संघ शताब्दी वर्ष : मध्यप्रदेश में अब तीन प्रांत (मध्यभारत , मालवा और महाकौशल) की जगह होंगे 7 संभाग, मध्य भारत में भोपाल एवं ग्वालियर संभाग, मालवा की जगह इंदौर और उज्जैन संभाग, महाकौशल की जगह सागर, रीवा और जबलपुर संभाग
![]() |
| यह आलेख 'आयुध Updates' के मार्च-अप्रैल 2026 अंक में प्रकाशित हुआ है। |
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर समाज में अब स्वीकार्यता के साथ-साथ एक विश्वास भी बन गया है। सज्जनशक्ति संघ के साथ मिलकर समाज परिवर्तन के आंदोलन से जुड़ना चाहती है, वहीं संघ भी अपने लक्ष्य यानी समाज के साथ एकाकार होने की ओर बढ़ना चाहता है। हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष के बाद अपने अगले पड़ाव की ओर कदम बढ़ा रहा है। शताब्दी वर्ष में अब तक आयोजित कार्यक्रमों में समाज ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया है। समाज की बड़ी ताकत संघ के संपर्क में आई है। इसलिए अपने अगले पड़ाव में संघ समाज की सज्जन शक्ति को साथ लेकर भारत के निर्माण की नयी कहानी लिखने की तैयारी कर रहा है। इसकी एक झलक हरियाणा के पट्टीकल्याणा (समालखा) में आयोजित अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों एवं भविष्य की रणनीति में देखी जा सकती है। पिछले कुछ समय से एक चर्चा बहुत जोरों से थी कि संघ अपनी भौगोलिक संरचना में बदलाव करने जा रहा है, संघ की प्रांत रचना खत्म हो जाएगी, क्षेत्र रचना में भी बदलाव होगा। इस चर्चा पर अब प्रतिनिधि सभा में मुहर लग गई है। हाँ, संघ की भौगोलिक संरचना में बदलाव हो रहा है। अब चर्चा इस बात की अधिक हो रही है कि आखिर संघ को इस परिवर्तन की आवश्यकता क्यों पड़ी?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संदर्भ में एक बात समझ लेनी चाहिए कि यह प्रगतिशील संगठन है। संघ देश-काल-परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन के लिए सदैव तैयार रहता है। संघ के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से लेकर वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत तक सबने कहा है कि आरएसएस में सब बदला जा सकता है लेकिन हिंदू राष्ट्र का विचार, हिंदुत्व का मूल सिद्धांत और भारत के प्रति समर्पण का मूल मंत्र, ये तीन बातें कभी नहीं बदली जा सकती हैं। संघ की शुरुआत ही इस विचार के साथ हुई है कि ‘भारत एक हिन्दू राष्ट्र है’। व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज में वांछित परिणाम लाए जा सकते हैं। संघ व्यक्ति निर्माण के अपने कार्य के लिए पद्धति एवं प्रक्रिया में बदलाव ला सकता है लेकिन विचार में नहीं, यह बात पक्की है। इसी संदर्भ में संघ की भौगोलिक रचना में होने जा रहे बदलाव को देखना चाहिए। स्मरण रहे कि संघ में इस तरह के बदलाव पहली बार नहीं हो रहे हैं। संघ की भौगोलिक रचना पहले भी बदलती रही है। इसलिए संघ के लिए यह परिवर्तन सहज है, जो संघ को समीप से नहीं जानते, उनके लिए ही यह परिवर्तन कौतुहल का विषय हो सकता है। जब संघ शुरू हुआ था, तब शाखाओं की रचना नहीं थी। नागपुर में चलने वाले अखाड़ों में ही स्वयंसेवक एकत्र आते थे। बाद में विचार करने के बाद शाखा की रचना आई। गणवेश में भी निरंतर बदलाव होते रहे हैं। मिलिट्री गणवेश, फिर खाकी नेकर एवं सफेद कमीज से लेकर अब फुलपेंट तक कई परिवर्तन संघ की गणवेश में हुए हैं। प्रारंभ में संघ की आज्ञाएं अंग्रेजी में थी, जिन्हें बाद में संस्कृत में बदला गया। पहले मराठी-हिन्दी में प्रार्थना गायी जाती थी, बाद में उसे भी आवश्यक संसोधन के साथ संस्कृत में किया गया। बदलावों की ऐसी लंबी शृंखला संघ में है। दरअसल, संघ लकीर का फकीर नहीं है, वह जीवंत आंदोलन है, जिसमें समयानुकूल परिवर्तनों के लिए संभावनाएं हैं।
प्रतिनिधि सभा के बाद मीडिया से बातचीत में संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने जानकारी दी है कि संरचना में विकेन्द्रीकरण पर विचार हुआ है, जिसमें प्रांत के स्थान पर छोटी इकाई संभाग बनाने का प्रस्ताव है। जिसके लागू होने पर 46 प्रांतों के स्थान पर 80 से अधिक संभाग होंगे। क्षेत्र की रचना में भी बदलाव होगा, 11 की जगह अब 9 क्षेत्र होंगे। यह परिवर्तन क्यों किए गए, इसके संदर्भ में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने स्पष्ट किया है कि आरएसएस का काम बहुत तेजी से बढ़ रहा है और लोगों की उम्मीदें भी बढ़ रही हैं, इसलिए अब काम को अलग-अलग हिस्सों में बांटने के लिए विकेंद्रीकरण की शुरुआत की जा रही है। स्वयंसेवकों को मजबूत बनाने और काम बेहतर करने के लिए संगठन में बदलाव किए गए हैं। प्रांत की जगह संभाग जैसी छोटी इकाई बनाने से स्थानीय स्तर पर काम आसानी और अच्छे तरीके से हो सकेगा। यह बात साफ समझ आ रही है कि संघ की भौगोलिक रचना में बदलाव के पीछे संघ कार्य के विस्तार की योजना है। संघ अपने कार्य का विस्तार और सघन करना चाहता है। संघ के विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी आरएसएस के विकास के संदर्भ में अकसर ‘द प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट’ की बात करते थे। यानी संघ का बीज बोते समय ही डॉ. हेडगेवार ने यह कल्पना कर ली थी कि यह आगे चलकर किस प्रकार का वटवृक्ष बनेगा। इसलिए उन्होंने प्रारंभ में सबकुछ नहीं बताया लेकिन जैसे-जैसे संघ की यात्रा आगे बढ़ी, उसका सामर्थ्य बढ़ा, हमने संघ को आकार लेते देखा। समाज में सघन कार्य विस्तार की दृष्टि से प्रांत रचना को समाप्त करके संभाग रचना के निर्माण के पीछे ‘द प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट’ की संकल्पना को देखेंगे, तो यह निर्णय व्यवहारिक रूप से समझ आ सकता है।
प्रांत रचना समाप्त होने के साथ-साथ विभाग, जिला, नगर/खंड की भौगोलिक रचना में भी बदलाव संभव है। जिले, नगर एवं खंड छोटे हो सकते हैं या फिर उनका नये सिरे से परिसीमन किया जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में नगरीय और ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक बदलाव हुआ है, जनसंख्या के आधार पर भी और भौगोलिक दृष्टि से भी। इसलिए संघ की छोटी भौगोलिक रचना बस्ती और मंडल भी पुनर्परिभाषित किए जा सकते हैं। छोटी इकाई होगी, तो कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण अच्छे से हो सकेगा। उनकी देखभाल में भी सरलता रहेगी। इसके साथ ही संघ कार्य के विस्तार की दृष्टि से प्रवास भी प्रभावी ढंग से हो सकेंगे।
संघ की वर्तमान भौगोलिक संरचना :
केंद्र - अखिल भारतीय स्तर पर
क्षेत्र - पूरे भारत को 11 क्षेत्रों में बांटा गया है। अब 9 क्षेत्र रह जाएंगे।
प्रांत - देश को 46 प्रांतों में बांटा गया है। एक शासकीय प्रदेश में संघ के एक से अधिक प्रांत हो सकते हैं। जैसे मध्यप्रदेश में कुल 3 प्रांत हैं- मध्य भारत, मालवा, महाकौशल। एक समय में मालवा, मध्यभारत का ही हिस्सा था।
विभाग - कुछ जिलों के समूह को मिलाकर एक विभाग बनता है। इनकी संख्या लगभग 500 है। मध्यभारत प्रांत में 8 विभाग हैं।
जिला – संघ ने अपने कार्य की दृष्टि से शासकीय जिलों के इतर जिलों की रचना की है। जैसे मध्यभारत में 16 शासकीय जिले हैं लेकिन संघ ने अपने कार्य की दृष्टि से इन्हें 31 जिलों में बांटा है।
नगर - शहरी क्षेत्रों के लिए।
खंड/तहसील - ग्रामीण क्षेत्रों के लिए।
बस्ती – नगरीय क्षेत्र में
मंडल - 10-12 ग्रामों का समूह
मोहल्ला – संघ की सबसे छोटी भौगोलिक इकाई।
अब प्रांत की जगह संभाग की रचना अस्तित्व में आ जाएगी। मध्य क्षेत्र को देखें तो अभी यहाँ चार प्रांत हैं- मध्यभारत, मालवा, महाकौशल और छत्तीसगढ़। नयी रचना में मध्यभारत प्रांत की जगह भोपाल और ग्वालियर संभाग होंगे। मालवा प्रांत की जगह भी दो संभाग- इंदौर और उज्जैन संभाग बनाए जा रहे हैं। महाकौशल को तीन संभागों में बाँटा गया है- सागर, रीवा और जबलपुर। वहीं, छत्तीसगढ़ प्रांत रायपुर और बिलासपुर संभाग में बदल जाएगा।
अप्रैल-2027 से प्रभावी होगी नयी रचना :
संघ की नयी रचना अप्रैल-2027 से प्रभावी होगी। दरअसल, अभी जो प्रांत कार्यकारिणी कार्यरत हैं, उनका तीन साल का कार्यकाल 2027 में पूर्ण होगा। इसलिए तब तक वर्तमान रचना एवं कार्यकारिणी ही कार्य करेंगी। संघ में आगामी निर्वाचन नयी संभाग रचना के अनुसार ही होंगे। स्मरण रहे कि नये बदलाव से नगर, खंड, जिले और विभाग की संगठनात्मक रचना पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। प्रांत की जगह अब संभाग में कार्यकारिणी की रचना रहेगी। संभाग प्रचारक, कार्यवाह एवं संघचालक के साथ सभी कार्य विभाग प्रमुख, गतिविधि एवं अन्य कार्य के संयोजक संभाग कार्यकारिणी का हिस्सा होंगे। वहीं, संभाग और क्षेत्र के साथ समन्वय के लिए राज्य प्रचारक एवं राज्य कार्यवाह की व्यवस्था होगी। राज्य प्रचारक एवं राज्य कार्यवाह, क्षेत्र की कार्यकारिणी के पदेन सदस्य रहेंगे। कार्य में सुगमता के लिए राज्य प्रचारक एवं कार्यवाह के साथ दो-तीन कार्यकर्ताओं की समिति जोड़ी जा सकती है। स्मरण रहे कि राज्य स्तर पर संघचालक का दायित्व नहीं रहेगा।
बड़े परिवर्तनों की साक्षी रही है सिंदी बैठक-1939 :
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास में फरवरी-1939 में सिंदी (नागपुर से लगभग 50 किमी दूर एक गाँव) में हुई बैठक का ऐतिहासिक और संगठनात्मक महत्व है। यह बैठक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें लिए गए निर्णयों ने संघ के कामकाज, स्वरूप और वैचारिक दिशा को एक अखिल भारतीय और मानकीकृत रूप दिया। सिंदी बैठक का सबसे बड़ा निर्णय यह था कि संघ की प्रार्थना संस्कृत भाषा में होनी चाहिए। इससे पहले संघ की शाखाओं में जो प्रार्थना गाई जाती थी, वह मराठी और हिंदी का मिश्रण थी। 1939 से पहले, संघ की शाखाओं और प्रशिक्षण शिविरों में शारीरिक निर्देशों के लिए अंग्रेजी और मराठी शब्दों का इस्तेमाल होता था। इस बैठक में यह तय किया गया कि पूरे भारत में एकरूपता लाने के लिए सभी आज्ञाएं संस्कृत में होंगी। इसी बैठक में पहली बार औपचारिक रूप से ‘प्रचारक व्यवस्था’ को अखिल भारतीय स्वरूप दिया गया।








.jpg)