रविवार, 24 मई 2026

संघ शिक्षा वर्ग : संघ कार्य के प्रशिक्षण की प्रयोगशाला

संघ शताब्दी वर्ष : मई-जून में देशभर में आयोजित होते हैं, 1927 में नागपुर में लगा था पहला वर्ग

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को एक अनुशासित और राष्ट्रव्यापी संगठन बनाने में ‘संघ शिक्षा वर्गों’ का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ये केवल प्रशिक्षण शिविर नहीं हैं, बल्कि ये संघ कार्य की साधना की प्रयोगशालाएं हैं। चयनित एवं दायित्ववान स्वयंसेवक संघ शिक्षा वर्गों में एक साधक की तरह रहते हैं और संघ कार्य के लिए संगठनात्मक एवं बौद्धिक प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। इन वर्गों से स्वयंसेवक केवल संघ चलाने की पद्धति नहीं सीखते, अपितु उनके व्यक्तित्व का भी सर्वांगीण विकास होता है। वर्ग में रहकर स्वयंसेवक सफल जीवन के लिए अनुशासन, समय प्रबंधन, दिनचर्या पालन, कार्यक्रम कुशलता, सामंजस्य और वक्तृत्व कला जैसे गुणों को समझता और सीखता है। सबके साथ मिलकर रहने से स्वयंसेवकों में सहयोग और सामंजस्य की भावना का विकास होता है। सोचने-समझने, तर्क करने, समस्या का समाधान खोजने, निर्णय लेने की क्षमता का विकास, अपनी भावनाओं को प्रकट करने का अभ्यास, सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का महत्व, दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, ये सब बातें भी संघ शिक्षा वर्ग से प्रशिक्षित स्वयंसेवक के व्यक्तित्व में दिखने लगती हैं। इसलिए संघ शिक्षा वर्गों को लेकर स्वयंसेवकों में भी खूब उत्साह रहता है। 

स्वयंसेवकों के प्रशिक्षण के महत्व को संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार भली प्रकार समझते थे। इसलिए संघ की स्थापना के दो वर्ष बाद ही डॉक्टर साहब ने संघ शिक्षा वर्ग की नींव रख दी थी। पहला वर्ग 1927 में नागपुर में लगाया गया। शुरुआती दौर में तीन सप्ताह तक चलने वाले इन वर्गों को ‘ग्रीष्मकालीन वर्ग’ कहा जाता था। समय के साथ इसके नाम में बदलाव आया। इन्हें ‘अधिकारी शिक्षा वर्ग (ओटीसी)’ भी कहा गया। वर्ष 1950 में इन्हें वर्तमान नाम ‘संघ शिक्षा वर्ग’ मिला। पूर्व रचना में प्राथमिक वर्ग के अलावा संघ शिक्षा वर्ग- प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष के नाम से होते थे। अब संघ शिक्षा वर्ग प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय वर्ष की जगह संघ शिक्षा वर्ग, कार्यकर्ता विकास वर्ग-1 और कार्यकर्ता विकास वर्ग-2 की रचना है। संघ कार्य के प्रशिक्षण के लिए तीन दिन से लेकर 25 दिन तक के वर्गों की रचना है- 

  • प्रारंभिक वर्ग : यह वर्ग तीन दिन का रहता है। यह नये कार्यकर्ताओं के लिए होता है।
  • प्राथमिक वर्ग : यह सात दिन का होता है, यह जिला स्तर पर आयोजित होता है। 
  • संघ शिक्षा वर्ग : यह 15 दिन का होता है, जो प्रांत के स्तर पर आयोजित किया जाता है। 
  • कार्यकर्ता विकास वर्ग-1 : यह 20 दिन का होता है। क्षेत्र स्तर पर आयोजित होता है। 
  • कार्यकर्ता विकास वर्ग-2 : यह 25 दिन का होता है और इसका स्वरूप अखिल भारतीय होता है। यह वर्ग रेशमबाग स्थित हेडगेवार स्मृति मंदिर परिसर में लगता है। इस वर्ग में देशभर के स्वयंसेवक शामिल होते हैं।

प्रारंभिक और प्राथमिक वर्ग को छोड़कर शेष संघ शिक्षा वर्गों को आयुसीमा के आधार पर दो श्रेणी में बाँटा गया है- सामान्य और विशेष। सामान्य वर्ग में 18 से 40 वर्ष की उम्र के स्वयंसेवक भाग लेते हैं। वहीं, जिन स्वयंसेवकों की उम्र 40 वर्ष से 65 वर्ष तक होती है, वे विशेष वर्ग में प्रशिक्षण लेते हैं। सामान्य वर्ग शारीरिक प्रधान और विशेष वर्ग बौद्धिक प्रधान होते हैं। सामान्यतौर पर संघ शिक्षा वर्ग मई और जून में ही आयोजित किए जाते हैं। दरअसल, इस समय विद्यालयों और महाविद्यालयों में परीक्षा होने के बाद ग्रीष्मकालीन अवकाश रहता है। युवाओं को इस खाली समय में संघ की कार्यविधि से परिचित कराने के लिए यह सबसे उपयुक्त समय माना गया और यह व्यवस्था प्रारंभ से आज तक कायम है। पिछले कुछ वर्षों में विशेष वर्गों का आयोजन सितंबर से दिसंबर के बीच भी किया जाने लगा है। 

प्रारंभिक दौर की चुनौतियां :

संघ शिक्षा वर्ग जब प्रारंभ हुए थे, तब अनेक प्रकार की चुनौतियां थीं। शिक्षार्थियों के रहने के लिए आवास, भोजन और प्रशिक्षण के लिए मैदान, इनकी व्यवस्था करना आसान नहीं होता था। नागपुर में आयोजित होने वाले तृतीय वर्ष (अब कार्यकर्ता विकास वर्ग-2) की बात करें तो प्रारंभ में इस वर्ग के लिए देशभर से आने वाले शिक्षार्थियों का निवास स्थानीय पाठशालाओं (जैसे लोकांचीशाला, मिल सिटी स्कूल/धनवटे नगर विद्यालय और न्यू इंग्लिश स्कूल) में होता था, जो नि:शुल्क उपलब्ध थीं। भोजन आस-पड़ोस के घरों से आता था। चिकित्सा, बिजली और जल जैसे बुनियादी खर्चों के लिए स्वयंसेवकों से नाममात्र शुल्क लिया जाता था। आज भी संघ शिक्षा वर्ग में शामिल होने के लिए स्वयंसेवक शुल्क देते हैं। 

नागपुर से देशव्यापी विस्तार की यात्रा :

  • 1934: पुणे में वर्गों का आयोजन शुरू हुआ।
  • 1938: महाराष्ट्र से बाहर लाहौर (अविभाजित भारत) में शुरुआत हुई।
  • 1940: नागपुर के शिक्षा वर्ग में उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक के स्वयंसेवकों ने हिस्सा लिया, जिसने इसे अखिल भारतीय स्वरूप दे दिया। 

जब संघ शिक्षा वर्ग रोकने पड़े :

कार्यकर्ता निर्माण के इस अबाध प्रवाह को कई बार राष्ट्रीय आपात स्थितियों के कारण रोकना भी पड़ा है। वर्ष 1948-1949 में संघ पर प्रतिबंध और 1976-1977 में आपातकाल के दौरान प्रतिबंध, 1993 में प्रतिबंध और 1991 में विशेष राष्ट्रीय परिस्थितियों (पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या और लोकसभा चुनाव) के दौरान यह वर्ग अवरुद्ध हुए थे। देश में जब कोरोना महामारी का प्रकोप था और संघ के स्वयंसेवक कोरोना योद्धा के रूप में समाज की सेवा कर रहे थे, तब भी 2020-2021 में संघ शिक्षा वर्गों को स्थगित करना पड़ा था।

संघ शिक्षा वर्ग में नियुद्ध (जूडो-कराटे) सीखते आरएसएस के स्वयंसेवक

जीवन जीने की कला सिखाते हैं संघ शिक्षा वर्ग :

  • सामाजिक समरसता : देशभर से स्वयंसेवक बिना किसी जातीय या रंग-रूप के भेदभाव के एकत्र होते हैं।
  • सामूहिक जीवन : एक साथ रहना और बिना भेदभाव के सामूहिक भोजन करना।
  • अखिल भारतीय दृष्टि : देश के विभिन्न हिस्सों से आए लोगों से मिलकर राष्ट्रव्यापी दृष्टिकोण विकसित होता है।
  • स्वावलंबन : अपना कार्य स्वयं करने की आदत, जिससे आत्मनिर्भरता आती है।
  • संगठन और अनुशासन : अनुशासन के प्रति जागरूकता और सभी के प्रति अपनेपन (बंधुत्व) का भाव पैदा होता है।
  • राष्ट्रीय चुनौतियों का बोध : समाज और राष्ट्र के सामने मौजूद चुनौतियों को समझना और उनके समाधान खोजना।
  • राष्ट्रभक्ति : बौद्धिक, कहानियों, गीतों और प्रसंगों के माध्यम से स्वयंसेवक राष्ट्रभक्ति का पाठ सीखते हैं।
  • सेवा : संघ शिक्षा वर्ग में विभिन्न प्रयोगों के माध्यम से सेवा का भाव भी स्वयंसेवकों के भीतर उतारा जाता है।
  • समर्पण : स्वयंसेवकों के जीवन में समाज, देश, धर्म के लिए समर्पण की भावना बढ़ती है।
  • श्रम साधना : वर्ग में स्वयंसेवक श्रम करना सीखते हैं।
संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 17 मई, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

मंगलवार, 12 मई 2026

भगवान के प्रति भक्ति प्रकट करने का सर्वोत्तम प्रकार है सेवा-भाव

संघ शताब्दी वर्ष : श्रीगुरुजी की दृष्टि में आध्यात्मिक साधना है सेवा


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहचान केवल शाखा पर खेलने एवं कदमताल करने वाले संगठन के रूप में नहीं है। अपितु, समाजसेवी संगठन के तौर पर भी संघ को देखा जाता है। समाज में विभिन्न प्रकार के सेवा उपक्रम चलाने वाले संगठन या व्यक्ति मानते हैं कि वे कोई विशिष्ट कार्य कर रहे हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग मानते हैं कि वे सेवा करके समाज पर उपकार कर रहे हैं। संघ ने प्रारंभ से स्पष्ट किया है कि उसके लिए सेवा कार्य समाज पर उपकार नहीं हैं अपितु सेवा तो करणीय कार्य है। स्वामी विवेकानंद के दर्शन ‘नर सेवा-नारायण सेवा’ को अनुकरणीय मानकर अपने नैतिक एवं स्वाभाविक दायित्व के रूप में संघ के स्वयंसेवक सेवा कार्य करते हैं। संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ के चिंतन में सेवा की संकल्पना अत्यंत व्यापक, गूढ़ और आध्यात्मिक है। उनके दर्शन में सेवा केवल एक औपचारिकता या सामाजिक दायित्व नहीं है, बल्कि यह ईश्वर की आराधना का सबसे उत्तम और प्रत्यक्ष मार्ग है। उन्होंने सेवा को भौतिकता के धरातल से उठाकर परोपकार और ईश्वरीय साधना के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित किया।

बुधवार, 6 मई 2026

भाजपा की ऐतिहासिक जीत, विपक्ष को आईना दिखाता जनादेश

जनता ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उसकी सामूहिक चेतना से बढ़कर कोई भी ताकत नहीं है। छल-बल और तुष्टीकरण से सत्ता हथियाने वाली ताकतों को जनता ने आईना दिखा दिया है। जैसे ही पश्चिम बंगाल में जनता को सुरक्षा का आश्वासन मिला, उसने निर्भय होकर बता दिया है कि लोकतंत्र में हिंसा, गुंडागर्दी और मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए कोई स्थान नहीं है। कहना होगा कि पाँच राज्यों (चार राज्य और एक केंद्रशासित प्रदेश) के चुनाव परिणामों ने भारतीय राजनीति के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। बंपर मतदान और मतदाताओं के अभूतपूर्व उत्साह के बीच जो परिणाम सामने आए हैं, वे न केवल चुनाव पश्चात आए सर्वेक्षण के अनुमानों पर मुहर लगाते हैं, बल्कि लोकतंत्र की जीत की कहानी भी धूमधाम से सुना रहे हैं।

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

भारतीय विचार के मजबूत स्तंभ ‘11 महानायक’

देखें : 11 महानायक : भारत के महान सपूतों की गाथा | 11 Mahanayak Book Review

भारत में महापुरुषों की एक लंबी शृंखला है। भारत के सुदीर्घ इतिहास के प्रत्येक कालखंड में हमें ऐसे नायक दिखाई देते हैं, जिन्होंने भारतीय समाज का मार्ग प्रशस्त किया। ऐसे में कुछ नायकों को चुनना और उनके व्यक्तित्व पर लिखना, अत्यंत कठिन कार्य है। अपने लेखन के दौरान प्रो. संजय द्विवेदी समय-समय पर भारत के नायकों के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर लिखते रहे हैं। उनमें से ही 11 नायकों का चयन करके उन्होंने एक पुस्तक तैयार की है, जिसका नाम है- ‘11 महानायक’। ‘संस्मय प्रकाशन’ से प्रकाशित पुस्तक ‘11 महानायक’ भारतीय इतिहास और नवजागरण के उन देदीप्यमान नक्षत्रों की गाथा है, जिन्होंने अपने त्याग, संघर्ष और वैचारिक स्पष्टता से एक सशक्त भारत की नींव रखी। यह पुस्तक ‘गागर में सागर’ भरने का एक सफल प्रयास है, जो पाठकों को भारत के महान सपूतों के जीवन-दर्शन से सीधे जोड़ती है।

रविवार, 26 अप्रैल 2026

श्रीगुरुजी को संन्यासी जीवन से वापस खींच लाया संघ कार्य

संघ शताब्दी वर्ष : श्री गोलवलकर ने स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शिष्य अखंडानंद जी से संन्यास की दीक्षा ली थी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ के जीवन का एक दौर ऐसा भी है, जब वे दुनियादारी छोड़कर अध्यात्म के मार्ग पर संन्यासी हो गए। लेकिन उनकी नियति और संघ कार्य की आवश्यकता उन्हें पुन: राष्ट्रीय आंदोलन में खींच लाई। संघ कार्य को विस्तार देते हुए भी उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन एक तपोनिष्ठ संन्यासी की भाँति ही व्यतीत किया। श्रीगुरुजी किसी आध्यात्मिक विभूति की तरह दिखाई देते थे। उनके चेहरे पर दमकता तेज भी इसका साक्ष्य देता था कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है अपितु अध्यात्म की ऊर्जा से सम्पन्न कोई पवित्र आत्मा है। श्रीगुरुजी के व्यक्तित्व का स्मरण करते हुए ‘माधव अर्चना’ गीत की रचना की गई है, जिसकी एक-एक पंक्ति उनके आध्यात्मिक व्यक्तित्व की ओर संकेत करती है। “सिन्धु सा गम्भीर मानस, थाह कब पाई किसी ने। आ गया सम्पर्क में जो, धन्यता पाई उसी ने”। श्रीगुरुजी के संपर्क में आए संघ से बाहर के बंधु भी मानते थे कि उनका जीवन केवल एक संगठनकर्ता का जीवन नहीं था, बल्कि वह भीतर से एक पूर्ण विरक्त और आध्यात्मिक साधक थे। उनका समूचा जीवन इस बात का प्रतीक है कि कैसे एक संन्यासी अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को समाज और राष्ट्र के कल्याण में समाहित कर सकता है।

रविवार, 19 अप्रैल 2026

संघ के सबसे युवा सरसंघचालक

संघ शताब्दी वर्ष : माधव सदाशिवराव गोलवलकर सबसे कम उम्र (34 वर्ष) में सरसंघचालक बने और सबसे अधिक समय (33 वर्ष) तक सरसंघचालक के रूप में स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया

स्वतंत्रता सेनानी डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम से जिस आंदोलन की शुरुआत की थी, उनके जाने के बाद उसे विस्तार देने का कार्य द्वितीय सरसंघचालक श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर ने किया, जिन्हें सब आदरपूर्वक ‘श्रीगुरुजी’ कहते थे। संघ के अब तक के इतिहास में श्रीगुरुजी सबसे युवा सरसंघचालक रहे हैं। वे केवल 34 वर्ष की आयु में ही सरसंघचालक नियुक्त हो गए थे। आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार भली प्रकार से श्रीगुरुजी की प्रतिभा को पहचानते थे, इसलिए उन्हें संघ की बागडोर सौंपते समय वे निश्चिंत थे। जब श्रीगुरुजी के नाम की विधिवत घोषणा हुई, तब उन्होंने अपने पहले ही भाषण में स्पष्ट किया कि, “सरसंघचालक का पद यह विक्रमादित्य का सिंहासन है। उस सिंहासन पर चरवाहे का लड़का आसीन हुआ और उसने यथोचित न्याय किया। डॉक्टरजी ने इस पद को ‘विक्रमादित्य का सिंहासन’ इस कोटि में बिठाया। उस पर आरूढ़ होने का अवसर मुझ जैसे साधारण नागरिक को मिला है, परंतु डॉक्टरजी मुझसे उचित रूप में ही उच्चारण तथा कृति करवा लेंगे...”। बहुत ही विनम्रता के भाव से उन्होंने सबके मन में यह विश्वास जगाया कि डॉक्टरजी ने ही इस प्रकार का मार्ग बना दिया है कि उस पर कोई भी चल सकता है। श्रीगुरुजी ने सरसंघचालक के रूप में 33 वर्षों तक स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया। उनके कार्यकाल में संघ के सामने अनेक प्रकार की चुनौतियां आईं, लेकिन वे एक कुशल नाविक की भाँति तूफानों के बीच से संघ रूपी जहाज को निकालकर ले आए। श्रीगुरुजी का जीवन राष्ट्र और समाज के लिए पूर्ण समर्पण की एक अद्भुत मिसाल है। एक मेधावी छात्र, एक समर्पित शिक्षक और एक तपस्वी के रूप में उनका जीवन दर्शन आज भी प्रेरणा का स्रोत है।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

अनादि समर : छावा के बलिदान से जाग उठा हिन्दू

देखें वीडियो : यूट्यूब चैनल 'अपना वीडियो पार्क' पर 'अनादि समर' की चर्चा


लेखक गिरीश जोशी की पुस्तक ‘अनादि समर’ छत्रपति शंभूराजे की जीवनी मात्र नहीं है, बल्कि यह भारतीय इतिहास के उस महत्वपूर्ण कालखंड का विश्लेषण है, जिसे सही ढंग से सामने नहीं लाया गया है। इस पुस्तक की पृष्ठभूमि की जानकारी मुझे ज्ञात है, इसलिए बताना चाहूँगा कि जब सुपरहिट फिल्म ‘छावा’ आई थी, तब छत्रपति शंभूराजे अर्थात् संभाजी महाराज के बारे में जानने की इच्छा लोगों के मन में अत्यंत प्रबल थी। यह एक सहज जिज्ञासा थी कि छत्रपति शंभूराजे के बलिदान के बाद क्या हुआ होगा? क्योंकि फिल्म की पटकथा हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए छत्रपति शंभूराजे के बलिदान पर खत्म हो जाती है। उस समय लेखक गिरीश जोशी जी को यह दायित्व बोध हुआ कि फिल्म जहाँ खत्म होती है, उसके आगे की कहानी वे सुनाएँगे। लोगों को यह अवश्य ही जानना चाहिए कि छत्रपति शंभूराजे के बलिदान ने किस प्रकार हिन्दुत्व की ज्वाला को और तीव्र किया। ‘अनादि समर’ के माध्यम से लेखक गिरीश जोशी ने छत्रपति शंभूराजे के मुगलों के साथ संघर्ष, उनके बलिदान और उस बलिदान के परिणामस्वरूप उपजे ‘लोकयुद्ध’ के वास्तविक इतिहास को सामने लाने का साधु कार्य किया है।