सोमवार, 22 जून 2026

करोड़ों देशभक्त नागरिकों के दिलों में है आरएसएस का पंजीयन

संघ शताब्दी वर्ष : भारत का संविधान अपने नागरिकों को संगठन, आंदोलन, विचार समूह बनाने का अधिकार देता है। इसके लिए राज्य से पंजीकरण कराना अनिवार्य नहीं है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पंजीकृत क्यों नहीं है? यह अपने आय-व्यय का हिसाब-किताब क्यों नहीं देता है? आरएसएस पारदर्शिता नहीं रखता है। ये ऐसे सवाल हैं, जो संघ को बदनाम करने या उसके प्रति समाज में संदेह पैदा करने के लिए अकसर उछाले जाते हैं। हालांकि, इन सवालों का कोई औचित्य नहीं है। समाज से लेकर न्यायालय तक इन्हें खारिज कर चुके हैं। मजेदार और हास्यास्पद बात यह है कि जो लोग संविधान लहराते हुए घूम रहे हैं, उन्हें यह भी नहीं पता है कि संविधान ही यह अधिकार देता है कि भारत के नागरिक बिना किसी पंजीयन के संगठन, समिति, समूह बनाकर समाज में काम कर सकते हैं। इसलिए कहा जाता है कि संविधान लहराने की वस्तु नहीं है, अपितु उसका अध्ययन करना चाहिए और पालन भी। लेकिन नहीं, उन्हें तो प्रोपेगेंडा खड़ा करने में ही आनंद आता है। जरा सोचिए, यदि आरएसएस के लिए पंजीयन अनिवार्य होता तब क्या कांग्रेस बिना पंजीयन संघ को इतने वर्ष चलने देती? कांग्रेस की सरकारों ने संघ को तीन बार प्रतिबंधित किया लेकिन उसको पंजीयन के लिए कभी बाध्य नहीं किया। महात्मा गांधी की हत्या के झूठे आरोप लगाकर जब संघ पर प्रतिबंध लगाया था, तब उसके विरुद्ध स्वयंसेवकों के राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा कर दिया। सरकार को बिना शर्त संघ से प्रतिबंध हटाना पड़ा। सरकार ने अपने आपको शर्मिंदगी से बचाने के लिए संघ से उसके संविधान की लिखित कॉपी तो मांगी, लेकिन उस समय भी पंजीयन नहीं माँगा। यह स्थिति तब है जबकि उस समय की सरकार येन-केन-प्रकारेण संघ को कुचलना या उस पर अपना नियंत्रण चाहती थी। बहरहाल, उसके बाद भी सरकार ने कभी संघ का पंजीयन नहीं माँगा। हाँ, संघ को रोकने के सारे हथकंडे अवश्य अपनाए गए, आज भी अपनाए जा रहे हैं। लेकिन समाज का विश्वास जीतकर संघ अजेय शक्ति के रूप में आगे बढ़ रहा है। इस मामले में सच यह है कि आज भी पंजीयन की माँग नहीं होती अपितु इस फर्जी प्रश्न की आड़ में अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने का प्रयास किया जाता है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संदर्भ में प्रारंभ से यह स्पष्ट किया जाता रहा है कि संघ भारत के सभी कानूनों का सम्मान करता है और उनके दायरे में रहकर ही कार्य करता है। 

देखें यह वीडियो : संघ के बारे में फैलाए गए भ्रमों का जवाब | ध्येय पथ

एक संस्था नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलन : 

संघ के पंजीकृत संगठन न होने के कई कारण हैं। उनमें से एक है कि संघ स्वयं को समाज में अलग से किसी संगठन के तौर पर नहीं देखता है अपितु संघ तो स्वयं को संपूर्ण समाज का संगठन मानता है। जब समाज का पंजीयन आवश्यक नहीं है तब संघ के पंजीयन का प्रश्न क्यों? दूसरी बात, संघ एक संस्था या संगठन के रूप में प्रारंभ नहीं हुआ अपितु आंदोलन के रूप में प्रारंभ हुआ था। इसलिए जब संघ शुरू किया गया, तब न तो इसका कोई नाम था और न इसे चलाने के लिए कोई समिति थी। 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में कुछ युवाओं के साथ इसकी शुरुआत की। उद्देश्य केवल एक था- समाज का संगठन, व्यक्ति निर्माण और भारत की सर्वांगीण स्वतंत्रता। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत अकसर कहते हैं कि “जिन अंग्रेजों के विरुद्ध संघ प्रारंभ हुआ था, उनके पास जाकर ही संघ का पंजीयन कराते क्या? संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े थे और अंग्रेजों की उन पर कड़ी नजर थी। इसलिए उन्होंने जानबूझकर संघ को 1860 के अंग्रेजों के ‘सोसायटी पंजीकरण अधिनियम’ के तहत पंजीकृत कराने से परहेज किया”। याद रहे कि वर्तमान समय में संघ इकलौता संगठन नहीं है, जिसका पंजीयन नहीं है, अपितु देश में अनेक संस्थाएं, समितियां, समूह और अध्ययन मंडल हैं, जो भारत के संविधान के प्रकाश में बगैर पंजीयन के श्रेष्ठ सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं। याद रहे कि संघ में कोई भी व्यक्ति सदस्यता फॉर्म भरकर औपचारिक सदस्य नहीं बनता था, न ही नियमित शुल्क देकर सदस्यता ली जाती है। स्वयंसेवक शाखा में आते हैं, प्रशिक्षण लेते हैं और सामाजिक कार्यों में भागीदारी करते हैं। इसलिए संघ की संरचना आरंभ से ही एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन की रही, न कि किसी पंजीकृत संस्था की।

भारत का संविधान क्या कहता है : 

संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ग) हर नागरिक को संगठन, यूनियन या सहकारी समितियां बनाने का मौलिक अधिकार देता है। इसके लिए राज्य से पूर्व-पंजीकरण कराना अनिवार्य नहीं है। किसी संगठन और संस्था को सरकारी सहायता प्राप्त करने के लिए पंजीयन की आवश्यकता होती है। संस्था की पहचान एवं अस्तित्व के लिए पंजीयन जरूरी नहीं है। संघ न तो सरकार से और न ही किसी बाहरी संस्था से फंड लेता है, वह तो अपने स्वयंसेवकों की गुरु दक्षिणा से चलता है। इसलिए संविधान के अनुसार उसे पंजीयन की कतई आवश्यकता नहीं है।

क्या कहते हैं न्यायालय :

संघ विरोधियों ने इनकम टैक्स के बहाने हाथ घुमाकर संघ का कान पकड़ने का प्रयास किया था। लेकिन वह प्रयास भी संघ के पक्ष में ही गया। विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता आलोक कुमार बताते हैं कि “इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने 1967-68 और 1975-76 में असेसिंग ऑफिसर के जरिए आदेश जारी किए थे कि आरएसएस को अपनी आय पर टैक्स देना होगा। दोनों ही मामलों में हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि ‘म्यूचुअल ट्रस्ट कानूनों’ के तहत ‘गुरु दक्षिणा’ से होने वाली आय पर इनकम टैक्स नहीं लगता”। पटना उच्च न्यायालय के सामने यह भी रखा गया कि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने 19 दिसंबर 1978 के एक पत्र में स्पष्ट किया था कि आरएसएस को उसके सदस्यों से मिलने वाली गुरु दक्षिणा को पारस्परिकता के सिद्धांत के आधार पर कर-मुक्त माना जाएगा। पटना उच्च न्यायालय ने फरवरी 1994 में आरएसएस के पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसे आज तक विरोधी चुनौती नहीं दे सके हैं। 

संघ की अन्य संस्थाएं विधिवत पंजीकृत हैं : 

संघ के स्वयंसेवकों ने जब विभिन्न क्षेत्रों में कार्य प्रांरभ किया, कार्यालय बनाएं, भवन खड़े किए, तो उनको संचालित करने के लिए बाकायदा पंजीकृत संस्थाएं खड़ी की हैं। उदाहरण के तौर पर, सेवा के क्षेत्र में कार्यरत सेवा भारती एक पंजीकृत संस्था है। मजदूरों के क्षेत्र में कार्यरत भारतीय मजदूर संघ भी पंजीकृत है। ये संस्थाएं अपने आय-व्यय का सारा हिसाब सरकार को सौंपती हैं। कुछ नासमझ दिल्ली में बने संघ कार्यालय को लेकर बहुत प्रश्न खड़े करते हैं। वह कार्यालय भी केशव स्मारक समिति का भवन है, जो एक पंजीकृत संस्था है। कार्यालय के निर्माण का संपूर्ण विवरण केशव स्मारक समिति के पास उपलब्ध है। जरा आँखें खोलकर देखेंगे तो दिखेगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अस्तित्व, इसकी कार्यप्रणाली और फंडिंग मॉडल कोई रहस्य नहीं है। सबकुछ पारदर्शी है। न्यायालयों, आयकर अपीलीय अधिकरणों और सरकारों ने कई बार इसकी समीक्षा की है और हर बार इसे एक वैध सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में मान्यता दी है। बिना ठोस कानूनी आधार के संघ के पंजीकरण पर सवाल उठाना केवल राजनीतिक बहस का हिस्सा तो हो सकता है, लेकिन यह संगठन की वैधानिकता या उसकी संवैधानिक स्वतंत्रता को खंडित नहीं करता। इस प्रकार के वितंडावाद को समाज बहुत पहले ही खारिज कर चुका है। इसलिए इस मामले में विरोधियों को गाल बजाने के अलावा और कुछ हासिल नहीं होगा। 

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 21 जून, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

शनिवार, 20 जून 2026

श्रीगुरुजी के सरसंघचालक बनने की कहानी

संघ शताब्दी वर्ष : “सरसंघचालक का दायित्व विक्रमादित्य के सिंहासन जैसा है। अगर कोई अज्ञानी लड़का भी इस पर बैठता है, तो वह भी इस पर बैठकर एक बराबर न्याय करेगा” - श्रीगुरुजी


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (डॉक्टर साहब) के बाद इस राष्ट्रीय विचार के आंदोलन की बागडोर कौन संभालेगा? अगला सरसंघचालक कौन होगा? यह प्रश्न जब किसी के मन में भी नहीं आया था, तब से डॉक्टर साहब ने सरसंघचालक के लिए योग्य व्यक्ति की खोज प्रारंभ कर दी थी। यह बहुत आवश्यक था कि संघ का नेतृत्व ऐसे व्यक्तित्व को सौंपा जाए, जिसके प्रति श्रद्धा हो। जिसके नेतृत्व में संघ सरिता का वेग बढ़े, न कि उसमें बहता पानी ही सूख जाए। डॉक्टर साहब की आँखों के सामने से ऐसे अनेक संगठनों की कहानियां गुजर रही थीं, जो एक व्यक्ति की संकल्पना के साथ शुरू हुए और उनके जाने के साथ ही धुंधले पड़ गए। हालांकि, डॉक्टर साहब ने राष्ट्रीय आंदोलन की जो कहानी लिखी थी, उसके बीज उन्होंने अनेक लोगों के मन में बो दिए थे। अब भारत को परम वैभव पर पहुँचाने का संघ का सपना केवल डॉक्टर साहब का सपना नहीं रह गया था, यह सपना सबका अपना सपना बन गया था। डॉ. हेडगेवार व्यक्तियों के बड़े पारखी थे। कोई हीरा व्यापारी भी असली हीरा पहचानने में धोखा खा सकता है लेकिन डॉक्टर साहब व्यक्ति की पहचान में सिद्ध थे। संन्यास जीवन से वापस सामाजिक क्षेत्र में लौटे माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ को अपना उत्तरदायित्व सौंपने का निर्णय वे अपने मन में कर ही चुके थे। डॉक्टर साहब ने संघ में सामूहिक निर्णय की कार्यपद्धति का निर्माण किया था, इसलिए उन्होंने अपने निर्णय को संघ पर थोपा नहीं अपितु उस समय के अन्य दायित्ववान कार्यकर्ताओं से भी इस संबंध में परामर्श किया। श्रीगुरुजी के संबंध में जो विचार डॉक्टर साहब के थे, अन्य साथियों के मन में भी उन्होंने वही भाव पाया।

सोमवार, 15 जून 2026

अपने समय से संवाद का नाम है ‘संजय उवाच’

मीडिया प्राध्यापक एवं लेखक प्रो. संजय द्विवेदी की नई पुस्तक ‘संजय उवाच’ उनके चुनिंदा और सारगर्भित भाषणों का उत्कृष्ट संग्रह है। अकादमिक जगत से लेकर सार्वजनिक कार्यक्रमों में उन्होंने जो व्याख्यान दिए, उनको पाठकों के लिए संपादित कर पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया है। ज्यादातर व्याख्यान मीडिया, भाषा और शिक्षा के मुद्दों पर केंद्रित हैं। इसलिए यह पुस्तक मीडिया के विद्यार्थियों एवं इस क्षेत्र में रुचि रखनेवालों को अवश्य ही पढ़नी चाहिए। जिस दौर में मीडिया को लेकर अनेक प्रकार की बहस हवा में तैर रही हैं, तब उस बहस में भारतीय दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप प्रो. संजय द्विवेदी का नजर आता है। संवाद से सुंदर बनेगी दुनिया,  जड़ों की ओर लौटे मीडिया और जरूरी है मीडिया का भारतीयकरण- ये व्याख्यान मीडिया पर चल रही बहस को सार्थक दिशा देने का प्रयास हैं। इसके अलावा इस पुस्तक में भारत के नायकों, साहित्यकारों और समसामयिक विमर्श पर भी सारगर्भित विचार पढ़े जा सकते हैं। एक पंक्ति में कहें तो, इस पुस्तक में संकलित व्याख्यान पत्रकारिता, समाज, शिक्षा, भाषा और आज के समाज के विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर एक सार्थक और सकारात्मक विमर्श प्रस्तुत करते हैं। प्रो. संजय द्विवेदी ने अपने समय के साथ जो संवाद किया है, उसको संकलित और संपादित करके ‘संजय उवाच’ के रूप में अपने पाठकों के सामने प्रस्तुत कर दिया है। यह एक प्रकार से प्रो. द्विवेदी के बौद्धिक हस्तक्षेप का दस्तावेजीकरण है।

मंगलवार, 9 जून 2026

विश्व का नेतृत्व करेगा संगठित भारत

संघ शताब्दी वर्ष : सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और मुख्य अतिथि कुमार मंगलम बिरला ने दिखाई भविष्य के भारत की तस्वीर, वर्तमान की तैयारियों की ओर किया संकेत

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता विकास वर्ग-2 के समापन समारोह में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और मुख्य अतिथि प्रसिद्ध उद्योगपति एवं पद्मभूषण से सम्मानित कुमार मंगलम बिरला के वक्तव्य भविष्य के भारत की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं, जो स्वयं सशक्त और आत्मनिर्भर होकर विश्व बंधुत्व की भावना का प्रवर्तक बनेगा। जिस समय दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी-बड़ी शक्तियों के बीच संघर्ष चल रहा है, शांति की कोई राह दिखाई नहीं देती, तब भारत का दर्शन सबका मार्ग प्रशस्त कर सकता है। दुनिया को सुख-शांति से जीना है, तब उसे भारत की ओर देखना ही होगा। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने उचित ही कहा कि “भारत का समय आ गया है। कलह और स्वार्थ में फँसकर लड़खड़ाती हुई इस दुनिया को आज केवल भारत की ही आवश्यकता है”। भारत दुनिया को इस कलह से बाहर निकाल सकता है, उसके लिए सबसे पहले हमें अपने देश को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना पड़ेगा। दुनिया भी उसी के सत्य को सुनती है, जो शक्ति सम्पन्न होता है।

सोमवार, 8 जून 2026

रजनीश अग्रवाल: पत्रकारिता के प्रांगण से राज्यसभा के पटल तक

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के प्रांगण से पत्रकारिता की पढ़ाई करके राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय रहे पूर्व विद्यार्थी रजनीश अग्रवाल अब राज्यसभा के सम्मानित सदस्य होंगे। भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें मध्यप्रदेश से देश की सबसे बड़ी पंचायत के उच्च सदन हेतु अपना उम्मीदवार बनाया है। विश्वविद्यालय के लिए यह गौरव की बात है कि उसके विद्यार्थी दादा माखनलाल चतुर्वेदी के आंगन में संचार कौशल सीखकर विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। रजनीश अग्रवाल को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया जाना यह संदेश भी देता है कि राजनीतिक क्षेत्र में बौद्धिक क्षमता, वैचारिक स्पष्टता और उत्कृष्ट संचार कौशल वाले नेताओं को महत्व दिया जा रहा है। रजनीश अग्रवाल का व्यक्तित्व एक राजनेता से कहीं अधिक एक कुशल रणनीतिकार और प्रखर संचारक का है, जिसकी जड़ें पत्रकारिता के मजबूत धरातल से जुड़ी हैं।

शुक्रवार, 5 जून 2026

स्कूल की छुट्टियां : नानी का घर बनाम गैजेट्स की दुनिया

ग्रीष्मकालीन अवकाश : सीखने, समझने और निखरने का उत्तम अवसर


गर्मी की छुट्टियों की प्रतीक्षा किसे नहीं होती है। भले ही समय बदल गया है, पीढ़ी बदल गई है, लेकिन गर्मी की छुट्टियों को लेकर रोमांच कम नहीं हुआ है। छुट्टियों के नाम से आज भी हमारे चेहरों पर एक प्यारी-सी मुस्कान तैर जाती है। हर बच्चे के मन में वार्षिक परीक्षा के बाद आने वाली लंबी छुट्टियों को लेकर अपने-अपने सपने होते हैं। हालांकि इन सपनों या कहें योजनाओं में बड़ा बदलाव आया है। बदलते समय ने हमारे जीने के तरीके को जितना बदला है, उतना ही असर इन छुट्टियों के आनंद पर भी डाला है। एक वह दौर था जब अप्रैल का महीना आते ही मन किसी पंछी की तरह उड़ने को बेताब हो जाता था। फुर्र से उड़कर नानी के आंगन, वहाँ से दादी के घर। खेत-खलियान। नीम की छांव। चाचा के साथ मटरगस्ती। मामा के साथ नदी में छलाँग। भाई-बहनों के साथ अष्टा-चंगा, गिल्ली-डंडा, छुपन-छुपाई, सांप-सीढ़ी और न जाने कितने देशी खेल। एक से मन भरे, दूसरे में आए आनंद। रात में तारों की छांव में सोना। नाना-नानी की किस्सागोई में सिनेमा से बढ़कर मनोरंजन। रोज नई कहानी। नया संस्कार। आम के आम, गुठलियों के दाम। छुट्टियों का आनंद भी और समाज जीवन की शिक्षा-संस्कार भी। एक आज का दौर है, जहाँ छुट्टियां तो हैं, लेकिन उनका रंग-रूप पूरी तरह बदल चुका है। नानी-दादी का घर तो है लेकिन हम जाते चार दिन के लिए ही हैं। मामा, चाचा-ताऊ के बच्चे यानी हमारे भाई-बहनों की मंडली तो है लेकिन हम देशी खेल नहीं खेलते, गैजेट्स में डूबे रहते हैं। जो हम खेल-खेल में सीख लेते थे, उसके लिए हॉबी क्लासेस लगा रहे हैं। कुछ समय तो समर कैम्प भी जीम लेता है। जो आनंद हमें नानी-दादी के घर आता था, उसे मोटी फीस देकर भी हम समर कैम्प में नहीं पा सकते। हालांकि, इस सबका अभिप्राय यह नहीं है कि समर कैम्प और हॉबी क्लासेस का महत्व नहीं है। बदली परिस्थितियों में यह हमारी छुट्टियों को उपयोगी बनाते हैं।

बुधवार, 3 जून 2026

खेत बचाओ अभियान : मिट्टी बचेगी, तभी बचेगा किसान और देश का भविष्य

केन्द्र सरकार ने मिट्टी के संरक्षण के लिए जनांदोलन खड़ा करने का संकल्प लिया है। यह अत्यंत आवश्यक आंदोलन है, जिसे केवल सरकार के प्रयास से नहीं अपितु जनता (विशेषकर किसानों) की भागीदारी एवं समझदारी से ही सफल बनाया जा सकता है। मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के ग्राम रमासिया से केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राष्ट्रव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ की घोषणा की है। स्मरण रहे कि कृषि मंत्री स्वयं भी कृषक परिवार से आते हैं, इसलिए खेती के बारे में उनकी समझ अधिक जमीन और वास्तविक है। आज कृषि भूमि की जो स्थिति है, उसको लेकर सब ओर अनुत्तरित चिंता पसरी दिखायी देती है।