प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन लोगों को ‘दिमागी नक्सल’ की संज्ञा दी थी, जो सभ्य समाज में छिपकर बैठे हैं और सांप्रदायिक, तानाशाही तथा हिंसक विचारधारा को आगे बढ़ाते हैं। दिमागी नक्सल कम्युनिज्म की हिंसक विचारधारा के पोषक भी होते हैं। विडंबना यह है कि ऐसे ही कुछ तत्व अब बौखलाहट के कारण खुलकर सामने आने लगे हैं। अपने अभिनय के कारण प्रसिद्ध नसीरुद्दीन शाह अनेक अवसरों पर अपनी मानसिकता को प्रकट कर चुके हैं, लेकिन अब तो वे खुलकर कह रहे हैं- “मैं फख्र के साथ कहता हूं, मैं दिमागी नक्सल हूं”। उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में छात्र संघ बहाली की मांग का समर्थन करते हुए अपनी बौखलाहट प्रदर्शित की है, जबकि छात्र संघ की बहाली पर विश्वविद्यालय प्रशासन विद्यार्थियों की मांग को पहले ही स्वीकार कर चुका है। स्वयं को ‘दिमागी नक्सल’ बताकर मोदी सरकार पर हमला बोल रहे नसीरुद्दीन को यह बताना चाहिए कि आखिर विश्वविद्यालय में छात्र संघ के चुनाव किसने रोके थे? क्या 2006 में जब छात्र संघ के चुनाव रोके गए थे, तब भी नसीर साहब ने इसी तरह सरकार को आड़े हाथ लिया था या तब वे सरकार की गोद में बैठकर अभिनय कर रहे थे?
मोदी सरकार पर शिक्षण संस्थानों की बर्बादी का आरोप लगाने वाले नसीर और इस जमात के अन्य बुद्धिजीवी बताएं कि 2011 में जामिया को अल्पसंख्यक संस्थान बनाने पर उन्होंने चुप्पी क्यों साध ली थी? विपक्षी राजनीतिक दलों एवं वैचारिक समूहों को भी इस बात का उत्तर देना चाहिए कि आखिर जामिया में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का आरक्षण बंद करके तत्कालीन सरकार ने किसके उत्थान का मार्ग प्रशस्त किया था? क्या यह सीधे तौर पर वंचित वर्ग के अधिकारों पर कुठाराघात नहीं था? जामिया में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए भी कोटा नहीं है। बात-बे-बात अपनी राजनीतिक दुकान चमकाने के लिए ओबीसी का हितैषी बनने का प्रयास कर रहा कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व इसका जवाब दे।






