केन्द्र सरकार ने मिट्टी के संरक्षण के लिए जनांदोलन खड़ा करने का संकल्प लिया है। यह अत्यंत आवश्यक आंदोलन है, जिसे केवल सरकार के प्रयास से नहीं अपितु जनता (विशेषकर किसानों) की भागीदारी एवं समझदारी से ही सफल बनाया जा सकता है। मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के ग्राम रमासिया से केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राष्ट्रव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ की घोषणा की है। स्मरण रहे कि कृषि मंत्री स्वयं भी कृषक परिवार से आते हैं, इसलिए खेती के बारे में उनकी समझ अधिक जमीन और वास्तविक है। आज कृषि भूमि की जो स्थिति है, उसको लेकर सब ओर अनुत्तरित चिंता पसरी दिखायी देती है।
“मिट्टी बचेगी तो खेती बचेगी, किसान बचेगा”- यह केवल एक राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि यह हमारे कृषि क्षेत्र के अस्तित्व की सबसे बड़ी सच्चाई है। पिछले कुछ दशकों में अधिक उत्पादन की होड़ में हमने रासायनिक खादों और कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग किया है। हरित क्रांति के दौर में इसका तात्कालिक लाभ तो हमें मिला; देश खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हुआ, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम अब भयावह रूप में सामने आ रहे हैं। रसायनों के अत्यधिक प्रयोग से ‘धरती माता’ की प्राकृतिक उर्वरक क्षमता घट रही है और मिट्टी में मौजूद लाभदायक सूक्ष्म जीव नष्ट हो गए हैं। इसका सीधा असर यह हुआ है कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि उत्पादन और मुनाफा घट रहा है।
यहाँ उल्लेख करना होगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी इस दिशा में अपने स्तर पर जन जागरूकता के प्रयास कर रहा है, जो उसकी समाजोन्मुखी दृष्टि को रेखांकित करता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देशव्यापी ‘भूमि सुपोषण अभियान’ चला रखा है, जिसके तहत संघ के कार्यकर्ता सीधे किसानों के बीच जा रहे हैं और उन्हें भूमि के संरक्षण के लिए जागरूक और प्रोत्साहित कर रहे हैं। इस अभियान में भूमि के प्रति मातृत्व का भाव पैदा करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। संघ के इन प्रयासों का सकारात्मक परिणाम भी मिल रहा है लेकिन अभी भी इस आंदोलन को और व्यापक आधार देने की आवश्यकता है।
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| मध्यप्रदेश के गोविंदनगर में भूमि सुपोषण का प्रशिक्षण देते आरएसएस के कार्यकर्ता |
किसानों को धैर्य के साथ आत्मचिंतन और स्व-मूल्यांकन करना होगा कि जिस भूमि/मिट्टी से उनकी पहचान है, उसके स्वास्थ्य की स्थिति क्या है? उन्हें यह भी विचार करना होगा कि इसी प्रकार अंधाधुंध रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग होता रहा है, तो क्या खेत बचेंगे और खेत नहीं बचेंगे, तब क्या किसान बचेंगे? किसान नहीं बचेंगे, तब देश का भविष्य क्या होगा?
‘खेत बचाओ अभियान’ की सफलता सीधे तौर पर किसानों की सहभागिता और उनकी जागरूकता पर निर्भर करती है। 1 से 30 जून तक देशभर में चलाया जा रहा यह अभियान, समय की मांग के अनुरूप उठाया गया सार्थक कदम है। इस अभियान का सबसे मजबूत पक्ष यह है कि यह केवल सरकारी कार्यालयों तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि वैज्ञानिकों, विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञों और अधिकारियों को सीधे गांवों और खेतों तक पहुंचाने की योजना है।
इस अभियान के अंतर्गत हर किसान के लिए ‘मृदा स्वास्थ्य कार्ड’ की अनिवार्यता इस दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगी। जैसे मनुष्यों को स्वस्थ रहने के लिए अपनी शारीरिक कमियों के अनुसार पोषण की आवश्यकता होती है, वैसे ही मिट्टी को भी आवश्यकता के हिसाब से उर्वरक चाहिए। जब किसान अपनी मिट्टी की प्रकृति और उसकी वास्तविक आवश्यकता को समझेगा, तभी वह संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करेगा। इससे बेवजह रसायनों पर खर्च होने वाला पैसा बचेगा और खेती की लागत घटेगी। इसका सीधा लाभ किसान को मिलेगा।
इस पूरे अभियान को महिला सशक्तिकरण से जोड़ना भी एक दूरदर्शी कदम है। कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी सर्वाधिक होती है; ऐसे में स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से उन्हें प्रशिक्षण, वित्तीय सहयोग और स्वरोजगार से जोड़ना ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ को मजबूत करेगा। कुल मिलाकर कहना है कि ‘खेत बचाओ अभियान’ को केवल एक महीने के सरकारी कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह धरती को बंजर होने से बचाने का एक राष्ट्रीय संकल्प है। जन-प्रतिनिधियों, वैज्ञानिकों और सबसे बढ़कर स्वयं किसानों को इस महायज्ञ में सक्रिय रूप से भाग लेना होगा। जब किसान जागरूक होगा और पारंपरिक ज्ञान के साथ वैज्ञानिक पद्धतियों का तालमेल बिठाएगा, तभी हमारी मिट्टी की खोई हुई सेहत वापस लौटेगी और भारतीय कृषि एक सुरक्षित, टिकाऊ एवं समृद्ध भविष्य की ओर कदम बढ़ा सकेगी। सही मायने में, मिट्टी की सेहत ही देश के सुरक्षित भविष्य की गारंटी है।
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| मध्यप्रदेश के गंजबासौदा के ग्राम झूकर जोगी में किसानों को 'भूमि सुपोषण' का महत्व बताते आरएसएस के कार्यकर्ता |




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