सोमवार, 24 अगस्त 2026

रक्षाबंधन : समाज की एकता, समरसता और राष्ट्र-रक्षा का पावन संदेश

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बस्तियों में जाकर वंचित वर्ग के बंधुओं को रक्षासूत्र बाँधकर अपनेपन की भावना को करते हैं प्रकट

भारत में उत्सव की अनूठी परंपरा है। ये उत्सव हमारे समाज को एक सूत्र में पिरोने और जीवन मूल्यों को जगाए रखने का काम करते हैं। हमारे प्रत्येक उत्सव की रचना में समाज के लिए जरूरी संदेश हैं। ऐसा ही एक उत्सव है- रक्षाबंधन, जो हमें सामाजिक समरसता का संदेश देता है। आमतौर पर हम इसे भाई-बहन के पवित्र प्रेम के त्योहार के रूप में जानते हैं, लेकिन इसका वास्तविक विचार इससे कहीं अधिक बड़ा और गहरा है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने रक्षाबंधन को अपने छह उत्सवों में शामिल किया है। संघ ने इस पर्व को संपूर्ण समाज को एकजुट करने, आपस में प्रेम-भाव बढ़ाने और देश की रक्षा का संकल्प लेने वाले महापर्व के रूप में देखा और उसे उसी ढंग से मनाना शुरू किया। यह पर्व हमें सिखाता है कि हम अपने समाज, संस्कृति और मातृभूमि की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहें। संघ ने समाज को स्मरण कराया कि रक्षाबंधन केवल एक धागा बांधने की रस्म नहीं है। हमारे यहाँ संबंधों की नींव विश्वास पर टिकी होती है, और यह धागा उसी विश्वास की डोर है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस तरह एक धागा बिखरे हुए अनगिनत मोतियों को जोड़कर एक सुंदर माला बना देता है, ठीक वैसे ही यह रक्षासूत्र भी समाज के अलग-अलग लोगों को आपस में जोड़कर एक कर देता है। पुराने समय में यह पर्व सिर्फ भाई-बहन तक ही सीमित नहीं था। जब भी समाज या देश पर कोई संकट आता था, तो लोग एक-दूसरे को रक्षासूत्र बांधकर साथ खड़े रहने और मदद करने का भरोसा दिलाते थे। 

अपनी स्थापना के एक वर्ष के भीतर ही आरएसएस ने 1926 में अपना पहला रक्षाबंधन उत्सव मनाया था। नागपुर के तुलसी बाग में आयोजित एक बैठक के स्वरूप में रक्षाबंधन का पहला उत्सव मनाया गया। इस अवसर पर रक्षाबंधन के सामाजिक समरसता के व्यापक स्वरूप पर भी प्रबोधन किया गया। उसके बाद से प्रतिवर्ष संघ में रक्षाबंधन का उत्सव बहुत आत्मीय और व्यापक रूप से मनाया जाता है। इस दिन शाखाओं में स्वयंसेवक सबसे पहले अपने परम पवित्र भगवा ध्वज को रक्षासूत्र बांधते हैं। भगवा ध्वज हमारे देश के त्याग, शौर्य और उच्च सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतीक है। ध्वज को राखी बांधने का मतलब यह संकल्प लेना है कि हम मिलकर अपने समाज के अच्छे मूल्यों, परंपराओं और धर्म की रक्षा करेंगे, क्योंकि जब हम धर्म और समाज की रक्षा करेंगे, तभी वह हम सबकी रक्षा कर सकेगा। इस संबंध में श्री गुरुजी का मानना था कि जब कोई किसी को राखी बांधता है, तो उसका यह कर्तव्य बन जाता है कि वह अपनी जान देकर भी राखी बांधने वाले की रक्षा करे। स्वयंसेवक जब ध्वज को राखी बांधते हैं, तो वे यह तय करते हैं कि वे अपने देश के गौरव को दुनिया में हमेशा ऊँचा रखेंगे। स्वयंसेवक अपने पवित्र ध्वज को राखी बाँधकर यह निश्चय करते हैं कि वे अपने इस ध्वज को सारे संसार में ऊँचा लहराएँगे, जिसका गौरव स्थायी रखने के लिए पूर्वकाल में असंख्य वीरों ने खून बहाया है।

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत को राखी बांधता एक कार्यकर्ता

बस्ती में जाकर रक्षाबंधन मनाते हैं स्वयंसेवक:

भगवा ध्वज को रक्षासूत्र बांधने के बाद सभी स्वयंसेवक एक-दूसरे को स्नेह की डोर बांधते हैं। यहाँ किसी की जाति, भाषा, पैसे या ऊँच-नीच का कोई भेद नहीं होता। यह छोटा-सा धागा सभी को एक परिवार के रूप में बांध देता है। शाखा के कार्यक्रम के बाद स्वयंसेवक अपने आस-पास की उन बस्तियों में जाते हैं, जो वर्षों से उपेक्षित या अभाव में रही हैं। स्वयंसेवक वहाँ रहने वाले परिवारों के बीच बैठते हैं, उन्हें प्यार से रक्षासूत्र बांधते हैं और बंधवाते हैं। स्वयंसेवकों का यह प्रयास समाज में सबको बराबर मानने की सच्ची भावना को जमीन पर उतारता है। रक्षाबंधन उत्सव के इन अनुकरणीय प्रयासों से हिन्दू समाज के अंदर ऐक्य एवं सामरस्य भाव-संचार का गुणात्मक परिवर्तन दिखाई देने लगा है। यह भाव कैसे आता है, इस संबंध में संघ के प्रचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी कहते हैं कि रक्षाबंधन आपसी विश्वास का पर्व है। इस पर्व पर जो-जो सक्षम हैं, वे अन्य को विश्वास दिलाते हैं कि वे निर्भय रहें, किसी भी संकट में वे उनके साथ खड़े रहेंगे। संघ ने इस उत्सव और अपने करोड़ों स्वयंसेवकों के माध्यम से इसी विश्वास को समाज में पुनर्स्थापित करने का श्रेयस्कर कार्य किया है।

आज के समय में रक्षाबंधन का महत्व :

रक्षाबंधन उत्सव पर संघ का अनुकरण करके हम हिन्दू समाज में एकता स्थापित कर सकते हैं। जिस जातीय या वर्ग भेद को उभारकर हिन्दू विरोधी ताकतें हिन्दुओं को एक-दूसरे के विरुद्ध लड़ाने का प्रयास कर रही हैं, उस साजिश को एक झटके में रक्षाबंधन उत्सव समाप्त कर सकता है। हिन्दू समाज के जिन वर्गों को कमतर बताकर उन्हें अलग-थलग करने का प्रयास किया जाता है, तब उनके पास जाकर, उन्हें रक्षासूत्र बांधकर, उनका विश्वास जीता जा सकता है। हिन्दुओं को बाँटने के लिए उठ रहे शोर के बीच रक्षासूत्र बाँधने के लिए आगे बढ़े हाथ का स्पर्श उन्हें अहसास कराएगा कि हम सब एक हैं, हम एक-दूसरे का हाथ थामकर किसी भी परिस्थिति का सामना कर लेंगे। उन्हें लगेगा कि हमें थामने वाले हमारे ही अपने हिन्दू समाज के बंधु हमारे आस-पास खड़े हैं। आरएसएस ने रक्षाबंधन के माध्यम से सीधा और सच्चा संदेश देने का प्रयास किया है कि समाज के आखिरी व्यक्ति तक सुरक्षा, सम्मान और अपनापन पहुँचे। जब हम सब मिलकर एक-दूसरे का हाथ थामेंगे और अपने देश एवं समाज की भलाई के लिए खड़े होंगे, तभी एक सुखी, सशक्त और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण हो सकेगा।

रक्षाबंधन का इतिहास और इसकी पुरानी परंपरा :

प्राचीन समय में हमारे देश में रक्षाबंधन को शिक्षा और ज्ञानार्जन से जोड़कर देखा जाता था। उस जमाने में आज की तरह आने-जाने के साधन नहीं होते थे। गुरुकुल नगरों से दूर शांत जंगलों में बने होते थे। बारिश के दिनों में जब गुरुकुलों में पढ़ाई बंद हो जाती थी, तब गुरु और शिष्य मिलकर श्रावण पूर्णिमा से स्वाध्याय और ज्ञान बढ़ाने के लिए एक बड़ा अनुष्ठान शुरू करते थे, जो कई महीनों तक चलता था। इसलिए रक्षाबंधन को श्रावणी भी कहा जाता है। समय के साथ इस पर्व के मनाने के तौर-तरीकों में भी बदलाव आया। स्कंद पुराण में बताया गया है कि श्रावण पूर्णिमा की सुबह लोग पवित्र सरोवरों और नदियों में स्नान करके नया जनेऊ पहनते थे। इसके बाद ऋषि-मुनियों और पूर्वजों का तर्पण करके राजाओं, मित्रों और यजमानों के हाथों पर रक्षा का पवित्र धागा बांधते हुए उनकी भलाई की कामना करते थे।

पौराणिक कथाओं में रक्षा का संदेश :

रक्षाबंधन से जुड़ी कई प्रसिद्ध कथाएं हमारे ग्रंथों में मिलती हैं, जो इस धागे की शक्ति और महत्व को दर्शाती हैं। भविष्य पुराण की एक कथा के अनुसार, एक बार देवताओं और असुरों के बीच बारह वर्षों तक लंबा युद्ध चला। इस युद्ध में देवताओं की हार होने लगी। दुखी होकर देवराज इंद्र अपने गुरु बृहस्पति के पास गए। वहाँ इंद्र की पत्नी शचि भी मौजूद थीं। इंद्र की परेशानी देखकर उन्होंने कहा कि वे विधिपूर्वक एक रक्षासूत्र तैयार करेंगी, जिसे गुरुदेव से बंधवाकर इंद्र युद्ध में जाएं। इंद्र ने गुरु बृहस्पति से वह रक्षाविधान करवाया और उसकी शक्ति से देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की। महाभारत में भी इसका एक सुंदर प्रसंग आता है। जब भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी शिशुपाल का वध किया, तो सुदर्शन चक्र के लौटने पर श्रीकृष्ण की अंगुली में चोट लग गई और खून बहने लगा। यह देखकर द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर भगवान की अंगुली पर बांध दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने इस स्नेह के बदले द्रौपदी की रक्षा का वचन दिया और जब भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया गया, तब श्रीकृष्ण ने उनकी लाज रखकर उस वचन को निभाया।

एक अन्य कथा में देवी लक्ष्मी ने राजा बलि की कलाई पर पवित्र धागा बांधकर उन्हें अपना भाई माना था और इसके बदले में भगवान विष्णु को अपने साथ वैकुंठ ले जाने का वचन पूरा करवाया था। जब भी पुरोहित अपने यजमानों को रक्षासूत्र बांधते हैं, तो वे वही श्लोक दोहराते हैं जिसमें राजा बलि को बांधे जाने वाले रक्षासूत्र का स्मरण किया जाता है और यह कामना की जाती है कि यह धागा हमेशा रक्षा करे।

देश के अलग-अलग कोनों में रक्षाबंधन के रूप :

  • महाराष्ट्र और समुद्र किनारे के इलाकों में इसे नारियल पूर्णिमा कहते हैं, जहाँ लोग समुद्र देवता को नारियल चढ़ाकर पूजा करते हैं।
  • बुंदेलखंड में इसे कजरी पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है, जहाँ सातों दिन माँ भगवती की पूजा होती है और जौ-धान बोया जाता है।
  • गुजरात में इसे पवित्रोपन और राखी पूर्णिमा के रूप में मनाते हैं।
  • ओडिशा में यह गम्हा पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है, जहाँ खेती-बाड़ी, हल और मवेशियों की पूजा की जाती है।
  • पश्चिम बंगाल में इसे झूलन पूर्णिमा के रूप में राधा-कृष्ण के प्रेम के प्रतीक के तौर पर मनाया जाता है।
  • मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में किसान अपनी पत्नियों के साथ मिलकर धरती माँ और मिट्टी की पूजा करते हैं।
  • दक्षिण भारत के तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में इस दिन उपाकर्म की परंपरा निभाई जाती है और लोग नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं।
  • राजस्थान में भाइयों के साथ-साथ भाभियों की चूड़ियों में भी सुंदर लुम्बा राखी बांधी जाती है।
  • उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा और झारखंड में यह भाई-बहन के अटूट स्नेह और राखी के पारंपरिक रूप में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। नाम भले ही अलग हों, लेकिन इस त्योहार की मूल भावना हर जगह प्रेम और सुरक्षा की ही है।
संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 23 अगस्त, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ 'साधना के सौ वर्ष'

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