गुरुवार, 24 मई 2018

चर्च की राजनीति-2

भारतीय राजनीति में चर्च का अनुचित हस्तक्षेप
राष्ट्रवाद, पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र पर चर्च का हमला
 यह  विचार करने की बात है कि चर्च को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की सरकार से क्या दिक्कत हो रही है कि पादरियों ने सियासी पत्राचार प्रारंभ कर दिया है। ईसाई संप्रदाय में प्रमुख स्थान रखने वाले आर्कबिशप (प्रधान पादरी) भाजपा सरकार के विरुद्ध खुलकर दुष्प्रचार कर रहे हैं। सबसे पहले गुजरात चुनाव में आर्कबिशप थॉमस मैकवान ने चिट्ठी लिखकर ईसाई समुदाय के लोगों से अपील की है कि वे गुजरात चुनाव में 'राष्ट्रवादी ताकतों' को हराने के लिए मतदान करें। इसके बाद मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा में भी भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए चर्च सक्रिय हुआ। कर्नाटक भी चर्च की राजनीति से अछूता नहीं रहा। अब दिल्ली के आर्कबिशप अनिल काउटो ने अन्य पादरियों को पत्र लिखकर अपील की है- ‘हम एक अशांत राजनैतिक वातावरण देख रहे हैं जो हमारे संविधान में निहित लोकतांत्रिक सिद्धांतों तथा हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के लिए खतरा है। देश तथा राजनेताओं के लिए हमेशा प्रार्थना करना हमारी प्रतिष्ठित परंपरा है, लेकिन आम चुनाव की ओर बढ़ते हुए यह और भी ज़रूरी हो जाता है। अब जब हम 2019 की ओर देखते हैं, जब हमारे पास नई सरकार होगी, तो आइए हम देश के लिए 13 मई से शुरू करते हैं एक प्रार्थना अभियान…’

मंगलवार, 22 मई 2018

सरकार और जनता के साझे प्रयास से स्वच्छता में सिरमौर बनता मध्यप्रदेश

 मध्यप्रदेश  की औद्योगिक राजधानी इंदौर और प्रशासनिक राजधानी भोपाल ने स्वच्छता सर्वेक्षण में क्रमश: प्रथम और द्वितीय स्थान प्राप्त कर एक सकारात्मक और अनुकरणीय संदेश दिया है। यह लगातार दूसरा वर्ष है जब सबसे साफ शहरों की सूची में इंदौर और भोपाल सबसे ऊपर हैं। पिछले वर्ष भी इंदौर पहले स्थान पर था और भोपाल दूसरे स्थान पर। दोनों शहरों ने अपना स्थान बरकरार रखा है। हमें याद करना होगा कि इससे पहले दोनों शहर स्वच्छता सर्वेक्षण की सूची के अंतिम हिस्से में थे। किंतु, बाद में जनता ने संकल्प लेकर स्वच्छता को अपनी आदत बना लिया। प्रशासन ने भी आवश्यक व्यवस्था उपलब्ध कराने में सक्रियता और गंभीरता से कार्य किया। परिणाम हमारे सामने हैं, मध्यप्रदेश के दो बड़े शहर स्वच्छ शहरों की सूची में शीर्ष पर सुशोभित हैं। यह सब संभव हुआ सरकार और जनता के साझे प्रयास से। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान ने स्वच्छता के मामले में भारत की तस्वीर बदल दी है। 'स्वच्छ भारत अभियान' प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विशेष उपलब्धि में गिना जाएगा।

सोमवार, 21 मई 2018

जरा सोचिए, लोकतंत्र जीता, या फिर हारा

 कर्नाटक  के राजनीतिक 'नाटक' का फिलहाल पटाक्षेप हो चुका है। हालाँकि, चुनाव परिणाम बाद मजबूरी और भाजपा विरोध में जिस प्रकार का गठबंधन हुआ है, उसके कारण निकट भविष्य में भी 'उठा-पटक' की आशंका बनी हुई है। भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस ने उस पार्टी (जनता दल सेक्युलर) को समर्थन दिया है, जिस पर चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी 'जनता दल (संघ)' कह कर हमला किया था। संघ के प्रति राहुल गांधी का दुराग्रह जगजाहिर है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति वह यहाँ तक द्वेष से भरे हुए हैं कि संघ की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए अनर्गल और झूठ बोलने में भी संकोच नहीं करते हैं।

शनिवार, 19 मई 2018

कांग्रेस अपने गिरेबां में भी तो झांके

 पूर्व  प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह सहित कांग्रेस के दूसरे नेताओं ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को चिट्ठी लिखकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भाषण-शैली पर आपत्ति दर्ज कराई है। कर्नाटक के हुबली में दिए गए भाषण को आधार बनाकर पत्र में उन्होंने राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि वह प्रधानमंत्री को कांग्रेस नेताओं या अन्य किसी पार्टी के लोगों के खिलाफ अवांछित और धमकाने वाली भाषा का इस्तेमाल करने से रोकें। इसके साथ ही डॉ. मनमोहन सिंह और अन्य नेताओं ने आरोप लगाया कि नरेंद्र मोदी का व्यवहार प्रधानमंत्री पद की मर्यादा के अनुकूल नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह लोकतांत्रिक व्यवस्था में भाषा की मर्यादा और संयम पर चिंतित हो रहे हैं, यह अच्छी बात है। राजनेताओं को अपने प्रतिद्वंद्वी नेताओं के प्रति मर्यादित भाषा का उपयोग करना चाहिए। देश का सामान्य व्यक्ति भी यही मानता है और चाहता है कि हमारे नेता भाषा में संयम बनाएं। किंतु,  विचार करने की बात यह है कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेसी नेताओं को अब जाकर यह चिंता हुई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भाषण-शैली पर आपत्ति दर्ज कराने वाले पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेसी नेता क्या अपने वक्तव्यों के लिए खेद प्रकट करेंगे? कांग्रेस ने नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध जिस प्रकार के अपशब्दों को उपयोग किया है, क्या उन सबके लिए मनमोहन सिंह खेद प्रकट करेंगे?

रविवार, 13 मई 2018

राहुल गांधी देख रहे हैं एक हसीन ख्वाब

 कांग्रेस  के अध्यक्ष राहुल गांधी ने अंतत: अपने मन की इच्छा देश की जनता के सामने खुलकर प्रकट कर दी है। कर्नाटक चुनाव प्रचार के दौरान पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने साफ कहा कि यदि 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस बड़ी पार्टी बन कर सामने आती है, तो वह प्रधानमंत्री बनना चाहेंगे। राहुल गांधी की इस स्वाकारोक्ति में कुछ भी आश्चर्य जैसा नहीं है। सब जानते हैं कि राहुल गांधी भारत का प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखते हैं। नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य होने के नाते उनकी स्वाभाविक सोच यही है कि भारत का प्रधानमंत्री बनना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के आपत्तिजनक बयान 'देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है' की तर्ज पर राहुल गांधी के मन में यह बात गहरे बैठी है कि 'कांग्रेस की ओर से संगठन और सत्ता के शीर्ष पद पर पहला हक उनके परिवार का है।'

शुक्रवार, 11 मई 2018

झूठ क्यों बोलते हैं राहुल गांधी?

 कांग्रेस  के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी और उनके राजनीतिक सलाहकारों का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंध में अध्ययन ठीक नहीं है। इसलिए जब भी राहुल गांधी संघ के संबंध में कोई टिप्पणी करते हैं, वह बेबुनियाद और अतार्किक होती है। संघ के संबंध में वह जो भी कहते हैं, सत्य उससे कोसों दूर होता है। एक बार फिर उन्होंने संघ के संबंध में बड़ा झूठ बोला है। अब तक संघ की नीति थी कि वह आरोपों पर स्पष्टीकरण वक्तव्य से नहीं, अपितु समय आने पर अपने कार्य से देता था। संचार क्रांति के समय में संघ ने अपनी इस नीति को बदल लिया है। यह अच्छा ही है। वरना, इस समय झूठ इतना विस्तार पा जाता है कि वह सच ही प्रतीत होने लगता है। झूठ सच का मुखौटा ओढ़ ले, उससे पहले ही उसके पैर पकड़ कर पछाडऩे का समय आ गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंध में राहुल गांधी के हालिया बयान पर संघ ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है।

रविवार, 6 मई 2018

कौन हैं भारत में जिन्ना के प्रेमी?

 अलीगढ़  मुस्लिम विश्वविद्यालय में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर क्यों लगाई गई है? यह प्रश्न बहुत वाजिब है। यह आश्चर्य का विषय भी है कि स्वतंत्रता के इतने वर्ष बाद तक भारत विभाजन के प्रमुख गुनहगारों में शामिल जिन्ना की तस्वीर एक शिक्षा संस्थान में सुशोभित हो रही है। मोहम्मद अली जिन्ना सिर्फ भारत विभाजन का ही गुनहगार नहीं है, बल्कि हजारों लोगों की हत्या का भी दोषी है। भाजपा के सांसद सतीश गौतम ने विश्वविद्यालय के उपकुलपति तारिक मंसूर को पत्र लिखकर उचित ही प्रश्न पूछा है कि क्या मजबूरी है कि जिन्ना की तस्वीर विश्वविद्यालय में लगाई गई है? उन्होंने पत्र में यह भी कहा है कि अगर वह विश्वविद्यालय में कोई तस्वीरें लगाना चाहते हैं तो उन्हें महेंद्र प्रताप सिंह जैसे महान लोगों की तस्वीर संस्थान में लगानी चाहिए, जिन्होंने विश्वविद्यालय बनाने के लिए अपनी जमीन दान में दी थी।

बुधवार, 2 मई 2018

पत्रकारिता के दार्शनिक आयाम का आधार है 'आदि पत्रकार नारद का संचार दर्शन'

 भारत  में प्रत्येक विधा का कोई न कोई एक अधिष्ठाता है। प्रत्येक विधा का कल्याणकारी दर्शन है। पत्रकारिता या कहें संपूर्ण संचार विधा के संबंध में भी भारतीय दर्शन उपलब्ध है। देवर्षि नारद का संचार दर्शन हमारे आख्यानों में भरा पड़ा है। हाँ, यह और बात है कि वर्तमान में संचार के क्षेत्र में 'भारतीय दर्शन' की उपस्थिति दिखाई नहीं देती है। उसका एक कारण तो यह है कि लंबे समय तक संचार माध्यमों पर कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों को दबदबा रहा है। यह उजागर तथ्य है कि कम्युनिस्टों को 'भारतीय दर्शन' स्वीकार नहीं, वह प्रत्येक विधा को कार्ल मार्क्स या फिर विदेशी विचारकों के चश्मे से देखते हैं। अब यह स्थिति बदल रही है। देशभर में विभिन्न विषयों को भारतीय दृष्टिकोण से देखने की एक परंपरा विकसित हो रही है। उन लोगों को प्रोत्साहन मिल रहा है, जो ज्ञान-विज्ञान एवं संचार विषयों में भारतीय पहलू की पड़ताल कर रहे हैं। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के मालवीय पत्रकारिता संस्थान के निदेशक प्रो. ओम प्रकाश सिंह ने देवर्षि नारद को शोध का विषय बनाकर संचार के भारतीय दर्शन को सामने लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है। देवर्षि नारद पर गहन अध्ययन के बाद संचार के भारतीय पक्ष पुस्तक 'आदि पत्रकार नारद का संचार दर्शन' के रूप में हमारे सामने आया है। यह पुस्तक निश्चित तौर पर भारतीय पत्रकारिता को एक दिशा देने का कार्य कर सकती है।

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