न्यूयॉर्क व्याख्यान : ‘साझा मानवता’ का व्यावहारिक मार्ग
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| न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आरएसएस के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेसन' (Universal Oneness Celebration) कार्यक्रम को संबोधित किया |
न्यूयॉर्क की ऐतिहासिक धरा पर ‘एक विश्व : एक मानवता शिखर सम्मेलन’ में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का उद्बोधन वस्तुतः भारत के शाश्वत आध्यात्मिक बोध और 'वसुधैव कुटुंबकम्' की युगीन अभिव्यक्ति है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जहाँ भौतिकवादी होड़, वैचारिक संकीर्णता, युद्ध की विभीषिका और अविश्वास का अंधकार संपूर्ण मानवता को ग्रस रहा है, वहाँ यह कार्य-आह्वान विश्व को विनाश के गर्त से निकालकर एकात्मता के प्रकाश की ओर ले जाने वाला एक सशक्त मार्गदर्शक सिद्ध होगा। भारत की यह सनातन परंपरा रही है कि जब-जब संसार में घृणा, विभाजन और संघर्ष की लहरें उठी हैं, तब-तब यहाँ के ऋषियों, मनीषियों और विचारकों ने संपूर्ण सृष्टि को एक परिवार मानकर शांति और एकात्मता का संदेश दिया है। ऐसे में याद आता है स्वामी विवेकानंद का शिकागो व्याख्यान। विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद ने रक्त रंजित और युद्धरत विश्व को शांति एवं सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाया था। आज जब आधुनिक सभ्यता तकनीक की पराकाष्ठा पर पहुँचकर भी मानवीय संवेदनाओं के संकट से जूझ रही है, तब सरसंघचालक जी का यह उद्बोधन वैश्विक चिंतन को एक नई दिशा प्रदान करता है।
आरएसएस के सरसंघचालक डॉ भागवत के इस उद्बोधन का सबसे गहरा और व्यावहारिक पक्ष यह है कि यह किसी थोपी गई एकरूपता की बात नहीं करता, बल्कि विविधता के भीतर अंतर्निहित एकता के सत्य को प्रतिष्ठित करता है। एकात्म मानवदर्शन और भारतीय संस्कृति का मूल स्वर सदैव यही रहा है कि मार्गों की भिन्नता सत्य की एकता को बाधित नहीं करती। सरसंघचालक जी ने इस बात को अत्यंत स्पष्टता से रेखांकित किया कि दृढ़ विश्वास और भिन्न मतों के प्रति सम्मान एक साथ सह-अस्तित्व में रह सकते हैं। जब विश्व के विभिन्न समुदाय अपने-अपने आग्रहों और हठधर्मिता के कारण परस्पर टकराव की स्थिति में हैं, तब यह विचार अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि एकता के लिए एकरूपता की आवश्यकता नहीं है, बल्कि प्रत्येक मनुष्य में उसी एकात्म चैतन्य का दर्शन करना आवश्यक है। दूसरे की मानवता और गरिमा की रक्षा करना वास्तव में अपनी ही मानवता को समृद्ध करना है।
सरसंघचालक जी के भाषण में आत्म-निरीक्षण और उत्तरदायित्व का जो भाव प्रस्तुत किया गया है, वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उस मूल कार्यपद्धति का ही वैश्विक विस्तार है, जहाँ सुधार का आरंभ सदैव 'स्वयं' से होता है। समाज निर्माण अथवा विश्व शांति कोई बाह्य व्यवस्था नहीं है, अपितु यह व्यक्ति के भीतर से आरंभ होने वाली एक निरंतर साधना है। यह आह्वान कि हम सबसे पहले अपने ही आचरण, वचनों और संस्थाओं का परीक्षण करें, धर्म के नाम पर स्वार्थ, घृणा और हिंसा फैलाने वाली प्रवृत्तियों पर एक करारा प्रहार है। सच्चा धर्म कभी विभाजनकारी नहीं हो सकता; धर्म तो वह है जो सबको जोड़े, धारण करे और सबका अभ्युदय करे। जब कोई समाज अपने भीतर के दोषों को स्वीकार कर उन्हें दूर करने का साहस दिखाता है, तभी वह विश्व के समक्ष एक प्रामाणिक उदाहरण प्रस्तुत कर पाता है।
सच्ची सेवा और आत्मीयता का संदेश भी इस उद्बोधन का एक प्रमुख स्तंभ है। भारतीय चिंतन में सेवा केवल कोई परोपकार या सामाजिक उपक्रम नहीं है, बल्कि वह 'नर सेवा ही नारायण सेवा' का जीवंत प्रकटीकरण है। जब हम किसी भूखे, रोगी, विस्थापित या उपेक्षित मनुष्य की सेवा करते हैं, तो हम किसी पर दया नहीं कर रहे होते, बल्कि अपने ही विराट सामाजिक स्वरूप की उपासना कर रहे होते हैं। आज जब विश्व में सेवा के नाम पर प्रतिस्पर्धा, धर्मांतरण, श्रेय लेने की होड़ और वैचारिक वर्चस्व स्थापित करने के प्रयास दिखाई देते हैं, तब यह उद्बोधन स्मरण कराता है कि सेवा का मूल तत्व निःस्वार्थ समर्पण और मानव-पीड़ा का समूचा निवारण है। विपत्ति के समय किसी अन्य समुदाय को अकेला न छोड़ना और संकट आने से पहले ही आत्मीय संबंधों का निर्माण करना ही वह सुरक्षा कवच है जो भविष्य के संघर्षों को रोक सकता है।
सरसंघचालक जी के उद्बोधन का एक अन्य अत्यंत सामयिक और दूरगामी आयाम भविष्य के प्रति हमारे नैतिक उत्तरदायित्व तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों से जुड़ा है। तकनीक साधन हो सकती है, साध्य नहीं। यदि तकनीक का विकास मनुष्य की आध्यात्मिक चेतना, गरिमा और स्वतंत्रता का ह्रास करने लगे, तो वह प्रगति विनाशकारी सिद्ध होगी। भारत का दृष्टिकोण सदैव विज्ञान और आध्यात्मिकता के संतुलन का रहा है। विश्व को आज ऐसी प्रौद्योगिकी और नीतियों की आवश्यकता है जो विनाश के स्थान पर निर्माण करें, घृणा के स्थान पर सत्य को स्थापित करें और शक्ति के अहंकार को त्यागकर संपूर्ण सृष्टि के कल्याण में नियोजित हों।
कहना होगा कि यह संपूर्ण उद्बोधन केवल विचारों का विमर्श नहीं, बल्कि ठोस और स्थानीय स्तर पर किए जाने वाले कर्म का संकल्प है। बड़ी-बड़ी वैश्विक संधियों और सम्मेलनों की सार्थकता इसी बात पर टिकी होती है कि वे समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में क्या परिवर्तन लाते हैं। भारतीय चिंतन सदैव 'आचारः परमो धर्मः' यानी आचरण को ही सर्वोपरि मानता आया है। विश्व के सामने आज प्रश्नों की कमी नहीं है, कमी केवल उस निष्ठा और संकल्प की है जो कथनी को करनी में बदल सके। न्यूयॉर्क के मंच से गूंजा यह स्वर भारत की उस जागृत चेतना का उद्घोष है जो विश्व को टकराव के दलदल से निकालकर एकात्मता, बंधुत्व और शांति के पथ पर अग्रसर करने का सामर्थ्य रखती है। अब समय आ गया है कि विश्व इस संदेश के मर्म को समझे और एक साझा मानव-परिवार के निर्माण के लिए सक्रिय संकल्प के साथ आगे बढ़े।









