राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन की यात्रा पर पहुँचे सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने अमेरिका के बाद कनाडा में भारतीय विचार को दुनिया के सामने रखा है। जिस प्रकार न्यूयॉर्क में उन्होंने दुनिया को शांति और सह-अस्तित्व के साथ चलने की राह दिखायी, उसी प्रकार उन्होंने टोरंटो में भारत के उदात्त विचार को सबके साथ साझा किया। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य जब भू-राजनीतिक तनावों, संकीर्ण राष्ट्रवाद और वैचारिक ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रहा है, तब भारत का विचार ही सही राह दिखा सकता है। प्रारंभ से लेकर आज तक विश्व में भारत की प्रतिष्ठा भी उसके दर्शन को लेकर रही है। कहना होगा कि टोरंटो में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का ‘हिंदू विश्व बंधु’ संबोधन केवल एक सांस्कृतिक व्याख्यान नहीं, बल्कि विश्व शांति के लिए एक अनिवार्य दृष्टि प्रस्तुत करता है। उनका यह कथन कि विविधता एकता की विरोधी नहीं बल्कि उसकी स्वाभाविक और सुंदर अभिव्यक्ति है, भारतीय चिंतन के उस मूल तत्त्व को रेखांकित करता है जिसे आज की खंडित दुनिया को गहराई से समझने की आवश्यकता है। भारतीय मनीषा ने विविधता को कभी संकट या विभाजन के स्रोत के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे एक ही चेतना के बहुरंगी स्वरूप के रूप में स्वीकार और सम्मानित किया है।
इसलिए तो हिन्दू सदा से विश्व बंधु है...
— लोकेन्द्र सिंह (Lokendra Singh) (@lokendra_777) September 3, 2026
No Single language.
No single worship.
Hindus accept all.#HinduVishwaBandhu pic.twitter.com/rqSzXv1MqS
उल्लेखनीय है कि कनाडा सहित संपूर्ण वैश्विक पटल पर एक बार पुन: हिन्दुत्व की वास्तविक अवधारणा को प्रस्तुत करना आवश्यक है। कुछ संकीर्ण किस्म के वैचारिक समूहों ने हिन्दू और हिन्दुत्व को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न करने का अभियान चला रखा है। ऐसे में आवश्यक है कि भारत की ओर से हिन्दुत्व की सच्ची परिभाषा दुनिया के पास पहुँचे। एक समय में यह कार्य स्वामी विवेकानंद ने किया था। शिकागो व्याख्यान में बाद हिन्दू और हिन्दू धर्म को देखने का दुनिया का दृष्टिकोण बदल गया था। उसी प्रकार का प्रयास संघ की ओर से किया जा रहा है। सरसंघचालक जी के टोरंटो में दिए गए भाषण का सबसे व्यावहारिक पहलू व्यक्ति के जीवन-उद्देश्य को सामाजिक और वैश्विक कल्याण से जोड़ना है। मनुष्य को कली से खिलकर सुगंध फैलाने वाले फूल के समान होना चाहिए, जो अपने विकास को केवल व्यक्तिगत स्वार्थ तक सीमित न रखकर पूरे परिवेश को सुरभित करे। व्यक्तिगत सफलता और प्रगति का अंतिम ध्येय जब सेवा बन जाता है, तब समाज में गैर-बराबरी और वैमनस्य के लिए कोई स्थान नहीं बचता।
"जब भी दुनिया को मदद की ज़रूरत पड़ी है, भारत ने बिना मांगे भी आगे बढ़कर हाथ बढ़ाया है।"
— लोकेन्द्र सिंह (Lokendra Singh) (@lokendra_777) September 3, 2026
टोरंटो (कनाडा) में आयोजित 'हिंदू विश्व बंधु' कार्यक्रम में संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत जी का संबोधन।
#HinduVishwaBandhu #MohanBhagwat #Bharat #VasudhaivaKutumbakam #RSS pic.twitter.com/pPJUPHQawk
कनाडा जैसे बहुसांस्कृतिक देश में दिया गया यह संदेश प्रवासी भारतीयों के साथ-साथ समूचे वैश्विक समाज को यह याद दिलाता है कि स्वामित्व के भाव के स्थान पर बंधुत्व के भाव को प्राथमिकता देना ही टिकाऊ शांति का एकमात्र मार्ग है। भारत का यह सनातन दर्शन किसी पर आधिपत्य स्थापित करने का नहीं, बल्कि मानव कल्याण की सामूहिक चेतना को जाग्रत करने का आह्वान है। विश्व यदि आज अशांति और अविश्वास से मुक्ति चाहता है, तो उसे विविधता के सम्मान और निस्वार्थ सेवा के इसी भारतीय मार्ग की ओर लौटना होगा।

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