गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

संघ को समझने का प्रयास है पुस्तक - आरएसएस @100

संघ शताब्दी वर्ष : प्रो. संजय द्विवेदी और डॉ. लोकेंद्र सिंह की यह पुस्तक संघ के विचार एवं दर्शन को समग्रता से प्रस्तुत करती है


- सुदर्शन व्यास (पत्रकार एवं शोधार्थी)

किसी संगठन की सौ वर्ष की यात्रा को समझना केवल उसके इतिहास के पन्ने पलटना नहीं होता। उसके विचार, कार्यपद्धति, सामाजिक सरोकार और समय के साथ बदलती चुनौतियों को भी देखना पड़ता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी के अवसर पर प्रकाशित ‘आरएसएस@100’ इसी दृष्टि से एक महत्वपूर्ण पुस्तक के रूप में सामने आती है। प्रो. संजय द्विवेदी और डॉ. लोकेंद्र सिंह के संपादन में शिल्पायन पब्लिशर्स, दिल्ली से प्रकाशित इस पुस्तक में 35 लेखकों और विचारकों के आलेख शामिल हैं। इन आलेखों के माध्यम से संघ के विचार और कार्य को अलग-अलग दृष्टियों से समझने का प्रयास किया गया है।

आरएसएस@100 पुस्तक की विशेषता केवल इसमें शामिल लेखों की संख्या नहीं, बल्कि विषय और दृष्टिकोण की विविधता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सामान्यतः एक संगठन के रूप में देखा जाता है, लेकिन उसके लगभग सौ वर्ष के विस्तार को समझने के लिए उसके पीछे की वैचारिक दृष्टि और सामाजिक कार्यपद्धति को समझना भी आवश्यक है। पुस्तक के विभिन्न आलेख इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य को सामने लाते हैं। कहीं संघ के विचार का पक्ष दिखाई देता है, कहीं उसके सामाजिक कार्य का विस्तार, तो कहीं उसके साथ जुड़े अनुभवों और विमर्शों की झलक मिलती है।

संघ की यात्रा को समझने में ‘राष्ट्र’ और ‘समाज’ की उसकी अवधारणा केंद्रीय रही है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सामाजिक समरसता संघ के सार्वजनिक विमर्श में लगातार प्रमुख विषय रहे हैं। शताब्दी वर्ष में भी संघ ने सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी और नागरिक कर्तव्य जैसे विषयों पर विशेष जोर दिया है। ऐसे समय में आरएसएस@100 का महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि यह इन व्यापक अवधारणाओं को एक ही आलेख के बजाय अनेक लेखकों की दृष्टि से देखने का अवसर देती है।

पुस्तक की एक और उपलब्धि यह है कि इसमें संघ को केवल अतीत के संदर्भ में देखने की कोशिश नहीं की गई है। सौ वर्ष की यात्रा अपने आप में महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे अधिक महत्वपूर्ण यह प्रश्न है कि बदलते भारत और बदलती दुनिया में संघ की भूमिका को किस तरह समझा जाए। तकनीक, वैश्वीकरण, सामाजिक परिवर्तन और नई पीढ़ी की बदलती आकांक्षाओं के बीच संगठन की विचार-यात्रा और सामाजिक उपस्थिति को देखने के लिए पुस्तक कई संदर्भ उपलब्ध कराती है।

विभिन्न लेखकों और विचारकों का एक साथ आना पुस्तक को संवाद का स्वरूप देता है। अलग-अलग लेखकों की भाषा, अनुभव और दृष्टिकोण पाठक को एक ही विषय के कई पहलुओं तक ले जाते हैं। यही कारण है कि यह पुस्तक केवल संघ के स्वयंसेवकों के लिए ही नहीं, बल्कि उन पाठकों के लिए भी उपयोगी हो सकती है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समझना चाहते हैं और उसके बारे में प्रचलित धारणाओं से आगे जाकर उसके विचार और कार्य को पढ़ना चाहते हैं।

प्रो. संजय द्विवेदी और डॉ. लोकेन्द्र सिंह की पुस्तक 'RSS@100'

हालांकि किसी भी बहुआयामी संगठन को एक पुस्तक में पूरी तरह समेटना संभव नहीं है। सौ वर्षों की यात्रा में अनेक घटनाएं, व्यक्तित्व, विचार-विमर्श और सामाजिक अनुभव जुड़े हैं। ऐसे में इस किताब को संघ पर अंतिम शब्द के बजाय एक महत्वपूर्ण वैचारिक पड़ाव के रूप में देखना अधिक उचित होगा। इसकी उपयोगिता इसी में है कि यह पाठक के सामने कई प्रश्न और संदर्भ रखती है तथा संघ की यात्रा को समझने के लिए आगे पढ़ने की जिज्ञासा पैदा करती है।

शताब्दी वर्ष में प्रकाशित आरएसएस@100 इसलिए महज एक स्मृति-पुस्तक नहीं, बल्कि एक वैचारिक संकलन के रूप में सामने आती है। 35 लेखकों की दृष्टियों से गुजरते हुए पाठक संघ के विचार, उसके सामाजिक कार्य और उसकी दीर्घ यात्रा को अलग-अलग कोणों से देख सकता है। संघ को जानने की इच्छा रखने वालों के लिए यह एक उपयोगी प्रवेश-द्वार है और स्वयंसेवकों के लिए अपनी यात्रा तथा विचारों को नए संदर्भों में देखने का अवसर। सौ वर्ष पूरे कर चुका संगठन जब अगले चरण की ओर बढ़ रहा है, तब उसके अतीत, वर्तमान और भविष्य पर विचार करने वाली ऐसी पुस्तक का सामने आना निश्चित रूप से समकालीन हिंदी वैचारिक साहित्य में उल्लेखनीय घटना है।

पुस्तक : आरएसएस@100

संपादक : प्रो. संजय द्विवेदी एवं डॉ. लोकेन्द्र सिंह

मूल्य : 450 रुपये0

प्रकाशक : शिल्पायन पब्लिशर्स, दिल्ली

'स्वदेश ज्योति' में 4 अक्टूबर, 2026 को प्रकाशित समीक्षा

रविवार, 4 अक्टूबर 2026

अदम्य साहस की सराहना और चयनित चुप्पी से संदेश

संकट के क्षण व्यक्ति के वास्तविक चरित्र, उसके संस्कारों और उसकी आंतरिक शक्ति की परीक्षा लेते हैं। आसमान में हजारों फीट की ऊंचाई पर, जब मौत सामने खड़ी थी और चारों तरफ हिंसा का तांडव था, तब भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छर ने जिस अप्रतिम वीरता, सूझबूझ और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया, वह केवल एक विमान चालक का पराक्रम नहीं, बल्कि भारतीय चेतना और जीवन-मूल्यों का साक्षात प्रकटीकरण है। कॉकपिट में गंभीर रूप से घायल और लहूलुहान होने के बावजूद अपने प्राणों की बाजी लगाकर यात्रियों की रक्षा करना उस मानवीय गरिमा की मिसाल है, जिसे दुनिया प्रणाम कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैप्टन स्मित मच्छर के साहस की सराहना की है। उन्होंने कैप्टन से बात भी की। प्रधानमंत्री मोदी को अपना प्रेरणास्रोत बताते हुए गंभीर चोटों और जीवन-मृत्यु के संघर्ष के बीच जब स्मित ने कहा कि उस भयावह क्षण में वे केवल ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ कर रहे थे और उसी आध्यात्मिक ऊर्जा ने उन्हें उठने और कॉकपिट का दरवाजा खोलकर स्थिति को संभालने की प्रेरणा दी, तो यह स्पष्ट हो गया कि आस्था जब आत्मबल बनती है, तो मृत्यु का भय भी परास्त हो जाता है। प्रधानमंत्री ने बिल्कुल सटीक कहा कि स्मित के परिवार ने उन्हें साक्षात गीता के निष्काम कर्म और शौर्य के संस्कार दिए हैं। यह अंतर ही भारत की आत्मा को परिभाषित करता है कि हम जान लेने वाले नहीं, अपनी जान दांव पर लगाकर दूसरों की जान बचाने वाले लोग हैं। कैप्टन स्मित की बहादुरी ने भारतीयों का मान दुनिया में बढ़ा दिया है। भारतीय मूल के नागरिकों को देखकर लोग उनके सम्मान में तालियां बजा रहे हैं, खड़े होकर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रहे हैं। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी हमारे बहादुर वीर से बात की और उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की है। यहूदी समुदाय की इस बात के लिए प्रशंसा करनी चाहिए कि वह उन लोगों को कभी नहीं भूलता, जिन्होंने उनकी सहायता की हो। यहूदी आज भी हाइफा युद्ध-1918 में भारत के योद्धाओं के बलिदान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं क्योंकि भारतीय योद्धाओं ने इजराइल की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

बहरहाल, विमान हाईजैक करके इजराइल पर आतंकी हमले की साजिश ने अमेरिका में हुए 9/11 के आतंकी हमले की यादें ताजा कर दी हैं। कह सकते हैं कि एक बार फिर आतंक और कट्टरता की निकृष्ट मानसिकता बेनकाब होकर सबके सामने है।

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

हजार स्वर्ण मंदिरों का शहर है कांचीपुरम

देखें : इस वीडियो ब्लॉग में करें कांचीपुरम के चार प्रमुख मंदिरों के दर्शन


हिन्दू आस्था का प्रमुख केंद्र है तमिलनाडु का कांचीपुरम। हिन्दू वाङ्ग्मय में मोक्षदायिनी सप्तपुरियों का वर्णन आता है, उनमें कांचीपुरम भी शामिल है। अर्थात् कांची मोक्ष की भूमि है। ज्ञान-वैराग्य की भूमि है। संभवत: यही कारण है कि कांची को दक्षिण भारत की काशी भी कहते हैं। यह सप्तपुरियां भगवान शिव और विष्णु में बराबर-बराबर बंटी हैं। सप्तपुरियों को आधा-आधा कैसे बाँटें, तब इसका रास्ता निकाला गया कि कांची नगरी आधी विष्णु को और आधी शिव को समर्पित कर दी जाए। इस प्रकार कांचीपुरम के दो भाग हैं-  शिवकांची तथा विष्णुकांची। कांचीपुरम प्राचीन मंदिरों का शहर है। एक-दो नहीं अपितु यहाँ अनेक मंदिर हैं, जिनका द्रविण शैली का स्थापत्य देखते ही बनता है। कांचीपुरम को ‘हजार मंदिरों का शहर’ या ‘हजार मंदिरों का स्वर्ण नगर’ और ‘द गोल्डन सिटी ऑफ़ 1000 टेंपल’ भी कहा जाता है। यहाँ आज भी लगभग 126 भव्य-दिव्य मंदिरों के दर्शन किए जा सकते हैं। अपनी कांचीपुरम की यात्रा में हमने यहाँ के चार प्रमुख मंदिरों के दर्शन किए- कामाक्षी अम्मन मंदिर, एकाम्बरेश्वर मंदिर, वरदराज पेरुमल मंदिर और उलगलंथा पेरुमल मंदिर। चेन्नई के दक्षिण-पश्चिम में पलार नदी के किनारे स्थित कांचीपुरम अपने रेशम के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसे ‘कांजीवरम’ कहा जाता है। यहाँ आसपास के गाँवों में आज भी घर-घर में हथकरघे लगे हैं, जहाँ स्त्री के सौंदर्य को कई गुना बढ़ाने वाली रेशम की साड़ियाँ बुनी जाती हैं। कभी चोल, पल्लव और विजयनगर साम्राज्य की राजधानी रहे कांचीपुरम की ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक विरासत के साथ हमने तीन दिन गुजारे। श्रीकांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य श्री विजेंद्र सरस्वती कहते हैं कि कांचीपुरम में दो-तीन दिन रहने से पुण्य प्राप्त होता है। पुण्य के साथ हमने अविस्मरणीय आनंद भी प्राप्त किया।

शनिवार, 26 सितंबर 2026

“मैं अंग्रेजों की नौकरी नहीं करूंगा”

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक रज्जू भैया पढ़ने में बहुत मेधावी थे, स्कूल के दिनों में ही उन्होंने भांप लिया था कि ब्रिटिश राज भारत के लिए अच्छा नहीं है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चौथे सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ का संपूर्ण जीवन प्रखर मेधा, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति का अप्रतिम उदाहरण है। बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी रज्जू भैया ने उस दौर में ब्रिटिश शासन के वैभवशाली पदों को ठुकरा दिया था, जब लोग सरकारी नौकरियों के लिए लालायित रहते थे। उन्हें स्कूल के दिनों से ही यह अनुभव होने लगा था कि ब्रिटिश राज भारत के लिए अच्छा नहीं है। अंग्रेजों से मुक्ति पाने के लिए देश में स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा है। रज्जू भैया एक घटना को याद करते हैं– “मेरठ में नौचंदी का प्रसिद्ध मेला लगता था, यदा-कदा हम लोग भी उसे देखने जाते थे। भगतसिंह और उनके दो साथी राजगुरु और सुखदेव को मृत्युदंड दिया गया था। एक दुकानदार ने उस मेले में अपनी दुकान पर उस दृश्य का एक छोटा चित्र लगा रखा था, जो मेले में आए दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया था। अगले दिन ही पुलिस ने उस चित्र को हटा दिया और हमें यह पता लगा कि उस दुकानदार को गिरफ्तार कर लिया गया है। हम उस घटना को पूरी तरह समझ पाने में सक्षम नहीं थे, किंतु अंग्रेजों के प्रति हमारे मन में रोष अवश्य उत्पन्न हुआ और हमने ‘टोडी बच्चा हाय हाय’ के नारे का भरपूर समर्थन किया।” इसी विचार के कारण उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि ब्रिटिश शासन के अधीन नौकरी नहीं करूंगा।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

श्रीगणेश की दिव्य प्रतिमा, निरंतर बढ़ रहा आकार

अमरकंटक दर्शन : पुष्पराजगढ़ के जंगलों में कलचुरीकालीन भगवान श्रीगणेश की ऐतिहासिक प्रतिमा, इन्हें बटुक गणेश भी कहते हैं


अनूपपुर के पुष्पराजगढ़ तहसील के ग्राम धरहर कला में स्थापित प्राचीन एवं दिव्य श्रीगणेश प्रतिमा

अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ विकासखंड के अंतर्गत ग्राम धरहरकला में भगवान श्रीगणेश की दिव्य एवं प्राचीन प्रतिमा है, जो श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र है। इस स्थान को बहगड़नाला भी कहते हैं। अमरकंटक स्थित माँ नर्मदा मंदिर से उत्तर दिशा की ओर लगभग 35 किलोमीटर और पुष्पराजगढ़ से लगभग सात किलोमीटर की दूरी पर भगवान श्रीगणेश की यह प्रतिमा स्थापित है। भगवान श्रीगणेश की इस प्रतिमा को लेकर लोगों के मन में अपार श्रद्धा होने के साथ-साथ कौतुहल भी है। कहते हैं कि प्रतिवर्ष तिल-तिल करके प्रतिमा का आकार बढ़ रहा है। वर्तमान में प्रतिमा का आकार लगभग 8 फीट है। हालांकि इसके कोई वैज्ञानिक एवं पुरातात्विक साक्ष्य नहीं है। लेकिन लोगों की श्रद्धा है। इस संदर्भ में यह भी जनश्रुति है कि जब प्रतिमा प्रकट हुई थी, तब इसका आकार केवल एक फीट था। इन्हीं जनश्रुतियों के कारण घने जंगल में, एकांत में विराजे धरहरकला भगवान श्रीगणेश की प्रसिद्धि दूर-दूर तक है। प्रतिवर्ष वसंत पंचमी पर यहाँ तीन दिवसीय विशाल मेला लगता है। श्रीगणेशोत्सव के दिनों में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहाँ भगवान श्रीगणेश की इस दिव्य प्रतिमा के दर्शन के लिए आते हैं। अमरकंटक में सदानीरा माँ नर्मदा के दर्शन के लिए आने वाले भक्तगण भी श्रीगणेश के दर्शन के लिए आते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि अमरकंटक में माँ नर्मदा की पूजा-अर्चना का फल भक्तों को तभी मिलता है, जब धरहरकला आकर भगवान श्रीगणेश की पूजा करते हैं। एक मान्यता यह भी है कि अमरकंटक पहुंचने से पहले धरहर के स्वयंभू गणेश महाराज के दर्शन करने के बाद ही माँ नर्मदा की पूजा-अर्चना का फल पूर्ण होता है। इन्हीं कारणों से अमरकंटक आने वाले और वहाँ से लौटने वाले श्रद्धालु धरहर कला पहुंचकर श्री गणेश जी के दर्शन और पूजन करते हैं।

गुरुवार, 24 सितंबर 2026

‘हनुमान अंश’ ने भारतीय सिनेमा को दिखाई राह

भारतीय सिनेमाई परिदृश्य में जब भी किसी फिल्म की सफलता का आकलन होता है, तो अमूमन भारी-भरकम बजट, चमचमाते सितारे और आक्रामक प्रचार तंत्र का उल्लेख किया जाता है। बड़े प्रोडक्शन हाउस अक्सर औसत दर्जे की कहानियों को भी पीआर रणनीतियों और मल्टी-सिटी टूर के शोर में ‘ब्लॉकबस्टर’ का चोगा पहनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन नीम करोली बाबा के जीवन और दर्शन से प्रेरित फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने स्थापित व्यावसायिक नैरेटिव्स को ध्वस्त कर यह सिद्ध कर दिया है कि जब कथ्य में आत्मीयता, सांस्कृतिक जुड़ाव और सादगी हो, तो समाज उसे न केवल स्वीकारता है, बल्कि सिर-आंखों पर बिठाता है। रिलीज के सातवें सप्ताह और 47वें दिन के बाद भी सिनेमाघरों में दर्शकों की बढ़ती भीड़ इस बात का प्रमाण है कि यह कोई क्षणिक कौतूहल नहीं, बल्कि भारतीय दर्शकों के अंतर्मन का सच्चा प्रकटीकरण है।

बुधवार, 23 सितंबर 2026

ब्रह्मांड को मापने वाले भगवान का मंदिर

उलगलंथा पेरुमल मंदिर में भगवान विष्णु के वामन अवतार के दर्शन

‘उलगलंथा पेरुमल’ का अर्थ है ‘ब्रह्मांड को मापने वाला भगवान’। यह नाम भगवान विष्णु के पाँचवे अवतार ‘वामन अवतार’ से जुड़ता है। भगवान वामन को समर्पित मंदिर बमुश्किल ही आपने देखे होंगे। मेरे लिए तो यह पहला मंदिर है, जहाँ मंदिर के मुख्य देवता के रूप में भगवान वामन की पूजा होती है। उलगलंथा पेरुमल मंदिर कांचीपुरम के सबसे प्राचीन मंदिरों में शामिल है। इतिहासकार बताते हैं कि इस मंदिर का निर्माण राजेन्द्र चोल प्रथम (1012-1044 ई.) ने कराया था। एक और महत्वपूर्ण तथ्य इस मंदिर को विशेष बनाता है कि यह मंदिर 108 दिव्य देसमों (विष्णु के पवित्र निवास) में से एक है। मंदिर का गोपुरम् आकर्षक है।

दर्शन करें : कांचीपुरम के मंदिरों का दर्शन करें