गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

वर्षों से प्रकाशस्तंभ की भाँति विद्यमान हैं लोकनायक श्रीराम


मर्यादापुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम भारत की आत्मा हैं। राम भारतीय संस्कृति के भव्य-दिव्य मंदिर के न केवल चमकते शिखर हैं, अपितु वे वास्तव में उसके आधार भी हैं। इसलिए राम का जीवन उनके समय से लेकर आज तक प्रासंगिक है। उनका जीवन प्रकाश स्तम्भ की तरह है, जो अंधेरे में हमारा मार्ग प्रशस्त करता है। संसार का ऐसा कोई प्रश्न नहीं है, जिसका व्यवहारिक आदर्श उत्तर राम ने अपने आचरण से नहीं दिया हो। उनके जीवन में सारा जग समाया हुआ है। बाबा तुलसीदास लिखते हैं- ‘सिय राम मय सब जग जानी, करहु प्रणाम जोरी जुग पानी।’ राष्ट्र एवं समाज जीवन की दिशा क्या होनी चाहिए, यह रामकथा में राम के जीवन से अनुभूत की जा सकती है। वह ऐसे नरश्रेष्ठ या अवतार हैं, जिन्होंने वाणी से नहीं अपितु आचरण से जीवनदर्शन को प्रस्तुत किया। इसलिए वह सीधे लोक से जुड़ते हैं। असाधारण होकर भी अपने साधारण जीवन से समूचे लोक का नेतृत्व करते हैं। राम भारतीय संस्कृति के ऐसे नायक हैं, जिन्होंने समाज के सुख-दु:ख और उसकी रचना को नजदीक से देखा-समझा। अयोध्या के राजकुमार-राजा से कहीं अधिक बड़ी भूमिका में राम हमें एक ऐसे जननायक के रूप में दिखाई पड़ते हैं, जिन्होंने उत्तर से दक्षिण तक दुष्ट राजाओं के आतंक से भयाक्रांत भारतीय समाज के साहस को जगाया और उन्हें एकजुट किया। अन्याय के विरुद्ध प्रतिकार और पराक्रम का बल दिया। राष्ट्र के सोये हुए भाग्य को जगाने का काम लोकनायक करते हैं, वहीं प्रभु राम ने किया। 
          शक्तिशाली राज्य अयोध्या के महाराज दशरथ के वीर पुत्र और भावी सम्राट होने मात्र से राम जनता के नायक नहीं हो जाते। वह अपने व्यक्तित्व को इस प्रकार गढ़ते हैं कि जनता उन्हें स्वाभाविक तौर पर अपना नायक मानती है। जनमानस में राम के प्रति कितना समर्पण था, उनके प्रति कितनी आस्था-भक्ति थी, व्यापक स्तर पर उसका पहला प्रकटीकरण तब होता है, जब राम अयोध्या का भव्य महल छोड़कर वन की ओर निकलते हैं। अयोध्या के समस्त मार्ग अवरुद्ध हो गए हैं। राम को रोकने के लिए जनसैलाब उमड़ आया है। रथ के आगे लोग लेट गए हैं। राम उनसे दूर जाएं, अयोध्या का कोई भी जन यह स्वीकार करने को तैयार नहीं। अयोध्या में आर्तनाद छा गया। यह अगाध श्रद्धा, अपनत्व, ममत्व, स्नेह और भक्ति राम ने अपने आचरण से कमाई थी। अयोध्या का हाल देखकर भरत अपने भाई को वापस लाने के लिए चित्रकूट में पहुँचते हैं। राम से लौटकर चलने के लिए मनुहार करते हैं। करबद्ध प्रार्थना करते हैं। किंतु, राम को मर्यादा की स्थापना करनी है। वह भरत को मना कर देते हैं। परंतु, अयोध्या का क्या, जो दशरथ के बाद राम की है। राम ही अयोध्या को नेतृत्व दे सकते हैं। क्योंकि, अयोध्या की जनता सिर्फ ‘रामराज्य’ चाहती है। राम के विरह की अग्नि अभी ठण्डी भी कहाँ हुई थी? ऐसे में भरत स्वप्न में भी अयोध्या के सिंहासन पर बैठने की सोच नहीं सकते। भाई राम के प्रति भी भरत के मन में जो श्रद्धा है, वह भी इसकी अनुमति नहीं देती। भले ही माता कैकयी भरत को राजा के रूप में सिंहासन पर बैठे देखना चाहती थीं। यदि किसी दबाव में भरत यह करते तो जनमानस उनके विरुद्ध हो सकता था। अयोध्या को सिर्फ राम संभाल सकते थे। इसलिए भरत ने राम की चरणपादुकाएं लीं और अयोध्या लौट गए।  
          महल छोड़कर राम जब वन पहुँचते हैं, तब उन्हें ज्ञात होता है कि समाज किन कठिनाइयों से गुजर रहा है। हालाँकि, गुरु वशिष्ठ उन्हें पहले भी समाज की समस्याओं से साक्षात्कार करा चुके थे। समाज को अत्यंत समीप से देखने के बाद राम उसे संगठित और जागृत करना चाहते थे। इसलिए भी संभव है कि राम अयोध्यावासियों और अपने प्रिय भाई भरत की प्रार्थनाओं को अस्वीकार कर देते हैं। वह साधारण जीवन जी कर समाज के सामने अनेक प्रकार के उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते हैं। वह चाहते तो वन में किसी एक जगह सुंदर और साधन-सम्पन्न कुटिया बना कर रह सकते थे। लेकिन, उन्होंने वनगमन को राष्ट्र निर्माण के एक अवसर में बदल दिया। अपना हित छोड़ा, कष्ठ सहन किए। सरलता को छोड़ा, कठिनता को चुना। आराम का त्याग किया, परिश्रम को चुना। वनवास के दौरान राम ने व्यापक जनसंपर्क किया। वनवासियों को अपने साथ जोड़ा। उन्हें अपना बनाया। सामान्य व्यक्ति जिस संघर्ष भरे जीवन को जी रहा था, उसी को राम ने भी अपनाया। इसलिए वन-ग्राम में रहने वाले सब लोगों के साथ उनका आत्मीय और विश्वास का संबंध जुड़ता। 
          वनवास खत्म होने में केवल छह-सात माह ही बचते हैं, तब माता जानकी का अपहरण रावण ने कर लिया। राम ने ऐसे कठिन समय में भी अयोध्या, मिथिला या फिर अन्य किसी मित्र राज्य से सहायता नहीं ली। वह समाज को संदेश देना चाहते थे कि समाज की एकजुटता से बिना साधन के भी रावण जैसे अत्यधिक शक्तिशाली आताताई को भी परास्त किया जा सकता है। संगठन में ही वास्तविक शक्ति है। अत्याचारी और अन्यायी ताकतों का सामना करने के लिए राज्य की सशस्त्र सेना ही आवश्यक नहीं है। हम अपनी शक्ति को एकत्र कर भी दुष्टों को धूल चटा सकते हैं। चूँकि वह मानते थे- ‘यथा हि कुरुते राजा प्रजा तमनुवर्तते’ (उत्तरकाण्ड, सर्ग ४३, श्लोक १९)। अर्थात् प्रजा अपने राजा का अनुसरण करती है। यदि राम ने सेना बुला कर रावण का अंत किया होता, तब जनमानस में ‘संगठन में शक्ति है’ का भाव कभी नहीं आ पाता, तब शायद समाज में पराक्रम का भाव नहीं जाग पाता, तब शायद सामान्य समाज अपने साहस और कौशल को हथियार नहीं बना पाता, अन्याय के सामने सिर उठाने का साहस नहीं कर पाता। वह बाहुबलियों द्वारा पददलित होना, अपना भाग्य समझ लेता। राम ने लोगों का संगठन कर उसे शक्तिशाली सेना का स्वरूप देकर समाज का भाग्य बदल दिया। उन्होंने समाज में संघर्ष और आत्मविश्वास का बीज बो दिया। राम ने आने वाले भविष्य के लिए उदाहरण प्रस्तुत कर दिया कि कितना भी बलशाली दुष्ट शासन हो, संगठित समाजशक्ति द्वारा उसका प्रतिकार किया जा सकता है। अन्यायपूर्ण शासन को जनशक्ति उखाड़ कर फेंक देती है। संगठित जनसमूह के सामने साधन-सम्पन्न दुष्ट ताकत कमजोर पड़ जाती है। अंत में विजय समाज के हिस्से आती है। 
          प्रभु राम की ईश्वरीय अवधारणा से इतर, रामकथा ऐसे जननायक की कहानी है, जिसने संपूर्ण भारत को एकसूत्र में पिरोया, समाज के विभेद को समाप्त किया, समाज में मूल्य एवं आदर्श स्थापित किए। आज भी भारत राम के नाम पर एक है। राम ऐसे लोकनायक हैं, जो सिर्फ भक्त शिरोमणि वीर हनुमान के सीने में ही नहीं बसते, वरन भारत के बच्चे-बच्चे में राम की छवि दिखती है। राम ऐसे जननायक हैं, जो आज भी प्रत्येक संकट में हमें सहारा देते हैं। उनका जीवन हमें कठिन से कठिन संकटों का सामना करने की प्रेरणा देता है। लोकनायक होने के लिए किस तरह का संकल्प चाहिए, यह राम के संपूर्ण जीवन से स्पष्ट हो जाना चाहिए। यद्धपि महाकवि भवभूति ने अपने नाटक ‘उत्तररामचरित’ में स्वयं प्रभु राम से वक्तव्य दिलाया है- “स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि, आराधनाय लोकस्य मुंचतो नास्ति मे व्यथा।” अर्थात् राम कहते हैं कि लोक की आराधना के लिए मुझे अपने स्नेह, दया, सौख्य और यहाँ तक कि जानकी का भी परित्याग करने में भी कोई व्यथा नहीं होगी। हमको ज्ञात है कि राम ने लोक की सेवा के लिए फूलों की सेज छोड़ कर कंटकाकीर्ण मार्ग चुना। अपना सर्वस्व त्यागा। राम सुखपूर्वक अपना जीवन बिता सकते थे लेकिन उन्होंने कठिन और कष्टप्रद जीवन को चुना।
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मेरा भारत साक्षात् राजा राम स्वरुप है 



बुधवार, 25 मार्च 2020

सरसंघचालक परंपरा के आदर्श हैं डॉक्टर साहब


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वर्ष 2025 में शतायु हो जाएगा। अपनी सुदीर्घ यात्रा में संघ ने आदर्श, अनुशासन, सामाजिक एवं व्यक्ति निर्माण के कार्य में नित नये प्रतिमान स्थापित किए हैं। अपनी इस यात्रा में संघ कहीं ठहरा नहीं। निरंतर गतिमान रहा। समय के साथ कदमताल करता रहा। दशों दिशाओं में फैलकर संघ ने समाज जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। जबकि उसके आगे-पीछे प्रारंभ हुए अनेक अच्छे संगठन काल-कवलित हो गए। उनके उद्देश्य भी श्रेष्ठ थे। संघ अपने कर्मपथ पर अडिग़ रहा, उसका प्रमुख कारण है- सरसंघचालक की अनूठी व्यवस्था।  
          संघ में सरसंघचालक नेतृत्वकारी पद नहीं है, बल्कि मार्गदर्शक और प्रेरणा का केंद्र है। संस्थापक सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार के समय से स्थापित मानदंड अब तक स्थायी हैं। सिंहासन बत्तीसी की कहानी हम सबको भली प्रकार ज्ञात है। विक्रमादित्य के प्रताप से सिंहासन ही सिद्ध हो गया था। बाद में, जो भी उस पर बैठा, उसने विक्रमादित्य के सुशासन को ही आगे बढ़ाया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सरसंघचालक का दायित्व भी श्रेष्ठ संगठन शिल्पी और भारत माँ के सच्चे सपूत डॉ. हेडगेवार के प्रताप से सिद्ध हो गया है। इसलिए संघ की यह परंपरा निर्विवाद और अक्षुण्य चली आ रही है। 
          संघ के स्थापना वर्ष 1925 से 1940 तक डॉ. हेडगेवार का जीवन विश्व के सबसे बड़े संगठन का आधार बनाने में अनवरत लगा रहा। यशस्वी संगठन का उपयोग डॉ. हेडगेवार ने कभी भी अपने प्रभाव के लिए नहीं किया। उन्होंने संघ को सदैव राष्ट्रहित के लिए तैयार किया। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार एक दूरदृष्टा थे। उन्हें क्रांतिकारी, राजनीतिक और सामाजिक संगठनों में कार्य का अनुभव था। अपने उन सब अनुभवों और भविष्य को ध्यान में रखकर ही डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को व्यक्ति केंद्रित संगठन बल्कि विचार केंद्रित संगठन का स्वरूप दिया। संघ आत्मनिर्भर बने, इसके संबंध में भी उन्होंने पर्याप्त प्रयास किए। आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए गुरु पूजन की परंपरा प्रारंभ की। हम जानते हैं कि गुरु पूजन के अवसर पर गुरु दक्षिणा में स्वयंसेवकों से आई राशि से ही संघ का संचालन होता है। 1928 में गुरु पूर्णिमा के दिन से गुरु पूजन की परंपरा शुरू हुई। जब सब स्वयंसेवक गुरु पूजन के लिए एकत्र हुए तब सभी स्वयंसेवकों को यही अनुमान था कि डॉक्टर साहब की गुरु के रूप में पूजा की जाएगी। उनका अनुमान स्वाभाविक ही था, क्योंकि किसी भी सांस्कृतिक, सामाजिक या धार्मिक संगठन के संस्थापक ही उसके सर्वेसर्वा बन जाते हैं। व्यक्ति केंद्रित ऐसे संगठन संस्थापक के साथ ही समाप्त हो जाते हैं या फिर अपने उद्देश्य से भटक जाते हैं। 
          बहरहाल, डॉ. हेडगेवार ने संघ में व्यक्ति पूजा को निषेद करते हुए प्रथम गुरु पूजन कार्यक्रम के अवसर पर जो कहा, वह अत्यंत महत्व का है। उन्होंने कहा- ''संघ ने अपने गुरु की जगह पर किसी व्यक्ति विशेष को मान न देते हुए परम पवित्र भगवा ध्वज को ही सम्मानित किया है। इसका कारण है कि व्यक्ति कितना भी महान क्यों न हो, फिर भी वह कभी भी स्थिर या पूर्ण नहीं रह सकता। अतएव व्यक्ति विशेष को गुरु के स्थान पर रखकर अपनी स्थिति हास्यास्पद बनाने की अपेक्षा इतिहास, परंपरा एवं राष्ट्रीयता का समन्वित प्रतिबिंब भगवा ध्वज हमारे गुरु के रूप में सम्मानित है। इससे मिलने वाली स्फूर्ति किसी भी मनुष्य से मिलने वाली स्फूर्ति की अपेक्षा श्रेष्ठ है।''
          जिन डॉक्टर साहब ने स्वयं को संगठन के 'गुरु' के स्थान पर नहीं रखा, फिर भला वह अपने लिए सरसंघचालक का पद क्यों तय करते। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सरसंघचालक के पद का निर्माण की घटना अनोखी है, जो श्रद्धा भाव को प्रकट करती है। संघ के अनुशासन को दिखाती है। उस विराट व्यक्तित्व का दर्शन कराती है, जो भव्य महल की बालकनी में बैठना पसंद नहीं करते, बल्कि स्वयं को नींव में खपाने के लिए आतुर दिखते हैं। अमूमन किसी भी संगठन के प्रारंभ होने से पहले ही उसका नाम, कार्यपद्धति एवं पदनाम तय हो जाते हैं। किंतु, संघ के संबंध में यह सब महत्वपूर्ण बातें बाद में तय हुईं। संघ का नाम पहली शाखा लगने के छह माह बाद तय हुआ- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। सरसंघचालक, सरकार्यवाह और प्रचारक जैसे पदों का निर्माण चार वर्ष बाद हुआ। 
          संघ के प्रमुख स्वयंसेवकों की दो दिन की एक बैठक 9 और 10 नवंबर 1929 को नागपुर में हुई। इस बैठक में ही विश्वनाथराव केलकर, तात्याजी कालीकर, आप्पाजी जोशी, बापूराव मुठाल, बाबासाहब कोलते, बालाजी हुद्दार, कृष्णराव मोहरीर, मार्तंडराव जोग एवं देवईकर ने अन्य स्वयंसेवकों से विचार-विमर्श करके सरसंघचालक के पद का निर्माण किया। रोचक बात यह है कि इस पूरे विचार-विमर्श से डॉक्टर साहब को दूर रखा गया। बैठक के दूसरे दिन जब डॉ. हेडगेवार स्वयंसेवकों के मार्गदर्शन के लिए आए तो आप्पाजी जोशी ने आदेश दिया- ''सरसंघचालक प्रणाम एक, दो, तीन।'' स्वयंसेवकों ने डॉ. हेडगेवार को सरसंघचालक के रूप में प्रणाम किया। यह सब होता देख डॉ. हेडगेवार एकदम सकते में आ गए। कार्यक्रम के बाद उन्होंने आप्पाजी जोशी से कहा- ''यह मुझे पसंद नहीं है कि अपने से बड़े आदरणीय त्यागी पुरुषों का प्रणाम ग्रहण करूं।'' उन्होंने सरसंघचालक के पद के प्रति भी अस्वीकृति का भाव प्रकट किया। किंतु, आप्पाजी जोशी ने स्पष्ट कहा कि यह संघ का सामूहिक निर्णय है। संगठन के हित में आपको अप्रसन्न करने वाली यह बात तो स्वीकार करनी ही पड़ेगी। एक आदर्श स्वयंसेवक की भाँति डॉक्टर साहब ने संघ के सामूहिक निर्णय को स्वीकार कर लिया। 
          जब हम संघ की सरसंघचालक परंपरा को देखते हैं तो ध्यान आता है कि तृतीय सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रय देवरस उपाख्य बालासाहब देवरस ने स्वास्थ्य कारणों से अपने ही जीवन काल में 1994 में सरसंघचालक का दायित्व प्रो. राजेन्द्र सिंह उपाख्य रज्जू भैया को सौंप दिया। इसी परंपरा को रज्जू भैया ने आगे बढ़ाया और सरसंघचालक का दायित्व सुदर्शनजी को सौंपा। सुदर्शनजी ने यह दायित्व वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत को सौंपा। यह तीनों महान विभुतियों ने सरसंघचालक के पद से निवृत्ति के बाद एक आदर्श स्वयंसेवक की तरह 'सरसंघचालक' के मार्गदर्शन में शेष संघ जीवन जिया। जिसे सरसंघचालक का दायित्व सौंपा, उसके ही मार्गदर्शन में सहज स्वयंसेवक की तरह संघकार्य करने की यह अनूठी परंपरा आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव हेडगेवार के जीवन से स्थापित हुई। हालाँकि, वह तत्वरूप में परिवर्तित होने तक अर्थात् देहावसान तक सरसंघचालक पद पर रहे। किंतु, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रूपी वृहद परिवार के मुखिया के रूप में सरसंघचालक की भूमिका और आदर्श को उन्होंने अपने जीवन एवं विचार से स्थापित कर दिया था। 
          वर्ष 1933 में डॉक्टर साहब ने जो घोषणाएं कीं, उनसे ही एक स्वयंसेवक से लेकर सरसंघचालक तक के आचार-व्यवहार को दिशा मिलती है। वह कहते हैं- ''इस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्मदाता अथवा संस्थापक मैं न होकर आप सब हैं। यह मैं भली भाँति जानता हूँ।'' अद्वितीय संगठन की स्थापना का श्रेय न लेकर डाक्टर साहब ने स्वयंसेवकों को संदेश दिया है कि व्यक्तिगत कुछ नहीं, सब सामूहिक है। संगठन में श्रेय लेने की होड़ नहीं होनी चाहिए। यदि किसी ने कुछ श्रेष्ठ कार्य प्रारंभ किया है, या फिर दिए गए कार्य का सम्पादन सफलतापूर्वक किया है, तो उसका श्रेय लेने से बचना चाहिए। वह कहते हैं- ''आपकी इच्छा एवं आज्ञा से जितनी सहर्षता के साथ मैंने इस पद (सरसंघचालक) पर कार्य किया है, इतने ही आनंद से आपके द्वारा चुने हुए नये सरसंघचालक के हाथ सभी अधिकार सूत्र समर्पित करके उसी क्षण से उसके विश्वस्त स्वयंसेवक के रूप में कार्य करता रहूंगा। संघचालक की आज्ञा का पालन स्वयंसेवकों द्वारा बिना किसी अगर-मगर के होना अनुशासन एवं कार्य प्रगति के लिए आवश्यक है। नाक से भारी नथ- इस स्थिति को संघ कभी उत्पन्न नहीं होने देगा। यह संघ कार्य का रहस्य है।'' हम देखते हैं कि आद्य सरसंघचालक के इस विचार का संघ में सबने अक्षरश: पालन किया है। बालासाहब देवरस, रज्जू भैया और सुदर्शनजी ने सरसंघचालक के अधिकार सौंपने के बाद जैसा डॉक्टर साहब ने कहा, वैसा ही स्वयंसेवक जीवन जिया। 
          डाक्टर साहब आगे और अधिक कठोरता बरतते हुए घोषणा करते हैं- ''आपको जब भी प्रतीत हो कि मेरी अयोग्यता के कारण संघ की क्षति हो रही है तो आप मेरे स्थान पर दूसरे योग्य व्यक्ति को प्रतिष्ठित करने के लिए स्वतंत्र हैं। मेरे लिए अपने व्यक्तित्व के मायने नहीं, संघ कार्य का ही वास्तविक अर्थ में महत्व है। अत: संघ के हित में कोई भी कार्य करने में मैं पीछे नहीं हटूँगा। संघ कार्य के समय किसी भी प्रकार के संकट अथवा मान-अपमान की मैं कतई चिंता नहीं करूँगा।'' सोचिए, संगठन के हित में स्वयं के लिए भी संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक क्या विचार रखते हैं? वह किसी भी प्रकार संगठन के कार्य को प्रभावित नहीं होने देना चाहते। संघ कार्य बढ़े इसके लिए वह स्वयं भी पीछे रहने को भी तैयार हैं। इससे अधिक लोकतांत्रिक विचार क्या हो सकता है जब संगठन का मुखिया कह रहा है कि मेरी अयोग्यता से संघ को क्षति हो रही हो तो मेरे स्थान पर योग्य व्यक्ति को प्रतिष्ठित करने के लिए स्वयंसेवक स्वतंत्र हैं। 
          डॉक्टर साहब ने एक आदर्श मुखिया की भूमिका को स्थापित किया। उन्होंने अपने आदर्श चरित्र से सरसंघचालक परंपरा को स्थापित किया। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन संगठन और राष्ट्र के लिए स्वाह कर दिया। शरीर में जब तक रक्त की एक भी बूंद रही, वह राष्ट्रसेवा में समर्पित रहे। वह जो कहते थे, उसे जीवन में अक्षरश: जीते भी थे। आद्य सरसंघचालक के रूप में वह सदैव स्वयंसेवकों के लिए प्रकाशपुंज और प्रेरणा के स्रोत बने रहे। आज भी उनका जीवन-दर्शन संघ के स्वयंसेवकों को संघ-जीवन की दिशा देता है। एक व्यक्तित्व कैसे तत्व में परिवर्तित होता है, उसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं- डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार। 
(लेखक लोकेन्द्र सिंह स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

शनिवार, 21 मार्च 2020

आओ, जनता कर्फ्यू को बनाएं सफल


महामारी का रूप ले चुके कोरोना वायरस के विरुद्ध बड़ी लड़ाई का आह्वान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के नागरिकों से किया है। सरकार के साथ हम सब नागरिकों का कर्तव्य है कि महामारी से स्वयं बचें और अपने लोगों को बचाएं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम सब प्रधानमंत्री मोदी के आह्वान पर ‘जनता कर्फ्यू’ को सफल बनाएं। प्रधानमंत्री मोदी का यह ‘राष्ट्र के नाम संदेश’ सदैव याद किया जाएगा। उनका यह उद्बोधन मानवता और अपनत्व से भरा हुआ था। प्रधानमंत्री गुरुवार रात को जब देश की जनता को संबोधित कर रहे थे, तब वे एक अभिभावक की तरह भी नजर आए। महामारी कोरोना के संदर्भ में अन्य बड़े देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने भी अपने-अपने देश की जनता को संबोधित किया, लेकिन उनके भाषण में वह मर्म नहीं था, जो प्रधानमंत्री मोदी के भाषण में अनुभूत होता है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस बात पर अधिक जोर नहीं दिया कि उनकी सरकार ने कैसे अब तक कोरोना को काबू में रखा है, सरकार की तैयार क्या है? इसकी अपेक्षा उन्होंने लोगों को जागरूक करना अधिक जरूरी समझा, जो कि अधिक महत्वपूर्ण था। 
          अपनी स्वीकार्यता को जनता के हित में उपयोग करना ही बड़े और महान नेताओं की पहचान है। प्रधानमंत्री मोदी ने देश की जनता पर पूर्ण विश्वास और आत्मीयता प्रकट करते हुए कहा- ‘मैंने आपसे जब भी कुछ माँगा है, आपने मुझे कभी निराश नहीं किया है। इस बार मुझे आपका आने वाला कुछ समय, संकल्प और संयम चाहिए।’ देश की जनता से यह आग्रह वह राजनेता ही कर सकता है, जिसे नीति और नीयत पर लोगों को भरोसा हो। प्रधानमंत्री मोदी के इस आह्वान के तत्काल बाद ही समूचे देश से उन्हें समर्थन मिलना शुरू हो गया। सोशल मीडिया पर आम लोगों की टिप्पणियां इसकी साक्षी हैं। 
          संघ के सरकार्यवाह श्री सुरेश (भैय्याजी) जोशी ने वक्तव्य जारी कर देश के प्रत्येक क्षेत्र में कार्यरत स्वयंसेवकों से आग्रह किया है- “महामारी कोरोना वायरस की चुनौती का सामना करने के लिए आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने राष्ट्र के नाम जो आह्वान किया है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इन सभी प्रयासों का समर्थन करता है। ‘संकल्प और संयम’ इस मंत्र को लेकर 22 मार्च के ‘जनता कर्फ्यू’ सहित केंद्रीय एवं राज्य सरकारों के सभी प्रयासों की सफलता के लिए सभी स्वयंसेवक अपने परिवार की मानसिकता तैयार कर समाज जागरण में अपनी भूमिका सुनिश्चित कर इस चुनौती का सामना करने में अपना योगदान दें।” संघ की तरह अन्य सामाजिक संगठन भी जनता कर्फ्यू को सफल बनाने के लिए आगे आए हैं।

          याद कीजिए, देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अकाल जैसी कठिनाई से जीतने के लिए जब देश की जनता से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने का आग्रह किया था, तब कैसे जनता उनके साथ खड़ी हो गई थी। अमेरिका ने उस समय कुछ शर्तों के साथ भारत को अनाज देने की पेशकश की थी। शास्त्री जी जानते थे कि अमेरिका से अनाज लिया तो देश का स्वाभिमान चूर-चूर हो जाएगा। ऐसे में उन्होंने अपने नैतिक बल का उपयोग करते हुए देशवासियों से आह्वान किया- ‘पेट पर रस्सी बांधो, साग-सब्जी ज्यादा खाओ, सप्ताह में एक दिन एक वक्त उपवास करो, देश को अपना मान दो।’ उनके आह्वान का देशवासियों पर गहरा असर पड़ा। लोगों ने सहर्ष पूर्ण उत्साह के साथ अपने प्रधानमंत्री के आह्वान पर भरोसा किया और देश का स्वाभिमान बचाने के लिए सप्ताह में एक दिन उपवास करना प्रारंभ कर दिया। परिणामस्वरूप हम अमेरिका के यहाँ अपना स्वाभिमान गिरवीं रखे बिना ही अकाल के विरुद्ध लड़ाई जीत गए। प्रधानमंत्री मोदी के आह्वान में भी वही नैतिक बल दिखाई देता है। 
          प्रधानमंत्री मोदी इस अपील के मर्म को भी समझने की जरूरत है, जिसमें वे सेठों/मालिकों से आग्रह कर रहे हैं कि वे अपने कर्मचारियों का वेतन न काटें, उनके आर्थिक हितों का ध्यान रखें, क्योंकि कर्मचारियों को भी अपना परिवार पालना है। प्रधानमंत्री को यह बखूबी ध्यान रहता है कि यदि आम आदमी काम पर नहीं जाएगा तो सेठ/मालिक उनका वेतन काट लेगा, ऐसे में बहुत लोगों के सामने जीवनयापन का संकट खड़ा हो जाएगा। इसके साथ ही वे उन सब लोगों का हौसला बढ़ाने से भी नहीं चूके जो अपना जीवन दांव पर लगा कर कोरोना वायरस से पीडि़त लोगों का इलाज कर रहे हैं। कोरोना के विरुद्ध लड़ रहे हैं। उसके लिए उन्होंने आम जनता से आह्वान किया कि वह करतल-ध्वनि या थाल-घंटी बजा कर उनके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करे। 
          मोदी विरोध में तर्क विहीन हो चुके उन लोगों की बुद्धि पर तरस ही खाया जा सकता है, जो जनता-कर्फ्यू जैसे व्यवहारिक और जरूरी प्रयोग एवं करतल या थाल-घंटी बजाने के भारतीय अभिवादन के तौर-तरीका का उपहास उड़ा रहे हैं। इससे उनकी ओछी सोच ही प्रकट होती है। यह भारत है। यहाँ लोकभावना का उपहास स्वीकार नहीं होता। इसलिए तथाकथित बुद्धिजीवी भारत के लोकप्रिय नेता के आत्मीय आह्वान का जितना मर्जी आए मजाक बना लें, किंतु जनता 22 मार्च को न केवल ‘जनता कर्फ्यू’ को अभूतपूर्व समर्थन देगी बल्कि उतने ही उत्साह से थाल-घंटी बजा कर ‘कोरोना से लडऩे वाले योद्धाओं’ का अभिवादन भी करेगी।

रविवार, 16 फ़रवरी 2020

शम्भू धारा : अमरकंटक का 'गुमनाम' आकर्षक जल प्रपात



शम्भू धारा जल प्रपात माँ नर्मदा उद्गम स्थल से तकरीबन 5 किलोमीटर की दूरी पर है। यहाँ तक पहुँचने के लिए घने जंगलों से होकर गुजरना पड़ता है। यहाँ जंगल इतना घना है कि धूप धरती को नहीं छू पाती है। ऊंचे और हरे-भरे वृक्षों के बीच से कच्चा रास्ता शम्भूधारा तक पहुँचता है। घने जंगल से होकर शम्भूधारा तक पहुँचना किसी रोमांच से कम नहीं है। अमरकंटक के अन्य पर्यटन स्थलों की अपेक्षा यहाँ कम ही लोग आते हैं। दरअसल, लोगों को इसकी जानकारी नहीं रहती। किसी मार्गदर्शक के बिना यहाँ तक आना किसी नये व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। यह स्थान बेहद खूबसूरत है। प्राकृतिक रूप से समृद्ध है। यहाँ पशु-पक्षियों की आवाज किसी मधुर संगीत की तरह सुनाई देती हैं। 
          ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव के एक नाम शम्भूनाथ पर इस जल प्रपात का नाम शम्भूधारा पड़ा है। हालाँकि यह माँ नर्मदा नदी पर बना हुआ जल प्रपात नहीं है, बल्कि बरसाती नाले का झरना है, जो लगभग 35 मीटर की ऊँचाई से नीचे गिरता है। यूँ तो आप वर्षभर इस जलप्रपात को देख सकते हैं। यदि आप बारिश के मौसम में यहाँ आएंगे तो अधिक आनंद आएगा। बारिश में शम्भूधारा जलप्रपात में जलराशि बढ़ जाती है और इसका सौंदर्य चरम पर पहुँच जाता है। शम्भू धारा से ठीक पहले एक स्टॉप डेम बनाया गया है। जहाँ एकत्र जल और उसके किनारे खड़े ऊँचे-पूरे पेड़ों के कारण मनमोहक दृश्य उपस्थित होता है। मानो जलराशि को दर्पण बना कर वृक्ष अपना रूप-यौवन निहार रहे हों। 


          शम्भूधारा के आसपास निर्जन वन होने के कारण यहाँ साधु-संन्यासी धूनी भी रमाते हैं। एक स्थान हमें ऐसा मिला भी, जहाँ किसी साधु ने अपनी ध्यान-साधना के लिए शिवलिंग की स्थापना कर रखी थी और वहाँ अग्नि भी धधक रही थी। हालाँकि उस समय वहाँ कोई साधु उपस्थित नहीं था। संभवत: नगर की ओर निकल गया होगा। अंधेरा घिरने लगा था। घने जंगल में वैसे भी शाम जल्दी ढल जाती है। हमारे लौटने का वक्त हो गया था। हालाँकि, मन में एक और जलप्रपात देखने की लालसा थी, जो शम्भू धारा से आगे जाकर था। उसे फिर कभी तसल्ली से देखने का इरादा करके हम लौट पड़े। मैं नर्मदे हर सेवा न्यास में रुका था, जो शम्भू धारा से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर होगा। अपने कमरे पर लौटने के बाद तय किया कि एक बार बारिश में या फिर बारिश के बाद इस जलप्रपात को अवश्य देखूंगा। संयोग से ईश्वर ने वह अवसर दिया और मैंने दिसंबर-जनवरी में इस सुंदर झरने का आनंद लिया।

योगी की तपस्थली, शिव लिंग और धूनी 

वृक्षों के बीच से शम्भू धारा की एक झलक 

बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

भारतीय दृष्टि से ‘राष्ट्रवाद’ को परिभाषित करती पुस्तक


डॉ. सौरभ मालवीय और लोकेंद्र सिंह की पुस्तक ‘राष्ट्रवाद और मीडिया’ का विमोचन

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अध्येता डॉ. सौरभ मालवीय एवं लोकेन्द्र सिंह की पुस्तक ‘राष्ट्रवाद और मीडिया’ का विमोचन मीडिया विमर्श की ओर से आयोजित पं. बृजलाल द्विवेदी अखिल भारतीय साहित्यिक सम्मान समारोह में हुआ। भोपाल स्थित गाँधी भवन में पुस्तक विमोचन के लिए मंच पर प्रख्यात समाजवादी चिन्तक रघु ठाकुर, वरिष्ठ संपादक प्रो. कमल दीक्षित, सप्रे संग्रहालय के संस्थापक विजयदत्त श्रीधर, मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के पूर्व निदेशक डॉ. उमेश कुमार सिंह, व्यंग्यकार श्री गिरीश पंकज, संपादक कमलनयन पाण्डेय, मीडिया आचार्य प्रो. संजय द्विवेदी, डॉ. बीके रीना और साहित्यकार पूनम माटिया उपस्थित रहे। 
          इस अवसर पर समाजवादी विचारक एवं लेखक रघु ठाकुर ने कहा कि एक सच्चा राष्ट्रवाद वही होगा जो सच्चा विश्ववादी होगा। अगर सभी देश अपनी सीमाओं को छोड़ने के लिए तैयार हो जाए तभी असली राष्ट्रवाद की नींव रखी जा सकती है। उन्होंने कहा कि मीडिया और राष्ट्रवाद के बीच संघर्ष की स्थिति नहीं होनी चाहिए। वहीं, प्रख्यात साहित्यकार एवं व्यंग्यकार गिरीश पंकज ने पुस्तक के संबंध में कहा कि आज भारत माता की जय बोलने पर और राष्ट्रवादी शब्द का प्रयोग करने पर लोग घूरने लगते हैं। ये लोग अविलम्ब आपको दक्षिणपंथी बोल देंगे और सर्टिफिकेट दे देंगे। ऐसे समय में जब सब ओर राष्ट्रवाद की चर्चा है और कुछ मीडिया घरानों पर भी राष्ट्रवादी होने के ठप्पे लगाये जा रहे हैं, तब इस पुस्तक का प्रकाशित होकर आना अत्यधिक प्रासंगिक हो जाता है। 
           मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के पूर्व निदेशक एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. उमेश कुमार सिंह ने कहा कि भारत एक सनातन राष्ट्र है। यहाँ दृष्टि रही है, दर्शन रहा है लेकिन कभी वाद नहीं रह है। उन्होंने कहा कि कोई एक वाद इस राष्ट्र का पर्याय नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद पाश्चात्य दृष्टि का शब्द है। उन्होंने कहा कि लेखकों ने पुस्तक में भारतीय राष्ट्रवाद को सही अर्थों में परिभाषित करने का प्रयास किया है। उन्होंने राष्ट्रवाद की जगह ‘राष्ट्रत्व’ या ‘राष्ट्रीय विचार’ शब्द का उपयोग करने पर जोर दिया है। 
          पुस्तक में वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रवाद, राष्ट्रवाद एवं मीडिया के सम्बन्ध, मीडिया की भूमिका जैसे विषयों पर मीडिया विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ स्तम्भकारों के महत्वपूर्ण आलेख इस पुस्तक में शामिल किये गए हैं। इस पुस्तक में प्रो. संजय द्विवेदी, संतोष कुमार पाठक, डॉ. मयंक चतुर्वेदी, डॉ. शशि प्रकाश राय, डॉ. साधना श्रीवास्तव, डॉ. मंजरी शुक्ला, डॉ. मनोज कुमार तिवारी, डॉ. मीता उज्जैन, डॉ. सीमा वर्मा, उमेश चतुर्वेदी, अमरेंद्र आर्य, अनिल पांडेय आदि के लेख शामिल हैं। यश प्रकाशन, नईदिल्ली ने पुस्तक का प्रकाशन किया है।
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शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

गुलाब भेंट करने का शिष्टाचार

मैं ठहरा अल्हड़ प्रेमी
प्रेम की व्याकरण में शून्य
राजा गुलाब भेंट करने का
क्या जानूं मैं शिष्टाचार।

उस रोज पता चला
रंग अलग भाव अलग
जब पहली ही मुलाकात में
थमाया तुम्हें लाल गुलाब।

प्रभु, पूरे पागल तो तुम
कुछ तो तुम सोचो-समझो
भला कौन देता-लेता है
पहले-पहल लाल गुलाब।

प्रेम करने लगा हूँ तुम्हें
इसलिए ले आया लाल गुलाब
चलो छोड़ो तुम ही बताओ अब
तुम्हें कब कौन-सा दूं गुलाब।

सीधे प्रेम पर आने से पहले
थोड़ी दोस्ती करो तुम मुझसे
जाओ, रोज गार्डन चंडीगढ़
और लेकर आओ पीला गुलाब।

फिलहाल मेरी ओर से
तुम्हारी मासूमियत के लिए
गुलाब बाग, उदयपुर से
लाई हूं यह सफेद गुलाब।

तुम रचना चाहो यदि
मेरी प्रशंसा में कुछ गीत
रोज गार्डन, ऊंटी से
लाना मुस्कुराता गुलाबी गुलाब।

सीख जाएं हम दोनों प्रेम
सम्मान-स्वाभिमान एक-दूजे का
पहुंच जाना राष्ट्रीय गुलाब बाग
चुन लाना सुर्ख लाल गुलाब।

अच्छी तरह समझ लो यह भी
जिसे करते हैं टूटकर प्रेम
उसे कभी भी, विग्रह के बाद भी
सच्चे लोग नहीं देते काला गुलाब।

गुरुवार, 16 जनवरी 2020

राम तेरी दुनिया

Lokendra Singh लोकेन्द्र सिंह | Raisen Fort, Madhya Pradesh 

राम तेरी दुनिया में आकर
रंग देख रहा हूं, जीने का ढंग देख रहा हूं।
पल-पल में बदल रहे हैं लोग
रंगे सियारों का रंग देख रहा हूं।।

महंगाई सुरसा-सा मुंह फाड़ रही है
आम आदमी दाने-दाने को मोहताज देख रहा हूं।
मेहनतकश, मजदूर, गरीबों के पसीने से
अमीरों की तिजोरी में जमा धन देख रहा हूं।।

परंपराएं धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं
राक्षसी संस्कृति जन्मते देख रहा हूं।
बाजारवाद का चमत्कार है
नए-नए फर्जी त्योहार मनते देख रहा हूं।।

गजब है! दोस्त-दोस्त कहते-कहते
दुश्मनों-सा अंदाज देख रहा हूं।
पहले तो आस्तीनों में ही सांप थे
अब, खीसे में भी अजगर पलते देख रहा हूं।।

मोहब्बत का भी रंग उड़ गया है
इश्क शौकिया, बाजारू बनते देख रहा हूं।
साथ जीने-मरने की कसमें नहीं, वादे नहीं
दो पल मौज में बिताने, रिश्ते बनते देख रहा हूं।।

- लोकेन्द्र सिंह -
(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)

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