संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक रज्जू भैया पढ़ने में बहुत मेधावी थे, स्कूल के दिनों में ही उन्होंने भांप लिया था कि ब्रिटिश राज भारत के लिए अच्छा नहीं है
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चौथे सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ का संपूर्ण जीवन प्रखर मेधा, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति का अप्रतिम उदाहरण है। बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी रज्जू भैया ने उस दौर में ब्रिटिश शासन के वैभवशाली पदों को ठुकरा दिया था, जब लोग सरकारी नौकरियों के लिए लालायित रहते थे। उन्हें स्कूल के दिनों से ही यह अनुभव होने लगा था कि ब्रिटिश राज भारत के लिए अच्छा नहीं है। अंग्रेजों से मुक्ति पाने के लिए देश में स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा है। रज्जू भैया एक घटना को याद करते हैं– “मेरठ में नौचंदी का प्रसिद्ध मेला लगता था, यदा-कदा हम लोग भी उसे देखने जाते थे। भगतसिंह और उनके दो साथी राजगुरु और सुखदेव को मृत्युदंड दिया गया था। एक दुकानदार ने उस मेले में अपनी दुकान पर उस दृश्य का एक छोटा चित्र लगा रखा था, जो मेले में आए दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया था। अगले दिन ही पुलिस ने उस चित्र को हटा दिया और हमें यह पता लगा कि उस दुकानदार को गिरफ्तार कर लिया गया है। हम उस घटना को पूरी तरह समझ पाने में सक्षम नहीं थे, किंतु अंग्रेजों के प्रति हमारे मन में रोष अवश्य उत्पन्न हुआ और हमने ‘टोडी बच्चा हाय हाय’ के नारे का भरपूर समर्थन किया।” इसी विचार के कारण उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि ब्रिटिश शासन के अधीन नौकरी नहीं करूंगा।
स्वास्थ्यगत कारणों से रज्जू भैया की प्रारंभिक पढ़ाई की व्यवस्था उनके पिता बलवीर सिंह ने घर पर ही कर दी थी। एक शिक्षक प्रतिदिन घर आकर उन्हें और उनकी बहनों को तीन–चार घंटें पढ़ाते। रज्जू भैया की बुद्धि इतनी प्रखर थी कि उन्होंने हिन्दी वर्णमाला के अक्षर एक ही दिन में सीख लिए थे। कुछ ही दिन के अभ्यास के बाद वे अपनी पुस्तकों के अलावा अन्य बच्चों की पुस्तकों को भी पढ़ने लगे। कम पृष्ठों की पुस्तक को वे एक ही दिन में पढ़ डालते थे। उनके पिता बच्चों के लिए दो पत्रिकाएं– ‘शिशु’ और ‘बालसखा’ भी मंगाते थे। साहित्य में गहरी रुचि होने के कारण रज्जू भैया इन दोनों पत्रिकाओं को भी बड़े चाव से पढ़ते थे। बाद में, उन्होंने विद्यालय में प्रवेश लेकर अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की।
रज्जू भैया ने 1938 में नैनीताल के सेंट जोसेफ कॉलेज से अपनी इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्हें प्रथम श्रेणी प्राप्त हुई और विज्ञान में विशेष योग्यता। रज्जू भैया के अनुसार, उनके पिताजी की इच्छा थी कि वे इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में बैठें, क्योंकि उसमें उत्तीर्ण होने का अर्थ था, अपने आप सरकारी नौकरी भी पा लेना। उन दिनों इंजीनियरिंग की परीक्षा उत्तीर्ण करने भर से सरकारी नौकरी मिल जाया करती थी। पर रज्जू भैया के मन में यह स्पष्ट था कि ब्रिटिश शासन के प्रतिरोध के रहते उन्हें सरकारी नौकरी नहीं करनी चाहिए। इसलिए उन्होंने पिताजी से कहा कि “मैं एक अध्यापक या फिर एक वैज्ञानिक बनना चाहूँगा”। वैज्ञानिक और अध्यापन कार्य में स्वायत्तता एवं स्वतंत्रता के अवसर रहते हैं।
कुलपति को भी बताई मन की बात :
वर्ष 1941 में रज्जू भैया ने अपनी बीएससी की पढ़ाई पूरी की और शीर्षस्थ पाँच छात्रों में से एक रहे। इसके बाद उन्होंने भौतिकी से एमएससी करने का निर्णय लिया। रज्जू भैया की प्रतिभा को देखते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति ने उन्हें सुझाव दिया कि वे ‘इंडियन सिविल सेवा’ की परीक्षा में बैठें। लेकिन रज्जू भैया ने इनकार कर दिया क्योंकि उन्होंने तो पहले से ही इरादा कर लिया था कि वे ऐसी कोई नौकरी नहीं करेंगे, जहाँ उन्हें ब्रिटिश सरकार के अधीन होकर कार्य करना पड़े। इसलिए उन्होंने उसी विश्वविद्यालय में, जहाँ वे पढ़े थे, व्याख्याता के पद को स्वीकार कर लिया। 17 जुलाई, 1943 के दिन रज्जू भैया ने आधिकारिक रूप से इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भौतिकी पढ़ाना शुरू किया और फिर अगले 23 वर्षों तक वहाँ कार्य किया।
सरकार की सनक के चलते साढ़े पाँच महीने की जेल :
देश विभाजन के अनिश्चितता भरे समय में महात्मा गांधी की 30 जनवरी, 1948 को हत्या कर दी गई। इस दु:खद प्रसंग को राजनीतिक अवसर में बदलते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निशाना बनाया। राष्ट्रीय विचारों के संगठन को उस कायरतापूर्ण कार्य में फंसाने की कोशिश की, जिससे संघ का कोई लेना–देना नहीं था। अपितु संघ ने तो शोक में 13 दिन अपनी शाखाएं स्थगित कर दी थीं, जो संघ के इतिहास में कभी नहीं किया गया। इसके बावजूद सरकार ने झूठे आरोपों को आधार बनाकर 4 फरवरी, 1948 को आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। संघ के कई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। 5 फरवरी को रज्जू भैया को भी गिरफ्तार करके नैनी जेल भेज दिया गया। वे वहाँ साढ़े पाँच महीने रहे और फिर रिहा हो गए।
सरकार ने सेवा समाप्त की, न्यायालय से जीतकर दिखाया आईना :
सरकार ने रज्जू भैया को जेल भेजने के साथ ही उनकी नौकरी छीनने की तैयारी भी कर ली थी। जेल को कारण बनाकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय की कार्यकारिणी समिति ने रज्जू भैया की सेवाओं को समाप्त घोषित कर दिया। हालांकि, रज्जू भैया ने सोचा कि यह अच्छा हुआ, अब संघ को पूरा समय दे सकेंगे। लेकिन उनके सहकर्मियों ने उनसे विश्वविद्यालय प्रशासन के निर्णय के विरुद्ध लड़ने का आग्रह किया, क्योंकि इससे विश्वविद्यालय अधिकारियों द्वारा अपने मनमाने बल प्रयोग करने का एक उदाहरण स्थापित हो जाता। इसलिए अपने सहकर्मियों के कहने पर रज्जू भैया ने इस निर्णय को न्यायालय में चुनौती दी। न्यायालय में सरकार को मुंह की खानी पड़ी। न्यायालय के आदेश पर उनकी सेवाओं को बहाल कर दिया गया। इसके बाद रज्जू भैया ने लंबे समय तक विश्वविद्यालय में पढ़ाया। जनवरी 1966 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी। अब वे पूर्णकालिक संघ प्रचारक बन गए।
विज्ञान के लोग संघ में ज्यादा :
संघ से बाहर कई महानुभावों के साथ रज्जू भैया के अच्छे संपर्क थे। डॉ. राममनोहर लोहिया के प्रति उनके मन में प्रेम और आदर का भाव था। एक बार राममनोहर लोहिया ने रज्जू भैया से कहा- “तुम तो बहुत उदार और प्रगतिशील विचारों के दिखाई पड़ते हो। यूनिवर्सिटी में क्या विषय पढ़ाते हो?” रज्जू भैया ने उत्तर दिया- “भौतिकी”। इस पर लोहिया जी हँसने लगे और कहने लगे कि “मैं तो समझता था कि संघ के सारे लोग प्राचीन इतिहास या दर्शनशास्त्र जैसे विषयों के होते हैं। तुम तो आधुनिक विषय पढ़ाने वाले हो”। तब रज्जू भैया ने हँसते हुए उत्तर दिया- “हमारे गुरुजी (जो सरसंघचालक हैं) प्राणी विज्ञान से एमएससी हैं। हमारे यहाँ विज्ञान क्षेत्र के लोग ज्यादा आते हैं”।
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| संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 20 सितंबर, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ 'साधना के सौ वर्ष' |
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