संघ शताब्दी वर्ष : संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार अनुशीलन समिति के प्रमुख क्रांतिकारी थे, उन्होंने आजन्म भारतमाता की सेवा करने की प्रतिज्ञा की
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| यह चित्र Google Gemini AI से निर्मित है। |
ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए कोलकाता से बड़े पैमाने पर क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन हो रहा था। एक प्रकार से कोलकाता क्रांतिकारियों के लिए ‘काशी’ बन गया था। केशव बलिराम हेडगेवार के मन में भी एक ज्वार था- क्रांतिकारी बनकर भारत माता को ब्रितानी हुकूमत की बेढ़ियों से स्वतंत्र करना है। डॉक्टर साहब की जीवनी लिखने वाले सीपी भिशिकर लिखते हैं कि वंदेमातरम आंदोलन के समय से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में उनका मन रमने लगा था। मैट्रिकुलेशन की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने ठान लिया था कि कोलकाता जाकर मेडिकल की पढ़ाई करेंगे और वहीं क्रांतिकारी गतिविधियों में जुड़ जाएंगे। नागपुर के राष्ट्रभक्त महापुरुष भी यही चाहते थे कि केशव कोलकाता जाएं, क्रांतिकारियों से संपर्क जोड़ें और लौटकर पश्चिम भारत में क्रांतिकारी आंदोलन को संगठित करें। क्रांतिकारी रामलाल वाजपेयी ने भी अपने जीवन चरित्र में इस घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है कि “उनको कलकत्ता भेजने का असली मकसद क्रांतिकारी संगठन संबंधी जानकारी प्राप्त करना एवं मध्यप्रांत और बंगाल के बीच सेतु का काम करना था”। केशव हेडगेवार जब कलकत्ता पहुँचे तब क्रांतिकारियों पर अंग्रेजी दमन का दौर चल रहा था। सरकार राष्ट्रद्रोही सभा अधिनियम-1907, आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम-1908 और इंडियन प्रेस एक्ट-1910 के द्वारा क्रांतिकारी पत्रों, संगठनों एवं व्यक्तियों को दंडित करने, प्रतिबंधित करने एवं उन पर मुकदमा चलाने का कार्य कर रही थी। परंतु, यह दमनचक्र प्रखर क्रांतिकारी केशव बलिराम हेडगेवार के इरादों को कहाँ डिगा सकता था।
भारत माता की सेवा के अपने स्पष्ट उद्देश्य के साथ वर्ष 1910 में केशव हेडगेवार ने कोलकाता के नेशनल मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया। बंगाल में सक्रिय क्रांतिकारी संगठनों में अनुशीलन समिति प्रमुख संगठन था। उस समय देशभर में क्रांतिकारी गतिविधियों का समन्वय अनुशीलन समिति के माध्यम से होता था। बंगाल के सभी प्रसिद्ध क्रांतिकारी इससे जुड़े हुए थे। इनमें अरविंद घोष, विपिन चंद्र पाल, त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती, नलिनीकिशोर गुह, प्रतुल गांगुली, जोगेश चंद्र चटर्जी आदि नाम उल्लेखनीय हैं। केशव ने अनुशीलन समिति के वरिष्ठ नेता पुतिन बिहारी दास से संपर्क किया। केशव ने जल्दी ही समिति में अपना विश्वसनीय स्थान बना लिया था। मशहूर क्रांतिकारी त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती ने अपनी किताब ‘जेल में 30 साल’ में अनुशीलन समिति के 30 बड़े क्रांतिकारियों का फोटो प्रकाशित किए हैं, उनमें एक चित्र डॉ. हेडगेवार भी हैं।
अनुशीलन समिति ने हेडगेवारजी को क्रांतिकारी साहित्य एवं शस्त्र को लोगों तक पहुँचाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी, जिसे केशव ने बखूबी निभाया। वे जब भी कोलकाता से नागपुर आते थे, तब अपने साथ नागपुर के क्रांतिकारियों के लिए गोपनीय साहित्य और शस्त्र दोनों लेकर आते थे। उन्होंने उस साहित्य को नया नाम दिया ‘एनाटोमी’, जो मेडिकल की पढ़ाई में उनका एक विषय था। क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए केशव को भी एक नया नाम दिया गया था- ‘कोकेन’।
कोलकाता के प्रेम गुजराल मार्ग पर स्थित डॉ. हेडगेवार का निवास स्थान धीरे-धीरे क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बन गया था। भूमिगत अवस्था में श्याम सुंदर चक्रवर्ती यहां यदा-कथा आया करते थे तो नलिनीकिशोर गुह सहित अनेक क्रांतिकारियों के ठहरने, छिपने, शस्त्रों को सुरक्षित रखने का स्थान भी बन गया था। श्यामसुंदर चक्रवर्ती ने लिखा है कि “जब हेडगेवार नेशनल मेडिकल के छात्र थे, तब बंगाल में लिखी गई प्रसिद्ध पुस्तक बंगलार विप्लववाद के लेखक नलिनीकिशोर गुह भी वहां पढ़ रहे थे। गुह ने ही हेडगेवार, नारायणराव सावरकर एवं अन्य छात्रों को समिति में प्रवेश दिलवाया था”। गुह ने डॉक्टर साहब की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि “हेडगेवार सच्चे अर्थों में आदर्श क्रांतिकारी थे। समिति के सदस्यों के बीच यह रचनात्मक सोच एवं काम के लिए जाने जाते थे”। वहीं, क्रांतिकारी हरदास ने डॉक्टर साहब के चरित्र पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि “हेडगेवार ने अपने सात्विक चरित्र प्रतिबद्धता और साधारण संगठन कौशल से नौजवान क्रांतिकारियों का दिल जीत लिया था और उनके प्रति भक्ति भाव रखने वाले देशभक्तों की एक बड़ी जमात थी”।
अनुशीलन समिति में क्रांतिकारियों को देवी माँ काली की प्रतिमा के सामने एक प्रतिज्ञा करायी जाती थी। जब केशव ने क्रांतिकारी बनने के लिए समिति द्वारा तय की गई सब प्रकार की परीक्षाएं उत्तीर्ण कर लीं और उन्हें समिति की केन्द्रीय सभा का सदस्य बनाया गया, तब देवी काली को साक्षी मानकर केशव ने प्रतिज्ञा की- “इस जन्म में मेरा जीवन देश के काम के लिए ही होगा; अपना करियर आदि सब अगली दुनिया (पुनर्जन्म) के लिए छोड़ दिया”। अपनी इस प्रतिज्ञा का उन्होंने आजन्म पालन किया। जिस बालक ने गरीबी के कारण जीवन का संघर्ष का देखा था, डॉक्टर बनने के बाद उसने एक सुविधा सम्पन्न जीवन चुनने के बजाय भारत माता की सेवा का ‘कंटकाकीर्ण मार्ग’ का चुनाव किया। मेडिकल की पढ़ाई पूरी होने पर उन्हें बर्मा (म्यांमार) में 3000 रुपये मासिक की बहुत बड़ी नौकरी का प्रस्ताव मिला था। लेकिन उन्होंने अपने महाविद्यालय के प्राचार्य से स्पष्ट कह दिया– “मुझे पैसा नहीं कमाना, मुझे देश का काम करना है”। शिक्षा पूर्ण करके जब डॉक्टर साहब नागपुर वापस पहुँचे तो चाचाजी ने विवाह का पूछा; तब भी उन्होंने स्पष्ट कह दिया – “मेरा यह विचार नहीं है। मैं देश के लिए ही काम करूँगा। मेरा रास्ता कठिन है। न जाने क्या-क्या कष्ट सहने पड़ेंगे, वह मैं सहूँगा। और किसी को साथ लेकर नहीं करूँगा, इसलिए अविवाहित ही रहना है”। उस महापुरुष ने डॉक्टरी की प्रैक्टिस भी नहीं की और विवाह भी नहीं किया। देश की सेवा के लिए अपना जीवन पूर्ण समर्पित कर दिया।
कोलकाता से लौटकर नागपुर में डॉ. हेडगेवार ने अपने मित्र भाऊजी कर्वे के साथ मिलकर क्रांतिकारी समूह बनाया और एक सशस्त्र क्रांति की योजना बनायी। नागपुर के क्रांतिकारियों के इस दल को ‘क्रांतिदल’ के नाम से भी जाना जाता था। डॉक्टरजी और कर्वे, दोनों ने क्रांतिदल के कार्य को विस्तार देने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में प्रवास किया। क्रांतिकारियों से संपर्क कर एक नेटवर्क तैयार किया। क्रांतिकारियों के लिए हथियार इकट्ठे करने का काम किया। यवतमाल के वामनराव धर्माधिकारी याद करते हैं कि “वर्ष 1917-18 तक डॉक्टरजी ने हमें विद्रोह के लिए पूर्णरूपेण तैयार रहने को कह दिया था”। वर्ष 1918 में धर्माधिकारी को गोवा भेजा गया, क्योंकि एक समुद्री जहाज हथियारों की एक बड़ी खेप लेकर वहाँ पहुँचने वाला था। लेकिन उस जहाज को ब्रिटश नौसेना ने बीच समुद्र में ही रोक लिया। इस घटना का उल्लेख वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने भी 2018 में दिल्ली में आयोजित व्याख्यान माला में किया है।
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| संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 29 मार्च, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ |









