संस्कार केंद्र है संघ शाखा : खेल-खेल में स्वयंसेवक सीख जाते हैं प्रबंधन के सूत्र, संगठन शास्त्र, परोपकार, सेवाभाव, पारिवारिक आत्मीयता, सामुहिकता और समन्वय जैसे गुण
संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने व्यक्ति निर्माण के लिए शाखा के रूप में अनूठी कार्यपद्धति दी है। शाखा की सामान्य-सी दिखनेवाली गतिविधियों में वह जादू है कि नित्य शाखा आने वाले स्वयंसेवकों के व्यक्तित्व में व्यापक परिवर्तन आता है। स्वयंसेवक का समग्र व्यक्तित्व विकास होता है। शाखा के संस्कार से स्वयंसेवकों के मन में पारिवारिक आत्मीयता, सामाजिक उत्तरदायित्व, परोपकार, देशभक्ति, संवेदनशीलता, साहस, सेवा और प्रबंधन जैसे अनेक गुण विकसित होते हैं। संघ विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी अपनी पुस्तक ‘कार्यकर्ता’ में लिखते हैं- “संघशाखा पर प्रतिदिन एकत्रीकरण, यह अपनी कार्यपद्धति के संगठनसूत्र का बुनियादी पहलू है। उसमें से ही, आनेवाले स्वयंसेवकों के मन में एक पारिवारिक आत्मीयता का भाव विकसित होता है। इस पारिवारिकता के कारण ही एकसाथ काम करने की उमंग मन में पैदा होती है। सामूहिक कार्यक्रमों के माध्यम से ही सामूहिक मानसिकता का निर्माण होता है, इस मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त के प्रकाश में सामूहिक कार्यक्रम हम करते हैं। संघशाखा यह एक संस्कार केंद्र है”।
सामान्यतौर पर संघ की शाखा 60 मिनट की रहती है। यह 60 मिनट स्वयंसेवक एक अनुशासित व्यवस्था में व्यतीत करते हैं। शाखा पर होने वाले सभी शारीरिक एवं बौद्धिक कार्यक्रमों का पूर्व नियोजन होता है। प्रत्येक कार्यक्रम के लिए कालखंड विभाजित हैं। ऐसा नहीं होता कि स्वयंसेवकों को खेलने में आनंद आ रहा है, तो उस दिन शाखा पर केवल खेल ही होंगे। सामान्यतौर पर 40 मिनट शारीरिक, 10 मिनट बौद्धिक और शेष 10 मिनट शाखा लगाने एवं विकिर (शाखा छोड़ने) के लिए तय रहते हैं। सबसे पहले स्वयंसेवक संघस्थान पर एकत्र होते हैं। उसके पश्चात आचार पद्धति से शाखा लगाने का कार्य मुख्य शिक्षक सम्पन्न करता है। पहले स्वयंसेवक गुरु ‘भगवा ध्वज’ को प्रणाम करते हैं, उसके बाद ही शाखा में शारीरिक और बौद्धिक कार्यक्रमों की रचना होती है। प्रारंभ में शाखा पर उपस्थित स्वयंसेवकों की उम्र को ध्यान में रखकर व्यायाम, सूर्यनमस्कार, योग एवं आसान कराए जाते हैं। उसके बाद, लगभग 15 मिनट विभिन्न प्रकार के खेल खिलाए जाते हैं। शारीरिक कार्यक्रमों में समता, दंड संचालन, नियुद्ध इत्यादि भी शामिल रहते हैं। उसके बाद 10 मिनट बौद्धिक कार्यक्रम (गीत, सुभाषित, अमृतवचन, समाचार समीक्षा इत्यादि) सम्पन्न कराए जाते हैं। सबसे अंत में, सभी स्वयंसेवक प्रार्थना करते हैं और ‘भारत माता की जय’ बोलते हुए अप्रत्यक्ष रूप से बहुत सारे गुणों को अपने साथ लेकर समाज में जाते हैं।
बिना बताए होता है प्रशिक्षण :
विद्वान मानते हैं कि अच्छी शिक्षण प्रणाली वही है, जिसमें बच्चे को बताना न पड़े कि उसे क्या सिखाया जा रहा है। संघ शाखा व्यक्ति निर्माण का ऐसा ही केंद्र है, जहाँ स्वयंसेवक खेल-खेल में साहस, अनुशासन, कर्तव्य परायणता, गीत गाते-गाते देशभक्ति, आपस में मेलजोल से एकजुटता सीख जाता है। संघ की शाखा पर ऐसी ही शिक्षण प्रणाली अपनायी जाती है, जहाँ किसी को बताया नहीं जाता कि आज तुम्हें देशभक्ति, सामाजिक समरसता, सद्भाव या सेवा का गुण सिखाया जाएगा। श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगड़ी लिखते हैं कि “देशभक्तिशून्य, जातिभेदग्रस्त, स्वार्थपरायण हिन्दू समाज को डॉक्टर हेडगेवार यदि ऐसा आह्वान करते कि हिन्दुओं, आप में इतने दोष हैं, आइये हमारी शाखा में, मैं आपके दोष हटाकर, आपको देशभक्तिपरिपूर्ण, समतायुक्त और नि:स्वार्थ सेवक के रूप में परिवर्तित करने का दावा करता हूँ तो एक भी व्यक्ति संघस्थान पर कदम नहीं रखता। उलटा उलाहना देता कि भले आए हमें देशभक्ति और निःस्वार्थ सेवाभाव सिखाने वाले। डॉक्टर हेडगेवार समाज का यह मानसशास्त्र जानते थे। अतः उन्होंने लोगों को खेलने के लिए बुलाया। दण्डादि शारीरिक कार्यक्रम करने की शिक्षा दी और इन कार्यक्रमों की ऐसी रचना की कि संघ के इन सामान्य कार्यक्रमों से देवदुर्लभ कार्यकर्ता तैयार हुए”।
खेलों में छिपा है समाजजीवन का संस्कार :
शाखा के खेल केवल मनोरंजन या व्यायाम के लिए नहीं होते। उनमें संस्कार देने की क्षमता है। शाखा के खेल स्वयंसेवक के मन पर संस्कार डालते हैं, जो उसकी वाणी, विचार और व्यवहार में सदा दिखायी देते हैं। एक बार जब श्री गोलवलकर केरल की यात्रा पर थे, तब कुछ किशोर स्वयंसेवकों ने उनकी उपस्थिति में एक खेल खेला। बाद में उन्होंने स्वयंसेवक से पूछा- “इस खेल का नाम क्या है?” लड़के ने जवाब दिया- “दीपक बुझाना”। इस पर श्रीगुरुजी ने एक बड़े स्वयंसेवक से पूछा- “क्या लड़के ने सही नाम बताया?” जब उसने हां में उत्तर दिया तो श्रीगुरुजी ने कहा- “किसी भी खेल का नाम ऐसा नहीं होना चाहिए। हमारी संस्कृति में दीपक बुझाना अशुभ माना जाता है। यहां हम कहते हैं कि ज्ञान का दीपक चमकता रहे। खेलों में भी नाम ऐसे होने चाहिए जो अच्छे संस्कार पैदा करें’’। उसके बाद स्वयंसेवकों ने उस खेल का नाम बदल लिया। इसी प्रकार, एक बार श्रीगुरुजी को सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पूछा कि जो साहस का कार्य करने के लिए हमारे पेशेवर सैनिक भी कतराते हैं, वह आपके स्वयंसेवक कैसे कर जाते हैं, आप उन्हें कौन सी शिक्षा देते हैं; तो श्रीगुरुजी ने उत्तर दिया- “हमारी कबड्डी से यह साहस आता है। संघ की कार्यपद्धति की विशेषता यह है कि यहाँ मैन विथ कैपिटल एम बन जाता है”। संघ की शाखा पर जब स्वयंसेवक एक-दूसरे का हाथ पकड़कर खेलता है, तब उसके भीतर पारिवारिक आत्मीयता की भावना पैदा होती है।
नारों में जीवन का संदेश :
खेल खेलते समय स्वयंसेवक जोश का संचार करने के लिए नारे लगाते हैं- भारत माता की-जय, वन्दे-मातरम्, जय शिवाजी-जय भवानी, अलग है भाषा, अलग है वेश-फिर भी अपना एक देश, संगठन में-शक्ति है, हिन्दू हिन्दू-एक रहेंगे, छुआछूत को-नहीं सहेंगे, हिन्दू हिन्दू-एक रहेंगे, भेदभाव को-दूर करेंगे, अन्न जहां का हमने खाया, वस्त्र जहां के हमने पहने, उसकी रक्षा कौन करेगा-हम करेंगे हम करेंगे इत्यादि। ये नारे स्वयंसेवकों के मन में देश-समाज के प्रति समर्पण की भावना जगाते हैं। आपसी भेदभाव मिटाकर सबको एकसूत्र में बांधते हैं। यही कारण है कि जब महात्मा गांधी संघ की शाखा में पहुँचते हैं तो यह कहे बिना नहीं रहते कि “स्वयंसेवकों का कड़ा अनुशासन, सादगी और छुआछूत की पूर्ण समाप्ति देखकर मैं अत्यंत प्रभावित हुआ”। यह अनुभूति बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर को भी होती है- “मुझे यह देखकर आश्चर्य होता है कि यहाँ पर स्वयंसेवक किसी भी प्रकार के भेदभाव के बिना, एक-दूसरे की जाति जाने बगैर परस्पर भाईचारे से रह रहे हैं”।
गीत, कथा, अमृतवचन से बौद्धिक विकास :
शारीरिक के साथ-साथ स्वयंसेवक का बौद्धिक विकास हो, शाखा के कार्यक्रमों में इसका पाठ्यक्रम भी शामिल है। एकात्मता स्रोत के माध्यम से स्वयंसेवक भारत की गौरवशाली परंपरा का स्मरण करते हैं। महान नायकों के आदर्श को अपने आचरण में उतारने का संस्कार इससे मिलता है। बोध कथा, बड़ी कहानी, प्रेरक प्रसंग इत्यादि से सत्यनिष्ठा, लोक व्यवहार, संवेदनशीलता, परोपकार जैसे गुण स्वयंसेवक के भीतर विकसित होते हैं। संघ के गीतों की रचना भी समयानुकूल होती है। जिस प्रकार का भाव स्वयंसेवकों के मन में चाहिए, वैसे ही गीत रचे एवं गाए जाते हैं। संघ के गीत केवल देशभक्ति का ज्वार पैदा नहीं करते हैं अपितु सामाजिक मुद्दों के प्रति उत्तरदायित्व की भावना भी जगाते हैं। बौद्धिक कार्यक्रमों का बारीकी से अध्ययन करें, तो ध्यान आएगा कि ये कार्यक्रम स्वयंसेवकों को अपनी विरासत से जोड़कर, उस पर गौरव की अनुभूति करना सिखाते हैं। स्वयंसेवकों का इस प्रकार का व्यक्तित्व संघशाखा के विविध शारीरिक एवं बौद्धिक कार्यक्रमों से ही बनता है। इसलिए कहा जाता है कि व्यक्ति निर्माण के लिए शाखा जैसी कोई दूसरी पद्धति है ही नहीं।
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