सोमवार, 31 दिसंबर 2018

दूध धारा : नर्मदा के इस जल प्रपात का ऋषि दुर्वासा से है संबंध

- लोकेन्द्र सिंह -
कपिल धारा से उतरकर तकरीबन 200 मीटर की दूरी पर नर्मदा का एक और जल प्रपात है, जिसे दूध धारा कहते हैं। दरअसल, इस जल प्रपात में पानी इतनी तेजी से गिरता है कि उसका रंग दूध की तरह धवल दिखाई देता है। और भी जनश्रुति हैं, इस नाम के पीछे। अपने क्रोधि स्वभाव के लिए विख्यात ऋषि दुर्वासा ने यहाँ तपस्या की थी। उनके ही नाम पर यहाँ नर्मदा की धारा का नाम 'दुर्वासा धारा' पड़ा, जो बाद में अपभ्रंस होकर 'दूध धारा' हो गया। यह भी माना जाता है कि ऋषि दुर्वासा की तपस्या से प्रसन्न होकर माँ नर्मदा ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए और उन्हें दुग्ध पान कराया था, तभी से यहाँ नर्मदा की धारा का नाम दूध धारा पड़ गया। ऋषि दुर्वासा दूध के समान धवल नर्मदा जल से प्रतिदिन शिव का अभिषेक करते थे। 

         

रविवार, 30 दिसंबर 2018

कपिल धारा : 100 फीट की ऊंचाई से गिरती दो धाराएं



- लोकेन्द्र सिंह -
नर्मदा उद्गम स्थल से लगभग 6 किमी दूर स्थित है कपिल धारा। यह स्थान अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए तो प्रसिद्ध है ही, आध्यात्मिक ऊर्जा की दृष्टि से भी महत्त्व रखता है। यहाँ प्राचीन काल में ऋषि-मुनि साधना करते थे। यह ऋषि कपिल मुनि का तपस्थल है। माना जाता है कि सांसारिक दु:खों से निवृत्ति और तात्विक ज्ञान प्रदान करने वाले 'सांख्य दर्शन' की रचना कपिल मुनि ने इसी स्थान पर की थी। जैसे ही हम इस स्थान पर पहुँचते हैं, हमें कपिल मुनि का आश्रम या कहें कि मंदिर दिखाई देता है। उन्हीं के नाम पर इस स्थान पर बनने वाले जलप्रपात का नाम कपिल धारा पड़ा है। 
वीडियो देखें : प्रकृति प्रेमियों के लिए अमरकंटक में दो खूबसूरत झरने - कपिल धारा और दूध धारा

         

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

माई की बगिया : जहाँ छुटपन में खेला करती माँ नर्मदा

- लोकेन्द्र सिंह -
नर्मदाकुंड से पूर्व दिशा की ओर लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर माई की बगिया स्थित है। यह बगिया माँ नर्मदा को समर्पित है। यह स्थान हरे-भरे बाग की तरह है। एक छोटा-सा मंदिर है। यहाँ एक कुण्ड भी है, जिसे चरणोदक कुण्ड के नाम से जाना जाता है। एक मान्यता है कि नर्मदा का वास्तविक उद्गम स्थल यही स्थान है। माई की बगिया में निकली जलधारा ही आगे जाकर वर्तमान नर्मदा उद्गम मंदिर में निकली है।
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          एक दूसरी मान्यता यह है कि इस बाग को नर्मदा मैया के खेलने-कूदने के लिए बनाया गया था। छुटपन में नर्मदा अपनी सखी जोहिला सहित अन्य के साथ यहाँ खेला करती थीं। पूजा-अर्चना के लिए भी इसी स्थान से माँ नर्मदा पुष्प चुना करती थी। दूसरी मान्यता कहीं न कहीं पहली मान्यता को स्थापित करती प्रतीत होती है। माई की बगिया परिक्रमावासियों का एक पड़ाव भी है। माँ नर्मदा की परिक्रमा के लिए निकले श्रद्धालुओं को यहाँ देखा जा सकता है। वे सब आनंद से यहाँ ठहरते हैं। थोड़ा विश्राम करते हैं। माई के भजन करते हुए भोजन प्रसादी तैयार कर उसे प्राप्त करते हैं।
          माई की बगिया का और भी महत्त्व है। नेत्र औषधि के दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण पौधे गुलबकावली की जन्म स्थली भी माई की बगिया है। गुलबकावली पुष्प के अर्क से आयुर्वेदिक 'आईड्राप' तैयार किया जाता है। अमरकंटक के वैद्य ही नहीं, अपितु सामान्य नागरिक भी बहुत सरल विधि से गुलबकावली के फूल से नेत्र औषधि तैयार कर लेते हैं। अमरकंटक इस बात के लिए भी प्रसिद्ध है कि यहाँ के जंगलों में प्रचूर मात्रा में जड़ी-बूटी पाई जाती हैं।



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मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

माँ नर्मदा मंदिर, उद्गम स्थल


- लोकेन्द्र सिंह - 
अमरकंटक में जब हम नर्मदा उद्गम स्थल के समीप पहुँचते हैं, तब धवल रंग के मंदिरों का समूह बरबस ही हमें आकर्षित करता है। 24 मंदिरों वाले इसी परिसर में स्थित है नर्मदा कुण्ड, जहाँ से सदानीरा माँ नर्मदा का उद्गम हुआ है। श्री नर्मदा मंदिर के निर्माण के संबंध में कोई प्रमाण उपलब्ध नही हैं। यह मंदिर बहुत प्राचीन हैं। मंदिरों का निर्माण किसने कराया, यह भी कहा नहीं जा सकता। चूँकि माँ नर्मदा के उद्गम कुण्ड में रेवा नायक की प्रतिमा स्थित है। इसलिए यह माना जा सकता है कि प्रारंभिक तौर पर माँ नर्मदा मंदिर का निर्माण रेवा नायक नाम के व्यक्ति ने कराया होगा। रेवा नायक के नाम पर ही माँ नर्मदा का एक नाम रेवा है। आठवीं शताब्दी में आदि गुरु शंकराचार्य ने यहाँ बंसेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना की और नर्मदा कुण्ड बनवाया। उस समय यहाँ बांस के बहुत पेड़ थे, इसलिए आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित महादेव को बंसेश्वर महादेव कहा गया। बाद में, अन्य राजाओं-महाराजाओं ने मंदिर परिसर के निर्माण में अपना योगदान दिया है। 
माँ नर्मदा मंदिर और उद्गम स्थल वीडियो में देखें - 

         

रविवार, 23 दिसंबर 2018

एक चतुर कलाकार की तरह राजनीतिक/धार्मिक कार्ड खेल गए नसीरुद्दीन शाह

- लोकेन्द्र सिंह - 
भारतीय सिनेमा के वरिष्ठ अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने अपने विवादित बयान से एक बार फिर असहिष्णुता की बहस को जिंदा कर दिया है। एक ओर नसीर कह रहे हैं कि उन्हें भारत में डर लगता है, वहीं पाकिस्तान में यातनाएं झेल कर भारत सरकार के प्रयास से वापस लौटे हामिद नेहाल अंसारी अपने देश में सुकून महसूस कर रहे हैं। अब कौन सही है, नसीर साहब या हामिद? नसीरुद्दीन को इस देश ने बहुत सम्मान और प्रसिद्धि दी है। यह देश उनकी कला का प्रशंसक है। किंतु, नसीर अपने देश को क्या लौटा रहे हैं? आज कुछेक घटनाओं को आधार बना कर नसीर कह रहे हैं- 'मैं अपने बच्चों के लिए चिंतित हूं क्योंकि कल को अगर भीड़ उन्हें घेरकर पूछती है कि तुम हिंदू हो या मुसलमान? तो उनके पास इसका कोई जवाब नहीं होगा। यह मुझे चिंतित करता है और मैं हालात को जल्द सुधरते हुए नहीं पा रहा हूं।' उन्हें यह डर तब क्यों नहीं लगता, जब जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पंडितों को चिह्नित कर के मारा और भगाया गया। उन्हें यह डर तब क्यों नहीं लगता, जब कैराना से हिंदुओं का पलायन कराया जाता है? नसीर साहब दुनिया देखती है कि वह भीड़ कौन-सी है जो घेर कर धर्म पूछती है और कुरान की आयत नहीं सुनाने वालों को गोलियों से भून देती है। शुक्र है कि आपके बच्चों को कुरान की आयतें तो याद हैं। जब उन्हें भीड़ घेरेगी तो आयतें सुनाकर वह जान बचा लेंगे, लेकिन उनका क्या होगा जिन्हें रामायण की चौपाई और गीता के श्लोक याद हैं?

गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

हिंदू राष्ट्र पर उच्च न्यायालय का अभिमत

- लोकेन्द्र सिंह -
मेघालय के उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय नागरिकता पंजीयन प्रकरण की सुनवाई करते हुए भारत के संदर्भ में जो कहा, उसके बाद देशव्यापी विमर्श खड़ा हुआ। एक ओर कथित सेकुलर बिरादरी उच्च न्यायालय की टिप्पणी से असहज हो गई। उसे संविधान की याद आई। वहीं, दूसरी ओर उच्च न्यायालय की टिप्पणी ने भारत के 'हिंदू राष्ट्र' होने की अवधारणा को पुष्ट किया। उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एसआर सेन ने विभाजन और हिंदुओं पर हुए अत्याचार का जिक्र करते हुए कहा- 'पाकिस्तान ने स्वयं को इस्लामिक देश घोषित किया। चूंकि विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था। इसलिए भारत को भी स्वयं को हिंदू राष्ट्र घोषित करना चाहिए था।' स्पष्ट है कि इस टिप्पणी के बाद देश में दो तरह का विमर्श प्रारंभ होना ही था। जो लोग उच्च न्यायालय की इस टिप्पणी की निंदा कर रहे हैं, उन्हें जरा निरपेक्ष भाव से न्यायमूर्ति के कहे पर चिंतन करना चाहिए। क्या उन्होंने उचित नहीं कहा कि इस देश का विभाजन धर्म के नाम पर किया गया? एक हिस्सा इस्लामिक राष्ट्र के नाम पर बनाया गया तो दूसरा स्वत: ही हिंदू राष्ट्र नहीं बनना चाहिए था?

मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

पत्रकारिता की पाठशाला : जहाँ कलम पकड़ना सीखा

- लोकेन्द्र सिंह -
एक उम्र होती है, जब अपने भविष्य को लेकर चिंता अधिक सताने लगती है। चिकित्सक बनें, अभियंत्री बनें या फिर शिक्षक हो जाएं। आखिर कौन-सा कर्मक्षेत्र चुना जाए, जो अपने पिण्ड के अनुकूल हो। वह क्या काम है, जिसे करने में आनंद आएगा और घर-परिवार भी अच्छे से चल जाएगा? इन सब प्रश्नों के उत्तर अंतर्मन में तो खोजे ही जाते हैं, अपने मित्रों, पड़ोसियों और रिश्तेदारों से भी मार्गदर्शन प्राप्त किया जाता है। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण वह उम्र मेरे सामने समय से थोड़ा पहले आ गई थी। पिताजी का हाथ बँटाने के लिए तय किया कि अपन भी पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी करेंगे। शुभचिंतकों ने कहा कि नौकरी के सौ तनाव हैं, जिनके कारण पढ़ाई पर विपरीत असर पड़ेगा। लेकिन, मेरे सामने भी कोई विकल्प नहीं था। प्रारंभ से ही मेरी रुचि पढऩे-लिखने में रही है। अखबारों में पत्र संपादक के नाम लिखना और पत्र-पत्रिकाओं द्वारा आयोजित निबंध/लेख प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर पत्र-पुष्प भी प्राप्त करता रहा। मेरा मार्गदर्शन करने वाले लोग मेरे इस स्वभाव से भली प्रकार परिचित थे। तब उन्होंने ही सुझाव दिया कि मुझे पत्रकारिता को अपना कर्मक्षेत्र बनाना चाहिए। हालाँकि उस समय अपने को पत्रकारिता का 'क-ख-ग' भी नहीं मालूम था। तब तय हुआ कि इसके लिए स्वदेश में प्रशिक्षण प्राप्त किया जा सकता है। वहाँ पत्रकारिता का ककहरा सीखने के साथ-साथ बिना तनाव के जेबखर्च भी कमाया जा सकता है। इस संबंध में स्वदेश, ग्वालियर के संपादक लोकेन्द्र पाराशर जी और मार्गदर्शक यशवंत इंदापुरकर जी से मेरा परिचय कराया गया। उन्होंने मेरे मन को खूब टटोला और स्वदेश में तीन माह तक बिना वेतन के प्रशिक्षु पत्रकार रखने का प्रस्ताव दिया। तय हुआ कि काम सीख जाने पर तीन माह बाद मानदेय मिलना प्रारंभ हो सकेगा। मैंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

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