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गुरुवार, 10 सितंबर 2026

समर्पण और सादगी के प्रतीक: प्रो. राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक रज्जू भैया संघ में आने से पहले 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में शामिल हुए थे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस जी ने अपने पूर्ववर्ती सरसंघचालकों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए प्रो. राजेन्द्र सिंह उपाख्य ‘रज्जू भैया’ की चतुर्थ सरसंघचालक के रूप में घोषणा की। देवरस जी का स्वास्थ्य उनका साथ नहीं दे रहा था। संघ कार्य के लिए प्रवास करना कठिन हो गया था। संघ कार्य की गति रुके नहीं, इसलिए उन्होंने सरसंघचालक का दायित्व रज्जू भैया को सौंप दिया। 11 मार्च, 1994 का दिन है, जब बालासाहब देवरस जी ने रज्जू भैया को संघ का नेतृत्व सौंपा था। उस दिन नागपुर के रेशिमबाग स्थित डॉ. हेडगेवार सभागार में संघ की निर्णायक सर्वोच्च इकाई ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ की बैठक चल रही थी। देशभर से लगभग एक हजार प्रतिनिधि उपस्थित थे और सरकार्यवाह एचवी शेषाद्रि संघ कार्य का वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत कर रहे थे। ठीक उसी समय, सरसंघचालक बालासाहब व्हीलचेयर से बैठक में आते हैं। उन्होंने अत्यंत शांत और भावुक वातावरण में सभा को संबोधित करते हुए कहा कि “पूजनीय गुरुजी ने मुझ पर यह जिम्मेदारी 1973 में सौंपी थी। आप सबके सहयोग और समर्थन से मैं अब तक उस जिम्मेदारी को अपने कंधों पर उठा पाया, लेकिन गिरते स्वास्थ्य के कारण मेरे लिए अब यात्रा करना संभव नहीं रह गया है। इस कारण सभी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के साथ परामर्श के बाद मैंने यह निर्णय लिया है कि यह जिम्मेदारी अब प्रोफेसर राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) अपने कंधों पर लें। मुझे पूरा भरोसा है कि रज्जू भैया को भी इसी प्रकार का सहयोग और समर्थन मिलता रहेगा। मैं भी एक स्वयंसेवक की भाँति अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहूँगा”। सुबह ठीक 10:40 बजे बालासाहब देवरस जी ने पुष्प गुच्छ और नारियल भेंट कर रज्जू भैया को संघ के चतुर्थ सरसंघचालक का दायित्व सौंपा। 72 वर्ष की उम्र में सरसंघचालक बने रज्जू भैया ने 1994 से 2000 तक, अर्थात् 6 वर्ष इस दायित्व का निर्वहन किया। 

इस अवसर पर सरसंघचालक के रूप में रज्जू भैया ने संक्षिप्त उद्बोधन दिया। अपने इस भाषण में उन्होंने संघ में अपनी नयी भूमिका और जिम्मेदारी को निभाने के लिए सबसे सहयोग और समर्थन की अपेक्षा की। उल्लेखनीय है कि रज्जू भैया संघ के इतिहास में पहले ऐसे सरसंघचालक थे, जिन्होंने संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के साथ प्रत्यक्ष रूप से कार्य नहीं किया था। जबकि उनसे पहले सरसंघचालक बालासाहब देवरस जी के लिए तो कहा जाता था कि ‘जिन्होंने हेडगेवारजी को नहीं देखा, वे बालासाहब को देख लें’। वहीं, श्रीगुरुजी ने भी आद्यसरसंघचालक डॉ. हेडगेवार के साथ लंबे समय तक काम किया और द्वितीय सरसंघचालक के रूप में उनके नाम की घोषणा भी स्वयं डॉक्टरजी ने की। वर्ष 1940 में डॉक्टरजी का निधन हुआ। वर्ष 1942 में रज्जू भैया संघ के संपर्क में आए। यहाँ उल्लेखनीय है कि संघ में प्रवेश से पूर्व रज्जू भैया ने 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में हिस्सा लिया था। इस दौरान बड़े कांग्रेसी नेताओं के साथ उनका संपर्क आया, जो जीवनभर बना रहा।

बापूराव मोघे से प्रभावित होकर संघ से जुड़े :

एमएससी की पढ़ाई के दौरान रज्जू भैया अपने सहपाठी श्यामनारायण श्रीवास्तव और पड़ोसी छात्र शांताराम के माध्यम से प्रयाग के विभाग प्रचारक बापूराव मोघे के संपर्क में आए। मोघे जी के व्यक्तित्व, उनकी तार्किक शैली और संघ के सिद्धांतों की स्पष्ट व्याख्या ने रज्जू भैया को अत्यंत प्रभावित किया। रज्जू भैया ने अपने घर के पास लगने वाली शाखा में नियमित जाना प्रारंभ कर दिया।

रज्जू भैया के मन में राष्ट्रीयता और गांधीवादी साहित्य से उपजे जो भी प्रश्न व संशय थे, उनका समाधान बापूराव मोघे जी ने किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मूलभूत सिद्धांतों को समझने के लिए उन्होंने मोघे जी के सुझाव पर कई पुस्तकों का अध्ययन किया, जिनमें प्रमुख हैं– डॉ. राधा कुमुद मुखर्जी की ‘फंडामेंटल यूनिटी ऑफ इंडिया’, डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल की ‘भारत की एकता के आधारभूत सिद्धांत’, सखाराम गणेश देउस्कर की ‘देश की बात’ और स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर की ‘हिंदू पदपादशाही’। इन पुस्तकों के अध्ययन से उनके मन के सारे संशय दूर हो गए और उन्हें दृढ़ विश्वास हुआ कि उनका जीवन राष्ट्र और समाज सेवा के लिए ही समर्पित होना चाहिए।

पहले बने सरकार्यवाह फिर सह–सरकार्यवाह :

रज्जू भैया की संगठन क्षमता को देखकर उन्हें वर्ष 1977 में सह–सरकार्यवाह बनाया गया। एक वर्ष बाद ही उन्हें सरकार्यवाह की जिम्मेदारी सौंप दी गई। सरकार्यवाह के रूप में रज्जू भैया ने 9 वर्ष तक कार्य किया। देशभर में प्रवास कर संगठन के कार्य को मजबूत किया। स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने 1987 में सरकार्यवाह का दायित्व छोड़ दिया और नये सरकार्यवाह एचवी शेषाद्रि के सहयोगी के रूप में सह–सरकार्यवाह बनकर संघकार्य किया। उन्होंने स्वयंसेवकों के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया– प्रत्येक भूमिका में रहकर संघकार्य करना है। 

भारत के बाहर प्रवास पर जाने वाले पहले सरसंघचालक : 

देशभर में संघकार्य का विस्तार हो, काम की व्यापकता बढ़े और वह सुदृढ़ हो– इसके लिए अधिकारियों के प्रवास की व्यवस्था है। सभी सरसंघचालकों ने संघ कार्य के विस्तार के लिए देशभर में व्यापक प्रवास किए थे। श्रीगुरुजी के लिए तो कहा जाता था कि उनका दूसरा घर रेलगाड़ी है। स्वास्थ्य से संबंधित चुनौतियों का सामना करते हुए रज्जू भैया ने भी खूब प्रवास किए। रज्जू भैया ऐसे सरसंघचालक भी बने, जिन्होंने भारत के बाहर भी प्रवास किए। उनसे पहले कोई भी सरसंघचालक विदेश यात्रा पर नहीं गए थे। परंतु रज्जू भैया ने उन देशों में प्रवास किया, जहाँ भारत से गए स्वयंसेवक ‘हिन्दू स्वयंसेवक संघ’ के बैनर तले काम कर रहे थे। उन्होंने अमेरिका, यूरोप, ब्रिटेन, अफ्रीका और दक्षिण–पूर्व एशिया में हिन्दू समाज के बंधुओं के साथ संवाद किया। उन्होंने लगभग 40 देशों की व्यापक यात्राएँ कीं। जापान की उनकी अंतिम विदेश यात्रा का उद्देश्य हिन्दू और बौद्ध परंपराओं के बीच संबंधों को मजबूत करना था, और तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था में उनके संभावित वैश्विक महत्व को रेखांकित करना था।

प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ (1993-2000) : 

  • रज्जू भैया का जन्म 1922 में हुआ। उनके पिताजी श्री कुंवर बलवीर सिंह उत्तर प्रदेश शासन के सिंचाई विभाग में अभियन्ता थे। 
  • उनकी प्राथमिक पढ़ाई नैनीताल में हुई। बाद की शिक्षा प्रयाग विश्वविद्यालय में हुई। केवल 21 वर्ष की आयु में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भौतिक शास्त्र में एम.एस.सी. की पदवी प्राप्त की। पूरे विश्वविद्यालय में उनका द्वितीय क्रमांक था। तुरन्त ही वे विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में नियुक्त किए गए।
  • नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक डॉ. सीवी रमन एमएससी अन्तिम वर्ष की परीक्षा लेने प्रयाग आये तो वे रज्जू भैया की प्रतिभा से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें बंगलूरू चलकर अपने साथ शोध कार्य में सहायक बनने का निमंत्रण दिया।
  • उत्तर प्रदेश में संघ कार्य की बढ़ती आवश्यकता को देखकर सन् 1966 में रज्जू भैया ने स्वेच्छा से भौतिक शास्त्र विभागाध्यक्ष पद से त्यागपत्र दिया और वे संघ के प्रचारक बने। 
  • आपने स्वास्थ्य कारणों से अपने दायित्व को छोड़ते हुए 10 मार्च, 2000 को नागपुर में आयोजित अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में श्री के.एस. सुदर्शन की सरसंघचालक के नाते घोषणा की।
  • 14 जुलाई, 2003 को रज्जू भैया जी का पुणे में स्वर्गवास हो गया।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 30 अगस्त, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ 'साधना के सौ वर्ष'

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

‘तत्त्वमसि’: संघ दर्शन और प्रचारक जीवन की कथा-यात्रा

देखें यह वीडियो : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, प्रचारक जीवन, संघ से जुड़े प्रश्नों एवं दृष्टिकोण पर केन्द्रित वरिष्ठ प्रचारक एवं साहित्यकार श्रीधर पराडकर जी का उपन्यास


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पक्ष एवं प्रतिपक्ष में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। लेकिन ‘तत्त्वमसि’ मुझे बाकी सब पुस्तकों से अलग लगती है। यह एक ऐसा उपन्यास है, जिसका कथानक संघ के प्रचारक को केंद्र में रखकर बुना गया है। ‘तत्त्वमसि’ कथा-साहित्य के माध्यम से संघ की आंतरिक कार्यप्रणाली और दर्शन को प्रस्तुत करने का एक रोचक प्रयास है। वरिष्ठ प्रचारक एवं साहित्यकार श्रीधर पराड़कर का यह उपन्यास प्रचारक जीवन, उसके त्याग और समाज-केंद्रित अध्यात्म को रेखांकित करता है।

गुरुवार, 3 सितंबर 2026

विश्व बंधुत्व का संदेश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन की यात्रा पर पहुँचे सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने अमेरिका के बाद कनाडा में भारतीय विचार को दुनिया के सामने रखा है। जिस प्रकार न्यूयॉर्क में उन्होंने दुनिया को शांति और सह-अस्तित्व के साथ चलने की राह दिखायी, उसी प्रकार उन्होंने टोरंटो में भारत के उदात्त विचार को सबके साथ साझा किया। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य जब भू-राजनीतिक तनावों, संकीर्ण राष्ट्रवाद और वैचारिक ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रहा है, तब भारत का विचार ही सही राह दिखा सकता है। प्रारंभ से लेकर आज तक विश्व में भारत की प्रतिष्ठा भी उसके दर्शन को लेकर रही है। कहना होगा कि टोरंटो में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का ‘हिंदू विश्व बंधु’ संबोधन केवल एक सांस्कृतिक व्याख्यान नहीं, बल्कि विश्व शांति के लिए एक अनिवार्य दृष्टि प्रस्तुत करता है। उनका यह कथन कि विविधता एकता की विरोधी नहीं बल्कि उसकी स्वाभाविक और सुंदर अभिव्यक्ति है, भारतीय चिंतन के उस मूल तत्त्व को रेखांकित करता है जिसे आज की खंडित दुनिया को गहराई से समझने की आवश्यकता है। भारतीय मनीषा ने विविधता को कभी संकट या विभाजन के स्रोत के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे एक ही चेतना के बहुरंगी स्वरूप के रूप में स्वीकार और सम्मानित किया है।

सोमवार, 31 अगस्त 2026

वैश्विक पटल पर आरएसएस

न्यूयॉर्क व्याख्यान : ‘साझा मानवता’ का व्यावहारिक मार्ग

न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आरएसएस के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेसन' (Universal Oneness Celebration) कार्यक्रम को संबोधित किया 

न्यूयॉर्क की ऐतिहासिक धरा पर ‘एक विश्व : एक मानवता शिखर सम्मेलन’ में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का उद्बोधन वस्तुतः भारत के शाश्वत आध्यात्मिक बोध और 'वसुधैव कुटुंबकम्' की युगीन अभिव्यक्ति है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जहाँ भौतिकवादी होड़, वैचारिक संकीर्णता, युद्ध की विभीषिका और अविश्वास का अंधकार संपूर्ण मानवता को ग्रस रहा है, वहाँ यह कार्य-आह्वान विश्व को विनाश के गर्त से निकालकर एकात्मता के प्रकाश की ओर ले जाने वाला एक सशक्त मार्गदर्शक सिद्ध होगा। भारत की यह सनातन परंपरा रही है कि जब-जब संसार में घृणा, विभाजन और संघर्ष की लहरें उठी हैं, तब-तब यहाँ के ऋषियों, मनीषियों और विचारकों ने संपूर्ण सृष्टि को एक परिवार मानकर शांति और एकात्मता का संदेश दिया है। ऐसे में याद आता है स्वामी विवेकानंद का शिकागो व्याख्यान। विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद ने रक्त रंजित और युद्धरत विश्व को शांति एवं सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाया था। आज जब आधुनिक सभ्यता तकनीक की पराकाष्ठा पर पहुँचकर भी मानवीय संवेदनाओं के संकट से जूझ रही है, तब सरसंघचालक जी का यह उद्बोधन वैश्विक चिंतन को एक नई दिशा प्रदान करता है।

सोमवार, 24 अगस्त 2026

रक्षाबंधन : समाज की एकता, समरसता और राष्ट्र-रक्षा का पावन संदेश

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बस्तियों में जाकर वंचित वर्ग के बंधुओं को रक्षासूत्र बाँधकर अपनेपन की भावना को करते हैं प्रकट

भारत में उत्सव की अनूठी परंपरा है। ये उत्सव हमारे समाज को एक सूत्र में पिरोने और जीवन मूल्यों को जगाए रखने का काम करते हैं। हमारे प्रत्येक उत्सव की रचना में समाज के लिए जरूरी संदेश हैं। ऐसा ही एक उत्सव है- रक्षाबंधन, जो हमें सामाजिक समरसता का संदेश देता है। आमतौर पर हम इसे भाई-बहन के पवित्र प्रेम के त्योहार के रूप में जानते हैं, लेकिन इसका वास्तविक विचार इससे कहीं अधिक बड़ा और गहरा है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने रक्षाबंधन को अपने छह उत्सवों में शामिल किया है। संघ ने इस पर्व को संपूर्ण समाज को एकजुट करने, आपस में प्रेम-भाव बढ़ाने और देश की रक्षा का संकल्प लेने वाले महापर्व के रूप में देखा और उसे उसी ढंग से मनाना शुरू किया। यह पर्व हमें सिखाता है कि हम अपने समाज, संस्कृति और मातृभूमि की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहें। संघ ने समाज को स्मरण कराया कि रक्षाबंधन केवल एक धागा बांधने की रस्म नहीं है। हमारे यहाँ संबंधों की नींव विश्वास पर टिकी होती है, और यह धागा उसी विश्वास की डोर है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस तरह एक धागा बिखरे हुए अनगिनत मोतियों को जोड़कर एक सुंदर माला बना देता है, ठीक वैसे ही यह रक्षासूत्र भी समाज के अलग-अलग लोगों को आपस में जोड़कर एक कर देता है। पुराने समय में यह पर्व सिर्फ भाई-बहन तक ही सीमित नहीं था। जब भी समाज या देश पर कोई संकट आता था, तो लोग एक-दूसरे को रक्षासूत्र बांधकर साथ खड़े रहने और मदद करने का भरोसा दिलाते थे।

रविवार, 16 अगस्त 2026

आरएसएस बदल रहा है अपना ढांचा

संघ शताब्दी वर्ष : मध्यप्रदेश में अब तीन प्रांत (मध्यभारत , मालवा और महाकौशल) की जगह होंगे 7 संभाग, मध्य भारत में भोपाल एवं ग्वालियर संभाग, मालवा की जगह इंदौर और उज्जैन संभाग, महाकौशल की जगह सागर, रीवा और जबलपुर संभाग

यह आलेख 'आयुध Updates' के मार्च-अप्रैल 2026 अंक में प्रकाशित हुआ है। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर समाज में अब स्वीकार्यता के साथ-साथ एक विश्वास भी बन गया है। सज्जनशक्ति संघ के साथ मिलकर समाज परिवर्तन के आंदोलन से जुड़ना चाहती है, वहीं संघ भी अपने लक्ष्य यानी समाज के साथ एकाकार होने की ओर बढ़ना चाहता है। हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष के बाद अपने अगले पड़ाव की ओर कदम बढ़ा रहा है। शताब्दी वर्ष में अब तक आयोजित कार्यक्रमों में समाज ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया है। समाज की बड़ी ताकत संघ के संपर्क में आई है। इसलिए अपने अगले पड़ाव में संघ समाज की सज्जन शक्ति को साथ लेकर भारत के निर्माण की नयी कहानी लिखने की तैयारी कर रहा है। इसकी एक झलक हरियाणा के पट्टीकल्याणा (समालखा) में आयोजित अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों एवं भविष्य की रणनीति में देखी जा सकती है। पिछले कुछ समय से एक चर्चा बहुत जोरों से थी कि संघ अपनी भौगोलिक संरचना में बदलाव करने जा रहा है, संघ की प्रांत रचना खत्म हो जाएगी, क्षेत्र रचना में भी बदलाव होगा। इस चर्चा पर अब प्रतिनिधि सभा में मुहर लग गई है। हाँ, संघ की भौगोलिक संरचना में बदलाव हो रहा है। अब चर्चा इस बात की अधिक हो रही है कि आखिर संघ को इस परिवर्तन की आवश्यकता क्यों पड़ी?

रविवार, 9 अगस्त 2026

श्रीगुरुजी के ऐतिहासिक ‘तीन पत्र’

संघ शताब्दी वर्ष : गोलवलकर जी ने अपनी देह छोड़ने के पूर्व संघ की आगे की व्यवस्था और स्वयंसेवकों को संदेश देने के लिए तीन पत्र लिखे थे, जो उनके देवलोकगमन के बाद पढ़े गए

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ पत्र लिखने के अभ्यासी थे। पत्रों के माध्यम से श्रीगुरुजी का कार्यकर्ताओं के प्रति स्नेह, राष्ट्रप्रेम और हिन्दू समाज की एकात्मता के प्रति उनका संकल्प स्पष्ट झलकता है। उनके पत्रों में संघ कार्य के विस्तार, वैचारिक स्पष्टता, अनुशासन और व्यक्तिगत जीवन में मूल्यों को अपनाने पर जोर दिया गया है। कार्यकर्ताओं, सामाजिक एवं राजनीतिक नेतृत्व को लिखे उनके अनेक पत्र चर्चित हैं परंतु उनके ‘तीन पत्र’ अत्यंत महत्व के हैं। संघ को जानने-समझने की रुचि रखनेवाले बंधुओं को श्रीगुरुजी के ये तीनों पत्र अवश्य पढ़ना चाहिए। ये पत्र उन्होंने अपनी देह त्यागने से पूर्व लिखे थे। वर्ष 1972 में श्रीगुरुजी का स्वास्थ्य तेजी से गिरना शुरू हो गया था। परंतु, उसके बाद भी उन्होंने क्षणभर भी स्वयं को संघकार्य से अलग नहीं किया। वर्ष 1973 में जब उन्हें यह आभास होने लगा कि अब भौतिक देह से विश्राम लेने का समय आ गया है, तब उन्होंने अपने देहावसान के बाद संघ कार्य की समुचित व्यवस्था के बारे में विचार प्रारंभ कर दिया। इसी क्रम में ये तीन ऐतिहासिक पत्र लिखे गए। श्रीगुरुजी ने 2 अप्रैल 1973 को अपने हाथ से तीन पत्र लिखे और अखिल भारतीय व्यवस्था प्रमुख पांडुरंग पंत क्षीरसागर को सौंप दिए। उन्होंने क्षीरसागर जी को निर्देश दिए कि ये पत्र मेरे जाने के बाद सार्वजनिक रूप से पढ़े जाएं, जिनमें से दो पत्र बालासाहब देवरस पढ़ें। श्रीगुरुजी की इच्छा के अनुरूप तीनों पत्र सुरक्षित रख दिए गए। 5 जून 1973 को श्रीगुरुजी ने अपनी देह का त्याग किया। अगले दिन यानी 6 जून को इस पुण्य आत्मा के पार्थिव शरीर की अंत्येयात्रा प्रारंभ होने के पूर्व इन पत्रों को पढ़कर सुनाया गया। एक पत्र में उनके उत्तराधिकार की घोषणा की गई। दूसरे पत्र में आग्रह किया कि उनका कोई स्मारक नहीं बनाया जाए। वहीं, तीसरे पत्र में उनके हृदय की उदारता एवं व्यक्तित्व की महानता के दर्शन होते हैं, जिसमें वे विनयभाव से क्षमायाचना करते हैं कि उनके व्यवहार से कभी किसी का हृदय दु:खी हुआ हो, तो क्षमा करें। श्रीगुरुजी के ये तीन पत्र ‘बीज’ थे, जिन्होंने आगे चलकर संघ की कार्यपद्धति एवं संस्कृति को समृद्ध किया।

रविवार, 2 अगस्त 2026

गुरु के रूप में मार्गदर्शन करता है ‘भगवा ध्वज’

संघ शताब्दी वर्ष : गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर स्वयंसेवक ‘भगवा ध्वज’ के समक्ष गुरु दक्षिणा समर्पित करते हैं और संघकार्य के प्रति अपना समर्पण बढ़ाने का संकल्प लेते हैं

एआई से निर्मित प्रतीकात्मक चित्र

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भगवा ध्वज को जो स्थान दिया गया है, वह इस संगठन की विशिष्टता को दर्शाता है। संघ के लिए भगवा केवल ध्वज मात्र नहीं है, अपितु यह उसके प्रेरणा और मार्गदर्शन का केंद्र बिन्दु है। संघ में भगवा ध्वज को ‘गुरु’ के स्थान पर प्रतिष्ठित किया गया है। सामान्यतौर पर यही देखने में आता है कि किसी सांस्कृतिक/धार्मिक संगठन का संस्थापक ही उस संगठन के अनुसरणकर्ताओं के लिए गुरु के रूप में सम्मानित होता है। परंतु संघ इस सामान्य परंपरा से अलग लकीर खींचता दिखायी देता है। जिस प्रकार किसी संस्था से सम्बद्ध लोग गुरु के मार्गदर्शन के अनुसार व्यक्तिगत एवं सामाजिक क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक भगवा ध्वज से प्रेरणा प्राप्त कर सामाजिक क्षेत्र में कार्य करते हैं। संघ में गुरु के रूप में भगवा ध्वज को मान्यता दिए जाने का प्रसंग बहुत प्रेरक है। यह एक प्रसंग ही संघ के ध्येय, उसकी कार्यपद्धति और महानता को बताने के लिए पर्याप्त है।

सोमवार, 27 जुलाई 2026

“यदि अस्पृश्यता (छुआछूत) गलत नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है” – बालासाहब देवरस

संघ शताब्दी वर्ष : हिन्दू एकता एवं समरसता पर बालासाहब के क्रांतिकारी विचार


हिन्दू समाज की एकता और सामाजिक समरसता पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस के विचार अत्यंत स्पष्ट, प्रखर और क्रांतिकारी थे। ‘वसंत व्याख्यानमाला’ का उनका भाषण विश्व के ऐतिहासिक एवं महान भाषणों में शामिल किया जा सकता है। 8 मई, 1974 में पुणे में हुए अपने इस भाषण में छुआछूत (अस्पृश्यता) को लेकर बालासाहब ने जो कहा, वैसा खरा-खरा शायद ही किसी ने बोला हो। अब्राहम लिंकन के प्रसिद्ध विचार- “अगर गुलामी अनैतिक या गलत नहीं है, तो फिर कुछ भी गलत नहीं है”- का उल्लेख करते हुए बालासाहब ने कहा- “अगर छुआछूत गलत नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है”। जातिगत भेदभाव के निर्मूलन के लिए काम करने वाले महानुभाव अक्सर इस ओर या उस ओर खड़े दिखाई देते हैं। उनके विचारों में राजनीति, परस्पर द्वेष और कटुता रहती है। लेकिन बालासाहब के विचारों में स्पष्टता के साथ-साथ आत्मीयता और बंधुता की झलक दिखाई देती है। सामाजिक समरसता पर उनके विचार समाधानमूलक और व्यावहारिक हैं। बालासाहब जी का मानना था कि “विषमता नष्ट करने के प्रयासों में सभी का सहभाग अपेक्षित है। संयम के साथ उत्तम व्यवहार के द्वारा यह प्रयास होंगे तभी उसमें सफलता मिलेगी”।

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

“जिन्होंने हेडगेवारजी को नहीं देखा, वे बालासाहब को देख लें”

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस के लिए कहा जाता था कि वे संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की प्रतिमूर्ति थे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस उपाख्य बालासाहब देवरस संघ की पहली शाखा के स्वयंसेवक थे। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर के मोहिते बाड़े में जो शाखा लगाई थी, बालासाहब उसी शाखा के स्वयंसेवक थे। डॉक्टर साहब के संपर्क में आने के बाद 1927 में केवल 11 वर्ष की आयु में बालासाहब देवरस ने शाखा जाना प्रारंभ कर दिया। संघ शिल्पी डॉक्टर साहब ने स्वयं अपने हाथों से बालासाहब के व्यक्तित्व को गढ़ा और उन्हें प्रशिक्षित किया। उन्होंने संघ रूपी बीज बालासाहब के हृदय में बोया। जिस प्रकार छत्रपति शिवाजी महाराज ने ‘हिन्दवी स्वराज्य’ का सपना अपने मित्रों के हृदय में जैसे का तैसा उतार दिया था, उसी प्रकार डॉक्टर साहब ने भी स्वयंसेवकों के पहले समूह के मन-मस्तिष्क में संघ की विराट अवधारणा को उतार दिया था। देवरस जी ने डॉक्टर साहब की आँखों से ही संघ को देखा, उनकी दृष्टि के अनुरूप ही संघ की सृष्टि का विकास एवं विस्तार किया। 12 वर्ष से लेकर 70 वर्ष की आयु तक बालासाहब ने एक तपस्वी और सच्चे स्वयंसेवक की भाँति अपना जीवन जिया। उन्होंने सबके सामने उदाहरण प्रस्तुत किया कि राष्ट्र के लिए किस प्रकार जिया जाता है। संघ के स्वयंसेवक बालासाहब में संघ सृष्टि के निर्माता डॉक्टर साहब की छवि देखते थे। वर्ष 1943 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रशिक्षण शिविर (संघ शिक्षा वर्ग) पुणे में चल रहा था, जहाँ एक दिन बालासाहब देवरस का बौद्धिक होना था। बौद्धिक से पहले वक्ता का परिचय कराने के लिए तत्कालीन सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ खड़े हुए। बालासाहब के परिचय में उन्होंने कहा कि “आपमें से कइयों ने डॉ. हेडगेवारजी को नहीं देखा होगा। अगर आप बालासाहब देवरस को देखेंगे तो आपके सामने डॉ. हेडगेवारजी खड़े नजर आएंगे”।

सोमवार, 13 जुलाई 2026

बालासाहब ने शाखा को बनाया ‘अखंड साधना’ का केंद्र

संघ शताब्दी वर्ष : संघ कार्य के विस्तार और शाखाओं के सुदृढ़ीकरण के शिल्पी थे बालासाहब देवरस, उनकी पहल पर ही सातों दिन शाखा लगना शुरू हुई, सुबह की शाखा भी उनकी देन है


संघ कार्य के विस्तार, शाखाओं के विकास एवं सुदृढ़ीकरण में तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस (मधुकर दत्तात्रेय देवरस) का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला रहा है। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार अकसर स्वयंसेवकों से कहते थे कि शाखा अच्छी चलेगी तो समाज के सब काम होंगे। समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में काम करने के लिए राष्ट्रीय विचार से ओत-प्रोत कार्यकर्ता शाखा से ही तैयार होंगे। इसलिए अच्छी शाखा चलना जरूरी है। एक बार युवकों के साथ बातचीत के दौरान डॉक्टर साहब ने प्रश्न किया कि “आदर्श शाखा का लक्षण क्या है?” इसके उत्तर में बालासाहब ने जो कहा, वह उनके विचारों की स्पष्टता को दर्शाता है। उन्होंने कहा- “संघ कार्य को अपना जीवित कार्य समझकर, संघ कार्य के लिए सारा समय लगाने के लिए प्रस्तुत युवक जिस शाखा से विपुल संख्या में खड़े होंगे, ऐसी शाखा को मेरी दृष्टि से ‘आदर्श शाखा’ कहना उचित होगा”। संघ कार्य को राष्ट्रव्यापी बनाना है, तो उसके लिए जरूरी है कि आदर्श शाखाएं खड़ी हों। डॉक्टर साहब की शाखाओं की संकल्पना को धरातल पर उतारने और शाखाओं का व्यापक नेटवर्क खड़ा करने में बालासाहब देवरस ने जो संगठनात्मक कौशल दिखाया, वह अनुकरणीय है। बालासाहब की संगठन कुशलता से डॉक्टर साहब भली प्रकार परिचित थे। इसलिए उन्होंने नागपुर में संघ कार्य की जिम्मेदारी बालासाहब को सौंपी थी। संघ के कार्य को नागपुर से बाहर लेकर जाने के लिए यह आवश्यक था कि नागपुर में अच्छा काम चले। नागपुर के कार्यवाह के रूप में बालासाहब ने जिस प्रकार से संघ कार्य को आधार दिया, उस आधार पर ही आगे चलकर संघ कार्य राष्ट्रव्यापी हुआ। 

देखें यह वीडियो - आरएसएस और राजनीति पर सटीक विश्लेषण

गुरुवार, 9 जुलाई 2026

श्रीराम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण : कर्कश शोर में संघ का विनम्र संदेश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने दिया वक्तव्य

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर निर्मित भव्य मंदिर में चढ़ावे से चोरी की घटना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण, निंदनीय और करोड़ों रामभक्तों की अटूट आस्था पर आघात करने वाली है। इस हृदयविदारक घटना पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले द्वारा जारी किया गया वक्तव्य इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि संघ के लिए श्रीराम की मर्यादा, पवित्रता और समाज की भावनाएं सर्वोपरि हैं। संघ ने न केवल इस घटना पर गहरी पीड़ा व्यक्त की है, बल्कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास को उसकी जवाबदेही का कठोरता से स्मरण भी कराया है। संघ ने साफ शब्दों में कहा है कि व्यवस्था और संचालन की कमियों को अविलंब दूर किया जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल की जांच के आधार पर दोषियों को कठोरतम दंड मिले और भविष्य के लिए एक निर्दोष, पारदर्शी और शुद्ध वित्तीय प्रबंधन की व्यवस्था स्थापित हो, यह संघ की दो टूक मांग है।

रविवार, 28 जून 2026

लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए ऐतिहासिक संघर्ष

संघ शताब्दी वर्ष : आपातकाल के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा कर दिया, लोकतंत्र की बहाली के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया 

विश्व में भारतीय लोकतंत्र का उदाहरण दिया जाता है। यह सच है कि दुनिया में सबसे अधिक जीवंत और विशाल लोकतंत्र भारत में ही दिखायी देता है। लोकतंत्र भारत की परंपरा में है, इसलिए उसको जीना और संभालना हमें बखूबी आता है। परंतु, 25 जून 1975 वह दिनांक है, जब भारत के लोकतंत्र पर संकट आ गया था। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार ने देश पर आपातकाल थोप दिया। लोकतंत्र को घसीटकर सींखचों के पीछे डाल दिया गया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पंख नोंच लिए गए। रातों-रात आम नागरिकों के मौलिक अधिकारी समाप्त कर दिए गए। संविधान और लोकतंत्र पर हुए इस हमले का प्रतिकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने आगे बढ़कर किया। श्रीमती गांधी को भी यह ज्ञात था कि लोक संघर्ष समिति के आपातकाल विरोधी जनांदोलन को संगठित रूप से चलाने के पीछे संघ का अनुशासित कार्यकर्ता है। इसलिए उन्होंने 4 जुलाई 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। परंतु, यह प्रतिबंधन संघ के स्वयंसेवकों को आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष एवं सत्याग्रह करने से रोक नहीं सका। संविधान और लोकतंत्र को बचाने के लिए जिस प्रकार आगे बढ़कर संघ के स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह करते हुए पुलिस की बर्बाता का सामना किया, उसे देखकर संघ से असहमति रखनेवाले नेता एवं विचारकर भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुरीद बन गए।

सोमवार, 22 जून 2026

करोड़ों देशभक्त नागरिकों के दिलों में है आरएसएस का पंजीयन

संघ शताब्दी वर्ष : भारत का संविधान अपने नागरिकों को संगठन, आंदोलन, विचार समूह बनाने का अधिकार देता है। इसके लिए राज्य से पंजीकरण कराना अनिवार्य नहीं है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पंजीकृत क्यों नहीं है? यह अपने आय-व्यय का हिसाब-किताब क्यों नहीं देता है? आरएसएस पारदर्शिता नहीं रखता है। ये ऐसे सवाल हैं, जो संघ को बदनाम करने या उसके प्रति समाज में संदेह पैदा करने के लिए अकसर उछाले जाते हैं। हालांकि, इन सवालों का कोई औचित्य नहीं है। समाज से लेकर न्यायालय तक इन्हें खारिज कर चुके हैं। मजेदार और हास्यास्पद बात यह है कि जो लोग संविधान लहराते हुए घूम रहे हैं, उन्हें यह भी नहीं पता है कि संविधान ही यह अधिकार देता है कि भारत के नागरिक बिना किसी पंजीयन के संगठन, समिति, समूह बनाकर समाज में काम कर सकते हैं। इसलिए कहा जाता है कि संविधान लहराने की वस्तु नहीं है, अपितु उसका अध्ययन करना चाहिए और पालन भी। लेकिन नहीं, उन्हें तो प्रोपेगेंडा खड़ा करने में ही आनंद आता है। जरा सोचिए, यदि आरएसएस के लिए पंजीयन अनिवार्य होता तब क्या कांग्रेस बिना पंजीयन संघ को इतने वर्ष चलने देती? कांग्रेस की सरकारों ने संघ को तीन बार प्रतिबंधित किया लेकिन उसको पंजीयन के लिए कभी बाध्य नहीं किया। महात्मा गांधी की हत्या के झूठे आरोप लगाकर जब संघ पर प्रतिबंध लगाया था, तब उसके विरुद्ध स्वयंसेवकों के राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा कर दिया। सरकार को बिना शर्त संघ से प्रतिबंध हटाना पड़ा। सरकार ने अपने आपको शर्मिंदगी से बचाने के लिए संघ से उसके संविधान की लिखित कॉपी तो मांगी, लेकिन उस समय भी पंजीयन नहीं माँगा। यह स्थिति तब है जबकि उस समय की सरकार येन-केन-प्रकारेण संघ को कुचलना या उस पर अपना नियंत्रण चाहती थी। बहरहाल, उसके बाद भी सरकार ने कभी संघ का पंजीयन नहीं माँगा। हाँ, संघ को रोकने के सारे हथकंडे अवश्य अपनाए गए, आज भी अपनाए जा रहे हैं। लेकिन समाज का विश्वास जीतकर संघ अजेय शक्ति के रूप में आगे बढ़ रहा है। इस मामले में सच यह है कि आज भी पंजीयन की माँग नहीं होती अपितु इस फर्जी प्रश्न की आड़ में अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने का प्रयास किया जाता है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संदर्भ में प्रारंभ से यह स्पष्ट किया जाता रहा है कि संघ भारत के सभी कानूनों का सम्मान करता है और उनके दायरे में रहकर ही कार्य करता है।

शनिवार, 20 जून 2026

श्रीगुरुजी के सरसंघचालक बनने की कहानी

संघ शताब्दी वर्ष : “सरसंघचालक का दायित्व विक्रमादित्य के सिंहासन जैसा है। अगर कोई अज्ञानी लड़का भी इस पर बैठता है, तो वह भी इस पर बैठकर एक बराबर न्याय करेगा” - श्रीगुरुजी


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (डॉक्टर साहब) के बाद इस राष्ट्रीय विचार के आंदोलन की बागडोर कौन संभालेगा? अगला सरसंघचालक कौन होगा? यह प्रश्न जब किसी के मन में भी नहीं आया था, तब से डॉक्टर साहब ने सरसंघचालक के लिए योग्य व्यक्ति की खोज प्रारंभ कर दी थी। यह बहुत आवश्यक था कि संघ का नेतृत्व ऐसे व्यक्तित्व को सौंपा जाए, जिसके प्रति श्रद्धा हो। जिसके नेतृत्व में संघ सरिता का वेग बढ़े, न कि उसमें बहता पानी ही सूख जाए। डॉक्टर साहब की आँखों के सामने से ऐसे अनेक संगठनों की कहानियां गुजर रही थीं, जो एक व्यक्ति की संकल्पना के साथ शुरू हुए और उनके जाने के साथ ही धुंधले पड़ गए। हालांकि, डॉक्टर साहब ने राष्ट्रीय आंदोलन की जो कहानी लिखी थी, उसके बीज उन्होंने अनेक लोगों के मन में बो दिए थे। अब भारत को परम वैभव पर पहुँचाने का संघ का सपना केवल डॉक्टर साहब का सपना नहीं रह गया था, यह सपना सबका अपना सपना बन गया था। डॉ. हेडगेवार व्यक्तियों के बड़े पारखी थे। कोई हीरा व्यापारी भी असली हीरा पहचानने में धोखा खा सकता है लेकिन डॉक्टर साहब व्यक्ति की पहचान में सिद्ध थे। संन्यास जीवन से वापस सामाजिक क्षेत्र में लौटे माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ को अपना उत्तरदायित्व सौंपने का निर्णय वे अपने मन में कर ही चुके थे। डॉक्टर साहब ने संघ में सामूहिक निर्णय की कार्यपद्धति का निर्माण किया था, इसलिए उन्होंने अपने निर्णय को संघ पर थोपा नहीं अपितु उस समय के अन्य दायित्ववान कार्यकर्ताओं से भी इस संबंध में परामर्श किया। श्रीगुरुजी के संबंध में जो विचार डॉक्टर साहब के थे, अन्य साथियों के मन में भी उन्होंने वही भाव पाया।

मंगलवार, 9 जून 2026

विश्व का नेतृत्व करेगा संगठित भारत

संघ शताब्दी वर्ष : सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और मुख्य अतिथि कुमार मंगलम बिरला ने दिखाई भविष्य के भारत की तस्वीर, वर्तमान की तैयारियों की ओर किया संकेत

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता विकास वर्ग-2 के समापन समारोह में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और मुख्य अतिथि प्रसिद्ध उद्योगपति एवं पद्मभूषण से सम्मानित कुमार मंगलम बिरला के वक्तव्य भविष्य के भारत की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं, जो स्वयं सशक्त और आत्मनिर्भर होकर विश्व बंधुत्व की भावना का प्रवर्तक बनेगा। जिस समय दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी-बड़ी शक्तियों के बीच संघर्ष चल रहा है, शांति की कोई राह दिखाई नहीं देती, तब भारत का दर्शन सबका मार्ग प्रशस्त कर सकता है। दुनिया को सुख-शांति से जीना है, तब उसे भारत की ओर देखना ही होगा। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने उचित ही कहा कि “भारत का समय आ गया है। कलह और स्वार्थ में फँसकर लड़खड़ाती हुई इस दुनिया को आज केवल भारत की ही आवश्यकता है”। भारत दुनिया को इस कलह से बाहर निकाल सकता है, उसके लिए सबसे पहले हमें अपने देश को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना पड़ेगा। दुनिया भी उसी के सत्य को सुनती है, जो शक्ति सम्पन्न होता है।

बुधवार, 3 जून 2026

खेत बचाओ अभियान : मिट्टी बचेगी, तभी बचेगा किसान और देश का भविष्य

केन्द्र सरकार ने मिट्टी के संरक्षण के लिए जनांदोलन खड़ा करने का संकल्प लिया है। यह अत्यंत आवश्यक आंदोलन है, जिसे केवल सरकार के प्रयास से नहीं अपितु जनता (विशेषकर किसानों) की भागीदारी एवं समझदारी से ही सफल बनाया जा सकता है। मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के ग्राम रमासिया से केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राष्ट्रव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ की घोषणा की है। स्मरण रहे कि कृषि मंत्री स्वयं भी कृषक परिवार से आते हैं, इसलिए खेती के बारे में उनकी समझ अधिक जमीन और वास्तविक है। आज कृषि भूमि की जो स्थिति है, उसको लेकर सब ओर अनुत्तरित चिंता पसरी दिखायी देती है।

सोमवार, 1 जून 2026

भोपाल विलीनीकरण आंदोलन में आरएसएस का मौन किंतु प्रखर संघर्ष

स्वतंत्रता आंदोलन और आरएसएस : जनांदोलन के आगे नवाब ने घुटने टेके, 1 जून 1949 को भोपाल रियासत का भारत में हुआ विलय

भोपाल में स्थिति विलीनीकरण स्मारक : विलीनीकरण शहीद स्मृति द्वार

हम भारत के लोगों ने स्वतंत्रता के लिए लगभग 1000 वर्ष संघर्ष किया। 15 अगस्त, 1947 को वह दिन आया, जिसके लिए पीढ़ियों ने संघर्ष किया। इसे विडम्बना ही कहेंगे कि एक ओर 15 अगस्त 1947 को पूरा देश स्वतंत्रता का उत्सव मना रहा था, वहीं दूसरी ओर झीलों की नगरी भोपाल पर नवाब की हठधर्मिता का काला साया मंडरा रहा था। नवाब ‘स्वतंत्रता’ का अपहरण कर लेना चाहता था। पाकिस्तान परस्त नवाब हमीदुल्लाह खान ने 24 अगस्त, 1947 को भोपाल को ‘स्वतंत्र देश’ बनाए रखने की घोषणा कर दी। भोपाल की जनता ने नवाब के इस निर्णय का विरोध किया। जिस नवाब ने अपने दिमाग के दरवाजे बंद कर लिए हों, उसे भला लोगों के मन की बात कहाँ सुनायी देती। उसने जनता के विरोध को जूतों तले रौंदने का प्रयास किया। परंतु, नवाब सफल नहीं हो सका क्योंकि भोपाल विलीनीकरण आंदोलन का एक सिरा संघ के स्वयंसेवकों ने भी थाम लिया था। आम जनता के साथ अब संघ के कार्यकर्ता भी इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में आ गए थे। संघ जिस काम को हाथ में लेता है, उसमें सफलता सुनिश्चित रहती ही है।

रविवार, 31 मई 2026

संघ शिक्षा वर्ग में डॉ. अंबेडकर ने देखी समरसता

संघ शताब्दी वर्ष : वर्ष 1939 में पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग के सायंकालीन बौद्धिक सत्र में बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने स्वयंसेवकों को किया था संबोधित

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से आयोजित शिक्षा वर्गों में स्वयंसेवक क्या सीख रहे हैं, इसकी प्रत्यक्ष अनुभूति कराने के लिए संघ-सृष्टि के बाहर के महानुभावों को वर्ग में आमंत्रित करने की परंपरा प्रारंभ से रही है। प्रारंभ में बौद्धिक या समापन समारोह की अध्यक्षता के लिए महानुभावों को आमंत्रित किया जाता था, लेकिन अब तो वर्ग के बीच में भी समाज के प्रमुखजनों को ‘वर्ग दर्शन’ कराने की योजना रहती है। जब स्वयंसेवक सामूहिक रूप से मैदान पर अभ्यास कर रहे होते हैं या भोजन कर रहे होते हैं, उस समय विशिष्ट अतिथियों को आमंत्रित करके उन्हें वर्ग दर्शन कराया जाता है। आपको यह जानकर अच्छा लगेगा कि संघ शिक्षा वर्ग का दर्शन करने के लिए महात्मा गांधी से लेकर बाबा साहब डॉ. अंबेडकर तक आ चुके हैं। सामाजिक क्रांति के अग्रदूत बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर संघ शिक्षा वर्ग की प्रत्यक्ष अनुभूति करने के लिए वर्ष 1939 में पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग में आए थे। शिक्षा वर्ग की व्यवस्थाएँ, स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण और उनके व्यक्तित्व में आए परिवर्तन देखकर बाबा साहब अत्यंत प्रसन्न हुए थे।

देखें वीडियो : आरएसएस की शाखा में आए डॉ. भीमराव अंबेडकर


सामाजिक समरसता स्थापित करने के लिए अथक प्रयास कर रहे बाबा साहब डॉ. अंबेडकर ने यह सुन रखा था कि अस्पृश्यता निवारण में आरएसएस को उल्लेखनीय सफलता मिली है। इस बात की अनुभूति बाबा साहब ने संघ शिक्षा वर्ग में बहुत समीप से की। पुणे के संघ शिक्षा वर्ग के सायंकालीन बौद्धिक सत्र में डॉ. अंबेडकर आए थे। उस समय वर्ग में संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार भी उपस्थित थे। वर्ग में लगभग 525 स्वयंसेवक संघ कार्य का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे। डॉ. अंबेडकर ने डॉ. हेडगेवार से सबसे पहला प्रश्न यही किया कि इन 525 स्वयंसेवकों में से अस्पृश्य कितने हैं? डॉ. हेडगेवार ने उनसे कहा कि आप स्वयं ही इनसे पूछ लीजिए। बाबा साहब स्वयंसेवकों के बीच में गए, लेकिन पूर्ण गणवेश पहने सभी स्वयंसेवक एक समान ही दिख रहे थे। उनमें कौन स्पृश्य (सवर्ण) है और कौन अस्पृश्य, यह पहचाना ही नहीं जा सकता था। बाबा साहब भी नहीं पहचान पाए। तब बाबा साहब ने स्वयंसेवकों से कहा कि आपमें से जो अस्पृश्य हों, वे एक कदम आगे आएँ। लेकिन कतारबद्ध स्वयंसेवकों के बीच कोई हलचल नहीं हुई। एक भी स्वयंसेवक पंक्ति से बाहर नहीं आया।

गुरुवार, 28 मई 2026

संघ शिक्षा वर्ग बनाम समर कैंप

संघ शताब्दी वर्ष : ‘मैं’ से ‘हम’ के बोध की यात्रा में लेकर जाते हैं संघ शिक्षा वर्ग, जीवन को सार्थक बनाने की मिलती है सीख

व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया में ‘समर कैंप’ हमारे जीवन का हिस्सा बन गए हैं। गर्मी की छुट्टियां लगते ही युवा अपने व्यक्तित्व को निखारने, नया कौशल सीखने और समय का सदुपयोग करने के लिए अपनी अभिरुचि के अनुसार ‘समर कैंप’ में जाते हैं। नि:संदेह ये समर कैंप युवाओं को बहुत कुछ सिखाते हैं। इसलिए रचनाधर्मी और उत्साही युवाओं के बीच समर कैंप के प्रति आकर्षण बढ़ा है। वहीं, जब हम समर कैंप की तुलना संघ शिक्षा वर्ग से करते हैं, तब स्वयंसेवकों के उत्साह को देखकर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि इन वर्गों में न केवल व्यक्तित्व का विकास होता है, अपितु राष्ट्र साधना के लिए भी उनका मन तैयार होता है। भारत माँ की सेवा का जो संकल्प स्वयंसेवकों ने धारण किया है, उसको निभाने का प्रशिक्षण भी इन वर्गों में मिलता है। समर कैंप की तुलना करते हुए संघ शिक्षा वर्गों के संबंध में एक बात कहनी हो तो- संघ शिक्षा वर्ग सोने पर सुहागा हैं। यहाँ युवा समय प्रबंधन, कार्यक्रम प्रबंधन, अनुशासन, सामंजस्य, योग, कौशल, कला, संवेदनशीलता, वक्तृत्व कला इत्यादि गुण तो सीखता ही है, इसके अलावा वह अपनी गौरवशाली संस्कृति से परिचित होता है, राष्ट्रप्रेम का भाव और गहरा होता है, नेतृत्व करने की क्षमता का विकास होता है। इस सबके साथ युवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे यशस्वी आंदोलन को समाज में ले जाने का प्रशिक्षण भी प्राप्त करते हैं। संघ शिक्षा वर्ग में प्रशिक्षित युवा ही आगे चलकर संघ के बड़े दायित्व का निर्वहन करने के लिए तैयार होते हैं। हाँ, उनके मन में एक साधारण स्वयंसेवक की भाँति समर्पित भाव से संघ कार्य करने का दायित्व बोध भी गहरा होता है।