स्वतंत्रता आंदोलन और आरएसएस : जनांदोलन के आगे नवाब ने घुटने टेके, 1 जून 1949 को भोपाल रियासत का भारत में हुआ विलय
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| भोपाल में स्थिति विलीनीकरण स्मारक : विलीनीकरण शहीद स्मृति द्वार |
हम भारत के लोगों ने स्वतंत्रता के लिए लगभग 1000 वर्ष संघर्ष किया। 15 अगस्त, 1947 को वह दिन आया, जिसके लिए पीढ़ियों ने संघर्ष किया। इसे विडम्बना ही कहेंगे कि एक ओर 15 अगस्त 1947 को पूरा देश स्वतंत्रता का उत्सव मना रहा था, वहीं दूसरी ओर झीलों की नगरी भोपाल पर नवाब की हठधर्मिता का काला साया मंडरा रहा था। नवाब ‘स्वतंत्रता’ का अपहरण कर लेना चाहता था। पाकिस्तान परस्त नवाब हमीदुल्लाह खान ने 24 अगस्त, 1947 को भोपाल को ‘स्वतंत्र देश’ बनाए रखने की घोषणा कर दी। भोपाल की जनता ने नवाब के इस निर्णय का विरोध किया। जिस नवाब ने अपने दिमाग के दरवाजे बंद कर लिए हों, उसे भला लोगों के मन की बात कहाँ सुनायी देती। उसने जनता के विरोध को जूतों तले रौंदने का प्रयास किया। परंतु, नवाब सफल नहीं हो सका क्योंकि भोपाल विलीनीकरण आंदोलन का एक सिरा संघ के स्वयंसेवकों ने भी थाम लिया था। आम जनता के साथ अब संघ के कार्यकर्ता भी इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में आ गए थे। संघ जिस काम को हाथ में लेता है, उसमें सफलता सुनिश्चित रहती ही है।
भोपाल विलीनीकरण आंदोलन के एक प्रमुख चेहरा थे- भाई उद्धवदास मेहता। उनका उल्लेख किए बिना भोपाल विलीनीकरण आंदोलन का स्मरण नहीं किया जा सकता। कई इतिहासकार चतुराई से उनके नामोल्लेख से भी बचते हैं। उसका कारण है कि भोपाल में भाई उद्धवदास मेहता संघ के प्रमुख कार्यकर्ता थे। उन्होंने ही भोपाल में संघकार्य की नींव रखी थी। ऐसे में उनका उल्लेख करने से स्वतंत्रता आंदोलन का श्रेय संघ के खाते में भी जाता है। हालांकि, संघ और उसके कार्यकर्ता श्रेय लेने की होड़ में नहीं रहते। अपना कर्तव्य मानकर ही उन्होंने भोपाल विलीनीकरण आंदोलन में सक्रिय सहभागिता की। जब भोपाल विलीनीकरण के पक्ष में राजनैतिक खींचतान चल रही थी, तब सीहोर में भाई उद्धवदास मेहता के निवास पर, उनकी ही अध्यक्षता में सर्वदलीय बैठक हुई। इस बैठक में सबसे विलीनीकरण आंदोलन चलाने के लिए सर्वसम्मिति से ‘संयुक्त संघर्ष समिति’ का गठन किया, जिसके संयोजन की जिम्मेदारी भी भाईजी को ही दी गई। आंदोलन को गति देने के लिए भाईजी ने भोपाल रियासत के छोटे-बड़े कस्बों में प्रवास किया, वहाँ समितियां गठित कीं।
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| भोपाल विलीनीकरण आंदोलन के प्रमुख नेता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता भाई उद्धवदास मेहता |
इधर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने भी पूरी रियासत में घर-घर जाकर संपर्क करने और गुप्त बैठकों के प्रबंधन का जिम्मा संभाल लिया। कार्यकर्ताओं ने गाँव-गाँव जाकर प्रभात फेरियों और बैठकों के माध्यम से विलीनीकरण का ज्वार पैदा किया। याद रहे कि उस समय महात्मा गांधी की हत्या के आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसलिए स्वयंसेवकों ने ‘हिंदू उत्सव समिति’ और ‘व्यायामशालाओं’ के बैनर तले कार्य करना शुरू किया। गणेशोत्सव और विजयादशमी जैसे त्योहारों को सार्वजनिक रूप से मनाकर आंदोलन की सुलगती आग को पुनः हवा दी गई। अक्टूबर 1948 में इछावर से विलीनीकरण आंदोलन की आधिकारिक घोषणा हुई। इस सभा के प्रबंधन में संघ के प्रचारक श्रीनारायण प्रसाद गुप्ता की भूमिका सूत्रधार की थी। आंदोलन के आह्वान के दो दिन पहले ही प्रशासन ने सभी प्रमुख नेताओं को बंदी बना लिया। लेकिन नवाब यह भूल गया था कि संघ ने इस स्थिति के लिए भी तैयारी कर ली थी। रायसेन और सीहोर में लोग स्वप्रेरणा से निकले और नवाबी पुलिस के सामने तिरंगा लहरा दिया। नवाब प्रशासन ने एक परिपत्र जारी कर इस आंदोलन को ‘साम्प्रदायिक’ और ‘संघ प्रायोजित’ घोषित किया, जो वास्तव में स्वयंसेवकों की सफलता का प्रमाण था।
आंदोलन का दूसरा बड़ा चरण 6 जनवरी 1949 को शुरू हुआ। सीहोर, इछावर और बैरसिया में भीषण लाठीचार्ज हुआ। बरेली में आंदोलनकारियों पर गोली चली, जहाँ दो युवा शहीद हुए। 14 जनवरी को उदयपुरा के बोरास में हुई गोलीबारी में चार और वीर सपूतों ने विलीनीकरण के लिए अपना बलिदान दिया। विलीनीकरण के लिए उठा यह ज्वार और शहीदों का रक्त अंततः दिल्ली तक पहुँचा। लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने कड़ा रुख अपनाया, वीपी मेनन को भोपाल भेजा गया और अंततः नवाब को झुकना पड़ा। 30 अप्रैल 1949 को विलय के समझौते पर हस्ताक्षर हुए और 1 जून 1949 को भोपाल रियासत पूर्णतः भारत का हिस्सा बन गई।
जब हम भोपाल के विलीनीकरण आंदोलन का अध्ययन करते हैं, तब हमें उसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका ‘बीज’ के समान दिखायी देती है। ऐसा बीज जो जमीन के नीचे रहकर खुद को मिटा देता है ताकि संगठन का वृक्ष खड़ा हो सके। आज का भोपाल उन ज्ञात-अज्ञात स्वयंसेवकों का ऋणी है जिन्होंने नवाबी शासन की गोलियों के सामने तिरंगा नहीं झुकने दिया। नवाब के मुखपत्र ‘नदीम’ ने भी बाकायदा स्वीकार किया कि इस जन-आक्रोश के पीछे ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ का हाथ है। यह आंदोलन स्पष्टरूप से भारत की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की रक्षा में संघ के योगदान को रेखांकित करता है।
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| समाचार पत्र 'स्वदेश ज्योति' में 1 जून 2026 को प्रकाशित भोपाल विलीनीकरण आंदोलन पर केंद्रित आलेख |


