संघ शताब्दी वर्ष : साधारण स्वयंसेवक के सुख-दु:ख में सहभागी होने को लेकर बहुत आग्रही थे सुदर्शन जी, स्वयं बनते थे उदाहरण
![]() |
| जब आरएसएस के सरसंघचालक सुदर्शन जी स्वयंसेवक के घर विवाह में झाड़ू लगाने लगे (एआई से निर्मित चित्र) |
किसी भी व्यक्ति के महान व्यक्तित्व की असली पहचान उसके पद या प्रभाव से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक कुप्प. सी. सुदर्शन जी का जीवन इसी आत्मीयता, संवेदनशीलता और विनम्रता का जीवंत उदाहरण था। उनके जीवन के अनेक संस्मरण हैं, जो उनके सहज, निश्छल और अपनत्व से भरे व्यक्तित्व का दर्शन कराते हैं। एक अच्छा कार्यकर्ता कैसा होता है, उनके जीवन के प्रेरक प्रसंगों से सीखा जा सकता है। उन्होंने संघ के विचार को अपने आचरण से समाज तक पहुँचाया। विश्व के सबसे बड़े संगठन का सबसे बड़ा अधिकारी कितना सहज और सरल हो सकता है, इसकी बड़ी लकीर सुदर्शन जी खींचकर गए हैं।
सुदर्शन जी के लिए ‘स्वयंसेवक’ केवल संगठन का कार्यकर्ता नहीं, बल्कि परिवार का अभिन्न अंग था। भोपाल के वरिष्ठ कार्यकर्ता हेमंत मुक्तिबोध अपने संस्मरण में लिखते हैं कि समिधा कार्यालय में खाना बनाने वाले एक युवक की मां बीमार हो गईं तो उनसे मिलने वे रायसेन जिले के दूरस्थ ग्राम में उनके घर जा पहुंचे। शल्य चिकित्सा के लिए उन्हें भोपाल लेकर आए और जयप्रकाश अस्पताल में भर्ती करवाया तथा रोज उन्हें देखने जाते। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद चिकित्सकीय देखरेख के लिए सुदर्शन जी ने उन्हें भोपाल में रोक लिया और पूरे परिवार के एक सप्ताह तक ठहरने की व्यवस्था की। एक सामान्य कार्यकर्ता के लिए यह कितनी बड़ी बात है कि वह जिस संगठन के लिए कार्य करता है, वहाँ सर्वोच्च अधिकारी दु:ख के क्षण में केवल साथ नहीं खड़े हैं अपितु परिवार के सदस्य की भाँति अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं। एक और घटना उल्लेखनीय है, जो उनकी संवेदनशीलता और अपनत्व की भावना का मूर्तरूप है। भोपाल की एक शाखा में जब एक शिशु स्वयंसेवक के हाथ में चोट लगी तो वे 15 मिनट तक उसकी मालिश करते रहे थे। हेमंत मुक्तिबोध लिखते हैं कि “खेलते-खेलते कोई शिशु या बाल स्वयंसेवक घायल हो जाए तो उसकी वे ऐसी चिंता करते जो शायद उसके परिजन भी न करते होंगे”।
संघ गीत : शत वर्षों की अथक तपस्या, त्याग और बलिदान | RSS Shatabdi Geet | RSS 100 Years Song | Sangh Geet
सुदर्शन जी की सहजता और निरहंकारिता का एक और प्रेरक प्रसंग भोपाल स्थित अरेरा कॉलोनी का है। अरेरा कॉलोनी में ही मध्य भारत प्रांत का कार्यालय ‘समिधा’ है। उस समय सुदर्शन जी का केन्द्र यही कार्यालय था। वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी इस प्रसंग को अकसर सुनाते हैं। उस दिन रात के लगभग 9:30 बज रहे होंगे। सुदर्शन जी प्रवास से लौटे थे। उन्होंने कार्यालय में विवाह के निमंत्रण पत्र देखे। उनमें से एक पत्र बहुत साधारण था। वह निमंत्रण पत्र एक बाल स्वयंसेवक सुदर्शन जी के लिए देकर गया था। उसकी बहन का विवाह था। उसके पिता सरकारी कार्यालय में चौकीदार थे। उसका घर सरकारी परिसर में ही था। घर क्या था, एक कमरे में ही सारा परिवार रहता था। वह बाल स्वयंसेवक रोज शाखा में आता था। सबको यह लग रहा था कि सुदर्शन जी अभी बाहर से आए हैं, थके होंगे इसलिए किसी विवाह समारोह में नहीं जाएंगे। लेकिन तभी सुदर्शन जी ने निमंत्रण पत्र दिखाते हुए कहा कि सब जल्दी से तैयार हो जाओ, इस विवाह में शामिल होने चलना है।
कार्यकर्ताओं के साथ सुदर्शन जी विवाह में शामिल होने उस बाल स्वयंसेवक के घर पहुंचे। एक कमरे के घर में वर-वधू पक्ष के लोग जैसे-तैसे बैठे थे। यहां–वहां सामान बिखरा पड़ा था। वहाँ साफ–सफाई भी नहीं थी। यह सब देखते ही सुदर्शन जी ने स्वयं झाड़ू उठायी और घर–बाहर सफाई शुरू कर दी। उन्हें देखकर सभी कार्यकर्ता भी साफ–सफाई सहित अन्य व्यवस्थाओं को ठीक करने में जुट गए। इतने में बारात भी आ गई। उन्होंने देखा कि विवाह समारोह सम्पन्न कराने वाले पंडित बहुत जानकार नहीं हैं। फिर क्या था, उन्होंने पंडित जी की भूमिका भी निभा दी। कितना भाग्यशाली स्वयंसेवक था, जिसकी बहन के विवाह में सरसंघचालक स्वयं ‘मंत्र’ पढ़ रहे थे। उन्होंने वर-वधू को आशीर्वाद दिया और वस्त्र एवं कुछ उपहार भी भेंट किए। जैसा कि सुदर्शन जी का स्वभाव था कि ऐसे प्रसंग पर सबको भारतीय मूल्यों एवं रीति से भी परिचित कराते थे। विवाह एवं परिवार के महत्व से वर–वधू और उनके परिवारों को अवगत कराया। साथ में, हमारी जीवनशैली पर्यावरण के अनुकूल हो, इसका भी संदेश दिया। उन्होंने कहा कि विवाह रात में नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे बिजली का बहुत अपव्यय होता है। रात में डेढ़ बजे जब वे बाहर निकले तो उन्हें विदा करने के लिए घराती और बाराती, दोनों ही बाहर तक आए। सभी इसी बात पर धन्य हो रहे थे कि चौकीदारी करने वाले उनके जैसे साधारण परिवार की खुशी में इतना बड़ा व्यक्ति शामिल हुआ। निश्चित ही उस परिवार के लिए यह बड़ी बात थी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक उनके शुभ कार्य में न केवल शामिल हुए बल्कि घर के मुखिया की तरह जरूरी कार्य संभाल लिए।
उनके जीवन में इस प्रकार के अनेक प्रसंग हैं। संघ के अनेक वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने उनकी आत्मीयता और सरल व्यवहार की प्रत्यक्ष अनुभूति की है। सुदर्शन जी का यह आचरण दिखाता है कि वास्तविक समरसता भाषणों में नहीं, बल्कि ऐसे सहज कर्मों में बसती है। पद की गरिमा के साथ-साथ हृदय की विशालता और हर व्यक्ति को आत्मीय सम्मान देने की उनकी यह दृष्टि हम सबके लिए प्रेरणा का स्रोत है।
![]() |
| स्वदेश ज्योति में प्रकाशित साप्ताहिक कॉलम 'साधना के 100 वर्ष' में 4 अक्टूबर, 2026 को प्रकाशित लेख |










%20(1).jpeg)
