रविवार, 31 मई 2026

संघ शिक्षा वर्ग में डॉ. अंबेडकर ने देखी समरसता

संघ शताब्दी वर्ष : वर्ष 1939 में पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग के सायंकालीन बौद्धिक सत्र में बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने स्वयंसेवकों को किया था संबोधित

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से आयोजित शिक्षा वर्गों में स्वयंसेवक क्या सीख रहे हैं, इसकी प्रत्यक्ष अनुभूति कराने के लिए संघ-सृष्टि के बाहर के महानुभावों को वर्ग में आमंत्रित करने की परंपरा प्रारंभ से रही है। प्रारंभ में बौद्धिक या समापन समारोह की अध्यक्षता के लिए महानुभावों को आमंत्रित किया जाता था, लेकिन अब तो वर्ग के बीच में भी समाज के प्रमुखजनों को ‘वर्ग दर्शन’ कराने की योजना रहती है। जब स्वयंसेवक सामूहिक रूप से मैदान पर अभ्यास कर रहे होते हैं या भोजन कर रहे होते हैं, उस समय विशिष्ट अतिथियों को आमंत्रित करके उन्हें वर्ग दर्शन कराया जाता है। आपको यह जानकर अच्छा लगेगा कि संघ शिक्षा वर्ग का दर्शन करने के लिए महात्मा गांधी से लेकर बाबा साहब डॉ. अंबेडकर तक आ चुके हैं। सामाजिक क्रांति के अग्रदूत बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर संघ शिक्षा वर्ग की प्रत्यक्ष अनुभूति करने के लिए वर्ष 1939 में पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग में आए थे। शिक्षा वर्ग की व्यवस्थाएँ, स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण और उनके व्यक्तित्व में आए परिवर्तन देखकर बाबा साहब अत्यंत प्रसन्न हुए थे।

देखें वीडियो : आरएसएस की शाखा में आए डॉ. भीमराव अंबेडकर


सामाजिक समरसता स्थापित करने के लिए अथक प्रयास कर रहे बाबा साहब डॉ. अंबेडकर ने यह सुन रखा था कि अस्पृश्यता निवारण में आरएसएस को उल्लेखनीय सफलता मिली है। इस बात की अनुभूति बाबा साहब ने संघ शिक्षा वर्ग में बहुत समीप से की। पुणे के संघ शिक्षा वर्ग के सायंकालीन बौद्धिक सत्र में डॉ. अंबेडकर आए थे। उस समय वर्ग में संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार भी उपस्थित थे। वर्ग में लगभग 525 स्वयंसेवक संघ कार्य का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे। डॉ. अंबेडकर ने डॉ. हेडगेवार से सबसे पहला प्रश्न यही किया कि इन 525 स्वयंसेवकों में से अस्पृश्य कितने हैं? डॉ. हेडगेवार ने उनसे कहा कि आप स्वयं ही इनसे पूछ लीजिए। बाबा साहब स्वयंसेवकों के बीच में गए, लेकिन पूर्ण गणवेश पहने सभी स्वयंसेवक एक समान ही दिख रहे थे। उनमें कौन स्पृश्य (सवर्ण) है और कौन अस्पृश्य, यह पहचाना ही नहीं जा सकता था। बाबा साहब भी नहीं पहचान पाए। तब बाबा साहब ने स्वयंसेवकों से कहा कि आपमें से जो अस्पृश्य हों, वे एक कदम आगे आएँ। लेकिन कतारबद्ध स्वयंसेवकों के बीच कोई हलचल नहीं हुई। एक भी स्वयंसेवक पंक्ति से बाहर नहीं आया।

गुरुवार, 28 मई 2026

संघ शिक्षा वर्ग बनाम समर कैंप

संघ शताब्दी वर्ष : ‘मैं’ से ‘हम’ के बोध की यात्रा में लेकर जाते हैं संघ शिक्षा वर्ग, जीवन को सार्थक बनाने की मिलती है सीख

व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया में ‘समर कैंप’ हमारे जीवन का हिस्सा बन गए हैं। गर्मी की छुट्टियां लगते ही युवा अपने व्यक्तित्व को निखारने, नया कौशल सीखने और समय का सदुपयोग करने के लिए अपनी अभिरुचि के अनुसार ‘समर कैंप’ में जाते हैं। नि:संदेह ये समर कैंप युवाओं को बहुत कुछ सिखाते हैं। इसलिए रचनाधर्मी और उत्साही युवाओं के बीच समर कैंप के प्रति आकर्षण बढ़ा है। वहीं, जब हम समर कैंप की तुलना संघ शिक्षा वर्ग से करते हैं, तब स्वयंसेवकों के उत्साह को देखकर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि इन वर्गों में न केवल व्यक्तित्व का विकास होता है, अपितु राष्ट्र साधना के लिए भी उनका मन तैयार होता है। भारत माँ की सेवा का जो संकल्प स्वयंसेवकों ने धारण किया है, उसको निभाने का प्रशिक्षण भी इन वर्गों में मिलता है। समर कैंप की तुलना करते हुए संघ शिक्षा वर्गों के संबंध में एक बात कहनी हो तो- संघ शिक्षा वर्ग सोने पर सुहागा हैं। यहाँ युवा समय प्रबंधन, कार्यक्रम प्रबंधन, अनुशासन, सामंजस्य, योग, कौशल, कला, संवेदनशीलता, वक्तृत्व कला इत्यादि गुण तो सीखता ही है, इसके अलावा वह अपनी गौरवशाली संस्कृति से परिचित होता है, राष्ट्रप्रेम का भाव और गहरा होता है, नेतृत्व करने की क्षमता का विकास होता है। इस सबके साथ युवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे यशस्वी आंदोलन को समाज में ले जाने का प्रशिक्षण भी प्राप्त करते हैं। संघ शिक्षा वर्ग में प्रशिक्षित युवा ही आगे चलकर संघ के बड़े दायित्व का निर्वहन करने के लिए तैयार होते हैं। हाँ, उनके मन में एक साधारण स्वयंसेवक की भाँति समर्पित भाव से संघ कार्य करने का दायित्व बोध भी गहरा होता है।

रविवार, 24 मई 2026

संघ शिक्षा वर्ग : संघ कार्य के प्रशिक्षण की प्रयोगशाला

संघ शताब्दी वर्ष : मई-जून में देशभर में आयोजित होते हैं, 1927 में नागपुर में लगा था पहला वर्ग

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को एक अनुशासित और राष्ट्रव्यापी संगठन बनाने में ‘संघ शिक्षा वर्गों’ का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ये केवल प्रशिक्षण शिविर नहीं हैं, बल्कि ये संघ कार्य की साधना की प्रयोगशालाएं हैं। चयनित एवं दायित्ववान स्वयंसेवक संघ शिक्षा वर्गों में एक साधक की तरह रहते हैं और संघ कार्य के लिए संगठनात्मक एवं बौद्धिक प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। इन वर्गों से स्वयंसेवक केवल संघ चलाने की पद्धति नहीं सीखते, अपितु उनके व्यक्तित्व का भी सर्वांगीण विकास होता है। वर्ग में रहकर स्वयंसेवक सफल जीवन के लिए अनुशासन, समय प्रबंधन, दिनचर्या पालन, कार्यक्रम कुशलता, सामंजस्य और वक्तृत्व कला जैसे गुणों को समझता और सीखता है। सबके साथ मिलकर रहने से स्वयंसेवकों में सहयोग और सामंजस्य की भावना का विकास होता है। सोचने-समझने, तर्क करने, समस्या का समाधान खोजने, निर्णय लेने की क्षमता का विकास, अपनी भावनाओं को प्रकट करने का अभ्यास, सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का महत्व, दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, ये सब बातें भी संघ शिक्षा वर्ग से प्रशिक्षित स्वयंसेवक के व्यक्तित्व में दिखने लगती हैं। इसलिए संघ शिक्षा वर्गों को लेकर स्वयंसेवकों में भी खूब उत्साह रहता है।

मंगलवार, 12 मई 2026

भगवान के प्रति भक्ति प्रकट करने का सर्वोत्तम प्रकार है सेवा-भाव

संघ शताब्दी वर्ष : श्रीगुरुजी की दृष्टि में आध्यात्मिक साधना है सेवा


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहचान केवल शाखा पर खेलने एवं कदमताल करने वाले संगठन के रूप में नहीं है। अपितु, समाजसेवी संगठन के तौर पर भी संघ को देखा जाता है। समाज में विभिन्न प्रकार के सेवा उपक्रम चलाने वाले संगठन या व्यक्ति मानते हैं कि वे कोई विशिष्ट कार्य कर रहे हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग मानते हैं कि वे सेवा करके समाज पर उपकार कर रहे हैं। संघ ने प्रारंभ से स्पष्ट किया है कि उसके लिए सेवा कार्य समाज पर उपकार नहीं हैं अपितु सेवा तो करणीय कार्य है। स्वामी विवेकानंद के दर्शन ‘नर सेवा-नारायण सेवा’ को अनुकरणीय मानकर अपने नैतिक एवं स्वाभाविक दायित्व के रूप में संघ के स्वयंसेवक सेवा कार्य करते हैं। संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ के चिंतन में सेवा की संकल्पना अत्यंत व्यापक, गूढ़ और आध्यात्मिक है। उनके दर्शन में सेवा केवल एक औपचारिकता या सामाजिक दायित्व नहीं है, बल्कि यह ईश्वर की आराधना का सबसे उत्तम और प्रत्यक्ष मार्ग है। उन्होंने सेवा को भौतिकता के धरातल से उठाकर परोपकार और ईश्वरीय साधना के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित किया।

बुधवार, 6 मई 2026

भाजपा की ऐतिहासिक जीत, विपक्ष को आईना दिखाता जनादेश

जनता ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उसकी सामूहिक चेतना से बढ़कर कोई भी ताकत नहीं है। छल-बल और तुष्टीकरण से सत्ता हथियाने वाली ताकतों को जनता ने आईना दिखा दिया है। जैसे ही पश्चिम बंगाल में जनता को सुरक्षा का आश्वासन मिला, उसने निर्भय होकर बता दिया है कि लोकतंत्र में हिंसा, गुंडागर्दी और मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए कोई स्थान नहीं है। कहना होगा कि पाँच राज्यों (चार राज्य और एक केंद्रशासित प्रदेश) के चुनाव परिणामों ने भारतीय राजनीति के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। बंपर मतदान और मतदाताओं के अभूतपूर्व उत्साह के बीच जो परिणाम सामने आए हैं, वे न केवल चुनाव पश्चात आए सर्वेक्षण के अनुमानों पर मुहर लगाते हैं, बल्कि लोकतंत्र की जीत की कहानी भी धूमधाम से सुना रहे हैं।