गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

कोरोना से बचने स्वास्थ्य-आग्रह

मध्यप्रदेश में कोरोना संक्रमण अनियंत्रित होता जा रहा है। मध्यप्रदेश देश के उन राज्यों में शामिल हो गया है, जहाँ कोरोना महामारी की दूसरी लहर तेजी से फैल रही है। कोरोना संक्रमितों के मामले में मध्यप्रदेश देश में सातवें स्थान पर पहुंच गया है। विगत सात दिन में इंदौर का औसत पॉजिटिविटी रेट 15 जबकि भोपाल का 19 पर पहुँच गया है। यह स्थिति चिंताजनक है। ऐसी स्थिति में मध्यप्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उस भूमिका में सक्रिय हो गए हैं, जिसकी अपेक्षा किसी भी जनप्रतिनिधि से होती है। मुख्यमंत्री श्री चौहान प्रतिनिधि बाजारों में निकल कर लोगों को कोरोना संक्रमण के खतरे के प्रति जागरूक कर रहे हैं। इस संदर्भ में मंगलवार को उन्होंने महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने से ‘स्वास्थ्य-आग्रह’ की शुरुआत की। कोरोना महामारी के प्रति आम नागरिकों को जागरूक करने के लिए समाज के प्रमुख लोगों से आग्रह करने का यह अभिनव प्रयोग है। 

पिछले कुछ समय से कोरोना संक्रमण को लेकर सामान्य नागरिकों में जिस प्रकार की उदासीनता एवं लापरवाही बढ़ती गई है, ऐसी स्थिति में उन्हें फिर से सावधान करने के लिए समाज के ही प्रभावशाली लोगों का सहयोग आवश्यक है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं पत्रकारों-साहित्यकारों से भी बातचीत कर उनसे कोरोना के विरुद्ध लड़ाई में सहयोग की माँग की है। नि:संदेह यदि सब मिलकर अपने आस-पास के लोगों को जागरूक करेंगे, तब कोरोना को हराना आसान होगा। जिस तरह प्रतिदिन मुख्यमंत्री श्री चौहान आम लोगों से मिल कर मास्क लगाने, शारीरिक दूरी रखने एवं स्वच्छता का आग्रह कर रहे हैं, वैसे प्रयास सभी क्षेत्रों के नेतृत्वकारी लोगों को करना चाहिए। कोरोना संक्रमण समूची मानवता के लिए खतरा बन गया है। दूसरी लहर में जिस प्रकार यह अधिक घातक हो गया, वैसे में अपने समाज को बचाना हम सबकी जवाबदेही है। शासन के साथ हर स्तर पर सहयोग करना ही इस समय हमारा धर्म होना चाहिए। 

मुख्यमंत्री ने अपने घर पर अपनी सहधर्मिणी एवं पुत्र को मास्क पहनाकर प्रतीकात्मक ढंग से संदेश दिया है कि कोरोना के विरुद्ध जन-जागरूकता की लड़ाई हमें अपने घर से ही शुरू करनी होगी। मुख्यमंत्री बार-बार चेता रहे हैं कि लॉकडाउन जैसी स्थितियां बनने से रोकना होगा, अन्यथा सरकार को अपने नागरिकों का जीवन बचाने के लिए कड़े कदम उठाने पड़ सकते हैं। एक बात स्पष्ट है कि आज की स्थिति में हम सब लॉकडाउन लगाने की स्थिति में नहीं है, अब लॉकडाउन लगा तो वह हम पर बहुत भारी पड़ेगा। इसलिए आवश्यक है कि हम सब अपने जवाबदेही को पहचाने और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के ‘स्वास्थ्य-आग्रह’ के आह्वान को समझें। हमें अपनों के साथ ही समाज के प्रत्येक बंधु-भगिनी के स्वास्थ्य की चिंता करते हुए उनसे आग्रह करना होगा कि मास्क पहनें, स्वच्छ रहें और शारीरिक दूरी का पालन करें। साथ ही अनावश्यक रूप से बाहर न निकलें। 

सोमवार, 29 मार्च 2021

चार पाकिस्तान बनाने का विचार 'लीगी मानसिकता'

जिस मुस्लिम लीगी मानसिकता ने भारत का विभाजन किया था, वह अब भी मौजूद है। भारत की अखंडता, एकता और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए यह विभाजनकारी मानसिकता खतरनाक संकेत है। बंगाल के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान तृणमूल कांग्रेस के नेता शेख आलम ने भारत के टुकड़े करके चार पाकिस्तान बनाने संबंधी देश विरोधी भाषण दिया है। बीरभूम जिले के नानूर विधानसभा सीट से तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार करने पहुँचे शेख आलम ने कहा कि "हमारी जनसंख्या 30 प्रतिशत है और वो (हिन्दू) 70 प्रतिशत हैं। अगर पूरे भारत में हम 30 प्रतिशत लोग इकट्ठे हो जाते हैं तो हम चार-चार पाकिस्तान बना सकते हैं। फिर कहां जाएंगे ये 70 प्रतिशत लोग"? शेख आलम का यह बयान स्पष्ट तौर पर देशद्रोह की श्रेणी में आता है और इसके साथ ही यह भारत के विरुद्ध अंदरखाने में चल रही भयंकर साजिश की ओर भी इंगित करता है।

भारत हितैषी संगठनों एवं व्यक्तियों द्वारा बार-बार जब यह चेतावनी दी जाती है कि मुस्लिम बाहुल्य वाले क्षेत्र भारत की एकता एवं अखंडता के लिए खतरा बन सकते हैं, तब उनकी बातों को तथाकथित सेक्युलर ताकतें सांप्रदायिक कह कर खारिज कर देती हैं। लेकिन, यही सेक्युलर समूह/व्यक्ति शेख आलम जैसे कट्टरपंथी एवं लीगी मानसिकता के लोगों के बयानों पर चुप्पी साध जाते हैं। बल्कि पुलिस प्रशासन द्वारा जब इनके विरुद्ध कार्रवाई की जाती है, तब यह गैंग तख्ती एवं मोमबत्ती लेकर सड़कों पर उतर आती है। इससे पहले भारत से पूर्वोत्तर राज्यों को तोडऩे की योजना बताने वाले शर्जील इमाम के मामले में देश ने देखा ही कि कैसे तथाकथित प्रगतिशील उसकी तरफदारी कर रहे थे। 

बंगाल में कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहाँ लीगी मानसिकता का प्रभाव दिखाई देता है। इस संदर्भ में तृणमूल कांग्रेस की सरकार में मंत्री फिरहाद हकीम के उस बयान का उल्लेख आवश्यक हो जाता है, जिसमें उन्होंने माना कि बंगाल के कई क्षेत्र 'पाकिस्तान' बनाए जा चुके हैं। वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव के पांचवे चरण के मतदान से पहले मंत्री फिरहाद हकीम ने पाकिस्तान के एक पत्रकार से कहा था- "आप हमारे साथ आइए, हम अपको कोलकाता के मिनी पाकिस्तान ले चलते हैं"। वैसे यह स्थिति प्रत्येक उस शहर में बन गई है, जहाँ मुस्लिम आबादी 15 से 30 प्रतिशत है। मुस्लिम बाहुल्य वाले इन क्षेत्रों में सांप्रदायिक तनाव स्पष्ट तौर दिखाई देता है। जहाँ शेख आलम ने आपत्तिजनक बयान दिया है, उसी बीरभूमि के एक गाँव में 300 हिन्दू परिवारों को लगातार चौथे वर्ष दुर्गा पूजा का आयोजन करने के लिए स्थानीय प्रशासन से अनुमति लेनी पड़ी। ममता सरकार में कई बार यह स्थिति बनी है कि दशहरा और दुर्गा पूजा से हिन्दुओं को रोका गया है। अपनी परंपरा-संस्कृति का पालन करने और धार्मिक स्वतंत्रता के अपने मौलिक अधिकार के लिए हिन्दुओं को न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। 

यह स्थिति चिंताजनक है। शेख आलम के बयान को हवा में उड़ाना एक बड़ी भूल साबित हो सकती है। शासन-प्रशासन के साथ ही देशभक्त नागरिकों को लीगी मानसिकता पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। 

यह भी देखें - कश्मीरी हिन्दुओं की हत्या के पीछे जेहादी मानसिकता




बुधवार, 24 मार्च 2021

हर बूँद अनमोल

Lokendra Singh

विश्व जल दिवस पर जल शक्ति अभियान की शुरुआत कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मनुष्यता एवं प्रकृति-पर्यावरण के हित में एक महत्वपूर्ण शुरुआत की है। जल संरक्षण और जल प्रबंधन एक-दूसरे के पूरक हैं। बिना जल संरक्षण किए अगर हम जल का दोहन करेंगे, तो आने वाले समय में जल संकट की समस्या उत्पन्न हो जाएगी। भारत के अनेक हिस्सों में अब हम इस संकट का सामना करने की स्थिति में आ चुके हैं। यह संभलने का समय है। यह अभियान हमें संभलने का अवसर देता है। इस अभियान को ‘कैच द रैन’ नाम दिया गया है। वर्षा जल का संचयन करना, इसका उद्देश्य है। 

शहरीकरण की प्रक्रिया में एक बड़ी चूक पिछले वर्षों में हुई है कि वर्षा जल के संचयन की प्राकृतिक एवं नैसर्गिक संरचनाओं को हमने ध्वस्त कर दिया या बदहाल होने दिया। स्थिति यह है कि वर्षा जल का ज्यादातर हिस्सा बह कर शहर से बाहर चला जाता है, जबकि उसको वहाँ की भूमि में समाना चाहिए था। भू-जल स्तर को बनाए रखने में वर्षा जल का बहुत महत्व है। थोड़ी जागरूकता एवं थोड़े ही प्रयासों से हम वर्षा जल का संचयन कर सकते हैं। इसलिए इस अभियान को वर्षा जल के संचयन से जोडऩा अनुकरणीय है। 

मध्यप्रदेश में अनेक स्वयंसेवी संस्थाएं एवं समाजसेवी वर्षा जल के संचयन के लिए क्रांतिकारी पहल प्रारंभ कर चुके हैं। मध्यप्रदेश के बैतूल में पर्यावरण पुरुष मोहन नागर बारिश के पानी को सहजने के लिए ग्रामवासियों के सहयोग से ‘गंगा अवतरण अभियान’ एवं ‘बोरी बंधान’ जैसे परंपरागत वैज्ञानिक प्रयोगों का संचालन करते हैं। इन प्रयोगों के कारण जिन गाँवों में कभी जल संकट भयावह हो जाता था, आज वहाँ संग्रहित वर्षा जल का उपयोग सिंचाई के लिए भी होने लगा है। वहीं, झाबुआ में शिव गंगा अभियान के चला कर पद्मश्री महेश शर्मा ने एक लाख से अधिक जल संरचनाएं खड़ी कर दीं। दोनों ही महानुभाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरणा लेकर पर्यावरण संरक्षण के महती अभियान में जुटे हुए हैं। 

पर्यावरण पुरुष मोहन नागर के प्रयासों पर केन्द्रित फिल्म 


यह ठीक बात है कि सरकार ने वर्षा जल संरक्षण की चिंता की है लेकिन यह जब तक समाज की चिंता का विषय नहीं बनेगा, तब तक वांछित लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता। जल संरक्षण प्रत्येक मनुष्य का दायित्व होना चाहिए। जीवन में जल का क्या महत्व है, हमारी संस्कृति में, ऋषियों ने इसे भली प्रकार रेखांकित किया है। उन्होंने बताया है कि पृथ्वी का आधार जल और जंगल है। इसलिए उन्होंने पृथ्वी की रक्षा के लिए वृक्ष और जल को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा है- “वृक्षाद् वर्षति पर्जन्य: पर्जन्यादन्न सम्भव:” अर्थात् वृक्ष जल है, जल अन्न है, अन्न जीवन है। हिन्दुओं के चार वेदों में से एक अथर्ववेद में बताया गया है कि आवास के समीप शुद्ध जलयुक्त जलाशय होना चाहिए। जल दीर्घायु प्रदायक, कल्याणकारक, सुखमय और प्राणरक्षक होता है। छान्दोग्योपनिषद् में अन्न की अपेक्षा जल को उत्कृष्ट कहा गया है। महर्षि नारद ने भी कहा है कि पृथ्वी भी मूर्तिमान जल है। अन्तरिक्ष, पर्वत, पशु-पक्षी, देव-मनुष्य, वनस्पति सभी मूर्तिमान जल ही हैं। जल ही ब्रह्मा है। 

आधुनिक जीवनशैली में हम अपनी संस्कृति की सीखों को पीछे छोड़ते आए हैं, जिसके कारण आज अनेक प्रकार के संकटों का सामना कर रहे हैं। जल शक्ति अभियान के माध्यम से हमारे पास एक अवसर आया है कि हम अपनी संस्कृति के संदेशों को आत्मसात करें, दुनिया के सामने आचरण हेतु प्रस्तुत करें और प्रकृति के साथ अपने आत्मीय संबंध को पुन: प्रगाढ़ करें। याद रखें, जल का कोई विकल्प नहीं है। इसलिए इसका संरक्षण एवं संचयन अनिवार्य है।

मंगलवार, 2 मार्च 2021

पिता ने क्या किया

यूट्यूब चैनल 'अपना वीडियो पार्क' पर देखें


क्या किया पिता ने तुम्हारे लिए?
तुमने साहस कहां से बटोरा
प्रश्न यह पूछने का।
बचपन की छोड़ो
तब की तुम्हें सुध न होगी
जवानी तो याद है न
तो फिर याद करो...


पिता दफ्तर जाते थे साइकिल से
तुम्हें दिलाई थी नई मोपेड
जाने के लिए कॉलेज।
ऊंची पढ़ाई कराने तुम्हें
बैंक के काटे चक्कर तमाम
लाखों का लोन लिया उधार।
तुम्हारे कंधों पर होना था
बोझ उस उधार का
लेकिन, कमर झुकी है पिता की।


याद करो,
पिता ने पहनी तुम्हारी उतरी कमीज
लेकिन, तुम्हें दिलाई ब्रांडेड जींस
पेट काटकर जोड़े कुछ रुपये
तुम्हारा जन्मदिन होटल में मनाने।


नहीं आने दी तुम तक
मुसीबत की एक चिंगारी भी, कभी
खुद के स्वप्न खो दिए सब
तुम्हारे लिए चांद-सितारे लाने में।
पिता ही उस मौके पर साथ तुम्हारे थे
जब पहली बार हार से
कदम तुम्हारे लडख़ड़ाए थे।
सोचो पिता ने हटा लिया होता आसरा
तो क्या खड़े होते तुम
जिस जगह खड़े हो आज।


पिता होकर क्या पाया
तुम्हारा रूखा व्यवहार, बेअदब सवाल
पिता होकर ही समझोगे शायद तुम।
फिर साहस न जुटा पाओगे
प्रश्न यह पूछने का
क्या किया पिता ने तुम्हारे लिए?


आओ, प्यारे
प्रश्न यह बनाने की कोशिश करें
हमने क्या किया पिता के लिए?
क्या करेंगे पिता के लिए?
क्या उऋण हो सकेंगे पितृ ऋण से?

- लोकेन्द्र सिंह -

(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से) 


मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी की पत्रिका 'साक्षात्कार' के अगस्त-2020 के अंक में प्रकाशित

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

एकजुट भारत : वयं पंचाधिकं शतम्

तथाकथित किसान आंदोलन के नाम पर भारत विरोधी ताकतों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करने का षड्यंत्र रचा, लेकिन भारत के नागरिकों ने अविलम्ब एकजुट प्रतिकार करके बता दिया कि हम भारत विरोधी किसी भी साजिश को सफल नहीं होने देंगे। यह भारत की शक्ति और उसकी सुंदरता है कि आम और प्रभावशाली, सभी लोगों ने भारत की आवाज को मजबूत किया। महाभारत का एक प्रसंग है, जिसमें संदेश दिया गया है कि – ‘वयं पंचाधिकं शतम्’। जो भारतीय संस्कृति में रचा-बसा है, वह इस संदेश को जीता है। उसे पता है कि भले ही हमारी आपस में असहमति है लेकिन बाहर के लिए हम सब एकजुट हैं। इसलिए अनेक असहमतियों के बाद भी विगत दिवस देश के सभी नागरिकों ने ‘भारत के विरुद्ध रचे गए प्रोपोगंडा’ का एक सुर में विरोध किया। 

सुबह से जो लोग पॉप सिंगर रिहाना, पॉर्न स्टार मिया खलीफा, एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग और कमला हैरिस की भतीजी/भान्जी के ट्वीट पर लहालोट हो रहे थे, उनके प्रोपोगंडा की हवा ‘हम भारत के लोग’ में आस्था रखने वाले भारतीयों ने निकाल दी। भारत की ओर से इस बात पर आपत्ति की गई है कि एक अलग दुनिया में रहने वाले इन लोगों ने जमीनी सच्चाई को जाने बिना ही अपनी नाक भारत के आंतरिक मामले में घुसाई है। क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर से लेकर अभिनेता अक्षय कुमार और एक सामान्य भारतीय नागरिक ने कहा कि “भारत की संप्रभुता से समझौता नहीं किया जा सकता। आईए, भारत के विरुद्ध इस प्रोपोगंडा के सामने एकजुट होकर खड़े होते हैं”। विदेश मंत्रालय ने भी उचित ही प्रतिक्रिया दी कि “भारत की संसद ने व्यापक बहस और चर्चा के बाद, कृषि क्षेत्र से संबंधित सुधारवादी कानून पारित किया। ये सुधार किसानों को अधिक लचीलापन और बाजार में व्यापक पहुँच देते हैं। ये सुधार आर्थिक और पारिस्थितिक रूप से सतत खेती का मार्ग प्रशस्त करते हैं”। 

यह सच है कि इन ‘सेलेब्रिटीज’ न तो कृषि सुधार कानूनों की एक पंक्ति पढ़ी है और न ही उन्हें किसानों की माँगों का ही पता है। उन्हें जो ट्वीट और पोस्टर दिया गया, उसे उन्होंने ट्वीट कर दिया। इस कॉपी-पेस्ट कर्म में अनजाने में स्वीडिश एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग ने इस अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र की पोल खोल दी। ग्रेटा ने भारत में जारी किसान आंदोलन के समर्थन की अपील करते हुए जो ट्वीट किया, उसमें उन्होंने एक ऐसे दस्तावेज को साझा कर दिया, जिससे स्पष्ट होता है कि किसान आन्दोलन एक सोची समझी रणनीति के साथ शुरू किया गया था और 26 जनवरी का उपद्रव भी इसी रणनीति का हिस्सा था। गूगल ड्राइव पर साझा की गई इस फाइल में इस तथाकथित किसान आंदोलन के आगे की रणनीति एवं सोशल मीडिया अभियान का क्रम और अन्य गतिविधियों का ब्योरा दर्ज है। इसके साथ ही इस दस्तावेज में यह तक उल्लेख है कि किसको क्या ट्वीट करना है और किन्हें टैग करना है। दरअसल, प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने कृषि सुधार कानूनों की सराहना की है। उन संस्थाओं को टैग करके उन पर दबाव बनाने की योजना भी उजागर हुई है। 

इस दस्तावेज में भारत के कुछ मीडिया संस्थानों का भी जिक्र है, जो इस षड्यंत्र में उनके सहयोगी साबित हो सकते हैं। जैसे ही ग्रेटा ने यह ट्वीट किया, भारत विरोधी ताकतों की कलई खुल गई। आनन-फानन में ग्रेटा से यह ट्वीट हटवाया गया। हालाँकि, तब तक सच सामने आ चुका था। धीरे-धीरे ही सही, लेकिन इस आंदोलन के पीछे सक्रिय अराजक ताकतों का चेहरा सामने आता जा रहा है। वैसे भी राष्ट्रीय स्वाभिमान के पर्व ‘गणतंत्र दिवस’ पर हुई अराजकता और हिंसा के बाद से यह तथाकथित किसान आंदोलन अपनी नैतिकता खो चुका है। अब धीमे-धीमे जनसमर्थन और सहानुभूति से भी हाथ धो रहा है।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

बाचा : द राइजिंग विलेज

 देश का पहला गाँव, जिसके हर घर में सोलर इंडक्शन पर पकता है खाना

मध्यप्रदेश के बैतूल जिले का एक छोटा-सा अनुसूचित जनजाति (शेड्यूल ट्राइब) बाहुल्य गाँव है- बाचा। आजकल यह छोटा-सा गाँव अपने बड़े नवाचारों के कारण चर्चा में बना हुआ है। वर्ष 2016-17 से बाचा ने बदलाव की करवट लेनी शुरू की। आज बाचा न केवल मध्यप्रदेश बल्कि भारत के सभी गाँवों के लिए प्रेरणा स्रोत बन सकता है। गाँववासियों की लगन, समर्पण, सूझबूझ और वैज्ञानिक समझ ने बाचा गाँव की तस्वीर में रंग भर दिए हैं। एक समय में पानी की समस्या का सामना करने वाले इस गाँव में अब पानी के पर्याप्त प्रबंध हैं। शैक्षणिक संस्था विद्या भारती से जुड़े समाजसेवी मोहन नागर की प्रेरणा से ग्रामवासियों ने परंपरागत ग्राम-विज्ञान के सहारे बारिश के पानी को एकत्र करना प्रारंभ किया। इसके लिए पहाड़ी या ढलान से आने वाले पानी को रेत की बोरियों की दीवार बनाकर एकत्र किया गया, इससे न केवल खेती और पशुओं के लिए पानी जमा हुआ, बल्कि गाँव का भू-जलस्तर (ग्राउंड वाटर लेवल) भी बढ़ गया। गाँववालों ने इस प्रयोग को नाम दिया- बोरी बंधान। 

बोरी बंधान के इस प्रयोग से संग्रहित बारिश के पानी का उपयोग फसलों की सिंचाई में किया जाता है। पशुओं के पेयजल के लिए भी यह पानी उपयोग होता है। एक छोटे से ग्रामीण विज्ञान के प्रयोग से आज बाचा गाँव वह खेत लहलहाते हैं, जो कभी सिंचाई के अभाव में सूखे रह जाते थे। बोरी बंधान से गाँव की लगभग 15 एकड़ जमीन सिंचित की जा रही है। इसके साथ ही समाजसेवी मोहन नागर की योजना से प्रारंभ हुए गंगाअवतरण अभियान के अंतर्गत सभी ग्रामीणों ने आस-पास की पहाड़ियों पर खंती खोद कर बारिश के जल को जमीन के भीतर भेजने का और पौधरोपण करने का अनुपम एवं अनुकरणीय कार्य आरम्भ किया है। पिछले कुछ वर्षों से यह कार्य लगातार जारी है। प्रकृति संवर्धन और जल संरक्षण का यह अभिनव कार्य उस समय भी नहीं रुका जब कोरोना के कारण समूचा देश स्थिर-सा हो गया है। चूंकि गाँव में घरवास (लॉकडाउन) से छूट थी, कोरोना के संक्रमण की दस्तक भी नहीं हुयी थी, इसलिए बाचा और उसके आसपास के ग्रामीणों ने बारिश के जल को संरक्षित करने के लिए मानसून के आने से पहले ही गंगा अवतरण अभियान को प्रारम्भ कर दिया।  

सौर ऊर्जा के प्रयोग के लिए देशभर में चर्चित :

बाचा गाँव ने न केवल स्वच्छता और जलसंरक्षण सहित अन्य महत्व अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किये हैं, बल्कि प्राकृतिक ऊर्जा का दैनिक जीवन में उपयोग करने के लिए वैज्ञानिक पहल भी प्रारंभ की है। आज बाचा की पहचान देश में ऐसे पहले गाँव के रूप में है, जहाँ हर घर की रसोई में सौर ऊर्जा की सहायता से भोजन तैयार किया जाता है। समाजसेवी मोहन नागर बताते हैं- “जीवाश्म ईंधन से जहाँ पर्यावरण को क्षति पहुँच रही थी, वहीं महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए भी यह ठीक नहीं था। हमने सबसे पहले गाँववालों को सौर ऊर्जा के बारे में जागरूक किया गया। आईआईटी मुंबई के विद्यार्थियों और ओएनजीसी के अधिकारियों के सहयोग गाँव में इलेक्ट्रिक सोलर इंडक्शन लगाए गए हैं। अब गाँव के प्रत्येक घर में सौर्य ऊर्जा का उपयोग कर खाना बनाया जाता है। इसके लिए आईआईटी मुंबर्ई के विद्यार्थियों और ओएनजीसी के अधिकारियों ने गाँव के कुछ लोगों को प्रशिक्षित किया और उन्हें सौर ऊर्जा से बिजली कैसे बनाई जाती है, इसकी वैज्ञानिक प्रक्रिया की जानकारी दी।” 

गाँव वालों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह थी कि प्रारंभ में उन्हें न तो सौर ऊर्जा के बारे में पता था और न ही इसके लिए उपयोग में आने वाले उपकरणों की कोई जानकारी थी। इस समस्या का समाधान निकला आईआईटी मुंबई और ओएनजीसी के अधिकारीयों से। उन्होंने बाकायदा सौर ऊर्जा के उपयोग और उसके उपकरणों के रखरखाव के लिए गाँव के ही कुछ लोगों प्रशिक्षित किया। गाँववासियों को समझाया कि सौर ऊर्जा की वैज्ञानिक प्रक्रिया क्या है और उससे कैसे बिजली बनाई जा सकती है। हालाँकि, शुरुआत में तो गांववालों को यह बेहद ही मुश्किल और खर्चीला काम नज़र आया। लेकिन, पुराने अनुभवों और सफलता ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। परिणाम सबके सामने हैं कि आज सौर ऊर्जा ने ग्रामीणों के ईंधन का खर्च तो बचाया ही, महिलाओं को चूल्हे के धुंए से भी बचा लिया है।

अपने रसोईघर में सौर ऊर्जा से खाना बनाने वाली लता बताती है कि सौर पैनल नहीं लगा था तब हमें लकड़ी लाने के लिए जंगल में दूर तक जाना पड़ता था। हमें डर भी लगता था। इसके साथ ही अब हमें रसोई में धुंए से भी छुटकारा मिल गया है। ग्रामीण शरद बताते हैं कि सौलर ऊर्जा के उपयोग के बाद से गाँव में बहुत परिवर्तन आया है। 

आईआईटी मुंबई के इंजीनियर देवसुख बताते हैं कि बाचा गाँव में 74 घर हैं। इन सभी घरों में एक-एक हजार वॉट के सोलर पैनल सिस्टम लगे हैं। इसमें चार पैनल, चार बैटरी और एक चूल्हा शामिल है। उनका दावा है कि बारिश के मौसम में सूरज की रौशनी नहीं मिलने पर भी बैटरी के बैकअप से 5-6 घंटे तक यह काम करता है। 

‘अन्नपूर्णा मंडपम’ से बचा रहे हैं प्रतिमाह 500 से 1000 रुपये : 

विद्या भारती ने इस गाँव में एक और सार्थक पहल की शुरुआत की है, जिसे “अन्नपूर्णा मंडपम” नाम दिया गया है। इसका अर्थ है घर का किचन गार्डन। गाँव के लगभग हर घर में यह गार्डन है, जिसमें ग्रामीण घर में उपयोग के लिए सब्जी उगा रहे हैं। इससे हर परिवार के महीने के 500-1000 रूपये की बचत हो जाती है। 

प्लास्टिक मुक्त घूरा :

इस गाँव की एक और बड़ी उपलब्धि है कि ग्रामीणों ने अपने घूरों (कचरा एकत्र करने के स्थान) को प्लास्टिक मुक्त कर लिया है। प्लास्टिक मुक्त घूरे में एकत्र कचरे का उपयोग खेत के लिए जैविक खाद बनाने में किया जाता है। वैसे तो इस गाँव में प्लास्टिक का उपयोग कम ही किया जाता है, लेकिन जो भी प्लास्टिक कचरा निकलता है, उसे अलग रखा जाता है। उसे घूरे में नहीं फेंका जाता है।

गाँव पर बनी फिल्म 'बाचा : द राइजिंग विलेज' को मिला राष्ट्रीय पुरस्कार : 


माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक लोकेन्द्र सिंह और प्रोड्यूसर मनोज पटेल ने इस गाँव कहानी सबके सामने लाने के उद्देश्य से एक डॉक्युमेंट्री फिल्म ‘बाचा : द राइजिंग विलेज’ का निर्माण किया। फिल्म को राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान, हैदराबाद के तत्वावधान में आयोजित ‘नेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑन रूरल डेवलपमेंट’ में द्वितीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके अलावा इस फिल्म को कोलकाता में आयोजित 5वें अंतरराष्ट्रीय विज्ञान फिल्म फेस्टिवल में स्क्रीनिंग हेतु भी चुना गया। 

आदर्श गाँव के रूप में बाचा :

मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के एक छोटे से अनुसूचित जनजाति गाँव “बाचा” की कहानी सबको प्रेरणा देने वाली है। आधुनिक और पारंपरिक विज्ञान के छोटे-छोटे उपायों को अपनाकर, "बाचा" जैसा कोई भी गाँव एक आदर्श गाँव के रूप में खड़ा हो सकता है। इसी बात को समझाने के लिए हमने इस गाँव पर एक फिल्म बनायी। जिसको लेकर अभी तक काफी अच्छी प्रतिक्रियाएं आई हैं। - मनोज पटेल, निर्देशक-संपादक 

हर कोई जाने बाचा की कहानी :

हम चाहते हैं कि बाचा की कहानी हर कोई जाने, ताकि अन्य गाँव भी आदर्श बनें। बाचा जलसंरक्षण और सौर ऊर्जा का बड़ा सन्देश देता है। “इलेक्ट्रिक सोलर इंडक्शन” और “बोरी बंधन” जैसे अनूठे प्रयोग अनुकरणीय हैं। - लोकेन्द्र सिंह, फिल्म प्रोड्यूसर



बाचा की कहानी साधारण कहानी नहीं है। यह पिछड़े गाँव से आदर्श गाँव तक सीमित रह जाने की कहानी भी नहीं है। ‘बाचा’ की यात्रा अभी रुकी नहीं है। आधुनिक और परंपरागत विज्ञान के छोटे उपायों को अपनाकर बाचा ने सफलता की जो नींव रखी हैं, वह उसे और मजबूत करने के लिए प्रयत्नशील है। यह अन्य गाँव को भी राह दिखा रहा है। निसंदेह यह छोटा गाँव आज सबके बीच न केवल चर्चा का बल्कि प्रेरणा का स्रोत भी बन गया है। 

गुरुवार, 28 जनवरी 2021

‘हनुमानजी की भूमिका’ में भारत

आज जब हम 72वां गणतंत्र मना रहे हैं, तब हम गौरव की अनुभूति कर रहे हैं कि भारत अपनी वैश्विक भूमिका को भी प्राप्त करने की ओर तेजी से अग्रसर है। ‘हम भारत के लोग’ इस बात से रोमांचित होते हैं कि ज्ञान-विज्ञान से लेकर आर्थिक क्षेत्र में कभी हम दुनिया का नेतृत्व करते थे। लंबे समय से हम अपने देश को पुन: विश्वगुरु की भूमिका में देखना चाह रहे थे, उसके लिए प्रयासरत थे। हम चाहते हैं कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की अवधारणा का प्रतिपादक हमारा देश वैश्विक पटल पर ‘विश्व परिवार के मुखिया’ की भूमिका का निर्वहन करे। पिछले पाँच-छह वर्षों में भारत ने उस सामर्थ्य को अर्जित किया है। वैश्विक महामारी ‘कोरोना संक्रमण’ की शुरुआत में ही दुनिया ने भारत की इस भूमिका को देखा कि हमने कमजोर देशों के साथ ही समर्थ देशों की भी सहायता की। अब एक बार फिर भारत में निर्मित कोरोना के टीके जरूरतमंद देशों को भेज कर हम अपनी मानवतावादी आचरण की प्रस्तुति कर रहे हैं। 

भारत ने कोरोना के दो स्वदेशी टीके बनाकर न केवल अपने नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा को सुनिश्चित किया है, बल्कि वह अपने अनेक पड़ोसी देशों को टीके अनुदान के तौर पर देकर एक बड़ी लकीर खींच रहा है। पिछले कुछ दिनों में देसी टीकों की खेप भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश, मालदीव, नेपाल, सेशेल्स और मॉरिशस पहुंची है। इसके अलावा सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और मोरक्को को व्यावसायिक तौर पर टीके भेजे जा रहे हैं। इस सूची में अभी कुछ और देश भी जुड़ेंगे। अमेरिकी विदेश विभाग दक्षिण एवं मध्य एशिया ब्यूरो ने पड़ोसी देशों को मुफ्त टीका मुहैया कराने तथा वैश्विक स्तर पर कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए एक बार फिर भारत की प्रशंसा करते हुए उसे ‘सच्चा दोस्त’ बताया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अदनोम घेब्रेयेसस ने महामारी से निजात पाने की कोशिशों में भागीदारी के लिए भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद कहा है।

ब्राजील के राष्ट्रपति जेयर बोलसोनारो तो भारत से सहयोग मिलने पर अत्यधिक कृतज्ञ अनुभव कर रहे हैं। उन्होंने भारत के प्रति धन्यवाद प्रकट करते हुए कोरोना वैक्सीन लाते हुए हनुमानजी का पोस्टर ट्वीट किया है। हमें ज्ञात है कि जब भगवान श्रीराम के भाई लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे, तब हुनमानजी हिमालय से संजीवनी बूटी लेकर आए थे। उसी संजीवनी बूटी ने लक्ष्मणजी के प्राणों की रक्षा की थी। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि ब्राजील के राष्ट्रपति ने भारतीय संस्कृति के आधार ‘रामायण’ के प्रसंग को इस तरह उल्लेख किया। भारत की कोरोना वैक्सीन को उन्होंने ‘संजीवनी’ के रूप में मान्यता दी और भारत को मानवतासेवी बताया है। एक और अच्छी बात यह है कि उन्होंने हिन्दी में भी धन्यवाद ज्ञापित किया है। यह वैश्विक पटल पर भारत के सम्मान एवं उसकी भूमिका को रेखांकित करता है। इन तथ्यों को भारत के विपक्षी राजनीतिक दलों एवं मोदी विरोधी समूह को भी देखना और समझना चाहिए। जिस वैक्सीन को लेकर ‘झूठों का समूह’ दुष्प्रचार कर रहा था, उसके प्रति वैश्विक जगत भारत के प्रति कृतज्ञता प्रकट कर रहा है। उल्लेखनीय है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि हमारी वैक्सीन समूची मानवता के लिए है। इसलिए यह बात स्पष्ट समझ लेनी चाहिए कि अपने पड़ोसियों और मित्र देशों को टीका देना, केवल कूटनीति या व्यापार का मामला नहीं है बल्कि सदैव से मानवता की चिंता भारत की प्राथमिकता है।


शनिवार, 9 जनवरी 2021

लक्ष्य : हार और जीत ही काफी नहीं जिंदगी में...

यूट्यूब चैनल 'अपना वीडियो पार्क' पर देखें 


हार और जीत ही काफी नहीं
जिंदगी में मेरे लिए
मीलों दूर जाना है अभी मुझे।
निराशा के साथ बंधी
आशा की इक डोर थामे
उन्नत शिखर की चोटी पर चढ़ जाना है मुझे।
हार और जीत ही....


है अंधेरा घना लेकिन
इक दिया तो जलता है रोशनी के लिए
उसी रोशनी का सहारा लिए
भेदकर घोर तमस का सीना
उस दिये का हाथ बंटाना है मुझे।
हार और जीत ही...


चांद पर पहुंच पाऊंगा या नहीं
ये सोच अभी नहीं रुकना है मुझे
चलता रहा विजय की उम्मीद लिए
तो चांद पर न सही
तारों के बीच टिमटिमाना है मुझे।
हार और जीत ही...

- लोकेन्द्र सिंह -

(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से) 

बुधवार, 30 दिसंबर 2020

आओ, आत्मनिर्भरता का संकल्प लें

स्वदेशी का विरोध करने वाले असल में भारत विरोधी


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में ‘आत्मनिर्भर भारत का संकल्प’ लेने का बहुत महत्वपूर्ण आह्वान किया है। कोविड-19 ने हमें बहुत नुकसान पहुँचाया है, तो कई महत्वपूर्ण सबक भी दिए हैं, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण है- आत्मनिर्भरता का सबक। देश में जब लॉकडाउन था, तब प्रधानमंत्री मोदी ने देश को ‘लोकल फॉर वोकल’ का नारा दिया था, जिसका असर पिछले कुछ महीनों में देखा गया है। भारत के नागरिकों में स्वदेशी के प्रति भावना प्रबल हुई है। इस वर्ष बड़े त्यौहारों पर भी लोगों ने बाहरी कंपनियों की जगह स्थानीय उत्पाद खरीदने में रुचि दिखाई। यही कारण है कि हमारी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। लॉकडाउन में काम-धंधा बंद होने से स्थानीय व्यावसायी और कामगारों के मन में उपजी निराशा ‘लोकल फॉर वोकल’ के कारण दूर हो रही है। यदि हम ही अपने उत्पादों को प्रोत्साहित नहीं करेंगे, तब देश आर्थिक तौर पर कैसे सशक्त होगा?

आश्चर्य होता है कि कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों को स्वदेशी को बढ़ावा देने से चिढ़ क्यों होती है? वे विदेशी कंपनियों के पक्षधर और स्वदेशी कंपनियों के विरोधी नजर आते हैं। स्वदेशी कंपनियों के विरुद्ध नकारात्मक वातावरण बनाने में बुद्धिजीवियों का एक वर्ग सदैव अग्रणी रहता है। उनके इस विमर्श को समझने की आवश्यकता है। यह मानसिक गुलामी की स्थिति है या फिर विदेशी फंडिंग का प्रभाव? दोनों ही स्थितियां त्याज्य हैं। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के निर्माताओं और उद्योग जगत से आग्रह किया है कि “देश के लोगों ने मजबूत कदम आगे बढ़ाया है, वोकल फॉर लोकल आज घर-घर में गूंज रहा है। ऐसे में अब यह सुनिश्चित करने का समय है कि हमारे उत्पाद विश्वस्तरीय हों। जो भी वैश्विक स्तर पर श्रेष्ठ है, उसे हम भारत में बनाकर दिखाएं। इसके लिए हमारे उद्यामी साथियों को आगे आना है। स्टार्टअप को भी आगे आना है”। प्रधानमंत्री मोदी के इस आह्वान में देश को आर्थिक शक्ति बनाने का बड़ा संकल्प शामिल है। आत्मनिर्भर भारत के शुभ संकल्प की पूर्ति में भारत के आम नागरिकों एवं सज्जनशक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका रहने वाली है। स्वदेशी के विरुद्ध चलने वाले सभी प्रकार के नकारात्मक विमर्शों को निष्प्रभावी करके ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में आगे बढऩा होगा। अपने स्थानीय एवं स्वदेशी उद्यमियों को प्रोत्साहित करना होगा। 

एक जनवरी पर नये कैलेंडर वर्ष के लिए संकल्प लेने का चलन बन गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने एक सकारात्मक विचार हमारे सामने रखा है कि क्या हम नये वर्ष में भारत में बने उत्पादों का उपयोग करने का संकल्प ले सकते हैं? उन्होंने कहा- “मैं देशवासियों से आग्रह करूंगा कि दिनभर इस्तेमाल होने वाली चीजों की आप एक सूची बनाएं। उन सभी चीजों की विवेचना करें और यह देखें कि अनजाने में कौन-सी विदेश में बनी चीजों ने हमारे जीवन में प्रवेश कर लिया है तथा एक प्रकार से हमें बंदी बना दिया है। भारत में बने इनके विकल्पों का पता करें और यह भी तय करें कि आगे से भारत में बने, भारत के लोगों के पसीने से बने उत्पादों का हम इस्तेमाल करें”।

   

         स्वदेशी जागरण मंच का नारा है- ‘चाहत से देसी, जरूरत से स्वदेशी और मजबूरी में विदेशी’। स्वदेशी के इस सूत्र को ध्यान में रखकर हमें एक सूची बनानी चाहिए कि इस वर्ष हम किन स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करेंगे? यह भी सूची बना सकते हैं कि किन वस्तुओं को भारत में बनाए जाने की अपेक्षा आप भारत के निर्माताओं, उद्योग जगत और स्टार्टअप से करते हैं। इससे भारत का उद्योग जगत आपकी अपेक्षाओं से भी अवगत हो सकेगा। यदि हम सही में भारत को सशक्त करना चाहते हैं, तब हमें स्वदेशी के विचार को न केवल मजबूत बनाना होगा, बल्कि अपनी जीवन में भी उतारना होगा।

मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

ये चाय बहुत खास है

भारत में कुछ बुद्धिजीवियों ने गाय को विवाद विषय बना दिया है, जबकि गाय तो प्रेम और वात्सल्य की मूर्ति है। यह तो दिलों का मेल कराती है। 

गाँव में अपरिचित परिवार में सुबह-सुबह यह चाय गाय माता ने ही नसीब कराई है। 

हुआ यह कि हम पांच लोग इंदौर से ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए निकले।

एक गाँव से गुजर रहे थे तो सड़क किनारे एक घर देखा, वहां चार-पांच गाय थी। सुबह का समय था तो गांव के शुद्ध वातावरण में गाय के शुद्ध दूध की चाय पीने का मन हुआ। हमने गाड़ी रोकी। हमारे साथ अभियंता श्री संजय चौधरी थे, उन्होंने गाड़ी से उतर कर सूर्य देवता को नमन किया। इसी क्रम में अपन राम ने गाड़ी में बैठे-बैठे गाय माता को प्रणाम किया। 

संजय जी ने आंगन में पहुंच कर आवाज दी। घर से एक पुरुष बाहर निकल कर आया। संजय जी ने उसको निवेदन किया कि "भाई साहब, यदि गाय के दूध की चाय मिल जाये तो दिन बन जायेगा"। उन सज्जन ने कहा कि हम चाय बनाने का काम नहीं करते हैं। हालांकि, सड़क किनारे घर होने से कई बार लोग पूछते हैं। हम सबको मना कर देते हैं। लेकिन, आपको अवश्य पिलायेंगे"। यह कहते हुए उस सज्जन के चेहरे पर आत्मीयता और आतिथ्य का भाव स्पष्ट दिख रहा था। 

हम उनकी यह बात सुनकर हैरान हुए कि ये किसी चाय नहीं बनाते, लेकिन हमारे लिए बना रहे हैं। ऐसा क्यों है? 

हम सबकी चाय पीने की इच्छा पूरी हो रही थी। ऐसे में यह प्रश्न बेमानी था कि वे हमारे लिए चाय बनवाने के लिए तैयार क्यों हुए? परंतु मैं अपनी इस जिज्ञासा को अधिक देर तक दबा नहीं सका। 

मैंने उत्सुकता दिखाते हुए पूछ ही लिया कि "आपकी इस कृपा का कारण क्या है"?

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा- "यह मेरी कृपा नहीं, बल्कि गाय माता की कृपा है। मैंने आपको गाय को प्रणाम करते हुए देख लिया था। मन में विचार आया कि ये भले लोग हैं जो गाय के प्रति श्रद्धा रखते हैं। अन्यथा, आजकल तो लोग गाय का मांस खाने की होड़ लगाते हैं। जब मैंने अपनी पत्नी को कहा कि दो गाड़ियां हमारे घर बाहर आकर खड़ी हुई हैं। उसमें बैठे लोगों ने हमारी गायों के सामने झुककर हाथ जोड़े हैं। उसे भी अच्छा लगा"। 

हमारी बातचीत चल ही रही थी कि उस किसान की पत्नी और घर की मालकिन बाहर ट्रे में चाय के कप लेकर निकलीं। कप से उठ रही वाष्प के साथ अदरक और इलायची की सुगंध भी बता रही थी कि यह चाय बहुत विशेष है। 

हम सबने उस गोसेवी किसान परिवार के आंगन में बैठकर चाय की चुस्कियां लीं। बाद में, जब हम जाने लगे तो संजय जी ने उन सज्जन को सौ रुपये देना चाहा लेकिन उन्होंने मना कर दिया। संजय जी ने घर की मालकिन को अपनी बहन मानते हुए उसको पैसे देने का प्रयास किया तो उसने भी कह दिया- "भला कोई बहन चाय के बदले अपने भाइयों से पैसे लेगी"। 

हम सबके लिए वह क्षण एक आत्मीय और मन को आनंदित करने वाला बन गया। यकीनन, भारत गांव में बसता है। गांव और गाय, हमारे जीवन के अभिन्न अंग हैं। 

गो-माता की जय...