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शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2023

हमास के आतंकवाद के विरुद्ध इजरायल के साथ खड़ा है भारत

इजरायल पर हुए आतंकी हमले ने सबको दहला कर रख दिया है। जिस तरह की नृशंसता और वहशीपन के वीडियो सामने आए हैं, उनको देखकर कोई भी भला व्यक्ति हमास के साथ खड़ा नहीं हो सकता। परंतु जो लोग इस सबके बाद भी हमास के साथ खड़े हैं, उनकी मानसिकता को समझना कठिन नहीं है। ये लोग मानवता के विरोधी हैं। इनकी संवेदनाएं झूठी और बनावटी हैं। ये संवेदनाओं का उपयोग विरोधी विचार पर हमला करने के लिए करते हैं। एक तरह से इन्हें बौद्धिक आतंकवादी कहा जा सकता है। इससे यह भी ध्यान आता है कि ऐसी ही बर्बरता यहूदियों के साथ इतिहास के उस कालखंड में की गई होगी, जब उन्हें इजरायल से बेदखल किया गया। हमास के आतंकी जिस बर्बरता से इजरायल की महिलाओं एवं महिला सैनिकों के साथ पेश आ रहे हैं, उसकी एक सुर में भर्त्सना ही की जा सकती है।

रविवार, 26 अगस्त 2018

भारत, भारतीयता और भारत के देशभक्त नागरिकों के प्रति नकारात्मक विचार


- लोकेन्द्र सिंह 
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक बार फिर अपनी अपरिपक्वता जाहिर की है। यूरोप के दौरे के दौरान विदेशी जमीन पर उन्होंने जिस प्रकार के विचार प्रकट किए हैं, उससे भारत और भारतीय संस्कृति के प्रति उनके दृष्टिकोण का पता भी चलता है। इससे पहले भी वह अमेरिका में कह चुके हैं कि भारत को इस्लामिक आतंकी समूहों से नहीं, बल्कि 'हिंदू आतंकवाद' से अधिक खतरा है। पहले उन्होंने भारत के हिंदू समाज और हिंदू संस्कृति की छवि को धूमिल किया और अब भारत के मुस्लिम, अनुसूचित जाति-जनजाति और गरीब वर्ग को बदनाम करने का प्रयास किया है। जर्मनी के हैम्बर्ग में विद्यार्थियों से बात करते हुए उन्होंने आतंकवाद को गरीबी से जोड़कर एक तरह से आतंकी संगठनों के पैरोकार की भूमिका का निर्वहन किया है। क्या उनके इस तर्क से सहमत हुआ जा सकता है कि गरीबी और बेरोजगारी के कारण आईएसआईएस जैसे आतंकी समूह निर्मित होते हैं? उन्होंने कहा  कि अगर दलित और अल्सपसंख्यक जैसे समुदायों की विकास की दौड़ में अनदेखी हुई तो देश में आईएस की तरह आतंकवादी समूह बन सकते हैं? इस कथन का क्या आशय निकाला जाए? आतंकवाद जैसी वैश्विक समस्या पर यह किस स्तर का चिंतन है? भारत से लेकर दुनिया में जहाँ भी आतंकी घटनाएं हो रही हैं, उसके पीछे क्या वास्तव में गरीबी है? आईएसआईएस के जो उद्देश्य हैं, उसमें क्या गरीबी उन्मूलन शामिल है? कोई भी आतंकी समूह देश-दुनिया से गरीबी को समाप्त करने के लिए उद्देश्य से काम नहीं कर रहा है। आखिर किस तरह के अध्ययन के आधार पर राहुल गांधी ने यह विचार रखा है?

रविवार, 15 जुलाई 2018

कांग्रेस से छूट नहीं पा रही हिंदू विरोध और मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति


- लोकेन्द्र सिंह 
कोई भी व्यक्ति या संगठन बनावटी व्यवहार अधिक दिन तक नहीं कर सकता है। क्योंकि, उसका डीएनए इसकी अनुमति नहीं देता है। यदि स्वभाव के विपरीत चलने का प्रयास किया जाए तो अंतर्मन में बनावटी एवं वास्तविक आचरण में एक प्रकार का संघर्ष प्रारंभ हो जाता है। कांग्रेस के साथ भी यही हो रहा है। अपने कथित सेकुलर (मुस्लिम तुष्टीकरण और हिंदुओं की उपेक्षा) के कारण ही कांग्रेस कथित 'सॉफ्ट हिंदुत्व' (सुविधाजनक हिंदू समर्थन) की राह पर चलने में असहज है। कांग्रेस के शीर्ष नेता अकसर ऐसे बयान दे देते हैं, जिससे सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर साध-साध कर रखे जा रहे उसके कदम डगमगा जाते हैं। या यह कहना उचित होगा कि कांग्रेस के नेता सुनियोजित ढंग से समय-समय पर अपने परंपरागत मुस्लिम वोटबैंक को यह भरोसा दिलाते रहते हैं कि उसका 'सॉफ्ट हिंदुत्व' सिर्फ भ्रम है, वास्तविकता में कांग्रेस मुस्लिम तुष्टीकरण पर ही दृढ़ता से टिकी हुई है। मुस्लिम समुदाय कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की मंदिर यात्राओं से खिन्न न हो जाए, इसलिए उसे भरोसे में बनाए रखने के लिए कांग्रेस ने पी. चिदंबरम, दिग्विजय सिंह, मणिशंकर अय्यर, सैफुद्दीन सोज, सुशील कुमार शिंदे, सलमान खुर्शीद और पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी को यह जिम्मेदारी दे रखी है। अब इस सूची में शशि थरूर का नया नाम और जुड़ गया है।

रविवार, 6 मई 2018

कौन हैं भारत में जिन्ना के प्रेमी?

 अलीगढ़  मुस्लिम विश्वविद्यालय में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर क्यों लगाई गई है? यह प्रश्न बहुत वाजिब है। यह आश्चर्य का विषय भी है कि स्वतंत्रता के इतने वर्ष बाद तक भारत विभाजन के प्रमुख गुनहगारों में शामिल जिन्ना की तस्वीर एक शिक्षा संस्थान में सुशोभित हो रही है। मोहम्मद अली जिन्ना सिर्फ भारत विभाजन का ही गुनहगार नहीं है, बल्कि हजारों लोगों की हत्या का भी दोषी है। भाजपा के सांसद सतीश गौतम ने विश्वविद्यालय के उपकुलपति तारिक मंसूर को पत्र लिखकर उचित ही प्रश्न पूछा है कि क्या मजबूरी है कि जिन्ना की तस्वीर विश्वविद्यालय में लगाई गई है? उन्होंने पत्र में यह भी कहा है कि अगर वह विश्वविद्यालय में कोई तस्वीरें लगाना चाहते हैं तो उन्हें महेंद्र प्रताप सिंह जैसे महान लोगों की तस्वीर संस्थान में लगानी चाहिए, जिन्होंने विश्वविद्यालय बनाने के लिए अपनी जमीन दान में दी थी।

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

सामने आया 'भगवा आतंकवाद' का सच


'सत्य कभी पराजित नहीं होता।' 
'कितने भी काले बादल हों, सूरज को अधिक समय तक ढंक नहीं सकते।' 
'सच सामने आ ही जाता है।' 
'न्याय में देर है, अंधेर नहीं।' 
            यह लोकोक्तियां बताती हैं कि सच को परास्त करने के लिए कोई कितने भी षड्यंत्र रच ले, किंतु एक दिन आता है जब सत्य की ही जीत होती है और झूठों का मुंह काला। मक्का मस्जिद बम धमाके मामले में स्वामी असीमानंद समेत सभी आरोपियों के बरी होने के बाद 'हिंदू आतंकवाद' पर रचा गया षड्यंत्र पूरी तरह उजागर हो गया है। यह देश का दुर्भाग्य है कि वोटों की खातिर एक पार्टी ने इस देश की पहचान को आतंकवाद से जोडऩे का भयंकर षड्यंत्र रचा था। विश्व में जिस 'हिंदू' की उदारता, मानवता और करुणा के उदाहरण दिए जाते हैं, उस हिंदू को सिर्फ इसलिए बदनाम करने का षड्यंत्र रचा गया ताकि अपनी राजनीतिक बिसात बची रहे, ताकि एक समुदाय का तुष्टीकरण किया जा सके। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने 'भगवा आतंकवाद' और 'हिंदू आतंकवाद' जैसे शब्द दिए हैं। इस पर विचार किया जाना चाहिए कि आतंकवाद को धर्म और रंग से न जोडऩे की वकालत करने वाली कांग्रेस ने ही आखिर क्यों हिंदू और भगवा आतंकवाद की अवधारणा रची?

रविवार, 1 अप्रैल 2018

जल रहा बंगाल, बंसी बजा रहीं ममता

 पश्चिम  बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति के कारण सांप्रदायिक हालात खतरे के निशान तक पहुँच गए हैं। पिछले दिनों में भले ही ममता बनर्जी पूजा-पाठ में शामिल होती हुई और मंदिर की परिक्रम लगाती हुई दिखाई दी हों, परंतु अब भी उनके लिए हिंदू प्राथमिकता में नहीं हैं। चार वर्ष में राजनीतिक परिदृश्य बदला है। अब हिंदू भी राजनीतिक एकजुटता दिखा रहे हैं। इस एकजुटता से डर कर ममता बनर्जी ने कुछ दिन से मस्जिद-दरगाह की गली के साथ मंदिर का मार्ग भी पकड़ लिया है। हालाँकि, पश्चिम बंगाल के हालात और तृणमूल कांग्रेस सरकार की नीति को देखकर स्पष्ट समझा जा सकता है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दिखावे के लिए भगवा चूनर ओढ़ी है। यदि वास्तव में उन्हें हिंदू समाज की चिंता होती तो पश्चिम बंगाल में हिंदू बिना किसी बाधा के अपने धार्मिक कार्यक्रम सम्पन्न कर पा रहे होते। बंगाल की सरकार की प्राथमिकता में हिंदू समाज होता, तो रामनवमी के जुलूस पर पत्थर और बम नहीं फेंके जाते।

सोमवार, 29 जनवरी 2018

वंदेमातरम कहने पर नौजवान की हत्या दुर्भाग्यपूर्ण एवं चिंताजनक घटना

 गणतंत्र  दिवस के अवसर पर एक नौजवान की हत्या इसलिए कर देना कि वह तिरंगा लेकर वंदेमातरम का जयघोष कर रहा था, भारत में दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। सहसा विश्वास ही नहीं होता कि यह घटना हिंदुस्थान में हुई है। स्थान का उल्लेख किये बिना यदि घटना का वर्णन किया जाए तो यही लगेगा कि यह घटना पाकिस्तान में हुई होगी। घटना इस प्रकार है- उत्तरप्रदेश के कासगंज जिले में गणतंत्र दिवस पर स्थानीय युवकों ने तिरंगा यात्रा का आयोजन किया था। जब तिरंगा यात्रा कासगंज के मुस्लिम बाहुल्य मोहल्ले से गुजर रही थी, तो भारत माता की जय और वंदेमातरम के जयघोष लगाने पर समुदाय विशेष के लोगों ने तिरंगा यात्रा पर पथराव और गोलीबारी कर दी। गोली लगने से अभिषेक गुप्ता (चंदन) नाम के नौजवान की मौत हो गई। समुदाय विशेष की उग्र भीड़ ने पूरी रैली को घेर लिया। युवकों को अपनी जान बचाने के लिए मोटरसाइकलें छोड़कर भागना पड़ा। भीड़ ने उन मोटरसाइकलों को आग के हवाले कर दिया गया। इस घटना के बाद हिंदू समाज ने भी आक्रोश व्यक्त किया है।

सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

जम्मू-कश्मीर पर कांग्रेस का अलगाववादी सुर

 कांग्रेस  के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने जम्मू-कश्मीर पर भारत विरोधी टिप्पणी करके अपनी पार्टी को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है। जम्मू-कश्मीर पर चिदंबरम का बयान अलगाववादियों और पाकिस्तानियों की बयानबाजी की श्रेणी का है। यदि चिदंबरम का नाम छिपा कर किसी से भी यह पूछा जाए कि जम्मू-कश्मीर की आजादी का नारा कौन लगाता है, तब निश्चित ही उत्तर में अलगाववादियों और पाकिस्तानी नेताओं का नाम ही आएंगे। प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का नाम भी अनेक लोग ले सकते हैं। कांग्रेस के शीर्ष श्रेणी के नेता पी. चिदंबरम ने बीते शनिवार को कहा था कि जब कश्मीरी कहें आजादी तो समझिए स्वायत्तता। उन्होंने कहा कि 'कश्मीर घाटी में अनुच्छेद 370 का अक्षरश: सम्मान करने की मांग की जाती है। इसका मतलब है कि वो अधिक स्वायत्तता चाहते हैं। चिदंबरम का यह बयान भारतीय हित को नुकसान पहुँचाता है।

शनिवार, 23 सितंबर 2017

ममता सरकार के तुष्टीकरण को न्यायालय ने दिखाया आईना

 माननीय  न्यायालय में एक बार फिर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तुष्टीकरण की नीति का सच सामने आ गया। ममता बनर्जी समाज को धर्म के नाम पर बाँट कर राजनीति करने वाले उन लोगों/दलों में शामिल हैं, जो अपने व्यवहार और राजनीतिक निर्णयों से घोर सांप्रदायिक हैं लेकिन, तब भी तथाकथित 'सेकुलर जमात' की झंडाबरदार हैं। मुहर्रम का जुलूस निकालने के लिए दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध लगाना, क्या यह सांप्रदायिक निर्णय नहीं था? क्या तृणमूल कांग्रेस सरकार के इस फैसले मं  तुष्टीकरण और वोटबैंक की बदबू नहीं आती? क्या यह स्पष्टतौर पर दो समुदायों को दुश्मन बनाने वाला फैसला नहीं था? यकीनन उत्तर है- हाँ। न्यायालय में भी यही सिद्ध हुआ है। दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध के निर्णय के विरुद्ध सुनवाई करते हुए कलकत्ता न्यायालय ने ममता सरकार को जो आईना दिखाया है, उसमें उनकी राजनीति की असल तस्वीर बहुत स्पष्ट नजर आ रही है। न्यायालय ने ममता सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए एक गंभीर प्रश्न पूछा - 'सौहार्द खतरे में होने की आशंका जता कर क्या सांप्रदायिक विभेद पैदा नहीं किया जा रहा है?' इस प्रश्न का जो उत्तर है, वह सब जानते हैं। सरकार भी जानती है, लेकिन उसका उत्तर देने की ताकत उसमें नहीं है। न्यायालय के मात्र इसी प्रश्न ने ममता सरकार की समूची राजनीति को उधेड़ कर रख दिया।

शनिवार, 19 अगस्त 2017

नाम बदलने से दिक्कत कब होती है और कब नहीं

 उत्तरप्रदेश  के प्रमुख रेलवे स्टेशन 'मुगलसराय' का नाम भारतीय विचारक 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय' के नाम पर क्या रखा गया, प्रदेश के गैर-भाजपा दलों को ही नहीं, अपितु देशभर में तथाकथित सेकुलर बुद्धिवादियों को भी विरोध करने का दौरा पड़ गया है। मौजूदा समय में केंद्र सरकार के प्रत्येक निर्णय का विरोध करना ही अपना धर्म समझने वाले गैर-भाजपा दल और कथित बुद्धिवादी अपने थके हुए तर्कों के सहारे भाजपा की नीयत को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। साथ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा को भी लपेटने का प्रयास कर रहे हैं। 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय रेलवे स्टेशन' के विरोध में दिए जा रहे तर्क विरोधियों की मानसिकता और उनके वैचारिक अंधत्व को प्रदर्शित करते हैं। उनका कहना है कि भारतीय जनता पार्टी 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' को थोप रही है और इसके लिए वह मुगल संस्कृति को मिटाने का काम कर रही है। मुस्लिम समाज में भाजपा के लिए नफरत और अपने लिए प्रेम उत्पन्न करने के लिए विरोधी यह भी सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि भाजपा की विचारधारा मुस्लिम विरोधी है, इसलिए चिह्नित करके मुस्लिम नामों को मिटाया जा रहा है। बड़े उत्साहित होकर वह यह भी पूछ रहे हैं कि भारतीय राजनीति और लोकतंत्र में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का योगदान क्या है? मजेदार बात यह है कि कांग्रेस, कम्युनिस्ट या दूसरे दलों की सरकारें जब नाम बदलती हैं, तब इस तरह के प्रश्न नहीं उठते। सबको पीड़ा उसी समय होती है, जब भाजपा सरकार नाम बदलती है। भारतीय राजनीति की थोड़ी-बहुत समझ रखने वाला व्यक्ति भी बता सकता है कि मुगलसराय स्टेशन का नाम बदलने पर लगाए जा रहे आरोप और पूछे जा रहे प्रश्न, बचकाने और अपरिपक्व हैं।

शनिवार, 12 अगस्त 2017

अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हो पाए हामिद साहब

दैनिक समाचार पत्र राजएक्सप्रेस में प्रकाशित
 निवर्तमान  उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी जाते-जाते ऐसी बातें कह गए, जो संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को नहीं कहनी चाहिए थी और यदि कहना जरूरी ही था तो कम से कम उस ढंग से नहीं कहना था, जिस अंदाज में उन्होंने कहा। असहिष्णुता के मुद्दे पर किस प्रकार 'बड़ी और गंभीर' बात कहना, इसके लिए उन्हें पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के भाषणों को सुनना/पढऩा चाहिए था। असहिष्णुता के मुद्दे पर पूर्व राष्ट्रपति मुखर्जी ने भी अनेक अवसर पर अपनी बात रखी, लेकिन उनकी बात में अलगाव का भाव कभी नहीं दिखा। जबकि हामिद साहब के अतार्किक बयान के बाद उपजा विवाद बता रहा है कि उनके कथन से देश को बुरा लगा है। यकीनन जब कोई झूठा आरोप लगाता है तब बुरा तो लगता ही है, गुस्सा भी आता है। राज्यसभा टीवी को दिए साक्षात्कार को देख-सुन कर सामान्य व्यक्ति को भी यह समझने में मुश्किल हो रही है कि आखिर किस दृष्टिकोण से भारत में मुस्लिम असुरक्षित हैं। जब भी किसी ने मुस्लिमों के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणी की है, तब उसके विरोध में सबसे अधिक आवाज देश के बहुसंख्यक समाज की ओर से उठी हैं। मुसलमान भी किसी इस्लामिक देश की अपेक्षा भारत में अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं। वे पाकिस्तान जाने की अपेक्षा भारत में ही रहना पसंद करते हैं। भारत में जितनी आजादी मुसलमानों को है, क्या उतनी कहीं और है? मान सकते हैं कि लोकतंत्र की सफलता इस बात से तय होती होगी कि वहाँ अल्पसंख्यक कितने सुरक्षित हैं? हामिद साहब भारत में अल्पसंख्यक सुरक्षित ही नहीं है, बल्कि सफलताएं भी अर्जित कर रहे हैं। भारत के प्रत्येक क्षेत्र में मुस्लिम शीर्ष तक पहुँचे हैं। लोकप्रियता अर्जित की है। राजनीति के क्षेत्र में भी अपना नेतृत्व दिया है। हामिद अंसारी साहब का परिवार और वे स्वयं भी भारतीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय भी पूरे आनंद के साथ भारत-भूमि पर जीवन जी रहे हैं। उपराष्ट्रपति जैसे पद को सुशोभित करने वाले और उच्च शिक्षित व्यक्ति को ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए, जिससे देश के विभिन्न समुदायों में नकारात्मक भाव उत्पन्न हों। उन्हें मुस्लिम समाज को प्रेरित और सकारात्मकता की ओर अग्रेषित करने का प्रयास करना चाहिए था। जाते-जाते बड़प्पन दिखाना चाहिए था। बतौर उपराष्ट्रपति अपने अंतिम वक्तव्य में सकारात्मक बात कहनी चाहिए थी।

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

कितना आसान है हिंदुत्व का अपमान

 अपनी  ही भूमि पर हिंदुत्व का अपमान आसानी से किया जा सकता है, इस बात को एक बार फिर समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता नरेश अग्रवाल ने सिद्ध कर दिया। राज्यसभा में बुधवार को उन्होंने हिंदुओं के भगवान राम, माता जानकी और भगवान विष्णु को लेकर अमर्यादित टिप्पणी कर दी। गली-चौराहे के नेता की तरह बोलते हुए उन्होंने हिंदुओं की आस्था के केंद्र राम, माता जानकी और विष्णु को शराब से जोड़ दिया। उनकी टिप्पणी सरासर हिंदुत्व का अपमान है। क्या यह सीधे तौर पर हिंदू आस्थाओं पर चोट नहीं है? बिना विचार किए कही गई अपनी इस टिप्पणी को लेकर नरेश अग्रवाल को तनिक भी अफसोस नहीं हुआ। उन्हें कतई यह नहीं लगा कि उन्होंने देश की बहुसंख्यक आबादी की भावनाओं को ठेस पहुँचाई है। भारतीय जनता पार्टी के सांसदों ने अग्रवाल के बयान पर आपत्ति जताते हुए उनसे माफी की माँग की तब उन्होंने साफ-तौर पर इनकार कर दिया। बाद में, बे-मन से कहा कि अगर उनकी टिप्पणी से किसी की भावना को ठेस पहुंची है, तो वह उसे वापस लेते हैं। स्पष्ट है कि उन्हें अपनी गलती के लिए कोई मलाल नहीं था।

बुधवार, 31 मई 2017

विरोध प्रदर्शन या क्रूरता का प्रकटीकरण

 पशुओं  को क्रूरता से बचाने के लिए केंद्र सरकार के आदेश का विरोध जिस तरह केरल में किया गया, कोई भी भला मनुष्य उसे विरोध प्रदर्शन नहीं कह सकता। यह सरासर क्रूरता का प्रदर्शन था। इसे अमानवीय और राक्षसी प्रवृत्ति का प्रकटीकरण कहना, किसी भी प्रकार की अतिशयोक्ति नहीं होगा। केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोध में कांग्रेसी इतने अंधे हो जाएंगे, इसकी कल्पना भी शायद देश ने नहीं की होगी। कम्युनिस्टों का चरित्र इस देश को भली प्रकार मालूम है। केरल में रविवार को जिस प्रकार कम्युनिस्ट संगठनों ने केंद्र सरकार के आदेश का विरोध करने के लिए 'बीफ फेस्ट' का आयोजन किया, सार्वजनिक स्थलों पर गौमांस का वितरण किया, निश्चित तौर पर विरोध प्रदर्शन का यह तरीका निंदनीय है। लेकिन, कम्युनिस्ट पार्टियों के इस व्यवहार से देश को आश्चर्य नहीं है। कम्युनिस्टों का आचरण सदैव ही इसी प्रकार का रहा है, भारतीयता का विरोधी। केरल में कम्युनिस्ट जब अपनी विचारधारा से इतर राष्ट्रीय विचारधारा से संबंध रखने वाले इंसानों का गला काट सकते हैं, तब गाय काटने में कहाँ उनके हाथ कांपते? उनका इतिहास यही सिद्ध करता है कि हिंदुओं का उत्पीडऩ उनके लिए सुख की बात है। लेकिन, कम्युनिस्ट आचरण का अनुसरण करती कांग्रेस का व्यवहार समझ से परे है। देश की बहुसंख्यक हिंदू आबादी यह देखकर दु:खी है कि एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल, जिसे उसने लंबे समय तक देश चलाने के लिए जनादेश दिया, आज वह उसकी ही आस्था और भावनाओं पर इस प्रकार चोट कर रहा है।

सोमवार, 30 जनवरी 2017

इतिहास को विकृत करने की जिद

 भारतीय  फिल्म उद्योग में जब भी किसी ऐतिहासिक घटना या व्यक्तित्व पर फिल्म बनाने का विचार प्रारंभ होता है, तब उसके साथ विवाद भी उत्पन्न हो जाते हैं। दरअसल, हमारे निर्देशकों में एक बड़ी बीमारी है कि वह इतिहास को उसके वास्तविक रूप में प्रस्तुत न करके अपने ढंग से छेड़छाड़ करके प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। जहाँ मान्य सत्य के साथ छेड़छाड़ करने का प्रयास किया जाता है, वहीं विवाद खड़ा होता है। निर्देशक अपने चश्मे से इतिहास को देखने और दिखाने की जिद में समाज को आहत करने की गलती कर बैठते हैं। प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक-निर्माता संजय लीला भंसाली को थप्पड़ मारने की घटना इसी आहत समाज के आक्रोश का प्रकटीकरण है। करणी सेना के लोगों ने जयपुर में 'पद्मावती' फिल्म के शूटिंग स्थल पर पहुंच कर विरोध किया और भंसाली को थप्पड़ मार दिया। करणी सेना के इस कृत्य की निंदा की जानी चाहिए। लेकिन, जितनी निंदा करणी सेना की करना जरूरी है, उससे कहीं अधिक निंदा और आलोचना संजय लीला भंसाली की भी करना  आवश्यक है।

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

सांप्रदायिक निर्णय के बाद भी कांग्रेस सेक्युलर!

 जुमे  की नमाज के लिए मुस्लिम कर्मचारियों को 90 मिनट का अवकाश देकर उत्तराखंड सरकार ने सिद्ध कर दिया है कि कांग्रेस ने सेक्युलरिज्म का लबादा भर ओढ़ रखा है, असल में उससे बढ़ा सांप्रदायिक दल कोई और नहीं है। कांग्रेस के साथ-साथ उन तमाम बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों के सेक्युलरिज्म की पोलपट्टी भी खुल गई है, जो भारतीय जनता पार्टी या किसी हिंदूवादी संगठन के किसी नेता की 'कोरी बयानबाजी' से आहत होकर 'भारत में सेक्युलरिज्म पर खतरे' का ढोल पीटने लगते हैं, लेकिन यहाँ राज्य सरकार के निर्णय पर अजीब खामोशी पसरी हुई है। उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार के घोर सांप्रदायिक निर्णय के खिलाफ तथाकथित प्रगतिशील और बुद्धिजीवी समूहों से कोई आपत्ति नहीं आई है। सोचिए, यदि किसी भाजपा शासित राज्य में निर्णय हुआ होता कि सोमवार को भगवान शिव पर जल चढ़ाने के लिए हिंदू कर्मचारियों-अधिकारियों को 90 मिनट का अवकाश दिया जाएगा, तब देश में किस प्रकार का वातावरण बनाया जाता? सेक्युलरिज्म के नाम पर यह दोगलापन पहली बार उजागर नहीं हुआ है। यह विडम्बना है कि वर्षों से इस देश में वोटबैंक की राजनीति के कारण समाज को बाँटने का काम कांग्रेस और उसके प्रगतिशील साथियों ने किया है, लेकिन सांप्रदायिक दल होने की बदनामी समान नागरिक संहिता की माँग करने वाली भारतीय जनता पार्टी के खाते में जबरन डाल दी गई है।

बुधवार, 2 नवंबर 2016

पुलिस और जनता की बड़ी कामयाबी

 भोपाल  केंद्रीय जेल से भागे आठों आतंकियों को जिस तत्परता से पुलिस ने ढूंढ़ कर ढेर किया है, उसके लिए मध्यप्रदेश पुलिस की प्रशंसा की जानी चाहिए। जेल से भागे आतंकियों को चंद घंटों में मार गिराना पुलिस और सुरक्षा बलों के बढ़े मनोबल का ताजा उदाहरण हैं। देश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सभी प्रकार के आतंक से निपटने के लिए सुरक्षा बलों को साहसिक फैसले लेने की खुली छूट दे रखी है। सरकार के इस रुख से देशभर में पुलिस और सुरक्षा बलों के हौसले बुलंद हैं, जिसका परिणाम भी सामने आ रहा है। हालांकि कुछ राजनीतिक दल, संगठन और वामपंथी विचारधारा के लोग पुलिस के साहसिक और सराहनीय काम से आहत हैं। उन्हें इस बात की प्रसन्नता नहीं है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में मप्र की पुलिस को एक बड़ी कामयाबी मिली है, बल्कि उन्हें इस बात की अधिक चिंता हो रही है कि आतंकियों को जिंदा क्यों नहीं पकड़ा? इनका दु:ख तब प्रकट नहीं हुआ, जब इन्हीं आतंकियों ने जेल से भागने के लिए दीपावली के दिन एक संतरी की गला रेतकर हत्या कर दी। शहीद जवान रमाकांत के घर में अगले माह बेटी का विवाह है। बर्बर तरीके से इस जवान की हत्या हमारे मानवाधिकारियों के कलेजों को पिघला नहीं सकी, लेकिन आतंकियों की मौत से यह सब विचलित हैं।

बुधवार, 19 अक्टूबर 2016

बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा को सरकार का मौन समर्थन

 बंगाल  में सांप्रदायिक हिंसा विकराल होती जा रही है। बंगाल की स्थितियाँ देश और समाज के लिए खतरनाक होती जा रही हैं। हालात यह हैं कि मुस्लिम समाज से जुड़े अतिवादियों की दंगई से आजिज आकर कई क्षेत्रों से हिंदुओं को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। बंगाल में हिंदुओं को रहना, व्यापार करना और यहाँ तक की अपनी आस्थाओं का पालन करना भी कठिन हो गया है। मंदिरों में पथराव, मूर्तियों का खंडित किया जाना, हिंदू बस्तियों में आगजनी, हिंदुओं की दुकानों को लूटने जैसी घटनाओं की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। दंगइयों के हौसले इतने बुलंद हैं कि पुलिस थानों को भी खाक करने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता है। देश को अच्छे से याद है कि मालदा में ढाई लाख लोगों की भीड़ ने किस कदर आतंक फैलाया था। अब फिर से मालदा की पुनरावृत्ति की खबरें सामने आ रही हैं।

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

पाकिस्तानी कलाकारों से इतना प्रेम क्यों?

 आतंकवादी  हमलों से आहत भारत के नागरिक चाहते हैं कि पाकिस्तान का समूचा बहिष्कार किया जाए। इस सिलसिले में बॉलीवुड से पाकिस्तानी कलाकारों को बाहर करने और उन्हें काम नहीं देने की माँग जोर पकड़ रही है। यह माँग स्वाभाविक है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। लेकिन, बॉलीवुड से लेकर अन्य कला और तथाकथित बौद्धिक जगत इस विषय पर भी दो हिस्सों में बँटा नजर आ रहा है। देश का सामान्य आदमी समझ नहीं पा रहा है कि आखिर पाकिस्तानी कलाकारों से इतना प्रेम क्यों है? पाकिस्तानी कलाकारों का समर्थन क्या देशहित से बढ़कर है? पाकिस्तानी कलाकार बॉलीवुड में काम नहीं करेंगे, तब क्या बॉलीवुड ठप हो जाएगा? इन सवालों के जवाब कोई नहीं दे रहा। हद है कि कुछेक लोग पाकिस्तानी कलाकारों को देश से ऊपर रखने का प्रयास कर रहे हैं। उनके लिए कलाकार किसी भी प्रकार की सीमा से ऊपर हैं। वह पूछ रहे हैं कि क्या पाकिस्तानी कलाकारों को भगा देने से आतंकवाद समाप्त हो जाएगा? नहीं होगा, आतंकवाद समाप्त। लेकिन, क्या आप भरोसा दिलाते हैं कि पाकिस्तानी कलाकारों को काम देने आतंकवाद समाप्त हो जाएगा? भारत में आप अभिव्यक्ति की आजादी का बेजा इस्तेमाल करते हैं, इसलिए आप खुद को खुदा समझते हो। यदि वाकई कलाकार संवेदनशील हैं और उनके लिए देश की सीमाएँ कोई मायने नहीं रखती, तब क्या पाकिस्तानी कलाकार बेकसूर लोगों का खून बहाने वाले आतंकवादियों का विरोध कर सकते हैं? पाकिस्तानी कलाकारों के समर्थक क्या इतना भर करा सकते हैं कि कोई फवाद खान पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ बयान जारी कर दे? यह संभव नहीं है। इसलिए पाकिस्तानी कलाकारों के लिए विधवा विलाप बेमानी है।

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

मुलायम के बोल-वचन और वोट बैंक की राजनीति

 उत्तर  प्रदेश के चुनाव सिर पर आ गए हैं। इस बार समाजवादी पार्टी की नैया भंवर में दिखाई पड़ रही है। यही कारण है कि समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव को 'मुस्लिम प्रेम' नजर आने लगा है। वह किसी भी प्रकार अपने वोटबैंक को खिसकने नहीं देना चाहते हैं। मुसलमानों को रिझाने के लिए उन्होंने फिर से 'बाबरी राग' अलापा है। मुलायम सिंह यादव ने अपने जीवन पर लिखी किताब 'बढ़ते साहसिक कदम' के विमोचन अवसर पर अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाने के अपने फैसले को साहसिक बताया है। उनका कहना है कि देश की एकता को बचाने के लिए कारसेवकों पर गोली चलाने का उनका फैसला सही था। गोली नहीं चलती तो मुसलमानों का भरोसा उठ जाता। देश की एकता बचाने के लिए 16 की जगह 30 जान भी लेनी पड़ती तो ले लेता। गौरतलब है कि जनवरी, 2016 में भी मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली चलाने के अपने फैसले को सही ठहराया था।

रविवार, 17 अप्रैल 2016

आरक्षण पर नीतीश कुमार की राजनीति समाज और संविधान विरोधी

आरक्षण पर दो बयान आए हैं, जिनके गहरे निहितार्थ हैं। यह बयान हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और सांसद चिराग पासवान के। चूँकि देश में पिछले कुछ समय से आरक्षण का मुद्दा ज्वलंत है। इसलिए दोनों बयानों पर विमर्श महत्त्वपूर्ण है। आश्चर्य की बात है कि इन दोनों ही बयानों पर मीडिया में अजीब-सी खामोशी देखी गई है। जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से आए बयानों पर मीडिया ने किस तरह का राग अलापा था, सबने देखा-सुना। हमें यह मानना होगा कि आरक्षण पर राजनीतिक और सामाजिक विमर्श को सही दिशा देने में मीडिया चूक रहा है। खासकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया का आचरण राजनीतिक दलों की तरह है। जिस तरह कुछ राजनेता आरक्षण का मुद्दा उठाकर अपना राजनीतिक स्वार्थ साधने की कोशिश कर रहे हैं। ठीक उसी प्रकार, समाचार वाहिनियाँ (न्यूज चैनल्स) उसी समय आरक्षण का विषय उठाती हैं, जब उसमें उन्हें टीआरपी दिखाई देती है। टीआरपी से पैदा होने वाले अर्थ की चाह में समाचार वाहिनियाँ अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से भी मुँह फेर लेती हैं। आरक्षण ऐसा मसला है, जिसे व्यक्तिगत स्वार्थ की नजर से देखने से बचना होगा। क्योंकि, यह सामाजिक समानता और विभेद दोनों का कारण बनता है। सकारात्मक ढंग से बात करेंगे तब यह सामाजिक समानता का विषय बनता है। जब सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत करेंगे, तब यह समाज में विभेद पैदा करने का कारण बनता है।