देखें यह वीडियो : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, प्रचारक जीवन, संघ से जुड़े प्रश्नों एवं दृष्टिकोण पर केन्द्रित वरिष्ठ प्रचारक एवं साहित्यकार श्रीधर पराडकर जी का उपन्यास
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पक्ष एवं प्रतिपक्ष में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। लेकिन ‘तत्त्वमसि’ मुझे बाकी सब पुस्तकों से अलग लगती है। यह एक ऐसा उपन्यास है, जिसका कथानक संघ के प्रचारक को केंद्र में रखकर बुना गया है। ‘तत्त्वमसि’ कथा-साहित्य के माध्यम से संघ की आंतरिक कार्यप्रणाली और दर्शन को प्रस्तुत करने का एक रोचक प्रयास है। वरिष्ठ प्रचारक एवं साहित्यकार श्रीधर पराड़कर का यह उपन्यास प्रचारक जीवन, उसके त्याग और समाज-केंद्रित अध्यात्म को रेखांकित करता है।
उपन्यास का कथानक तीन मुख्य पात्रों के पारस्परिक संवाद और संपर्क के इर्द-गिर्द विकसित होता है। परितोष बाबू- एक समर्पित, शांतचित्त और अनुभवी संघ प्रचारक। सदानंद- प्रचारक जीवन पर शोध कर रहा एक अकादमिक अध्येता। स्नेहल- संघ को समझने और साक्षात्कार लेने आई एक युवा पत्रकार। उपन्यास के पात्र यथार्थवादी और सजीव हैं। परितोष बाबू का चरित्र केवल एक प्रचारक का नहीं, बल्कि समाज के प्रति समर्पित एक मार्गदर्शक का रूप प्रस्तुत करता है। वहीं, सदानंद और स्नेहल उस नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो बिना किसी पूर्वाग्रह के संघ के बारे में तटस्थ जानकारी पाना चाहती है। उपन्यास में इन दोनों पात्रों के माध्यम से समाज, बौद्धिक वर्ग और आलोचकों के मन में उठने वाले स्वाभाविक प्रश्नों को सामने लाया गया है, जैसे- संघ की स्थापना का मूल उद्देश्य क्या है, प्रचारक कौन होते हैं, उनका जीवन संन्यास से कैसे भिन्न है, शाखा में व्यक्ति-निर्माण किस प्रकार होता है? क्या संघ सांप्रदायिक संगठन है? परितोष बाबू इन प्रश्नों का उत्तर तार्किक, सहज और व्यावहारिक ढंग से देते हैं।
संवाद इस उपन्यास का सबसे सशक्त तत्व हैं। संवादों में दार्शनिकता और व्यावहारिकता का संतुलन दिखाई देता है। जब सदानंद पूछता है कि संघ समाज में फैले भ्रमों का निराकरण क्यों नहीं करता, तो परितोष बाबू का यह कथन उपन्यास का वैचारिक मर्म प्रकट करता है- “यदि भ्रम हो तो उसका निराकरण किया जाए। जानबूझकर भ्रम उत्पन्न किए गए हों तो उनका निरसन संभव नहीं है”। वास्तव में यही तो दिखाई देता है। घिसे-पिटे प्रश्नों का कई बार तार्किक उत्तर दिया जा चुका है लेकिन इसके बाद भी कुछ लोग अपने वैचारिक एवं राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए बार-बार उन्हीं प्रश्नों एवं आरोपों को दोहराते रहते हैं। हम सब जानते हैं कि संघ को लेकर पूछे जाने वाले ज्यादातर प्रश्न या आरोप, बेसिर-पैर होते हैं, जो राजनैतिक एवं वैचारिक द्वेष से प्रेरित हैं।
इस उपन्यास की एक और विशेषता यह है कि यह केवल संघ से बाहर के लोगों की जिज्ञासाओं का शमन नहीं करता, बल्कि स्वयंसेवकों एवं प्रचारकों के मन में उठने वाली आशंकाओं का भी समाधान प्रस्तुत करता है। इसलिए कहना होगा कि ‘तत्त्वमसि’ न केवल गैर-संघ पृष्ठभूमि वाले पाठकों और शोधार्थियों के लिए पठनीय एवं विचारोत्तेजक कृति है, बल्कि यह स्वयंसेवकों के लिए भी उतनी ही उपयोगी है। संगठन कार्य के दौरान आने वाली विभिन्न चुनौतियों एवं परिस्थितियों में धैर्य, संयम और सम्यक दृष्टि के साथ कैसे कार्य किया जाए, इसका व्यावहारिक मार्गदर्शन यह उपन्यास देता है।
श्रीधर पराड़कर का स्वयं संघ प्रचारक होना इस कृति को प्रामाणिक और आत्मकथात्मक गहराई प्रदान करता है। उपन्यास की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और परिष्कृत खड़ी बोली हिंदी है। लेखक ने जटिल दार्शनिक और संगठनात्मक विषयों को अत्यंत रोचक कथा-शैली में ढाला है, जिससे पाठक की जिज्ञासा अंत तक बनी रहती है। यह उपन्यास संघ से जुड़े पूर्वाग्रहों को दूर कर उसकी वास्तविक कार्यपद्धति और जीवन-मूल्यों से साक्षात्कार कराता है। संघ के शताब्दी वर्ष के परिप्रेक्ष्य में यह कृति समकालीन हिंदी साहित्य और सामाजिक विमर्श में एक महत्वपूर्ण योगदान सिद्ध होती है। अंत में कहना चाहूँगा कि संघ को समझने में रुचि रखनेवाले लोगों को यह उपन्यास अवश्य ही पढ़ना चाहिए। संघ शताब्दी वर्ष में यह उपन्यास पढ़ना आपको अच्छा अनुभव देगा।
पुस्तक : तत्त्वमसि
लेखक: श्रीधर पराड़कर
विधा: उपन्यास
प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली
पृष्ठ संख्या: 176
मूल्य: ₹350
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| मुम्बई से प्रकाशित मासिक पत्रिका 'हिन्दी विवेक' के सितंबर-2026 के अंक में प्रकाशित आरएसएस प्रचारक श्रीधर पराडकर की पुस्तक 'तत्वमसि' की समीक्षा |




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