शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018

हम आलोचना कर रहे हैं या दुष्प्रचार

 प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी ने लंदन प्रवास के दौरान 'भारत की बात, सबके साथ' कार्यक्रम में बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही है। उन्होंने एक प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा- 'आलोचनाएं लोकतंत्र की ब्यूटी होती है।' यह बात दरअसल, इसलिए महत्वूर्ण है, क्योंकि मोदी विरोधी जब-तब यह स्थापित करने का प्रयास करते हैं कि वर्तमान सरकार ने उनकी अभिव्यक्ति की आजादी को समाप्त कर दिया है। अब कुछ भी कहना खतरे से खाली नहीं। आलोचनाओं के लिए कोई स्थान नहीं बचा है। मोदी विरोधियों के इस प्रकार के प्रयासों के कारण ही यह प्रश्न लंदन में मोदी से पूछा गया। जबकि वास्तविकता क्या है, हम जानते हैं। जो लोग यह कह रहे हैं कि देश में आलोचना के लिए स्थान नहीं बचा है, वह लोग ही खुलकर वह सब कुछ भी बोल रहे हैं, जो आलोचना की श्रेणी में नहीं अपितु दुष्प्रचार की श्रेणी में आता है। यहाँ तक कि घृणा की श्रेणी में भी उसको शामिल किया जा सकता है।

मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

जाएं तो जाएं कहाँ

पाकिस्तान में हिंदुओं का जबरन मतांतरण
 पाकिस्तान  के लोग आज भी यह सिद्ध करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे कि कि उन्होंने भारत के टुकड़े 'मुस्लिमों के लिए अलग देश' के नाम पर किए थे। पाकिस्तान की माँग के साथ यह कहा गया था कि हिंदू और मुसलमान, दो अलग मुल्क हैं, यह एकसाथ नहीं रह सकते। किंतु, भारत ने उस अवधारणा को झूठ सिद्ध किया। भारत में मुसलमान न केवल सुख से हैं, बल्कि तरक्की भी कर रहे हैं। उनकी आबादी भी बड़ी है। भारत में उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता है। वह अपने हक के लिए आवाज भी बुलंद कर लेते हैं। पाकिस्तान में स्थिति ठीक उलट है। इस्लाम के नाम पर बने 'पाकिस्तान' में गैर-मुस्लिमों के लिए कोई सम्मान एवं स्थान नहीं है। विभाजन के बाद से वहाँ हिंदुओं की जनसंख्या बढऩे की जगह लगातार खतरनाक ढंग से कम होती गई है। अपने अधिकारों की बात करना तो दूर की बात है, हिंदू वहाँ अपने जीवन के लिए ही संघर्ष कर रहा है। हिंदुओं के लिए तो पाकिस्तान एक तरह से नर्क हो गया है। उनके सामने तीन ही विकल्प हैं- एक, पाकिस्तान में रहना है तो अपना धर्म छोड़ कर इस्लाम कबूल करना होगा। दो, मुस्लिम नहीं बने तब बलात् धर्मांतरण के लिए तैयार रहो या मर जाओ। दोयम दर्जे का जीवनयापन करो। तीन, अपने धर्म एवं स्वाभिमान को बचाने के लिए पाकिस्तान छोड़ दो।

शनिवार, 7 अप्रैल 2018

चीन में 'अभिव्यक्ति' को रत्तीभर जगह नहीं

 कम्युनिस्ट  विचारधारा के विचारक एवं समर्थक उन सब राज्यों/देशों में अभिव्यक्ति की आजादी के झंडाबरदार बनते हैं, जहाँ उनकी सत्ता नहीं है। किंतु, जहाँ कम्युनिस्टों की सत्ता है, वहाँ वह अभिव्यक्ति की आजादी को पूरी तरह कुचल देते हैं। विशेषकर, कम्युनिस्ट विचारधारा और सरकार के विरुद्ध वह एक भी आवाज सहन नहीं कर सकते। कम्युनिस्ट विचार भीतर से तानाशाही है। जिस प्रकार तानाशाह अपनी, अपने निर्णयों और अपनी सत्ता के विरुद्ध आलोचना के स्वरों को दण्डित करते हैं, उसी तरह कम्युनिस्ट शासन व्यवस्था में आलोचकों के लिए कठोर दण्ड की व्यवस्था रहती है। ऐसा करके कम्युनिस्ट लोगों के बीच में भय का वातावरण बनाने का कार्य करते हैं, ताकि उनके विरुद्ध माहौल न बन सके। हालाँकि, यह संभव नहीं है। एक न एक दिन लोगों का आक्रोश फूटता है। अवसर आने पर जनशक्ति अपना काम कर देती है। क्योंकि, अपने विचार और मंतव्य को अभिव्यक्त करने की विशेष दक्षता ईश्वर ने मनुष्य को दी है। ईश्वर प्रदत्त व्यवस्था को आखिर अनैतिक ढंग से कब तक दबाया जा सकता है। भारत में इसका उदाहरण देखना हो तो त्रिपुरा सबसे ताजा मामला है।

रविवार, 1 अप्रैल 2018

जल रहा बंगाल, बंसी बजा रहीं ममता

 पश्चिम  बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति के कारण सांप्रदायिक हालात खतरे के निशान तक पहुँच गए हैं। पिछले दिनों में भले ही ममता बनर्जी पूजा-पाठ में शामिल होती हुई और मंदिर की परिक्रम लगाती हुई दिखाई दी हों, परंतु अब भी उनके लिए हिंदू प्राथमिकता में नहीं हैं। चार वर्ष में राजनीतिक परिदृश्य बदला है। अब हिंदू भी राजनीतिक एकजुटता दिखा रहे हैं। इस एकजुटता से डर कर ममता बनर्जी ने कुछ दिन से मस्जिद-दरगाह की गली के साथ मंदिर का मार्ग भी पकड़ लिया है। हालाँकि, पश्चिम बंगाल के हालात और तृणमूल कांग्रेस सरकार की नीति को देखकर स्पष्ट समझा जा सकता है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दिखावे के लिए भगवा चूनर ओढ़ी है। यदि वास्तव में उन्हें हिंदू समाज की चिंता होती तो पश्चिम बंगाल में हिंदू बिना किसी बाधा के अपने धार्मिक कार्यक्रम सम्पन्न कर पा रहे होते। बंगाल की सरकार की प्राथमिकता में हिंदू समाज होता, तो रामनवमी के जुलूस पर पत्थर और बम नहीं फेंके जाते।

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