शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

आरक्षण की आग

 आ रक्षण की मांग को लेकर गुजरात में जो हो रहा है, वह देशहित में नहीं है। आरक्षण की मांग के लिए सरकारी और निजी सम्पत्ति को नष्ट करना, कहाँ उचित है? आगजनी और हिंसक गतिविधियों से शेष समाज के समक्ष भय का वातावरण बनाना, कहाँ ठीक है? भारतीय समाज के लिए यह खतरनाक संकेत हैं। आरक्षण के विषय पर पहले से ही हिन्दू समाज बंटा हुआ है। आरक्षण के लिए इस तरह के हथकंडे देखकर अन्य जातियां भी उत्तेजित हो रही हैं। ईश्वन न करे कि हिन्दू समाज जातियां तोडऩे की जगह फिर से जातियों में बंट जाए। आरक्षण की मांग या विरोध में, कहीं ये जातियां एक-दूसरे के सामने खड़ी न हो जाएं? लोकतंत्र में अपनी बात कहने के और भी तरीके हैं। सरकार से अपनी मांगें मनवाने के और भी रास्ते हैं। आंदोलन करने की अपनी एक मर्यादा है। हिंसा का रास्ता अपनाया तो आंदोलन की पवित्रता बची नहीं रहती। गुजरात की भूमि से निकले महापुरुष महात्मा गांधी ने स्वयं कहा है कि पवित्र साध्य की प्राप्ति के लिए साधन और मार्ग भी उतने ही पवित्र होने चाहिए। गांधीजी ने तो अहिंसक आंदोलनों से दमनकारी ब्रिटिश शासन को हिन्दुस्थान से इग्लैंड तक हिला दिया था। गुजरात का होकर भी पटेल समुदाय गांधीजी से आंदोलन की सीख नहीं ले सका।

        आरक्षण से वंचित सामान्य वर्ग, आरक्षण का लाभ ले रहे पिछड़े वर्ग और अन्य लाभार्थियों का बहुत बड़ा हिस्सा भी कल तक पटेल समुदाय के आंदोलन का समर्थक था लेकिन आंदोलन जैसे ही हिंसक हुआ, पटेल समुदाय के साथ अब कोई नहीं खड़ा। बल्कि आंदोलन के विरोध की सुगबुगाहट होने लगी है। आंदोलन करने वालों को गांधीजी याद न आएं तो अन्ना हजारे को याद कर लेना चाहिए। उन्होंने भी यह सिद्ध किया है कि हिंसा से अधिक ताकतवर शांति है। बहरहाल, पटेल-पाटीदार समुदाय ने गुजरात में जो गदर मचाया है उसके लिए सीधेतौर पर आंदोलन का नेता हार्दिक पटेल जिम्मेदार है। हार्दिक के भाषण भी उकसाने वाले थे। आंदोलन की सफलता-विफलता के लिए उसका नेता ही जिम्मेदार होता है। अब तक हार्दिक पटेल ने शांति की राह अपनाने के लिए समाज से अपील नहीं की है। बल्कि गुजरात बंद की अपील करके हार्दिक ने अपरिपक्वता का परिचय दिया है।
        सरकार की लापरवाही को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। सरकार को जब पता था कि भारी संख्या में पटेल समाज सड़कों पर उतरने वाला है तब उन्हें नियंत्रित करने के लिए पहले से पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं किए गए? सरकार के प्रभावी नेताओं ने आंदोलन खत्म कराने का प्रयास क्यों नहीं किया? नेता चुप्पी क्यों साधे रहे? बिना आदेश पुलिस ने लाठीचार्ज कैसे कर दिया? सरकार भी अपनी लापरवाही से बच नहीं सकती। बहरहाल, गुजरात में लगी आरक्षण की आग अन्य राज्यों और अन्य समाजों तक न पहुंचे इसके लिए प्रभावी उपाय सोचे जाने चाहिए। साथ ही साथ सरकार यह भी जांच करे कि गुजरात का सबल और समृद्ध पटेल समुदाय आरक्षण की मांग क्यों कर रहा है? पटेल समाज को आरक्षण और अराजक आंदोलन के लिए उकसाने के पीछे किन ताकतों का हाथ है? भविष्य में आरक्षण की आग न भड़के, जातिवाद की विषबेल न फैले, समाज एकजुट रहे, इसके लिए सभी राज्यों की सरकारों और केन्द्र सरकार को ठोस प्रयास करने चाहिए। यह अवसर है जब भारत और अपने भले के लिए सभी राजनीतिक दलों को जातिवाद और आरक्षण की राजनीति को भी तिलांजलि दे देना चाहिए। यह मुश्किल है लेकिन असंभव नहीं। एक-दूसरे की देखी-देखा सभी समाज आरक्षण की मांग करने लगे हैं। सभी समाजों के जिम्मेदार नेताओं, प्रभावी व्यक्तियों को सोचना चाहिए कि आरक्षण से किसी समाज का भला नहीं होगा। अपने समाज-अपने बच्चों-युवाओं को आरक्षण की बैशाखी थमाने की बजाए, उन्हें समर्थ और सबल बनाएं। 

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