भारतीय मूल्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
भारतीय मूल्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

मातुश्री का दर्शन है ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’

पुस्तक चर्चा : पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होल्कर के जीवन के सभी पहलुओं को देखने के लिए पढ़ें यह पुस्तक


“सनातन संस्कृति में सर्वश्रेष्ठ धर्म है ‘मानव धर्म’। मानवता की स्थापना करना ही धर्म की स्थापना करना है। देवी अहिल्याबाई होल्कर ने धर्म की स्थापना हेतु अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया। समस्त प्रजा को वात्सल्य से सींचने वाली देवी अहिल्याबाई होल्कर पूरे मालवा की मातुश्री कहलाई। त्याग, तपस्या, समर्पण, अनुशासन एवं न्याय- मानव धर्म के मूल आधार हैं। इन्हीं आधारभूत कर्तव्यों का पालन समाज में समरसता और व्यवस्था को स्थापित करता है। अहिल्याबाई का संपूर्ण जीवन न्याय प्रियता, सद्चरित्र, संस्कार अनुशासन और धर्म के स्तंभों पर मजबूती से खड़ा है”। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. साधना बलवटे की पुस्तक ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ का केंद्रीय भाव यही है। नाट्यरूप में प्रस्तुत पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर के जीवन से उन्होंने भारत की बेटी के संघर्ष, साहस और नेतृत्व की कहानी सुनाई है। यह गाथा आपको प्रारंभ से अंत तक बाँधे रखती है, फिर भले ही आपने देवी अहिल्याबाई की कहानी पहले से सुन भी क्यों न रखी हो। पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर के 300वें जयंती वर्ष में यह पुस्तक अवश्य पढ़ी जानी चाहिए। इस पुस्तक की एक ओर विशेषता है कि इसका पाठक वर्ग बहुत विशाल है यानी हर कोई इस पुस्तक को पढ़ सकता है।

शनिवार, 19 अगस्त 2023

समाज को समरसता के स्नेह सूत्र में बाँधने निकले संत

यह कितनी सुखद बात है कि समाज के विभिन्न वर्गों में आत्मीयता एवं समरसता के भाव को बढ़ाने के लिए साधु-संत ‘स्नेह यात्रा’ पर निकल पड़े हैं। जब द्वार पर आकर संत कुछ आग्रह करते हैं, तब हिन्दू समाज का कोई भी वर्ग उस आग्रह को अस्वीकार नहीं कर सकता। मन में असंतोष होगा, लेकिन संतों का सम्मान सबके हृदय में सर्वोपरि है। इसलिए तो सब भेद भुलाकर, हिन्दू विरोधी ताकतों के उलाहने नकारकर, भगवत् कथा का श्रवण करने के लिए सभी वर्गों के लोग संतों के पंडाल में एकत्र हो जाते हैं। हम जानते हैं कि भारत को कमजोर करने के लिए बाह्य विचार से पोषित ताकतें हिन्दू समाज के जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगा रही हैं। ये ताकतें पूर्व में हुए जातिगत भेदभाव के घावों को कुरेद कर अनुसूचित जाति वर्ग के बंधुओं के कोमल हृदय में द्वेष के बीज बोने का काम कर रही हैं, जबकि कोशिश होनी चाहिए उनके घावों पर मरहम लगाने की। परंतु जिनका स्वार्थ परपीड़ा से सध रहा हो, वे जख्म पर नमक ही छिड़केंगे। उनसे कोई और उम्मीद करना बेमानी है। ऐसे वातावरण में संत समाज ने आगे आकर, सभी वर्गों में बंधुत्व के भाव को बढ़ाने के जो प्रयास किए हैं, वह अनुकरणीय हैं। समाज की सज्जनशक्ति को संतों के साथ जुड़ना चाहिए और स्नेह धारा को आगे बढ़ाना चाहिए।

मंगलवार, 20 जून 2023

भारतीय मूल्यों की संवाहक बन रही हैं जी-20 की बैठकें

संयोग देखिए कि जब भारत अपनी स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहा है, उसी समय उसे विश्व के प्रभावशाली देशों के संगठन ‘जी-20’ की अध्यक्षता का अवसर प्राप्त हुआ है। भारत को एक वर्ष के लिए जी-20 की अध्यक्षता का यह अवसर मिला है, जिसमें भारत 200 से अधिक जी-20 बैठकों का आयोजन करेगा। विभिन्न मुद्दों को लेकर होनेवाली इन बैठकों में दुनियाभर से विद्वान एवं राजनयिक आएंगे। निश्चित ही भारत अपने आतिथ्य के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति उनके मन को आकर्षित करने में सफल रहेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार ने बीते वर्षों में निरंतर संपर्क-संवाद से जी-20 समूह में शामिल देशों के साथ जो संबंध विकसित किए हैं, उन्हें मित्रता का और गहरा रंग देने का भी यह अवसर है। व्यापक आर्थिक मुद्दों के साथ ही व्यापार, जलवायु परिवर्तन, सतत विकास, स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन जैसे ज्वलंत मुद्दों पर आयोजित होनेवाली बैठकों में जब जी-20 के प्रतिनिधि एवं विषय विशेषज्ञ आएंगे, तब वे भारत से इन मुद्दों पर सम्यक दृष्टिकोण लेकर भी जाएंगे। ये ऐसे विषय हैं, जिन पर दुनिया बात तो कर रही है, लेकिन ठोस समाधानमूलक पहल इसलिए नहीं हो पा रही है क्योंकि समाधान की दृष्टि में सार्वभौमिक मूल्यों का अभाव है। जैसे पर्यावरण के मुद्दे पर सामर्थ्यशाली देश स्वयं तो भोगवादी प्रवृत्ति को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है परंतु विकासशील देशों से वे अपेक्षा कर रहे हैं कि कार्बन उत्सर्जन इत्यादि में कमी लाने के लिए प्रयास करें। भारत अपनी परंपरा के आलोक में उक्त विषयों पर जी-20 की बैठकों के दौरान विश्व का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। भारत ने जिस जोश एवं उत्साह के साथ जी-20 की अध्यक्षता का स्वागत किया है, उसे स्वीकारा है, उसे देखकर यह समझा जा सकता है कि वर्तमान नेतृत्व ने पहले से कोई भावभूमि तैयार कर रखी है, जिस पर खड़े होकर वह भारतीय मूल्यों के आधार पर विश्व के प्रभावशाली देशों के साथ भारत के संबंधों को प्रगाढ़ करेगा। कहना होगा कि भारत के पास यह ऐसा स्वर्णिम अवसर है, जो विश्वपटल पर भारत के कल्याणकारी विचार एवं मूल्यों की पुनर्स्थापना में सहायक सिद्ध होगा।

सोमवार, 29 मई 2023

नये भारत की नयी संसद

भारत की नयी संसद की पहली झलक / First Look of New Parliament Building

स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद भारत को अमृतकाल में उसका नया और स्वदेशी संसद भवन मिल गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब धर्मदंड ‘सेंगोल’ को नवीन संसद के लोकसभा में अध्यक्ष की आसंदी के समीप स्थापित किया तब भारत के इतिहास में दिनांक 28 मई, 2023 सदैव के लिए अंकित हो गई है। लोकसभा की आसंदी के समीप स्थापित यह सेंगोल हमारे राजनेताओं को प्रेरणा देगा। महान चोल साम्राज्य में सेंगोल को कर्तव्यपथ, सेवापथ और राष्ट्रपथ का प्रतीक माना जाता था। राजादी और आदीनम के संतों के मार्गदर्शन में यही सेंगोल सत्ता के हस्तांतरण का प्रतीक था। यह सेंगोल भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को सौंपा गया था लेकिन उस समय इसे यथोचित सम्मान और स्थान नहीं दिया गया। बल्कि सिंगोल की प्रतिष्ठा गिराते हुए उसे आनंद भवन में बनाए गए संग्रहालय में ‘चलने में सहायक छड़ी’ के रूप में प्रदर्शित किया गया। माना कि पंडित जवाहरलाल नेहरू भारतीय परंपराओं एवं धर्म से दूरी बनाकर चलते थे, लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं होना चाहिए था कि धार्मिक, सांस्कृतिक एवं भावनात्मक महत्व के ‘सेंगोल’ की उपेक्षा इस तरह की जानी चाहिए थी।

बुधवार, 24 मई 2023

प्रधानमंत्री मोदी का सम्मान, भारत का अभिमान

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विदेश दौरे से आए एक दृश्य ने समूचे भारत को गौरव का अवसर दे दिया। प्रधानमंत्री मोदी एफआईपीआईसी के तीसरे अधिवेशन में शामिल होने के लिए ‘पापुआ न्यू गिनी’ पहुँचे थे। यहाँ प्रधानमंत्री मोदी का सभी शासकीय प्रोटोकॉल तोड़कर स्वागत-अभिनंदन किया गया। इस देश में सूर्यास्त के बाद शासकीय स्वागत नहीं किया जाता। परंतु जब प्रधानमंत्री मोदी यहाँ पहुँचे तब न केवल शाही स्वागत किया गया अपितु पापुआ न्यू गिनी के प्रधानमंत्री जेम्स मारापे ने तो दो कदम आगे बढ़कर प्रधानमंत्री मोदी के पैर ही छू लिए। यह अभूतपूर्व और अद्भुत घटना है, जब विश्व इतिहास में किसी राष्ट्र प्रमुख का सम्मान दूसरे देश के राष्ट्र प्रमुख ने पैर छूकर किया। इस दृश्य से जहाँ प्रत्येक भारतीय का मन गदगद है, वहीं भारत के विचार की पताका भी विश्व पटल पर थोड़ी और ऊंची हुई है। यह सम्मान केवल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नहीं है, अपितु उनके नेतृत्व में भारत का विचार जिस तरह प्रखर होकर विश्व के सम्मुख आ रहा है, यह उस भारतीय विचार का भी सम्मान है।

गुरुवार, 20 अप्रैल 2023

पर्यावरण को वैश्विक मुद्दा बनाने का प्रधानमंत्री का आह्वान अनुकरणीय

भारत सहित समूची दुनिया में पर्यावरण संरक्षण को लेकर विमर्श भी बन गया है और उसके अनुरूप कुछ प्रयास भी प्रारंभ हुए हैं। विश्व पटल पर पर्यावरण को लेकर गंभीरता का निर्माण करने में भारत और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने प्रभावशाली वैश्विक मंचों से पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रगत एवं प्रगतिशील देशों का न केवल ध्यान आकर्षित किया है अपितु जिम्मेदारी का अहसास भी कराया है। बीते दिन भी जब वे विश्व बैंक द्वारा आयोजित विश्व नेताओं के एक आभासी सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे, तब भी उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे को उठाया। अपने उद्बोधन में उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को व्यापक जनांदोलन बनाने का आह्वान किया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बार प्रधानमंत्री मोदी ने विभिन्न देशों के शासन-प्रशासन से नहीं अपितु सीधे नागरिकों से आह्वान किया है कि वे व्यक्तिगत रूप से अपने रोजमर्या के जीवन में बदलाव लाकर पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी निभाएं।

शुक्रवार, 10 मार्च 2023

‘हिन्दवी स्वराज्य’ की संकल्पना का आधार 'स्व'

 स्वराज्य 350 : श्रीछत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती (चैत्र कृष्ण पक्ष तृतीया, 10 मार्च, 2023) प्रसंग पर विशेष

हिन्दवी स्वराज्य की राजधानी दुर्गदुर्गेश्वर श्री रायगढ़ पर राजदरबार में महाराजाधिराज श्रीशिव छत्रपति की सिंहासनारूढ़ प्रतिमा / Photo : Lokendra Singh

भारतवर्ष जब दासता के मकड़जाल में फंसकर आत्मगौरव से दूर हो गया था, तब शिवाजी महाराज ने ‘हिन्दवी स्वराज्य’ की घोषणा करके भारतीय प्रजा की आत्मचेतना को जगाया। आक्रांताओं के साथ ही तालमेल बिठाकर राजा-महाराज अपनी रियासतें चला रहे थे, तब शिवाजी महाराज ने केवल शासन के सूत्र मुगलों से अपने हाथ में लेने के लिए बिगुल नहीं फूंका था अपितु उन्होंने वास्तविक अर्थों में स्वराज्य की प्रेरणा जगायी। अकसर हम आर्तस्वर में कहते हैं कि 1947 में हमने सत्ता तो प्राप्त कर ली थी लेकिन तत्काल बाद स्वराज्य की ओर कदम नहीं बढ़ाये थे। अंग्रेजों की बनायी व्यवस्थाओं को ही हम ढोते रहे। यहाँ तक कि हम अपनी भाषा को प्रधानता नहीं दे सके। पिछले कुछ वर्षों में अवश्य ही हमने स्वराज्य की ओर कुछ कदम बढ़ाये हैं। जबकि शिवाजी महाराज ने हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना के साथ ही सब प्रकार की प्रशासनिक व्यवस्थाएं ‘स्व’ के आधार पर बनायी। उन्होंने जिस राज्य की स्थापना की, उसे भोंसले राज्य, कोंकण राज्य या मराठी राज्य नहीं कहा अपितु उसे उन्होंने नाम दिया ‘हिन्दवी स्वराज्य’ और जिस साम्राज्यपीठ की स्थापना की, उसे कहा- ‘हिन्दू पदपादशाही’। यानी उन्होंने स्वराज्य को स्वयं की निजी पहचान से नहीं अपितु भारत की संस्कृति से जोड़ा। इसी तरह उन्होंने कभी नहीं कहा कि हिन्दवी स्वराज्य की उनकी अपनी संकल्पना है अपितु श्रीशिव ने तो जन-जन में स्वराज्य के भाव की जाग्रति के लिए कहा- “हिन्दवी स्वराज्य ही श्रींची इच्छा”। अर्थात् यह हिन्दवी स्वराज्य की इच्छा ईश्वर की इच्छा है।

गुरुवार, 26 जनवरी 2023

कर्तव्य पथ पर ‘गणतंत्र’

हम भारत के लोग अपना 74वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं। हमारा गणतंत्र बीते 73 वर्षों में किस ओर बढ़ा है, विद्वान लोग अकसर इसकी समीक्षा/चर्चा करते रहते हैं। वैसे तो भारत के लिए गणतंत्र कोई आधुनिक व्यवस्था नहीं है। जब हम अपने इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ पलटकर देखते हैं, तो हमें भारत में गणतंत्र की समृद्ध परंपरा दिखाई देती है। फिलहाल हम अपने वर्तमान गणतंत्र की बात करें तो ध्यान आता है कि अपनी चर्चाओं में अकसर विद्वान कहते हैं कि भारत का ‘तंत्र’ अभी पूरी तरह से ‘गण’ केंद्रित नहीं हुआ है। कहीं न कहीं औपनिवेशिक मानसिकता ही हमारे तंत्र पर हावी है। परंतु पिछले दस वर्षों में जिस तरह से भारत के गणतंत्र ने करवट बदली है, उससे स्पष्टतौर पर परिलक्षित हो रहा है कि हमारा तंत्र अब गण की ओर सम्मुख हुआ है। इसलिए पिछले कुछ वर्षों में शासन स्तर पर हुए निर्णय, नीतिगत बदलाव एवं सांकेतिक व्यवस्थाएं गण की मंशा के अनुरूप दिखाई देती हैं। अब अंतरराष्ट्रीय ताकतों के दबाव में नहीं अपितु जनता के हित में नीतियां बनती हैं। हमारा शासन किसी का पिछलग्गू नहीं है, वह भारतीय दृष्टिकोण से नीतियां बना रहा है। भारत अब बैशाखियां छोड़कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ चला है।

मंगलवार, 26 जुलाई 2022

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का प्रेरक उद्बोधन

 “देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर मेरा निर्वाचन इस बात का सबूत है कि भारत का गरीब सपने देख सकता है और उसे पूरा भी कर सकता है"


देश की पहली अनुसूचित जनजाति महिला राष्ट्रपति के रूप में द्रौपदी मुर्मु ने शपथ ली तो संसद भवन का केंद्रीय कक्ष तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। इस अवसर पर उनकी सरलता-सहजता के दर्शन समूचे देश ने किये। बहुत ही सहजता के साथ उन्होंने अपना वक्तव्य हिन्दी में दिया। राष्ट्रपति के रूप में द्रौपदी मुर्मु का यह पहला उद्बोधन लम्बे समय तक याद रखा जायेगा। प्रेरणा से भरे हुए इस उद्बोधन को बार-बार पढ़ा और सुना जाना चाहिए। उनका यह उद्बोधन भारत के प्रत्येक सामान्य नागरिक के मन में सपनों के दीप जलाता है। राष्ट्रपति ने अपने पहले उद्बोधन में महत्वपूर्ण सन्देश दिया है- “देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर मेरा निर्वाचन इस बात का सबूत है कि भारत का गरीब सपने देख सकता है और उसे पूरा भी कर सकता है। मैंने अपनी जीवन यात्रा ओडिशा के एक छोटे से आदिवासी गांव से शुरू की थी। मैं जिस पृष्ठभूमि से आती हूं, वहां मेरे लिए प्रारंभिक शिक्षा हासिल करना भी सपने जैसा था लेकिन अनेक बाधाओं के बावजूद मेरा संकल्प दृढ़ रहा और मैं कॉलेज जाने वाली अपने गांव की पहली व्यक्ति थी”।

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2022

हिन्दुत्व ही राष्ट्रत्व

एक ओर बाह्य विचारधारा के प्रभाव में कुछ राजनेता और उनके सहयोगी बुद्धिजीवी ‘हिन्दुत्व’ एवं ‘राष्ट्र’ की अवधारणा पर प्रश्न उठाकर उसे नकार रहे हैं। हिन्दुत्व को लेकर उनका विचार अत्यधिक नकारात्मक है। उन्हें जैसे ही अवसर मिलता है, नकारात्मक बातों के साथ हिन्दुत्व को जोड़कर, हिन्दुत्व के प्रति समाज में घृणा का भाव पैदा करने का प्रयास करते हैं। वहीं, दूसरी ओर राष्ट्रीय विचार से अनुप्रमाणित संगठन हैं, जो हिन्दुत्व को भारत का मूल बता रहे हैं। हिन्दुत्व को सही प्रकार से परिभाषित करते हुए उनकी ओर से बताया जाता है कि उसमें सबके लिए सम्मानपूर्वक स्थान है। इस विमर्श के क्रम में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के वक्तव्य को देखा जा सकता है। भाग्यनगर (हैदराबाद) में चल रहे रामानुजाचार्य सहस्राब्दी समारोह में शामिल होने पहुँचे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि “हिन्दुत्व ही राष्ट्रत्व है। इसमें दो मत नहीं है। इस बात को कहने में कोई संकोच नहीं है”।

रविवार, 5 दिसंबर 2021

भारत में दर्शन का आधार है ‘संवाद’

सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम् । 

देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ॥2॥ 

समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम् l 

समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि ॥3॥ 

समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः । 

समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥4॥

ऋग्वेद के 10वें मंडल का यह 191वां सूक्त ऋग्वेदका अंतिम सूक्त है। इस सूक्त में सबकी अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले अग्निदेव की प्रार्थना, जो आपसी मतभेदों को भुलाकर सुसंगठित होने के लिए की गयी है। आप परस्पर एक होकर रहें, परस्पर मिलकर प्रेम से वार्तालाप करें। समान मन होकर ज्ञान प्राप्त करें। जिस प्रकार श्रेष्ठजन एकमत होकर ज्ञानार्जन करते हुए ईश्वर की उपासना करते हैं, उसी प्रकार आप भी एकमत होकर एवं विरोध त्याग करके अपना काम करें। हम सबकी प्रार्थना एकसमान हो, भेद-भाव से रहित परस्पर मिलकर रहें, अंतःकरण मन-चित्त-विचार समान हों। मैं सबके हित के लिए समान मन्त्रों को अभिमंत्रित करके हवि प्रदान करता हूँ। तुम सबके संकल्प एकसमान हों, तुम्हारे ह्रदय एकसमान हों और मन एकसमान हों, जिससे तुम्हारा कार्य परस्पर पूर्णरूपसे संगठित हों।

गुरुवार, 28 जनवरी 2021

‘हनुमानजी की भूमिका’ में भारत

आज जब हम 72वां गणतंत्र मना रहे हैं, तब हम गौरव की अनुभूति कर रहे हैं कि भारत अपनी वैश्विक भूमिका को भी प्राप्त करने की ओर तेजी से अग्रसर है। ‘हम भारत के लोग’ इस बात से रोमांचित होते हैं कि ज्ञान-विज्ञान से लेकर आर्थिक क्षेत्र में कभी हम दुनिया का नेतृत्व करते थे। लंबे समय से हम अपने देश को पुन: विश्वगुरु की भूमिका में देखना चाह रहे थे, उसके लिए प्रयासरत थे। हम चाहते हैं कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की अवधारणा का प्रतिपादक हमारा देश वैश्विक पटल पर ‘विश्व परिवार के मुखिया’ की भूमिका का निर्वहन करे। पिछले पाँच-छह वर्षों में भारत ने उस सामर्थ्य को अर्जित किया है। वैश्विक महामारी ‘कोरोना संक्रमण’ की शुरुआत में ही दुनिया ने भारत की इस भूमिका को देखा कि हमने कमजोर देशों के साथ ही समर्थ देशों की भी सहायता की। अब एक बार फिर भारत में निर्मित कोरोना के टीके जरूरतमंद देशों को भेज कर हम अपनी मानवतावादी आचरण की प्रस्तुति कर रहे हैं। 

भारत ने कोरोना के दो स्वदेशी टीके बनाकर न केवल अपने नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा को सुनिश्चित किया है, बल्कि वह अपने अनेक पड़ोसी देशों को टीके अनुदान के तौर पर देकर एक बड़ी लकीर खींच रहा है। पिछले कुछ दिनों में देसी टीकों की खेप भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश, मालदीव, नेपाल, सेशेल्स और मॉरिशस पहुंची है। इसके अलावा सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और मोरक्को को व्यावसायिक तौर पर टीके भेजे जा रहे हैं। इस सूची में अभी कुछ और देश भी जुड़ेंगे। अमेरिकी विदेश विभाग दक्षिण एवं मध्य एशिया ब्यूरो ने पड़ोसी देशों को मुफ्त टीका मुहैया कराने तथा वैश्विक स्तर पर कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए एक बार फिर भारत की प्रशंसा करते हुए उसे ‘सच्चा दोस्त’ बताया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अदनोम घेब्रेयेसस ने महामारी से निजात पाने की कोशिशों में भागीदारी के लिए भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद कहा है।

ब्राजील के राष्ट्रपति जेयर बोलसोनारो तो भारत से सहयोग मिलने पर अत्यधिक कृतज्ञ अनुभव कर रहे हैं। उन्होंने भारत के प्रति धन्यवाद प्रकट करते हुए कोरोना वैक्सीन लाते हुए हनुमानजी का पोस्टर ट्वीट किया है। हमें ज्ञात है कि जब भगवान श्रीराम के भाई लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे, तब हुनमानजी हिमालय से संजीवनी बूटी लेकर आए थे। उसी संजीवनी बूटी ने लक्ष्मणजी के प्राणों की रक्षा की थी। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि ब्राजील के राष्ट्रपति ने भारतीय संस्कृति के आधार ‘रामायण’ के प्रसंग को इस तरह उल्लेख किया। भारत की कोरोना वैक्सीन को उन्होंने ‘संजीवनी’ के रूप में मान्यता दी और भारत को मानवतासेवी बताया है। एक और अच्छी बात यह है कि उन्होंने हिन्दी में भी धन्यवाद ज्ञापित किया है। यह वैश्विक पटल पर भारत के सम्मान एवं उसकी भूमिका को रेखांकित करता है। इन तथ्यों को भारत के विपक्षी राजनीतिक दलों एवं मोदी विरोधी समूह को भी देखना और समझना चाहिए। जिस वैक्सीन को लेकर ‘झूठों का समूह’ दुष्प्रचार कर रहा था, उसके प्रति वैश्विक जगत भारत के प्रति कृतज्ञता प्रकट कर रहा है। उल्लेखनीय है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि हमारी वैक्सीन समूची मानवता के लिए है। इसलिए यह बात स्पष्ट समझ लेनी चाहिए कि अपने पड़ोसियों और मित्र देशों को टीका देना, केवल कूटनीति या व्यापार का मामला नहीं है बल्कि सदैव से मानवता की चिंता भारत की प्राथमिकता है।


शनिवार, 15 अगस्त 2020

आओ, भारत को उत्साहित करें

भारत के स्वरूप पर यह कविता भी सुनें

आज भारत अपना 74वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। कोरोना महामारी ने हम सबको बांध कर रखा हुआ है। इस महामारी के कारण अनेक चिंताएं और चुनौतियां हमारे सामने हैं। लेकिन, अच्छी बात यह है कि हम हारे नहीं हैं। हमने इस महामारी के सामने घुटने नहीं टेके हैं। हम पहले दिन से संघर्ष कर रहे हैं। हम ठीक उसी तरह अपनी पूरी जान लगा कर बीमारी से लड़ रहे हैं, जैसे हम विदेशी दासता से लड़े। हमने कभी भी विदेशी शासन के सामने घुटने नहीं टेके थे। हमारा संघर्ष पहले दिन से शुरू हो गया था। चाहे फिर वे मुगल हों, पुर्तगीज हों या फिर ब्रिटिश। हमने बाहर से आए आक्रांताओं एवं लुटेरों के विरुद्ध सतत् संघर्ष किया। कभी हार नहीं मानी। हमारे संघर्ष, हौसले और हमारी विजिगीषा का परिणाम था कि 1947 में शासन के सूत्र हमारे हाथ में थे। यह दीगर बात है कि पूर्ण स्वतंत्रता और स्वराज्य के लिए संघर्ष अब भी जारी है। हमें विश्वास है कि अपने इन्हीं अद्भुत गुणों के कारण हम कोविड-19 वायरस को भी भारत से बाहर खदेड़ सकेंगे। इस दिशा में कुछ उत्साहजनक समाचारों की आहट मिलना शुरू हुई है। भारत में बन रही देसी वैक्सीन अपने पहले चरण के परीक्षण में सब प्रकार से सफल रही है। उम्मीद है कि भारत की मेधा वैक्सीन के शेष चरणों का परीक्षण भी जल्द पूरा करेगी। 

भारत के नागरिकों का यह चरित्र इसलिए है क्योंकि उसके शास्त्र यही सीख देते हैं कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धैर्य और उत्साह को क्षीण नहीं होने देना चाहिए। जिजीविषा बनाए रखना ही पराक्रमी और विजेता लोगों की पहचान है। रामायण में माता सीता के अपहरण के बाद एक स्थान पर प्रसंग आता है कि वियोग में श्रीराम गहरे दु:ख से घिर गए हैं। उनका उत्साह बिल्कुल ठंडा पड़ गया है। तब उनके अनुज लक्ष्मण उन्हें कहते हैं- 

“उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात् परं बलम्।

सोत्साहस्य हि लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्।।” (१२१ किष्किन्धाकाण्ड, प्रथम सर्ग) 

“भैया, उत्साह ही बलवान होता है। उत्साह से बढ़कर दूसरा कोई बल नहीं है। उत्साही पुरुष के लिए संसार में कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है।” सुमित्रानंदन आगे कहते हैं कि जिनके हृदय में उत्साह होता है, वे पुरुष कठिन-से-कठिन कार्य आ पडऩे पर हिम्मत नहीं हारते। आप जैसे महात्मा एवं कृतात्मा पुरुष को शोक शोभा नहीं देता। इसी तरह महाभारत का प्रसंग हमको ध्यान में आता है, जब युद्ध भूमि में वीर अजुर्न के हाथ से गांडिव छूट जाता है। रणभूमि में संगे-संबंधियों को अपने सामने देखकर अपराजेय अर्जुन का उत्साह ठंडा पड़ जाता है। वे घनघोर निराशा में डूब जाते हैं। तब योगेश्वर श्रीकृष्ण उनके भीतर उत्साह का संचार करते हैं। 

वर्तमान समय में अनेक प्रकार से अनेक महात्मा एवं राजपुरुष लोग ‘भारत’ के उत्साह को बनाए हुए हैं। इसी महान उत्साह के बल पर हमारा संघर्ष जारी है। इसी उत्साह के बल पर हम जीतेंगे। आईए, इस स्वतंत्रता दिवस पर हम संकल्प लें कि भारत को मजबूत करेंगे। भारत को श्रेष्ठ बनाने में अपना ‘गिलहारी’ (हर संभव) योगदान देंगे। हम आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को साकार करने के लिए आगे आएंगे। जयतु भारत....

इस अवसर पर यह कविता सुनें.... 

माझा भारत | मेरा भारत | भारत का आध्यात्मिक काव्य चित्रण/वर्णन


बुधवार, 29 अप्रैल 2020

संघ की बात : सेवा उपकार नहीं, करणीय कार्य


देश के किसी भी हिस्से में, जब भी आपदा की स्थितियां बनती हैं, तब राहत/सेवा कार्यों में राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ के कार्यकर्ता बंधु अग्रिम पंक्ति में दिखाई देते हैं। चरखी दादरी विमान दुर्घटना, गुजरात भूकंप, ओडिसा चक्रवात, केदारनाथ चक्रवात, केरल बाढ़ या अन्य आपात स्थितियों में संघ के स्वयंसेवकों ने पूर्ण समर्पण से राहत कार्यों में अग्रणी रहकर महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। अब जबकि समूचा देश ही कोरोना जैसे महामारी से जूझ रहा है, तब भी संघ के स्वयंसेवक आगे आकर सेवाकार्यों में जुटे हुए हैं। आश्चर्य की बात है कि स्वयंसेवकों का आपदा के समय में राहत कार्य करने का कोई विशेष प्रशिक्षण भी नहीं होता, इसके बाद भी वे अपना जीवन दांव पर लगा कर समाज हित में आगे आते हैं। इसके पीछे का भाव क्या है? रहस्य क्या है? स्वयंसेवकों के इस समर्पण भाव को समझने के लिए 26 अप्रैल, 2020 को सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के ऑनलाइन दिए गए उद्बोधन को सुनना और समझना चाहिए। सेवाकार्यों के संबंध में उन्होंने जो बातें कहीं, उसका सार यही है कि स्वयंसेवक के लिए सेवा उपकार नहीं है, उसके लिए यह ‘करणीय कार्य है’। इसलिए संघ का स्वयंसेवक अपना दायित्व मान कर सेवाकार्य करता है। 
          हम (संघ के स्वयंसेवक) सेवा कार्य क्यों करते हैं? इस प्रश्न की उन्होंने सुंदर व्याख्या की। सरसंघचालक जी ने कहा- “सेवा कार्यों की प्रेरणा के पीछे हमारा स्वार्थ नहीं है। हमें अपने अहंकार की तृप्ति और अपनी कीर्ति-प्रसिद्धि के लिए सेवा-कार्य नहीं करना है। यह अपना समाज है, अपना देश है, इसलिए हम कार्य कर रहे हैं। स्वार्थ, भय, मजबूरी, प्रतिक्रिया या अहंकार, इन सब बातों से रहित आत्मीय वृत्ति का परिणाम है यह सेवा।” उनके इस वक्तव्य से उन लोगों को सीख लेनी चाहिए जो सिर्फ अपने निहित स्वार्थ की पूर्ति के लिए सेवा कार्य करते हैं। इस क्रम में उन्होंने आगे जो कहा, वह और भी अधिक महत्व का है। वैसा कहने के लिए सामथ्र्य चाहिए। क्योंकि वर्तमान समय में तो अपने समाज और व्यक्ति का मानस ऐसा बन गया है कि जो किया है उसका श्रेय तो लेना ही है, जो नहीं किया उसका भी श्रेय लूटने का प्रयत्न करना चाहिए। चारों और श्रेय लेने की होड़ लगी है। ऐसी स्थिति में वह स्वयंसेवकों को मार्गदर्शित करते हुए कहते हैं- “हमें निरहंकार वृत्ति से सेवा कार्य में जुटना चाहिए। हम जो कर रहे हैं, उसमें समाज की सहभागिता है, इसलिए उसका श्रेय स्वयं न लेकर दूसरों को देना चाहिए।” जब हम कोई कार्य प्रारंभ करते हैं तो बहुत उत्साह रहता है। लेकिन जब वह लंबा खिंचने लगता है तो कार्य के प्रति ऊब पैदा होने लगती है। कोरोना संकट में सेवा कार्य अभी तो जोर-शोर से चल रहे हैं, लेकिन यह संकट लंबा भी चल सकता है इसलिए कार्य की गुणवत्ता और मात्रा में गिरावट न आए, इसके लिए भी सरसंघचालक जी स्वयंसेवकों को मार्गदर्शन देते हैं। हालाँकि, संघ के स्वयंसेवक जिस कार्य को हाथ में लेते हैं, उसे पूर्ण करके ही छोड़ते हैं। तब भी उन्होंने कहा कि अपने प्रयासों में सातत्य रहना चाहिए। हमें न तो ऊबना है और न ही थकना है। निरंतर कार्य करते रहता है। बल्कि उन्होंने कहा कि कोरोना के समाप्त होने के बाद भी संपूर्ण व्यवस्था को पुन: चलायमान बनाने के लिए भी अतिरिक्त कार्य की आवश्कता होगी, उसकी भी तैयारी रहनी चाहिए। यह संघ की दूरदृष्टि है कि वह न केवल वर्तमान संकट से निपटने के लिए प्रयत्नशील है, बल्कि भविष्य में होने वाली कठिनाईयों की ओर भी देख रहा है। 
          अकसर राष्ट्रीय विचार के विरोधी लोग संघ के संदर्भ में दुष्प्रचार करते हैं कि आरएसएस मुसलमानों-ईसाईयों से भेद करता है। किंतु, यह वास्तविकता नहीं। यह एक झूठ है, जिसे वर्षों से बोला जा रहा है। वैसे तो संघ किसी का विरोध नहीं करता है, लेकिन उन लोगों के आचरण पर आपत्ति अवश्य करता है जिनकी गतिविधियां देश-समाज के हित में नहीं होती हैं, फिर वे चाहें किसी भी संप्रदाय से संबंध रखने वाले लोग हों। आपदा की स्थिति में तो संघ के लोग किसी के साथ भी भेद नहीं रखते। सरसंघचालक जी ने कहा भी- “हमें सबके लिए काम करना है। कोई भेद नहीं करना है। जो-जो पीडि़त हैं, वे सब हमारे अपने हैं। भारत ने जिन दवाईयों के निर्यात पर प्रतिबन्ध लगाया हुआ था, दुनिया के हित के लिए उस प्रतिबंध को हटाकर और स्वयं थोडा नुकसान सह कर भी हमने दूसरे देशों को दवाइयाँ भेजी हैं। जो माँगेंगे, उनको देंगें, क्योंकि यह हमारा स्वभाव है। हम मनुष्यों में भेद नहीं करते और ऐसे प्रसंगों (संकट काल) में तो बिल्कुल नहीं करते। सब अपने हैं। जो-जो पीडि़त हैं और जिस-जिस को आवश्यकता है, उन सबकी सेवा हम करेंगे। जितनी अपनी शक्ति है उतनी सेवा करेंगे। अपने कार्य का आधार है - अपनत्व की भावना। स्नेह और प्रेम अपने व्यवहार में दिखना चाहिये।” देशभर से सेवाकार्यों की जो तस्वीरें और वीडियो आ रहे हैं, वे इस बात की पुष्टी करते हैं कि संघ के स्वयंसेवक पीडि़त के प्रति अपनत्व का भाव रखकर उनकी सहायता कर रहे हैं। संघ के स्वयंसेवक एवं राष्ट्रीय विचार से ओत-प्रोत समविचारी संगठनों के कार्यकर्ता प्रचंड रूप से सेवाकार्य चला रहे हैं। देश के प्रत्येक राज्य-जिले में संघ की प्रेरणा से भोजन पैकेट, राशन सामग्री, दवाएं, फल, सब्जियां, मास्क और अन्य आवश्यक सामग्री का वितरण किया जा रहा है। समाज के जिस वर्ग को सहायता की आवश्यकता है, वहाँ तक यह सहायता पहुँच रही है। 
कोरोना से बचने के लिए गरीबों के लिए मास्क सिलती राष्ट्र सेविका समिति की कार्यकर्ता
          संघ अपने प्रारंभ से ही ‘प्रसिद्धिपंरागमुखता’ के सिद्धांत का पालन करता रहा है। इसलिए इसमें किसी को संदेह नहीं कि संघ अपनी कीर्ति-प्रसिद्धि के लिए सेवाकार्य करता है। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने स्पष्ट भी किया- “जो लोग सहयोगी बनना चाहते हैं, उनको समुचित जानकारी हो इसलिये कुछ प्रसिद्धि भी करनी पड़ती है। अपने कार्य की रचना में हम सबको सविस्तार वृत्त ठीक-ठीक पता चले, इसलिये उसको प्रकाशित करना पड़ता है। लोगों को प्रेरणा मिले, इसलिये भी ऐसे कार्य में आने वाले अनुभवों का लेखन-प्रकाशन करना पड़ता है। परन्तु अपना डंका बजाने के लिये हम ये काम नहीं कर रहे हैं।” यानी संघ के सेवाकार्यों की जो जानकारी हमारे सामने मीडिया या सोशल मीडिया के माध्यम से आ रही है, उसका उद्देश्य की संघ की शक्ति का ढंका बजाना नहीं है, बल्कि अन्य लोगों को प्रेरणा देना है।   
          राष्ट्रीय विचार के प्रति निरंतर दुष्प्रचार के कार्य में संलग्न व्यक्तियों/संस्थाओं को सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी के उद्बोधन के उस हिस्से पर विशेष ध्यान देना चाहिए, जिसमें वे कह रहे हैं कि कुछ लोगों की भयवश, क्रोधवश या जानबूझकर की गई गलती के कारण उससे संबंध रखने वाले पूरे वर्ग से दूरी नहीं बनानी चाहिए। कुछ लोगों की गलती के लिए सारे समूह को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि सब जगह दोष रखने वाले लोग होते हैं। उन्होंने उचित ही कहा कि ऐसे समय में सभी लोगों को यह सावधानी रखनी होगी कि यह अपने देशहित का विषय है और इसमें हमारी भूमिका सहयोग की ही होगी, कभी भी विरोध की नहीं होगी। भारत का 130 करोड़ का समाज भारत माता का पुत्र है, अपना बंधु है। इस बात को ध्यान में रखना चाहिये। भय और क्रोध दोनों तरफ से नहीं करना चाहिये। जो-जो अपने समूह के समझदार लोग हैं, उन्हें अपने-अपने समूह के लोगों को इससे बचाना चाहिये और भय या क्रोधवश होने वाले ऐसे कृत्यों  में  हम लोगों को शामिल नहीं रहना चाहिए। संभवत: उनका संकेत जमात से जुड़े लोगों की अभद्रता और उपद्रव के कारण समाज में मुस्लिम संप्रदाय के प्रति बन रहे हेय के वातावरण के प्रति था। नि:संदेह जमात से जुड़े और अन्य कुछ लोगों की हरकतों के कारण सामान्य लोगों के मन में मुस्लिम संप्रदाय से दूर रहने का विचार घर करने लगा है। इस संबंध में समाज का प्रबोधन आवश्यक है। किंतु, भारत विरोधी ताकतों ने इसे एक अवसर की तरह लिया और उन्होंने इसे ‘इस्लामोफोबिया’ का विशेषण देकर वैश्विक मीडिया और सोशल मीडिया में भारत के प्रति नकारात्मक वातावरण बनाने का प्रयास किया। सरसंघचालक जी ने ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ का कुविचार रखने वालों की धूर्तता से सावधान रहने की बात भी कही। उन्होंने कहा कि हमें उनके प्रोपोगंडा से बचना है। ये लोग हमारा कुछ बिगाड़ न सकें इतनी सावधानी और इतना बल सजग जागृत रखना। लेकिन हमारे मन में इसके कारण प्रतिक्रियावश कोई खुन्नस या कोई दुश्मनी नहीं होनी चाहिए।


          ‘वर्तमान परिदृश्य और हमारी भूमिका’ विषय पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का यह ऑनलाइन प्रबोधन केवल स्वयंसेवकों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह शासन-प्रशासन, समाज की सज्जनशक्ति के लिए भी पाथेय था। कोरोना संकट के बीत जाने के बाद फिर से नये और आकांक्षावान भारत के निर्माण के लिए सबको मिलकर सामूहिक प्रयास करने का आह्वान उन्होंने किया है। इस उद्बोधन में उन्होंने स्वदेशी अर्थव्यवस्था, समाज के स्वावलंबन एवं पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर भी दिशा-सूत्र दिए। उनका यह उद्बोधन ‘संघ की बात’ एवं ‘संघ के विचार’ को समाज के सामने प्रस्तुत करता है, साथ ही संघ की वास्तविक छवि को भी प्रकट करता है। संभव है कि इस उद्बोधन से अनेक लोगों के मन से संघ के प्रति बने/बनाए गए भ्रम दूर हुए होंगे। संघकार्य की स्पष्टता भी बनी होगी। संघ के संबंध में यह बात गाँठ में बाँध लेनी चाहिए कि यह विशाल संगठन समय के साथ कदमताल करता है, यह सिर्फ लकीर नहीं पीटता। समय की आवश्कता के अनुरूप अपना स्वरूप तय करता है और प्रत्येक परिस्थिति में समाज-देश की सेवा में जुट जाता है।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

लोकनायक श्रीराम


मर्यादापुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम भारत की आत्मा हैं। राम भारतीय संस्कृति के भव्य-दिव्य मंदिर के न केवल चमकते शिखर हैं, अपितु वे वास्तव में उसके आधार भी हैं। इसलिए राम का जीवन उनके समय से लेकर आज तक प्रासंगिक है। उनका जीवन प्रकाश स्तम्भ की तरह है, जो अंधेरे में हमारा मार्ग प्रशस्त करता है। संसार का ऐसा कोई प्रश्न नहीं है, जिसका व्यवहारिक आदर्श उत्तर राम ने अपने आचरण से नहीं दिया हो। उनके जीवन में सारा जग समाया हुआ है। बाबा तुलसीदास लिखते हैं- ‘सिय राम मय सब जग जानी, करहु प्रणाम जोरी जुग पानी।’ राष्ट्र एवं समाज जीवन की दिशा क्या होनी चाहिए, यह रामकथा में राम के जीवन से अनुभूत की जा सकती है। वह ऐसे नरश्रेष्ठ या अवतार हैं, जिन्होंने वाणी से नहीं अपितु आचरण से जीवनदर्शन को प्रस्तुत किया। इसलिए वह सीधे लोक से जुड़ते हैं। असाधारण होकर भी अपने साधारण जीवन से समूचे लोक का नेतृत्व करते हैं। राम भारतीय संस्कृति के ऐसे नायक हैं, जिन्होंने समाज के सुख-दु:ख और उसकी रचना को नजदीक से देखा-समझा। अयोध्या के राजकुमार-राजा से कहीं अधिक बड़ी भूमिका में राम हमें एक ऐसे जननायक के रूप में दिखाई पड़ते हैं, जिन्होंने उत्तर से दक्षिण तक दुष्ट राजाओं के आतंक से भयाक्रांत भारतीय समाज के साहस को जगाया और उन्हें एकजुट किया। अन्याय के विरुद्ध प्रतिकार और पराक्रम का बल दिया। राष्ट्र के सोये हुए भाग्य को जगाने का काम लोकनायक करते हैं, वहीं प्रभु राम ने किया। 
          शक्तिशाली राज्य अयोध्या के महाराज दशरथ के वीर पुत्र और भावी सम्राट होने मात्र से राम जनता के नायक नहीं हो जाते। वह अपने व्यक्तित्व को इस प्रकार गढ़ते हैं कि जनता उन्हें स्वाभाविक तौर पर अपना नायक मानती है। जनमानस में राम के प्रति कितना समर्पण था, उनके प्रति कितनी आस्था-भक्ति थी, व्यापक स्तर पर उसका पहला प्रकटीकरण तब होता है, जब राम अयोध्या का भव्य महल छोड़कर वन की ओर निकलते हैं। अयोध्या के समस्त मार्ग अवरुद्ध हो गए हैं। राम को रोकने के लिए जनसैलाब उमड़ आया है। रथ के आगे लोग लेट गए हैं। राम उनसे दूर जाएं, अयोध्या का कोई भी जन यह स्वीकार करने को तैयार नहीं। अयोध्या में आर्तनाद छा गया। यह अगाध श्रद्धा, अपनत्व, ममत्व, स्नेह और भक्ति राम ने अपने आचरण से कमाई थी। अयोध्या का हाल देखकर भरत अपने भाई को वापस लाने के लिए चित्रकूट में पहुँचते हैं। राम से लौटकर चलने के लिए मनुहार करते हैं। करबद्ध प्रार्थना करते हैं। किंतु, राम को मर्यादा की स्थापना करनी है। वह भरत को मना कर देते हैं। परंतु, अयोध्या का क्या, जो दशरथ के बाद राम की है। राम ही अयोध्या को नेतृत्व दे सकते हैं। क्योंकि, अयोध्या की जनता सिर्फ ‘रामराज्य’ चाहती है। राम के विरह की अग्नि अभी ठण्डी भी कहाँ हुई थी? ऐसे में भरत स्वप्न में भी अयोध्या के सिंहासन पर बैठने की सोच नहीं सकते। भाई राम के प्रति भी भरत के मन में जो श्रद्धा है, वह भी इसकी अनुमति नहीं देती। भले ही माता कैकयी भरत को राजा के रूप में सिंहासन पर बैठे देखना चाहती थीं। यदि किसी दबाव में भरत यह करते तो जनमानस उनके विरुद्ध हो सकता था। अयोध्या को सिर्फ राम संभाल सकते थे। इसलिए भरत ने राम की चरणपादुकाएं लीं और अयोध्या लौट गए।  
          महल छोड़कर राम जब वन पहुँचते हैं, तब उन्हें ज्ञात होता है कि समाज किन कठिनाइयों से गुजर रहा है। हालाँकि, गुरु वशिष्ठ उन्हें पहले भी समाज की समस्याओं से साक्षात्कार करा चुके थे। समाज को अत्यंत समीप से देखने के बाद राम उसे संगठित और जागृत करना चाहते थे। इसलिए भी संभव है कि राम अयोध्यावासियों और अपने प्रिय भाई भरत की प्रार्थनाओं को अस्वीकार कर देते हैं। वह साधारण जीवन जी कर समाज के सामने अनेक प्रकार के उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते हैं। वह चाहते तो वन में किसी एक जगह सुंदर और साधन-सम्पन्न कुटिया बना कर रह सकते थे। लेकिन, उन्होंने वनगमन को राष्ट्र निर्माण के एक अवसर में बदल दिया। अपना हित छोड़ा, कष्ट सहन किए। सरलता को छोड़ा, कठिनता को चुना। आराम का त्याग किया, परिश्रम को चुना। वनवास के दौरान राम ने व्यापक जनसंपर्क किया। वनवासियों को अपने साथ जोड़ा। उन्हें अपना बनाया। सामान्य व्यक्ति जिस संघर्ष भरे जीवन को जी रहा था, उसी को राम ने भी अपनाया। इसलिए वन-ग्राम में रहने वाले सब लोगों के साथ उनका आत्मीय और विश्वास का संबंध जुड़ता। 
          वनवास खत्म होने में केवल छह-सात माह ही बचते हैं, तब माता जानकी का अपहरण रावण ने कर लिया। राम ने ऐसे कठिन समय में भी अयोध्या, मिथिला या फिर अन्य किसी मित्र राज्य से सहायता नहीं ली। वह समाज को संदेश देना चाहते थे कि समाज की एकजुटता से बिना साधन के भी रावण जैसे अत्यधिक शक्तिशाली आताताई को भी परास्त किया जा सकता है। संगठन में ही वास्तविक शक्ति है। अत्याचारी और अन्यायी ताकतों का सामना करने के लिए राज्य की सशस्त्र सेना ही आवश्यक नहीं है। हम अपनी शक्ति को एकत्र कर भी दुष्टों को धूल चटा सकते हैं। चूँकि वह मानते थे- ‘यथा हि कुरुते राजा प्रजा तमनुवर्तते’ (उत्तरकाण्ड, सर्ग ४३, श्लोक १९)। अर्थात् प्रजा अपने राजा का अनुसरण करती है। यदि राम ने सेना बुला कर रावण का अंत किया होता, तब जनमानस में ‘संगठन में शक्ति है’ का भाव कभी नहीं आ पाता, तब शायद समाज में पराक्रम का भाव नहीं जाग पाता, तब शायद सामान्य समाज अपने साहस और कौशल को हथियार नहीं बना पाता, अन्याय के सामने सिर उठाने का साहस नहीं कर पाता। वह बाहुबलियों द्वारा पददलित होना, अपना भाग्य समझ लेता। राम ने लोगों का संगठन कर उसे शक्तिशाली सेना का स्वरूप देकर समाज का भाग्य बदल दिया। उन्होंने समाज में संघर्ष और आत्मविश्वास का बीज बो दिया। राम ने आने वाले भविष्य के लिए उदाहरण प्रस्तुत कर दिया कि कितना भी बलशाली दुष्ट शासन हो, संगठित समाजशक्ति द्वारा उसका प्रतिकार किया जा सकता है। अन्यायपूर्ण शासन को जनशक्ति उखाड़ कर फेंक देती है। संगठित जनसमूह के सामने साधन-सम्पन्न दुष्ट ताकत कमजोर पड़ जाती है। अंत में विजय समाज के हिस्से आती है। 
          प्रभु राम की ईश्वरीय अवधारणा से इतर, रामकथा ऐसे जननायक की कहानी है, जिसने संपूर्ण भारत को एकसूत्र में पिरोया, समाज के विभेद को समाप्त किया, समाज में मूल्य एवं आदर्श स्थापित किए। आज भी भारत राम के नाम पर एक है। राम ऐसे लोकनायक हैं, जो सिर्फ भक्त शिरोमणि वीर हनुमान के सीने में ही नहीं बसते, वरन भारत के बच्चे-बच्चे में राम की छवि दिखती है। राम ऐसे जननायक हैं, जो आज भी प्रत्येक संकट में हमें सहारा देते हैं। उनका जीवन हमें कठिन से कठिन संकटों का सामना करने की प्रेरणा देता है। लोकनायक होने के लिए किस तरह का संकल्प चाहिए, यह राम के संपूर्ण जीवन से स्पष्ट हो जाना चाहिए। यद्धपि महाकवि भवभूति ने अपने नाटक ‘उत्तररामचरित’ में स्वयं प्रभु राम से वक्तव्य दिलाया है- “स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि, आराधनाय लोकस्य मुंचतो नास्ति मे व्यथा।” अर्थात् राम कहते हैं कि लोक की आराधना के लिए मुझे अपने स्नेह, दया, सौख्य और यहाँ तक कि जानकी का भी परित्याग करने में भी कोई व्यथा नहीं होगी। हमको ज्ञात है कि राम ने लोक की सेवा के लिए फूलों की सेज छोड़ कर कंटकाकीर्ण मार्ग चुना। अपना सर्वस्व त्यागा। राम सुखपूर्वक अपना जीवन बिता सकते थे लेकिन उन्होंने कठिन और कष्टप्रद जीवन को चुना।
---

मेरा भारत साक्षात् राजा राम स्वरुप है 



शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

संभावना और चुनौतियों के बीच मूल्यानुगत मीडिया का आग्रह


सक्रिय पत्रकारिता और उसके शिक्षण-प्रशिक्षण के सशक्त हस्ताक्षर प्रो. कमल दीक्षित की नयी पुस्तक ‘मूल्यानुगत मीडिया : संभावना और चुनौतियां’ ऐसे समय में आई है, जब मीडिया में मूल्यहीनता दिखाई पड़ रही है। मीडिया में मूल्यों और सिद्धांतों की बात तो सब कर रहे हैं, लेकिन उस तरह का व्यवहार मीडिया का दिखाई नहीं दे रहा है। मीडिया के जरिये कर्ता-धर्ता मालिक/पत्रकार अपने व्यावसायिक और वैचारिक हित साधने में लगे हुए हैं। उन्होंने अपने नये मूल्य गढ़ लिये हैं। मूल्यहीनता के इस अंधकार को दूर करने का काम यह पुस्तक कर सकती है। प्रो. कमल दीक्षित की लेखकी में यह शक्ति है। वे निरंतर अपनी लेखनी के प्रवाह से यह करते आ रहे हैं। उनके शब्दों में सत्याग्रह है। वे आध्यात्मिक पुरुष भी हैं। जो वह कह रहे हैं, उसे उन्होंने जिया भी है। विभिन्न समाचार पत्रों का संपादन करते हुए उन्होंने मूल्यों और सिद्धांतों को कभी नहीं छोड़ा। प्रत्येक स्थिति में मूल्यों की पत्रकारिता को आगे बढ़ाया। पत्रकारिता के अध्यापन एवं प्रशिक्षण में भी अपनी भावी पीढ़ी को मिशनरी पत्रकारिता के तत्व ही हस्तांतरित किए। शायद इसलिए ही प्रो. कमल दीक्षित जिस मूल्यानुगत मीडिया की बात कर रहे हैं, अनेक चुनौतियों के बाद भी वैसी मीडिया के अस्तित्व की भरपूर संभावना दिखाई देती है।
            पुस्तक में शामिल अनेक आलेखों में प्रो. कमल दीक्षित की चिंता/बेचैनी दिखाई देती है। वह मानते हैं कि सामाजिक बदलाव के लिए मीडिया की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। मीडिया इसमें कहीं चूक रहा है। मीडिया से वह अपेक्षा करते हैं कि उसे अपने कर्तव्य पथ पर वापस लौटना चाहिए। वे लिखते हैं कि ‘मीडिया ने अपने मूल्यों को दरकिनार किया है तथा मानवीय मूल्यों से भी उसके संबंध कमजोर हुए हैं। उसने भारतीय तथा जातीय संस्कृति को प्रभावित करते हुए पाश्चात्य तथा उपभोक्तावादी संस्कृति का विस्तार किया है।’ हिंदी के समाचार पत्र-पत्रिका जिस तरह भाषा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, उस पर भी उनकी बेचैनी साफ नजर आती है। उनका मानना है कि ‘हमारे समाचार पत्रों ने भाषा के साथ ही बेसमझ और फूहड़ व्यवहार किया है।’ यह पीड़ा हर उस पाठक की है, जो भाषा के प्रति थोड़ा-सा भी संवेदनशील है। विशेषतौर पर हिंदी के समाचार-पत्रों ने जिस तरह से आम बोल-चाल की भाषा के नाम पर ‘हिंदी’ का स्वरूप बिगाड़ा है, वह असहनीय है। समाचार-पत्र धड़ल्ले से हिंदी की अस्मिता पर चोट कर रहे हैं। अच्छी भाषा भी एक मूल्य है। समाचार-पत्रों को भाषा की अनदेखी नहीं करनी चाहिए, बल्कि उसके संवर्द्धन की जिम्मेदारी का निर्वहन करना चाहिए।
            पुस्तक के पहले आलेख का शीर्षक है- ‘अभी संभावना है।’ यह शीर्षक ही इस पुस्तक के मूल विचार, भाव और तत्व का प्रतिनिधि है। यह शीर्षक उन लोगों को झकझोरता है, जो यह मान बैठे हैं कि कॉरपोरेट ने पत्रकारिता को चौपट कर दिया और अब मीडिया में मूल्यों के लिए कोई स्थान शेष नहीं। यह शीर्षक उस विश्वास को पक्का करता है, जो यह मानता है कि घोर व्यावयायिकता और गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा के दौर में सबकुछ नष्ट नहीं हुआ है, अभी बहुत संभावनाएं शेष हैं। पुस्तक में शामिल सभी आलेखों में लेखक ने मूल्यों और सिद्धांतों को टटोलते हुए उनकी अनुपस्थिति पर जिम्मेदारों से प्रश्न भी पूछे हैं तो पत्रकारिता में मूल्यों की स्थापना के लिए प्रयासरत सज्जनों को प्रोत्साहित भी किया है, ताकि वह अपने पथ पर आगे बढ़ते रहें। बहरहाल, बाकी सबको भी ‘अभी संभावना है’ इसको मंत्र बनाकर पत्रकारिता में मूल्योन्मुखी वातावरण बनाने के लिए जुटना चाहिए। यह भारतीय पत्रकारिता के वर्तमान और भविष्य, दोनों के लिए आवश्यक है। भारतीय पत्रकारिता का स्वर्णिम इतिहास है। पत्रकारिता ने न केवल भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को धार दी, अपितु समाज जागरण का दायित्व भी निभाया है। इसलिए समाज आज भी पत्रकारिता से उसी भूमिका की अपेक्षा करता है। प्रो. दीक्षित लिखते हैं कि “समाचार पत्र-पत्रिकाओं को अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का स्मरण करना चाहिए। उसे अपने कंटेंट के विकास और पत्र के संचालन के बारे में कुछ ऐसी नीतियां तय करनी होंगी जिससे उसकी आर्थिक स्थिति भी ठीक रहे। बाजार उसका सहयोग तो उसके उपभोक्ताओं के आधार पर ले सके पर उसे बाजार की शर्तों पर अपने मूल्यों और आदर्शों को बदलना नहीं पड़े।”
            पुस्तक में मूल्यानुगत मीडिया के आचार्य प्रो. दीक्षित के 60 चुनिंदा आलेखों को शामिल किया गया है। पुस्तक का पहला आलेख ‘अभी संभावना है’ और अंतिम आलेख ‘यह प्रवाह बना रहे’ है। पुस्तक में प्रवाहित चिंतनधारा के इस ओर-छोर (पहला और अंतिम आलेख के शीर्षक) पर खड़े लेखक ने अपने चिरपरिचित आध्यात्मिक अंदाज में महत्वपूर्ण संदेश दिया है। दोनों लेखों का यह क्रम लेखक के दार्शनिक पक्ष को भी सामने लाता है। सारगर्भित ढंग से लेखक ने अपने पाठकों और उन सब लोगों का मार्गदर्शन किया है, जो मूल्यानुगत मीडिया की स्थापना एवं विस्तार का ध्येय लेकर चल रहे हैं। उनके लिए संदेश है- सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है। फिर से पत्रकारिता के मूल स्वरूप को जाग्रत किया जा सकता है। अभी संभावना है। छोटी से छोटी संभावना भी हमारे प्रोत्साहन का आधार बने। इसलिए पत्रकारिता जगत में अनेक लोगों ने मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए जो प्रयास प्रारंभ किए हैं, हर हाल में उनका प्रवाह बना रहना चाहिए।

           
पुस्तक : मूल्यानुगत मीडिया : संभावना और चुनौतियां
लेखक : प्रो. कमल दीक्षित
मूल्य : 250 रुपये 
प्रकाशक : सृजन बिंब प्रकाशन, 
                301, सनशाइन-2, के.टी. नगर, 
                काटोल रोड, नागपुर – 440013
मोबाइल : 8208529489
ईमेल : Srijanbimb.2017@gmail.com

मंगलवार, 27 अगस्त 2019

सेवा को अपने जीवन में उतारें : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

बैतूल में आरएसएस के समविचार संगठन 'विद्या भारती' द्वारा संचालित हॉस्पिटल

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने लोकप्रिय रेडियो संवाद ‘मन की बात’ में भगवान श्रीकृष्ण और महात्मा गांधी के जीवन का उल्लेख करते हुए सेवा को अपने जीवन में उतारने का आह्वान किया। भारतीय परंपरा-संस्कृति में सेवा का अत्यधिक महत्व है। हम भारतीयों का यह एक ऐसा गुण है, जो हमें एक-दूसरे से जोड़ता है। हमारे देश में सेवा को उपकार की तरह नहीं, बल्कि कर्तव्य की तरह देखा जाता है। कर्तव्य भी साधारण नहीं, अपितु विशेष। भारतीय परंपरा में ‘सेवा’ अर्थात् ‘करना ही चाहिए’ ऐसा कार्य। सेवा हमारे यहां बदले में कुछ पाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह करणीय कार्य है। जबकि पश्चिम से जो ईसाई मिशनरीज आए उन्होंने सेवा को कन्वर्जन (धर्मान्तरण) का माध्यम बनाया है। अर्थात् वह सेवा जैसे पवित्र कार्य का भी दुरुपयोग करते हैं। जबकि हमारे लिए सेवा समाज ऋण से उऋण होने का माध्यम है।
          प्राचीन भारत के इतिहास में झांक कर देखें तो पाएंगे कि समाज के प्रतिष्ठित और साधन-सम्पन्न लोग ही नहीं, अपितु सामान्य जनमानस में भी सेवा की प्रवृत्ति थी। आधुनिकत जीवन पद्धति में कहीं न कहीं हम ‘सेवा भाव’ से दूर हुए हैं। स्व-केंद्रित जीवन होने के कारण हम अपने आस-पास जरूरतमंद लोगों को देख नहीं पाते हैं। जबकि हम सहजता से उनकी विभिन्न प्रकार से मदद कर सकते हैं। यही बात देशवासियों के ध्यान में लाने का प्रयास प्रधानमंत्री मोदी ने भगवान श्रीकृष्ण और महात्मा गांधी के माध्यम से किया है। उन्होंने एक बार फिर महात्मा गांधी की 150वीं जयंती को सार्थक ढंग से मनाने का आह्वान देश से किया है।
          हम जानते हैं कि अंहिसा के बाद महात्मा गांधी का सबसे बड़ा साधन एवं मंत्र ‘सेवा’ ही है। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी ने उचित ही कहा कि महात्मा गांधी के जीवन से एक बात हमेशा जुड़ी रही वह है, सेवा और सेवा भाव। उनका पूरा जीवन देखने पर यह ‘सेवा भाव’ सदैव उनके साथ दिखाई देता है। महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में उन लोगों की सेवा की, जो नस्लीय हिंसा का शिकार थे। उस समय यह छोटी बात नहीं थी। उन्होंने उन किसानों की सेवा की, जिनके साथ चंपारण में भेदभाव किया जा रहा था। उन्होंने उन मिल मजदूरों की सेवा की, जिन्हें उचित मजदूरी नहीं दी जा रही थी। उन्होंने गरीब, बेसहारा, कमजोर और भूखे लोगों की सेवा को अपने जीवन का परम कर्तव्य माना। अहिंसा और सत्य के साथ गांधी का जितना अटूट नाता रहा है, सेवा के साथ भी उनका उतना ही अनन्य, अटूट नाता रहा। जिस किसी को जब भी जहां जरूरत पड़ी, महात्मा गांधी सेवा के लिए मौजूद रहे। उन्होंने न केवल सेवा पर बल दिया, बल्कि उसके साथ जुड़े आत्मसुख पर भी जोर दिया। सेवा शब्द की सार्थकता इसी अर्थ में है कि उसे आनंद के साथ किया जाए।
          इस महत्वपूर्ण वर्ष में जब हम महात्मा गांधी को याद कर रहे हैं, उनकी सार्धशती को उत्साहित होकर मना रहे हैं, तब सेवा को अपने आचरण में उतारना ही गांधीजी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। सेवा कोई कठिन कार्य नहीं है, बल्कि बहुत सहज है। अपने सामथ्र्य के अनुसार हम छोटे-छोटे उपक्रम करके सेवा कर सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने अनेक उपक्रम बताए ही हैं। अपने स्तर पर बहुत से लोग सेवा कार्य कर भी रहे हैं। देश में जब भी निस्वार्थ सेवा कार्यों की चर्चा चलती है तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उल्लेख अवश्य होता है/ होना भी चाहिए। संघ की प्रेरणा से देशभर में अनेक समविचारी संगठन और स्वयंसेवक डेढ़ लाख से अधिक सेवा प्रकल्प संचालित कर रहे हैं। सेवा कार्यों से समाज में क्या बदलाव आए हैं, उनकी प्रेरक कहानियां सेवागाथा डॉट ओआरजी पर पढ़ी जा सकती हैं। संघ के स्वयंसेवकों ने सेवा को अपने जीवन में उतार लिया है, सेवा कार्य करते हुए वह एक गीत भी गाते हैं- “सेवा है यज्ञ कुंड, समिधा सम हम जलें।” हमारे जीवन में ‘सेवा’ किस ‘भाव’ से आनी चाहिए, उसको यह गीत स्पष्ट रूप में बताता है।

बुधवार, 17 जनवरी 2018

भारतीयता की प्रचारक हैं प्रार्थनाएं

 देश  के लगभग एक हजार केंद्रीय विद्यालयों में पढऩे वाले विद्यार्थियों को संस्कृत और हिंदी में प्रार्थना कराई जाती हैं। वर्षों से यह प्रार्थनाएं हो रही हैं। परंतु, आज तक देश में कभी विद्यालयों में होने वाली प्रार्थनाओं पर विवाद नहीं हुआ। कभी किसी को ऐसा नहीं लगा कि प्रार्थनाओं से किसी धर्म विशेष का प्रचार होता है। न ही कभी किसी को यह लगा कि इन प्रार्थनाओं से संविधान की अवमानना हो रही है। यहाँ तक कि केंद्रीय विद्यालय में पढऩे वाले मुस्लिम और ईसाई विद्यार्थियों एवं उनके अभिभावकों ने भी कभी प्रार्थनाओं पर आपत्ति दर्ज नहीं कराई। विद्यालय में पढ़ाने वाले मुस्लिम और ईसाई शिक्षकों को भी कभी ऐसा नहीं लगा कि प्रार्थनाएं किसी धर्म का प्रचार कर रही हैं। किन्तु, अब अचानक से एक व्यक्ति (निश्चित तौर पर उसके साथ भारत विरोधी विचारधारा होगी) को यह प्रार्थनाएं असंवैधानिक दिखाई देने लगी हैं। विनायक शाह नाम के मूढ़ व्यक्ति ने याचिका दाखिल कर कहा है कि केंद्रीय विद्यालयों में 1964 से हिंदी-संस्कृत में सुबह की प्रार्थना हो रही हैं, जो कि पूरी तरह असंवैधानिक हैं। याचिकाकर्ता ने इसे संविधान के अनुच्छेद 25 और 28 के विरुद्ध बताते हुए कहा है कि इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती है। एक ओर न्यायालय में अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे सुनवाई की प्रतीक्षा कर रहे हैं, वहीं माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 'प्रार्थनाओं' को संवैधानिक मुद्दा मान कर उक्त याचिका पर विचार करना आवश्यक समझ लिया है। बड़ी तत्परता दिखाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और केंद्रीय विद्यालय संगठन से इस संबंध में जवाब माँगा है।

रविवार, 3 सितंबर 2017

संस्कार की पाठशाला हैं महिलाएं एवं बुजुर्ग

हिन्दू गर्जना में प्रकाशित लेख
 भारतीय  परंपरा में परिवार व्यवस्था अद्धितीय है। हम जानते हैं कि किसी भी व्यक्ति की पहली गुरु माँ और पहली पाठशाला परिवार होता है। परिवार संस्कार की पाठशाला है। परिवार में व्यक्ति का सामाजिक शिक्षण होता है। यहाँ हम जीवनमूल्य सीखते हैं। भारतीयता की धुरी परिवार अपने ढंग से मनुष्य को त्याग, सहयोग, सम्मान, दुलार, आत्मीयता, कर्तव्य और अनुशासन इत्यादि का पाठ पढ़ाते हैं। लेकिन, हमारा दुर्भाग्य है कि विरासत में प्राप्त अपनी सबसे बड़ी और सुघड़ रचना को हम छिन्न-भिन्न कर रहे हैं। हम अपने शिक्षा के सबसे बड़े केंद्र को ध्वस्त करने में व्यस्त हैं। आज समाज में हम मानवीयता का जो अवमूल्यन देख रहे हैं, उसका सबसे बड़ा कारण है परिवार व्यवस्था का कमजोर होना। जब हम भारत के प्राचीन इतिहास के पन्ने पलटने बैठते हैं, तब हमें ध्यान आता है कि हमारे यहाँ महिलाओं और बुजुर्गों का अत्यधिक सम्मान था। उनका अपमान तो बहुत दूर की बात थी, उनकी अनदेखी भी संभव नहीं थी। घर में उनका शीर्ष स्थान था। उनकी देखरेख में ही परिवार का संचालन होता था। लेकिन, आज इस प्रकार के परिवार की कल्पना भी मुश्किल है। हालाँकि हमारी परिवार व्यवस्था कमजोर जरूर हुई है, लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। हमारी संस्कृति की ताकत है कि वह अनेक झंझावात सहकर भी अपने संस्कारों को बचाते हुए गतिमान है।

शनिवार, 29 अगस्त 2015

मूल्य खोकर क्या पाया हमने?

 स नसनीखेज शीना बोरा हत्याकांड ने भारतीय समाज को सोचने का अवसर दिया है कि वह किस तरफ आगे बढ़ रहा है। रिश्तों में खोखलापन, झूठ की बुनियाद पर टिके रिश्ते, विवाह को खेल बना देना, रिश्तों में जिम्मेदारी से ऊपर हावी व्यक्तिगत सोच ने हमें कहां लाकर पटक दिया है? क्या यह आधुनिकता है? आधुनिक होने के लिए क्या भारतीय मूल्यों को छोडऩा जरूरी है? अपने चिर-पुरातन और जीवन को संयमित करने वाले संस्कारों के साथ हम आधुनिक नहीं हो सकते? एक बड़ा सवाल है आखिर तथाकथित प्रगतिशीलता की दौड़ में अपने मूल्यों को खोकर हमने क्या पाया है? चमकती दुनिया में रहने वाली इंद्राणी मुखर्जी की कहानी आज बहुत से परिवारों का यथार्थ है। जहां हर कोई अपने कर्तव्य-जिम्मेदारी निभाने में असफल हैं। रिश्ते दिखावटी अधिक हैं। उनमें मिठास नहीं है, संवेदनाएं नहीं हैं, जीवतंता नहीं है। चमकती दुनिया के पीछे कितना गहन अंधकार पसरा रहता है, इसके कई उदाहरण शीना बोरा हत्याकांड प्रकरण से उजागर हो रहे हैं। एक घर में, एक छत के नीचे रहते हुए एक-दूसरे से अजनबी हैं। एक-दूसरे के जीवन की दिशा का पता नहीं है और जब पता चलता है तब रिश्तों को तार-तार कर देने वाला विस्फोट होता है। कितने आश्चर्य और चिंता की बात है कि समाज तो क्या घर में ही किसी को पता नहीं होता है कि शीना बोरा और इंद्राणी मुखर्जी का रिश्ता क्या है?