संघ शताब्दी वर्ष : आपातकाल के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा कर दिया, लोकतंत्र की बहाली के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया
विश्व में भारतीय लोकतंत्र का उदाहरण दिया जाता है। यह सच है कि दुनिया में सबसे अधिक जीवंत और विशाल लोकतंत्र भारत में ही दिखायी देता है। लोकतंत्र भारत की परंपरा में है, इसलिए उसको जीना और संभालना हमें बखूबी आता है। परंतु, 25 जून 1975 वह दिनांक है, जब भारत के लोकतंत्र पर संकट आ गया था। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार ने देश पर आपातकाल थोप दिया। लोकतंत्र को घसीटकर सींखचों के पीछे डाल दिया गया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पंख नोंच लिए गए। रातों-रात आम नागरिकों के मौलिक अधिकारी समाप्त कर दिए गए। संविधान और लोकतंत्र पर हुए इस हमले का प्रतिकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने आगे बढ़कर किया। श्रीमती गांधी को भी यह ज्ञात था कि लोक संघर्ष समिति के आपातकाल विरोधी जनांदोलन को संगठित रूप से चलाने के पीछे संघ का अनुशासित कार्यकर्ता है। इसलिए उन्होंने 4 जुलाई 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। परंतु, यह प्रतिबंधन संघ के स्वयंसेवकों को आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष एवं सत्याग्रह करने से रोक नहीं सका। संविधान और लोकतंत्र को बचाने के लिए जिस प्रकार आगे बढ़कर संघ के स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह करते हुए पुलिस की बर्बाता का सामना किया, उसे देखकर संघ से असहमति रखनेवाले नेता एवं विचारकर भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुरीद बन गए।









