रविवार, 16 अगस्त 2026

आरएसएस बदल रहा है अपना ढांचा

संघ शताब्दी वर्ष : मध्यप्रदेश में अब तीन प्रांत (मध्यभारत , मालवा और महाकौशल) की जगह होंगे 7 संभाग, मध्य भारत में भोपाल एवं ग्वालियर संभाग, मालवा की जगह इंदौर और उज्जैन संभाग, महाकौशल की जगह सागर, रीवा और जबलपुर संभाग

यह आलेख 'आयुध Updates' के मार्च-अप्रैल 2026 अंक में प्रकाशित हुआ है। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर समाज में अब स्वीकार्यता के साथ-साथ एक विश्वास भी बन गया है। सज्जनशक्ति संघ के साथ मिलकर समाज परिवर्तन के आंदोलन से जुड़ना चाहती है, वहीं संघ भी अपने लक्ष्य यानी समाज के साथ एकाकार होने की ओर बढ़ना चाहता है। हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष के बाद अपने अगले पड़ाव की ओर कदम बढ़ा रहा है। शताब्दी वर्ष में अब तक आयोजित कार्यक्रमों में समाज ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया है। समाज की बड़ी ताकत संघ के संपर्क में आई है। इसलिए अपने अगले पड़ाव में संघ समाज की सज्जन शक्ति को साथ लेकर भारत के निर्माण की नयी कहानी लिखने की तैयारी कर रहा है। इसकी एक झलक हरियाणा के पट्टीकल्याणा (समालखा) में आयोजित अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों एवं भविष्य की रणनीति में देखी जा सकती है। पिछले कुछ समय से एक चर्चा बहुत जोरों से थी कि संघ अपनी भौगोलिक संरचना में बदलाव करने जा रहा है, संघ की प्रांत रचना खत्म हो जाएगी, क्षेत्र रचना में भी बदलाव होगा। इस चर्चा पर अब प्रतिनिधि सभा में मुहर लग गई है। हाँ, संघ की भौगोलिक संरचना में बदलाव हो रहा है। अब चर्चा इस बात की अधिक हो रही है कि आखिर संघ को इस परिवर्तन की आवश्यकता क्यों पड़ी? 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संदर्भ में एक बात समझ लेनी चाहिए कि यह प्रगतिशील संगठन है। संघ देश-काल-परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन के लिए सदैव तैयार रहता है। संघ के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से लेकर वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत तक सबने कहा है कि आरएसएस में सब बदला जा सकता है लेकिन हिंदू राष्ट्र का विचार, हिंदुत्व का मूल सिद्धांत और भारत के प्रति समर्पण का मूल मंत्र, ये तीन बातें कभी नहीं बदली जा सकती हैं। संघ की शुरुआत ही इस विचार के साथ हुई है कि ‘भारत एक हिन्दू राष्ट्र है’। व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज में वांछित परिणाम लाए जा सकते हैं। संघ व्यक्ति निर्माण के अपने कार्य के लिए पद्धति एवं प्रक्रिया में बदलाव ला सकता है लेकिन विचार में नहीं, यह बात पक्की है। इसी संदर्भ में संघ की भौगोलिक रचना में होने जा रहे बदलाव को देखना चाहिए। स्मरण रहे कि संघ में इस तरह के बदलाव पहली बार नहीं हो रहे हैं। संघ की भौगोलिक रचना पहले भी बदलती रही है। इसलिए संघ के लिए यह परिवर्तन सहज है, जो संघ को समीप से नहीं जानते, उनके लिए ही यह परिवर्तन कौतुहल का विषय हो सकता है। जब संघ शुरू हुआ था, तब शाखाओं की रचना नहीं थी। नागपुर में चलने वाले अखाड़ों में ही स्वयंसेवक एकत्र आते थे। बाद में विचार करने के बाद शाखा की रचना आई। गणवेश में भी निरंतर बदलाव होते रहे हैं। मिलिट्री गणवेश, फिर खाकी नेकर एवं सफेद कमीज से लेकर अब फुलपेंट तक कई परिवर्तन संघ की गणवेश में हुए हैं। प्रारंभ में संघ की आज्ञाएं अंग्रेजी में थी, जिन्हें बाद में संस्कृत में बदला गया। पहले मराठी-हिन्दी में प्रार्थना गायी जाती थी, बाद में उसे भी आवश्यक संसोधन के साथ संस्कृत में किया गया। बदलावों की ऐसी लंबी शृंखला संघ में है। दरअसल, संघ लकीर का फकीर नहीं है, वह जीवंत आंदोलन है, जिसमें समयानुकूल परिवर्तनों के लिए संभावनाएं हैं। 

प्रतिनिधि सभा के बाद मीडिया से बातचीत में संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने जानकारी दी है कि संरचना में विकेन्द्रीकरण पर विचार हुआ है, जिसमें प्रांत के स्थान पर छोटी इकाई संभाग बनाने का प्रस्ताव है। जिसके लागू होने पर 46 प्रांतों के स्थान पर 80 से अधिक संभाग होंगे। क्षेत्र की रचना में भी बदलाव होगा, 11 की जगह अब 9 क्षेत्र होंगे। यह परिवर्तन क्यों किए गए, इसके संदर्भ में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने स्पष्ट किया है कि आरएसएस का काम बहुत तेजी से बढ़ रहा है और लोगों की उम्मीदें भी बढ़ रही हैं, इसलिए अब काम को अलग-अलग हिस्सों में बांटने के लिए विकेंद्रीकरण की शुरुआत की जा रही है। स्वयंसेवकों को मजबूत बनाने और काम बेहतर करने के लिए संगठन में बदलाव किए गए हैं। प्रांत की जगह संभाग जैसी छोटी इकाई बनाने से स्थानीय स्तर पर काम आसानी और अच्छे तरीके से हो सकेगा। यह बात साफ समझ आ रही है कि संघ की भौगोलिक रचना में बदलाव के पीछे संघ कार्य के विस्तार की योजना है। संघ अपने कार्य का विस्तार और सघन करना चाहता है। संघ के विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी आरएसएस के विकास के संदर्भ में अकसर ‘द प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट’ की बात करते थे। यानी संघ का बीज बोते समय ही डॉ. हेडगेवार ने यह कल्पना कर ली थी कि यह आगे चलकर किस प्रकार का वटवृक्ष बनेगा। इसलिए उन्होंने प्रारंभ में सबकुछ नहीं बताया लेकिन जैसे-जैसे संघ की यात्रा आगे बढ़ी, उसका सामर्थ्य बढ़ा, हमने संघ को आकार लेते देखा। समाज में सघन कार्य विस्तार की दृष्टि से प्रांत रचना को समाप्त करके संभाग रचना के निर्माण के पीछे ‘द प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट’ की संकल्पना को देखेंगे, तो यह निर्णय व्यवहारिक रूप से समझ आ सकता है।

प्रांत रचना समाप्त होने के साथ-साथ विभाग, जिला, नगर/खंड की भौगोलिक रचना में भी बदलाव संभव है। जिले, नगर एवं खंड छोटे हो सकते हैं या फिर उनका नये सिरे से परिसीमन किया जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में नगरीय और ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक बदलाव हुआ है, जनसंख्या के आधार पर भी और भौगोलिक दृष्टि से भी। इसलिए संघ की छोटी भौगोलिक रचना बस्ती और मंडल भी पुनर्परिभाषित किए जा सकते हैं। छोटी इकाई होगी, तो कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण अच्छे से हो सकेगा। उनकी देखभाल में भी सरलता रहेगी। इसके साथ ही संघ कार्य के विस्तार की दृष्टि से प्रवास भी प्रभावी ढंग से हो सकेंगे। 

संघ की वर्तमान भौगोलिक संरचना :

केंद्र - अखिल भारतीय स्तर पर

क्षेत्र - पूरे भारत को 11 क्षेत्रों में बांटा गया है। अब 9 क्षेत्र रह जाएंगे।

प्रांत - देश को 46 प्रांतों में बांटा गया है। एक शासकीय प्रदेश में संघ के एक से अधिक प्रांत हो सकते हैं। जैसे मध्यप्रदेश में कुल 3 प्रांत हैं- मध्य भारत, मालवा, महाकौशल। एक समय में मालवा, मध्यभारत का ही हिस्सा था। 

विभाग - कुछ जिलों के समूह को मिलाकर एक विभाग बनता है। इनकी संख्या लगभग 500 है। मध्यभारत प्रांत में 8 विभाग हैं।

जिला – संघ ने अपने कार्य की दृष्टि से शासकीय जिलों के इतर जिलों की रचना की है। जैसे मध्यभारत में 16 शासकीय जिले हैं लेकिन संघ ने अपने कार्य की दृष्टि से इन्हें 31 जिलों में बांटा है। 

नगर - शहरी क्षेत्रों के लिए।

खंड/तहसील - ग्रामीण क्षेत्रों के लिए।

बस्ती – नगरीय क्षेत्र में

मंडल - 10-12 ग्रामों का समूह

मोहल्ला – संघ की सबसे छोटी भौगोलिक इकाई।

अब प्रांत की जगह संभाग की रचना अस्तित्व में आ जाएगी। मध्य क्षेत्र को देखें तो अभी यहाँ चार प्रांत हैं- मध्यभारत, मालवा, महाकौशल और छत्तीसगढ़। नयी रचना में मध्यभारत प्रांत की जगह भोपाल और ग्वालियर संभाग होंगे। मालवा प्रांत की जगह भी दो संभाग- इंदौर और उज्जैन संभाग बनाए जा रहे हैं। महाकौशल को तीन संभागों में बाँटा गया है- सागर, रीवा और जबलपुर। वहीं, छत्तीसगढ़ प्रांत रायपुर और बिलासपुर संभाग में बदल जाएगा।

अप्रैल-2027 से प्रभावी होगी नयी रचना :

संघ की नयी रचना अप्रैल-2027 से प्रभावी होगी। दरअसल, अभी जो प्रांत कार्यकारिणी कार्यरत हैं, उनका तीन साल का कार्यकाल 2027 में पूर्ण होगा। इसलिए तब तक वर्तमान रचना एवं कार्यकारिणी ही कार्य करेंगी। संघ में आगामी निर्वाचन नयी संभाग रचना के अनुसार ही होंगे। स्मरण रहे कि नये बदलाव से नगर, खंड, जिले और विभाग की संगठनात्मक रचना पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। प्रांत की जगह अब संभाग में कार्यकारिणी की रचना रहेगी। संभाग प्रचारक, कार्यवाह एवं संघचालक के साथ सभी कार्य विभाग प्रमुख, गतिविधि एवं अन्य कार्य के संयोजक संभाग कार्यकारिणी का हिस्सा होंगे। वहीं, संभाग और क्षेत्र के साथ समन्वय के लिए राज्य प्रचारक एवं राज्य कार्यवाह की व्यवस्था होगी। राज्य प्रचारक एवं राज्य कार्यवाह, क्षेत्र की कार्यकारिणी के पदेन सदस्य रहेंगे। कार्य में सुगमता के लिए राज्य प्रचारक एवं कार्यवाह के साथ दो-तीन कार्यकर्ताओं की समिति जोड़ी जा सकती है। स्मरण रहे कि राज्य स्तर पर संघचालक का दायित्व नहीं रहेगा। 

बड़े परिवर्तनों की साक्षी रही है सिंदी बैठक-1939 :

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास में फरवरी-1939 में सिंदी (नागपुर से लगभग 50 किमी दूर एक गाँव) में हुई बैठक का ऐतिहासिक और संगठनात्मक महत्व है। यह बैठक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें लिए गए निर्णयों ने संघ के कामकाज, स्वरूप और वैचारिक दिशा को एक अखिल भारतीय और मानकीकृत रूप दिया। सिंदी बैठक का सबसे बड़ा निर्णय यह था कि संघ की प्रार्थना संस्कृत भाषा में होनी चाहिए। इससे पहले संघ की शाखाओं में जो प्रार्थना गाई जाती थी, वह मराठी और हिंदी का मिश्रण थी। 1939 से पहले, संघ की शाखाओं और प्रशिक्षण शिविरों में शारीरिक निर्देशों के लिए अंग्रेजी और मराठी शब्दों का इस्तेमाल होता था। इस बैठक में यह तय किया गया कि पूरे भारत में एकरूपता लाने के लिए सभी आज्ञाएं संस्कृत में होंगी। इसी बैठक में पहली बार औपचारिक रूप से ‘प्रचारक व्यवस्था’ को अखिल भारतीय स्वरूप दिया गया। 

रविवार, 9 अगस्त 2026

श्रीगुरुजी के ऐतिहासिक ‘तीन पत्र’

संघ शताब्दी वर्ष : गोलवलकर जी ने अपनी देह छोड़ने के पूर्व संघ की आगे की व्यवस्था और स्वयंसेवकों को संदेश देने के लिए तीन पत्र लिखे थे, जो उनके देवलोकगमन के बाद पढ़े गए

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ पत्र लिखने के अभ्यासी थे। पत्रों के माध्यम से श्रीगुरुजी का कार्यकर्ताओं के प्रति स्नेह, राष्ट्रप्रेम और हिन्दू समाज की एकात्मता के प्रति उनका संकल्प स्पष्ट झलकता है। उनके पत्रों में संघ कार्य के विस्तार, वैचारिक स्पष्टता, अनुशासन और व्यक्तिगत जीवन में मूल्यों को अपनाने पर जोर दिया गया है। कार्यकर्ताओं, सामाजिक एवं राजनीतिक नेतृत्व को लिखे उनके अनेक पत्र चर्चित हैं परंतु उनके ‘तीन पत्र’ अत्यंत महत्व के हैं। संघ को जानने-समझने की रुचि रखनेवाले बंधुओं को श्रीगुरुजी के ये तीनों पत्र अवश्य पढ़ना चाहिए। ये पत्र उन्होंने अपनी देह त्यागने से पूर्व लिखे थे। वर्ष 1972 में श्रीगुरुजी का स्वास्थ्य तेजी से गिरना शुरू हो गया था। परंतु, उसके बाद भी उन्होंने क्षणभर भी स्वयं को संघकार्य से अलग नहीं किया। वर्ष 1973 में जब उन्हें यह आभास होने लगा कि अब भौतिक देह से विश्राम लेने का समय आ गया है, तब उन्होंने अपने देहावसान के बाद संघ कार्य की समुचित व्यवस्था के बारे में विचार प्रारंभ कर दिया। इसी क्रम में ये तीन ऐतिहासिक पत्र लिखे गए। श्रीगुरुजी ने 2 अप्रैल 1973 को अपने हाथ से तीन पत्र लिखे और अखिल भारतीय व्यवस्था प्रमुख पांडुरंग पंत क्षीरसागर को सौंप दिए। उन्होंने क्षीरसागर जी को निर्देश दिए कि ये पत्र मेरे जाने के बाद सार्वजनिक रूप से पढ़े जाएं, जिनमें से दो पत्र बालासाहब देवरस पढ़ें। श्रीगुरुजी की इच्छा के अनुरूप तीनों पत्र सुरक्षित रख दिए गए। 5 जून 1973 को श्रीगुरुजी ने अपनी देह का त्याग किया। अगले दिन यानी 6 जून को इस पुण्य आत्मा के पार्थिव शरीर की अंत्येयात्रा प्रारंभ होने के पूर्व इन पत्रों को पढ़कर सुनाया गया। एक पत्र में उनके उत्तराधिकार की घोषणा की गई। दूसरे पत्र में आग्रह किया कि उनका कोई स्मारक नहीं बनाया जाए। वहीं, तीसरे पत्र में उनके हृदय की उदारता एवं व्यक्तित्व की महानता के दर्शन होते हैं, जिसमें वे विनयभाव से क्षमायाचना करते हैं कि उनके व्यवहार से कभी किसी का हृदय दु:खी हुआ हो, तो क्षमा करें। श्रीगुरुजी के ये तीन पत्र ‘बीज’ थे, जिन्होंने आगे चलकर संघ की कार्यपद्धति एवं संस्कृति को समृद्ध किया।

सोमवार, 3 अगस्त 2026

भगवा रंग से चिढ़ क्यों?

राष्ट्रध्वज तिरंगा में सबसे ऊपर है भगवा, भारतीय संस्कृति का का परिचायक, त्याग, वैराग्य, साहस, बलिदान और सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत है भगवा

खेल मैदान में राष्ट्रीय ध्वज के रंगों का समावेश कोई नई बात नहीं है, लेकिन भारत की राजनीति में जब भी केसरिया या नारंगी रंग की बात आती है, एक खास राजनीतिक वर्ग में असहजता साफ दिखने लगती है। आगामी हॉकी विश्व कप 2026 के लिए भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीमों की नई जर्सी लॉन्च हुई है। पारंपरिक नीले रंग की जगह इस बार नारंगी रंग को प्राथमिक किट के रूप में चुना गया है। हॉकी इंडिया के अध्यक्ष और पूर्व दिग्गज खिलाड़ी दिलीप तिर्की ने स्पष्ट किया कि नीले टर्फ पर नीले रंग की जर्सी के कारण विजिबिलिटी (दृश्यता) की व्यावहारिक समस्या आ रही थी और यह सुझाव सीधे खिलाड़ियों एवं कोचिंग स्टाफ की तरफ से आया था। इसके बावजूद, सुदीर्घ अनुभव रखनेवाले राजनीतिक दल के नेताओं और उनके समर्थकों ने इसे लेकर एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा करने का प्रयास किया है। हिन्दू पहचान से चिढ़ने वाले नेताओं का यह बयान आया है कि “देश की पहचान अहिंसा, सत्य और भाईचारे से जुड़ी है और इन्हें बदला नहीं जा सकता”। यह बयान इस बात का प्रमाण है कि कैसे एक विशुद्ध रूप से तकनीकी और खेल संबंधी फैसले को जबरन वैचारिक संघर्ष में घसीटा जा रहा है।

रविवार, 2 अगस्त 2026

गुरु के रूप में मार्गदर्शन करता है ‘भगवा ध्वज’

संघ शताब्दी वर्ष : गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर स्वयंसेवक ‘भगवा ध्वज’ के समक्ष गुरु दक्षिणा समर्पित करते हैं और संघकार्य के प्रति अपना समर्पण बढ़ाने का संकल्प लेते हैं

एआई से निर्मित प्रतीकात्मक चित्र

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भगवा ध्वज को जो स्थान दिया गया है, वह इस संगठन की विशिष्टता को दर्शाता है। संघ के लिए भगवा केवल ध्वज मात्र नहीं है, अपितु यह उसके प्रेरणा और मार्गदर्शन का केंद्र बिन्दु है। संघ में भगवा ध्वज को ‘गुरु’ के स्थान पर प्रतिष्ठित किया गया है। सामान्यतौर पर यही देखने में आता है कि किसी सांस्कृतिक/धार्मिक संगठन का संस्थापक ही उस संगठन के अनुसरणकर्ताओं के लिए गुरु के रूप में सम्मानित होता है। परंतु संघ इस सामान्य परंपरा से अलग लकीर खींचता दिखायी देता है। जिस प्रकार किसी संस्था से सम्बद्ध लोग गुरु के मार्गदर्शन के अनुसार व्यक्तिगत एवं सामाजिक क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक भगवा ध्वज से प्रेरणा प्राप्त कर सामाजिक क्षेत्र में कार्य करते हैं। संघ में गुरु के रूप में भगवा ध्वज को मान्यता दिए जाने का प्रसंग बहुत प्रेरक है। यह एक प्रसंग ही संघ के ध्येय, उसकी कार्यपद्धति और महानता को बताने के लिए पर्याप्त है।

शनिवार, 1 अगस्त 2026

शोर-शराबे में गुम हुआ छात्रों का हित, विपक्ष के निशाने पर रही हिन्दू मान्यताएं

लोकसभा और राज्यसभा में हंगामेदार चर्चा के बीच आखिरकार परीक्षा सुधार का विधेयक ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ पारित हो गया। देश के करोड़ों युवाओं और छात्रों के भविष्य को देखते हुए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दा था। उम्मीद यह थी कि जब प्रश्न पत्र लीक जैसे गंभीर विषय पर संसद में बहस होगी, तो देश को एक ठोस और सर्वसम्मति वाला समाधान देखने को मिलेगा। लेकिन संसद के दोनों सदनों में जो दृश्य देखने को मिला, वह बेहद निराशाजनक रहा। जो विपक्ष कल तक पर्चा लीक के मुद्दे को लेकर सड़कों से लेकर संसद तक हो-हल्ला मचा रहा था, जब विधेयक पर रचनात्मक चर्चा और सुझाव देने का सही समय आया, तब वह पूरी तरह दिशाहीन नजर आया। बहस का रुख परीक्षा प्रणाली के तकनीकी एवं प्रशासनिक सुधारों पर केंद्रित रहने के बजाय ऐसे विषयों की ओर मोड़ दिया गया, जिनका आम छात्रों की समस्याओं और उनके भविष्य से कोई दूर-दूर तक का लेना-देना नहीं था। विशेष रूप से मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के पास यह एक बड़ा अवसर था कि वह परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी और लीक-मुक्त बनाने के लिए अपने ठोस और व्यावहारिक सुझाव पटल पर रखती। इससे देश की जनता और युवाओं के बीच यह संदेश जाता कि विपक्ष के पास महज विरोध करने के बजाय समस्याओं का समाधान करने का एक स्पष्ट एजेंडा भी है। परंतु इस रचनात्मक भूमिका को निभाने के स्थान पर बहस को धार्मिक प्रतीकों, गोमूत्र और मनुस्मृति जैसे विषयों पर लाकर खड़ा कर दिया गया।

सावधान! अब ई20 पर भड़काने की तैयारी

नीट परीक्षा में गड़बड़ी को लेकर हुए कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन की गर्मी अभी शांत भी नहीं हुई है कि आंदोलनजीवियों ने जनता को भ्रमित करने एवं भड़काने के लिए दूसरा विषय खोजना शुरू कर दिया है। पिछले कुछ महीनों से एथनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर एक नकारात्मक नैरेटिव खड़ा करने का प्रयास किया गया है। परिणामस्वरूप, एथनॉल मिश्रित पेट्रोल की नीति को लेकर उठ रही आपत्तियों और राजनीतिक बयानों ने एक बार फिर ऊर्जा संक्रमण की इस प्रक्रिया को व्यापक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। एक तरफ जहां सरकार इसे पर्यावरण संरक्षण, विदेशी मुद्रा की बचत और किसानों की आय बढ़ाने वाले दूरगामी कदम के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों, ट्रांसपोर्ट यूनियनों और आम वाहन चालकों के विरोध प्रदर्शनों ने नीति के व्यावहारिक क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

सोमवार, 27 जुलाई 2026

“यदि अस्पृश्यता (छुआछूत) गलत नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है” – बालासाहब देवरस

संघ शताब्दी वर्ष : हिन्दू एकता एवं समरसता पर बालासाहब के क्रांतिकारी विचार


हिन्दू समाज की एकता और सामाजिक समरसता पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस के विचार अत्यंत स्पष्ट, प्रखर और क्रांतिकारी थे। ‘वसंत व्याख्यानमाला’ का उनका भाषण विश्व के ऐतिहासिक एवं महान भाषणों में शामिल किया जा सकता है। 8 मई, 1974 में पुणे में हुए अपने इस भाषण में छुआछूत (अस्पृश्यता) को लेकर बालासाहब ने जो कहा, वैसा खरा-खरा शायद ही किसी ने बोला हो। अब्राहम लिंकन के प्रसिद्ध विचार- “अगर गुलामी अनैतिक या गलत नहीं है, तो फिर कुछ भी गलत नहीं है”- का उल्लेख करते हुए बालासाहब ने कहा- “अगर छुआछूत गलत नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है”। जातिगत भेदभाव के निर्मूलन के लिए काम करने वाले महानुभाव अक्सर इस ओर या उस ओर खड़े दिखाई देते हैं। उनके विचारों में राजनीति, परस्पर द्वेष और कटुता रहती है। लेकिन बालासाहब के विचारों में स्पष्टता के साथ-साथ आत्मीयता और बंधुता की झलक दिखाई देती है। सामाजिक समरसता पर उनके विचार समाधानमूलक और व्यावहारिक हैं। बालासाहब जी का मानना था कि “विषमता नष्ट करने के प्रयासों में सभी का सहभाग अपेक्षित है। संयम के साथ उत्तम व्यवहार के द्वारा यह प्रयास होंगे तभी उसमें सफलता मिलेगी”।