सोमवार, 27 जुलाई 2026

“यदि अस्पृश्यता (छुआछूत) गलत नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है” – बालासाहब देवरस

संघ शताब्दी वर्ष : हिन्दू एकता एवं समरसता पर बालासाहब के क्रांतिकारी विचार


हिन्दू समाज की एकता और सामाजिक समरसता पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस के विचार अत्यंत स्पष्ट, प्रखर और क्रांतिकारी थे। ‘वसंत व्याख्यानमाला’ का उनका भाषण विश्व के ऐतिहासिक एवं महान भाषणों में शामिल किया जा सकता है। 8 मई, 1974 में पुणे में हुए अपने इस भाषण में छुआछूत (अस्पृश्यता) को लेकर बालासाहब ने जो कहा, वैसा खरा-खरा शायद ही किसी ने बोला हो। अब्राहम लिंकन के प्रसिद्ध विचार- “अगर गुलामी अनैतिक या गलत नहीं है, तो फिर कुछ भी गलत नहीं है”- का उल्लेख करते हुए बालासाहब ने कहा- “अगर छुआछूत गलत नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है”। जातिगत भेदभाव के निर्मूलन के लिए काम करने वाले महानुभाव अक्सर इस ओर या उस ओर खड़े दिखाई देते हैं। उनके विचारों में राजनीति, परस्पर द्वेष और कटुता रहती है। लेकिन बालासाहब के विचारों में स्पष्टता के साथ-साथ आत्मीयता और बंधुता की झलक दिखाई देती है। सामाजिक समरसता पर उनके विचार समाधानमूलक और व्यावहारिक हैं। बालासाहब जी का मानना था कि “विषमता नष्ट करने के प्रयासों में सभी का सहभाग अपेक्षित है। संयम के साथ उत्तम व्यवहार के द्वारा यह प्रयास होंगे तभी उसमें सफलता मिलेगी”।

बालासाहब देवरस जी का यह भाषण हिन्दू एकता और सामाजिक समरसता के लिए जमीनी स्तर पर संघ का जो ‘मौन’ कार्य चलता है, उसकी ही ‘मुखर अभिव्यक्ति’ थी। सामाजिक समरसता के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य को देखकर महात्मा गांधी से लेकर डॉ. भीमराव अंबेडकर तक प्रभावित हो गए थे। परंतु, संघ ने कभी अपने प्रयासों का ढिंढोरा नहीं पीटा। इसका लाभ लेकर कम्युनिस्टों एवं अन्य वितंडावादियों ने संघ को लेकर समाज में अनेक विसंगतियां फैलाने का प्रयास किया था। उन्होंने समाज के मन में यह बात बिठाने का प्रयास किया कि संघ छुआछूत को मानता है और देश में वर्ण व्यवस्था लाना चाहता है। संघ के सरसंघचालक बालासाहब ने अपने भाषण से ऐसे सभी वितंडावादियों के झूठे प्रपंच को भी समाप्त करने का काम किया। इसके साथ ही समाज की सज्जनशक्ति का प्रबोधन भी किया कि हिन्दू समाज की एकता और सामाजिक समरसता के लिए किस प्रकार की दृष्टि रखना आवश्यक है।

हिन्दू एकता के लिए आवश्यक है विषमता समाप्त हो :

बालासाहब देवरस का स्पष्ट मानना था कि अस्पृश्यता समाज की विषमता का एक अत्यंत दुःखद और दुर्भाग्यजनक पहलू है, जिसका पूरी तरह से उन्मूलन होना ही चाहिए। हिन्दू समाज की अक्षुण्ण एकता के लिए यह आवश्यक है कि जाति के आधार पर भेदभाव समाप्त हो। वे कहते थे कि जब तक समाज में ऊँच-नीच और छोटे-बड़े की विषमता रहेगी, तब तक पूरा समाज कभी भी संगठित और सामर्थ्यवान नहीं हो सकता। जो लोग जाति के खोखले स्वाभिमान के कारण इस ‘अव्यवस्था’ को अपनी ‘व्यवस्था’ या ‘परंपरा’ मानते हैं, उनको भ्रम के जाल से बाहर निकालने के लिए अपने सार्वजनिक वक्तव्यों में उन्होंने अक्सर स्पष्ट किया कि प्राचीन काल में अस्पृश्यता का कोई अस्तित्व नहीं था और न ही यह हमारी मूल व्यवस्था का हिस्सा थी। यह एक रूढ़ि और बीमारी की तरह बाद के कालखंड में समाज में समाविष्ट हो गई, जिसे समय के साथ हमें बाहर कर देना चाहिए। 

आरक्षित वर्ग को सुविधाएं कब तक :

सामान्य तौर पर हम जातिगत भेदभाव के प्रश्न से बचकर निकलने का प्रयास करते हैं। यह आचरण ठीक नहीं है। बालासाहब का कहना था कि हमें नि:संकोच यह मानना चाहिए कि हमारे ही अपने बंधुओं के साथ एक समय में ठीक व्यवहार नहीं हुआ है। यह बात उचित ही है यदि हम यह नहीं मानेंगे तो सामाजिक समरसता के लिए किए जाने वाले प्रयास और उपायों को लेकर संशय रहेगा। चूँकि हिन्दू समाज का एक वर्ग लंबे समय तक पीछे रहा है इसलिए उसके उत्थान के लिए सरकारें समय-समय पर विशेष प्रावधान करती हैं, उनके प्रति हमारी सम्यक दृष्टि रहे। इस संदर्भ में बालासाहब का मत अनुकरणीय है- “अब तक उनके पिछड़े रहने के कारण उन्हें सब प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध कराना आवश्यक है। ऐसी सुविधाओं की यदि वे माँग कर रहे हैं तो वह उनका अधिकार है। तथा ऐसी सुविधाएँ कब तक जारी रहें यह भी तय करना उनकी इच्छा पर निर्भर हो”। 

एक-दूसरे का करें सम्मान :

सामाजिक समरसता के बारे में एक और महत्वपूर्ण संकेत उन्होंने किया कि “दलित बंधु किसी की कृपा नहीं चाहते, वे बराबरी का स्थान चाहते हैं और वह भी अपने पुरुषार्थ से ही”। इस विचार में तथाकथित सवर्ण एवं दलित वर्ग, दोनों के लिए ही संदेश है। किसी भी व्यक्ति को बराबरी का स्थान देना और उसे उचित सम्मान देना, किसी प्रकार की कृपा नहीं है। जिस वर्ग के साथ उपेक्षा का व्यवहार होता है, वह भी कृपा नहीं चाहता है। वह अपने पुरुषार्थ से जो हासिल कर रहा है, उसके लिए स्थान और सम्मान चाहता है। इसी प्रकार, जो लोग दलित हितों की आड़ में दूसरे वर्ग को कोसते हैं, उसे अपमानित करने का प्रयास करते हैं, उनको भी बालासाहब सीख देते हैं- “समाज के किसी भी वर्ग को अन्याय का पुतला कहकर कोसना, अपमानित करना या उनका मनोबल गिराना कदापि उचित नहीं है”। इस प्रकार का नकारात्मक दृष्टिकोण रखने से भी सामाजिक समरसता के विचार को व्यवहार में साकार नहीं किया जा सकता है। किसी के भी स्वाभिमान को ठेस पहुँचाना ठीक नहीं है। वे कहते थे कि सामाजिक समरसता के लिए ऐसा मार्ग निकालना आवश्यक है, जिसमें किसी के प्रति कटुता न हो।

समाज के समझदार लोगों पर बड़ा दायित्व :

सामाजिक एकता और समरसता स्थापित करने के प्रयास सौहार्दपूर्ण ढंग से आगे बढ़ें इसलिए बालासाहब ने समाज की सज्जनशक्ति से आह्वान किया। इस कार्य के लिए उपयुक्त वातावरण बनाने के लिए उन्होंने धर्माचार्यों (धर्मगुरुओं, संतों, महात्माओं और विद्वानों) से विशेष रूप से आगे आने का आग्रह किया, क्योंकि उनका मानना था कि इन महापुरुषों का जनमानस पर बहुत गहरा प्रभाव होता है। बालासाहब कहते हैं- “समाज के अन्य समझदार लोगों पर भी बड़ा दायित्व है। उन्हें ऐसे मार्ग सुझाने चाहिए कि जिनसे काम तो बनेगा किन्तु समाज में कटुता उत्पन्न नहीं होगी। ‘उपायं चिन्तयन् प्राज्ञः अपायमपि चिन्तयेत्’। समाज में सौहार्द, सामंजस्य और परस्पर सहयोग का वातावरण स्थापित करने के लिए ही हमें समानता चाहिए। इस बात को भूलकर अथवा इसे न समझते हुए जो लोग बोलेंगे, लिखेंगे और आचरण करेंगे, वे निश्चय ही अपने उद्देश्यों को बाधा पहुँचाएंगे”। उन्होंने धर्मगुरुओं से आग्रह किया कि वे अपने प्रवचनों एवं उपदेशों के माध्यम से लोगों को यह स्पष्ट करें कि हमारे धर्म के ‘शाश्वत मूल्य’ (हमेशा बने रहने वाले सिद्धांत) कौन से हैं और ‘कालानुरूप परिवर्तनीय’ (समय के साथ बदलने योग्य) बातें कौन सी हैं। हम सब जानते हैं कि हमारा समाज धर्माचार्यों की बातों का अनुसरण करता है। यदि धर्माचार्य लोगों को समझाएंगे कि अस्पृश्यता हमारा जीवन मूल्य नहीं है, यह किसी कालखंड में बुराई के रूप में हमारे समाज में घर कर गया होगा, अब इसे छोड़ना ही हितकारक है। तब निश्चित ही उसके अच्छे परिणाम आएंगे। जब भी इस प्रकार के प्रयास हुए हैं, उनके सार्थक परिणामों की अनुभूति हम सबने की ही है।

प्रेरक प्रसंग : 

बालासाहब सामाजिक समरसता के अपने विचारों को बाल्यकाल से ही जीते थे। एक बार बालासाहब ने अपनी मां से कहा, ‘‘संघ के मेरे कुछ मित्र भोजन करने के लिए आएंगे, परंतु मैं चाहता हूं कि उन सबको मेरी तरह सम्मान प्राप्त हो, चाहे वे किसी भी जाति से संबंध रखते हों। उन्हें भोजन उन्हीं बर्तनों में परोसा जाए, जिनमें हमारा परिवार खाता है। वे सब मेरे साथ रसोई में बैठकर भोजन करेंगे। मैं जाति के नाम पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं चाहता।’’ इस पर मां ने अपनी सहमति प्रदान कर दी और उसी दिन से जब वे उनके घर खाना खाने के लिए आए, देवरस परिवार में स्वयंसेवकों की जाति को लेकर कभी कोई प्रश्न नहीं पूछा गया। उस काल में देश में यह एक असाधारण बात थी, उन दिनों जाति-संबंधी भेदभाव अत्यधिक प्रचलित था।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 19 जुलाई, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

बुधवार, 22 जुलाई 2026

आंदोलन को बदनाम करते हिंसक प्रदर्शन

अराजक तत्वों ने हड़प लिए छात्रों के जरूरी मुद्दे, उनके मंच पर कब्जाकर अपना नैरेटिव चलाने का किया प्रयास


देश में प्रमुख परीक्षाओं की पारदर्शिता और लाखों युवाओं का भविष्य अत्यंत संवेदनशील विषय हैं। परीक्षाओं के आयोजन में लगातार हो रही गड़बड़ियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार को इस पर कोई ठोस रणनीति बनानी ही चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि नीट परीक्षा को लेकर उठी चिंताएं पूरी तरह उचित हैं। एक अभिभावक की भाँति उन्होंने युवाओं को आश्वस्त किया है कि उनके भविष्य से खिलवाड़ करने वाले किसी भी दोषी को छोड़ा नहीं जाएगा और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत कठोर कार्रवाई की जाएगी। उल्लेखनीय है कि सरकार ने नीट परीक्षा में हुई गड़बड़ी पर संज्ञान लेकर उसका फिर से व्यवस्थित आयोजन कराया है। इसके बावजूद, इस संवेदनशील मुद्दे की आड़ में जिस तरह दिल्ली की सड़कों पर हिंसा, उपद्रव और ‘चलो संसद’ के नाम पर अराजकता फैलाई गई, वह देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

“जिन्होंने हेडगेवारजी को नहीं देखा, वे बालासाहब को देख लें”

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस के लिए कहा जाता था कि वे संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की प्रतिमूर्ति थे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस उपाख्य बालासाहब देवरस संघ की पहली शाखा के स्वयंसेवक थे। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर के मोहिते बाड़े में जो शाखा लगाई थी, बालासाहब उसी शाखा के स्वयंसेवक थे। डॉक्टर साहब के संपर्क में आने के बाद 1927 में केवल 11 वर्ष की आयु में बालासाहब देवरस ने शाखा जाना प्रारंभ कर दिया। संघ शिल्पी डॉक्टर साहब ने स्वयं अपने हाथों से बालासाहब के व्यक्तित्व को गढ़ा और उन्हें प्रशिक्षित किया। उन्होंने संघ रूपी बीज बालासाहब के हृदय में बोया। जिस प्रकार छत्रपति शिवाजी महाराज ने ‘हिन्दवी स्वराज्य’ का सपना अपने मित्रों के हृदय में जैसे का तैसा उतार दिया था, उसी प्रकार डॉक्टर साहब ने भी स्वयंसेवकों के पहले समूह के मन-मस्तिष्क में संघ की विराट अवधारणा को उतार दिया था। देवरस जी ने डॉक्टर साहब की आँखों से ही संघ को देखा, उनकी दृष्टि के अनुरूप ही संघ की सृष्टि का विकास एवं विस्तार किया। 12 वर्ष से लेकर 70 वर्ष की आयु तक बालासाहब ने एक तपस्वी और सच्चे स्वयंसेवक की भाँति अपना जीवन जिया। उन्होंने सबके सामने उदाहरण प्रस्तुत किया कि राष्ट्र के लिए किस प्रकार जिया जाता है। संघ के स्वयंसेवक बालासाहब में संघ सृष्टि के निर्माता डॉक्टर साहब की छवि देखते थे। वर्ष 1943 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रशिक्षण शिविर (संघ शिक्षा वर्ग) पुणे में चल रहा था, जहाँ एक दिन बालासाहब देवरस का बौद्धिक होना था। बौद्धिक से पहले वक्ता का परिचय कराने के लिए तत्कालीन सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ खड़े हुए। बालासाहब के परिचय में उन्होंने कहा कि “आपमें से कइयों ने डॉ. हेडगेवारजी को नहीं देखा होगा। अगर आप बालासाहब देवरस को देखेंगे तो आपके सामने डॉ. हेडगेवारजी खड़े नजर आएंगे”।

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

मातुश्री का दर्शन है ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’

पुस्तक चर्चा : पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होल्कर के जीवन के सभी पहलुओं को देखने के लिए पढ़ें यह पुस्तक


“सनातन संस्कृति में सर्वश्रेष्ठ धर्म है ‘मानव धर्म’। मानवता की स्थापना करना ही धर्म की स्थापना करना है। देवी अहिल्याबाई होल्कर ने धर्म की स्थापना हेतु अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया। समस्त प्रजा को वात्सल्य से सींचने वाली देवी अहिल्याबाई होल्कर पूरे मालवा की मातुश्री कहलाई। त्याग, तपस्या, समर्पण, अनुशासन एवं न्याय- मानव धर्म के मूल आधार हैं। इन्हीं आधारभूत कर्तव्यों का पालन समाज में समरसता और व्यवस्था को स्थापित करता है। अहिल्याबाई का संपूर्ण जीवन न्याय प्रियता, सद्चरित्र, संस्कार अनुशासन और धर्म के स्तंभों पर मजबूती से खड़ा है”। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. साधना बलवटे की पुस्तक ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ का केंद्रीय भाव यही है। नाट्यरूप में प्रस्तुत पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर के जीवन से उन्होंने भारत की बेटी के संघर्ष, साहस और नेतृत्व की कहानी सुनाई है। यह गाथा आपको प्रारंभ से अंत तक बाँधे रखती है, फिर भले ही आपने देवी अहिल्याबाई की कहानी पहले से सुन भी क्यों न रखी हो। पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर के 300वें जयंती वर्ष में यह पुस्तक अवश्य पढ़ी जानी चाहिए। इस पुस्तक की एक ओर विशेषता है कि इसका पाठक वर्ग बहुत विशाल है यानी हर कोई इस पुस्तक को पढ़ सकता है।

सोमवार, 13 जुलाई 2026

बालासाहब ने शाखा को बनाया ‘अखंड साधना’ का केंद्र

संघ शताब्दी वर्ष : संघ कार्य के विस्तार और शाखाओं के सुदृढ़ीकरण के शिल्पी थे बालासाहब देवरस, उनकी पहल पर ही सातों दिन शाखा लगना शुरू हुई, सुबह की शाखा भी उनकी देन है


संघ कार्य के विस्तार, शाखाओं के विकास एवं सुदृढ़ीकरण में तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस (मधुकर दत्तात्रेय देवरस) का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला रहा है। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार अकसर स्वयंसेवकों से कहते थे कि शाखा अच्छी चलेगी तो समाज के सब काम होंगे। समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में काम करने के लिए राष्ट्रीय विचार से ओत-प्रोत कार्यकर्ता शाखा से ही तैयार होंगे। इसलिए अच्छी शाखा चलना जरूरी है। एक बार युवकों के साथ बातचीत के दौरान डॉक्टर साहब ने प्रश्न किया कि “आदर्श शाखा का लक्षण क्या है?” इसके उत्तर में बालासाहब ने जो कहा, वह उनके विचारों की स्पष्टता को दर्शाता है। उन्होंने कहा- “संघ कार्य को अपना जीवित कार्य समझकर, संघ कार्य के लिए सारा समय लगाने के लिए प्रस्तुत युवक जिस शाखा से विपुल संख्या में खड़े होंगे, ऐसी शाखा को मेरी दृष्टि से ‘आदर्श शाखा’ कहना उचित होगा”। संघ कार्य को राष्ट्रव्यापी बनाना है, तो उसके लिए जरूरी है कि आदर्श शाखाएं खड़ी हों। डॉक्टर साहब की शाखाओं की संकल्पना को धरातल पर उतारने और शाखाओं का व्यापक नेटवर्क खड़ा करने में बालासाहब देवरस ने जो संगठनात्मक कौशल दिखाया, वह अनुकरणीय है। बालासाहब की संगठन कुशलता से डॉक्टर साहब भली प्रकार परिचित थे। इसलिए उन्होंने नागपुर में संघ कार्य की जिम्मेदारी बालासाहब को सौंपी थी। संघ के कार्य को नागपुर से बाहर लेकर जाने के लिए यह आवश्यक था कि नागपुर में अच्छा काम चले। नागपुर के कार्यवाह के रूप में बालासाहब ने जिस प्रकार से संघ कार्य को आधार दिया, उस आधार पर ही आगे चलकर संघ कार्य राष्ट्रव्यापी हुआ। 

देखें यह वीडियो - आरएसएस और राजनीति पर सटीक विश्लेषण

शनिवार, 11 जुलाई 2026

तीजन बाई: भारतीय सांस्कृतिक विरासत की राजदूत

भारत की सांस्कृतिक विरासत की सशक्त पहचान और पंडवानी गायन की जादुई आवाज अब खामोश हो गई है, लेकिन उसकी गूंज सदियों तक भारतीय संस्कृति के आकाश में गूंजती रहेगी। पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का 70 वर्ष की आयु में 5 जुलाई, 2026 को रायपुर एम्स में निधन केवल एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि भारतीय लोक कला के एक सुनहरे अध्याय का विश्राम लेना है। अपने नाना से महाभारत की कथाएं सुनकर बड़ी हुई तीजन बाई ने जब तंबूरा हाथ में थामा, तो उन्होंने केवल गीत नहीं गाए, बल्कि महाभारत के चरित्रों को अपनी सशक्त आवाज और प्रभावशाली अभिनय से मंच पर जीवंत कर दिया। उनकी कला और जीवन यात्रा हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो संघर्षों से पार पाना चाहता है। एक ऐसे दौर में जब महिलाओं का मंच पर आकर तेज स्वर में गाना और अभिनय करना आसान नहीं था, उन्होंने सामाजिक बंधनों और रूढ़ियों की परवाह न करते हुए अपनी राह चुनी।

गुरुवार, 9 जुलाई 2026

एआई एक सहयोग टूल है, हमारा विकल्प या निर्णयकर्ता नहीं

डेटाबेस और एल्गोरिदम पर आधारित एआई, कभी भावनाओं, संवेदनाओं, अनुभवजन्य बुद्धि वाले मनुष्य से होशियार नहीं हो सकता


आज के तकनीकी युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) को हर समस्या के जादुई समाधान के रूप में दिखाया जा रहा है। इस बात में कोई शक नहीं है कि एआई आने वाले समय में बड़े परिवर्तन का कारण बनने वाला है। लेकिन यह परिवर्तन मानव समाज के हित में होगा या उसके विरुद्ध, यह सब हमें ही तय करना है। अगर हमने सचेत होकर एआई का विकास और उपयोग नहीं किया, तब हमारे सामने अनेक प्रकार की चुनौतियां खड़ी हो जाएंगी। एक ओर, एआई ने चिकित्सा, विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी में क्रांतिकारी बदलाव की नींव रखी है, वहीं दूसरी ओर इसने कई नयी और गंभीर चिंताओं को भी जन्म दिया है। एक बड़ी विडम्बना तो यही है कि जिस मनुष्य ने एआई को जन्म दिया है, वही उसे स्वयं से ऊपर समझने की भूल कर बैठता है। हमें हमेशा याद रखना होगा कि एआई हमारा सहयोगी है, हमारा विकल्प नहीं। अगर हम उसे अपना खुदा बनाएंगे, तब समस्याएं उत्पन्न होना स्वाभाविक है। याद रहे कि किसी भी एआई मॉडल की क्षमताओं का आधार डेटा और एल्गोरिदम ही है। इसलिए उसका दायरा सीमित है, वह पूर्ण नहीं है। जो डेटा उपलब्ध है, उसी के आधार पर वह प्रश्न का उत्तर देता है, इसलिए एआई के सुझाए समाधान या जानकारी कई बार व्यावहारिक नहीं होती है, उसमें पूर्वाग्रह भी दिखायी देता है। इसलिए एआई का अंधानुकरण करने से हमें बचना चाहिए और पूरी तरह उस पर निर्भर भी नहीं होना चाहिए।