ग्रीष्मकालीन अवकाश : सीखने, समझने और निखरने का उत्तम अवसर
गर्मी की छुट्टियों की प्रतीक्षा किसे नहीं होती है। भले ही समय बदल गया है, पीढ़ी बदल गई है, लेकिन गर्मी की छुट्टियों को लेकर रोमांच कम नहीं हुआ है। छुट्टियों के नाम से आज भी हमारे चेहरों पर एक प्यारी-सी मुस्कान तैर जाती है। हर बच्चे के मन में वार्षिक परीक्षा के बाद आने वाली लंबी छुट्टियों को लेकर अपने-अपने सपने होते हैं। हालांकि इन सपनों या कहें योजनाओं में बड़ा बदलाव आया है। बदलते समय ने हमारे जीने के तरीके को जितना बदला है, उतना ही असर इन छुट्टियों के आनंद पर भी डाला है। एक वह दौर था जब अप्रैल का महीना आते ही मन किसी पंछी की तरह उड़ने को बेताब हो जाता था। फुर्र से उड़कर नानी के आंगन, वहाँ से दादी के घर। खेत-खलियान। नीम की छांव। चाचा के साथ मटरगस्ती। मामा के साथ नदी में छलाँग। भाई-बहनों के साथ अष्टा-चंगा, गिल्ली-डंडा, छुपन-छुपाई, सांप-सीढ़ी और न जाने कितने देशी खेल। एक से मन भरे, दूसरे में आए आनंद। रात में तारों की छांव में सोना। नाना-नानी की किस्सागोई में सिनेमा से बढ़कर मनोरंजन। रोज नई कहानी। नया संस्कार। आम के आम, गुठलियों के दाम। छुट्टियों का आनंद भी और समाज जीवन की शिक्षा-संस्कार भी। एक आज का दौर है, जहाँ छुट्टियां तो हैं, लेकिन उनका रंग-रूप पूरी तरह बदल चुका है। नानी-दादी का घर तो है लेकिन हम जाते चार दिन के लिए ही हैं। मामा, चाचा-ताऊ के बच्चे यानी हमारे भाई-बहनों की मंडली तो है लेकिन हम देशी खेल नहीं खेलते, गैजेट्स में डूबे रहते हैं। जो हम खेल-खेल में सीख लेते थे, उसके लिए हॉबी क्लासेस लगा रहे हैं। कुछ समय तो समर कैम्प भी जीम लेता है। जो आनंद हमें नानी-दादी के घर आता था, उसे मोटी फीस देकर भी हम समर कैम्प में नहीं पा सकते। हालांकि, इस सबका अभिप्राय यह नहीं है कि समर कैम्प और हॉबी क्लासेस का महत्व नहीं है। बदली परिस्थितियों में यह हमारी छुट्टियों को उपयोगी बनाते हैं।
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| यह आलेख विवेकानंद केन्द्र की मासिक पत्रिका 'केन्द्र भारती' के मई-2026 अंक में कवर स्टोरी के रूप में प्रकाशित हुआ है। |
दादी-नानी के घर का वो सुनहरा बचपन :
अगर हम अपने बचपन की ओर पलटकर देखें, तो गर्मी की छुट्टियों का सीधा-सा अर्थ होता था- नानी या दादी का घर। परीक्षाएं खत्म होते ही टिकट बुक होना, रेलगाड़ी या बस के सफर का वह रोमांच। स्टेशन पर मामा या चाचा का इंतजार करना, यह किसी उत्सव से कम नहीं था। पूरे तीन महीने की छुट्टियां आनंद में बीतती थीं। वहाँ पहुंचते ही भाई-बहनों की एक पूरी फौज का मिलना, दोपहर की चिलचिलाती धूप में छुपकर आम के बागों में जाना, कच्चे आम (कैरी) तोड़कर नमक-मिर्च लगाकर खाना, यही हमारा सबसे बड़ा एडवेंचर था। तब वीडियो गेम नहीं थे, लेकिन गिल्ली-डंडा, लुका-छिपी, सांप-सीढ़ी, लूडो, शतरंज और कैरम ने हमें कभी बोरियत का अहसास नहीं होने दिया। रात को आंगन या छत पर पानी छिड़क कर खटिया बिछाना, तारों से भरे आसमान को देखते हुए दादी-नानी से राजा-रानी और परियों की कहानियां सुनना और एक मीठी सी नींद की गोद में चले जाना... वह एक अलग ही दुनिया थी। आज भी जब हम उस दौर को याद करते हैं, तो वह निश्छल आनंद हमें भीतर तक रोमांचित कर देता है। अपनों के साथ समय बिताने से, रिश्तों में जो आत्मीयता आती थी, वह जीवनभर चलती थी।
बदलते परिवेश में छुट्टियों का नया स्वरूप :
आज के परिवेश में छुट्टियों का अर्थ पूरी तरह से बदल गया है। अब नानी के आंगन की जगह ‘समर कैम्प’ ने ले ली है। आज माता-पिता इस बात को लेकर अधिक चिंतित रहते हैं कि इन दो महीनों में बच्चा क्या नया सीख सकता है। कोडिंग क्लासेस, रोबोटिक्स, पर्सनैलिटी डेवलपमेंट और हॉबी क्लासेस के टाइम-टेबल में बच्चों की छुट्टियां भी एक रूटीन बनकर रह गई हैं। लगता ही नहीं कि छुट्टियां लगी हैं। स्कूल की जगह ये हॉबी क्लासेस ले लेती हैं। हम यह भूल गए हैं कि अपनों के साथ रहकर भी बच्चे बहुत कुछ सीखते थे। हम जीवन के जरूरी सबक सीखते थे। पारिवारिक और जीवन मूल्य अपने आप ही हमारे आचरण में जुड़ते जाते थे। अपनी सांस्कृतिक विरासत से भी परिचित होते थे। मुझे याद है कि इन्हीं दिनों में गाँव में रामलीला और रासलीला का मंचन होता था। रात में रामलीला देखते और दिन में अपने दोस्तों के साथ उसके मंचन को चौपाल पर दोहराते। कब राम-लक्ष्मण के किरदार हमारे भीतर उतर आते, पता ही नहीं चलता था। श्रीमद्भागवत कथाओं के आयोजन का अवसर भी यही होता था।
आज के दौर में टेलीविजन, स्मार्टफोन, आईपैड और डिजिटल गेम्स ने ऐसा मायावी संसार रच दिया है, बच्चे उसमें उलझ गए हैं। मस्ती का सारा समय स्क्रीन टाइम में बदल गया है। अब बच्चे धूप में पसीना बहाने के बजाय एसी कमरों में बैठकर ऑनलाइन मल्टीप्लेयर गेम खेलना ज्यादा पसंद करते हैं। चार बच्चे एक साथ इकट्ठे भी होते हैं, तो वह स्मार्टफोन पर ऑनलाइन गेम खेलना ही अधिक पसंद करते हैं। इसके अलावा हाई लाइफ स्टाइल दिखाने की होड़ में विदेश या किसी महंगे रिसॉर्ट में छुट्टियां बिताकर सोशल मीडिया पर तस्वीरें डालने का अभ्यास भी बढ़ गया है।
क्या आज के बच्चे पहले वाले आनंद से अछूते हैं :
यह एक ऐसा सवाल है जो हर उस व्यक्ति के मन में उठता है जिसने 80 या 90 के दशक की गर्मियां जी हैं। अगर सच्चाई और बेबाकी से कहा जाए, तो हाँ, आज के बच्चे उस नैसर्गिक आनंद से बहुत हद तक अछूते हैं। उन्हें सुख-सुविधाएं तो हमसे कई गुना ज्यादा मिल रही हैं, लेकिन वो स्वतंत्रता नहीं मिल रही जो हमें हासिल थी। बिना घड़ी देखे खेलने की स्वतंत्रता, मिट्टी में सने होने पर भी बेफिक्र रहने की स्वतंत्रता और संयुक्त परिवार के उस शोरगुल और प्यार को महसूस करने की स्वतंत्रता। आज का बच्चा आभासी तरीके में तो दुनिया भर के लोगों से जुड़ा है, लेकिन चचेरे-ममेरे भाई-बहनों के साथ होने वाली वो छोटी-छोटी तकरारें और गहरे भावनात्मक जुड़ाव उससे कहीं पीछे छूट गए हैं।
हालांकि, यह भी समझने की बात है कि हर दौर का अपना एक अलग रंग होता है। आज के बच्चों का आनंद उनके गैजेट्स और नई तकनीक में है, जिसे पूरी तरह गलत भी नहीं कहा जा सकता। लेकिन, जब हम अपनी पुरानी स्मृतियों के झरोखे से झांकते हैं, तो यह बात पूरी तरह सच साबित होती है कि जो सुकून नानी की कहानियों और आंगन की मिट्टी में था, वह आज के वाई-फाई कनेक्शन और एयर-कंडीशंड कमरों में कहीं खो गया है। शायद हमें जरूरत है कि हम अपने बच्चों को स्क्रीन की दुनिया से थोड़ा बाहर निकालें, ताकि वे भी समझ सकें कि ‘गर्मी की छुट्टी’ असल में जिंदगी को खुलकर जीने का दूसरा नाम है। उन्हें नानी-दादी के यहाँ भेजें। उन्हें देशी खेल सिखाएं। उन्हें बताएं कि गैजेट्स के बिना भी जीवन का आनंद लिया जा सकता है। इस बार कोशिश करें कि छुट्टियों को छुट्टियों की तरह जीएं। थोड़ा पीछे जाएं और अतीत के आनंद को वर्तमान में खींचकर लाएं।
आइए, इन छुट्टियों के कैनवास पर भरें कुछ नए रंग:
संस्कारों की छांव और व्यक्तित्व का निखार: अपनी जड़ों से जुड़ने और जीवन-मूल्यों को गहराई से समझने के लिए राष्ट्रीय विचार वाले संगठनों के ग्रीष्मकालीन शिविरों का हिस्सा बनें। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिक्षा वर्ग, विवेकानंद केंद्र के संस्कार और योग शिविर, संस्कृत भारती के संस्कृत संभाषण शिविर, सेवा भारती, भारत विकास परिषद और सूर्या फाउंडेशन के व्यक्तित्व विकास शिविरों में शामिल होकर आप बहुत कुछ नया सीख सकते हैं।
मैदान की मस्ती और बौद्धिक विकास : गैजेट्स को छोड़कर अपने घर के आसपास लगने वाली ‘संघ की शाखा’ में जाएं। वहाँ होने वाले विविध खेल, व्यायाम और बौद्धिक चर्चाएं आपकी छुट्टियों को शारीरिक और मानसिक रूप से ऊर्जावान बना देंगी।
हुनर को दें नई उड़ान : यह समय आपके भीतर छिपी प्रतिभा को तराशने का है। कला, संगीत या अपने किसी पसंदीदा खेल का विधिवत प्रशिक्षण लेने के लिए किसी स्थानीय अकादमी से जुड़ें।
शब्दों से करें पक्की दोस्ती : अपनी कल्पनाओं को कागज पर उकेरें। कहानी, कविताएं या कहीं घूमने गए हैं तो उसका यात्रा वृत्तांत लिखने का अभ्यास करें। अपनी इन रचनाओं को स्कूल की पत्रिका या किसी बाल-साहित्य पत्रिका में प्रकाशन के लिए भेजें; छपे हुए अपने नाम को देखने का रोमांच अद्भुत होता है।
करुणा का भाव एवं प्रकृति से जुड़ाव : अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक छोटा-सा क्लब बनाएं और भीषण गर्मी में छतों व पेड़ों पर पक्षियों के लिए सकोरों में दाना-पानी रखने का अभियान चलाएं।
प्रतिभा को मंच और नेतृत्व की क्षमता : अपने मोहल्ले में ‘बाल सभा’ आयोजित करें, जहाँ आपके साथी अपनी प्रतिभा (गायन, नाटक, कविता) बेझिझक मंच पर दिखा सकें।
कुटम्ब जीवन की सीख : केवल फोन पर नहीं, बल्कि सपरिवार अपने मित्रों और रिश्तेदारों के घर चाय-नाश्ते पर जाएं और उन्हें भी अपने घर आमंत्रित करें। यह अभ्यास आपकी दोस्ती को गहरा करेगा और एक-दूसरे से सीखने के अवसर भी देगा।
रसोई के नए स्वाद : माँ के साथ रसोई के कामों में थोड़ा हाथ बंटाएं और अपनी पसंद की एक-दो चीज़ें बनाना जरूर सीखें।
पिता की दुनिया को समझें : किसी दिन अपने पिता के साथ उनके ऑफिस या कार्यस्थल पर पूरा दिन बिताएं। देखें और समझें कि वे कितनी मेहनत और जिम्मेदारी के साथ अपना काम करते हैं। व्यवसाय कैसे होता है, इसकी समझ भी बढ़ेगी।
गाँव की माटी से जुड़ाव : इन सबके बीच, कुछ दिन अपने गाँव में जाकर जरूर बिताएं। आपका गाँव न हो तो किसी रिश्तेदार के गाँव में जाएं। वहां की साफ हवा, खुले खेत और सादगी भरा जीवन आपको वह सुकून देगा, जो शहर की भीड़भाड़ में कहीं खो गया है। इसके साथ ही ग्राम संस्कृति के प्रति समझ और संवेदनशीलता भी बढ़ेगी।
स्कूल की छुट्टियों पर यह कविता लिखी है, आप भी इसका आनंद लीजिए। यह कविता आपको उस दौर में लेकर जाएगी, जब गर्मी की छुट्टियों का मतलब बहुत कुछ होता था-








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