बुधवार, 12 जनवरी 2022

भारत भक्ति से भरा मन है ‘स्वामी विवेकानंद’


स्वामी विवेकानंद ऐसे संन्यासी हैं, जिन्होंने हिमालय की कंदराओं में जाकर स्वयं के मोक्ष के प्रयास नहीं किये बल्कि भारत के उत्थान के लिए अपना जीवन खपा दिया। विश्व धर्म सम्मलेन के मंच से दुनिया को भारत के ‘स्व’ से परिचित कराने का सामर्थ्य स्वामी विवेकानंद में ही था, क्योंकि विवेकानंद अपनी मातृभूमि भारत से असीम प्रेम करते थे। भारत और उसकी उदात्त संस्कृति के प्रति उनकी अनन्य श्रद्धा थी। समाज में ऐसे अनेक लोग हैं जो स्वामी जी या फिर अन्य महान आत्माओं के जीवन से प्रेरणा लेकर भारत की सेवा का संकल्प लेते हैं। रामजी की गिलहरी के भांति वे भी भारत निर्माण के पुनीत कार्य में अपना योगदान देना चाहते हैं। परन्तु भारत को जानते नहीं, इसलिए उनका गिलहरी योगदान भी ठीक दिशा में नहीं होता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक, चिन्तक एवं वर्तमान में सह-सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य अक्सर कहते हैं कि “भारत को समझने के लिए चार बिन्दुओं पर ध्यान देने की जरूरत है। सबसे पहले भारत को मानो, फिर भारत को जानो, उसके बाद भारत के बनो और सबसे आखिर में भारत को बनाओ”। भारत के निर्माण में जो भी कोई अपना योगदान देना चाहता है, उसे पहले इन बातों को अपने जीवन में उतरना होगा। भारत को मानेंगे नहीं, तो उसकी विरासत पर विश्वास और गौरव नहीं होगा। भारत को जानेंगे नहीं तो उसके लिए क्या करना है, क्या करने की आवश्यकता है, यह ध्यान ही नहीं आएगा। भारत के बनेंगे नहीं तो बाहरी मन से भारत को कैसे बना पाएंगे? भारत को बनाना है तो भारत का भक्त बनना होगा। उसके प्रति अगाध श्रद्धा मन में उत्पन्न करनी होगी। स्वामी विवेकानंद भारत माता के ऐसे ही बेटे थे, जो उनके एक-एक धूलि कण को चन्दन की तरह माथे पर लपेटते थे। उनके लिए भारत का कंकर-कंकर शंकर था। उन्होंने स्वयं कहा है- “पश्चिम में आने से पहले मैं भारत से केवल प्रेम करता था, परंतु अब (विदेश से लौटते समय) मुझे प्रतीत होता है कि भारत की धूलि तक मेरे लिए पवित्र है, भारत की हवा तक मेरे लिए पावन है, भारत अब मेरे लिए पुण्यभूमि है, तीर्थ स्थान है”।

भारत के बाहर जब स्वामी विवेकानंद ने अपना महत्वपूर्ण समय बिताया तब उन्होंने दुनिया की नज़र से भारत को देखा, दुनिया की नज़र में भारत को देखा। भारत के बारे में बनाई गई मिथ्या प्रतिमा खंड-खंड हो गई। भारत का अप्रतिम सौंदर्य उनके सामने प्रकट हुआ। दुनिया की संस्कृतियों के उथलेपन ने उन्हें सिन्धु सागर की अथाह गहराई दिखा दी। एक महान आत्मा ही लोकप्रियता और आकर्षण के सर्वोच्च शिखर पर बैठकर भी विनम्रता से अपनी गलती को स्वीकार कर सकती है। स्वामी विवेकानंद लिखते हैं- “हम सभी भारत के पतन के बारे में काफी कुछ सुनते हैं। कभी मैं भी इस पर विश्वास करता था। मगर आज अनुभव की दृढ़ भूमि पर खड़े होकर दृष्टि को पूर्वाग्रहों से मुक्त करके और सर्वोपरि अन्य देशों के अतिरंजित चित्रों को प्रत्यक्ष रूप से उचित प्रकाश तथा छायाओं में देखकर, मैं विनम्रता के साथ स्वीकार करता हूं कि मैं गलत था। हे आर्यों के पावन देश! तू कभी पतित नहीं हुआ। राजदंड टूटते रहे और फेंके जाते रहे, शक्ति की गेंद एक हाथ से दूसरे में उछलती रही, पर भारत में दरबारों तथा राजाओं का प्रभाव सदा अल्प लोगों को ही छू सका- उच्चतम से निम्नतम तक जनता की विशाल राशि अपनी अनिवार्य जीवनधारा का अनुसरण करने के लिए मुक्त रही है और राष्ट्रीय जीवनधारा कभी मंद तथा अर्धचेतन गति से और कभी प्रबल तथा प्रबुद्ध गति से प्रवाहित होती रही है”। 

स्वामी विवेकानंद की यह स्वीकारोक्ति उन बुद्धिजीवियों के लिए आईना बन सकती है जो भारत के सन्दर्भ में अपने पूर्वाग्रहों को पकड़ कर बैठे हुए हैं। भारत में कई विद्वान तो ऐसे हैं जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात तो करते हैं लेकिन स्वयं विज्ञान को स्वीकार नहीं करते। यदि उनके मतानुसार विज्ञान की खोज का परिणाम नहीं आया तो उस परिणाम को ही नहीं मानते। उनकी ऐसी मति इसलिए भी है क्योंकि भारत के प्रति उनके मन में श्रद्धा नहीं है। उन्होंने न तो मन से भारत को माना है और न ही वे स्वाभाव से भारतीय हैं। अन्यथा क्या कारण हैं कि राखीगढ़ी और सिनौली की वैज्ञानिक खोजों के बाद भी उनका घोड़ा उसी झूठ पर अड़ा है कि भारत में आर्य बाहर से आये। ऐसा क्यों न माना जाये कि वे इस झूठ पर अभी भी इसलिए टिके हैं क्योंकि वे भारत को तोड़ने के लिए इस झूठ को लेकर आये थे। स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि मैं गलत था, हे आर्यों के देश तू कभी पतित नहीं हुआ। जबकि हमारे आज के विद्वान मानते हैं कि भारत तो अंधकार में था, उसको तो अन्य सभ्यताओं ने उजाला दिखाया है। भारत के स्वर्णकाल पर उनको भरोसा ही नहीं। भारत के लिए उपयोग की जाने वाले विशेषण ‘विश्वगुरु’ को हेय दृष्टि से देखते हैं। इस विशेषण को वे उपहास में उड़ाना पसंद करते हैं क्योंकि भारत के प्रति उनका मन भक्ति से भरा हुआ नहीं है। भारत के प्रति मन में भक्ति होती है तब स्वामी विवेकानंद भी अपने पूर्व मत में सुधार करने के लिए उत्साहित होते हैं।

आत्मनिर्भर भारत पर स्वामी विवेकानंद के विचार



आज जब हम स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं तब हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि स्वामी विवेकानंद ने भारत माता के अनेक सपूतों के मन में संघर्ष करने की प्रेरणा पैदा की। क्रांतिपथ पर स्वयं को समर्पित करने की प्रेरणा जगाई। उनके मन इस प्रकार तैयार किये कि देवताओं की उपासना छोड़कर भारत माता की भक्ति में लीन हो जाएँ। उन्होंने दृढ़ होकर कहा- “आगामी 50 वर्षों के लिए हमारा केवल एक ही विचार केंद्र होगा- और वह है हमारी महान मातृभूमि भारत। दूसरे से व्यर्थ के देवताओं को उस समय तक के लिए हमारे मन से लुप्त हो जाने दो। हमारा भारत, हमारा राष्ट्र- केवल यही एक देवता है, जो जाग रहा है, जिसके हर जगह हाथ हैं, हर जगह पैर हैं, हर जगह कान हैं- जो सब वस्तुओं में व्याप्त है। दूसरे सब देवता सो रहे हैं। हम क्यों इन व्यर्थ के देवताओं के पीछे दौड़ें, और उस देवता की- उस विराट की - पूजा क्यों न करें, जिसे हम अपने चारों ओर देख रहे हैं। जब हम उसकी पूजा कर लेंगे तभी हम सभी देवताओं की पूजा करने योग्य बनेंगे”। नि:संदेह इस आह्वान के पीछे स्वामी विवेकानंद का उद्देश्य यही था कि भारतीय मन, बाहरी तंत्र के साथ चल रहे भारत के संघर्ष और उससे उपजी उसकी वेदना के साथ एकात्म हों। भारत की स्थिति को समझें। जाग्रत देवता भारत की पूजा से उनका अभिप्राय भारत की स्वतंत्रता के लिए स्वयं को होम कर देने से रहा होगा। भारत स्वतंत्र होगा, तब ही अपनी संस्कृति और उपासना पद्धति का पालन कर पाएगा। अन्यथा तो विधर्मी ताकतें जोर-जबरदस्ती और छल-कपट से अपना धर्म एवं उपासना पद्धति भारत की संतति पर थोप ही ही रही है। भारत स्वतंत्र न हुआ, तब कहाँ हम अपने देवताओं की पूजा करने के योग्य रह जाएंगे। यह ध्यान भी आता है कि स्वामी विवेकानंद से प्रेरणा लेकर अनेक क्रांतिकारी एवं स्वतंत्रता सेनानी भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में आगे आये। याद रखें कि अनेक प्रकार के आक्रमण झेलने के बाद भी भारत आज भी अपनी जड़ों के साथ खड़ा है तो उसका कारण स्वामी विवेकानंद जैसी महान आत्माएं हैं, जिन्होंने भारत को भारत के दृष्टिकोण से देखा और भारतीय मनों में भारत के प्रति भक्ति पैदा की।

(यह आलेख 12 जनवरी, 2022 को भोपाल स्वदेश समूह एवं सुबह सवेरे सहित अन्य समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ है।)

यह भी देखें : आज्ञा पालन पर स्वामी विवेकानंद का उपदेश



शनिवार, 8 जनवरी 2022

सूर्य नमस्कार का मूर्खतापूर्ण विरोध

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के निर्णय एवं प्रस्ताव स्पष्ट करते हैं कि मुस्लिम समुदाय को पिछड़ा रखने एवं उसमें सांप्रदायिक कट्टरता को बढ़ावा देने में इस संस्था की बड़ी भूमिका है। अपनी सांप्रदायिक सोच एवं प्रस्तावों के कारण यह संस्था विवादों में रहती है। पिछले दिनों भारत में पाकिस्तान के घोर सांप्रदायिक ‘ईशनिंदा कानून’ को भारत में लागू करने की माँग करके मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड विवादों में रहा था। उस समय देशभर में इस सांप्रदायिक माँग का विरोध किया गया। लेकिन उसके बाद भी बोर्ड ने अपनी सोच को बदला नहीं है। अब बोर्ड ने सूर्य नमस्कार का विरोध करके जता दिया है कि उसे कथित ‘गंगा-जमुनी संस्कृति’ से उसको कोई लेना-देना नहीं है। सबको मिलकर ऐसी कट्टर और संकीर्ण विचारों का विरोध करना चाहिए। इस तरह के विचारों को हतोत्साहित करना सभी समुदायों के हित में है।

शनिवार, 25 दिसंबर 2021

‘अटलपथ’ पर चल रही सरकार


मोदी सरकार ने भारत रत्न एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती को ‘सुशासन दिवस’ के रूप में मनाने की परंपरा प्रारंभ की है। यह केवल एक परंपरा न रहे, इसका प्रयास भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करते हैं। उनका तो ध्येय ही है-‘सुशासन’। केंद्र सरकार के लोककल्याण एवं विकास कार्यों को देखकर यह आश्वस्ति होती है कि वर्तमान सरकार अटल पथ पर चल रही है। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी तो देश ने एक करवट ली और जनता के बीच आशा की नयी लहर दौड़ी थी। उन्होंने नये भारत के निर्माण की नींव रखी। अटलजी ने नये भारत के निर्माण को जहाँ छोड़ा था, मोदीजी उसे वहीं से आकार दे रहे हैं। वह मंदिर निर्माण का सपना हो या फिर जम्मू-कश्मीर से विवादास्पद अनुच्छेद-370 को समाप्त करने का संकल्प, सब आज संभव हो रहा है।

रविवार, 5 दिसंबर 2021

भारत में दर्शन का आधार है ‘संवाद’

सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम् । 

देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ॥2॥ 

समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम् l 

समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि ॥3॥ 

समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः । 

समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥4॥

ऋग्वेद के 10वें मंडल का यह 191वां सूक्त ऋग्वेदका अंतिम सूक्त है। इस सूक्त में सबकी अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले अग्निदेव की प्रार्थना, जो आपसी मतभेदों को भुलाकर सुसंगठित होने के लिए की गयी है। आप परस्पर एक होकर रहें, परस्पर मिलकर प्रेम से वार्तालाप करें। समान मन होकर ज्ञान प्राप्त करें। जिस प्रकार श्रेष्ठजन एकमत होकर ज्ञानार्जन करते हुए ईश्वर की उपासना करते हैं, उसी प्रकार आप भी एकमत होकर एवं विरोध त्याग करके अपना काम करें। हम सबकी प्रार्थना एकसमान हो, भेद-भाव से रहित परस्पर मिलकर रहें, अंतःकरण मन-चित्त-विचार समान हों। मैं सबके हित के लिए समान मन्त्रों को अभिमंत्रित करके हवि प्रदान करता हूँ। तुम सबके संकल्प एकसमान हों, तुम्हारे ह्रदय एकसमान हों और मन एकसमान हों, जिससे तुम्हारा कार्य परस्पर पूर्णरूपसे संगठित हों।

बुधवार, 1 दिसंबर 2021

इस्लामिक कानूनों की माँग का औचित्य


भारत जैसे देश में इस्लामिक संगठन यदि ‘ईशनिंदा’ जैसे विवादित कानून की माँग कर रहे हैं, तब इस ओर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। जरा यह भी देखने की आवश्यकता है कि सेकुलर बुद्धिजीवी इस तरह के कानूनों की माँग का विरोध करने की जगह किस कोने में दुबक गए हैं? जब भी देश में समान नागरिक संहिता जैसे सेकुलर कानून की माँग उठती है तब यही बुद्धिजीवी उछल-उछलकर विरोध करते हैं। स्पष्ट है कि वे कहने के लिए सेकुलर हैं, लेकिन उनका आचरण घोर सांप्रदायिक है। उनके व्यवहार में हिन्दू विरोध और इस्लामिक तुष्टीकरण की झलक दिखाई देती है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने हाल ही में सम्पन्न हुई अपनी एक बैठक में भारत में पाकिस्तान के उस कानून को लागू करने का प्रस्ताव पारित किया है, जिसके तहत मोहम्मद पैगंबर साहब या कुरान के संबंध में अपमानजनक, आपत्तिजनक या आलोचनात्मक बात कहने पर मृत्युदंड का प्रावधान है। पाकिस्तान में इस कानून का दुरुपयोग सुधारवादी मुस्लिमों के विरुद्ध ही नहीं अपितु गैर-मुस्लिमों को भयाक्रांत करने और उन्हें दबाने के लिए किया जाता है। यह भी देखने में आया है कि सामान्य बात को भी ‘ईशनिंदा’ बताकर अनेक गैर-मुस्लिमों को प्रताडि़त और दंडित किया गया है। क्या भारत जैसे देश में इस प्रकार के सांप्रदायिक कानून की वकालत होनी चाहिए?

मंगलवार, 16 नवंबर 2021

भारतीय मूल्यों एवं संस्कृति से जोड़ता है ‘जनजाति गौरव दिवस’

भारत सरकार ने भारत माता के महान बेटे बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवंबर को ‘जनजाति गौरव दिवस’ के रूप में मान्यता देकर प्रशंसनीय कार्य किया है। जनजाति समुदाय के इस बेटे ने भारत की सांस्कृतिक एवं भौगोलिक स्वतंत्रता के लिए महान संघर्ष किया और बलिदान दिया। अपनी धरती की रक्षा के लिए उन्होंने विदेशी ताकतों के साथ जिस ढंग से संघर्ष किया, उसके कारण समूचा जनजाति समाज उन्हें अपना भगवान मानने लगा। उन्हें ‘धरती आबा’ कहा गया। भगवान बिरसा मुंडा न केवल भारतीय जनजाति समुदाय के प्रेरणास्रोत हैं बल्कि उनका व्यक्तित्व हम सबको गौरव की अनुभूति कराता है। इसलिए उनकी जयंती सही मायने में ‘गौरव दिवस’ है।

सोमवार, 15 नवंबर 2021

माँ अन्नपूर्णा प्रतिमा की वापसी - सांस्कृतिक विरासत के प्रति प्रतिबद्ध मोदी सरकार


एक महत्वपूर्ण प्रयास केंद्र में भाजपानीत सरकार के आने के बाद से प्रारंभ हुआ है, जिसकी चर्चा व्यापक स्तर पर नहीं हुई है। केंद्र सरकार के लक्षित प्रयासों के कारण 2014 के बाद से 42 मूर्तियों को विदेशों से वापस लाया गया है। ये मूर्तियां पुरातात्विक महत्व की हैं और भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती हैं। संस्कृति मंत्रालय एवं विदेश मंत्रालय के संयुक्त प्रयास भारत की विरासत के प्रति मोदी सरकार की प्रतिबद्धता को भी प्रकट करते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले वर्ष ही लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में माँ अन्नपूर्णा की प्रतिमा को वापिस लाने के लिए अपनी प्रतिबद्धता प्रकट की थी। लगभग 107 वर्ष पहले वाराणसी के मंदिर से चुराई गई माँ अन्नपूर्णा की प्रतिमा को कनाडा की ‘यूनिवर्सिटी ऑफ रिजायना’ के ‘मैकेंजी आर्ट गैलरी’ में रख दिया गया था। कला एवं सौंदर्य की दृष्टि से उत्क्रष्ट इस प्रतिमा को केंद्र सरकार कनाडा से वापस प्राप्त करने में सफल रही। केंद्र सरकार की ओर से 11 नवम्बर को उत्तरप्रदेश सरकार को यह प्रतिमा सौंपी गई। आगे हम सबने देखा कि उत्तरप्रदेश सरकार ने बहुत ही गरिमामयी आयोजन के साथ प्रतिमा को उसके मूल स्थान पर स्थापित कर दिया। नये भारत में यह एक सुखद परिवर्तन दिखाई दे रहा है कि सरकारें अब निसंकोच अपनी विरासत की पुनर्स्थापना कर रही हैं।

शुक्रवार, 12 नवंबर 2021

नायकों का सम्मान


देश के प्रतिष्ठित पुरस्कारों/सम्मानों को लेकर समाज में सकारात्मक चर्चा हो रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोधी भी मन मारकर प्रशंसा करने को मजबूर हैं कि उन्होंने देश के वास्तविक नायकों को खोजकर उनका सम्मान करने की परंपरा प्रारंभ की है। सही मायने में अब पद्म पुरस्कारों को अधिक पात्र लोग मिल रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में जिन साधारण से दिखने वाले असाधारण लोगों को पद्म पुरस्कार दिए गए हैं, उससे पद्म पुरस्कारों का ही सम्मान अधिक बढ़ गया है। एक समय था जब ज्यादातर नामचीन और सत्ता के इर्द-गिर्द परिक्रमा करने वाले लोगों के हिस्से में ये पुरस्कार आते थे। सरकार 'अपने लोगों' को संतुष्ट एवं प्रसन्न करने के लिए उन्हें ये पुरस्कार देती थी। लेकिन अब दृश्य पूरी तरह बदल गया है। अपने काम से अलग पहचान बनाने वाले आम लोगों को पद्म पुरस्कार मिल रहे हैं।

शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2021

सिनेमा के निशाने पर हिन्दू संस्कृति

फिल्म निर्माता प्रकाश झा की विवादित वेबसीरीज ‘आश्रम’ के कारण एक बार फिर आम समाज में यह विमर्श चल पड़ा है कि सिनेमाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं रचनाधर्मिता के निशाने पर हिन्दू संस्कृति ही क्यों रहती है? फिल्मकार अन्य संप्रदायों पर सिनेमा बनाने का साहस क्यों नहीं कर पाते हैं? हिन्दू संस्कृति एवं प्रतीकों को ही अपनी तथाकथित रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए चुनने के पीछे का एजेंडा क्या है? मुस्लिम कलाकार भी अपने धर्म की आलोचनात्मक प्रस्तुति करने की जगह हिन्दू धर्म पर ही व्यंग्य करना पसंद करता है। पिछले दिनों एम्स दिल्ली के विद्यार्थियों ने भी रामलीला का आपत्तिजनक मंचन किया, जिसका निर्देशन शोएब नाम के लड़के ने किया था। हिन्दू बार-बार इन प्रश्नों के उत्तर माँगता है, लेकिन उसको कभी भी समाधानमूलक उत्तर मिले नहीं। परिणामस्वरूप अपमानजनक एवं उपेक्षित परिस्थितियों और चयनित आलोचना एवं चुप्पी ने उसके भीतर आक्रोश को जन्म देना प्रारंभ कर दिया है।

शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2021

व्यक्तियों के आधार पर नहीं, संघ को तत्व के आधार पर समझें

डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में विजयादशमी के दिन शुभ संकल्प के साथ एक छोटा बीज बोया था, जो आज विशाल वटवृक्ष बन चुका है। दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक-सामाजिक संगठन के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमारे सामने है। नन्हें कदम से शुरू हुई संघ की यात्रा समाज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पहुँची है, न केवल पहुँची है, बल्कि उसने प्रत्येक क्षेत्र में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। ऐसे अनेक क्षेत्र हैं, जहाँ संघ की पहुँच न केवल कठिन थी, बल्कि असंभव मानी जाती थी। किंतु, आज उन क्षेत्रों में भी संघ नेतृत्व की भूमिका में है। बीज से वटवृक्ष बनने की संघ की यात्रा आसान कदापि नहीं रही है। 1925 में जिस जमीन पर संघ का बीज बोया गया था, वह उपजाऊ कतई नहीं थी। जिस वातावरण में बीज का अंकुरण होना था, वह भी अनुकूल नहीं था। किंतु, डॉक्टर हेडगेवार को उम्मीद थी कि भले ही जमीन ऊपर से बंजर दिख रही है, पंरतु उसके भीतर जीवन है। जब माली अच्छा हो और बीज में जीवटता हो, तो प्रतिकूल वातावरण भी उसके विकास में बाधा नहीं बन पाता है। अनेक व्यक्तियों, विचारों और संस्थाओं ने संघ को जड़ से उखाड़ फेंकने के प्रयास किए, किंतु उनके सब षड्यंत्र विफल हुए। क्योंकि, संघ की जड़ों के विस्तार को समझने में वह हमेशा भूल करते रहे। आज भी स्थिति कमोबेश वैसी ही है। आज भी अनेक लोग संघ को राजनीतिक चश्मे से ही देखने की कोशिश करते हैं। पिछले 96 बरस में इन लोगों ने अपना चश्मा नहीं बदला है। इसी कारण यह संघ के विराट स्वरूप का दर्शन करने में असमर्थ रहते हैं। जबकि संघ इस लंबी यात्रा में समय के साथ सामंजस्य बैठाता रहा और अपनी यात्रा को दसों दिशाओं में लेकर गया।