बुधवार, 19 सितंबर 2018

संघ एक परिचय

'भविष्य का भारत: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' - २ 
- लोकेन्द्र सिंह
संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 'भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' विषय पर पहले दिन के व्याख्यान में संघ का परिचय प्रस्तुत किया। संघ की विकास यात्रा को देश-दुनिया के महानुभावों के सम्मुख रखा। सहज संवाद में अनेक प्रश्नों के उत्तर दिए। सबसे महत्वपूर्ण बात अपने संबोधन के प्रारंभ में उन्होंने कही- 'मैं यहां आपको सहमत करने नहीं आया, बल्कि संघ के बारे में वस्तुस्थिति बताने आया हूं।' यह कहते हुए उन्होंने बताया कि आप संघ के संबंध में अपना विचार बनाने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन, संघ के संबंध में वस्तुस्थिति जानकार आप अपना मत रखेंगे तो अच्छा होगा। उनका यह कहना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ज्यादातर लोग संघ के संबंध में टिप्पणी तो करते हैं किंतु उसके संबंध में बुनियादी जानकारी भी नहीं रखते हैं। इस संबंध में उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव का हालिया वक्तव्य उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है। व्याख्यानमाला का आमंत्रण मिलने पर उन्होंने कहा कि वह संघ के बारे में अधिक नहीं जानते हैं। स्वयं उन्होंने स्वीकारा कि वह संघ के संबंध में अधिक नहीं जानते, इसके बाद भी वह आगे कहते हैं कि वह इस आयोजन में नहीं जाएंगे, क्योंकि संघ पर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने प्रतिबंध लगाया था और जिन कारणों से प्रतिबंध लगाया गया था, वह कारण अभी तक समाप्त नहीं हुए हैं। यह एकमात्र उदाहरण नहीं है। देश के ज्यादातर राजनेता एवं अन्य लोग संघ के संबंध में जानकारी रखते नहीं है, इसके बाद भी संघ पर अनर्गल टिप्पणी करते हैं। 

जन्मजात देशभक्त डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार :
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने पहले दिन के संबोधन में संघ के संबंध में गढ़े गए अनेक मिथकों से धूल तो झाड़ी ही, साथ ही संघ को समझने की राह भी दिखाई। उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को समझे बिना संघ को समझना कठिन होगा। डॉ. हेडगेवार के संबंध में बताते हुए उन्होंने सहज भाव से महान देशभक्त का जीवन प्रस्तुत कर दिया। डॉ. हेडगेवार जन्मजात देशभक्त थे। केशव हेडगेवार कलकत्ता में डॉक्टरी की पढ़ाई के वक्त क्रांतिकारियों के बीच समन्वय का काम करते थे। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। डॉ. हेडगेवार 19 अगस्त, 1921 से 11 जुलाई, 1922 तक कारावास में रहे। जब वह जेल से छूटे तब उनके सम्मान में नागपुर में 12 जुलाई, 1922 को आयोजित सार्वजानिक सभा में प्रांत नेताओं के साथ कांग्रेस के अन्य नेता हकीम अज़मल खां, पंडित मोतीलाल नेहरू, राजगोपालाचारी आदि ने हेडगेवार जी का स्वागत किया। वह उस समय की कांग्रेस के नागपुर के वरिष्ठ राजनेता थे। गांधीजी के आंदोलनों में सक्रियता से सहभागी बने। गांधीजी जब येरवाड़ा में पकड़े गए तब उनके लिए हुए एकत्रिकरण बैठक में मुख्य प्रवक्ता के तौर पर कांग्रेस ने हेडगेवार को बुलाया। इसी वर्ष जब संघ शिक्षा वर्ग के समापन में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी नागपुर पहुँचे थे, तब उन्होंने डॉ. हेडगेवार का घर (जो अब उनकी स्मृति में संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया है) गए। वहाँ अभ्यागत पुस्तिका (विजिटर बुक) में संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के लिए लिखा- 'मैं आज भारत माँ के महान सपूत डॉ. केबी हेडगेवार के प्रति सम्मान और श्रद्धांजलि अर्पित करने आया हूँ।'


राष्ट्रध्वज के सम्मान में तत्पर :
राष्ट्र ध्वज तिरंगा के सम्मान पर अकसर संघ को घेरा जाता है। इस संबंध में संघ के ऊपर लगने वाले आरोप का जिक्र किए बिना ही डॉ. भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ और उसके स्वयंसेवक राष्ट्र ध्वज के रूप में तिरंगे को मान्यता मिलने के बाद से उसका पूर्ण सम्मान करते हैं। इस संबंध में उन्होंने दो महत्वपूर्ण प्रसंग सुनाए। एक, कांग्रेस के अधिवेशन में 80 फीट ऊंचे पोल पर तिरंगा फहराया जाना था। पंडित नेहरू उस अधिवेशन में आए थे। तिरंगा पोल पर अटक गया। तब वहाँ उपस्थित भीड़ में से एक नौजवान दौड़ कर आया और पोल पर चढ़ कर उसने तिरंगा को फहरा दिया। जब पंडित नेहरू जी ने उस नौजवान का सम्मान करने की बात कही और उसे शाम को बुलाया। तब पंडित नेहरू को बताया गया कि वह नौजवान संघ का स्वयंसेवक किशन सिंह राजपूत है। इसी तरह जब कांग्रेस ने अपने अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का संकल्प लिया, तब डॉ. हेडगेवार ने संघ के प्रमुख कार्यकर्ताओं को पत्र लिख कर इस निर्णय के लिए कांग्रेस का अभिनंदन किया और स्वयंसेवकों से राष्ट्र ध्वज तिरंगा लेकर पथ संचलन निकालने का आग्रह किया। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने यह भी बताया कि संघ सबसे बड़ा लोकतांत्रिक संगठन है। यहाँ सब मिलकर निर्णय करते हैं। सामान्य स्वयंसेवक भी अपना सुझाव दे सकता है। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में सब लोग मिलकर नीति-निर्णय तय करते हैं। यह परंपरा आज से नहीं है, प्रारंभ से है। संघ के नामकरण का प्रसंग इसका उदाहरण है। 

संघ का किसी से विरोध नहीं :
उन्होंने संघ के उद्देश्य के संबंध में भी स्पष्ट किया कि संघ सामर्थ्यवान समाज का निर्माण करना चाहता है। संघ व्यक्ति निर्माण और समाज निर्माण का कार्य करता है। दरअसल, संघ मानता है कि समाज ठीक रहेगा तो सब व्यवस्थाएं ठीक प्रकार से चलेंगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संघ का किसी से विरोध नहीं है। समाज के बीच में काम करते समय स्वयंसेवक किसी के प्रति कटुता का भाव नहीं रखते हैं। संघ सबको साथ लेकर चलने में विश्वास करता है। संघ किसी को पराया नहीं मानता है। बहरहाल, संघ ने अधिकृत तौर पर विभिन्न मुद्दों पर अपना पक्ष रखा है। यह सही है कि संघ से अब भी बहुतेरे लोग सहमत नहीं होंगे। किंतु, अब इतना तो करना ही चाहिए कि संघ के संबंध में टिप्पणी करते समय डॉ. मोहन भागवत द्वारा रखे गए पक्ष का ध्यान रखा जाएगा। तथ्यों की अनदेखी करके अनर्गल टिप्पणी करने से जिम्मेदार लोग बचेंगे।
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व्याख्यानमाला के पहले दिन की चित्रमयी झलकी देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - 

सोमवार, 17 सितंबर 2018

संघ की पहल

'भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' - १
- लोकेन्द्र सिंह 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम पर सबकी नजर है। देश में भी और देश के बाहर भी। सब जानना चाहते हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा सांस्कृतिक संगठन आरएसएस ‘भविष्य का भारत’ को किस तरह देखता है? संघ का ‘भारत का विचार’ क्या है? दरअसल, यह उत्सुकता इसलिए भी है क्योंकि पिछले 93 वर्षों में कुछेक राजनीतिक/वैचारिक खेमों से संबद्ध राजनेताओं, लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर अनेक मिथक गढ़ दिए हैं। किंतु, संघ सब प्रकार के दुष्प्रचारों की चिंता न करते हुए समाज के बीच कार्य करता रहा और तमाम आरोपों का उत्तर अपने आचरण/कार्य से देता रहा। परिणामस्वरूप आज संघ का विस्तार ‘दशों दिशाओं...’ में हो गया है। उसके निष्ठावान स्वयंसेवक सबदूर ‘दल बादल...’ से छा गए हैं। इसके बावजूद व्यापक स्तर पर किए गए दुष्प्रचार के कारण समाज के कुछ हिस्सों में संघ को लेकर स्पष्टता नहीं है। एक विश्वास व्यक्त किया जा रहा है कि इस महत्वपूर्ण आयोजन से बहुत हद तक भ्रम और मिथक के बादल छंट जाएंगे। 
          प्रारंभिक दो दिन (17 और 18 सितंबर) सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ‘भविष्य का भारत’ विषय पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण प्रस्तुत करेंगे। तीसरे दिन, 19 सितंबर को व्याख्यानमाला में आमंत्रित महानुभावों के प्रश्नों का उत्तर देंगे। संघ ने इस कार्यक्रम के लिए देश-दुनिया से चयनित लोगों को आमंत्रित किया है। इनमें सब प्रकार के संगठनों (राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृति एवं अन्य) से चयनित प्रतिनिधि आमंत्रित हैं। जब इस आयोजन की जानकारी संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अरुण कुमार ने दिल्ली में प्रेस के सामने रखी थी, तब मीडिया के एक वर्ग ने जानबूझ कर (संभवत: टीआरपी के लिए) यह समाचार चला दिया था कि संघ कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी को अपने कार्यक्रम में बुलाएगा। उसके बाद स्वाभाविक तौर पर एक अनावश्यक बहस प्रारंभ हो गई। जबकि संघ के प्रचार प्रमुख ने उसी समय स्पष्ट किया था कि अभी राहुल गांधी को बुलाने की कोई योजना नहीं बनी है। हम किसको बुलाएंगे, यह हम तय करेंगे। परंतु, अभी इतना तय है कि हम सब विचार और कार्यक्षेत्र के लोगों को बुलाएंगे। संघ ने राहुल गांधी को चिट्ठी भेजी है या नहीं, अब भी यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुआ है। 
          बहरहाल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भविष्य में भारत को कहाँ देखना चाहता है, यह तो उसकी शाखा में नित्य की जाने वाली प्रार्थना से ही स्पष्ट होता है। ‘परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रम्’ अर्थात् संघ भारत को परम् वैभव के शिखर पर देखना चाहता है। विश्वगुरु की भूमिका में। दुनिया का नेतृत्व करते हुए। संघ का भारत के संदर्भ में जो विचार है वह कोई नया नहीं है। जो भारत के वेद-उपनिषदों में कहा गया है, उसका सार लेकर ही संघ काम करता है। उसके लिए भारत का अभिप्राय स्वामी विवेकानंद के उस भारत से है, जिसकी एक झलक उन्होंने शिकागो विश्व धर्म संसद में प्रस्तुत की थी। विश्व बंधुत्व की बात करने वाला भारत। सबको साथ लेकर चलने वाला भारत। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से समय-समय पर भारत के विचार की संकल्पना को प्रस्तुत किया जाता है। इस श्रृंखला में यह महत्वपूर्ण अवसर है। संभवत: यह पहला अवसर है जब संघ अपना दृष्टिकोण रखने के लिए इस प्रकार का आयोजन कर रहा है। संघ की इस पहल का आत्मीय स्वागत किया जाना चाहिए।

रविवार, 16 सितंबर 2018

नर्मदा के तट पर हुई सांख्य दर्शन की रचना

भारतीय संस्कृति के प्रमुख दर्शनों में से एक है- "सांख्य दर्शन"। महाभारतकार वेद व्यास ने कहा है कि "ज्ञानं च लोके यदिहास्ति किंचित् सांख्यागतं तच्च महन्महात्मन्" (शांति पर्व 301.109)।  इसका अर्थ है- इस संसार में जो कुछ भी ज्ञान है, सब सांख्य से आया है। शान्ति पर्व के कई स्थलों पर सांख्य दर्शन के विचारों का बड़े काव्यमय और रोचक ढंग से उल्लेख किया गया है। 
       इस महत्वपूर्ण ग्रन्थ की रचना अमरकंटक में नर्मदा तट के किनारे पर कपिल मुनि ने की है। कपिल मुनि और सांख्य दर्शन से जुड़े उस स्थान को देखने के लिए यह वीडियो देखें...  


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शनिवार, 15 सितंबर 2018

‘हिन्दीपन’ से मिलेगा हिंदी को सम्मान


- लोकेन्द्र सिंह 
भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है। बल्कि, इससे इतर भी बहुत कुछ है। भाषा की अपनी पहचान है और उस पहचान से उसे बोलने वाले की पहचान भी जुड़ी होती है। यही नहीं, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रत्येक भाषा का अपना संस्कार होता है। प्रत्येक व्यक्ति या समाज पर उसकी मातृभाषा का संस्कार देखने को मिलता है। जैसे हिन्दी भाषी किसी श्रेष्ठ, अपने से बड़ी आयु या फिर सम्मानित व्यक्ति से मिलता है तो उसके प्रति आदर व्यक्त करने के लिए 'नमस्ते' या 'नमस्कार' बोलता है या फिर चरणस्पर्श करता है। 'नमस्ते' या 'नमस्कार' बोलने में हाथ स्वयं ही जुड़ जाते हैं। यह हिन्दी भाषा में अभिवादन का संस्कार है। अंग्रेजी या अन्य भाषा में अभिवादन करते समय उसके संस्कार और परंपरा परिलक्षित होगी। इस छोटे से उदाहरण से हम समझ सकते हैं कि कोई भी भाषा अपने साथ अपनी परंपरा और संस्कार लेकर चलती है। किसी भी देश की पहचान उसकी संस्कृति से होती है। संस्कृति क्या है? हमारे पूर्वजों ने विचार और कर्म के क्षेत्र में जो भी श्रेष्ठ किया है, उसी धरोहर का नाम संस्कृति है। यानी हमारे पूर्वजों ने हमें जो संस्कार दिए और जो परंपराएं उन्होंने आगे बढ़ाई हैं, वे संस्कृति हैं। किसी भी देश की संस्कृति उसकी भाषा के जरिए ही जीवित रहती है, आगे बढ़ती है। जिस किसी देश की भाषा खत्म हो जाती है तब उस देश की संस्कृति का कोई नामलेवा तक नहीं बचता है। यानी संस्कृति भाषा पर टिकी हुई है।

बुधवार, 29 अगस्त 2018

सिख विरोधी दंगा : जब एक व्यक्ति के अपराध का बदला पूरे समुदाय से लिया गया


- लोकेन्द्र सिंह 
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 1984 के सिख विरोधी दंगों पर गलत बयानी कर अपने लिए और अपनी पार्टी के लिए नया संकट खड़ा कर लिया है। राहुल गांधी ने उन पीडि़त परिवारों के जख्म भी हरे कर दिए हैं, जिन्होंने उन दंगों में अपनों को खोया था। इतिहास में ऐसा उदाहरण शायद ही कोई दूसरा मिले, जब एक सिर-फिरे व्यक्ति के अपराध की कीमत एक संप्रदाय से वसूली गई। यूरोप में घूम-घूम कर भारत और भारतीयता के संदर्भ में गलत बयानी कर रहे राहुल गांधी ने बहुत ही आसानी से कह दिया कि 1984 के सिख विरोधी दंगों में कांग्रेस की कोई भूमिका नहीं है। जबकि उनके पिताजी राजीव गांधी ने खुले मंच से 19 नवंबर, 1984 को अप्रत्यक्ष रूप से दंगों में कांग्रेस की भूमिका को स्वीकार करते हुए कहा था- 'जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है।' राजीव गांधी के इस बयान का अभिप्राय अपनी पार्टी के नेताओं द्वारा किए गए सिख बंधुओं के कत्लेआम को सामान्य की प्रतिक्रिया बता कर मामले को रफा-दफा करने से था।

सोमवार, 27 अगस्त 2018

भ्रम के जाले हटाएं राहुल गांधी

- लोकेन्द्र सिंह 
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को उनके किसी सलाहकार ने भ्रमित कर दिया है। जिसके कारण वह समझ नहीं पा रहे हैं कि राजनीति के मैदान में उन्हें भारतीय जनता पार्टी से मुकाबला करना है या फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से। अपने इस भ्रम के कारण वह उस संगठन का प्रचार-प्रसार करते रहते हैं, जो प्रसिद्धपरांगमुखता का पालन करते हुए सामाजिक कार्य में संलग्न है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर बार-बार अनर्गल टिप्पणी करने से न तो राहुल गांधी को कोई लाभ होने वाला है और न कांग्रेस के खाते में राजनीतिक लाभ आएगा। संघ समाज के बीच में काम करता है। इसलिए आमजन संघ को भली प्रकार जानते और समझते हैं। उसके प्रति घृणा और नफरत पैदा करने के कांग्रेस के सब प्रयत्न विफल होना तय है। वैसे भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर झूठा आरोप लगाने के एक मामले में राहुल गांधी न्यायालय के चक्कर काट रहे हैं।

रविवार, 26 अगस्त 2018

भारत, भारतीयता और भारत के देशभक्त नागरिकों के प्रति नकारात्मक विचार


- लोकेन्द्र सिंह 
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक बार फिर अपनी अपरिपक्वता जाहिर की है। यूरोप के दौरे के दौरान विदेशी जमीन पर उन्होंने जिस प्रकार के विचार प्रकट किए हैं, उससे भारत और भारतीय संस्कृति के प्रति उनके दृष्टिकोण का पता भी चलता है। इससे पहले भी वह अमेरिका में कह चुके हैं कि भारत को इस्लामिक आतंकी समूहों से नहीं, बल्कि 'हिंदू आतंकवाद' से अधिक खतरा है। पहले उन्होंने भारत के हिंदू समाज और हिंदू संस्कृति की छवि को धूमिल किया और अब भारत के मुस्लिम, अनुसूचित जाति-जनजाति और गरीब वर्ग को बदनाम करने का प्रयास किया है। जर्मनी के हैम्बर्ग में विद्यार्थियों से बात करते हुए उन्होंने आतंकवाद को गरीबी से जोड़कर एक तरह से आतंकी संगठनों के पैरोकार की भूमिका का निर्वहन किया है। क्या उनके इस तर्क से सहमत हुआ जा सकता है कि गरीबी और बेरोजगारी के कारण आईएसआईएस जैसे आतंकी समूह निर्मित होते हैं? उन्होंने कहा  कि अगर दलित और अल्सपसंख्यक जैसे समुदायों की विकास की दौड़ में अनदेखी हुई तो देश में आईएस की तरह आतंकवादी समूह बन सकते हैं? इस कथन का क्या आशय निकाला जाए? आतंकवाद जैसी वैश्विक समस्या पर यह किस स्तर का चिंतन है? भारत से लेकर दुनिया में जहाँ भी आतंकी घटनाएं हो रही हैं, उसके पीछे क्या वास्तव में गरीबी है? आईएसआईएस के जो उद्देश्य हैं, उसमें क्या गरीबी उन्मूलन शामिल है? कोई भी आतंकी समूह देश-दुनिया से गरीबी को समाप्त करने के लिए उद्देश्य से काम नहीं कर रहा है। आखिर किस तरह के अध्ययन के आधार पर राहुल गांधी ने यह विचार रखा है?

शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

यहाँ का कंकर-कंकर शंकर है

नर्मदा नदी के जल में पाए जाने वाले शिव लिंग का बहुत महत्व है। शास्त्रों में नर्मदा में पाए जाने वाले "शिवलिंग" को नर्मदेश्वर और बाणलिंग भी कहा गया है। इन शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती है। जानिये क्यों है नर्मदा जल में पाए जाने वाले शिव लिंग का इतना महत्व - 


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शनिवार, 18 अगस्त 2018

अटल कभी मरते नहीं

- लोकेन्द्र सिंह 

'हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय'
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ राजनीति के एक युग का अवसान हो गया है। यह युग भारतीय राजनीति के इतिहास के पन्नों पर अमिट स्याही से दर्ज हो गया है। भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों, आदर्शों और सिद्धांतों को जानने के लिए अटल अध्याय से होकर गुजरना ही होगा। अटल युग की चर्चा और अध्ययन के बिना भारतीय राजनीति को पूरी तरह समझना किसी के लिए भी मुश्किल होगा। उन्होंने भारतीय राजनीति को एक दिशा दी। उन्होंने वह कर दिखाया, जिसकी कल्पना भी कठिन थी। उस भारतीय जनता पार्टी को पहले मुख्य विपक्षी दल बनाया और बाद में सत्ता के शिखर पर पहुँचाया, जिसके साथ लंबे समय तक 'अछूत' की तरह व्यवहार किया गया। उन्होंने भाजपा के साथ अनेक राजनीतिक दलों को एकसाथ एक मंच पर लाकर सही अर्थों में 'गठबंधन' के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। अपने सिद्धांतों पर अटल रहकर भी कैसे सबको साथ लेकर चला जाता है, यह दिवंगत वाजपेयी जी के राजनीतिक जीवन से सीखना होगा।

सोमवार, 13 अगस्त 2018

देहरी छूटी, घर छूटा


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काम-धंधे की तलाश में
देहरी छूटी, घर छूटा
गलियां छूटी, चौपाल छूटा
छूट गया अपना प्यारा गांव
मिली नौकरी इक बनिया की
सुबह से लेकर शाम तक
रगड़म-पट्टी, रगड़म-पट्टी
बन गया गधा धोबी राम का।

आ गया शहर की चिल्ल-पों में
शांति छूटी, सुकून छूटा
सांझ छूटी, सकाल छूटा
छूट गया मुर्गे की बांग पर उठना
मिली चख-चख चिल्ला-चौंट
ऑफिस से लेकर घर के द्वार तक
बॉस की चें-चें, वाहनों की पों-पों
कान पक गया अपने राम का।

सीमेन्ट-कांक्रीट से खड़े होते शहर में
माटी छूटी, खेत छूटा
नदी छूटी, ताल छूटा
छूट गया नीम की छांव का अहसास
मिला फ्लैट ऊंची इमारत में
आंगन अपना न छत अपनी
पैकबंद, चकमुंद दिनभर
बन गया कैदी बाजार की चाल का।

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