सोमवार, 13 जुलाई 2026

बालासाहब ने शाखा को बनाया ‘अखंड साधना’ का केंद्र

संघ शताब्दी वर्ष : संघ कार्य के विस्तार और शाखाओं के सुदृढ़ीकरण के शिल्पी थे बालासाहब देवरस, उनकी पहल पर ही सातों दिन शाखा लगना शुरू हुई, सुबह की शाखा भी उनकी देन है


संघ कार्य के विस्तार, शाखाओं के विकास एवं सुदृढ़ीकरण में तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस (मधुकर दत्तात्रेय देवरस) का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला रहा है। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार अकसर स्वयंसेवकों से कहते थे कि शाखा अच्छी चलेगी तो समाज के सब काम होंगे। समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में काम करने के लिए राष्ट्रीय विचार से ओत-प्रोत कार्यकर्ता शाखा से ही तैयार होंगे। इसलिए अच्छी शाखा चलना जरूरी है। एक बार युवकों के साथ बातचीत के दौरान डॉक्टर साहब ने प्रश्न किया कि “आदर्श शाखा का लक्षण क्या है?” इसके उत्तर में बालासाहब ने जो कहा, वह उनके विचारों की स्पष्टता को दर्शाता है। उन्होंने कहा- “संघ कार्य को अपना जीवित कार्य समझकर, संघ कार्य के लिए सारा समय लगाने के लिए प्रस्तुत युवक जिस शाखा से विपुल संख्या में खड़े होंगे, ऐसी शाखा को मेरी दृष्टि से ‘आदर्श शाखा’ कहना उचित होगा”। संघ कार्य को राष्ट्रव्यापी बनाना है, तो उसके लिए जरूरी है कि आदर्श शाखाएं खड़ी हों। डॉक्टर साहब की शाखाओं की संकल्पना को धरातल पर उतारने और शाखाओं का व्यापक नेटवर्क खड़ा करने में बालासाहब देवरस ने जो संगठनात्मक कौशल दिखाया, वह अनुकरणीय है। बालासाहब की संगठन कुशलता से डॉक्टर साहब भली प्रकार परिचित थे। इसलिए उन्होंने नागपुर में संघ कार्य की जिम्मेदारी बालासाहब को सौंपी थी। संघ के कार्य को नागपुर से बाहर लेकर जाने के लिए यह आवश्यक था कि नागपुर में अच्छा काम चले। नागपुर के कार्यवाह के रूप में बालासाहब ने जिस प्रकार से संघ कार्य को आधार दिया, उस आधार पर ही आगे चलकर संघ कार्य राष्ट्रव्यापी हुआ। 

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प्रारंभ से डॉक्टर साहब के सान्निध्य में रहने के कारण बालासाहब को संघ कार्य की गहरी समझ थी। कहा जा सकता है कि उन्होंने डॉक्टर साहब के विचार, दर्शन, क्रियान्वयन के मार्ग और समाज निर्माण के स्वप्न को आत्मसात कर लिया था। डॉक्टर साहब ने जो सपना देखा था, उसे साकार करने के लिए शाखाओं का व्यापक नेटवर्क आवश्यक था। बालासाहब ने नागपुर कार्यवाह से लेकर सरसंघचालक के दायित्व में रहने के दौरान शाखा पर विशेष जोर दिया। नागपुर में संघ कार्य की जिम्मेदारी संभालते समय उन्होंने अधिकतम बस्तियों में शाखाएं प्रारंभ कराईं। शाखा ठीक चले इसके लिए प्रति सोमवार डॉ. हेडगेवार के निवास पर शाखा कार्यवाह और मुख्य शिक्षकों की बैठकें शुरू की गईं। एक बड़ा काम उन्होंने यह किया कि शाखा को संघ कार्य की साधना का अखंड केन्द्र बना दिया। प्रारंभिक दौर में समाज की मानसिकता प्रतिदिन एक ही स्थान पर एकत्रित होने की नहीं थी। लोग अकसर सवाल करते थे- “प्रतिदिन एक साथ आने की क्या जरूरत है? क्या किसी का अपना काम नहीं है?” लेकिन डॉक्टरजी और बालासाहब यह भली-भांति जानते थे कि शाखा कोई सामान्य एकत्रीकरण नहीं, बल्कि एक ‘सतत साधना’ है। साधना में खंड पड़ने का अर्थ है नित्य संस्कारों में बाधा आना। बालासाहब के नागपुर कार्यवाह बनने से पहले, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाएं सप्ताह में केवल छह दिन लगती थीं। रविवार को छुट्टी का दिन होता था। इतना ही नहीं, श्रावण के पवित्र महीने में रविवार के साथ सोमवार को भी छुट्टी रहती थी। बालासाहब ने महसूस किया कि इस खंडित दिनचर्या से कार्य में शिथिलता आती है। शाखा तो नित्य का कार्य है। यह तो साधना है। इसमें अवकाश कैसा? उन्होंने रविवार और श्रावण सोमवार के अवकाश बंद कर दिए। अब शाखा सप्ताह के सातों दिन वर्ग के 365 दिन बिना किसी अवकाश के लगना प्रारंभ हो गईं। आज संघ की जो 365 दिन की अविरत शाखा की परंपरा है, वह बालासाहब के ही दूरदर्शी निर्णय का परिणाम है।

‘प्रभात शाखा’ की पहल :

बालासाहब ने देखा कि कई व्यावसायिक, नौकरीपेशा लोग और प्रौढ़ आयु के व्यक्ति शाखा आना तो चाहते हैं, लेकिन शाम की शाखा में शामिल होने का उनके पास समय नहीं होता था। काम-धंधे में लगते ही कई पुराने स्वयंसेवकों का भी सायं शाखा में आना अनियमित या बंद हो जाता था। उल्लेखनीय है कि प्रारंभ में शाखा केवल शाम के समय लगती थीं। इस समस्या का समाधान बालासाहब ने ‘प्रभात शाखा’ (प्रातःकालीन शाखा) के रूप में उपलब्ध कराया। 1938 में ‘सोमवार बैठक’ में इस विषय पर गहन विचार-विमर्श हुआ। बालासाहब के कहने पर वर्ष 1938 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रथम प्रातःकालीन शाखा नागपुर में ‘मोहिते बाड़ा’ संघस्थान पर शुरू की गई। तात्याजी बाविस्कर को इस प्रभात शाखा का कार्यवाह और बाबूराव वाघ को मुख्य शिक्षक नियुक्त किया गया। चूंकि इस शाखा में अपेक्षाकृत अधिक उम्र के प्रौढ़ स्वयंसेवक आते थे, इसलिए इसकी गतिविधियां सायं शाखा की गतिविधियों से अपेक्षाकृत शारीरिक रूप से कम थकाने वाली रखी गईं। इस एक निर्णय शाखा में नवाचार की नींव रखी। बाद में चलकर सबको शाखा से जोड़ने के लिए समय से लेकर शाखा के कार्यक्रम में अनेक प्रयोग हुए। ‘प्रभात शाखा’ ने संघ कार्य को मजबूत करने और समाज के प्रत्येक वर्ग (विशेषकर नौकरीपेशा और बुद्धिजीवी वर्ग) को संघ से जोड़ने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अपनी बस्ती की शाखा में जाने का नियम :

प्रारंभ में उपशाखाएं सीमित थीं, इसलिए कई स्वयंसेवक दूर की शाखाओं में जाते थे। लेकिन जब धीरे-धीरे उपशाखाएं बढ़ने लगीं, तब भी एक प्रवृत्ति देखी गई कि स्वयंसेवक अपनी बस्ती में प्रारंभ हुई नई शाखा में न जाकर अपनी पुरानी (मुख्य) शाखा में ही जाते थे। इससे नई बस्ती की शाखा के लिए उनका योगदान शून्य हो जाता था और एक ही शाखा में स्वतंत्र काम कर सकने वाले सक्षम कार्यकर्ताओं का जमावड़ा लग जाता था। बालासाहब ने इस विसंगति को पहचाना और यह निर्णय लिया गया कि “स्वयंसेवक अपनी बस्ती में लगने वाली शाखा में ही जाएंगे”। इस नियम से कार्यकर्ताओं का विकेंद्रीकरण हुआ, नई शाखाओं को योग्य नेतृत्व मिला और संघ कार्य का हर मोहल्ले-बस्ती में तेजी से विस्तार संभव हो सका। एक साथ 15 शाखाएं प्रारंभ करने के लिए भी बालासाहब का उदाहरण दिया जाता है। उनके प्रयास से नागपुर की इतवारी शाखा के प्रशिक्षित 15 स्वयंसेवकों ने एक साथ 15 नई शाखाएं प्रारंभ कीं।  

संघ शिक्षा वर्ग और दैनिक शाखाओं में संतुलन :

संघ कार्य मूलतः दैनंदिन शाखा पर आधारित है। बालासाहब सदैव यह चिंता करते थे कि किसी भी परिस्थिति में दैनिक शाखा का कार्य बाधित नहीं होना चाहिए। उन दिनों नागपुर में संघ शिक्षा वर्ग 40 दिनों तक चलता था। वर्ग की व्यवस्था में शहर के सभी प्रमुख कार्यकर्ता जुट जाते थे, जिससे वे अपनी शाखा पर ध्यान नहीं दे पाते थे। इस कमी को दूर करने के लिए बालासाहब ने एक नई व्यवस्था लागू की। उन्होंने वर्ग की कालावधि में भी दैनिक शाखा की ओर ध्यान देने के लिए अलग से विशेष कार्यकर्ता नियुक्त करने का उपक्रम कार्यान्वित किया।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 12 जुलाई, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

शनिवार, 11 जुलाई 2026

तीजन बाई: भारतीय सांस्कृतिक विरासत की राजदूत

भारत की सांस्कृतिक विरासत की सशक्त पहचान और पंडवानी गायन की जादुई आवाज अब खामोश हो गई है, लेकिन उसकी गूंज सदियों तक भारतीय संस्कृति के आकाश में गूंजती रहेगी। पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का 70 वर्ष की आयु में 5 जुलाई, 2026 को रायपुर एम्स में निधन केवल एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि भारतीय लोक कला के एक सुनहरे अध्याय का विश्राम लेना है। अपने नाना से महाभारत की कथाएं सुनकर बड़ी हुई तीजन बाई ने जब तंबूरा हाथ में थामा, तो उन्होंने केवल गीत नहीं गाए, बल्कि महाभारत के चरित्रों को अपनी सशक्त आवाज और प्रभावशाली अभिनय से मंच पर जीवंत कर दिया। उनकी कला और जीवन यात्रा हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो संघर्षों से पार पाना चाहता है। एक ऐसे दौर में जब महिलाओं का मंच पर आकर तेज स्वर में गाना और अभिनय करना आसान नहीं था, उन्होंने सामाजिक बंधनों और रूढ़ियों की परवाह न करते हुए अपनी राह चुनी।

गुरुवार, 9 जुलाई 2026

एआई एक सहयोग टूल है, हमारा विकल्प या निर्णयकर्ता नहीं

डेटाबेस और एल्गोरिदम पर आधारित एआई, कभी भावनाओं, संवेदनाओं, अनुभवजन्य बुद्धि वाले मनुष्य से होशियार नहीं हो सकता


आज के तकनीकी युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) को हर समस्या के जादुई समाधान के रूप में दिखाया जा रहा है। इस बात में कोई शक नहीं है कि एआई आने वाले समय में बड़े परिवर्तन का कारण बनने वाला है। लेकिन यह परिवर्तन मानव समाज के हित में होगा या उसके विरुद्ध, यह सब हमें ही तय करना है। अगर हमने सचेत होकर एआई का विकास और उपयोग नहीं किया, तब हमारे सामने अनेक प्रकार की चुनौतियां खड़ी हो जाएंगी। एक ओर, एआई ने चिकित्सा, विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी में क्रांतिकारी बदलाव की नींव रखी है, वहीं दूसरी ओर इसने कई नयी और गंभीर चिंताओं को भी जन्म दिया है। एक बड़ी विडम्बना तो यही है कि जिस मनुष्य ने एआई को जन्म दिया है, वही उसे स्वयं से ऊपर समझने की भूल कर बैठता है। हमें हमेशा याद रखना होगा कि एआई हमारा सहयोगी है, हमारा विकल्प नहीं। अगर हम उसे अपना खुदा बनाएंगे, तब समस्याएं उत्पन्न होना स्वाभाविक है। याद रहे कि किसी भी एआई मॉडल की क्षमताओं का आधार डेटा और एल्गोरिदम ही है। इसलिए उसका दायरा सीमित है, वह पूर्ण नहीं है। जो डेटा उपलब्ध है, उसी के आधार पर वह प्रश्न का उत्तर देता है, इसलिए एआई के सुझाए समाधान या जानकारी कई बार व्यावहारिक नहीं होती है, उसमें पूर्वाग्रह भी दिखायी देता है। इसलिए एआई का अंधानुकरण करने से हमें बचना चाहिए और पूरी तरह उस पर निर्भर भी नहीं होना चाहिए।

श्रीराम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण : कर्कश शोर में संघ का विनम्र संदेश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने दिया वक्तव्य

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर निर्मित भव्य मंदिर में चढ़ावे से चोरी की घटना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण, निंदनीय और करोड़ों रामभक्तों की अटूट आस्था पर आघात करने वाली है। इस हृदयविदारक घटना पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले द्वारा जारी किया गया वक्तव्य इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि संघ के लिए श्रीराम की मर्यादा, पवित्रता और समाज की भावनाएं सर्वोपरि हैं। संघ ने न केवल इस घटना पर गहरी पीड़ा व्यक्त की है, बल्कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास को उसकी जवाबदेही का कठोरता से स्मरण भी कराया है। संघ ने साफ शब्दों में कहा है कि व्यवस्था और संचालन की कमियों को अविलंब दूर किया जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल की जांच के आधार पर दोषियों को कठोरतम दंड मिले और भविष्य के लिए एक निर्दोष, पारदर्शी और शुद्ध वित्तीय प्रबंधन की व्यवस्था स्थापित हो, यह संघ की दो टूक मांग है।

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

श्रीराम मंदिर प्रकरण में ‘कालनेमियों’ के विलाप से रहें सावधान

श्री अयोध्या धाम के भव्य श्रीराम मंदिर के कोष में हुई चोरी की घटना निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है। इस कृत्य से संपूर्ण हिन्दू समाज का आहत और हतप्रभ होना स्वाभाविक है। मंदिर की सुरक्षा, व्यवस्थापन और दान के प्रबंधन पर सवाल उठना भी स्वाभाविक है। हिन्दू समाज एवं हिन्दू संगठनों की एक राय है कि इस मामले में दोषियों पर कठोर कार्रवाई होनी ही चाहिए। लेकिन, इस पूरी घटना के बाद जो सबसे अधिक आश्चर्यजनक और वैचारिक रूप से खोखला पहलू उभर कर सामने आया है, वह है उन राजनेताओं और तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं की अति-सक्रियता, जो जीवनभर भगवान श्रीराम और उनकी जन्मभूमि पर श्रीराम मंदिर निर्माण के विरोधी रहे हैं। यह ध्यान देने वाली बात है कि आज मंदिर के धन की चिंता में जो लोग सबसे ज्यादा मुखर हैं, यह वही वर्ग है जिसका न तो कभी भगवान श्रीराम में विश्वास था और न ही वे उस पवित्र भूमि पर मंदिर निर्माण के पक्षधर थे।

रविवार, 28 जून 2026

लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए ऐतिहासिक संघर्ष

संघ शताब्दी वर्ष : आपातकाल के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा कर दिया, लोकतंत्र की बहाली के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया 

विश्व में भारतीय लोकतंत्र का उदाहरण दिया जाता है। यह सच है कि दुनिया में सबसे अधिक जीवंत और विशाल लोकतंत्र भारत में ही दिखायी देता है। लोकतंत्र भारत की परंपरा में है, इसलिए उसको जीना और संभालना हमें बखूबी आता है। परंतु, 25 जून 1975 वह दिनांक है, जब भारत के लोकतंत्र पर संकट आ गया था। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार ने देश पर आपातकाल थोप दिया। लोकतंत्र को घसीटकर सींखचों के पीछे डाल दिया गया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पंख नोंच लिए गए। रातों-रात आम नागरिकों के मौलिक अधिकारी समाप्त कर दिए गए। संविधान और लोकतंत्र पर हुए इस हमले का प्रतिकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने आगे बढ़कर किया। श्रीमती गांधी को भी यह ज्ञात था कि लोक संघर्ष समिति के आपातकाल विरोधी जनांदोलन को संगठित रूप से चलाने के पीछे संघ का अनुशासित कार्यकर्ता है। इसलिए उन्होंने 4 जुलाई 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। परंतु, यह प्रतिबंधन संघ के स्वयंसेवकों को आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष एवं सत्याग्रह करने से रोक नहीं सका। संविधान और लोकतंत्र को बचाने के लिए जिस प्रकार आगे बढ़कर संघ के स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह करते हुए पुलिस की बर्बाता का सामना किया, उसे देखकर संघ से असहमति रखनेवाले नेता एवं विचारकर भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुरीद बन गए।

शनिवार, 27 जून 2026

सुशासन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है हिन्दू साम्राज्य दिवस

ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी वह तिथि है, जिसने भारत के भाग्य का निर्धारण किया, इसी दिन छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की घोषणा की 

छत्रपति शिवाजी महाराज भारतीय इतिहास के ऐसे अद्वितीय नायक हैं जिन्हें न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य की अनेक पीढ़ियाँ भी स्मरण करेंगी। इसका मुख्य कारण यह है कि उन्होंने उस युग में, जब आक्रांताओं के अत्याचारों से भारतीय समाज शिथिल हो चुका था, तब हिन्दू समाज में उन्होंने एक नई चेतना जगाई। उसके भीतर विश्वास जगाया कि भारत में स्वराज्य की फिर से स्थापना हो सकती है, जहाँ सब स्वतंत्रता और स्वाभिमान के साथ जी सकते हैं।