सोमवार, 31 मई 2021

पुण्यश्लोक राजमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर

देखें यह वीडियो : Rajmata Devi Ahilyabai Holkar



अहिल्याबाई का जन्म 31 मई, 1725 को महाराष्ट्र के जिले अहमदनगर के चौंढ़ी ग्राम तालुका जामखेड़ा में हुआ था। उनके पिता माणकोजी शिंदे और माता सुशीलाबाई बहुत धार्मिक थे। अपने माता-पिता से ही धार्मिक और संवेदनशील होने का संस्कार अहिल्याबाई को विरासत में मिला।  

वर्ष 1733 में पुणे में हिंदू विधि-विधान से उनका विवाह श्रीमंत खण्डेराव के साथ सम्पन्न हुआ। उनको आशीर्वाद देने के लिए बाजीराव पेशवा अपने परिवार के साथ आए थे। एक साधारण परिवार की दिव्य कन्या अब इंदौर के राजमहल की रानी हो गई।

शनिवार, 29 मई 2021

एक ध्येय के सूत्र से बंधे थे वीर सावरकर और भगत सिंह

वीडियो ब्लॉग देखें: Veer Savarkar and Bhagat Singh | वीर सावरकर पर भगत सिंह के विचार


आपने देखा और पढ़ा होगा कि भारत में तथाकथित बुद्धिजीवियों का एक विशेष वर्ग स्वातंत्र्यवीर सावरकर और सरदार भगत सिंह को एक-दूसरे के सामने खड़ा करने का प्रयास करता है। ऐसा करते समय उसकी नीयत साफ नहीं होती। मन में बहुत मैल रहता है। दरअसल, वे स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर को कमतर दिखाने और उनका अपमान करने की चेष्टा कर रहे होते हैं। लेकिन, सूरज से भी भला कोई आँखें मिला सकता है। दो महापुरुषों/क्रांतिकारियों की तुलना करके ऐसे लोग अपने ओछेपन को ही उजागर कर रहे होते हैं। ऐसा करते समय उन्हें पता ही नहीं होता कि दोनों क्रांतिवीर एक-दूसरे का बहुत सम्मान करते थे। आज हम वीर सावरकर और सरदार भगत सिंह के आपसी संबंधों को टटोलने का प्रयास करेंगे। हम जानेंगे कि कैसे भगत सिंह क्रांति की राह में सावरकर के प्रति आदर का भाव रखते थे और सावरकर के मन में भगत सिंह के प्रति कितनी आत्मीयता थी?

बुधवार, 26 मई 2021

शर्मनाक! आपदा में भी ‘कन्वर्जन का खेल’

मध्यप्रदेश के रतलाम जिले में कोरोना महामारी की आड़ में ईसाई संप्रदाय के प्रचार का और कन्वर्जन (धर्मान्तरण) की प्रक्रिया का चौकाने वाला मामला सामने आया है। मध्यप्रदेश सरकार ने अच्छी पहल करते हुए कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए ‘किल कोरोना’ अभियान शुरू किया, जिसके तहत घर-घर जाकर स्वास्थ्यकर्मी लोगों के स्वास्थ्य की जाँच कर हैं और उन्हें उचित परामर्श दे रहे हैं। महामारी से लोगों का जीवन बचाने के उद्देश्य से शुरू किए गए इस अभियान का उपयोग ईसाई संप्रदाय के प्रचार और कन्वर्जन के लिए प्रेरित करने हेतु किया जाएगा, इसकी कल्पना भी सरकार ने नहीं की होगी। सरकार क्या, कोई भी निर्मल मन का व्यक्ति यह कल्पना नहीं कर सकता। सोचिए, जो लोग शासकीय अभियान को भी ईसाई संप्रदाय के प्रचार एवं कन्वर्जन की प्रक्रिया के लिए उपयोग कर सकते हैं, वे अपने तथाकथित ‘सेवा प्रकल्पों’ के माध्यम से किस स्तर पर जाकर गरीब, पिछड़े एवं वनवासी बंधुओं को ईसाई बनाते होंगे? यह घटना इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि भारत में सेवा कार्यों के पीछे चर्च का एक ही एजेंडा है- कन्वर्जन। यह अत्यंत घृणित एवं निंदनीय कार्य है कि सेवा की आड़ में लोगों का धर्म परिवर्तित कर अपने संप्रदाय का विस्तार किया जाए।

शुक्रवार, 21 मई 2021

कोरोना की रोकथाम का मध्यप्रदेश मॉडल

कोरोना महामारी की दूसरी लहर अचानक तेजी से आई, जिसकी भयावहता ने सबको मूकदर्शक बना दिया। कैसे इस लहर को रोका जाए, यह बड़ा प्रश्न बन गया। प्रारंभिक दिनों में अफरा-तफरी के हालात बन गए। ऐसी कठिन परिस्थितियों को संभालने के लिए मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार और उसके मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने युद्धस्तर पर प्रयास किए। मुख्यमंत्री श्री चौहान अत्यधिक सक्रिय नजर आए। पहले चरण में वे स्वयं सड़कों पर निकले और लोगों को कोरोना संबंधी दिशा-निर्देशों को पालन करने का आग्रह किया। लेकिन, परिस्थितियां तेजी से बिगड़ती जा रही थीं। तब उन्होंने प्रदेश में कोरोना संक्रमण का आकलन कर कोरोना कर्फ्यू जैसा कठोर निर्णय लेने में हिचक नहीं दिखाई। उधर, स्वास्थ्य सेवाओं का प्रबंध ठीक हो इस पर भी सरकार ने विशेष जोर दिया। सामाजिक संस्थाओं से इस संकट की घड़ी में सहयोग करने का आग्रह भी उन्होंने किया। किल कोरोना अभियान चलाया। बहुत ही कम समय में सीमित संसाधनों और सरकार की सक्रियता के कारण मध्यप्रदेश की स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर हो गई है। 

गुरुवार, 20 मई 2021

स्वातंत्र्यवीर सावरकर पर 'द वीक' का माफीनामा

वीडियो रिपोर्ट देखें : 'The Week' magazine apologies for defaming Veer Savarkar

'द वीक' पत्रिका ने स्वातंत्र्यवीर सावरकर पर लिखे गए झूठे और अपमानजनक लेख के लिए माफी मांगी है। ‘द वीक’ की यह माफ़ी राष्ट्रभक्त लोगों की जीत है और महापुरुषों का अपमान करने वाले संकीर्ण मानसिकता के लोगों की पराजय। निरंजन टाकले नाम के पत्रकार का एक लेख ‘द वीक’ ने 24 जनवरी, 2016 को प्रकाशित किया, जिसका शीर्षक ‘लैंब लायोनाइज्ड’ था। वीर सावरकर की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के उद्देश्य से लिखे गए इस लेख में मनगढ़ंत और तथ्यहीन बातें लिखी गयीं। तथ्यों को तोड़-मरोड़कर कर भी प्रस्तुत किया गया। ‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक’ ने इस आलेख को चुनौती दी। सबसे पहले 23 अप्रैल, 2016 को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया में इसकी लिखित शिकायत की गई। परन्तु प्रेस काउंसिल कहाँ, इस तरह के मामलों पर संज्ञान लेती है। राष्ट्रीय विचार से जुड़े विषयों पर उसकी उदासीनता सदैव ही देखने को मिली है, उसका कारण सब जानते ही हैं। उसके बाद स्मारक इस लेख के विरुद्ध याचिका लेकर न्यायालय पहुँच गया और हम देखते हैं कि न्यायालय में झूठ टिक नहीं सका। इससे पहले वीर सावरकर के सम्बन्ध में आपत्तिजनक कार्यक्रम के प्रसारण के लिए एबीपी माझा भी लिखित माफी मांग चुका है। सोचिये, इतिहास में इस तरह के लोगों ने कितना और किस प्रकार का झूठ परोसा होगा? 

मंगलवार, 18 मई 2021

सकारात्मकता का संचार : ‘हम जीतेंगे - पाजिटीविटी अनलिमिटेड’

हम विकट संकट से गुजर रहे हैं। इस प्रकार के वैश्विक संकट का सामना सामूहिक प्रयासों, धैर्य एवं सकारात्मक मन के साथ ही किया जा सकता है। निराश और हतोत्साहित मन से हम इस मुसीबत से पार नहीं पा सकते। वैसे भी दुनिया में यह सामाजिक व्यवस्था है कि दु:ख एवं कष्ट की स्थिति में व्यक्ति के दु:ख को बढ़ाने का काम नहीं किया जाता, अपितु उसे सांत्वना दी जाती है, धैय दिया जाता है और उसके दु:ख में शामिल होकर उसको हिम्मत दी जाती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने समाज में सेवा एवं राहत कार्यों को करने के साथ ही अपने इस दायित्व को भी स्वीकार किया। निराशा के गर्त में धकेले जा रहे अपने समाज के मन में जीत का विश्वास जगाने के उद्देश्य से संघ की प्रेरणा से ‘कोविड रिस्पॉन्स टीम’ ने पाँच दिवसीय ‘हम जीतेंगे - पाजिटीविटी अनलिमिटेड’ व्याख्यानमाला का आयोजन किया। इस व्याख्यानमाला में सामाजिक एवं धार्मिक नेतृत्व ने समाज में आत्मविश्वास जगाने का प्रयास किया।

शुक्रवार, 14 मई 2021

संवेदनशीलता शिवराज सरकार

बेसहारा परिवार को पाँच हजार पेंशन और बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा का सराहनीय निर्णय

हम सब जानते हैं कि कोरोना महामारी की दूसरी लहर ने किसी को संभलने का अवसर नहीं दिया। बहुत तेजी से फैली महामारी की यह लहर अपने पीछे अनेक प्रकार के दु:ख और कष्ट छोड़कर जाने वाली है। यह दु:ख और कष्ट छोटे हो सकते हैं यदि समाज और सरकार मिलकर प्रयास करें। कोरोना संक्रमण की त्रासद घटनाओं के कारण यह महामारी अब हमारे लिए सामाजिक समस्या भी बन गई है। अनेक परिवार बेसहारा हो गए हैं। उनमें जो कमाने-खिलानेवाले थे, उनका दु:खद निधन हो गया है। बेसहारा परिवार और बच्चों के सामने अनेक चिंताएं हैं। हमें प्रयास करना चाहिए कि हम सब ऐसे परिवारों की चिंताओं का समाधान कैसे कर सकते हैं? मध्यप्रदेश सरकार ने पहलकदमी करते हुए बेसहारा परिवारों को पाँच हजार रुपये मासिक पेंशन, बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा और राशन की नि:शुल्क व्यवस्था करने का निर्णय लिया है। यह निर्णय बाकी राज्यों की सरकारों के लिए अनुकरणीय हो सकता है। 

इस तरह के प्रयासों में सरकारों के साथ सामाजिक संगठनों एवं जागरूक व्यक्तियों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। सरकार ऐसे परिवारों के लिए कोई योजना बनाए और सामाजिक संगठन एवं जागरूक नागरिक जरूरतमंद व्यक्ति तक इन योजनाओं का लाभ पहुँचाने में सहयोगी बनें। साथ यह भी नजर रखी जाए कि कोई जरूरतमंदों का हक न मार ले। योजनाओं का सीधा लाभ पीडि़त व्यक्ति को मिले। उसमें बिचौलिए आकर उनको सहायता देने की जगह उनके दर्द को बढ़ाने का काम न करें। मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार एवं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस बात के लिए प्रशंसा के पात्र हैं कि उन्होंने बेसहारा हुए परिवारों एवं बच्चों को प्रत्येक माह पाँच हजार रुपये की पेंशन देने का निर्णय लिया है। बेसहारा परिवारों के लिए यह बड़ी राहत होगी। यह निर्णय बताता है कि शिवराज सिंह चौहान बहुत संवेदनशील मुख्यमंत्री हैं। उनके लिए अंत्योदय की चिंता प्राथमिक है। वह उन परिवारों की चुनौतियों को समझते हैं, जो कमजोर आय वर्ग से हैं। पाँच हजार रुपये की मासिक पेंशन के साथ ही उन्होंने ऐसे बच्चों की नि:शुल्क पढ़ाई की व्यवस्था एवं परिवारों को नि:शुल्क राशन की व्यवस्था करने का निर्णय भी लिया है। 

इसके साथ ही महिलाओं को काम प्रारंभ करने के लिए सरकार की गारंटी पर बिना ब्याज का ऋण उपलब्ध कराने का निर्णय भी सराहनीय है। इस बात के लिए लोगों को अधिक प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि वे स्वावलंबी बनें और स्वरोजगार कर बाकी सबके लिए भी उदाहरण बनें। मध्यप्रदेश सरकार का यह निर्णय एक आत्मविश्वास पैदा करता है, एक भरोसा जगाता है एवं आश्वासन देता है कि कठिन परिस्थितियों में सरकार हमारा सहारा बनेगी और हम फिर से उठ खड़े होंगे। आज की निराशाजनक परिस्थिति में इस प्रकार का भरोसा बहुत जरूरी है। यह भरोसा ही इस कठिन लड़ाई में जीतने का हमारा सबसे बड़ा सहारा बनेगा।