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शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

न्याय की जीत, झूठ हुआ परास्त


भारत के स्वाभिमान के प्रतीक भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण में बाधाएं उत्पन्न करने और भारत के राष्ट्रीय विचार के प्रति नकारात्मक वातावरण बनाने के लिए बोले गए सभी झूठ अब एक-एक कर ध्वस्त हो रहे हैं। पहले श्रीराम मंदिर के संबंध में निर्णय आया और अयोध्या में भव्य मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वयं उपस्थित होकर मंदिर निर्माण का भूमिपूजन भी सम्पन्न कराया। अब तथाकथित ढांचे के विध्वंस के संबंध में फैलाए गए झूठ की कलई भी खुल गई है। बाबरी ढांचा गिराए जाने संबंधी प्रकरण में भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती समेत 32 आरोपियों को न्यायालय ने दोषमुक्त कर दिया है। लखनऊ की सीबीआई अदालत ने 30 सितंबर को अपने निर्णय में कहा है कि 6 दिसंबर, 1992 की घटना के पीछे कोई साजिश नहीं थी। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एसके यादव ने फैसला सुनाते हुए कहा, “घटना पूर्वनियोजित नहीं थी”। जबकि भारत विरोधी गिरोह ने वर्षों तक अफवाहों, मनगढ़ंत तर्कों और तथ्यों के आधार पर हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के बीच सांप्रदायिक जहर फैलाया कि तथाकथित बाबरी ढांचे को षड्यंत्र रच कर तोड़ा गया। इस काल्पनिक षड्यंत्र के लिए यह गिरोह भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं विश्व हिन्दू परिषद जैसे राष्ट्रीय संगठनों से जुड़े लोगों को जिम्मेदार ठहराता रहा। गिरोह में शामिल राजनीतिक दलों, नेताओं, तथाकथित बुद्धिजीवियों एवं पत्रकारों ने वर्षों तक इन राष्ट्रीय संगठनों एवं निर्दोष लोगों के विरुद्ध विषवमन किया। सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया। इस ‘हिन्दू विरोधी विमर्श’ के कारण देश में न केवल हिन्दू-मुसलमानों के बीच दूरी बढ़ी बल्कि अनेक जगह सांप्रदायिक दंगे भी इस विमर्श के कारण हुए। 

अयोध्या में जिस दिन तथाकथित बाबरी ढांचे के तोड़े जाने की घटना हुई थी, उस दिन वहाँ उपस्थित अनेक लोग मानते हैं कि वह भीड़ द्वारा किया गया अप्रत्याशित कृत्य था। किसी भी राजनीतिक या सामाजिक नेता ने लोगों से यह आह्वान नहीं किया था कि तथाकथित ढांचे को तोडऩा है बल्कि जब भीड़ आक्रोशि हो उठी तब सभी बड़े नेताओं ने उसे शांत कराने के प्रयास किए। मंच से अनुशासन रखने और धैर्य-संयम दिखाने का आह्वान किया जा रहा था। यह सब खुले मैदान में हो रहा था, इसके बाद भी यह झूठ वर्षों तक बोला गया कि भाजपा-विहिप के नेताओं ने बाबरी को ध्वस्त करने का आह्वान किया। यह याद रखना चाहिए कि लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती सहित अनेक बड़े नेताओं ने बाबरी ढ़ाचे को तोड़े जाने की कड़ी निंदा की थी और इसे दुर्भाग्यपूर्ण कृत्य बताया था। लेकिन, गिरोह द्वारा हिन्दू विरोधी विमर्श में इन तथ्यों पर हमेशा पर्दा डाला गया। इस महान झूठ को साबित करने के लिए जो भी प्रमाण न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए, उन्हें न्यायालय ने खारिज कर दिया। न्यायालय का मत है कि ये प्रमाण न केवल पर्याप्त हैं, बल्कि इनके साथ छेड़छाड़ की गई है। 

उल्लेखनीय है कि देशभर से रामधुन गाते हुए लाखों की संख्या में रामभक्त कारसेवक खाली हाथ ही अयोध्या पहुँचे थे। उनके पास ऐसे कोई साधन या सामग्री नहीं थी, जिससे पता चलता हो कि वे योजना बनाकर और पूर्ण तैयारी के साथ बाबरी ढांचे को तोडऩे आए हों। वे तो बस अपने आराध्य श्रीराम के दर्शन और मंदिर निर्माण की माँग के साथ एकत्र हुए थे। परंतु, आक्रोशित भीड़ ने ऐसी घटना को अंजाम दे दिया था, जिसके कारण हिन्दू विरोधी ताकतों को रामभक्तों के पवित्र, निर्दोष, शांतिपूर्ण आंदोलन पर कलंक लगाने का अवसर प्राप्त हो गया। कहते हैं कि झूठ कितना भी ताकतवर क्यों न हो, आखिर एक दिन सत्य के सामने पराजित हो ही जाता है। 30 सितंबर, 2020 को न्यायालय में ऐसे ही ताकतवर झूठ की हार हुई और रामभक्तों के साथ न्याय हुआ।  

बुधवार, 8 जून 2016

मथुरा कांड : सरकार का जातिवादी होना

 मथुरा के जवाहर बाग में कब्जा जमाए 'रामवृक्ष यादव' और उसके कथित 'सत्याग्रहियों' के खिलाफ देरी से कार्रवाई करने पर उत्तरप्रदेश की सरकार कठघरे में है। खासकर समाजवादी सरकार के कैबिनेट मंत्री और मुख्यमंत्री के चाचा शिवपाल सिंह यादव की भूमिका पर बड़े प्रश्न खड़े किए जा रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी सहित अन्य दलों का आरोप है कि समाजवादी पार्टी के संरक्षण में रामवृक्ष यादव और उसके सहयोगी जवाहर बाग जैसे महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक स्थल पर कब्जा जमा पाने में कामयाब हो सके। वरना क्या कारण हो सकता है कि बाग के मुख्य द्वार पर तलवार लेकर पहरा देते कथित 'सत्याग्रहियों' को पुलिस और प्रशासन प्रतिदिन देख रहे थे, लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई करने का साहस नहीं कर सके? आखिर पुलिस पर गोली चलाने का साहस भी आपराधिक किस्म के रामवृक्ष यादव के अनुयायियों में कहाँ से आया? स्वाभाविक है कि उन्हें लगा होगा कि जब सैंया भये कोतवाल, फिर डर काहे का। सरकार का साथ हासिल है तब पुलिस क्या कर लेगी? सरकार के लचर रवैए के कारण पुलिस को अपने दो अधिकारी खोने पड़ गए। सरकार के संरक्षण के बिना यह कैसे संभव है कि एक ओर पुलिस लाइन, एसपी ऑफिस और दूसरी ओर जज कॉलोनी से घिरे जवाहर बाग में दो-ढाई साल कोई अवैध कब्जा जमाए रखे। रामवृक्ष यादव ने यहाँ सिर्फ कब्जा ही नहीं जमा रखा था बल्कि उसके उत्पाति सत्याग्रहियों ने आस-पड़ोस के लोगों का जीना मुहाल कर दिया था। 

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

नेपाल में शांति बहाली के लिए आगे बढ़े भारत

 ने पाल में 20 सितम्बर की शाम से नया संविधान लागू हो गया है। राष्ट्रपति रामबरन यादव ने संविधान लागू होने की घोषणा की है। वर्षों से हिन्दू राष्ट्र नेपाल अब धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र बन गया है। संविधान को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। एक ओर, नेपाल में नया संविधान लागू होने पर खुशी का माहौल देखा गया, वहीं दूसरी ओर संविधान के विरोध में भी आवाजें उठती दिखाई दे रही हैं। हालांकि नए संविधान का विरोध पहले से चल रहा था। अब वह विरोध और मुखर हो गया है। मधेसी और थारू समुदाय के लोग विरोध में हैं। वे लम्बे समय से आंदोलन चलाकर अपने लिए अलग प्रांत की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि नए संविधान में उनकी अनदेखी की गई है। संविधान बनाते समय और नेपाल को सात प्रांतों में बांटते समय उनके हितों की चिंता नहीं की गई। नए संविधान से असंतुष्ट मधेसी समुदाय का आंदोलन दक्षिणी तराई और पश्चिमी क्षेत्रों में हिंसक होता जा रहा है। इस हिंसा से भारत चिंतित है।

सोमवार, 21 सितंबर 2015

एक अभिनेता का संवेदनशील होना

 अ मूमन देखने में आता है कि हमारे सिने सितारों की दुनिया अलग ही होती है। आम आदमी के जीवन से उनका सीधा संबंध नहीं होता है। आम आदमी के जीवन के यथार्थ को कलाकार केवल पर्दे पर जीते हुए दिखते हैं। वास्तविक जीवन में बहुत कम कलाकार होते हैं, जो आम आदमी के साथ खड़े दिखते हैं, उनकी मुश्किलों को दूर करने के लिए चमकदार दुनिया से बाहर निकलकर आते हैं। बॉलीवुड के दूसरे महत्वपूर्ण कलाकारों को नाना पाटेकर से सीख लेनी चाहिए। नाना बेहद संवेदनशील व्यक्ति हैं। बिना किसी 'शो-बाजी' के किसानों का दु:ख बांटने के लिए महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में काम कर रहे हैं। नाना गाँव-गाँव जाकर आत्महत्या कर चुके किसानों के परिवारों की आर्थिक मदद कर रहे हैं। किसानों को मुश्किल घड़ी से लडऩे का हौसला दे रहे हैं। यह होती है वास्तविक 'हीरो' की पहचान। किसानों का संघर्ष, उनकी समस्याएं और दिन-रात की तकलीफें नाना पाटेकर को सोने नहीं दे रहीं। नाना ने उम्रभर किसानों के लिए काम करने का संकल्प लिया है। उनके एक कथन में समूचे बॉलीवुड और देश की महत्वपूर्ण हस्तियों के लिए गहरा संदेश छिपा है। नाना कहते हैं- 'हम शहर में रहते हैं। हमने खुद को चारदीवारी में बांध लिया है। हम स्क्वेयर फीट में सोचने लगे हैं। सबसे पहले हमें ये दीवार गिरानी होंगी। फिर दीवार के उस पार के पहाड़ भी अपने होंगे, नदी, पक्षी और लोग भी अपने होंगे।'

शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

आरक्षण की आग

 आ रक्षण की मांग को लेकर गुजरात में जो हो रहा है, वह देशहित में नहीं है। आरक्षण की मांग के लिए सरकारी और निजी सम्पत्ति को नष्ट करना, कहाँ उचित है? आगजनी और हिंसक गतिविधियों से शेष समाज के समक्ष भय का वातावरण बनाना, कहाँ ठीक है? भारतीय समाज के लिए यह खतरनाक संकेत हैं। आरक्षण के विषय पर पहले से ही हिन्दू समाज बंटा हुआ है। आरक्षण के लिए इस तरह के हथकंडे देखकर अन्य जातियां भी उत्तेजित हो रही हैं। ईश्वन न करे कि हिन्दू समाज जातियां तोडऩे की जगह फिर से जातियों में बंट जाए। आरक्षण की मांग या विरोध में, कहीं ये जातियां एक-दूसरे के सामने खड़ी न हो जाएं? लोकतंत्र में अपनी बात कहने के और भी तरीके हैं। सरकार से अपनी मांगें मनवाने के और भी रास्ते हैं। आंदोलन करने की अपनी एक मर्यादा है। हिंसा का रास्ता अपनाया तो आंदोलन की पवित्रता बची नहीं रहती। गुजरात की भूमि से निकले महापुरुष महात्मा गांधी ने स्वयं कहा है कि पवित्र साध्य की प्राप्ति के लिए साधन और मार्ग भी उतने ही पवित्र होने चाहिए। गांधीजी ने तो अहिंसक आंदोलनों से दमनकारी ब्रिटिश शासन को हिन्दुस्थान से इग्लैंड तक हिला दिया था। गुजरात का होकर भी पटेल समुदाय गांधीजी से आंदोलन की सीख नहीं ले सका।

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

ये मुल्क पाकिस्तान है क्या?

 ग जब है! आज के समय में हिन्दुस्थान में हिन्दुओं को अपने घर बचाने के लिए धर्म बदलने पर मजबूर होना पड़ रहा है। इतिहास की किताबों में पढ़ते हैं कि मुगलों के अत्याचार से बचने के लिए हिन्दुओं ने मजबूरी में इस्लाम स्वीकार किया। जरूर किया होगा। गर्दन पर तलवार रखी हो और पूछा जा रहा हो- 'जान बचानी है या धर्म? ' तब विकल्प ही कितने बचते हैं आदमी के पास। कुछ ने मौत स्वीकारी तो बहुतों ने मजबूरी में इस्लाम। लेकिन, अब न तो मुगलिया शासन है और न उनकी तलवार का आतंक। फिर कौन है? क्या परिस्थितियां हैं? क्या संकट है कि अपना घर बचाने के लिए हिन्दू धर्मांतरण को मजबूर हैं।

शनिवार, 16 मार्च 2013

नक्सलियों को खुली चुनौती

 रा म-कृष्ण, बुद्ध और गांधी के देश में हिंसक संघर्ष बर्दाश्त नहीं है। ध्येय कितना भी ऊंचा, पवित्र और जनहित का हो लेकिन उसे पाने के लिए उचित माध्यम होना जरूरी है। बुलेट की ताकत पर बदलाव संभव नहीं होता। बदलाव तो स्वत: स्फूर्त होना चाहिए। बंदूक की नाल से तो डराया जाता है। जिसके हाथ में बंदूक होती है वह कब, किस तरफ उसे मोड़ दे, कोई नहीं जानता। यही नक्सलवाद और माओवाद के नाम पर किया जाता रहा है। व्यवस्था के खिलाफ शुरू हुआ संघर्ष अब निरीह जनता के खिलाफ हो गया है। लोग तंग आ गए हैं। नक्सलवाद भ्रष्ट हो गया है। उसका शिकार आदिवासी समाज ही बन रहा है। नक्सलियों के आतंक से तंग वनवासी समाज ने खुला पत्र लिख है। इस पत्र में बस्तर आदिवासी रक्षा समिति ने नक्सलियों से घोटपाल मड़ई विस्फोट में घायल हुए तीन ग्रामीणों को मुआवजा देने की मांग की है। समिति ने आदिवासी संस्कृति व परम्पराओं को भविष्य में आघात नहीं पहुंचाने की माओवादियों से लिखित गारंटी भी मांगी है। वनवासियों ने साफ कहा है कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो नक्सली कड़ी कार्रवाई के लिए तैयार रहें। संभवत: यह पहला मौका है जब वनवासियों ने नक्सलियों के खिलाफ इस तरह का खुला पत्र जारी किया है। हालात बदल रहे हैं। वनवासी अब और अधिक नक्सल आतंक सहन करने के मूड में नहीं दिख रहे। यह महज एक मांग पत्र नहीं है बल्कि नक्सलियों को खुली चुनौती है। आओ, अब देखते हैं तुम्हें। सचेत उन्हें भी हो जाना चाहिए जो गाए-बगाहे लाल हिंसा का समर्थन करते हैं। तथाकथित बुद्धिजीवियों को वनवासी समुदाय की पीड़ा समझनी होगी और उनके हित में अपनी लेखनी का उपयोग करना चाहिए। स्थितियां बिगड़े उससे पहले सरकार को भी चेतना होगा। आम नागरिकों के हित की रक्षा करना सरकार की ही जिम्मेदारी है। यह नौबत नहीं आनी चाहिए कि नक्सलवाद से लडऩे के लिए जनता को हथियार उठाने पड़ें। भारत सरकार के पास मौका है नक्सल आतंक को जड़ से उखाड़ फेंकने का। पीडि़त और शोषित वनवासी सरकार के साथ आने को तैयार हैं, यदि सरकार की नीयत साफ हो तो।
    वनवासी समाज की चिंता इस बात से भी बढ़ गई है कि नक्सलवाद के नाम पर धीमे-धीमे उनकी संस्कृति को भी निशाना बनाया जा रहा है। उनके लोगों का खून तो बह ही रहा है। नक्सलवाद भले ही वर्ष १९६७ में पश्चिम बंगाल के गांव नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ हो लेकिन इसके नेताओं की वैचारिक प्रेरणा का केन्द्र विदेशी है। नक्सवाद के जन्म के साथ ही इसके प्रारंभिक नेताओं ने राष्ट्र विरोधी नारा लगाया था- 'चेयरमैन माओ ही हमारा चेयरमैन है।' माओ त्से तुंग चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक और चीनी क्रांति का नेता था। जगजाहिर है कि चीन की तथाकथित ग्रेट प्रोलेटोरियन कल्चरल रिवोल्यूशन यानी सांस्कृतिक क्रांति में लाखों लोगों की जान व्यर्थ चली गई थी। करीब २० लाख लोगों की मौत, ४० लाख लोगों को बंदी बनाया गया और चीनी जनता पर बंदूक-तोप की दम पर वामपंथी विचारधारा थोपी गई। स्टालिन (शासन काल १९२४-१९५३) के समय सोवियत संघ में और पॉल पॉट के शासनकाल १९७५-८० के बीच कंबोडिया में निर्दोष लोगों को विचारधारा के नाम पर कत्ल किया गया।   तथाकथित भारतीय नक्सलवाद का कनेक्शन भी अंतरराष्ट्रीय वामपंथी आंदोलनों से है। विदेशी प्रेरणा केन्द्र होने के कारण नक्सलवाद का भारतीय परंपराओं और संस्कृति से कोई सरोकार नहीं है। खासकर हिन्दुत्व के तो ये विरोधी ही हैं। दरअसल, हिन्दुत्व राष्ट्रवाद की सीख देता है और नक्सलवाद की इसमें कोई रुचि नहीं है। दंतेवाड़ा जिले के ग्राम घोटपाल में आंगा देव व ग्राम्य देवता पर श्रद्धा के चलते वार्षिक मड़ई मनाया जाता है। इसी मेले में नक्सलियों ने विस्फोट किया। जिससे दो आदिवासी युवतियों और एक ग्रामीण घायल हो गया है। चार पुलिस जवान भी घायल हुए। इस विस्फोट को वनवासियों ने अपने आराध्य आंगा देव का अपमान  माना है। तीखी प्रतिक्रिया करते हुए रक्षा समिति ने देवताओं का अपमान करने पर आंध्रप्रदेश के नक्सलियों को फांसी देने की भी मांग की है। हालांकि नक्सली पहले भी वनवासी लोगों को निशाना बनाते रहे हैं। मुखबिरी का आरोप लगाकर मासूम-कोमल बच्चों सहित पूरे परिवार को जला दिया जाता है। बेरहमी से उनका कत्ल कर दिया जाता रहा है। तथाकथित नक्सली आंदोलन में शामिल करने के लिए बच्चों को जबरन उठाकर ले जाया जाता है। जवान लड़कियों के साथ दुराचार के मामले भी सामने आने लगे हैं। अब तो इनकी हरकतें बेहद घृणित हो गईं हैं। सुरक्षा जवान की हत्या कर उसके मृत शरीर में बम लगाने की हरकत, नजीर है कि नक्सलवाद विचार का पतन कितना हो चुका है।
    दरअसल, भारत में सक्रिय नक्सली समूह वास्तव में देश के विरुद्ध परोक्ष युद्ध लड़ रहे हैं। पुलिस रक्षक दल पर आक्रमण करना, वनवासियों में दबदबा बनाने के लिए अबोध नागरिकों की निर्मम हत्या, राजनीति का संरक्षण पाने के लिए राजनेताओं की हत्या, धन उगाही के लिए व्यवसायियों को धमकाना, सरकार की विकासोन्मुखी योजनाओं के कार्यान्वयन को रोकना, स्कूल की इमारतों में बम विस्फोट और शिक्षकों का अपहरण कर हत्या करना ऐसी सभी घटनाएं यही संकेत करती हैं। नक्सलियों की लोकतंत्र में आस्था नहीं। वे लोकतंत्र को उखाड़कर अतिवादी व निरंकुश कम्युनिष्ट शासन स्थापित करना चाहते हैं।   अब तक लाल आतंक के नाम पर नक्सली लाखों लोगों का खून बहा चुके हैं। इनमें पुलिस के जवान, सरकारी अफसर, नेता, व्यवसायी, उद्योगपतियों सहित आम नागरिक भी शामिल हैं।
    भारत में ८ प्रतिशत से अधिक वनवासी आबादी है। नक्सलवाद इन्हीं के बीच केंद्रित है। अब तक की सरकारों को १५ प्रतिशत मुस्लिमों की तो चिंता है लेकिन वनांचल में रहने वाले अबोध वनवासियों की फिक्र नहीं। १५ प्रतिशत लोगों के लिए तो अरबों रुपए की योजनाएं चलाई जा रही हैं लेकिन वनवासियों के लिए सिर्फ दिखावा। ये भोले-भाले वनवासी अल्पसंख्यकों की तरह मुखिर नहीं हैं, ये अब तक की केन्द्र सरकारों के वोट बैंक भी नहीं है। क्या इसीलिए इनकी उपेक्षा की जाती है। नक्सलबाड़ी से निकलकर देश के ५० से अधिक जिलों में नक्सलवाद के फैलने के लिए अब तक की सरकारों की उदासीनता ही जिम्मेदार है। बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओड़ीसा, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के जनजातीय और पिछड़े क्षेत्रों में नक्सली गतिविधियां अधिक हैं।  इसे ही रेड कॉरिडोर के नाम से जाना जाता है यानी लाल आतंक का गढ़। हालांकि उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में भी इनकी हिंसक घटनाएं सामने आती हैं। नक्सलवाद से निपटने के लिए सरकारी स्तर पर मजबूती के साथ प्रयास होने चाहिए। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भूमि सुधार, गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेलकूद और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देकर वनवासियों का विश्वास जीतना होगा। वनवासी क्षेत्रों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने होंगे। सड़क, इमारतों और रेल की पटरियों को नुकसान पहुंचाने वाले नक्सलियों से भी कड़ाई से निपटना होगा। सरकार को चाहिए कि वह सेना की भी मदद ले क्योंकि नक्सलवाद अब नासूर बन गया है।  यही नहीं पुलिस का भी आधुनिकीकरण करना होगा। नक्सलियों के पास एके-४७ से लेकर अति आधुनिक हथियार हैं लेकिन पुलिस के पास पुरानी तकनीक की बंदूकें, ऐसे में पुलिस भी कैसे मुकाबले करे। हालांकि नक्सल आतंक से निपटने के नाम पर सरकार के पास नीति है लेकिन नीयत नहीं है। नक्सल प्रभावित इन क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए सरकारों को पुरजोर कोशिश करनी होगी। आधे-अधूरे मन के साथ बदलाव संभव नहीं। लाल आतंक के चगुंग में फंसे वनवासी सुकून चाहते हैं जो उनके नसीब में नहीं।

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

उनका हिन्दू होना ही दुर्भाग्य है !

 को ई भी इंसान अपनी जमीन यूं ही नहीं छोड़ता। उसके साथ उसके पुरखों की याद जुड़ी होती है। लेकिन, पाकिस्तान में हिन्दू एक क्षण भी नहीं रहना चाहते। वे अपनी जमीन, जायदाद सबकुछ छोड़कर बस वहां से भाग जाना चाहते हैं। हाय री दुनिया! उनके लिए यह भी तो मुमकिन नहीं। हिन्दुओं के देश में ही उन्हें रहने को ठौर नहीं मिल रहा तो कहीं और का खयाल कैसे किया जाए। पाकिस्तान से आए १५१ हिन्दुओं पर बैरी सरकार की नजर है। इनका वीजा समाप्त हो गया है। इसलिए सरकार उन्हें यहां से घसीटकर फिर से पाकिस्तानी नर्क में धकेल देना चाहती है। जहां न उनकी इज्जत है न उनके काम की। उनके धर्म को तो वहां हिकारत की नजरों से देखा जाता है। उनकी नाबालिक और जवान बेटियों-बीवीयों पर पाकिस्तानी युवकों-बूढ़ों की नजर ठीक वैसे ही रहती है जैसे कुत्तों की नजर हड्डी पर। लड़कियों का अपहरण, जबरन धर्मांतरण, बेरोजगारी, मताधिकार पर प्रतिबंध, आए दिन प्रताडऩा.... पाकिस्तान में हिन्दुओं की महज २ फीसदी रह गई आबादी को आज यही सब हासिल हैं।
      इस सबसे आजिज आ चुके पाकिस्तानी हिन्दू अब पाकिस्तान में और नहीं रहना चाहते। भारत सरकार भी उनकी मदद नहीं करती। भारत सरकार की ओर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान में हिन्दुओं की स्थिति सुधारने के लिए बात नहीं की जाती। आखिर क्यों...? क्या इसलिए कि वे हिन्दू हैं। शायद हां। ऑस्ट्रेलिया में आतंकवादी होने के शक में एक मुस्लिम डॉक्टर के पकड़े जाने पर भारत के प्रधानमंत्री को नींद नहीं आ सकी थी। जबकि पाकिस्तान में आए दिन हिन्दुओं के साथ दुराचार हो रहा है, वे और उनकी सरकार तान के चादर सो रही है। पाकिस्तान की स्थानीय एजेंसियों की ओर से किए गए शोध बताते हैं कि पाकिस्तान में हर माह औसत २५ लड़कियों का अपहरण होता है और जबरन उनका धर्मांतरण किया जाता है। नतीजा यह है कि विभाजन के समय पाकिस्तान में हिन्दुओं की आबादी करीब 15 फीसदी थी, जो वर्तमान में महज 2 फीसदी से भी कम रह गई है। हिन्दुओं के पूजा स्थल तोड़ दिए गए या फिर उन पर मुसलमानों ने कब्जा कर लिया। फिलवक्त पाकिस्तान में 428 मंदिरों में से सिर्फ 26 में ही पूजा-पाठ होता है। इतना ही नहीं उन्हें अंतिम संस्कार करने तक की आजादी नहीं है। वहां हिन्दू अपने धर्म के मुताबिक परिजन के शव को जला नहीं सकते। स्थानीय मुस्लिम आवाम दबाव बनाकर शव को दफन करवा देती है।
      ऐसी स्थितियों में भला कोई कैसे रह सकता है? जिन 151 हिन्दुओं को सरकार वापस पाकिस्तान भेजना चाह रही है वे ऐसी ही अपमानजनक स्थितियों से तंग आकर भारत आए हैं। उन्हें उम्मीद थी कि यह उनके अपने हिन्दू भाइयों का देश है। यहां उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने के लिए थोड़ी सी जगह मिल सकेगी। लेकिन, दुर्भाग्य कि वे वोट बैंक नहीं है, अल्पसंख्यक नहीं, भारत को अपना मानते हैं भारत विरोधी नहीं है, ऐसे में सरकार उन्हें सिरमाथे कैसे बैठा सकती है। हां, अगर ये हिन्दू नहीं होते तो बांग्लादेशी और पाकिस्तानी घुसपैठियों की तरह इनके राशनकार्ड बनवा दिए जाते, रहने और रोजगार की व्यवस्था कर दी जाती। पिछले दिनों यूपीए सरकार के केन्द्रीय गृहराज्य मंत्री एम रामचंद्र ने संसद को लिखित बयान में कहा था कि इन पाकिस्तानी हिन्दुओं को वापस पाकिस्तान जाना होगा। इनका वीजा समाप्त हो चुका है। जब यह बात मीडिया के जरिए समाज में पहुंची तो कुछ संगठनों की संवेदनाएं जागी। उन्होंने जाकर उनके सुख-दु:ख को जानने की कोशिश की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारी व कार्यकर्ता, विश्व हिन्दू परिषद, भारतीय जनता पार्टी और अन्य हिन्दू संगठनों के लोग वहां पहुंचे। संत श्री श्री रविशंकर, स्वामी स्वरूपानंद, स्वामी आनंदस्वरूप सहित अन्य साधु-संत की उनको दिलासा देने पहुंचे। इन पाकिस्तानी हिन्दुओं को भारत में शरण दी जानी चाहिए इस बात को लेकर अखिल भारत हिन्दू महासभा दिल्ली हाईकोर्ट में पहुंची। हिन्दू महासभा की याचिका पर बुधवार को दिल्ली हाईकोर्ट में कार्यकारी चीफ जस्टिस एके सीकरी और जस्टिस राजीव सहाय एंडलॉ की बेंच ने विदेश और गृह मंत्रालय से इस मसले पर 29 फरवरी तक जवाब मांगा है। केन्द्रीय गृहराज्य मंत्री एम. रामचन्द्र के बयान से घबराए हुए ये हिन्दू राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मानवाधिकार आयोग तक में गुहार लगा चुके हैं। मुसीबत के मारे हिन्दू करें भी तो क्या? यहां उनके अपने सुनवाई नहीं कर रहे बल्कि उन्हें जबरन पाकिस्तान भेजना चाह रहे हैं और वहां मुसलमान उन्हें जीने नहीं देंगे।
      आश्चर्य इस बात पर अधिक है कि पाकिस्तान से आए महज 151 हिन्दुओं को वापस पाकिस्तान भेजने के लिए केन्द्र सरकार कटिबद्ध दिख रही है जबकि सालों से पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान से बड़ी संख्या में अवैध रूप से भारत आए मुसलमानों को उनके देश भेजने को कभी उत्सुक नहीं रही। आजादी के बाद के 60 सालों में कांग्रेस व अन्य तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों ने बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए घुसपैठियों को बसाने का ही काम किया है न की भगाने का। पश्चिम बंगाल, असम सहित पूर्वांचल के राज्यों में अवैध बांग्लादेशियों के चलते स्थितियां बिगड़ गईं हैं। केन्द्रीय गृहराज्य मंत्री एम रामचंद्र राज्यसभा के एक प्रश्न के उत्तर में बताते हैं कि देश में करीब 70 हजार विदेशी अवैध तरीके से रह रहे हैं। इनमें 28 हजार से अधिक बांग्लदेशी हैं। इसके अलावा 13747 अफगानिस्तानी, 8319 पाकिस्तानी, 2461 अमरीकी, 1817 ब्रिटिश और 662 चीनी अवैध तरीके से भारत में रह रहे हैं। उक्त सभी आंकड़े सरकारी हैं। वास्तविकता इससे अलग है। देश में बांग्लादेश से और बांग्लादेश के रास्ते पाकिस्तान, अफगानिस्तान के लोग भारी संख्या में आए दिन घुसपैठ करते हैं। सरकार 151 हिन्दुओं को भगाने के लिए तो आतुर दिख रही है लेकिन अन्य के बारे में कोई कार्रवाई करने के मूड में नहीं दिखती। पिछले दिनों एक शोध में बताया गया कि बांग्लादेश, असम और पूर्वांचल के राज्यों में इन अवैध विदेशियों को वोट की खातिर राशनकार्ड, वोटर आईडी बनवा दिए गए। वैध तरीके से बने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कई बांग्लादेशियों ने तो नगरीय निकाय के चुनाव भी लड़े और जीत भी हासिल की। कहा जा रहा है कि पाकिस्तान से आए लोगों का धर्म हिन्दू है इसलिए इनको सरकार से मदद की आशा नहीं रखनी चाहिए।
      पाकिस्तान में हिन्दुओं की दुर्दशा के गवाह हैं दिल्ली के मजनूं टीला में डेरा डाले 151 पाकिस्तानी हिन्दू : पाकिस्तान में हिन्दुओं की क्या स्थिति है, यह किसी से छिपी नहीं है। भारत सरकार भी इस बात से भली-भांति परिचित है। भारत में पर्याप्त आजादी के बाद भी अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए छाती पीटने वाले बुद्धिजीवी, सेक्यूलर और एक्टिविस्ट भी जानते हैं कि कैसे पाकिस्तान में 62 सालों में हिन्दू 15 फीसदी से महज 2 फीसदी रह गए। लेकिन, सवाल उठता है सब जानते हैं तो बोलते क्यों नहीं? भारत के अल्पसंख्यकों के हितों की चिंता तो अंतरराष्ट्रीय पटल तक करते हैं लेकिन पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की रक्षा पर घर में ही चुप्पी साध लेते हैं। मीडिया कई दफा पाकिस्तान में हिन्दुओं की क्या दुर्दशा हो रही है इसकी जानकारी देती रहती है। कुछ राष्ट्रवादी सोच के पत्र-पत्रिका भी समय-समय पर पाकिस्तान के हिन्दुओं के हितों की चिंता करते दिखती हैं। इनके दिए आंकड़ों को तो सरकार के लोग और बुद्धिजीवी सेक्यूलर झूठ का पुलिंदा करार दे देते हैं। मेरे ही एक आलेख पर दिल्ली के एक पत्रकार अंगुली उठाते हुए कहते हैं कि पाकिस्तान में ऐसा नहीं होता आपकी जानकारी गलत है। पता नहीं किस ने आपको यह जानकारी मुहैया कराई है। वहां हिन्दू लड़कियों के साथ बलात्कार, जबरन धर्मांतरण, टेरर टैक्स जैसी कोई बात नहीं। उन महाशय और उनके जैसे तमाम सेक्यूलरों को जवाब देने के लिए दिल्ली के मजनूं टीला में डेरा डाले 151 पाकिस्तानी हिन्दू मौजूद हैं।
इंडिया टुडे की रपट कहती है कि पाकिस्तान में हिन्दू लड़कियों का अपहरण आम बात है : हिन्दी की प्रतिष्ठित समाचार पत्रिका इंडिया टुडे ने अपने 1 जून, 2011 के अंक में बताया है कि पाकिस्तान में हिन्दुओं का जीना मुहाल है। उनका हर दिन खौफ के साए में गुजरता है। मुसलमानों के लिए बने प्याऊ से हिन्दू पानी भी नहीं पी सकता। अपने परिजनों का अंतिम संस्कार करने तक की आजादी उन्हें नहीं है। उन्हें मजबूरी में इस्लाम की शिक्षा ग्रहण करनी पड़ती है क्योंकि वहां के सभी स्कूलों का इस्लामीकरण कर दिया गया है। हाल ही में अमरीका की एक सरकारी संस्था की रिसर्च बताती है कि पाकिस्तान के स्कूलों में भारत और हिन्दुओं के खिलाफ घृणा का पाठ पढ़ाया जाता है। इंडिया टुडे की रपट बताती है कि कराची की एक फैक्टरी में हिन्दू कर्मचारी जगदीश कुमार की हत्या फैक्टरी के ही मुसलिम साथियों ने कर दी। उस पर इस्लाम की निंदा करने का आरोप लगा दिया गया। पेशावर के जगदीश भट्टी इंडिया टुडे को बताते हैं कि नौकरी पाने के लिए उनके बेटे को मुसलिम नाम रखना पड़ा। पुलिस अधिकारियों ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर इंडिया टुडे को बताया कि कई हिन्दुओं से सुरक्षा के नाम पर हर माह वसूली की जाती है। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की परिषद के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता अमरनाथ मोटूमल इंडिया टुडे को बताते हैं कि अकेले कराची में ही हिन्दू लड़कियों का अपहरण आम बात है। आगे पत्रिका में लिखा है कि नगरपारकर इलाके की 17 साल की एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया जबकि आकली गांव की 15 साल की लड़की का अपहरण कर जबरन उसका धर्म परिवर्तन किया गया।
तहलका की विशेष खबर बताती है पाकिस्तान में हिन्दू होना गुनाह : स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के लिए प्रसिद्ध पत्रिका तहलका ने 31 दिसंबर 2011 के अपने अंक में पाकिस्तान से आए 151 हिन्दुओं के मुख से पाकिस्तान में हिन्दुओं के हालात का जिक्र किया है। तहलका के संवाददाता को इन हिन्दुओं में से 22 वर्षीय दयाराम बताते हैं कि वहां हिन्दुओं का धर्म नहीं है। हम लोगों को डराया धमकाया जाता है। धर्म बदलने को कहा जाता है। स्कूलों में सिर्फ इस्लाम की शिक्षा देते हैं। परेशानियां सह कर अगर हिन्दू पढ़ भी ले तो उसे नौकरी नहीं मिल पाती। एक नौजवान बताता है कि हम स्कूल में जवान लड़कियों को पढऩे नहीं भेजते थे क्योंकि वहां लोग हिन्दू लड़कियों को अगवा कर धर्म परिवर्तन करा कर निकाह करा लेते हैं। जैसे आपके यहां लड़कियां आराम से अकेले दिल्ली से मुंबई चली जाती हैं, वैसे हमारे यहां इतनी दूर अकेले नहीं जा सकतीं। 35 वर्षीय आशा देवी कहती है कि यहां हमने पहली बार दिवाली इतनी खुशी से मनाई। वहां तो पता ही नहीं चलता कि त्योहार है। मनाते भी थे तो अपने घर के अंदर एक कोने में एक-दो दिए जला कर। होली भी बाहर नहीं खेल सकते थे। सबसे अधिक दु:ख वाली बात है कि वहां अंतिम संस्कार भी आप अपने ढंग से नहीं कर सकते। इस बारे में सुनील ने तहलका को बताया कि वहां हिन्दुओं को मरने के बाद जलाने भी नहीं दिया जाता है। शव जलाने के वक्त लोग पुलिस लेकर आ जाते हैं कि जलाओ मत, हमें बदबू आती है। दो-तीन दिन तक लाश ऐसे ही पड़ी रहती है। फिर कुछ लोग दबाव में आकर दफना देते हैं।
      बहरहाल, इन सब बातों को जानने के बाद भी सरकार इन हिन्दुओं को पाकिस्तान भेजती है तो लानत है ऐसी सरकार पर। केन्द्र सरकार को चाहिए कि पाकिस्तान से आए इन हिन्दुओं बयानों को आधार बनाकर अंतरराष्ट्रीय पटल पर मजबूती के साथ पाकिस्तान में रह रहे अन्य हिन्दुओं की हितों की रक्षा के लिए पाकिस्तान की सरकार पर दबाव बनाए। साथ पाकिस्तान में मानवाधिकारों की क्या स्थिति है इस बारे में दुनिया को बताया जाए।

रविवार, 20 नवंबर 2011

...आखिर गलती किसकी

  छो टा-सा बच्चा एक दिन घर-घर खेल रहा था। उसने अपने घर का डिजाइन बनाया। बच्चे ने एक छोटा-सा कमरा मुख्य भवन से दूर बनाया था। बालक के पिता ने डिजााइन देखा और बेटे को शाबासी देते हुए पूछा - वाह! सोनू, बहुत अच्छा घर बनाया है। यह कहकर उसने अपने बेटे को गोद में उठा लिया। फिर पिता ने पूछा कि - अच्छा बेटे, एक बात तो बताओ कि ये छोटा-सा कमरा क्यों बनाया है। तब उस बच्चे ने कहा - यह कमरा आपके और मम्मी के लिए है, जब आप बूढ़े हो जाएंगे। मैं और मेरी पत्नी इस घर में रहेंगे और आप उस कमरे में रहेंगे। जैसे अभी दादा-दादी रहते हैं। बाहर बने दूसरे कमरे में।
           बच्चे की बात सुनकर पिता को अपनी गलती का अहसास हुआ। फिर उसने अपनी गलती सुधारी या नहीं, पता नहीं। लेकिन, इस कहानी से साफ होता है कि हम अपने माता-पिता के साथ जैसा कर रहे हैं, वैसा ही बुढ़ापे में हमारे बेटे हमारे साथ करने वाले हैं।
         दरअसल, भेल की ओर से भोपाल में संचालित वृद्धाश्रम 'आनंदम्' के वाकये से यह कहानी याद आई। भेल प्रबंधन के एक फैसले से 'आनंदम्'  में रह रहे कई बुजुर्गों के माथे पर चिंता की रेखाएं उभर आईं। उन्हें खबर लगी थी कि 'आनंदम्' बंद होने वाला है। ऐसे में उन्हें यहां से जाना होगा। लेकिन, कहां जाएंगे? यह तय नहीं था। सभी बुजुर्गों को उनके अपनों ने घर से तो पहले ही बेदखल कर दिया था। इसलिए घर का रास्ता तो वे जानबूझकर याद करना नहीं चाहते थे। इन बुजुर्गों ने अपनी तमाम युवा अवस्था बच्चों की बेहतर परवरिश में खपा दी थी। एक आस थी कि बच्चे बुढ़ापे की लाठी बन जाएंगे और उनको खुश देखकर सुकून से जिंदगी बसर हो जाएगी। बच्चे बड़े भी हो गए और बड़े आदमी भी बन गए, लेकिन बुजुर्ग अब भी जिंदगी की जंग में हैं। अपने बेटों के आलीशान घरों, बंगलों और फ्लैटों में उन्हें इतनी सी भी जगह मयस्सर नहीं कि वे अपनी जिन्दगी की शाम वहां बिता सकें। यह भी संभव है कि बेटों ने अपने माता-पिता को बेदखल कर जिन भवनों पर कब्जा जमा रखा है उनकी नींव में इनकी पसीने की इक बूंद तक न हो। वह भी मां-बाप की कमाई हो।
      हालांकि भेल प्रबंधन ने 'आनंदम्' को बंद करने की बात को कोरी अफवाह बताया है। लेकिन, इस मसले से कई सवाल उपजे। उनमें सबसे महत्वपूर्ण है कि भारत और भारतवासियों की दशा और दिशा क्या हो गई हैं। उनकी प्राथमिकताएं ऐश-ओ-आराम है या सेवा और कर्तव्य। युवा सोच को क्या हो गया है? किस रास्ते पर चल निकले हैं ये? जिन मां-बाप ने तमाम कष्ट सहकर, अपनी इच्छाओं को तिलांजलि देकर पहले अपने बच्चे की ख्वाहिश पूरी की। आज उनके बच्चे उन्हें अपने साथ रखने को तैयार नहीं। ऐसी परिस्थितियों में जब कई बार मां-बाप बच्चों पर हक जताते हुए कहते हैं कि बेटे हमने अपना सारा जीवन तुम्हारी बेहतरी के लिए लगा दिया, क्या अब तुम्हारा इतना भी फर्ज नहीं बनता कि हमें बुढ़ापे में दो वक्त की रोटी और सिर छुपाने को छत दे सको। तब अधिकांश मामलों में बच्चों द्वारा जवाब दिया जाता है - 'यह तो आपका फर्ज था। इतना भी नहीं कर सकते थे तो हमें पैदा क्यों किया?' इन नालायक औलादों से पूछना चाहिए कि जिस तरह आज तुम अपना फर्ज भूल रहे हो वैसे ही यदि जब तुम इनकी तरह असहाय थे और ये अपना फर्ज भूल जाते तब तुम्हारा क्या होता? निश्चित ही कहीं सड़ रहे होते। दरअसल, ये लोग इस भ्रम में होते हैं कि हम जैसा कर रहे हैं वैसा हमें नहीं भोगना होगा। लेकिन, दोस्त पृकृति का नियम है जैसा करोगे वैसा भरोगे। आज नहीं तो कल।
      यह दास्तान सिर्फ भेल भोपाल के 'आंनदम्' में रहने वाले बुजुर्गों की नहीं है। देशभर में यह बीमारी फैली हुई है। इसका इलाज जरूरी है। कुछ दिन पहले ही खबर आई थी कि केरल के एर्नाकुलम में 88 वर्षीय वृद्ध भास्करन नायर ने बेटों द्वारा जबरन वृद्धाश्रम भेजे जाने से दुखी होकर आत्महत्या कर ली। वृद्ध के आठ बेटे थे। एक भी बेटा उन्हें अपने साथ रखने को तैयार नहीं हुआ। सोचो! कभी एक ने आठ को पाला था। आज आठ एक को नहीं पाल पा रहे हैं। वहीं मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर के एक बेटे ने एक प्लॉट को पाने के लिए अपनी जीवित मां को मृत घोषित कर दिया। दरअसल 62 वर्षीय रेशमा वेदी पाल के नाम से ग्वालियर में एक प्लॉट था। इसे हथियाने के लिए उसके बेटे नीरज ने कागजों में अपनी मां को मार दिया। गांव से उसने अपनी मां का फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाया। इसके बाद उस प्लॉट अपने नाम करवाकर बेच दिया। अब विधवा अबला न्याय की उम्मीद लिए नगर निगम और पुलिस अफसरों के दफ्तरों में चक्कर काट रही है। ऐसी दु:खद और शर्मनाक घटनाएं भरी पड़ी हैं। एक खोजो चार मिलेंगी। क्योंकि लोग अधिकारों की बात तो कर रहे हैं लेकिन जिम्मेदारी और कर्तव्य से बच रहे हैं। अपने लिए तो सम्मान की चाह है लेकिन दूसरे के सम्मान की फिक्र नहीं। एक और बात है घर से बुजुर्गों को दूर करना एक तरह से घर से छत हटाने जैसा है। बुजुर्ग घर में संस्कार की पाठशाला भी होते हैं। लेकिन, अब घर में उनके नहीं होने से नौनिहालों का लालन-पालन भी मशीनी हो गया है। इसीलिए उनमें संस्कारों की कमी साफ देखी जा रही है।
    आखिर में इतना ही, क्या इन वृद्ध दंपत्तियों ने भी कहानी के अनुसार गलती की थी। माना कि इन्होंने वह गलती की थी। अब इनके बच्चे उसी परंपरा पर चल निकले हैं। ऐसे में क्या यह माना जाना चाहिए कि यह परंपरा हमेशा के लिए बन जाएगी।

रविवार, 5 जून 2011

आप को कुछ कहने का अधिकार नहीं!

 आ प अपना काम करें, देश की समस्याओं पर बोलने का कोई अधिकार आपको नहीं है। अगर आप डाक्टर हैं तो लोगों का इलाज करें। शिक्षिक हैं तो सिर्फ वही पढ़ाएं जो किताबों में लिखा है। इंजीनियर है तो बिल्डिंग बनाएं, देश निर्माण करने की आवश्यकता नहीं। यही संदेश दिया है कांग्रेस ने चार-पांच जून की दरमियानी रात रामलीला मैदान में योग गुरु बाबा रामदेव के अनशन पर बर्बर कार्रवाई कर। कांग्रेस और उनके नेताओं ने मीडिया के सामने खुलकर कहा कि हमने भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन कर रहे इस देश के नागरिकों पर आंसू गैस के गोले दागकर और लाठियां भांज कर एकदम सही किया है। इतना ही नहीं उन्होंने उन तमाम लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई करने का मन बना लिया है, जिन्होंने बाबा रामदेव का साथ दिया है या जिन्होंने भ्रष्टाचार के विरोध में अपनी आवाज उठाने का प्रयास किया। पूरी कांग्रेस और उनके बड़बोले नेता बकबक करने में लगे हैं कि बाबा रामदेव योग गुरु हैं, उन्हें लोगों को सिर्फ योग सिखाने का काम ही करना चाहिए। भ्रष्टाचार के खिलाफ देश जागरण की जरूरत नहीं। उनकी मंशा साफ देश को लूटने की दिखती है। वे चाहते हैं कि हम आराम से भ्रष्टाचार करते रहें और कोई हमें कुछ न कहे। उन्हें पता है जनता जाग गई तो हमने देश में जो लूट-खंसोट मचा रखी है वह बंद करनी पड़ेगी। मुझे आज तक यह समझ नहीं आया कि यह कौन सा तर्क है कि आप जो काम कर रहे हैं वही करें। देश की समस्याओं के बारे में कुछ भी कहने का आपको अधिकार नहीं। अरे, इस देश के हर एक नागरिक का अधिकार है कि वह देश में चल रही गड़बड़ियों को उजागर कर सके, उनके खिलाफ आवाज बुलंद करे। इस देश में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में राजपाठ में साधु-संतो, शिक्षिकों और उपदेषकों ने हमेशा से मार्गदर्शन दिया है। इस देश के इतिहास में तो इसकी लम्बी परंपरा है।
          कांग्रेस और उसके नेताओं ने 60 सालों में इस देश को जमकर लूटा है। अब जनता जाग रही है तो उसे डर लग रहा है कि उसका गोरखधंधा कैसे जारी रहेगा। कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ठग है, धोखेबाज, बर्बर है। उसने पहले अन्ना हजारे को धोखा दिया और अब बाबा रामदेव के अनशन पर बल प्रयोग किया है। वैसे हमेशा से ही कांग्रेस के शासनकाल में जनआंदोलनों का यही हश्र होता आया है। आपातकाल में भी लाखों लोगों पर अनगिनत अत्याचार किए गए। पांच जून की दरमियानी रात जो हुआ उसका सारे देश में सब ओर से विरोध हो रहा है। कांग्रेस के इशारे पर रात में सोते हुए लोगों पर लाठीचार्ज जैसी दमनात्मक कार्रवाई की गई। पांडाल में हजारों महिलाएं अपने छोटे बच्चों के साथ सो रहीं थीं। वृद्ध साधु-संन्यासी और देशभर से आए हजारों आमजन दिनभर की थकान के बाद गहरी नींद में थे। ऐसे वक्त की गई बर्बर पुलिया कार्रवाई की तुलना जलियांवाला बाग से की जा रही है। जो कि अतिश्योक्ति कतई नहीं। कल्पनामात्र से ही आंखें भर आती हैं कि अपरा-तफरी में छोटे-छोटे बच्चों की क्या हालत हुई होगी। गरीबों का मसीहा बनने का ढोंग करने वाला राहुल गांधी इन्हें देखने नहीं आया और न ही का बयान जारी किया कि यहां महिलाओं के साथ कांग्रेस के इशारे पर कितनी बर्बता बरती गई। लेकिन, उस दयालु, करुणा के प्रतीक, मानवता के रक्षक राहुल गांधी का कहीं कोई अता-पता नहीं।
...... ये कैसी सरकार है जो एक और तो भ्रष्टाचारियों और आतंकवादियों के खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं कर रही है वहीँ निर्दोष और समस्याओं से घिरे लोगों पर आसू गैस के गोले दाग कर अत्याचार कर रही है... क्या ये सरकार समाजकंटकों के बचाव और देश भक्तों के विरोध में है...???


किसने क्या कहा -

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी - इस घटना को रामलीला मैदान में रावण लीला करार दिया।
भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी - बाबा रामदेव की गिरफ्तारी और लोगों पर लाठीचार्ज की तुलना जलियांवाला बाग कांड और आपातकाल की।
गाधीवादी कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे - बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर कल मध्यरात्रि को हुई पुलिस कार्रवाई देश की लोकशाही पर कलंक की तरह है और इस कार्रवाई के लिए सरकार को सबक सिखाने वाला आदोलन करने की जरूरत है।
भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी - शनिवार को बाबा रामदेव के खिलाफ की गई कार्रवाई इमर्जेंसी के दिनों की याद दिलाती है। पार्टी अध्यक्ष ने कहा, ' यह लोकतंत्र को कलंकित करने वाली घटना है , जिसे सोनिया गांधीऔर मनमोहन सिंह के इशारे पर अंजाम दिया गया। पुलिस और आरएएफ ने लोकतांत्रिक तरीके से अनशन कर रहे निहत्थे लोगों पर अत्याचार किया , जो दुखद है।
संतोष हेगड़े - कर्नाटक के लोकायुक्त और लोकपाल विधेयक मसौदा समिति में समाज की ओर से शामिल सदस्य संतोष हेगड़े ने कहा कि बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर की गई पुलिस कार्रवाई आपातकाल के दिनों की याद दिलाती है। पुलिस ने रामलीला मैदान पर धारा 144 लगा दी। धारा 144 तब लगाई जाती है जब कानून व्यवस्था से जुड़ी स्थिति बिगड़ने की आशंका होती है। लेकिन जब पुलिस कार्रवाई हुई तब रामदेव, उनके समर्थक, महिलाएं और बच्चे सो रहे थे। सोते लोग कैसे कानून व्यवस्था से जुड़ी स्थिति बिगाड़ सकते हैं।
शांति भूषण - पुलिस की इस बर्बर कार्रवाई से आपातकाल की याद आ जाती है। उन्होंने कहा कि यह काफी निंदनीय है और प्रधानमंत्री को इस मुद्दे पर इस्तीफा देना चाहिए।
बीजेपी के प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर - सभी को इसका विरोध करना चाहिए। उन्होंने इसे आजादी और लोकतंत्र, दोनों पर हमला बताया है।
आरएसएस प्रवक्ता राम माधव - सरकार का रवैया हैरान करने वाला है। सरकार भ्रष्टाचारियों से डर गई है, जिस कारण आंदोलन को जबरन खत्म करवाया गया। स्वामी अग्निवेश ने भी पुलिस कार्रवाई की निंदा करते हुए कहा कि वे इसका विरोध करेंगे।
अरविंद केजरीवाल - केंद्र सरकार ने बाबा और अन्ना दोनों को धोखा दिया है।
बाबा रामदेव - हरिद्वार पहुंचने के बाद कहा कि यूपीए सरकार मेरे एन्काउंटर की साजिश कर रही थी। उन्होंने प्रेस प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अनशन से पहले होटल में केंद्रीय मंत्रियों के साथ मीटिंग के दौरान भी उन्हें अनशन न करने के लिए धमकी दी गई थी। सोनिया गांधी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि यूपीए अध्यक्ष के निर्देश पर ही रामलीला मैदान में जमा महिलाओं और बच्चों बर्बर कार्रवाई की गई।

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

राष्ट्रवादी और राष्ट्रविरोधी एक से दिखे बाबा को

राहुल चले दिग्विजय के नक्शेकदम पर, कहा संघ और सिमी एक जैसे

रा हुल 'बाबा' ने बुधवार को मध्यप्रदेश के प्रवास पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और सिमी की तुलना करते हुए दोनों को एक समान ठहरा दिया। हर किसी को राहुल की बुद्धि पर तरस आ रहा है। जाहिर है मुझे भी आ रहा है। उनके बयान को सुनकर लगा वाकई बाबा विदेश से पढ़कर आए हैं, उन्होंने देश का इतिहास अभी ठीक से नहीं पढ़ा। उन्हें थोड़ा आराम करना चाहिए और ढंग से भारत के इतिहास का अध्ययन करना चाहिए।  या फिर लगता है कि अपनी मां की तरह उनकी भी हिन्दी बहुत खराब है। राष्ट्रवादी और राष्ट्रविरोधी में अंतर नहीं समझ पाए होंगे। अक्टूबर एक से तीन तक मैं भोपाल प्रवास पर था। उसी दौरान भाजपा के एक कार्यकर्ता से राहुल को लेकर बातचीत हुई। मैंने उनसे कहा कि वे पश्चिम बंगाल गए थे, वहां उन्होंने वामपंथियों का झंड़ा उखाडऩे की बात कही। कहा कि वामपंथियों ने बंगाल की जनता को धोखे में रखा। लम्बे समय से उनका एकछत्र शासन बंगाल में है, लेकिन उन्होंने बंगाल में कलकत्ता के अलावा कहीं विकास नहीं किया। तब वामपंथियों ने बाबा को करारा जवाब दिया कि राहुल के खानदान ने तो भारत में वर्षों से शासन किया है। उनका खानदान भारत तो क्या एक दिल्ली को भी नहीं चमका पाए। इस पर राहुल दुम दबाए घिघयाने से दिखे, उनसे इसका जवाब देते न बना। अब राहुल मध्यप्रदेश में आ रहे हैं। तब उन भाजपा कार्यकर्ता ने कहा आपको क्या लगता है वह यहां कुछ उल्टा-पुल्टा बयान जारी करके नहीं जाएंगे। मैंने कहा बयान जारी करना ही तो राजनीति है, लेकिन मैंने राहुल से इस बयान की कल्पना भी नहीं की थी।
    संघ मेरे अध्ययन का प्रिय विषय रहा है। आज तक मुझे संघ और सिमी में कोई समानता नहीं दिखी। इससे पूर्व एक पोस्ट में मैंने लिखा था कि ग्वालियर में संघ की शाखाओं में मुस्लिम युवा और बच्चे आते हैं। इसके अलावा संघ के पथ संचलन पर मुस्लिम बंधु फूल भी बरसाते हैं। इससे तात्पर्य है कि संघ कट्टरवादी या मुस्लिम विरोधी नहीं है। राहुल के बयान से तो यह भी लगता है कि उन्हें इस बात की भी जानकारी न होगी कि संघ के नेतृत्व में एक राष्ट्रवादी मुस्लिम मंच का गठन भी किया गया है। जिससे हजारों राष्ट्रवादी मुस्लिमों का जुड़ाव है। जबकि सिमी के साथ यह सब नहीं है। वह स्पष्टतौर पर इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन है। जो इस्लामिक मत के प्रचार-प्रसार की आड़ में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देता रहा है। ऐसे में वैचारिक स्तर पर भी कैसे संघ और सिमी राहुल को एक जैसे लगे यह समझ से परे है।

    राहुल बाबा से पूर्व संघ पर निशाना साधने के लिए उन्होंने एक बंदे को तैनात किया हुआ है। संघ आतंकवादी संगठन है, उसके कार्यालयों में बम बनते हैं, पिस्टल और कट्टे बनते हैं। इस तरह के बयान देने के लिए कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह की नियुक्ति की हुई है। इसलिए संघ की इस तरह से व्याख्या अन्य कांग्रेसी कभी नहीं करते। बाबा ने यह कमाल कर दिखाया। बाबा ने यह बयान भोपाल में दिया। मुझे एक शंका है। कहीं दिग्विजय सिंह ने अपना भाषण उन्हें तो नहीं रटा दिया। क्योंकि जब राहुल के बयान की चौतरफा निंदा हुई तो उनके बचाव में सबसे पहले दिग्विजय ही कूदे। खैर जो भी हुआ हो। यह तो साफ हो गया कि राहुल की समझ और विचार शक्ति अभी कमजोर है। वे अक्सर भाषण देते समय अपने परिवार की गौरव गाथा सुनाते रहते हैं। मेरे पिता ने फलां काम कराया, फलां विचार दिया। इस बार उन्होंने यह नहीं कहा कि जिस संघ को वे सिमी जैसा बता रहे हैं। उनके ही खानदान के पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संघ को राष्ट्रवादी संगठन मानते हुए कई मौकों पर आमंत्रित किया। 1962 में चीनी आक्रमण में संघ ने सेना और सरकारी तंत्र की जिस तरह मदद की उससे प्रभावित होकर पंडित नेहरू ने 26 जनवरी 1963 के गणतंत्र दिवस समारोह में सम्मिलित होने के लिए संघ को आमंत्रित किया और उनके आमंत्रण पर संघ के 300 स्वयं सेवकों ने पूर्ण गणवेश में दिल्ली परेड में भाग लिया। कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा विरोध होने पर नेहरू ने कहा था कि उन्होंने देशभक्त नागरिकों को परेड में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया था। अर्थात् नेहरू की नजरों में संघ देशभक्त है और राहुल की नजरों में आतंकवादी संगठन सिमी जैसा। इनके परिवार की भी बात छोड़ दें तो इस देश के महान नेताओं ने संघ के प्रति पूर्ण निष्ठा जताई है। उन नेताओं के आगे आज के ये नेता जो संघ के संबंध में अनर्गल बयान जारी करते हैं बिल्ली का गू भी नहीं है।
    1965 में पाकिस्तान ने आक्रमण किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री व प्रात: पूज्य लाल बहादुर शास्त्री जी ने सर्वदलीय बैठक बुलाई। जिसमें संघ के सर संघचालक श्री गुरुजी को टेलीफोन कर आमंत्रित किया। पाकिस्तान के साथ 22 दिन युद्ध चला। इस दौरान दिल्ली में यातायात नियंत्रण का सारा काम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को सौंपा गया। इतना ही नहीं जब भी आवश्यकता पड़ती दिल्ली सरकार तुरंत संघ कार्यालय फोन करती थी। युद्ध आरंभ होने के दिन से स्वयं सेवक प्रतिदिन दिल्ली अस्पताल जाते और घायल सैनिकों की सेवा करते व रक्तदान करते। यह संघ की देश भक्ति का उदाहरण है।
    1934 में जब प्रात: स्मरणीय गांधी जी वर्धा में 1500 स्वयं सेवकों का शिविर देखने पहुंचे तो उन्हें यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि अश्पृश्यता का विचार रखना तो दूर वे एक-दूसरे की जाति तक नहीं जानते। इस घटना को उल्लेख गांधी जी जब-तब करते रहे। 1939 में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर पूना में संघ शिक्षा वर्ग देखने पहुंचे। वहां उन्होंने डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (संघ के स्थापक) से पूछा कि क्या शिविर में कोई अस्पृश्य भी है तो उत्तर मिला कि शिविर में न तो 'स्पृश्य' है और न ही 'अस्पृश्य'। यह उदाहरण है सामाजिक समरसता के। जो संघ के प्रयासों से संभव हुआ।
    वैसे सिमी की वकालात तो इटालियन मैम यानि राहुल बाबा की माताजी सोनिया गांधी भी कर चुकी हैं। मार्च 2002 और जून 2002 में संसद में भाषण देते हुए सोनिया गांधी ने सिमी पर प्रतिबंध लगाने के लिए एनडीए सरकार के कदम का जोरदार विरोध किया। सोनिया की वकालात के बाद कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने 2005 में प्रतिबंध की अवधि बीत जाने के बाद चुप्पी साध ली, लेकिन उसे फरवरी 2006 में फिर से प्रतिबंध लगाना पड़ा। इसी कांग्रेस की महाराष्ट्र सरकार ने 11 जुलाई 2006 को हुए मुंबई धमाकों में सिमी का हाथ माना और करीब 200 सिमी के आतंकियों को गिरफ्तार किया। सिमी के कार्यकर्ताओं को समय-समय पर राष्ट्रविरोधी हिंसक गतिविधियों में संलिप्त पाया गया है।
क्या है सिमी
    स्टूडेन्ट्स इस्लामिक मूवमेन्ट ऑफ इण्डिया (सिमी) की स्थापना 1977 में अमरीका के एक विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा प्राप्त प्राध्यापक मोहम्मद अहमदुल्लाह सिद्दीकी ने की थी। वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता और जनसंचार में प्राध्यापक था। सिमी हिंसक घटनाओं तथा मुस्लिम युवाओं की जिंदगी बर्बाद करने वाला धार्मिक कटट्रता को पोषित करने वाला गिरोह है। संगठन की स्थापना का उद्देश्य इस्लाम का प्रचार-प्रसार करना बतलाया गया। लेकिन इसकी आड़ में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दिया गया।
दुनिया भर के आतंकी संगठनों से मिलती रही सिमी को मदद-
-वल्र्ड असेम्बल ऑफ मुस्लिम यूथ, रियाद
  • इंटरनेशनल इस्लामिक फेडरेशन ऑफ स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन, कुवैत
  • जमात-ए-इस्लाम, पाकिस्तान
  • इस्लामी छात्र शिविर, बांग्लादेश
  • हिज उल मुजाहिदीन
  • आईएसआई, पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था
  • लश्कर-ए-तोएयबा
  • जैश-ए-मोहम्मद
  • हरकत उल जेहाद अल इस्लाम, बांग्लादेश