जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की शोध रिपोर्ट ‘दिल्ली में अवैध अप्रवासी : सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिणामों का विश्लेषण’ को गंभीरता से देखने की आवश्यकता है। यह रिपोर्ट जनसांख्यकीय असंतुलन के भयावह परिणामों की ओर से संकेत करती है। अवैध अप्रवासियों से न केवल सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां उत्पन्न होती हैं, अपितु लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी खतरा उत्पन्न हो जाता है। जेएनयू की रिपोर्ट बताती है कि बांग्लादेश और म्यांमार से रोहिंग्या सहित अन्य मुस्लिम आबादी बड़ी संख्या में घुसपैठ करके दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों में बस गई है। इसके कारण दिल्ली की डेमोग्राफी में बदलाव आया है, जो दिल्ली आज से 10-15 साल पहले हुआ करती थी, आज नहीं है। अवैध अप्रवासियों के कारण अर्थव्यवस्था बर्बाद हो रही है। संसाधनों पर भी दबाव बढ़ा है। स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था पर भी असर पड़ा है। जो मजदूर वर्ग कल तक हरियाणा, पूर्वांचल, ओडिशा, केरल के लोग होते थे, वे अब रोहिंग्या हैं। इन अवैध घुसपैठियों के कारण भारतीय नागरिकों से मजदूरी सहित अन्य काम छिन गया है।
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गुरुवार, 6 फ़रवरी 2025
शनिवार, 17 जुलाई 2021
बेहतर जीवन के लिए आवश्यक है जनसंख्या नियंत्रण
उत्तरप्रदेश की योगी सरकार देश में सर्वाधिक जनसंख्या वाले प्रदेश के लिए जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने जा रही है। 11 जुलाई को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तरप्रदेश जनसंख्या विधेयक-2021 के मसौदे के बारे में स्वयं लोगों को जानकारी दी। दरअसल, विपक्षी राजनीतिक एवं उनके सहयोगी बुद्धिजीवी अत्यंत आवश्यक कानून को भी सांप्रदायिक रंग देने का प्रयास करने लगे थे। तथाकथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी वर्ग का दोगलापन एवं पाखंड अब खुलकर सामने आ गया है। उत्तरप्रदेश जनसंख्या विधेयक किसी एक संप्रदाय की जनसंख्या को रोकने का एजेंडा नहीं है। यह कानून सब पर एक समान रूप से लागू होगा। यह कानून किसी विशेष संप्रदाय को लक्षित करके तैयार नहीं किया गया है। इसके बावजूद विपक्षी नेता एवं अन्य लोग जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास को मुुस्लिम विरोधी बता रहे हैं। जबकि यही लोग यह दावा भी करते हैं कि मुस्लिमों की जनसंख्या दर में हिन्दुओं की अपेक्षा कमी आई है। यानी अब मुस्लिम भी सात-आठ बच्चे पैदा नहीं कर रहे बल्कि वे भी हम दो-हमारे दो की अवधारणा पर चल रहे हैं। जब यह सच है कि मुसलमानों ने आधुनिक सोच के साथ कदमताल करना शुरू कर दिया है, तब यह कानून उनके विरुद्ध कैसे हो सकता है?
रविवार, 2 अप्रैल 2017
अल्पसंख्यक कौन?
भारत के राज्य जम्मू-कश्मीर में बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक का मुद्दा बड़ी बहस में तब्दील हो सकता है। इस मसले पर बहस होनी भी चाहिए। देश के उच्चतम न्यायालय ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए कहा है कि केंद्र और राज्य सरकार को आपस में बातचीत करके इस मसले का हल खोजना चाहिए चाहिए कि राज्य में मुस्लिम समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा मिलते रहने देना चाहिए या नहीं? उन्होंने चार सप्ताह में इस मुद्दे पर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। ध्यान देने की बात यह है कि उच्चतम न्यायालय ने इस मुद्दे को महत्त्वपूर्ण माना है। यकीनन यह बहुत महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। राज्य के लिए ही नहीं, बल्कि देश के संदर्भ में भी इस पर व्यापक बहस की जानी चाहिए। आखिर किस सीमा तक किसी समाज को अल्पसंख्यक माना जाना चाहिए? अल्पसंख्यक दर्जे को पुन: परिभाषित करने की जरूरत है। यह संवेदनशील मुद्दा है। इस पर बहस के अपने खतरे भी हैं। लेकिन, तमाम खतरों के प्रभाव को कम करने के उपाय खोजते हुए इस विषय पर एक गंभीर और सकारात्मक बहस की जरूरत है।
बुधवार, 15 फ़रवरी 2017
हिंदू आबादी घटने पर विवाद नहीं चिंता करनी चाहिए
अरुणाचल प्रदेश में हिंदू जनसंख्या के सन्दर्भ में केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू के बयान पर कुछ लोग विवाद खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। जबकि उनका बयान एक कड़वी हकीकत को बयां कर रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि उनके बयान पर वो लोग हायतौबा मचा रहे हैं, जो खुद को पंथनिरपेक्षता का झंडाबरदार बताते हैं। हिंदू आबादी घटने के सच पर विवाद क्यों हो रहा है, जबकि यह तो चिंता का विषय होना चाहिए। जनसंख्या असंतुलन आज कई देशों के सामने गंभीर समस्या है, लेकिन हमारे नेता इस गम्भीर चुनौती को भी क्षुद्र मानसिकता के साथ देख रहे हैं।
बुधवार, 28 सितंबर 2016
सामने आया कैराना का सच
अब यह साबित हो चुका है कि उत्तरप्रदेश में कानून व्यवस्था संभालने में समाजवादी पार्टी की सरकार और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव असफल रहे हैं। लगभग साढ़े तीन महीने पहले उत्तर प्रदेश के कैराना में हिंदू समुदाय की पलायन की खबरें सामने आई थीं। यह पलायन चर्चा के केंद्र में लंबे समय तक रहा। इस गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे पर तथाकथित सेकुलर जमात ने न केवल आँखें बंद कर ली थीं, बल्कि हिंदू पलायन को पूरी तरह खारिज कर दिया था। हिंदुओं के पलायन को खारिज करने के लिए इस सेकुलर जमात ने एक से बढ़कर एक कुतर्क गढ़े थे। यहाँ तक की कैराना जाकर फर्जी तथ्यों या अपवाद के आधार पर यह साबित करने का पूरा प्रयास किया कि कैराना से पलायन स्वाभाविक है। यह पलायन रोजगार और बेहतर जीवन के लिए हुआ है। मीडिया के एक धड़े ने भी इस जमात को भरपूर सहयोग दिया था। लेकिन, मानवाधिकार आयोग ने इन ढ़ोंगी सेकुलरों का मुँह नोंच लिया है। इनके झूठ को उजागर कर दिया है। मानवाधिकार आयोग ने अपनी जाँच में पाया है कि हिंदू परिवारों का पलायन सत्य है, कोई झूठ नहीं। पलायन की मुख्य वजह भी मुस्लिम समाज के दबंगों की गुंडागर्दी है।
बुधवार, 15 जून 2016
उत्तरप्रदेश में हिन्दू पलायन को क्यों हुए मजबूर?
उत्तरप्रदेश में कानून का राज खत्म-सा हो गया है। पुलिस प्रशासन मूक बना हुआ है। गुंडागर्दी चरम पर है। कैराना से करीब 346 हिन्दू परिवार आए दिन की सांप्रदायिक गुंडागर्दी से आजिज आकर पलायन कर गए, लेकिन सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। सरकार की अनदेखी का कारण है, वोटबैंक। हिन्दू परिवारों को परेशान करने वाला समुदाय समाजवादी पार्टी का मतदाता है। इसीलिए सपा सरकार आँखों पर पट्टी बाँधकर बैठ गई है। इतने बड़े पैमाने पर हिन्दू परिवारों का पलायन कोई छोटी घटना नहीं है। यह पलायन कितना खतरनाक साबित हो सकता है, इसे समझने के लिए हमें जम्मू-कश्मीर का इतिहास उलटकर देखना चाहिए। वहाँ भी मुस्लिम समुदाय ने हिन्दुओं के सामने ऐसी परिस्थितियां खड़ी कर दी थीं कि उन्हें अपने पुरुखों की जमीन-जायदात छोड़कर अपने ही देश में निर्वासित होकर रहना पड़ रहा है। कैराना की घटना का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तब स्पष्ट होता है कि यह घटना भी जम्मू-कश्मीर के षड्यंत्र से मेल खाती है। कैराना में हिन्दू कारोबारियों से जबरन हफ्ता वसूला जा रहा है। उनके साथ मारपीट की जा रही है। बहू-बेटियों का घर से बाहर निकला मुश्किल कर दिया गया है। यदि वक्त रहते इस तरह के वातावरण को नहीं बदला गया तब वह दिन दूर नहीं होगा जब कैराना सहित उत्तरप्रदेश के अन्य हिस्से जम्मू-कश्मीर में तब्दील हो जाएंगे।
गुरुवार, 27 अगस्त 2015
समान नागरिक संहिता से रुकेगा जनसंख्या असंतुलन
भा रत सरकार ने जनगणना-2011 के धर्म आधारित आंकड़ों का लेखा-जोखा जारी कर दिया है। आंकड़ों के मुताबिक देश की आबादी में भारत के मूल धर्मावलम्बी हिंदुओं की जनसंख्या लगभग 96.63 करोड़ है यानी कुल आबादी का 79.8 प्रतिशत। ऐसा पहली बार हुआ है कि देश की जनसंख्या में हिंदुओं की भागीदारी 80 प्रतिशत से नीचे पहुंची हो। जबकि मुस्लिम आबादी 24.6 प्रतिशत की वृद्धि दर से बढ़ रही है। मुसलमानों की जनसंख्या 14.2 प्रतिशत हो गई है। यानी देश में करीब 17.22 करोड़ मुसलमान रह रहे हैं। जनगणना-2001 के आंकड़ों में मुसलमानों की आबादी 13.4 प्रतिशत थी, जिसमें 0.8 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। मुस्लिम जनसंख्या का वास्तविक आंकड़ा इससे अधिक हो सकता है। क्योंकि, बांग्लादेश से घुसपैठ करके भारत में आकर बस गए मुस्लिम आमतौर पर वापस बांग्लादेश भेजे जाने के डर से अपनी धार्मिक पहचान छिपाकर खुद को हिन्दू बिहारी या हिन्दू बंगाली बताते हैं। धर्म की जानकारी नहीं देने वालों की भी संख्या करीब 29 लाख है। यह आंकड़ा भी इस ओर संकेत देता है कि वास्तविक मुस्लिम जनसंख्या सरकारी रिकॉर्ड में दिखाए गए आंकड़ों से अधिक हो सकती है। तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवी जनसंख्या के आंकड़ों पर शुतुरमुर्ग की तरह व्यवहार कर सकते हैं। तेजी से हो रहा जनसंख्या असंतुलन उन्हें दिखाई न दे या हिन्दुओं की घटती और मुसलमानों की बढ़ती आबादी से उन्हें किसी प्रकार की समस्या न हो। लेकिन, भारत का बहुसंख्यक समाज इन आंकड़ों से जरूर चिंतित है।
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