शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

हजार स्वर्ण मंदिरों का शहर है कांचीपुरम

देखें : इस वीडियो ब्लॉग में करें कांचीपुरम के चार प्रमुख मंदिरों के दर्शन


हिन्दू आस्था का प्रमुख केंद्र है तमिलनाडु का कांचीपुरम। हिन्दू वाङ्ग्मय में मोक्षदायिनी सप्तपुरियों का वर्णन आता है, उनमें कांचीपुरम भी शामिल है। अर्थात् कांची मोक्ष की भूमि है। ज्ञान-वैराग्य की भूमि है। संभवत: यही कारण है कि कांची को दक्षिण भारत की काशी भी कहते हैं। यह सप्तपुरियां भगवान शिव और विष्णु में बराबर-बराबर बंटी हैं। सप्तपुरियों को आधा-आधा कैसे बाँटें, तब इसका रास्ता निकाला गया कि कांची नगरी आधी विष्णु को और आधी शिव को समर्पित कर दी जाए। इस प्रकार कांचीपुरम के दो भाग हैं-  शिवकांची तथा विष्णुकांची। कांचीपुरम प्राचीन मंदिरों का शहर है। एक-दो नहीं अपितु यहाँ अनेक मंदिर हैं, जिनका द्रविण शैली का स्थापत्य देखते ही बनता है। कांचीपुरम को ‘हजार मंदिरों का शहर’ या ‘हजार मंदिरों का स्वर्ण नगर’ और ‘द गोल्डन सिटी ऑफ़ 1000 टेंपल’ भी कहा जाता है। यहाँ आज भी लगभग 126 भव्य-दिव्य मंदिरों के दर्शन किए जा सकते हैं। अपनी कांचीपुरम की यात्रा में हमने यहाँ के चार प्रमुख मंदिरों के दर्शन किए- कामाक्षी अम्मन मंदिर, एकाम्बरेश्वर मंदिर, वरदराज पेरुमल मंदिर और उलगलंथा पेरुमल मंदिर। चेन्नई के दक्षिण-पश्चिम में पलार नदी के किनारे स्थित कांचीपुरम अपने रेशम के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसे ‘कांजीवरम’ कहा जाता है। यहाँ आसपास के गाँवों में आज भी घर-घर में हथकरघे लगे हैं, जहाँ स्त्री के सौंदर्य को कई गुना बढ़ाने वाली रेशम की साड़ियाँ बुनी जाती हैं। कभी चोल, पल्लव और विजयनगर साम्राज्य की राजधानी रहे कांचीपुरम की ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक विरासत के साथ हमने तीन दिन गुजारे। श्रीकांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य श्री विजेंद्र सरस्वती कहते हैं कि कांचीपुरम में दो-तीन दिन रहने से पुण्य प्राप्त होता है। पुण्य के साथ हमने अविस्मरणीय आनंद भी प्राप्त किया।

कामाक्षी अम्मन मंदिर, कांचीपुरम / फोटो - डॉ. लोकेन्द्र सिंह

कामाक्षी अम्मन मंदिर :

कामाक्षी अम्मन मंदिर, कांचीपुरम का प्रमुख तीर्थस्थल है। देशभर से श्रद्धालु यहाँ माँ पार्वती के अवतार कामाक्षी माता के दर्शन करने के लिए आते हैं। पद्मासन में विराजमान कामाक्षी अम्मन, कांची की अधिष्ठात्री देवी हैं। कामाक्षी मंदिर को शक्तिपीठ माना जाता है, जहाँ देवी सती की नाभि गिरी थी। कामाक्षी मंदिर में गर्भगृह को गायत्री मंडप कहते हैं। गर्भगृह के ऊपर स्वर्ण गोपुरम् है, जो पूरे वैभव के साथ अध्यात्म और समृद्धि की चमक बिखरेता है। प्रवेश द्वार पर एक विशाल ध्वजस्तंभ या जयस्तंभम् है, जो विजय का प्रतीक है। यह जयस्तम्भ भी स्वर्ण आभा के साथ चमकता है। माँ कामाक्षी के सम्मुख श्रीचक्र बना है, जिसके शीर्ष पर वे प्रकटरूप में विराजी हैं। कहते हैं कि स्वयं जगद्गगुरु आदि शंकराचार्य ने शिला पर इस श्रीचक्र को उकेरा था और यहीं उन्होंने देवी पर सौंदर्यलहरी की रचना की थी। 

मंदिर का स्थापत्य बहुत भव्य है। इसकी दीवारों एवं खम्बों पर की गई नक्काशी देखते ही बनती है। यह नक्काशी भारत की एकात्मता को भी प्रकट करती है। दीवारों पर रामायण के प्रसंगों को उकेरा गया है। महाविष्णु के अवतार श्रीराम के जन्म के प्रसंग के साथ ही तीनों माताओं- कौशल्या, सुमित्रा, केकई और पिता महाराज दशरथ का शिल्प भी है। माता सीता की खोज में लंका पहुँचे श्रीहनुमान भी दशाशन के सामने बैठे दिखायी दे जाएंगे। यानी मंदिर की दीवारें रामकथा सुनाती हुई प्रतीत होंगी। यहाँ आप कल्याण मंडप भी देख पाएंगे, जहाँ भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ। इसके दृश्यों को मंडप की दीवारों एवं खम्बों पर आप देख सकते हैं। शिवलिंग का आलिंगन किए माँ पार्वती (कामाक्षी देवी) का शिल्प भाव-विभोर कर देता है।  

एकाम्बरेश्वर मंदिर, कांचीपुरम / फोटो : डॉ. लोकेन्द्र सिंह

एकाम्बरेश्वर मंदिर :

कामाक्षी मंदिर से थोड़ी दूरी पर ही एकाम्बरेश्वर मंदिर है, जिसे एकम्बरनाथ मंदिर भी कहते हैं। यह कांचीपुरम का सबसे बड़ा मंदिर है, जो लगभग 20 एकड़ में फैला हुआ है। गोपुरम् पर रंगों का संयोजन आकर्षित करता है। यह मंदिर महादेव को समर्पित है। एकाम्बरेश्वर शिवलिंग बालू से बना है, जिसे पृथ्वी लिंगम या बालुका लिंगम कहते हैं। मान्यता है कि इस शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा माता पार्वती ने की थी। उन्होंने महादेव से विवाह करने के लिए यहाँ आम के पेड़ के नीचे तपस्या की। मंदिर परिसर में स्थित लगभग 3500 वर्ष प्राचीन आम्रवृक्ष उस दैवीय प्रसंग के साक्षी के रूप में उपस्थित है। मंदिर के परिक्रमा पथ में अनेक शिवलिंग देखे जा सकते हैं। ये सभी शिवलिंग एक ही पत्थर से बनाए गए हैं। दक्षिण भारत के अन्य मंदिरों की भाँति यहाँ भी दीवारों और खंबों पर सुंदर नक्काशी की गई है। कई मूर्तियां इतनी सजीव हैं कि मानो अभी बोल ही पड़ेंगी। मंदिर के भीतर एक हजार खंभों वाला मंडप भी इस परिसर को विशिष्ट बनाता है।

वरदराज पेरुमल मंदिर में पत्थर से बनी जंजीर / फोटो : डॉ. लोकेन्द्र सिंह

वरदराज पेरुमल मंदिर : 

पेरुमल का अर्थ है ‘महान भगवान’। यह शब्द तमिल भाषा के ‘पेरुम’ (महान) और ‘माल’ (ईश्वर) से बना है। मुख्य रूप से दक्षिण भारत में भगवान विष्णु के लिए उपाधि के रूप में ‘पेरुमल’ शब्द का प्रयोग होता है। इसी तरह, ‘वरदराज’ का अर्थ है ‘वरदानों का राज’। इसका उपयोग भी भगवान विष्णु के लिए किया जाता है। ‘वरदराज पेरुमल मंदिर’ में भगवान विष्णु को देवराजस्वामी के रूप में पूजा जाता है। सन् 1053 में चोलों ने वरदराज पेरुमल मंदिर बनवाया था। यहाँ 9 फीट ऊंची भगवान विष्णु की अद्भूत मूर्ति है। वरदराज पेरुमल मंदिर के प्रवेश द्वार से जैसे ही हम परिसर में प्रवेश करते हैं, हमें बायीं ओर 100 खंभों वाला एक मंडप दिखायी देता है। इसके खंबों पर की गई कारीगरी अद्भुत है। क्या कारीगर रहे होंगे, जिन्होंने पत्थर को तराशकर अचंभित करनेवाली सांकर (जंजीर) बना दी। मंडल के कंगूरे पर लटकी जंजीर को देखकर आप अंदाजा ही नहीं लगा सकते कि यह लोहे या अन्य धातु की न होकर पत्थर की सांकर है। 

कांचीपुरम के उलगलंथा पेरुमल मंदिर का आकर्षक गोपुरम् / फोटो : डॉ. लोकेन्द्र सिंह

उलगलंथा पेरुमल मंदिर : 

‘उलगलंथा पेरुमल’ का अर्थ है ‘ब्रह्मांड को मापने वाला भगवान’। यह नाम भगवान विष्णु के पाँचवे अवतार ‘वामन अवतार’ से जुड़ता है। भगवान वामन को समर्पित मंदिर बमुश्किल ही आपने देखे होंगे। उलगलंथा पेरुमल मंदिर कांचीपुरम के सबसे प्राचीन मंदिरों में शामिल है। इतिहासकार बताते हैं कि मंदिर का निर्माण राजेन्द्र चोल प्रथम (1012-1044 ई.) ने कराया था। मंदिर का गोपुरम् आकर्षक है। जब हम गर्भगृह में पहुँचते हैं तब हमारे सामने भगवान वामन अपने विराट स्वरूप में दिखायी देते हैं। मूर्ति 35 फीट ऊँची है, जिसमें भगवान वामन का बायाँ पैर ऊँचा उठा हुआ है और दायाँ पैर राजा बलि के सिर पर टिका हुआ है। 

कांचीपुरम के ऐतिहासिक, प्राचीन और सांस्कृतिक महत्व के मंदिरों के वातावरण में सकारात्मक दिव्य ऊर्जा की अनुभूति आप कर सकते हैं। हम यह तो नहीं कहेंगे कि मौसम की अनुकूलता को ध्यान में रखकर आप केवल अक्टूबर से फरवरी के बीच ही यहाँ आएं। जब आपको लगे कि कांचीपुरम होकर आना चाहिए, तभी यहाँ चले आईए। कांचीपुरम के उत्सव एवं मंदिरों की परंपराओं की जानकारी लेकर आएंगे तो सांस्कृतिक विरासत के भी साक्षी एवं सहभागी बनने अवसर आपको मिल सकता है।

कांचीपुरम यात्रा के सहयात्री
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के छात्र
अंकित आनंद, नैवेद्य पुरोहित, शशांक कुमार और पुष्कर दीक्षित

स्वदेश ज्योति में 28 सितंबर, 2026 को प्रकाशित

शनिवार, 26 सितंबर 2026

“मैं अंग्रेजों की नौकरी नहीं करूंगा”

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक रज्जू भैया पढ़ने में बहुत मेधावी थे, स्कूल के दिनों में ही उन्होंने भांप लिया था कि ब्रिटिश राज भारत के लिए अच्छा नहीं है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चौथे सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ का संपूर्ण जीवन प्रखर मेधा, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति का अप्रतिम उदाहरण है। बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी रज्जू भैया ने उस दौर में ब्रिटिश शासन के वैभवशाली पदों को ठुकरा दिया था, जब लोग सरकारी नौकरियों के लिए लालायित रहते थे। उन्हें स्कूल के दिनों से ही यह अनुभव होने लगा था कि ब्रिटिश राज भारत के लिए अच्छा नहीं है। अंग्रेजों से मुक्ति पाने के लिए देश में स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा है। रज्जू भैया एक घटना को याद करते हैं– “मेरठ में नौचंदी का प्रसिद्ध मेला लगता था, यदा-कदा हम लोग भी उसे देखने जाते थे। भगतसिंह और उनके दो साथी राजगुरु और सुखदेव को मृत्युदंड दिया गया था। एक दुकानदार ने उस मेले में अपनी दुकान पर उस दृश्य का एक छोटा चित्र लगा रखा था, जो मेले में आए दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया था। अगले दिन ही पुलिस ने उस चित्र को हटा दिया और हमें यह पता लगा कि उस दुकानदार को गिरफ्तार कर लिया गया है। हम उस घटना को पूरी तरह समझ पाने में सक्षम नहीं थे, किंतु अंग्रेजों के प्रति हमारे मन में रोष अवश्य उत्पन्न हुआ और हमने ‘टोडी बच्चा हाय हाय’ के नारे का भरपूर समर्थन किया।” इसी विचार के कारण उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि ब्रिटिश शासन के अधीन नौकरी नहीं करूंगा।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

श्रीगणेश की दिव्य प्रतिमा, निरंतर बढ़ रहा आकार

अमरकंटक दर्शन : पुष्पराजगढ़ के जंगलों में कलचुरीकालीन भगवान श्रीगणेश की ऐतिहासिक प्रतिमा, इन्हें बटुक गणेश भी कहते हैं


अनूपपुर के पुष्पराजगढ़ तहसील के ग्राम धरहर कला में स्थापित प्राचीन एवं दिव्य श्रीगणेश प्रतिमा

अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ विकासखंड के अंतर्गत ग्राम धरहरकला में भगवान श्रीगणेश की दिव्य एवं प्राचीन प्रतिमा है, जो श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र है। इस स्थान को बहगड़नाला भी कहते हैं। अमरकंटक स्थित माँ नर्मदा मंदिर से उत्तर दिशा की ओर लगभग 35 किलोमीटर और पुष्पराजगढ़ से लगभग सात किलोमीटर की दूरी पर भगवान श्रीगणेश की यह प्रतिमा स्थापित है। भगवान श्रीगणेश की इस प्रतिमा को लेकर लोगों के मन में अपार श्रद्धा होने के साथ-साथ कौतुहल भी है। कहते हैं कि प्रतिवर्ष तिल-तिल करके प्रतिमा का आकार बढ़ रहा है। वर्तमान में प्रतिमा का आकार लगभग 8 फीट है। हालांकि इसके कोई वैज्ञानिक एवं पुरातात्विक साक्ष्य नहीं है। लेकिन लोगों की श्रद्धा है। इस संदर्भ में यह भी जनश्रुति है कि जब प्रतिमा प्रकट हुई थी, तब इसका आकार केवल एक फीट था। इन्हीं जनश्रुतियों के कारण घने जंगल में, एकांत में विराजे धरहरकला भगवान श्रीगणेश की प्रसिद्धि दूर-दूर तक है। प्रतिवर्ष वसंत पंचमी पर यहाँ तीन दिवसीय विशाल मेला लगता है। श्रीगणेशोत्सव के दिनों में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहाँ भगवान श्रीगणेश की इस दिव्य प्रतिमा के दर्शन के लिए आते हैं। अमरकंटक में सदानीरा माँ नर्मदा के दर्शन के लिए आने वाले भक्तगण भी श्रीगणेश के दर्शन के लिए आते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि अमरकंटक में माँ नर्मदा की पूजा-अर्चना का फल भक्तों को तभी मिलता है, जब धरहरकला आकर भगवान श्रीगणेश की पूजा करते हैं। एक मान्यता यह भी है कि अमरकंटक पहुंचने से पहले धरहर के स्वयंभू गणेश महाराज के दर्शन करने के बाद ही माँ नर्मदा की पूजा-अर्चना का फल पूर्ण होता है। इन्हीं कारणों से अमरकंटक आने वाले और वहाँ से लौटने वाले श्रद्धालु धरहर कला पहुंचकर श्री गणेश जी के दर्शन और पूजन करते हैं।

गुरुवार, 24 सितंबर 2026

‘हनुमान अंश’ ने भारतीय सिनेमा को दिखाई राह

भारतीय सिनेमाई परिदृश्य में जब भी किसी फिल्म की सफलता का आकलन होता है, तो अमूमन भारी-भरकम बजट, चमचमाते सितारे और आक्रामक प्रचार तंत्र का उल्लेख किया जाता है। बड़े प्रोडक्शन हाउस अक्सर औसत दर्जे की कहानियों को भी पीआर रणनीतियों और मल्टी-सिटी टूर के शोर में ‘ब्लॉकबस्टर’ का चोगा पहनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन नीम करोली बाबा के जीवन और दर्शन से प्रेरित फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने स्थापित व्यावसायिक नैरेटिव्स को ध्वस्त कर यह सिद्ध कर दिया है कि जब कथ्य में आत्मीयता, सांस्कृतिक जुड़ाव और सादगी हो, तो समाज उसे न केवल स्वीकारता है, बल्कि सिर-आंखों पर बिठाता है। रिलीज के सातवें सप्ताह और 47वें दिन के बाद भी सिनेमाघरों में दर्शकों की बढ़ती भीड़ इस बात का प्रमाण है कि यह कोई क्षणिक कौतूहल नहीं, बल्कि भारतीय दर्शकों के अंतर्मन का सच्चा प्रकटीकरण है।

बुधवार, 23 सितंबर 2026

ब्रह्मांड को मापने वाले भगवान का मंदिर

उलगलंथा पेरुमल मंदिर में भगवान विष्णु के वामन अवतार के दर्शन

‘उलगलंथा पेरुमल’ का अर्थ है ‘ब्रह्मांड को मापने वाला भगवान’। यह नाम भगवान विष्णु के पाँचवे अवतार ‘वामन अवतार’ से जुड़ता है। भगवान वामन को समर्पित मंदिर बमुश्किल ही आपने देखे होंगे। मेरे लिए तो यह पहला मंदिर है, जहाँ मंदिर के मुख्य देवता के रूप में भगवान वामन की पूजा होती है। उलगलंथा पेरुमल मंदिर कांचीपुरम के सबसे प्राचीन मंदिरों में शामिल है। इतिहासकार बताते हैं कि इस मंदिर का निर्माण राजेन्द्र चोल प्रथम (1012-1044 ई.) ने कराया था। एक और महत्वपूर्ण तथ्य इस मंदिर को विशेष बनाता है कि यह मंदिर 108 दिव्य देसमों (विष्णु के पवित्र निवास) में से एक है। मंदिर का गोपुरम् आकर्षक है।

दर्शन करें : कांचीपुरम के मंदिरों का दर्शन करें

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

न्यूजरूम के यथार्थ से जोड़ती संपादन-कला

पुस्तक चर्चा : सोशल मीडिया और आधुनिक पत्रकारिता के दौर में सामग्री परिमार्जन का प्रामाणिक पाठ है प्रो. अरुण कुमार भगत की पुस्तक ‘संपादन-कला : सिद्धांत से व्यवहार तक’


सोशल मीडिया के इस दौर में एक बात सबको साफ़ समझ आ गई है कि पत्रकारिता में संपादन का बहुत महत्व है। पत्रकारिता केवल रिपोर्टिंग नहीं है। यह सत्य है कि पत्रकारिता में जानकारी एकत्र करके लाना सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण कार्य है यह तय करना कि उस जानकारी को किस प्रकार से प्रसारित करना है, या प्रसारित करना भी है या नहीं? संपादन की अच्छी समझ होने पर ही हम उस जानकारी को लोकोपयोगी बना सकते हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पत्रकारिता की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता बहुत हद तक उसके संपादन पक्ष पर टिकी होती है। इसलिए संपादन-कला का कौशल सबको सीखना चाहिए। सूचनाओं के प्रचार-प्रसार में शामिल सभी लोगों को संपादन की बुनियादी बातें पता होनी चाहिए। मीडिया के आचार्य रहे वरिष्ठ लेखक एवं बिहार लोक सेवा आयोग के सदस्य प्रो. अरुण कुमार भगत की पुस्तक ‘संपादन-कला : सिद्धांत से व्यवहार तक’ इन बुनियादी बातों को सिखाने में बहुत उपयोगी साबित होगी। पुस्तक के शीर्षक और उसकी विषय-वस्तु को देखकर यह अनुमान न लगाएं कि यह केवल पत्रकारिता के विद्यार्थियों के उपयोग की पुस्तक है। यह उन सबके लिए उपयोगी है, जो सोशल मीडिया में लिख-पढ़ रहे हैं।

रविवार, 13 सितंबर 2026

हिन्दी समाचारपत्र में अंग्रेजी शब्दों पर ‘लाल गोले’ लगाकर संपादक के पास पहुँच गए थे सुदर्शन जी

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पाँचवें सरसंघचालक श्री कुप्पहल्ली सीतारामय्या सुदर्शन स्वभाषा के प्रबल पक्षधर थे, हिन्दी में अंग्रेजी की मिलावट वे पसंद नहीं करते थे


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक कुप्प. सी. सुदर्शन भाषा की शुद्धता और व्याकरण को लेकर बेहद संवेदनशील थे। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में वर्तनी एवं व्याकरण की अशुद्धियों को वे कतई नजरअंदाज नहीं करते थे। भले ही उनकी अपनी मातृभाषा तमिल थी, लेकिन जन्मभूमि एवं कर्मभूमि हिन्दी भाषी क्षेत्र रहा। शायद इसलिए ही हिन्दी से उन्हें गहरा प्रेम था। हालांकि, सुदर्शनजी लगभग 12 भाषाओं पर अधिकार रखते थे। परिवार तमिल था लेकिन पूर्वज वर्षों पहले तमिलनाडु से स्थानांतरित होकर कर्नाटक में बस गए थे इसलिए कन्नड़ ही उनके परिवार की मुख्य भाषा बन गई थी। भाषा प्रेम को लेकर सुदर्शन जी के अनेक प्रेरक प्रसंग प्रचलित हैं। ऐसा ही एक किस्सा भोपाल का है, जब वे सरसंघचालक के दायित्व से मुक्त होकर ‘एक साधारण स्वयंसेवक’ की भाँति रह रहे थे। हिन्दी के हृदय प्रदेश, ‘मध्यप्रदेश’ से प्रकाशित हिन्दी के प्रमुख समाचार पत्र में जब उन्होंने अंग्रेजी के शब्दों की भरमार देखी, तो उन्हें क्षोभ हुआ। समाचारपत्र अपनी प्रतिष्ठा तो इस नाते करता है कि वह हिन्दी का सबसे बड़ा और सबसे अधिक प्रसारित समाचार पत्र है लेकिन हिन्दी भाषा के साथ न्याय नहीं करता है। उन्होंने लाल कलम से भाषा की त्रुटियों और अंग्रेजी के शब्दों पर गोले लगाए। उस रंगे-पुते समाचारपत्र को लेकर संपादक के कक्ष में भी पहुँच गए। सुदर्शनजी ने समाचारपत्र की वह प्रति संपादक की मेज पर रखकर उन्हें हिन्दी में अनावश्यक अंग्रेजी मिलावट के प्रति सचेत किया। यह बातचीत आक्रोश या अभिमान के साथ नहीं हो रही थी, बल्कि उसमें अपनत्व था। संपादक ने भी स्वीकार किया और विश्वास दिलाया कि हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों की मिलावट और वर्तनी की अशुद्धियों के प्रति सावधान रहेंगे।