर रहीं हैं, जिनसे हिन्दू समाज की छवि यथार्थ के ठीक विपरीत संकीर्ण, कूपमंढूक और असहिष्णु समाज के रूप में बन रही है। 

यह अच्छी बात है कि विज्ञापनों और सिनेमा के माध्यम से समाज पर हो रहे लगातार हमले पर अब हिन्दू समाज ने अपना प्रतिरोध दर्ज कराना शुरू कर दिया है। निश्चित ही यह जागरूक समाज की जिम्मेदारी है कि वह अपने विरुद्ध हो रहे वैचारिक हमलों को रोके। वास्तविकता से परे, कपोल-कल्पित, झूठे और आपत्तिजनक विज्ञापनों को रोका जाना बहुत आवश्यक है। इसके साथ ही अच्छी और सच्ची बातों का स्वागत भी करना है।

अब हमें बहिष्कार करने की प्रवृत्ति से आगे बढ़ कर अपने स्थानीय उत्पादों को स्थापित करके भी दिखाना चाहिए। उन छोटे दुकानदारों, कारीगरों और कलाकारों का प्रचार करना चाहिए, जो विज्ञापन फिल्में बनाकर अपने गुणवत्तापूर्ण सामग्री को सब तक नहीं पहुँचा पाते हैं। यह इसलिए भी करना आवश्यक है क्योंकि कोरोना संक्रमण का बहुत नकारात्मक प्रभाव हमारे छोटे-मोटे दुकानदार, कारीगर, व्यवसायियों पर पड़ा है। इस दौरान उनके यहाँ काम करने वाले कामगारों को भी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा है। यदि हमें भारत को मजबूत बनाना है तब इन लोकल्स के लिए वोकल होना ही पड़ेगा। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान के बाद हमने जिस आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का संकल्प लिया है, उसमें ‘गिलहरी योगदान’ देने का अवसर आ गया है। यह अवसर स्वदेशी के प्रति आग्रही होने के हमारे अभ्यास को भी पक्का करेगा। 

तो आईये, संकल्प लेते हैं कि इस बार स्वदेशी और स्थानीय उत्पाद ही खरीदेंगे। साथ ही उसका प्रचार भी करेंगे।