सोमवार, 24 सितंबर 2018

सहिष्णुता और सादगी से प्रश्न करती ‘हम असहिष्णु लोग’

- सुदर्शन वीरेश्वर प्रसाद व्यास
‘हम असहिष्णु लोग’...यकीनन, पुस्तक के शीर्षक से यह तो पूर्व में ही आभास हो जाता है कि लेखक इस पुस्तक के पाठकों से प्रत्यक्ष संवाद के साथ ही एक अप्रत्यक्ष संवाद उन लोगों से भी करना चाहते हैं जो एक विचारधारा (वर्ग) विशेष के प्रति ‘असहिष्णु’ शब्द की रट लगाए बैठे हैं। हालांकि, पुस्तक चर्चा से पूर्व हमें यह अच्छी तरह से जान लेना चाहिए कि असल में इस ‘असहिष्णु’ शब्द के मायने क्या हैं? देशभर के ख्यातिलब्ध विद्वानों ने इस शब्द को अपने हिसाब से विभिन्न परिभाषाओं में गढ़ा है, किसी का मानना है कि दूसरे धर्म या विचार से असहमति ही असहिष्णुता है, कोई कहता है कि अनायास क्रोधित होकर तेश में आना असहिष्णुता है, किसी का मानना है दूसरों की आवाज़ दबाकर अपनी आवाज़ बुलन्द करना असहिष्णुता है तो किसी का मानना है कि जो पसन्द न हो, उसे बर्दाश्त करना असहिष्णुता है। सरल शब्दों में कहा जाए तो जो व्यक्ति को निजी तौर पर पसंद ना हो, उसके खिलाफ जाना या उसे बर्दाश्त ना कर पाना असहिष्णुता है। इसके अतिरिक्त किसी के विचारों से सहमत न हो पाना तथा बिना किसी कारण के उनकी काट करना (सिरे से नकारना) असहिष्णुता का प्रतीक है। या कहें कि उसे सहन ना करना, जो अपने से भिन्न हो, फिर चाहे वह धार्मिक हो, सांस्कृतिक हो, नस्लीय हो या किसी अन्य प्रकार से भिन्न हो, उसे बर्दाश्त ना करना असहिष्णुता कहलाती है। असहिष्णुता को अंग्रेजी में इनटॉलरेंस (Intolerance) कहा जाता है। 
          भारतीय संस्कृति के संदर्भ में यदि बात करें, तो यह शब्द इस देश के लिए एकदम नया सा है, क्योंकि ये वो देश है जहां पुरातनकाल से मानवों से इतर नदी, पहाड़, पौधे वृक्ष, सागर, पक्षी, नाग यहां तक कि पशुओं को भी देवतुल्य माना गया है। जिस संस्कृति में यह निहित हो कि घर में बनने वाली पहली रोटी गाय और अंतिम श्वान (कुत्ते) की होती है, जहां चीटियों तक के भोजन की व्यवस्था का विधान है, वे लोग भला मनुष्यों से बैर कैसे कर सकते हैं? ऐसी संस्कृति जो समूचे विश्व को अपना कुटुम्ब मानती हो, जिसके आराध्य स्थल यानी मंदिरों में रोज़ाना सुबह–शाम धर्म की जय होने के साथ प्राणियों में सद्भावना और विश्व के कल्याण की कामना की जाती हो, वे लोग किसी दूसरे धर्म, विचार, नस्ल आदि किसी भी भिन्नता से बैर, विरोध या घृणा या ईर्ष्या कदापि नहीं रख सकते और जब उसी विचारधारा के लोगों को वर्ग विशेष द्वारा ऐसी संज्ञा दी जाए, जो उनके लिए अकल्पनीय हो, तो उन्हें एक संवाद स्थापित करना ही होगा यह स्वीकार करते हुए कि ‘हां वे असहिष्णु लोग हैं’…इसी शीर्षक के साथ एक पीड़ा को जीवंत कर समूचे विश्व से संवाद का अतुलनीय प्रयास किया है लोकेन्द्र सिंह ने...।
          हालांकि, लेखक ने पुस्तक में नीहित प्रस्तावना से पूर्व ही इसे ऐसी विभूतियों को समर्पित किया है जो झूठ, अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध सीना तानकर सदैव खड़े हो रहे हैं। ऐसे में पुस्तक का सार लेखक की इसी निष्ठा में ही प्रतीत होता है। कुल दो सौ पृष्ठों की इस पुस्तक में लेखक द्वारा अपने बहत्तर आलेखों को समन्वित किया है, इन आलेखों का समय देश में मौजूद राष्ट्रवादी विचारधारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक अनुषांगिक संगठन भारतीय जनता पार्टी की सरकार द्वारा सत्ता में रहकर देशसेवा के दौर का है। यदि सभी आलेखों के सार की बात करें तो ऐसा कोई आलेख नहीं मिलेगा, जिसमें उन लोगों से तर्कों के साथ यह संवाद करने की कोशिश की गई है, जिसमें कदम–कदम पर मौजूद सरकार और राष्ट्रवादी विचारधारा पर तरह–तरह के विभिन्न आरोपों की मूसलधार-सी की गई है।
          लेखक ने इस पुस्तक में शामिल आलेखों के द्वारा उन तमाम तथाकथित सहिष्णु लोगों से यह सवाल भी करने की चेष्टा की है कि आखिर उन्हें जब असहिष्णु करार दे ही दिया है, तो फिर उन असहिष्णुओं के ऐतिहासिक, धार्मिक, वैचारिक, मानवीय, सांस्कृतिक, पुरातन, पारम्परिक तमाम पहलुओं पर लगातार हमले क्यों किये जा रहे हैं? इसके साथ ही लेखक ने उन तमाम कृत्यों, हरकतों और बयानों (नारों) को सामने रखकर यह पूछने की भी चेष्टा की है कि एक विचारधारा के विरोध में किये गए सारे कृत्य धीरे–धीरे आखिर राष्ट्र विरोधी क्यों होते जा रहे हैं? अपनी बात में लेखक यह स्वयं कहते हैं कि बीते कुछ सालों से असहिष्णुता का ऐसा हौव्वा खड़ा किया गया है कि आम आदमी भी भौंचक्का-सा रह गया है। तमाम बुद्धिवादी लोग मैजिक बुलेट थ्यौरी का उपयोग करते हुए आम आदमी के आसपास ऐसा माहौल खड़ा करने पर आमादा हैं कि उसे स्वयं की असुरक्षा का डर पैदा हो जाए? सारे देश में यह माहौल भी बनाया जाता है कि उन्हें बोलने, खाने-पीने, अभिव्यक्ति के साथ ही तमाम तरह की आज़ादी से वंचित किया जा रहा है? असल में, वे जिस आज़ादी के छिनने का रूदन करते हैं, उसी आज़ादी का भरपूर उपयोग करते हुए आज भी स्वतंत्र हैं।
           निश्चित रूप से विभिन्न सारगर्भित चुनिंदा आलेखों में लेखक ने इसी सच्चाई को सामने लाने की एक कोशिश इस पुस्तक के सहारे की है। पेज नंबर 21– 22 का शीर्षक – ‘नाटक नहीं संवाद कीजिए’ आलेख हो या पेज नंबर 27–28 पर मौजूद शीर्षक – गांधी और बुद्ध का देश है भारत, या पेज नंबर 29–30 पर शीर्षक – क्या राष्ट्रपति की सुनेंगे साहित्यकार? और पेज नंबर 31–32 पर शीर्षक – भारत असहिष्णु या अतुल्य ? ये तमाम आलेख इस बात का प्रमाण है कि यदि राष्ट्रवादी विचारधारा के लोग असहिष्णु हैं तो वे आपसे सार्थक संवाद के साथ प्रगतिशीलता की बात क्यों कर रहे हैं?
          वहीं, सहिष्णुता पर नसीहत न दे पाकिस्तान, जायरा की माफी पर शर्मनाक चुप्पी, रामजस पर हल्ला, केरल पर चुप्पी क्यों? और 16 साल की आफरीन के विरुद्ध 46 मौलवी जैसे कई आलेख हैं, जो शूल से सवालों की तरह प्रतीत होते हैं।
          इस समूची पुस्तक में पाठकों को सबसे ज्यादा आकर्षित करने वाले दो आलेख प्रमुख हैं, जिसमें पेज नंबर 196 पर मौजूद ‘धन्यवाद जेन’ में लेखक एक जर्मन युवती को धन्यवाद ज्ञापित कर रहे हैं, जिनकी नज़रों में भारत और भारतीय समाज गर्वानुभूति कराता है, तो वहीं सबसे अंतिम आलेख जो एक टीस की तरह है कि तथाकथिक देशभक्त आसानी से किस तरह के दस नुस्खों को अपनाने से बना जा सकता है। पुस्तक में लेखक ने सीधी और सरल भाषा का उपयोग किया जो, आमजनों के ज़हन में मौजूद तमाम सवालों के साथ ही उनकी अपनी संस्कृति के संरक्षण के संकल्प को और भी दृढ़ करने में सहायक होगी। 
          इस पुस्तक के लेखक लोकेन्द्र सिंह की लेखनी में राष्ट्रवाद सहज ही झलकता है। वीरांगना लक्ष्मीबाई की रणभूमि ग्वालियर में जन्में लोकेन्द्र सिंह ने मूलत: स्वदेश ग्वालियर से पत्रकारिता का ककहरा सीखा। आपने नईदुनिया, दैनिक भास्कर, पत्रिका में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। वर्तमान में आप माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में सहायक प्राध्यापक हैं। आपकी पुस्तक ‘देश कठपुतलियों के हाथ में’ प्रमुख रूप से राजनीति और पत्रकारिता के मोहल्ले में खासी चर्चित रही तो वहीं इस पुस्तक के लिए ‘राष्ट्रीय पत्र लेखक मंच’ द्वारा आपका अभिनन्दन भी किया गया। आपके काव्य संग्रह ‘मैं भारत हूं’ ने भी साहित्य जगत का ध्यान आकर्षित किया। आप ‘अपना पंचू’ के माध्यम से ब्लॉग जगत में सक्रिय हैं। अर्चना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का मूल्य दो सौ रूपये है। नि:संदेह यह पुस्तक पत्रकारिता, साहित्य और राजनीति की नव पीढ़ी अर्थात् युवा तरुणाइयों को खासा आकर्षित करेगी, क्योंकि इस पुस्तक के माध्यम से लेखक ने पूरी सादगी, संजीदगी के साथ अपनी संस्कृति का परिचय कराते हुए यह भी संदेश दिया है कि यदि अपनी संस्कृति या राष्ट्र के प्रति प्रेम ही असहिष्णुता है तो हां ‘हम असहिष्णु हैं’…शायद यही कारण होगा जो पुस्तक का शीर्षक ‘हम असहिष्णु लोग’ रखा गया, जिसमें लेखक उन सहिष्णुओं से पूरी सहिष्णुता के साथ प्रश्न पूछ रहे हैं। अशेष मंगलकामनाएं, बधाई।
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पुस्तक :  हम असहिष्णु लोग
लेखक : लोकेन्द्र सिंह
प्रकाशक  : अर्चना प्रकाशन
17, दीनदयाल परिसर, ई-2 महावीर नगर,
भोपाल (मध्यप्रदेश)- 462016
दूरभाष  - 0755-4236865
मूल्य :  दो सौ रूपये मात्र  
18 फरवरी, 2018 को सुबह सवेरे में प्रकाशित "हम असहिष्णु लोग" की समीक्षा


रविवार, 23 सितंबर 2018

हैरतंगेज और रोमांचक नृत्य भवई

- लोकेन्द्र सिंह
भवई, राजस्थान के पारंपरिक लोक नृत्यों में से एक है। यह नृत्य बहुत कठिन है। हैरतंगेज और अत्यंत रोमांचक भी। जब नर्तकियां भवई की प्रस्तुति देती हैं, तो लोग दाँतों तले अंगुलियां दबा कर उनकी प्रस्तुति देखते हैं। भवई नृत्य के लिए लंबी नृत्य साधना की आवश्यकता होती है। कुशल कलाकार ही इस नृत्य की प्रस्तुति दे सकते हैं। भवई नृत्य में नर्तकियां अपने सिर पर 7 से 8 घड़े एक के ऊपर एक रखकर संतुलन बनाते हुए नाचती हैं। उसके बाद इस नृत्य को और अधिक रोमांचक बनाने के लिए यह नर्तकियां सिर पर घड़े रख कर काँच या अन्य धातु के गिलास पर पैर रखकर नाचती हैं। दर्शक सबसे अधिक हैरत में तब पड़ जाते हैं, जब यह कुशल नर्तकियां नंगी तलवारों के ऊपर चढ़ कर नाचती हैं। 
          मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में 11-12 अगस्त, 2018 को आयोजित 'यंग थिंकर्स कॉन्क्लेव' में राजस्थानी कलाकारों की भवई नृत्य की एक प्रस्तुति दी। उस शानदार प्रस्तुति की छोटी-सी वीडियो क्लिप की लिंक यहाँ दी हुई है। उस लिंक पर क्लिक करके आप भी रोमांचित करने वाले भवई नृत्य का आनंद ले सकते हैं। उल्लेखनीय है कि भवई नृत्य में पुरुष संगीतकार नर्तकियों के लिए पृष्ठभूमि संगीत बजाता है। संगीत के लिए कई यंत्र जैसे पखावज, ढोलक, झांझर, सारंगी और हार्मोनियम बजाए जाते हैं। आमतौर पर इसके साथ ही मधुर राजस्थानी लोक गीत भी संगीतकारों द्वारा गाया जाता है। नर्तकियों सहित सभी कलाकार राजस्थान के पारंपरिक रंगीन और सुंदर कपड़े पहनते हैं। 
          यह रहा भवई नृत्य का लिंक। 

शनिवार, 22 सितंबर 2018

समाधानमूलक प्रश्नोत्तरी

भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण
- लोकेन्द्र सिंह
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 'भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' व्याख्यान माला में अंतिम दिन अभ्यागतों के प्रश्नों के उत्तर दिए। प्रश्न वही थे, जो हमेशा संघ से पूछे जाते हैं किंतु इस बार यह प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण थे क्योंकि उनको समाधानमूलक उत्तरों ने पूर्ण कर दिया। संघ ने 'सनातन प्रश्नों' के उत्तर अधिकृत एवं सर्वोच्च पदाधिकारी के माध्यम से संपूर्ण समाज के सम्मुख रख दिए हैं। भले ही कोई उनसे सहमत हो या असहमत, किंतु अब कम से कम अनेक प्रश्नों पर संघ का अधिकृत पक्ष तो सार्वजनिक हो गया है। हालाँकि अनेक प्रश्नों के उत्तर संघ पूर्व में भी अपने कार्य-व्यवहार, अधिकृत वक्तव्यों एवं प्रस्तावों के माध्यम से समाज के सामने रख चुका है। कुल मिलाकर इस बौद्धिक यज्ञ की पूर्णाहुति लोक-विमर्श और लोक-व्यवहार को दिशा देने वाली रही। व्याख्यानमाला में शामिल अभ्यागतों के 215 प्रश्नों के उत्तर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने दिए। तीसरे दिन के आयोजन को कुछ नाम देना हो तो 'समाधानमूलक प्रश्नोत्तरी' दिया जा सकता है।

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

हिंदुत्व का अर्थ

भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण-3
- लोकेन्द्र सिंह 
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 'भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ का दृष्टिकोण' में हिंदुत्व पर बहुत ही महत्वपूर्ण विचार देश के सामने रखे हैं। उनके विचार हिंदुत्व की भारतीय संकल्पना को पूर्ण रूप से स्पष्ट करते हैं। 'हिंदुत्व' गाहे-बगाहे बौद्धिक और राजनीतिक जगत में चर्चा का विषय बना रहता है। दुर्भाग्य से भारत में कुछ ऐसी ताकतें हैं, जो भारतीय अवधारणाओं के प्रति सामान्य जन के मन में घृणा उत्पन्न करने का प्रयास करती रहती हैं। राष्ट्रवाद और हिंदुत्व ऐसे ही शब्द हैं, जिनको लेकर भारत विरोधी विचार से प्रेरित लोग सदैव नकारात्मक ढंग से बात करते हैं। हिंदुओं की नाराजगी से बचने के लिए आजकल उन्होंने 'हिंदुत्व' पर रणनीति बदल ली है। अब वह दो हिंदुत्व बताते हैं- कट्टर हिंदुत्व और सॉफ्ट हिंदुत्व। हिंदुत्व को श्रेणीबद्ध करते समय वह आगे कहते हैं कि आरएसएस का हिंदुत्व कट्टर है। हिंदुत्व को बदनाम करने के लिए चलने वाले इस षड्यंत्र के मुकाबले सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने बहुत ही सहजता से हिंदुत्व के विराट, उदार, सहिष्णु स्वरूप के दर्शन सबको कराए हैं। उन्होंने सकारात्मक ढंग से अपना विचार रखा।

बुधवार, 19 सितंबर 2018

संघ एक परिचय

'भविष्य का भारत: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' - 2 
- लोकेन्द्र सिंह
संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 'भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' विषय पर पहले दिन के व्याख्यान में संघ का परिचय प्रस्तुत किया। संघ की विकास यात्रा को देश-दुनिया के महानुभावों के सम्मुख रखा। सहज संवाद में अनेक प्रश्नों के उत्तर दिए। सबसे महत्वपूर्ण बात अपने संबोधन के प्रारंभ में उन्होंने कही- 'मैं यहां आपको सहमत करने नहीं आया, बल्कि संघ के बारे में वस्तुस्थिति बताने आया हूं।' यह कहते हुए उन्होंने बताया कि आप संघ के संबंध में अपना विचार बनाने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन, संघ के संबंध में वस्तुस्थिति जानकार आप अपना मत रखेंगे तो अच्छा होगा। उनका यह कहना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ज्यादातर लोग संघ के संबंध में टिप्पणी तो करते हैं किंतु उसके संबंध में बुनियादी जानकारी भी नहीं रखते हैं। इस संबंध में उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव का हालिया वक्तव्य उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है। व्याख्यानमाला का आमंत्रण मिलने पर उन्होंने कहा कि वह संघ के बारे में अधिक नहीं जानते हैं। स्वयं उन्होंने स्वीकारा कि वह संघ के संबंध में अधिक नहीं जानते, इसके बाद भी वह आगे कहते हैं कि वह इस आयोजन में नहीं जाएंगे, क्योंकि संघ पर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने प्रतिबंध लगाया था और जिन कारणों से प्रतिबंध लगाया गया था, वह कारण अभी तक समाप्त नहीं हुए हैं। यह एकमात्र उदाहरण नहीं है। देश के ज्यादातर राजनेता एवं अन्य लोग संघ के संबंध में जानकारी रखते नहीं है, इसके बाद भी संघ पर अनर्गल टिप्पणी करते हैं।

सोमवार, 17 सितंबर 2018

संघ की पहल

'भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' - 1
- लोकेन्द्र सिंह 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम पर सबकी नजर है। देश में भी और देश के बाहर भी। सब जानना चाहते हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा सांस्कृतिक संगठन आरएसएस ‘भविष्य का भारत’ को किस तरह देखता है? संघ का ‘भारत का विचार’ क्या है? दरअसल, यह उत्सुकता इसलिए भी है क्योंकि पिछले 93 वर्षों में कुछेक राजनीतिक/वैचारिक खेमों से संबद्ध राजनेताओं, लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर अनेक मिथक गढ़ दिए हैं। किंतु, संघ सब प्रकार के दुष्प्रचारों की चिंता न करते हुए समाज के बीच कार्य करता रहा और तमाम आरोपों का उत्तर अपने आचरण/कार्य से देता रहा। परिणामस्वरूप आज संघ का विस्तार ‘दशों दिशाओं...’ में हो गया है। उसके निष्ठावान स्वयंसेवक सबदूर ‘दल बादल...’ से छा गए हैं। इसके बावजूद व्यापक स्तर पर किए गए दुष्प्रचार के कारण समाज के कुछ हिस्सों में संघ को लेकर स्पष्टता नहीं है। एक विश्वास व्यक्त किया जा रहा है कि इस महत्वपूर्ण आयोजन से बहुत हद तक भ्रम और मिथक के बादल छंट जाएंगे।

रविवार, 16 सितंबर 2018

नर्मदा के तट पर हुई सांख्य दर्शन की रचना

भारतीय संस्कृति के प्रमुख दर्शनों में से एक है- "सांख्य दर्शन"। महाभारतकार वेद व्यास ने कहा है कि "ज्ञानं च लोके यदिहास्ति किंचित् सांख्यागतं तच्च महन्महात्मन्" (शांति पर्व 301.109)।  इसका अर्थ है- इस संसार में जो कुछ भी ज्ञान है, सब सांख्य से आया है। शान्ति पर्व के कई स्थलों पर सांख्य दर्शन के विचारों का बड़े काव्यमय और रोचक ढंग से उल्लेख किया गया है। 
       इस महत्वपूर्ण ग्रन्थ की रचना अमरकंटक में नर्मदा तट के किनारे पर कपिल मुनि ने की है। कपिल मुनि और सांख्य दर्शन से जुड़े उस स्थान को देखने के लिए यह वीडियो देखें...  


आग्रह : यूट्यूब चैनल "अपना वीडियो पार्क" को सब्सक्राइब अवश्य करें। लाइक, कमेंट और शेयर करने में संकोच न करें... नर्मदे हर 

शनिवार, 15 सितंबर 2018

‘हिन्दीपन’ से मिलेगा हिंदी को सम्मान


- लोकेन्द्र सिंह 
भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है। बल्कि, इससे इतर भी बहुत कुछ है। भाषा की अपनी पहचान है और उस पहचान से उसे बोलने वाले की पहचान भी जुड़ी होती है। यही नहीं, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रत्येक भाषा का अपना संस्कार होता है। प्रत्येक व्यक्ति या समाज पर उसकी मातृभाषा का संस्कार देखने को मिलता है। जैसे हिन्दी भाषी किसी श्रेष्ठ, अपने से बड़ी आयु या फिर सम्मानित व्यक्ति से मिलता है तो उसके प्रति आदर व्यक्त करने के लिए 'नमस्ते' या 'नमस्कार' बोलता है या फिर चरणस्पर्श करता है। 'नमस्ते' या 'नमस्कार' बोलने में हाथ स्वयं ही जुड़ जाते हैं। यह हिन्दी भाषा में अभिवादन का संस्कार है। अंग्रेजी या अन्य भाषा में अभिवादन करते समय उसके संस्कार और परंपरा परिलक्षित होगी। इस छोटे से उदाहरण से हम समझ सकते हैं कि कोई भी भाषा अपने साथ अपनी परंपरा और संस्कार लेकर चलती है। किसी भी देश की पहचान उसकी संस्कृति से होती है। संस्कृति क्या है? हमारे पूर्वजों ने विचार और कर्म के क्षेत्र में जो भी श्रेष्ठ किया है, उसी धरोहर का नाम संस्कृति है। यानी हमारे पूर्वजों ने हमें जो संस्कार दिए और जो परंपराएं उन्होंने आगे बढ़ाई हैं, वे संस्कृति हैं। किसी भी देश की संस्कृति उसकी भाषा के जरिए ही जीवित रहती है, आगे बढ़ती है। जिस किसी देश की भाषा खत्म हो जाती है तब उस देश की संस्कृति का कोई नामलेवा तक नहीं बचता है। यानी संस्कृति भाषा पर टिकी हुई है।

बुधवार, 29 अगस्त 2018

सिख विरोधी दंगा : जब एक व्यक्ति के अपराध का बदला पूरे समुदाय से लिया गया


- लोकेन्द्र सिंह 
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 1984 के सिख विरोधी दंगों पर गलत बयानी कर अपने लिए और अपनी पार्टी के लिए नया संकट खड़ा कर लिया है। राहुल गांधी ने उन पीडि़त परिवारों के जख्म भी हरे कर दिए हैं, जिन्होंने उन दंगों में अपनों को खोया था। इतिहास में ऐसा उदाहरण शायद ही कोई दूसरा मिले, जब एक सिर-फिरे व्यक्ति के अपराध की कीमत एक संप्रदाय से वसूली गई। यूरोप में घूम-घूम कर भारत और भारतीयता के संदर्भ में गलत बयानी कर रहे राहुल गांधी ने बहुत ही आसानी से कह दिया कि 1984 के सिख विरोधी दंगों में कांग्रेस की कोई भूमिका नहीं है। जबकि उनके पिताजी राजीव गांधी ने खुले मंच से 19 नवंबर, 1984 को अप्रत्यक्ष रूप से दंगों में कांग्रेस की भूमिका को स्वीकार करते हुए कहा था- 'जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है।' राजीव गांधी के इस बयान का अभिप्राय अपनी पार्टी के नेताओं द्वारा किए गए सिख बंधुओं के कत्लेआम को सामान्य की प्रतिक्रिया बता कर मामले को रफा-दफा करने से था।

सोमवार, 27 अगस्त 2018

भ्रम के जाले हटाएं राहुल गांधी

- लोकेन्द्र सिंह 
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को उनके किसी सलाहकार ने भ्रमित कर दिया है। जिसके कारण वह समझ नहीं पा रहे हैं कि राजनीति के मैदान में उन्हें भारतीय जनता पार्टी से मुकाबला करना है या फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से। अपने इस भ्रम के कारण वह उस संगठन का प्रचार-प्रसार करते रहते हैं, जो प्रसिद्धपरांगमुखता का पालन करते हुए सामाजिक कार्य में संलग्न है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर बार-बार अनर्गल टिप्पणी करने से न तो राहुल गांधी को कोई लाभ होने वाला है और न कांग्रेस के खाते में राजनीतिक लाभ आएगा। संघ समाज के बीच में काम करता है। इसलिए आमजन संघ को भली प्रकार जानते और समझते हैं। उसके प्रति घृणा और नफरत पैदा करने के कांग्रेस के सब प्रयत्न विफल होना तय है। वैसे भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर झूठा आरोप लगाने के एक मामले में राहुल गांधी न्यायालय के चक्कर काट रहे हैं।

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