शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

हजार स्वर्ण मंदिरों का शहर है कांचीपुरम

देखें : इस वीडियो ब्लॉग में करें कांचीपुरम के चार प्रमुख मंदिरों के दर्शन


हिन्दू आस्था का प्रमुख केंद्र है तमिलनाडु का कांचीपुरम। हिन्दू वाङ्ग्मय में मोक्षदायिनी सप्तपुरियों का वर्णन आता है, उनमें कांचीपुरम भी शामिल है। अर्थात् कांची मोक्ष की भूमि है। ज्ञान-वैराग्य की भूमि है। संभवत: यही कारण है कि कांची को दक्षिण भारत की काशी भी कहते हैं। यह सप्तपुरियां भगवान शिव और विष्णु में बराबर-बराबर बंटी हैं। सप्तपुरियों को आधा-आधा कैसे बाँटें, तब इसका रास्ता निकाला गया कि कांची नगरी आधी विष्णु को और आधी शिव को समर्पित कर दी जाए। इस प्रकार कांचीपुरम के दो भाग हैं-  शिवकांची तथा विष्णुकांची। कांचीपुरम प्राचीन मंदिरों का शहर है। एक-दो नहीं अपितु यहाँ अनेक मंदिर हैं, जिनका द्रविण शैली का स्थापत्य देखते ही बनता है। कांचीपुरम को ‘हजार मंदिरों का शहर’ या ‘हजार मंदिरों का स्वर्ण नगर’ और ‘द गोल्डन सिटी ऑफ़ 1000 टेंपल’ भी कहा जाता है। यहाँ आज भी लगभग 126 भव्य-दिव्य मंदिरों के दर्शन किए जा सकते हैं। अपनी कांचीपुरम की यात्रा में हमने यहाँ के चार प्रमुख मंदिरों के दर्शन किए- कामाक्षी अम्मन मंदिर, एकाम्बरेश्वर मंदिर, वरदराज पेरुमल मंदिर और उलगलंथा पेरुमल मंदिर। चेन्नई के दक्षिण-पश्चिम में पलार नदी के किनारे स्थित कांचीपुरम अपने रेशम के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसे ‘कांजीवरम’ कहा जाता है। यहाँ आसपास के गाँवों में आज भी घर-घर में हथकरघे लगे हैं, जहाँ स्त्री के सौंदर्य को कई गुना बढ़ाने वाली रेशम की साड़ियाँ बुनी जाती हैं। कभी चोल, पल्लव और विजयनगर साम्राज्य की राजधानी रहे कांचीपुरम की ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक विरासत के साथ हमने तीन दिन गुजारे। श्रीकांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य श्री विजेंद्र सरस्वती कहते हैं कि कांचीपुरम में दो-तीन दिन रहने से पुण्य प्राप्त होता है। पुण्य के साथ हमने अविस्मरणीय आनंद भी प्राप्त किया।

कामाक्षी अम्मन मंदिर, कांचीपुरम / फोटो - डॉ. लोकेन्द्र सिंह

कामाक्षी अम्मन मंदिर :

कामाक्षी अम्मन मंदिर, कांचीपुरम का प्रमुख तीर्थस्थल है। देशभर से श्रद्धालु यहाँ माँ पार्वती के अवतार कामाक्षी माता के दर्शन करने के लिए आते हैं। पद्मासन में विराजमान कामाक्षी अम्मन, कांची की अधिष्ठात्री देवी हैं। कामाक्षी मंदिर को शक्तिपीठ माना जाता है, जहाँ देवी सती की नाभि गिरी थी। कामाक्षी मंदिर में गर्भगृह को गायत्री मंडप कहते हैं। गर्भगृह के ऊपर स्वर्ण गोपुरम् है, जो पूरे वैभव के साथ अध्यात्म और समृद्धि की चमक बिखरेता है। प्रवेश द्वार पर एक विशाल ध्वजस्तंभ या जयस्तंभम् है, जो विजय का प्रतीक है। यह जयस्तम्भ भी स्वर्ण आभा के साथ चमकता है। माँ कामाक्षी के सम्मुख श्रीचक्र बना है, जिसके शीर्ष पर वे प्रकटरूप में विराजी हैं। कहते हैं कि स्वयं जगद्गगुरु आदि शंकराचार्य ने शिला पर इस श्रीचक्र को उकेरा था और यहीं उन्होंने देवी पर सौंदर्यलहरी की रचना की थी। 

मंदिर का स्थापत्य बहुत भव्य है। इसकी दीवारों एवं खम्बों पर की गई नक्काशी देखते ही बनती है। यह नक्काशी भारत की एकात्मता को भी प्रकट करती है। दीवारों पर रामायण के प्रसंगों को उकेरा गया है। महाविष्णु के अवतार श्रीराम के जन्म के प्रसंग के साथ ही तीनों माताओं- कौशल्या, सुमित्रा, केकई और पिता महाराज दशरथ का शिल्प भी है। माता सीता की खोज में लंका पहुँचे श्रीहनुमान भी दशाशन के सामने बैठे दिखायी दे जाएंगे। यानी मंदिर की दीवारें रामकथा सुनाती हुई प्रतीत होंगी। यहाँ आप कल्याण मंडप भी देख पाएंगे, जहाँ भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ। इसके दृश्यों को मंडप की दीवारों एवं खम्बों पर आप देख सकते हैं। शिवलिंग का आलिंगन किए माँ पार्वती (कामाक्षी देवी) का शिल्प भाव-विभोर कर देता है।  

एकाम्बरेश्वर मंदिर, कांचीपुरम / फोटो : डॉ. लोकेन्द्र सिंह

एकाम्बरेश्वर मंदिर :

कामाक्षी मंदिर से थोड़ी दूरी पर ही एकाम्बरेश्वर मंदिर है, जिसे एकम्बरनाथ मंदिर भी कहते हैं। यह कांचीपुरम का सबसे बड़ा मंदिर है, जो लगभग 20 एकड़ में फैला हुआ है। गोपुरम् पर रंगों का संयोजन आकर्षित करता है। यह मंदिर महादेव को समर्पित है। एकाम्बरेश्वर शिवलिंग बालू से बना है, जिसे पृथ्वी लिंगम या बालुका लिंगम कहते हैं। मान्यता है कि इस शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा माता पार्वती ने की थी। उन्होंने महादेव से विवाह करने के लिए यहाँ आम के पेड़ के नीचे तपस्या की। मंदिर परिसर में स्थित लगभग 3500 वर्ष प्राचीन आम्रवृक्ष उस दैवीय प्रसंग के साक्षी के रूप में उपस्थित है। मंदिर के परिक्रमा पथ में अनेक शिवलिंग देखे जा सकते हैं। ये सभी शिवलिंग एक ही पत्थर से बनाए गए हैं। दक्षिण भारत के अन्य मंदिरों की भाँति यहाँ भी दीवारों और खंबों पर सुंदर नक्काशी की गई है। कई मूर्तियां इतनी सजीव हैं कि मानो अभी बोल ही पड़ेंगी। मंदिर के भीतर एक हजार खंभों वाला मंडप भी इस परिसर को विशिष्ट बनाता है।

वरदराज पेरुमल मंदिर में पत्थर से बनी जंजीर / फोटो : डॉ. लोकेन्द्र सिंह

वरदराज पेरुमल मंदिर : 

पेरुमल का अर्थ है ‘महान भगवान’। यह शब्द तमिल भाषा के ‘पेरुम’ (महान) और ‘माल’ (ईश्वर) से बना है। मुख्य रूप से दक्षिण भारत में भगवान विष्णु के लिए उपाधि के रूप में ‘पेरुमल’ शब्द का प्रयोग होता है। इसी तरह, ‘वरदराज’ का अर्थ है ‘वरदानों का राज’। इसका उपयोग भी भगवान विष्णु के लिए किया जाता है। ‘वरदराज पेरुमल मंदिर’ में भगवान विष्णु को देवराजस्वामी के रूप में पूजा जाता है। सन् 1053 में चोलों ने वरदराज पेरुमल मंदिर बनवाया था। यहाँ 9 फीट ऊंची भगवान विष्णु की अद्भूत मूर्ति है। वरदराज पेरुमल मंदिर के प्रवेश द्वार से जैसे ही हम परिसर में प्रवेश करते हैं, हमें बायीं ओर 100 खंभों वाला एक मंडप दिखायी देता है। इसके खंबों पर की गई कारीगरी अद्भुत है। क्या कारीगर रहे होंगे, जिन्होंने पत्थर को तराशकर अचंभित करनेवाली सांकर (जंजीर) बना दी। मंडल के कंगूरे पर लटकी जंजीर को देखकर आप अंदाजा ही नहीं लगा सकते कि यह लोहे या अन्य धातु की न होकर पत्थर की सांकर है। 

कांचीपुरम के उलगलंथा पेरुमल मंदिर का आकर्षक गोपुरम् / फोटो : डॉ. लोकेन्द्र सिंह

उलगलंथा पेरुमल मंदिर : 

‘उलगलंथा पेरुमल’ का अर्थ है ‘ब्रह्मांड को मापने वाला भगवान’। यह नाम भगवान विष्णु के पाँचवे अवतार ‘वामन अवतार’ से जुड़ता है। भगवान वामन को समर्पित मंदिर बमुश्किल ही आपने देखे होंगे। उलगलंथा पेरुमल मंदिर कांचीपुरम के सबसे प्राचीन मंदिरों में शामिल है। इतिहासकार बताते हैं कि मंदिर का निर्माण राजेन्द्र चोल प्रथम (1012-1044 ई.) ने कराया था। मंदिर का गोपुरम् आकर्षक है। जब हम गर्भगृह में पहुँचते हैं तब हमारे सामने भगवान वामन अपने विराट स्वरूप में दिखायी देते हैं। मूर्ति 35 फीट ऊँची है, जिसमें भगवान वामन का बायाँ पैर ऊँचा उठा हुआ है और दायाँ पैर राजा बलि के सिर पर टिका हुआ है। 

कांचीपुरम के ऐतिहासिक, प्राचीन और सांस्कृतिक महत्व के मंदिरों के वातावरण में सकारात्मक दिव्य ऊर्जा की अनुभूति आप कर सकते हैं। हम यह तो नहीं कहेंगे कि मौसम की अनुकूलता को ध्यान में रखकर आप केवल अक्टूबर से फरवरी के बीच ही यहाँ आएं। जब आपको लगे कि कांचीपुरम होकर आना चाहिए, तभी यहाँ चले आईए। कांचीपुरम के उत्सव एवं मंदिरों की परंपराओं की जानकारी लेकर आएंगे तो सांस्कृतिक विरासत के भी साक्षी एवं सहभागी बनने अवसर आपको मिल सकता है।

कांचीपुरम यात्रा के सहयात्री
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के छात्र
अंकित आनंद, नैवेद्य पुरोहित, शशांक कुमार और पुष्कर दीक्षित

स्वदेश ज्योति में 28 सितंबर, 2026 को प्रकाशित

शनिवार, 26 सितंबर 2026

“मैं अंग्रेजों की नौकरी नहीं करूंगा”

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक रज्जू भैया पढ़ने में बहुत मेधावी थे, स्कूल के दिनों में ही उन्होंने भांप लिया था कि ब्रिटिश राज भारत के लिए अच्छा नहीं है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चौथे सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ का संपूर्ण जीवन प्रखर मेधा, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति का अप्रतिम उदाहरण है। बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी रज्जू भैया ने उस दौर में ब्रिटिश शासन के वैभवशाली पदों को ठुकरा दिया था, जब लोग सरकारी नौकरियों के लिए लालायित रहते थे। उन्हें स्कूल के दिनों से ही यह अनुभव होने लगा था कि ब्रिटिश राज भारत के लिए अच्छा नहीं है। अंग्रेजों से मुक्ति पाने के लिए देश में स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा है। रज्जू भैया एक घटना को याद करते हैं– “मेरठ में नौचंदी का प्रसिद्ध मेला लगता था, यदा-कदा हम लोग भी उसे देखने जाते थे। भगतसिंह और उनके दो साथी राजगुरु और सुखदेव को मृत्युदंड दिया गया था। एक दुकानदार ने उस मेले में अपनी दुकान पर उस दृश्य का एक छोटा चित्र लगा रखा था, जो मेले में आए दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया था। अगले दिन ही पुलिस ने उस चित्र को हटा दिया और हमें यह पता लगा कि उस दुकानदार को गिरफ्तार कर लिया गया है। हम उस घटना को पूरी तरह समझ पाने में सक्षम नहीं थे, किंतु अंग्रेजों के प्रति हमारे मन में रोष अवश्य उत्पन्न हुआ और हमने ‘टोडी बच्चा हाय हाय’ के नारे का भरपूर समर्थन किया।” इसी विचार के कारण उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि ब्रिटिश शासन के अधीन नौकरी नहीं करूंगा।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

श्रीगणेश की दिव्य प्रतिमा, निरंतर बढ़ रहा आकार

अमरकंटक दर्शन : पुष्पराजगढ़ के जंगलों में कलचुरीकालीन भगवान श्रीगणेश की ऐतिहासिक प्रतिमा, इन्हें बटुक गणेश भी कहते हैं


अनूपपुर के पुष्पराजगढ़ तहसील के ग्राम धरहर कला में स्थापित प्राचीन एवं दिव्य श्रीगणेश प्रतिमा

अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ विकासखंड के अंतर्गत ग्राम धरहरकला में भगवान श्रीगणेश की दिव्य एवं प्राचीन प्रतिमा है, जो श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र है। इस स्थान को बहगड़नाला भी कहते हैं। अमरकंटक स्थित माँ नर्मदा मंदिर से उत्तर दिशा की ओर लगभग 35 किलोमीटर और पुष्पराजगढ़ से लगभग सात किलोमीटर की दूरी पर भगवान श्रीगणेश की यह प्रतिमा स्थापित है। भगवान श्रीगणेश की इस प्रतिमा को लेकर लोगों के मन में अपार श्रद्धा होने के साथ-साथ कौतुहल भी है। कहते हैं कि प्रतिवर्ष तिल-तिल करके प्रतिमा का आकार बढ़ रहा है। वर्तमान में प्रतिमा का आकार लगभग 8 फीट है। हालांकि इसके कोई वैज्ञानिक एवं पुरातात्विक साक्ष्य नहीं है। लेकिन लोगों की श्रद्धा है। इस संदर्भ में यह भी जनश्रुति है कि जब प्रतिमा प्रकट हुई थी, तब इसका आकार केवल एक फीट था। इन्हीं जनश्रुतियों के कारण घने जंगल में, एकांत में विराजे धरहरकला भगवान श्रीगणेश की प्रसिद्धि दूर-दूर तक है। प्रतिवर्ष वसंत पंचमी पर यहाँ तीन दिवसीय विशाल मेला लगता है। श्रीगणेशोत्सव के दिनों में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहाँ भगवान श्रीगणेश की इस दिव्य प्रतिमा के दर्शन के लिए आते हैं। अमरकंटक में सदानीरा माँ नर्मदा के दर्शन के लिए आने वाले भक्तगण भी श्रीगणेश के दर्शन के लिए आते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि अमरकंटक में माँ नर्मदा की पूजा-अर्चना का फल भक्तों को तभी मिलता है, जब धरहरकला आकर भगवान श्रीगणेश की पूजा करते हैं। एक मान्यता यह भी है कि अमरकंटक पहुंचने से पहले धरहर के स्वयंभू गणेश महाराज के दर्शन करने के बाद ही माँ नर्मदा की पूजा-अर्चना का फल पूर्ण होता है। इन्हीं कारणों से अमरकंटक आने वाले और वहाँ से लौटने वाले श्रद्धालु धरहर कला पहुंचकर श्री गणेश जी के दर्शन और पूजन करते हैं।

गुरुवार, 24 सितंबर 2026

‘हनुमान अंश’ ने भारतीय सिनेमा को दिखाई राह

भारतीय सिनेमाई परिदृश्य में जब भी किसी फिल्म की सफलता का आकलन होता है, तो अमूमन भारी-भरकम बजट, चमचमाते सितारे और आक्रामक प्रचार तंत्र का उल्लेख किया जाता है। बड़े प्रोडक्शन हाउस अक्सर औसत दर्जे की कहानियों को भी पीआर रणनीतियों और मल्टी-सिटी टूर के शोर में ‘ब्लॉकबस्टर’ का चोगा पहनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन नीम करोली बाबा के जीवन और दर्शन से प्रेरित फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने स्थापित व्यावसायिक नैरेटिव्स को ध्वस्त कर यह सिद्ध कर दिया है कि जब कथ्य में आत्मीयता, सांस्कृतिक जुड़ाव और सादगी हो, तो समाज उसे न केवल स्वीकारता है, बल्कि सिर-आंखों पर बिठाता है। रिलीज के सातवें सप्ताह और 47वें दिन के बाद भी सिनेमाघरों में दर्शकों की बढ़ती भीड़ इस बात का प्रमाण है कि यह कोई क्षणिक कौतूहल नहीं, बल्कि भारतीय दर्शकों के अंतर्मन का सच्चा प्रकटीकरण है।

बुधवार, 23 सितंबर 2026

ब्रह्मांड को मापने वाले भगवान का मंदिर

उलगलंथा पेरुमल मंदिर में भगवान विष्णु के वामन अवतार के दर्शन

‘उलगलंथा पेरुमल’ का अर्थ है ‘ब्रह्मांड को मापने वाला भगवान’। यह नाम भगवान विष्णु के पाँचवे अवतार ‘वामन अवतार’ से जुड़ता है। भगवान वामन को समर्पित मंदिर बमुश्किल ही आपने देखे होंगे। मेरे लिए तो यह पहला मंदिर है, जहाँ मंदिर के मुख्य देवता के रूप में भगवान वामन की पूजा होती है। उलगलंथा पेरुमल मंदिर कांचीपुरम के सबसे प्राचीन मंदिरों में शामिल है। इतिहासकार बताते हैं कि इस मंदिर का निर्माण राजेन्द्र चोल प्रथम (1012-1044 ई.) ने कराया था। एक और महत्वपूर्ण तथ्य इस मंदिर को विशेष बनाता है कि यह मंदिर 108 दिव्य देसमों (विष्णु के पवित्र निवास) में से एक है। मंदिर का गोपुरम् आकर्षक है।

दर्शन करें : कांचीपुरम के मंदिरों का दर्शन करें

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

न्यूजरूम के यथार्थ से जोड़ती संपादन-कला

पुस्तक चर्चा : सोशल मीडिया और आधुनिक पत्रकारिता के दौर में सामग्री परिमार्जन का प्रामाणिक पाठ है प्रो. अरुण कुमार भगत की पुस्तक ‘संपादन-कला : सिद्धांत से व्यवहार तक’


सोशल मीडिया के इस दौर में एक बात सबको साफ़ समझ आ गई है कि पत्रकारिता में संपादन का बहुत महत्व है। पत्रकारिता केवल रिपोर्टिंग नहीं है। यह सत्य है कि पत्रकारिता में जानकारी एकत्र करके लाना सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण कार्य है यह तय करना कि उस जानकारी को किस प्रकार से प्रसारित करना है, या प्रसारित करना भी है या नहीं? संपादन की अच्छी समझ होने पर ही हम उस जानकारी को लोकोपयोगी बना सकते हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पत्रकारिता की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता बहुत हद तक उसके संपादन पक्ष पर टिकी होती है। इसलिए संपादन-कला का कौशल सबको सीखना चाहिए। सूचनाओं के प्रचार-प्रसार में शामिल सभी लोगों को संपादन की बुनियादी बातें पता होनी चाहिए। मीडिया के आचार्य रहे वरिष्ठ लेखक एवं बिहार लोक सेवा आयोग के सदस्य प्रो. अरुण कुमार भगत की पुस्तक ‘संपादन-कला : सिद्धांत से व्यवहार तक’ इन बुनियादी बातों को सिखाने में बहुत उपयोगी साबित होगी। पुस्तक के शीर्षक और उसकी विषय-वस्तु को देखकर यह अनुमान न लगाएं कि यह केवल पत्रकारिता के विद्यार्थियों के उपयोग की पुस्तक है। यह उन सबके लिए उपयोगी है, जो सोशल मीडिया में लिख-पढ़ रहे हैं।

रविवार, 13 सितंबर 2026

हिन्दी समाचारपत्र में अंग्रेजी शब्दों पर ‘लाल गोले’ लगाकर संपादक के पास पहुँच गए थे सुदर्शन जी

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पाँचवें सरसंघचालक श्री कुप्पहल्ली सीतारामय्या सुदर्शन स्वभाषा के प्रबल पक्षधर थे, हिन्दी में अंग्रेजी की मिलावट वे पसंद नहीं करते थे


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक कुप्प. सी. सुदर्शन भाषा की शुद्धता और व्याकरण को लेकर बेहद संवेदनशील थे। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में वर्तनी एवं व्याकरण की अशुद्धियों को वे कतई नजरअंदाज नहीं करते थे। भले ही उनकी अपनी मातृभाषा तमिल थी, लेकिन जन्मभूमि एवं कर्मभूमि हिन्दी भाषी क्षेत्र रहा। शायद इसलिए ही हिन्दी से उन्हें गहरा प्रेम था। हालांकि, सुदर्शनजी लगभग 12 भाषाओं पर अधिकार रखते थे। परिवार तमिल था लेकिन पूर्वज वर्षों पहले तमिलनाडु से स्थानांतरित होकर कर्नाटक में बस गए थे इसलिए कन्नड़ ही उनके परिवार की मुख्य भाषा बन गई थी। भाषा प्रेम को लेकर सुदर्शन जी के अनेक प्रेरक प्रसंग प्रचलित हैं। ऐसा ही एक किस्सा भोपाल का है, जब वे सरसंघचालक के दायित्व से मुक्त होकर ‘एक साधारण स्वयंसेवक’ की भाँति रह रहे थे। हिन्दी के हृदय प्रदेश, ‘मध्यप्रदेश’ से प्रकाशित हिन्दी के प्रमुख समाचार पत्र में जब उन्होंने अंग्रेजी के शब्दों की भरमार देखी, तो उन्हें क्षोभ हुआ। समाचारपत्र अपनी प्रतिष्ठा तो इस नाते करता है कि वह हिन्दी का सबसे बड़ा और सबसे अधिक प्रसारित समाचार पत्र है लेकिन हिन्दी भाषा के साथ न्याय नहीं करता है। उन्होंने लाल कलम से भाषा की त्रुटियों और अंग्रेजी के शब्दों पर गोले लगाए। उस रंगे-पुते समाचारपत्र को लेकर संपादक के कक्ष में भी पहुँच गए। सुदर्शनजी ने समाचारपत्र की वह प्रति संपादक की मेज पर रखकर उन्हें हिन्दी में अनावश्यक अंग्रेजी मिलावट के प्रति सचेत किया। यह बातचीत आक्रोश या अभिमान के साथ नहीं हो रही थी, बल्कि उसमें अपनत्व था। संपादक ने भी स्वीकार किया और विश्वास दिलाया कि हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों की मिलावट और वर्तनी की अशुद्धियों के प्रति सावधान रहेंगे।

शनिवार, 12 सितंबर 2026

उच्च कोटि के वैज्ञानिक थे ‘रज्जू भैया’

संघ शताब्दी वर्ष : ‘रज्जू भैया’ को न्यूक्लियर फिजिक्स पर शोध के लिए अपने साथ लेकर जाना चाहते थे नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर सीवी रमन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चौथे सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ के बारे में कहा जाता है कि यदि वे संघ के प्रचारक नहीं होते तो निश्चित ही देश के महान वैज्ञानिक होते। यह बात यूँ ही नहीं कही जाती है अपितु इसके पीछे ठोस आधार है। रज्जू भैया की वैज्ञानिक प्रतिभा को पहचान कर ही भारत के महान वैज्ञानिक एवं भौतिकी के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक सर चंद्रशेखर वेंकट रमन (सीवी रमन) उन्हें अपने साथ न्यूक्लियर फिजिक्स में शोध कार्य के लिए बेंगलूरु ले जाना चाहते थे। जब डॉ. होमी जहाँगीर भाभा भारत के उभरते परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए देश के शीर्ष भौतिकशास्त्रियों को जोड़ रहे थे, तब भी सर सीवी रमन ने उन्हें रज्जू भैया का नाम सुझाया था। डॉ. भाभा ने भी रज्जू भैया से अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना के साथ जुड़ने का आग्रह किया। परंतु, रज्जू भैया तो पहले ही भौतिक वैज्ञानिक नहीं अपितु समाज वैज्ञानिक बनने का विचार पक्का कर चुके थे। प्रसिद्ध लेखक देवेन्द्र स्वरूप और बृजकिशोर शर्मा द्वारा लिखित रज्जू भैया की जीवनी ‘हमारे रज्जू भैया’ में उल्लेख आता है कि मुंबई प्रवास के दौरान जब डॉ. होमी भाभा की भेंट श्री गुरुजी से हुई, तो उन्होंने यह उलाहना देते हुए कहा था- “गुरुजी, आपके कारण भारत ने एक शीर्ष न्यूक्लियर फिजिसिस्ट (परमाणु वैज्ञानिक) खो दिया”। इस पर श्री गुरुजी ने सहज भाव से उत्तर दिया था- “डॉ. भाभा, रज्जू भैया ने वैज्ञानिक बनना नहीं छोड़ा है; अंतर केवल इतना है कि वह अब भौतिक प्रयोगशाला के बजाय ‘समाज की प्रयोगशाला’ में मनुष्यों को गढ़ने का वैज्ञानिक प्रयोग कर रहे हैं”।

गुरुवार, 10 सितंबर 2026

समर्पण और सादगी के प्रतीक: प्रो. राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक रज्जू भैया संघ में आने से पहले 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में शामिल हुए थे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस जी ने अपने पूर्ववर्ती सरसंघचालकों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए प्रो. राजेन्द्र सिंह उपाख्य ‘रज्जू भैया’ की चतुर्थ सरसंघचालक के रूप में घोषणा की। देवरस जी का स्वास्थ्य उनका साथ नहीं दे रहा था। संघ कार्य के लिए प्रवास करना कठिन हो गया था। संघ कार्य की गति रुके नहीं, इसलिए उन्होंने सरसंघचालक का दायित्व रज्जू भैया को सौंप दिया। 11 मार्च, 1994 का दिन है, जब बालासाहब देवरस जी ने रज्जू भैया को संघ का नेतृत्व सौंपा था। उस दिन नागपुर के रेशिमबाग स्थित डॉ. हेडगेवार सभागार में संघ की निर्णायक सर्वोच्च इकाई ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ की बैठक चल रही थी। देशभर से लगभग एक हजार प्रतिनिधि उपस्थित थे और सरकार्यवाह एचवी शेषाद्रि संघ कार्य का वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत कर रहे थे। ठीक उसी समय, सरसंघचालक बालासाहब व्हीलचेयर से बैठक में आते हैं। उन्होंने अत्यंत शांत और भावुक वातावरण में सभा को संबोधित करते हुए कहा कि “पूजनीय गुरुजी ने मुझ पर यह जिम्मेदारी 1973 में सौंपी थी। आप सबके सहयोग और समर्थन से मैं अब तक उस जिम्मेदारी को अपने कंधों पर उठा पाया, लेकिन गिरते स्वास्थ्य के कारण मेरे लिए अब यात्रा करना संभव नहीं रह गया है। इस कारण सभी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के साथ परामर्श के बाद मैंने यह निर्णय लिया है कि यह जिम्मेदारी अब प्रोफेसर राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) अपने कंधों पर लें। मुझे पूरा भरोसा है कि रज्जू भैया को भी इसी प्रकार का सहयोग और समर्थन मिलता रहेगा। मैं भी एक स्वयंसेवक की भाँति अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहूँगा”। सुबह ठीक 10:40 बजे बालासाहब देवरस जी ने पुष्प गुच्छ और नारियल भेंट कर रज्जू भैया को संघ के चतुर्थ सरसंघचालक का दायित्व सौंपा। 72 वर्ष की उम्र में सरसंघचालक बने रज्जू भैया ने 1994 से 2000 तक, अर्थात् 6 वर्ष इस दायित्व का निर्वहन किया।

प्रधानमंत्री मोदी का युवाओं से जुड़ाव

राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव को भांपकर अपनी रणनीति ढाल लेना ही किसी राजनेता की सबसे बड़ी ताकत होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर बार अपनी ऊर्जावान सक्रियता और अप्रत्याशित पहलकदमी से चौंकाते हैं। वडोदरा में ‘जेन-जी’ के छह हजार युवाओं के बीच प्रधानमंत्री की मौजूदगी महज एक सरकारी या औपचारिक संवाद नहीं थी, बल्कि यह बदलते भारत की नब्ज पर हाथ रखने की एक सोची-समझी राजनीतिक और विकासात्मक कवायद थी। मंच पर क्वीन का कालजयी गीत ‘वी विल रॉक यू’ और ‘आरी आरी’ की गूंज के बीच वाई-आकार के रैंप पर चलकर युवाओं के करीब पहुंचना यह साबित करता है कि वे आज की युवा संस्कृति और उनके तेवर को बखूबी समझते हैं।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

‘तत्त्वमसि’: संघ दर्शन और प्रचारक जीवन की कथा-यात्रा

देखें यह वीडियो : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, प्रचारक जीवन, संघ से जुड़े प्रश्नों एवं दृष्टिकोण पर केन्द्रित वरिष्ठ प्रचारक एवं साहित्यकार श्रीधर पराडकर जी का उपन्यास


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पक्ष एवं प्रतिपक्ष में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। लेकिन ‘तत्त्वमसि’ मुझे बाकी सब पुस्तकों से अलग लगती है। यह एक ऐसा उपन्यास है, जिसका कथानक संघ के प्रचारक को केंद्र में रखकर बुना गया है। ‘तत्त्वमसि’ कथा-साहित्य के माध्यम से संघ की आंतरिक कार्यप्रणाली और दर्शन को प्रस्तुत करने का एक रोचक प्रयास है। वरिष्ठ प्रचारक एवं साहित्यकार श्रीधर पराड़कर का यह उपन्यास प्रचारक जीवन, उसके त्याग और समाज-केंद्रित अध्यात्म को रेखांकित करता है।

गुरुवार, 3 सितंबर 2026

विश्व बंधुत्व का संदेश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन की यात्रा पर पहुँचे सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने अमेरिका के बाद कनाडा में भारतीय विचार को दुनिया के सामने रखा है। जिस प्रकार न्यूयॉर्क में उन्होंने दुनिया को शांति और सह-अस्तित्व के साथ चलने की राह दिखायी, उसी प्रकार उन्होंने टोरंटो में भारत के उदात्त विचार को सबके साथ साझा किया। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य जब भू-राजनीतिक तनावों, संकीर्ण राष्ट्रवाद और वैचारिक ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रहा है, तब भारत का विचार ही सही राह दिखा सकता है। प्रारंभ से लेकर आज तक विश्व में भारत की प्रतिष्ठा भी उसके दर्शन को लेकर रही है। कहना होगा कि टोरंटो में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का ‘हिंदू विश्व बंधु’ संबोधन केवल एक सांस्कृतिक व्याख्यान नहीं, बल्कि विश्व शांति के लिए एक अनिवार्य दृष्टि प्रस्तुत करता है। उनका यह कथन कि विविधता एकता की विरोधी नहीं बल्कि उसकी स्वाभाविक और सुंदर अभिव्यक्ति है, भारतीय चिंतन के उस मूल तत्त्व को रेखांकित करता है जिसे आज की खंडित दुनिया को गहराई से समझने की आवश्यकता है। भारतीय मनीषा ने विविधता को कभी संकट या विभाजन के स्रोत के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे एक ही चेतना के बहुरंगी स्वरूप के रूप में स्वीकार और सम्मानित किया है।

सोमवार, 31 अगस्त 2026

वैश्विक पटल पर आरएसएस

न्यूयॉर्क व्याख्यान : ‘साझा मानवता’ का व्यावहारिक मार्ग

न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आरएसएस के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेसन' (Universal Oneness Celebration) कार्यक्रम को संबोधित किया 

न्यूयॉर्क की ऐतिहासिक धरा पर ‘एक विश्व : एक मानवता शिखर सम्मेलन’ में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का उद्बोधन वस्तुतः भारत के शाश्वत आध्यात्मिक बोध और 'वसुधैव कुटुंबकम्' की युगीन अभिव्यक्ति है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जहाँ भौतिकवादी होड़, वैचारिक संकीर्णता, युद्ध की विभीषिका और अविश्वास का अंधकार संपूर्ण मानवता को ग्रस रहा है, वहाँ यह कार्य-आह्वान विश्व को विनाश के गर्त से निकालकर एकात्मता के प्रकाश की ओर ले जाने वाला एक सशक्त मार्गदर्शक सिद्ध होगा। भारत की यह सनातन परंपरा रही है कि जब-जब संसार में घृणा, विभाजन और संघर्ष की लहरें उठी हैं, तब-तब यहाँ के ऋषियों, मनीषियों और विचारकों ने संपूर्ण सृष्टि को एक परिवार मानकर शांति और एकात्मता का संदेश दिया है। ऐसे में याद आता है स्वामी विवेकानंद का शिकागो व्याख्यान। विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद ने रक्त रंजित और युद्धरत विश्व को शांति एवं सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाया था। आज जब आधुनिक सभ्यता तकनीक की पराकाष्ठा पर पहुँचकर भी मानवीय संवेदनाओं के संकट से जूझ रही है, तब सरसंघचालक जी का यह उद्बोधन वैश्विक चिंतन को एक नई दिशा प्रदान करता है।

सोमवार, 24 अगस्त 2026

रक्षाबंधन : समाज की एकता, समरसता और राष्ट्र-रक्षा का पावन संदेश

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बस्तियों में जाकर वंचित वर्ग के बंधुओं को रक्षासूत्र बाँधकर अपनेपन की भावना को करते हैं प्रकट

भारत में उत्सव की अनूठी परंपरा है। ये उत्सव हमारे समाज को एक सूत्र में पिरोने और जीवन मूल्यों को जगाए रखने का काम करते हैं। हमारे प्रत्येक उत्सव की रचना में समाज के लिए जरूरी संदेश हैं। ऐसा ही एक उत्सव है- रक्षाबंधन, जो हमें सामाजिक समरसता का संदेश देता है। आमतौर पर हम इसे भाई-बहन के पवित्र प्रेम के त्योहार के रूप में जानते हैं, लेकिन इसका वास्तविक विचार इससे कहीं अधिक बड़ा और गहरा है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने रक्षाबंधन को अपने छह उत्सवों में शामिल किया है। संघ ने इस पर्व को संपूर्ण समाज को एकजुट करने, आपस में प्रेम-भाव बढ़ाने और देश की रक्षा का संकल्प लेने वाले महापर्व के रूप में देखा और उसे उसी ढंग से मनाना शुरू किया। यह पर्व हमें सिखाता है कि हम अपने समाज, संस्कृति और मातृभूमि की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहें। संघ ने समाज को स्मरण कराया कि रक्षाबंधन केवल एक धागा बांधने की रस्म नहीं है। हमारे यहाँ संबंधों की नींव विश्वास पर टिकी होती है, और यह धागा उसी विश्वास की डोर है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस तरह एक धागा बिखरे हुए अनगिनत मोतियों को जोड़कर एक सुंदर माला बना देता है, ठीक वैसे ही यह रक्षासूत्र भी समाज के अलग-अलग लोगों को आपस में जोड़कर एक कर देता है। पुराने समय में यह पर्व सिर्फ भाई-बहन तक ही सीमित नहीं था। जब भी समाज या देश पर कोई संकट आता था, तो लोग एक-दूसरे को रक्षासूत्र बांधकर साथ खड़े रहने और मदद करने का भरोसा दिलाते थे।

रविवार, 16 अगस्त 2026

आरएसएस बदल रहा है अपना ढांचा

संघ शताब्दी वर्ष : मध्यप्रदेश में अब तीन प्रांत (मध्यभारत , मालवा और महाकौशल) की जगह होंगे 7 संभाग, मध्य भारत में भोपाल एवं ग्वालियर संभाग, मालवा की जगह इंदौर और उज्जैन संभाग, महाकौशल की जगह सागर, रीवा और जबलपुर संभाग

यह आलेख 'आयुध Updates' के मार्च-अप्रैल 2026 अंक में प्रकाशित हुआ है। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर समाज में अब स्वीकार्यता के साथ-साथ एक विश्वास भी बन गया है। सज्जनशक्ति संघ के साथ मिलकर समाज परिवर्तन के आंदोलन से जुड़ना चाहती है, वहीं संघ भी अपने लक्ष्य यानी समाज के साथ एकाकार होने की ओर बढ़ना चाहता है। हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष के बाद अपने अगले पड़ाव की ओर कदम बढ़ा रहा है। शताब्दी वर्ष में अब तक आयोजित कार्यक्रमों में समाज ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया है। समाज की बड़ी ताकत संघ के संपर्क में आई है। इसलिए अपने अगले पड़ाव में संघ समाज की सज्जन शक्ति को साथ लेकर भारत के निर्माण की नयी कहानी लिखने की तैयारी कर रहा है। इसकी एक झलक हरियाणा के पट्टीकल्याणा (समालखा) में आयोजित अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों एवं भविष्य की रणनीति में देखी जा सकती है। पिछले कुछ समय से एक चर्चा बहुत जोरों से थी कि संघ अपनी भौगोलिक संरचना में बदलाव करने जा रहा है, संघ की प्रांत रचना खत्म हो जाएगी, क्षेत्र रचना में भी बदलाव होगा। इस चर्चा पर अब प्रतिनिधि सभा में मुहर लग गई है। हाँ, संघ की भौगोलिक संरचना में बदलाव हो रहा है। अब चर्चा इस बात की अधिक हो रही है कि आखिर संघ को इस परिवर्तन की आवश्यकता क्यों पड़ी?

रविवार, 9 अगस्त 2026

श्रीगुरुजी के ऐतिहासिक ‘तीन पत्र’

संघ शताब्दी वर्ष : गोलवलकर जी ने अपनी देह छोड़ने के पूर्व संघ की आगे की व्यवस्था और स्वयंसेवकों को संदेश देने के लिए तीन पत्र लिखे थे, जो उनके देवलोकगमन के बाद पढ़े गए

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ पत्र लिखने के अभ्यासी थे। पत्रों के माध्यम से श्रीगुरुजी का कार्यकर्ताओं के प्रति स्नेह, राष्ट्रप्रेम और हिन्दू समाज की एकात्मता के प्रति उनका संकल्प स्पष्ट झलकता है। उनके पत्रों में संघ कार्य के विस्तार, वैचारिक स्पष्टता, अनुशासन और व्यक्तिगत जीवन में मूल्यों को अपनाने पर जोर दिया गया है। कार्यकर्ताओं, सामाजिक एवं राजनीतिक नेतृत्व को लिखे उनके अनेक पत्र चर्चित हैं परंतु उनके ‘तीन पत्र’ अत्यंत महत्व के हैं। संघ को जानने-समझने की रुचि रखनेवाले बंधुओं को श्रीगुरुजी के ये तीनों पत्र अवश्य पढ़ना चाहिए। ये पत्र उन्होंने अपनी देह त्यागने से पूर्व लिखे थे। वर्ष 1972 में श्रीगुरुजी का स्वास्थ्य तेजी से गिरना शुरू हो गया था। परंतु, उसके बाद भी उन्होंने क्षणभर भी स्वयं को संघकार्य से अलग नहीं किया। वर्ष 1973 में जब उन्हें यह आभास होने लगा कि अब भौतिक देह से विश्राम लेने का समय आ गया है, तब उन्होंने अपने देहावसान के बाद संघ कार्य की समुचित व्यवस्था के बारे में विचार प्रारंभ कर दिया। इसी क्रम में ये तीन ऐतिहासिक पत्र लिखे गए। श्रीगुरुजी ने 2 अप्रैल 1973 को अपने हाथ से तीन पत्र लिखे और अखिल भारतीय व्यवस्था प्रमुख पांडुरंग पंत क्षीरसागर को सौंप दिए। उन्होंने क्षीरसागर जी को निर्देश दिए कि ये पत्र मेरे जाने के बाद सार्वजनिक रूप से पढ़े जाएं, जिनमें से दो पत्र बालासाहब देवरस पढ़ें। श्रीगुरुजी की इच्छा के अनुरूप तीनों पत्र सुरक्षित रख दिए गए। 5 जून 1973 को श्रीगुरुजी ने अपनी देह का त्याग किया। अगले दिन यानी 6 जून को इस पुण्य आत्मा के पार्थिव शरीर की अंत्येयात्रा प्रारंभ होने के पूर्व इन पत्रों को पढ़कर सुनाया गया। एक पत्र में उनके उत्तराधिकार की घोषणा की गई। दूसरे पत्र में आग्रह किया कि उनका कोई स्मारक नहीं बनाया जाए। वहीं, तीसरे पत्र में उनके हृदय की उदारता एवं व्यक्तित्व की महानता के दर्शन होते हैं, जिसमें वे विनयभाव से क्षमायाचना करते हैं कि उनके व्यवहार से कभी किसी का हृदय दु:खी हुआ हो, तो क्षमा करें। श्रीगुरुजी के ये तीन पत्र ‘बीज’ थे, जिन्होंने आगे चलकर संघ की कार्यपद्धति एवं संस्कृति को समृद्ध किया।

सोमवार, 3 अगस्त 2026

भगवा रंग से चिढ़ क्यों?

राष्ट्रध्वज तिरंगा में सबसे ऊपर है भगवा, भारतीय संस्कृति का का परिचायक, त्याग, वैराग्य, साहस, बलिदान और सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत है भगवा

खेल मैदान में राष्ट्रीय ध्वज के रंगों का समावेश कोई नई बात नहीं है, लेकिन भारत की राजनीति में जब भी केसरिया या नारंगी रंग की बात आती है, एक खास राजनीतिक वर्ग में असहजता साफ दिखने लगती है। आगामी हॉकी विश्व कप 2026 के लिए भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीमों की नई जर्सी लॉन्च हुई है। पारंपरिक नीले रंग की जगह इस बार नारंगी रंग को प्राथमिक किट के रूप में चुना गया है। हॉकी इंडिया के अध्यक्ष और पूर्व दिग्गज खिलाड़ी दिलीप तिर्की ने स्पष्ट किया कि नीले टर्फ पर नीले रंग की जर्सी के कारण विजिबिलिटी (दृश्यता) की व्यावहारिक समस्या आ रही थी और यह सुझाव सीधे खिलाड़ियों एवं कोचिंग स्टाफ की तरफ से आया था। इसके बावजूद, सुदीर्घ अनुभव रखनेवाले राजनीतिक दल के नेताओं और उनके समर्थकों ने इसे लेकर एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा करने का प्रयास किया है। हिन्दू पहचान से चिढ़ने वाले नेताओं का यह बयान आया है कि “देश की पहचान अहिंसा, सत्य और भाईचारे से जुड़ी है और इन्हें बदला नहीं जा सकता”। यह बयान इस बात का प्रमाण है कि कैसे एक विशुद्ध रूप से तकनीकी और खेल संबंधी फैसले को जबरन वैचारिक संघर्ष में घसीटा जा रहा है।

रविवार, 2 अगस्त 2026

गुरु के रूप में मार्गदर्शन करता है ‘भगवा ध्वज’

संघ शताब्दी वर्ष : गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर स्वयंसेवक ‘भगवा ध्वज’ के समक्ष गुरु दक्षिणा समर्पित करते हैं और संघकार्य के प्रति अपना समर्पण बढ़ाने का संकल्प लेते हैं

एआई से निर्मित प्रतीकात्मक चित्र

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भगवा ध्वज को जो स्थान दिया गया है, वह इस संगठन की विशिष्टता को दर्शाता है। संघ के लिए भगवा केवल ध्वज मात्र नहीं है, अपितु यह उसके प्रेरणा और मार्गदर्शन का केंद्र बिन्दु है। संघ में भगवा ध्वज को ‘गुरु’ के स्थान पर प्रतिष्ठित किया गया है। सामान्यतौर पर यही देखने में आता है कि किसी सांस्कृतिक/धार्मिक संगठन का संस्थापक ही उस संगठन के अनुसरणकर्ताओं के लिए गुरु के रूप में सम्मानित होता है। परंतु संघ इस सामान्य परंपरा से अलग लकीर खींचता दिखायी देता है। जिस प्रकार किसी संस्था से सम्बद्ध लोग गुरु के मार्गदर्शन के अनुसार व्यक्तिगत एवं सामाजिक क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक भगवा ध्वज से प्रेरणा प्राप्त कर सामाजिक क्षेत्र में कार्य करते हैं। संघ में गुरु के रूप में भगवा ध्वज को मान्यता दिए जाने का प्रसंग बहुत प्रेरक है। यह एक प्रसंग ही संघ के ध्येय, उसकी कार्यपद्धति और महानता को बताने के लिए पर्याप्त है।

शनिवार, 1 अगस्त 2026

शोर-शराबे में गुम हुआ छात्रों का हित, विपक्ष के निशाने पर रही हिन्दू मान्यताएं

लोकसभा और राज्यसभा में हंगामेदार चर्चा के बीच आखिरकार परीक्षा सुधार का विधेयक ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ पारित हो गया। देश के करोड़ों युवाओं और छात्रों के भविष्य को देखते हुए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दा था। उम्मीद यह थी कि जब प्रश्न पत्र लीक जैसे गंभीर विषय पर संसद में बहस होगी, तो देश को एक ठोस और सर्वसम्मति वाला समाधान देखने को मिलेगा। लेकिन संसद के दोनों सदनों में जो दृश्य देखने को मिला, वह बेहद निराशाजनक रहा। जो विपक्ष कल तक पर्चा लीक के मुद्दे को लेकर सड़कों से लेकर संसद तक हो-हल्ला मचा रहा था, जब विधेयक पर रचनात्मक चर्चा और सुझाव देने का सही समय आया, तब वह पूरी तरह दिशाहीन नजर आया। बहस का रुख परीक्षा प्रणाली के तकनीकी एवं प्रशासनिक सुधारों पर केंद्रित रहने के बजाय ऐसे विषयों की ओर मोड़ दिया गया, जिनका आम छात्रों की समस्याओं और उनके भविष्य से कोई दूर-दूर तक का लेना-देना नहीं था। विशेष रूप से मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के पास यह एक बड़ा अवसर था कि वह परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी और लीक-मुक्त बनाने के लिए अपने ठोस और व्यावहारिक सुझाव पटल पर रखती। इससे देश की जनता और युवाओं के बीच यह संदेश जाता कि विपक्ष के पास महज विरोध करने के बजाय समस्याओं का समाधान करने का एक स्पष्ट एजेंडा भी है। परंतु इस रचनात्मक भूमिका को निभाने के स्थान पर बहस को धार्मिक प्रतीकों, गोमूत्र और मनुस्मृति जैसे विषयों पर लाकर खड़ा कर दिया गया।

सावधान! अब ई20 पर भड़काने की तैयारी

नीट परीक्षा में गड़बड़ी को लेकर हुए कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन की गर्मी अभी शांत भी नहीं हुई है कि आंदोलनजीवियों ने जनता को भ्रमित करने एवं भड़काने के लिए दूसरा विषय खोजना शुरू कर दिया है। पिछले कुछ महीनों से एथनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर एक नकारात्मक नैरेटिव खड़ा करने का प्रयास किया गया है। परिणामस्वरूप, एथनॉल मिश्रित पेट्रोल की नीति को लेकर उठ रही आपत्तियों और राजनीतिक बयानों ने एक बार फिर ऊर्जा संक्रमण की इस प्रक्रिया को व्यापक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। एक तरफ जहां सरकार इसे पर्यावरण संरक्षण, विदेशी मुद्रा की बचत और किसानों की आय बढ़ाने वाले दूरगामी कदम के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों, ट्रांसपोर्ट यूनियनों और आम वाहन चालकों के विरोध प्रदर्शनों ने नीति के व्यावहारिक क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

सोमवार, 27 जुलाई 2026

“यदि अस्पृश्यता (छुआछूत) गलत नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है” – बालासाहब देवरस

संघ शताब्दी वर्ष : हिन्दू एकता एवं समरसता पर बालासाहब के क्रांतिकारी विचार


हिन्दू समाज की एकता और सामाजिक समरसता पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस के विचार अत्यंत स्पष्ट, प्रखर और क्रांतिकारी थे। ‘वसंत व्याख्यानमाला’ का उनका भाषण विश्व के ऐतिहासिक एवं महान भाषणों में शामिल किया जा सकता है। 8 मई, 1974 में पुणे में हुए अपने इस भाषण में छुआछूत (अस्पृश्यता) को लेकर बालासाहब ने जो कहा, वैसा खरा-खरा शायद ही किसी ने बोला हो। अब्राहम लिंकन के प्रसिद्ध विचार- “अगर गुलामी अनैतिक या गलत नहीं है, तो फिर कुछ भी गलत नहीं है”- का उल्लेख करते हुए बालासाहब ने कहा- “अगर छुआछूत गलत नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है”। जातिगत भेदभाव के निर्मूलन के लिए काम करने वाले महानुभाव अक्सर इस ओर या उस ओर खड़े दिखाई देते हैं। उनके विचारों में राजनीति, परस्पर द्वेष और कटुता रहती है। लेकिन बालासाहब के विचारों में स्पष्टता के साथ-साथ आत्मीयता और बंधुता की झलक दिखाई देती है। सामाजिक समरसता पर उनके विचार समाधानमूलक और व्यावहारिक हैं। बालासाहब जी का मानना था कि “विषमता नष्ट करने के प्रयासों में सभी का सहभाग अपेक्षित है। संयम के साथ उत्तम व्यवहार के द्वारा यह प्रयास होंगे तभी उसमें सफलता मिलेगी”।

बुधवार, 22 जुलाई 2026

आंदोलन को बदनाम करते हिंसक प्रदर्शन

अराजक तत्वों ने हड़प लिए छात्रों के जरूरी मुद्दे, उनके मंच पर कब्जाकर अपना नैरेटिव चलाने का किया प्रयास


देश में प्रमुख परीक्षाओं की पारदर्शिता और लाखों युवाओं का भविष्य अत्यंत संवेदनशील विषय हैं। परीक्षाओं के आयोजन में लगातार हो रही गड़बड़ियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार को इस पर कोई ठोस रणनीति बनानी ही चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि नीट परीक्षा को लेकर उठी चिंताएं पूरी तरह उचित हैं। एक अभिभावक की भाँति उन्होंने युवाओं को आश्वस्त किया है कि उनके भविष्य से खिलवाड़ करने वाले किसी भी दोषी को छोड़ा नहीं जाएगा और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत कठोर कार्रवाई की जाएगी। उल्लेखनीय है कि सरकार ने नीट परीक्षा में हुई गड़बड़ी पर संज्ञान लेकर उसका फिर से व्यवस्थित आयोजन कराया है। इसके बावजूद, इस संवेदनशील मुद्दे की आड़ में जिस तरह दिल्ली की सड़कों पर हिंसा, उपद्रव और ‘चलो संसद’ के नाम पर अराजकता फैलाई गई, वह देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

“जिन्होंने हेडगेवारजी को नहीं देखा, वे बालासाहब को देख लें”

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस के लिए कहा जाता था कि वे संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की प्रतिमूर्ति थे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस उपाख्य बालासाहब देवरस संघ की पहली शाखा के स्वयंसेवक थे। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर के मोहिते बाड़े में जो शाखा लगाई थी, बालासाहब उसी शाखा के स्वयंसेवक थे। डॉक्टर साहब के संपर्क में आने के बाद 1927 में केवल 11 वर्ष की आयु में बालासाहब देवरस ने शाखा जाना प्रारंभ कर दिया। संघ शिल्पी डॉक्टर साहब ने स्वयं अपने हाथों से बालासाहब के व्यक्तित्व को गढ़ा और उन्हें प्रशिक्षित किया। उन्होंने संघ रूपी बीज बालासाहब के हृदय में बोया। जिस प्रकार छत्रपति शिवाजी महाराज ने ‘हिन्दवी स्वराज्य’ का सपना अपने मित्रों के हृदय में जैसे का तैसा उतार दिया था, उसी प्रकार डॉक्टर साहब ने भी स्वयंसेवकों के पहले समूह के मन-मस्तिष्क में संघ की विराट अवधारणा को उतार दिया था। देवरस जी ने डॉक्टर साहब की आँखों से ही संघ को देखा, उनकी दृष्टि के अनुरूप ही संघ की सृष्टि का विकास एवं विस्तार किया। 12 वर्ष से लेकर 70 वर्ष की आयु तक बालासाहब ने एक तपस्वी और सच्चे स्वयंसेवक की भाँति अपना जीवन जिया। उन्होंने सबके सामने उदाहरण प्रस्तुत किया कि राष्ट्र के लिए किस प्रकार जिया जाता है। संघ के स्वयंसेवक बालासाहब में संघ सृष्टि के निर्माता डॉक्टर साहब की छवि देखते थे। वर्ष 1943 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रशिक्षण शिविर (संघ शिक्षा वर्ग) पुणे में चल रहा था, जहाँ एक दिन बालासाहब देवरस का बौद्धिक होना था। बौद्धिक से पहले वक्ता का परिचय कराने के लिए तत्कालीन सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ खड़े हुए। बालासाहब के परिचय में उन्होंने कहा कि “आपमें से कइयों ने डॉ. हेडगेवारजी को नहीं देखा होगा। अगर आप बालासाहब देवरस को देखेंगे तो आपके सामने डॉ. हेडगेवारजी खड़े नजर आएंगे”।

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

मातुश्री का दर्शन है ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’

पुस्तक चर्चा : पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होल्कर के जीवन के सभी पहलुओं को देखने के लिए पढ़ें यह पुस्तक


“सनातन संस्कृति में सर्वश्रेष्ठ धर्म है ‘मानव धर्म’। मानवता की स्थापना करना ही धर्म की स्थापना करना है। देवी अहिल्याबाई होल्कर ने धर्म की स्थापना हेतु अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया। समस्त प्रजा को वात्सल्य से सींचने वाली देवी अहिल्याबाई होल्कर पूरे मालवा की मातुश्री कहलाई। त्याग, तपस्या, समर्पण, अनुशासन एवं न्याय- मानव धर्म के मूल आधार हैं। इन्हीं आधारभूत कर्तव्यों का पालन समाज में समरसता और व्यवस्था को स्थापित करता है। अहिल्याबाई का संपूर्ण जीवन न्याय प्रियता, सद्चरित्र, संस्कार अनुशासन और धर्म के स्तंभों पर मजबूती से खड़ा है”। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. साधना बलवटे की पुस्तक ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ का केंद्रीय भाव यही है। नाट्यरूप में प्रस्तुत पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर के जीवन से उन्होंने भारत की बेटी के संघर्ष, साहस और नेतृत्व की कहानी सुनाई है। यह गाथा आपको प्रारंभ से अंत तक बाँधे रखती है, फिर भले ही आपने देवी अहिल्याबाई की कहानी पहले से सुन भी क्यों न रखी हो। पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर के 300वें जयंती वर्ष में यह पुस्तक अवश्य पढ़ी जानी चाहिए। इस पुस्तक की एक ओर विशेषता है कि इसका पाठक वर्ग बहुत विशाल है यानी हर कोई इस पुस्तक को पढ़ सकता है।

सोमवार, 13 जुलाई 2026

बालासाहब ने शाखा को बनाया ‘अखंड साधना’ का केंद्र

संघ शताब्दी वर्ष : संघ कार्य के विस्तार और शाखाओं के सुदृढ़ीकरण के शिल्पी थे बालासाहब देवरस, उनकी पहल पर ही सातों दिन शाखा लगना शुरू हुई, सुबह की शाखा भी उनकी देन है


संघ कार्य के विस्तार, शाखाओं के विकास एवं सुदृढ़ीकरण में तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस (मधुकर दत्तात्रेय देवरस) का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला रहा है। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार अकसर स्वयंसेवकों से कहते थे कि शाखा अच्छी चलेगी तो समाज के सब काम होंगे। समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में काम करने के लिए राष्ट्रीय विचार से ओत-प्रोत कार्यकर्ता शाखा से ही तैयार होंगे। इसलिए अच्छी शाखा चलना जरूरी है। एक बार युवकों के साथ बातचीत के दौरान डॉक्टर साहब ने प्रश्न किया कि “आदर्श शाखा का लक्षण क्या है?” इसके उत्तर में बालासाहब ने जो कहा, वह उनके विचारों की स्पष्टता को दर्शाता है। उन्होंने कहा- “संघ कार्य को अपना जीवित कार्य समझकर, संघ कार्य के लिए सारा समय लगाने के लिए प्रस्तुत युवक जिस शाखा से विपुल संख्या में खड़े होंगे, ऐसी शाखा को मेरी दृष्टि से ‘आदर्श शाखा’ कहना उचित होगा”। संघ कार्य को राष्ट्रव्यापी बनाना है, तो उसके लिए जरूरी है कि आदर्श शाखाएं खड़ी हों। डॉक्टर साहब की शाखाओं की संकल्पना को धरातल पर उतारने और शाखाओं का व्यापक नेटवर्क खड़ा करने में बालासाहब देवरस ने जो संगठनात्मक कौशल दिखाया, वह अनुकरणीय है। बालासाहब की संगठन कुशलता से डॉक्टर साहब भली प्रकार परिचित थे। इसलिए उन्होंने नागपुर में संघ कार्य की जिम्मेदारी बालासाहब को सौंपी थी। संघ के कार्य को नागपुर से बाहर लेकर जाने के लिए यह आवश्यक था कि नागपुर में अच्छा काम चले। नागपुर के कार्यवाह के रूप में बालासाहब ने जिस प्रकार से संघ कार्य को आधार दिया, उस आधार पर ही आगे चलकर संघ कार्य राष्ट्रव्यापी हुआ। 

देखें यह वीडियो - आरएसएस और राजनीति पर सटीक विश्लेषण

शनिवार, 11 जुलाई 2026

तीजन बाई: भारतीय सांस्कृतिक विरासत की राजदूत

भारत की सांस्कृतिक विरासत की सशक्त पहचान और पंडवानी गायन की जादुई आवाज अब खामोश हो गई है, लेकिन उसकी गूंज सदियों तक भारतीय संस्कृति के आकाश में गूंजती रहेगी। पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का 70 वर्ष की आयु में 5 जुलाई, 2026 को रायपुर एम्स में निधन केवल एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि भारतीय लोक कला के एक सुनहरे अध्याय का विश्राम लेना है। अपने नाना से महाभारत की कथाएं सुनकर बड़ी हुई तीजन बाई ने जब तंबूरा हाथ में थामा, तो उन्होंने केवल गीत नहीं गाए, बल्कि महाभारत के चरित्रों को अपनी सशक्त आवाज और प्रभावशाली अभिनय से मंच पर जीवंत कर दिया। उनकी कला और जीवन यात्रा हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो संघर्षों से पार पाना चाहता है। एक ऐसे दौर में जब महिलाओं का मंच पर आकर तेज स्वर में गाना और अभिनय करना आसान नहीं था, उन्होंने सामाजिक बंधनों और रूढ़ियों की परवाह न करते हुए अपनी राह चुनी।

गुरुवार, 9 जुलाई 2026

एआई एक सहयोग टूल है, हमारा विकल्प या निर्णयकर्ता नहीं

डेटाबेस और एल्गोरिदम पर आधारित एआई, कभी भावनाओं, संवेदनाओं, अनुभवजन्य बुद्धि वाले मनुष्य से होशियार नहीं हो सकता


आज के तकनीकी युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) को हर समस्या के जादुई समाधान के रूप में दिखाया जा रहा है। इस बात में कोई शक नहीं है कि एआई आने वाले समय में बड़े परिवर्तन का कारण बनने वाला है। लेकिन यह परिवर्तन मानव समाज के हित में होगा या उसके विरुद्ध, यह सब हमें ही तय करना है। अगर हमने सचेत होकर एआई का विकास और उपयोग नहीं किया, तब हमारे सामने अनेक प्रकार की चुनौतियां खड़ी हो जाएंगी। एक ओर, एआई ने चिकित्सा, विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी में क्रांतिकारी बदलाव की नींव रखी है, वहीं दूसरी ओर इसने कई नयी और गंभीर चिंताओं को भी जन्म दिया है। एक बड़ी विडम्बना तो यही है कि जिस मनुष्य ने एआई को जन्म दिया है, वही उसे स्वयं से ऊपर समझने की भूल कर बैठता है। हमें हमेशा याद रखना होगा कि एआई हमारा सहयोगी है, हमारा विकल्प नहीं। अगर हम उसे अपना खुदा बनाएंगे, तब समस्याएं उत्पन्न होना स्वाभाविक है। याद रहे कि किसी भी एआई मॉडल की क्षमताओं का आधार डेटा और एल्गोरिदम ही है। इसलिए उसका दायरा सीमित है, वह पूर्ण नहीं है। जो डेटा उपलब्ध है, उसी के आधार पर वह प्रश्न का उत्तर देता है, इसलिए एआई के सुझाए समाधान या जानकारी कई बार व्यावहारिक नहीं होती है, उसमें पूर्वाग्रह भी दिखायी देता है। इसलिए एआई का अंधानुकरण करने से हमें बचना चाहिए और पूरी तरह उस पर निर्भर भी नहीं होना चाहिए।

श्रीराम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण : कर्कश शोर में संघ का विनम्र संदेश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने दिया वक्तव्य

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर निर्मित भव्य मंदिर में चढ़ावे से चोरी की घटना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण, निंदनीय और करोड़ों रामभक्तों की अटूट आस्था पर आघात करने वाली है। इस हृदयविदारक घटना पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले द्वारा जारी किया गया वक्तव्य इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि संघ के लिए श्रीराम की मर्यादा, पवित्रता और समाज की भावनाएं सर्वोपरि हैं। संघ ने न केवल इस घटना पर गहरी पीड़ा व्यक्त की है, बल्कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास को उसकी जवाबदेही का कठोरता से स्मरण भी कराया है। संघ ने साफ शब्दों में कहा है कि व्यवस्था और संचालन की कमियों को अविलंब दूर किया जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल की जांच के आधार पर दोषियों को कठोरतम दंड मिले और भविष्य के लिए एक निर्दोष, पारदर्शी और शुद्ध वित्तीय प्रबंधन की व्यवस्था स्थापित हो, यह संघ की दो टूक मांग है।

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

श्रीराम मंदिर प्रकरण में ‘कालनेमियों’ के विलाप से रहें सावधान

श्री अयोध्या धाम के भव्य श्रीराम मंदिर के कोष में हुई चोरी की घटना निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है। इस कृत्य से संपूर्ण हिन्दू समाज का आहत और हतप्रभ होना स्वाभाविक है। मंदिर की सुरक्षा, व्यवस्थापन और दान के प्रबंधन पर सवाल उठना भी स्वाभाविक है। हिन्दू समाज एवं हिन्दू संगठनों की एक राय है कि इस मामले में दोषियों पर कठोर कार्रवाई होनी ही चाहिए। लेकिन, इस पूरी घटना के बाद जो सबसे अधिक आश्चर्यजनक और वैचारिक रूप से खोखला पहलू उभर कर सामने आया है, वह है उन राजनेताओं और तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं की अति-सक्रियता, जो जीवनभर भगवान श्रीराम और उनकी जन्मभूमि पर श्रीराम मंदिर निर्माण के विरोधी रहे हैं। यह ध्यान देने वाली बात है कि आज मंदिर के धन की चिंता में जो लोग सबसे ज्यादा मुखर हैं, यह वही वर्ग है जिसका न तो कभी भगवान श्रीराम में विश्वास था और न ही वे उस पवित्र भूमि पर मंदिर निर्माण के पक्षधर थे।

रविवार, 28 जून 2026

लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए ऐतिहासिक संघर्ष

संघ शताब्दी वर्ष : आपातकाल के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा कर दिया, लोकतंत्र की बहाली के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया 

विश्व में भारतीय लोकतंत्र का उदाहरण दिया जाता है। यह सच है कि दुनिया में सबसे अधिक जीवंत और विशाल लोकतंत्र भारत में ही दिखायी देता है। लोकतंत्र भारत की परंपरा में है, इसलिए उसको जीना और संभालना हमें बखूबी आता है। परंतु, 25 जून 1975 वह दिनांक है, जब भारत के लोकतंत्र पर संकट आ गया था। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार ने देश पर आपातकाल थोप दिया। लोकतंत्र को घसीटकर सींखचों के पीछे डाल दिया गया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पंख नोंच लिए गए। रातों-रात आम नागरिकों के मौलिक अधिकारी समाप्त कर दिए गए। संविधान और लोकतंत्र पर हुए इस हमले का प्रतिकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने आगे बढ़कर किया। श्रीमती गांधी को भी यह ज्ञात था कि लोक संघर्ष समिति के आपातकाल विरोधी जनांदोलन को संगठित रूप से चलाने के पीछे संघ का अनुशासित कार्यकर्ता है। इसलिए उन्होंने 4 जुलाई 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। परंतु, यह प्रतिबंधन संघ के स्वयंसेवकों को आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष एवं सत्याग्रह करने से रोक नहीं सका। संविधान और लोकतंत्र को बचाने के लिए जिस प्रकार आगे बढ़कर संघ के स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह करते हुए पुलिस की बर्बाता का सामना किया, उसे देखकर संघ से असहमति रखनेवाले नेता एवं विचारकर भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुरीद बन गए।

शनिवार, 27 जून 2026

सुशासन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है हिन्दू साम्राज्य दिवस

ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी वह तिथि है, जिसने भारत के भाग्य का निर्धारण किया, इसी दिन छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की घोषणा की 

छत्रपति शिवाजी महाराज भारतीय इतिहास के ऐसे अद्वितीय नायक हैं जिन्हें न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य की अनेक पीढ़ियाँ भी स्मरण करेंगी। इसका मुख्य कारण यह है कि उन्होंने उस युग में, जब आक्रांताओं के अत्याचारों से भारतीय समाज शिथिल हो चुका था, तब हिन्दू समाज में उन्होंने एक नई चेतना जगाई। उसके भीतर विश्वास जगाया कि भारत में स्वराज्य की फिर से स्थापना हो सकती है, जहाँ सब स्वतंत्रता और स्वाभिमान के साथ जी सकते हैं।

शुक्रवार, 26 जून 2026

ऑस्ट्रेलिया के बाद ब्रिटेन में भी लगाई गई ‘फादर ऑफ सर्जरी’ महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा

भारत की ज्ञान-परंपरा की प्रतिष्ठा : भारत के ज्ञान-विज्ञान की वैश्विक स्वीकृति, प्रत्येक भारतीय के लिए है गर्व की बात

स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग स्थित दुनिया के सबसे पुराने ‘रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स’ में महर्षि सुश्रुत की भव्य प्रतिमा का स्थापित होना हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। अब जरा कल्पना कीजिए कि यदि महर्षि सुश्रुत की यह प्रतिमा स्कॉटलैंड या मेलबर्न के बजाय भारत के एम्स या किसी अन्य प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में स्थापित की जाती, तो क्या होता? यह तय है कि देश के स्वघोषित प्रगतिशील बुद्धिजीवियों, वामपंथी विचारकों और लिबरल जमात के बीच एक भारी ‘हाय-तौबा’ मच जाती। इसे ‘शिक्षा के भगवाकरण’, ‘विज्ञान में धर्म के हस्तक्षेप’ और ‘अंधविश्वास को बढ़ावा देने’ का नाम दे दिया जाता। यह मानसिकता भारत के उस बौद्धिक वर्ग की सबसे बड़ी त्रासदी है, जो अभी तक ‘औपनिवेशिक हैंगओवर’ से बाहर नहीं आ पाया है। इस वर्ग की समस्या यह है कि वे ‘भारतीय ज्ञान-परंपरा’ को केवल कर्मकांडों और मिथकों के चश्मे से देखते हैं। उनका पैमाना यह बन गया है कि जो कुछ भी प्राचीन भारत का है, वह अवैज्ञानिक है; और जो कुछ भी पश्चिम से आता है, वही परम सत्य है। जब तक कोई विदेशी संस्थान या विदेशी वैज्ञानिक हमारे प्राचीन ज्ञान पर अपनी मुहर नहीं लगाता, तब तक हमारे अपने बुद्धिजीवी उसे सिरे से खारिज करते रहते हैं।

बुधवार, 24 जून 2026

संविधान हत्या दिवस : इतिहास से सीखकर संविधान की रक्षा का संकल्प दिवस

लोकतंत्र और संविधान के महत्व को समझने के लिए 25 जून की तारीख बहुत महत्वपूर्ण है। भारत सरकार ने 25 जून को 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में मनाने की अधिसूचना जारी की है। दरअसल, 1975 में 25 जून को ही देश पर आपातकाल थोप दिया गया था। जिसके कारण रातों-रात आम नागरिकों के मौलिक अधिकार छीन लिए गए थे, मीडिया की स्वतंत्रता पर ताले जड़ दिए गए थे, और सवाल पूछने पर लोगों को बिना किसी अपील और दलील के जेल में डाल दिया गया था।

'संविधान हत्या दिवस' मनाने का उद्देश्य किसी पुरानी पीड़ा को कुरेदना नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों को याद दिलाना है कि जब संविधान की रक्षा नहीं होती, तो लोकतंत्र कैसे तानाशाही में बदल जाता है। यह दिन एक चेतावनी है और एक संकल्प भी, कि हम दोबारा अपने देश में ऐसा अंधकार कभी नहीं आने देंगे।

पाकिस्तान की गीदड़ भभकियां

पाकिस्तान के बड़बोले रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने सिंधु नदी का पानी नहीं मिलने पर भारत पर हमला करने की धमकी दी है, उनका यह बयान पाकिस्तान की गहरी निराशा और बौखलाहट को ही दर्शाता है। इस समय पाकिस्तान अनेक प्रकार की आंतरिक चुनौतियों से घिरा हुआ है। इसलिए वह अपने देश की आवाम का ध्यान भटकाने के लिए कभी परमाणु बम की धमकी देते हैं तो कभी कभी जल युद्ध की हुंकार भरते हैं। दुनिया जानती है कि यह पाकिस्तान की गीदड़ भभकियां हैं। जो देश ऑपरेशन सिंदूर से घबराकर अमेरिका के चरणों में जाकर भारत से बचाने की गुहार लगा चुका हो, उसे इस प्रकार की बातें शोभा नहीं देती हैं। गीदड़ भभकी देने वाले पाकिस्तान को भी पता है कि यह नया भारत है, जो अपने नुकसान की कीमत ब्याज सहित वसूल करता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत केवल रक्षात्मक रुख नहीं अपनाता बल्कि आक्रामक जवाब देना भी जानता है।

सोमवार, 22 जून 2026

करोड़ों देशभक्त नागरिकों के दिलों में है आरएसएस का पंजीयन

संघ शताब्दी वर्ष : भारत का संविधान अपने नागरिकों को संगठन, आंदोलन, विचार समूह बनाने का अधिकार देता है। इसके लिए राज्य से पंजीकरण कराना अनिवार्य नहीं है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पंजीकृत क्यों नहीं है? यह अपने आय-व्यय का हिसाब-किताब क्यों नहीं देता है? आरएसएस पारदर्शिता नहीं रखता है। ये ऐसे सवाल हैं, जो संघ को बदनाम करने या उसके प्रति समाज में संदेह पैदा करने के लिए अकसर उछाले जाते हैं। हालांकि, इन सवालों का कोई औचित्य नहीं है। समाज से लेकर न्यायालय तक इन्हें खारिज कर चुके हैं। मजेदार और हास्यास्पद बात यह है कि जो लोग संविधान लहराते हुए घूम रहे हैं, उन्हें यह भी नहीं पता है कि संविधान ही यह अधिकार देता है कि भारत के नागरिक बिना किसी पंजीयन के संगठन, समिति, समूह बनाकर समाज में काम कर सकते हैं। इसलिए कहा जाता है कि संविधान लहराने की वस्तु नहीं है, अपितु उसका अध्ययन करना चाहिए और पालन भी। लेकिन नहीं, उन्हें तो प्रोपेगेंडा खड़ा करने में ही आनंद आता है। जरा सोचिए, यदि आरएसएस के लिए पंजीयन अनिवार्य होता तब क्या कांग्रेस बिना पंजीयन संघ को इतने वर्ष चलने देती? कांग्रेस की सरकारों ने संघ को तीन बार प्रतिबंधित किया लेकिन उसको पंजीयन के लिए कभी बाध्य नहीं किया। महात्मा गांधी की हत्या के झूठे आरोप लगाकर जब संघ पर प्रतिबंध लगाया था, तब उसके विरुद्ध स्वयंसेवकों के राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा कर दिया। सरकार को बिना शर्त संघ से प्रतिबंध हटाना पड़ा। सरकार ने अपने आपको शर्मिंदगी से बचाने के लिए संघ से उसके संविधान की लिखित कॉपी तो मांगी, लेकिन उस समय भी पंजीयन नहीं माँगा। यह स्थिति तब है जबकि उस समय की सरकार येन-केन-प्रकारेण संघ को कुचलना या उस पर अपना नियंत्रण चाहती थी। बहरहाल, उसके बाद भी सरकार ने कभी संघ का पंजीयन नहीं माँगा। हाँ, संघ को रोकने के सारे हथकंडे अवश्य अपनाए गए, आज भी अपनाए जा रहे हैं। लेकिन समाज का विश्वास जीतकर संघ अजेय शक्ति के रूप में आगे बढ़ रहा है। इस मामले में सच यह है कि आज भी पंजीयन की माँग नहीं होती अपितु इस फर्जी प्रश्न की आड़ में अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने का प्रयास किया जाता है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संदर्भ में प्रारंभ से यह स्पष्ट किया जाता रहा है कि संघ भारत के सभी कानूनों का सम्मान करता है और उनके दायरे में रहकर ही कार्य करता है।

शनिवार, 20 जून 2026

श्रीगुरुजी के सरसंघचालक बनने की कहानी

संघ शताब्दी वर्ष : “सरसंघचालक का दायित्व विक्रमादित्य के सिंहासन जैसा है। अगर कोई अज्ञानी लड़का भी इस पर बैठता है, तो वह भी इस पर बैठकर एक बराबर न्याय करेगा” - श्रीगुरुजी


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (डॉक्टर साहब) के बाद इस राष्ट्रीय विचार के आंदोलन की बागडोर कौन संभालेगा? अगला सरसंघचालक कौन होगा? यह प्रश्न जब किसी के मन में भी नहीं आया था, तब से डॉक्टर साहब ने सरसंघचालक के लिए योग्य व्यक्ति की खोज प्रारंभ कर दी थी। यह बहुत आवश्यक था कि संघ का नेतृत्व ऐसे व्यक्तित्व को सौंपा जाए, जिसके प्रति श्रद्धा हो। जिसके नेतृत्व में संघ सरिता का वेग बढ़े, न कि उसमें बहता पानी ही सूख जाए। डॉक्टर साहब की आँखों के सामने से ऐसे अनेक संगठनों की कहानियां गुजर रही थीं, जो एक व्यक्ति की संकल्पना के साथ शुरू हुए और उनके जाने के साथ ही धुंधले पड़ गए। हालांकि, डॉक्टर साहब ने राष्ट्रीय आंदोलन की जो कहानी लिखी थी, उसके बीज उन्होंने अनेक लोगों के मन में बो दिए थे। अब भारत को परम वैभव पर पहुँचाने का संघ का सपना केवल डॉक्टर साहब का सपना नहीं रह गया था, यह सपना सबका अपना सपना बन गया था। डॉ. हेडगेवार व्यक्तियों के बड़े पारखी थे। कोई हीरा व्यापारी भी असली हीरा पहचानने में धोखा खा सकता है लेकिन डॉक्टर साहब व्यक्ति की पहचान में सिद्ध थे। संन्यास जीवन से वापस सामाजिक क्षेत्र में लौटे माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ को अपना उत्तरदायित्व सौंपने का निर्णय वे अपने मन में कर ही चुके थे। डॉक्टर साहब ने संघ में सामूहिक निर्णय की कार्यपद्धति का निर्माण किया था, इसलिए उन्होंने अपने निर्णय को संघ पर थोपा नहीं अपितु उस समय के अन्य दायित्ववान कार्यकर्ताओं से भी इस संबंध में परामर्श किया। श्रीगुरुजी के संबंध में जो विचार डॉक्टर साहब के थे, अन्य साथियों के मन में भी उन्होंने वही भाव पाया।

सोमवार, 15 जून 2026

अपने समय से संवाद का नाम है ‘संजय उवाच’

मीडिया प्राध्यापक एवं लेखक प्रो. संजय द्विवेदी की नई पुस्तक ‘संजय उवाच’ उनके चुनिंदा और सारगर्भित भाषणों का उत्कृष्ट संग्रह है। अकादमिक जगत से लेकर सार्वजनिक कार्यक्रमों में उन्होंने जो व्याख्यान दिए, उनको पाठकों के लिए संपादित कर पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया है। ज्यादातर व्याख्यान मीडिया, भाषा और शिक्षा के मुद्दों पर केंद्रित हैं। इसलिए यह पुस्तक मीडिया के विद्यार्थियों एवं इस क्षेत्र में रुचि रखनेवालों को अवश्य ही पढ़नी चाहिए। जिस दौर में मीडिया को लेकर अनेक प्रकार की बहस हवा में तैर रही हैं, तब उस बहस में भारतीय दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप प्रो. संजय द्विवेदी का नजर आता है। संवाद से सुंदर बनेगी दुनिया,  जड़ों की ओर लौटे मीडिया और जरूरी है मीडिया का भारतीयकरण- ये व्याख्यान मीडिया पर चल रही बहस को सार्थक दिशा देने का प्रयास हैं। इसके अलावा इस पुस्तक में भारत के नायकों, साहित्यकारों और समसामयिक विमर्श पर भी सारगर्भित विचार पढ़े जा सकते हैं। एक पंक्ति में कहें तो, इस पुस्तक में संकलित व्याख्यान पत्रकारिता, समाज, शिक्षा, भाषा और आज के समाज के विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर एक सार्थक और सकारात्मक विमर्श प्रस्तुत करते हैं। प्रो. संजय द्विवेदी ने अपने समय के साथ जो संवाद किया है, उसको संकलित और संपादित करके ‘संजय उवाच’ के रूप में अपने पाठकों के सामने प्रस्तुत कर दिया है। यह एक प्रकार से प्रो. द्विवेदी के बौद्धिक हस्तक्षेप का दस्तावेजीकरण है।

मंगलवार, 9 जून 2026

विश्व का नेतृत्व करेगा संगठित भारत

संघ शताब्दी वर्ष : सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और मुख्य अतिथि कुमार मंगलम बिरला ने दिखाई भविष्य के भारत की तस्वीर, वर्तमान की तैयारियों की ओर किया संकेत

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता विकास वर्ग-2 के समापन समारोह में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और मुख्य अतिथि प्रसिद्ध उद्योगपति एवं पद्मभूषण से सम्मानित कुमार मंगलम बिरला के वक्तव्य भविष्य के भारत की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं, जो स्वयं सशक्त और आत्मनिर्भर होकर विश्व बंधुत्व की भावना का प्रवर्तक बनेगा। जिस समय दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी-बड़ी शक्तियों के बीच संघर्ष चल रहा है, शांति की कोई राह दिखाई नहीं देती, तब भारत का दर्शन सबका मार्ग प्रशस्त कर सकता है। दुनिया को सुख-शांति से जीना है, तब उसे भारत की ओर देखना ही होगा। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने उचित ही कहा कि “भारत का समय आ गया है। कलह और स्वार्थ में फँसकर लड़खड़ाती हुई इस दुनिया को आज केवल भारत की ही आवश्यकता है”। भारत दुनिया को इस कलह से बाहर निकाल सकता है, उसके लिए सबसे पहले हमें अपने देश को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना पड़ेगा। दुनिया भी उसी के सत्य को सुनती है, जो शक्ति सम्पन्न होता है।

सोमवार, 8 जून 2026

रजनीश अग्रवाल: पत्रकारिता के प्रांगण से राज्यसभा के पटल तक

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के प्रांगण से पत्रकारिता की पढ़ाई करके राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय रहे पूर्व विद्यार्थी रजनीश अग्रवाल अब राज्यसभा के सम्मानित सदस्य होंगे। भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें मध्यप्रदेश से देश की सबसे बड़ी पंचायत के उच्च सदन हेतु अपना उम्मीदवार बनाया है। विश्वविद्यालय के लिए यह गौरव की बात है कि उसके विद्यार्थी दादा माखनलाल चतुर्वेदी के आंगन में संचार कौशल सीखकर विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। रजनीश अग्रवाल को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया जाना यह संदेश भी देता है कि राजनीतिक क्षेत्र में बौद्धिक क्षमता, वैचारिक स्पष्टता और उत्कृष्ट संचार कौशल वाले नेताओं को महत्व दिया जा रहा है। रजनीश अग्रवाल का व्यक्तित्व एक राजनेता से कहीं अधिक एक कुशल रणनीतिकार और प्रखर संचारक का है, जिसकी जड़ें पत्रकारिता के मजबूत धरातल से जुड़ी हैं।

शुक्रवार, 5 जून 2026

स्कूल की छुट्टियां : नानी का घर बनाम गैजेट्स की दुनिया

ग्रीष्मकालीन अवकाश : सीखने, समझने और निखरने का उत्तम अवसर


गर्मी की छुट्टियों की प्रतीक्षा किसे नहीं होती है। भले ही समय बदल गया है, पीढ़ी बदल गई है, लेकिन गर्मी की छुट्टियों को लेकर रोमांच कम नहीं हुआ है। छुट्टियों के नाम से आज भी हमारे चेहरों पर एक प्यारी-सी मुस्कान तैर जाती है। हर बच्चे के मन में वार्षिक परीक्षा के बाद आने वाली लंबी छुट्टियों को लेकर अपने-अपने सपने होते हैं। हालांकि इन सपनों या कहें योजनाओं में बड़ा बदलाव आया है। बदलते समय ने हमारे जीने के तरीके को जितना बदला है, उतना ही असर इन छुट्टियों के आनंद पर भी डाला है। एक वह दौर था जब अप्रैल का महीना आते ही मन किसी पंछी की तरह उड़ने को बेताब हो जाता था। फुर्र से उड़कर नानी के आंगन, वहाँ से दादी के घर। खेत-खलियान। नीम की छांव। चाचा के साथ मटरगस्ती। मामा के साथ नदी में छलाँग। भाई-बहनों के साथ अष्टा-चंगा, गिल्ली-डंडा, छुपन-छुपाई, सांप-सीढ़ी और न जाने कितने देशी खेल। एक से मन भरे, दूसरे में आए आनंद। रात में तारों की छांव में सोना। नाना-नानी की किस्सागोई में सिनेमा से बढ़कर मनोरंजन। रोज नई कहानी। नया संस्कार। आम के आम, गुठलियों के दाम। छुट्टियों का आनंद भी और समाज जीवन की शिक्षा-संस्कार भी। एक आज का दौर है, जहाँ छुट्टियां तो हैं, लेकिन उनका रंग-रूप पूरी तरह बदल चुका है। नानी-दादी का घर तो है लेकिन हम जाते चार दिन के लिए ही हैं। मामा, चाचा-ताऊ के बच्चे यानी हमारे भाई-बहनों की मंडली तो है लेकिन हम देशी खेल नहीं खेलते, गैजेट्स में डूबे रहते हैं। जो हम खेल-खेल में सीख लेते थे, उसके लिए हॉबी क्लासेस लगा रहे हैं। कुछ समय तो समर कैम्प भी जीम लेता है। जो आनंद हमें नानी-दादी के घर आता था, उसे मोटी फीस देकर भी हम समर कैम्प में नहीं पा सकते। हालांकि, इस सबका अभिप्राय यह नहीं है कि समर कैम्प और हॉबी क्लासेस का महत्व नहीं है। बदली परिस्थितियों में यह हमारी छुट्टियों को उपयोगी बनाते हैं।

बुधवार, 3 जून 2026

खेत बचाओ अभियान : मिट्टी बचेगी, तभी बचेगा किसान और देश का भविष्य

केन्द्र सरकार ने मिट्टी के संरक्षण के लिए जनांदोलन खड़ा करने का संकल्प लिया है। यह अत्यंत आवश्यक आंदोलन है, जिसे केवल सरकार के प्रयास से नहीं अपितु जनता (विशेषकर किसानों) की भागीदारी एवं समझदारी से ही सफल बनाया जा सकता है। मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के ग्राम रमासिया से केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राष्ट्रव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ की घोषणा की है। स्मरण रहे कि कृषि मंत्री स्वयं भी कृषक परिवार से आते हैं, इसलिए खेती के बारे में उनकी समझ अधिक जमीन और वास्तविक है। आज कृषि भूमि की जो स्थिति है, उसको लेकर सब ओर अनुत्तरित चिंता पसरी दिखायी देती है।