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बुधवार, 13 अगस्त 2025

कुत्तो की चिंता परंतु गो-हत्या पर चुप्पी, क्यों?

आवारा कुत्तों को सड़कों से हटाकर आश्रय स्थल भेजने के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद कुछ लोगों का श्वान प्रेम अचानक से जाग गया है। जरा सोचिए, इन लोगों का यह प्रेम / चिंता / संवेदना गाय के प्रति क्यों नहीं जागती... अपितु गो-संरक्षण के मुद्दे पर इनके तर्क ठीक उलट होते हैं। गाय के प्रति इनकी सोच इतनी निर्दयी है कि ये लोग गाय को कसाई के हाथों काटे जाने के पक्षधर दिखाई पड़ते हैं। इनके लोग स्वयं भी गाय काटकर सड़क/चौराहों पर उसके रक्त/मांस भक्षण का उत्सव मनाते हैं।

आवारा कुत्तों को सड़कों से हटाकर आश्रय स्थल में भेजने के निर्णय का विरोध करने जो 'डॉग लवर्स' सोशल मीडिया/सड़कों पर मोमबत्ती लेकर उतरे हैं, उनमें से कई लोग कई जीवों का भक्षण बहुत स्वाद से करते होंगे। जब ये लोग बोटी/हड्डी को चटकारे लेकर चबाते हैं तब क्या इनके भीतर से आवाज नहीं आती कि अपने स्वाद के लिए किसी के प्राण ही ले लिए? यहां तो कुत्तों को मारा नहीं जा रहा है, उन्हें केवल सड़क से शेल्टर में शिफ्ट किया जा रहा है। कभी सोचा है कि आप लोग तो अपनी जीभ के स्वाद के लिए कितने की बकरों/मुर्गों की हत्या के कारण बन चुके हो?

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

एकजुट भारत : वयं पंचाधिकं शतम्

तथाकथित किसान आंदोलन के नाम पर भारत विरोधी ताकतों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करने का षड्यंत्र रचा, लेकिन भारत के नागरिकों ने अविलम्ब एकजुट प्रतिकार करके बता दिया कि हम भारत विरोधी किसी भी साजिश को सफल नहीं होने देंगे। यह भारत की शक्ति और उसकी सुंदरता है कि आम और प्रभावशाली, सभी लोगों ने भारत की आवाज को मजबूत किया। महाभारत का एक प्रसंग है, जिसमें संदेश दिया गया है कि – ‘वयं पंचाधिकं शतम्’। जो भारतीय संस्कृति में रचा-बसा है, वह इस संदेश को जीता है। उसे पता है कि भले ही हमारी आपस में असहमति है लेकिन बाहर के लिए हम सब एकजुट हैं। इसलिए अनेक असहमतियों के बाद भी विगत दिवस देश के सभी नागरिकों ने ‘भारत के विरुद्ध रचे गए प्रोपोगंडा’ का एक सुर में विरोध किया। 

सुबह से जो लोग पॉप सिंगर रिहाना, पॉर्न स्टार मिया खलीफा, एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग और कमला हैरिस की भतीजी/भान्जी के ट्वीट पर लहालोट हो रहे थे, उनके प्रोपोगंडा की हवा ‘हम भारत के लोग’ में आस्था रखने वाले भारतीयों ने निकाल दी। भारत की ओर से इस बात पर आपत्ति की गई है कि एक अलग दुनिया में रहने वाले इन लोगों ने जमीनी सच्चाई को जाने बिना ही अपनी नाक भारत के आंतरिक मामले में घुसाई है। क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर से लेकर अभिनेता अक्षय कुमार और एक सामान्य भारतीय नागरिक ने कहा कि “भारत की संप्रभुता से समझौता नहीं किया जा सकता। आईए, भारत के विरुद्ध इस प्रोपोगंडा के सामने एकजुट होकर खड़े होते हैं”। विदेश मंत्रालय ने भी उचित ही प्रतिक्रिया दी कि “भारत की संसद ने व्यापक बहस और चर्चा के बाद, कृषि क्षेत्र से संबंधित सुधारवादी कानून पारित किया। ये सुधार किसानों को अधिक लचीलापन और बाजार में व्यापक पहुँच देते हैं। ये सुधार आर्थिक और पारिस्थितिक रूप से सतत खेती का मार्ग प्रशस्त करते हैं”। 

यह सच है कि इन ‘सेलेब्रिटीज’ न तो कृषि सुधार कानूनों की एक पंक्ति पढ़ी है और न ही उन्हें किसानों की माँगों का ही पता है। उन्हें जो ट्वीट और पोस्टर दिया गया, उसे उन्होंने ट्वीट कर दिया। इस कॉपी-पेस्ट कर्म में अनजाने में स्वीडिश एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग ने इस अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र की पोल खोल दी। ग्रेटा ने भारत में जारी किसान आंदोलन के समर्थन की अपील करते हुए जो ट्वीट किया, उसमें उन्होंने एक ऐसे दस्तावेज को साझा कर दिया, जिससे स्पष्ट होता है कि किसान आन्दोलन एक सोची समझी रणनीति के साथ शुरू किया गया था और 26 जनवरी का उपद्रव भी इसी रणनीति का हिस्सा था। गूगल ड्राइव पर साझा की गई इस फाइल में इस तथाकथित किसान आंदोलन के आगे की रणनीति एवं सोशल मीडिया अभियान का क्रम और अन्य गतिविधियों का ब्योरा दर्ज है। इसके साथ ही इस दस्तावेज में यह तक उल्लेख है कि किसको क्या ट्वीट करना है और किन्हें टैग करना है। दरअसल, प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने कृषि सुधार कानूनों की सराहना की है। उन संस्थाओं को टैग करके उन पर दबाव बनाने की योजना भी उजागर हुई है। 

इस दस्तावेज में भारत के कुछ मीडिया संस्थानों का भी जिक्र है, जो इस षड्यंत्र में उनके सहयोगी साबित हो सकते हैं। जैसे ही ग्रेटा ने यह ट्वीट किया, भारत विरोधी ताकतों की कलई खुल गई। आनन-फानन में ग्रेटा से यह ट्वीट हटवाया गया। हालाँकि, तब तक सच सामने आ चुका था। धीरे-धीरे ही सही, लेकिन इस आंदोलन के पीछे सक्रिय अराजक ताकतों का चेहरा सामने आता जा रहा है। वैसे भी राष्ट्रीय स्वाभिमान के पर्व ‘गणतंत्र दिवस’ पर हुई अराजकता और हिंसा के बाद से यह तथाकथित किसान आंदोलन अपनी नैतिकता खो चुका है। अब धीमे-धीमे जनसमर्थन और सहानुभूति से भी हाथ धो रहा है।

शुक्रवार, 1 मई 2020

कल्पना और झूठ पर आधारित है अमेरिकी आयोग की रिपोर्ट



अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (यूएससीआईआरएफ) ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में भारत के संदर्भ में जो सुझाव दिया है, वह कोरी कल्पनाओं और सफेद झूठ पर आधारित है। यूएससीआईआरएफ ने भारत को ‘कुछ खास चिंताओं’ वाले उन 14 देशों की सूची में शामिल करने का सुझाव दिया है, जहाँ धार्मिक अल्पसंख्यकों पर उत्पीडऩ लगातार बढ़ रहा है। दुनिया भर में धार्मिक स्वतंत्रता के मामलों पर नजर रखने वाली अमेरिका की इस संस्था ने भारत को इस सूची में शामिल करने के लिए जो तथ्य और कथ्य जुटाए हैं, वे शुद्धतौर पर काल्पनिक हैं। यूएससीआईआरएफ की उपाध्यक्ष नेन्डिन माएजा ने कहा है- ‘भारत के नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी से लाखों भारतीय मुसलमानों को हिरासत में लिए जाने, डिपोर्ट किए जाने और स्टेटलेस हो जाने का खतरा है।’ यह कल्पना नहीं तो और क्या है? इस संदर्भ में यह समझने की भी जरूरत है कि नागरिकता और धर्म, दोनों अलग चीज हैं। लेकिन, इस संस्था ने भारत की छवि खराब करने के लिए दोनों का घालमेल कर दिया। रिपोर्ट में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 को निष्प्रभावी करने, गोहत्या और धर्म-परिवर्तन (कन्वर्जन) विरोधी कानूनों को धार्मिक अल्पसंख्यकों के उत्पीडऩ के तौर पर रेखांकित किया गया है। श्रीरामजन्मभूमि प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरुद्ध उत्पीडऩ से जोड़ कर आयोग ने अपनी मर्यादा का उल्लंघन किया है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को सांप्रदायिक चश्मे से देख कर अमेरिकी आयोग ने अपनी नासमझी और मानसिक क्षुद्रता का ही परिचय दिया है।

          संस्था की यह राय साफ तौर पर उन लोगों के बयानों/लेखन के आधार पर बनी हुई दिख रही है, जो भारत की छवि खराब करने के षड्यंत्र में शामिल हैं। यदि हम पूरी रिपोर्ट को पढ़े तो यही समझ आएगा कि यह किसी ‘शाहीन बाग के प्रेमी’ द्वारा लिखी गई रिपोर्ट है। वास्तविकता यह है कि नागरिकता संशोधन कानून का किसी भी प्रकार का कोई लेना-देना भारत के धार्मिक अल्पसंख्यक नागरिकों से नहीं है। इस कानून से भारत के अल्पसंख्यकों का उत्पीडऩ होने की कोई गुंजाइश नहीं है। बल्कि यह तो धार्मिक आधार पर उत्पीडऩ का शिकार हुए हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन, ईसाई समुदाय के बंधुओं का संरक्षण करने वाला कानून है। दुनिया जानती है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में गैर-मुस्लिमों के साथ किस तरह के अत्याचार किए जा रहे हैं। इन देशों से अपनी जान बचाकर भारत में शरण लेने आए धार्मिक अल्पसंख्यकों का स्वाभिमान के साथ जीने का अधिकार देने का सराहनीय काम भारत सरकार ने किया है। अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग को इस कानून के लिए भारत सरकार की प्रशंसा करनी चाहिए थी। 

          वहीं, राष्ट्रीय नागरिकता पंजीयन (एनआरसी) किसी भी देश का संवैधानिक कार्य है। नागरिकों और घुसपैठियों की पहचान देश की सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ा मामला है। इसका भी संबंध भारत के अल्पसंख्यकों से नहीं है। एनआरसी के जरिये किसी को भी धार्मिक आधार पर डिपोर्ट या नागरिकता से बेदखल नहीं किया जाना है। एनआरसी में कहीं नहीं लिखा कि इसके जरिए धार्मिक अल्पसंख्यकों को डिपोर्ट किया जाएगा। हैरत है कि अंतरराष्ट्रीय संस्था को इतनी सी बात समझ नहीं आ रही और उसने धर्म एवं नागरिकता का आपस में घालमेल कर दिया। इसलिए भारत सरकार ने उचित ही प्रत्युत्तर यूएससीआईआरएफ को दिया है। भारत के विदेश मंत्रालय ने न केवल आयोग की रिपोर्ट के दावों को खारिज किया है, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया है कि इसमें भारत के खिलाफ की गई भेदभावपूर्ण और भड़काऊ टिप्पणियों में कुछ नया नहीं है। यह आयोग पहले भी भारत के विरुद्ध दुष्प्रचार करने का प्रयास करता रहा है। लेकिन इस बार गलत दावों का स्तर एक नई ऊंचाई पर पहुंच गया है। 

          बहरहाल, इस झूठी रिपोर्ट और उसके फर्जी दावों के विरुद्ध आयोग के ही दो सदस्य भारत के पक्ष में खड़े हैं। यह हमारे लिए संतोष की बात है। आयोग के नौ में से दो वरिष्ठ सदस्यों गैरी एल. बॉर और टेन्जिन दोरजी ने रिपोर्ट से अपनी असहमति भी जतायी है और कहा है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है तथा उसे चीन और उत्तर कोरिया जैसे एकाधिकारवादी शासनों के साथ नहीं रखा जा सकता है। कमिश्नर गैरी एल. बॉर ने रिपोर्ट के दावों से असहमति जताते हुए अपने नोट में लिखा है- ‘भारत को सीपीसी (कंट्री ऑन पर्टिक्यलर कंसर्न) सूची में रखे जाने के बारे मैं अपने साथियों से अलग राय रखता हूं। भारत कम्युनिस्ट चीन देश की तरह नहीं है, जो सभी धार्मिक विश्वासों से युद्ध लड़ रहा है। भारत दक्षिण कोरिया की तरह भी नहीं है और न ही यह ईरान की तरह है, जहाँ इस्लामिक चरमपंथी नियमित तौर पर अन्य मत को मानने वालों के सर्वनाश (हालकॉस्ट) की धमकी देते रहते हैं। मुझे विश्वास है कि भारत सदैव धार्मिक स्वतंत्रता के साथ अन्य सब प्रकार की स्वतंत्रताओं के साथ खड़ा रहेगा।’ इसी तरह टेन्जिन दोरजी ने अमेरिकी आयोग की रिपोर्ट के प्रति अपनी असहमति में लिखा है- ‘भारत एक प्राचीन देश है, जहाँ प्राचीन काल से ही विभिन्न मत-विश्वास को मानने वाले लोग, एक-दूसरे के अस्तित्व को स्वीकारते और एक-दूसरे का सम्मान करते हुए रहते आए हैं। भारत ही वह देश है, जहाँ तिब्बती शरणार्थी आनंद के साथ रहते हैं। चीन और तिब्बत में भी वे उतने स्वतंत्र नहीं, जितने भारत में हैं।’ नागरिकता संशोधन कानून के संदर्भ में भी उन्होंने महत्वपूर्ण टिप्पणी दर्ज कराई है। उन्होंने कहा कि इससे अधिक लोकतांत्रिक व्यवस्था क्या हो सकती है कि भारत में नागरिकता संशोधन कानून का खुलकर विरोध किया गया। कांग्रेस, कानूनविद, सिविल सोसायटी और अन्य समूहों ने भी इसका विरोध किया है। मीडिया ने भी सीएए के पक्ष में और उसके विरोध में खुलकर रिपोर्टिंग की है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस मामले की सुनवाई की है। गैरी एल. बॉर के कहने से स्पष्ट है कि भारत सरकार ने यह कानून जबरन नहीं थोपा है। बल्कि इसके लिए तय संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया है। संसद से लेकर सड़क तक भरपूर बहस हुई है, किसी के विरोध को कुचला नहीं गया। 
          भारत के संदर्भ में जो दावे किए गए हैं, वे इसलिए भी खोखले हैं क्योंकि इसमें झूठ का भी सहारा लिया गया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आने के बाद से भाजपा और हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ता धार्मिक अल्पसंख्यकों को धमकी देने, उत्पीडऩे करने और हिंसा की बहुत-सी घटनाओं में शामिल रहे हैं। यह कोई तथ्य नहीं है, बल्कि शुद्धतौर पर भारत विरोधी ताकतों के द्वारा चलाए गए प्रोपोगंडा से प्रेरित है। रिपोर्ट में मॉब लिंचिंग की कथित तौर पर बढ़ती घटनाओं को धार्मिक अल्पसंख्यकों के उत्पीडऩ के तौर पर रेखांकित किया गया है। इस संदर्भ में झारखंड में तबरेज आलम की हत्या से जुड़े उदाहरण को भी ठीक उसी प्रकार वर्णित किया गया है, जैसा कि भारत की टुकड़े-टुकड़े गैंग करती है। मॉब लिंचिंग में आयोग ने भी वही धूर्तता दिखाई है, जो भारत का तथाकथित सेकुलर दिखाता है। आयोग ने हिंदुओं की मॉब लिंचिंग की घटनाओं की अनदेखी की है। 
          अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की यह रिपोर्ट ईसाई मिशनरीज के समर्थन में दिखाई देती है, जो भारत की अनुसूचित जाति-जनजाति के कन्वर्जन के आपत्तिजनक काम में संलग्न हैं। आयोग की पीड़ा यह है कि भारत में कन्वर्जन को रोकने के लिए राज्यों ने कठोर कानून क्यों बनाया है? तब क्या आयोग की मंशा यह है कि भारत को ईसाई मिशनरीज के लिए किसी चारागाह की तरह छोड़ दिया जाए। कन्वर्जन को रोकने वाले कानून ईसाई धर्म के बंधुओं का उत्पीडऩ करने के लिए नहीं बनाए गए हैं, बल्कि वह दलित और वनवासी समुदाय को ईसाई मिशनरीज के कन्वर्जन के खेल से बचाने के लिए बनाए गए हैं। यह भी अत्याचार को बढ़ाने वाले कानून नहीं बल्कि विभिन्न मत-विश्वासों का संरक्षण करने वाला कानून है। इसी तरह आयोग को गोहत्या रोधी कानूनों से दिक्कत है। मूक पशु का संरक्षण करने के कानून से भला किस प्रकार धार्मिक अल्पसंख्यकों का उत्पीडऩ संभव है? 
          कुल मिलाकर यह रिपोर्ट ऐसे ही झूठों का पुलिंदा है। यह उन कपोल कल्पनाओं और प्रोपोगंडा का चिट्ठा मात्र है, जो वर्षों से भारत विरोधी ताकतों के द्वारा चलाया जा रहा है। इस तरह तथ्यहीन बातों के आधार पर रिपोर्ट तैयार करने अंतरराष्ट्रीय संस्था यूएससीआईआरएफ ने स्वयं को ही संदिग्ध बनाया है। भारत जैसे लोकतांत्रित देश पर अंगुली उठाने से पहले आयोग को अपने ही गिरेबां (अमेरिका में) ही देख लेना चाहिए था कि किस तरह वहाँ नस्लीय एवं धार्मिक भेदभाव और उत्पीडऩ किया जाता है। कोरोना महामारी के भयंकर संकट में भी अमेरिका का स्वास्थ्य विभाग नागरिकों के इलाज में भेदभाव कर रहा है।


मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016

इसलिए कीजिए चीनी सामान का बहिष्कार

 भारत  की देशभक्त जनता ने चीनी सामान के बहिष्कार का अभियान चला रखा है। यह उचित ही है। इस अभियान का भरपूर समर्थन किया जाना चाहिए। भारत के सामने लगातार चीन बाधाएं खड़ी कर रहा है। हालांकि प्रत्येक भारतीय के लिए सबसे असहनीय बात यह है कि चीन लगातार पाकिस्तान का समर्थन कर रहा है। आतंकवाद पर भी चीन का व्यवहार ठीक नहीं है। उड़ी हमले के बाद जिस तरह से चीन ने पाकिस्तान का बचाव करने का प्रयास किया है, उससे भारत की देशभक्त जनता में चीन के प्रति काफी आक्रोश है। चीन को सबक सिखाने के लिए भारतीय नागरिकों ने सोशल मीडिया पर चीनी सामान के बहिष्कार की मुहिम चलाई है। यह मुहिम अपना रंग दिखा रही है। तकरीबन एक ही महीने में भारत में चीनी सामान की बिक्री इतनी कम हो गई है कि उससे चीन बुरी तरह बौखला गया है। बौखलाहट में चीनी मीडिया ने भारत और उसके नागरिकों के खिलाफ बहुत हल्की भाषा में कटाक्ष किया है। चीनी सामान के बहिष्कार की मुहिम के संबंध में लिखते हुए चीनी मीडिया ने लिखा है कि भारत भौंक तो सकता है, लेकिन कुछ कर नहीं सकता। चीन के सामान और तकनीक के सामने भारत का सामान और तकनीक टिक नहीं सकता है। लेकिन, चीन को इस बात का आभास नहीं है भारत के नागरिक यदि तय कर लेते हैं तो सब बातें एक तरफ और भारतीयों का निर्णय एक तरफ। चीन को यह भी नहीं पता होगा कि भारत में उसके सामान के प्रति आम नागरिकों की भावना किस प्रकार की है। चीनी माल को दोयम दर्जे का समझा जाता है। उसकी गुणवत्ता को संदेह से देखा जाता है। चीनी सामान भारत में इसलिए बिकता है, क्योंकि वह सस्ता है। उसकी बिक्री गुणवत्ता के कारण नहीं है।

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

पाकिस्तानी कलाकारों से इतना प्रेम क्यों?

 आतंकवादी  हमलों से आहत भारत के नागरिक चाहते हैं कि पाकिस्तान का समूचा बहिष्कार किया जाए। इस सिलसिले में बॉलीवुड से पाकिस्तानी कलाकारों को बाहर करने और उन्हें काम नहीं देने की माँग जोर पकड़ रही है। यह माँग स्वाभाविक है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। लेकिन, बॉलीवुड से लेकर अन्य कला और तथाकथित बौद्धिक जगत इस विषय पर भी दो हिस्सों में बँटा नजर आ रहा है। देश का सामान्य आदमी समझ नहीं पा रहा है कि आखिर पाकिस्तानी कलाकारों से इतना प्रेम क्यों है? पाकिस्तानी कलाकारों का समर्थन क्या देशहित से बढ़कर है? पाकिस्तानी कलाकार बॉलीवुड में काम नहीं करेंगे, तब क्या बॉलीवुड ठप हो जाएगा? इन सवालों के जवाब कोई नहीं दे रहा। हद है कि कुछेक लोग पाकिस्तानी कलाकारों को देश से ऊपर रखने का प्रयास कर रहे हैं। उनके लिए कलाकार किसी भी प्रकार की सीमा से ऊपर हैं। वह पूछ रहे हैं कि क्या पाकिस्तानी कलाकारों को भगा देने से आतंकवाद समाप्त हो जाएगा? नहीं होगा, आतंकवाद समाप्त। लेकिन, क्या आप भरोसा दिलाते हैं कि पाकिस्तानी कलाकारों को काम देने आतंकवाद समाप्त हो जाएगा? भारत में आप अभिव्यक्ति की आजादी का बेजा इस्तेमाल करते हैं, इसलिए आप खुद को खुदा समझते हो। यदि वाकई कलाकार संवेदनशील हैं और उनके लिए देश की सीमाएँ कोई मायने नहीं रखती, तब क्या पाकिस्तानी कलाकार बेकसूर लोगों का खून बहाने वाले आतंकवादियों का विरोध कर सकते हैं? पाकिस्तानी कलाकारों के समर्थक क्या इतना भर करा सकते हैं कि कोई फवाद खान पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ बयान जारी कर दे? यह संभव नहीं है। इसलिए पाकिस्तानी कलाकारों के लिए विधवा विलाप बेमानी है।

सोमवार, 12 सितंबर 2016

अब सुशासन बाबू नहीं रहे नीतीश कुमार

 बिहार  के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कल तक 'सुशासन बाबू' के तौर पर पहचाने जाते थे, लेकिन अब उनकी यह छवि पीछे छूटने लगी है। बिहार में अब सुशासन नहीं बल्कि अपराध की बहार है। शहाबुद्दीन की वापसी ने इस बात पर मुहर लगा दी है कि बिहार में अपराध पर लगाम लगाने में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नाकामयाब साबित हो रहे हैं। बिहार सरकार में शामिल राजद के विधायकों/मंत्रियों ने जिस तरह उसका स्वागत किया है और फूल बरसाए हैं, उससे भी जाहिर होता है कि भाजपा विरोध की राजनीति का हिस्सा बनकर नीतीश कुमार गलत जगह फंस गए हैं। बिहार सरकार के पिछले एक-डेढ़ साल के कार्यकाल से साबित होता है कि नीतीश कुमार 'सुशासन बाबू' भारतीय जनता पार्टी के कारण बन पाए थे। जदयू-भाजपा गठबंधन की सरकार के वक्त नीतीश कुमार के सुशासन को भाजपा का समर्थन था। जदयू और भाजपा दोनों का मुख्य एजेंडा विकास था। यानी सुशासन की प्रमुख हिस्सेदार भाजपा थी। लेकिन, इस बार नीतीश कुमार अपनी महत्वाकांक्षाओं (स्वयं को तीसरे मोर्चे का नेता प्रस्तुत कर प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब) के कारण भाजपा विरोध की राजनीति में शामिल हुए और भाजपा से रिश्ता तोड़कर राजद एवं कांग्रेस के साथ महागठबंधन का हिस्सा बन गए। चुनाव परिणाम महागठबंधन के पक्ष में आया, जिसमें लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद ने सबसे ज्यादा सीटें जीतीं। इस परिणाम से ही तय हो गया था कि नीतीश के लिए मुख्यमंत्री का ताज काँटों भरा रहेगा, जो बार-बार उन्हें पीड़ा देगा। संभव है कि यह गठबंधन पाँच साल पूरे न कर पाए। जदयू के नेता और पूर्व सांसद शहाबुद्दीन ने जेल से बाहर निकलते ही कहा भी है कि नीतीश कुमार परिस्थितियों के कारण मुख्यमंत्री हैं। नीतीश जनता के नेता (मास लीडर) भी नहीं हैं। उनके नेता सिर्फ लालू प्रसाद यादव हैं और वह लालू की राजनीति करते हैं।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

नक्सलियों की क्रूरता के खिलाफ बच्चियों का आक्रोश

 ज ब कभी पुलिस के हाथों कोई नक्सली मारा जाता है, तब तमाम मानवाधिकारी और वामपंथी विचारक आसमान सिर पर उठा लेते हैं। लेकिन, नक्सलियों की क्रूरता के खिलाफ इनके होंठ सिल जाते हैं। धिक्कार है ऐसे वामपंथी विचारकों और मानवाधिकारियों के प्रति जिन्होंने एक दुधमुंही बच्ची की हत्या पर शर्मनाक तरीके से खामोशी की चादर ओढ़ रखी है। गौरतलब है कि बीजापुर जिले में क्रूर नक्सलियों ने चार माह की दुधमुंही बच्ची की जघन्य हत्या कर दी थी। आखिर कोई बता सकता है कि उस दुधमुंही बच्ची ने किसी का क्या बिगाड़ा होगा? नक्सलियों से उसकी क्या दुश्मनी रही होगी? कोई इतना निर्दयी कैसे हो सकता है कि एक नन्हीं कली को ही मसल दिया? इस तरह की हिंसा किस तरह के समाज का निर्माण करेगी? इस नक्सलवाद ने खूबसूरत बस्तर को नर्क बना दिया है। नक्सलियों की इस बर्बरता पर भले ही मीडिया, वामपंथी बुद्धिजीवियों और मानवाधिकारी खामोश रह गए हों लेकिन बस्तर की बच्चियों ने साहस दिखाया है। उन्होंने नक्सलवाद का घिनोना चेहरा दुनिया को दिखाने का प्रयास किया है। 

सोमवार, 14 दिसंबर 2015

यह कैसा विरोध प्रदर्शन, कहाँ गए सहिष्णुता के ठेकेदार

 उ त्तरप्रदेश में हिन्दू महासभा के एक नेता कमलेश तिवारी पर आरोप है कि उसने मोहम्मद पैगम्बर के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की है। टिप्पणी से मुसलमान इतने उद्देलित हैं कि देश के अलग-अलग शहरों में भारी संख्या में एकत्र होकर कमलेश तिवारी को फांसी पर चढ़ाने की मांग कर रहे हैं। तिवारी का सिर कलम करने के फतवे जारी किए जा रहे हैं। इन रैलियों में आईएसआईएस के समर्थन में नारे लगाए जा रहे हैं। मुसलमानों के धार्मिक नेता रक्तपात के लिए मुसलमानों को उकसा रहे हैं। दस-बीस हजार मुसलमानों की भीड़ जोरदार नारे लगाकर सांप्रदायिक हिंसा को भड़काने वाले भाषणों को अपना समर्थन दे रही है। इन रैलियों से लौटती भीड़ को हिंसक होते देखा जा रहा है। मध्यप्रदेश का इंदौर शहर इन जहरीली तकरीरों का असर देख चुका है। भला हो मध्यप्रदेश के शासन-प्रशासन का जिसने हिंसा पर तत्काल ही काबू पा लिया।

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

असहिष्णुता पर चर्चा क्यों?

 कां ग्रेस और सीपीएम की मांग पर लोकसभा में 'असहिष्णुता' पर चर्चा कराई गई। जैसा कि पहले से ही तय था कि 'असहिष्णुता' के मुद्दे पर सदन में जमकर हंगामा होगा। क्योंकि, पक्ष-प्रतिपक्ष एक-दूसरे पर असहिष्णु होने का आरोप मढ़ेंगे। सरकार तो पहले ही कह चुकी है कि 'असहिष्णुता' का मुद्दा बनावटी है। जिस दादरी की घटना को आधार बनाकर 'असहिष्णुता' का मुद्दा उछाला जा रहा है, वैसी अनेक घटनाएं देश में पहले भी होती आईं हैं। बल्कि इससे भी अधिक गंभीर घटनाएं हो चुकी हैं। इसलिए सरकार यह स्वीकार करेगी नहीं कि देश का माहौल अचानक से डेढ़ साल में बिगड़ गया है। वहीं, कांग्रेस, कम्युनिस्ट और कुछ क्षेत्रीय पार्टियां किसी भी स्तर पर जाकर केन्द्र सरकार को झुकाना चाहती हैं। उनका कहना है कि जब से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की कमान संभाली है तब से देश में असहिष्णुता बढ़ गई है। 

बुधवार, 25 नवंबर 2015

'लालू-केजरी मिलन' पर अन्ना की खुशी और अरविन्द की 'सफाई'

 भ्र ष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का चेहरा रहे सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने 'लालू-केजरी मिलन' प्रकरण पर खुशी जताई है। लेकिन, यह खुशी अरविन्द केजरीवाल के लिए चिंता का बहुत बड़ा विषय होना चाहिए। कई ऐसे अवसर-प्रकरण गवाह हैं जब सब ओर से केजरीवाल की कड़ी आलोचना हो रही थी तब अन्ना ने केजरीवाल की पीठ पर हाथ रखा था। उनके प्रयासों का समर्थन किया था। आलोचकों के सामने खड़ा होने का हौसला दिया था। लेकिन, भ्रष्टाचार को गले लगाने के प्रकरण में अन्ना ने केजरीवाल से न केवल पल्ला झड़ा लिया है बल्कि कड़ी टिप्पणी भी कर है। उन्होंने कहा- 'लालू प्रसाद यादव को गले लगाकर अरविन्द ने अच्छा काम नहीं किया है। इससे समाज में गलत संदेश गया है। मैं खुश हूं कि मैं अरविन्द से नहीं जुड़ा हूं। वरना केजरीवाल की इस गलती पर लोग मुझ पर भी सवाल उठाते।'

बुधवार, 18 नवंबर 2015

क्या अब राष्ट्रपति की सुनेंगे साहित्यकार?

 रा ष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सम्मान लौटा रहे तथाकथित बुद्धिजीवियों को नसीहत दी है। उन्होंने कहा है कि जिन लोगों को देश की तरफ से प्रतिष्ठित सम्मान/पुरस्कार मिलते हैं, उन्हें इन पुरस्कारों का सम्मान करना चाहिए। अपनी असहमति को बहस, तर्क और विमर्श के माध्यम से प्रकट किया जाना चाहिए। भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। राष्ट्रपति के बयान के बाद सम्मान लौटाने वाले लोगों के सामने बड़ी विकट स्थिति खड़ी हो गई है। पहले से ही उनके सम्मान वापसी अभियान का विरोध हो रहा था। अनुपम खेर, नरेन्द्र कोहली, सूर्यकांत बाली, मधुर भंडारकर सहित अनेक हस्तियां सम्मान वापस करने वाले लोगों के चयनित दृष्टिकोण और चयनित विरोध के खिलाफ प्रदर्शन कर चुकी हैं। सम्मान वापसी अभियान के प्रत्युत्तर में किताब वापसी अभियान भी पाठकों ने चला रखा है। किताब वापसी अभियान में पाठक सम्मान लौटाने वाले साहित्यकारों की पुस्तकें उनके घर जाकर वापस कर रहे हैं। अब राष्ट्रपति की टिप्पणी ने सम्मान लौटाकर विरोध करने के तरीके पर सबसे बड़ा प्रश्न चिह्न खड़ा कर दिया है।

शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

'बौद्धिक आतंकवाद' का विरोध

 के न्द्र सरकार का विरोध करने के लिए सम्मान वापसी का अभियान चलाने वाले साहित्यकारों के खिलाफ भी विरोध तेज होता जा रहा है। यह शुभ है या अशुभ, अभी कहा नहीं जा सकता। लेकिन, इतना तो है कि साहित्यकारों की असलियत जनता के सामने आने लगी है। चरित्र अभिनेता अनुपम खैर ने दशहरे के दिन ट्वीट किया था- 'अब वक्त आ गया है कि नकली धर्मनिरपेक्ष पाखंडियों का पर्दाफाश किया जाए। इनके कारण से हमारी एकता खतरे में आ गई है।' यह सही बात है। सांप्रदायिकता पर चयनित दृष्टिकोण ठीक नहीं है। इसी दौरान और भी सांप्रदायिक घटनाएं हुई हैं, उन पर ये साहित्कार चुप क्यों रहे? सांप्रदायिक घटनाओं में मारे गए हिन्दुओं के प्रति किसी प्रकार की सहानुभूति का न होना, जाहिर करता है कि सम्मान लौटाने की राजनीति कर रहे साहित्यकारों की धर्मनिरपेक्षता पाखंड है। उनका असल मकसद साहित्य को आधार बनाकर राजनीति करना है।

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

नेपाल में शांति बहाली के लिए आगे बढ़े भारत

 ने पाल में 20 सितम्बर की शाम से नया संविधान लागू हो गया है। राष्ट्रपति रामबरन यादव ने संविधान लागू होने की घोषणा की है। वर्षों से हिन्दू राष्ट्र नेपाल अब धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र बन गया है। संविधान को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। एक ओर, नेपाल में नया संविधान लागू होने पर खुशी का माहौल देखा गया, वहीं दूसरी ओर संविधान के विरोध में भी आवाजें उठती दिखाई दे रही हैं। हालांकि नए संविधान का विरोध पहले से चल रहा था। अब वह विरोध और मुखर हो गया है। मधेसी और थारू समुदाय के लोग विरोध में हैं। वे लम्बे समय से आंदोलन चलाकर अपने लिए अलग प्रांत की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि नए संविधान में उनकी अनदेखी की गई है। संविधान बनाते समय और नेपाल को सात प्रांतों में बांटते समय उनके हितों की चिंता नहीं की गई। नए संविधान से असंतुष्ट मधेसी समुदाय का आंदोलन दक्षिणी तराई और पश्चिमी क्षेत्रों में हिंसक होता जा रहा है। इस हिंसा से भारत चिंतित है।

मंगलवार, 1 सितंबर 2015

आत्महत्या नहीं है संथारा

 जै न पंथ को सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद बंधी है। संथारा प्रथा पर रोक लगाने के राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्टे लगा दिया है। राजस्थान हाईकोर्ट ने जनहित याचिका की सुनवाई करने के बाद संथारा को आत्महत्या करार देकर इस पर रोक लगाने के आदेश दिए थे। सभी जैन पंथी हाईकोर्ट के आदेश से आहत महसूस कर रहे थे। नरम स्वभाव का जैन समाज बरसों पुरानी प्रथा संथारा-संलेखना पर रोक लगाने और उसकी तुलना आत्महत्या जैसे कायराना कृत्य से करने पर भड़क उठा था। समूचा जैन समाज आदेश के विरोध में एकजुट होकर सड़कों पर निकला। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी है। पुनर्विचार याचिका दायर की है। सुप्रीम कोर्ट से मिले स्टे को जैन समाज आंशिक जीत मान रहा है। जैन समाज का मत है कि संथारा किसी भी तरह से आत्महत्या नहीं है। आत्महत्या भावावेश में की जाती है जबकि संसार से मोहभंग होने पर जैन मतावलम्बी संथारा लेते हैं। महीनों कठोर उपवास और तप के जरिए संथारा किया जाता है।

शनिवार, 25 अप्रैल 2015

वह मरता रहा, ‘आप’ बोलते रहे, छी!

 'छी हो, ऐसी राजनीति पर...' जिसने भी सुना कि जतंर-मतंर पर किसान ने भरी सभा में आत्महत्या कर ली, लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल का भाषण अनवरत जारी रहा। 'ये कैसा नेता है? ये कैसी सियासत है? दुर्भाग्यपूर्ण है यह...' उन सबके बोल लगभग यही थे। राजनीति का घृणित अध्याय। क्या संवेदनाएं मर गई हैं? हम मनुष्य ही हैं न, संदेह होता है। मोहल्ले में भी किसी अपरिचित की मौत हो जाती है तो सन्नाटा खिंच जाता है, लोगों के घरों में चूल्हे नहीं जलते। लेकिन, जंतर-मंतर पर भरी सभा में, मुख्यमंत्री के सामने एक किसान पेड़ पर झूल जाता है, आम आदमी के मसीहा कहलाने की जिद पाले नेताओं पर कोई फर्क नहीं पड़ता। उनकी राजनीति चलती रहती है। किसान की मौत को भुनाने के लिए सब गिद्ध की तरह झपट पड़ते हैं। आम आदमी पार्टी की नई राजनीति, औरों से अलग राजनीति, जनता के हित की राजनीति, यही है क्या? तो नहीं चाहिए ऐसी राजनीति और संवेदनहीन नेताओं की फौज।

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

ये मुल्क पाकिस्तान है क्या?

 ग जब है! आज के समय में हिन्दुस्थान में हिन्दुओं को अपने घर बचाने के लिए धर्म बदलने पर मजबूर होना पड़ रहा है। इतिहास की किताबों में पढ़ते हैं कि मुगलों के अत्याचार से बचने के लिए हिन्दुओं ने मजबूरी में इस्लाम स्वीकार किया। जरूर किया होगा। गर्दन पर तलवार रखी हो और पूछा जा रहा हो- 'जान बचानी है या धर्म? ' तब विकल्प ही कितने बचते हैं आदमी के पास। कुछ ने मौत स्वीकारी तो बहुतों ने मजबूरी में इस्लाम। लेकिन, अब न तो मुगलिया शासन है और न उनकी तलवार का आतंक। फिर कौन है? क्या परिस्थितियां हैं? क्या संकट है कि अपना घर बचाने के लिए हिन्दू धर्मांतरण को मजबूर हैं।

शनिवार, 16 मार्च 2013

नक्सलियों को खुली चुनौती

 रा म-कृष्ण, बुद्ध और गांधी के देश में हिंसक संघर्ष बर्दाश्त नहीं है। ध्येय कितना भी ऊंचा, पवित्र और जनहित का हो लेकिन उसे पाने के लिए उचित माध्यम होना जरूरी है। बुलेट की ताकत पर बदलाव संभव नहीं होता। बदलाव तो स्वत: स्फूर्त होना चाहिए। बंदूक की नाल से तो डराया जाता है। जिसके हाथ में बंदूक होती है वह कब, किस तरफ उसे मोड़ दे, कोई नहीं जानता। यही नक्सलवाद और माओवाद के नाम पर किया जाता रहा है। व्यवस्था के खिलाफ शुरू हुआ संघर्ष अब निरीह जनता के खिलाफ हो गया है। लोग तंग आ गए हैं। नक्सलवाद भ्रष्ट हो गया है। उसका शिकार आदिवासी समाज ही बन रहा है। नक्सलियों के आतंक से तंग वनवासी समाज ने खुला पत्र लिख है। इस पत्र में बस्तर आदिवासी रक्षा समिति ने नक्सलियों से घोटपाल मड़ई विस्फोट में घायल हुए तीन ग्रामीणों को मुआवजा देने की मांग की है। समिति ने आदिवासी संस्कृति व परम्पराओं को भविष्य में आघात नहीं पहुंचाने की माओवादियों से लिखित गारंटी भी मांगी है। वनवासियों ने साफ कहा है कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो नक्सली कड़ी कार्रवाई के लिए तैयार रहें। संभवत: यह पहला मौका है जब वनवासियों ने नक्सलियों के खिलाफ इस तरह का खुला पत्र जारी किया है। हालात बदल रहे हैं। वनवासी अब और अधिक नक्सल आतंक सहन करने के मूड में नहीं दिख रहे। यह महज एक मांग पत्र नहीं है बल्कि नक्सलियों को खुली चुनौती है। आओ, अब देखते हैं तुम्हें। सचेत उन्हें भी हो जाना चाहिए जो गाए-बगाहे लाल हिंसा का समर्थन करते हैं। तथाकथित बुद्धिजीवियों को वनवासी समुदाय की पीड़ा समझनी होगी और उनके हित में अपनी लेखनी का उपयोग करना चाहिए। स्थितियां बिगड़े उससे पहले सरकार को भी चेतना होगा। आम नागरिकों के हित की रक्षा करना सरकार की ही जिम्मेदारी है। यह नौबत नहीं आनी चाहिए कि नक्सलवाद से लडऩे के लिए जनता को हथियार उठाने पड़ें। भारत सरकार के पास मौका है नक्सल आतंक को जड़ से उखाड़ फेंकने का। पीडि़त और शोषित वनवासी सरकार के साथ आने को तैयार हैं, यदि सरकार की नीयत साफ हो तो।
    वनवासी समाज की चिंता इस बात से भी बढ़ गई है कि नक्सलवाद के नाम पर धीमे-धीमे उनकी संस्कृति को भी निशाना बनाया जा रहा है। उनके लोगों का खून तो बह ही रहा है। नक्सलवाद भले ही वर्ष १९६७ में पश्चिम बंगाल के गांव नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ हो लेकिन इसके नेताओं की वैचारिक प्रेरणा का केन्द्र विदेशी है। नक्सवाद के जन्म के साथ ही इसके प्रारंभिक नेताओं ने राष्ट्र विरोधी नारा लगाया था- 'चेयरमैन माओ ही हमारा चेयरमैन है।' माओ त्से तुंग चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक और चीनी क्रांति का नेता था। जगजाहिर है कि चीन की तथाकथित ग्रेट प्रोलेटोरियन कल्चरल रिवोल्यूशन यानी सांस्कृतिक क्रांति में लाखों लोगों की जान व्यर्थ चली गई थी। करीब २० लाख लोगों की मौत, ४० लाख लोगों को बंदी बनाया गया और चीनी जनता पर बंदूक-तोप की दम पर वामपंथी विचारधारा थोपी गई। स्टालिन (शासन काल १९२४-१९५३) के समय सोवियत संघ में और पॉल पॉट के शासनकाल १९७५-८० के बीच कंबोडिया में निर्दोष लोगों को विचारधारा के नाम पर कत्ल किया गया।   तथाकथित भारतीय नक्सलवाद का कनेक्शन भी अंतरराष्ट्रीय वामपंथी आंदोलनों से है। विदेशी प्रेरणा केन्द्र होने के कारण नक्सलवाद का भारतीय परंपराओं और संस्कृति से कोई सरोकार नहीं है। खासकर हिन्दुत्व के तो ये विरोधी ही हैं। दरअसल, हिन्दुत्व राष्ट्रवाद की सीख देता है और नक्सलवाद की इसमें कोई रुचि नहीं है। दंतेवाड़ा जिले के ग्राम घोटपाल में आंगा देव व ग्राम्य देवता पर श्रद्धा के चलते वार्षिक मड़ई मनाया जाता है। इसी मेले में नक्सलियों ने विस्फोट किया। जिससे दो आदिवासी युवतियों और एक ग्रामीण घायल हो गया है। चार पुलिस जवान भी घायल हुए। इस विस्फोट को वनवासियों ने अपने आराध्य आंगा देव का अपमान  माना है। तीखी प्रतिक्रिया करते हुए रक्षा समिति ने देवताओं का अपमान करने पर आंध्रप्रदेश के नक्सलियों को फांसी देने की भी मांग की है। हालांकि नक्सली पहले भी वनवासी लोगों को निशाना बनाते रहे हैं। मुखबिरी का आरोप लगाकर मासूम-कोमल बच्चों सहित पूरे परिवार को जला दिया जाता है। बेरहमी से उनका कत्ल कर दिया जाता रहा है। तथाकथित नक्सली आंदोलन में शामिल करने के लिए बच्चों को जबरन उठाकर ले जाया जाता है। जवान लड़कियों के साथ दुराचार के मामले भी सामने आने लगे हैं। अब तो इनकी हरकतें बेहद घृणित हो गईं हैं। सुरक्षा जवान की हत्या कर उसके मृत शरीर में बम लगाने की हरकत, नजीर है कि नक्सलवाद विचार का पतन कितना हो चुका है।
    दरअसल, भारत में सक्रिय नक्सली समूह वास्तव में देश के विरुद्ध परोक्ष युद्ध लड़ रहे हैं। पुलिस रक्षक दल पर आक्रमण करना, वनवासियों में दबदबा बनाने के लिए अबोध नागरिकों की निर्मम हत्या, राजनीति का संरक्षण पाने के लिए राजनेताओं की हत्या, धन उगाही के लिए व्यवसायियों को धमकाना, सरकार की विकासोन्मुखी योजनाओं के कार्यान्वयन को रोकना, स्कूल की इमारतों में बम विस्फोट और शिक्षकों का अपहरण कर हत्या करना ऐसी सभी घटनाएं यही संकेत करती हैं। नक्सलियों की लोकतंत्र में आस्था नहीं। वे लोकतंत्र को उखाड़कर अतिवादी व निरंकुश कम्युनिष्ट शासन स्थापित करना चाहते हैं।   अब तक लाल आतंक के नाम पर नक्सली लाखों लोगों का खून बहा चुके हैं। इनमें पुलिस के जवान, सरकारी अफसर, नेता, व्यवसायी, उद्योगपतियों सहित आम नागरिक भी शामिल हैं।
    भारत में ८ प्रतिशत से अधिक वनवासी आबादी है। नक्सलवाद इन्हीं के बीच केंद्रित है। अब तक की सरकारों को १५ प्रतिशत मुस्लिमों की तो चिंता है लेकिन वनांचल में रहने वाले अबोध वनवासियों की फिक्र नहीं। १५ प्रतिशत लोगों के लिए तो अरबों रुपए की योजनाएं चलाई जा रही हैं लेकिन वनवासियों के लिए सिर्फ दिखावा। ये भोले-भाले वनवासी अल्पसंख्यकों की तरह मुखिर नहीं हैं, ये अब तक की केन्द्र सरकारों के वोट बैंक भी नहीं है। क्या इसीलिए इनकी उपेक्षा की जाती है। नक्सलबाड़ी से निकलकर देश के ५० से अधिक जिलों में नक्सलवाद के फैलने के लिए अब तक की सरकारों की उदासीनता ही जिम्मेदार है। बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओड़ीसा, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के जनजातीय और पिछड़े क्षेत्रों में नक्सली गतिविधियां अधिक हैं।  इसे ही रेड कॉरिडोर के नाम से जाना जाता है यानी लाल आतंक का गढ़। हालांकि उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में भी इनकी हिंसक घटनाएं सामने आती हैं। नक्सलवाद से निपटने के लिए सरकारी स्तर पर मजबूती के साथ प्रयास होने चाहिए। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भूमि सुधार, गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेलकूद और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देकर वनवासियों का विश्वास जीतना होगा। वनवासी क्षेत्रों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने होंगे। सड़क, इमारतों और रेल की पटरियों को नुकसान पहुंचाने वाले नक्सलियों से भी कड़ाई से निपटना होगा। सरकार को चाहिए कि वह सेना की भी मदद ले क्योंकि नक्सलवाद अब नासूर बन गया है।  यही नहीं पुलिस का भी आधुनिकीकरण करना होगा। नक्सलियों के पास एके-४७ से लेकर अति आधुनिक हथियार हैं लेकिन पुलिस के पास पुरानी तकनीक की बंदूकें, ऐसे में पुलिस भी कैसे मुकाबले करे। हालांकि नक्सल आतंक से निपटने के नाम पर सरकार के पास नीति है लेकिन नीयत नहीं है। नक्सल प्रभावित इन क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए सरकारों को पुरजोर कोशिश करनी होगी। आधे-अधूरे मन के साथ बदलाव संभव नहीं। लाल आतंक के चगुंग में फंसे वनवासी सुकून चाहते हैं जो उनके नसीब में नहीं।

मंगलवार, 31 जुलाई 2012

हिन्दुओं का बलात्कार, हत्या और धर्मांतरण उनके लिए नेकी का काम

हि न्दुओं का बलात धर्मांतरण पाकिस्तान में नेकी का काम है, इस्लाम की सेवा है। हिन्दुओं को इस्लाम में धर्मांतरित करने के लिए हर वो काम जायज है जिसे हम घोर अपराध मानते हैं। नाबालिग हिन्दू लड़कियों का अपहरण, उनसे सामूहिक बलात्कार, विरोध करने वाले हिन्दू स्त्री-पुरुषों की हत्या और टेरर टैक्स, इन सबसे पाकिस्तान में हिन्दू रोज ही दो-चार होते हैं। इस्लाम के नाम पर गुंडई करने वालों को सरकार की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष स्वीकृति है। नतीजा पाकिस्तान में हिन्दुओं की जनसंख्या लगातार घट रही है। विभाजन के समय पाकिस्तान में अच्छी-खासी हिन्दू आबादी थी। आज वहां हिन्दू गिनती के रह गए। बढऩे की जगह कम क्यों हुए? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं। कई हिन्दू अपनी बेटी, पत्नी, बहू और मां की आबरू बचाने और अपना धर्म बचाने के लिए पाकिस्तान से निकल आए। बहुतों का इस्लाम के नाम पर सबकुछ लूट लिया गया। उनकी मां-बहनों की आबरू, जमीन-जायदात सबकुछ। अब वे वहां मृतप्राय रह गए हैं। शेष जो विरोध में हैं रोज मुश्किल में जी रहे हैं। सरकार सुनती नहीं। हिन्दुओं के पक्ष में आवाज उठा रहे उदारवादियों की कोई बकत नहीं। अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को हिन्दुओं पर अत्याचार दिखता नहीं। इतना ही नहीं भारत की भ्रष्ट सरकार के हुक्मरानों को उनकी फिक्र ही नहीं, क्योंकि वे वोट बैंक नहीं है। भारत सरकार तो पाकिस्तान से जान बचाकर आए हिन्दुओं को भी यहां से भगाने पर तुली नजर आती है। बड़ी विरोधाभासी स्थिति है, एक ओर तो बांग्लादेश से आ रहे लाखों घुसपैठियों के स्वागत में केन्द्र और केन्द्र समर्थित राज्य सरकारें पलक-पांवड़े बिछाकर बैठी हैं वहीं पाकिस्तान से आए गिनती के हिन्दुओं को भारत में जरा-सा ठिया देने में इन्हें कष्ट होता है। बांग्लादेशी और पाकिस्तानी घुसपैठियों के राशनकार्ड और वोटरकार्ड बनवाए जा रहे हैं वहीं हिन्दू शरणार्थियों को लीगल नोटिस थमाए जाते हैं। भारत की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खराब करने में पाकिस्तान कभी नहीं चूकता। बिलावजह या झूठे प्रकरणों में गाहे-बगाहे वह अंतरराष्ट्रीय मंचों से भारत के खिलाफ हमला बोलता रहता है। जबकि भारत वाजिब कारणों पर भी खामोश रहता है। हिन्दुओं की समस्या को लेकर न तो उसने कभी पाकिस्तान सरकार से शिकायत की और न ही अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस मसले को उठाया।
    हाल ही में पाकिस्तान के 'आरी डिजिटल चैनल' पर लाइव धर्मांतरण दिखाया गया। इसमें एक हिन्दू लड़के सुनील से मौलाना मुफ्ती मोहम्मद अकमल ने इस्लाम कबूल करवाया। इससे पहले भी पत्रकारिता को कलंकित करने वाली टीवी एंकर माया खान ने सुनील और वहां उपस्थित अन्य लोगों को बधाई देते हुए कहा कि अब सुनील मोहम्मद अब्दुल्ला के नाम से जाना जाएगा। लाइव धर्म परिवर्तन दिखाने की यह घटना पत्रकारिता को मैला करने की पराकाष्ठा है। चैनल, टीवी एंकर और इस शो की पत्रकारिता जगत में जमकर निंदा की गई। पाकिस्तानी मीडिया ने ही उक्त चैनल, एंकर और सरकार की जमकर खबर ली। पाकिस्तान के अखबार 'डॉन' के संपादकीय में लिखा गया कि सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि चैनल ने एक बार भी नहीं सोचा कि इससे अल्पसंख्यकों (हिन्दुओं) पर क्या प्रभाव पड़ेगा? जिस उत्साह से धर्म परिवर्तन का स्वागत किया गया, बधाइयां दी गईं, उससे साफ होता है कि पाकिस्तान में इस्लाम को जो स्थान प्राप्त है वह अन्य किसी धर्म को नहीं। एक ऐसे देश में जहां अल्पसंख्यकों को पहले से ही दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाता है, इस घटना ने उन्हें और किनारे पर धकेलने का काम किया है। वैसे यह तो सभी जानते हैं कि पाकिस्तान में हिन्दू दोयम दर्जे का ही नहीं चौथे-पांचवे दर्जे का नागरिक समझा जाता है। संभवत: उसे वहां का नागरिक समझा ही नहीं जाता हो।
    इस पूरे प्रकरण में एक बात तबीयत से समझने की है। धर्म परिवर्तन के लाइव शो में मौलाना मुफ्ती मोहम्मद अकमल सुनील से सवाल करता है कि वह इस्लाम क्यों कबूल कर रहा है? इस पर सुनील ऊलझ-ऊलझ कर कहता है कि उसने मानवाधिकार कार्यकर्ता अंसार बर्नी के गैर सरकारी संगठन में काम करने के दौरान इस्लाम कबूल करने का फैसला किया था। सुनील ने कहा - 'दो वर्ष पहले मैंने रमजान में रोजा रखा था। इस्लाम कबूल करने के लिए मुझ पर कोई दबाव नहीं है। मैं अपनी इच्छा से इस्लाम कबूल कर रहा हूं।' सुनील को बकरा बनाकर यह संदेश जानबूझकर दिलवाया गया ताकि जब भी यह बात उठे कि पाकिस्तान में हिन्दुओं का जबरन धर्मांतरण किया जा रहा है तो कहा जा सके यह झूठा आरोप है। हिन्दू अपने धर्म से उकता गए हैं, उन्हें अब जाकर इल्म हुआ है कि इस्लाम ही सबसे बढिय़ा धर्म है। पाकिस्तान के हिन्दू अपनी मर्जी से, पूरे होशोहवास में इस्लाम कबूल रहे हैं। उन पर किसी प्रकार का कोई दबाव नहीं है। वैसे इस बात से भी तो इनकार नहीं किया जा सकता कि सुनील को डांट-डपट कर मुसलमान बनाया गया हो। वह कैमरे के सामने भले ही कह रहा था कि वह अपनी मर्जी से इस्लाम कबूल कर रहा है लेकिन क्या पता कैमरे के पीछे उसके माथे पर बंदूक की नली रखी हो या फिर उसका परिवार तलवार की धार पर बैठा हो। अपनी जान की परवाह आदमी फिर भी नहीं करता लेकिन परिवार के लोगों की आबरू और जिन्दगी पर आन पड़े तब क्या किया जाए? ऐसी स्थिति में वह मजबूर होता है, अपनी अंतरआत्मा के विरुद्ध जाने के लिए। खैर, पाकिस्तान में क्या, कुछ नहीं हो सकता हिन्दुओं के साथ, यह किसी से छिपा नहीं है। शो के प्रसारित होने के बाद पाकिस्तान के हिन्दू धर्मांतरण की घटनाओं में तेजी आने की आशंका जाहिर कर रहे हैं। लाहौर स्थित 'हिन्दू सुधार सभा' के अमरनाथ रंधावा ने चिंता व्यक्त की है कि इस घटना ने हिन्दू समाज में मायूसी फैला दी है। लोग डर रहे हैं कि इस्लामिक गुंडों के हौसले अब और बुलंद हो जाएंगे। मीडिया ने घटिया शो दिखाकर बेहद खराब उदाहरण पेश किया है। इस शो से पाकिस्तान के अल्पसंख्यक (हिन्दू) समुदाय पर दबाव बढ़ा है। रंधावा की चिंता जायज है। पाकिस्तान में हिन्दू पहले से ही दबे-कुचले हैं। किसी भी देश में उपेक्षित समुदाय को दो संस्थाओं से हमेशा न्याय और आसरे की उम्मीद रहती है -न्यायपालिका और मीडिया। जब मीडिया का ही चरित्र ठीक नहीं हो तो पीडि़तों की आवाज कौन बुलंद करेगा। जैसा कि इस लेख की शुरुआत में कहा गया कि हिन्दुओं का बलात धर्मांतरण, हत्या और अपहरण वहां के कट्टरपंथी धड़े के लिए नेकी का काम है। पाकिस्तान की मीडिया का इस तरह का चरित्र देखकर तो डर लगने लगा है कि कहीं मीडिया भी इस 'नेक' काम में शरीक न होने लगा।

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

धरती-धरती चलो चिदंबरम, आसमान की छाती न फाड़ो

 कां ग्रेसनीत यूपीए सरकार की स्थिति दलदल में फंसे उस आदमी की तरह हो गई है, जो दलदल से बाहर निकलने के लिए जितना हाथ-पैर मारता है उतना ही दलदल में भीतर धंसता जाता है। सच को स्वीकार करने की जगह उस पर पर्दा डालने के लिए झूठ, कुतर्क और हास्यास्पद बयान जारी होंगे तो आमजन के अंतर्मन में उबाल आना स्वाभाविक है। अंडरअचीवर प्राइम मिनिस्टर की वकालत करने आए पी. चिदंबरम ने देश के आम आदमी की बेइज्जती करके कांग्रेस को और बुरा फंसा दिया। अब चिदंबरम और पूरी कांग्रेस देश को बरगलाने में लगी है। सलमान खुर्शीद, पी. चिदंबरम सहित तमाम नेता सफाई देते घूम रहे हैं। अपना घर साफ नहीं रख पा रहे गृहमंत्री पी. चिदंबरम क्या खाक मिस्टर क्लीन (?) की रक्षा कर पाते। होम करते ही हाथ जला बैठे। जिस देश की ६० फीसदी जनता दो जून का भोजन (?) जुटाने के लिए दिनभर हाड़ रगड़ती हो, उससे कहा जा रहा है कि वह आइसक्रीम खाकर मौज उड़ा रही है। यह देश की ६० फीसदी से भी अधिक आबादी का मजाक बनाना नहीं तो क्या है? जीवन के लिए हर क्षण संघर्ष कर रहे इस वर्ग को याद भी नहीं होगा कि उन्होंने और उनके बच्चों ने पिछली दफा आइसक्रीम कब खाई थी? संभवत: उन्हें तो यह भी नहीं पता होगा कि कोन वाली आइसक्रीम कौन-सी होती है? शाम की दो रोटी के इंतजाम के लिए जो आदमी सुबह निकलता हो उसके लिए एक किलो चावल पर एक रुपया बढ़ाना बहुत मायने रखता है। इसलिए निवेदन है कि चिदंबरम महाशय धरती-धरती चलो, आसमान की छाती न फाड़ो।
     फ्रांसीसी क्रांति के समय भूख से पीडि़त जनता वर्साय के महल के सामने जुट आई। इस उम्मीद के साथ कि महारानी उनका दर्द समझेंगी और कुछ राहत जनता को देंगी। जनता के प्रतिनिधियों ने महारानी से कहा कि जनता भूखी है। उसके पास खाने को ब्रेड (रोटी) नहीं है। उसकी मदद कीजिए। इस पर महारानी ने कहा कि ब्रेड नहीं है तो क्या हुआ? जनता से कहो कि वह केक खाए। ऐश-ओ-आराम में रह रही महारानी को क्या पता कि महल के बाहर उसके कुप्रबंधन से जनता कैसी मुसीबतें झेल रही है? केक खाने वाली महारानी को क्या पता कि केक जनता की पहुंच के बाहर है। जिस जनता के पास रोटी खरीदने के लिए पैसा न हो वह केक का दाम कहां से चुकाएगी? चिदंबरम का बयान इससे कहीं निचले स्तर का है। फ्रांस की साम्राज्ञी ने तो महल के बाहर की दुनिया देखी ही नहीं थी इसलिए उसे अपनी जनता की यथास्थिति पता नहीं थी। लेकिन, चिदंबरम साहब तो देश की दशा और दिशा से बखूबी वाकिफ हैं। भ्रष्टचार और महंगाई से आजिज आ चुकी जनता दिल्ली में कई बार डेरा डालकर अपने दर्द से भारत सरकार को बावस्ता करा चुकी है। इसके बाद भी गृहमंत्री पी. चिदंबरम कह रहे हैं कि लोग पानी की बॉटल पर १५ रुपए और आइसक्रीम के कोन पर २० रुपए तो खर्च कर सकते हैं लेकिन गेहूं-चावल की कीमत में एक रुपए की बढ़त बर्दाश्त नहीं कर पाते। शायद चिदंबरम भूल गए कि उनकी ही सरकार के निर्देशन में योजना आयोग ने गरीबी का मजाक बनाते हुए आंकड़े पेश किए थे। आयोग के मुताबिक ३२ रुपए रोज पर शहर में और २६ रुपए रोज पर गांव में आदमी आराम से गुजारा कर सकता है। अब चिदंबरम साहब बताएं कि ३२ और २६ रुपए वाला आदमी २० रुपए आइसक्रीम पर कैसे खर्च कर सकता है। हवाई जहाज के बिजिनस क्लास में यात्रा करने वाला नहीं सोच सकता कि ट्रेन के जनरल डिब्बे में भेड़-बकरियों की तरह भरकर यात्रा करने के पीछे क्या मजबूरी हो सकती है। फाइव स्टार होटल में दाल की एक कटोरी के लिए तीन हजार रुपए खर्च करने वाला नहीं सोच सकता कि गेहूं-चावल पर एक रुपए बढऩे पर क्यों गरीब का कलेजा बैठ जाता है। भारत में करीब ४.६२ लाख राशन की उचित मूल्य की दुकानों से लगभग २० करोड़ परिवार को राशन बांटा जाता है। इन २० करोड़ परिवारों को पता है कि गेहूं-चावल का दाम प्रतिकिलो एक रुपए बढ़ाने पर घर के बजट पर क्या असर पड़ता है। उसकी भरपाई के लिए कितने घंटे ओवरटाइम कर हाड़तोड़ मजदूरी कर जीवन खपना पड़ता है। भारत में ४८ फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। इस मामले में भारत दुनिया में १५८वें स्थान पर खड़ा है। हमारे यहां शिशु मृत्यु दर एक हजार पर ५२ है, इससे दुनिया में हमारा १२२वां स्थान है। ये हाल इसलिए हैं कि लोगों के पास अच्छा खाने-पहनने-रहने के लिए पर्याप्त पैसा-साधन नहीं है। अगर सारा देश आइसक्रीम खा रहा होता तो स्थिति इतनी विकराल न होती। कांग्रेस सरकार को चाहिए कि वोट बैंक को साधने की नीतियां बनाना छोड़े और सही मायने में आम आदमी की चिंता करे। उसके विकास की दृष्टि रखकर योजनाएं बनाए। कांग्रेस के वर्तमान हाल को देखकर नहीं लगता कि उसका हाथ आम आदमी के साथ है। सच तो यह है कि इस वक्त कांग्रेस का हाथ आम आदमी के गिरेबां पर है।
       कांग्रेसनीत यूपीए सरकार की आंखें तो भारत की गरीबी के संबंध में वर्ल्ड बैंक के आकंडे देखकर भी नहीं खुलीं। जिसे गरीबों से कोई लेना-देना नहीं हो या अंतिम छोर पर खड़े आदमी के उत्थान की चिंता ही न हो, उस सरकार को इन सबसे क्या फर्क पड़ता है। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट कहती है कि गरीबी रेखा के नीचे जीने वाली आबादी के प्रतिशत के लिहाज से भारत की स्थिति केवल अफ्रीका के सब-सहारा देशों से ही बेहतर है। बैंक ने अनुमान जताया है कि २०१५ तक भारत की एक तिहाई आबादी करीब ६० रुपए प्रतिदिन से कम आय में गुजारा कर रही होगी। यूपीए सरकार की नीतियां देखकर तो वर्ल्ड बैंक के इस दावे से शायद ही कोई इनकार कर सके। वर्ल्ड बैंक की यह रिपोर्ट ग्लोबल इकनॉमिक प्रॉस्पेक्टस फॉर - २००९ शीर्षक से प्रकाशित हुई है। यह रिपोर्ट कांग्रेसनीत यूपीए सरकार की नाकामी को साफ पानी की तरह हमारे सामने रखती है। इधर, टाइम मैगजीन ने भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अंडरअचीवर बताते हुए सरकार की वोट बैंक बढ़ाने वाली नीतियों की जमकर आलोचना की है। टाइम मैगजीन की रिपोर्ट कहती है कि भ्रष्टाचार और घोटालों से घिरी सरकार सुधारों की दिशा में आगे नहीं बढ़ पा रही है। यूपीए के मंत्री-नेता सब वोट बढ़ाने के उपायों में फंसे दिखते हैं। गिरती आर्थिक वृद्धि, बढ़ता घाटा और रुपए की गिरती साख को संभालने में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लाचार रहे हैं। कोयला आवंटन में मनमोहन के हाथ भी काले दिख रहे हैं। मंत्रियों पर प्रधानमंत्री का कोई नियंत्रण नहीं है। यूपीए-१ और यूपीए-२ के आठ साल के कार्यकाल में २जी सहित १५ लाख करोड़ रुपए से अधिक के घोटाले सामने आ चुके हैं। सरकार की नीतियां इतनी लचर हैं कि तीन साल में महंगाई दर १० फीसदी से ऊपर निकल गई है। पेट्रोल और रसोई गैस के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। विकास दर औंधे मुंह पड़ी है। फिलहाल विकास दर ६.५ फीसदी पर स्थिर है, जो पिछले नौ सालों में सबसे कम है। मैगजीन के एशिया अंक के कवर पेज पर प्रकाशित ७९ वर्षीय मनमोहन की तस्वीर के ऊपर शीर्षक दिया गया है - उम्मीद से कम सफल... भारत को चाहिए नई शुरुआत।

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

मार्क्स-लेनिन जाएं भाड़ में


 भा रत से वामपंथ को विदा करने की सही राह पश्चिम बंगाल की तेजतर्रार मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पकड़ी है। ममता ने लम्बे संघर्ष के दौरान पश्चिम बंगाल की जनता को वामपंथ का कलुषित चेहरा दिखाया और उसे पश्चिम बंगाल की सत्ता से बेदखल किया। ममता बनर्जी को साधुवाद है इतिहास की पुस्तकों में से मार्क्स और लेनिन के अध्याय हटाने के लिए। शुक्र की बात यह है कि ममता भारतीय जनता पार्टी की नेता नहीं हैं। वरना हमारे तमाम बुद्धिजीवि और सेक्युलर जमात 'शिक्षा का भगवाकरण-भगवाकरण' चिल्लाने लगते। आखिर हम गांधी, सुभाष, दीनदयाल, अरविन्द, विवेकानन्द, लोहिया और अन्य भारतीय महापुरुषों, चिंतकों और राजनीतिज्ञों की कीमत पर मार्क्स और लेनिन को क्यों पढ़े? हम अपने ही महापुरुषों के बारे में अपने नौनिहालों को नहीं बता पा रहे हैं ऐसे में मार्क्स और लेनिन के पाठ उन पर थोपने का तुक समझ नहीं आता। अगर किसी को मार्क्स और लेनिन को पढऩा ही है तो स्वतंत्र रूप से पढ़े, उन्हें पाठ्यक्रमों में क्यों घुसेड़ा जाए। जबकि वामपंथियों ने यही किया। उन्हें पता है कि शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से अपनी विचारधारा को किस तरह विस्तार दिया जा सकता है। 
       वामपंथियों का मार्क्स, लेनिन और अन्य कम्युनिस्ट नेताओं के प्रति कितना दुराग्रह है इसकी झलक सन् २०११ में त्रिपुरा राज्य में देखने को मिली। यहां की कम्युनिस्ट सरकार ने कक्षा पांच के सिलेबस से सत्य-अंहिसा के पुजारी महात्मा गांधी की जगह घोर कम्युनिस्ट, फासीवादी, जनता पर जबरन कानून लादने वाले लेनिन (ब्लाडिमिर इल्या उल्वानोव) को शामिल किया है। भारतीय संदर्भ में जहां-जहां वामपंथी ताकत में रहे शिक्षा का सत्यानाश होता रहा। शिक्षा व्यवस्था में सेंध लगाकर ये भारतीयों के मानस पर कब्जा करने का षड्यंत्र रचते रहे हैं। केरल के कई उच्च शिक्षित नागरिकों को विश्व शांति का मंत्र देने वाले महात्मा गांधी और अयांकलि के समाज सुधारक श्रीनारायण गुरु सहित अन्य स्वदेशी विचारकों के संदर्भ में उचित जानकारी नहीं होगी। क्योंकि केरल की कम्युनिस्ट पार्टी ने वहां स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रमों में इन्हें स्थान ही नहीं दिया। बल्कि उन्होंने मार्क्सवादी संघर्ष के इतिहास से किताबों के पन्ने काले कर दिए। केरल के ही महात्मा गांधी विश्वविद्यालय के एमए राजनीति विज्ञान के पाठ्यक्रम में भारतीय राजनीतिक विचारधारा में गांधीजी, वीर सावरकर और श्री अरविन्दों को हटाया गया, इनकी जगह मार्क्सवादी नेताओं को रखा गया। पत्रकार और सांसद अरुण शौरी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'एमिनेण्ट हिस्टोरियन्स' में 'शुद्धो-औशुद्धो' के संदर्भ में पश्चिम बंगाल के अध्यादेश का उदाहरण दिया है। यह अध्यादेश १९८९ को हायर सेकण्डरी स्कूलों को जारी किया गया था। इसमें इतिहास की पाठ्य पुस्तकों के लेखकों और प्रकाशकों कहा गया था कि उनके द्वारा प्रकाशित पुस्तक औशुद्ध (गलतियां) हो तो वे आगामी संस्करण में उन्हें ठीक कर लें। एक लम्बी सूची भी दी गई जिसमें बताया गया कि क्या-क्या गलत है और उसमें क्या संसोधन करना है। इस तरह पश्चिम बंगाल ने कम्युनिस्टों ने भारत के इतिहास में मनमाफिक फेरबदल किया। पश्चिम बंगाल में लम्बे समय तक कम्युनिस्ट सरकार रही। इस दौरान उन्होंने जबर्दस्त तरीके से शिक्षा व्यवस्था में घुसपैठ की। इसके चलते पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, केरल के प्राथमिक विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक के अधिकांश शिक्षक, शिक्षक न होकर माकपा के सक्रिय कार्यकर्ता अधिक रहे हैं। वामपंथियों की मंशानुरूप ये शिक्षक इतिहास, भूगोल, साहित्य सहित अन्य विषयों को तोड़-मड़ोरकर प्रस्तुत करते रहे हैं। वामपंथियों ने अपनी थोथी राजनीति की दुकान चलाने के लिए शिक्षा व्यवस्था को तो जार-जार किया ही इसके माध्यम से राष्ट्रीय भावना को भी तार-तार किया। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था में ममता सरकार की ओर से किए जा रहे सार्थक प्रयासों का स्वागत किया जाना चाहिए। वर्षों से कम्युनिस्टों ने जो गड़बडिय़ां की, उन्हें ठीक किया ही जाना चाहिए। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार ने कक्षा ११वी और १२वी के इतिहास के सिलेबस में बदलाव करने का फैसला लिया है। सिलेबस बनाने वाली कमेटी की ओर से तैयार किए गए नए प्रारूप में पुराने अध्यायों को हटाया गया है। हटाए जाने वालों में मार्क्स और लेनिन के अध्याय भी हैं। पाठ्यक्रम तैयार करने वाली कमेटी के चेयरमैन अभिक मजूमदार ने बताया कि इतिहास में ऐसे कई अध्याय हैं जिन्हें किताबों में बेवजह शामिल किया गया था, जबकि इनकी कोई जरूरत नहीं है। इन्हें हटाने की सिफारिश की गई है। उन्होंने कहा कि जब चीन का इतिहास पाठ्यक्रम में शामिल है तो अलग से मार्क्स और लेनिन को पढऩे की जरूरत क्या है? नए प्रारूप में महिला आंदोलन, हरित क्रान्ति और पर्यावरण से जुड़े अध्याय शामिल हैं। मजूमदार ने बताया कि हमने किसी विषय को जबरन थोपने की कोशिश नहीं की है।
       चालाक कम्युनिस्टों ने भारत में मार्क्स, लेनिन व अन्य वामपंथी विचारकों को पढ़ाने में भी ईमानदारी नहीं दिखाई। वामपंथ का पूरा सच भारत के कम्युनिस्टों ने कभी नहीं पढ़ाया। वामपंथ का साफ-सुथरा और लोक-लुभावन चेहरा ही प्रस्तुत किया गया। कम्युनिस्ट मार्क्सवाद के पीछे छिपा अवैज्ञानिकवाद, फासीवाद, अधिनायकवाद, हिंसक चेहरा कभी सामने लेकर नहीं आए। इससे वे हमेशा कन्नी काटते नजर आए। कम्युनिस्टों ने कभी नहीं पढ़ाया या स्वीकार किया कि रूस में लेनिन और स्टालिन, रूमानिया में चासेस्क्यू, पोलैंड में जारू जेलोस्की, हंगरी में ग्रांज, पूर्वी जर्मनी में होनेकर, चेकोस्लोवाकिया में ह्मूसांक, बुल्गारिया में जिकोव और चीन में माओ-त्से-तुंग ने किस तरह नरसंहार मचाया। इन अधिनायकों ने सैनिक शक्ति, यातना-शिविरों और असंख्य व्यक्तियों को देश-निर्वासन करके भारी आतंक का राज स्थापित किया। मार्क्सवादी रूढि़वादिता ने कंबोडिया में पोल पॉट के द्वारा वहां की संस्कृति के विद्वानों मौत के घाट उतार दिया गया। जंगलों और खेतों में उन्हें मार गिराया गया। रूस और मध्य एशिया के गणराज्यों में भी हजारों गिरजाघरों और मस्जिदों को बंद कर दिया गया। स्टालिन के कारनामों से मार्क्सवाद का खूनी चेहरा जग-जाहिर हुआ। हालांकि इन फासीवादी ताकतों को धूल में मिलाने में जनता ने अधिक समय नहीं लगाया। जल्द ही उक्त देशों से कम्युनिज्म उखाड़ फेंका गया। रूस में तो लेनिन और स्टालिन के शवों को बुरी तरह पीटा गया। इतना ही नहीं वहां कि जनता ने उन सब चीजों को बदलने का प्रयास किया जिन पर कम्युनिज्म ने अपना ठप्पा लगा दिया था। इतिहास की पुस्तकों से वे पन्ने निकाल दिए गए, जो कम्युनिस्ट के काले रंग से रंगे थे। सेंट पीटर्सबर्ग नगर कम्युनिस्टों के शासनकाल में 'लेनिनग्राड' हो गया था। कम्युनिज्म के ध्वस्त होते ही लेनिनग्राड वापिस सेंट पीटर्सबर्ग हो गया। भारत में भी कम्युनिस्टों ने समय-समय पर अपना रंग दिखाया है। महात्मा गांधी के आंदोलन भारत छोड़ो के खिलाफ षड्यंत्र किए, अंग्रेजों का साथ दिया, कम्युनिस्टों ने सुभाषचंद्र बोस और आजाद हिन्द फौज के खिलाफ दुष्प्रचार किया, पाकिस्तान बनाने की मांग को वैध करने और भारत में अनेक स्वायत्त राष्ट्र बनाने का समर्थन किया। १९६२ के युद्ध में चीन की तरफदारी की, क्योंकि वहां कम्युनिस्ट सरकार थी। कम्युनिस्टों के लिए सदैव राष्ट्रहित से बढक़र स्वहित रहे हैं। कम्युनिस्टों ने भारत की संस्कृति, राष्ट्रीय चरित्रों, राष्ट्रीय आदर्शों और परम्पराओं से नफरत करना सिखाया। मार्क्स, लेनिन, माओ, फिदेल कास्त्रो, चे ग्वारा  सबके सब उनके लिए आदर्श बने रहे, स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविन्द, महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, डॉ. हेडगेवार सभी बुर्जुआ, पुनरुत्थानवादी कहे जाते रहे। कितनी बेशर्मी से कम्युनिस्ट इस देश में रहकर ही इस देश के महापुरुषों को दरकिनार करते रहे और विदेश से प्रेरणा लेते रहे। ऐसे कम्युनिज्म को तो इस देश से खुरच-खुरच कर बाहर फेंक देना चाहिए।
         जिस कम्युनिज्म की अर्थी उसके जन्म स्थान से ही उठ गई, उसे भारत में दुल्हन की तरह रखा गया। रूस में मार्क्सवाद का प्रारंभ भीषण नरसंहार, नागरिकों की हत्याओं, दमन और सैनिक गतिविधियों से हुआ। १९९१ में इसका अंत व्यापक भ्रष्टाचार, आर्थिक कठिनाइयों और देशव्यापी भुखमरी के रूप में हुआ। ऐसे कम्युनिज्म का भारत में बने रहने का कोई मतलब नहीं है। ममता बनर्जी की तरह औरों को भी आगे आना होगा। साथ ही इस तरह के सुधारों का स्वागत किया जाना चाहिए। इतना ही नहीं अगर किसी भी स्तर पर वामपंथियों की ओर से विरोध जताया जाता है तो उसका सबको मिलकर मुकाबला करना चाहिए।