शनिवार, 20 जून 2026

श्रीगुरुजी के सरसंघचालक बनने की कहानी

संघ शताब्दी वर्ष : “सरसंघचालक का दायित्व विक्रमादित्य के सिंहासन जैसा है। अगर कोई अज्ञानी लड़का भी इस पर बैठता है, तो वह भी इस पर बैठकर एक बराबर न्याय करेगा” - श्रीगुरुजी


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (डॉक्टर साहब) के बाद इस राष्ट्रीय विचार के आंदोलन की बागडोर कौन संभालेगा? अगला सरसंघचालक कौन होगा? यह प्रश्न जब किसी के मन में भी नहीं आया था, तब से डॉक्टर साहब ने सरसंघचालक के लिए योग्य व्यक्ति की खोज प्रारंभ कर दी थी। यह बहुत आवश्यक था कि संघ का नेतृत्व ऐसे व्यक्तित्व को सौंपा जाए, जिसके प्रति श्रद्धा हो। जिसके नेतृत्व में संघ सरिता का वेग बढ़े, न कि उसमें बहता पानी ही सूख जाए। डॉक्टर साहब की आँखों के सामने से ऐसे अनेक संगठनों की कहानियां गुजर रही थीं, जो एक व्यक्ति की संकल्पना के साथ शुरू हुए और उनके जाने के साथ ही धुंधले पड़ गए। हालांकि, डॉक्टर साहब ने राष्ट्रीय आंदोलन की जो कहानी लिखी थी, उसके बीज उन्होंने अनेक लोगों के मन में बो दिए थे। अब भारत को परम वैभव पर पहुँचाने का संघ का सपना केवल डॉक्टर साहब का सपना नहीं रह गया था, यह सपना सबका अपना सपना बन गया था। डॉ. हेडगेवार व्यक्तियों के बड़े पारखी थे। कोई हीरा व्यापारी भी असली हीरा पहचानने में धोखा खा सकता है लेकिन डॉक्टर साहब व्यक्ति की पहचान में सिद्ध थे। संन्यास जीवन से वापस सामाजिक क्षेत्र में लौटे माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ को अपना उत्तरदायित्व सौंपने का निर्णय वे अपने मन में कर ही चुके थे। डॉक्टर साहब ने संघ में सामूहिक निर्णय की कार्यपद्धति का निर्माण किया था, इसलिए उन्होंने अपने निर्णय को संघ पर थोपा नहीं अपितु उस समय के अन्य दायित्ववान कार्यकर्ताओं से भी इस संबंध में परामर्श किया। श्रीगुरुजी के संबंध में जो विचार डॉक्टर साहब के थे, अन्य साथियों के मन में भी उन्होंने वही भाव पाया। 

संघ के इतिहास में सिंदी की बैठक का बहुत महत्व है। फरवरी 1939 में हुई इस बैठक में प्रार्थना और शाखा में प्रयुक्त आज्ञाओं से लेकर संघ की आगे की दिशा के बारे में महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। इसी बैठक के दौरान डॉक्टर साहब ने पहली बार सरसंघचालक के दायित्व के लिए श्रीगुरुजी को लेकर वरिष्ठ स्वयंसेवकों का मन टटोला। उन्होंने हरिकृष्ण जोशी (अप्पाजी जोशी) से पूछा कि “आप संघ के अगले सरसंघचालक के रूप में श्रीगुरुजी को कैसे देखते हैं?” अगले ही पल में अप्पाजी जोशी ने उत्साहित होकर कहा कि “डॉक्टर जी, यह तो आपने मेरे मन की बात कह दी”। याद रहे कि अप्पाजी जोशी को डॉक्टर साहब का दाहिना हाथ माना जाता था। सब यह मानते थे कि डॉक्टर साहब के बाद संघ के द्वितीय सरसंघचालक अप्पाजी जोशी ही बनेंगे। सरसंघचालक के रूप में डॉ. हेडगेवार की घोषणा करने का श्रेय अप्पाजी जोशी को ही था। जंगल सत्याग्रह में भी अप्पाजी जोशी, डॉक्टर साहब के साथ गए थे। स्वयंसेवक भी अप्पाजी को बहुत मानते थे। इसलिए जब अप्पाजी को सरसंघचालक नहीं बनाया गया, तो स्वाभाविक ही कुछ स्वयंसेवक थोड़े नाराज भी थे। ऐसे सभी स्वयंसेवकों को समझाते हुए उन्होंने बहुत सुंदर बात कही थी, जो संघ की रीति बन गई कि जो भी दायित्व में आएगा, उसका साथ सबको देना है- “मैं डॉक्टर साहब का दाहिना हाथ था, ये सत्य है परंतु श्रीगुरुजी तो डॉक्टरजी का हृदय हैं। ये उचित ही हुआ कि वे सरसंघचालक बने, अब वे ही अपने डॉक्टर हेडगेवार हैं। मैं डॉक्टरजी का दाहिना हाथ था और नए सरसंघचालक का भी मैं दाहिना हाथ ही हूं”। 

अपने गिरते स्वास्थ्य को देखकर जब डॉक्टर हेडगेवार को लगने लगा था कि उनके पास अधिक समय नहीं है, तब उन्होंने अपना पक्का मन बना लिया कि श्रीगुरुजी को सरसंघचालक का दायित्व सौंप दिया जाए। अप्रैल, 1940 में डॉ. हेडगेवार पुणे में संघ के प्रशिक्षण वर्ग में थे, तभी उनका स्वास्थ्य अप्रत्याशित रूप से गिर गया। उन्होंने श्रीगुरुजी को बुलावा भेजा और संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के समक्ष उनसे कहा- “अब संघ की संपूर्ण जिम्मेदारी आपको सौंपी जाती है। पहले आप इसे स्वीकार करें और फिर आप मेरे शरीर का जो करना चाहें करें”। श्रीगुरुजी ने कहा कि “आप क्यों ऐसा कह रहे हैं? आप जल्द ही स्वस्थ हो जाएंगे”। परंतु ईश्वर के घर से बुलावा आ चुका था। दो दिन अत्यंत पीड़ा सहने के बाद अंतत: 21 जून, 1940 को डॉक्टर साहब का स्वर्गवास हो गया। डॉक्टर साहब ने श्रीगुरुजी को सरसंघचालक बनाने का निर्णय करने से पहले उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपकर उनकी संगठन कार्य की कुशलता का परीक्षण भी किया था। डॉ. हेडगेवार ने 1939 में नागपुर में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग का ‘सर्वाधिकारी’ श्रीगुरुजी को नियुक्त किया। यह प्रशिक्षण वर्ग श्रीगुरुजी के लिए निर्णायक मोड़ था। उन्होंने कुशलता से वर्ग का संचालन किया। स्वयंसेवकों के सामने स्वयं को अनुकरणीय आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया। श्रीगुरुजी की कुशलता देखकर डॉक्टर साहब ने 1939 में ही रक्षाबंधन पर्व मनाने के लिए आयोजित एक समारोह में ‘सरकार्यवाह’ के रूप में उनकी घोषणा कर दी थी।

देखें यह वीडियो : जातिवाद और छुआछूत को लेकर गोलवलकर के विचार

डॉक्टर साहब के अंतिम निर्णय को अमलीजामा पहनाने के लिए उनके निधन के बाद अकोला में पाँच संघचालकों की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। इस बैठक में सर्वसम्मति से तय हुआ कि श्रीगुरुजी बिल्कुल सही उत्तराधिकारी हैं। उन्होंने निर्णय लिया कि डॉक्टर हेडगेवार के निधन के 13वें दिन होने वाली श्रद्धांजलि सभा में श्रीगुरुजी की सरसंघचालक के रूप में आधिकारिक घोषणा की जाए। इसी बैठक में इस नियम की आधारशिला रखी गई कि सरसंघचालक ही अपना उत्तराधिकारी चुनेंगे। नागपुर के रेशिमबाग स्थित डॉक्टर साहब की समाधि स्थल पर आयोजित कार्यक्रम में नागपुर जिले के संघचालक बाबासाहब पाध्ये ने नए सरसंघचालक के रूप में श्रीगुरुजी के नाम की घोषणा की- “हमारे प्रथम सरसंघचालक की अंतिम इच्छा के अनुसार आदरणीय श्री माधवराव गोलवलकर को हमारा नया सरसंघचालक नियुक्त किया जाता है और अब वे हम सबके लिए डॉ. हेडगेवार के स्थान पर हैं। मैं उन्हें नए सरसंघचालक के रूप में अपना प्रथम प्रणाम निवेदित करता हूँ”। 

विनम्रतापूर्वक सरसंघचालक के दायित्व को स्वीकार करते हुए श्रीगुरुजी ने इस अवसर पर जो भाषण दिया, वह सबको पढ़ना चाहिए। डॉक्टर साहब के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करने के बाद उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण बात कही- “डॉक्टरजी ने मुझे सरसंघचालक की जिम्मेदारी निभाने का मुश्किल काम दिया है, परंतु यह विक्रमादित्य के सिंहासन जैसा है। अगर कोई अज्ञानी लड़का भी इस पर बैठता है, तो वह भी इस पर बैठकर एक बराबर न्याय करेगा”। हम सब जानते हैं कि श्रीगुरुजी ने डॉक्टर साहब के रोपे पौधे को अपने पसीने से सींचा और दसों दिशाओं में उसके विस्तार के लिए वातावरण बनाया। 

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 14 जून, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

सोमवार, 15 जून 2026

अपने समय से संवाद का नाम है ‘संजय उवाच’

मीडिया प्राध्यापक एवं लेखक प्रो. संजय द्विवेदी की नई पुस्तक ‘संजय उवाच’ उनके चुनिंदा और सारगर्भित भाषणों का उत्कृष्ट संग्रह है। अकादमिक जगत से लेकर सार्वजनिक कार्यक्रमों में उन्होंने जो व्याख्यान दिए, उनको पाठकों के लिए संपादित कर पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया है। ज्यादातर व्याख्यान मीडिया, भाषा और शिक्षा के मुद्दों पर केंद्रित हैं। इसलिए यह पुस्तक मीडिया के विद्यार्थियों एवं इस क्षेत्र में रुचि रखनेवालों को अवश्य ही पढ़नी चाहिए। जिस दौर में मीडिया को लेकर अनेक प्रकार की बहस हवा में तैर रही हैं, तब उस बहस में भारतीय दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप प्रो. संजय द्विवेदी का नजर आता है। संवाद से सुंदर बनेगी दुनिया,  जड़ों की ओर लौटे मीडिया और जरूरी है मीडिया का भारतीयकरण- ये व्याख्यान मीडिया पर चल रही बहस को सार्थक दिशा देने का प्रयास हैं। इसके अलावा इस पुस्तक में भारत के नायकों, साहित्यकारों और समसामयिक विमर्श पर भी सारगर्भित विचार पढ़े जा सकते हैं। एक पंक्ति में कहें तो, इस पुस्तक में संकलित व्याख्यान पत्रकारिता, समाज, शिक्षा, भाषा और आज के समाज के विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर एक सार्थक और सकारात्मक विमर्श प्रस्तुत करते हैं। प्रो. संजय द्विवेदी ने अपने समय के साथ जो संवाद किया है, उसको संकलित और संपादित करके ‘संजय उवाच’ के रूप में अपने पाठकों के सामने प्रस्तुत कर दिया है। यह एक प्रकार से प्रो. द्विवेदी के बौद्धिक हस्तक्षेप का दस्तावेजीकरण है।

छत्तीसगढ़ विधानसभा के अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने इस पुस्तक की भूमिका में उचित ही रेखांकित किया है कि यह केवल भाषणों का संकलन नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की जीवन-डायरी है जो शब्द को साधना और व्याख्यान को साध्य मानता है। डॉ. रमन सिंह की प्रस्तावना के शीर्षक से भी पुस्तक की विषय-वस्तु का सार ध्यान में आ जाता है- “भारतबोध की अभिव्यक्ति करते व्याख्यान”। प्रो. द्विवेदी की भाषा इतनी सहज-सरल और सरस है कि लिखा हुआ भी हमें सुनाई देता है, जो सहज ही पाठकों के अंतर्मन तक अपनी छाप छोड़ने का सामर्थ्य रखता है। लेखक की चिंता के केंद्र में निरंतर ‘भारतबोध’ और अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति का कल्याण झलकता है। इसके अलावा, प्रो. द्विवेदी ने प्रिंट और डिजिटल मीडिया के समक्ष उपस्थित चुनौतियों का सूक्ष्म विश्लेषण किया है। वे स्पष्ट करते हैं कि तकनीकी बदलावों या सोशल मीडिया के आने मात्र से प्रिंट मीडिया का भविष्य खतरे में नहीं है। अपनी बात को प्रमाणित करते हुए उन्होंने जापान का उदाहरण देते हुए बताया है कि तकनीक में आगे होने के बावजूद वहां अखबार छपते हैं और पढ़े जाते हैं। प्रो. द्विवेदी ‘फेक न्यूज’ और ‘इन्फोडेमिक’ (सूचनाओं के महाविस्फोट) के इस दौर में ‘मीडिया साक्षरता’ को न केवल छात्रों के लिए, बल्कि संपूर्ण समाज और प्रशासनिक अधिकारियों के लिए भी अत्यंत अनिवार्य मानते हैं ताकि समाज में फैल रहे दुष्प्रभावों को रोका जा सके। उनका मानना है कि मीडिया का कार्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि पाठकों को बौद्धिक रूप से उन्नत करना भी है।

इस डिजिटल युग में भारतीय भाषाओं को लेकर भी उनके मन में चिंता दिखाई देती है। एक संचार विशेषज्ञ के तौर पर वे भारतीय भाषाओं और बोलियों के प्रबल पक्षधर के रूप में सामने आते हैं। वे अनुवाद को भारतीय भाषाओं को विश्व पटल पर स्थापित करने का एक मजबूत और अनिवार्य सेतु मानते हैं। वे समझाते हैं कि यदि मराठी का कोई लेखक पूरे भारत में प्रतिष्ठा हासिल करता है, तो यह बड़ी चुनौती और उपलब्धि है, जो अनुवाद के बिना संभव नहीं। एक अध्याय- ‘डिजिटल समय में भारतीय भाषाएं’ - में प्रो. द्विवेदी आंकड़ों के साथ बताते हैं कि इंटरनेट पर डिजिटल दुनिया में अब हिंदी सबसे बड़ी भाषा बनकर उभर रही है। 

लेखक प्रो. संजय द्विवेदी की भाषण कला में नयापन है। उनके अंदाजेबयां श्रोताओं के अनुसार होता है। यदि सामने युवा हैं, तब वे उनकी ही भाषा में बात करते हैं। मुहावरों, उपमाओं का बखूबी प्रयोग करने के साथ-साथ कई नये ‘डायलॉग’ वे स्वयं भी गढ़ते हैं। उनके पास किस्सागोई की अनूठी शैली है। उनके व्याख्यानों का अध्ययन करने के बाद कहा जा सकता है कि एक बेहतरीन मीडिया शिक्षक होने के नाते प्रो. द्विवेदी की भाषा शैली अत्यंत रोचक, संवादात्मक और किस्सागोई से भरपूर है। अपने व्याख्यानों में वे गंभीर और भारी-भरकम बातों को भी छोटी-छोटी प्रेरक कहानियों के माध्यम से सीधे श्रोताओं के मर्म तक पहुँचा देते हैं। प्रो. द्विवेदी भारतीय जनसंचार संस्थान, नईदिल्ली के पूर्व महानिदेशक हैं। वे वर्तमान में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।   

‘संजय उवाच’ केवल जनसंचार और मीडिया के विद्यार्थियों या पत्रकारों के लिए ही नहीं, बल्कि उन सभी जागरूक नागरिकों के लिए एक अत्यंत उपयोगी और संग्रहणीय कृति है, जो मीडिया और समसामयिक विषयों पर चलने वाले विमर्श में रुचि रखते हैं। पुस्तक के प्रकाशन की गुणवत्ता बेहतरीन है। नईदिल्ली के शिल्पायन पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स ने इसे प्रकाशित किया है। यह पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है।

पुस्तक : संजय उवाच 

लेखक : प्रो. संजय द्विवेदी

मूल्य: 495.00 रुपये

पृष्ठ : 370

प्रकाशक: शिल्पायन पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली

स्वदेश ज्योति में 15 जून, 2026 को प्रकाशित 

मंगलवार, 9 जून 2026

विश्व का नेतृत्व करेगा संगठित भारत

संघ शताब्दी वर्ष : सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और मुख्य अतिथि कुमार मंगलम बिरला ने दिखाई भविष्य के भारत की तस्वीर, वर्तमान की तैयारियों की ओर किया संकेत

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता विकास वर्ग-2 के समापन समारोह में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और मुख्य अतिथि प्रसिद्ध उद्योगपति एवं पद्मभूषण से सम्मानित कुमार मंगलम बिरला के वक्तव्य भविष्य के भारत की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं, जो स्वयं सशक्त और आत्मनिर्भर होकर विश्व बंधुत्व की भावना का प्रवर्तक बनेगा। जिस समय दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी-बड़ी शक्तियों के बीच संघर्ष चल रहा है, शांति की कोई राह दिखाई नहीं देती, तब भारत का दर्शन सबका मार्ग प्रशस्त कर सकता है। दुनिया को सुख-शांति से जीना है, तब उसे भारत की ओर देखना ही होगा। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने उचित ही कहा कि “भारत का समय आ गया है। कलह और स्वार्थ में फँसकर लड़खड़ाती हुई इस दुनिया को आज केवल भारत की ही आवश्यकता है”। भारत दुनिया को इस कलह से बाहर निकाल सकता है, उसके लिए सबसे पहले हमें अपने देश को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना पड़ेगा। दुनिया भी उसी के सत्य को सुनती है, जो शक्ति सम्पन्न होता है।

सोमवार, 8 जून 2026

रजनीश अग्रवाल: पत्रकारिता के प्रांगण से राज्यसभा के पटल तक

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के प्रांगण से पत्रकारिता की पढ़ाई करके राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय रहे पूर्व विद्यार्थी रजनीश अग्रवाल अब राज्यसभा के सम्मानित सदस्य होंगे। भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें मध्यप्रदेश से देश की सबसे बड़ी पंचायत के उच्च सदन हेतु अपना उम्मीदवार बनाया है। विश्वविद्यालय के लिए यह गौरव की बात है कि उसके विद्यार्थी दादा माखनलाल चतुर्वेदी के आंगन में संचार कौशल सीखकर विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। रजनीश अग्रवाल को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया जाना यह संदेश भी देता है कि राजनीतिक क्षेत्र में बौद्धिक क्षमता, वैचारिक स्पष्टता और उत्कृष्ट संचार कौशल वाले नेताओं को महत्व दिया जा रहा है। रजनीश अग्रवाल का व्यक्तित्व एक राजनेता से कहीं अधिक एक कुशल रणनीतिकार और प्रखर संचारक का है, जिसकी जड़ें पत्रकारिता के मजबूत धरातल से जुड़ी हैं।

शुक्रवार, 5 जून 2026

स्कूल की छुट्टियां : नानी का घर बनाम गैजेट्स की दुनिया

ग्रीष्मकालीन अवकाश : सीखने, समझने और निखरने का उत्तम अवसर


गर्मी की छुट्टियों की प्रतीक्षा किसे नहीं होती है। भले ही समय बदल गया है, पीढ़ी बदल गई है, लेकिन गर्मी की छुट्टियों को लेकर रोमांच कम नहीं हुआ है। छुट्टियों के नाम से आज भी हमारे चेहरों पर एक प्यारी-सी मुस्कान तैर जाती है। हर बच्चे के मन में वार्षिक परीक्षा के बाद आने वाली लंबी छुट्टियों को लेकर अपने-अपने सपने होते हैं। हालांकि इन सपनों या कहें योजनाओं में बड़ा बदलाव आया है। बदलते समय ने हमारे जीने के तरीके को जितना बदला है, उतना ही असर इन छुट्टियों के आनंद पर भी डाला है। एक वह दौर था जब अप्रैल का महीना आते ही मन किसी पंछी की तरह उड़ने को बेताब हो जाता था। फुर्र से उड़कर नानी के आंगन, वहाँ से दादी के घर। खेत-खलियान। नीम की छांव। चाचा के साथ मटरगस्ती। मामा के साथ नदी में छलाँग। भाई-बहनों के साथ अष्टा-चंगा, गिल्ली-डंडा, छुपन-छुपाई, सांप-सीढ़ी और न जाने कितने देशी खेल। एक से मन भरे, दूसरे में आए आनंद। रात में तारों की छांव में सोना। नाना-नानी की किस्सागोई में सिनेमा से बढ़कर मनोरंजन। रोज नई कहानी। नया संस्कार। आम के आम, गुठलियों के दाम। छुट्टियों का आनंद भी और समाज जीवन की शिक्षा-संस्कार भी। एक आज का दौर है, जहाँ छुट्टियां तो हैं, लेकिन उनका रंग-रूप पूरी तरह बदल चुका है। नानी-दादी का घर तो है लेकिन हम जाते चार दिन के लिए ही हैं। मामा, चाचा-ताऊ के बच्चे यानी हमारे भाई-बहनों की मंडली तो है लेकिन हम देशी खेल नहीं खेलते, गैजेट्स में डूबे रहते हैं। जो हम खेल-खेल में सीख लेते थे, उसके लिए हॉबी क्लासेस लगा रहे हैं। कुछ समय तो समर कैम्प भी जीम लेता है। जो आनंद हमें नानी-दादी के घर आता था, उसे मोटी फीस देकर भी हम समर कैम्प में नहीं पा सकते। हालांकि, इस सबका अभिप्राय यह नहीं है कि समर कैम्प और हॉबी क्लासेस का महत्व नहीं है। बदली परिस्थितियों में यह हमारी छुट्टियों को उपयोगी बनाते हैं।

बुधवार, 3 जून 2026

खेत बचाओ अभियान : मिट्टी बचेगी, तभी बचेगा किसान और देश का भविष्य

केन्द्र सरकार ने मिट्टी के संरक्षण के लिए जनांदोलन खड़ा करने का संकल्प लिया है। यह अत्यंत आवश्यक आंदोलन है, जिसे केवल सरकार के प्रयास से नहीं अपितु जनता (विशेषकर किसानों) की भागीदारी एवं समझदारी से ही सफल बनाया जा सकता है। मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के ग्राम रमासिया से केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राष्ट्रव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ की घोषणा की है। स्मरण रहे कि कृषि मंत्री स्वयं भी कृषक परिवार से आते हैं, इसलिए खेती के बारे में उनकी समझ अधिक जमीन और वास्तविक है। आज कृषि भूमि की जो स्थिति है, उसको लेकर सब ओर अनुत्तरित चिंता पसरी दिखायी देती है।

सोमवार, 1 जून 2026

भोपाल विलीनीकरण आंदोलन में आरएसएस का मौन किंतु प्रखर संघर्ष

स्वतंत्रता आंदोलन और आरएसएस : जनांदोलन के आगे नवाब ने घुटने टेके, 1 जून 1949 को भोपाल रियासत का भारत में हुआ विलय

भोपाल में स्थिति विलीनीकरण स्मारक : विलीनीकरण शहीद स्मृति द्वार

हम भारत के लोगों ने स्वतंत्रता के लिए लगभग 1000 वर्ष संघर्ष किया। 15 अगस्त, 1947 को वह दिन आया, जिसके लिए पीढ़ियों ने संघर्ष किया। इसे विडम्बना ही कहेंगे कि एक ओर 15 अगस्त 1947 को पूरा देश स्वतंत्रता का उत्सव मना रहा था, वहीं दूसरी ओर झीलों की नगरी भोपाल पर नवाब की हठधर्मिता का काला साया मंडरा रहा था। नवाब ‘स्वतंत्रता’ का अपहरण कर लेना चाहता था। पाकिस्तान परस्त नवाब हमीदुल्लाह खान ने 24 अगस्त, 1947 को भोपाल को ‘स्वतंत्र देश’ बनाए रखने की घोषणा कर दी। भोपाल की जनता ने नवाब के इस निर्णय का विरोध किया। जिस नवाब ने अपने दिमाग के दरवाजे बंद कर लिए हों, उसे भला लोगों के मन की बात कहाँ सुनायी देती। उसने जनता के विरोध को जूतों तले रौंदने का प्रयास किया। परंतु, नवाब सफल नहीं हो सका क्योंकि भोपाल विलीनीकरण आंदोलन का एक सिरा संघ के स्वयंसेवकों ने भी थाम लिया था। आम जनता के साथ अब संघ के कार्यकर्ता भी इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में आ गए थे। संघ जिस काम को हाथ में लेता है, उसमें सफलता सुनिश्चित रहती ही है।