गुरुवार, 16 जुलाई 2026

“जिन्होंने हेडगेवारजी को नहीं देखा, वे बालासाहब को देख लें”

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस के लिए कहा जाता था कि वे संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की प्रतिमूर्ति थे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस उपाख्य बालासाहब देवरस संघ की पहली शाखा के स्वयंसेवक थे। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर के मोहिते बाड़े में जो शाखा लगाई थी, बालासाहब उसी शाखा के स्वयंसेवक थे। डॉक्टर साहब के संपर्क में आने के बाद 1927 में केवल 11 वर्ष की आयु में बालासाहब देवरस ने शाखा जाना प्रारंभ कर दिया। संघ शिल्पी डॉक्टर साहब ने स्वयं अपने हाथों से बालासाहब के व्यक्तित्व को गढ़ा और उन्हें प्रशिक्षित किया। उन्होंने संघ रूपी बीज बालासाहब के हृदय में बोया। जिस प्रकार छत्रपति शिवाजी महाराज ने ‘हिन्दवी स्वराज्य’ का सपना अपने मित्रों के हृदय में जैसे का तैसा उतार दिया था, उसी प्रकार डॉक्टर साहब ने भी स्वयंसेवकों के पहले समूह के मन-मस्तिष्क में संघ की विराट अवधारणा को उतार दिया था। देवरस जी ने डॉक्टर साहब की आँखों से ही संघ को देखा, उनकी दृष्टि के अनुरूप ही संघ की सृष्टि का विकास एवं विस्तार किया। 12 वर्ष से लेकर 70 वर्ष की आयु तक बालासाहब ने एक तपस्वी और सच्चे स्वयंसेवक की भाँति अपना जीवन जिया। उन्होंने सबके सामने उदाहरण प्रस्तुत किया कि राष्ट्र के लिए किस प्रकार जिया जाता है। संघ के स्वयंसेवक बालासाहब में संघ सृष्टि के निर्माता डॉक्टर साहब की छवि देखते थे। वर्ष 1943 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रशिक्षण शिविर (संघ शिक्षा वर्ग) पुणे में चल रहा था, जहाँ एक दिन बालासाहब देवरस का बौद्धिक होना था। बौद्धिक से पहले वक्ता का परिचय कराने के लिए तत्कालीन सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ खड़े हुए। बालासाहब के परिचय में उन्होंने कहा कि “आपमें से कइयों ने डॉ. हेडगेवारजी को नहीं देखा होगा। अगर आप बालासाहब देवरस को देखेंगे तो आपके सामने डॉ. हेडगेवारजी खड़े नजर आएंगे”।

बालासाहब देवरस का मध्यप्रदेश से गहरा नाता है। मध्यप्रदेश उनकी जन्मस्थली है। बालाघाट में 11 दिसंबर, 1915 को कारंजा नामक स्थान पर उनका जन्म हुआ। बालासाहब नौ भाई-बहन (चार लड़के और पाँच लड़कियाँ) थे। वे आठवें क्रमांक पर थे। उनसे दो वर्ष छोटे भाऊराव थे। वैसे बालासाहब का नाम रखा गया था ‘मधुकर’, लेकिन घर में सब उन्हें प्रेम से ‘बाल’ कहकर पुकारते थे। बाल अर्थात् बच्चा। इस प्रकार उनका नाम ‘बालासाहब’ पड़ गया। बालासाहब का जन्म भले ही मध्यप्रदेश में हुआ था, लेकिन उनकी पढ़ाई-लिखाई नागपुर के स्कूल और कॉलेज में ही हुई। कालांतर में उनके पिता दत्तात्रेय देवरस नागपुर में राजस्व विभाग में अधिकारी हो गए।

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बालासाहब और डॉक्टर साहब के बीच एक और संयोग है। दोनों महानुभावों के पूर्वज एक ही स्थान तेलंगाना से थे। देवरस परिवार तेलंगाना के चिन्नुरु ग्राम का रहने वाला था। पेशवा बाजीराव के समय देवरस परिवार महाराष्ट्र के भण्डारा में आकर बस गया। वहीं, डॉ. हेडगेवारजी के पूर्वज भी तेलंगाना के थे। गोदावरी नदी के तट पर स्थित ‘कंदकूर्ति’ ग्राम से निकलकर डॉक्टर साहब का परिवार नागपुर आया था। गोदावरी नदी महाराष्ट्र से तेलंगाना में प्रवेश करके उत्तर दिशा में मुड़ती है। उस मोड़ पर कंदकूर्ति है। यहाँ से गोदावरी पूर्ववाहिनी होकर रामगुंडम् तक जाती है। वहाँ से थोड़ा आगे जाने पर फिर से उत्तरवाहिनी होकर आगे बहती है। विदर्भ के चंद्रपुर से आने वाली ‘प्राणहिता’ नदी उसे वहाँ मिलती है। इस संगम स्थान पर ‘चिन्नुरु’ ग्राम स्थित है। जिस प्रकार गोदावरी दोनों महानुभावों को जोड़ती है, उसी प्रकार संघ सरिता भी डॉक्टर साहब और बालासाहब को जोड़ने वाली गर्भनाल की भाँति दिखाई देती है।

नियति ने तय किया था कि बालासाहब संघ कार्य के विस्तार का एक प्रमुख आधार बनेंगे, इसलिए वे बाल्यकाल में ही डॉक्टर साहब के संपर्क में आ गए। बालासाहब ने मोहिते बाड़े की शाखा में आना शुरू किया। स्वयंसेवकों के लिए सीखने की बात है कि बालासाहब अकेले शाखा नहीं आते थे। वे अपने साथ में छोटे भाई भाऊराव को भी लेकर जाते थे। अपने मित्रों को भी उन्होंने शाखा से जोड़ा। बालासाहब और भाऊराव, दोनों ही पढ़ने में बहुत होशियार थे। संस्कृत उनका प्रिय विषय था, इसमें उनके 100 प्रतिशत अंक आते थे। बाकी विषयों पर भी अच्छी पकड़ थी। इसलिए उनके पिता चाहते थे कि वे भारतीय सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करें। परंतु उनके मन में तो संघ कार्य के लिए संपूर्ण जीवन देने का विचार घर कर गया था। दोनों भाइयों की जोड़ी अपने मोहल्ले में और संघ में भी प्रसिद्ध हो गई। आखिरकार बालासाहब और उनके भाई भाऊराव, प्रचारक हो गए। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित कर दिया।

संगठन के कार्य को लेकर बालासाहब देवरस की स्पष्टता इतनी अच्छी थी कि द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी भी उन्हें बहुत महत्व देते थे। इसलिए जब बालासाहब को कलकत्ता से वापस बुलाया गया, तब श्रीगुरुजी ने उन्हें वापस नागपुर के बाहर प्रचारक बनाकर नहीं भेजा। नागपुर में संगठन का सारा कार्य बालासाहब के भरोसे छोड़ दिया गया। श्रीगुरुजी कहते थे कि “जिनके कारण मैं सरसंघचालक हूँ, उनका नाम है बालासाहब देवरस”। संघ के संविधान में एक समय में दो सरसंघचालक का प्रावधान नहीं है, अन्यथा इस समय मेरे साथ बालासाहब भी सरसंघचालक होते। एक बार ऐसे ही मजाक-मजाक में श्रीगुरुजी ने कह दिया था कि ‘वास्तविक सरसंघचालक तो बालासाहब जी ही हैं’। यह घटना 1944-45 के दौरान नागपुर के रेशिमबाग में हुई थी। एक दिन जब श्रीगुरुजी तांगे में बैठकर उत्सव में जा रहे थे, तब उन्होंने रास्ते में बालासाहब देवरस को अपने मित्रों के साथ पैदल जाते देखा। उन्हें देखकर श्रीगुरुजी ने तांगे वाले से कहा, “सच्चे सरसंघचालक पैदल जा रहे हैं, और नकली तांगे में”। बालासाहब देवरस 11 वर्ष की उम्र से संघ शिल्पी डॉ. हेडगेवार के प्रशिक्षण में रहे, इसलिए वे डॉक्टर साहब के साथ एकरूप हो गए थे। 

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 05 जुलाई, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

मातुश्री का दर्शन है ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’

पुस्तक चर्चा : पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होल्कर के जीवन के सभी पहलुओं को देखने के लिए पढ़ें यह पुस्तक


“सनातन संस्कृति में सर्वश्रेष्ठ धर्म है ‘मानव धर्म’। मानवता की स्थापना करना ही धर्म की स्थापना करना है। देवी अहिल्याबाई होल्कर ने धर्म की स्थापना हेतु अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया। समस्त प्रजा को वात्सल्य से सींचने वाली देवी अहिल्याबाई होल्कर पूरे मालवा की मातुश्री कहलाई। त्याग, तपस्या, समर्पण, अनुशासन एवं न्याय- मानव धर्म के मूल आधार हैं। इन्हीं आधारभूत कर्तव्यों का पालन समाज में समरसता और व्यवस्था को स्थापित करता है। अहिल्याबाई का संपूर्ण जीवन न्याय प्रियता, सद्चरित्र, संस्कार अनुशासन और धर्म के स्तंभों पर मजबूती से खड़ा है”। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. साधना बलवटे की पुस्तक ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ का केंद्रीय भाव यही है। नाट्यरूप में प्रस्तुत पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर के जीवन से उन्होंने भारत की बेटी के संघर्ष, साहस और नेतृत्व की कहानी सुनाई है। यह गाथा आपको प्रारंभ से अंत तक बाँधे रखती है, फिर भले ही आपने देवी अहिल्याबाई की कहानी पहले से सुन भी क्यों न रखी हो। पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर के 300वें जयंती वर्ष में यह पुस्तक अवश्य पढ़ी जानी चाहिए। इस पुस्तक की एक ओर विशेषता है कि इसका पाठक वर्ग बहुत विशाल है यानी हर कोई इस पुस्तक को पढ़ सकता है।

‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ की प्रस्तावना भी पठनीय और महत्वपूर्ण है। लेखिका डॉ. साधना बलवटे ने प्रस्तावना में ही अपने पाठकों को देवी अहिल्याबाई होल्कर के व्यक्तित्व और उनके द्वारा किए गए महान कार्यों का संक्षिप्त परिचय कराया है। इस प्रस्तावना को मैं इस नाटक के सारांश के तौर पर देखता हूँ, जो सीधे तौर पर पुस्तक के पाठकों के लिए है। यह प्रस्तावना अहिल्या कथा का साररूप है। यूं तो पुण्यश्लोक का जीवन दर्शन इतना विराट है कि उसे किसी पुस्तक, ग्रंथ या निबंध में समेटना अत्यंत कठिन है। फिर भी कहना चाहूंगा कि आज की पीढ़ी- जो अपने नायकों को नहीं जानती, जानना भी चाहती है तो थोड़े में अधिक जानना चाहती है। ऐसे सभी लोगों को डॉ. साधना बलवटे की पुस्तक ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ अवश्य पढ़नी चाहिए। इस पुस्तक की प्रस्तावना पढ़कर भी अहिल्याबाई होल्कर के जीवन से परिचित हो सकते हैं। जैसे शिखर दर्शन से मंदिर की भव्यता और दिव्यता की अनुभूति होती, वैसे इस पुस्तक को पढ़कर लोगों के मन मंदिर में सुशोभित देवी अहिल्याबाई होल्कर के जीवन के दर्शन होते हैं।

इस पुस्तक के माध्यम से एक महत्वपूर्ण तथ्य हमारे सामने आता है। आखिर हम एक रानी के लिए पुण्यश्लोक जैसे विशेषण का उपयोग क्यों करते हैं? यह जानकार भी गौरव की अनुभूति होती है कि भगवान विष्णु, धर्मराज युधिष्ठिर और राजा नल के पश्चात देवी अहिल्याबाई होल्कर ही एकमात्र व्यक्तित्व हैं जिन्हें उनकी उज्ज्वल छवि, शुभ चरित्र के कारण पुण्यश्लोक की उपाधि प्राप्त हुई है। 

इस नाटक को पढ़ते हुए बौद्धिक बेईमानों की कारगुजारियां भी याद आती हैं। कैसे भारत के महान चरित्रों को उन्होंने अपने वैचारिक एवं राजनीतिक स्वार्थपूर्ति के चक्कर में इतिहास लेखन के दौरान उपेक्षित किया है। वहीं, आक्रांताओं को उज्ज्वल चरित्र के नायक के तौर पर प्रस्तुत करने के लिए मनगढंत कहानियां लिख डालीं। तथाकथित इतिहासकारों ने एक क्रूर और अत्याचारी शासक औरंगजेब का महिमामंडन करने के लिए नैरेटिव बनाया कि वह टोपी सिलकर अपना खर्चा निकलता था। सत्ता के लिए अपने भाइयों की गर्दनें उतारने वाला शासक कैसी टोपियां सिलता होगा, हम सहज अंदाज लगा सकते हैं। अगर इतिहासकारों को त्यागपूर्ण भाव से शासन करने के उदाहरण ही प्रस्तुत करने थे, तब उनको झूठी कहानियां लिखने की बजाय देवी अहिल्याबाई की कथा सुननी चाहिए थी। राज्य की संपत्ति के विषय में अहिल्याबाई होल्कर की दृष्टि कितनी उदात्त थी, उसका वर्णन इस पुस्तक में आया है। मातुश्री अहिल्याबाई का मानना था कि राज्य की संपत्ति प्रजा के कल्याण के लिए होती है। इसका उपयोग राज परिवार का कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तिगत कार्य के लिए नहीं कर सकता। हम देवी अहिल्याबाई होल्कर को धार्मिक कार्यों के लिए आगे बढ़कर दान करने वाली नायिका के तौर पर जानते हैं। आपको जानकर सुखद आनंद की अनुभूति होगी कि उन्होंने जो धर्म संबंधी निर्माण कार्य कराए, उसका व्यय उन्होंने अपने निजी खर्च से किया, जिसे खासगी कहते थे।

अधिक जानकारी के लिए देखें यह वीडियो : पुण्यश्लोक राजमाता देवी अहिल्याबाई होलकर

आज आवश्यकता है लोकमाता अहिल्याबाई के जीवन पृष्ठों को पुनः पढ़ा जाए और उनका अनुकरण किया जाए। डॉ. बलवटे ने अपनी पुस्तक में एक स्थान पर उचित ही लिखा है कि शक्ति, विद्या, बुद्धि, लक्ष्मी और मातृत्व का समवेत रूप यदि किसी में देखना हो या किसी एक व्यक्तित्व को, इन शक्तियों का नाम देना हो तो वह एक ही होगा ‘मातुश्री अहिल्याबाई होलकर’। 

लेखिका ने इस नाटक में मानकोजी और सुशीला बाई की बेटी, शिव की अनन्य भक्त पुण्यश्लोक, लोकमाता देवी अहिल्याबाई के जीवन के सभी पहलुओं को दिखाने का प्रयास किया गया है। एक कुशल एवं लोक कल्याणकारी शासक के रूप में उनकी छवि ‘नारी सशक्तिकरण’ का सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करती है। स्त्री सेना का गठन, कपास की फसल को प्रोत्साहन, बुनकरों का प्रशिक्षण एवं हथकरघा उद्योग की स्थापना, स्त्री शिक्षा, विधवा स्त्रियों को अधिकार, प्रजा के साथ न्याय करने के लिए अपने पुत्र को भी दंड देने वाली और समय पड़ने पर युद्ध लड़कर शत्रुओं को परास्त करने वाली तथा अपनी सूझबूझ से युद्ध को टाल देने का समर्थ रखने वाली देवी अहिल्याबाई होलकर के संपूर्ण जीवन को अभिव्यक्त करने का प्रयास है पुस्तक ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ में किया गया है।

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के पूर्व संगठन मंत्री श्रद्धेय श्रीधर पराड़कर ने इस नाटिका को अपना आशीर्वाद देते हुए उचित ही लिखा है- “प्रस्तुत लघु नाटिका में अहिल्याबाई के यशस्वी जीवन को दर्शकों के सामने रखा गया है। नाटक की भाषा सहज, सरल, बोधगम्य है”। अहिल्याबाई की मातृभाषा मराठी थी इस कारण मराठी भाषा के कई शब्दों का प्रयोग संवादों में किया गया है। उसी प्रकार उनके कार्य क्षेत्र निमाड़ था, जिस कारण निमाड़ी बोली के शब्द तथा गीतों का प्रयोग भी किया गया है। अक्सर लेखक अपना बौद्धिक सामर्थ्य प्रदर्शित करने के लिए कठिनतम शब्दों का प्रयोग करते हैं। उस कालखंड की कहानी लिखने के लिए सामान्यतौर पर लेखक उस समय में प्रचलित शब्दावली का उपयोग करते हैं। भाषा का अतिरिक्त श्रृंगार करते हैं। थोड़ा उसे दरबारी स्वरूप देते हैं। ऐसा करते समय लेखक अपने समय के पाठकों से बहुत दूर चला जाता है। इस पुस्तक की अच्छी बात यह है कि लेखिका डॉ. साधना बलवटे ने भाषाशैली के माध्यम से अपनी बौद्धिक क्षमता को प्रदर्शित करने का प्रयास नहीं किया। इस कारण यह पुस्तक आज के पाठकों को आसानी से अपने साथ जोड़ लेगी। सबको समझ में आने वाली हिन्दी में संवादों की रचना की गई है। फिर चाहे संवाद राजा का हो या सामान्य नागरिक का।

यह पुस्तक केवल एक कहानी नहीं बुनती है, बल्कि वर्तमान समय में समाज के सामने मुंह बाए खड़ी चुनौतियों के समाधान की ओर भी संकेत करती है। किसी रचना का महत्व इसी बात में अधिक होता है कि वह वर्तमान समय से कैसे जुड़ती है। आज परिवार प्रबोधन की आवश्यकता सब अनुभव कर रहे हैं। पति-पत्नी के बीच के संबंधों में संतुलन, परस्पर सम्मान और सहयोग की भावना कैसे आ सकती है। बहुत कुशलता से इस ज्वलंत विषय की ओर संकेत किया गया है। अहिल्याबाई अपने पति खांडेराव के साथ विद्या अध्ययन और शस्त्र विद्या का प्रशिक्षण लेती हैं। अहिल्याबाई तीव्र बुद्धि की होने के कारण जल्दी ही दोनों विधाओं में पारंगत हो गई किंतु खांडेराव से मित्रता करने के लिए वह प्राय: खांडेराव से सहायता मांग लिया करती या कुछ सीखने की इच्छा दिखाया करती थीं। यहाँ संकेत है कि हम स्वयं को अधिक होशियार दिखाकर मित्रता नहीं कर सकते। सच्ची मित्रता तो एक-दूसरे को समझने और एक-दूसरे के सम्मान में है। 

विश्व संवाद केन्द्र, मध्यप्रदेश में पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होल्कर की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में साहित्यकार डॉ. साधना बलवटे की पुस्तक 'अहिल्या रूपेण संस्थिता' पर अपने विचार रखते हुए डॉ. लोकेन्द्र सिंह

सावन में काँवड़ यात्रा की परंपरा अपने देश में सदियों से रही है। आज एक वर्ग काँवड़ यात्रा पर वितंडावाद करता है। जब यह विषय उठाया जाता है कि एक संप्रदाय के कुछ कट्टरपंथी एवं असामाजिक तत्व काँवड़ यात्रियों पर हमले करते हैं, उन्हें परेशान करते हैं, तब वास्तविक दोषियों की मानसिकता की चर्चा करने की जगह काँवड़ियों को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। पथराव या अन्य प्रकार से काँवड़ यात्रा में व्यवधान डालने का प्रश्न आज का नहीं है। देवी अहिल्याबाई के समय से या कहें कि उसके पहले से भी यह समस्या चली आ रही है। इसके समाधान की दृष्टि क्या हो? इस संबंध में हमें अहिल्याबाई का दृष्टिकोण देखना चाहिए। जब उनके सामने यह विषय आया कि काशी से रामेश्वर तक गंगाजल की काँवड़ पहुंचने के समय रास्ते में निजाम के सैनिक काँवड़ियों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं तब अहिल्याबाई ने हैदराबाद के निजाम को पत्र लिखा- “हुजूर को अहिल्याबाई होल्कर का नमस्कार पहुंचे। विदित हो कि सनातनी समाज ने कभी भी आपकी पूजा स्थानों, जुलूसों और त्योहार पर किसी प्रकार की बाधा डालने की चेष्टा नहीं की है। हुजूर से आग्रह है कि वह भी काँवड़ यात्रियों के साथ कोई दुर्व्यवहार न करें। अन्यथा कठोर कदम उठाने में हमें भी संकोच नहीं होगा”। 

कुल मिलाकर कहना है कि ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ ऐसी पुस्तक है, जो हमें भारत की महान शासक पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई के जीवन से भी परिचित कराती है और वर्तमान समय की चुनौतियों के समाधान की ओर भी संकेत करती है। अपनी संस्कृति, अपने नायकों एवं अपने इतिहास को समझने में जिनकी रुचि है, उन सबको यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए। नाट्य विधा से जुड़े रंगकर्मियों के लिए यह बढ़िया पुस्तक है। इस नाटक को मंच पर खेलकर समाज के प्रबोधन के जरूरी कार्य में वे अपना योगदान दे सकते हैं। ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ का प्रकाशन राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने कया है। यह 54 पृष्ठ की पुस्तक है, जिसे आप एक बैठक में पढ़ सकते हैं। 

पुस्तक : अहिल्या रूपेण संस्थिता

लेखक : डॉ. साधना बलवटे

मूल्य : 120 रुपये

प्रकाशक : राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नईदिल्ली

भोपाल से प्रकाशित समाचारपत्र 'स्वदेश ज्योति' में 4 जुलाई, 2026 को प्रकाशित डॉ. साधना बलवटे की पुस्तक 'अहिल्या रूपेण संस्थिता' की समीक्षा। समीक्षक हैं डॉ. लोकेन्द्र सिंह

सोमवार, 13 जुलाई 2026

बालासाहब ने शाखा को बनाया ‘अखंड साधना’ का केंद्र

संघ शताब्दी वर्ष : संघ कार्य के विस्तार और शाखाओं के सुदृढ़ीकरण के शिल्पी थे बालासाहब देवरस, उनकी पहल पर ही सातों दिन शाखा लगना शुरू हुई, सुबह की शाखा भी उनकी देन है


संघ कार्य के विस्तार, शाखाओं के विकास एवं सुदृढ़ीकरण में तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस (मधुकर दत्तात्रेय देवरस) का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला रहा है। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार अकसर स्वयंसेवकों से कहते थे कि शाखा अच्छी चलेगी तो समाज के सब काम होंगे। समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में काम करने के लिए राष्ट्रीय विचार से ओत-प्रोत कार्यकर्ता शाखा से ही तैयार होंगे। इसलिए अच्छी शाखा चलना जरूरी है। एक बार युवकों के साथ बातचीत के दौरान डॉक्टर साहब ने प्रश्न किया कि “आदर्श शाखा का लक्षण क्या है?” इसके उत्तर में बालासाहब ने जो कहा, वह उनके विचारों की स्पष्टता को दर्शाता है। उन्होंने कहा- “संघ कार्य को अपना जीवित कार्य समझकर, संघ कार्य के लिए सारा समय लगाने के लिए प्रस्तुत युवक जिस शाखा से विपुल संख्या में खड़े होंगे, ऐसी शाखा को मेरी दृष्टि से ‘आदर्श शाखा’ कहना उचित होगा”। संघ कार्य को राष्ट्रव्यापी बनाना है, तो उसके लिए जरूरी है कि आदर्श शाखाएं खड़ी हों। डॉक्टर साहब की शाखाओं की संकल्पना को धरातल पर उतारने और शाखाओं का व्यापक नेटवर्क खड़ा करने में बालासाहब देवरस ने जो संगठनात्मक कौशल दिखाया, वह अनुकरणीय है। बालासाहब की संगठन कुशलता से डॉक्टर साहब भली प्रकार परिचित थे। इसलिए उन्होंने नागपुर में संघ कार्य की जिम्मेदारी बालासाहब को सौंपी थी। संघ के कार्य को नागपुर से बाहर लेकर जाने के लिए यह आवश्यक था कि नागपुर में अच्छा काम चले। नागपुर के कार्यवाह के रूप में बालासाहब ने जिस प्रकार से संघ कार्य को आधार दिया, उस आधार पर ही आगे चलकर संघ कार्य राष्ट्रव्यापी हुआ। 

देखें यह वीडियो - आरएसएस और राजनीति पर सटीक विश्लेषण

प्रारंभ से डॉक्टर साहब के सान्निध्य में रहने के कारण बालासाहब को संघ कार्य की गहरी समझ थी। कहा जा सकता है कि उन्होंने डॉक्टर साहब के विचार, दर्शन, क्रियान्वयन के मार्ग और समाज निर्माण के स्वप्न को आत्मसात कर लिया था। डॉक्टर साहब ने जो सपना देखा था, उसे साकार करने के लिए शाखाओं का व्यापक नेटवर्क आवश्यक था। बालासाहब ने नागपुर कार्यवाह से लेकर सरसंघचालक के दायित्व में रहने के दौरान शाखा पर विशेष जोर दिया। नागपुर में संघ कार्य की जिम्मेदारी संभालते समय उन्होंने अधिकतम बस्तियों में शाखाएं प्रारंभ कराईं। शाखा ठीक चले इसके लिए प्रति सोमवार डॉ. हेडगेवार के निवास पर शाखा कार्यवाह और मुख्य शिक्षकों की बैठकें शुरू की गईं। एक बड़ा काम उन्होंने यह किया कि शाखा को संघ कार्य की साधना का अखंड केन्द्र बना दिया। प्रारंभिक दौर में समाज की मानसिकता प्रतिदिन एक ही स्थान पर एकत्रित होने की नहीं थी। लोग अकसर सवाल करते थे- “प्रतिदिन एक साथ आने की क्या जरूरत है? क्या किसी का अपना काम नहीं है?” लेकिन डॉक्टरजी और बालासाहब यह भली-भांति जानते थे कि शाखा कोई सामान्य एकत्रीकरण नहीं, बल्कि एक ‘सतत साधना’ है। साधना में खंड पड़ने का अर्थ है नित्य संस्कारों में बाधा आना। बालासाहब के नागपुर कार्यवाह बनने से पहले, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाएं सप्ताह में केवल छह दिन लगती थीं। रविवार को छुट्टी का दिन होता था। इतना ही नहीं, श्रावण के पवित्र महीने में रविवार के साथ सोमवार को भी छुट्टी रहती थी। बालासाहब ने महसूस किया कि इस खंडित दिनचर्या से कार्य में शिथिलता आती है। शाखा तो नित्य का कार्य है। यह तो साधना है। इसमें अवकाश कैसा? उन्होंने रविवार और श्रावण सोमवार के अवकाश बंद कर दिए। अब शाखा सप्ताह के सातों दिन वर्ग के 365 दिन बिना किसी अवकाश के लगना प्रारंभ हो गईं। आज संघ की जो 365 दिन की अविरत शाखा की परंपरा है, वह बालासाहब के ही दूरदर्शी निर्णय का परिणाम है।

‘प्रभात शाखा’ की पहल :

बालासाहब ने देखा कि कई व्यावसायिक, नौकरीपेशा लोग और प्रौढ़ आयु के व्यक्ति शाखा आना तो चाहते हैं, लेकिन शाम की शाखा में शामिल होने का उनके पास समय नहीं होता था। काम-धंधे में लगते ही कई पुराने स्वयंसेवकों का भी सायं शाखा में आना अनियमित या बंद हो जाता था। उल्लेखनीय है कि प्रारंभ में शाखा केवल शाम के समय लगती थीं। इस समस्या का समाधान बालासाहब ने ‘प्रभात शाखा’ (प्रातःकालीन शाखा) के रूप में उपलब्ध कराया। 1938 में ‘सोमवार बैठक’ में इस विषय पर गहन विचार-विमर्श हुआ। बालासाहब के कहने पर वर्ष 1938 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रथम प्रातःकालीन शाखा नागपुर में ‘मोहिते बाड़ा’ संघस्थान पर शुरू की गई। तात्याजी बाविस्कर को इस प्रभात शाखा का कार्यवाह और बाबूराव वाघ को मुख्य शिक्षक नियुक्त किया गया। चूंकि इस शाखा में अपेक्षाकृत अधिक उम्र के प्रौढ़ स्वयंसेवक आते थे, इसलिए इसकी गतिविधियां सायं शाखा की गतिविधियों से अपेक्षाकृत शारीरिक रूप से कम थकाने वाली रखी गईं। इस एक निर्णय शाखा में नवाचार की नींव रखी। बाद में चलकर सबको शाखा से जोड़ने के लिए समय से लेकर शाखा के कार्यक्रम में अनेक प्रयोग हुए। ‘प्रभात शाखा’ ने संघ कार्य को मजबूत करने और समाज के प्रत्येक वर्ग (विशेषकर नौकरीपेशा और बुद्धिजीवी वर्ग) को संघ से जोड़ने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अपनी बस्ती की शाखा में जाने का नियम :

प्रारंभ में उपशाखाएं सीमित थीं, इसलिए कई स्वयंसेवक दूर की शाखाओं में जाते थे। लेकिन जब धीरे-धीरे उपशाखाएं बढ़ने लगीं, तब भी एक प्रवृत्ति देखी गई कि स्वयंसेवक अपनी बस्ती में प्रारंभ हुई नई शाखा में न जाकर अपनी पुरानी (मुख्य) शाखा में ही जाते थे। इससे नई बस्ती की शाखा के लिए उनका योगदान शून्य हो जाता था और एक ही शाखा में स्वतंत्र काम कर सकने वाले सक्षम कार्यकर्ताओं का जमावड़ा लग जाता था। बालासाहब ने इस विसंगति को पहचाना और यह निर्णय लिया गया कि “स्वयंसेवक अपनी बस्ती में लगने वाली शाखा में ही जाएंगे”। इस नियम से कार्यकर्ताओं का विकेंद्रीकरण हुआ, नई शाखाओं को योग्य नेतृत्व मिला और संघ कार्य का हर मोहल्ले-बस्ती में तेजी से विस्तार संभव हो सका। एक साथ 15 शाखाएं प्रारंभ करने के लिए भी बालासाहब का उदाहरण दिया जाता है। उनके प्रयास से नागपुर की इतवारी शाखा के प्रशिक्षित 15 स्वयंसेवकों ने एक साथ 15 नई शाखाएं प्रारंभ कीं।  

संघ शिक्षा वर्ग और दैनिक शाखाओं में संतुलन :

संघ कार्य मूलतः दैनंदिन शाखा पर आधारित है। बालासाहब सदैव यह चिंता करते थे कि किसी भी परिस्थिति में दैनिक शाखा का कार्य बाधित नहीं होना चाहिए। उन दिनों नागपुर में संघ शिक्षा वर्ग 40 दिनों तक चलता था। वर्ग की व्यवस्था में शहर के सभी प्रमुख कार्यकर्ता जुट जाते थे, जिससे वे अपनी शाखा पर ध्यान नहीं दे पाते थे। इस कमी को दूर करने के लिए बालासाहब ने एक नई व्यवस्था लागू की। उन्होंने वर्ग की कालावधि में भी दैनिक शाखा की ओर ध्यान देने के लिए अलग से विशेष कार्यकर्ता नियुक्त करने का उपक्रम कार्यान्वित किया।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 12 जुलाई, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

शनिवार, 11 जुलाई 2026

तीजन बाई: भारतीय सांस्कृतिक विरासत की राजदूत

भारत की सांस्कृतिक विरासत की सशक्त पहचान और पंडवानी गायन की जादुई आवाज अब खामोश हो गई है, लेकिन उसकी गूंज सदियों तक भारतीय संस्कृति के आकाश में गूंजती रहेगी। पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का 70 वर्ष की आयु में 5 जुलाई, 2026 को रायपुर एम्स में निधन केवल एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि भारतीय लोक कला के एक सुनहरे अध्याय का विश्राम लेना है। अपने नाना से महाभारत की कथाएं सुनकर बड़ी हुई तीजन बाई ने जब तंबूरा हाथ में थामा, तो उन्होंने केवल गीत नहीं गाए, बल्कि महाभारत के चरित्रों को अपनी सशक्त आवाज और प्रभावशाली अभिनय से मंच पर जीवंत कर दिया। उनकी कला और जीवन यात्रा हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो संघर्षों से पार पाना चाहता है। एक ऐसे दौर में जब महिलाओं का मंच पर आकर तेज स्वर में गाना और अभिनय करना आसान नहीं था, उन्होंने सामाजिक बंधनों और रूढ़ियों की परवाह न करते हुए अपनी राह चुनी।

गुरुवार, 9 जुलाई 2026

एआई एक सहयोग टूल है, हमारा विकल्प या निर्णयकर्ता नहीं

डेटाबेस और एल्गोरिदम पर आधारित एआई, कभी भावनाओं, संवेदनाओं, अनुभवजन्य बुद्धि वाले मनुष्य से होशियार नहीं हो सकता


आज के तकनीकी युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) को हर समस्या के जादुई समाधान के रूप में दिखाया जा रहा है। इस बात में कोई शक नहीं है कि एआई आने वाले समय में बड़े परिवर्तन का कारण बनने वाला है। लेकिन यह परिवर्तन मानव समाज के हित में होगा या उसके विरुद्ध, यह सब हमें ही तय करना है। अगर हमने सचेत होकर एआई का विकास और उपयोग नहीं किया, तब हमारे सामने अनेक प्रकार की चुनौतियां खड़ी हो जाएंगी। एक ओर, एआई ने चिकित्सा, विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी में क्रांतिकारी बदलाव की नींव रखी है, वहीं दूसरी ओर इसने कई नयी और गंभीर चिंताओं को भी जन्म दिया है। एक बड़ी विडम्बना तो यही है कि जिस मनुष्य ने एआई को जन्म दिया है, वही उसे स्वयं से ऊपर समझने की भूल कर बैठता है। हमें हमेशा याद रखना होगा कि एआई हमारा सहयोगी है, हमारा विकल्प नहीं। अगर हम उसे अपना खुदा बनाएंगे, तब समस्याएं उत्पन्न होना स्वाभाविक है। याद रहे कि किसी भी एआई मॉडल की क्षमताओं का आधार डेटा और एल्गोरिदम ही है। इसलिए उसका दायरा सीमित है, वह पूर्ण नहीं है। जो डेटा उपलब्ध है, उसी के आधार पर वह प्रश्न का उत्तर देता है, इसलिए एआई के सुझाए समाधान या जानकारी कई बार व्यावहारिक नहीं होती है, उसमें पूर्वाग्रह भी दिखायी देता है। इसलिए एआई का अंधानुकरण करने से हमें बचना चाहिए और पूरी तरह उस पर निर्भर भी नहीं होना चाहिए।

श्रीराम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण : कर्कश शोर में संघ का विनम्र संदेश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने दिया वक्तव्य

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर निर्मित भव्य मंदिर में चढ़ावे से चोरी की घटना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण, निंदनीय और करोड़ों रामभक्तों की अटूट आस्था पर आघात करने वाली है। इस हृदयविदारक घटना पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले द्वारा जारी किया गया वक्तव्य इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि संघ के लिए श्रीराम की मर्यादा, पवित्रता और समाज की भावनाएं सर्वोपरि हैं। संघ ने न केवल इस घटना पर गहरी पीड़ा व्यक्त की है, बल्कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास को उसकी जवाबदेही का कठोरता से स्मरण भी कराया है। संघ ने साफ शब्दों में कहा है कि व्यवस्था और संचालन की कमियों को अविलंब दूर किया जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल की जांच के आधार पर दोषियों को कठोरतम दंड मिले और भविष्य के लिए एक निर्दोष, पारदर्शी और शुद्ध वित्तीय प्रबंधन की व्यवस्था स्थापित हो, यह संघ की दो टूक मांग है।

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

श्रीराम मंदिर प्रकरण में ‘कालनेमियों’ के विलाप से रहें सावधान

श्री अयोध्या धाम के भव्य श्रीराम मंदिर के कोष में हुई चोरी की घटना निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है। इस कृत्य से संपूर्ण हिन्दू समाज का आहत और हतप्रभ होना स्वाभाविक है। मंदिर की सुरक्षा, व्यवस्थापन और दान के प्रबंधन पर सवाल उठना भी स्वाभाविक है। हिन्दू समाज एवं हिन्दू संगठनों की एक राय है कि इस मामले में दोषियों पर कठोर कार्रवाई होनी ही चाहिए। लेकिन, इस पूरी घटना के बाद जो सबसे अधिक आश्चर्यजनक और वैचारिक रूप से खोखला पहलू उभर कर सामने आया है, वह है उन राजनेताओं और तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं की अति-सक्रियता, जो जीवनभर भगवान श्रीराम और उनकी जन्मभूमि पर श्रीराम मंदिर निर्माण के विरोधी रहे हैं। यह ध्यान देने वाली बात है कि आज मंदिर के धन की चिंता में जो लोग सबसे ज्यादा मुखर हैं, यह वही वर्ग है जिसका न तो कभी भगवान श्रीराम में विश्वास था और न ही वे उस पवित्र भूमि पर मंदिर निर्माण के पक्षधर थे।

रविवार, 28 जून 2026

लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए ऐतिहासिक संघर्ष

संघ शताब्दी वर्ष : आपातकाल के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा कर दिया, लोकतंत्र की बहाली के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया 

विश्व में भारतीय लोकतंत्र का उदाहरण दिया जाता है। यह सच है कि दुनिया में सबसे अधिक जीवंत और विशाल लोकतंत्र भारत में ही दिखायी देता है। लोकतंत्र भारत की परंपरा में है, इसलिए उसको जीना और संभालना हमें बखूबी आता है। परंतु, 25 जून 1975 वह दिनांक है, जब भारत के लोकतंत्र पर संकट आ गया था। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार ने देश पर आपातकाल थोप दिया। लोकतंत्र को घसीटकर सींखचों के पीछे डाल दिया गया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पंख नोंच लिए गए। रातों-रात आम नागरिकों के मौलिक अधिकारी समाप्त कर दिए गए। संविधान और लोकतंत्र पर हुए इस हमले का प्रतिकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने आगे बढ़कर किया। श्रीमती गांधी को भी यह ज्ञात था कि लोक संघर्ष समिति के आपातकाल विरोधी जनांदोलन को संगठित रूप से चलाने के पीछे संघ का अनुशासित कार्यकर्ता है। इसलिए उन्होंने 4 जुलाई 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। परंतु, यह प्रतिबंधन संघ के स्वयंसेवकों को आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष एवं सत्याग्रह करने से रोक नहीं सका। संविधान और लोकतंत्र को बचाने के लिए जिस प्रकार आगे बढ़कर संघ के स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह करते हुए पुलिस की बर्बाता का सामना किया, उसे देखकर संघ से असहमति रखनेवाले नेता एवं विचारकर भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुरीद बन गए।

शनिवार, 27 जून 2026

सुशासन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है हिन्दू साम्राज्य दिवस

ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी वह तिथि है, जिसने भारत के भाग्य का निर्धारण किया, इसी दिन छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की घोषणा की 

छत्रपति शिवाजी महाराज भारतीय इतिहास के ऐसे अद्वितीय नायक हैं जिन्हें न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य की अनेक पीढ़ियाँ भी स्मरण करेंगी। इसका मुख्य कारण यह है कि उन्होंने उस युग में, जब आक्रांताओं के अत्याचारों से भारतीय समाज शिथिल हो चुका था, तब हिन्दू समाज में उन्होंने एक नई चेतना जगाई। उसके भीतर विश्वास जगाया कि भारत में स्वराज्य की फिर से स्थापना हो सकती है, जहाँ सब स्वतंत्रता और स्वाभिमान के साथ जी सकते हैं।

शुक्रवार, 26 जून 2026

ऑस्ट्रेलिया के बाद ब्रिटेन में भी लगाई गई ‘फादर ऑफ सर्जरी’ महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा

भारत की ज्ञान-परंपरा की प्रतिष्ठा : भारत के ज्ञान-विज्ञान की वैश्विक स्वीकृति, प्रत्येक भारतीय के लिए है गर्व की बात

स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग स्थित दुनिया के सबसे पुराने ‘रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स’ में महर्षि सुश्रुत की भव्य प्रतिमा का स्थापित होना हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। अब जरा कल्पना कीजिए कि यदि महर्षि सुश्रुत की यह प्रतिमा स्कॉटलैंड या मेलबर्न के बजाय भारत के एम्स या किसी अन्य प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में स्थापित की जाती, तो क्या होता? यह तय है कि देश के स्वघोषित प्रगतिशील बुद्धिजीवियों, वामपंथी विचारकों और लिबरल जमात के बीच एक भारी ‘हाय-तौबा’ मच जाती। इसे ‘शिक्षा के भगवाकरण’, ‘विज्ञान में धर्म के हस्तक्षेप’ और ‘अंधविश्वास को बढ़ावा देने’ का नाम दे दिया जाता। यह मानसिकता भारत के उस बौद्धिक वर्ग की सबसे बड़ी त्रासदी है, जो अभी तक ‘औपनिवेशिक हैंगओवर’ से बाहर नहीं आ पाया है। इस वर्ग की समस्या यह है कि वे ‘भारतीय ज्ञान-परंपरा’ को केवल कर्मकांडों और मिथकों के चश्मे से देखते हैं। उनका पैमाना यह बन गया है कि जो कुछ भी प्राचीन भारत का है, वह अवैज्ञानिक है; और जो कुछ भी पश्चिम से आता है, वही परम सत्य है। जब तक कोई विदेशी संस्थान या विदेशी वैज्ञानिक हमारे प्राचीन ज्ञान पर अपनी मुहर नहीं लगाता, तब तक हमारे अपने बुद्धिजीवी उसे सिरे से खारिज करते रहते हैं।

बुधवार, 24 जून 2026

संविधान हत्या दिवस : इतिहास से सीखकर संविधान की रक्षा का संकल्प दिवस

लोकतंत्र और संविधान के महत्व को समझने के लिए 25 जून की तारीख बहुत महत्वपूर्ण है। भारत सरकार ने 25 जून को 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में मनाने की अधिसूचना जारी की है। दरअसल, 1975 में 25 जून को ही देश पर आपातकाल थोप दिया गया था। जिसके कारण रातों-रात आम नागरिकों के मौलिक अधिकार छीन लिए गए थे, मीडिया की स्वतंत्रता पर ताले जड़ दिए गए थे, और सवाल पूछने पर लोगों को बिना किसी अपील और दलील के जेल में डाल दिया गया था।

'संविधान हत्या दिवस' मनाने का उद्देश्य किसी पुरानी पीड़ा को कुरेदना नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों को याद दिलाना है कि जब संविधान की रक्षा नहीं होती, तो लोकतंत्र कैसे तानाशाही में बदल जाता है। यह दिन एक चेतावनी है और एक संकल्प भी, कि हम दोबारा अपने देश में ऐसा अंधकार कभी नहीं आने देंगे।

पाकिस्तान की गीदड़ भभकियां

पाकिस्तान के बड़बोले रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने सिंधु नदी का पानी नहीं मिलने पर भारत पर हमला करने की धमकी दी है, उनका यह बयान पाकिस्तान की गहरी निराशा और बौखलाहट को ही दर्शाता है। इस समय पाकिस्तान अनेक प्रकार की आंतरिक चुनौतियों से घिरा हुआ है। इसलिए वह अपने देश की आवाम का ध्यान भटकाने के लिए कभी परमाणु बम की धमकी देते हैं तो कभी कभी जल युद्ध की हुंकार भरते हैं। दुनिया जानती है कि यह पाकिस्तान की गीदड़ भभकियां हैं। जो देश ऑपरेशन सिंदूर से घबराकर अमेरिका के चरणों में जाकर भारत से बचाने की गुहार लगा चुका हो, उसे इस प्रकार की बातें शोभा नहीं देती हैं। गीदड़ भभकी देने वाले पाकिस्तान को भी पता है कि यह नया भारत है, जो अपने नुकसान की कीमत ब्याज सहित वसूल करता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत केवल रक्षात्मक रुख नहीं अपनाता बल्कि आक्रामक जवाब देना भी जानता है।

सोमवार, 22 जून 2026

करोड़ों देशभक्त नागरिकों के दिलों में है आरएसएस का पंजीयन

संघ शताब्दी वर्ष : भारत का संविधान अपने नागरिकों को संगठन, आंदोलन, विचार समूह बनाने का अधिकार देता है। इसके लिए राज्य से पंजीकरण कराना अनिवार्य नहीं है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पंजीकृत क्यों नहीं है? यह अपने आय-व्यय का हिसाब-किताब क्यों नहीं देता है? आरएसएस पारदर्शिता नहीं रखता है। ये ऐसे सवाल हैं, जो संघ को बदनाम करने या उसके प्रति समाज में संदेह पैदा करने के लिए अकसर उछाले जाते हैं। हालांकि, इन सवालों का कोई औचित्य नहीं है। समाज से लेकर न्यायालय तक इन्हें खारिज कर चुके हैं। मजेदार और हास्यास्पद बात यह है कि जो लोग संविधान लहराते हुए घूम रहे हैं, उन्हें यह भी नहीं पता है कि संविधान ही यह अधिकार देता है कि भारत के नागरिक बिना किसी पंजीयन के संगठन, समिति, समूह बनाकर समाज में काम कर सकते हैं। इसलिए कहा जाता है कि संविधान लहराने की वस्तु नहीं है, अपितु उसका अध्ययन करना चाहिए और पालन भी। लेकिन नहीं, उन्हें तो प्रोपेगेंडा खड़ा करने में ही आनंद आता है। जरा सोचिए, यदि आरएसएस के लिए पंजीयन अनिवार्य होता तब क्या कांग्रेस बिना पंजीयन संघ को इतने वर्ष चलने देती? कांग्रेस की सरकारों ने संघ को तीन बार प्रतिबंधित किया लेकिन उसको पंजीयन के लिए कभी बाध्य नहीं किया। महात्मा गांधी की हत्या के झूठे आरोप लगाकर जब संघ पर प्रतिबंध लगाया था, तब उसके विरुद्ध स्वयंसेवकों के राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा कर दिया। सरकार को बिना शर्त संघ से प्रतिबंध हटाना पड़ा। सरकार ने अपने आपको शर्मिंदगी से बचाने के लिए संघ से उसके संविधान की लिखित कॉपी तो मांगी, लेकिन उस समय भी पंजीयन नहीं माँगा। यह स्थिति तब है जबकि उस समय की सरकार येन-केन-प्रकारेण संघ को कुचलना या उस पर अपना नियंत्रण चाहती थी। बहरहाल, उसके बाद भी सरकार ने कभी संघ का पंजीयन नहीं माँगा। हाँ, संघ को रोकने के सारे हथकंडे अवश्य अपनाए गए, आज भी अपनाए जा रहे हैं। लेकिन समाज का विश्वास जीतकर संघ अजेय शक्ति के रूप में आगे बढ़ रहा है। इस मामले में सच यह है कि आज भी पंजीयन की माँग नहीं होती अपितु इस फर्जी प्रश्न की आड़ में अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने का प्रयास किया जाता है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संदर्भ में प्रारंभ से यह स्पष्ट किया जाता रहा है कि संघ भारत के सभी कानूनों का सम्मान करता है और उनके दायरे में रहकर ही कार्य करता है।

शनिवार, 20 जून 2026

श्रीगुरुजी के सरसंघचालक बनने की कहानी

संघ शताब्दी वर्ष : “सरसंघचालक का दायित्व विक्रमादित्य के सिंहासन जैसा है। अगर कोई अज्ञानी लड़का भी इस पर बैठता है, तो वह भी इस पर बैठकर एक बराबर न्याय करेगा” - श्रीगुरुजी


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (डॉक्टर साहब) के बाद इस राष्ट्रीय विचार के आंदोलन की बागडोर कौन संभालेगा? अगला सरसंघचालक कौन होगा? यह प्रश्न जब किसी के मन में भी नहीं आया था, तब से डॉक्टर साहब ने सरसंघचालक के लिए योग्य व्यक्ति की खोज प्रारंभ कर दी थी। यह बहुत आवश्यक था कि संघ का नेतृत्व ऐसे व्यक्तित्व को सौंपा जाए, जिसके प्रति श्रद्धा हो। जिसके नेतृत्व में संघ सरिता का वेग बढ़े, न कि उसमें बहता पानी ही सूख जाए। डॉक्टर साहब की आँखों के सामने से ऐसे अनेक संगठनों की कहानियां गुजर रही थीं, जो एक व्यक्ति की संकल्पना के साथ शुरू हुए और उनके जाने के साथ ही धुंधले पड़ गए। हालांकि, डॉक्टर साहब ने राष्ट्रीय आंदोलन की जो कहानी लिखी थी, उसके बीज उन्होंने अनेक लोगों के मन में बो दिए थे। अब भारत को परम वैभव पर पहुँचाने का संघ का सपना केवल डॉक्टर साहब का सपना नहीं रह गया था, यह सपना सबका अपना सपना बन गया था। डॉ. हेडगेवार व्यक्तियों के बड़े पारखी थे। कोई हीरा व्यापारी भी असली हीरा पहचानने में धोखा खा सकता है लेकिन डॉक्टर साहब व्यक्ति की पहचान में सिद्ध थे। संन्यास जीवन से वापस सामाजिक क्षेत्र में लौटे माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ को अपना उत्तरदायित्व सौंपने का निर्णय वे अपने मन में कर ही चुके थे। डॉक्टर साहब ने संघ में सामूहिक निर्णय की कार्यपद्धति का निर्माण किया था, इसलिए उन्होंने अपने निर्णय को संघ पर थोपा नहीं अपितु उस समय के अन्य दायित्ववान कार्यकर्ताओं से भी इस संबंध में परामर्श किया। श्रीगुरुजी के संबंध में जो विचार डॉक्टर साहब के थे, अन्य साथियों के मन में भी उन्होंने वही भाव पाया।

सोमवार, 15 जून 2026

अपने समय से संवाद का नाम है ‘संजय उवाच’

मीडिया प्राध्यापक एवं लेखक प्रो. संजय द्विवेदी की नई पुस्तक ‘संजय उवाच’ उनके चुनिंदा और सारगर्भित भाषणों का उत्कृष्ट संग्रह है। अकादमिक जगत से लेकर सार्वजनिक कार्यक्रमों में उन्होंने जो व्याख्यान दिए, उनको पाठकों के लिए संपादित कर पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया है। ज्यादातर व्याख्यान मीडिया, भाषा और शिक्षा के मुद्दों पर केंद्रित हैं। इसलिए यह पुस्तक मीडिया के विद्यार्थियों एवं इस क्षेत्र में रुचि रखनेवालों को अवश्य ही पढ़नी चाहिए। जिस दौर में मीडिया को लेकर अनेक प्रकार की बहस हवा में तैर रही हैं, तब उस बहस में भारतीय दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप प्रो. संजय द्विवेदी का नजर आता है। संवाद से सुंदर बनेगी दुनिया,  जड़ों की ओर लौटे मीडिया और जरूरी है मीडिया का भारतीयकरण- ये व्याख्यान मीडिया पर चल रही बहस को सार्थक दिशा देने का प्रयास हैं। इसके अलावा इस पुस्तक में भारत के नायकों, साहित्यकारों और समसामयिक विमर्श पर भी सारगर्भित विचार पढ़े जा सकते हैं। एक पंक्ति में कहें तो, इस पुस्तक में संकलित व्याख्यान पत्रकारिता, समाज, शिक्षा, भाषा और आज के समाज के विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर एक सार्थक और सकारात्मक विमर्श प्रस्तुत करते हैं। प्रो. संजय द्विवेदी ने अपने समय के साथ जो संवाद किया है, उसको संकलित और संपादित करके ‘संजय उवाच’ के रूप में अपने पाठकों के सामने प्रस्तुत कर दिया है। यह एक प्रकार से प्रो. द्विवेदी के बौद्धिक हस्तक्षेप का दस्तावेजीकरण है।

मंगलवार, 9 जून 2026

विश्व का नेतृत्व करेगा संगठित भारत

संघ शताब्दी वर्ष : सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और मुख्य अतिथि कुमार मंगलम बिरला ने दिखाई भविष्य के भारत की तस्वीर, वर्तमान की तैयारियों की ओर किया संकेत

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता विकास वर्ग-2 के समापन समारोह में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और मुख्य अतिथि प्रसिद्ध उद्योगपति एवं पद्मभूषण से सम्मानित कुमार मंगलम बिरला के वक्तव्य भविष्य के भारत की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं, जो स्वयं सशक्त और आत्मनिर्भर होकर विश्व बंधुत्व की भावना का प्रवर्तक बनेगा। जिस समय दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी-बड़ी शक्तियों के बीच संघर्ष चल रहा है, शांति की कोई राह दिखाई नहीं देती, तब भारत का दर्शन सबका मार्ग प्रशस्त कर सकता है। दुनिया को सुख-शांति से जीना है, तब उसे भारत की ओर देखना ही होगा। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने उचित ही कहा कि “भारत का समय आ गया है। कलह और स्वार्थ में फँसकर लड़खड़ाती हुई इस दुनिया को आज केवल भारत की ही आवश्यकता है”। भारत दुनिया को इस कलह से बाहर निकाल सकता है, उसके लिए सबसे पहले हमें अपने देश को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना पड़ेगा। दुनिया भी उसी के सत्य को सुनती है, जो शक्ति सम्पन्न होता है।

सोमवार, 8 जून 2026

रजनीश अग्रवाल: पत्रकारिता के प्रांगण से राज्यसभा के पटल तक

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के प्रांगण से पत्रकारिता की पढ़ाई करके राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय रहे पूर्व विद्यार्थी रजनीश अग्रवाल अब राज्यसभा के सम्मानित सदस्य होंगे। भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें मध्यप्रदेश से देश की सबसे बड़ी पंचायत के उच्च सदन हेतु अपना उम्मीदवार बनाया है। विश्वविद्यालय के लिए यह गौरव की बात है कि उसके विद्यार्थी दादा माखनलाल चतुर्वेदी के आंगन में संचार कौशल सीखकर विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। रजनीश अग्रवाल को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया जाना यह संदेश भी देता है कि राजनीतिक क्षेत्र में बौद्धिक क्षमता, वैचारिक स्पष्टता और उत्कृष्ट संचार कौशल वाले नेताओं को महत्व दिया जा रहा है। रजनीश अग्रवाल का व्यक्तित्व एक राजनेता से कहीं अधिक एक कुशल रणनीतिकार और प्रखर संचारक का है, जिसकी जड़ें पत्रकारिता के मजबूत धरातल से जुड़ी हैं।

शुक्रवार, 5 जून 2026

स्कूल की छुट्टियां : नानी का घर बनाम गैजेट्स की दुनिया

ग्रीष्मकालीन अवकाश : सीखने, समझने और निखरने का उत्तम अवसर


गर्मी की छुट्टियों की प्रतीक्षा किसे नहीं होती है। भले ही समय बदल गया है, पीढ़ी बदल गई है, लेकिन गर्मी की छुट्टियों को लेकर रोमांच कम नहीं हुआ है। छुट्टियों के नाम से आज भी हमारे चेहरों पर एक प्यारी-सी मुस्कान तैर जाती है। हर बच्चे के मन में वार्षिक परीक्षा के बाद आने वाली लंबी छुट्टियों को लेकर अपने-अपने सपने होते हैं। हालांकि इन सपनों या कहें योजनाओं में बड़ा बदलाव आया है। बदलते समय ने हमारे जीने के तरीके को जितना बदला है, उतना ही असर इन छुट्टियों के आनंद पर भी डाला है। एक वह दौर था जब अप्रैल का महीना आते ही मन किसी पंछी की तरह उड़ने को बेताब हो जाता था। फुर्र से उड़कर नानी के आंगन, वहाँ से दादी के घर। खेत-खलियान। नीम की छांव। चाचा के साथ मटरगस्ती। मामा के साथ नदी में छलाँग। भाई-बहनों के साथ अष्टा-चंगा, गिल्ली-डंडा, छुपन-छुपाई, सांप-सीढ़ी और न जाने कितने देशी खेल। एक से मन भरे, दूसरे में आए आनंद। रात में तारों की छांव में सोना। नाना-नानी की किस्सागोई में सिनेमा से बढ़कर मनोरंजन। रोज नई कहानी। नया संस्कार। आम के आम, गुठलियों के दाम। छुट्टियों का आनंद भी और समाज जीवन की शिक्षा-संस्कार भी। एक आज का दौर है, जहाँ छुट्टियां तो हैं, लेकिन उनका रंग-रूप पूरी तरह बदल चुका है। नानी-दादी का घर तो है लेकिन हम जाते चार दिन के लिए ही हैं। मामा, चाचा-ताऊ के बच्चे यानी हमारे भाई-बहनों की मंडली तो है लेकिन हम देशी खेल नहीं खेलते, गैजेट्स में डूबे रहते हैं। जो हम खेल-खेल में सीख लेते थे, उसके लिए हॉबी क्लासेस लगा रहे हैं। कुछ समय तो समर कैम्प भी जीम लेता है। जो आनंद हमें नानी-दादी के घर आता था, उसे मोटी फीस देकर भी हम समर कैम्प में नहीं पा सकते। हालांकि, इस सबका अभिप्राय यह नहीं है कि समर कैम्प और हॉबी क्लासेस का महत्व नहीं है। बदली परिस्थितियों में यह हमारी छुट्टियों को उपयोगी बनाते हैं।

बुधवार, 3 जून 2026

खेत बचाओ अभियान : मिट्टी बचेगी, तभी बचेगा किसान और देश का भविष्य

केन्द्र सरकार ने मिट्टी के संरक्षण के लिए जनांदोलन खड़ा करने का संकल्प लिया है। यह अत्यंत आवश्यक आंदोलन है, जिसे केवल सरकार के प्रयास से नहीं अपितु जनता (विशेषकर किसानों) की भागीदारी एवं समझदारी से ही सफल बनाया जा सकता है। मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के ग्राम रमासिया से केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राष्ट्रव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ की घोषणा की है। स्मरण रहे कि कृषि मंत्री स्वयं भी कृषक परिवार से आते हैं, इसलिए खेती के बारे में उनकी समझ अधिक जमीन और वास्तविक है। आज कृषि भूमि की जो स्थिति है, उसको लेकर सब ओर अनुत्तरित चिंता पसरी दिखायी देती है।

सोमवार, 1 जून 2026

भोपाल विलीनीकरण आंदोलन में आरएसएस का मौन किंतु प्रखर संघर्ष

स्वतंत्रता आंदोलन और आरएसएस : जनांदोलन के आगे नवाब ने घुटने टेके, 1 जून 1949 को भोपाल रियासत का भारत में हुआ विलय

भोपाल में स्थिति विलीनीकरण स्मारक : विलीनीकरण शहीद स्मृति द्वार

हम भारत के लोगों ने स्वतंत्रता के लिए लगभग 1000 वर्ष संघर्ष किया। 15 अगस्त, 1947 को वह दिन आया, जिसके लिए पीढ़ियों ने संघर्ष किया। इसे विडम्बना ही कहेंगे कि एक ओर 15 अगस्त 1947 को पूरा देश स्वतंत्रता का उत्सव मना रहा था, वहीं दूसरी ओर झीलों की नगरी भोपाल पर नवाब की हठधर्मिता का काला साया मंडरा रहा था। नवाब ‘स्वतंत्रता’ का अपहरण कर लेना चाहता था। पाकिस्तान परस्त नवाब हमीदुल्लाह खान ने 24 अगस्त, 1947 को भोपाल को ‘स्वतंत्र देश’ बनाए रखने की घोषणा कर दी। भोपाल की जनता ने नवाब के इस निर्णय का विरोध किया। जिस नवाब ने अपने दिमाग के दरवाजे बंद कर लिए हों, उसे भला लोगों के मन की बात कहाँ सुनायी देती। उसने जनता के विरोध को जूतों तले रौंदने का प्रयास किया। परंतु, नवाब सफल नहीं हो सका क्योंकि भोपाल विलीनीकरण आंदोलन का एक सिरा संघ के स्वयंसेवकों ने भी थाम लिया था। आम जनता के साथ अब संघ के कार्यकर्ता भी इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में आ गए थे। संघ जिस काम को हाथ में लेता है, उसमें सफलता सुनिश्चित रहती ही है।

रविवार, 31 मई 2026

संघ शिक्षा वर्ग में डॉ. अंबेडकर ने देखी समरसता

संघ शताब्दी वर्ष : वर्ष 1939 में पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग के सायंकालीन बौद्धिक सत्र में बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने स्वयंसेवकों को किया था संबोधित

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से आयोजित शिक्षा वर्गों में स्वयंसेवक क्या सीख रहे हैं, इसकी प्रत्यक्ष अनुभूति कराने के लिए संघ-सृष्टि के बाहर के महानुभावों को वर्ग में आमंत्रित करने की परंपरा प्रारंभ से रही है। प्रारंभ में बौद्धिक या समापन समारोह की अध्यक्षता के लिए महानुभावों को आमंत्रित किया जाता था, लेकिन अब तो वर्ग के बीच में भी समाज के प्रमुखजनों को ‘वर्ग दर्शन’ कराने की योजना रहती है। जब स्वयंसेवक सामूहिक रूप से मैदान पर अभ्यास कर रहे होते हैं या भोजन कर रहे होते हैं, उस समय विशिष्ट अतिथियों को आमंत्रित करके उन्हें वर्ग दर्शन कराया जाता है। आपको यह जानकर अच्छा लगेगा कि संघ शिक्षा वर्ग का दर्शन करने के लिए महात्मा गांधी से लेकर बाबा साहब डॉ. अंबेडकर तक आ चुके हैं। सामाजिक क्रांति के अग्रदूत बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर संघ शिक्षा वर्ग की प्रत्यक्ष अनुभूति करने के लिए वर्ष 1939 में पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग में आए थे। शिक्षा वर्ग की व्यवस्थाएँ, स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण और उनके व्यक्तित्व में आए परिवर्तन देखकर बाबा साहब अत्यंत प्रसन्न हुए थे।

देखें वीडियो : आरएसएस की शाखा में आए डॉ. भीमराव अंबेडकर


सामाजिक समरसता स्थापित करने के लिए अथक प्रयास कर रहे बाबा साहब डॉ. अंबेडकर ने यह सुन रखा था कि अस्पृश्यता निवारण में आरएसएस को उल्लेखनीय सफलता मिली है। इस बात की अनुभूति बाबा साहब ने संघ शिक्षा वर्ग में बहुत समीप से की। पुणे के संघ शिक्षा वर्ग के सायंकालीन बौद्धिक सत्र में डॉ. अंबेडकर आए थे। उस समय वर्ग में संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार भी उपस्थित थे। वर्ग में लगभग 525 स्वयंसेवक संघ कार्य का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे। डॉ. अंबेडकर ने डॉ. हेडगेवार से सबसे पहला प्रश्न यही किया कि इन 525 स्वयंसेवकों में से अस्पृश्य कितने हैं? डॉ. हेडगेवार ने उनसे कहा कि आप स्वयं ही इनसे पूछ लीजिए। बाबा साहब स्वयंसेवकों के बीच में गए, लेकिन पूर्ण गणवेश पहने सभी स्वयंसेवक एक समान ही दिख रहे थे। उनमें कौन स्पृश्य (सवर्ण) है और कौन अस्पृश्य, यह पहचाना ही नहीं जा सकता था। बाबा साहब भी नहीं पहचान पाए। तब बाबा साहब ने स्वयंसेवकों से कहा कि आपमें से जो अस्पृश्य हों, वे एक कदम आगे आएँ। लेकिन कतारबद्ध स्वयंसेवकों के बीच कोई हलचल नहीं हुई। एक भी स्वयंसेवक पंक्ति से बाहर नहीं आया।

गुरुवार, 28 मई 2026

संघ शिक्षा वर्ग बनाम समर कैंप

संघ शताब्दी वर्ष : ‘मैं’ से ‘हम’ के बोध की यात्रा में लेकर जाते हैं संघ शिक्षा वर्ग, जीवन को सार्थक बनाने की मिलती है सीख

व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया में ‘समर कैंप’ हमारे जीवन का हिस्सा बन गए हैं। गर्मी की छुट्टियां लगते ही युवा अपने व्यक्तित्व को निखारने, नया कौशल सीखने और समय का सदुपयोग करने के लिए अपनी अभिरुचि के अनुसार ‘समर कैंप’ में जाते हैं। नि:संदेह ये समर कैंप युवाओं को बहुत कुछ सिखाते हैं। इसलिए रचनाधर्मी और उत्साही युवाओं के बीच समर कैंप के प्रति आकर्षण बढ़ा है। वहीं, जब हम समर कैंप की तुलना संघ शिक्षा वर्ग से करते हैं, तब स्वयंसेवकों के उत्साह को देखकर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि इन वर्गों में न केवल व्यक्तित्व का विकास होता है, अपितु राष्ट्र साधना के लिए भी उनका मन तैयार होता है। भारत माँ की सेवा का जो संकल्प स्वयंसेवकों ने धारण किया है, उसको निभाने का प्रशिक्षण भी इन वर्गों में मिलता है। समर कैंप की तुलना करते हुए संघ शिक्षा वर्गों के संबंध में एक बात कहनी हो तो- संघ शिक्षा वर्ग सोने पर सुहागा हैं। यहाँ युवा समय प्रबंधन, कार्यक्रम प्रबंधन, अनुशासन, सामंजस्य, योग, कौशल, कला, संवेदनशीलता, वक्तृत्व कला इत्यादि गुण तो सीखता ही है, इसके अलावा वह अपनी गौरवशाली संस्कृति से परिचित होता है, राष्ट्रप्रेम का भाव और गहरा होता है, नेतृत्व करने की क्षमता का विकास होता है। इस सबके साथ युवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे यशस्वी आंदोलन को समाज में ले जाने का प्रशिक्षण भी प्राप्त करते हैं। संघ शिक्षा वर्ग में प्रशिक्षित युवा ही आगे चलकर संघ के बड़े दायित्व का निर्वहन करने के लिए तैयार होते हैं। हाँ, उनके मन में एक साधारण स्वयंसेवक की भाँति समर्पित भाव से संघ कार्य करने का दायित्व बोध भी गहरा होता है।

रविवार, 24 मई 2026

संघ शिक्षा वर्ग : संघ कार्य के प्रशिक्षण की प्रयोगशाला

संघ शताब्दी वर्ष : मई-जून में देशभर में आयोजित होते हैं, 1927 में नागपुर में लगा था पहला वर्ग

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को एक अनुशासित और राष्ट्रव्यापी संगठन बनाने में ‘संघ शिक्षा वर्गों’ का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ये केवल प्रशिक्षण शिविर नहीं हैं, बल्कि ये संघ कार्य की साधना की प्रयोगशालाएं हैं। चयनित एवं दायित्ववान स्वयंसेवक संघ शिक्षा वर्गों में एक साधक की तरह रहते हैं और संघ कार्य के लिए संगठनात्मक एवं बौद्धिक प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। इन वर्गों से स्वयंसेवक केवल संघ चलाने की पद्धति नहीं सीखते, अपितु उनके व्यक्तित्व का भी सर्वांगीण विकास होता है। वर्ग में रहकर स्वयंसेवक सफल जीवन के लिए अनुशासन, समय प्रबंधन, दिनचर्या पालन, कार्यक्रम कुशलता, सामंजस्य और वक्तृत्व कला जैसे गुणों को समझता और सीखता है। सबके साथ मिलकर रहने से स्वयंसेवकों में सहयोग और सामंजस्य की भावना का विकास होता है। सोचने-समझने, तर्क करने, समस्या का समाधान खोजने, निर्णय लेने की क्षमता का विकास, अपनी भावनाओं को प्रकट करने का अभ्यास, सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का महत्व, दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, ये सब बातें भी संघ शिक्षा वर्ग से प्रशिक्षित स्वयंसेवक के व्यक्तित्व में दिखने लगती हैं। इसलिए संघ शिक्षा वर्गों को लेकर स्वयंसेवकों में भी खूब उत्साह रहता है।

मंगलवार, 12 मई 2026

भगवान के प्रति भक्ति प्रकट करने का सर्वोत्तम प्रकार है सेवा-भाव

संघ शताब्दी वर्ष : श्रीगुरुजी की दृष्टि में आध्यात्मिक साधना है सेवा


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहचान केवल शाखा पर खेलने एवं कदमताल करने वाले संगठन के रूप में नहीं है। अपितु, समाजसेवी संगठन के तौर पर भी संघ को देखा जाता है। समाज में विभिन्न प्रकार के सेवा उपक्रम चलाने वाले संगठन या व्यक्ति मानते हैं कि वे कोई विशिष्ट कार्य कर रहे हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग मानते हैं कि वे सेवा करके समाज पर उपकार कर रहे हैं। संघ ने प्रारंभ से स्पष्ट किया है कि उसके लिए सेवा कार्य समाज पर उपकार नहीं हैं अपितु सेवा तो करणीय कार्य है। स्वामी विवेकानंद के दर्शन ‘नर सेवा-नारायण सेवा’ को अनुकरणीय मानकर अपने नैतिक एवं स्वाभाविक दायित्व के रूप में संघ के स्वयंसेवक सेवा कार्य करते हैं। संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ के चिंतन में सेवा की संकल्पना अत्यंत व्यापक, गूढ़ और आध्यात्मिक है। उनके दर्शन में सेवा केवल एक औपचारिकता या सामाजिक दायित्व नहीं है, बल्कि यह ईश्वर की आराधना का सबसे उत्तम और प्रत्यक्ष मार्ग है। उन्होंने सेवा को भौतिकता के धरातल से उठाकर परोपकार और ईश्वरीय साधना के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित किया।

बुधवार, 6 मई 2026

भाजपा की ऐतिहासिक जीत, विपक्ष को आईना दिखाता जनादेश

जनता ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उसकी सामूहिक चेतना से बढ़कर कोई भी ताकत नहीं है। छल-बल और तुष्टीकरण से सत्ता हथियाने वाली ताकतों को जनता ने आईना दिखा दिया है। जैसे ही पश्चिम बंगाल में जनता को सुरक्षा का आश्वासन मिला, उसने निर्भय होकर बता दिया है कि लोकतंत्र में हिंसा, गुंडागर्दी और मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए कोई स्थान नहीं है। कहना होगा कि पाँच राज्यों (चार राज्य और एक केंद्रशासित प्रदेश) के चुनाव परिणामों ने भारतीय राजनीति के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। बंपर मतदान और मतदाताओं के अभूतपूर्व उत्साह के बीच जो परिणाम सामने आए हैं, वे न केवल चुनाव पश्चात आए सर्वेक्षण के अनुमानों पर मुहर लगाते हैं, बल्कि लोकतंत्र की जीत की कहानी भी धूमधाम से सुना रहे हैं।

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

भारतीय विचार के मजबूत स्तंभ ‘11 महानायक’

देखें : 11 महानायक : भारत के महान सपूतों की गाथा | 11 Mahanayak Book Review

भारत में महापुरुषों की एक लंबी शृंखला है। भारत के सुदीर्घ इतिहास के प्रत्येक कालखंड में हमें ऐसे नायक दिखाई देते हैं, जिन्होंने भारतीय समाज का मार्ग प्रशस्त किया। ऐसे में कुछ नायकों को चुनना और उनके व्यक्तित्व पर लिखना, अत्यंत कठिन कार्य है। अपने लेखन के दौरान प्रो. संजय द्विवेदी समय-समय पर भारत के नायकों के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर लिखते रहे हैं। उनमें से ही 11 नायकों का चयन करके उन्होंने एक पुस्तक तैयार की है, जिसका नाम है- ‘11 महानायक’। ‘संस्मय प्रकाशन’ से प्रकाशित पुस्तक ‘11 महानायक’ भारतीय इतिहास और नवजागरण के उन देदीप्यमान नक्षत्रों की गाथा है, जिन्होंने अपने त्याग, संघर्ष और वैचारिक स्पष्टता से एक सशक्त भारत की नींव रखी। यह पुस्तक ‘गागर में सागर’ भरने का एक सफल प्रयास है, जो पाठकों को भारत के महान सपूतों के जीवन-दर्शन से सीधे जोड़ती है।

रविवार, 26 अप्रैल 2026

श्रीगुरुजी को संन्यासी जीवन से वापस खींच लाया संघ कार्य

संघ शताब्दी वर्ष : श्री गोलवलकर ने स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शिष्य अखंडानंद जी से संन्यास की दीक्षा ली थी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ के जीवन का एक दौर ऐसा भी है, जब वे दुनियादारी छोड़कर अध्यात्म के मार्ग पर संन्यासी हो गए। लेकिन उनकी नियति और संघ कार्य की आवश्यकता उन्हें पुन: राष्ट्रीय आंदोलन में खींच लाई। संघ कार्य को विस्तार देते हुए भी उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन एक तपोनिष्ठ संन्यासी की भाँति ही व्यतीत किया। श्रीगुरुजी किसी आध्यात्मिक विभूति की तरह दिखाई देते थे। उनके चेहरे पर दमकता तेज भी इसका साक्ष्य देता था कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है अपितु अध्यात्म की ऊर्जा से सम्पन्न कोई पवित्र आत्मा है। श्रीगुरुजी के व्यक्तित्व का स्मरण करते हुए ‘माधव अर्चना’ गीत की रचना की गई है, जिसकी एक-एक पंक्ति उनके आध्यात्मिक व्यक्तित्व की ओर संकेत करती है। “सिन्धु सा गम्भीर मानस, थाह कब पाई किसी ने। आ गया सम्पर्क में जो, धन्यता पाई उसी ने”। श्रीगुरुजी के संपर्क में आए संघ से बाहर के बंधु भी मानते थे कि उनका जीवन केवल एक संगठनकर्ता का जीवन नहीं था, बल्कि वह भीतर से एक पूर्ण विरक्त और आध्यात्मिक साधक थे। उनका समूचा जीवन इस बात का प्रतीक है कि कैसे एक संन्यासी अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को समाज और राष्ट्र के कल्याण में समाहित कर सकता है।

रविवार, 19 अप्रैल 2026

संघ के सबसे युवा सरसंघचालक

संघ शताब्दी वर्ष : माधव सदाशिवराव गोलवलकर सबसे कम उम्र (34 वर्ष) में सरसंघचालक बने और सबसे अधिक समय (33 वर्ष) तक सरसंघचालक के रूप में स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया

स्वतंत्रता सेनानी डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम से जिस आंदोलन की शुरुआत की थी, उनके जाने के बाद उसे विस्तार देने का कार्य द्वितीय सरसंघचालक श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर ने किया, जिन्हें सब आदरपूर्वक ‘श्रीगुरुजी’ कहते थे। संघ के अब तक के इतिहास में श्रीगुरुजी सबसे युवा सरसंघचालक रहे हैं। वे केवल 34 वर्ष की आयु में ही सरसंघचालक नियुक्त हो गए थे। आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार भली प्रकार से श्रीगुरुजी की प्रतिभा को पहचानते थे, इसलिए उन्हें संघ की बागडोर सौंपते समय वे निश्चिंत थे। जब श्रीगुरुजी के नाम की विधिवत घोषणा हुई, तब उन्होंने अपने पहले ही भाषण में स्पष्ट किया कि, “सरसंघचालक का पद यह विक्रमादित्य का सिंहासन है। उस सिंहासन पर चरवाहे का लड़का आसीन हुआ और उसने यथोचित न्याय किया। डॉक्टरजी ने इस पद को ‘विक्रमादित्य का सिंहासन’ इस कोटि में बिठाया। उस पर आरूढ़ होने का अवसर मुझ जैसे साधारण नागरिक को मिला है, परंतु डॉक्टरजी मुझसे उचित रूप में ही उच्चारण तथा कृति करवा लेंगे...”। बहुत ही विनम्रता के भाव से उन्होंने सबके मन में यह विश्वास जगाया कि डॉक्टरजी ने ही इस प्रकार का मार्ग बना दिया है कि उस पर कोई भी चल सकता है। श्रीगुरुजी ने सरसंघचालक के रूप में 33 वर्षों तक स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया। उनके कार्यकाल में संघ के सामने अनेक प्रकार की चुनौतियां आईं, लेकिन वे एक कुशल नाविक की भाँति तूफानों के बीच से संघ रूपी जहाज को निकालकर ले आए। श्रीगुरुजी का जीवन राष्ट्र और समाज के लिए पूर्ण समर्पण की एक अद्भुत मिसाल है। एक मेधावी छात्र, एक समर्पित शिक्षक और एक तपस्वी के रूप में उनका जीवन दर्शन आज भी प्रेरणा का स्रोत है।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

अनादि समर : छावा के बलिदान से जाग उठा हिन्दू

देखें वीडियो : यूट्यूब चैनल 'अपना वीडियो पार्क' पर 'अनादि समर' की चर्चा


लेखक गिरीश जोशी की पुस्तक ‘अनादि समर’ छत्रपति शंभूराजे की जीवनी मात्र नहीं है, बल्कि यह भारतीय इतिहास के उस महत्वपूर्ण कालखंड का विश्लेषण है, जिसे सही ढंग से सामने नहीं लाया गया है। इस पुस्तक की पृष्ठभूमि की जानकारी मुझे ज्ञात है, इसलिए बताना चाहूँगा कि जब सुपरहिट फिल्म ‘छावा’ आई थी, तब छत्रपति शंभूराजे अर्थात् संभाजी महाराज के बारे में जानने की इच्छा लोगों के मन में अत्यंत प्रबल थी। यह एक सहज जिज्ञासा थी कि छत्रपति शंभूराजे के बलिदान के बाद क्या हुआ होगा? क्योंकि फिल्म की पटकथा हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए छत्रपति शंभूराजे के बलिदान पर खत्म हो जाती है। उस समय लेखक गिरीश जोशी जी को यह दायित्व बोध हुआ कि फिल्म जहाँ खत्म होती है, उसके आगे की कहानी वे सुनाएँगे। लोगों को यह अवश्य ही जानना चाहिए कि छत्रपति शंभूराजे के बलिदान ने किस प्रकार हिन्दुत्व की ज्वाला को और तीव्र किया। ‘अनादि समर’ के माध्यम से लेखक गिरीश जोशी ने छत्रपति शंभूराजे के मुगलों के साथ संघर्ष, उनके बलिदान और उस बलिदान के परिणामस्वरूप उपजे ‘लोकयुद्ध’ के वास्तविक इतिहास को सामने लाने का साधु कार्य किया है।

रविवार, 12 अप्रैल 2026

संघ की शाखा में आए थे बाबा साहब डॉ. अंबेडकर

संघ शताब्दी वर्ष : स्वयंसेवकों से संवाद करते हुए डॉ. अंबेडकर ने कहा- “कुछ बातों पर मतभेद हो सकते हैं। लेकिन संघ की तरफ अपनत्व की भावना से देखता हूँ”

सामाजिक समरसता के अग्रदूत बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर अपनत्व की भावना रखते थे और विश्वास करते थे कि यह संगठन सामाजिक परिवर्तन का आंदोलन बनेगा। उन्हें विश्वास था कि संघ हिन्दू समाज में एकजुटता और सामाजिक समरसता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। बाबा साहब डॉ. अंबेडकर संघ की शाखा और शिक्षा वर्ग में पहुँचकर एवं संघ के कार्यकर्ताओं से संवाद कर अपने विचार की पुष्टि करते रहते थे। डॉ. अंबेडकर का संघ के साथ पहला महत्वपूर्ण संपर्क 1939 में हुआ, जब वे पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग के सायंकालीन बौद्धिक सत्र में आए थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से हुई। इस वर्ग में उन्हें जो अनुभूति हुई, उससे संघ के प्रति अपनत्व का भाव बन गया, जो उनके मन में जीवनपर्यंत बना रहा है। संघ के साथ संपर्क-संवाद भी बना रहा।

मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

कांग्रेस अधिवेशन में डॉ. हेडगेवार ने रखा पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव

संघ शताब्दी वर्ष : संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने कांग्रेस में शामिल होकर राजनीतिक आंदोलन में भी बढ़-चढ़कर भाग लिया था


यह प्रतीकात्मक चित्र AI से निर्मित है।

नागपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में लोकमान्य तिलक का बहुत प्रभाव था। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार प्रारंभ से ही तिलक जी को आदर्श राजनेता और स्वतंत्रतासेनानी के तौर पर देखते थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नागपुर इकाई में तिलक के समर्थकों का प्रभाव था, उन्होंने मिलकर अलग से ‘राष्ट्रीय मंडल’ भी बना रखा था। इस राष्ट्रीय मंडल की ओर से नागपुर में राजनीतिक गतिविधियों का आयोजन किया जाता, जिनमें डॉ. हेडगेवार भी हिस्सा लेते थे। एक ओर जहाँ अन्य कांग्रेसी नेता एवं कार्यकर्ता ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत एक स्वतंत्र औपनिवेशिक राज्य की माँग करते थे, वहीं डॉ. हेडगेवार इकलौते थे जो पूर्ण स्वराज्य की माँग को आगे बढ़ाते थे। डॉक्टर जी अपने भाषणों से युवाओं के मन में पूर्ण स्वतंत्रता की भावना को प्रज्वलित कर रहे थे। बहुत कम समय में डॉ. हेडगेवार नागपुर कांग्रेस के प्रमुख नेता बन गए। कांग्रेस की नागपुर शहर इकाई के संयुक्त सचिव की जिम्मेदारी डॉक्टर साहब के पास आ गई थी। वर्ष 1919 में कांग्रेस के अधिवेशन में भी शामिल होने डॉक्टर साहब अमृतसर भी गए और वहाँ उन्होंने जलियांवाला बाग की मिट्टी को माथे से लगाकर देश को अंग्रेजों के अत्याचार से मुक्त कराने के अपने संकल्प को और दृढ़ किया।

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

संघ की वैचारिक यात्रा का ऐतिहासिक दस्तावेज ‘आरएसएस @100’

जनसंचार के सरोकारों को समर्पित पत्रिका 'मीडिया विमर्श' का संघ शताब्दी वर्ष विशेषांक 

- पुरु शर्मा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्ष की यात्रा पूरी होने पर देशभर में संघ की विचारधारा, उसकी उपलब्धियों एवं योगदान को लेकर चर्चा है। ऐसे में ‘मीडिया विमर्श’ का विशेषांक ‘आरएसएस@100’ का आना महत्वपूर्ण है। मीडिया विमर्श का यह विशेषांक संघ से संबंधित सामयिक एवं चर्चित विषयों पर प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध कराता है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक एवं लेखक डॉ. लोकेन्द्र सिंह इसके अतिथि संपादक हैं। संघ विषयों पर वे निरंतर लिखते हैं। संघ पर केंद्रित उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें- संघ दर्शन : अपने मन की अनुभूति और राष्ट्रध्वज एवं आरएसएस भी उल्लेखनीय हैं। डॉ. सिंह के कुशल संपादन में तैयार मीडिया विमर्श का विशेषांक संघ की एक सदी की यात्रा को केवल एक संगठन के इतिहास के रूप में नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण की गाथा के रूप में प्रस्तुत करता है। यह विशेषांक उन सबके लिए उपयोगी है, जो संघ को जानना-समझना चाहते हैं। कहना होगा कि यह एक संदर्भ ग्रंथ की भाँति है।

रविवार, 29 मार्च 2026

“मेरा यह जीवन देश सेवा के लिए समर्पित”

संघ शताब्दी वर्ष : संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार अनुशीलन समिति के प्रमुख क्रांतिकारी थे, उन्होंने आजन्म भारतमाता की सेवा करने की प्रतिज्ञा की

यह चित्र Google Gemini AI से निर्मित है।

ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए कोलकाता से बड़े पैमाने पर क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन हो रहा था। एक प्रकार से कोलकाता क्रांतिकारियों के लिए ‘काशी’ बन गया था। केशव बलिराम हेडगेवार के मन में भी एक ज्वार था- क्रांतिकारी बनकर भारत माता को ब्रितानी हुकूमत की बेढ़ियों से स्वतंत्र करना है। डॉक्टर साहब की जीवनी लिखने वाले सीपी भिशिकर लिखते हैं कि वंदेमातरम आंदोलन के समय से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में उनका मन रमने लगा था। मैट्रिकुलेशन की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने ठान लिया था कि कोलकाता जाकर मेडिकल की पढ़ाई करेंगे और वहीं क्रांतिकारी गतिविधियों में जुड़ जाएंगे। नागपुर के राष्ट्रभक्त महापुरुष भी यही चाहते थे कि केशव कोलकाता जाएं, क्रांतिकारियों से संपर्क जोड़ें और लौटकर पश्चिम भारत में क्रांतिकारी आंदोलन को संगठित करें। क्रांतिकारी रामलाल वाजपेयी ने भी अपने जीवन चरित्र में इस घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है कि “उनको कलकत्ता भेजने का असली मकसद क्रांतिकारी संगठन संबंधी जानकारी प्राप्त करना एवं मध्यप्रांत और बंगाल के बीच सेतु का काम करना था”। केशव हेडगेवार जब कलकत्ता पहुँचे तब क्रांतिकारियों पर अंग्रेजी दमन का दौर चल रहा था। सरकार राष्ट्रद्रोही सभा अधिनियम-1907, आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम-1908 और इंडियन प्रेस एक्ट-1910 के द्वारा क्रांतिकारी पत्रों, संगठनों एवं व्यक्तियों को दंडित करने, प्रतिबंधित करने एवं उन पर मुकदमा चलाने का कार्य कर रही थी। परंतु, यह दमनचक्र प्रखर क्रांतिकारी केशव बलिराम हेडगेवार के इरादों को कहाँ डिगा सकता था।

रविवार, 22 मार्च 2026

यूनियन जैक को उखाड़ फेंकने के लिए खोद दी सुरंग

संघ शताब्दी वर्ष : जन्मजात देशभक्त थे संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार

यह चित्र AI प्लेटफॉर्म Google Gemini से निर्मित है।

कहते हैं कि पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करने वाले महापुरुष डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का बचपन भी कुछ ऐसा ही था, जो स्पष्ट संकेत देता था कि यह बालक बड़ा होकर भारत के नवनिर्माण की नींव रखेगा। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को ‘जन्मजात देशभक्त’ ऐसे ही नहीं कहा जाता है। उनके बचपन के अनेक प्रसंग मिलते हैं, जो उनकी देशभक्ति की केसरिया छाप को दर्शाते हैं। 13 वर्ष की उम्र में केशव ने प्लेग की महामारी में अपने माता-पिता को खो दिया। इस प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी केशव ने स्वयं को संभाले रखा। उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और क्रांति के मार्ग पर कदम बढ़ाते गए। स्कूल के दिनों में ही उनकी प्रखर देशभक्ति की मुखर अभिव्यक्ति होने लग गई थी। जीवन के संघर्ष में तपकर निखरे केशव बचपन में ही बड़ों की भाँति परिपक्व हो गए थे। 1901 में जब किंग एडवर्ड-सप्तम इंग्लैंड की राजगद्दी पर बैठे, तब नागपुर में एम्प्रेस मिल के मालिकों ने खुशी में आतिशबाजी का कार्यक्रम रखा। लगभग पूरा शहर इस आतिशबाजी को देखने के लिए एकत्रित हुआ। बच्चों को तो आतिशबाजी वैसे ही बहुत आकर्षित करती है। बड़ी संख्या में बच्चे भी आतिशबाजी का लुत्फ उठाने के लिए आए थे। लेकिन, जब केशव से आतिशबाजी देखने चलने का आग्रह किया गया तो उन्होंने अपने मित्रों से कहा- “यह शर्म की बात है कि हम एक विदेशी शासक की ताजपोशी पर जश्न मनाएं; मैं यह आतिशबाजी देखने नहीं जाऊंगा”।

बुधवार, 18 मार्च 2026

आरएसएस के साथ आई समाज की सज्जनशक्ति

सर्वव्यापी-सर्वस्पर्शी कार्य : संघ शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों में समाज का सहयोग और सहभागिता ने स्वयंसेवकों का बढ़ाया उत्साह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शताब्दी वर्ष पर कोई बड़ा उत्सव आयोजित न करके छोटे-छोटे स्थानों (मंडल/बस्ती) पर कार्यक्रमों का आयोजन किया, ताकि संघ कार्य का व्याप बढ़े। शताब्दी वर्ष के निमित्त संघ ने मुख्य रूप से दो प्रकार के कार्यक्रमों की व्यापक योजना बनाई है। इनमें पहला उद्देश्य संगठन का विस्तार करना है, जबकि दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य समाज की सज्जन शक्ति को सद्भाव और समरसता के सूत्र में पिरोकर राष्ट्र निर्माण के लिए संगठित करना है। इस ऐतिहासिक अवसर पर आयोजित संघ के कार्यक्रमों में समाज का जो अभूतपूर्व और भरपूर साथ मिल रहा है, वह संगठन की राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता का प्रमाण है। कहना होगा कि कई कार्यक्रमों का नेतृत्व तो समाज ने ही किया, संघ की शक्ति तो उनकी सहयोगी बनी। विशेष रूप से हिन्दू सम्मेलनों का आयोजन समाज की सज्जनशक्ति ने आगे रहकर किया।

सोमवार, 16 मार्च 2026

अनूठा जन्मदिन : पुस्तकों से तौले गए 8 वर्षीय मारुति

भोपाल में 8 वर्षीय बालक मारुति का जन्मदिन अनूठे ढंग से मनाया गया। पूरे उत्सव में भारतीय संस्कृति की गहरी झलक दिखाई दी। मारुति के माता-पिता और दादा-दादी ने भारतीय पद्धति के अनुसार जन्मदिन की योजना बनाई। इस उत्सव को सार्थक स्वरूप देते हुए 'पुस्तक-तुला' का आयोजन किया गया, जिसमें मारुति को पुस्तकों से तौला गया। ​तराजू के एक पलड़े में मारुति को बैठाया गया और दूसरे पलड़े में पुस्तकें रखी गईं। जो भी अतिथि आए थे, वे अपने साथ लाई गई पुस्तकें या वहां उपलब्ध पुस्तकों को दूसरे पलड़े में तब तक रखते गए, जब तक मारुति का पलड़ा ऊपर नहीं उठ गया। इस अवसर पर कई सामाजिक कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे। परिवार 'पुनरुत्थान विद्यापीठ' से जुड़ा हुआ है और इस प्रकार जन्मदिन मनाने की प्रेरणा उन्हें वहीं से प्राप्त हुई। मारुति की शिक्षा भी पुनरुत्थान विद्यापीठ के गुरुकुल में चल रही है।