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सोमवार, 1 सितंबर 2025

प्रतिभाशाली युवाओं से देश की सेवा करने का आग्रह

भारत के लिए प्रतिभा पलायन दशकों से एक गंभीर चुनौती रहा है। हमारे देश में सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों में शिक्षा प्राप्त करने वाले युवा, जिन्होंने सरकारी खर्च पर उच्च शिक्षा हासिल की, अकसर स्नातक होने के बाद अच्छे ‘पैकेज’ के आकर्षण में दूसरे देशों की ओर रुख कर लेते हैं। अपनी प्रतिभा से उस देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सोचिए, अगर ये प्रतिभाशाली लोग विदेश नहीं गए होते और भारत में रहकर ही अपनी सेवाएं देते, तब आज भारत कहाँ होता? केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भोपाल में आईआईएसईआर के दीक्षांत समारोह में युवा वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए ‘ब्रेन ड्रेन’ (प्रतिभा पलायन) के मुद्दे पर चिंता जताई है और देश की सेवा करने की एक भावनात्मक अपील भी की है। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान की अपील- “देश छोड़कर मत जाना” केवल भावनात्मक आग्रह भर नहीं है अपितु इसके पीछे राष्ट्रीय विकास की ठोस चिंता है। जब योग्य युवा देश में रहकर अपनी ऊर्जा और ज्ञान का उपयोग करेंगे, तभी शोध, नवाचार और तकनीकी प्रगति भारत को आत्मनिर्भर बना पाएगी।

मंगलवार, 22 जुलाई 2025

पाठ्यक्रम से साफ हुई कम्युनिस्टों की दूषित सोच

अब पढ़ाया जाएगा- भारत का सच्चा और संतुलित इतिहास


राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने अपनी पाठ्य पुस्तकों को संशोधित करने का बहुप्रतीक्षित काम किया है। देश में लंबे समय से यह बहस चल रही थी कि पाठ्य पुस्तकों में भारत का संतुलित इतिहास क्यों नहीं पढ़ाया जाता है? आखिर वह क्या सोच रही होगी जिसने भारतीय नायकों को इतिहास में न केवल सीमित स्थान दिया, अपितु उनको पराजित राजा की तरह ही प्रस्तुत किया? वहीं, भारत को लूटने के उद्देश्य से आए मुगल आक्रांताओं का न केवल महिमामंडन किया अपितु इतिहास की पुस्तकों में उन्हें सर्वाधिक स्थान देकर यह स्थापित करने का प्रयास किया कि मुगल काल ही भारत का वास्तविक इतिहास है। बौद्धिक चतुराई दिखाकर मुगलिया शासन की क्रूरताओं पर पर्दा डाल दिया गया। अब जबकि एनसीईआरटी ने भारत के इतिहास को भारतीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने की दिशा में जनाकांक्षाओं के अनुरूप पहल की है, तब यही सोच विरोध कर रही है।

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2021

शिक्षक के हाथ में राष्ट्र के उत्थान-पतन की बागडोर

‘स्वतंत्र भारत के 75 वर्ष और शिक्षकों की भूमिका’




तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये।

आयासायापरं कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम्॥ - श्रीविष्णुपुराण 1-19-41

अर्थात, कर्म वही है जो बन्धन का कारण न हो और विद्या भी वही है जो मुक्ति की साधिका हो। इसके अतिरिक्त और कर्म तो परिश्रम रुप तथा अन्य विद्याएँ कला-कौशल मात्र ही हैं॥

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

‘सबको शिक्षा-अच्छी शिक्षा’ की ओर बढ़ते कदम

भारत सरकार के प्रकाशन विभाग की पत्रिका 'योजना' के जुलाई-2018 के अंक में प्रकाशित

- जगदीश उपासने एवं लोकेन्द्र सिंह 

किसी भी राष्ट्र की पहचान उसके मानव संसाधन से बनती है। जबकि श्रेष्ठ मानव संसाधन शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करता है। एक सामान्य किंतु महत्वपूर्ण बात सभी जानते हैं कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति वहाँ के नागरिकों पर निर्भर करती है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त किए हुए नागरिक ही अपने देश की प्रगति में सहयोग कर सकते हैं। शिक्षित नागरिक ही अपने देश को प्रगति के पथ पर आगे ले जाने में सक्षम होते हैं। स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा के महत्व को समझाते हुए यहाँ तक कहा है कि 'यदि शिक्षा से सम्पन्न राष्ट्र होता तो आज हम पराभूत मन:स्थिति में न आए होते।' भारत में स्वामी विवेकानंद ऐसे संन्यासी हुए जिन्होंने नागरिकों को शिक्षित बनाने पर सर्वाधिक जोर दिया। भारत जैसे विविधता सम्पन्न और विशाल देश में अब भी शिक्षा सब तक नहीं पहुँच सकी है। अनेक स्थानों पर शिक्षा के उपक्रम प्रारंभ तो हो गए किंतु उसमें गुणवत्ता नहीं है। दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था में भारतीय दृष्टिकोण ही नदारद है। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने अपने पहले साल से ही शिक्षा में गुणात्मक एवं भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार सुधार का शुभ संकल्प ले लिया था। सरकार के संकल्प 'सबको शिक्षा-अच्छी शिक्षा' की पूर्ति के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय योजनाबद्ध तरीके से निरंतर कार्य कर रहा है। पिछले चार वर्ष में स्कूली शिक्षा के साथ-साथ उच्च शिक्षा में भी महत्वपूर्ण आवश्यक कदम सरकार ने उठाए हैं। शिक्षा के दोनों स्तर पर जितने भी प्रयास हुए हैं, सराहनीय हैं।

मंगलवार, 8 सितंबर 2015

अपनी भाषा में हो शिक्षा

 ज ब किसी राष्ट्र पर विदेशी भाषा हावी हो जाती है तो उसकी संस्कृति, परंपरा और उसके जीवन मूल्यों के समक्ष गहरा संकट खड़ा हो जाता है। उस राष्ट्र की संतति भ्रम की स्थिति में होती है। बाहरी भाषा के प्रभुत्व के कारण एक ही राष्ट्र में भाषाई आधार पर भेदभाव की दीवार खड़ी हो जाती है। भारत जैसे बहुभाषी देश में तो एक विदेशी भाषा ने भारतीय भाषाओं को आमने-सामने शत्रु की तरह खड़ा करवा दिया है। इसके साथ ही विदेशी भाषा के प्रभाव में वह राष्ट्र स्वभाविक प्रगति भी नहीं कर पाता है। अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण यह स्थिति भारत के साथ दिखती है। दरअसल, भाषा महज संवाद की सेतु नहीं है। संवाद सेतु से कहीं अधिक, भाषा संस्कृति की धुरी है। संस्कृति भाषा पर ही टिकी रहती है। भाषा बदलने पर संस्कृति बदल जाती है, मूल्य बदल जाते हैं। बात सांस्कृतिक मूल्यों तक भी सीमित नहीं है बल्कि सार्वभौमिक सत्य है कि कोई भी राष्ट्र अपनी भाषा के साथ ही आगे बढ़ता है। हम दुनिया के उन्नत और प्रगतिशील राष्ट्रों का इतिहास-वर्तमान उलट-पलट कर जब देखेंगे तो ज्ञात होगा कि उन्होंने निज भाषा को नहीं त्यागा। लोक व्यवहार से लेकर पठन-पाठन और शोध तक अपनी मातृभाषा में किए। मातृभाषा में शिक्षा का क्या महत्व है, इसे दुनिया के उन्नत राष्ट्रों जापान, जर्मनी, रूस, अमरीका और चीन से लेकर इजराइल तक ने साबित करके दिखाया है। दुनिया के शिक्षाविद् भी यही मानते हैं कि शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। महामना मदनमोहन मालवीय, महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अम्बेडकर, रविन्द्रनाथ ठाकुर, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे महापुरुषों ने भी मातृभाषा में शिक्षा पर जोर दिया है। भारत में समय-समय पर गठित शिक्षा आयोगों राधाकृष्णन आयोग और कोठारी आयोग सहित अन्य आयोगों ने भी मातृभाषा में ही शिक्षा की अनुशंसा की है।

शनिवार, 22 अगस्त 2015

सोच-विचार कर करें शिक्षा में बदलाव

 भा रत सरकार एक बार फिर स्कूली शिक्षा प्रणाली में बदलाव करने का विचार कर रही है। आठवीं कक्षा तक विद्यार्थियों को फेल नहीं करने के नियम को सरकार बदलने जा रही है। शिक्षा से संबंधित केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड में बनी सहमति के बाद राज्य सरकारों से रजामंदी मांगी गई है। मध्यप्रदेश के स्कूली शिक्षा मंत्री पारस जैन ने यह मामला उठाया था कि जब से पांचवी और आठवीं की बोर्ड परीक्षा समाप्त की गई है तब से शिक्षा का स्तर गिर गया है। विद्यार्थियों को पता है कि वे फेल नहीं होंगे, इसलिए पढ़ाई पर उनका ध्यान नहीं रहता। प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर बच्चों की नींव कमजोर होने से उच्च शिक्षा में भी दिक्कतें आती हैं। हमें याद है कि आठवीं तक बोर्ड की परीक्षा खत्म करने के पीछे तर्क दिया गया था कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता सुधरेगी, बच्चों के दिमाग पर परीक्षा का भूत सवार नहीं रहेगा तो रचनात्मकता बढ़ेगी। बच्चों के दिमाग से तनाव हटेगा। इन महत्वपूर्ण तथ्यों के प्रकाश में आठवीं तक किसी बच्चे को फेल नहीं करने का निर्णय बिना तैयारी किए ही ले लिया था।

सोमवार, 1 जून 2015

व्यक्ति और राष्ट्र हित में मूल्यपरक शिक्षा

 शि क्षा के अभाव से कितनी समस्याएं और विसंगतियां उत्पन्न होती हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। विशेषकर मूल्यहीन शिक्षा व्यवस्था के कारण तो कई प्रकार की नई समस्याएं जन्म ले लेती हैं। अपनी बौद्धिक और तर्क क्षमता से दुनिया पर विजय प्राप्त करने वाले युवा संन्यासी स्वामी विवेकानन्द तो यहां तक कहते हैं- 'यदि शिक्षा से सम्पन्न राष्ट्र होता तो आज हम पराभूत मन:स्थिति में न आए होते।' इस देश का सबसे अधिक नुकसान शिक्षा के अभाव के कारण ही हुआ है। भारत के संदर्भ में शिक्षा का अभाव ही एकमात्र चुनौती नहीं है बल्कि उचित शिक्षा का अभाव ज्यादा गंभीर मसला है। इस बात से किसी को इनकार नहीं है कि एक समर्थ राष्ट्र के निर्माण में शिक्षा व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह कहना ज्यादा उचित होगा कि राष्ट्र निर्माण में शिक्षा पहली और अनिवार्य आवश्यकता है। लेकिन, यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत को कैसी शिक्षा की आवश्यकता है? सब लोग पढऩा-लिखना सीख लें, अंगूठे की जगह हस्ताक्षर करना सीख लें, केवल इतना भर शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए क्या? मनुष्य अपने हित-अहित के संबंध में जागरूक हो जाए, उसे इतना शिक्षित करने मात्र से काम चलेगा क्या? अच्छे-भले मनुष्य को पैसा कमाने की मशीन बना देना, शिक्षा है क्या? अच्छी नौकरी पाने के योग्य हो जाना, अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो जाना, किताबें पढऩा-लिखना सीख लेना ही शिक्षा और शिक्षा का उद्देश्य नहीं है, तो भला क्या है?

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

माननियों की शिक्षा का हो इंतजाम

 अ कसर यह बहस खड़ी की जाती है कि विधायक-सांसद बनने के लिए भी न्यूनतम योग्यता तय होनी चाहिए। इंजीनियर बनने के लिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई जरूरी है, डॉक्टर बनने के लिए एमबीबीएस, एमडी सहित अन्य डिप्लोमा अनिवार्य हैं, शिक्षक बनने के लिए भी मापदण्ड तय हैं लेकिन ऐसा क्यों है कि विधायक-सांसद बनने के लिए किसी प्रकार की शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य नहीं है। ऐरा-गैरा नत्थूखेरा, कोई भी, अंगूठाछाप भी, विधानसभा से लेकर देश के सर्वोच्च सदन संसद में प्रवेश पा जाता है। न्यूनतम योग्यता क्यों तय नहीं की जाती? जवाब में अमूमन यही कहा जाता है कि शैक्षणिक योग्यता अलग है और मुद्दों की समझ अलग बात है। राजनेता के पास कागज की डिग्रियों से अधिक मानवीय संवेदनाओं का होना जरूरी है। राजनीति में आने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि नेता अपने क्षेत्र, परिवेश और देश-प्रदेश की नब्ज को पहचानता हो। नेता बनने के लिए जरूरी है कि वह लोगों की समस्याओं को समझता हो। कुछ हद तक यह सही बात भी है कि शैक्षणिक योग्यता से ही समझदारी और संवेदनाएं नहीं आती हैं। जिन्दगी असल पाठ खुद ही पढ़ा देती है। राजनीति में अधिक कारगर वह आदमी है जो संवेदनशील है, न कि उच्च शिक्षित मशीनी आदमी। यूपीए सरकार की कैबिनेट में दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों से उच्चतम शिक्षा प्राप्त मंत्री शामिल थे, लेकिन क्या उनकी शैक्षणिक योग्यता का देश को लाभ मिला? बीती सरकार का कार्यकाल देखें तो पढ़े-लिखे लोगों ने देश का अधिक बेड़ागर्ग किया। लेकिन, इस सबके बावजूद अनेक मौकों पर नेताओं की टिप्पणी, उनके क्रियाकलाप और उनके विचार-चिंतन को देखकर लगता है कि माननियों की शिक्षा का कुछ तो इंतजाम होना चाहिए। ज्यादा वक्त नहीं बीता जब राजनीतिक पार्टियां अपने कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण का पूरा ध्यान रखती थीं। चिंतन शिविर, राष्ट्रीय अधिवेशन, प्रादेशिक कार्यकर्ता प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन पार्टियां अपने स्तर पर किया करती थीं, ताकि उनके कार्यकर्ता अधिक संवेदनशील और जागरूक बन सकें। लोक जीवन में आने के लिए किस प्रकार का व्यवहार जरूरी है, इन प्रशिक्षण शिविरों में राजनीतिक कार्यकर्ताओं को सिखाया जाता था। हाल के कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति और राजनेताओं का जैसा चरित्र सामने आया है, उसे देखकर समाज का प्रबुद्ध वर्ग चिंतित है। अपने समय के सर्वाधिक लोकप्रिय राजपुरुष और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह राजनीतिक बदलाव की शुरुआत की है, उससे आशा की उम्मीद बंधी है। लगता है कुछ सार्थक परिवर्तन की बात की जा सकती है। इसलिए यह बहस और अधिक ताकत से खड़ी होने की कोशिश में है कि माननियों के शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था तय होनी चाहिए। 
       माननीय अपने परिवेश, अपने प्रदेश और अपने देश के प्रति कितने जागरूक हैं? समसामयिक घटनाओं को लेकर उनका कैसा चिंतन है? सामाजिक क्षेत्र में हो रहे सद्प्रयासों पर उनकी कितनी पैनी नजर है? यह बताने के लिए मध्यप्रदेश के माननियों का उदाहरण संभवत: सबसे सही होगा। बचपन बचाओ आंदोलन के पुरोधा और सर्वेसर्वा कैलाश सत्यार्थी को शांति के लिए नोबेल पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई। कैलाश सत्यार्थी चूंकि मध्यप्रदेश के विदिशा जिले के निवासी हैं, इसलिए पत्रकारों ने मध्यप्रदेश विधानसभा के सदस्यों से इस पर प्रतिक्रिया लेनी चाही। युवा पत्रकार सुधीर दण्डौतिया ने भाजपा के एक मंत्री से सवाल पूछा कि मध्यप्रदेश के कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार मिलने पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? उन माननीय के लिए तो एकमात्र कैलाश ही इस दुनिया में हैं, वह हैं भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय। मंत्री ने चट से जवाब दिया- 'हमें खुशी है। हमारे नेता हैं। उनको तो नोबेल पुरस्कार मिलना ही था। उन्होंने इंदौर में बहुत काम कराया है। हरियाणा विधानसभा चुनाव में अभूतपूर्व जीत पार्टी को दिलाई है। नोबेल पुरस्कार मिलने पर उन्हें बहुत बधाई।' टीवी पत्रकार श्री दण्डौतिया ने उन्हें समझाने का प्रयास भी किया लेकिन वे कहां किसी की सुनते। खैर, पत्रकारों को एक बढिय़ा खबर हाथ लग गई। फिर क्या था, अलग-अलग चैनल और अखबारों के पत्रकारों ने विधानसभा भवन से बाहर निकल रहे मंत्री-विधायकों को पकड़-पकड़ कर पूछना शुरू किया- 'कैलाश जी को नोबेल पुरस्कार मिला है, इस पर आप क्या कहना चाहेंगे? ' धड़ाधड़ कैलाश विजयवर्गीय की प्रशंसा में जवाब आने शुरू हो गए। यह स्थिति ऐसी पार्टी (भाजपा) के नेताओं की थी, जो खुद को 'औरों से अलग' मानकर चलती है। जिसके नेताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे पढ़ते-लिखते भी हैं। उनकी अपनी एक विचारधारा है। हालांकि कांग्रेस सहित दूसरे दल के नेता भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने कहा कि अब तो केन्द्र और राज्य दोनों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। झूठे पुरस्कार लेकर आना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। कैलाश जी अच्छे नेता हैं लेकिन फिर भी वे नोबेल पुरस्कार के लायक नहीं हैं। अब सोचिए क्या यह सवाल वाजिब नहीं हो जाता कि माननियों को शिक्षा की जरूरत है। दुनियाभर के इलेक्ट्रोनिक चैनल्स और अखबार पाकिस्तान की मलाला और भारत के कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार मिलने के समाचारों, विश्लेषणों और शुभकामनाओं से भरे पढ़े थे, तब भी हमारे माननीय बेखबर थे। ऐसे में इनसे कैसे अपेक्षा की जाए कि आमजन के सरोकारों को लेकर जागरूक रहते होंगे। 
      सदन में किस तरह का व्यवहार अपेक्षित है, इसकी भी जानकारी शायद इन्हें न हो। तभी तो सदन में जूता-चप्पल, कुर्सी, मिर्च पाउडर फेंकने की घटनाएं हमारे सामने आती हैं। संभवत: हमारे माननीय यह मानकर चलते हैं कि सदन होता ही इसलिए है। कर्नाटक विधानसभा के सदस्य तो दो-चार कदम और आगे तक निकल गए हैं। उन्होंने तो विधानसभा भवन को अश्लील फिल्म देखने का अड्डा बना दिया। सदन में चल रही गंभीर बहस के बीच कोई पोर्न फिल्म देख रहा है तो कोई प्रियंका गांधी के ग्लैमर को नजदीक से देखने के लिए उसका चित्र बार-बार जूम करके देख रहा है। जिन माननियों को इन सब काम में रुचि नहीं हैं, वे बेफिक्र होकर खर्राटे ले रहे होते हैं। खुले आम सदन में सो रहे माननियों से कैसे अपेक्षा की जाए कि ये जागरूक हैं, देश की समस्याओं के हल के लिए इन्होंने व्रत लिया है। क्यों नहीं माना जाए कि सदन में बैठकर आपत्तिजनक गतिविधियों से संलिप्त माननियों के दिमाग में गंदगी भरी होगी? फिर गंदे दिमाग कैसे समाज को स्वच्छ करेंगे? एक बार निर्वाचित होने के बाद जब माननियों को कुछ समझ नहीं आता तो लोकप्रिय होने के लिए, खबरों में बने रहने के लिए, न्यूज चैनल पर छाए रहने के लिए ऊल-जुलूल बयान देना ही इनका प्रिय काम हो जाता है। हकीकत यह है कि यदि कोई जिम्मेदार राजनेता हो तो उसके लिए देश में इतना काम है कि उसे सांस लेने की फुरसत न मिले। लेकिन, हमारे कई माननियों का कार्य-व्यवहार देखकर तो लगता है कि देश में करने के लिए अब कुछ काम ही शेष नहीं है।  
       लोकतंत्र जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन व्यवस्था है। लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार प्राप्त हैं। सबकी हैसियत एक वोट की है। प्रत्येक नागरिक चुनाव में खड़ा हो सकता है, चुनाव जीतकर विधानसभा-संसद जा सकता है। इसे लोकतंत्र की खामी न माना जाए। यह तो लोकतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन, जिस तरह से समाज ने समय की मांग को देखते हुए पुरानी शासन व्यवस्थाओं में फेरबदल किए, उसी तरह अब भी कुछ बदलाव तो लाए ही जा सकते हैं। चुनाव लडऩे की आजादी सबको हो लेकिन उसके लिए निर्धारित योग्यता होना अनिवार्य कर दी जाए। इससे लोकतंत्र का कुछ बिगड़ेगा नहीं बल्कि कुछ तो सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे ही। इससे भी आगे बढ़ा जा सकता है। चूंकि सरकार में अलग-अलग मंत्रालय हैं। जिन माननियों को ये मंत्रालय सौंपे जाएं, जरूरी नहीं कि उन्हें उसकी समझ हो। ऐसे में क्यों न नई सरकार के गठन पर मंत्री-सांसदों का प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएं। वर्तमान में भी यह व्यवस्था है लेकिन प्रभावी नहीं है। उसे प्रभावी बनाया जाना चाहिए। प्रशिक्षण कार्यशाला में जनप्रतिनिधि अनिवार्य रूप से शामिल हों, इसे सुनिश्चित किया जाना जरूरी है। ताकि वे संसदीय कार्यवाही की प्रणाली को, अपने विभाग की कार्यप्रणाली को, संबंधित मंत्रालय की चुनौतियों को समझ सकें। ताकि उन्हें यह पता चल सके कि उन्हें क्या काम करने हैं। ताकि उन्हें समझ आए कि उन्हें कहां अपनी ऊर्जा बर्बाद नहीं करनी है? यह जिम्मेदारी अकेले सरकार की नहीं है। पार्टियों को भी अपने स्तर पर यह चुनौती स्वीकार करनी होगी कि जिन कार्यकर्ताओं को वे आगे बढ़ा रहीं हैं, उनकी योग्यता को भी बढ़ाएं। चुनाव जरूरी लोकप्रियता के बूते जीते जा सकते हैं लेकिन चुनाव जीतने के लिए जनता को जो सपने दिखाए हैं, उन्हें पूरा करने के लिए तो काबिलियत ही काम आने वाली है। पार्टी संगठनों को सोचना होगा कि विधायक-सांसद-मंत्री जब अर्मादित, हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण व्यवहार करते हैं तो बदनामी सिर्फ माननियों की नहीं होती बल्कि पार्टी का चरित्र भी गिरता है। पार्टी की भूमिका माता-पिता की तरह है। उनका बेटा (कार्यकर्ता) जैसा व्यवहार करेगा, उसका प्रतिसाद माता-पिता (पार्टी-संगठन) को ही मिलेगा। अच्छा व्यवहार करेगा का यश मिलेगा और बुरा व्यवहार करेगा तो ताने मिलेंगे कि जरूरी माता-पिता (पार्टी-संगठन) ने अच्छे संस्कार नहीं दिए होंगे। जरूर उनके घर में भी ऐसा ही माहौल होगा। नरेन्द्र मोदी के आने से भारतीय राजनीति में आई बदलाव की इस बयार के बीच हर कोई यह अपेक्षा कर रहा है कि शायद अब माननीय 'शिक्षित' हो जाएंगे।

सोमवार, 12 जनवरी 2015

शिक्षा नीति में दिखे विवेकानन्द का चिंतन

 यु वा नायक स्वामी विवेकानन्द को याद करते ही बुद्धि, हृदय और शरीर में ऊर्जा का संचार होने लगता है। स्वामी विवेकानन्द सबके प्रेरणा स्रोत हैं। लेकिन, युवाओं के तो वे हृदय सम्राट हैं। यही कारण है कि उनकी जयंती (१२ जनवरी) युवा दिवस के रूप में मनाई जाती है। देश की वर्तमान परिस्थितियों के हिसाब से देखें तो स्वामी विवेकानन्द, उनके विचार, उनका चिंतन, उनकी सीख आज बहुत प्रासंगिक हैं। दरअसल, भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। निकट भविष्य में हम और अधिक जवां होंगे। लेकिन, क्या ये तरुणाई हमारी ताकत बन सकेगी? यह बड़ा प्रश्न है। ये तरुणाई देश को शक्ति तभी दे सकेगी जब इनकी आस्था भारत में होगी। फिर एक सवाल उठता है कि क्या आज की शिक्षा नीति ऐसी है कि जिससे युवाओं में राष्ट्र के प्रति श्रद्धा के भाव जागृत होते हैं? समर्पण की बात आती है? 'राष्ट्र सबसे पहले' यह भाव जागृत होता है क्या? यही नहीं, क्या हम अपनी तरुणाई को राष्ट्र के उद्देश्य के अनुरूप शिक्षित कर रहे हैं? हमारी शिक्षा नीति क्या राष्ट्र के उद्देश्य के अनुरूप है? स्वामी विवेकानन्द ने जिस मैन मेकिंग एजुकेशन की बात कही है, क्या आज की शिक्षा नीति वैसी है? आज की शिक्षा विद्यार्थी को मनुष्य बनाने की प्रक्रिया की ओर ले जाती है या पैसा कमाने की मशीन बनाने का प्रयास करती है। स्वामी विवेकानन्द अर्थवादी शिक्षा व्यवस्था का कड़ा विरोध करते थे लेकिन, आज की शिक्षा व्यवस्था तो पूरी तरह अर्थ आधारित होकर रह गई है। क्या इस अर्थवादी शिक्षा नीति से हम अपने राष्ट्र को फिर से शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी बना सकेंगे? मैकाले की शिक्षा पद्धति का उद्देश्य मनी मेकिंग, पैसा बनाने की शिक्षा देना था और स्वामी विवेकानन्द की शिक्षा का उद्देश्य मैन मेकिंग, व्यक्ति निर्माण था। हमें मैकाले की शिक्षा नीति पर आगे बढऩा चाहिए या फिर स्वामी विवेकानन्द के विचारों को भारत की शिक्षा नीति में शामिल करना चाहिए? यदि हम सही अर्थों में भारत निर्माण करना चाहते हैं, भारत को शिक्षा के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व करते हुए देखना चाहते हैं तो भारत की शिक्षा नीति में स्वामी विवेकानन्द के विचारों का समावेश होना ही चाहिए। शिक्षा नीति में परिवर्तन समय की मांग है और यह परिर्वतन स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा संबंध उपदेशों को ध्यान में रखकर होना चाहिए। 
       स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षा पर बहुत बल दिया था। उनका स्पष्ट मानना था कि भारत का सबसे अधिक नुकसान किसी ने किया है तो वह अशिक्षा ने किया। चंद लोगों के मस्तिष्क तक शिक्षा के सीमित रह जाने से भी भारत का अनिष्ट हुआ है। इस संबंध में २४ अप्रैल १८९७ को 'भारती' की सम्पादक सरला घोषाल को दार्जिलिंग से लिखे उनके पत्र को देखना होगा। स्वामीजी लिखते हैं- 'भारत के सत्यानाश का मूल कारण यही है कि देश की सम्पूर्ण विद्या-बुद्धि राजशासन और दम्भ के बल से केवल मुट्ठीभर लोगों के अधिकार में रखी गई है। यदि हमें फिर से उन्नति करनी है, तो हमको उसी मार्ग पर चलना होगा अर्थात् जनता में विद्या का प्रचार करना होगा।' सम्पूर्ण भारत को शिक्षित करने का चिंतन जब स्वामी विवेकानन्द करते हैं तो वे प्रत्येक उपाय पर विचार करते हैं। गांव-गांव, नगर-नगर घूम रहे साधु और संन्यासियों को भी वे उनका मूल काम याद दिलाने का प्रयास करते हैं। भारत को शिक्षित करने के अपने संकल्प को पूरा करने के लिए वे इन्हें शिक्षा अभियान से जोडऩे की बात करते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने २३ जून १८९४ को शिकागो से मैसूर के महाराजा को पत्र लिखा कि मान लीजिए महाराज आपने हरएक गांव में एक नि:शुल्क पाठशाला खोल दी, तो भी इससे कुछ काम न होगा। क्योंकि, भारत में इतनी अधिक गरीबी है कि गरीब लड़के पाठशाला आने की बजाय खेतों में अपने माता-पिता को मदद देना या दूसरे किसी उपाय से रोटी कमाने का प्रयत्न करना अधिक पसंद करेंगे। यदि पहाड़ मुहम्मद के पास न आये, तो मुहम्मद ही पहाड़ के पास क्यों न जाय? यदि गरीब लड़का शिक्षा के मन्दिर तक न आ सके, तो शिक्षा को ही उसके पास जाना चाहिए। हमारे देश में हजारों एकनिष्ठ और त्यागी साधु हैं, जो गांव-गांव धर्म की शिक्षा देते फिरते हैं। यदि उनमें से कुछ लोग सुनियन्त्रित रूप से ऐहिक विषयों के भी शिक्षक बनाये जाएं तो गांव-गांव, दर-दर जाकर वे केवल धर्मशिक्षा ही नहीं देंगे, बल्कि ऐहिक शिक्षा भी दिया करेंगे। 
      ऐहिक शिक्षा के साथ ही धर्मशिक्षा पर भी स्वामी जी का जोर था। वे विज्ञान की शिक्षा के साथ-साथ अध्यात्म की शिक्षा को भी अनिवार्य मानते थे। शिक्षा के विषय में समय-समय पर दिए गए उनके विचारों से यह परिलक्षित होता था। तीन जनवरी १८९५ को शिकागो से सर एस. सुब्रह्मण्य अय्यर को पत्र में स्वामी विवेकानन्द लिखते हैं- 'बहुत सोच-विचार के बाद मेरे मन ने तय किया है कि पहले मद्रास में धर्मशिक्षा के लिए एक विद्यालय खोलना ठीक होगा, फिर इसका कार्यक्षेत्र धीरे-धीरे बढ़ाया जाएगा। नवयुवकों को वेदों, विभिन्न भाष्यों और दर्शनों की पूरी शिक्षा देनी होगी, जगत् के अन्य धर्मों का ज्ञान भी इसमें शामिल होगा।' लेकिन, हमने क्या किया? शिक्षा को धर्मविहीन कर दिया। सेकुलरिज्म के चक्कर में फंस कर हमने स्वामी विवेकानन्द के विचारों को खूंटी पर टांग दिया। शिक्षा को नैसर्गिक नहीं रहने दिया। यही कारण है कि आज अभिभावक, शिक्षक, राजनेता और प्रबुद्ध वर्ग मूल्य आधारित शिक्षा की जरूरत महसूस कर रहे हैं। समाज की 'गति' देखकर धर्मविहीन, मूल्यहीन, असंवेदनशील शिक्षा में परिवर्तन की बात हर कोई कर रहा है। स्वामी विवेकानन्द के लिए धर्म अंग्रेजी का शब्द 'रिलीजन' नहीं था। स्वामीजी ने धर्म की व्याख्या उन नियमों और संहिताओं के रूप में की, जो प्रकृति में करोंड़ों वर्षों से प्रचलित हैं। इसलिए देश की तथाकथित सेकुलर बिरादरी को धर्मशिक्षा की बात से बिदकने की जरूरत नहीं है। स्वामी विवेकानन्द ने बार-बार बल दिया है कि धर्म ही भारत की आत्मा है। उन्होंने कहा है -'मैं धर्म को शिक्षा का सबसे आंतरिक सारतत्व मानता हूं।' धर्मविहीन वर्तमान शिक्षा मनुष्य को डॉक्टर, इंजीनियर, टेक्नोक्रेट, ब्यूरोक्रेट आदि बनने के लिए प्रेरित करती है। जबकि वास्तव में मनुष्य की शिक्षा का उद्देश्य स्वयं को पहचानने का होना चाहिए। यूनेस्को ने भी शिक्षा पर प्रकाशित अपनी रिपोर्ट का शीर्षक दिया था- 'कुछ होने के लिए सीखना, न कि कुछ बनने के लिए सीखना।' स्वामीजी भी बार-बार कहते रहे कि विद्यार्थी को कुछ बनाने की जरूरत नहीं है। उसके भीतर सबकुछ है, बस उसे बाहर आने दो। 
      यह बात जग जाहिर है कि एक समय में भारत शिक्षा के क्षेत्र में सबसे आगे था। भारत में विश्वविद्यालय जैसे संस्थाएं थीं, जिनमें शिक्षा प्राप्त करने के लिए दुनियाभर से विद्यार्थी आते थे। नगरों में ही नहीं ग्रामीण क्षेत्रों में भी पाठशालाएं थीं, यह बात प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक धर्मपाल ने भी अपने शोध से प्रमाणित की है। धर्मपाल ने अपनी पुस्तक 'अ ब्यूटीफुल ट्री' में बताया है कि अंग्रेजों के सर्वे के मुताबिक १८वीं सदी में भारत में लाखों की संख्या में स्कूल थे। भारतीयों ने चिंतन, अध्यात्म, सामाजिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, कला ही नहीं परंतु विज्ञान के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व उपलब्धियां अर्जित की थीं। मैकाले की शिक्षा नीति के प्रभाव में आकर भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में अपना नेतृत्व तो खोया ही, स्वाभिमान भी खो दिया। स्वामी विवेकानन्द लगातार भारतीयों से आग्रह करते रहे कि अपने तईं भेड़-बकरी होने का भ्रम दूर करो। खुद को पहचानो, तुम सिंह हो, अमृत के पुत्र हो। अत्यंत अल्पायु में बहुत कुछ मार्गदर्शन देकर स्वामीजी चले गए। अब उनके मार्गदर्शन पर आगे बढऩे का काम हमारा होना चाहिए। हमारे शिक्षाविदों के सामने ऐसी शिक्षा नीति बनाने की चुनौती है, जिसमे बूते फिर से हम शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी हो जाएं। लेकिन, शिक्षा नीति तय करने से पहले यह जान लेना जरूरी होगा कि स्वामी विवेकानन्द असल में शिक्षा किसे मानते थे? स्वामी विवेकानन्द देवघर (वैद्यनाथ) से २३ दिसम्बर १९०० को एक बंगाली महिला को पत्र में लिखते हैं कि आखिर शिक्षा क्या है? क्या वह केवल कुछ पुस्तकों का पठन-पाठन ही है? नहीं। फिर क्या विविध विषयों का ज्ञान? वह भी नहीं है। शिक्षा तो वह है, जिसके सहारे इच्छाशक्ति का प्रवाह एवं उसकी अभिव्यक्ति संयत की जाती है। अब यह विचार कीजिए कि क्या वह शिक्षा कहलाने के योग्य है, जिसके फलस्वरूप इच्छाशक्ति पीढिय़ों से बलपूर्वक अनवरत अवरुद्ध होकर आज मृतप्राय हो रही है। जिसके प्रभाव से नवीन विचारों की कौन कहे, पुराने तक एक-एक करके विलुप्त होते जा रहे हैं? क्या वह शिक्षा है, जो धीरे-धीरे मनुष्य को मशीन बना दे रही है? मेरे विचार से यंत्रवत् अच्छे होने की अपेक्षा स्वतन्त्र इच्छा और बुद्धि द्वारा प्रेरित होकर एक बार गलती भी कर लेना अधिक श्रेयस्कर है। 
     बहरहाल, स्वामी विवेकानन्द के विचार-दर्शन से होकर गुजरते हैं तो यह स्पष्ट होता है कि उनके विचारों का प्रमुख केन्द्र जीविकोपार्जन की शिक्षा, तकनीकी ज्ञान और विज्ञान की शिक्षा नहीं था, वे सबसे पहले व्यक्ति के अंदर निहित क्षमताओं को उजागर करने की शिक्षा देना चाहते थे। वे तकनीकी ज्ञान और विज्ञान की शिक्षा के साथ-साथ चरित्र निर्माण की शिक्षा पर अधिक बल देते थे। शिक्षा के संबंध में उनका महत्वपूर्ण कथन है - 'शिक्षा मनुष्य में निहित सम्पूर्णता की अभिव्यक्ति है।'