भारत के लोगों ने संगीतकार एआर रहमान को वर्षों बिना किसी भेदभाव के अथाह प्रेम दिया है, जबकि सबको पता है कि रहमान कन्वर्टेड मुसलमान हैं। आज तक किसी ने भी रहमान को लेकर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की है। परंतु, रहमान ने खुद ही स्वयं को लेकर विवाद खड़ा कर लिया है। एक विदेशी मीडिया संस्थान को दिए गए साक्षात्कार में उनका यह कहना कि बॉलीवुड में उन्हें काम न मिलने की वजह ‘सांप्रदायिक’ हो सकती है, बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निराशाजनक है। जिस कलाकार को पूरे देश ने बिना किसी धर्म या जाति के भेदभाव के, आंखों पर बिठाया हो, ऐसी विक्टिम हुड (पीड़ित भाव) की बातें करना उनकी गरिमा के अनुकूल नहीं है। एक प्रकार से कहना होगा कि रहमान के मन में ही कहीं सांप्रदायिक सोच बैठी हुई थी, जो अब जाकर सामने आई है। रहमान जैसे लोगों को इसका जवाब भी देना चाहिए कि अनेक हिन्दू संगीतकार भी बॉलीवुड से बाहर हो चुके हैं, उसका कारण क्या है? क्या उन्हें भी मुस्लिम गिरोहबंदी के कारण काम मिलना बंद हुआ है? भारतीय सिनेमा में मुस्लिम कलाकारों का जिस प्रकार का वर्चस्व है, वह किसी से छिपा नहीं है। इसके बाद भी रहमान हिन्दुओं के माथे पर सांप्रदायिका का लेबल चस्पा करने की कोशिश करे रहे हैं, तो इसे एक प्रकार से बेईमानी ही कहना चाहिए।
मंगलवार, 20 जनवरी 2026
गुरुवार, 5 सितंबर 2024
फिल्मकारों की चालाकियां का उदाहरण है ‘आईसी814- द कंधार हाईजैक’
ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर हाल ही में जारी हुई वेबसीरीज ‘आईसी814- द कंधार हाईजैक’ को लेकर देशभर में बहस छिड़ी हुई है। दरअसल, पूरी वेबसीरीज में आतंकियों के वास्तविक नामों की जगह उनके कोडनेम का इस्तेमाल किया गया है। भारतीय वायुसेना की उड़ान संख्या-आईसी814 का हाईजैक करनेवाले आतंकियों ने अपने वास्तविक नाम एवं पहचान छिपाने के लिए बर्गर, चीफ, शंकर और भोला जैसे कोडनेम रखे थे। वेबसीरीज के निर्माता ने इस तथ्य का गलत ढंग से उपयोग करते हुए आतंकियों की पहचान इन्हीं नामों से स्थापित करने का प्रयास किया। हालांकि फिल्म के अंत में आतंकियों के वास्तविक नामों का उल्लेख किया गया है। हम सब जानते हैं कि फिल्म समाप्त होने के बाद आनेवाली जानकारियों को आमतौर पर दर्शक पढ़ते नहीं है। ऐसे में वेबसीरीज के दर्शकों के मन में यह बात बैठ जाती कि आतंकियों में हिन्दू ‘भोला’ और ‘शंकर’ भी शामिल थे। उल्लेखनीय है कि भारत में इस्लामिक आतंकवाद के बचाव में और हिन्दुओं को बदनाम करने की नीयत से ‘हिन्दू आतंकवाद’ की फर्जी अवधारणा को स्थापित करने के लिए अनेक प्रकार की साजिशें हो चुकी हैं। हिन्दुओं की छवि खराब करने की दिशा में ही फिल्म निर्माताओं की इस कलाकारी को देखना चाहिए।
शुक्रवार, 29 मार्च 2024
‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर’ को साकार करने में सफल रहे रणदीप हुड्डा
स्वातंत्र्यवीर सावरकर पर रणदीप हुड्डा ने बेहतरीन फिल्म बनाई है। सच कहूं तो यह फिल्म से कहीं अधिक है। सिनेमा का पर्दा जब रोशन होता है तो आपको इतिहास के उस हिस्से में ले जाता है, जिसको साजिश के तहत अंधकार में रखा गया। भारत की स्वतंत्रता के लिए हमारे नायकों ने क्या कीमत चुकाई है, यह आपको फिल्म के पहले फ्रेम से लेकर आखिरी फ्रेम तक में दिखेगा। अच्छी बात यह है कि रणदीप हुड्डा ने उन सब प्रश्नों पर भी बेबाकी से बात की है, जिनको लेकर कम्युनिस्ट तानाशाह लेनिन–स्टालिन की औलादें भारत माता के सच्चे सपूत की छवि पर आघात करती हैं। कथित माफीनामे से लेकर 60 रुपए पेंशन तक, प्रत्येक प्रश्न का उत्तर फिल्म में दिया गया है। वीर सावरकर जन्मजात देशभक्त थे। चाफेकर बंधुओं के बलिदान पर किशोरवय में ही वीर सावरकर ने अपनी कुलदेवी अष्टभुजा भवानी के सामने भारत की स्वतंत्रता का संकल्प लिया। अपने संकल्प को साकार करने के लिए किशोरवय में ही ‘मित्र मेला’ जैसा संगठन प्रारंभ किया। क्रांतिकारी संगठन ‘अभिनव भारत’ की नींव रखी। विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। अंग्रेजों को उनकी ही भाषा में उत्तर देने के लिए लंदन जाकर वकालत की पढ़ाई की। हालांकि क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण अंग्रेजों ने उन्हें डिग्री नहीं दी। ब्रिटिश शासन के घर ‘लंदन’ में किस प्रकार वीर सावरकर ने अंग्रेजों को चुनौती दी, इसकी झलक भी फिल्म में दिखाई देती है। नि:संदेह, वीर सावरकर के महान व्यक्तित्व के संबंध में फिल्म न्याय करने में सफल हुई है।
गुरुवार, 14 मार्च 2024
सच का सामना करने की है दम तो देखिए- बस्तर : द नक्सल स्टोरी
कम्युनिस्टों की हिंसक एवं क्रूर विचारधारा एवं भारत विरोधी सोच को उजागर करती है सुदीप्तो सेन की फिल्म
‘द केरल स्टोरी’ के बाद सुदीप्तो सेन ने फिल्म ‘बस्तर: द नक्सल स्टोरी’ के माध्यम से एक और आतंकवाद को, उसके वास्तविक रूप में, सबके सामने रखने का साहसिक प्रयास किया है। भारत में कम्युनिस्ट, नक्सल और माओवाद (संपूर्ण कम्युनिस्ट परिवार) के खून से सने हाथों एवं चेहरे को छिपाने का प्रयास किया जाता रहा है। लेफ्ट लिबरल का चोला ओढ़कर अकादमिक, साहित्यक, कला-सिनेमा एवं मीडिया क्षेत्र में बैठे अर्बन नक्सलियों ने कहानियां बनाकर हमेशा लाल आतंक का बचाव किया और उसकी क्रांतिकारी छवि प्रस्तुत की। जबकि सच क्या है, यही दिखाने का काम ‘बस्तर : द नक्सल स्टोरी’ ने किया है। फिल्म संवेदनाओं को जगाने के साथ ही आँखों को भिगो देती हैं। फिल्म जिस दृश्य के साथ शुरू होती है, वह दर्शकों को हिला देता है। जब मैं ‘बस्तर’ की विशेष स्क्रीनिंग देख रहा था, तब मैंने देखा कि अनेक महिलाएं एवं युवक भी पहले ही दृश्य को देखकर रोते हुए सिनेमा हॉल से बाहर निकल गए। जरा सोचिए, हम जिस दृश्य को पर्दे पर देख नहीं पा रहे हैं, उसे एक महिला और उसकी बेटी ने भोगा है। फिल्म में कुछ दृश्य विचलित कर सकते हैं। यदि उन दृश्यों को दिखाया नहीं जाता, तो दर्शक कम्युनिस्टों की हिंसक मानसिकता का अंदाजा नहीं लगा सकते थे। 76 जवानों को जलाकर मारने की घटना का चित्रांकन, कुल्हाड़ी से निर्दोष वनवासियों की हत्या करने के दृश्य, मासूम बच्चों को उठाकर आग में फेंक देने की घटना, यह सब देखने के लिए दम चाहिए। यह फिल्म अधिक से अधिक लोगों को देखनी एवं दिखायी जानी चाहिए। सुदीप्तो सेन को सैल्यूट है कि उन्होंने बेबाकी से लाल आतंक के सच को दिखाया है। हालांकि, कम्युनिस्ट हिंसा की और भी क्रूर कहानियां हैं, जिन्हें दिखाया जाना चाहिए था लेकिन फिल्म में समय की एक मर्यादा है। अपेक्षा है कि सुदीप्तो इस पर एक वेबसीरीज लेकर आएं।
शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2023
गो-वर : पर्यावरण एवं मानवता के लिए गाय का वरदान
गाय के महत्व को रेखांकित करती फिल्म
‘बाचा: द राइजिंग विलेज’ को मिली सराहना के बाद हमारे समूह का उत्साह बढ़ा। अब हम नये वृत्तचित्र के लिए नयी कहानी खोज रहे थे। एक कार्यक्रम के निमित्त भोपाल स्थित शारदा विहार आवासीय विद्यालय जाना हुआ। वहां कई कहानियां थीं, जिन्हें हम सुना सकते थे। भौतिकी की खुली प्रयोगशाला में नवाचार दिखा, ध्यान के लिए बनाया गया एक विशेष मंडप में भारतीय ज्ञान–परंपरा की झलक थी, शिक्षा की भारतीय पद्धति का महत्व भी ध्यान में आ रहा था। परंतु हमने चुनी गोशाला।
तथाकथित प्रगतिशील गाय–गोबर का जितना चाहे उपहास उड़ाएं, लेकिन शारदा विहार, भोपाल स्थित ‘कामधेनु गोशाला एवं गोविज्ञान अनुसंधान केंद्र’ अपने प्रयोगों से गाय की महत्ता सिद्ध कर रहा है। परंपरागत और आधुनिक विज्ञान के सहयोग से इस प्रकल्प ने सिद्ध किया है कि भारत में गाय न केवल आर्थिक विकास की धुरी है अपितु पर्यावरण को संभालने में भी उपयोगी है। उल्लेखनीय है कि हमारी बदली हुई जीवनशैली के कारण पर्यावरण संरक्षण दुनिया का ज्वलंत मुद्दा बन गया है। तेजी से कटते जंगल, प्रदूषित होती हवा, जल संकट और ऊर्जा-ईंधन चिंता के कारण बन गए हैं। जब हम इन सब समस्याओं का समाधान तलाशते हैं, तो भारतीय जीवन शैली में ही एक उम्मीद की किरण नजर आती है और इस दिशा में हमारा विश्वास पक्का किया है- ‘कामधेनु गोशाला एवं गोविज्ञान अनुसंधान केंद्र’ ने।
शनिवार, 13 मई 2023
द केरल स्टोरी : प्रतिबंध लगाकर सच को नहीं दबा पाएंगे
गुरुवार, 4 मई 2023
‘द केरल स्टोरी’ से सामने आए कई सच
लव जिहाद, कन्वर्जन, आतंकवाद और सांप्रदायिकता के मुद्दे पर बनी फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ को लेकर तथाकथित प्रगतिशील, मार्क्सवादी, माओवादी, लेनिनवादी और उनके साथ में तथाकथित सेकुलर बुद्धिजीवी हो-हल्ला मचा रहे हैं। फिल्म को दर्शकों तक पहुँचने से रोकने के लिए इस वर्ग ने एड़ी-चोटी का जोर लगा लिया है। फिल्म दर्शकों के सामने न जाए इसलिए इस पर रोक लगाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में अपील की गई। अच्छी बात यह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने सभी प्रकार के कुतर्कों को रद्द करते हुए ‘द केरल स्टोरी’ पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। कुल मिलाकर फिल्म अभी आई भी नहीं है, उससे पहले ही उसने तथाकथित सेकुलर गिरोह की कलई खोलकर रख दी है। अभिव्यक्ति और सिनेमाई स्वतंत्रता का झंडाबरदार यह समूह वास्तव में असहिष्णु और तानाशाही है। यह समूह वास्तव में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्षधर नहीं अपितु उसका विरोधी है।
रविवार, 4 दिसंबर 2022
जम्मू-कश्मीर में हिन्दुओं के नरसंहार को नकारनेवालों की मानसिकता है ‘वल्गर’
गोवा में आयोजित भारत के अंतरराष्ट्रीय फिल्म उत्सव (आईएफएफआई) के समापन समारोह में इजराइल मूल के फिल्म निर्माता नदव लैपिड ने फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ के संबंध में आपत्तिजनक टिप्पणी करके इस्लामिक आतंकवाद की क्रूरता का शिकार हुए हिन्दुओं के घावों पर नमक छिड़कने का काम किया। लैपिड इस आयोजन के निर्णायक मंडल के अध्यक्ष थे। फिल्म को लेकर की गई टिप्पणी में शब्दावली का चयन बता रहा है कि वह किसी खास विचार से प्रेरित हैं और ‘द कश्मीर फाइल्स’ पर जानबूझकर टिप्पणी की है। अपनी टिप्पणी में उन्होंने कहा कि फिल्म उत्सव में इस फिल्म की स्क्रीनिंग को देखकर वे परेशान हुए और उन्हें झटका लगा। यह फिल्म वल्गर और प्रोपेगंडा है। यकीनन फिल्म देखकर लैपिड को झटका लगा होगा, वह क्रूरता के दृश्य देखकर परेशान भी हो गए होंगे, क्योंकि दृश्य परेशान करनेवाले और दिल-दिमाग को हिला देनेवाले ही हैं। भारत में पहली बार किसी फिल्म निर्माता ने साहस दिखाकर जम्मू-कश्मीर में हुए हिन्दुओं के नरसंहार को सामने लाने का काम किया है।
गुरुवार, 17 मार्च 2022
अब तक बीती नहीं है, 19 जनवरी की वह रात
जम्मू-कश्मीर में हुए हिन्दुओं के नरसंहार को सप्रमाण प्रस्तुत करनेवाली फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ भारतीय सिनेमा के लिए एक मील का पत्थर है। जम्मू-कश्मीर को केंद्र में रखकर पहले भी फिल्में बनती रही हैं लेकिन उनमें सच कभी नहीं दिखाया गया बल्कि सच पर पर्दा डालने के प्रयास ही अधिक हुए। निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री ने हिन्दुओं के नरसंहार को दिखाने का साहस जुटाया है। एक-एक व्यक्ति यह बात कर रहा है कि आज देश में राष्ट्रीय विचार की सरकार नहीं होती तो 30 वर्ष बाद भी यह सच इस तरह सामने नहीं आ पाता। न तो कोई निर्देशक इस तरह की फिल्म बनाने की कल्पना कर पाता और यदि कोई बना भी लेता, तब उसका प्रदर्शन संभव न हो पाता। जिस तरह से तथाकथित सेकुलर खेमा, कांग्रेस समर्थक बुद्धिजीवी और अन्य लोग ‘द कश्मीर फाइल्स’ का विरोध कर रहे हैं, उसे देखकर आमजन की यह आशंका सही नजर आती है। सोचिए न कि 30 वर्ष पुराने इस भयावह घटनाक्रम की कितनी जानकारी लोगों को है? कितने लोगों को पता था कि हिन्दुओं को भगाने के लिए कश्मीर की मस्जिदों से सूचनाएं प्रसारित की गईं। ‘यहां क्या चलेगा, निजाम-ए-मुस्तफा’, ‘कश्मीर में अगर रहना है, अल्लाहू अकबर कहना है’ और ‘असि गछि पाकिस्तान, बटव रोअस त बटनेव सान मतलब हमें पाकिस्तान चाहिए और हिंदू औरतें भी मगर अपने मर्दों के बिना’। यह धमकी भरे संदेश लगातार प्रसारित किए जा रहे थे। कश्मीरी हिन्दुओं के घरों पर पर्चे चिपका दिए गए। ‘कन्वर्ट हो जाओ, भाग जाओ या मारे जाओ’ इनमें से एक ही रास्ता चुनने का विकल्प हिन्दुओं के पास था। महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म और उसके बाद नृशंस ढंग से हत्याएं करने की जानकारी कितनों को थी? महिलाओं को पति के रक्त से सने चावल खाने के लिए मजबूर किया गया। ये घटनाएं एक-दो नहीं थी, अनेक थीं।
शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021
सिनेमा के निशाने पर हिन्दू संस्कृति
फिल्म निर्माता प्रकाश झा की विवादित वेबसीरीज ‘आश्रम’ के कारण एक बार फिर आम समाज में यह विमर्श चल पड़ा है कि सिनेमाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं रचनाधर्मिता के निशाने पर हिन्दू संस्कृति ही क्यों रहती है? फिल्मकार अन्य संप्रदायों पर सिनेमा बनाने का साहस क्यों नहीं कर पाते हैं? हिन्दू संस्कृति एवं प्रतीकों को ही अपनी तथाकथित रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए चुनने के पीछे का एजेंडा क्या है? मुस्लिम कलाकार भी अपने धर्म की आलोचनात्मक प्रस्तुति करने की जगह हिन्दू धर्म पर ही व्यंग्य करना पसंद करता है। पिछले दिनों एम्स दिल्ली के विद्यार्थियों ने भी रामलीला का आपत्तिजनक मंचन किया, जिसका निर्देशन शोएब नाम के लड़के ने किया था। हिन्दू बार-बार इन प्रश्नों के उत्तर माँगता है, लेकिन उसको कभी भी समाधानमूलक उत्तर मिले नहीं। परिणामस्वरूप अपमानजनक एवं उपेक्षित परिस्थितियों और चयनित आलोचना एवं चुप्पी ने उसके भीतर आक्रोश को जन्म देना प्रारंभ कर दिया है।
गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016
पाकिस्तानी कलाकारों से इतना प्रेम क्यों?
शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015
माफी मांगी, लेकिन बाकि है अकड़
सोमवार, 21 सितंबर 2015
एक अभिनेता का संवेदनशील होना
शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014
वोट बड़ा या नोट
गुरुवार, 4 अप्रैल 2013
मनुष्य जाति में स्त्री सबसे ज्यादा कामुक?
स्त्रीत्व का निरादर : बॉडी स्प्रे की खुशबू से मदहोश होकर सारी वर्जनाएं तोड़कर युवक के पीछे युवती का चले आना, बिस्तर से अंतवस्त्रों को उतार फेंकना। कपड़े (जींस) के विज्ञापन में नग्न पुरुषों को दिखाना। यहां भी उक्त कंपनी के जींस पहनने के बाद पुरुषों का संसर्ग पाने के लिए स्त्री को लंपट होते दिखाया गया है। डर्टी विज्ञापन नग्नता ही नहीं परोस रहे बल्कि स्त्री अस्मता से भी खिलवाड़ कर रहे हैं। यह अधिक चिंता की बात है। डर्टी कैटेगरी के सभी विज्ञापन यही दिखाते हैं कि मनुष्य जाति में स्त्री सबसे ज्यादा कामुक है। काम इच्छाओं पर उसका जोर नहीं, वह इनके आगे हार जाती है। स्त्री की सोच सेक्स से शुरू होकर सेक्स पर ही खत्म हो जाती है। डर्टी विज्ञापन में भारत में शीर्ष पर बैठी स्त्री को दोयम दर्जे पर धकेलने का षड्यंत्र साफ दिखता है।
सकारात्मकता ही है हिट फार्मूला : सामान बेचने के लिए डर्टी विज्ञापन ही एकमात्र सफल फार्मूला नहीं है। निरमा, एमडीएच मसाला, टाटा चाय, बजाज स्कूटर सहित कई उदाहरण हैं। इन कंपनियों के ऐसे कई विज्ञापन हैं जो इतिहास के पृष्ठ पर स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गए हैं। एक भी डर्टी विज्ञापन उतना बड़ा हिट नहीं हुआ जितना कि ये साफ-सुथरे विज्ञापन रहे। आजकल प्रसारित हो रहा चाय कंपनी का विज्ञापन - देश उबल रहा है। उबलेगा तभी तो आएगा जोश, बढ़ेगी मिठास, बदलेगा देश का रंग.... भ्रष्टाचार के खिलाफ देशभर में चल रही मुहिम का हिस्सा लगता है। इस विज्ञापन को देखकर लगता है कि समाज जागरण का काम तो सामान बेचने के साथ भी किया जा सकता है। एक अनुमान के मुताबिक यह विज्ञापन अन्य डर्टी विज्ञापन से कही अधिक हिट है। ग्राहक को उत्पाद की ओर आकर्षित तो करता ही है उसके मन में कुछ करने का जज्बा भी भरता है। इस तरह के विज्ञापन मनुष्य देह के उन्नत शिखर (मस्तिष्क) में स्पंदन करते हैं। यहां स्पष्ट कर हूं कि मेरा ऐसा मानना कतई नहीं है कि आप सामान न बेंचे या हर सामान बेचने के साथ समाज सृजन करें। लेकिन, कम से कम समाज को दूषित तो न करें। हर कोई आगे जाना चाहता है। बाजार में अपनी 'आवाज' सबसे ऊंची रखना चाहता है। लेकिन, इसके लिए समाज को क्या कीमत चुकानी पड़ रही है यह तो सोचना ही पड़ेगा।
रविवार, 16 सितंबर 2012
ज्ञान है तो जहान हैं
'आपका ज्ञान ही आपको आपका हक दिलाता है' टैग लाइन का विचार कहां से आया? इस सवाल का जवाब है - सुशील कुमार। याद आया बिहार, मोतीहारी के सुशील कुमार, जिन्होंने पिछले सीजन में पांच करोड़ रुपए की रकम जीती थी। केबीसी के अब तक के इतिहास में इतनी बड़ी रकम कोई नहीं जीत सका। लेकिन, मोतीहारी के एक साधारण शिक्षक ने अपने ज्ञान के बूते पर यह कामयाबी हासिल करके दिखाई। अमिताभ बच्चन मीडिया को बताते हैं कि सुशील कुमार के उदाहरण से ही शो को थीम मिली। यह शो महज एक गेम शो नहीं है बल्कि इसके माध्यम से कहीं न कहीं अमिताभ या कहें शो निर्माता कंपनी सामाजिक मुद्दे भी उठाने की कोशिश करते हैं। बहरहाल, केबीसी-६ के अलग-अलग विज्ञापन कई संदेश देते दिखे। बेटा-बेटी में अंतर न किया जाए। खासकर सबको पढऩे के समान अवसर उपलब्ध कराए जाएं। समाज में अकसर देखने को मिलता है कि लोग सोचते हैं बेटी को पढ़ाने से पैसा जाया हो रहा है क्योंकि कल तो यह ससुराल चली जाएगी। स्त्री इस देश की आधी शक्ति है, उसे उसका अधिकार मिलना ही चाहिए। एक और महत्वपूर्ण विज्ञापन है जो हिन्दी के महत्व को उजागर करता है। विज्ञापन साफ संदेश देता है कि शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होना ही श्रेष्ठता की पहचान नहीं है। एक भारतीय हिन्दी में कहीं अधिक सहजता से ज्ञार्नाजन करता है। ज्ञान किसी भाषा के बंधन में नहीं बंधा। शिक्षा की राष्ट्रीय परिचर्या-२००५ की रूपरेखा में भी इस बात को स्वीकारा गया है कि अपनी भाषा में इंसान बेहतर सीख सकता है। इसलिए हिन्दी को हीनभावना से देखने वाले निरे मूर्ख हैं। हिन्दुस्तान की बिन्दी है हिन्दी। इस बिन्दी पर हमें नाज होना चाहिए। भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहां विदेशी भाषा को देशी भाषा से अधिक मान सरकारी स्तर पर दिया गया है। अध्ययन-अध्यापन, व्यापार, संवाद और लेखन अंग्रेजी में होता है। जबकि चीन, जापान, इजराइल और ब्रिटेन सहित दुनियाभर के तमाम देशों में वहीं की मूल भाषा में शिक्षा, संवाद से लेकर व्यापार तक होता है। कई बार देशभर में अमिताभ बच्चन की आलोचना होती है कि बच्चन ने देश और समाज को क्या दिया है? बाकी तो मुझे ज्ञात नहीं लेकिन बच्चन ने हिन्दी की बड़ी सेवा की है। शायद ही कोई बॉलीवुड सितारा होगा जो पर्दे के बाहर शुद्ध हिन्दी में बात करता हो। केबीसी के जितने भी सीजन बच्चन ने होस्ट किए हैं सबमें उनकी हिन्दी ने लोगों को खासा आकर्षित किया है।
हिन्दी सिनेमा की १५० से अधिक फिल्मों अभिनय कर चुके अमिताभ बच्चन ११ अक्टूबर को ७० वर्ष को हो जाएंगे। इसके अगले दिन ही केबीसी-६ का १६वां एपिसोड होगा। निश्चित ही यह एपिसोड खास होगा। अमिताभ बच्चन को इस सदी का महानायक कहा जाता है। उनके होनेभर से केबीसी सफलता के शिखर चूम लेता है। केबीसी और बिग बी एक-दूसरे के पर्याय हो गए हैं। अमिताभ केबीसी को होस्ट करने के लिए काफी मेहनत भी करते हैं। केबीसी ही है जिसने लगभग कंगाल हो चुके अमिताभ बच्चन को भी करोड़पति बनाया बल्कि बच्चन की एक नई पारी को शुरुआत दी। और वह अमिताभ बच्चन ही हैं जो केबीसी की सफलता की अनिवार्य शर्त हैं। सभी जानते हैं एक बार शाहरूख खान भी गेम शो होस्ट कर चुके हैं जो बुरी तरह फ्लोप हुआ था। उम्मीद है कि कौन बनेगा करोड़पति-६ सफलता के नए प्रतिमान स्थापित करेगा। हॉट सीट तक पहुंचने वाले के ज्ञान का हक अदा करेगा।
रविवार, 24 जून 2012
लायक से नालायक तक का सफर
यह तो सभी जानते हैं कि भारत में सिनेमा की शुरुआत दादा साहब फाल्के ने की। दादा साहब फाल्के का सही नाम धुन्दीराज गोविंद फाल्के था। १९११ में उन्होंने ईसा मसीह के जीवन पर बनी फिल्म देखी। इसके बाद उनके मन में विचारों का ज्वार उमडऩे लगा। भारत के महापुरुषों और इतिहास को आधार बनाकर फिल्म बनाने के विचार दादा साहब के मन में आने लगे। जब विचारों ने मन-मस्तिष्क पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया तो उन्होंने फिल्म बनाने का संकल्प लिया। फिल्म निर्माण की कला सीखने के लिए वे लंदन पहुंच गए। लंदन में दो साल रहकर उन्होंने सिनेमा निर्माण की तकनीकी सीखी। वहां से कुछ जरूरी उपकरण लेकर वे भारत वापस आए। काफी मेहनत-मशक्कत के बाद उन्होंने भारतीय जन-जन में रचे-बसे चरित्र राजा हरिशचन्द्र पर फिल्म बनाई। ३ मई १९१३ को भारतीय सिनेमा की पहली फिल्म प्रदर्शित हुई। यह मूक फिल्म थी। दादा साहब को उनके साथियों ने खूब कहा कि फिल्म का आइडिया बकवास है, तुम्हारी फिल्म कोई देखने नहीं आएगा, भारत की जनता को फिल्म देखने का सऊर नहीं। लेकिन, 'राजा हरिशचन्द्र' की लोकप्रियता ने सारे कयासों को धूमिल कर दिया। इस तरह भारत में दुनिया के विशालतम फिल्म उद्योग बॉलीवुड की नींव पड़ी।
यहां गौर करने लायक बात है कि दादा साहब जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति ने एक सुने-सुनाए, जन-जन में रचे-बसे चरित्र पर फिल्म क्यों बनाई? संभवत: उन्हें सिनेमा के प्रभाव का ठीक-ठीक आकलन था। सिनेमा लोगों के अंतर्मन को प्रभावित करता है। उनके जीवन में बदलाव लाने का सशक्त माध्यम है। इसके अलावा उनके मन में सिनेमा से रुपयों का ढेर लगाने खयाल नहीं था। ईसा मसीह के जीवन पर बनी फिल्म को देखकर उनके मन में पहला विचार यही कौंधा कि भारत के महापुरुषों पर भी फिल्म बननी चाहिए। ताकि लोग उनके जीवन से प्रेरणा लेकर स्वस्थ्य समाज का निर्माण कर सकें। हरिशचन्द्र सत्य की मूर्ति हैं। सत्य मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी, उपलब्धी और सर्वोत्तम गुण है। 'राजा हरिशचन्द्र' के बाद भी लंबे समय तक भारत में बनाई जाने वाली फिल्में संस्कार और शिक्षाप्रद थीं। १४ मार्च १९३१ को प्रदर्शित पहली बोलती फिल्म आलमआरा और १९३७ में प्रदर्शित पहली रंगीन फिल्म किसान कन्या की कहानी साहित्य से उठाई गई थी। भारतीय सिनेमा लंबे समय तक सीधे तौर पर भारतीय साहित्य से जुड़ा रहा। बंकिमचन्द्र और प्रेमचंद की कृतियों पर सिनेमा रचा गया, जिसने समाज को दिशा दी। रचनात्मक सिनेमा गढऩे के लिए गुरुदत्त, हिमांशु रॉय, सत्यजीत रे, वी. शांताराम, विमल रॉय, राजकपूर, नितिन बॉस, श्याम बेनेगल जैसे निर्देशकों को हमेशा याद किया जाएगा। लेकिन, २१ वीं सदी की शुरुआत से ही बॉलीवुड के रंग-ढंग बदलने लगे। महेश भट्ट जैसे तमाम भटके हुए निर्देशकों ने भारतीय सिनेमा की धुरी साहित्य और संस्कृति से हटाकर नग्नता पर टिका दी। मनुष्य के दिमाग को शिक्षा देने वाले साधन को दिमाग में गंदगी भरने वाला साधन बना दिया। 'आज बन रहीं फिल्में परिवार के साथ बैठकर देखने लायक नहीं है' यह वाक्य बॉलीवुड के लिए आज हर कोई कहता है। इसके बावजूद भट्ट सरीखे निर्देशक कहते हैं कि हम वही बना रहे हैं जो समाज देखना चाहता है। अब ये किस समाज से पूछकर सिनेमा बनाते हैं यह तो पता नहीं। लेकिन, मेरे आसपास और दूर तक बसा समाज तो इस तरह की फिल्म देखना कतई पसंद नहीं करता। खासकर अपने माता-पिता, भाई-बहन और बच्चों के साथ तो नहीं ही देखता। ऐसी फिल्में समाज देखना नहीं चाहता इसका ताजा उदाहरण है- टेलीविजन पर डर्टी फिक्चर के प्रसारण का विरोध। यहां इस बात को भी समझिए कि समाज घर में तो ऐसी फिल्म नहीं देखना चाहता लेकिन घर के बाहर उसे परहेज नहीं है। इसी डर्टी फिक्चर की कमाई यह सच बताती है। लेकिन, इस सब में एक बात साफ है कि डर्टी टाइप की फिल्में समाज हित में नहीं हैं। डेल्ही बेल्ही, लव सेक्स और धोखा, ब्लड मनी, मर्डर, हेट स्टोरी, जिस्म और आने वाली फिल्म जिस्म-२ (इसमें पॉर्न एक्ट्रेस नायिका है) जैसी फिल्में समाज में क्या प्रभाव छोड़ रहीं हैं कहने की जरूरत नहीं है। इनके प्रभाव से निर्मित हो रहा समाज भारत के लोगों की चिंता जरूर बढ़ा रहा है लेकिन वे भी हाथ और मुंह बंद किए बैठे हैं। भारतीय सिनेमा के पिछले पांच-छह सालों को देखकर इसका आने वाला भविष्य उज्वल नहीं दिखता। आज बॉलीवुड १००वें साल में प्रवेश कर रहा है, इसकी और समाज की बेहतरी के लिए निर्माताओं, निर्देशकों और दर्शकों को विचार करना होगा। निर्माता-निर्देशकों को विचार करना होगा क्या कैमरे को नंगई के अलावा कहीं और फोकस नहीं किया जा सकता? दर्शकों को विचार करना होगा कि जिस सिनेमा को हम अपने परिवार के साथ नहीं देख सकते या जिसे हम अपने बच्चों को नहीं दिखा सकते, उसका बहिष्कार क्यों न किया जाए?
शनिवार, 16 जून 2012
उपनिषदगंगा : भारत में भारतीयता का प्रवाह
पर्यावरण, साहित्य, संस्कृति और शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के कार्य में संलग्न संस्था 'स्पंदन' के कार्यक्रम में डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी का भोपाल आना हुआ। इस दौरान सिनेमा, टेलीविजन और संस्कृति पर उनका व्याख्यान हुआ। उनसे एक सज्जन ने पूछा- आपने इतना बढिय़ा धारावाहिक बनाया है तो इसे किसी निजी चैनल पर प्रसारित क्यों नहीं करवाया? दूरदर्शन को आज कौन देखता है? इस पर डॉ. द्विवेदी ने बहुत ही गंभीर और सोचने को विवश करने वाला जवाब दिया। उन्होंने कहा- दूरदर्शन और निजी चैनल में रिमोट के एक बटन का ही तो फर्क है। इसके अलावा दूरदर्शन भारत का राष्ट्रीय चैनल है, इसकी पहुंच भी व्यापक है। स्पंदन के ही कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारत में सिनेमा की शुरुआत सांस्कृतिक मूल्यों के साथ हुई। दादा साहेब फाल्के ने १९१३ में पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र बनाई। हालांकि आज मुंबई में साहित्य पर काम करने वाले लोग कम ही बचे हैं। दरअसल, पहले शिक्षा, प्रसार और प्रचार टेलीविजन के आधार थे लेकिन बाजारवाद ने सब कबाड़ा कर दिया है। आज टेलीविजन और सिनेमा से शिक्षा गायब है। वहीं, संस्कृति और साहित्य के लिए दूरदर्शन पर जितना गंभीर काम हो रहा है उतना कहीं और नहीं। यही कारण है कि हम टेलीविजन के सामने घंटेभर बैठे रहते हैं और लगातार चैनल बदलते रहते हैं, देखते कुछ नहीं।
दूरदर्शन के प्रति डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी के आग्रह को देखकर ही यह आलेख लिखने का संबल मुझे मिला। भारत में दूरदर्शन ५३ बरस का हो गया है। इस दौरान उसने तमाम अनुभव जुटाए। दूरदर्शन का काफी विकास और विस्तार हुआ। आज दूरदर्शन ३० चैनल का बड़ा परिवार है। १५ सितंबर, १९५९ को भारत में टेलीविजन की शुरुआत हुई थी। बाद में, निजी चैनल्स की बाढ़-सी आ गई। फिलवक्त देश में करीब ५०० निजी चैनल हैं। भारत में दूरदर्शन का स्वरूप कैसा हो? इस बात की चिंता के लिए समय-समय पर कमेटियां (चंदा कमेटी, बीजी वर्गीस कमेटी और पीसी जोशी कमेटी) बनी। पीसी जोशी कमेटी ने कहा था- टेलीविजन किसी भी देश का चेहरा होता है। अगर किसी देश का परिचय पाना है तो उसका टेलीविजन देखना चाहिए। वह राष्ट्र का व्यक्तित्व होता है। स्पष्ट है कि दूरदर्शन पर भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधत्व करने वाले कार्यक्रम ही प्रसारित होना चाहिए, इस आशय की रिपोर्ट पीसी जोशी के नेतृत्व वाली कमेटी ने सरकार को सौंपी थी। संभवत: यही कारण रहा कि भारतीय संस्कृति, साहित्य और चिंतन को बचाए रखने, उसके संवर्धन और प्रोत्साहन में जो योगदान दूरदर्शन का है वह अन्य किसी का नहीं। निजी चैनल्स ने तो पैसा बनाया और इसके लिए संस्कृति को विद्रूप भी करना पड़ा तो किया, आज भी कर रहे हैं। भारत में जब निजी चैनल्स को प्रसारण के अधिकार मिले तो टेलीविजन और साहित्य से जुड़े लोगों को एक उम्मीद जगी थी, सोचा था प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। इससे चैनल्स पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों की गुणवत्ता में वृद्धि होगी। लेकिन, स्थिति विद्वानों की सोच के विपरीत है। आज देश में चैनल्स की भीड़ है। उनके बीच प्रतिस्पर्धा भी है लेकिन गुणवत्ता बढ़ाने की नहीं वरन गुणवत्ता गिराने की प्रतिस्पर्धा है।
निजी चैनल्स पर प्रसारण के क्षेत्र में उतरे तो उनके पास दर्शकों का टोटा था। दूरदर्शन की दर्शक संख्या बेहद मजबूत थी। दूरदर्शन पर प्रसारित अर्थपूर्ण कार्यक्रमों ने दर्शकों को बांधे रखा था। ऐसे में निजी चैनल्स ने दूरदर्शन के दर्शकों को हड़पने के लिए बाकायदा षड्यंत्र रचा। उन्होंने हिटलर के मंत्री गोएबल्स के प्रोपेगण्डा सूत्र का उपयोग किया। 'दूरदर्शन घटिया है। दूरदर्शन पर प्रसारित सामग्री भी भला देखने वाली है क्या? दूरदर्शन आउटडेटेड हो गया है।' ऐसे झूठ निजी चैनल्स के गुटों ने जोर-जोर से चिल्लाकर और चालाकी से आमजन के अंतरमन में बैठा दिए। टीआरपी के झूठे खेल में दूरदर्शन को पिछड़ा दिखाया गया। यह सच है कि निजी चैनल्स यह भ्रम खड़ा करने में सफल रहे कि दूरदर्शन देखे जाने लायक चैनल नहीं है। महानगरों में यह भ्रम आज भी कायम है। लेकिन, असल स्थिति इसके उलट है। गोएबल्स का सूत्र 'एक झूठ को सौ बार बोलो वह सच लगने लगेगा' सफल नहीं क्योंकि झूठ सच भले ही प्रतीत करा दिया जाए लेकिन वह सच नहीं बन पाता। सच तो सच ही रहता है। द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर की पराजय का एक कारण गोएबल्स का यह सूत्र भी था। गोएबल्स अंत तक हिटलर को यही बताता रहा कि जर्मनी युद्ध जीत रहा है जबकि रणक्षेत्र में कुछ और ही घट रहा था। ठीक यही स्थिति दूरदर्शन और निजी चैनल्स की जंग के साथ है। १९८२ से १९९१ तक का समय भारतीय दूरदर्शन का स्वर्णकाल रहा। इस दौरान दूरदर्शन ने न सिर्फ नायक गढ़े वरन एक टेलीविजन संस्कृति का विकास भी किया। इस दौरान उसने कई ऐतिहासिक रिकॉर्ड कायम किए। यह उसकी लोकप्रियता का दौर था। रंगीन प्रसारण (१९८२ में भार में आयोजित एशियाड गेम्स से) और सोप ऑपेरा ने इसे और विस्तार दिया। महाभारत और रामायण ने किंवदंतियां रचीं। कहते हैं कि महाभारत और रामायण के प्रसारण के वक्त भारत की सड़कें सूनी हो जाती थी। दूरदर्शन पर प्रसारित हुए धारावाहिक हमलोग, बुनियाद, ये जो जिंदगी है, विक्रम-बेताल, चंद्रकांता, करमचंद, तमस और चाणक्य को जो लोकप्रियता हासिल हुई वो किसी भी निजी चैनल्स के किसी भी धारावाहिक को नहीं मिल सकी। डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी द्वारा निर्मित 'उपनिषद गंगा' धारावाहिक इसी श्रंखला को आगे बढ़ाएगा यह तय है। ११ मार्च, २०१२ से प्रति रविवार अब तक प्रसारित एपिसोड तो इसी बात की हामी भरते है।
( त्रैमासिक पत्रिका मीडिया क्रिटिक में प्रकाशित आलेख )
शुक्रवार, 1 जून 2012
अन्याय हारेगा सत्य जीतेगा सबके साथ से, सत्यमेव जयते
बेटा-बेटी का भेद समाज से अभी गया नहीं। जबकि समाज में शिक्षा बढऩे के साथ ही इसके जाने के कयास लगाए गए थे। लेकिन, घटनाओं को देखने से लगता है कि शिक्षा के प्रसार से भी अभी कोई अधिक फर्क नहीं आया है। शिक्षित लोग भी झूठी सामाजिक परंपरा में फंसे हैं। जबकि हम आसपास देखते हैं कि झूठ की बुनियाद पर खड़ी सभी सामाजिक परंपराएं दरक रहीं हैं। आज बेटी श्मशान घाट जाकर अपने माता-पिता को मुखाग्नि दे रही है तो नौकरी-व्यवसाय करके माता-पिता का भरण-पोषण कर रही है। एक सफेद झूठ समाज में प्रचारित किया गया है कि वंश बेटे से चलता है। जबकि वंश तो बेटी की कोख से ही पैदा होता है। बेटा चाहकर भी अकेले संतान पैदा नहीं कर सकता। इतना ही नहीं बेटियां सब क्षेत्रों में कामयाबी के झंडे गाड़ रही हैं। कार्यक्रम में मध्यप्रदेश, राजस्थान और हरियाणा की घटनाओं के बारे में बताया गया। जो सच सामने आया वह दिल दहलाने वाला है। कन्याओं को जन्म देने वाली माताओं के साथ किस तरह का बर्बर सलूक किया जाता है यह देखकर तमाम लोगों की आंखों में अश्रूधार और धमनियों में रक्त प्रवाह तेज हुआ होगा। कोख में दम तोड़तीं बेटियां चीख-चीख कर कहती हैं कि आज भी सामंती युग कायम है। हमने दुनिया को दिखा दिया है कि हम बेटों के मुकाबले कहीं कमतर नहीं इसके बावजूद हमारा स्वागत नहीं किया जा रहा। जबकि इन्ही प्रदेशों की कई बेटियों ने मिशाल कायम की है। राजस्थान और मध्यप्रदेश की दो महिला सरपंचों को केन्द्र सरकार की ओर से प्रधानमंत्री राष्ट्रीय गौरव ग्राम पंचायत पुरस्कार से सम्मानित किया गया। राजस्थान के दौसा जिले की विमला देवी मीणा और मध्यप्रदेश के धार जिले की जामबाई मुनिया को यह सम्मान मिला। वहीं, पिछले साल मार्च में संयुक्त राष्ट्र संघ की इंफोपॉवर्टी वल्र्ड कॉन्फ्रेंस में लाजवाब भाषण देकर राजस्थान के टोंक जिले के सोड़ा गांव की सरपंच छवि राजावत ने दुनिया में नाम कमाया। एमबीए डिग्रीधारी छवि अपने गांव के विकास के लिए ऊंची नौकरी छोड़कर गांव आकर बस गई। मध्यप्रदेश की साध्वी और तेजतर्रार नेता उमा भारती ने तो राजनीति में तमाम प्रतिमान स्थापित किए। हाल ही में घोषित हुए संघ लोक सेवा आयोग के परीक्षा परीणाम में भी बेटियों ने अपनी योग्यता का लोहा मनवाया। ऐसे तमाम उदाहरण हमारे आसपास मौजूद हैं।
आमिर खान महज फिल्मी पर्दे पर समाज के लिए आवाज बुलंद करने वाले अभिनेता नहीं हैं। उन्होंने समय-समय पर प्रत्यक्ष रूप से समाज के लिए आगे आकर काम किया है। वे नर्मदा बांध के विस्थापितों के प्रति हमदर्दी रखते हैं। मेधा पाटकर के साथ आकर विस्थापितों की आवाज बुलंद करते हैं। भ्रष्टाचार रहित समाज के लिए प्रयासरत हैं। अण्णा के मंच से भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत लोकपाल की सिफारिश करते हैं। बच्चों के प्रति समाज का रुख सकारात्मक रहे इसके लिए 'तारे जमीं' से संदेश देते हैं। ये तो चंद उदाहरण मात्र हैं, आमिर खान इनसे भी अधिक कार्य समाज के लिए करते हैं। आमिर सकारात्मक और सार्थक सिनेमा रचने में विश्वास रखते हैं। भारतीय सिनेमा को १००वां साल शुरू हो गया है। ऐसे में बॉलीवुड के अन्य दिग्गज अभिनेताओं और निर्देशकों को सोचना चाहिए कि मुनाफा फिल्मों में नंगापन दिखाने से ही नहीं कमाया जा सकता, आमिर की तरह सकारात्मक सिनेमा रचकर भी कमाया जा सकता है। ऐसे सिनेमा से प्रसिद्ध और सफलता मुनाफे के साथ बोनस के रूप में मिलती है।
सत्यमेव जयते के पहले एपीसोड में मध्यप्रदेश के मुरैना जिले की परवीन खान की दास्तान दिखाई गई। परवीन साहस का प्रतिरूप है। परवीन की बेटियों को लगातार बेरहमी से मारा जाता रहा। आखिर वह इस सबसे तंग आ गई। उसने तय किया कि इस बार वह अपनी बेटी को दुनिया दिखाएगी, किसी भी कीमत पर। उसने ऐसा करके भी दिखा दिया। हालांकि बाद में उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ी। उसके पति (क्षमा करें उसे पति कहना गलत होगा, ऐसे आदमी को बहशी दरिंदा ही कहा जाना उचित होगा) ने मुंह से परवीन की नाक चबा ली। मुरैना भ्रूण हत्या और कन्या हत्या के लिए काफी कुख्यात है। एक समय में यहां कन्या हत्या के बेहद घृणित तरीके प्रचलित रहे हैं। यहां उनका जिक्र करना भी उचित न होगा। हालांकि अब पहले की तुलना में स्थिति में काफी सुधार आया है। फिर भी 2011 की जनगणना के आंकड़े भी बयां करते हैं कि 2001 की तुलना में लिंगानुपात में अंतर बढ़ा है। 2011 की जनगणना के मुताबिक मुरैना ही मध्यप्रदेश में सबसे कम लिंगानुपात वाला जिला है। यहां छह साल तक की उम्र के बच्चों में 1000 लड़कों पर महज 825 लड़कियां हैं। जनगणना 2001 के मुताबिक यहां इस आयु वर्ग का लिंगानुपात 837 था। यानी एक दशक में यहां लिंगानुपात में 12 अंकों की गिरावट दर्ज हुई। जो निश्चिततौर पर चिंतनीय है। वैसे प्रदेश के हाल भी खराब ही हैं। जनगणना 2011 के आकंड़ों के मुताबिक प्रदेश में शून्य से छह वर्ष तक के आयु समूह का लिंगानुपात 912 है। यह 2001 की जनगणना के मुताबिक 932 था। यानी इस एक दशक में प्रदेश में भी 20 अंक की गिरावट हुई। प्रदेश में बेटी के यह हाल देखकर सूबे के मुखिया शिवराज सिंह चौहान ने बेटी बचाओ अभियान भी शुरू कर रखा है। लेकिन, बेटियों के प्रति सोच में बदलाव किसी एक के बूते आना संभव नहीं, हम सबके मिले-जुले प्रयास से ही संभव हो सकता है। पहले ही एपिसोड में आमिर खान ने पंजाब के एक गांव को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया। जहां सभी ग्रामवासियों ने तय किया कि कोई भी भ्रूण हत्या नहीं करवाएगा। कोख में जिसे भी ईश्वर ने भेजा है दुनिया में उसका स्वागत किया जाएगा। नतीजा यह हुआ कि कुछ ही समय में उस गांव का लिंगानुपात समान हो गया। वहां लड़के-लड़कियों की संख्या समान हो गई। हमें इतिहास से सबक लेना चाहिए कि जितने भी सामाजिक बदलाव आए वे सब सामूहिक प्रयास से ही आए। इसलिए कन्या भ्रूण हत्या और कन्या शिशु हत्या को रोकना है तो सबको सामने आना होगा।
चलते-चलते सत्यमेव जयते के बहाने दूरदर्शन की ताकत की भी बात कर ली जाए। यह शो आठ भाषाओं में नौ चैनलों पर १०० देशों में दिखाया जाएगा। इतना ही नहीं यह पहला शो है जो निजी चैनल्स पर प्रसारित होने के साथ ही साथ दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल (डीडी-१) पर भी प्रसारित होगा। दरअसल, तमाम टीआरपी के आंकड़ों के बाद भी यह व्यवहारिक सत्य है कि दूरदर्शन की जितनी पहुंच है उतनी किसी भी निजी चैनल की नहीं। टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट) में भले ही दूरदर्शन पिछड़ा नजर आता हो, क्योंकि यह मनोरंजन बेच रहे लोगों की चालाकी है। आमिर खान कहते हैं कि मैं ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक पहुंचना चाहता हूं इसलिए टेलीविजन का उपयोग कर रहा हूं। उन्हें पता है कि निजी चैनलों की पहुंच शहर और शहर से लगे कुछ कस्बों तक ही है। जबकि भारत तो गांवों में बसता है। समाज जागरण करना है तो मास तक पहुंचना होगा। मास तक पहुंचने का माध्यम सिर्फ दूरदर्शन ही है। दूरदर्शन की पहुंच शहर से लेकर दूरदराज के गांव तक है। सत्यमेव जयते को शुरुआत से मिल रही सफलताओं को देखकर कहा जा सकता है कि यह मनोरंजन के जगत से लेकर सामाजिक जगत में परिवर्तन ला सकता है। बस, इसके लिए आमजन के साथ ही जरूरत है।
रविवार, 4 मार्च 2012
हे! उज्ज्वला, क्यों दामन मैला कर रही है?
पतित पुरुष (सभी नहीं) और उसके फेर में फंसी दिग्भ्रमित नारी ने स्त्री स्वतंत्रता के नाम पर उज्ज्वला के मन में कचरा भी भर दिया। नारी से कहा गया कि मनुष्य जितना पतित कर्म कर सकता है तुम भी कर सकती हो। पुरुष तौलिया लपेटकर सड़क पर घूम सकता है तो स्त्री क्यों नहीं? पुरुष शराब पीकर नाली में पड़ा रह सकता है तो स्त्री क्यों नहीं? पुरुष स्त्रियों को छल सकता है उन्हें क्षणिक दैहिक सुख के लिए इस्तेमाल कर सकता है तो स्त्री क्यों नहीं? पुरुष गाली-गलौज कर सकता है तो स्त्री क्यों नहीं? इन सवालों के जवाब कुछ नहीं है। क्योंकि ये स्त्री स्वतंत्रता से जुड़े सवाल नहीं। ये तो उसकी गुलामी के लिए बुने गए जाल के तार हैं। दंभी और कुंठित पुरुष तो चाहता ही था कि वह स्त्री की मांसल देह को देख सके। इधर, कथित स्वतंत्रता के नाम पर स्त्री देह दिखाऊ वस्त्र पहनकर उसकी मंशा पूरी कर रही है। पुरुष तो वर्षों से चाहता था कि स्त्री होश खो दे और उसके बाहुपाश में आ गिरे। ताकि वह उससे जैसे चाहे वैसे खेल सके। स्त्री आज हर तरह का नशा कर रही है। होश गंवाकर उसने पुरुष के धूर्त पुरुष के साथ जो किया, उसके तमाम एमएमएस आज बाजार में हैं। स्त्री जब तक श्रेष्ठ थी या है लंपट पुरुष की पहुंच से बहुत दूर थी या है। हालात बदल गए। पुरुषों का उपभोग करने के नाम पर खुद ही उपभोग हो रही है।
भारत एक ऐसा देश है जहां नारी को श्रेष्ठ सत्ता माना गया है। वंदनीय, पूजनीय माना गया। स्त्री पर कई तरह की बंदिशें लगाई जाती रही हैं यह एक सफेद झूठ है। जो स्त्री की आबरू लूटने बैठे समाज के द्वारा लगातार बोला गया। इतनी बार बोला गया कि वह सच के जैसा लगने लगा। लेकिन, यह सच नहीं है। सच तो यह है कि श्रेष्ठता के साथ ही उसे सम्मान के साथ जीने के पूरी आजादी थी और है। पाबंदी इतनी-सी थी कि वह कुछ मैले कामों से दूर रहे। इसे पाबंदी कहना ठीक नहीं। इसे तो अपेक्षा कह सकते हैं, भरोसा भी कह सकते हैं। ऐसा भी नहीं है कि यह अपेक्षा और भरोसा सिर्फ स्त्री से ही है, पुरुष को भी बुराइयों से उतना ही दूर रहना चाहिए। चूंकि स्त्री को ईश्वर ने विशिष्ट बनाया है। उसे कुछ विशेष ताकतें दीं। ईश्वर पवित्र लोगों को सृष्टि के संचालन की शक्तियां प्रदान करता है। स्त्री की कोख से जीवन का अंकुर फूटता है। गंदली जमीन पर विषैली पौध ही उगेगी। इससे समाज दूषित होगा। समाज स्वच्छ रहे। अच्छाई बढ़े ताकि बुराई को हराया जा सके। इसके लिए अच्छी पौध की जरूरत है। अच्छी पौध साफ और पवित्र जमीन पर उगेगी। इसलिए स्त्री को अपनी जमीन साफ रखने की जरूरत है। और फिर स्वच्छता में जो आनंद है वह गंदगी में कहां। तो फिर क्यों वह आंख बंद किए अंधेरे में दौड़े जा रही है। क्यों नहीं वह समझती की अच्छे समाज के निर्माण की उसकी भूमिका अहम है, पुरुष से भी अधिक जिम्मेदारी उसके ऊपर है। पुरुष आवारा है। ऐसे में स्त्री भी उच्छृंखल हो जाएगी तो कैसे समाज चलेगा।
मायावी पुरुष ने तुझे फंसाने के लिए कैसे-कैसे खेल रचे हैं। तू देख क्यों नहीं रही उज्ज्वला। उसने बाजारवाद का ऐसा मोहपाश फेंका है कि तू उसमें उलझ गई है। वह फैशन के नाम पर तुझसे नग्न परेड कराता है। कला के नाम पर तेरा जिस्म दिखाता है। सीमेंट का ही विज्ञापन क्यों न हो तेरा शरीर बेचकर पैसा बनता है। कथित आजादी के नाम पर तुझसे स्लट वॉक कराता है। देवी, मां, बहन, भाभी, पत्नी तेरी ये सारी पहचान छीनकर उसने तुझे सेक्स सिंबल बनाकर रख दिया है। तू पता नहीं किस आजादी और सम-अधिकार के भ्रमजाल में फंसकर यह सब किए जा रही है। खुद को खोए जा रही है। याद रखना पतित के पास समाज ताकत नहीं रहने देता। जब तेरे पास सत्य की ताकत नहीं होगी तो अधम पुरुष तुझसे जो उसका जी चाहेगा कराएगा। तुझे करना होगा तब चाहे तेरी मर्जी हो या न हो। तू अभी जिसे स्वतंत्रता मान रही है वह तब धरी रह जाएगी।
हे! उज्ज्वला, धवला अब भी समय है, सम्भल जा। रोक ले अपने कदमों को जो पुरुष के इशारे पर दलदल की ओर बढ़ रहे हैं। अब भी तू अपनी देवीमय गरिमा को बनाए रख सकती है। अब भी तू पवित्रता और श्रेष्ठता के मामले में पुरुष को चुनौती दे सकती है। तुम नहीं संभली तो वह दिन दूर नहीं जब तुम कीचड़ में सनी होगी और पुरुष तुम पर हंस रहा होगा।
आखिर में स्पष्ट कर देता हूं कि मैं इस बात का पक्ष कतई नहीं ले रहा कि पुरुष के लिए कोई मर्यादा नहीं, कोई बंधन नहीं। उच्छृंखल व्यवहार उसका भी बर्दाश्त नहीं। वह भी समाज के संचालन का अभिन्न हिस्सा है। उसे भी उन तमाम बुराइयों से दूर रहना चाहिए जो उसके पतन का कारण बनती हैं। जिस तरह समाज में व्यसन में लिप्त स्त्री का सम्मान नहीं है उसी तरह उदण्ड पुरुष को भी समाज हिकारत की नजरों से देखता है। उसकी आजादी वहीं तक है जहां तक दूसरों को परेशानी न हो। एक चेतावनी उसके लिए भी है। वह भी भौतिक चकाचौंध में अपनी जिम्मेदारी भूल रहा है।













