बुधवार, 25 नवंबर 2020

'स्व' की ओर बढ़ते भारत को 'पाथेय'



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ रहा है। अपनी स्थापना के प्रारंभ से ही विजयादशमी पर सरसंघचालक के उद्बोधन की परंपरा है। वैसे तो विजयादशमी का उद्बोधन स्वयंसेवकों के लिए पाथेय होता है परंतु यह संघ के दृष्टिकोण को भी प्रकट करता है और भविष्य की राह की ओर इंगित करता है। इसलिए संघ के स्वयंसेवकों का ही नहीं अपितु देश के प्रबुद्ध वर्ग का ध्यान भी सरसंघचालक के विजयादशमी के उद्बोधन पर रहता है। 25 अक्टूबर को वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने जो उद्बोधन दिया, वह बहुत महत्वपूर्ण है। भारत अपने 'स्व' की ओर बढ़ रहा है, इस बात की आश्वस्ति उनके संबोधन में थी और भविष्य की चुनौतियां की ओर संकेत और उनसे निपटने की तैयारियों का आग्रह भी। इसलिए उनके इस उद्बोधन की देशव्यापी चर्चा होनी चाहिए। भारत हितचिंतकों के वर्ग में विमर्श होने चाहिए। शासन स्तर पर भी उनकी विचारों के अनुपालन में नीतियां बनाई जा सकती हैं। भारत के संदर्भ में 2020 महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक वर्ष है। ऐसा वर्ष, जिसे ऐतिहासिक घटनाओं, उपलब्धियों और सामर्थ्य के लिए याद किया जाएगा। किंतु, कोरोना संक्रमण के कारण गौरव की अनुभूति कराने वाले अवसरों की चर्चा अधिक नहीं होने दी। सरसंघचालक ने उचित ही ध्यान दिलाया कि पिछली विजयादशमी से अब तक बहुत महत्व की बातें देश में हुई हैं। भारत के स्वाभिमान के प्रतीक श्रीराम मंदिर पर निर्णय, श्रीरामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण हेतु भूमिपूजन, पड़ोसी देशों में धार्मिक आधार पर उत्पीडऩ झेल रहे हिन्दुओं को भारत की नागरिकता एवं स्वाभिमान से जीने का अधिकार देने वाले कानून का निर्माण, यह सब इसी बीच में हुआ। शैव दर्शन की भूमि पर अलगाव का कारण और विकास में अवरोध बने अस्थायी अनुच्छेद-370 को निष्प्रभावी करने वाला निर्णय हालांकि कुछ पहले ही हो चुका था, लेकिन इस बीच ऐतिहासिक निर्णय का असर भी दिखा। 

अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर बनाने के लिए भारत के लोग उसी दिन से संघर्ष कर रहे थे जब एक आक्रांता ने हमारे गौरव को पददलित करने की मानसिकता से श्रीराम मंदिर को ध्वस्त किया और तथाकथित मस्जिद का ढांचा खड़ा कर दिया। भारतीय समाज कितना सहिष्णु है, यह आंदोलन इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है। ऐसा कोई विरला ही समाज/देश होगा, जिसने अपने ही मानबिंदु को प्राप्त करने के लिए धैर्यपूर्वक संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया। वर्षों की प्रतीक्षा पूर्ण होने के ऐतिहासिक अवसर पर किसी प्रकार की उत्तेजना को प्रकट न करते हुए संयमित व्यवहार प्रदर्शित किया। भूमिपूजन के दिन 'भारत का नियति से भेंट का अवसर' का स्वागत भी शांत, सौम्य, सात्विक, पवित्र और स्नेहिल वातावरण में किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जब इस ऐतिहासिक अवसर का वर्णन कर रहे थे, तब भारत के मूल स्वभाव का बखूबी चित्रण जनमानस में पहुंचा। 

हम सबने देखा कि कोरोना संक्रमण के कारण देश-दुनिया में सबकुछ ठप हो गया। एक निराशा का वातावरण बनने लगा, मानो अब सब समाप्त हो जाएगा। भारत में तो अपने ही समाज के एक बड़े वर्ग के सामने जीवनयापन और दो वक्त की रोटी का संकट उपस्थित हो गया। तब दुनिया ने 'भाव' को अनुभूत किया। 'खुद दर्द में होते हुए दूसरों के जख्मों को सिलते हुए' भारत को दुनिया ने बहुत करीब से देखा। सरसंघचालक जी ने इस ओर भी सबका ध्यान आकर्षित किया। यह अनुकरणीय बात है और संघ के विराट लक्ष्य को प्रकट करता है कि देश में सबसे अधिक सेवा और राहत कार्यों का संचालन करने वाले संगठन के मुखिया ने इसका श्रेय स्वयं के संगठन को न देकर, सेवाभावी भारतीय समाज को दिया। इस संदर्भ में उनका वह उद्बोधन भी सबको स्मरण में रखना चाहिए, जो घरवास (लॉकडाउन) के समय में उन्होंने दिया था। तब उन्होंने संघ के सेवाकार्यों की स्पष्ट संकल्पना प्रस्तुत की थी। संघ के स्वयंसेवकों के लिए सेवाकार्य कोई उपकार या यश प्राप्त करने का प्रयोजन नहीं है, बल्कि उनके लिए तो सेवा 'करणीय कार्य' हैं। सरसंघचालक डॉ. भागवत ने कोरोनयोद्धाओं के सेवाभाव, कर्तव्य परायणता और समर्पण की स्तुति करते हुए कहा कि "प्रशासन के कर्मचारी, विभिन्न उपचार पद्धतियों के चिकित्सक तथा सुरक्षा और सफाई सहित सभी काम करने वाले कर्मचारी उच्चतम कर्तव्यबोध के साथ रुग्णों की सेवा में जुटे रहे। स्वयं को कोरोना वायरस की बाधा होने की जोखिम उठाकर उन्होंने दिन-रात अपने घर परिवार से दूर रहकर युद्ध स्तर पर सेवा का काम किया। नागरिकों ने भी अपने समाज बंधुओं की सेवा के लिए स्वयंस्फूर्ति के साथ जो भी समय की आवश्यकता थी, उसको पूरा करने में प्रयासों की कमी नहीं होने दी। समाज की मातृशक्ति भी स्वप्रेरणा से सक्रिय हुई। महामारी के कारण पीडि़त होकर जो लोग विस्थापित हो गए, जिनको घर में वेतन और रोजगार बंद होने से विपन्नता का और भूख का सामना करना पड़ा, वह भी प्रत्यक्ष उस संकट को झेलते हुए अपने धैर्य और सहनशीलता को बनाकर रखते रहे। अपनी पीड़ा व कठिनाई को किनारे करते हुए दूसरों की सेवा में वे लग गए, ऐसे कई प्रसंग अनुभव में आए। विस्थापितों को घर पहुंचाना, यात्रा पथ पर उनके भोजन विश्राम आदि की व्यवस्था करना, पीडि़त विपन्न लोगों के घर पर भोजन आदि सामग्री पहुँचाना, इन आवश्यक कार्यों में सम्पूर्ण समाज ने महान प्रयास किए। एकजुटता एवं संवेदनशीलता का परिचय देते हुए जितना बड़ा संकट था, उससे अधिक बड़ा सहायता का उद्यम खड़ा किया।" सरसंघचालक ने इस ओर भी सबका ध्यान आकर्षित किया कि भौतिकवाद की अंधी दौड़ में व्यस्त इस दुनिया को कोरोना महामारी ने भारतीय संस्कृति की सर्वोच्चता और उसकी आवश्यकता से परिचित कराया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति के जीवन में स्वच्छता, स्वास्थ्य तथा रोगप्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने वाली अपनी कुछ परंपरागत आदतें एवं आयुर्वेद जैसे शास्त्र भी इस समय उपयुक्त सिद्ध हुए। अब तो यह चिकित्सकीय प्रक्रिया से भी सिद्ध हुआ कि कोरोना मरीजों को सबसे अधिक लाभ आयुर्वेद से हुआ है। 

संघ सिर्फ तात्कालिक परिस्थिति में सक्रिय नहीं होता है, बल्कि उससे सीखकर आगे की योजना-रचना भी करता है। निसंदेह कोरोना के कारण बहुत नुकसान हुआ है। भारत अब उससे उबरता दिख भी रहा है। स्थितियों को सामान्य बनाने के लिए अब सबके सहयोग की आवश्यकता है। इसलिए उन्होंने आह्वान किया है कि "इस परिस्थिति से उबरने के लिए अब दूसरे प्रकार की सेवाओं की आवश्यकता है। विद्यालयों का प्रारम्भ, शिक्षकों के वेतन तथा बच्चों की शिक्षा के लिए कुछ सेवा सहायता करनी पड़ेगी। विस्थापन के कारण रोजगार चला गया, नए क्षेत्र में रोजगार पाना है। अत: रोजगार का प्रशिक्षण व रोजगार का सृजन करना पड़ेगा। इस सारी परिस्थिति के चलते घरों में एवं समाज में तनाव बढऩे की परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में अपराध, अवसाद, आत्महत्या आदि कुप्रवृत्तियां ना बढ़ें, इसलिए समुपदेशन की व्यापक आवश्यकता है।" सरसंघचालक के उद्बोधन के इस हिस्से में वे वृहद समाज के सचेत अभिभावक के रूप में नज़र आये। 

पर्यावरण की चिंता करने का आग्रह भी उनके उद्बोधन में दिखा। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे हमने अपनी प्रकृति को नुकसान पहुंचाया है। इसकी अनुभूति भी कोरोना काल में हुई है। उन्होंने कहा- "कोरोना महामारी की परिस्थिति के चलते जीवन लगभग थम सा गया। कई नित्य की क्रियाएं बंद हो गईं। उनको देखते हैं तो ध्यान में आता है कि जो कृत्रिम बातें मनुष्य जीवन में प्रवेश कर गई थीं, वे बंद हो गईं और जो मनुष्य जीवन की शाश्वत आवश्यकताएं हैं, वास्तविक आवश्यकताएं हैं, वे चलती रहीं। कुछ कम मात्रा में चली होंगी, लेकिन चलती रहीं। अनावश्यक और कृत्रिम वृत्ति से जुड़ी हुई बातों के बंद होने से एक हफ्ते में ही हमने हवा में ताजगी का अनुभव किया। झरने, नाले, नदियों का पानी स्वच्छ होकर बहता हुआ देखा। खिड़की के बाहर बाग-बगीचों में पक्षियों की चहक फिर से सुनाई देने लगी। अधिक पैसों के लिए चली अंधी दौड़ में, अधिकाधिक उपभोग प्राप्त करने की दौड़ में हमने अपने आपको जिन बातों से दूर कर लिया था, कोरोना परिस्थिति के प्रतिकार में वही बातें काम की होने के नाते हमने उनको फिर स्वीकार कर लिया और उनके आनंद का नए सिरे से अनुभव लिया। उन बातों की महत्ता हमारे ध्यान में आ गई। नित्य व अनित्य, शाश्वत और तात्कालिक, इस प्रकार का विवेक करना कोरोना की इस परिस्थिति ने विश्व के सभी मानवों को सिखा दिया है। विश्व के लोग अब फिर से कुटुम्ब व्यवस्था की महत्ता, पर्यावरण के साथ मित्र बन कर जीने का महत्त्व समझने लगे हैं। यह सोच कोरोना की मार की प्रतिक्रिया में तात्कालिक सोच है या शाश्वत रूप में विश्व की मानवता ने अपनी दिशा में थोड़ा परिवर्तन किया है यह बात तो समय बताएगा। परन्तु इस तात्कालिक परिस्थिति के कारण शाश्वत मूल्यों की ओर व्यापक रूप में विश्व मानवता का ध्यान खींचा गया है, यह बात निश्चित है।" 

सरसंघचालक ने 'देशविरोधी ताकतों' को भी आड़े हाथ लिया और देशभक्त जनता को उनके षड्यंत्रों से सावधान रहने का आग्रह किया। पड़ोसी देशों में कट्टरता और धार्मिक अत्याचार से पीड़ित हिन्दू समाज सहित अन्य अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने का कानून भारत सरकार ने बनाया, जिसके विरोध में दिल्ली के 'शाहीनबाग' से लेकर देशभर में निर्लज्ज प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों की आड़ में साम्प्रदायिक ताकतों ने देश को हिंसा में झौंकने का षड्यंत्र रचा। देश के सौहार्द को बिगाड़ने के लिए असामाजिक तत्व सक्रिय हो गए। भारतीय मुसलमानों के मन में द्वेष और भय पैदा करने का प्रयास किया। देशवासियों ने इस सबको नज़दीक से देखा। भविष्य में ऐसी ताकतें फिर से सिर न उठाएं का समाज विभाजन पैदा करने के षड्यंत्र न रच पाएं, इसके लिए सरसंघचालक ने बाबा साहब अंबेडकर का उल्लेख करते हुए कहा- "25 नवम्बर, 1949 के संविधान सभा में दिये अपने भाषण में श्रद्धेय डॉ. बाबासाहब अंबेडकर ने ऐसे तरीकों को 'अराजकता का व्याकरण' कहा था। ऐसे छद्मवेषी उपद्रव करने वालों को पहचानना एवं उनके षड्यंत्रों को नाकाम करना तथा भ्रमवश उनका साथ देने से बचना समाज को सीखना पड़ेगा।" 

विपक्षी राजनैतिक दलों के लिए भी उन्होंने मार्गदर्शन दिया। वर्तमान परिस्थितियों में उनके विचार को सभी राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को सुनना और उस पर चिंतन करना चाहिए। आखिर राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का व्यवहार और नीति कैसी होनी चाहिए? सरसंघचालक कहते हैं- "सत्ता से जो वंचित रहे हैं, ऐसे सत्ता चाहने वाले राजनीतिक दलों के पुन: सत्ता प्राप्ति के प्रयास, यह प्रजातंत्र में चलने वाली एक सामान्य बात है। लेकिन उस प्रक्रिया में भी एक विवेक का पालन अपेक्षित है कि वह राजनीति में चलने वाली आपस की स्पर्धा है, शत्रुओं में चलने वाला युद्ध नहीं। स्पर्धा चले, स्वस्थ चले, परंतु उसके कारण समाज में कटुता, भेद, दूरियों का बढऩा, आपस में शत्रुता खड़ी होना, यह नहीं होना चाहिए। ध्यान रहे, इस स्पर्धा का लाभ लेने वाली, भारत को दुर्बल या खण्डित बनाकर रखना चाहने वाली, भारत का समाज सदा कलहग्रस्त रहे इसलिए उसकी विविधताओं को भेद बता कर, या पहले से चलती आई हुई दुर्भाग्यपूर्ण भेदों की स्थिति को और विकट व संघर्षयुक्त बनाते हुए, आपस में झगड़ा लगाने वाली शक्तियां, विश्व में हैं व उनके हस्तक भारत में भी हैं। उनको अवसर देने वाली कोई बात अपनी ओर से ना हो, यह चिंता सभी को करनी पड़ेगी।" 

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में स्वदेशी के विचार पर प्रकाश डाला। उसकी आवश्यकता को रेखांकित किया। चीन के सामने पूर्ण सामर्थ्य के साथ खड़े होने के लिए सरकार की नीति की सराहना की। उन्होंने दोहराया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सम्पूर्ण देश में बंधुता, पुरुषार्थ तथा न्याय, नीतिपूर्ण व्यवहार का वातावरण चतुर्दिक खड़ा करने का प्रयास अपनी स्थापना के समय से कर रहा है। उन्होंने आह्वान किया कि अपने संविधान को यशस्वी करने के लिए पूरे समाज में स्पष्ट दृष्टि, परस्पर समरसता, एकात्मता की भावना तथा देश हित सर्वोपरि मानकर किया जाने वाला व्यवहार इस संघ कार्य से ही खड़ा होगा। इस पवित्र कार्य में प्रामाणिकता से, निस्वार्थ बुद्धि से एवं तन-मन-धन पूर्वक देशभर में लक्षावधि स्वयंसेवक लगे हैं। आपको भी उनके सहयोगी कार्यकर्ता बनकर देश के नवोत्थान के इस अभियान के रथ में हाथ लगाने का आवाहन करता हूँ।" 

निस्संदेह, सरसंघचालक मोहन भागवत का यह उद्बोधन देश की सज्जन शक्ति के मध्य विमर्श का विषय बनना चाहिए। उनके विचारों को आधार बनाकर 'विश्वगुरु भारत' की राह बनानी चाहिए। संगठित होकर देश को मजबूत करने की आधारशिला रखनी चाहिये। उनके आग्रह/आह्वान को अपने जीवन में उतार कर श्रेष्ठ भारत के नवनिर्माण के प्रयत्न करने चाहिए। संघ के इस 'ईश्वरीय कार्य' में सहस्त्रों राष्ट्रभक्त नागरिकों के सहयोग की आवश्यकता है। अपने उद्बोधन को उन्होंने प्रेरक गीत की दो पंक्तियों के साथ पूरा किया- 

"प्रश्न बहुत से उत्तर एक, कदम मिलाकर बढ़ें अनेक।

वैभव के उत्तुंग शिखर पर, सभी दिशा से चढ़ें अनेक।

शनिवार, 21 नवंबर 2020

बेटी के लिए कविता-9

यह कविता ऋष्वी के 6वें जन्मदिवस पर

पसीने की बूंदें

याद है तुम्हें
बी-फॉल की सीढिय़ां उतरते हुए
मेरी गोद में थी तुम
देखकर माथे पर पसीने की बूंदें 
तुमने कहा था- 
“ध्यान रखना पिताजी, 
ये पसीना मुझ पर न गिरे”

तुम्हारे चेहरे पर निश्छल हंसी 
और देखकर एक विश्वास 
मंद-मंद मुस्काया था मैं
तुम्हें पसीना न बहाना पड़े
सुनिश्चित करूंगा यह 
परंतु, पसीने का मूल्य
उसकी ताकत और ताप 
पता होना ही चाहिए तुम्हें
ताकि पसीने का सम्मान
कर पाओ तुम। 

किसान का पसीना गिरता है खेत में
लहराता है धरती का आंचल
मजदूर के पसीने की बूंदें
करती हैं निर्माण बुलंद भारत का
कलाकार का पसीना
निखारता है कला-संस्कृति को
शिक्षक अपने पसीने से
गढ़ता है भारत के भविष्य को
चिकित्सक पसीने की बूंदों से
बचाता है लोगों का जीवन
बाकी सब की तरह ही
माता-पिता के पसीने की बूंदों से
पोषित होता है संतति का जीवन।

सुनिश्चित करूंगा मैं
अपने पसीने की बूंदों से
तुम्हारे जीवन में सुख लाऊं
चेहरे की इस हंसी को,
चमक और धमक को बढ़ाऊं
मेरा पसीना गिरे जहाँ
उठ खड़े हों बाग-बगीचे वहाँ
पसीने से सिंचित पुष्पों से
सुंगधित हो जीवन तुम्हारा 
एक-एक बूंद से समृद्ध हो,
सुरक्षित हो, जीवन तुम्हारा। 
परंतु, शर्त एक यही है
निरादर न करना कभी
पसीने की बूंदों का।

शनिवार, 31 अक्तूबर 2020

पुलवामा पर बेनकाब पाकिस्तान

पुलवामा हमले पर बार-बार झूठ बोलने वाले पाकिस्तान की कलई खुल गई है। पाकिस्तान की संसद में इमरान खान सरकार के मंत्री फवाद चौधरी ने आत्मविश्वास के साथ पुलवामा हमले को पाकिस्तार सरकारी की कामयाबी के तौर पर प्रस्तुत किया है। मंत्री चौधरी ने कहा है कि पाकिस्तान ने भारत को घुसकर मारा है। पुलवामा में जो हमारी कामयाबी है, वह प्रधानमंत्री इमरान खाने के नेतृत्व में पूरे देश की कामयाबी है। उसके हिस्सेदार आप (विपक्ष) भी हैं। दरअसल, विपक्ष ने इमरान सरकार की कमजोरी पर प्रश्न उठाए थे। विपक्ष के सांसद अयाज सादिक ने संसद में कहा था कि जब बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद भारत के विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान पाकिस्तान की कैद में थे, तब पाकिस्तान सरकार को डर सता रहा था कि भारत हमले की तैयारी कर रहा है। उन्होंने दावा किया था कि विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने विपक्षी दलों से कहा था कि अभिनंदन को जाने दें, वरना भारत रात 9 बजे हमला कर देगा। विपक्ष के इस दावे के बाद अपनी सरकार की छवि को बचाने के लिए इमरान खान के मंत्री फवाद चौधरी ने वह सच बोल दिया, जिस पर पाकिस्तान अब तक झूठ बोल रहा था। भारत की ओर से प्रमाण प्रस्तुत करने के बाद भी पाकिस्तान बेशर्मी से इस बात से इनकार करता था कि पुलवामा आतंकी हमले में उसकी कोई मिलीभगत रही। लेकिन, अब तो पाकिस्तान की संसद में स्वयं सरकार ने ही स्वीकार कर लिया है कि पुलवामा हमला उसकी ‘कामयाबी’ है। 

आतंकियों और आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घिर चुके पाकिस्तान की मुसीबत अब और बढ़ सकती है। पाकिस्तान सरकार की इस स्वीकारोक्ति को भारत को दमदारी के साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाना चाहिए। इमरान सरकार की यह स्वीकारोक्ति इस बात का प्रमाण है कि पाकिस्तान ने अपने चरित्र में कोई बदलाव नहीं किया है। भारत के साथ सीधे युद्ध से डरने वाला पाकिस्तान आतंकियों के सहयोग से भारत के विरुद्ध छद्म युद्ध चला रहा है। पाकिस्तान की जमीन पर आतंकी संरक्षण पा रहे हैं, यह आतंकी दुनिया के लिए खतरा बन चुके हैं। इस स्वीकारोक्ति के बाद भारत को पाकिस्तान के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्यवाही के लिए प्रयास करने चाहिए। उल्लेखनीय है कि भारत ने पिछले पाँच-छह वर्षों में पाकिस्तान को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है, जिसके कारण वह आर्थिक प्रतिबंध झेलने की स्थिति में पहुँच चुका है।

पाकिस्तान का यह सच भारत के उन तथाकथित बुद्धिजीवियों, पत्रकारों एवं नेताओं के मुंह पर भी करारा तमाचा है, जो पुलवामा में भारतीय सैनिकों पर हमले के पीछे पाकिस्तान के हाथ से इनकार करते रहे। जवानों के बलिदान, उनके शौर्य, सर्जिकल और एयर स्ट्राइक के सबूत माँगने वाली इस ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ को स्वयं पाकिस्तान की संसद ने सबूत दे दिया है। पाकिस्तान से अधिक बेशर्म तो हमारे यहाँ का यह वर्ग था, जो पुलवामा आतंकी हमले को भारत सरकार की ही साजिश बता रहा था। बहरहाल, पाकिस्तान की संसद में इस खुलासे के साथ एक और सच भी सामने आया कि जब पाकिस्तान के लड़ाकू विमान को मार गिराते वक्त भारतीय वायुसेना के जाबांज कमांडर अभिनंदन पाकिस्तान की सीमा में पहुँच गए और पाकिस्तान की पकड़ में आ गए तब भारत के नेतृत्व और सेना के शौर्य से भयभीत पाकिस्तान की सरकार एवं सेना के पाँव कांप रहे थे। नि:संदेह पिछले छह वर्षों में भारत की छवि एक सशक्त देश के रूप में बनी है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के मुद्दों पर कोई समझौता नहीं करता।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पुलवामा हमले पर देश विरोधी बयानबाज़ी और देश विरोधी राजनीति करने वालों को आड़े हाथ लिया

मंगलवार, 27 अक्तूबर 2020

एफसीआरए फंडिंग के नए नियमों पर आपत्ति क्यों?

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बेशलेट ने एफसीआरए फंडिंग संबंधी भारत सरकार के नये नियमों पर आपत्ति जताई है। मिशेल ने भारत सरकार से विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम की समीक्षा करने की अपील की और खेद व्यक्त किया कि इसका उपयोग 'मानवाधिकार रिपोर्टिंग के लिए गैर सरकारी संगठनों को रोकने या दंडित करने के लिए’ किया जा रहा था। उनकी टिप्पणियां मीडिया में सुर्खियाँ बनी। 

इस बयान पर भारत ने मिशेल को सटीक उत्तर दिया है। भारत की ओर से कहा गया है कि मानवाधिकार के बहाने कानून का उल्लंघन माफ नहीं किया जा सकता। संयुक्त राष्ट्र इकाई से मामले को लेकर अधिक सुविज्ञ मत की आशा थी। 

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बेशलेट ने एफसीआरए फंडिंग के बहाने नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में किए गए अतार्किक और हिंसक आंदोलनों को भी मानवाधिकारों से जोडऩे की कोशिश की। संदिग्ध गतिविधियों में पकड़े गए कैथोलिक पादरी स्टेन स्वामी का मामला भी उन्होंने उठाया है। 

कुल मिलाकर मिशेल बेशलेट के बयान को देखें तो वह पूर्वाग्रह, ईसाई मिशनरीज और भारत विरोधी ताकतों से प्रभावित लगता है।

अगर इस शर्त से आपत्ति है तब यह माना जा सकता है कि एनजीओ का उद्देश्य समाज हित नहीं, कुछ और है। यह भी माना जा सकता है कि विदेशी फंडिंग का उपयोग असामाजिक और देशविरोधी गतिविधियों में हो रहा है। 

जाँच-पड़ताल में सामने आया है कि विदेशी अनुदान का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा ईसाई एनजीओ के पास आता है। ये संस्थाएं इस राशि का उपयोग कन्वर्जन में करती हैं, जो कि गैर-कानूनी है। पिछले माह ही गृह मंत्रालय द्वारा कन्वर्जन में लिप्त लगभग एक दर्जन संगठनों के लाइसेंस रद किए गए। 

इन गैर सरकारी संगठनों की ताकत का अंदाजा इसी से चलता है कि ओबामा और ट्रंप सरकारों ने ईसाई संगठन कंपैशन इंडिया के अंशदान पर लगी रोक को हटाने के लिए भारत पर भरपूर, किंतु असफल दबाव बनाया था। 

यह नोटिस करके की बात है कि जब भी ईसाई मिशनरीज के कन्वर्जन के खेल में बाधा पहुँचती है, अमेरिकी या अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं सक्रिय हो जाती हैं। हमने पहले भी भारत के सन्दर्भ में अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की झूठी रिपोर्ट का विश्लेषण किया है, जिसे आपको देखना चाहिए।

Reality of USCIRF Annual Report 2020 on International Religious Freedom

खैर, एफसीआरए लाइसेंसी संगठन राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर भी सवालों के घेरे में आते रहे हैं। भीमा कोरेगांव मामले की जांच कर रही एजेंसियों को मिशनरी संगठनों द्वारा प्राप्त हुए धन के नक्सलवादियों तक पहुंचने के सुबूत मिले हैं। यह भी तथ्य सामने आए हैं कि एनजीओ को प्राप्त हो रहे विदेशी अनुदान का बड़ा हिस्सा जासूसी गतिविधियों पर खर्च किया जा रहा था। 

क्या देश की सुरक्षा और संप्रभुता को सुनिश्चित करने के लिए अनियमित विदेशी अनुदान को पारदर्शी बनाकर मोदी सरकार ने किसी प्रकार के मानवाधिकारों पर हमला किया है? इसका एक ही उत्तर है, नहीं। भारत के सामाजिक-धार्मिक तानेबाने और आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए यह एक आवश्यक कदम था, जिसे बहुत पहले उठाया जाना चाहिए था। 

अब इस समाचार से जुड़ी एक और जानकारी आपको देते हैं। 

भारत के ही नेता ने मिशेल बेशलेट को भारत आमंत्रित करते हुए लिखा है कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त भारत आयें और लोगों से बात करके जाने कि किस तरह सरकार यहाँ मानवाधिकारों को कुचल रही है।

अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसी सोच का नेता कौन है। खैर, इसे छोडिये कि वो कौन है, आप यह तय कीजिये कि ऐसी सोच के नेताओं का आपको क्या करना है?

रविवार, 25 अक्तूबर 2020

राष्ट्रीय विचारों का पुण्य प्रवाह ‘स्वदेश’

चित्र स्वदेश समूह के स्वर्ण जयंती समारोह और स्वदेश भोपाल समूह के 35 वर्ष पूर्ण होने के अवसर का

राष्ट्रीय विचारों का ध्वज वाहक दैनिक समाचारपत्र ‘स्वदेश’ हिन्दी पत्रकारिता का प्रमुख स्तम्भ है। विजयादशमी के अवसर पर शुभ संकल्प के साथ प्रारंभ हुए ‘स्वदेश’ ने सदैव ही, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों और आपातकाल जैसे संवैधानिक संकट के समय में भी राष्ट्रीय विचार की पत्रकारिता की विजय पताका को नील गगन में फहराया है। स्वदेश ने बाजारवाद और कड़ी प्रतिस्पद्र्धा के दौर में भी यह स्थापित करके दिखाया है कि मूल्य और सिद्धाँतों की पत्रकारिता संभव है। समूचे पत्रकारिता जगत में स्वदेश का अपना वैशिष्ट्य है। स्वदेश की पहचान राष्ट्रीय प्रहरी के तौर पर भी है।  

लखनऊ में जिस स्वदेश की नींव एकात्म मानवदर्शन के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने रखी थी, मध्यप्रदेश में वही स्वदेश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक सुदर्शन जी की प्रेरणा से शुरू हुआ। इंदौर और ग्वालियर में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराने के बाद स्वदेश ने भोपाल की राह चुनी। 1966 में जब इंदौर से स्वदेश की शुरुआत हुई, तब राष्ट्रीय विचार की पत्रकारिता के लिए अनुकूल परिस्थितियां नहीं थी। राष्ट्रीय विचारधारा से ओत-प्रोत संगठनों के समाचार या फिर राष्ट्रीय विचारधारा को पुष्ट करने वाली जनसामान्य की विराट अभिव्यक्ति को भी समाचारपत्रों में स्थान मिलना मुश्किल रहता था। लेकिन, स्वदेश ने राष्ट्रीय विचारधारा से जुड़े समाचारों और विचारों को प्रमुखता से स्थान दिया। यशस्वी संपादक मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी ने अपने संपादकीय कौशल और ओजस्वी शैली से मध्यप्रदेश की पत्रकारिता को विवश कर दिया कि वह अपनी दशा-दिशा में बदलाव लाए और अपनी दृष्टि को व्यापक करे। 

स्वदेश के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले ‘मामाजी’ ने अपने एक आलेख में लिखा था कि जो पत्रकारिता तुष्टीकरण तथा छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों की चेरी बन गई थी, जो पत्रकारिता गांधी, तिलक, अरविंद, दीनदयाल उपाध्याय और दादा माखनलाल चतुर्वेदी के मार्ग से हट गई थी, जो पत्रकारिता भारतीय राष्ट्रीयता के पर्यायवाची हिन्दुत्व के विचार से बिचकती थी, अब वह पत्रकारिता पूर्व की भाँति भ्रांत धर्मनिरपेक्षतावादियों की चेरी या चारण नहीं है। वह अब राष्ट्रवादी विचार को अस्पृश्य नहीं मानती है। उसे गंभीरता से लेती है। उसे डांटती है तो पीठ भी थपथपाती है। कोई अब उसकी उपेक्षा नहीं करता-नहीं कर सकता। कोई उसे अनदेखा नहीं कर सकता। यकीनन, मध्यप्रदेश के पत्रकारिता जगत में यह परिवर्तन स्वदेश की प्रखर राष्ट्रीय विचारधारा के कारण ही आया। स्वदेश ने राष्ट्रीय स्वाभिमान से जुड़े प्रश्नों को जिस तरह उठाया, उस अंदाज ने समाज के सामान्य पाठक से लेकर प्रबुद्धजनों को सोचने पर विवश कर दिया। स्वदेशी, गो-संरक्षण, श्रीराम मंदिर आंदोलन, सांप्रदायिकता, तुष्टीकरण, आंतरिक सुरक्षा और लोकतंत्र इत्यादि विषयों पर स्वदेश ने राष्ट्रीय दृष्टिकोण को समाज के समक्ष प्रस्तुत किया। समाज का प्रबोधन किया। देशविरोधी ताकतों द्वारा चलाए जाने वाले भ्रामक विमर्श के प्रति लोगों को जागरूक किया। हालाँकि, मध्यप्रदेश में स्वदेश की नींव को मजबूत करने वाले मामाजी बड़प्पन दिखाते हुए कहते थे कि “आज जो सुखद परिवर्तन समाज के चिंतन में आया है, उसका श्रेय स्वदेश को नहीं है, उन असंख्य नींव के पत्थरों को है, जिन्होंने राष्ट्र जागरण के पावन कार्य में अपने जीवन खपा दिए हैं। उनके विचारों व कार्यों के प्रामाणिक प्रचार-प्रसार व उनके पक्ष में जनमत निर्माण में स्वदेश की भूमिका सेतुबंध के समय सक्रिय तुच्छ गिलहरी के बराबर भी रही हो, तो स्वदेश अपने को धन्य मानेगा”।

स्वदेश ने अपनी बेबाकी और राष्ट्रीय विचार के प्रति निष्ठा की कीमत भी चुकायी है। स्वदेश, भोपाल समूह ने केवल वैचारिक हमलों ही सामना नहीं किया बल्कि उस पर कट्टरवादी मानसिकता के समूहों ने प्रत्यक्ष हमले भी किए हैं। इस संदर्भ में एक घटना उल्लेखनीय है, जब स्वदेश, भोपाल का कार्यालय मारवाड़ी रोड पर था। उस समय एक समाचार के चिढ़ कर स्वार्थी और हिंसक गिरोह ने स्वदेश के कार्यालय पर हमला कर दिया था और तोड़-फोड़ मचा कर बहुत नुकसान पहुँचाया। लेकिन, उसके बाद भी स्वदेश के तेवर ढीले नहीं हुए। उसने उसी मुखरता से देश-समाज विरोधी ताकतों के विरुद्ध समाचार एवं विचार प्रकाशित करना जारी रखा। अपनी स्पष्टवादिता के कारण स्वदेश को आर्थिक संकटों का भी सामना करना पड़ा है। आज भी स्थिति कमोबेश वैसी ही है। राष्ट्रीय विचारधारा के विरोधियों की आँखों में आज भी स्वदेश खटकता है। उनको जब भी अवसर मिलता है, वे स्वदेश को क्षति पहुँचाने का प्रयत्न ही करते हैं। स्वदेश के विचार से जुड़े लोगों को प्रारंभ से पता था कि उसका मार्ग बाकी समाचारपत्रों की तरह आसान नहीं रहने वाला है। जिनके भी हाथ में स्वदेश की बागडोर रही, उन्हें पता था कि हमें सिद्धाँतों पर अडिग़ रहना है। इसलिए ही महान संकट से समय में भी स्वदेश ने पत्रकारिता के सिद्धांतों, मानदण्डों और वैचारिक अधिष्ठान को नहीं बदला। पूरी निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ स्वदेश पत्रकारिता के भारतीय मूल्यों को समृद्ध करता रहा है। 

स्वदेश, भोपाल समूह का नेतृत्व ऐसे यशस्वी संपादक श्रीमान राजेन्द्र शर्मा जी के हाथों में है, जिनके पत्रकारीय जीवन को ही पाँच दशक से अधिक समय हो गया है। राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर आज भी उनकी लेखनी हम सबका मार्गदर्शन करती है। वे और स्वदेश पत्रकारिता की पाठशाला हैं। उनके प्रयासों से 1981 में भोपाल से स्वदेश प्रारंभ हुआ। उनके कुशल संपादन में स्वदेश ने मध्यप्रदेश के उस शहर (राजधानी) की पत्रकारिता में अपनी स्थिति मजबूत कर ली, जहाँ से शेष प्रदेश में विमर्श बनता है। ठीक 10 वर्ष की यात्रा के बाद स्वदेश भोपाल की यात्रा में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव आया, जब इस समूह ने 1991 में अपने सांध्यकालीन संस्करण ‘सायंकालीन स्वदेश’ का प्रकाशन प्रारंभ किया। आज स्वदेश भोपाल समूह के जबलपुर, सागर, रायपुर और बिलासपुर से भी विभिन्न संस्करण निकल रहे हैं। सागर से यह ‘स्वदेश ज्योति’ के नाम से प्रकाशित होता है। स्वदेश की एक ओर परंपरा है, जो इसे विशिष्ट बतानी है, वह है इसके संग्रहणीय विशेषांकों की समृद्ध शृंखला। प्रधान संपादक श्रीमान राजेन्द्र शर्मा के संपादन एवं मार्गदर्शन में श्री अटल बिहारी वाजपेयी के अमृत महोत्सव पर ‘अटल विशेषांक’, राजमाता सिंधिया की स्मृति में ‘पुण्य स्मरण’, श्रीगुरुजी जन्म शताब्दी वर्ष पर ‘राष्ट्रऋषि श्री गुरुजी’, मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी की स्मृति में ‘पुष्पांजलि’, सुदर्शन स्मृति और वंदनीय विवेकानंद जैसे संग्रहणीय विशेषांक प्रकाशित हुए हैं।  

यह सुखद अवसर है जब अपने उद्देश्य और ध्येय की ध्वजा को लेकर 39 वर्ष सफलता से पूर्ण कर अब स्वदेश 40वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। आज तकनीक के कारण पत्रकारिता का परिदृश्य बदला हुआ है। हमें भरोसा है कि स्वदेश इस बदले हुए परिदृश्य में भी राष्ट्रीय विचारों का संवाहक बनेगा और डिजिटल पत्रकारिता में भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराएगा। 40वें स्थापना दिवस के शुभ अवसर पर यही आकांक्षा और शुभकामनाएं हैं कि स्वदेश की यह गौरवपूर्ण यात्रा अनवरत जारी रहे... 

शनिवार, 17 अक्तूबर 2020

अपने लोगों को ताकत दें, स्थानीय बाजार से खरीदारी करें


हमारे देश में दीपावली से पहले बड़े स्तर पर खरीदारी शुरू हो जाती है। दरअसल, शारदीय नवरात्र के साथ ही त्योहारों और शुभ अवसरों की एक शृंखला प्रारंभ होती है, जो दीपावली के बाद तक जारी रहती है। इन शुभ प्रसंगों पर हम आवश्यक वस्तुएं, उपहार और चल-अचल संपत्ति क्रय करते हैं। विजय की आकांक्षा जगाने वाला पर्व विजयादशमी पर भी बाज़ारों में रौनक रहती है। सुख-समृद्धि और आरोग्य का प्रतीक पर्व धनतेरस भी दीपावली से ठीक दो दिन पूर्व ही आता है, जब हमारे बाजार विशेष तौर पर सजाए जाते हैं। इस दिन बड़ी संख्या में लोग बर्तन, सोना-चांदी, जेवरात इत्यादि संपत्ति खरीदते हैं। 

कुल मिलाकर यह एक ऐसा अवसर आ रहा है, जब हम सही मायने में ‘वोकल फॉर लोकल’ के अपने शुभ संकल्प को परख सकते हैं। क्या हम यह तय कर सकते हैं कि इस बार हम अपने स्थानीय व्यवसायियों के हाथ मजबूत करेंगे? अपनी आवश्यकता का सामान अपने आसपास के बाजार से खरीदेंगे। 

  • स्थानीय सुनार से आभूषण तैयार कराएंगे। 
  • स्थानीय इलेक्ट्रीशियन को सजावटी लाइट तैयार करने को कहेंगे। 
  • साज-सज्जा की सामग्री किसी मॉल या शो-रूम से नहीं, बल्कि अपने शिल्पियों से खरीदेंगे। 
  • कुम्हार के चाक को गति देंगे और उससे दीये खरीदेंगे। 
  • शहर के मोची से जूते-चप्पल बनवाएंगे। 
  • फर्नीचर अपने बढ़ई से तैयार कराएंगे। 
  • अपने हलवाई से मिठाई बनवाएंगे। 

क्या हम तय कर सकते हैं कि अब हम ब्रांडेड के चक्कर में न पड़ कर स्थानीय उत्पाद को प्रोत्साहित करेंगे। अपने स्थानीय उत्पाद को ब्रांड बनाएंगे। स्थानीय उत्पाद को न केवल खरीदेंगे अपितु उपयोग के बाद संतुष्ट होने पर उसका प्रचार भी करेंगे। अपने परिचितों के साथ और अपने सोशल मीडिया मंचों के माध्यम से उस उत्पाद की खूबियां सबके साथ साझा करेंगे। 

हम ऐसा विज्ञापन करेंगे कि उन देशी-विदेशी बड़े ब्रांडों को शर्म आ जाए, जो प्रचार में भी हिन्दू समाज पर आघात करते हैं। यह लगातार देखने में आ रहा है कि विभिन्न देशी-विदेशी कंपनियां अपने उत्पाद का प्रचार करने के लिए ऐसी झूठी कहानियां प्रस्तुत कर रहीं हैं, जिनसे हिन्दू समाज की छवि यथार्थ के ठीक विपरीत संकीर्ण, कूपमंढूक और असहिष्णु समाज के रूप में बन रही है। 

यह अच्छी बात है कि विज्ञापनों और सिनेमा के माध्यम से समाज पर हो रहे लगातार हमले पर अब हिन्दू समाज ने अपना प्रतिरोध दर्ज कराना शुरू कर दिया है। निश्चित ही यह जागरूक समाज की जिम्मेदारी है कि वह अपने विरुद्ध हो रहे वैचारिक हमलों को रोके। वास्तविकता से परे, कपोल-कल्पित, झूठे और आपत्तिजनक विज्ञापनों को रोका जाना बहुत आवश्यक है। इसके साथ ही अच्छी और सच्ची बातों का स्वागत भी करना है।

अब हमें बहिष्कार करने की प्रवृत्ति से आगे बढ़ कर अपने स्थानीय उत्पादों को स्थापित करके भी दिखाना चाहिए। उन छोटे दुकानदारों, कारीगरों और कलाकारों का प्रचार करना चाहिए, जो विज्ञापन फिल्में बनाकर अपने गुणवत्तापूर्ण सामग्री को सब तक नहीं पहुँचा पाते हैं। यह इसलिए भी करना आवश्यक है क्योंकि कोरोना संक्रमण का बहुत नकारात्मक प्रभाव हमारे छोटे-मोटे दुकानदार, कारीगर, व्यवसायियों पर पड़ा है। इस दौरान उनके यहाँ काम करने वाले कामगारों को भी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा है। यदि हमें भारत को मजबूत बनाना है तब इन लोकल्स के लिए वोकल होना ही पड़ेगा। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान के बाद हमने जिस आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का संकल्प लिया है, उसमें ‘गिलहरी योगदान’ देने का अवसर आ गया है। यह अवसर स्वदेशी के प्रति आग्रही होने के हमारे अभ्यास को भी पक्का करेगा। 

तो आईये, संकल्प लेते हैं कि इस बार स्वदेशी और स्थानीय उत्पाद ही खरीदेंगे। साथ ही उसका प्रचार भी करेंगे। 

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2020

सो मैं हँस दिया

उदासी और निराशा से मुक्त करती कविता




हालांकि परिस्थितियां नहीं हैं मुस्कुराने की।
तुमने कहा मुस्कुराने को, सो मैं हँस दिया।।

मेरे दर्द को समझने की कोशिश में नहीं जो
उसके सामने रोना क्या, सो मैं हँस दिया।।

बिछड़ने का रत्ती भर गम नहीं था उसको
उदास हो विदा देता कैसे, सो मैं हँस दिया।

उसे कैसे समझता तकलीफ अपने दिल की
वो हँस के कर रहा बातें, सो मैं भी हंस दिया।

उसे पता नहीं मुक्कदर मेरा लिखा है राम ने
और वो मांग रहा मेरी बर्बादी, सो मैं हँस दिया।

सोमवार, 12 अक्तूबर 2020

जन आंदोलन को सफल बनाएं


कोविड-19 वायरस के कारण दुनियाभर में फैली महामारी को रोकने और उससे बचने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रारंभ से ही अपने देश की जनता के साथ संवाद कर रहे हैं। अब जबकि कोरोना का पीक भारत में देखा जा रहा है और संक्रमण के मामलों में कमी आने लगी है, तब एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी ने जनता से कोरोना से बचाव के लिए जन-आंदोलन चलाने की अपील की है। एक बात हमें अभी तरह समझ लेनी चाहिए कि जब तक कोरोना की वैक्सीन नहीं आ जाती तब तक वैश्विक स्वास्थ्य संगठनों की ओर से जारी दिशा-निर्देश का पालन करना ही आवश्यक है। मास्क, शारीरिक दूरी और स्वच्छता का पालन करना अनिवार्य है। लेकिन, पिछले कुछ दिनों से देखने में आ रहा है कि लोगों के बीच लापरवाही बढ़ती जा रही है। लोग दो गज की शारीरिक दूरी का पालन नहीं कर रहे हैं। बिना मास्क लगाए घर से बाहर निकल रहे हैं। बार-बार हाथ धोने या साफ करने की सीख भी हमने बिसार दी है। ऐसी स्थिति में एक बार फिर यह लोगों को जागरूक करने की आवश्यकता थी। प्रधानमंत्री मोदी ने इसी बात को ध्यान में रख कर एक बार फिर कोरोना से बचाव के लिए ‘जन आंदोलन अभियान’ चलाने का आह्वान किया है। 

          दुनिया के कई देशों में कोरोना का दूसरा चरण देखने में आ रहा है। भारत को हम कोरोना संक्रमण के दूसरे चरण से बचा सकें, इसके लिए नागरिकों में जागरूकता और प्रतिबद्धता आवश्यक है। इसलिए प्रधानमंत्री ने कोविड-19 अनुरूप व्यवहार हेतु लोगों से शपथ लेने का आह्वान किया है। जब पूरा देश सामान्यीकरण की प्रक्रिया में जा रहा है, तब प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए सुझाव, संदेश और उनका नेतृत्व प्रशंसनीय है। प्रधानमंत्री के इस अभियान का उद्देश्य एक बार फिर से लोगों को रोकथाम एवं बचाव के उपायों की तरफ ले जाना हैं, ताकि वे आपदा से बचे रहें। जहाँ तक इस अभियान के प्रभाव की बात है, तो प्रधानमंत्री ने जब-जब राष्ट्र को संबोधित किया है, भले ही उनका माध्यम कोई भी रहा हो, पूरे देश ने उनकी बात सुनी है और उसे माना है। यह एक तरह से जागरूकता अभियान ही है। प्रधानमंत्री मोदी जैसे व्यक्तित्व द्वारा जब कोई बात कही जाती है, तो समाज के तमाम लोग उससे प्रभावित होते हैं। इसलिए यह माना जा रहा है कि यदि लोगों ने थोड़ी ढिलाई बरतनी शुरू की है, तो वे वापस संभल जाएंगे। संक्रमण से बचाव को लेकर जिनके ध्यान में थोड़ी कमी आयी थी, वो पुन: ध्यान रखना शुरू कर देंगे। 

          प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किया गया यह अभियान समाज हित में है। देशवासियों के स्वास्थ्य एवं जीवन से जुड़ा है। इसलिए सब लोगों को मिल कर इस ‘जन आंदोलन’ को सफल बनाना चाहिए। इस अभियान के माध्यम से प्रधानमंत्री ने हमें यह याद दिलाया है कि इस बदलते मौसम में तमाम वायरस सक्रिय हो जाते हैं, ऐसे में यह वायरस भी ज्यादा सक्रिय हो सकता है, इसलिए रोकथाम के उपायों को लेकर किसी तरह की कोताही ना बरती जाए। शोधार्थियों ने भी सर्दियों में संक्रमण के बढऩे को लेकर संभावना जतायी है। इसलिए यह बात स्मरण रखना जरूरी है कि जब तक हमारे पास इस बीमारी का कोई उपचार उपलब्ध नहीं हो जाता है, तब तक सावधानी और जागरूकता ही एकमात्र बचाव है। 

बुधवार, 7 अक्तूबर 2020

हिन्दी पत्रकारिता के ‘माणिक’ मामाजी

प्रखर संपादक माणिकचंद्र वाजपेयी उपाख्य ‘मामाजी’ की 101वीं जयंती पर विशेष

‘मन समर्पित, तन समर्पित और यह जीवन समर्पित। चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ’। कवि रामावतार त्यागी की यह पंक्तियां यशस्वी संपादक माणिकचंद्र वाजपेयी उपाख्य ‘मामाजी’ के जीवन/व्यक्तित्व पर सटीक बैठती हैं। मामाजी ने अपने ध्येय की साधना में सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। उनका जीवन आज की पीढ़ी के लिए संदेश बन गया है। सादगी, सरलता और निश्छलता के पर्याय मामाजी ने अपने मौलिक चिंतन और धारदार लेखनी से पत्रकारिता में भारतीय मूल्यों एवं राष्ट्रीय विचार को प्रतिष्ठित किया। मामाजी उन विरले पत्रकारों में शामिल हैं, जिन्होंने पत्रकारिता के मिशनरी स्वरूप को जीवित रखा। उन्होंने कभी भी पत्रकारिता को एक प्रोफेशन के तौर पर नहीं लिया, बल्कि उन्होंने पत्रकारिता को देश, समाज और राष्ट्रीय विचार की सेवा का माध्यम बनाया। सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर उन्होंने सदैव समाज को जागरूक किया। आपातकाल, हिन्दुत्व, जम्मू-कश्मीर, स्वदेशी, श्रीराम जन्मभूमि, जातिवाद, छद्म धर्मनिरपेक्षता, कन्वर्जन, शिक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और देश के स्वाभिमान से जुड़े विषयों पर लेखन कर उन्होंने समाज को मतिभ्रम की स्थिति से बाहर निकाला। सामाजिक, राजनीतिक और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर उन्होंने विपुल लेखन किया है, जो आज भी प्रासंगिक है। स्वदेश में प्रकाशित उनकी लेखमालाएं ‘केरल में मार्क्स नहीं महेश’, ‘आरएसएस अपने संविधान के आईने में’, ‘समय की शिला पर’ इत्यादि बहुत चर्चित हुईं। ये लेखमालाएं आज भी पठनीय हैं।   

मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी का पत्रकारीय जीवन लगभग 40 वर्ष का रहा। वैसे तो पत्रकारिता में उनका प्रवेश भिंड में ही हो चुका था, जहाँ वे ‘देश-मित्र’ समाचारपत्र का संचालन कर रहे थे। लेकिन, एक सजग एवं प्रखर पत्रकार के रूप में उनकी पहचान स्वदेश से जुडऩे के बाद ही बनी। 1966 में विजयदशमी के शुभ अवसर पर इंदौर में दैनिक समाचारपत्र ‘स्वदेश’ की स्थापना हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक सुदर्शनजी की प्रेरणा से प्रारंभ हुए इस महत्वपूर्ण समाचारपत्र के संपादक की जब खोज प्रारंभ हुई तो वह मामाजी के नाम पर जाकर पूरी हुई। स्थापना वर्ष से ही मामाजी ‘स्वदेश’ से जुड़ गए लेकिन संपादक का दायित्व उन्होंने 1968 से संभाला। 17 वर्ष तक वे स्वदेश, इंदौर के संपादक रहे। अपने संपादकीय कौशल से उन्होंने मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में भारतीयता की एक सशक्त धारा प्रवाहित कर दी। मामाजी की लेखनी का ही प्रताप था कि स्वदेश शीघ्र ही मध्यप्रदेश का प्रमुख समाचारपत्र बन गया। प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी स्वदेश की माँग होने लगी। ग्वालियर में राजमाता विजयाराजे सिंधिया की प्रेरणा से दैनिक समाचारपत्र ‘हमारी आवाज’ प्रकाशित हो रहा था। 1970 में राजमाता ने इंदौर प्रवास के दौरान स्वदेश का प्रभाव देखा, तब उन्होंने सुदर्शनजी के सामने प्रस्ताव रखा कि ग्वालियर से भी स्वदेश का प्रकाशन होना चाहिए और राजमाता का समाचारपत्र ‘हमारी आवाज’ अब ‘स्वदेश’ के रूप में प्रकाशित होने लगा। मामाजी से प्रेरित प्रखर संपादक राजेन्द्र शर्मा के नेतृत्व में स्वदेश (ग्वालियर) ने लोकप्रियता के कीर्तिमान रच दिए। बाद में, राजेन्द्र जी ने भोपाल से स्वदेश की शुरुआत की। इंदौर से सेवानिवृत्त होने के बाद मामाजी स्वदेश (ग्वालियर) के संपादक एवं प्रधान संपादक रहे और स्वदेश (भोपाल) के साथ भी सलाहकार संपादक के रूप में जुड़े। मामाजी अपने जीवन के अंतिम समय तक स्वदेश से जुड़े रहे। पत्रकारिता जगत में मामाजी और स्वदेश, एक-दूसरे के पर्याय हो गए थे।  


मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी ने ध्येय के प्रति अपना जीवन समर्पित करके न केवल स्वदेश की स्थापना की बल्कि इस समाचारपत्र के माध्यम से उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता का वातावरण ही बदल दिया। मामाजी ने किस तरह के वातावरण में राष्ट्रीय विचार को केंद्र में रखते हुए स्वदेश को प्रतिष्ठा दिलाई और उनके लिए पत्रकारिता का क्या अर्थ था, यह समझने के लिए हमें उनके ही विचार प्रवाह से होकर गुजरना चाहिए। स्वदेश (ग्वालियर) के 25 वर्ष पूर्ण होने पर प्रकाशित स्मारिका में अपने आलेख में मामाजी लिखते हैं- “आजादी के बाद भी ‘स्व’ उपेक्षित और प्रताडि़त था। तुष्टीकरण की जिस आत्मघाती नीति के कारण देश का विभाजन हुआ, उसे ही कल्याणकारी साबित करने की होड़ लगी थी। छद्म धर्मनिरपेक्षिता का सर्वत्र बोलबाला था। राष्ट्रवाद को साम्प्रदायिक घोषित कर दिया गया था। प्रगतिशीलता के नाम पर हिन्दुत्व यानी भारतीयत्व की खिल्ली उड़ाई जा रही थी। समाज को तोडऩे वाली नीतियों एवं कार्यक्रमों को संरक्षण मिल रहा था। पत्रकारिता भी इन्हीं तुष्टीकरण तथा छद्म धर्मनिरपेक्षता वादियों की चेरी बनी हुई थी। वह गांधी, तिलक, अरविंद, दीनदयाल उपाध्याय और दादा माखनलाल चतुर्वेदी के मार्ग से हट गई थी, भटक गई थी। भारतीय राष्ट्रीयता के पर्यायवाची हिन्दुत्व के विचार से वह ऐसे बिचकती थी, जैसे लाल कपड़े को देखकर साड़। सड़ी लाश मानकर वह उससे घृणा करती थी। जनता भ्रमित थी तथा सत्ता निरंकुश। ऐसी विषम स्थिति में स्वदेश ने अपने जन्मकाल से ही राष्ट्रवाद के पक्ष में खड़े होने का संकल्प लिया। उसी कण्टकाकीर्ण मार्ग को उसने अपने लिए चुना। उसके जन्म का उद्देश्य ही वही था”। 


मामाजी ने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। प्रत्येक परिस्थिति में सच के साथ खड़े रहे। जब समूची पत्रकारिता भ्रमित होकर भारतीय मूल्यों के विरुद्ध ही प्रचार करने लगती, तब भी मामाजी की लेखनी भटकती नहीं। वे धारा के साथ बहने वाले लोगों में नहीं थे। जब गो-हत्या बंद करने की माँग को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे हजारों साधु-संतों पर गोलियां चलाई गईं, तब पत्रकारिता में एक बड़ा वर्ग गो-भक्तों के विरोध में खड़ा था। जब पत्रकारिता के माध्यम से इन साधु-संन्यासियों एवं गो-भक्तों को सांप्रदायिक और दंगाई सिद्ध करने के प्रयत्न हो रहे थे, तब मामाजी ने मध्यप्रदेश में गो-भक्तों के पक्ष में स्वदेश के माध्यम से आवाज उठाई। परिणाम यह हुआ कि मध्यप्रदेश में गोवंश हत्या को रोकने के लिए प्रभावी कानून बन गया। इसी तरह इंदौर में हिन्द केसरी मास्टर चंदगीराम के सम्मान में निकाली गई शोभायात्रा पर जब लीगी गुण्डों ने हमला किया, तब केवल मामाजी का स्वदेश ही था जिसने लीगी मानसिकता का पर्दाफाश किया। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन और तथाकथित बाबरी ढंाचा गिरने पर भी मामाजी की लेखनी ने हिन्दू समाज को जागरूक किया तथा उन्हें कम्युनिस्टों के प्रोपोगंडा से भ्रमित होने से बचाया। हिन्दुत्व को बदनाम करने के प्रयत्न जिसने भी किए, मामाजी की लेखनी ने उसकी जमकर खबर ली। उनकी लेखनी ने भारतीय मूल्यों एवं हिन्दुत्व के विरोध में चलने वाले सभी अपप्रचारों का तथ्यों एवं तर्कों के आधार पर भंडाफोड़ किया। 

वर्ष 1975 में मौलिक अधिकारों एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हत्या कर देश पर थोपे गए आपातकाल के दौरान सरकार के भय से प्रतिष्ठित समाचारपत्रों और संपादकों की कलम झुक गई थी लेकिन प्रखर राष्ट्रभक्त मामाजी भूमिगत रहकर भी लेखन कार्य करते रहे। इंदिरा गांधी की तानाशाही के विरोध में स्वदेश मुखर ही रहा। परिणाम यह हुआ कि स्वदेश के कार्यालय पर ताला लगा दिया गया और संपादक यानी मामाजी के नाम मीसा का वारंट जारी हो गया था। पुलिस ने मामाजी को पकड़ कर जेल में डाल दिया। परंतु, धुन के पक्के मामाजी कहाँ मानते, उन्होंने जेल में बंदियों को पढ़ाना शुरू कर दिया। मामाजी ने जेल में रहकर हस्तलिखित ‘मीसा समाचार पत्र’ निकालना प्रारंभ कर दिया। बाद में जब उच्च न्यायालय के आदेश पर स्वदेश के ताले खुल गए तो मामाजी ने जेल के भीतर से ही किसी प्रकार संपादकीय भिजवाने की व्यवस्था जमा ली। उनकी बेबाक संपादकीयों के कारण स्वदेश की खूब प्रतिष्ठा बढ़ी। इमरजेंसी के दौरान लोकतंत्र के सिपाहियों को स्वतंत्र भारत की सरकार ने किस प्रकार की नारकीय यातनाएं दी, इस पर तो उन्होंने एक अमर कृति ही तैयार कर दी। उनकी पुस्तक ‘आपातकाल की संघर्षगाथा’ लोकतंत्र की बहाली के लिए किए गए आंदोलन का प्रमाणित दस्तावेज है।    

बौद्धिकता का आडम्बर रचने के लिए उन्होंने कभी नहीं लिखा। उनका समूचा लेखन समाज को जागरूक करने के लिए था। उस समय में उन्होंने अपनी सीधी, सहज, सरल लेकिन धारधार भाषा-शैली से पाठकों का दिल जीत लिया था। वे अपने लेखन में आम बोलचाल की भाषा का उपयोग करते थे। वे ऐसी भाषा लिखते थे, जिसे सामान्य व्यक्ति भी समझ सके। गंभीर विषयों को सरलता से समझाने के लिए मामाजी अपने संपादकीय एवं अग्रलेखों में मुहावरों, कहानियों, प्रसंगों का बखूबी उपयोग करते थे। अनेक लेखों में तो उन्होंने लघु कथाएं स्वयं ही रच दी हैं, ताकि पाठक के मन-मस्तिष्क में विषय को सरलता से उतारा जा सके। यह उनके लेखन की विशेषता है। संपादकीय एवं अग्रलेखों में इस तरह के प्रयोग उन्हें बाकी संपादकों, लेखकों एवं पत्रकारों से अलग पहचान भी देते हैं। उनके आलेख बोझिल नहीं होते थे। पाठकों को बाँधे रखने की कला उनके अच्छे से आती थी।    

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से प्रकाशित पुस्तक ‘पत्रकारिता के युग निर्माता : माणिकचंद्र वाजयेयी’ में लेखक कैलाश गौड़ लिखते हैं कि मामाजी की दृष्टि में कार्य की गुणवत्ता ही अधिक महत्वपूर्ण थी न कि समाचारपत्र की साज-सज्जा और कलेवर। समाचारपत्र के संबंध में वे प्राय: कहा करते थे कि उसका रंग-रोगन या कागज का चिकनापन महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि महत्वपूर्ण है उसमें छपे समाचारों का सही सटीक होना और उनका एकदम ताजा होना। मामाजी संपादकीय, अग्रलेखों और संपादक के नाम आए पत्रों को अत्यधिक महत्व देते थे। उनका कहना होता था कि “संपादकीय तो समाचारपत्र की जान है, वह जितना पढ़ा जाएगा और चर्चित होगा, समझ लो अखबार उतना ही सफल होगा। इसलिए संपादकीय सामयिक और धारदार होना चाहिए”। पाठकों के पत्रों को वे समाचारपत्र की लोकप्रियता का पैमाना मानते थे। जितने अधिक पाठकों के पत्र, समझ लो उतना ही लोकप्रिय। संपादक के नाम आए पत्रों को जनता का संपादकीय कहते थे और उन्हें प्राथमिकता प्रदान करने का निर्देश दिया करते थे। 


मामाजी 1978 से 80 तक इंदौर प्रेस क्लब के अध्यक्ष भी रहे। उनके कार्यकाल में इंदौर प्रेस क्लब अपनी गतिविधियों के लिए काफी चर्चित हुआ। उन्होंने पुराने हो चुके बेकार कानूनों को खत्म करने की माँग इसी प्रेस क्लब के माध्यम से उठाई। पत्रकारों के प्रशिक्षण की भी चिंता उन्हें रहती थी। वे पत्रकारों को प्रशिक्षण देने के लिए प्रतिवर्ष कोई न कोई आयोजन कराते थे। इसके साथ ही पत्रकारिता को अपना करियर बनाने वाले युवकों को वे बहुत प्रोत्साहित करते थे। वे पत्रकारिता की चलती-फिरती पाठशाला थे। उनके संपर्क में आए अनेक युवकों ने पत्रकारिता में नाम कमाया। उनका एक स्वभाव था कि वे अपनी संपादकीय पढऩे और प्रूफ सुधारने के लिए युवा पत्रकारों को दे दिया करते थे। उन्हें इतनी छूट देते थे कि जो भी त्रुटि नजर आए बेहिचक उसे ठीक करके छपने के लिए भेज दें। मामाजी संपादक के लिए तय कुर्सी पर कभी-कभार ही बैठा करते थे। वे तो नवागत पत्रकारों के प्रशिक्षण की दृष्टि से उनके बीच में ही अधिक समय बिताया करते थे। मामाजी नये पत्रकारों के बीच अकसर कोई विषय चर्चा के लिए छेड़ देते थे और देखते थे कि वे क्या सोचते हैं? सब प्रकार के विचार सुनने के बाद अंत में उस घटना या मुद्दे पर सबका प्रबोधन भी करते थे। वे सबके विचारों का सम्मान करते थे। मामाजी के संपर्क में रहकर अनेक युवाओं ने पत्रकारिता का ककहरा सीखा लेकिन उन्होंने कभी किसी पर अपनी विचारधारा नहीं थोपी। सबका सहयोग ही किया।   

मामाजी का जन्म 7 अक्टूबर, 1919 को आगरा जिले के बटेश्वर गाँव में हुआ। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी इसी गाँव से थे। बटेश्वर में मामाजी और अटलजी का घर आमने-सामने है। दोनों ही महापुरुषों का बचपन यमुना की गोद में अटखेलियां करते बीता है। 2002 में जब अटलजी प्रधानमंत्री थे, तब स्वदेश (इंदौर) की योजना से दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास पर मामाजी का अभिनंदन समारोह ‘अमृत महोत्सव’ का आयोजन किया गया। उस दिन भार-विभोर होकर छल-छलाती आँखों से भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भरी सभा में मामाजी के चरणस्पर्श करने की अनुमति माँगी, तब वहाँ स्पंदित कर देने वाला वातावरण बन गया। भारत की राजसत्ता त्याग, समर्पण और निष्ठा के पर्याय साधु स्वभाव के मामाजी के सामने नतमस्तक थी। यह मामाजी संबोधन से प्रसिद्ध व्यक्ति का नहीं वरन उस लेखनी का सम्मान था, जिसने हिन्दी पत्रकारिता में भारतीय मूल्यों को स्वीकार्यता दिलाई। वर्ष 2005 में पत्रकारिता एवं लेखकीय सेवाओं के लिए उन्हें कोलकाता में डॉक्टर हेडगेवार प्रज्ञा पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। हालाँकि, यह सब सम्मान/पुरस्कार, उनके लिए कोई मोल नहीं रखते थे। उनका व्यक्तित्व इन सबसे कहीं ऊपर और विराट था। मामाजी ने कभी अपने लिए सम्मान और पुरस्कार की आकांक्षा नहीं की। वे तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उस मंत्र को जीते थे, जिसमें कहा गया है कि कार्यकर्ता को ‘प्रसिद्धि परांगमुख’ होना चाहिए।


शनिवार, 3 अक्तूबर 2020

नृशंस अपराध और घृणित राजनीति पर लगे रोक


पहले उत्तरप्रदेश के हाथरस जिले और उसके बाद बलरामपुर जिले में दलित लड़की के साथ दरिंदगी की घटना सामने आई है। बलरामपुर में भी दलित युवती के साथ क्रूरता की वह सब हदें पार की गईं, जो हाथरस की बेटी के साथ हुईं। नरपिशाचों ने पहले युवती को नशे का इंजेक्शन लगाया, उसके बाद सामूहिक बलात्कार किया और पीट-पीट कर उसकी कमर एवं पैर तोड़ दिए। इतनी ज्यादती के बाद भला कौन बचता? जैसे हाथरस की बेटी ने लगभग 15 दिन के संघर्ष के बाद दम तोड़ दिया, उसी तरह बलरामपुर की बेटी के जीवन की डोर भी अस्पताल पहुँचते ही टूट गई। दोनों ही घटनाओं में पुलिस की लापरवाही साफ दिखाई देती है। हाथरस की बेटी की तरह यहाँ भी पुलिस ने लोगों के आक्रोश एवं विरोध प्रदर्शन को रोकने की आड़ लेकर चुपचाप रात में अंतिम संस्कार कर दिया। यह नृशंस घटनाएं हमारे लिए शर्म की स्थिति पैदा करती हैं। एक ओर जहाँ हम नया भारत बनाने का संकल्प लेकर आगे बढऩे को उत्सुक हैं, वहीं दूसरी ओर बेटियों के साथ इस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं। उल्लेखनीय है कि इसी तरह दिल्ली के निर्भया प्रकरण ने देश को आंदोलित कर दिया था। उस समय भी हमने यह संकल्प लिया था कि बेटियों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराएंगे। कानून में भी ऐतिहासिक परिवर्तन किया गया। लेकिन, परिणाम क्या है- हाथरस और बलरामपुर। 

उत्तरप्रदेश के ये दोनों शहर ही नहीं, बल्कि देश के अन्य राज्यों के शहरों से भी कमोबेश इसी प्रकार की दर्दनाक घटनाएं सामने आती रहती हैं। राजस्थान के बांसवाड़ा में एक युवती नग्न अवस्था में मिली है। अपराधियों ने दुष्कर्म कर उसकी भी हत्या कर दी। निर्भया प्रकरण के बाद भी बहुत बदलाव नहीं आया है। बेटियों के प्रति इस विकृत मानसिकता को रोकने के संबंध में गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। कानूनों का अपना महत्व एवं आवश्यकता है लेकिन इस क्रूरता को रोकने के लिए सामाजिक प्रबोधन बहुत आवश्यक है। सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और परिवारों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। हाथरस की घटना पर जातिवादी और पुरुषवादी मानसिकता से भरे जिस तरह के कुछ बयान एवं प्रतिक्रियाएं आई हैं, वे उस उक्त घटनाओं से भी ज्यादा क्रूर हैं। समाज के प्रबुद्ध एवं जागरूक लोगों को न केवल इस प्रकार की मानसिकता के लोगों का बहिष्कार करना चाहिए बल्कि उन नेताओं एवं बुद्धिपिशाचों को भी आईना दिखाना चाहिए जो गिद्धों की तरह घटनाओं को चुनकर समाज में वैमनस्यता, द्वेष, विभाजन एवं घृणा के बीज बोने का काम करते हैं। 

नेताओं एवं बुद्धिजीवियों के कपटपूर्ण आचरण को समझने के लिए दोनों घटनाओं पर उनकी प्रतिक्रियाओं को देख लेना ही पर्याप्त होगा। एक ही समय की दोनों घटनाओं पर किस प्रकार का रवैया दिखाई दे रहा है- हाथरस की घटना पर भयंकर उबाल है, लेकिन बलरामपुर की घटना पर उतनी ही गजब की खामोशी। जबकि दोनों ही घटनाओं में दरिंदगी की शिकार दलित बेटियां हुई हैं। लाव-लश्कर के साथ हाथरस जाने के लिए राजनीतिक ड्रामा करने वाले नेता बलरामपुर की घटना पर इसलिए चुप हैं क्योंकि वहाँ आरोपी/अपराधी उनके एजेंडे का कमजोर करने वाले हैं। आखिर ये लोग बलरामपुर की दलित बेटी को न्याय दिलाने के लिए आवाज क्यों नहीं उठा रहे? बलरामपुर ही क्यों, उत्तरप्रदेश के ही आजमगढ़ और बुलंदशहर में नाबालिग लड़की के साथ हुए दुष्कर्म की घटनाओं पर भी खामोशी पसरी हुई है।  

हाथरस की दर्दनाक घटना पर जिस तरह की घृणित एवं संकीर्ण राजनीति प्रारंभ हो गई है, वह हमारे राजनीतिक चेतना में आई महान गिरावट को रेखांकित करता है। क्योंकि, वहाँ पीडि़त परिवार को न्याय दिलाने के प्रयास नहीं, बल्कि हिन्दू समाज को बाँटने और राजनीतिक एवं वैचारिक स्वार्थपूर्ति के प्रयत्न हो रहे हैं। उल्लेखनीय है कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस घटना पर शोक व्यक्त किया है और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को कठोर कार्रवाई कर सभी दोषियों को सजा दिलाने के निर्देश दिए हैं। उत्तरप्रदेश सरकार को इस मामले में लापरवाही करने वाले पुलिस प्रशासन पर भी कार्यवाही करनी चाहिए। पुलिस प्रशासन के गलत निर्णयों एवं लापरवाही ने मामले को अधिक संदिग्ध और विवाद का विषय बनाया है। भरोसा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ न केवल हाथरस और बलरामपुर की घटनाओं की ईमानदार जाँच कराने के उपरांत दोषियों को सजा दिलाएंगे, बल्कि प्रदेश की कानून व्यवस्था को ठीक करने के लिए भी आवश्यक कदम उठाएंगे।

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2020

न्याय की जीत, झूठ हुआ परास्त


भारत के स्वाभिमान के प्रतीक भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण में बाधाएं उत्पन्न करने और भारत के राष्ट्रीय विचार के प्रति नकारात्मक वातावरण बनाने के लिए बोले गए सभी झूठ अब एक-एक कर ध्वस्त हो रहे हैं। पहले श्रीराम मंदिर के संबंध में निर्णय आया और अयोध्या में भव्य मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वयं उपस्थित होकर मंदिर निर्माण का भूमिपूजन भी सम्पन्न कराया। अब तथाकथित ढांचे के विध्वंस के संबंध में फैलाए गए झूठ की कलई भी खुल गई है। बाबरी ढांचा गिराए जाने संबंधी प्रकरण में भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती समेत 32 आरोपियों को न्यायालय ने दोषमुक्त कर दिया है। लखनऊ की सीबीआई अदालत ने 30 सितंबर को अपने निर्णय में कहा है कि 6 दिसंबर, 1992 की घटना के पीछे कोई साजिश नहीं थी। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एसके यादव ने फैसला सुनाते हुए कहा, “घटना पूर्वनियोजित नहीं थी”। जबकि भारत विरोधी गिरोह ने वर्षों तक अफवाहों, मनगढ़ंत तर्कों और तथ्यों के आधार पर हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के बीच सांप्रदायिक जहर फैलाया कि तथाकथित बाबरी ढांचे को षड्यंत्र रच कर तोड़ा गया। इस काल्पनिक षड्यंत्र के लिए यह गिरोह भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं विश्व हिन्दू परिषद जैसे राष्ट्रीय संगठनों से जुड़े लोगों को जिम्मेदार ठहराता रहा। गिरोह में शामिल राजनीतिक दलों, नेताओं, तथाकथित बुद्धिजीवियों एवं पत्रकारों ने वर्षों तक इन राष्ट्रीय संगठनों एवं निर्दोष लोगों के विरुद्ध विषवमन किया। सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया। इस ‘हिन्दू विरोधी विमर्श’ के कारण देश में न केवल हिन्दू-मुसलमानों के बीच दूरी बढ़ी बल्कि अनेक जगह सांप्रदायिक दंगे भी इस विमर्श के कारण हुए। 

अयोध्या में जिस दिन तथाकथित बाबरी ढांचे के तोड़े जाने की घटना हुई थी, उस दिन वहाँ उपस्थित अनेक लोग मानते हैं कि वह भीड़ द्वारा किया गया अप्रत्याशित कृत्य था। किसी भी राजनीतिक या सामाजिक नेता ने लोगों से यह आह्वान नहीं किया था कि तथाकथित ढांचे को तोडऩा है बल्कि जब भीड़ आक्रोशि हो उठी तब सभी बड़े नेताओं ने उसे शांत कराने के प्रयास किए। मंच से अनुशासन रखने और धैर्य-संयम दिखाने का आह्वान किया जा रहा था। यह सब खुले मैदान में हो रहा था, इसके बाद भी यह झूठ वर्षों तक बोला गया कि भाजपा-विहिप के नेताओं ने बाबरी को ध्वस्त करने का आह्वान किया। यह याद रखना चाहिए कि लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती सहित अनेक बड़े नेताओं ने बाबरी ढ़ाचे को तोड़े जाने की कड़ी निंदा की थी और इसे दुर्भाग्यपूर्ण कृत्य बताया था। लेकिन, गिरोह द्वारा हिन्दू विरोधी विमर्श में इन तथ्यों पर हमेशा पर्दा डाला गया। इस महान झूठ को साबित करने के लिए जो भी प्रमाण न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए, उन्हें न्यायालय ने खारिज कर दिया। न्यायालय का मत है कि ये प्रमाण न केवल पर्याप्त हैं, बल्कि इनके साथ छेड़छाड़ की गई है। 

उल्लेखनीय है कि देशभर से रामधुन गाते हुए लाखों की संख्या में रामभक्त कारसेवक खाली हाथ ही अयोध्या पहुँचे थे। उनके पास ऐसे कोई साधन या सामग्री नहीं थी, जिससे पता चलता हो कि वे योजना बनाकर और पूर्ण तैयारी के साथ बाबरी ढांचे को तोडऩे आए हों। वे तो बस अपने आराध्य श्रीराम के दर्शन और मंदिर निर्माण की माँग के साथ एकत्र हुए थे। परंतु, आक्रोशित भीड़ ने ऐसी घटना को अंजाम दे दिया था, जिसके कारण हिन्दू विरोधी ताकतों को रामभक्तों के पवित्र, निर्दोष, शांतिपूर्ण आंदोलन पर कलंक लगाने का अवसर प्राप्त हो गया। कहते हैं कि झूठ कितना भी ताकतवर क्यों न हो, आखिर एक दिन सत्य के सामने पराजित हो ही जाता है। 30 सितंबर, 2020 को न्यायालय में ऐसे ही ताकतवर झूठ की हार हुई और रामभक्तों के साथ न्याय हुआ।  

रविवार, 27 सितंबर 2020

वन्यप्रदेश के लोकगीत सुनाते अमरकंटक के जलप्रपात


अमरकंटक, मध्यप्रदेश के प्राकृतिक सौंदर्य से समृद्ध पर्यटन स्थलों में प्रमुख है। यदि सरकार और पर्यटन विभाग थोड़ा ध्यान दे, तो ‘हिल स्टेशन’ पचमढ़ी के बाद अमरकंटक मध्यप्रदेश का प्रमुख पर्यटन स्थल बन सकता है। यहाँ का तापमान भी अपेक्षाकृत कम ही रहता है। बारिश के दिनों में यहाँ बादलों को पहाड़ों की चोटियों और ऊंचे पेड़ों से टकराते देखा जा सकता है। यहाँ के घने वन, ऊंचे पहाड़, शांत, शीतल और सौम्य वातावरण सबका मन मोह लेता है। जो एक बार यहाँ आ जाता है, वह बार-बार यहाँ आना चाहता है। मध्यप्रदेश के अन्य हिस्सों से के अलावा छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल से यहाँ अधिक संख्या में पर्यटक आते हैं। देशभर से आने वाले ऐसे पर्यटकों की संख्या भी कम नहीं है, जो प्रकृति के सान्निध्य का सुख और पुण्यदायिनी माँ नर्मदा के घर में आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति चाहते हैं। अमरकंटक, सदानीरा माँ नर्मदा के उद्गम स्थल के लिए प्रसिद्ध है। शोण (सोन) और जोहिला नदियों के उद्गम स्थल भी अमरकंटक के प्रमुख पर्यटन स्थल हैं। ये नदियां मैदानी इलाकों में बहने से पहले अमरकंटक के पहाड़ों से उतरती हैं, तब वे यहाँ अनेक स्थानों पर आकर्षक जलप्रपात बनाती हैं। कपिल धारा और दूध धारा तो अपने सौंदर्य के लिए खूब प्रसिद्ध हैं। सोनमूड़ा में लगभग 300-350 फीट की ऊंचाई से गिरता जलप्रपात भी कम आकर्षक नहीं है। दुर्गा धारा, शंभू धारा, लक्ष्मण धारा जैसे कुछ झरने ऐसे भी हैं, जो पहाड़ों से बहकर आने वाली जलधार से बनते हैं। ये भी बहुत मनोहारी हैं। प्रकृति से प्रेम करने वाले पर्यटकों को ये बहुत भाते हैं। फुरसत से आकर इनके समीप बैठ जाओ और ध्यान से सुनो, तब ऐसा लगता है मानो ये जलप्रपात वन्यप्रदेश के लोकगीत सुना रहे हैं।

अमरकंटक के प्रमुख जलप्रपातों में सबसे पहला स्थान है, कपिल धारा और दूध धारा का। नर्मदा उद्गम स्थल से लगभग 6 किमी दूर स्थित है कपिल धारा। यह ऋषि कपिल मुनि की तपस्थली है। सांसारिक दु:खों से निवृत्ति और तात्विक ज्ञान प्रदान करने वाले ‘सांख्य दर्शन’ की रचना कपिल मुनि ने इसी स्थान पर की थी। यहाँ लगभग 100 फीट की ऊंचाई से नर्मदा के जल की दो धाराएं नीचे गिरती हैं। शेष दिनों में यह धाराएं बहुत पतली होती हैं। जबकि बारिश के दिनों में इस झरने का वेग तीव्र होता है और जलराशि भी अधिक होती है। जब यहाँ से पानी नीचे गिरता है, तब बड़ा ही मनोहारी दृश्य बनता है। 100 फीट से नीचे गिरने के बाद नर्मदा का जल बौझार और फुआर बनकर यहाँ आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं को भिगोता है, मानो नर्मदा मैया अपने तट पर आए प्रकृति प्रेमियों पर ‘गंगाजल’ छिड़क रही हों। 


मध्यप्रदेश के पर्यटन विभाग ने कपिल धारा का विहंगम दृश्य देखने के लिए ‘वॉच टॉवर’ भी बनाया है। यहाँ से जब हम देखते हैं तो नर्मदा किसी नटखट बालिका की तरह दिखाई देती हैं, जो पहाड़ों से कूदती-फांदती अपनी मौज में चली जा रही हैं। नर्मदा की अटखेलियाँ देखकर घने वन और पशु-पक्षी प्रसन्नता जाहिर कर रहे हैं। कपिल धारा से उतरकर तकरीबन 200 मीटर की दूरी पर नर्मदा का एक और जल प्रपात है, जिसे दूध धारा कहते हैं। दरअसल, इस जल प्रपात में पानी इतनी तेजी से गिरता है कि उसका रंग दूध की तरह धवल दिखाई देता है। इस नाम के पीछे एक जनश्रुति भी है। अपने क्रोधित स्वभाव के लिए विख्यात ऋषि दुर्वासा ने यहाँ तपस्या की थी। उनके ही नाम पर यहाँ नर्मदा की धारा का नाम ‘दुर्वासा धारा’ पड़ा, जो बाद में अपभ्रंस होकर ‘दूध धारा’ हो गया। यह भी माना जाता है कि ऋषि दुर्वासा की तपस्या से प्रसन्न होकर माँ नर्मदा ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए और उन्हें दुग्ध पान कराया था, तभी से यहाँ नर्मदा की धारा का नाम दूध धारा पड़ गया। ऋषि दुर्वासा दूध के समान धवल नर्मदा जल से प्रतिदिन शिव का अभिषेक करते थे। इस स्थान पर ऋषि दुर्वासा की गुफा भी हैं, जहाँ उन्होंने ध्यान-तपस्या की होगी। इस गुफा में एक शिवलिंग भी है, जिस पर निरंतर पानी गिरता रहता है।  

शोण (सोन) के उद्गम स्थल पर बना जलप्रपात ‘सोनमूड़ा’ भी पर्यटकों को प्रिय है। सोनमूड़ा नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर स्थान है। बारिश के समय में यह झरना भरपूर चलता है। शेष समय में एक पतली जलधारा के रूप में रहता है। यह काफी ऊंचा स्थान है। इसलिए यहाँ से अमरकंटक की घाटियां, घने हरे-भरे जंगल, गाँव-टोलों के सुंदर दृश्य मन मोह लेते हैं। यहाँ प्रात: काल उगते हुए सूर्य का दर्शन भी सुखकर है। 


बरसात या फिर उसके बाद जब हम अमरकंटक पहुँचते हैं तब हमें शम्भू धारा और लक्ष्मण धारा जैसे जलप्रपात देखने का आनंद भी प्राप्त होता है। इस मौसम में ये जल प्रपात अपने पूर्ण सौंदर्य के साथ पर्यटकों के सामने उपस्थित होते हैं। शम्भू धारा और लक्ष्मण धारा, नर्मदा उद्गम स्थल से तकरीबन ५ किलोमीटर की दूरी पर है। यहाँ तक पहुँचने के लिए घने जंगल से होकर गुजरना पड़ता है। यहाँ जंगल इतना घना है कि धूप धरती को नहीं छू पाती है। घने जंगल से होकर, कच्चे रस्ते से शम्भूधारा तक पहुँचना किसी रोमांच से कम नहीं है। अमरकंटक के अन्य पर्यटन स्थलों की अपेक्षा यहाँ कम ही लोग आते हैं। दरअसल, लोगों को इसकी जानकारी नहीं रहती। किसी मार्गदर्शक के बिना यहाँ तक आना किसी नये व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। यह स्थान बेहद खूबसूरत है। प्राकृतिक रूप से समृद्ध है। यहाँ पशु-पक्षियों की आवाज किसी मधुर संगीत की तरह सुनाई देती हैं। निर्जन वन होने के कारण यहाँ साधु-संन्यासी धूनी भी रमाते हैं। 


दुर्गा धारा एक बहुत छोटा जल प्रपात है, लेकिन बहुत रमणीय है। पहाड़ों में ऊपर स्थित अमरनाला या अमरताल से होकर निकली धारा तकरीबन दो-तीन किमी की दूरी सघन वन में तय करके यहाँ जल प्रपात के रूप में गिरती है। पूर्व में इसका नाम कुछ और रहा होगा। लेकिन, कालांतर में इस स्थान पर मृत्युंजय आश्रम, अमरकंटक से जुड़े स्वामी आत्मानंद सरस्वती ने दुर्गा मंदिर का निर्माण करा दिया, तब से इस जल प्रपात का नामकरण ‘दुर्गा धारा’ हो गया। जब हम माई के मण्डप के लिए जाते हैं, तब यह स्थान हमें बीच में मिलता है। इनके अलावा चिलम-पानी और धरम-पानी नामक रमणीक स्थान पर भी मनोहारी जलप्रपात हैं। ये सब जलप्रपात अमरकंटक के सौंदर्य में गुणोत्तर वृद्धि करते हैं। यहाँ आने वाले पर्यटकों के आनंद को बढ़ाते हैं।  

शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

पं. दीनदयाल उपाध्याय और पत्रकारिता

 पत्रकारिता में नैतिकता और शुचिता के आग्रही दीनदयालजी 

पंडित दीनदयाल उपाध्याय राजनीतिज्ञ, चिंतक और विचारक के साथ ही कुशल संचारक और पत्रकार भी थे। उनके पत्रकार-व्यक्तित्व पर उतना प्रकाश नहीं डाला गया है, जितना कि आदर्श पत्रकारिता में उनका योगदान है। उनको सही मायनों में राष्ट्रीय पत्रकारिता का पुरोधा कहा जा सकता है। उन्होंने देश में उस समय राष्ट्रीय पत्रकारिता की पौध रोपी थी, जब पत्रकारिता पर कम्युनिस्टों का प्रभुत्व था। कम्युनिस्टों के प्रभाव के कारण भारतीय विचारधारा को संचार माध्यमों में उचित स्थान नहीं मिल पा रहा था, बल्कि राष्ट्रीय विचार के प्रति नकारात्मकता वातावरण बनाने के प्रयत्न किये जा रहे थे। देश को उस समय संचार माध्यमों में ऐसे सशक्त विकल्प की आवश्यकता थी, जो कांग्रेस और कम्युनिस्टों से इतर दूसरा पक्ष भी जनता को बता सके। पत्रकारिता की ऐसी धारा, जो पाश्चात्य नहीं अपितु भारतीयता पर आधारित हो। दीनदयाल उपाध्याय ने अपनी दूरदर्शी सोच से पत्रकारिता में ऐसी ही भारतीय धारा का प्रवाह किया। उन्होंने राष्ट्रीय विचार से ओत-प्रोत मासिक पत्रिका ‘राष्ट्रधर्म’, साप्ताहिक समाचारपत्र ‘पाञ्चजन्य’ (हिंदी), ‘ऑर्गेनाइजर’ (अंग्रेजी) और दैनिक समाचारपत्र ‘स्वदेश’ प्रारंभ कराए। उन्होंने जब विधिवत पत्रकारिता (1947 में राष्ट्रधर्म के प्रकाशन से) प्रारंभ की, तब तक पत्रकारिता मिशन मानी जाती थी। पत्रकारिता राष्ट्रीय जागरण का माध्यम थी। स्वतंत्रता संग्राम में अनेक राजनेताओं की भूमिका पत्रकार के नाते भी रहती थी। महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय, डॉ. भीमराव आंबेडकर, गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे अनेक नाम हैं, जो स्वतंत्रता सेनानी भी थे और पत्रकार भी। ये महानुभाव समूचे देश में राष्ट्रबोध का जागरण करने के लिए पत्रकारिता का उपयोग करते थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी पत्रकारिता कुछ समय तक मिशन बनी रही, उसके पीछे पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे व्यक्तित्व थे। जिनके लिए पत्रकारिता अर्थोपार्जन का जरिया नहीं, अपितु राष्ट्र जागरण का माध्यम थी।

          पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पत्रकारिता का अध्ययन करने से पहले हमें एक तथ्य ध्यान में अवश्य रखना चाहिए कि वह राष्ट्रीय विचार की पत्रकारिता के पुरोधा अवश्य थे, लेकिन कभी भी संपादक या संवाददाता के रूप में उनका नाम प्रकाशित नहीं हुआ। वह जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मूर्धन्य विचारक थे, अपने कार्यकर्ताओं के लिए उस संगठन का मंत्र है कि कार्यकर्ता को 'प्रसिद्धि परांगमुख' होना चाहिए। अर्थात् प्रसिद्धि और श्रेय से बचना चाहिए। प्रसिद्धि और श्रेय अहंकार का कारण बन सकता है और समाज जीवन में अहंकार ध्येय से भटकाता है। अपने संगठन के इस मंत्र को दीनदयालजी ने आजन्म गाँठ बांध लिया था। इसलिए उन्होंने पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित तो करायीं, लेकिन उनके 'प्रधान संपादक' कभी नहीं बने। जबकि वास्तविक संचालक, संपादक और आवश्यकता होने पर उनके कम्पोजिटर, मशीनमैन और सबकुछ दीनदयाल उपाध्याय ही थे। उन्होंने जुलाई-1947 में लखनऊ से 'राष्ट्रधर्म' मासिक पत्रिका का प्रकाशन कर वैचारिक पत्रकारिता की नींव रखी और संपादक बनाया अटल बिहारी वाजपेयी और राजीव लोचन अग्निहोत्री को। राष्ट्रधर्म को सशक्त करने और लोगों के बीच लोकप्रिय बनाने के लिए उन्होंने प्राय: उसके हर अंक में विचारोत्तेजक लेख लिखे। इसमें प्रकाशित होने वाली सामग्री का चयन भी दीनदयालजी स्वयं ही करते थे। 

           इसी प्रकार मकर संक्राति के पावन अवसर पर 14 जनवरी, 1948 को उन्होंने 'पाञ्चजन्य' प्रारंभ कराया। राष्ट्रीय विचारों के प्रहरी पाञ्चजन्य में भी उन्होंने संपादक का दायित्व नहीं संभाला। यह दायित्व उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को सौंपा। पाञ्चजन्य में भी दीनदयालजी 'विचारवीथी' स्तम्भ लिखते थे। जबकि अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित ऑर्गेनाइजर में वह 'पॉलिटिकल डायरी' के नाम से स्तम्भ लिखते थे। इन स्तंभों में प्रकाशित सामग्री के अध्ययन से ज्ञात होता है कि दीनदयालजी की तत्कालीन घटनाओं एवं परिस्थितियों पर कितनी गहरी पकड़ थी। उनके लेखन में तत्कालीन परिस्थितियों पर बेबाक टिप्पणी के अलावा राष्ट्रजीवन की दिशा दिखाने वाला विचार भी समाविष्ट होता था। दीनदयालजी ने समाचार पत्र-पत्रिकाएं ही प्रकाशित नहीं करायीं, बल्कि उनकी प्रेरणा से कई लोग पत्रकारिता के क्षेत्र में आए और आगे चलकर इस क्षेत्र के प्रमुख हस्ताक्षर बने। इनमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, देवेंद्र स्वरूप, महेशचंद्र शर्मा, यादवराव देशमुख, राजीव लोचन अग्निहोत्री, वचनेश त्रिपाठी, महेन्द्र कुलश्रेष्ठ, गिरीश चंद्र मिश्र आदि प्रमुख हैं। ये सब पत्रकारिता की उसी पगडंडी पर आगे बढ़े, जिसका निर्माण दीनदयाल उपाध्याय ने किया।

            दीनदयालजी पत्रकारिता में आदर्शवाद के आग्रही थे। वे मानते थे कि एक संवाददाता या संपादक को अपने लेखन में शब्दों की मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। शब्दों का चयन करते समय पूरी सावधानी बरतनी चाहिए। किसी मुद्दे पर विरोध होने पर लिखते समय पत्रकार को अनावश्यक उत्तेजना से बचना चाहिए। क्योंकि, अनावश्यक उत्तेजना हमारे लेखन को कमजोर और अप्रभावी बनाती है। पत्रकारिता के धर्म का निर्वहन करने के लिए अपनी भावनाओं पर काबू रखना अनिवार्य है। लेखक और पत्रकार को हमेशा याद रखना चाहिए कि अंगुली सिर्फ चाकू से ही नहीं कटती, कभी-कभी कागज की कोर से भी कट जाती है। कागज और कलम के क्षेत्र काम करने वाले विद्वानों को चाकू की भाषा के बजाय तर्कों में धार देने पर ध्यान देना चाहिए। दीनदयाल उपाध्याय की पत्रकारिता में अहंकार और कटुता का समावेश अंश मात्र भी नहीं था। इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकार ने दीनदयालजी को याद करते हुए लिखा था- 'उनके हृदय के अंदर कोई कटुता नहीं थी। शब्दों में भी कटुता नहीं थी। बड़े प्रेम से बोला करते थे। कभी किसी पर जरा भी नाराज नहीं हुए। बहुत खराबी होने पर भी खराबी करने वाले के प्रति अपशब्द का प्रयोग नहीं किया।' 


          पत्रकारिता में नैतिकता, शुचिता और उच्च आदर्शों के वे कितने बड़े हिमायती थे, इसका जिक्र करते हुए दीनदयालजी की पत्रकारिता पर आधारित पुस्तक के संपादक डॉ. महेशचंद्र शर्मा ने लिखा है- संत फतेहसिंह के आमरण अनशन को लेकर पाञ्चजन्य में एक शीर्षक लगाया गया 'अकालतख्त के काल'। दीनदयालजी ने यह शीर्षक हटवा दिया और समझाया कि सार्वजनिक जीवन में इस प्रकार की भाषा का उपयोग नहीं करना चाहिए, जिससे परस्पर कटुता बढ़े तथा आपसी सहयोग और साथ काम करने की संभावना ही समाप्त हो जाए। अपनी बात को दृढ़ता से कहने का अर्थ कटुतापूर्वक कहना नहीं होना चाहिए। इसी प्रकार का एक और उदाहरण है। जुलाई, 1953 के पाञ्चजन्य के अर्थ विशेषांक की संपादकीय में संपादक महेन्द्र कुलश्रेष्ठ ने अशोक मेहता की शासन के साथ सहयोग नीति की आलोचना करते हुए 'मूर्खतापूर्ण' शब्द का उपयोग किया था। दीनदयालजी ने इस शब्द के उपयोग पर संपादक को समझाइश दी। उन्होंने लिखा- 'मूर्खतापूर्ण शब्द के स्थान पर यदि किसी सौम्य शब्द का प्रयोग होता तो पाञ्चजन्य की प्रतिष्ठा के अनुकूल होता।' इसी प्रकार चित्रों और व्यंग्य चित्रों के उपयोग में भी शालीनता का ध्यान रखने के वह आग्रही थे।

          एक और प्रसंग उल्लेखनीय है। पाञ्चजन्य के संपादक यादवराव देशमुख ने तिब्बत और चीन के संबंध में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की नीतियों से क्षुब्ध होकर पहला संपादकीय लिखा था। उन्होंने शीर्षक दिया था- 'गजस्तत्र न हन्यते'। इस संपादकीय को पढऩे के बाद दीनदयालजी ने यादवराव देशमुख को कहा था- 'भाई आपका अग्रलेख बहुत अच्छा रहा, लेकिन उसका शीर्षक तुमने शायद बहुत सोचकर नहीं लिखा है। पंडित नेहरू से हमारा वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि वे हमारे देश के प्रधानमंत्री हैं। उनकी आलोचना करते समय हल्के शब्दों का प्रयोग करना तो उचित नहीं होगा।' कितनी महत्वपूर्ण बात उन्होंने कही थी। संपादक या पत्रकार होने का यह मतलब कतई नहीं होता कि हमारे मन में जो आक्रोश है, उसे अपनी लेखनी के जरिए प्रकट किया जाए। देश के प्रधानमंत्री पद की गरिमा का ध्यान रखना ही चाहिए। आज की परिस्थितियों में हम देखें, तब क्या इस प्रकार की पत्रकारिता दिखाई देती है? हमारे समय के अनेक मूर्धन्य लेखक और पत्रकार वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति जिस प्रकार के शब्द और वाक्य उपयोग करते हैं, उनसे तो यही प्रतीत होता है कि उनका अपने मन-मस्तिष्क पर नियंत्रण नहीं है। दीनदयालजी की पत्रकारिता में जिस प्रकार की सौम्यता थी, वह अब दिखाई नहीं देती है। 1968 में तीन दिन से भी कम अवधि में हरियाणा, पश्चिम बंगाल और पंजाब की गैर-कांग्रेसी सरकारें गिरा दी गईं, तब ऑर्गेनाइजर में एक व्यंग्य चित्र प्रकाशित हुआ। इस कार्टून में तत्कालीन गृहमंत्री चव्हाण लोकतंत्र के बैल को काटते हुए दर्शाये गए थे। उस समय केआर मलकानी ऑर्गेनाइजर के संपादक थे। दीनदयालजी ने इस व्यंग्य चित्र के लिए उनको समझाया था कि चाहे व्यंग्य चित्र ही क्यों न हो, गो-हत्या का यह दृश्य मन को धक्का पहुंचाने वाला है। इस प्रकार के व्यंग्य चित्रों का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। उनकी पत्रकारिता की शुचिता और नैतिकता का स्तर इतना ऊंचा था कि अपने विरोधी के प्रति भी असंसदीय और अमर्यादित शब्दों, फोटो या फिर व्यंग्य चित्रों के उपयोग को उपाध्यायजी सर्वथा अनुचित मानते थे।

          यह माना जा सकता है कि यदि पंडित दीनदयाल उपाध्याय को राजनीति में नहीं भेजा जाता तो निश्चय ही उनका योगदान पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में और अधिक होता। पत्रकारिता के संबंध में उनके विचार अनुकरणीय है, यह स्पष्ट ही है। यदि उन्होंने पत्रकारिता को थोड़ा और अधिक समय दिया होता, तब वर्तमान पत्रकारिता का स्वरूप संभवत: कुछ और होता। पत्रकारिता में उन्होंने जो दिशा दिखाई है, उसका पालन किया जाना चाहिए।

सोमवार, 14 सितंबर 2020

देश-दुनिया में हिन्दी का विस्तार

वर्ष 2015 में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आयोजित 10वां हिन्दी सम्मलेन 

वैश्वीकरण के इस दौर में हिन्दी का विस्तार और प्रभाव पूरे विश्व में देखने को मिल रहा है। हिन्दी भारत की सीमाओं से बाहर कई देशों में अपनी पहचान बना चुकी है। भारत में भी वह सम्पर्क की प्रमुख भाषा है। महात्मा गांधी ने कहा था कि इस देश में हिन्दी ही सम्पर्क की भाषा हो सकती है। लेकिन, महात्मा गांधी की बात को सत्ताधीशों ने गंभीरता से नहीं लिया। अलबत्ता, हम देखते हैं कि संकुचित राजनीति के कारण उपजे भाषाई विरोध के बावजूद भी आज पूरे देश में हिन्दी बोलने, पढऩे, लिखने और समझने वाले लोग मिल जाते हैं। उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक भारत में हिन्दी लोकप्रिय है और सम्पर्क-संवाद की सेतु है। वह विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही है। साहित्य की रचना हो रही है। हिन्दी की श्रेष्ठ पुस्तकों को अनुवाद भारतीय भाषाओं में और भारतीय भाषाओं में रची गईं महत्वपूर्ण पुस्तकों का अनुवाद हिन्दी में हो रहा है। एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि हम भले ही अपने भाषायी समाज में अपनी भाषा-बोली में बात करते हैं लेकिन जब किसी दूसरे समाज के व्यक्ति से बात करनी होती है तो हिन्दी ही माध्यम बनती है। जैसे- मराठी और मलयालम बोलने वाले आपस में संवाद करते हैं तो हिन्दी में। इस तरह हिन्दी सबकी भाषा है। 

प्रख्यात उपन्यासकार डॉ. नरेन्द्र कोहली बता रहे हैं- "हिन्दी में हैं सबसे अधिक रोजगार"

हिन्दी लम्बे समय से सम्पूर्ण देश में जन-जन के पारस्परिक सम्पर्क की भाषा रही है। दक्षिण भारत के आचार्यों वल्लभाचार्य, रामानुज, रामानंद आदि ने भी इसी भाषा के माध्यम से अपने मतों का प्रचार किया था। अहिन्दी भाषी राज्यों के भक्त-संत कवियों (जैसे—असम के शंकरदेव, महाराष्ट्र के ज्ञानेश्वर व नामदेव, गुजरात के नरसी मेहता, बंगाल के चैतन्य आदि) ने इसी भाषा को अपने धर्म और साहित्य का माध्यम बनाया था। यही कारण था कि जनता और सरकार के बीच संवाद में फ़ारसी या अंग्रेज़ी के माध्यम से दिक्कतें पेश आईं तो कम्पनी सरकार ने फ़ोर्ट विलियम कॉलेज में हिन्दुस्तानी विभाग खोलकर अधिकारियों को हिन्दी सिखाने की व्यवस्था की थी। यहाँ से हिन्दी पढ़े हुए अधिकारियों ने भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में उसका प्रत्यक्ष लाभ देकर मुक्त कंठ से हिन्दी को सराहा।

सी. टी. मेटकाफ़ ने 1806 ई. में अपने शिक्षा गुरु जॉन गिलक्राइस्ट को लिखा— 'भारत के जिस भाग में भी मुझे काम करना पड़ा है, कलकत्ता से लेकर लाहौर तक, कुमाऊँ के पहाड़ों से लेकर नर्मदा नदी तक मैंने उस भाषा का आम व्यवहार देखा है, जिसकी शिक्षा आपने मुझे दी है। मैं कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक या जावा से सिंधु तक इस विश्वास से यात्रा करने की हिम्मत कर सकता हूँ कि मुझे हर जगह ऐसे लोग मिल जाएँगे जो हिन्दुस्तानी बोल लेते होंगे।' वहीं टॉमस रोबक ने 1807 ई. में लिखा था कि जैसे इंग्लैण्ड जाने वाले को लैटिन सेक्सन या फ्रेंच के बदले अंग्रेजी सीखनी चाहिए, वैसे ही भारत आने वाले को अरबी-फारसी के बदले हिन्दुस्तानी सीखनी चाहिए। जबकि विलियम केरी ने 1816 ई. में लिखा था- 'हिन्दी किसी एक प्रदेश की भाषा नहीं बल्कि देश में सर्वत्र बोली जाने वाली भाषा है।' इसी तरह एच. टी. कोलब्रुक ने लिखा था- 'जिस भाषा का व्यवहार भारत के प्रत्येक प्रान्त के लोग करते हैं, जो पढ़े-लिखे तथा अनपढ़ दोनों की साधारण बोलचाल की भाषा है, जिसको प्रत्येक गाँव में थोड़े बहुत लोग अवश्य ही समझ लेते हैं, उसी का यथार्थ नाम हिन्दी है।'

भारत की सीमा से बाहर विश्व फलक पर निगाह दौड़ाएं तो हिन्दी का सुखद संसार नजर आएगा। दुनिया में हिन्दी को फलते-फूलते देखकर निश्चित ही प्रत्येक भारतीय और हिन्दी प्रेमी को सुखद अनुभूति होगी। बात बाजार-व्यापार की हो या फिर संस्कार की, विश्व कुटुम्ब में बदलती दुनिया की निगाह भारत की ओर है और उसकी समृद्ध भाषा हिन्दी की ओर भी है। एक ओर जहां मॉरिशस, त्रिनिदाद, टोबैगो, दक्षिण अफ्रीका, गुयाना, सूरीनाम और फिजी जैसे देशों में प्रवासी भारतीय अपनी विरासत के तौर पर हिन्दी को पाल-पोस रहे हैं तो दूसरी ओर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जर्मनी, पौलेंड, कोरिया, रूस, आस्ट्रेलिया, कनाडा जैसे दूसरे देशों के लिए यह बाजार की जरूरत बन रही है। आभासी दुनिया (वर्चुअल वर्ल्ड) में भी हिन्दी की धमक साफ नजर आती है। सभी सर्च इंजन हिन्दी में सामग्री खोजने की सुविधा देते हैं। गूगल हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए नित नए प्रयोग कर रहा है। जब से हिन्दी इंटरनेट पर लिखी जाने लगी है, लगातार हिन्दी सामग्री की उपलब्धता इंटरनेट पर बढ़ती जा रही है। सुखद तथ्य है कि आज दुनिया के 40 से अधिक देश और उनकी 600 से अधिक संस्थाओं, विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है।

मॉरिशस में फ्रेंच के बाद हिन्दी ही एक ऐसी महत्वपूर्ण एवं सशक्त भाषा है जिसमें पत्र-पत्रिकाओं तथा साहित्य का प्रकाशन होता है। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) देश की पहचान सिटी ऑफ गोल्ड दुबई से है। यूएई में एफएम रेडियो के कम से कम तीन ऐसे चैनल हैं, जहां आप चौबीसों घंटे नए अथवा पुराने हिन्दी फिल्मों के गीत सुन सकते हैं। ब्रिटेन ने हिन्दी के प्रति बहुत पहले से रुचि लेनी आरंभ कर दिया था। गिलक्राइस्ट, फोवर्स-प्लेट्स, मोनियर विलियम्स, केलाग होर्ली, शोलबर्ग ग्राहमवेली तथा ग्रियर्सन जैसे विद्वानों ने हिन्दीकोश व्याकरण और भाषिक विवेचन के ग्रंथ लिखे हैं। लंदन, कैंब्रिज तथा यार्क विश्वविद्यालयों में हिन्दी पठन-पाठन की व्यवस्था है। लंदन में बर्मिंघम स्थित मिडलैंड्स वर्ल्ड ट्रेड फोरम के अध्यक्ष रहे पीटर मैथ्यूज ने ब्रिटिश उद्यमियों, कर्मचारियों और छात्रों को हिन्दी समेत कई अन्य भाषाएँ सीखने की नसीहत दी है। ‘अन्तरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान’ हिन्दी का अकेला ऐसा सम्मान है जो किसी दूसरे देश की संसद (ब्रिटेन के हाउस ऑफ लॉर्ड्स) में प्रदान किया जाता है। अमेरिका के येन विश्वविद्यालय मंभ 1815 से ही हिन्दी पढ़ाई जा रही है। आज 30 से अधिक विश्वविद्यालयों तथा अनेक स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा हिन्दी में पाठ्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। ‘लैंग्वेज यूज इन यूनाइटेड स्टेट्स-2011’ की रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि अमेरिका में बोली जाने वाली शीर्ष दस भाषाओं में हिन्दी शामिल है। अमेरिका हिन्दी को उन पाँच भाषाओं में गिनता है, जिनमें उसके नागरिकों की दक्षता जरूरी समझी जाती है। 

रूस में हिन्दी पुस्तकों का जितना अनुवाद हुआ है, उतना शायद ही विश्व में किसी भाषा की पुस्तकों का हुआ हो। रूस के कई विश्वविद्यालयों में हिन्दी साहित्य पर शोध हो रहे हैं। मास्को विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के तहत जनता की समस्याओं का अध्ययन करने वाले केंद्र के एक विशेषज्ञ, रूस की विज्ञान अकादमी के भूविज्ञान संस्थान के कर्मी रुस्लान दिमीत्रियेव मानते हैं कि भविष्य में हिन्दी बोलने वालों की संख्या इस हद तक बढ़ सकती है कि हिन्दी दुनिया की एक सबसे लोकप्रिय भाषा हो जाएगी। वर्ष 2011 के आंकड़ों के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया में एक लाख से अधिक लोग हिन्दी भाषा बोलते हैं। ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी, लट्रोब विश्वविद्यालय, सिडनी विश्वविद्यालय, मेलबोर्न विश्वविद्यालय, मोनाश विश्वविद्यालय, रॉयल मेलबोर्न इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी सहित अन्य संस्थानों में हिन्दी पठन-पाठन की व्यवस्था है। 

एशियाई देश जापान में हिन्दी भाषा का बहुत अधिक सम्मान है। जापान की दो नेशनल यूनिवर्सिटी ओसाका और टोकियो में स्नातक और परास्नातक स्तर पर हिन्दी की पढ़ाई की व्यवस्था है। गौरतलब है कि प्रोफेसर दोई ने टोकियो विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग की स्थापना की। महात्मा गांधी और टैगोर के अनन्य भक्तों में से एक साइजी माकिनो जब भारत आए तो हिन्दी के रंग में रंग गए। उन्होंने गांधीजी के सेवाग्राम में रहकर हिन्दी सीखी। भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित ‘भारत में पैंतालीस साल और मेरी हिन्दी-यात्रा’ उनकी चर्चित पुस्तक है, जो उनके भारत और हिन्दी प्रेम को प्रकट करती है साथी ही जापान और भारत के संबंधों को भी बताने का प्रयास करती है। 

जर्मनी के हीडलबर्ग, लोअर सेक्सोनी के लाइपजिंग, बर्लिन के हम्बोलडिट और बॉन विश्वविद्यालय में हिन्दी भाषा को पाठ्यक्रम के रूप में शामिल किया गया है। जर्मन के लोग हिन्दी को एशियाई आबादी के एक बड़े तबके से संपर्क साधने का सबसे बड़ा माध्यम मानने लगे हैं। त्रिनिदाद एवं टोबैगो में भारतीय मूल की आबादी 45 प्रतिशत से अधिक है। गुयाना में 51 प्रतिशत से अधिक लोग भारतीय मूल के हैं। मालदीव की भाषा दीवेही भारोपीय परिवार की भाषा है। यह हिन्दी से मिलती-जुलती भाषा है। सिंगापुर, फ्रांस, इटली, स्वीडन, ऑस्ट्रिया, नार्वे, डेनमार्क, स्विटजरलैंड, जर्मन, रोमानिया, बल्गारिया और हंगरी के विश्वविद्यालयों में हिन्दी के पठन-पाठन की व्यवस्था है। इसी तरह भूटान, मालदीव और श्रीलंका में भी हिन्दी का प्रभाव है। विगत वर्षों में खाड़ी देशों में हिन्दी का तेजी से प्रचार-प्रसार हुआ है। वहां के सोशल मीडिया में हिन्दी का दखल बढ़ा है और कई पत्र-पत्रिकाओं को ऑनलाइन पढ़ा जा रहा है। आज दुनिया का कोई ऐसा कोना नहीं हैं जहां भारतीयों की उपस्थिति न हो और वहां हिन्दी का दखल न बढ़ रहा हो। एक आंकड़े के मुताबिक दुनिया भर में ढाई करोड़ से अधिक अप्रवासी भारतीय 160 से अधिक देशों में रहते हैं। इनका हिन्दी भाषा के फैलाव में अतुलनीय योगदान है। दुनिया में चीनी के दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली मातृभाषा हिन्दी आज भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के विराट फलक पर अपने अस्तित्व को आकार दे रही है। अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करा रही है। आज हिन्दी विश्व भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त करने की ओर अग्रसर है। 

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शनिवार, 15 अगस्त 2020

आओ, भारत को उत्साहित करें

भारत के स्वरूप पर यह कविता भी सुनें

आज भारत अपना 74वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। कोरोना महामारी ने हम सबको बांध कर रखा हुआ है। इस महामारी के कारण अनेक चिंताएं और चुनौतियां हमारे सामने हैं। लेकिन, अच्छी बात यह है कि हम हारे नहीं हैं। हमने इस महामारी के सामने घुटने नहीं टेके हैं। हम पहले दिन से संघर्ष कर रहे हैं। हम ठीक उसी तरह अपनी पूरी जान लगा कर बीमारी से लड़ रहे हैं, जैसे हम विदेशी दासता से लड़े। हमने कभी भी विदेशी शासन के सामने घुटने नहीं टेके थे। हमारा संघर्ष पहले दिन से शुरू हो गया था। चाहे फिर वे मुगल हों, पुर्तगीज हों या फिर ब्रिटिश। हमने बाहर से आए आक्रांताओं एवं लुटेरों के विरुद्ध सतत् संघर्ष किया। कभी हार नहीं मानी। हमारे संघर्ष, हौसले और हमारी विजिगीषा का परिणाम था कि 1947 में शासन के सूत्र हमारे हाथ में थे। यह दीगर बात है कि पूर्ण स्वतंत्रता और स्वराज्य के लिए संघर्ष अब भी जारी है। हमें विश्वास है कि अपने इन्हीं अद्भुत गुणों के कारण हम कोविड-19 वायरस को भी भारत से बाहर खदेड़ सकेंगे। इस दिशा में कुछ उत्साहजनक समाचारों की आहट मिलना शुरू हुई है। भारत में बन रही देसी वैक्सीन अपने पहले चरण के परीक्षण में सब प्रकार से सफल रही है। उम्मीद है कि भारत की मेधा वैक्सीन के शेष चरणों का परीक्षण भी जल्द पूरा करेगी। 

भारत के नागरिकों का यह चरित्र इसलिए है क्योंकि उसके शास्त्र यही सीख देते हैं कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धैर्य और उत्साह को क्षीण नहीं होने देना चाहिए। जिजीविषा बनाए रखना ही पराक्रमी और विजेता लोगों की पहचान है। रामायण में माता सीता के अपहरण के बाद एक स्थान पर प्रसंग आता है कि वियोग में श्रीराम गहरे दु:ख से घिर गए हैं। उनका उत्साह बिल्कुल ठंडा पड़ गया है। तब उनके अनुज लक्ष्मण उन्हें कहते हैं- 

“उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात् परं बलम्।

सोत्साहस्य हि लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्।।” (१२१ किष्किन्धाकाण्ड, प्रथम सर्ग) 

“भैया, उत्साह ही बलवान होता है। उत्साह से बढ़कर दूसरा कोई बल नहीं है। उत्साही पुरुष के लिए संसार में कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है।” सुमित्रानंदन आगे कहते हैं कि जिनके हृदय में उत्साह होता है, वे पुरुष कठिन-से-कठिन कार्य आ पडऩे पर हिम्मत नहीं हारते। आप जैसे महात्मा एवं कृतात्मा पुरुष को शोक शोभा नहीं देता। इसी तरह महाभारत का प्रसंग हमको ध्यान में आता है, जब युद्ध भूमि में वीर अजुर्न के हाथ से गांडिव छूट जाता है। रणभूमि में संगे-संबंधियों को अपने सामने देखकर अपराजेय अर्जुन का उत्साह ठंडा पड़ जाता है। वे घनघोर निराशा में डूब जाते हैं। तब योगेश्वर श्रीकृष्ण उनके भीतर उत्साह का संचार करते हैं। 

वर्तमान समय में अनेक प्रकार से अनेक महात्मा एवं राजपुरुष लोग ‘भारत’ के उत्साह को बनाए हुए हैं। इसी महान उत्साह के बल पर हमारा संघर्ष जारी है। इसी उत्साह के बल पर हम जीतेंगे। आईए, इस स्वतंत्रता दिवस पर हम संकल्प लें कि भारत को मजबूत करेंगे। भारत को श्रेष्ठ बनाने में अपना ‘गिलहारी’ (हर संभव) योगदान देंगे। हम आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को साकार करने के लिए आगे आएंगे। जयतु भारत....

इस अवसर पर यह कविता सुनें.... 

माझा भारत | मेरा भारत | भारत का आध्यात्मिक काव्य चित्रण/वर्णन


शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

बेंगलुरू में सांप्रदायिक दंगों के पीछे की मानसिकता


बेंगलुरू का दंगा यह समझाने के लिए पर्याप्त है कि वास्तव में असहिष्णुता, सांप्रदायिकता और कट्टरता क्या है? एक फेसबुक पोस्ट पर इतना आतंक? जबकि उसका विरोध करने के और भी तरीके थे। मुस्लिम समुदाय को कांग्रेस विधायक एवं दलित नेता श्रीनिवास मूर्ति के भतीजे नवीन की आपत्तिजनक टिप्पणी की शिकायत पुलिस में करनी चाहिए थी। पुलिस अपना काम करती लेकिन चिंता की बात तो यह है कि पुलिस में शिकायत करने की जगह यहाँ तो पुलिस पर ही हमला कर दिया गया। अब तक सामने आई जानकारी के मुताबिक 60 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हैं। दिल्ली के दंगों में भी हमने देखा कि आईबी के अधिकारी तक को कई बार चाकू घोंप कर मार दिया गया था। यह किस तरह की कट्टरता पनप रही है। इस ओर समाज के प्रबुद्ध वर्ग को और शासन-प्रशासन को गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। 

बेंगलुरू दंगा पहला उदाहरण नहीं है इसलिए इस बात पर संदेह है कि इसके बाद भी हम कोई सबक लेंगे? क्योंकि देश में कथित बुद्धिजीवियों एवं पत्रकारों का एक वर्ग ऐसा है जिसकी पूरी कोशिश यह रहती है कि इस प्रकार के सांप्रदायिक दंगों की अनदेखी करने या इन्हें जायज ठहराने के लिए हिंदू समाज को ही असहिष्णु और सांप्रदायिक ठहरा दिया जाए। पिछले कुछ वर्षों में यह तीव्र गति से हुआ है। बाकायदा प्रगतिशील बुद्धिजीवी वर्र्ग ने हिंदू समाज को बदनाम करने के लिए संगठित आंदोलन चलाया। लेकिन, इस तरह के आंदोलनों से न तो झूठ को सच बनाया जा सकता है और न ही सच को छिपाया जा सकता है। हकीकत तो दिल्ली-बेंगलुरू और शाहीन बाग की तरह बार-बार हमारे सामने आकर खड़ी हो जाती है। 

बेंगलुरू दंगा पर चल रही बहस में यह तथ्य कहीं खो गया है कि कांग्रेस विधायक के भतीजे ने आपत्तिजनक पोस्ट लिखी थी या फिर ‘नेक और आहत बंदे’ की हिंदुओं के खिलाफ लिखी गई आपत्तिजनक पोस्ट पर आक्रोश में आकर प्रतिक्रिया दी थी। यह कैसी भावनाएं हैं कि आप दूसरों के मानबिंदुओं का अपमान करो लेकिन अपने लिए वैसा लिखे या कहे जाने पर खून-खराबा करो? मध्यप्रदेश की हालिया घटना का उल्लेख करना चाहूँगा, जिसमें मुस्लिम भीड़ ने पीट-पीट कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता राजेश फूलमाली की हत्या इसलिए कर दी क्योंकि उसने माता सीता पर किए गए अपमानजनक टिप्पणी की शिकायत पुलिस में की थी। इसी तरह उत्तरप्रदेश के हिंदू नेता कमलेश तिवारी के प्रकरण को भी देखिए, जिन्होंने आपत्तिजनक बयान के कारण पहले जेल में सजा काटी उसके बाद भी उन्हें उनके ऑफिस में घुस कर मार दिया गया। इस प्रकरण में भी यह नहीं भूलना चाहिए कि कमलेश तिवारी ने जो आपत्तिजनक बयान दिया था, वह भी मुस्लिम नेता आजम खान के आपत्तिजनक बयान से उपजा आक्रोश था। क्या मुस्लिम समाज और नेता खुलकर हिंदू धर्म को अपशब्द कहने की स्वतंत्रता चाहते हैं? क्या वे यह चाहते हैं कि न तो उनका विरोध किया जाए और न ही शिकायत की जाए? इस अंतर को भी समझिए कि हिंदू समाज आपत्तिजनक पोस्ट या बयान पर अपना विरोध दर्ज कराने के लिए कानून के पास जाता है, वह लाठी-डंडे और पेट्रोल बम लेकर सड़क पर नहीं निकलता।

हैदराबाद के मुस्लिम नेता ओवैसी के भाई ने श्रीराम, माता सीता, कौशल्या और दशरथ के प्रति कितनी अभद्र बातें सार्वजनिक मंच से कहीं थीं, लेकिन इसके बाद भी हिंदू समाज ने जो धैर्य दिखाया, उससे मुस्लिम समाज को सीखने की आवश्यकता है। दुर्भाग्य की बात है कि मुस्लिम समाज के झंडाबरदार कभी इन सब बातों के विरोध में सड़क पर नहीं उतरते। सड़क पर छोडि़ए, एक बयान भी जारी नहीं करते हैं। मुस्लिम समाज को अपनी धार्मिक कट्टरता से बाहर आना होगा। एक और महत्वपूर्ण बात उन्हें सीखनी चाहिए कि जैसा व्यवहार वह अपने लिए चाहते हैं, वैसा आचरण उन्हें दूसरों के प्रति भी रखना होगा। 

श्रीराम मंदिर के भूमिपूजन के बाद जिस तरह की प्रतिक्रियाएं मुस्लिम समाज से आईं हैं, उसकी ही परिणति है बेंगलुरू दंगा। मुसलमानों के बड़े नेताओं, यहाँ तक कि आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड और आल इंडिया इमाम संघ जैसे संगठन खुलेआम कट्टरता फैलाते हैं, दंगे जैसी स्थितियां बनाते हैं। श्रीराम मंदिर के संदर्भ में हागिया सोफिया का उदाहरण देना और यह कहना कि एक दिन राम मंदिर को तोड़ कर वहाँ मस्जिद बना देंगे, क्या इससे मुस्लिम समाज में भाईचारे की भावना पैदा होगी? क्या इससे भारत के कानून के प्रति सम्मान पैदा होगा? जिन संगठनों को अमन-चैन कायम करने में अपनी भूमिका का निर्वहन करना चाहिए, वे ही लोगों को भड़का रहे हैं। ऐसी संस्थाओं पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। 

बेंगलुरू का दंगा कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं है। बल्कि यह उस मानसिकता का प्रकटीकरण है, जिसे धीरे-धीरे समाज में बोया जाता है। जरा सोचिए कि कैसे अचानक से हजारों की हिंसक भीड़ इकट्ठी हो जाती है? भीड़ की तैयारी देखकर तो यही लग रहा है कि दंगे की तैयारी पहले से थी, बस कारण की प्रतीक्षा थी। वह अवसर मिला कांग्रेस के दलित नेता के भतीजे नवीन द्वारा सोशल मीडिया पर पैगम्बर मुहम्मद को लेकर कथित अपमानजनक पोस्ट शेयर करने पर। जरा उन ठेकेदारों को भी विचार करना चाहिए जो हिंदू समाज को बांटने के लिए ‘भीम-मीम’ का नारा बुलंद करते हैं। इस घटना पर कांग्रेस, वामपंथी और दलितों की राजनीति करने वाले राजनीतिक एवं गैर-राजनीतिक संगठनों ने बहुत ही धीरे स्वर में प्रतिक्रिया दी है। 

हमारा यह जो दोहरा आचरण है, यह ही इस सांप्रदायिकता के मजबूत होने के लिए जिम्मेदार है। इस तरह की कोई भी घटना हो, किसी भी समुदाय की ओर से की गई हो, उसका एक ही मजबूत स्वर में विरोध होना चाहिए। कर्नाटक सरकार को दंगाईयों के विरोध कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। उत्तरप्रदेश सरकार की नीति का पालन करते हुए सार्वजनिक नुकसान की भरपाई दंगाईयों की संपत्ति कुर्क करके की जाए। इस सांप्रदायिकता को रोकने के लिए एक ओर सरकार को कड़े कदम उठाने होंगे, वहीं दूसरी ओर समाज को भी जागरूक होकर सांप्रदायिकता के प्रति एकजुट होना होगा।

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