शनिवार, 1 अगस्त 2026

शोर-शराबे में गुम हुआ छात्रों का हित, विपक्ष के निशाने पर रही हिन्दू मान्यताएं

लोकसभा और राज्यसभा में हंगामेदार चर्चा के बीच आखिरकार परीक्षा सुधार का विधेयक ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ पारित हो गया। देश के करोड़ों युवाओं और छात्रों के भविष्य को देखते हुए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दा था। उम्मीद यह थी कि जब प्रश्न पत्र लीक जैसे गंभीर विषय पर संसद में बहस होगी, तो देश को एक ठोस और सर्वसम्मति वाला समाधान देखने को मिलेगा। लेकिन संसद के दोनों सदनों में जो दृश्य देखने को मिला, वह बेहद निराशाजनक रहा। जो विपक्ष कल तक पर्चा लीक के मुद्दे को लेकर सड़कों से लेकर संसद तक हो-हल्ला मचा रहा था, जब विधेयक पर रचनात्मक चर्चा और सुझाव देने का सही समय आया, तब वह पूरी तरह दिशाहीन नजर आया। बहस का रुख परीक्षा प्रणाली के तकनीकी एवं प्रशासनिक सुधारों पर केंद्रित रहने के बजाय ऐसे विषयों की ओर मोड़ दिया गया, जिनका आम छात्रों की समस्याओं और उनके भविष्य से कोई दूर-दूर तक का लेना-देना नहीं था। विशेष रूप से मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के पास यह एक बड़ा अवसर था कि वह परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी और लीक-मुक्त बनाने के लिए अपने ठोस और व्यावहारिक सुझाव पटल पर रखती। इससे देश की जनता और युवाओं के बीच यह संदेश जाता कि विपक्ष के पास महज विरोध करने के बजाय समस्याओं का समाधान करने का एक स्पष्ट एजेंडा भी है। परंतु इस रचनात्मक भूमिका को निभाने के स्थान पर बहस को धार्मिक प्रतीकों, गोमूत्र और मनुस्मृति जैसे विषयों पर लाकर खड़ा कर दिया गया। 

संसद जैसे गरिमामय मंच पर नीतिगत सुधारों को पीछे छोड़कर ऐसी टिप्पणियां करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए रणनीतिक और वैचारिक दृष्टि से चिंतन का विषय होना चाहिए। विपक्ष के रवैये को देखकर यह भी प्रश्न जनता के मन में आए हैं कि गोमूत्र और मनुस्मृति पर सवाल उठाने वाले विपक्षी दलों के नेता क्या कभी इसी तरह कुरान, बाइबिल, खतना, हलाला और बपतिस्मा पर सवाल उठाएंगे? इसका उत्तर है- नहीं। क्योंकि उनके निशाने पर हिन्दू धर्म, उनकी मान्यताएं एवं परंपराएं हैं। मनुस्मृति के संबंध में मिथ्या बातें कह रहे नेताओं से जब कहा गया कि वे जो कह रहे हैं, उसे प्रमाणित करें, तब उनके पास कोई प्रमाण नहीं था। वहीं, भाजपा के सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने प्रमाण सहित बताया कि मनुस्मृति में ऐसा कहीं भी नहीं लिखा है, जो यहाँ संसद में कहा जा रहा है। वास्तव में मनुस्मृति का उल्लेख करके हिन्दू समाज में आपस में द्वेष बढ़ाने के प्रयास किए जाते हैं। देश की जनता हैरान है कि छात्रों के हितों की जगह विपक्षी नेता गोमूत्र और मनुस्मृति पर चर्चा क्यों कर रहे हैं? 

संसद परिसर में शुक्रवार को जिस तरह श्रीराम मंदिर के दानपात्रों से चोरी के प्रकरण पर नौटंकी की गई, उससे संपूर्ण हिन्दू समाज और संत-महात्माओं में विपक्षी दलों के प्रति गहरी नाराजगी घर कर गई है। श्रीराम मंदिर के दानपात्रों से चोरी होना, सबके लिए दु:खद और हतप्रभ करने वाली घटना थी। इस घटना को वहाँ काम करने वाले कुछ कर्मचारियों ने अंजाम दिया। परंतु विपक्षी सांसदों ने संसद परिसर में नौटंकी करके पुजारियों एवं संत-महात्माओं को चोर के रूप में दिखाकर घोर अपराध किया है। इस घटिया प्रदर्शन को लेकर हिन्दुओं के साथ-साथ साधु-संतों में आक्रोश देखा जा रहा है। इसकी सहज कल्पना की जा सकती है कि भविष्य में इसका बड़ा नुकसान विपक्षी दलों को उठाना पड़ सकता है। जनता के बीच फिर वही प्रश्न है कि इससे पहले कब किसी राजनीतिक दल या सांसदों ने अन्य धर्म-संप्रदायों पर इस तरह की नौटंकी की थी? अपितु, एक संप्रदाय विशेष से जुड़े आतंकियों के लिए आँसू अवश्य बहाए गए।

बहरहाल, लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल सरकार की घेराबंदी करना या हंगामा खड़ा करना नहीं होता, बल्कि एक मजबूत और जिम्मेदार विकल्प प्रस्तुत करना भी होता है। जब देश के युवा एक विश्वसनीय और मजबूत परीक्षा प्रणाली की उम्मीद लगाए बैठे थे, तब संसद का कीमती समय बुनियादी मुद्दों से भटक गया। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि अपने पारंपरिक वोटबैंक को साधने या वैचारिक बयानबाजी के चक्कर में जब-जब राष्ट्रीय महत्व के नीतिगत मुद्दे पीछे छूटते हैं, तब-तब लोकतंत्र और देश की युवा शक्ति का ही नुकसान होता है। यह भी याद रखें कि ऐसा करने से राजनीति दलों का भी नुकसान ही होता है।

सावधान! अब ई20 पर भड़काने की तैयारी

नीट परीक्षा में गड़बड़ी को लेकर हुए कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन की गर्मी अभी शांत भी नहीं हुई है कि आंदोलनजीवियों ने जनता को भ्रमित करने एवं भड़काने के लिए दूसरा विषय खोजना शुरू कर दिया है। पिछले कुछ महीनों से एथनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर एक नकारात्मक नैरेटिव खड़ा करने का प्रयास किया गया है। परिणामस्वरूप, एथनॉल मिश्रित पेट्रोल की नीति को लेकर उठ रही आपत्तियों और राजनीतिक बयानों ने एक बार फिर ऊर्जा संक्रमण की इस प्रक्रिया को व्यापक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। एक तरफ जहां सरकार इसे पर्यावरण संरक्षण, विदेशी मुद्रा की बचत और किसानों की आय बढ़ाने वाले दूरगामी कदम के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों, ट्रांसपोर्ट यूनियनों और आम वाहन चालकों के विरोध प्रदर्शनों ने नीति के व्यावहारिक क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

सोमवार, 27 जुलाई 2026

“यदि अस्पृश्यता (छुआछूत) गलत नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है” – बालासाहब देवरस

संघ शताब्दी वर्ष : हिन्दू एकता एवं समरसता पर बालासाहब के क्रांतिकारी विचार


हिन्दू समाज की एकता और सामाजिक समरसता पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस के विचार अत्यंत स्पष्ट, प्रखर और क्रांतिकारी थे। ‘वसंत व्याख्यानमाला’ का उनका भाषण विश्व के ऐतिहासिक एवं महान भाषणों में शामिल किया जा सकता है। 8 मई, 1974 में पुणे में हुए अपने इस भाषण में छुआछूत (अस्पृश्यता) को लेकर बालासाहब ने जो कहा, वैसा खरा-खरा शायद ही किसी ने बोला हो। अब्राहम लिंकन के प्रसिद्ध विचार- “अगर गुलामी अनैतिक या गलत नहीं है, तो फिर कुछ भी गलत नहीं है”- का उल्लेख करते हुए बालासाहब ने कहा- “अगर छुआछूत गलत नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है”। जातिगत भेदभाव के निर्मूलन के लिए काम करने वाले महानुभाव अक्सर इस ओर या उस ओर खड़े दिखाई देते हैं। उनके विचारों में राजनीति, परस्पर द्वेष और कटुता रहती है। लेकिन बालासाहब के विचारों में स्पष्टता के साथ-साथ आत्मीयता और बंधुता की झलक दिखाई देती है। सामाजिक समरसता पर उनके विचार समाधानमूलक और व्यावहारिक हैं। बालासाहब जी का मानना था कि “विषमता नष्ट करने के प्रयासों में सभी का सहभाग अपेक्षित है। संयम के साथ उत्तम व्यवहार के द्वारा यह प्रयास होंगे तभी उसमें सफलता मिलेगी”।

बुधवार, 22 जुलाई 2026

आंदोलन को बदनाम करते हिंसक प्रदर्शन

अराजक तत्वों ने हड़प लिए छात्रों के जरूरी मुद्दे, उनके मंच पर कब्जाकर अपना नैरेटिव चलाने का किया प्रयास


देश में प्रमुख परीक्षाओं की पारदर्शिता और लाखों युवाओं का भविष्य अत्यंत संवेदनशील विषय हैं। परीक्षाओं के आयोजन में लगातार हो रही गड़बड़ियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार को इस पर कोई ठोस रणनीति बनानी ही चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि नीट परीक्षा को लेकर उठी चिंताएं पूरी तरह उचित हैं। एक अभिभावक की भाँति उन्होंने युवाओं को आश्वस्त किया है कि उनके भविष्य से खिलवाड़ करने वाले किसी भी दोषी को छोड़ा नहीं जाएगा और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत कठोर कार्रवाई की जाएगी। उल्लेखनीय है कि सरकार ने नीट परीक्षा में हुई गड़बड़ी पर संज्ञान लेकर उसका फिर से व्यवस्थित आयोजन कराया है। इसके बावजूद, इस संवेदनशील मुद्दे की आड़ में जिस तरह दिल्ली की सड़कों पर हिंसा, उपद्रव और ‘चलो संसद’ के नाम पर अराजकता फैलाई गई, वह देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

“जिन्होंने हेडगेवारजी को नहीं देखा, वे बालासाहब को देख लें”

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस के लिए कहा जाता था कि वे संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की प्रतिमूर्ति थे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस उपाख्य बालासाहब देवरस संघ की पहली शाखा के स्वयंसेवक थे। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर के मोहिते बाड़े में जो शाखा लगाई थी, बालासाहब उसी शाखा के स्वयंसेवक थे। डॉक्टर साहब के संपर्क में आने के बाद 1927 में केवल 11 वर्ष की आयु में बालासाहब देवरस ने शाखा जाना प्रारंभ कर दिया। संघ शिल्पी डॉक्टर साहब ने स्वयं अपने हाथों से बालासाहब के व्यक्तित्व को गढ़ा और उन्हें प्रशिक्षित किया। उन्होंने संघ रूपी बीज बालासाहब के हृदय में बोया। जिस प्रकार छत्रपति शिवाजी महाराज ने ‘हिन्दवी स्वराज्य’ का सपना अपने मित्रों के हृदय में जैसे का तैसा उतार दिया था, उसी प्रकार डॉक्टर साहब ने भी स्वयंसेवकों के पहले समूह के मन-मस्तिष्क में संघ की विराट अवधारणा को उतार दिया था। देवरस जी ने डॉक्टर साहब की आँखों से ही संघ को देखा, उनकी दृष्टि के अनुरूप ही संघ की सृष्टि का विकास एवं विस्तार किया। 12 वर्ष से लेकर 70 वर्ष की आयु तक बालासाहब ने एक तपस्वी और सच्चे स्वयंसेवक की भाँति अपना जीवन जिया। उन्होंने सबके सामने उदाहरण प्रस्तुत किया कि राष्ट्र के लिए किस प्रकार जिया जाता है। संघ के स्वयंसेवक बालासाहब में संघ सृष्टि के निर्माता डॉक्टर साहब की छवि देखते थे। वर्ष 1943 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रशिक्षण शिविर (संघ शिक्षा वर्ग) पुणे में चल रहा था, जहाँ एक दिन बालासाहब देवरस का बौद्धिक होना था। बौद्धिक से पहले वक्ता का परिचय कराने के लिए तत्कालीन सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ खड़े हुए। बालासाहब के परिचय में उन्होंने कहा कि “आपमें से कइयों ने डॉ. हेडगेवारजी को नहीं देखा होगा। अगर आप बालासाहब देवरस को देखेंगे तो आपके सामने डॉ. हेडगेवारजी खड़े नजर आएंगे”।

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

मातुश्री का दर्शन है ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’

पुस्तक चर्चा : पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होल्कर के जीवन के सभी पहलुओं को देखने के लिए पढ़ें यह पुस्तक


“सनातन संस्कृति में सर्वश्रेष्ठ धर्म है ‘मानव धर्म’। मानवता की स्थापना करना ही धर्म की स्थापना करना है। देवी अहिल्याबाई होल्कर ने धर्म की स्थापना हेतु अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया। समस्त प्रजा को वात्सल्य से सींचने वाली देवी अहिल्याबाई होल्कर पूरे मालवा की मातुश्री कहलाई। त्याग, तपस्या, समर्पण, अनुशासन एवं न्याय- मानव धर्म के मूल आधार हैं। इन्हीं आधारभूत कर्तव्यों का पालन समाज में समरसता और व्यवस्था को स्थापित करता है। अहिल्याबाई का संपूर्ण जीवन न्याय प्रियता, सद्चरित्र, संस्कार अनुशासन और धर्म के स्तंभों पर मजबूती से खड़ा है”। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. साधना बलवटे की पुस्तक ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ का केंद्रीय भाव यही है। नाट्यरूप में प्रस्तुत पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर के जीवन से उन्होंने भारत की बेटी के संघर्ष, साहस और नेतृत्व की कहानी सुनाई है। यह गाथा आपको प्रारंभ से अंत तक बाँधे रखती है, फिर भले ही आपने देवी अहिल्याबाई की कहानी पहले से सुन भी क्यों न रखी हो। पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर के 300वें जयंती वर्ष में यह पुस्तक अवश्य पढ़ी जानी चाहिए। इस पुस्तक की एक ओर विशेषता है कि इसका पाठक वर्ग बहुत विशाल है यानी हर कोई इस पुस्तक को पढ़ सकता है।

सोमवार, 13 जुलाई 2026

बालासाहब ने शाखा को बनाया ‘अखंड साधना’ का केंद्र

संघ शताब्दी वर्ष : संघ कार्य के विस्तार और शाखाओं के सुदृढ़ीकरण के शिल्पी थे बालासाहब देवरस, उनकी पहल पर ही सातों दिन शाखा लगना शुरू हुई, सुबह की शाखा भी उनकी देन है


संघ कार्य के विस्तार, शाखाओं के विकास एवं सुदृढ़ीकरण में तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस (मधुकर दत्तात्रेय देवरस) का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला रहा है। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार अकसर स्वयंसेवकों से कहते थे कि शाखा अच्छी चलेगी तो समाज के सब काम होंगे। समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में काम करने के लिए राष्ट्रीय विचार से ओत-प्रोत कार्यकर्ता शाखा से ही तैयार होंगे। इसलिए अच्छी शाखा चलना जरूरी है। एक बार युवकों के साथ बातचीत के दौरान डॉक्टर साहब ने प्रश्न किया कि “आदर्श शाखा का लक्षण क्या है?” इसके उत्तर में बालासाहब ने जो कहा, वह उनके विचारों की स्पष्टता को दर्शाता है। उन्होंने कहा- “संघ कार्य को अपना जीवित कार्य समझकर, संघ कार्य के लिए सारा समय लगाने के लिए प्रस्तुत युवक जिस शाखा से विपुल संख्या में खड़े होंगे, ऐसी शाखा को मेरी दृष्टि से ‘आदर्श शाखा’ कहना उचित होगा”। संघ कार्य को राष्ट्रव्यापी बनाना है, तो उसके लिए जरूरी है कि आदर्श शाखाएं खड़ी हों। डॉक्टर साहब की शाखाओं की संकल्पना को धरातल पर उतारने और शाखाओं का व्यापक नेटवर्क खड़ा करने में बालासाहब देवरस ने जो संगठनात्मक कौशल दिखाया, वह अनुकरणीय है। बालासाहब की संगठन कुशलता से डॉक्टर साहब भली प्रकार परिचित थे। इसलिए उन्होंने नागपुर में संघ कार्य की जिम्मेदारी बालासाहब को सौंपी थी। संघ के कार्य को नागपुर से बाहर लेकर जाने के लिए यह आवश्यक था कि नागपुर में अच्छा काम चले। नागपुर के कार्यवाह के रूप में बालासाहब ने जिस प्रकार से संघ कार्य को आधार दिया, उस आधार पर ही आगे चलकर संघ कार्य राष्ट्रव्यापी हुआ। 

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