शुक्रवार, 13 मार्च 2026

'जादूगरनी' - जीवन, प्रेम और रिश्तों की खूबसूरत अभिव्यक्ति

वीडियो देखें : क्या एक कविता जीवन बदल सकती है?


“जब कोई कविता किसी मरते हुए को जीन का सहारा दे जाए तो वह जादूगरनी होती है”। युवा कवि सुदर्शन व्यास ने अपने नये काव्य संग्रह का नामकरण इसी भाव के साथ किया है- जादूगरनी। सच है, कविताओं में वह जादू होता है कि वे बड़े परिवर्तन की संवाहक बनती हैं। दुनिया के कितने ही बड़े आंदोलनों का आधार कविता ही बनी है। भारत के स्वाधीनता संग्राम में क्रांतिकारियों और स्वतंत्रतता सेनानियों का बीज मंत्र ‘वंदेमातरम’ भी काव्य है। ऐसा काव्य जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में नये सिरे से प्राण फूंक दिए। भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण का जीवन दर्शन काव्य के रूप में ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बहता आया है। कविता के महत्व एवं हमारे जीवन में उसकी उपस्थिति पर कवि ने उचित ही लिखा है कि “मनुष्यता के सबसे बड़े शोक में भी कविता गायी जाती है और सबसे बड़ी खुशी में भी कविता होती है। कविता हमारे जीवन का आधार है और जब कोई कविता किसी मरते हुए को जीने का सहारा दे जाए तो वह जादूगरनी होती है”।

युवा कवि सुदर्शन व्यास का काव्य–संग्रह ‘जादूगरनी’ हिंदी कविता की संवेदनशील और आत्मानुभूति से भरी अभिव्यक्ति है। इस संग्रह में संकलित 71 कविताएँ जीवन, प्रेम, प्रतीक्षा, रिश्तों की जटिलता, सामाजिक विडंबना और मानवीय मूल्यों के क्षरण जैसे विविध विषयों को स्पर्श करती हैं। ‘सुनो न पापा’, ‘बेचारे लड़के’, ‘जीवन’, ‘मृत्यु और मोक्ष’, ‘देने का सुख’, ‘प्रेम और प्रतीक्षा’, ‘मौन प्रेम’, ‘रिश्ते की संजीदगी’ जैसे शीर्षक ही इस बात का संकेत देते हैं कि कवि की दृष्टि आत्मीय रिश्तों से लेकर सामाजिक उत्तरदायित्व तक फैली हुई है।

सुदर्शन की कविताएं, उनके निर्मल व्यक्तित्व की परिचायक भी हैं। ‘सुनो न पापा…’ और ‘सुनो श्रीपद’, ये दो कविताएं- पिता और पुत्र का आत्मिक संवाद है। जीवन में संतान के आने के बाद सामान्यतौर पर एक व्यक्ति स्वयं को पीछे कर लेता है और अपनी संतति की खुशियों को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। अपने बच्चों के चेहरे पर हँसी देखने के लिए अपनी खुशियों को भूल जाता है। ‘सुनो न पापा…’ का भाव कुछ इस प्रकार है कि यदि एक नवजात शिशु बोल पाता तो अपने पिता के माथे की लकीरों को पढ़कर कहता कि “आप मुझे देखकर कोई चिंता न किया करो…”। वहीं, ‘सुनो श्रीपद’ में पिता होने की अभिव्यक्ति है। सुदर्शन की कविताओं में भावों की अभिव्यक्ति हृदय की गहरायी से होती हुई दिखायी देती है। ये भाव ही उनकी कविताओं के प्राण तत्व हैं। यह भाव ही पाठकों को कविताओं से जोड़ने में सफल होते हैं। भाव पाठक के हृदय में सीधे उतरते हैं, इसलिए पाठकों को ये कविताएं अपने ही जीवन की कहानियाँ लगती हैं। 

कविता ‘धरोहर’ में कवि ने बुजुर्गों को जीवित विरासत के रूप में चित्रित किया है। कवि लिखते हैं- “धरोहर सरीखे हमारे बुजुर्ग, हर घर में आज भी खड़े हैं अविरल से...” यहाँ कवि ने आधुनिक पीढ़ी की आत्ममुग्धता पर कविता के जरिए व्यंग्य किया है। हम ऐतिहासिक इमारतों को निहारने का समय तो निकाल लेते हैं, पर अपने घर की जीवित धरोहर ‘बुजुर्गों’ के साथ संवाद नहीं करते हैं। यह कविता पारिवारिक मूल्यों के क्षरण पर मार्मिक टिप्पणी है। कविता पढ़कर आपको लगेगा कि अब से हमें अपने बुजुर्गों के साथ कुछ समय बिताना चाहिए। याद रखें, जब हम बुजुर्गों के साथ होते हैं, तब उन्हें ही अच्छा नहीं लगता है अपितु हम भी समृद्ध होते हैं।

देखें : सुदर्शन व्यास की पुस्तक 'सुन रही हो न तुम' की चर्चा

कवि का एक मुखर स्वर सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध भी दिखाई देता है। जिस तरह से हमारा समाज संवेदनहीन होते जा रहा है, उस पर अपनी पीड़ा और आक्रोश व्यक्त करते हुए कवि लिखता है- “जिंदा लाशों के इस प्रगतिशील और सभ्य समाज से क्या अपेक्षा की जा सकती है? क्योंकि मरी हुई संवेदनाओं, मरे हुए गुस्से, मरे हुए तंत्र और, मरी हुई इंसानियत से, क्या अपेक्षा की जा सकती है?” यह पंक्तियाँ समाज में मरती संवेदनाओं, निष्प्राण व्यवस्था और खोती इंसानियत पर तीखा प्रहार करती हैं। कवि का यह आक्रोश निराशा नहीं, बल्कि जागृति का संकेत है। वह पाठक को झकझोरना चाहता है, ताकि समाज आत्ममंथन कर सके।

कविता ‘अंतिम’ में कवि जीवन के शाश्वत प्रवाह की बात करते हैं। यह वह एक दार्शनिक की भाँति कहते हैं कि “अंतिम, कभी अंतिम नहीं हुआ।” न इच्छाएँ अंतिम होती हैं, न स्मृतियाँ। मृत्यु के बाद भी व्यक्ति स्मरण में जीवित रहता है। यह दृष्टिकोण जीवन को आशावादी और गतिशील बनाता है। 

युवा कवि सुदर्शन व्यास की कविताओं में एक मजबूत स्वर प्रेम का भी रहता है। सात्विक प्रेम। जिम्मेदार प्रेम। जो परस्पर सम्मान सिखाता है। जो मनुष्य बनाता है। जीवन में प्रेम का होना मनुष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह प्रेम किसी भी रूप में हो सकता है। कवि सुदर्शन ने अपनी कविताओं में प्रेम के सूक्ष्मतम भावों को अत्यंत सरल शब्दों में व्यक्त किया है। कवि कहता है कि “प्रेम का सबसे सुंदर रूप है प्रतीक्षा, जिसकी जितनी गहरी प्रतीक्षा, उसका उतना ही गहरा प्रेम”। कवि के अनुसार जहाँ समर्पण है, वहाँ अपेक्षाएँ नहीं; पर प्रेम के साथ प्रतीक्षा अनिवार्य है। प्रतीक्षा यहाँ अधीरता नहीं, बल्कि विश्वास और समर्पण का प्रतीक बनकर उभरती है।

देखें : युवा कवि सुदर्शन व्यास के साथ एक खास बातचीत

‘उम्मीद’ कविता में कवि सुदर्शन अपने लेखन धर्म को स्पष्ट करते हैं- जब भी कभी उदास होता हूँ, पर अक्सर खुशी लिखता हूँ। जब भी कभी हताश होता हूँ, पर अक्सर हौसला लिखता हूँ। जब भी कभी खफा होता हूँ, पर जिंदगी को खूबसूरत लिखता हूँ। क्या पता लिखे को पढ़कर, कोई रोता हँस पड़े, कोई रुका चल पड़े, कोई रूठा गले लगा ले जिंदगी अपनी। यह पंक्तियाँ कवि के सकारात्मक दृष्टिकोण को दर्शाती हैं। वे निजी पीड़ा को भी इस तरह रूपांतरित करते हैं कि पाठक को आशा और साहस मिल सके। कविता उनके लिए केवल आत्माभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज को संबल देने का माध्यम है। उनकी इस भावना को अन्य कविताओं में भी अनुभव किया जा सकता है।

युवा कवि सुदर्शन व्यास के काव्य संग्रह ‘जादूगरनी’ की भाषा सहज, सरस और भावप्रधान है। कवि ने कठिन प्रतीकों या जटिल बिंबों के बजाय सीधे संवाद की शैली अपनाई है। उनकी कविताएँ पाठक से सीधा संवाद करती प्रतीत होती हैं। भावों की प्रामाणिकता और सरल अभिव्यक्ति इस संग्रह की विशेषता है। कुल मिलाकर कहना होगा कि ‘जादूगरनी’ एक ऐसी काव्य यात्रा है, जिसमें प्रेम की कोमलता, समाज की कठोर सच्चाइयाँ, रिश्तों की संवेदनशीलता और जीवन का दार्शनिक बोध एक साथ उपस्थित हैं। युवा कवि सुदर्शन व्यास ने अपने अनुभवों और भावनाओं को सरल शब्दों में ढालकर पाठकों के हृदय तक पहुँचाने का सफल प्रयास किया है। यह संग्रह न केवल युवाओं के लिए, बल्कि हर उस पाठक के लिए महत्त्वपूर्ण है जो कविता में अपनी संवेदनाओं का प्रतिबिंब खोजता है।

पुस्तक : जादूगरनी

कवि : सुदर्शन व्यास

पृष्ठ : 122

मूल्य : 175

प्रकाशक : वेरा प्रकाशन, जयपुर

सुदर्शन व्यास की पुस्तक 'जादूगरनी' की समीक्षा दैनिक समाचार पत्र 'स्वदेश ज्योति' में 13 मार्च, 2026 को प्रकाशित

रविवार, 8 मार्च 2026

स्वदेशी का आग्रही है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

संघ शताब्दी वर्षआरएसएस ने धरातल पर उतारकर दिखाया स्वदेशी विचार


भारत की सर्वांगीण स्वतंत्रता एवं विकास का सपना देखने वाले महापुरुषों ने ‘स्वदेशी’ का महत्व समझा और भारत को आत्मनिर्भर एवं सशक्त बनाने के लिए समाज से स्वदेशी आचरण का आग्रह किया। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि यदि हमें फिर से उन्नति करनी है, तो लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की शिक्षा देनी होगी। स्वातंत्र्यवीर सावरकर, बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय और महात्मा गांधी से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार तक, सभी ने स्वदेशी को अपनाने का आग्रह किया। भारत के निर्माण का सपना देखने वाले विचारक यह भली-भांति जानते थे कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति के मूल में स्वदेशी का आचरण ही है।

भारत को परमवैभव पर ले जाने की महान आकांक्षा के साथ 1925 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई, तब से ही संघ ने स्वदेशी को लेकर समाज का प्रबोधन प्रारंभ कर दिया था। संघ के लिए स्वदेशी केवल एक आर्थिक नारा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का मूल मंत्र है। संघ ने अपनी स्थापना के साथ ही भारत की आत्मनिर्भरता और भारतीय मूल्यों पर आधारित अर्थतंत्र की वकालत की है।

मंगलवार, 3 मार्च 2026

कहाँ है आपकी निष्ठा

खामेनेई की मौत : प्रदर्शन करनेवाले मुसलमानों की निष्ठा कहाँ है?


अमेरिका और इजराइल के हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद मध्य पूर्व में जो भू-राजनीतिक भूचाल आया है, उसकी अनुगूंज भारत के कई हिस्सों में सुनाई दे रही है। लखनऊ से लेकर श्रीनगर तक कई क्षेत्रों में हजारों मुस्लिम प्रदर्शनकारियों का सड़कों पर उतरना, अमेरिका और इजराइल के खिलाफ नारेबाजी करना, एक गहरी चिंता का विषय है। यह प्रदर्शन सवाल उठाता है कि भारत के मुसलमानों की निष्ठा आखिर कहाँ है? ईरान के सुप्रीम खामनेई की मौत के बाद भारत में प्रदर्शनों का क्या औचित्य है? अपने आप को इस्लामिक सत्ता/व्यवस्था से जोड़ने की यह बीमारी आज की नहीं है। खिलाफत आंदोलन को याद कीजिए और उसके उद्देश्य का विश्लेषण कीजिए। आखिर क्यों भारत के मुसलमानों ने खिलाफत आंदोलन चलाया था? क्या उसका कोई संबंध भारत की स्वतंत्रता से था? 

आज से आठ दशक पूर्व संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जिस कड़वे सच की ओर देश का ध्यान आकृष्ट किया था, वह आज पूरी तरह प्रासंगिक नजर आता है। उन्होंने स्पष्ट लिखा था कि मुसलमानों की निष्ठा उस देश के प्रति नहीं होती जहाँ वे रहते हैं, बल्कि उस सांप्रदायिक विश्वास पर निर्भर करती है जिसका वे हिस्सा हैं। लखनऊ से लेकर जम्मू-कश्मीर की सड़कों पर उतरकर मातम मनाने वाली भीड़ और खामेनेई को शहीद का दर्जा देने की कवायद, इसी मानसिकता का साक्षात प्रमाण है।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

छत्रपति शिवाजी महाराज से सीखें जल प्रबंधन

सह्याद्रि के उत्तुंग शिखरों पर आसमान से बातें करनेवाले गिरिदुर्ग हों या फिर समुद्री लहरों के बीच मुस्कुराते जलदुर्ग, उनकी व्यवस्थाएं देखकर ध्यान आता है कि हिन्दवी स्वराज्य के योजनाकार, वास्तुकार, अभियंता और निर्माण में योगदान करनेवाले सभी शिल्पकार एवं श्रमिक अपने कार्य-कौशल में सिद्धस्थ थे। सुरक्षा पक्ष हो या फिर कला पक्ष, सबका बारीकी से विचार किया गया। इसके साथ ही बुनियादी आवश्यकताओं की चिंता भी की गई। भारत में जहाँ भी आपने दुर्ग देखे होंगे, उनमें जलस्रोत की व्यवस्था देखी ही होगी। परंतु हिन्दवी स्वराज्य के किलों में जलस्रोतों का प्रबंधन रचनात्मक ढंग से किया गया है। हजारों फीट की ऊंचाई पर बारह महीने पानी की व्यवस्था बनाए रखना चुनौतीपूर्ण था। कुशल योजनाकारों ने बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से दुर्गों पर जलाशयों का निर्माण किया है। किसी भी दुर्ग पर एक-दो नहीं अपितु अलग-अलग हिस्सों में कई जलाशयों का निर्माण किया जाता था। हम हिन्दवी स्वराज्य की राजधानी दुर्गदुर्गेश्वर श्रीरायगढ़ की ही बात करें, तो वहाँ छोटे-बड़े 84 जलाशयों का निर्माण किया गया है। चूँकि रायगढ़ पर अधिक संख्या में लोग रहते थे इसलिए यहाँ बड़ी संख्या में जल निकायों का निर्माण किया गया। श्रीरायगढ़ के प्रसिद्ध जल निकाय हैं- गंगा सागर तालाब, हत्ती तालाब, कुशावर्त तालाब, हनुमान टांकी, बारह टांकी इत्यादि।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

मातृभाषाओं के संरक्षण का पक्षधर है संघ

संघ शताब्दी वर्ष : सभी भारतीय भाषाएं, राष्ट्रीय भाषाएं हैं। किसी की अनदेखी न हो, सबको समान स्तर प्राप्त हो


वैश्विक मानचित्र पर भाषाई दृष्टि से भारत की स्थिति विशिष्ट है। हमारे यहाँ उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक भाषाओं के विविध रंग फैले हुए दिखायी देते हैं। भारत की ये भाषाएं क्षेत्रीय या स्थानीय भाषाएं नहीं है, अपितु सभी भाषाएं राष्ट्रीय हैं। उनका एकसमान महत्व है। राजनीतिक स्वार्थ हावी होने से पहले भारत में कभी भाषाई विभाजन दिखायी नहीं दिया। दरअसल, जिस प्रकार भारत की संस्कृति के विविध पक्ष एक–दूसरे के साथ एकात्म हैं, उसी भाँति हमारी भाषाओं में भी आपस में गहरा नाता है। विविधता में एकात्मता का उत्सव मनाने वाले देश भारत में भाषाओं का सुंदर पुष्पगुच्छ है, जिसकी सुगंध से भारत की संस्कृति महकती रही है। भारत को कमजोर करने वाली ताकतें अकसर हमारी भाषाओं को एक–दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयास करती हैं। वहीं, भारत के प्रति श्रद्धा रखने वाले संगठन भारत की सभी मातृभाषाओं के बीच स्वाभाविक एकात्म को गहरा करने में विश्वास रखते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐसा ही संगठन है, जिसने सदैव भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और उनके एकात्म पर जोर दिया है। संघ ने सभी भारतीय भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा माना है, जो भारत की समृद्ध संस्कृति की संवाहिकाएं हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर देश की सभी भाषाओं को चिरजीवी मानते थे। आम समाज से लेकर राजकाज के व्यवहार में मातृभाषा का उपयोग होना चाहिए, इसके वे प्रबल पक्षधर थे। इस संदर्भ में वे छत्रपति शिवाजी महाराज का उदाहरण देते थे। विशेषरूप से छत्रपति शिवाजी महाराज के उदाहरण से उन लोगों को सीखना चाहिए जो आज कहते हैं कि हमारे दैनिक व्यवहार में अंग्रेजी और अन्य बाह्य भाषाओं का प्रभाव इतना अधिक बढ़ गया है कि अब उन्हें हटाना संभव नहीं है। श्रीगुरुजी कहते थे– “राज्य स्थापना के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज ने सामान्य व्यवहार में घुसे फारसी, अरबी शब्दों को निकालने का काम किया। उस समय की स्थिति का विचार करने पर दिखाई देगा कि फारसी, अरबी के बिना काम ही नहीं चलता था। छत्रपति छत्रपति शिवाजी महाराज ने मिलावट की प्रवृत्ति को दूर करने और अपनी भाषा को शुद्ध रूप में लाने का प्रयत्न किया। उनके काल का ‘राज्य व्यवहार-कोश’ प्रसिद्ध है”। हमारे सामने छत्रपति शिवाजी महाराज का उदाहरण था लेकिन इसके बाद भी स्वाधीनता के बाद हमारे सत्ताधीशों ने अंग्रेजी के सामने घुटने टेक दिए। दुनिया में कई देशों के उदाहरण हैं, जिन्होंने सत्ता के सूत्र संभालते ही अपनी भाषा में राजकाज किया। मातृभाषा के प्रति गौरव का भाव जगाते समय श्रीगुरुजी भी ऐसे देशों का उदाहरण देते थे। उनका स्पष्ट मत था कि जो देश अंग्रेजों की दासता से मुक्त हुए, उन सभी देशों ने अपने देश की भाषाओँ को ग्रहण किया। ब्रह्मदेश ने ब्रह्मी और श्रीलंका ने सिंहली को स्वीकार किया। सत्ता हाथों में आते ही उन्होंने भाषा बदल दी। दक्षिण अफ्रीका में विभिन्न 14-16 भाषाएँ हैं तथा प्रत्येक समुदाय को अपनी भाषा पर गर्व है। फिर भी सर्वसम्मति से उन्होंने ‘स्वाहिली’ भाषा को राष्ट्रीय भाषा के रूप में ग्रहण किया। उनका सब-कुछ ठीक चल रहा है। इस संबंध में इजराइल और तुर्की के उदाहरण भी प्रेरक हैं।

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

भारत के हो, तो गाओ गर्व से ‘वंदेमातरम्’

राष्ट्रगीत को मिला उसका सम्मान, गृह मंत्रालय ने ‘वंदेमातरम्’ के सम्मान के संबंध में जारी किए दिशा-निर्देश


मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते कभी कांग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन के मंत्र और राष्ट्रीय गीत ‘वंदेमातरम’ के सम्मान के साथ समझौता कर लिया था। राष्ट्रगान को जो सम्मान दिया गया, राष्ट्रगीत को उससे वंचित कर दिया गया। संविधान के अनुच्छेद 51ए में राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करने को मौलिक कर्तव्य के रूप में रेखांकित किया गया है लेकिन इसमें राष्ट्रगीत के संबंध में कोई निर्देश नहीं मिलता है। राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 3 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रगान के गायन को रोकता है या गा रहे लोगों के बीच अशांति पैदा करता है, तो उसे 3 साल तक की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। इस अधिनियम में भी राष्ट्रगीत का अपमान करने पर सजा का कोई प्रावधान नहीं किया गया है। राष्ट्रगीत के सम्मान के प्रति यह उदासीनता क्यों रखी गई? इसका उत्तर सब जानते हैं। इसलिए सभी राष्ट्रभक्त देशवासियों के मन में कसक थी कि आखिर वह दिन कब आएगा जब हम अपने राष्ट्रगीत को वह सम्मान देंगे, जिसका वह प्रारंभ से अधिकारी है। याद रखें कि जिनके मन में भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान नहीं था, वे लोग तो पाकिस्तान चले गए थे। आज जिन्हें भारत में रहकर वंदेमातरम गाने और उसके सम्मान में खड़े होने में दिक्कत है, उन्हें अपने बारे में विचार करना चाहिए। भारत में रहना है तो फिर वंदेमातरम तो गाना पड़ेगा। मोदी सरकार को साधुवाद कि उसने राष्ट्रीय गीत को उसका खोया हुआ स्वाभिमान एवं प्रतिष्ठा लौटाई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘वंदेमातरम’ के गायन को लेकर आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करके अच्छा कदम उठाया है। इस आदेश के तहत अब जब भी राष्ट्रगीत एवं राष्ट्रगान, दोनों एक साथ बजाए जाएंगे, तो पहले ‘वंदे मातरम्’ (राष्ट्रगीत) के सभी छह छंद गाए जाएंगे और उसके बाद ‘जन-गण-मन’ (राष्ट्रगान) होगा। यह बदलाव केवल प्रक्रियात्मक नहीं है, बल्कि इसके ऐतिहासिक और संवैधानिक निहितार्थ भी हैं। हमें सदैव याद रखना चाहिए कि वंदेमातरम का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अद्वितीय स्थान रहा है। बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित इस गीत ने क्रांतिकारियों में जो ऊर्जा भरी, वह इतिहास में दर्ज है।

देखें : आरएसएस के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव हेडगेवार ने चलाया वंदेमातरम आंदोलन

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

पर्यटक की डायरी से अधिक इतिहास की याद दिलाने वाला दस्तावेज है 'हिन्दवी स्वराज्य दर्शन'

- सुमंत विद्वांस

दिसंबर में जब मैं बालाघाट में था, तब भोपाल से मेरे मित्र लोकेन्द्र जी ने बहुत स्नेहपूर्वक अपनी तीन पुस्तकें मेरे लिए उपहार में भेजी थीं। साथ ही उन्होंने यह सुझाव भी भेजा कि इन तीनों में सबसे पहले ‘हिन्दवी स्वराज्य दर्शन’ को पढ़ूँ।

आज मैंने यह पुस्तक पढ़कर पूरी की।

इसे यात्रा वर्णन कहा गया है और यह बात बिल्कुल ठीक भी है। लेकिन यह पुस्तक किसी पर्यटक की डायरी नहीं है। यह इतिहास की याद दिलाने वाला दस्तावेज भी है और अपने नाम के अनुरूप ही छत्रपति शिवाजी महाराज के स्वराज्य का ‘दर्शन’ करवाने वाली पुस्तक भी है। 

शिवाजी महाराज के जीवन और कार्य के बारे में अनेक भाषाओं में सैकड़ों पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। उनमें से अनेक पुस्तकें बहुत शोधपूर्ण एवं गहन हैं। ऐसे में अगर आप सोचें कि इस पुस्तक को क्यों पढ़ा जाए, तो मैं कहूँगा कि यदि आपको सरल शब्दों में शिवाजी महाराज के कुछ महत्वपूर्ण किलों की प्राथमिक जानकारी पानी हो, तो यह पुस्तक आपके लिए बहुत काम की है। इसमें आपको सिंहगढ़ और रायगढ़ जैसे प्रसिद्ध किलों की जानकारी तो मिलेगी ही, पर साथ ही खान्देरी और कोलाबा जैसे जलदुर्गों व पुरंदर व मल्हारगढ़ जैसे किलों के बारे में भी पता चलेगा। इसके अलावा इसमें पुणे के शनिवारवाड़ा, लाल महल और पाचाड में जीजाबाई के समाधि-स्थल का भी परिचय मिल जाएगा।

मैं लगभग 15 वर्षों तक नासिक और पुणे में रहा हूँ, और उनमें से भी सात वर्ष पुणे शहर में ही रहा हूँ, इसलिए इनमें से कई स्थानों पर मैं जा चुका हूँ। इस पुस्तक को पढ़ते समय अनायास ही मेरी भी कई पुरानी यादें ताजा हो गईं और बहुत-सी नई जानकारी भी मिल गई।