संघ शताब्दी वर्ष : ‘रज्जू भैया’ को न्यूक्लियर फिजिक्स पर शोध के लिए अपने साथ लेकर जाना चाहते थे नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर सीवी रमन
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चौथे सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ के बारे में कहा जाता है कि यदि वे संघ के प्रचारक नहीं होते तो निश्चित ही देश के महान वैज्ञानिक होते। यह बात यूँ ही नहीं कही जाती है अपितु इसके पीछे ठोस आधार है। रज्जू भैया की वैज्ञानिक प्रतिभा को पहचान कर ही भारत के महान वैज्ञानिक एवं भौतिकी के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक सर चंद्रशेखर वेंकट रमन (सीवी रमन) उन्हें अपने साथ न्यूक्लियर फिजिक्स में शोध कार्य के लिए बेंगलूरु ले जाना चाहते थे। जब डॉ. होमी जहाँगीर भाभा भारत के उभरते परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए देश के शीर्ष भौतिकशास्त्रियों को जोड़ रहे थे, तब भी सर सीवी रमन ने उन्हें रज्जू भैया का नाम सुझाया था। डॉ. भाभा ने भी रज्जू भैया से अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना के साथ जुड़ने का आग्रह किया। परंतु, रज्जू भैया तो पहले ही भौतिक वैज्ञानिक नहीं अपितु समाज वैज्ञानिक बनने का विचार पक्का कर चुके थे। प्रसिद्ध लेखक देवेन्द्र स्वरूप और बृजकिशोर शर्मा द्वारा लिखित रज्जू भैया की जीवनी ‘हमारे रज्जू भैया’ में उल्लेख आता है कि मुंबई प्रवास के दौरान जब डॉ. होमी भाभा की भेंट श्री गुरुजी से हुई, तो उन्होंने यह उलाहना देते हुए कहा था- “गुरुजी, आपके कारण भारत ने एक शीर्ष न्यूक्लियर फिजिसिस्ट (परमाणु वैज्ञानिक) खो दिया”। इस पर श्री गुरुजी ने सहज भाव से उत्तर दिया था- “डॉ. भाभा, रज्जू भैया ने वैज्ञानिक बनना नहीं छोड़ा है; अंतर केवल इतना है कि वह अब भौतिक प्रयोगशाला के बजाय ‘समाज की प्रयोगशाला’ में मनुष्यों को गढ़ने का वैज्ञानिक प्रयोग कर रहे हैं”।
आरंभ से ही रज्जू भैया की रुचि विज्ञान में थी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उन्होंने भौतिकी का अध्ययन किया। कठिन से कठिन वैज्ञानिक अवधारणाओं को समझने की उनकी क्षमता और प्रयोगों के प्रति उनकी गहरी रुचि उन्हें अपने सहपाठियों से अलग करती थी। उनके लिए भौतिकी केवल पाठ्यक्रम का विषय नहीं थी। वह प्रकृति के रहस्यों को समझने की एक भाषा थी। प्रकाश, ध्वनि, पदार्थ और ऊर्जा के पीछे छिपे नियम उन्हें आकर्षित करते थे। विज्ञान की यही जिज्ञासु दृष्टि आगे चलकर उनके अध्यापन की सबसे बड़ी शक्ति बनी।
एमएससी की पढ़ाई पूरी करते समय उनके सामने वह अवसर आया, जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है। उनकी प्रायोगिक परीक्षा का दिन था। उन्होंने सीवी रमन प्रभाव पर भी अपना प्रयोग किया था। संयोग से उनका मूल्यांकन करने के लिए बाह्य परीक्षक के रूप में स्वयं सर सीवी रमन आए थे। उल्लेखनीय है कि रमन तब केवल भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक नहीं थे अपितु प्रकाश के प्रकीर्णन पर उनके ऐतिहासिक अनुसंधान ने उन्हें विश्व-विज्ञान के शिखर पर पहुँचा दिया था। 1930 में उन्हें भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिल चुका था। उनके सामने परीक्षा देना किसी युवा विद्यार्थी के लिए असाधारण अनुभव रहा होगा।
रज्जू भैया ने अपने प्रयोग सफलतापूर्वक करके दिखाए और तर्क सहित उत्तर दिए। सर रमन ने रज्जू भैया के उत्तरों और प्रयोगात्मक समझ को ध्यान से परखा। उनके भीतर उन्हें केवल पाठ्यक्रम याद कर लेने वाला विद्यार्थी नहीं, बल्कि तर्क करने, प्रश्न पूछने और वैज्ञानिक ढंग से सोचने वाला मस्तिष्क दिखाई दिया। रज्जू भैया की प्रतिभा से प्रभावित सर सीवी रमन ने उन्हें न्यूक्लियर फिजिक्स में शोध के लिए अपने साथ जुड़ने का अवसर दिया। इस प्रायोगिक परीक्षा के बाद रज्जू भैया के हाथ में बेंगलुरु स्थित सर रमन की प्रयोगशाला में काम करने का प्रस्ताव था। परमाणु भौतिकी जैसे उभरते हुए क्षेत्र में सीवी रमन के साथ काम करने का यह अवसर किसी युवा वैज्ञानिक के लिए किसी सपने से कम नहीं था।
लेकिन राजेन्द्र सिंह के जीवन की दिशा कुछ और थी। रज्जू भैया ने बेंगलुरु जाने के बजाय इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही अपने शैक्षणिक जीवन को आगे बढ़ाने का निर्णय किया। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भारत के शीर्ष वैज्ञानिक एवं अपने गुरु डॉ. केएस कृष्णन (जो सर सी.वी. रमन के निकट सहयोगी थे) के मार्गदर्शन में स्पेक्ट्रोस्कोपी और न्यूक्लियर फिजिक्स पर कार्य किया। इसके साथ ही वहीं अध्यापन कार्य से जुड़ गए। अध्यापन करते हुए वे संघ कार्य के लिए समय दे पाते थे।
जीव विज्ञान छोड़कर भौतिकी को क्यों चुना :
विज्ञान के अध्ययन की गहरी ललक के साथ-साथ उनके भीतर एक अत्यंत कोमल एवं संवेदनशील हृदय भी था। मसूरी के एक स्थानीय स्कूल में नौवीं कक्षा के दौरान जब वे जीव विज्ञान का अध्ययन कर रहे थे, तब मेढ़क के विच्छेदन (चीरा लगाने) से उनका मन व्यथित हो उठा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में अपने पिता से कहा कि वे परीक्षण हेतु मेढ़क को मूर्च्छित तो कर सकते हैं, किंतु उसे चीरा नहीं लगा सकते। इस संवेदना ने उन्हें चिकित्सा के क्षेत्र से मोड़कर भौतिक और गणितीय विज्ञान के गहन अनुसंधान की ओर अग्रसर कर दिया।
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| संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 06 सितंबर, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ 'साधना के सौ वर्ष' |




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