मंगलवार, 9 जून 2026

विश्व का नेतृत्व करेगा संगठित भारत

संघ शताब्दी वर्ष : सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और मुख्य अतिथि कुमार मंगलम बिरला ने दिखाई भविष्य के भारत की तस्वीर, वर्तमान की तैयारियों की ओर किया संकेत

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता विकास वर्ग-2 के समापन समारोह में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और मुख्य अतिथि प्रसिद्ध उद्योगपति एवं पद्मभूषण से सम्मानित कुमार मंगलम बिरला के वक्तव्य भविष्य के भारत की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं, जो स्वयं सशक्त और आत्मनिर्भर होकर विश्व बंधुत्व की भावना का प्रवर्तक बनेगा। जिस समय दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी-बड़ी शक्तियों के बीच संघर्ष चल रहा है, शांति की कोई राह दिखाई नहीं देती, तब भारत का दर्शन सबका मार्ग प्रशस्त कर सकता है। दुनिया को सुख-शांति से जीना है, तब उसे भारत की ओर देखना ही होगा। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने उचित ही कहा कि “भारत का समय आ गया है। कलह और स्वार्थ में फँसकर लड़खड़ाती हुई इस दुनिया को आज केवल भारत की ही आवश्यकता है”। भारत दुनिया को इस कलह से बाहर निकाल सकता है, उसके लिए सबसे पहले हमें अपने देश को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना पड़ेगा। दुनिया भी उसी के सत्य को सुनती है, जो शक्ति सम्पन्न होता है। 

सरसंघचालक डॉ. भागवत ने वैश्विक परिदृश्य को सामने रखकर, भारत की भूमिका की ओर सबका ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि “आज विश्व की शक्तियां मनमानी कर रही हैं; वे देशों पर कब्ज़ा करने, युद्ध थोपने या संसाधनों को रोकने का काम करती हैं। परंतु, भारत जब शक्ति-सम्पन्न होगा, तो वह बल प्रयोग नहीं करेगा, बल्कि सबको साथ लेकर चलेगा”। प्राचीन इतिहास में पलटकर जब हम देखते हैं तब भारत की इसी प्रकार की भूमिका हमें दिखाई पड़ती है। सब प्रकार से दुनिया का नेतृत्व करने वाले भारत ने विश्व को ज्ञान और व्यापार ही दिया, युद्ध नहीं। भारत ने कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया। यह भारत का स्वभाव और प्रकृति है। प्रत्येक देश का अपना स्वभाव होता है, इसलिए जब वह शक्तिशाली होता है, तब दुनिया के कैनवास पर वैसे ही रंग भरता है। इसलिए पुन: जब भारत प्रभावशाली होगा, तब वह दुनिया को फिर से ज्ञान, धर्म, कला, संस्कृति, शांति का उपहार भेंट में देगा। सरसंघचालक जी ने भारतीय दर्शन की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि दुनिया व्यक्ति, समाज और सृष्टि को अलग-अलग देखती है, लेकिन सबका एक साथ पोषण करना केवल भारत जानता है। जीवन में ‘अर्थ’ और ‘काम’ के साथ ‘मोक्ष’ का समन्वय कैसे हो, यह दुनिया को भारत ही सिखा सकता है। यह इसलिए भी संभव है क्योंकि भारत दुनिया को परिवार मानता है। भारत के निर्माण की नींव ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ पर रखी गई है।

हमें अपनी तैयारी प्रारंभ कर देनी चाहिए :

एक महत्वपूर्ण नैरेटिव की ओर भी सरसंघचालक जी ने न केवल हमारा ध्यान खींचा है अपितु उसका सटीक उत्तर भी दिया है। भारत के प्रति श्रद्धा भाव नहीं रखने वाले लोग अक्सर पूछते हैं कि समृद्ध संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान के बावजूद भारत ने लगभग 1000 वर्षों की गुलामी क्यों झेली? अपने उद्बोधन के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट किया है कि “आक्रमणकारी हमसे श्रेष्ठ या संख्या में अधिक नहीं थे, बल्कि वे हमसे बदतर ही थे। हम इसलिए गुलाम हुए क्योंकि हमने अपनी परम्पराओं और तैयारी को विस्मृत कर दिया था”। इसलिए जब पुन: भारत का समय आ रहा है, तब हमें अपने इतिहास से सबक लेकर अपनी संस्कृति का गौरव मन में रखकर संगठित होना होगा, अपनी तैयारी उसी ढंग से करनी होगी। यह सुखद है कि हिन्दू समाज अब संगठित और जागृत हो रहा है। स्मरण रखें कि हिन्दू संगठित होगा, तब स्वाभाविक ही भारत अपने स्वबोध के साथ मजबूती से पुन: उठकर खड़ा होगा।

केवल दर्शक न बनें, राष्ट्रहित में कार्य करें:

हमें ज्ञात है कि यह संघ कार्य की शताब्दी का वर्ष है। सरसंघचालक जी ने स्वाभाविक ही इस संदर्भ में आवश्यक जानकारी लोगों को दी और संघ की अपेक्षा से भी अवगत कराया। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ का उद्देश्य मात्र व्याख्यान देना नहीं है, बल्कि ‘स्वभाव’ और ‘आदत’ में बदलाव लाना है। संघ द्वारा एक ऐसी कार्यपद्धति विकसित की गई है जो सारी विभिन्नताओं के बावजूद समाज को एकजुट कर रही है। स्वार्थ और भेद को तिलांजलि देने वाले कार्यकर्ताओं का निर्माण ही संघ का लक्ष्य है। संघ का लक्ष्य है कि भारत यथाशीघ्र परम वैभव को प्राप्त करे। भारत माता जल्द ही विश्वगुरु के सिंहासन पर आरूढ़ होकर विश्व का मार्गदर्शन करे। इसलिए उन्होंने समाज की सज्जनशक्ति से आग्रह किया कि केवल दर्शक न बनें; संघ की शाखा में आएं, सहयोग करें या स्वतंत्र रूप से राष्ट्रहित में कार्य करें। 

हर परिस्थिति में राष्ट्र के साथ खड़ा रहा है संघ :

मुख्य अतिथि कुमार मंगलम बिरला ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विशाल स्वरूप का उल्लेख करते हुए कहा कि 83 हजार शाखाएं, 60 लाख स्वयंसेवक और 1 लाख 77 हजार सेवा कार्य अभूतपूर्व हैं। स्वतंत्रता से पहले का समय हो या भूकंप एवं सुनामी जैसी आपदाएं, संघ सदैव देश और समाज के साथ खड़ा रहा है। श्री बिरला के यह विचार संघ की वास्तविक तस्वीर को प्रस्तुत करते हैं। जिसके मन में भी देशभक्ति की भावना है, वह जानता है कि संघ के स्वयंसेवक प्रत्येक परिस्थिति में देश के साथ खड़े हैं। श्री बिरला ने अप्रत्यक्ष रूप से उन लोगों को भी आईना दिखाया है, जो गाहे-बगाहे उद्योगपतियों को कोसते रहते हैं। भारत को आत्मनिर्भर बनाने में उद्योग जगत की सबसे बड़ी भूमिका रहने वाली है। इसलिए उन्होंने अपने उद्बोधन में आर्थिक और औद्योगिक दृष्टिकोण से राष्ट्र निर्माण की बात रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘आत्मनिर्भरता’ कोई सामान्य आर्थिक नीति नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र निर्माण का मूल आधार है। उन्होंने युवा उद्यमियों को संदेश दिया कि “भारत में बनाएं, भारत के लिए बनाएं और भारत में रहकर पूरी दुनिया के लिए बनाएं”। आज के युवाओं के लिए यह एक बड़ा और जरूरी संदेश है। हमें अपनी मेधा का उपयोग अपने देश को बनाने के लिए करना चाहिए। अपने दादाजी (जीडी बिड़ला) का संस्मरण साझा करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे विभाजन के समय जब कपास के खेत पाकिस्तान में रह गए थे, तब उस भारी चुनौती को भी अवसर में बदला गया था। आज भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और प्रधानमंत्री मोदी जी के ‘विकसित भारत’ के संकल्प के साथ नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहा है। इस बड़े सपने को पूरा करने में बड़े उद्योगों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

आखिर में कहना होगा कि कार्यकर्ता विकास वर्ग का यह समापन समारोह इस बात का स्पष्ट संदेश था कि भारत की अनुकूलता का समय आ गया है। जहाँ एक ओर संघ व्यक्ति-निर्माण और समाज-संगठन के माध्यम से राष्ट्र की आंतरिक शक्ति को मजबूत कर रहा है, वहीं औद्योगिक जगत आत्मनिर्भरता के माध्यम से देश को आर्थिक महाशक्ति बनाने को तत्पर है। समाज की सज्जन शक्ति और युवाओं का सामूहिक प्रयास ही वह मार्ग प्रशस्त करेगा, जिससे भारत विश्व का मार्गदर्शन कर सकेगा।

देखें यह वीडियो : आरएसएस में कब कौन आया- महात्मा गांधी, अंबेडकर और इंदिरा गांधी से अरविंद नेताम तक

लघु भारत की तस्वीर है कार्यकर्ता विकास वर्ग-2 :

नागपुर में लगने वाला संघ का कार्यकर्ता विकास वर्ग-2 एक प्रकार से लघु भारत की तस्वीर है। इस वर्ग को देखकर संपूर्ण भारत में संघ कार्य का अनुमान सहज लगाया जा सकता है। यह अखिल भारतीय वर्ग होता है, जिसमें प्रत्येक राज्य से स्वयंसेवक संघ कार्य का प्रशिक्षण प्राप्त करने आते हैं। वर्ग में लगभग 850 संख्या रहती है। इस बार 880 स्वयंसेवकों ने प्रशिक्षण लिया है। यह वर्ग 25 दिन का रहता है। इन स्वयंसेवकों को अलग-अलग समूह में विभाजित किया जाता है, जिन्हें ‘गण’ कहते हैं। एक गण में 18 से 22 स्वयंसेवक रहते हैं। कार्यकर्ता विकास वर्ग के गण की रचना करते समय ध्यान रखा जाता है कि प्रत्येक गण भी अपने आप में लघु भारत का प्रतिनिधित्व करे। 

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 7 जून, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

सोमवार, 8 जून 2026

रजनीश अग्रवाल: पत्रकारिता के प्रांगण से राज्यसभा के पटल तक

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के प्रांगण से पत्रकारिता की पढ़ाई करके राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय रहे पूर्व विद्यार्थी रजनीश अग्रवाल अब राज्यसभा के सम्मानित सदस्य होंगे। भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें मध्यप्रदेश से देश की सबसे बड़ी पंचायत के उच्च सदन हेतु अपना उम्मीदवार बनाया है। विश्वविद्यालय के लिए यह गौरव की बात है कि उसके विद्यार्थी दादा माखनलाल चतुर्वेदी के आंगन में संचार कौशल सीखकर विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। रजनीश अग्रवाल को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया जाना यह संदेश भी देता है कि राजनीतिक क्षेत्र में बौद्धिक क्षमता, वैचारिक स्पष्टता और उत्कृष्ट संचार कौशल वाले नेताओं को महत्व दिया जा रहा है। रजनीश अग्रवाल का व्यक्तित्व एक राजनेता से कहीं अधिक एक कुशल रणनीतिकार और प्रखर संचारक का है, जिसकी जड़ें पत्रकारिता के मजबूत धरातल से जुड़ी हैं। 

माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के गौरव :

राजनीतिक क्षेत्र में अपनी संवेदनशील और कुशल प्रवक्ता की छवि बनाने वाले रजनीश अग्रवाल की इस यात्रा में उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि का बड़ा महत्व है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (एमसीयू), भोपाल के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विभाग से उन्होंने प्रसारण पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की है। यहाँ सीखे संवाद कौशल का उपयोग उन्होंने टीवी डिबेट्स में खूब किया है। कैमरे के सामने किस प्रकार संतुलित ढंग से अपनी बात कही जाती है, उसके लिए रजनीश अग्रवाल का उदाहरण अकसर राजनीतिक गलियारों में दिया जाता रहा है। आज भी जब राज्यसभा के लिए उनके नाम की घोषणा हुई तब राजनीतिक क्षेत्र में किए गए उनके योगदान के साथ-साथ पत्रकारिता के अध्ययन की चर्चा भी हो रही है। एमसीयू से पढ़कर निकले कई अन्य विद्यार्थी भी राजनीतिक क्षेत्र में स्वयं को स्थापित कर चुके हैं। राजनीति का क्षेत्र ऐसा है, जहाँ कदम-कदम पर संवाद में कुशलता की आवश्यकता पड़ती है। एमएबीजे (MA-Broadcast Journalism) का पाठ्यक्रम जनसंचार की बारीकियों से अवगत कराने के साथ ही मीडिया के काम करने के तरीके, सूचनाओं के विश्लेषण और जनमानस तक अपनी बात प्रभावी ढंग से पहुँचाने की कला भी सिखाता है। एक पत्रकार के रूप में समाज को देखने का नज़रिया और फिर उसी समाज के लिए एक राजनेता के रूप में नीतियाँ बनाने का विज़न, किसी भी व्यक्ति को एक अनूठा संतुलन प्रदान करता है।

कुशल रणनीतिकार और प्रखर वक्ता :

एक ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म के छात्र होने के नाते, रजनीश अग्रवाल में कैमरे और जनता दोनों का सामना करने की अद्भुत क्षमता है। टीवी डिबेट्स, प्रेस कॉन्फ्रेंस या सार्वजनिक मंचों पर वे हमेशा तथ्यों और तर्कों के साथ अपनी बात रखते हैं। उनकी यह खूबी उन्हें एक गंभीर और विश्वसनीय राजनेता के रूप में स्थापित करती है। मीडिया की कार्यप्रणाली को अंदर से समझने के कारण, वे राजनीतिक बहसों में कभी आपा नहीं खोते और बेहद संयमित ढंग से पार्टी का पक्ष रखते हैं। मध्यप्रदेश में रजनीश भाजपा के मुख्य प्रवक्ता के नाते जिम्मेदारी का निर्वहन कर चुके हैं। इस दायित्व पर रहकर उन्होंने अपने और पार्टी के विचार को समाज के सामने संतुलित ढंग से रखा है। इस दौरान उन्होंने पार्टी के संचार तंत्र को मजबूत करने में भी अपनी संचार कुशलता का उपयोग किया है।

राज्यसभा में होगा एक बेहतर ‘कम्युनिकेटर’ :

संसद में राज्यसभा को ‘उच्च सदन’ या ‘बुद्धिजीवियों का सदन’ कहा जाता है, क्योंकि यहाँ चुनकर आनेवाले राजनेताओं से अपेक्षा रहती है कि वे संवाद में कुशल हों, बौद्धिक क्षमता रखते हों, जिनके पास जनता के हित में नीतियां बनाने का एक विजन हो। राज्यसभा में ऐसे नेताओं की आवश्यकता होती है जो राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय मुद्दों पर गहराई से अध्ययन कर सकें और सार्थक बहस कर सकें। इस दृष्टिकोण से देखें तो रजनीश अग्रवाल अपनी अकादमिक पृष्ठभूमि के कारण राज्यसभा के एक बेहतरीन कम्युनिकेटर के रूप में दिखायी देते हैं। 

एमसीयू के लिए गौरव की बात :

रजनीश अग्रवाल का राज्यसभा उम्मीदवार बनना माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के लिए भी एक गर्व का विषय है, जहाँ से निकले एक छात्र ने देश की सर्वोच्च विधायी संस्था तक का सफर तय किया है। एक छात्र, संचारक और राजनेता के रूप में उनका यह सफर यह साबित करता है कि यदि वैचारिक दृढ़ता और संचार कौशल का सही तालमेल हो, तो राजनीति में सकारात्मक और प्रभावशाली स्थान प्राप्त किया जा सकता है। उनका उच्च सदन में जाना मध्यप्रदेश की आवाज को और अधिक मुखरता प्रदान करेगा। विश्वविद्यालय परिवार इस समाचार को पाकर प्रसन्नता की अनुभूति कर रहा है। हम उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं।

देखें वीडियो : आपने ऐसा शिखालेख नहीं देखा होगा | माखनलाल चतुर्वेदी प्रतिमा | Makhanlal Chaturvedi University Bhopal


शुक्रवार, 5 जून 2026

स्कूल की छुट्टियां : नानी का घर बनाम गैजेट्स की दुनिया

ग्रीष्मकालीन अवकाश : सीखने, समझने और निखरने का उत्तम अवसर


गर्मी की छुट्टियों की प्रतीक्षा किसे नहीं होती है। भले ही समय बदल गया है, पीढ़ी बदल गई है, लेकिन गर्मी की छुट्टियों को लेकर रोमांच कम नहीं हुआ है। छुट्टियों के नाम से आज भी हमारे चेहरों पर एक प्यारी-सी मुस्कान तैर जाती है। हर बच्चे के मन में वार्षिक परीक्षा के बाद आने वाली लंबी छुट्टियों को लेकर अपने-अपने सपने होते हैं। हालांकि इन सपनों या कहें योजनाओं में बड़ा बदलाव आया है। बदलते समय ने हमारे जीने के तरीके को जितना बदला है, उतना ही असर इन छुट्टियों के आनंद पर भी डाला है। एक वह दौर था जब अप्रैल का महीना आते ही मन किसी पंछी की तरह उड़ने को बेताब हो जाता था। फुर्र से उड़कर नानी के आंगन, वहाँ से दादी के घर। खेत-खलियान। नीम की छांव। चाचा के साथ मटरगस्ती। मामा के साथ नदी में छलाँग। भाई-बहनों के साथ अष्टा-चंगा, गिल्ली-डंडा, छुपन-छुपाई, सांप-सीढ़ी और न जाने कितने देशी खेल। एक से मन भरे, दूसरे में आए आनंद। रात में तारों की छांव में सोना। नाना-नानी की किस्सागोई में सिनेमा से बढ़कर मनोरंजन। रोज नई कहानी। नया संस्कार। आम के आम, गुठलियों के दाम। छुट्टियों का आनंद भी और समाज जीवन की शिक्षा-संस्कार भी। एक आज का दौर है, जहाँ छुट्टियां तो हैं, लेकिन उनका रंग-रूप पूरी तरह बदल चुका है। नानी-दादी का घर तो है लेकिन हम जाते चार दिन के लिए ही हैं। मामा, चाचा-ताऊ के बच्चे यानी हमारे भाई-बहनों की मंडली तो है लेकिन हम देशी खेल नहीं खेलते, गैजेट्स में डूबे रहते हैं। जो हम खेल-खेल में सीख लेते थे, उसके लिए हॉबी क्लासेस लगा रहे हैं। कुछ समय तो समर कैम्प भी जीम लेता है। जो आनंद हमें नानी-दादी के घर आता था, उसे मोटी फीस देकर भी हम समर कैम्प में नहीं पा सकते। हालांकि, इस सबका अभिप्राय यह नहीं है कि समर कैम्प और हॉबी क्लासेस का महत्व नहीं है। बदली परिस्थितियों में यह हमारी छुट्टियों को उपयोगी बनाते हैं।

बुधवार, 3 जून 2026

खेत बचाओ अभियान : मिट्टी बचेगी, तभी बचेगा किसान और देश का भविष्य

केन्द्र सरकार ने मिट्टी के संरक्षण के लिए जनांदोलन खड़ा करने का संकल्प लिया है। यह अत्यंत आवश्यक आंदोलन है, जिसे केवल सरकार के प्रयास से नहीं अपितु जनता (विशेषकर किसानों) की भागीदारी एवं समझदारी से ही सफल बनाया जा सकता है। मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के ग्राम रमासिया से केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राष्ट्रव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ की घोषणा की है। स्मरण रहे कि कृषि मंत्री स्वयं भी कृषक परिवार से आते हैं, इसलिए खेती के बारे में उनकी समझ अधिक जमीन और वास्तविक है। आज कृषि भूमि की जो स्थिति है, उसको लेकर सब ओर अनुत्तरित चिंता पसरी दिखायी देती है।

सोमवार, 1 जून 2026

भोपाल विलीनीकरण आंदोलन में आरएसएस का मौन किंतु प्रखर संघर्ष

स्वतंत्रता आंदोलन और आरएसएस : जनांदोलन के आगे नवाब ने घुटने टेके, 1 जून 1949 को भोपाल रियासत का भारत में हुआ विलय

भोपाल में स्थिति विलीनीकरण स्मारक : विलीनीकरण शहीद स्मृति द्वार

हम भारत के लोगों ने स्वतंत्रता के लिए लगभग 1000 वर्ष संघर्ष किया। 15 अगस्त, 1947 को वह दिन आया, जिसके लिए पीढ़ियों ने संघर्ष किया। इसे विडम्बना ही कहेंगे कि एक ओर 15 अगस्त 1947 को पूरा देश स्वतंत्रता का उत्सव मना रहा था, वहीं दूसरी ओर झीलों की नगरी भोपाल पर नवाब की हठधर्मिता का काला साया मंडरा रहा था। नवाब ‘स्वतंत्रता’ का अपहरण कर लेना चाहता था। पाकिस्तान परस्त नवाब हमीदुल्लाह खान ने 24 अगस्त, 1947 को भोपाल को ‘स्वतंत्र देश’ बनाए रखने की घोषणा कर दी। भोपाल की जनता ने नवाब के इस निर्णय का विरोध किया। जिस नवाब ने अपने दिमाग के दरवाजे बंद कर लिए हों, उसे भला लोगों के मन की बात कहाँ सुनायी देती। उसने जनता के विरोध को जूतों तले रौंदने का प्रयास किया। परंतु, नवाब सफल नहीं हो सका क्योंकि भोपाल विलीनीकरण आंदोलन का एक सिरा संघ के स्वयंसेवकों ने भी थाम लिया था। आम जनता के साथ अब संघ के कार्यकर्ता भी इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में आ गए थे। संघ जिस काम को हाथ में लेता है, उसमें सफलता सुनिश्चित रहती ही है।

रविवार, 31 मई 2026

संघ शिक्षा वर्ग में डॉ. अंबेडकर ने देखी समरसता

संघ शताब्दी वर्ष : वर्ष 1939 में पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग के सायंकालीन बौद्धिक सत्र में बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने स्वयंसेवकों को किया था संबोधित

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से आयोजित शिक्षा वर्गों में स्वयंसेवक क्या सीख रहे हैं, इसकी प्रत्यक्ष अनुभूति कराने के लिए संघ-सृष्टि के बाहर के महानुभावों को वर्ग में आमंत्रित करने की परंपरा प्रारंभ से रही है। प्रारंभ में बौद्धिक या समापन समारोह की अध्यक्षता के लिए महानुभावों को आमंत्रित किया जाता था, लेकिन अब तो वर्ग के बीच में भी समाज के प्रमुखजनों को ‘वर्ग दर्शन’ कराने की योजना रहती है। जब स्वयंसेवक सामूहिक रूप से मैदान पर अभ्यास कर रहे होते हैं या भोजन कर रहे होते हैं, उस समय विशिष्ट अतिथियों को आमंत्रित करके उन्हें वर्ग दर्शन कराया जाता है। आपको यह जानकर अच्छा लगेगा कि संघ शिक्षा वर्ग का दर्शन करने के लिए महात्मा गांधी से लेकर बाबा साहब डॉ. अंबेडकर तक आ चुके हैं। सामाजिक क्रांति के अग्रदूत बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर संघ शिक्षा वर्ग की प्रत्यक्ष अनुभूति करने के लिए वर्ष 1939 में पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग में आए थे। शिक्षा वर्ग की व्यवस्थाएँ, स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण और उनके व्यक्तित्व में आए परिवर्तन देखकर बाबा साहब अत्यंत प्रसन्न हुए थे।

देखें वीडियो : आरएसएस की शाखा में आए डॉ. भीमराव अंबेडकर


सामाजिक समरसता स्थापित करने के लिए अथक प्रयास कर रहे बाबा साहब डॉ. अंबेडकर ने यह सुन रखा था कि अस्पृश्यता निवारण में आरएसएस को उल्लेखनीय सफलता मिली है। इस बात की अनुभूति बाबा साहब ने संघ शिक्षा वर्ग में बहुत समीप से की। पुणे के संघ शिक्षा वर्ग के सायंकालीन बौद्धिक सत्र में डॉ. अंबेडकर आए थे। उस समय वर्ग में संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार भी उपस्थित थे। वर्ग में लगभग 525 स्वयंसेवक संघ कार्य का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे। डॉ. अंबेडकर ने डॉ. हेडगेवार से सबसे पहला प्रश्न यही किया कि इन 525 स्वयंसेवकों में से अस्पृश्य कितने हैं? डॉ. हेडगेवार ने उनसे कहा कि आप स्वयं ही इनसे पूछ लीजिए। बाबा साहब स्वयंसेवकों के बीच में गए, लेकिन पूर्ण गणवेश पहने सभी स्वयंसेवक एक समान ही दिख रहे थे। उनमें कौन स्पृश्य (सवर्ण) है और कौन अस्पृश्य, यह पहचाना ही नहीं जा सकता था। बाबा साहब भी नहीं पहचान पाए। तब बाबा साहब ने स्वयंसेवकों से कहा कि आपमें से जो अस्पृश्य हों, वे एक कदम आगे आएँ। लेकिन कतारबद्ध स्वयंसेवकों के बीच कोई हलचल नहीं हुई। एक भी स्वयंसेवक पंक्ति से बाहर नहीं आया।

गुरुवार, 28 मई 2026

संघ शिक्षा वर्ग बनाम समर कैंप

संघ शताब्दी वर्ष : ‘मैं’ से ‘हम’ के बोध की यात्रा में लेकर जाते हैं संघ शिक्षा वर्ग, जीवन को सार्थक बनाने की मिलती है सीख

व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया में ‘समर कैंप’ हमारे जीवन का हिस्सा बन गए हैं। गर्मी की छुट्टियां लगते ही युवा अपने व्यक्तित्व को निखारने, नया कौशल सीखने और समय का सदुपयोग करने के लिए अपनी अभिरुचि के अनुसार ‘समर कैंप’ में जाते हैं। नि:संदेह ये समर कैंप युवाओं को बहुत कुछ सिखाते हैं। इसलिए रचनाधर्मी और उत्साही युवाओं के बीच समर कैंप के प्रति आकर्षण बढ़ा है। वहीं, जब हम समर कैंप की तुलना संघ शिक्षा वर्ग से करते हैं, तब स्वयंसेवकों के उत्साह को देखकर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि इन वर्गों में न केवल व्यक्तित्व का विकास होता है, अपितु राष्ट्र साधना के लिए भी उनका मन तैयार होता है। भारत माँ की सेवा का जो संकल्प स्वयंसेवकों ने धारण किया है, उसको निभाने का प्रशिक्षण भी इन वर्गों में मिलता है। समर कैंप की तुलना करते हुए संघ शिक्षा वर्गों के संबंध में एक बात कहनी हो तो- संघ शिक्षा वर्ग सोने पर सुहागा हैं। यहाँ युवा समय प्रबंधन, कार्यक्रम प्रबंधन, अनुशासन, सामंजस्य, योग, कौशल, कला, संवेदनशीलता, वक्तृत्व कला इत्यादि गुण तो सीखता ही है, इसके अलावा वह अपनी गौरवशाली संस्कृति से परिचित होता है, राष्ट्रप्रेम का भाव और गहरा होता है, नेतृत्व करने की क्षमता का विकास होता है। इस सबके साथ युवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे यशस्वी आंदोलन को समाज में ले जाने का प्रशिक्षण भी प्राप्त करते हैं। संघ शिक्षा वर्ग में प्रशिक्षित युवा ही आगे चलकर संघ के बड़े दायित्व का निर्वहन करने के लिए तैयार होते हैं। हाँ, उनके मन में एक साधारण स्वयंसेवक की भाँति समर्पित भाव से संघ कार्य करने का दायित्व बोध भी गहरा होता है।