मंगलवार, 27 सितंबर 2022

समग्र पर्यटन का केंद्र है मध्यप्रदेश

 मध्यप्रदेश के पर्यटन मानचित्र पर बिखरे हैं प्रकृति, वन्य जीवन, धरोहर और अध्यात्म के चटख रंग

भारत का ह्रदय ‘मध्यप्रदेश’ अपनी नैसर्गिक सुन्दरता, आध्यात्मिक ऊर्जा और समृद्ध विरासत के चलते सदियों से यात्रियों को आकर्षित करता रहा है। आत्मा को सुख देनेवाली प्रकृति, गौरव की अनुभूति करानेवाली धरोहर, रोमांच बढ़ानेवाला वन्य जीवन और विश्वास जगानेवाला अध्यात्म, इन सबका मेल मध्यप्रदेश को भारत के अन्य राज्यों से अलग पहचान देता है। इस प्रदेश में प्रत्येक श्रेणी के पर्यटकों के लिए कई चुम्बकीय स्थल हैं, जो उन्हें बरबस ही अपनी ओर खींच लेते हैं। यह प्रदेश उस बड़े ह्रदय के मेजबान की तरह है, जो किसी भी अतिथि को निराश नहीं करता है। 

वैभव की इस भूमि पर पराक्रम की गाथाएं सुनाते और आसमान का मुख चूमते दुर्ग हैं। भारत का जिब्राल्टर ‘ग्वालियर का किला’, महेश्वर में लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर का राजमहल, मांडू का जहाज महल, दतिया में सतखंडा महल, रायसेन का दुर्ग, दुर्गावती का मदन महल, जलमग्न रहनेवाला रानी कमलापति का महल और गिन्नौरगढ़ सहित अनेक किले हैं, जो मध्यप्रदेश के स्थापत्य की विविधता का बखान करते हैं। देवों के चरण भी इस धरा पर पड़े हैं। उज्जैन, जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण पढ़े। चित्रकूट, जहाँ प्रभु श्रीराम माता सीता और भ्राता लखन सहित वनवास में रहे। ओंकारेश्वर, जहाँ आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने आचार्य गोविन्द भगवत्पाद से दीक्षा ली। मध्यप्रदेश में दो ज्योतिर्लिंग- महाकाल और ओंकारेश्वर हैं। इसके साथ ही भगवान शिव ने कैलाश और काशी के बाद अमरकंटक को परिवार सहित रहने के लिए चुना है। एक ओर जहाँ द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण प्रतिवर्ष मुरैना में आकर ढ़ाई दिन रहते हैं तो वहीं ओरछा में राजा राम का शासन है। महारानी कुंवर गणेश के पीछे-पीछे श्रीराम अयोध्या से ओरछा तक चले आये थे। ओरछा राजाराम के मंदिर के लिए ही नहीं, अपितु अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए भी प्रसिद्ध है। 

पचमढ़ी का सबसे खूबसूरत WaterFall 'बी-फॉल' । फोटो : लोकेन्द्र सिंह

मध्यप्रदेश अपने वनों के लिए भी प्रसिद्ध है। सतपुड़ा के घने जंगल का तो अद्भुत वर्णन कवि भवानी प्रसाद मिश्र की कविता में आता ही है। चम्बल के भरकों से लेकर कटनी, उमरिया और जबलपुर से लगा शाहडार का जंगल भी रोमांचक यात्राओं का ठिकाना है। मेकल पर्वत पर सदानीरा माँ नर्मदा का उद्गम स्थल ही नहीं, अपितु वहां का सघन वन भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। मध्यप्रदेश भारत का इकलौता राज्य है जहाँ सर्वाधिक 12 राष्ट्रीय उद्यान हैं। कान्हा, बांधवगढ़, पेंच, शिवपुरी, पन्ना और कई अन्य राष्ट्रीय उद्यान लोगों को वन्य जीवन को देखने का दुर्लभ, रोमांचपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं। मध्यप्रदेश सफ़ेद बाघ ‘मोहन’ का ही घर नहीं है, अपितु यह रहस्य और कौतुहल बढ़ानेवाले बालक ‘मोगली’ का भी जन्मस्थान है। सर विलियम हेनरी स्लीमन ने 'एन एकाउंट ऑफ वाल्वस नरचरिंग चिल्ड्रन इन देयर डेन्स' शीर्षक से लिखे अपने एक दस्तावेज में उल्लेख किया है कि मध्यप्रदेश के सिवनी जिले के जंगल (पेंच टाइगर रिजर्व) में मोगली का घर था। 

वाइल्डलाइफ पर्यटन मध्यप्रदेश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान दिलाता है। वन्य जीवों के संरक्षण के कारण मध्यप्रदेश के पास ‘टाइगर स्टेट’ के साथ ही 'द लेपर्ड स्टेट' और 'घड़ियाल स्टेट' का दर्जा भी है। बाघ देखने के लिए न केवल देशभर से बल्कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से भी लोग मध्यप्रदेश में आते हैं। भिंड और मुरैना के समीप स्थित चम्बल सफारी तो घडियाल संरक्षण का बड़ा केंद्र बन गई है। कभी डाकुओं के लिए कुख्यात रहे चम्बल के बीहड़ अब डोल्फिन के लिए प्रसिद्ध हैं। भारत में गंगा के बाद सबसे अधिक डोल्फिन चम्बल सफारी में पाए जाते हैं। अब तो मध्यप्रदेश को चीते भी मिल गए हैं। अफ्रीका से लाए गए चीते श्योपुर के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की उपस्थिति में छोड़े गए हैं। भारत में 70 वर्ष बाद चीते दिखाई दे रहे हैं।

जनजातीय संस्कृति से साक्षात्कार करने का अवसर भी मध्यप्रदेश देता है। मंडला, उमरिया, छिंदवाडा, बालाघाट, झाबुआ और अनूपपुर में कई स्थान हैं, जो पर्यटन के तौर पर विकसित किये गए हैं। कुछ समय के लिए दुनिया की भागम-भाग से दूर प्रकृति की गोद में सुख की अनुभूति करने के लिए तामिया और पातालकोट जैसे स्थान भी हैं, जो आम पर्यटकों से छिपे हुए हैं। वहीं, मढ़ई, तवा, परसिली, हनुमंतिया जैसे अनेक स्थल भी हैं, जिन्हें पर्यटन गतिविधियों का केंद्र बनाया जा रहा है। पर्यटकों द्वारा खोजे जा रहे नये पर्यटन स्थलों को भी व्यवस्थित करने में मध्यप्रदेश की सरकार अग्रणी है। इंदौर के समीप महू से पातालपानी-कालाकुंड तक चलनेवाली हेरिटेज ट्रेन भी सीटी बजाकर उन पर्यटकों को बुलाती है, जो प्रकृति के नजारों में खोना चाहते हैं।

सब प्रकार के पर्यटन की दृष्टि से समृद्ध मध्यप्रदेश के ऐसे अनेक स्थान हैं, जो अभी भी पर्यटन के वैश्विक मानचित्र पर आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। वर्तमान में यूनेस्को की ‘विश्व विरासत’ की सूची में मध्यप्रदेश के चार स्थल है- बुद्ध का सन्देश देते साँची के स्तूप, प्रागैतिहासिक सभ्यता के चिन्ह भीमबेटिका, सौंदर्य के साक्षी खजुराहो के साथ त्यागमय संस्कृति का प्रतीक ओरछा। ये चारों ही स्थान विदेशी पर्यटकों को लुभाते हैं। 

अमरकंटक के प्राचीन मंदिर समूह 'रंगमहला' में स्थित कल्चुरी वंश के राजा कर्ण द्वारा निर्मित 'कर्ण मंदिर' - फोटो : Lokendra Singh Rajput

मध्यप्रदेश का कोई कोना ऐसा नहीं है, जो पर्यटन की दृष्टि से मरुस्थल हो। ग्वालियर के आसपास ककनमठ, मितावली, पड़ावली, बटेश्वर, दतिया, सोनागिर, ओरछा, चंदेरी और शिवपुरी का एक ट्रेवल रूट बनता है। भोपाल के आसपास साँची, विदिशा, ग्यारसपुर, उदयगिरी की गुफाएं, नरसिंहगढ़भोजपुर, भीमबेटका, देलावाडी और रायसेन एक पर्यटन स्थल समूह बनता है। इंदौर को केंद्र मानकर उज्जैन, हनुमंतिया, ओंकारेश्वर, ब्रह्मपुर (बुरहानपुर), महेश्वर और मांडू का एक पर्यटन स्थल का समूह बनता है। वहीं, जबलपुर से भेड़ाघाट, बरगी, बांधवगढ़, अमरकंटक, कान्हा और पेंच जा सकते हैं। खजुराहो के साथ ओरछा, अजयगढ़, चित्रकूट, मुकुंदपुर वाइल्डलाइफ सेंक्चुरी, संजय राष्ट्रीय उद्यान, मैहर और हीरों के साथ अपने जंगलों के लिए प्रसिद्ध पन्ना के पर्यटन स्थल घुमे जा सकते हैं। उधर, सतपुड़ा की रानी ‘पचमढ़ी’ के साथ मढ़ई, तवा, तामिया और पातालकोट का एक पर्यटन समूह बनता है। मध्यप्रदेश के पर्यटन, उसकी समृद्ध विरासत और गौरव का दर्शन करना है तो एक बार मध्यप्रदेश गान पढ़/सुन लेना चाहिए। वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार महेश श्रीवास्तव ने इस गीत में मध्यप्रदेश की एक खूबसूरत और गौरवपूर्ण तस्वीर उतार दी है। 

मध्यप्रदेश घूमने का सबसे अच्छा समय –

वैसे तो मध्यप्रदेश राज्य का वर्ष के किसी भी समय दौरा किया जा सकता है। मध्य भारत में स्थित होने के कारण, मध्य प्रदेश की जलवायु आमतौर पर गर्म और शुष्क होती है। परन्तु अच्छा होगा कि अक्टूबर से मार्च के बीच मध्यप्रदेश घूमने की योजना बनायी जाए। इस दौरान यहाँ का तापमान अनुकूल होता है और बारिश के बाद कई पर्यटन स्थल अपने पूर्ण सौंदर्य के साथ उपस्थित होते हैं। प्रदेश में सर्दियों का मौसम वन्यजीव अभयारण्यों, ऐतिहासिक स्थलों, नदी घाटियों और प्राचीन मंदिरों में जाने के लिए एकदम सही है। 

मध्यप्रदेश के कुछ सुप्रसिद्ध स्थलों की संक्षिप्त जानकारी -

अमरकंटक : कालिदास के मेघदूत का विश्राम स्थल -

अमरकंटक को मध्यप्रदेश के वनप्रदेश की उपमा प्राप्त है। आम, महुआ और साल सहित नाना प्रकार के वृक्ष मैकाल पर्वत का श्रृंगार करते हैं। अमरकंटक के जंगलों में आम के वृक्ष अधिक होने के कारण प्राचीन ग्रंथों में आम्रकूट के नाम से भी इस स्थान का वर्णन आता है। वृक्षों से आच्छादित यह वनभूमि प्रकृति प्रेमियों को सदैव ही आकर्षित करती है। यहाँ आकर मन, मस्तिष्क और शरीर प्रफुल्लित हो जाते हैं। प्रकृति के सान्निध्य से मानसिक तनाव और शारीरिक थकान दूर हो जाती है। अमरकंटक आकर अंतरमन आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है। कालिदास के मेघदूत जब लंबी यात्रा पर निकले थे, तब उन्होंने अपनी थकान मिटाने के लिए अमरकंटक को ही अपना पड़ाव बनाया था। कवि कालिदास ने 'मेघदूत' में लिखा है कि रामगिरि पर कुछ देर रुकने के बाद तुम (मेघदूत) आम्रकूट (अमरकंटक) पर्वत जाकर रुकना। अमरकंटक ऊंचे शिखरों वाला पर्वत है। वह अपने ऊंचे शिखर पर ही तुम्हारा स्वागत करेगा। मार्ग में जंगलों में लगी आग को तुमने बुझाया होगा, इसलिए तुम थक गए होगे। एक छोटे से छोटा व्यक्ति भी उसका स्वागत करता है, जिसने कभी उसके साथ उपकार किया था। फिर अमरकंटक जैसों की क्या बात कहना, जो स्वयं इतना महान है। यह स्थान प्रकृति प्रेमियों, पर्वतरोहियों, रोमांचक यात्रा पर जाने वाले युवाओं के साथ-साथ धार्मिक मन के व्यक्तियों के लिए भी सर्वोत्तम स्थान है। वन्यप्रदेश के लोकगीत सुनाते अमरकंटक के जलप्रपात भी आकर्षण का केंद्र हैं।

          प्राकृतिक रूप से समृद्ध होने के साथ-साथ अमरकंटक महादेव शिव की बेटी नर्मदा का उद्गम स्थल भी है। नर्मदा के साथ ही अमरकंटक शोणभद्र और जोहिला नदी का उद्गम स्थल भी है। अमरकंटक के प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं- नर्मदा उद्गम मंदिर, प्राचीन मंदिर समूह, कपिल धारा, दूध धारा, पंच धारा, शम्भू धारा, दुर्गा धारा, चक्रतीर्थ, अरण्यक आश्रम मंदिर, कबीर चबूतरा, भृगु कमण्डल, धूनी-पानी, श्रीयंत्र मंदिर, फरस विनायक, सोनमूड़ा, माई की बगिया, श्री दिगम्बर जैन सर्वोदय तीर्थ क्षेत्र, प्राचीन जलेश्वर मंदिर, अमरेश्वर मंदिर, और माई का मंडप।

अमरकंटक से जुड़े वीडियो ब्लॉग देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें 

नर्मदा उद्गम स्थल | अमरकंटक दर्शन



ओंकारेश्वर : जहां औंकार में विराजते हैं शिव - 

देवों के देव महादेव शिव अपने नाम के अनुरूप भोले हैं। बाबा मनमौजी भी हैं। उनका निवास और भेष दुनिया को संदेश देता है कि व्यक्ति अपने सामर्थ्य को पहचाने तो फिर वह प्रत्येक परिस्थिति में सुख से रह सकता है। बेफिक्र, निश्चिंत, परम आनंद में डूबा हुआ। कैलाश शिखर के वासी भोले भण्डारी ने औंकारेश्वर में भी एक पर्वत को ही अपना ठिया बनाया है। पर्वत पवित्र 'ऊँ' के आकार का है। इसीलिए यहां शिव का नाम पड़ा है- ओंकारेश्वर। भोले भण्डारी को मधुर संगीत सुनाने के लिए पर्वत के नीचे माँ नर्मदा कल-कल बहती हैं। कावेरी भी उनका साथ देती नजर आती हैं। प्रकृति भी अपने पूरे सौंदर्य के साथ मौजूद है। माँ नर्मदा के घाट पर खड़े होकर ओंकारेश्वर के शिखर को निहारना अलहदा अहसास है। शिखर पर पहुंचने की तीव्र लहरें मन में उठती हैं, लेकिन मान्धाता पर्वत उन्हें पीछे धकेल देता है, कहता है- 'शिखर पर बैठना है तो जाओ पहले शिव होकर आओ।' 

ओंकारेश्वर बारह ज्योर्तिलिंगों में से एक है। ऐसा माना जाता है कि इक्ष्वाक वंश के राजा मान्धाता ने तपस्या कर भगवान शंकर को प्रसन्न किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर ही महादेव ने औंकार रूप में अपना निवास ओंकारेश्वर में बनाया है। राजा मान्धाता के नाम पर ही इस पर्वत का नाम मान्धाता पर्वत पड़ा है। आदि शंकराचार्य के जीवन का महत्वपूर्ण प्रसंग भी इस पवित्र स्थल से जुड़ा है। आदि शंकराचार्य ने अपने गुरु गोविन्दाचार्य से नर्मदा नदी के उत्तरी तट पर ओंकारेश्वर मंदिर के समीप दीक्षा ली थी। ऐसी मान्यता है कि ओंकारेश्वर लिंग किसी मनुष्य ने नहीं बनाया, बल्कि यह प्राकृतिक शिवलिंग है। इसके चारों ओर हमेशा जल भरा रहता है।

ओंकारेश्वर, ज्योतिर्लिंग | A Trip to Omkareshwar jyotirlinga



सांची : विश्व बंधुत्व और शांति का संदेश -

सांची के बौद्ध स्तूप प्रेम, शांति, विश्वास और बंधुत्व के प्रतीक हैं। मौर्य सम्राट अशोक को बौद्ध धर्म की शिक्षा-दीक्षा के लिए प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर एकान्त स्थल की तलाश थी। ताकि एकांत वातावरण में बौद्ध भिक्षु अध्ययन कर सकें। सांची में उनकी यह तलाश पूरी हुई। जिस पहाड़ी पर सांची के बौद्ध स्मारक मौजूद हैं उसे पुरातनकाल में बेदिसगिरि, चेतियागिरि और काकणाय सहित अन्य नामों से जाना जाता था। यह ध्यान, शोध और अध्ययन के लिए अनुकूल स्थल है। कहते हैं महान सम्राट अशोक की महारानी ने उन्हें सांची में बौद्ध स्मारक बनाने का सुझाव दिया था। महारानी सांची के निकट ही स्थित समृद्धशाली नगरी विदिशा के एक व्यापारी की पुत्री थीं। सम्राट अशोक के काल में ही बौद्ध धर्म के अध्ययन और प्रचार-प्रसार की दृष्टि से सांची कितना महत्वपूर्ण स्थल हो गया था, इसे यूं समझ सकते हैं कि सम्राट अशोक के पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा ने भी कुछ समय यहीं रहकर अध्ययन किया। दोनों भाई-बहन बौद्ध धर्म की शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार के लिए सांची से ही बोधि वृक्ष की शाखा लेकर श्रीलंका गए थे। सांची के स्तूप सिर्फ बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए ही श्रद्धा के केन्द्र नहीं हैं बल्कि दुनियाभर के लोगों के लिए आकर्षण का केन्द्र हैं। ये स्तूप आज भी भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को देश-दुनिया में पहुंचा रहे हैं। दुनिया को शांति, सह अस्तित्व और विश्व बंधुत्व की भावना के साथ रहने का संदेश दे रहे हैं।

       वर्ष 1989 में यूनेस्को ने जब सांची स्थित बौद्ध स्मारकों को विश्व धरोहरों की सूची में शामिल किया तब इन्हें अन्तरराष्ट्रीय पहचान मिल गई। सांची स्थित बौद्ध स्मारक फिर से दुनिया की नजर में आ गए हैं। सांची के आसपास बौद्ध स्मारकों का खजाना है। सांची से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर चौथी से दसवीं शताब्दी तक निर्मित उदयगिरी की गुफाएं भी स्थित हैं। सांची के नजदीक ही बौद्ध धर्म से संबंधित सतधारा और सोनारी भी है। विदिशा से करीब 46 किलोमीटर की दूरी पर ग्यारसपुर है। ग्यारसपुर में आठ खम्बों का विशाल मंदिर सहित अन्य पुरातत्व महत्व के मंदिरों के अवशेष हैं। इसके साथ ही ग्यारसपुर में बौद्ध स्तूपों के अवशेष भी हैं। पत्थरों के मुख से इतिहास को सुनने की रुचि आपकी है तो सांची एक अच्छा स्थान है। यहां आकर आप मौर्य, शुंग और गुप्तकाल में निर्मित बौद्ध स्मारकों की सादगीपूर्ण भव्यता देखकर आल्हादित तो होओगे ही, शांत वातावरण में भगवान बुद्ध के संदेशों को भी समझ सकोगे।

सांची का विश्व प्रसिद्ध द्वार - फोटो : लोकेन्द्र सिंह राजपूत


माण्डू : मध्यप्रदेश की धड़कन 

जिसने माण्डू नहीं देखा, उसने मध्यप्रदेश में देखा क्या? इसलिए भारत का दिल देखने निकलो तो माण्डव जाना न भूलिएगा। बादशाह अकबर हो या जहांगीर, सबको मांडू पसंद आया है। अबुल फजल तो सम्मोहित होकर कह गया था कि माण्डू पारस पत्थर की देन है। माण्डू प्रकृति की गोद में खूब दुलार पा रहा है। ऐसा लगता है कि वर्षा ऋतु तो माण्डू का सोलह श्रंगार करने के लिए ही यहां आती है। रानी रूपमति के महल से दिखने वाला नैसर्गिक सौंदर्य आपको प्रेम सिखा ही देगा। जहाज महल पर खड़े होकर आप असीम सुकून की अनुभूति करेंगे। हिन्डोला महल में आपका मन डोले बिना नहीं रहेगा। होशंगशाह का मकबरा मन को मोह लेगा और ताजमहल की याद दिलाएगा। आल्हा-ऊदल की कथाएं रोमांच बढ़ा देंगी। ईको प्वाइंट पर खड़े होकर जब आप जोर से अपना नाम पुकारेंगे तो लगेगा कि दुनिया आपको सुन रही है। अद्भुत है माण्डू। 

       माण्डू दुर्ग का विस्तार बहुत अधिक है। इसके अलग-अलग हिस्सों में स्थित ऐतिहासिक इमारतें, भवन, धार्मिक स्थल और तालाब-बावड़ी किसी बड़े मैदान में बिखरे पड़े नायाब मोतियों, हीरे, जवाहरातों की तरह हैं। मांडू के प्रमुख पर्यटन स्थल हैं- रानी रूपमति महल, जहाज महल, हिन्डोला महल, दिलावर खान की मस्जिद, नाहर झरोखा, तवेली महल, उजली और अंधेरी बावड़ी, गदाशाह का घर, अशरफी महल, नीलकण्ठ महादेव मंदिर और नीलकण्ठ महल। 

      माण्डू का प्राचीन नाम मण्डप दुर्ग या माण्डवगढ़ है। माण्डू की आधारशिला रखने का प्रथम श्रेय परमार राजाओं को है। हर्ष, मुंज, सिंधु और राजा भोज इस वंश के चर्चित शासक रहे। लेकिन, इनका ध्यान माण्डू की अपेक्षा धार पर ज्यादा था। 12वीं-13वीं सदी में जैन मंत्रियों ने मांडवगढ़ को ऐश्वर्य की चरम सीमा तक पहुंचाया। अलाउद्दीन खिलजी के माण्डू पर आक्रमण के बाद से यहां हिन्दू शासन खत्म हो गया। हालांकि मुगल साम्राज्य के पतन के बाद माण्डू पर कुछ दिनों तक पेशवाओं का अधिकार रहा। इसके बाद यह इंदौर की मराठा रियासत में शामिल हो गया।

मांडू स्थित हिंडोला महल - फोटो : Lokendra Singh Rajput


खजुराहो : कला के लिए प्रसिद्ध

मध्यप्रदेश का यह पर्यटन स्थल अपने स्थापत्य के कारण दुनियाभर में आकर्षण का केंद्र है। खजुराहो मध्यकालीन मंदिर और उन पर उकेरी गयीं कलाकृतियों के लिए प्रसिद्ध है। सामान्यतौर पर खजुराहो को मंदिर की बाहरी दीवारों पर रति-क्रियाओं को प्रदर्शित करती मूर्तियों के कारण पहचान दी जाती है लेकिन खजुराहो की सुन्दरता और सांस्कृतिक विरासत इससे कहीं अधिक दर्शनीय है। खजुराहो के मंदिर बारीक नक्काशी के लिए भी प्रसिद्ध हैं। यहाँ कला और सांस्कृतिक विरासत का समृद्ध भंडार है। इसी कारण यूनेस्को ने विश्व धरोहर की सूची में वर्ष 1986 में खजुराहो को शामिल किया था। प्रसिद्ध खजुराहो मंदिर मूल रूप से हिंदू मंदिरों का एक संग्रह है। इन मंदिरों का निर्माण चंदेल वंश के राजाओं ने 950 और 1050 के बीच कराया था। इन मंदिर समूहों में कंदरिया महादेव का सुप्रसिद्ध मंदिर भी है। 


पचमढ़ी : मध्यप्रदेश का हिल स्टेशन

पचमढ़ी को सतपुड़ा की रानी कहा जाता है। मध्यप्रदेश के नर्मदापुर जिले में स्थित यह एक खूबसूरत हिल स्टेशन है। अपने नैसर्गिक सौंदर्य के कारण पचमढ़ी देश-विदेश के सैलानियों के आकर्षण का केंद्र है। पर्यटकों को यहाँ सुरम्य घाटियाँ, भरे-पूरे पहाड़, वन्य जीवन और खूबसूरत जलप्रपात देखने को मिलते हैं। पचमढ़ी का मौसम भी पर्यटकों को उनकी थकान मिटाने के लिए बुलाता है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का यह प्रिय स्थान है, वे वर्ष में यहाँ कम से कम एक बार जाना अवश्य पसंद करते हैं। पचमढ़ी में हांडी खोह, चौरागढ़ के महादेव, गुप्त महादेव, जटाशंकर, धूपगढ़, पांडव गुफाएं, बी फॉल, डचेस और रजत जलप्रपात सहित कई आकर्षक पर्यटन स्थल हैं। 

A Trip to Pachmarhi | Hill Station of Madhya Pradesh



ग्वालियर : बलिदान की भूमि 

ग्वालियर, अपने खूबसूरत और दुर्जय किले के लिए जाना जाता है। किले पर स्थित सहस्त्रबाहु का मंदिर, तेली का मंदिर, कर्ण महल, गूजरी महल और मानसिंह महल का स्थापत्य वर्षों से लोगों को आकर्षित कर रहा है। ग्वालियर के किले का लाइट एंड साउंड शो भी आकर्षण का केंद्र है, जिसमें पर्यटक प्रसिद्ध अभिनेता अमिताभ बच्चन की आवाज के जरिये शौर्य और पराक्रम की कथाओं में खो जाते हैं। भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमाएं हैं, जो पहाड़ को काटकर उकेरी गयीं हैं। सिखों का प्रमुख गुरुद्वारा ‘दाताबंदी छोड़’ भी यहीं है। ग्वालियर ऐतिहासिक शहर है जो केवल दुर्ग और महलों के लिए ही नहीं अपितु कला-संस्कृति के लिए भी ख्यात है। तानसेन से लेकर कृष्ण राव पंडित तक संगीत की एक लम्बी परंपरा है। ध्रुपद का जन्म तो ग्वालियर से जुड़ता है। कलाप्रेमी राजा मानसिंह ने ध्रुपद की रचना की। ग्वालियर के आस-पास विरासत का भंडार है। भिंड, मुरैना, शिवपुरी, दतिया, बेहट, नरवर और इनके आस-पास न केवल सांस्कृतिक विरासत के स्थल हैं, बल्कि प्राकृतिक पर्यटन के केंद्र भी हैं।

ग्वालियर तू बहुत याद आता है | Gwalior City



कान्हा राष्ट्रीय उद्यान : प्रदेश का सबसे बड़ा राष्ट्रीय उद्यान 

वाइल्ड लाइफ पर्यटन के लिए प्रसिद्ध और सबसे अधिक 12 राष्ट्रीय उद्यान वाले मध्यप्रदेश में कान्हा राष्ट्रीय उद्यान मध्य भारत का सबसे बड़ा राष्ट्रीय उद्यान है, जो राष्ट्रीय पशु बाघ और ऐसे कई जंगली जानवरों के प्रमुख आवास है। मंडला जिले में स्थित कान्हा राष्ट्रीय उद्यान पर्यटकों को अपनी प्राकृतिक सुंदरता से मंत्रमुग्ध कर देता है। इसकी स्थापना 1955 में हुई थी और तब से यहां कई लुप्तप्राय प्रजातियों को संरक्षित किया गया है। वर्तमान में राष्ट्रीय उद्यान का क्षेत्रफल 940 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है जो दो अभयारण्यों हल्लन और बंजार में विभाजित है। कान्हा को भारत के ही नहीं, अपितु एशिया के सबसे अच्छे पार्कों में से एक माना जाता है। 


ओरछा : जहाँ राजा हैं राम

ओरछा, राजा राम के मंदिर, ओरछा किले और महलों के लिए प्रसिद्ध है। भगवान श्रीराम अयोध्या में राजा नहीं हैं, वहां वे बालक के रूप में (रामलला) पूजे जाते हैं। राजा तो प्रभु श्रीराम ओरछा में हैं। अर्थात समूचे भारत में सिर्फ ओरछा है, जहाँ श्रीराम को ‘राजाराम’ के रूप में पूजा जाता है। इसकी जो कहानी हैं, वह भक्त और भगवान के बीच के आत्मीय प्रेम को बताती है। मध्यप्रदेश में झांसी से 16 किमी की दूरी पर बेतवा नदी के द्वीप पर ओरछा का किला स्थित है। ओरछा किला 16वीं शताब्दी में बुंदेला वंश के राजा रुद्र प्रताप सिंह द्वारा बनवाया गया था। इस किले का मुख्य आकर्षण राजा महल है, जो जटिल वास्तुकला को प्रदर्शित करता है। इस किले में राजा महल के साथ-साथ शीश महल, फूल बाग, राय प्रवीण महल और जहांगीर महल जैसे कई आकर्षण हैं। 


उज्जैन : महाकाल की नगरी

मध्यप्रदेश का प्राचीन शहर उज्जैन महाकाल की नगरी के रूप में प्रसिद्ध है। देशभर से भगवान शिव के श्रद्दालु ज्योतिर्लिंग ‘महाकाल’ के दर्शन को आते हैं। प्रतिदिन होनेवाली भस्म आरती और महाकाल के श्रृंगार में शामिल होने के लिए श्रद्धालु रातभर प्रतीक्षा करते हैं। 'महाकाल लोक' बनने से यहाँ की भव्यता और बढ़ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महाकाल लोक का उद्घाटन 11 अक्टूबर, 2022 को करेंगे। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पहल पर बने महाकाल कॉरिडोर (महाकाल लोक) में श्रद्धालुओं को भगवान शिव के संबंध में कई महत्वपूर्ण जानकारी मिलेंगी। शिप्रा नदी के किनारे बसा यह शहर राजा विक्रमादित्य की न्यायप्रियता का साक्षी है। इसके साथ ही यहाँ सांदीपनी आश्रम में भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षा-दीक्षा भी उज्जैन में ही हुई। यह काल की गणना का भी केंद्र है। यहाँ की वेद्शाला भारत में विज्ञान की उज्जवल परंपरा से जोड़ती है। उज्जैन को मंदिरों का शहर भी कहा जाता है। यहाँ भैरव, चिंतामन गणेश,  देवी हरसिद्धि मंदिर, मंगलनाथ मंदिर और चौबीस खंबा मंदिर सहित रामघाट प्रमुख स्थान हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से महाकाल मंदिर के समीप ही भारत माता का आकर्षक मंदिर भी बनाया गया है। इस मंदिर में भारत माता की मोहक प्रतिमा स्थापित की गई है। 

उज्जैन में भारत माता  का आकर्षक मंदिर 


भोपाल : तालों में ताल भोपाल का ताल 

भोपाल, मध्यप्रदेश की राजधानी है, जिसे झीलों के शहर के रूप में भी जाना जाता है। वैसे तो भोपाल में छोटे-बड़े कई तालाब हैं, लेकिन यहाँ का बड़ा तालाब मुख्य आकर्षण का केंद्र है। इसके लिए कहा जाता है- “तालों में ताल भोपाल का ताल बाकी सब तलैयां”। मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार महेश श्रीवास्तव ने उचित ही भोपाल के बड़े तालाब को ‘समुद्र सुत’ की संज्ञा दी है। इसके अलावा यह शहर भारत भवन, शौर्य स्मारक, रानी कमलापति महल, गौहर महल, ताजुल मसाजिद और प्राचीन स्थापत्य के लिए जाना जाता है। भोपाल के आस-पास भी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक विरासत और धार्मिक पर्यटन के प्रमुख स्थान हैं, जो पर्यटकों को लुभाते हैं।

भोपाल के बड़ा तालाब में स्थित राजा भोज की प्रतिमा


महेश्वरी : प्राचीन महिष्मति

इंदौर के पास महेश्वर, धार और मांडू तीन प्रमुख पर्यटन स्थल हैं। महेश्वर सदानीरा नर्मदा के सबसे सुन्दर और विस्तृत घाट के लिए प्रसिद्ध है। धार, राजा भोज द्वारा निर्मित भोजशाला के स्थापत्य के लिए ख्यात है। मांडू अपने खूबसूरत महलों एवं अन्य स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध है। 

न्यायप्रिय देवी अहिल्याबाई होल्कर की राजधानी महेश्वर मध्यप्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। इस शहर को पवित्र शहर का दर्जा भी मिला हुआ है। महेश्वर का अपना पौराणिक महत्व है, सहस्त्रार्जुन से लेकर मंडन मिश्रा और आदि शंकराचार्य की बहस की कहानियां। महेश्वर वायु पुराण, नर्मदा पुराण, स्कंद पुराण आदि में वर्णित महिष्मती नगरी आज का महेश्वर है। यह ऐतिहासिक शहर लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर के राजकौशल, धार्मिकता और बुद्धिमता का जीवंत साक्षी है।

हथकरघे पर सिल्क के वस्त्रों के निर्माण का बड़ा केंद्र भी महेश्वर है। महेश्वर के सिल्क को जीआई टैग भी प्राप्त है। 


जबलपुर : धुंआधार जलप्रपात

जबलपुर, भारत के मध्य राज्य का एक बहुत ही खूबसूरत शहर है। जबलपुर में आकर्षण का केंद्र मदन महल किला है जो शहर के पश्चिमी बाहरी इलाके में एक चट्टानी पहाड़ी पर बना है। इसके अलावा बैलेंसिंग रॉक भी पर्यटकों को दांतों तले अंगुली दबाने के लिए मजबूर कर देती है। शहर से कुछ दूरी पर सदानीरा नर्मदा पर बननेवाला ‘धुंआधार जलप्रपात’ यहाँ का सबसे प्रमुख पर्यटन स्थल है। यहाँ धुआंधार जलप्रपात के अलावा रंग-बिरंगे संगमरमर की चट्टानें भी पर्यटकों को आकर्षित करती हैं।

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- लोकेन्द्र सिंह (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं और पर्यटन में विशेष रुचि रखते हैं।)

विश्व पर्यटन दिवस #WorldTourismDay के अवसर पर 27 सितंबर, 2022 को समाचार पत्र 'स्वदेश' के सभी संस्करणों में प्रकाशित आलेख

रविवार, 25 सितंबर 2022

अमरकंटक का प्राचीन मंदिर समूह ‘रंगमहला’

अमरकंटक दर्शन - 12


आदि शंकराचार्य ने स्थापित किया शिवलिंग, अभिषेक करने आती हैं माँ नर्मदा



कोटि तीर्थ माँ नर्मदा उद्गम स्थल के समीप प्राचीन काल के मंदिरों का एक समूह है। ये मंदिर हमें अपने पास बुलाते हैं, नर्मदा के उद्गम की कहानी सुनाने के लिए। हम शांत चित्त से यहाँ बैठें तो पाएंगे कि थोड़ी देर में ये मंदिर हमसे बात करने लगते हैं। वे बताते हैं कि यहाँ जगतगुरु आदि शंकराचार्य आये थे। जगतगुरु आदि शंकराचार्य। मंदिर परिसर से सट कर बने आदि शंकराचार्य आश्रम की ओर इशारा करते हैं- देखिए वह है हिन्दू धर्म और हिंदुस्थान को एकसूत्र में पिरोने वाले भगवान का आश्रम। और फिर इसके बाद वह एक-एक करके अपने निर्माण की कथा सुनाते हैं। यहाँ पातालेश्वर मंदिर, कर्ण मंदिर, शिव मंदिर और एक पुरातन काल का सूर्य कुंड भी है। एक मंदिर में महावीर बजरंगबली भी विराजे हैं।

शुक्रवार, 16 सितंबर 2022

असाधारण, कुशल एवं प्रभावी वक्ता-प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

सार्वजनिक जीवन में संवाद कला का बहुत महत्व है। व्यक्तिगत स्तर और छोटे समूह में लोगों को आकर्षित करना एवं उन्हें अपने से सहमत करना अपेक्षाकृत आसान होता है। किंतु, जन (मास) को अपने विचारों से सहमत करना और अपने प्रति उसका विश्वास अर्जित करना कठिन बात है। सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले लोग किसी न किसी माध्यम से ही जन सामान्य तक अपनी पहुँच बनाते हैं। इस प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण है, व्यक्ति किस प्रकार अपने विचार प्रस्तुत करता है। आवश्यक है कि वह जिस रूप में सोच रहा है, वह उसी रूप में जनता के बीच पहुँचे। जो लोग इस प्रकार संवाद कला को साध लेते हैं, वह जनसामान्य से जुड़ जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसी संवाद कला को सिद्ध कर लिया है। वह असाधारण वक्ता और प्रभावी संचारक हैं। प्रधानमंत्री मोदी संचार के 7-सी के सिद्धांत को जीते हैं। संचार के विशेषज्ञ फ्रांसिस बेटजिन ने बताया है कि 7-सी के सिद्धांत का उपयोग कर संचारक बहुत ही सरलता और प्रभावी ढंग से जन (मास) के मस्तिष्क में अपनी बात (संदेश) को पहुंचा सकता है। बहुत बड़े जनसमुदाय से अपनत्व स्थापित कर सकता है। इस सिद्धांत की सातों सी- स्पष्टता (Clarity), संदर्भ (Context), निरंतरता (Continuty), विश्वसनीयता (Credibility), विषय वस्तु (Content), माध्यम (Channel) और पूर्णता (Completeness) प्रधानमंत्री मोदी के भाषण में झलकती हैं।

बुधवार, 14 सितंबर 2022

भारतीय भाषाओं के प्रति संघ का दृष्टिकोण


तुर्की जब स्वतंत्र हुआ, तब आधुनिक तुर्की के संस्थापक कमालपाशा ने जिन बातों पर गंभीरता से ध्यान दिया, उनमें से एक भाषा भी थी। कमालपाशा ने विरोध के बाद भी बिना समय गंवाए शिक्षा से विदेशी भाषा को हटा कर तुर्की को अनिवार्य कर दिया। क्योंकि, वह तुर्की के लोगों में राष्ट्रीयता की भावना का विस्तार करना चाहते थे, इसके लिए उन्हें अपनी भाषा की आवश्यकता थी। चूँकि उस समय तुर्की अरबी लिपि में लिखी जाती थी, इसलिए उन्होंने एक घोषणा और की जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे लोग सरकारी नौकरी से वंचित कर दिए जाएंगे, जिन्हें लैटिन लिपि का ज्ञान नहीं होगा। इसी प्रकार दुनिया भर में बिखरे यहूदियों को जब उनकी भूमि प्राप्त हुई, तो उन्होंने भी अपनी भाषा ‘हिब्रू’ को ही अपनाया। सोचिए, भूमिहीन यहूदियों की भाषा कहीं लिखत-पढ़त के व्यवहार में नहीं थी। इसके बाद भी जब यहूदियों ने इजराइल का नवनिर्माण किया तो राख के ढेर में दबी अपनी भाषा हिब्रू को जिंदा किया। आज जिस अंग्रेजी की अनिवार्यता भारत में स्थापित करने का प्रयास किया जाता है, उसके स्वयं के देश ब्रिटेन में वह एक जमाने में फ्रेंच की दासी थी। बाद में ब्रिटेन के लोगों ने आंदोलन कर अपनी भाषा ‘अंग्रेजी’ को उसका स्थान दिलाया। अपनी भाषा में समस्त व्यवहार करने वाले यह देश आज अग्रणी पंक्ति में खड़े हैं। अपनी भाषा में शिक्षा-दीक्षा के कारण ही यहाँ के नागरिक अपने देश की उन्नति में अधिक योगदान दे सके। अपनी भाषा का महत्व दुनिया के लगभग सभी देश समझते हैं। इसलिए उनकी आधिकारिक भाषा उनकी अपनी मातृभाषा है। किंतु, हम अभागे लोग जब स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भी मानसिक दासिता से मुक्ति नहीं पा सके। महात्मा गांधी के आग्रह के बाद भी अंग्रेजी का मोह नहीं छोड़ सके।

रविवार, 4 सितंबर 2022

गुलामी के चिह्न मिटाकर ‘स्व’ की स्थापना

नया भारत विश्व क्षितिज पर अपनी उपस्थिति को मजबूत करने के साथ ही अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है। अपनी जड़ों से जुड़कर ही भारत अनंत आकाश को नाप सकेगा। स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद जब भारतीय नौसेना को अपना प्रथम स्वदेशी विमान वाहक पोत मिला तब नया भारत एक नया इतिहास लिख रहा था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उसे कुछ इस तरह अभिव्यक्ति दी- ‘‘केरल के समुद्री तट पर पूरा भारत एक नए भविष्य के सूर्योदय का साक्षी बन रहा है। आईएनएस विक्रांत पर हो रहा यह आयोजन, विश्व क्षितिज पर भारत के बुलंद होते हौसलों की हुंकार है’’। प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में विश्वास की गूंज है, जो अब दूर-दूर तक सुनाई दे रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को सक्षम बनाने के लिए ‘आत्मनिर्भर भारत’ का जो सपना देखा और दिखाया, अब हम उसकी ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।