रविवार, 22 मार्च 2026

यूनियन जैक को उखाड़ फेंकने के लिए खोद दी सुरंग

संघ शताब्दी वर्ष : जन्मजात देशभक्त थे संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार

यह चित्र AI प्लेटफॉर्म Google Gemini से निर्मित है।

कहते हैं कि पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करने वाले महापुरुष डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का बचपन भी कुछ ऐसा ही था, जो स्पष्ट संकेत देता था कि यह बालक बड़ा होकर भारत के नवनिर्माण की नींव रखेगा। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को ‘जन्मजात देशभक्त’ ऐसे ही नहीं कहा जाता है। उनके बचपन के अनेक प्रसंग मिलते हैं, जो उनकी देशभक्ति की केसरिया छाप को दर्शाते हैं। 13 वर्ष की उम्र में केशव ने प्लेग की महामारी में अपने माता-पिता को खो दिया। इस प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी केशव ने स्वयं को संभाले रखा। उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और क्रांति के मार्ग पर कदम बढ़ाते गए। स्कूल के दिनों में ही उनकी प्रखर देशभक्ति की मुखर अभिव्यक्ति होने लग गई थी। जीवन के संघर्ष में तपकर निखरे केशव बचपन में ही बड़ों की भाँति परिपक्व हो गए थे। 1901 में जब किंग एडवर्ड-सप्तम इंग्लैंड की राजगद्दी पर बैठे, तब नागपुर में एम्प्रेस मिल के मालिकों ने खुशी में आतिशबाजी का कार्यक्रम रखा। लगभग पूरा शहर इस आतिशबाजी को देखने के लिए एकत्रित हुआ। बच्चों को तो आतिशबाजी वैसे ही बहुत आकर्षित करती है। बड़ी संख्या में बच्चे भी आतिशबाजी का लुत्फ उठाने के लिए आए थे। लेकिन, जब केशव से आतिशबाजी देखने चलने का आग्रह किया गया तो उन्होंने अपने मित्रों से कहा- “यह शर्म की बात है कि हम एक विदेशी शासक की ताजपोशी पर जश्न मनाएं; मैं यह आतिशबाजी देखने नहीं जाऊंगा”।

भारत के शौर्य की कहानियां सुनकर डॉक्टर जी के बाल-मन में देशप्रेम के संस्कार पल्लवित हो रहे थे। उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज की कहानियां सुनी थीं। श्रीशिवछत्रपति ने किशोरावस्था में ही पहला दुर्ग जीतकर, वहाँ से गुलामी का प्रतीक उखाड़कर भारत का ध्वज ‘भगवा’ फहरा दिया था। बचपन से ही डॉक्टर जी का मन भारत की स्वतंत्रता हेतु कुछ करने के लिए छटपटाता रहता था। उनके जीवन का एक किस्सा स्वतंत्रता के लिए उनकी बेचैनी को दर्शाता है। नागपुर में सीताबर्डी के किले पर ‘यूनियन जैक’ फहराया जाता था। बालक केशव और उनके मित्रों ने सोचा कि अगर हम यह ध्वज उतारकर यहाँ अपने देश का झंडा फहरा दें, तो अंग्रेजों की हार हो जाएगी और हम जीत जाएंगे। केशव और उनके मित्र विद्यालय के बाद वझे गुरुजी के घर पर अध्ययन के लिए जाते थे। देशभक्ति से भरे बाल-मन ने यहीं योजना बनाई कि सुरंग बनाकर किले में प्रवेश किया जाए। अपने शिक्षक की नजरों से बचकर उन्होंने उनके ही एक कमरे से सुरंग खोदना शुरू कर दिया। किंतु, दो-तीन दिन में ही वझे गुरुजी को क्रांतिकारी बच्चों की गतिविधियों पर संदेह हुआ। उन्होंने कमरे को खोलकर देखा तो हैरान रह गए। बच्चों की उदात्त देशभक्ति देखकर वझे गुरुजी का मन गर्व से भर गया। डॉक्टर साहब के साथ लंबा समय व्यतीत करने वाले लेखक ना. हा. पालकर ने इस घटना का विस्तारपूर्वक वर्णन ‘डॉक्टर हेडगेवार (चरित्र)’ में किया है। वझे गुरुजी इस घटना से इतने अधिक प्रभावित हुए कि अक्सर बड़े कौतुक के साथ वे यह प्रसंग दूसरों को सुनाया करते थे।

मिठाई किसे प्रिय नहीं होती! बच्चों को तो मिठाई अत्यंत प्रिय होती है। एक प्रसंग ऐसा है कि बालक केशव ने मिठाई को कूड़ेदान में फेंकते हुए कहा, “यह मिठाई मैं नहीं खा सकता। विक्टोरिया हमारी महारानी नहीं हैं।” दरअसल, ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के राज्यारोहण समारोह की जुबली भारत में भी मनाई गई थी। ब्रिटिश सरकार के निर्देशों के दबाव में सभी विद्यालयों में कार्यक्रमों का आयोजन करना तय हुआ था। केशव के स्कूल में भी कार्यक्रम हुआ। उस समय वे तीसरी कक्षा में पढ़ते थे। उनके स्कूल में कार्यक्रम के बाद मिठाई बांटी गई। केशव ने उस मिठाई को लेकर कूड़ेदान में फेंक दिया। एक शिक्षक ने उनसे पूछा कि क्या तुमको मिठाई अच्छी नहीं लगती, जो कूड़ेदान में फेंक दी? तब केशव ने निडरता के साथ उत्तर दिया- “हमारा राज्य छीनकर हमको गुलाम बनाने वालों के राज्यारोहण समारोह की मिठाई हमारे लिए मिठाई कैसे हो सकती है? और यह दिन हमारे लिए उत्सव का दिन कैसे हो सकता है? यह दिन तो शोक का दिन है”।

वंदे मातरम् का जयघोष करने पर तो केशव को विद्यालय से ही निकाल दिया गया था। वर्ष 1907 में नागपुर के नील सिटी हाईस्कूल में केशव बलिराम हेडगेवार पढ़ रहे थे। विद्यालय के वार्षिक निरीक्षण के लिए प्रशासनिक अधिकारी आने वाले थे। हेडगेवार जी ने अपने मित्रों के साथ मिलकर योजना बनाई कि निरीक्षक जिस भी कक्षा में जाएंगे, वहाँ उनका ‘स्वागत’ वंदे मातरम् के जयघोष से किया जाएगा। केशव की योजना के अनुसार यही हुआ, जैसे ही निरीक्षक उनकी कक्षा में आए, सभी विद्यार्थियों ने एक साथ खड़े होकर ‘वंदे मातरम्’ का जोरदार उद्घोष किया। गुस्से से लाल-पीले होकर निरीक्षक ने इस ‘अनुशासनहीनता’ पर विद्यार्थियों को अविलंब सजा देने की माँग की। सभी बच्चों को निष्कासित कर दिया गया। बाद में, स्थानीय नेताओं के हस्तक्षेप, माता-पिता एवं शिक्षकों के दबाव व आग्रह पर लगभग सभी बच्चों ने खेद प्रकट कर दिया। लेकिन केशव ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया। उन्होंने भरी सभा में कहा- “अगर मातृभूमि की आराधना अपराध है तो मैं यह अपराध एक नहीं, अनगिनत बार करूँगा और इसके लिए मिलने वाली सजा को भी सहर्ष स्वीकार करूँगा”। परिणामस्वरूप, केशव हेडगेवार को वंदे मातरम् का जयघोष करने के कारण विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। सुप्रसिद्ध लेखक सुशोभन सरकार, वी.आर. शेंडे, सी.पी. भिशिकर, अमूल्य रत्न घोष और अमरेन्द्र लक्ष्मण गाडगिल के लेखन से लेकर ब्रिटिश दस्तावेजों में इस घटना का प्रमुखता से उल्लेख मिलता है। देशभक्ति और क्रांति की यह भावना ही उन्हें मेडिकल की पढ़ाई के लिए कोलकाता खींचकर ले गई थी। वहाँ उन्होंने ‘अनुशीलन समिति’ से जुड़ने के लिए कठोरतम परीक्षा उत्तीर्ण की।

बाल्यकाल की ये सभी घटनाएँ इस बात का अकाट्य प्रमाण हैं कि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के भीतर राष्ट्रप्रेम की ज्वाला कितनी प्रखर थी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का बचपन किसी साधारण बालक की नहीं, बल्कि एक युगदृष्टा की कहानी है। मातृभूमि को परम वैभव पर ले जाने का जो संकल्प उन्होंने बचपन में लिया था, वह उनके अंतिम श्वास तक कायम रहा। उनका यह जीवन-चरित्र आज भी इस बात का सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत है कि यदि राष्ट्रभक्ति और स्वाभिमान के बीज बचपन में ही बो दिए जाएँ, तो वे आगे चलकर एक सशक्त और स्वाभिमानी राष्ट्र के नवनिर्माण की सबसे मजबूत नींव बनते हैं।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 22 मार्च, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

बुधवार, 18 मार्च 2026

आरएसएस के साथ आई समाज की सज्जनशक्ति

सर्वव्यापी-सर्वस्पर्शी कार्य : संघ शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों में समाज का सहयोग और सहभागिता ने स्वयंसेवकों का बढ़ाया उत्साह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शताब्दी वर्ष पर कोई बड़ा उत्सव आयोजित न करके छोटे-छोटे स्थानों (मंडल/बस्ती) पर कार्यक्रमों का आयोजन किया, ताकि संघ कार्य का व्याप बढ़े। शताब्दी वर्ष के निमित्त संघ ने मुख्य रूप से दो प्रकार के कार्यक्रमों की व्यापक योजना बनाई है। इनमें पहला उद्देश्य संगठन का विस्तार करना है, जबकि दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य समाज की सज्जन शक्ति को सद्भाव और समरसता के सूत्र में पिरोकर राष्ट्र निर्माण के लिए संगठित करना है। इस ऐतिहासिक अवसर पर आयोजित संघ के कार्यक्रमों में समाज का जो अभूतपूर्व और भरपूर साथ मिल रहा है, वह संगठन की राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता का प्रमाण है। कहना होगा कि कई कार्यक्रमों का नेतृत्व तो समाज ने ही किया, संघ की शक्ति तो उनकी सहयोगी बनी। विशेष रूप से हिन्दू सम्मेलनों का आयोजन समाज की सज्जनशक्ति ने आगे रहकर किया।

सोमवार, 16 मार्च 2026

अनूठा जन्मदिन : पुस्तकों से तौले गए 8 वर्षीय मारुति

भोपाल में 8 वर्षीय बालक मारुति का जन्मदिन अनूठे ढंग से मनाया गया। पूरे उत्सव में भारतीय संस्कृति की गहरी झलक दिखाई दी। मारुति के माता-पिता और दादा-दादी ने भारतीय पद्धति के अनुसार जन्मदिन की योजना बनाई। इस उत्सव को सार्थक स्वरूप देते हुए 'पुस्तक-तुला' का आयोजन किया गया, जिसमें मारुति को पुस्तकों से तौला गया। ​तराजू के एक पलड़े में मारुति को बैठाया गया और दूसरे पलड़े में पुस्तकें रखी गईं। जो भी अतिथि आए थे, वे अपने साथ लाई गई पुस्तकें या वहां उपलब्ध पुस्तकों को दूसरे पलड़े में तब तक रखते गए, जब तक मारुति का पलड़ा ऊपर नहीं उठ गया। इस अवसर पर कई सामाजिक कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे। परिवार 'पुनरुत्थान विद्यापीठ' से जुड़ा हुआ है और इस प्रकार जन्मदिन मनाने की प्रेरणा उन्हें वहीं से प्राप्त हुई। मारुति की शिक्षा भी पुनरुत्थान विद्यापीठ के गुरुकुल में चल रही है।

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

'जादूगरनी' - जीवन, प्रेम और रिश्तों की खूबसूरत अभिव्यक्ति

वीडियो देखें : क्या एक कविता जीवन बदल सकती है?


“जब कोई कविता किसी मरते हुए को जीन का सहारा दे जाए तो वह जादूगरनी होती है”। युवा कवि सुदर्शन व्यास ने अपने नये काव्य संग्रह का नामकरण इसी भाव के साथ किया है- जादूगरनी। सच है, कविताओं में वह जादू होता है कि वे बड़े परिवर्तन की संवाहक बनती हैं। दुनिया के कितने ही बड़े आंदोलनों का आधार कविता ही बनी है। भारत के स्वाधीनता संग्राम में क्रांतिकारियों और स्वतंत्रतता सेनानियों का बीज मंत्र ‘वंदेमातरम’ भी काव्य है। ऐसा काव्य जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में नये सिरे से प्राण फूंक दिए। भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण का जीवन दर्शन काव्य के रूप में ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बहता आया है। कविता के महत्व एवं हमारे जीवन में उसकी उपस्थिति पर कवि ने उचित ही लिखा है कि “मनुष्यता के सबसे बड़े शोक में भी कविता गायी जाती है और सबसे बड़ी खुशी में भी कविता होती है। कविता हमारे जीवन का आधार है और जब कोई कविता किसी मरते हुए को जीने का सहारा दे जाए तो वह जादूगरनी होती है”।

रविवार, 8 मार्च 2026

स्वदेशी का आग्रही है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

संघ शताब्दी वर्षआरएसएस ने धरातल पर उतारकर दिखाया स्वदेशी विचार


भारत की सर्वांगीण स्वतंत्रता एवं विकास का सपना देखने वाले महापुरुषों ने ‘स्वदेशी’ का महत्व समझा और भारत को आत्मनिर्भर एवं सशक्त बनाने के लिए समाज से स्वदेशी आचरण का आग्रह किया। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि यदि हमें फिर से उन्नति करनी है, तो लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की शिक्षा देनी होगी। स्वातंत्र्यवीर सावरकर, बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय और महात्मा गांधी से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार तक, सभी ने स्वदेशी को अपनाने का आग्रह किया। भारत के निर्माण का सपना देखने वाले विचारक यह भली-भांति जानते थे कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति के मूल में स्वदेशी का आचरण ही है।

भारत को परमवैभव पर ले जाने की महान आकांक्षा के साथ 1925 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई, तब से ही संघ ने स्वदेशी को लेकर समाज का प्रबोधन प्रारंभ कर दिया था। संघ के लिए स्वदेशी केवल एक आर्थिक नारा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का मूल मंत्र है। संघ ने अपनी स्थापना के साथ ही भारत की आत्मनिर्भरता और भारतीय मूल्यों पर आधारित अर्थतंत्र की वकालत की है।

मंगलवार, 3 मार्च 2026

कहाँ है आपकी निष्ठा

खामेनेई की मौत : प्रदर्शन करनेवाले मुसलमानों की निष्ठा कहाँ है?


अमेरिका और इजराइल के हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद मध्य पूर्व में जो भू-राजनीतिक भूचाल आया है, उसकी अनुगूंज भारत के कई हिस्सों में सुनाई दे रही है। लखनऊ से लेकर श्रीनगर तक कई क्षेत्रों में हजारों मुस्लिम प्रदर्शनकारियों का सड़कों पर उतरना, अमेरिका और इजराइल के खिलाफ नारेबाजी करना, एक गहरी चिंता का विषय है। यह प्रदर्शन सवाल उठाता है कि भारत के मुसलमानों की निष्ठा आखिर कहाँ है? ईरान के सुप्रीम खामनेई की मौत के बाद भारत में प्रदर्शनों का क्या औचित्य है? अपने आप को इस्लामिक सत्ता/व्यवस्था से जोड़ने की यह बीमारी आज की नहीं है। खिलाफत आंदोलन को याद कीजिए और उसके उद्देश्य का विश्लेषण कीजिए। आखिर क्यों भारत के मुसलमानों ने खिलाफत आंदोलन चलाया था? क्या उसका कोई संबंध भारत की स्वतंत्रता से था? 

आज से आठ दशक पूर्व संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जिस कड़वे सच की ओर देश का ध्यान आकृष्ट किया था, वह आज पूरी तरह प्रासंगिक नजर आता है। उन्होंने स्पष्ट लिखा था कि मुसलमानों की निष्ठा उस देश के प्रति नहीं होती जहाँ वे रहते हैं, बल्कि उस सांप्रदायिक विश्वास पर निर्भर करती है जिसका वे हिस्सा हैं। लखनऊ से लेकर जम्मू-कश्मीर की सड़कों पर उतरकर मातम मनाने वाली भीड़ और खामेनेई को शहीद का दर्जा देने की कवायद, इसी मानसिकता का साक्षात प्रमाण है।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

छत्रपति शिवाजी महाराज से सीखें जल प्रबंधन

सह्याद्रि के उत्तुंग शिखरों पर आसमान से बातें करनेवाले गिरिदुर्ग हों या फिर समुद्री लहरों के बीच मुस्कुराते जलदुर्ग, उनकी व्यवस्थाएं देखकर ध्यान आता है कि हिन्दवी स्वराज्य के योजनाकार, वास्तुकार, अभियंता और निर्माण में योगदान करनेवाले सभी शिल्पकार एवं श्रमिक अपने कार्य-कौशल में सिद्धस्थ थे। सुरक्षा पक्ष हो या फिर कला पक्ष, सबका बारीकी से विचार किया गया। इसके साथ ही बुनियादी आवश्यकताओं की चिंता भी की गई। भारत में जहाँ भी आपने दुर्ग देखे होंगे, उनमें जलस्रोत की व्यवस्था देखी ही होगी। परंतु हिन्दवी स्वराज्य के किलों में जलस्रोतों का प्रबंधन रचनात्मक ढंग से किया गया है। हजारों फीट की ऊंचाई पर बारह महीने पानी की व्यवस्था बनाए रखना चुनौतीपूर्ण था। कुशल योजनाकारों ने बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से दुर्गों पर जलाशयों का निर्माण किया है। किसी भी दुर्ग पर एक-दो नहीं अपितु अलग-अलग हिस्सों में कई जलाशयों का निर्माण किया जाता था। हम हिन्दवी स्वराज्य की राजधानी दुर्गदुर्गेश्वर श्रीरायगढ़ की ही बात करें, तो वहाँ छोटे-बड़े 84 जलाशयों का निर्माण किया गया है। चूँकि रायगढ़ पर अधिक संख्या में लोग रहते थे इसलिए यहाँ बड़ी संख्या में जल निकायों का निर्माण किया गया। श्रीरायगढ़ के प्रसिद्ध जल निकाय हैं- गंगा सागर तालाब, हत्ती तालाब, कुशावर्त तालाब, हनुमान टांकी, बारह टांकी इत्यादि।