गुरुवार, 16 जनवरी 2020

राम तेरी दुनिया

Lokendra Singh लोकेन्द्र सिंह | Raisen Fort, Madhya Pradesh 

राम तेरी दुनिया में आकर
रंग देख रहा हूं, जीने का ढंग देख रहा हूं।
पल-पल में बदल रहे हैं लोग
रंगे सियारों का रंग देख रहा हूं।।

महंगाई सुरसा-सा मुंह फाड़ रही है
आम आदमी दाने-दाने को मोहताज देख रहा हूं।
मेहनतकश, मजदूर, गरीबों के पसीने से
अमीरों की तिजोरी में जमा धन देख रहा हूं।।

परंपराएं धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं
राक्षसी संस्कृति जन्मते देख रहा हूं।
बाजारवाद का चमत्कार है
नए-नए फर्जी त्योहार मनते देख रहा हूं।।

गजब है! दोस्त-दोस्त कहते-कहते
दुश्मनों-सा अंदाज देख रहा हूं।
पहले तो आस्तीनों में ही सांप थे
अब, खीसे में भी अजगर पलते देख रहा हूं।।

मोहब्बत का भी रंग उड़ गया है
इश्क शौकिया, बाजारू बनते देख रहा हूं।
साथ जीने-मरने की कसमें नहीं, वादे नहीं
दो पल मौज में बिताने, रिश्ते बनते देख रहा हूं।।

- लोकेन्द्र सिंह -
(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)

सोमवार, 30 दिसंबर 2019

मंजिल की तलाश में

Lokendra Singh : Gopal Bag, GovindGarh, Rewa

मंजिल की तलाश में
जब निकला था
तब कुछ न था पास में
न थी जमीं और न आसमां था
बस सपने बहुत थे आंख में
अब तो...
मिल गया है रास्ता
पैर जमाना सीख रहा हूं
शिखर को जो छूना है।

चलता रहा मीलों
एक आस में भूखा-प्यासा
दर-दर घूमा खानाबदोश-सा
न तो दर मिला, न दरवेश कोई
पर उम्मीद की लौ बुझने न दी मैंने
अब तो...
दिया भी है, बाती भी
बस, प्रदीप्त होना सीख रहा हूं
जहां को रोशन जो करना है।

मुकाम बनाना है एक
इस जहां में
कब, कहां और कैसे
न जानता था, न किसी ने बताया
बस, सहयात्रियों से सीखता रहा
अब तो...
चांद-तारे हैं साथ में
टिमटिमाना सीख रहा हूं
क्षितिज पर जो चमकना है।

- लोकेन्द्र सिंह -
(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)

रविवार, 8 दिसंबर 2019

लक्ष्य

Narmda River, Sethani Ghat, Hoshangabad, MadhyaPradesh / Lokendra Singh

हार और जीत ही काफी नहीं 
जिंदगी में मेरे लिए
मीलों दूर जाना है अभी मुझे। 
निराशा के साथ बंधी 
आशा की इक डोर थामे
उन्नत शिखर की चोटी पर चढ़ जाना है मुझे। 
हार और जीत ही....

है अंधेरा घना लेकिन
इक दिया तो जलता है रोशनी के लिए
उसी रोशनी का सहारा लिए 
भेदकर घोर तमस का सीना 
उस दिये का हाथ बंटाना है मुझे। 
हार और जीत ही...

चांद पर पहुंच पाऊंगा या नहीं
ये सोच अभी नहीं रुकना है मुझे
चलता रहा विजय की उम्मीद लिए 
तो चांद पर न सही
तारों के बीच टिमटिमाना है मुझे। 
हार और जीत ही...

- लोकेन्द्र सिंह -
(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)

गुरुवार, 21 नवंबर 2019

बेटी के लिए कविता-8

ऋष्वी के पांचवे जन्मदिन पर
नखरे तुम्हारे 
---
सुनो, मीठी
नखरे बढ़ गए हैं तुम्हारे
ज़िद्दी पहले ही
बहुत थी तुम।
अब गुस्सा होकर
कोप भवन में बैठना
बड़ा प्यारा लगता है।

बता नहीं सकता
मनाना तुम्हें
कितना भाता है मुझे।
यह बात तो
जानती हो तुम भी
इसलिए नौटंकी तुम्हारी
मेरे घर आने पर ही
होती है शुरू।

मुझे पता है
तुम स्वभाव से
नखराली-ज़िद्दी नहीं हो।
बस बातें मनवाने
मुझसे खुशामद कराने
करती हो चालाकी तुम।
भरी है मासूमियत
सब अदाओं में।

परंतु, ध्यान रखना
मेरी प्यारी बेटी
ये ज़िद-नखरे
बुरी आदत न बन जाएं।
अन्यथा, खो जाएगा
चैन-ओ-सुकून दोनों का
रखना है बचाकर
अपनी समझदारी।

रविवार, 10 नवंबर 2019

राष्ट्रवाद के चिंतन और विकास पर महत्वपूर्ण कृति

वैसे तो 'राष्ट्रवाद' सदैव ही जनसाधारण की चर्चाओं से लेकर अकादमिक विमर्श के केंद्र में रहता है। किंतु, वर्तमान समय में राष्ट्रवाद की चर्चा जोरों पर है। राष्ट्रवाद का जिक्र बार-बार आ रहा है। राष्ट्रवाद को 'उपसर्ग' की तरह भी प्रयोग में लिया जा रहा है, यथा- राष्ट्रवादी लेखक, राष्ट्रवादी संगठन, राष्ट्रवादी विचारक, राष्ट्रवादी राजनीतिक दल, राष्ट्रवादी नेता, राष्ट्रवादी मीडिया इत्यादि। ऐसे में लोगों की रुचि यह जानने-समझने में बहुत बढ़ गई है, आखिर ये राष्ट्रवाद है क्या? राष्ट्रवाद को अनेक प्रकार से परिभाषित किया गया है। राष्ट्रवाद को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा गया है। राष्ट्रवाद पर विभिन्न प्रकार के मत हैं। ऐसे में एक सामान्य व्यक्ति के लिए राष्ट्रवाद को समझना कठिन हो जाता है। वह भ्रमित हो जाता है, क्योंकि देश में एक वर्ग ऐसा है जो भारतीय राष्ट्रवाद पर पश्चिम के राष्ट्रवाद का रंग चढ़ा कर लोगों के मन में उसके प्रति चिढ़ पैदा करने के लिए योजनाबद्ध होकर लंबे समय से प्रयास कर रहा है। इनके प्रोपोगंडा लोगों को उलझा देते हैं। राष्ट्रवाद के प्रति नकारात्मक वातावरण बनाने में बहुत हद तक यह वर्ग सफल भी रहा है। लेकिन, भारत का राष्ट्रवाद इतना उदात्त और स्वाभाविक है कि उसके विस्तार को किसी प्रकार का षड्यंत्र रोक नहीं सका। यह सुखद है कि कुछ विद्वान भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की रोशनी को जनता के बीच लेकर जाने का असाध्य श्रम कर रहे हैं। लेखक राजेन्द्र नाथ तिवारी ने अपनी पुस्तक 'राष्ट्रवाद : चिंतन एवं विकास' के माध्यम से उसी अत्यावश्यक कार्य को भली प्रकार आगे बढ़ाया है। भरोसे के साथ कहा जा सकता है कि उनकी यह पुस्तक राष्ट्रवाद जैसे गूढ़ विषय को सरलता के साथ समझाने वाली महत्वपूर्ण कृति सिद्ध हो सकेगी। वर्तमान समय में जब राष्ट्रवाद पर बहस तेज है, तब श्री तिवारी की पुस्तक अनेक प्रश्नों के सटीक उत्तर लेकर पाठकों/अध्ययेताओं के बीच उपस्थित है। 
          पुस्तक के चौथे अध्याय में लेखक ने बेबाकी के साथ स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रवाद की अवधारणा को समझने के लिए सबसे पहले लार्ड मैकाले एवं उसके मानसपुत्रों की सिखाई हुई असत्य तथ्यों और बातों को भूलना उचित होगा। राष्ट्रवाद को समझने में रुचि रखने वालों से लेखक का यह आग्रह उचित ही है। क्योंकि, जब तक हमारे पूर्वाग्रह होंगे, हम राष्ट्रवाद को निरपेक्ष भाव से समझ ही नहीं पाएंगे। भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को समझना है, तब यह अत्यंत आवश्यक है कि हम अपने दिमाग के दरवाजे-खिड़कियां अच्छे से खोल लें। दरअसल, भारतीय दृष्टि में राष्ट्रवाद की अवधारणा संकुचित नहीं, बल्कि वृहद है। यह 'सर्वसमावेशी'। सबका साथ-सबका विकास। सब साथ आएं। इसलिए हमारे पूर्वजों ने वसुदैव कुटुम्बकम् की बात की। वहीं, यूरोप द्वारा परिभाषित और प्रस्तुत 'राष्ट्रवाद' अत्यंत संकुचित है। 'राष्ट्रवाद' का अध्ययन करने से पूर्व इस अंतर को समझने की आवश्यकता है। लेखक राजेन्द्र नाथ तिवारी की पुस्तक यह कार्य बखूबी करती है। 
          पहले अध्याय में लेखक ने 'राष्ट्रवाद' के चिंतन और विकास को प्रस्तुत किया है। इस शब्द की उत्पत्ति और उसके वास्तविक अर्थ को समझाने का प्रयास किया है। भारतीय वांग्मय में यह शब्द कहाँ और किस संदर्भ में आया है, इसे भी लेखक ने बताया है। अगले तीन अध्यायों में उन्होंने विस्तार से भारतीय चिंतन में राष्ट्रवाद संबंधी विविध विचारों को प्रस्तुत किया है। वेदों, उपनिषदों और आधुनिक शास्त्रों में राष्ट्र की संकल्पना ने कैसे आकार लिया है, उसको संदर्भ सहित समझाया है। लेखक ने चिंतन की गहराई तक उतर कर कुछ महत्वपूर्ण तथ्य हम सबके सामने रखे हैं। इस पुस्तक के महत्व को रेखांकित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक पद्मश्री राम बहादुर राय ने लिखा है कि पुस्तक की उपादेयता वर्तमान में सांस्कृतिक-राष्ट्रवाद एवं संचेतना के विकास के अध्ययन में पंडित दीनदयाल उपाध्याय सहित राष्ट्रवादीजनों, संघ के विचारकों, गीता की सार्थक उपयोगिता के लिए तो है ही, यह पुस्तक इतिहास लेखन की दृष्टि से भी गंभीर एवं नीति-रीति पर विचार करती है। वैदिक काल से आधुनिक काल के बीच की कड़ी को मिलाकर अध्ययन करने से पुस्तक इतिहासविदों एवं राष्ट्र के प्रति सचेष्ट अध्ययन के उत्सुकजनों को सीधे प्रभावित करेगी। दस अध्यायों में लेखक राजेन्द्र नाथ तिवारी ने 'राष्ट्रवाद : चिंतन एवं विकास' को एक सुव्यवस्थित आकार दिया है। नि:संदेह रूप से यह पुस्तक राष्ट्रवाद को लेकर भारतीय बोध को सुदृढ़ और मजबूत आधार देती है। लेखक के चिंतन में अध्ययन का महत्तव भी यथेष्ट है। पुस्तक का व्यापक क्षेत्र सबको समाहित कर सबके लिए पठनीय एवं उपयोगी है। 
(मीडिया विमर्श के दिसम्बर, 2019 के अंक में प्रकाशित)

पुस्तक : राष्ट्रवाद : चिंतन एवं विकास
लेखक : राजेन्द्र नाथ तिवारी
मूल्य : 230 रुपये
पृष्ठ : 160
प्रकाशक : समदर्शी प्रकाशन
मकान नंबर-1652, न्यू हाउसिंग बोर्ड, 
हुड्डा सेक्टर-1, रोहतक, हरियाणा-124001
मोबाइल : 9599323508

शनिवार, 2 नवंबर 2019

भाषाई पत्रकारिता पर संदर्भ सामग्री से भरपूर मीडिया विमर्श का 'मलयालम मीडिया विशेषांक'

भारतीय भाषाओं के सम्मान का अनुष्ठान


यूँ तो मीडिया विमर्श का हर अंक ही विशेष होता है। हर अंक पठनीय और संदर्भ सामग्री से भरा पड़ा संग्रहणीय। कई ऐसे विषयों पर भी मीडिया विमर्श ने विशेषांक निकाले हैं, जिनकी मीडिया में भी अत्यंत कम चर्चा होती है और होती भी है तो वही पुराने किस्से/तथ्यों के साथ, नया कुछ नहीं होता। मीडिया विमर्श उन विषयों को नए तथ्यों के साथ हम सबके सामने लेकर आया है।
          बहरहाल, भारतीय भाषायी पत्रकारिता के यशस्वी योगदान को रेखांकित करने में भी 'मीडिया विमर्श' अग्रणी और महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर रहा है। अभी जो अंक (दिसम्बर, 2019) आ रहा है, वह 'मलयालम भाषा की पत्रकारिता' पर केंद्रित है। अतिथि संपादक डॉ. सी. जयशंकर बाबु (पांडिचेरी) ने 'मलयालम मीडिया विशेषांक' का संपादन किया है। निश्चित तौर पर मीडिया विमर्श का यह अंक अध्ययनशील पत्रकारों, पत्रकारिता के शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण होगा। इससे पूर्व डॉ. सी. जयशंकर बाबु ने मीडिया विमर्श के 'तेलुगु मीडिया विशेषांक' का बखूबी संपादन किया था। उनके उस संपादन से हम कल्पना कर सकते हैं कि मलयालम भाषा पर केन्द्रित यह अंक भी अच्छा बन पड़ा होगा।
          उल्लेखनीय है कि 'भारतीय भाषायी पत्रकारिता' के विस्तार को रेखांकित करने के अपने महत्वपूर्ण प्रयासों में मीडिया विमर्श इससे पूर्व उर्दू पत्रकारिता, गुजराती पत्रकारिता और तेलुगु पत्रकारिता पर विशेषांक प्रकाशित कर चुका है। हिंदी पत्रकारिता पर तो उसका हर अंक उपयोगी सामग्री लेकर आता है। मलयालम चौथी भारतीय भाषा है, जिस पर 'मीडिया विमर्श' पत्रिका का नया अंक आया है। इन सब यशस्वी प्रयासों के पीछे मीडिया गुरु प्रो. संजय द्विवेदी हैं, जो मीडिया विमर्श के कार्यकारी संपादक भी हैं।

शनिवार, 19 अक्तूबर 2019

संभावना और चुनौतियों के बीच मूल्यानुगत मीडिया का आग्रह


सक्रिय पत्रकारिता और उसके शिक्षण-प्रशिक्षण के सशक्त हस्ताक्षर प्रो. कमल दीक्षित की नयी पुस्तक मूल्यानुगत मीडिया : संभावना और चुनौतियांऐसे समय में आई है, जब मीडिया में मूल्यहीनता दिखाई पड़ रही है। मीडिया में मूल्यों और सिद्धांतों की बात तो सब कर रहे हैं, लेकिन उस तरह का व्यवहार मीडिया का दिखाई नहीं दे रहा है। मीडिया के जरिये कर्ता-धर्ता मालिक/पत्रकार अपने व्यावसायिक और वैचारिक हित साधने में लगे हुए हैं। उन्होंने अपने नये मूल्य गढ़ लिये हैं। मूल्यहीनता के इस अंधकार को दूर करने का काम यह पुस्तक कर सकती है। प्रो. कमल दीक्षित की लेखकी में यह शक्ति है। वे निरंतर अपनी लेखनी के प्रवाह से यह करते आ रहे हैं। उनके शब्दों में सत्याग्रह है। वे आध्यात्मिक पुरुष भी हैं। जो वह कह रहे हैं, उसे उन्होंने जिया भी है। विभिन्न समाचार पत्रों का संपादन करते हुए उन्होंने मूल्यों और सिद्धांतों को कभी नहीं छोड़ा। प्रत्येक स्थिति में मूल्यों की पत्रकारिता को आगे बढ़ाया। पत्रकारिता के अध्यापन एवं प्रशिक्षण में भी अपनी भावी पीढ़ी को मिशनरी पत्रकारिता के तत्व ही हस्तांतरित किए। शायद इसलिए ही प्रो. कमल दीक्षित जिस मूल्यानुगत मीडिया की बात कर रहे हैं, अनेक चुनौतियों के बाद भी वैसी मीडिया के अस्तित्व की भरपूर संभावना दिखाई देती है।
            पुस्तक में शामिल अनेक आलेखों में प्रो. कमल दीक्षित की चिंता/बेचैनी दिखाई देती है। वह मानते हैं कि सामाजिक बदलाव के लिए मीडिया की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। मीडिया इसमें कहीं चूक रहा है। मीडिया से वह अपेक्षा करते हैं कि उसे अपने कर्तव्य पथ पर वापस लौटना चाहिए। वे लिखते हैं कि मीडिया ने अपने मूल्यों को दरकिनार किया है तथा मानवीय मूल्यों से भी उसके संबंध कमजोर हुए हैं। उसने भारतीय तथा जातीय संस्कृति को प्रभावित करते हुए पाश्चात्य तथा उपभोक्तावादी संस्कृति का विस्तार किया है।हिंदी के समाचार पत्र-पत्रिका जिस तरह भाषा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, उस पर भी उनकी बेचैनी साफ नजर आती है। उनका मानना है कि हमारे समाचार पत्रों ने भाषा के साथ ही बेसमझ और फूहड़ व्यवहार किया है।यह पीड़ा हर उस पाठक की है, जो भाषा के प्रति थोड़ा-सा भी संवेदनशील है। विशेषतौर पर हिंदी के समाचार-पत्रों ने जिस तरह से आम बोल-चाल की भाषा के नाम पर हिंदीका स्वरूप बिगाड़ा है, वह असहनीय है। समाचार-पत्र धड़ल्ले से हिंदी की अस्मिता पर चोट कर रहे हैं। अच्छी भाषा भी एक मूल्य है। समाचार-पत्रों को भाषा की अनदेखी नहीं करनी चाहिए, बल्कि उसके संवर्द्धन की जिम्मेदारी का निर्वहन करना चाहिए।
            पुस्तक के पहले आलेख का शीर्षक है- अभी संभावना है।यह शीर्षक ही इस पुस्तक के मूल विचार, भाव और तत्व का प्रतिनिधि है। यह शीर्षक उन लोगों को झकझोरता है, जो यह मान बैठे हैं कि कॉरपोरेट ने पत्रकारिता को चौपट कर दिया और अब मीडिया में मूल्यों के लिए कोई स्थान शेष नहीं। यह शीर्षक उस विश्वास को पक्का करता है, जो यह मानता है कि घोर व्यावयायिकता और गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा के दौर में सबकुछ नष्ट नहीं हुआ है, अभी बहुत संभावनाएं शेष हैं। पुस्तक में शामिल सभी आलेखों में लेखक ने मूल्यों और सिद्धांतों को टटोलते हुए उनकी अनुपस्थिति पर जिम्मेदारों से प्रश्न भी पूछे हैं तो पत्रकारिता में मूल्यों की स्थापना के लिए प्रयासरत सज्जनों को प्रोत्साहित भी किया है, ताकि वह अपने पथ पर आगे बढ़ते रहें। बहरहाल, बाकी सबको भी ‘अभी संभावना है’ इसको मंत्र बनाकर पत्रकारिता में मूल्योन्मुखी वातावरण बनाने के लिए जुटना चाहिए। यह भारतीय पत्रकारिता के वर्तमान और भविष्य, दोनों के लिए आवश्यक है। भारतीय पत्रकारिता का स्वर्णिम इतिहास है। पत्रकारिता ने न केवल भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को धार दी, अपितु समाज जागरण का दायित्व भी निभाया है। इसलिए समाज आज भी पत्रकारिता से उसी भूमिका की अपेक्षा करता है। प्रो. दीक्षित लिखते हैं कि “समाचार पत्र-पत्रिकाओं को अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का स्मरण करना चाहिए। उसे अपने कंटेंट के विकास और पत्र के संचालन के बारे में कुछ ऐसी नीतियां तय करनी होंगी जिससे उसकी आर्थिक स्थिति भी ठीक रहे। बाजार उसका सहयोग तो उसके उपभोक्ताओं के आधार पर ले सके पर उसे बाजार की शर्तों पर अपने मूल्यों और आदर्शों को बदलना नहीं पड़े।”
            पुस्तक में मूल्यानुगत मीडिया के आचार्य प्रो. दीक्षित के 60 चुनिंदा आलेखों को शामिल किया गया है। पुस्तक का पहला आलेख ‘अभी संभावना है’ और अंतिम आलेख ‘यह प्रवाह बना रहे’ है। पुस्तक में प्रवाहित चिंतनधारा के इस ओर-छोर (पहला और अंतिम आलेख के शीर्षक) पर खड़े लेखक ने अपने चिरपरिचित आध्यात्मिक अंदाज में महत्वपूर्ण संदेश दिया है। दोनों लेखों का यह क्रम लेखक के दार्शनिक पक्ष को भी सामने लाता है। सारगर्भित ढंग से लेखक ने अपने पाठकों और उन सब लोगों का मार्गदर्शन किया है, जो मूल्यानुगत मीडिया की स्थापना एवं विस्तार का ध्येय लेकर चल रहे हैं। उनके लिए संदेश है- सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है। फिर से पत्रकारिता के मूल स्वरूप को जाग्रत किया जा सकता है। अभी संभावना है। छोटी से छोटी संभावना भी हमारे प्रोत्साहन का आधार बने। इसलिए पत्रकारिता जगत में अनेक लोगों ने मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए जो प्रयास प्रारंभ किए हैं, हर हाल में उनका प्रवाह बना रहना चाहिए।

           
पुस्तक : मूल्यानुगत मीडिया : संभावना और चुनौतियां
लेखक : प्रो. कमल दीक्षित
मूल्य250 रुपये 
प्रकाशक : सृजन बिंब प्रकाशन
                301, सनशाइन-2, के.टी. नगर, 
                काटोल रोड, नागपुर – 440013
मोबाइल : 8208529489
ईमेल : Srijanbimb.2017@gmail.com

बुधवार, 25 सितंबर 2019

पत्रकारिता के रूप में पं. दीनदयाल उपाध्याय


पंडित दीनदयाल उपाध्याय बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। सादगी से जीवन जीने वाले इस महापुरुष में राजनीतिज्ञ, संगठन शिल्पी, कुशल वक्ता, समाज चिंतक, अर्थचिंतक, शिक्षाविद्, लेखक और पत्रकार सहित कई प्रतिभाएं समाहित थी। ऐसी प्रतिभाएं कम ही होती हैं। पं. दीनदयाल उपाध्याय के राजनीतिक व्यक्तित्व को सब भली प्रकार जानते हैं। उन्होंने जनसंघ का कुशल नेतृत्व किया, उसके लिए सिद्धाँत गढ़े और राजनीति में शुचिता की नई लकीर खींची। हम उन्हें 'एकात्म मानवदर्शन' के प्रणेता के तौर पर भी जानते हैं। दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानवदर्शन के रूप में भारतीय राजनीति को अपनी संस्कृति एवं प्रकृति के अनुकूल दर्शन दिया, एक नया विचार दिया और एक नया विकल्प दिया। एकात्म मानवदर्शन में सम्पूर्ण जीवन की एक रचनात्मक दृष्टि है। इसमें भारत का अपना जीवन दर्शन है, जो व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को टुकड़ों में नहीं, समग्रता में देखता है। दीनदयालजी एकात्म मानवदर्शन में बताते हैं कि मन, बुद्धि, आत्मा और शरीर इन चारों का मनुष्य में रहना आवश्यक है। इन चारों को अलग-अलग करके विचार नहीं किया जा सकता। राजनीतिज्ञ, चिंतक और विचारक के साथ ही वह कुशल संचारक और पत्रकार थे। अब तक उनके पत्रकार-व्यक्तित्व पर उतना प्रकाश नहीं डाला गया है, जितना कि आदर्श पत्रकारिता में उनका योगदान है। दीनदयाल उपाध्याय को सही मायनों में राष्ट्रीय पत्रकारिता का पुरोधा कहा जा सकता है। उन्होंने इस देश में उस समय राष्ट्रीय पत्रकारिता की पौध रोपी थी, जब पत्रकारिता पर कम्युनिस्टों का प्रभुत्व था। कम्युनिस्टों के इस प्रभाव के कारण भारतीय विचारधारा को संचार माध्यमों में उचित स्थान नहीं मिल पा रहे था, बल्कि राष्ट्रवादी विचार के विरुद्ध नकारात्मकता को अधिक प्रसारित किया जा रहा था। देश को उस समय पत्रकारिता एवं संचार माध्यमों में ऐसे सशक्त विकल्प की आवश्यकता थी, जो कांग्रेस और कम्युनिस्टों से इतर दूसरा पक्ष भी जनता को बता सके। पत्रकारिता की ऐसी धारा, जिसकी अवधारणा पश्चिम पर नहीं, अपितु भारतीयता पर आधारित हो। दीनदयाल उपाध्याय ने अपनी दूरदर्शी सोच से पत्रकारिता में ऐसी ही एक भारतीय धारा का प्रवाह किया। उपाध्यायजी संचार की शक्ति को समझते थे, इसलिए उन्होंने राष्ट्रीय विचार से ओत-प्रोत मासिक पत्रिका राष्ट्रधर्म, साप्ताहिक समाचारपत्र पाञ्चजन्य (हिंदी) एवं ऑर्गेनाइजर (अंग्रेजी) और दैनिक समाचारपत्र स्वदेश प्रारंभ कराए।
          दीनदयाल उपाध्याय ने जब विधिवत पत्रकारिता (1947 में राष्ट्रधर्म के प्रकाशन से) प्रारंभ की थी, तब तक पत्रकारिता मिशन मानी जाती थी। पत्रकारिता राष्ट्रीय जागरण का माध्यम थी। स्वतंत्रता संग्राम में अनेक राजनेताओं की भूमिका पत्रकार के नाते भी रहती थी। महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय, डॉ. भीमराव आंबेडकर, गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे अनेक नाम हैं, जो स्वतंत्रता सेनानी भी थे और पत्रकार भी। ये महानुभाव समूचे देश में राष्ट्रबोध का जागरण करने के पत्रकारिता का उपयोग करते थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी पत्रकारिता कुछ समय तक मिशन बनी रही, उसके पीछे पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे व्यक्तित्व थे। जिनके लिए पत्रकारिता अर्थोपार्जन का जरिया नहीं थी, अपितु राष्ट्र जागरण का माध्यम थी। उनके लिए राष्ट्रीय विचारों के प्रचार-प्रसार का माध्यम थी। पत्रकारिता जनता तक पहुँचने का माध्यम थी, क्योंकि वे जानते थे कि पत्रकारिता किसी विचार के पक्ष में जनमत का निर्माण कराने में बहुत सहयोगी हो सकती है।
          पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पत्रकारिता का अध्ययन करने से पहले हमें एक तथ्य ध्यान में अवश्य रखना चाहिए कि वह राष्ट्रीय विचार की पत्रकारिता के पुरोधा अवश्य थे, लेकिन कभी भी संपादक या संवाददाता की भूमिका में नहीं रहे। वह जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मूर्धन्य विचारक थे, अपने कार्यकर्ताओं के लिए उस संगठन का मंत्र है कि कार्यकर्ता को 'प्रसिद्धि परांगमुख' होना चाहिए। अर्थात् प्रसिद्धि और श्रेय से बचना चाहिए। प्रसिद्धि और श्रेय अहंकार का कारण बन सकता है और समाज जीवन में अहंकार ध्येय से भटकाता है। अपने संगठन के इस मंत्र को पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने आजन्म गाँठ में बांध लिया था। इसलिए उन्होंने पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित तो कराए, लेकिन उनके 'प्रधान संपादक' कभी नहीं बने। किंतु, वास्तविक संचालक, संपादक और आवश्यकता होने पर उनके कम्पोजिटर, मशीनमैन और सबकुछ दीनदयाल उपाध्याय ही थे। संचार की प्रभावी भूमिका को भली प्रकार समझने वाले दीनदयाल उपाध्याय ने जुलाई-1947 में लखनऊ से 'राष्ट्रधर्म' मासिक पत्रिका का प्रकाशन कर एक नई पत्रकारिता की नींव रखी और संपादक बनाया अटल बिहारी वाजपेयी और राजीव लोचन अग्निहोत्री को। किन्तु, पत्रिका प्रारंभ करके उससे हट नहीं गए। उसे स्थापित करने में भी अपना योगदान दिया। राष्ट्रधर्म को सशक्त करने और लोगों के बीच लोकप्रिय बनाने के लिए उन्होंने प्राय: उसके हर अंक में विचारोत्तेजक लेख लिखे। इस पत्रिका में प्रकाशित होने वाली सामग्री का चयन भी दीनदयाल उपाध्याय स्वयं ही करते थे। इसी प्रकार मकर संक्राति के पावन अवसर पर 14 जनवरी, 1948 को उन्होंने 'पाञ्चजन्य' प्रारंभ कराया। राष्ट्रीय विचारों के प्रहरी पाञ्चजन्य में भी उन्होंने संपादक का दायित्व नहीं संभाला। इसके संपादक का दायित्व उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को सौंपा। पाञ्चजन्य में भी दीनदयालजी 'विचारवीथी' स्तम्भ लिखते थे। जबकि अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित ऑर्गेनाइजर में वह 'पॉलिटिकल डायरी' के नाम से स्तम्भ लिखते थे। इन स्तंभों में प्रकाशित सामग्री के अध्ययन से ज्ञात होता है कि दीनदयालजी की तत्कालीन घटनाओं एवं परिस्थितियों पर कितनी गहरी पकड़ थी। उनके लेखन में तत्कालीन परिस्थितियों पर बेबाक टिप्पणी के अलावा राष्ट्रजीवन की दिशा दिखाने वाला विचार भी समाविष्ट होता था। आजादी के बाद जब देश को साम्यवादी-समाजवादी ढांचे की ओर ले जाया जा रहा था, तब दीनदयाल उपाध्याय ने सरकार को पश्चिम के अंधानुकरण से बचने की सलाह देते हुए भारत को अपनी संस्कृति के अनुरूप विकास का बुनियादी ढांचा तैयार करने का संदेश दिया था। उन्होंने पाञ्चजन्य में लिखा था- 'आज देश में व्याप्त अभावों की पूर्ति के लिए हम सब व्यग्र हैं। अधिकाधिक परिश्रम आदि करने के नारे भी सभी लगाते हैं। परंतु नारों के अतिरिक्त वस्तुत: अपनी इच्छानुसार सुनहले स्वप्नों, योजनाओं तथा महत्वाकांक्षाओं के अनुकूल देश का चित्र निर्माण करने के लिए उचित परिश्रम और पुरुषार्थ करने को हममें से पिचानवे प्रतिशत लोग तैयार नहीं हैं। जिसके अभाव में यह सुंदर-सुंदर चित्र शेखचिल्ली के स्वप्नों के अतिरिक्त कुछ और नहीं।' बहरहाल, पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने समाचार पत्र-पत्रिकाएं ही प्रकाशिन नहीं कराए, बल्कि उनकी प्रेरणा से कई लोग पत्रकारिता के क्षेत्र में आए और आगे चलकर इस क्षेत्र के प्रमुख हस्ताक्षर बने। इनमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, देवेंद्र स्वरूप, महेशचंद्र शर्मा, यादवराव देशमुख, राजीव लोचन अग्निहोत्री, वचनेश त्रिपाठी, महेन्द्र कुलश्रेष्ठ, गिरीश चंद्र मिश्र आदि प्रमुख हैं। ये सब पत्रकारिता की उसी पगडंडी पर आगे बढ़े, जिसका निर्माण दीनदयाल उपाध्याय ने किया।
          पत्रकारिता में नैतिकता, शुचिता और उच्च आदर्शों के दीनदयाल उपाध्याय कितने बड़े हिमायती थे, इसका जिक्र करते हुए दीनदयालजी की पत्रकारिता पर आधारित पुस्तक के संपादक डॉ. महेशचंद्र शर्मा ने लिखा है- संत फतेहसिंह के आमरण अनशन को लेकर पाञ्चजन्य में एक शीर्षक लगाया गया 'अकालतख्त के काल'। दीनदयालजी ने यह शीर्षक हटवा दिया और समझाया कि सार्वजनिक जीवन में इस प्रकार की भाषा का उपयोग नहीं करना चाहिए, जिससे परस्पर कटुता बढ़े तथा आपसी सहयोग और साथ काम करने की संभावना ही समाप्त हो जाए। अपनी बात को दृढ़ता से कहने का अर्थ कटुतापूर्वक कहना नहीं होना चाहिए। इसी प्रकार का एक और उदाहरण है। जुलाई, 1953 के पाञ्चजन्य के अर्थ विशेषांक में संपादकीय में संपादक महेन्द्र कुलश्रेष्ठ ने अशोक मेहता की शासन के साथ सहयोग नीति की आलोचना करते हुए 'मूर्खतापूर्ण' शब्द का उपयोग किया था। दीनदयाल उपाध्याय ने इस प्रकार के शब्द उपयोग पर संपादक को समझाइश दी। उन्होंने लिखा- 'मूर्खतापूर्ण शब्द के स्थान पर यदि किसी सौम्य शब्द का प्रयोग होता तो पाञ्चजन्य की प्रतिष्ठा के अनुकूल होता।' इसी प्रकार चित्रों और व्यंग्य चित्रों के उपयोग में भी शालीनता का ध्यान रखने के वह आग्रही थे।
          यह माना जा सकता है कि यदि पंडित दीनदयाल उपाध्याय को राजनीति में नहीं भेजा जाता तो निश्चय ही उनका योगदान पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में और अधिक होता। पत्रकारिता के संबंध में उनके विचार अनुकरणीय है, यह स्पष्ट ही है। यदि उन्होंने पत्रकारिता को थोड़ा और अधिक समय दिया होता, तब वर्तमान पत्रकारिता का स्वरूप संभवत: कुछ और होता। पत्रकारिता में उन्होंने जो दिशा दिखाई है, उसका पालन किया जाना चाहिए।

शनिवार, 14 सितंबर 2019

हिंदी के दुश्मन कौन?


कुछ प्रश्न आपके सामने रख रहा हूं। भारत की बहुसंख्यक आबादी की मातृभाषा कौन-सी है? भारत में सम्पर्क और संवाद की सबसे बड़ी भाषा कौन-सी है? भारत की ज्यादातर आबादी किस भाषा में बोलती, लिखती-पढ़ती है? मनोरंजन की प्रमुख भाषा कौन-सी है? किस भाषा का शब्दकोश सबसे अधिक समृद्ध है? कौन-सी भाषा अधिक समावेशी है? किस भाषा में बोलियों और बाहरी भाषा के शब्दों को आसानी के साथ अपने में समाहित करने की अद्भुत क्षमता है? सबसे अधिक प्रसार संख्या किस भाषा के समाचार-पत्रों की है? सबसे अधिक टीआरपी किस भाषा के समाचार चैनल की है? प्रश्नों की यह सूची और भी लम्बी हो सकती है। इन सब प्रश्नों का उत्तर एक ही है - हिंदी। अब एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है कि इस सबके बाद भी हिंदी के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों किया जाता है? हिंदी पिछड़ क्यों गई? हिंदी भाषियों के साथ उपेक्षा का व्यवहार क्यों? अपने ही देश में हिंदी दासी और अंग्रेजी महारानी क्यों? किसने हिंदी की यह दुर्दशा की है? कौन हैं हिंदी के दुश्मन? इन सब प्रश्नों का उत्तर भी एक ही है- हम।
          हम ही हैं जिनके कारण हिंदी की अनदेखी होती रही है। हम ही हैं जो अपनी भाषा में बात करने पर शर्मिंदगी का अनुभव करते हैं। हम ही हैं जो अंग्रेजी के प्यार में दीवाने हैं। अंग्रेजी ही हमारा कल्याण कर सकती है, हमने ही यह भ्रम अपने तईं खड़ा कर लिया है और इस भ्रम में बुरी तरह उलझ गए हैं। हम ही हैं जिन्होंने यह मान लिया कि विश्व से संवाद की भाषा सिर्फ अंग्रेजी है। वास्तविकता यह है कि दुनिया में कई ऐसे देश हैं जहां अंग्रेजी न तो बोली जाती है और न ही लिखी-पढ़ी जाती है। यूरोप के ही कई देश हैं जिनके नागरिकों से आप अंग्रेजी में बात करेंगे तो वे बुरा मान जाएंगे। जापान, रूस और चीन सहित कई देशों में स्थानीय लोग एक-दो बार तो आपकी मदद कर देंगे लेकिन लम्बे समय तक उस देश में रहना है तो फिर वहां की भाषा आपको सीखनी ही पड़ेगी। भारत में स्थिति उलट है। यहां हमने ऐसी स्थितियां पैदा कर दी हैं कि हिंदी भले आपको न आती हो लेकिन अंग्रेजी अवश्य सीख लेनी चाहिए। भारत में आप अंग्रेजी जानते हैं तो आपका बहुत सम्मान है। सरकारी नौकरियों में अनेक अवसर हैं। व्यापार और रोजगार में अनेक संभावनाएं हैं। हिंदी जानते हो तो आपको अपने सपने छोटे करने होंगे, अंग्रेजी आपके मार्ग में अकाट्य चट्टान की तरह खड़ी कर दी गई है। यह सर्वमान्य सत्य है कि व्यक्ति अपनी भाषा में अधिक रचनात्मक हो सकता है, अधिक शिक्षा प्राप्त कर सकता है, सीख सकता है और समझ सकता है लेकिन भारत में इस सार्वभौमिक सत्य की अनदेखी कर दी जाती है। यहां शिक्षा, रोजगार और शासन की प्रमुख भाषा अंग्रेजी है। जिसे केवल दो प्रतिशत भारतीय ही अच्छी तरह बोल, लिख और समझ पाते हैं। अपनी निज संतानों के कारण ही हिंदी को ये दिन देखने पड़ रहे हैं। वरना क्या यह संभव होता कि चीनी (मंडारिन) के बाद दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी मातृभाषा हिंदी को दो प्रतिशत अंग्रेजीदां लोगों के शोषण का शिकार होना पड़ता। 
          दुनियाभर में अनेक देश हैं, जहां उनकी मातृभाषा ही संवाद और कामकाज की भाषा है। छोटे देशों को छोड़ दिया जाए तो भी बड़े और विकसित/विकासशील देशों की संख्या भी अधिक है, जो अपनी भाषा पर गर्व करते हैं। उन्हें संवाद के लिए किसी दूसरे की भाषा पर आश्रित नहीं रहना पड़ता। फ्रांस में फ्रेंच, जर्मन में जर्मन, इटली में इतावली, जापान में जापानी, श्रीलंका में सिंहली तमिल ही प्रमुख भाषा है। यहूदी तो अपनी भूमि-भाषा दोनों खो चुके थे लेकिन मातृभूमि और मातृभाषा से अटूट प्रेम का ही परिणाम था कि यहूदियों ने अपनी जमीन (इजराइल) भी वापस पाई और अपनी भाषा (हिब्रू) को भी जीवित किया। लगभग सवा सौ साल पहले तक फिनलैंड के निवासी स्वीडी भाषा का इस्तेमाल करते थे लेकिन एक दिन उन्होंने तय किया कि अपनी भाषा को सम्मान देंगे। तभी से फिनी भाषा में वहां सारा कामकाज चल रहा है। इसी तरह जार के जमाने में रूस में फ्रांसीसी भाषा का दबदबा था। लेकिन अब वहां रूसी भाषा सर्वोपरि है। इसके उलट, भारत में स्वतंत्रता का आंदोलन तो भारतीय भाषाओं में लड़ा गया, लेकिन 1947 के बाद भारत भाषाई तौर पर अंग्रेजी का गुलाम हो गया है।
          किसी का भी विरोध अंग्रेजी से नहीं है बल्कि अंग्रेजी को प्राथमिकता देने से खड़ी हुईं समस्याओं से है। कोई स्वेच्छा से अंग्रेजी सीखे, उसका स्वागत है लेकिन भारत में अंग्रेजी मजबूरी बन गई है। अंग्रेजी ही वह भाषा है जिसने भारतीय भाषाओं को आपस में लड़ा दिया। घर में सगी बहनों के बीच फूट डालने का काम अंग्रेजी ने किया है। इस भाषाई झगड़े की आग में घी डालने का काम किया हमारे राजनेताओं ने, उनकी अदूरदर्शी राजनीति ने, उनके स्वार्थों ने। कमजोर नेतृत्व ने संपूर्ण भारत को जोडऩे के लिए अंग्रेजी को महत्वपूर्ण माना। भारत सरकार ने राजभाषा विधेयक बनाया, उसमें भी हिंदी के साथ दोयम दर्जे का बर्ताव किया गया। हिंदी को कमजोर कर दिया। वर्ष 1959 में संसद में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने एक दुर्भाग्यपूर्ण भाषण दिया और हिंदी के अपमान के लिए रास्ता बना दिया। उन्होंने कहा कि जब तक अहिंदी भाषी राज्य चाहेंगे सरकार के काम में अंग्रेजी प्रमुख भाषा रहेगी। उनके इस गलत तर्क के कारण ही अनेक चरणों से होते हुए वर्ष 1968 में राजभाषा में ऐसा संशोधन स्वीकार कर लिया गया, जिसके कारण हिंदी का घोर अपमान हुआ। राजभाषा विधेयक में यह प्रावधान कर दिया गया कि जब तक एक भी अहिंदी भाषी राज्य चाहेगा, सरकार का काम अंग्रेजी में चलता रहेगा। हिंदी भाषी राज्य किसी अहिंदी भाषी राज्य को पत्र लिखेगा तो उसका अंग्रेजी अनुवाद साथ में भेजना होगा। लेकिन, अहिंदी भाषी राज्य जब हिंदी भाषी राज्य को पत्र लिखेगा तो उसे अंग्रेजी पत्र का हिंदी अनुवाद भेजने की जरूरत नहीं होगी। हिंदी और अहिंदी भाषी राज्यों को जोडऩे के लिए एक बाहरी भाषा को माध्यम बनाने के इस अविवेकी निर्णय का खामियाजा आज पूरे देश को उठाना पड़ रहा है।
          किसी ने भी मतिभ्रम नेताओं से यह नहीं पूछा कि जब अंग्रेजी नहीं थी तब सभी भारतीय आपस में किस भाषा में संवाद करते थे? कैसे एक-दूसरे से जुड़ते थे? क्या हिंदी हम सबको जोडऩे के लिए सक्षम नहीं थी/है? क्या हिंदी अन्य भारतीय भाषाओं के लिए खतरा साबित होती? क्या हिंदी को प्रमुख भाषा बना देने से अहिंदी भाषियों को उपेक्षा का शिकार होना पड़ता? इन प्रश्नों के जवाब अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन इनका समाधान अंग्रेजी कदापि नहीं हो सकती। अंग्रेजी के साथ आई अंग्रेजियत ने भारतीय भाषाओं को बहुत नुकसान पहुंचाया है। अब जबकि दुनिया में हिंदी बोलने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है, इंटरनेट पर भी हिंदी प्रमुख भाषा में रूप में अपने सौंदर्य के साथ मौजूद है तब भी अपने फायदे के लिए अंग्रेजीदां लोग हिंदी की उपेक्षा लगातार कर रहे हैं। वर्ष 1925 में महात्मा गांधी ने स्पष्ट कहा था- 'वास्तव में ये अंग्रेजी बोलने वाले नेता हैं जो आम जनता में हमारा काम जल्दी आगे बढऩे नहीं देते हैं। वे हिंदी सीखने से इनकार करते हैं जबकि हिंदी द्रविड़ प्रदेशों में भी केवल तीन माह में सीखी जा सकती है।' महात्मा गांधी अंग्रेजी को बहुत बड़ी बीमारी की संज्ञा देते थे और उसका तत्काल इलाज करने की बात कहते थे। वे समाज से जुड़े राजपुरुष थे इसलिए उन्हें पता था कि भारतीय समाज का भला उसकी अपनी भाषा में ही हो सकता है। 
          आज सभी भारतीय भाषाओं में जबरन अंग्रेजी के शब्दों को ठूंसा जा रहा है। सरल हिंदी के नाम पर हिंदी को तो हिंग्लिश बनाने का षड्यंत्र जैसा चलाया जा रहा है। मेट्रोपॉलटन सिटी कहना सरल है या महानगर, क्युरीआसिटी कहना आसान है या जिज्ञासा, इन्डिपेन्डन्स डे की जगह स्वतंत्रता दिवस कहने में हमारी जीभ चिपकती है क्या? हम अपने शब्दों को बोलेंगे नहीं तो वे हमारे लिए अपरिचित और कठिन हो ही जाएंगे। जैसे बहुत से लोगों के लिए आवश्यकता, दूरभाष, कार्यालय, संदेश, आवेदन और संकेत जैसे शब्द भी बहुत कठिन हो गए हैं। इसलिए हिंदी के साथ हो रहे खिलवाड़ को तत्काल बंद करने की जरूरत है। वह हमारी अपनी भाषा है। हिंदी सरल, सहज और समृद्ध है। भाषा विज्ञानी भी मानते हैं कि हिंदी अधिक व्यवस्थित भाषा है। डार्लिंग 'अंग्रेजी' की मोहब्बत में पड़कर हम अपनी मां 'हिंदी' के आंचल से दूर हो रहे हैं। मां के आश्रय में हम ज्यादा ठीक से विकास कर सकेंगे, इसलिए मां के नजदीक आना ही पड़ेगा। दुनिया के तमाम विकसित देशों की अपनी भाषा है। उन्होंने अपनी ही भाषाओं में विकास की कहानी लिखी है और हम अंग्रेजी के चक्कर में पड़कर पीछे ही रह गए।
          हिंदी के सम्मान का प्रश्न केवल एक भाषा के सम्मान का प्रश्न नहीं है वरन यह राष्ट्र की अस्मिता से जुड़ा है। अभूतपूर्व जनाधार पाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शायद इस बात को समझा है। इसीलिए वे देश में ही नहीं वरन भारत के बाहर भी हिंदी के सम्मान को बढ़ा रहे हैं। दुनिया से वे भारत की भाषा हिंदी में बात कर रहे हैं और उसे सम्मान दिला रहे हैं। अहिंदी भाषी होने के बावजूद नरेन्द्र मोदी हिंदी से प्रेम इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि हिंदी में ही वह क्षमता है जो भारत को आगे बढ़ा सकती है। प्रत्येक भारतीय भी अपने स्तर पर हिंदी को मजबूत कर सकता है। एक हिंदी प्रेमी का उदाहरण है, जो बेझिझक अपनी शर्ट पर लोगो लगाकर चलते हैं जिस पर लिखा है - 'मैं अंग्रेजी नहीं जानता हूं।' अंग्रेजी नहीं आना शर्म और संकोच का कारण होना भी नहीं चाहिए। शर्मिंदा तो तब होना चाहिए जब हमें अपनी ही भाषा न आए। हिंदी पर हमें गर्व होना चाहिए। अंग्रेजीदां लोगों के आगे झुकने की जरूरत नहीं। अब हमें उन्हें अपना और अपनी मातृभाषा का उपहास उड़ाने का अधिकार नहीं देना चाहिए। आप अपने जीवन में हिंदी को ले आइए फिर देखिए बदलाव। खुद हिंदी बोलिए और लोगों से भी आग्रह कीजिए कि वे भी हिंदी में बात करें। हस्ताक्षर, आवेदन, एटीएम और बैंक से धन निकासी, पहचान-पत्र और नाम पत्रक, घर और कार्यालय में नाम पट्टिका हिंदी में लगाने जैसे छोटे-छोटे प्रयोग कर आप हिंदी के सम्मान को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।

सोमवार, 9 सितंबर 2019

चंद्रयान-2 अभियान, विजय ही विजय


चंद्रमा पर चंद्रयान-2 के उतरने से पहले ही लैंडर विक्रम से संपर्क टूटने को इस अभियान की असफलता नहीं माना जाना चाहिए। चंद्रमा के जिस हिस्से (दक्षिणी ध्रुव) पर आज तक कोई नहीं पहुँचा, वहाँ सॉफ्ट लैंडिंग का हमारा बड़ा लक्ष्य अवश्य था, किंतु यह चंद्रयान-2 का एकमात्र लक्ष्य कतई नहीं था। मौटे तौर पर चंद्रयान मिशन के दो लक्ष्य थे। पहला- विज्ञान से जुड़ा और दूसरा- तकनीक का प्रदर्शन। लैंडिंग और रोवर मुख्यत: तकनीक प्रदर्शन के लिए थे। जबकि विज्ञान का बड़ा हिस्सा ऑर्बिटर से जुड़ा है, जो चंद्रमा की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित हो गया है। यह सात वर्ष तक हमें चंद्रमा से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां प्रदान करता रहेगा। इसलिए केवल हम ही नहीं, बल्कि दुनिया कह रही है कि चंद्रयान-2 अपने उद्देश्य में लगभग सौ प्रतिशत सफल रहा है। इस संबंध में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के प्रमुख डॉ. के. सिवन ने भी स्पष्ट किया है। उनके अनुसार मिशन अपने अधिकतर उद्देश्यों में सफल रहा है। इसरो अपने मिशन की सफलता को लेकर आश्वस्त है। चंद्रयान-2 को 99.5 प्रतिशत सफल माना जा सकता है।उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लैंडर और रोवर का चंद्रमा की सतह पर 14 दिन का ही मिशन था। इस मिशन का महत्वपूर्ण हिस्सा तो ऑर्बिटर से ही जुड़ा है। भावुकता छोड़ कर विज्ञान के लिहाज से देखें तो भारत के हिस्से बड़ी सफलता आई है।
          विश्व की अग्रणी विज्ञान संस्थाएं भी भारत के इस मिशन को सफल मान रही हैं। नासा ने ट्वीट कर चंद्रयान-2 की सराहना की है। उसने ट्वीट किया, ‘अंतरिक्ष कठिन है। हम इसरो के चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर चंद्रयान-2 को उतारने के प्रयास की सराहना करते हैं। आपने हमें प्रेरित किया है और भविष्य में हम सौर मंडल का पता लगाने के लिए साथ काम करेंगे।नासा का यह ट्वीट हमारे चंद्रयान-2 की सफलता को दर्शाता है। निश्चित तौर पर चंद्रयान-2 मिशन के माध्यम से इसरो ने भारत के स्पेस सुपरपावरबनने की महत्वाकांक्षा को पंख लगा दिए हैं। इसरो के वैज्ञानिकों ने अपने अथक परिश्रम और मेधाशक्ति से भारत की साख को बढ़ाया है। इसरो की अब तक की सफलताओं के साथ चंद्रयान-2 मिशन ने भारत के प्रति विश्व की दृष्टि को भी बदल कर दिया है। भारत के मंगल मिशनकी घोषणा पर हमारा मजाक बनाने के लिए व्यंग्य-चित्र प्रकाशित करने वाले न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी चंद्रयान-2 की सफलता के अवसर पर हमारी प्रशंसा की है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है, ‘भारत भले ही अपने पहले प्रयास में लैंडिंग नहीं कर पाया, लेकिन उसके प्रयास बताते हैं कि उसके पास अभियांत्रिकी के क्षेत्र में किस स्तर तक शौर्य एवं साहस है और दशकों में उसने वैश्विक महत्वाकांक्षा के साथ अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में कितना विकास किया है।विश्वभर की मीडिया ने चंद्रयान-2 को अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत की सफलता के तौर पर देखा है।
          इसमें कोई दोराय नहीं कि यदि हम चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग में सफल होते तो मंगलयान की तरह अपने पहले ही प्रयास में चंद्रमा पर उतरने का इतिहास रचते। उल्लेखनीय है कि अमेरिका और रूस जैसे देश भी चंद्रमा पर पहले प्रयास में नहीं उतर सके थे। 1958 से लेकर अब तक अमेरिका, रूस, जापान और चीन सहित यूरोपीय संघ ने 109 चंद्र अभियान लांच किए, इनकी सफलता 60 प्रतिशत ही रही है। इन 109 अभियानों में ऑर्बिटर और लैंडर शामिल रहे हैं। इनमें से 61 अभियान सफल और 48 विफल रहे हैं। ध्यान रहे कि अमेरिका को चंद्रमा की कक्षा में ही पहुँचने के लिए पाँच बार असफलता का सामना करना पड़ा। रूस के भी प्रारंभिक चार मिशन असफल रहे। हालाँकि अमेरिका और रूस के उन प्रयासों को असफलता कहना ठीक नहीं, क्योंकि उनसे भी सबक मिले, तकनीक और ज्ञान में वृद्धि हुई।


          चंद्रयान-2 मिशन के एक लक्ष्य (चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग) की पूर्ति न होने पर भारत के वैज्ञानिकों सहित देश में एक उदासी अवश्य छा गई थी, लेकिन अब उस उदासी को पीछे छोड़ कर आकांक्षावान भारत सकारात्मक दृष्टि से आगे बढऩे को उत्साहित है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आचरण की खुलकर सराहना करनी चाहिए। सबसे पहले वह इस ऐतिहासिक अवसर पर वैज्ञानिकों के बीच पहुँचे। फिर जब उन्होंने वैज्ञानिकों को निराश और भावुक होते देखा तो उनका मनोबल ऊंचा उठाने के लिए इसरो प्रमुख को गले लगाकर पीठ थप-थपाई। देश के शीर्षस्थ नेता का यह व्यवहार उन्हें महानता की ओर लेकर जाता है। यह दृश्य पूरे देश को भावुक करने वाला था और आश्वस्त करने वाला भी कि देश का मुखिया हर हाल में अपने लोगों के साथ डट कर खड़ा है। वह हताशा छोड़ आगे बढऩे के लिए प्रेरित कर रहा है। हतोत्साहित नहीं, बल्कि प्रोत्साहित कर रहा है। संभव है कि उस क्षण प्रधानमंत्री मोदी भी उदास हुए होंगे, किंतु उन्होंने अपनी उदासी पर पर्दा डालकर भारत के वैज्ञानिकों का हौसला बढ़ाने का काम किया। इस अवसर पर उन्होंने बहुत सुंदर और प्रेरक बात कही, जो किसी भी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मशीलों के लिए ध्येय वाक्य हो सकती है- विज्ञान में विफलता नहीं होती, केवल प्रयोग और प्रयास होते हैं।उन्होंने उचित ही कहा- हर मुश्किल, हर संघर्ष, हर कठिनाई, हमें कुछ नया सिखाकर जाती है।चंद्रयान-2 के तीन चरण सफल रहे हैं, जो एक चरण फिलहाल पूरा नहीं हो सका है, उसे पूर्ण करने का साहस, सामर्थ्य और कौशल भारत के पास है। सोशल मीडिया पर उचित ही लिखा गया कि ‘संपर्क टूटा है, संकल्प नहीं।’ सुविख्यात बोधवाक्य है- ‘जिनके संकल्प शुभ होते हैं, प्रकृति भी उन्हें साकार करने में सहयोग प्रदान करती है।’ 

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