कथित विवादास्पद टिप्पणी के मामले में मुस्लिम समुदाय की ओर से किए जा रहे प्रदर्शन रुकने की बजाय हिंसक होते जा रहे हैं। यह स्थिति चिंताजनक है। इन प्रदर्शनों से भविष्य के लिए गंभीर संकेत मिल रहे हैं। जिस छोटे से घटनाक्रम का पटाक्षेप भाजपा प्रवक्ताओं के खेद प्रकट करने के साथ ही हो जाना चाहिए था, वह प्रवक्ताओं के निलंबन और पुलिस प्रकरण दर्ज होने के बाद भी थम नहीं रहा है। शुक्रवार को नमाज के बाद जिस तरह देश के विभिन्न शहरों में सड़कों पर निकलकर धर्मांध भीड़ ने हिंसक प्रदर्शन किए हैं, उससे इस वर्ग की मानसिकता भी प्रकट होती है। एक ऐसी टिप्पणी पर यह वर्ग हिंसातुर हो गया है, जिसका जिक्र उनकी किताबों में है और प्रमुख मुस्लिम प्रवक्ता उस बात का उल्लेख करते रहते हैं। जबकि इस वर्ग के लोगों की ओर से पिछले दिनों में भगवान शिव के लिए कितनी ही ओछी और अश्लील बातें कही गई हैं, लेकिन न तो हिन्दू समाज ने हिंसक प्रदर्शन किए और न ही किसी का सिर काटने पर ईनाम की घोषणा की। किसी हिन्दू संगठन या हिन्दू धर्मगुरु ने सड़कों पर हिंसा करने के लिए उकसाने वाले भाषण भी नहीं दिए हैं। शिव की तरह हिन्दू समाज गरल को अपने कंठ में धारण करके बैठ गया है। मानवता के लिए कुछ कड़वी बातों को सहन कर ही लेना उचित होता है। यह धैर्य अन्य संप्रदायों को हिन्दू समाज से सीखना चाहिए।
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शनिवार, 11 जून 2022
बुधवार, 1 दिसंबर 2021
इस्लामिक कानूनों की माँग का औचित्य
भारत जैसे देश में इस्लामिक संगठन यदि ‘ईशनिंदा’ जैसे विवादित कानून की माँग कर रहे हैं, तब इस ओर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। जरा यह भी देखने की आवश्यकता है कि सेकुलर बुद्धिजीवी इस तरह के कानूनों की माँग का विरोध करने की जगह किस कोने में दुबक गए हैं? जब भी देश में समान नागरिक संहिता जैसे सेकुलर कानून की माँग उठती है तब यही बुद्धिजीवी उछल-उछलकर विरोध करते हैं। स्पष्ट है कि वे कहने के लिए सेकुलर हैं, लेकिन उनका आचरण घोर सांप्रदायिक है। उनके व्यवहार में हिन्दू विरोध और इस्लामिक तुष्टीकरण की झलक दिखाई देती है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने हाल ही में सम्पन्न हुई अपनी एक बैठक में भारत में पाकिस्तान के उस कानून को लागू करने का प्रस्ताव पारित किया है, जिसके तहत मोहम्मद पैगंबर साहब या कुरान के संबंध में अपमानजनक, आपत्तिजनक या आलोचनात्मक बात कहने पर मृत्युदंड का प्रावधान है। पाकिस्तान में इस कानून का दुरुपयोग सुधारवादी मुस्लिमों के विरुद्ध ही नहीं अपितु गैर-मुस्लिमों को भयाक्रांत करने और उन्हें दबाने के लिए किया जाता है। यह भी देखने में आया है कि सामान्य बात को भी ‘ईशनिंदा’ बताकर अनेक गैर-मुस्लिमों को प्रताडि़त और दंडित किया गया है। क्या भारत जैसे देश में इस प्रकार के सांप्रदायिक कानून की वकालत होनी चाहिए?
रविवार, 19 जुलाई 2020
लव जिहाद की सच्ची कहानियों का दस्तावेज है 'एक मुखौटा ऐसा भी'
डॉ. वंदना गांधी समाजशास्त्र की शिक्षिका हैं। समाज में चल रही गतिविधियों और उनके पीछे के एजेंडे को वह बहुत बारीक से समझती हैं। जब उन्होंने प्रेम की आड़ में चल रहे 'लव जिहाद' की नब्ज टटोलने की कोशिश की तो उनका सामना ऐसे सच से पड़ा, जो बहुत डरावना है। अपने कहानी संग्रह 'एक मुखौटा ऐसा भी' में उन्होंने 15 सच्ची कहानियों के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि कैसे प्रेम का मुखौटा लगा कर हिंदू युवतियों को निशाना बनाया जा रहा है। उनका जीवन बर्बाद किया जा रहा है। इनमें छह कहानियां मध्यप्रदेश की हैं और शेष भारत के विभिन्न हिस्सों से ली गई हैं। लेखिका का कहना है कि वह कई परिवारों और पीडि़त युवतियों से प्रत्यक्ष मिली हैं और उनके दर्द को समझने का प्रयास किया है।
धरती पर सबसे अधिक पवित्र कुछ है तो वह प्रेम है। प्रेम के सभी रूप मनुष्य के जीवन को सुंदर बनाते हैं। यह शाश्वत सत्य है कि जिसको किसी प्रकार जीतना संभव न हो, उसे प्रेम जीता जा सकता है। प्रेम में एक-दूसरे पर अटूट भरोसा हो जाता है। इस अटूट भरोसे के कारण ही कई बार प्रेम के मुखौटे के पीछे छिपी घिनौनी सूरत को हम देख नहीं पाते हैं। जब यह मुखौटा हटता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। कहानीकार डॉ. वंदना गांधी की पुस्तक निश्चित ही बहुत देर होने से पहले ऐसे घिनौने चेहरों से मुखौटे नौंचने का कार्य करेगी। उनकी यह पुस्तक हिंदू युवतियों को सावधान करती है कि उन्हें जरा एक बार अच्छे से पड़ताल करनी चाहिए कि वह जिसे प्रेम समझ रही हैं, वह वास्तव में प्रेम ही है या कुछ और।
डॉ. वंदना गांधी की यह कहानियां बताती है कि यह सिर्फ प्रेम में धोखे की दास्तां मात्र नहीं है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को छिन्न करने वाला पूरा एक षड्यंत्र है। अब यह कोई छिपा हुआ षड्यंत्र नहीं है कि हिंदू युवतियों का धर्मांतरण करने के लिए सुनियोजित ढंग से 'लव जिहाद' शुरू किया गया है। तथाकथित प्रगतिशील बंधु इसे भाजपा और आरएसएस का राजनीतिक एजेंडा कह कर खारिज कर सकता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा या आरएसएस से भी पहले 'लव जिहाद' शब्द का उपयोग वर्ष 2009 में न्यायमूर्ति केटी शंकरन ने किया था। केरल हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति केटी शंकरन ने मुस्लिम लड़के और हिंदू युवती की शादी के मामले की सुनवाई करते समय कहा था कि देश में लव जिहाद चल रहा है। बाद में, केरल से चर्चा में आए लव जिहाद के मामले देश के कई हिस्सों से भी सामने आए, जो स्पष्टतौर पर न्यायमूर्ति केटी शंकरन के कहे को सत्य सिद्ध करते हैं। यह पुस्तक भी लव जिहाद की ऐसी कहानियां का संग्रह है। पुस्तक यह स्पष्ट करती है कि यह किसी का राजनीतिक एजेंडा हो या न हो, किंतु यह एक सामाजिक संकट जरूर है। इस पर राजनीतिक बहस कम और सामाजिक दृष्टि से विमर्श अधिक होना चाहिए।
मुस्लिम समाज भी कोरी कल्पना कह कर 'लव जिहाद' नकार नहीं सकता। यथार्थ में क्या है? यह भी मुस्लिम समाज को देखना होगा। घटनाएं और मुस्लिम समाज का व्यवहार तो यही बयां करता है कि मुस्लिम समाज का कट्टरपंथी धड़ा 'लव जिहाद' की अवधारणा पर काम तो कर रहा है। वरना क्या कारण है कि मुस्लिम युवक से विवाह करने वाली प्रत्येक लड़की को इस्लाम कबूल करना पड़ता है? मुस्लिम लड़का क्यों नहीं हिंदू धर्म अपनाता? यह कैसा प्रेम है कि हिंदू लड़की को ही अपने धर्म का त्याग करना पड़ता है? हिंदू लड़की के सामने इस्लाम अपनाने के अलावा कोई रास्ता नहीं छोडऩा, लव जिहाद नहीं तो क्या है? यह तो स्पष्टतौर पर धर्मांतरण का तरीका है। ज्यादातर मामलों में यह भी देखने में आता है कि युवक अपनी मजहबी पहचान छिपा कर हिंदू लड़की से मुलाकात बढ़ाता है। झूठ की बुनियाद पर बनाया गया संबंध प्रेम कतई नहीं हो सकता।
पुस्तक 'एक मुखौटा ऐसा भी' निश्चित तौर पर अपने उद्देश्य को पूरा करने में सफल होगी। एक षड्यंत्र के विरुद्ध जागरूकता लाने में यह पुस्तक सहायक सिद्ध होगी। डॉ. गांधी कहती हैं कि लव जिहाद की खौफनाक हकीकत सामने लाकर उन्हें बहुत संतोष है। यह किताब कॉलेज छात्राओं के लिए गीता साबित होगी। हर युवती को इस किताब को जरूर पढऩा चाहिए। अर्चना प्रकाशन को साधुवाद कि उसने ऐसे विषय पर पुस्तक प्रकाशित करने का साहस दिखाया, जिस पर दुर्भाग्यपूर्ण राजनीति हो रही है। इस संबंध में अर्चना प्रकाशन के ट्रस्टी ओमप्रकाश गुप्ता कहते हैं कि लव जेहाद की सच्ची घटनाओं पर देश में यह पहली किताब है। इस किताब में उन युवतियों की पीड़ा को उजागर किया गया है, जो गलत कदम उठाने के बाद अब पछता रहीं हैं। दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में विमोचित इस कृति ने पर्याप्त चर्चा प्राप्त की है।
पुस्तक : एक मुखौटा ऐसा भी (लव जिहाद पर केंद्रित कहानी संग्रह)
लेखक : डॉ. वंदना गांधी
मूल्य : 80 रुपये (पेपरबैक)
पृष्ठ : 86
प्रकाशक : अर्चना प्रकाशन,
17, दीनदयाल परिसर, ई-2, महावीर नगर, भोपाल
दूरभाष – 0755-2420551
मंगलवार, 17 जुलाई 2018
हामिद अंसारी का शरीयत और जिन्ना प्रेम
- लोकेन्द्र सिंह
पूर्व उपराष्ट्रपति और कांग्रेस के मुस्लिम नेता हामिद अंसारी एक बार फिर अपनी संकीर्ण सोच के कारण विवादों में हैं। कबीलाई समय के शरीयत कानून और भारत विभाजन के गुनहगार मोहम्मद अली जिन्ना के संदर्भ में उनके विचार आश्चर्यजनक हैं। यह भरोसा करना मुश्किल हो जाता है कि हामिद अंसारी कभी दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के उपराष्ट्रपति रहे हैं। किंतु, यह सच है। समय-समय पर उनके विचार जान कर यह सच ही प्रतीत होता है कि पूर्व उपराष्ट्रपति को भारत के संविधान और कानून व्यवस्था में भरोसा नहीं है। वह मुस्लिम समाज को मुख्यधारा में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने की जगह उनके लिए आधुनिक समय में आदम युग का कानून चाहते हैं। वह देश के प्रत्येक जिले में ऐसी शरिया अदालतों की स्थापना के पक्षधर हैं, जिनमें महिलाओं के लिए न्याय की कोई व्यवस्था नहीं है। शरिया अदालतों पर हामिद अंसारी के वक्तव्य से यह क्यों नहीं समझा जाए कि उन्हें भारत के आम मुसलमानों के मन में भारत की न्याय व्यवस्था के प्रति संदेह उत्पन्न करना चाहते हैं। शरिया कानून के साथ ही मोहम्मद अली जिन्ना के प्रति प्रेम भी संविधान के प्रति हामिद अंसारी की निष्ठा को संदिग्ध बनाता है।
शनिवार, 12 अगस्त 2017
अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हो पाए हामिद साहब
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| दैनिक समाचार पत्र राजएक्सप्रेस में प्रकाशित |
निवर्तमान उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी जाते-जाते ऐसी बातें कह गए, जो संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को नहीं कहनी चाहिए थी और यदि कहना जरूरी ही था तो कम से कम उस ढंग से नहीं कहना था, जिस अंदाज में उन्होंने कहा। असहिष्णुता के मुद्दे पर किस प्रकार 'बड़ी और गंभीर' बात कहना, इसके लिए उन्हें पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के भाषणों को सुनना/पढऩा चाहिए था। असहिष्णुता के मुद्दे पर पूर्व राष्ट्रपति मुखर्जी ने भी अनेक अवसर पर अपनी बात रखी, लेकिन उनकी बात में अलगाव का भाव कभी नहीं दिखा। जबकि हामिद साहब के अतार्किक बयान के बाद उपजा विवाद बता रहा है कि उनके कथन से देश को बुरा लगा है। यकीनन जब कोई झूठा आरोप लगाता है तब बुरा तो लगता ही है, गुस्सा भी आता है। राज्यसभा टीवी को दिए साक्षात्कार को देख-सुन कर सामान्य व्यक्ति को भी यह समझने में मुश्किल हो रही है कि आखिर किस दृष्टिकोण से भारत में मुस्लिम असुरक्षित हैं। जब भी किसी ने मुस्लिमों के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणी की है, तब उसके विरोध में सबसे अधिक आवाज देश के बहुसंख्यक समाज की ओर से उठी हैं। मुसलमान भी किसी इस्लामिक देश की अपेक्षा भारत में अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं। वे पाकिस्तान जाने की अपेक्षा भारत में ही रहना पसंद करते हैं। भारत में जितनी आजादी मुसलमानों को है, क्या उतनी कहीं और है? मान सकते हैं कि लोकतंत्र की सफलता इस बात से तय होती होगी कि वहाँ अल्पसंख्यक कितने सुरक्षित हैं? हामिद साहब भारत में अल्पसंख्यक सुरक्षित ही नहीं है, बल्कि सफलताएं भी अर्जित कर रहे हैं। भारत के प्रत्येक क्षेत्र में मुस्लिम शीर्ष तक पहुँचे हैं। लोकप्रियता अर्जित की है। राजनीति के क्षेत्र में भी अपना नेतृत्व दिया है। हामिद अंसारी साहब का परिवार और वे स्वयं भी भारतीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय भी पूरे आनंद के साथ भारत-भूमि पर जीवन जी रहे हैं। उपराष्ट्रपति जैसे पद को सुशोभित करने वाले और उच्च शिक्षित व्यक्ति को ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए, जिससे देश के विभिन्न समुदायों में नकारात्मक भाव उत्पन्न हों। उन्हें मुस्लिम समाज को प्रेरित और सकारात्मकता की ओर अग्रेषित करने का प्रयास करना चाहिए था। जाते-जाते बड़प्पन दिखाना चाहिए था। बतौर उपराष्ट्रपति अपने अंतिम वक्तव्य में सकारात्मक बात कहनी चाहिए थी।
मंगलवार, 11 जुलाई 2017
सद्भाव के दृश्य
भारतीय संस्कृति में गुरु पूर्णिमा/ व्यास पूर्णिमा का बहुत महत्त्व है। समूचे भारत में यह उत्सव बहुत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। बीते रविवार को भी देशभर में गुरु पूर्णिमा उत्सव व्यापक स्तर पर मनाया गया। इस दौरान धर्म नगरी काशी से सुंदर और सार्थक चित्र सामने आए हैं। यह चित्र दो समुदायों को जोड़ने वाले हैं। बनारस में गुरु पूर्णिमा का उत्सव हिंदुओं के साथ-साथ मुस्लिम समुदाय के लोगों ने भी मनाया। हिंदू उत्सवों में मुस्लिम चेहरों को देखना दुर्लभ होता है। अमूमन ईद और इफ्तार पार्टी में बड़ी संख्या में हिंदू समाज के लोग शामिल होते हैं। अनेक स्थानों पर इफ्तार पार्टी का आयोजन ही हिंदू समाज की ओर से किया जाता है। लेकिन, हिंदू उत्सवों में मुस्लिम सहभागिता कम ही होती है। इसलिए जब देश में कुछ समाजविरोधी तत्वों के द्वारा दोनों संप्रदायों के बीच वैमनस्य का वातावरण उत्पन्न करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है, तब इस प्रकार के दृश्य एक उम्मीद की तरह उपस्थित होते हैं। दो समुदायों को नजदीक लाते हैं। आपसी सौहार्द का निर्माण करते हैं।
मंगलवार, 4 अप्रैल 2017
महिलाओं के हित में आए निर्णय
पिछले ढाई साल में तीन तलाक का मसला काफी बड़ा हो गया है। तीन तलाक पर व्यापक बहस प्रारंभ हो चुकी है। हालाँकि, मुस्लिम महिलाओं की ओर से लम्बे समय से तीन तलाक को खत्म करने के लिए आंदोलन चलाया जा रहा है। लेकिन, अब तक उन्हें न्याय नहीं मिला। अब तक की सरकारों ने मुस्लिम महिलाओं की आवाज को न तो सुना और न ही उनका समर्थन किया। वरन् शाहबानो प्रकरण में तो तत्कालीन कांग्रेसनीत केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटकर एक तरह से मुस्लिम महिलाओं को उनकी बदहाली पर छोड़ दिया था। महिलाओं के संघर्ष को उस वक्त ताकत और सफल होने की उम्मीद मिली, जब मई-२०१४ में केंद्र में भाजपानीत सरकार का गठन हुआ। क्योंकि, भारतीय जनता पार्टी सदैव से समान नागरिक संहिता और मुस्लिम महिलाओं की बेहतरी के लिए तीन तलाक को खत्म करने की हिमायती रही है। भाजपा के शीर्ष नेता अकसर अपने भाषणों में मुस्लिम महिलाओं के हित में तीन तलाक को खत्म करने की मांग उठाते रहे हैं। हाल में सम्पन्न उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी तीन तलाक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना था। माना जा रहा है कि उत्तरप्रदेश में भाजपा को जो प्रचंड बहुमत मिला है, उसमें मुस्लिम महिलाओं की बड़ी हिस्सेदारी है।
शुक्रवार, 17 मार्च 2017
कट्टरपंथ की बुरी नजर से कला-संस्कृति को बचाना होगा
असम के 46 मौलवियों की कट्टरपंथी सोच को 16 वर्षीय गायिका नाहिद आफरीन ने करारा जवाब दिया है। नाहिद ने कहा है कि खुदा ने उसे गायिका का हुनर दिया है, संगीत की अनदेखी करना मतलब खुदा की अनदेखी होगा। वह मरते दम तक संगीत से जुड़ी रहेंगी और वह किसी फतवे से नहीं डरती हैं। इंडियन आइडल से प्रसिद्ध हुई नाहिद आफरीन ने हाल में आतंकवाद और आईएसआईएस के विरोध में गीत गाए थे। आशंका है कि कट्टरपंथियों को यह बात चुभ गई होगी। सुरीली आवाज का गला घोंटने के लिए कट्टरपंथियों ने 46 फरमान जारी करते हुए नाहिद को 25 मार्च को संगीत कार्यक्रम की प्रस्तुति नहीं देने के लिए धमकाया है। आफरीन के खिलाफ मंगलवार को मध्य असम के होजई और नागांव जिलों में कई पर्चे बांटे गए, जिनमें असमिया भाषा में फतवा और फतवा जारी करने वाले लोगों के नाम हैं। इन फतवों के अनुसार, 25 मार्च को असम के लंका इलाके के उदाली सोनई बीबी महाविद्यालय में 16 साल की नाहिद को गीत गाना है, जिसे पूरी तरह से शरिया के खिलाफ बताया गया है। फतवों की माने तो संगीत संध्या जैसी चीजें पूरी तरह से शरिया के खिलाफ हैं। दरअसल, इन मौलवियों के दिमाग में जहर भरा हुआ है। यही कारण है कि उन्हें एक बच्ची की प्रतिभा दिखाई नहीं दे रही। इन्हें भारत में इस्लाम और संगीत के रिश्ते की समझ भी नहीं है। 21वीं सदी में आगे बढ़ने की जगह इस्लाम के यह ठेकेदार अपनी कौम को पीछे धकेलने का निंदनीय कृत्य कर रहे हैं। अब भी यह कूपमंढूक बने रहना चाहते हैं।
सोमवार, 10 अक्टूबर 2016
सुधार क्यों नहीं चाहता मुस्लिम समुदाय
तीन तलाक के मुद्दे पर सरकार का हलफनामा स्वागत योग्य है। मुस्लिम महिलाओं की सामाजिक स्थिति और उनके संवैधानिक अधिकार को मजबूत करने के लिए केन्द्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में दायर अपने हलफनामे में स्पष्ट कहा है कि तीन तलाक महिलाओं के साथ लैंगिग भेदभाव करता है। केन्द्र सरकार ने उचित ही कहा है कि पर्सनल लॉ के आधार पर किसी को संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। महिलाओं की गरिमा के साथ किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता। केन्द्र सरकार ने यहाँ तक कहा है कि तीन तलाक, हलाला निकाह और बहुविवाह इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है। सरकार का यह कहना उचित ही है। यदि यह प्रथाएँ इस्लाम का अभिन्न अंग होती, तब इस्लामिक देशों में इन पर प्रतिबंध संभव होता क्या? दुनिया के अनेक प्रमुख इस्लामिक मुल्कों में तीन तलाक, हलाला निकाह और बहुविवाह प्रतिबंधित हैं। इसलिए भारत में भी महिलाओं के साथ धर्म और पर्सनल लॉ के नाम पर होने वाली ज्यादती रुकनी चाहिए।
सोमवार, 8 अगस्त 2016
सना से सीखें कट्टरपंथियों को जवाब देना
सांप्रदायिक और कट्टर सोच को उजागर करती दो घटनाएं हमारे सामने हैं। एक, मायानगरी मुम्बई की घटना है। दूसरी घटना मध्यप्रदेश की धर्मनगरी उज्जैन की है। घर-घर 'आराध्या' नाम से पहचानी जाने वाली सना अमीन शेख टीवी कलाकार हैं। धारावाहिक 'कृष्णदासी' में सना का नाम आराध्या है। धारावाहिक में वह एक विवाहित मराठी महिला का किरदार कर रही हैं। भूमिका के अनुसार उन्हें माँग में सिंदूर भरना होता है और गले में मंगलसूत्र पहनना होता है। गजब की धार्मिक असहिष्णुता है कि पर्दे पर अपने किरदार को निभाने के लिए सना द्वारा सिंदूर भरने और मंगलसूत्र पहनने भर से ही इस्लाम खतरे में आ गया। सना ने धारावाहिक की शूटिंग के कुछ चित्र सामाजिक माध्यम (सोशल मीडिया) पर साझा किए, तबसे वह कट्टरपंथी मानसिकता के निशाने पर हैं। ओछी सोच के अनेक मुसलमान उन्हें नसीहत देने लगे हैं, यथा - 'मुस्लिम लड़कियों को सिंदूर नहीं लगाना चाहिए। तुम एक मुस्लिम लड़की हो, मंगलसूत्र क्यों पहनती हो? किसी भी मुस्लिम महिला को चाहे वह अभिनेत्री हो, सबसे पहले अपने धर्म का सम्मान करना चाहिए। कुछ अतिवादी तो धमकाने की हद तक पहुँच गए। सना शेख ने इन मनोरोगियों की कट्टरपंथी सोच को करारा जवाब दिया है। उसने सामाजिक माध्यम पर खुला खत लिखकर सांप्रदायिक सोच को लताड़ लगाई है। सना ने लिखा है कि क्या सिंदूर लगाने से अल्लाह मुझे दोजख में भेज देंगे और विरोध करने वालों को जन्नत में भेजेंगे? सना ने कहा कि शूटिंग के वक्त मेरी माँग में भरा सिंदूर तब तक मेरे बालों में रहता है जब तक मैं नहाती नहीं हूँ। सना ने संकुचित मानसिकता के लोगों को उनकी ही भाषा में आईना दिखाने का प्रयास भी किया। उसने कहा कि यदि अपने किरदार को निभाने के लिए मेरा सिंदूर लगाना और मंगलसूत्र पहनना इस्लाम के खिलाफ है तब मेरा धारावाहिक देखने वाले क्या कर रहे हैं? सिनेमा देखना, फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम का उपयोग करना क्या हराम नहीं है? आप लोग मेरा धारावाहिक देखना बंद क्यों नहीं करते? फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर समय बर्बाद करके क्या तुम लोग जन्नत में जाओगे?
सोमवार, 11 जुलाई 2016
आतंकी से सहानुभूति क्यों?
आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के 22 वर्षीय कमांडर बुरहान वानी की मौत पर जम्मू-कश्मीर में मातम ही नहीं मनाया जा रहा है, बल्कि उपद्रव भी किया जा रहा है। सेना और पुलिस को निशाना बनाकर हमले किए जा रहे हैं। इस उपद्रव में अब तक करीब 20 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि सैकड़ों लोग घायल हो गए हैं। बुरहान वानी खतरनाक आतंकवादी था। उसके सिर पर दस लाख का इनाम था। बुरहान वानी भी इस्लामिक उपदेशक डॉ. जाकिर नाइक से प्रेरित था। उसकी मौत से हिजबुल मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठन को बहुत बड़ा नुकसान होगा। दरअसल, वानी हिजबुल मुजाहिदीन के पोस्टर बॉय के रूप में स्थापित हो चुका था। खुद को आगे रखकर वह आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के लिए घाटी के मुस्लिम युवाओं की भर्ती करता था। उसकी मौत से आतंकवादी तैयार होने की यह प्रक्रिया टूटेगी। इसलिए वानी की मौत को पुलिस, सेना और सरकार आतंकवाद के खिलाफ बड़ी कामयाबी मान रही है।
रविवार, 10 जुलाई 2016
जहरीली तकरीरों पर लगे अंकुश
ढाका हमले में निर्दोष विदेशी और गैर-मुस्लिम नागरिकों का गला रेतकर हत्या करने वाले आतंकवादियों के प्रेरणास्रोत साबित हो रहे इस्लाम के उपदेशक डॉ. जाकिर नाईक पहली बार अपनी जहरीली तकरीरों के लिए चौतरफा घिर रहे हैं। बांग्लादेश की जाँच एजेंसियों को इस बात के सबूत मिले हैं कि राजनयिक क्षेत्र में होली आर्टिसन बेकरी रेस्तरां पर हमला करने वाले आतंकियों ने इस्लाम की व्याख्या करने वाले जाकिर नाईक की तकरीर सुनकर आतंकी बनने का फैसला किया था। बांग्लादेश सरकार के आग्रह पर ही केन्द्र सरकार डॉ. नाईक के भाषणों की जाँच करा रही है। महाराष्ट्र सरकार ने भी जाकिर नाईक की जहरीली तकरीरों की जाँच कराने के निर्देश दिए हैं। अपने पड़ोसी मुल्क में हुई बीभत्स घटना की जाँच में मदद करने से आपसी संबंध भी प्रगाढ़ होते हैं। आतंकवाद के खिलाफ साझी लड़ाई में दोनों देशों का साथ आना जरूरी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी वैश्विक मंचों से बार-बार आग्रह कर रहे हैं कि आतंकवाद को खत्म करने के लिए सबको साथ आना चाहिए। अकेले-अकेले लड़कर आतंकवाद का समूल नाश नहीं किया जा सकता। आतंकवाद के विरुद्ध दोनों देशों का साथ आना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि जिस तरह आतंकवाद बांग्लादेश में अपनी आमद दर्ज करा रहा है, वह भारत के लिए भी खतरनाक है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि जाकिर नाईक के भाषण मुसलमानों को आतंकवादी बनने के लिए प्रेरित करने वाले पाए तब उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
शनिवार, 2 जुलाई 2016
कट्टरपंथियों के निशाने पर हिन्दू
बांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरपंथी हावी हो गए हैं। शेख हसीना सरकार भले ही दावा करे कि बांग्लादेश में इस्लामिक स्टेट और अन्य इस्लामिक आतंकी संगठनों का वजूद नहीं है लेकिन लगातार निर्दोष लोगों की हत्याएं कुछ और ही कहानी बयां करती है। बांग्लादेश में उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष सोच वाले लेखकों-ब्लॉगरों, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को सुनियोजित हमले करके मौत के घाट उतारा जा रहा है। इनमें से अधिकतर हत्याओं की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट ने ली है। इस्लाम का झंडा थामकर चलने वाले आतंकवादियों के निशाने पर धार्मिक अल्पसंख्यक भी हैं, खासकर हिन्दू समुदाय। वैसे तो पाकिस्तान के साथ-साथ बांग्लादेश के इतिहास के पन्ने हिन्दुओं के रक्त से लाल हैं। लेकिन, पिछले कुछ समय में जिस तरह बांग्लादेश में हिन्दुओं को निशाना बनाया जा रहा है, उससे भविष्य के खतरे स्पष्ट नजर आ रहे हैं। एक के बाद एक हत्या किसी गहरे सांप्रदायिक षड्यंत्र की ओर इशारा कर रही हैं। मानो, बांग्लादेश की भूमि को हिन्दू विहीन करने की तैयारी इस्लामिक ताकतों ने कर ली है। वर्तमान सरकार को कथिततौर पर पंथनिरपेक्ष माना जाता है। लेकिन, इस्लामिक कट्टरपंथ पर जिस तरह से प्रधानमंत्री शेख हसीना और उनकी सरकार ने आँखें बंद कर रखीं हैं, उसे देखकर लगता है कि उन्हें भी अपनी राजनीतिक रोटियों की फिक्र अधिक है। अल्पसंख्यकों पर हो रहे लगातार हमलों पर जिस तरह सरकार मूकदर्शक बन गई है, उससे लगता है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यक खासकर हिन्दू समुदाय बचेगा ही नहीं। बांग्लादेश सरकार को समझना चाहिए कि इस तरह की घटनाओं पर चुप्पी उसके लिए भी घातक हो सकती है। अतिवादी ताकतें जब अपनी जड़ें गहरी जमा लेती हैं तब वह सबके लिए नासूर बन जाती हैं और उस स्थिति में उनसे निपटना अधिक मुश्किल हो जाता है। बांग्लादेश आज उस जगह खड़ा है, जहाँ वह संभला नहीं तो उसकी बुरी गत हो जाएगी। प्रधानमंत्री शेख हसीना यह नहीं भूलें कि इस्लामिक आतंकवाद बांग्लादेश के इतिहास और वर्तमान को भी पूरी तरह निगल जाएगा। इस बात को समझने के लिए उन्हें इस्लामिक स्टेट की गतिविधियों का अध्ययन कर लेना चाहिए। हाल की कई घटनाएं बताती हैं कि बांग्लादेश में आज जिस तरह हिन्दुओं की हत्याएं हो रही है, वह दिन भी दूर नहीं है जब इसी तरह मुसलमानों की हत्याएं होना शुरू हो जाएंगी।
सोमवार, 27 जून 2016
आतंकवाद और खौफ के बीच हिन्दू
प्राचीन काल में हिन्दू राष्ट्र रहे अफगानिस्तान में अब हिन्दू समुदाय बदहाली के दौर से गुजर रहा है। उनका जीवन आतंकवाद और खौफ के बीच बीत रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक आतंकवाद, सांप्रदायिक हमले और धर्मांतरण के कारण पिछले 24 साल में अफगानिस्तान में हिन्दुओं की आबादी में दो लाख से अधिक कमी आई है। मौजूदा समय में वहाँ 220 से भी कम हिन्दू परिवार बचे हैं। मुस्लिम बहुल इस देश में हिन्दुओं की स्थिति दुनिया के सामने गंभीर प्रश्न खड़े करती है। क्या कारण रहे हैं कि गांधारी के देश में आज अंगुली पर गिनने लायक हिन्दू बचे हैं? जिस देश में कभी हिन्दूशाही रही, सन् 843 ईस्वी में कल्लार राजा तक हिन्दू राजाओं का शासन रहा, वहाँ आज हिन्दू पददलित क्यों हैं? 17वीं सदी तक अफगानिस्तान अलग देश नहीं था बल्कि हिन्दुस्थान का ही हिस्सा था, उसी भूमि पर हिन्दुओं के सामने विकट परिस्थितियां कैसे आ खड़ी हुईं?
शनिवार, 6 फ़रवरी 2016
अराजक भीड़ ने 'बेंगलुरु' को किया अपमानित
बें गलुरु से खबर है कि उग्र भीड़ ने तंजानिया की एक छात्रा के साथ बदसलूकी की है। उसकी पिटाई की है। इतना ही नहीं, भीड़ ने छात्रा के कपड़े भी नोंच लिए। उसे अर्धनग्न अवस्था में सड़क पर दौड़ाया। एक युवक ने जब छात्रा की मदद करने की कोशिश की, उसे अपनी टी-शर्ट पहनने के लिए दी तो भीड़ ने उस युवक को भी जमकर पीटा। बुरी तरह जख्मी लड़की ने भीड़ से बचने के लिए जब वहां से गुजर रही बस में चढऩे की कोशिश की तो यात्रियों ने उसे धकेलकर वापस भीड़ के हवाले कर दिया। यह किस तरह का व्यवहार है। एक लड़की की रक्षा करने की जगह बस यात्रियों ने कायराना व्यवहार किया। उफ! हमारी संवेदनाएं। भीड़ ने छात्रा के तीन दोस्तों को भी बुरी तरह पीटा है। बताते हैं कि पुलिस भी मूक दर्शक की तरह यह वीभत्स घटना को देखती रही। अस्पताल स्टाफ ने भी उन्हें इलाज के लिए भर्ती नहीं किया। बेंगलुरु की पहचान एक हाईटेक और उच्च शिक्षित शहर के नाते है। वहां इस तरह की घटना होना चिंता का विषय है। उग्र भीड़ ने अपने इस कृत्य से समूचे बेंगलुरु को अपमानित किया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बदनामी का कारण यह घटना बन सकती है।
गुरुवार, 7 जनवरी 2016
कौन हैं देश का सांप्रदायिक सौहार्द बिगाडऩे वाले लोग?
प श्चिम बंगाल का जिला मालदा क्यों जला? सड़कों पर ढाई लाख लोगों की भीड़ क्यों उतरी थी? किसने संविधान और कानून की धज्जियां उड़ाईं? किसने दो दर्जन से अधिक वाहनों को आग के अवाले किया? इनमें पुलिस के वाहन भी थे। किसने अराजकता की हद तोड़कर पुलिस स्टेशन (कालियाचक) पर हमला बोला, थाने में घुसकर तोड़-फोड़ की, किसने पुलिस को मारा-पीटा? २५ घरों में जमकर लूटपाट करने वाली भीड़ किसकी थी? इतनी अराजकता, इतनी दशहतगर्दी, आखिर किसलिए? इस दशहतगर्दी पर चुप्पी क्यों? इस चुप्पी का मतलब क्या है? कोई नहीं बता रहा है। मालदा को दहशत के हवाले करने की इक्का-दुक्का खबरों को छोड़ दें तो यह खबर कहीं नहीं है। आखिर, यह क्यों नहीं बताया जाना चाहिए कि देश का सांप्रदायिक सौहार्द बिगाडऩे वाले यह लोग कौन हैं?
शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015
मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव क्यों?
सु प्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ की आड़ में मुस्लिम महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव पर चिंता जताई है। मुस्लिम महिलाओं की दशा सुधारने और उन्हें अन्य धर्म की महिलाओं के समान अधिकार दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ की समीक्षा करने का फैसला किया है। महिला सशक्तिकरण, नारी सम्मान और समानता की दिशा में सुप्रीम कोर्ट की इस पहल का स्वागत होना चाहिए। चूंकि मामला कथित अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़ा है, इसलिए राजनीति से यह अपेक्षा बेमानी है कि वे मुस्लिम महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिलाने के लिए कोई पहल करते। लेकिन, उनसे आग्रह है कि इस मसले पर 'अल्पसंख्यक हितों पर कुठाराघात' का वितंडावाद खड़ा न करें। सुप्रीम कोर्ट का साथ देकर महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिलाएं।
रविवार, 25 अक्टूबर 2015
कौन हैं गोमांस के लिए भूखे बैठे लोग?
'मैं गाय काट रहा हूं। तुम मेरा क्या बिगाड़ लोगे?'
'मैं तो बड़े मजे से गोमांस खाता हूं।'
'मैं तो बड़े मजे से गोमांस खाता हूं।'
'हिन्दुओं के लिए होगी गाय माता, मेरे लिए तो एक पशु से अधिक कुछ नहीं।'
'वैदिक काल में ऋषि-मुनि खाते थे गोमांस।'
'मैं बीफ फेस्टीवल मना रहा हूं, मेरा कोई क्या बिगाड़ सकता है?'
आपको नहीं लगता ये बयान जानबूझकर हिन्दुओं को चिढ़ाने के लिए दिए गए हैं। हिन्दुओं की भावनाओं का मजाक बनाकर कोई आखिर क्या हासिल करना चाहता है? ये बयान सांप्रदायिक सौहार्द बनाने वाले हैं या बिगाडऩे वाले? दरअसल, इस समय गाय के बहाने सब अपना लक्ष्य भेदने का प्रयास कर रहे हैं। लक्ष्य भाँति-भाँति के हैं, राजनीतिक, सांप्रदायिक और वैचारिक।
शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015
गोहत्या रोकने कानून बनाए सरकार
दा दरी हत्याकांड के बाद से देशभर में गाय पर राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक बहस छिड़ी हुई है। खुद को सेक्युलर कहने वाले तथाकथित बुद्धि के ठेकेदार गोमांस खाने को उतावले हैं। वे गोहत्या पर प्रतिबंध के खिलाफ खूब लिख-बोल रहे हैं। शोभा डे सरीखी वाममार्ग पर प्रगतिशील महिला हिन्दुओं को उकसाने वाला बयान देती हैं- मैंने गोमांस खाया है, आओ मुझे मार डालो। फिल्म अभिनेता ऋषि कपूर, पूर्व न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू, बिहार के नेता लालू प्रसाद यादव, भाजपा सरकार के केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू से लेकर विभिन्न क्षेत्रों की कई प्रमुख हस्तियों ने गोमांस पर हिन्दू समाज की भावनाओं को आहत करने वाले बयान दिए हैं। साहित्यकार भी गाय पर राजनीति करने में पीछे नहीं हैं। इस सब वितंडावाद के बीच हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने गोहत्या और गोमांस बिक्री पर रोक लगाने का महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार से भी आग्रह किया है कि पूरे देश में गोहत्या और गोमांस बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानून बनाने पर विचार किया जाना चाहिए। गोमांस और उससे बने उत्पाद की बिक्री, आयात और निर्यात पर तीन माह में पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए।
गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015
धर्मनिरपेक्ष है समान नागरिक संहिता, सब करें समर्थन
सु प्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता को लेकर भाजपानीत केन्द्र सरकार से सवाल पूछकर एक जरूरी बहस को जन्म दे दिया है। सुप्रीम कोर्ट में क्रिश्चयन डायवोर्स एक्ट की धारा 10ए (1) को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई चल रही थी। याचिका दायर करने वाले अलबर्ट एंथोनी का सवाल है कि एक देश में एक ही मामले में अलग-अलग कानून क्यों हैं? ईसाई दंपती को तलाक लेने के लिए दो साल तक अलग-अलग रहना जरूरी है। जबकि हिन्दू मैरिज एक्ट में एक साल अलग रहने पर तलाक दे दिया जाता है। बात इसके आगे करें तो मुस्लिम पुरुष महज 'तलाक-तलाक-तलाक' कहकर ही महिला को छोड़ सकता है। वाट्सअप पर भी वह तीन बार तलाक लिख-बोल कर अपनी पत्नी को बता दे तो तलाक हो जाता है। हिन्दू और ईसाई दंपती को तलाक के लिए वाजिब कारण साबित करना होता है जबकि मुसलमानों में यह जरूरी नहीं है।
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