मंगलवार, 20 जनवरी 2026

रहमान का ‘सांप्रदायिक सुर’

भारत के लोगों ने संगीतकार एआर रहमान को वर्षों बिना किसी भेदभाव के अथाह प्रेम दिया है, जबकि सबको पता है कि रहमान कन्वर्टेड मुसलमान हैं। आज तक किसी ने भी रहमान को लेकर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की है। परंतु, रहमान ने खुद ही स्वयं को लेकर विवाद खड़ा कर लिया है। एक विदेशी मीडिया संस्थान को दिए गए साक्षात्कार में उनका यह कहना कि बॉलीवुड में उन्हें काम न मिलने की वजह ‘सांप्रदायिक’ हो सकती है, बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निराशाजनक है। जिस कलाकार को पूरे देश ने बिना किसी धर्म या जाति के भेदभाव के, आंखों पर बिठाया हो, ऐसी विक्टिम हुड (पीड़ित भाव) की बातें करना उनकी गरिमा के अनुकूल नहीं है। एक प्रकार से कहना होगा कि रहमान के मन में ही कहीं सांप्रदायिक सोच बैठी हुई थी, जो अब जाकर सामने आई है। रहमान जैसे लोगों को इसका जवाब भी देना चाहिए कि अनेक हिन्दू संगीतकार भी बॉलीवुड से बाहर हो चुके हैं, उसका कारण क्या है? क्या उन्हें भी मुस्लिम गिरोहबंदी के कारण काम मिलना बंद हुआ है? भारतीय सिनेमा में मुस्लिम कलाकारों का जिस प्रकार का वर्चस्व है, वह किसी से छिपा नहीं है। इसके बाद भी रहमान हिन्दुओं के माथे पर सांप्रदायिका का लेबल चस्पा करने की कोशिश करे रहे हैं, तो इसे एक प्रकार से बेईमानी ही कहना चाहिए। 

रहमान के विवादित बयान के बाद अनेक साहित्यकारों एवं कलाकारों ने उनकी सोच पर सवाल उठाया है। सुप्रसिद्ध गायक शान ने उचित ही कहा है कि संगीत में कोई ‘अल्पसंख्यक या सांप्रदायिक’ कोण नहीं होता, वहां सिर्फ काम बोलता है। बिना किसी ठोस प्रमाण के इतने गंभीर आरोप लगाना न केवल उद्योग का अपमान है, बल्कि यह समाज में अनावश्यक विभाजन भी पैदा करता है। बांग्लादेश से निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने भी कहा है कि रहमान को सभी धर्मों के लोग प्यार करते हैं और ऐसी बातें करना उन्हें शोभा नहीं देता। उन्होंने शाहरुख खान, आमिर खान और जावेद अख्तर जैसी हस्तियों का उदाहरण देते हुए कहा कि मशहूर और अमीर लोग किसी भी धर्म या जाति के हों, उन्हें बॉलीवुड में काम करने में मुश्किल नहीं आती। सांप्रदायिकता क्या होती है और उसके कारण क्या हाल होते हैं, रहमान को यह देखना है तो उन्हें तस्लीमा नसरीन के जीवन को देखना चाहिए। इस्लामिक सांप्रदायिकता से बचने के लिए उन्हें भारत में शरण लेनी पड़ी है। आज भी बांग्लादेश में सांप्रदायिक आधार पर हिन्दुओं को निशाना बनाया जा रहा है। 

एआर रहमान ने विक्की कौशल अभिनीत फिल्म ‘छावा’ को भी ‘विभाजनकारी’ करार दिया। छत्रपति शंभू राजे के बलिदान पर आधारित फिल्म को विभाजनकारी कहना इतिहास और जनभावनाओं की समझ में कमी को दर्शाता है। एक ऐतिहासिक गाथा को, जो शौर्य का प्रतीक है, उसे सांप्रदायिक चश्मे से देखना एक कलाकार की संकीर्ण दृष्टि का परिचायक है। छावा को वही लोग विभाजनकारी फिल्म बता सकते हैं, जो औरंगजेब के साथ स्वयं को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जोड़ते हैं। 

जब एआर रहमान ने देखा कि उनकी सांप्रदायिक सोच का विरोध सब ओर से हो रहा है, तब उन्होंने इस विवाद से बचकर निकलने के लिए अपनी सफाई में एक वीडियो जारी किया है और कहा है कि उनका इरादा किसी को दु:ख पहुंचाने का नहीं था और भारत उनकी प्रेरणा है। लेकिन सवाल यह है कि एक परिपक्व और वैश्विक स्तर के कलाकार को ऐसे बयानों की आवश्यकता ही क्यों पड़ी? सफाई देने से वे शब्द वापस नहीं हो जाते, जिन्होंने भारत के बहुसंख्यक समाज का अपमान किया है। रहमान जैसे लोगों को यह समझना होगा कि अनावश्यक सांप्रदायिकता की बातें करके उन्होंने भारत की पंथनिरपेक्ष छवि को चोट पहुँचाई है। 

कला का काम दिलों को जोड़ना है। रहमान जैसे संगीतकार को अपनी कला का इस्तेमाल जोड़ने के लिए करना चाहिए, न कि असुरक्षा की भावना से ग्रस्त होकर समाज को बांटने वाले बयान देने के लिए। भविष्य में उनसे उम्मीद की जाती है कि वे अपने सुरों पर ध्यान देंगे, सियासी और विभाजनकारी शोर पर नहीं। भारत का जनमानस ‘सांप्रदायिक’ सोच से बहुत ऊपर है। इसका नवीनतम उदाहरण ‘धुरंधर’ फिल्म का गीत-संगीत है, जिसे बहरीनी रैपरों ने तैयार किया है। अरबी भाषा में लिखे गाने भले ही लोगों को समझ में नहीं आए लेकिन इनकी बीट्स और एनर्जी दर्शकों/श्रोताओं को खूब पसंद आई। भारत के सिनेमाप्रेमियों ने धुरंधर के संगीत को खूब सराहा और प्रेम दिया है। यही भारत के लोगों की पहचान है, वे काम का सम्मान करते हैं, जाति एवं संप्रदाय के आधार पर भेदभाव नहीं करते।

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