खामेनेई की मौत :प्रदर्शन करनेवाले मुसलमानों की निष्ठा कहाँ है?
अमेरिका और इजराइल के हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद मध्य पूर्व में जो भू-राजनीतिक भूचाल आया है, उसकी अनुगूंज भारत के कई हिस्सों में सुनाई दे रही है। लखनऊ से लेकर श्रीनगर तक कई क्षेत्रों में हजारों मुस्लिम प्रदर्शनकारियों का सड़कों पर उतरना, अमेरिका और इजराइल के खिलाफ नारेबाजी करना, एक गहरी चिंता का विषय है। यह प्रदर्शन सवाल उठाता है कि भारत के मुसलमानों की निष्ठा आखिर कहाँ है? ईरान के सुप्रीम खामनेई की मौत के बाद भारत में प्रदर्शनों का क्या औचित्य है? अपने आप को इस्लामिक सत्ता/व्यवस्था से जोड़ने की यह बीमारी आज की नहीं है। खिलाफत आंदोलन को याद कीजिए और उसके उद्देश्य का विश्लेषण कीजिए। आखिर क्यों भारत के मुसलमानों ने खिलाफत आंदोलन चलाया था? क्या उसका कोई संबंध भारत की स्वतंत्रता से था?
आज से आठ दशक पूर्व संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जिस कड़वे सच की ओर देश का ध्यान आकृष्ट किया था, वह आज पूरी तरह प्रासंगिक नजर आता है। उन्होंने स्पष्ट लिखा था कि मुसलमानों की निष्ठा उस देश के प्रति नहीं होती जहाँ वे रहते हैं, बल्कि उस सांप्रदायिक विश्वास पर निर्भर करती है जिसका वे हिस्सा हैं। लखनऊ से लेकर जम्मू-कश्मीर की सड़कों पर उतरकर मातम मनाने वाली भीड़ और खामेनेई को शहीद का दर्जा देने की कवायद, इसी मानसिकता का साक्षात प्रमाण है।
भारत के लोगों ने संगीतकार एआर रहमान को वर्षों बिना किसी भेदभाव के अथाह प्रेम दिया है, जबकि सबको पता है कि रहमान कन्वर्टेड मुसलमान हैं। आज तक किसी ने भी रहमान को लेकर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की है। परंतु, रहमान ने खुद ही स्वयं को लेकर विवाद खड़ा कर लिया है। एक विदेशी मीडिया संस्थान को दिए गए साक्षात्कार में उनका यह कहना कि बॉलीवुड में उन्हें काम न मिलने की वजह ‘सांप्रदायिक’ हो सकती है, बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निराशाजनक है। जिस कलाकार को पूरे देश ने बिना किसी धर्म या जाति के भेदभाव के, आंखों पर बिठाया हो, ऐसी विक्टिम हुड (पीड़ित भाव) की बातें करना उनकी गरिमा के अनुकूल नहीं है। एक प्रकार से कहना होगा कि रहमान के मन में ही कहीं सांप्रदायिक सोच बैठी हुई थी, जो अब जाकर सामने आई है। रहमान जैसे लोगों को इसका जवाब भी देना चाहिए कि अनेक हिन्दू संगीतकार भी बॉलीवुड से बाहर हो चुके हैं, उसका कारण क्या है? क्या उन्हें भी मुस्लिम गिरोहबंदी के कारण काम मिलना बंद हुआ है? भारतीय सिनेमा में मुस्लिम कलाकारों का जिस प्रकार का वर्चस्व है, वह किसी से छिपा नहीं है। इसके बाद भी रहमान हिन्दुओं के माथे पर सांप्रदायिका का लेबल चस्पा करने की कोशिश करे रहे हैं, तो इसे एक प्रकार से बेईमानी ही कहना चाहिए।
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में तृणमूल कांग्रेस के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने कथित तौर पर बाबरी मस्जिद की नींव रखकर ‘बाबर की औलादों’ को जिंदा कर दिया है। अब तहरीक मुस्लिम शब्बन नाम के संगठन ने ग्रेटर हैदराबाद में बाबरी स्मारक बनाने का ऐलान किया है। ये घटनाएं केवल अपने मत-संप्रदाय के प्रति अपना विश्वास प्रकट करने का विषय नहीं है, बल्कि देश की न्यायिक व्यवस्था, सांप्रदायिक सौहार्द और संवैधानिक मूल्यों को चुनौती देने की कोशिश के तौर पर इन्हें देखना चाहिए। यह एक प्रकार से अलगाववादी सोच है, जो पहले भी भारत का विभाजन करा चुकी है। यह सोच इसलिए और भी अधिक खतरनाक दिखायी दे रही है क्योंकि ये किसी सिरफिरे कट्टरपंथियों की घोषणा मात्र नहीं है, अपितु इस विचार के पीछे मुसलमानों की अच्छी-खासी भीड़ भी खड़ी दिखायी दे रही है। कथित बाबरी मस्जिद की नींव रखने के लिए जिस तरह सिर पर ईंटें ढोकर लाते मुसलमानों की भीड़ दिखायी दी, उसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर’ के नारों के बीच लाखों समर्थकों का जुटना और बाबरी मस्जिद के निर्माण की बात दोहराना, साफ तौर पर मुस्लिम समुदाय की सांप्रदायिक लामबंदी को स्पष्टतौर पर रेखांकित करता है।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की शोध रिपोर्ट ‘दिल्ली में अवैध अप्रवासी : सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिणामों का विश्लेषण’ को गंभीरता से देखने की आवश्यकता है। यह रिपोर्ट जनसांख्यकीय असंतुलन के भयावह परिणामों की ओर से संकेत करती है। अवैध अप्रवासियों से न केवल सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां उत्पन्न होती हैं, अपितु लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी खतरा उत्पन्न हो जाता है। जेएनयू की रिपोर्ट बताती है कि बांग्लादेश और म्यांमार से रोहिंग्या सहित अन्य मुस्लिम आबादी बड़ी संख्या में घुसपैठ करके दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों में बस गई है। इसके कारण दिल्ली की डेमोग्राफी में बदलाव आया है, जो दिल्ली आज से 10-15 साल पहले हुआ करती थी, आज नहीं है। अवैध अप्रवासियों के कारण अर्थव्यवस्था बर्बाद हो रही है। संसाधनों पर भी दबाव बढ़ा है। स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था पर भी असर पड़ा है। जो मजदूर वर्ग कल तक हरियाणा, पूर्वांचल, ओडिशा, केरल के लोग होते थे, वे अब रोहिंग्या हैं। इन अवैध घुसपैठियों के कारण भारतीय नागरिकों से मजदूरी सहित अन्य काम छिन गया है।
भारत में सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने में अपने आप को सेकुलर एवं प्रगतिशील कहनेवाले वर्ग की प्रमुख भूमिका है। जिस प्रकार से एक-दो घटनाओं को आधार बनाकर हिन्दू समाज के प्रति अभियान चलाए जाते हैं और मुस्लिम समाज को भड़काने एवं हिन्दुओं के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयास किए जाते हैं, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि वास्तव में सेकुलर वर्ग ही सांप्रदायिक है। सेकुलर बिरादरी के कारण जिस प्रकार का नकारात्मक वातावरण बना है, उसके कारण से हिन्दुओं पर लगातार हमले बढ़ रहे हैं। अभी हाल में उत्तरप्रदेश के बरेली जिले के गाँव गौसगंज में मुस्लिम समुदाय ने हिन्दू समुदाय पर पथराव कर दिया, लोगों को घेरकर पीटा गया और तोड़फोड़ की गई। असामाजिक तत्वों की यह भीड़ गाँव के युवक तेजराम को घसीटकर मस्जिद में ले गए और वहाँ उसकी पीट-पीटकर हत्या कर दी। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि समूचा सेकुलर वर्ग तेजराम की मॉब लिंचिंग पर मुंह में दही जमाकर बैठा हुआ है।
अखलाक की मौत की बात सारी दुनिया में हुई और लेफ्ट मीडिया ने भारत को लिंचिस्तान घोषित कर दिया। लेकिन तेजाराम को मस्जिद में लिंच करके मार दिया गया, पर इसके चर्चे कहीं नहीं हुए pic.twitter.com/NecSziTeLb
आखिर क्या कारण हैं कि मुस्लिम बंधुओं के साथ होनेवाली ऐसी ही घटना पर हो-हल्ला मचानेवाले हिन्दुओं की मॉब लिंचिंग पर खामोशी की चादर ओढ़ लेते हैं? जिस समय में मुस्लिम भीड़ मस्जिद में तेजराम की पीट-पीटकर हत्या कर रही थी, उसी वक्त यह सेकुलर वर्ग कांवड़ियों द्वारा तोड़-फोड़ की एक-दो घटनाओं को आधार बनाकर समूचे कांवड़ियों और हिन्दुओं को बदनाम करने में लगे हुए हैं। यह किस तरह का चयनित दृष्टिकोण है? इसे सेकुलर बिरादरी के लेखकों एवं पत्रकारों का दोगला आचरण क्यों नहीं माना जाना चाहिए? इसे सांप्रदायिकता का पोषण करनेवाली प्रवृत्ति क्यों नहीं मानी जानी चाहिए?
बेंगलुरू का दंगा यह समझाने के लिए पर्याप्त है कि वास्तव में असहिष्णुता, सांप्रदायिकता और कट्टरता क्या है? एक फेसबुक पोस्ट पर इतना आतंक? जबकि उसका विरोध करने के और भी तरीके थे। मुस्लिम समुदाय को कांग्रेस विधायक एवं दलित नेता श्रीनिवास मूर्ति के भतीजे नवीन की आपत्तिजनक टिप्पणी की शिकायत पुलिस में करनी चाहिए थी। पुलिस अपना काम करती लेकिन चिंता की बात तो यह है कि पुलिस में शिकायत करने की जगह यहाँ तो पुलिस पर ही हमला कर दिया गया। अब तक सामने आई जानकारी के मुताबिक 60 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हैं। दिल्ली के दंगों में भी हमने देखा कि आईबी के अधिकारी तक को कई बार चाकू घोंप कर मार दिया गया था। यह किस तरह की कट्टरता पनप रही है। इस ओर समाज के प्रबुद्ध वर्ग को और शासन-प्रशासन को गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है।
बेंगलुरू दंगा पहला उदाहरण नहीं है इसलिए इस बात पर संदेह है कि इसके बाद भी हम कोई सबक लेंगे? क्योंकि देश में कथित बुद्धिजीवियों एवं पत्रकारों का एक वर्ग ऐसा है जिसकी पूरी कोशिश यह रहती है कि इस प्रकार के सांप्रदायिक दंगों की अनदेखी करने या इन्हें जायज ठहराने के लिए हिंदू समाज को ही असहिष्णु और सांप्रदायिक ठहरा दिया जाए। पिछले कुछ वर्षों में यह तीव्र गति से हुआ है। बाकायदा प्रगतिशील बुद्धिजीवी वर्र्ग ने हिंदू समाज को बदनाम करने के लिए संगठित आंदोलन चलाया। लेकिन, इस तरह के आंदोलनों से न तो झूठ को सच बनाया जा सकता है और न ही सच को छिपाया जा सकता है। हकीकत तो दिल्ली-बेंगलुरू और शाहीन बाग की तरह बार-बार हमारे सामने आकर खड़ी हो जाती है।
हैदराबाद के मुस्लिम नेता ओवैसी के भाई ने श्रीराम, माता सीता, कौशल्या और दशरथ के प्रति कितनी अभद्र बातें सार्वजनिक मंच से कहीं थीं, लेकिन इसके बाद भी हिंदू समाज ने जो धैर्य दिखाया, उससे मुस्लिम समाज को सीखने की आवश्यकता है। दुर्भाग्य की बात है कि मुस्लिम समाज के झंडाबरदार कभी इन सब बातों के विरोध में सड़क पर नहीं उतरते। सड़क पर छोडि़ए, एक बयान भी जारी नहीं करते हैं। मुस्लिम समाज को अपनी धार्मिक कट्टरता से बाहर आना होगा। एक और महत्वपूर्ण बात उन्हें सीखनी चाहिए कि जैसा व्यवहार वह अपने लिए चाहते हैं, वैसा आचरण उन्हें दूसरों के प्रति भी रखना होगा।
श्रीराम मंदिर के भूमिपूजन के बाद जिस तरह की प्रतिक्रियाएं मुस्लिम समाज से आईं हैं, उसकी ही परिणति है बेंगलुरू दंगा। मुसलमानों के बड़े नेताओं, यहाँ तक कि आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड और आल इंडिया इमाम संघ जैसे संगठन खुलेआम कट्टरता फैलाते हैं, दंगे जैसी स्थितियां बनाते हैं। श्रीराम मंदिर के संदर्भ में हागिया सोफिया का उदाहरण देना और यह कहना कि एक दिन राम मंदिर को तोड़ कर वहाँ मस्जिद बना देंगे, क्या इससे मुस्लिम समाज में भाईचारे की भावना पैदा होगी? क्या इससे भारत के कानून के प्रति सम्मान पैदा होगा? जिन संगठनों को अमन-चैन कायम करने में अपनी भूमिका का निर्वहन करना चाहिए, वे ही लोगों को भड़का रहे हैं। ऐसी संस्थाओं पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
बेंगलुरू का दंगा कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं है। बल्कि यह उस मानसिकता का प्रकटीकरण है, जिसे धीरे-धीरे समाज में बोया जाता है। जरा सोचिए कि कैसे अचानक से हजारों की हिंसक भीड़ इकट्ठी हो जाती है? भीड़ की तैयारी देखकर तो यही लग रहा है कि दंगे की तैयारी पहले से थी, बस कारण की प्रतीक्षा थी। वह अवसर मिला कांग्रेस के दलित नेता के भतीजे नवीन द्वारा सोशल मीडिया पर पैगम्बर मुहम्मद को लेकर कथित अपमानजनक पोस्ट शेयर करने पर। जरा उन ठेकेदारों को भी विचार करना चाहिए जो हिंदू समाज को बांटने के लिए ‘भीम-मीम’ का नारा बुलंद करते हैं। इस घटना पर कांग्रेस, वामपंथी और दलितों की राजनीति करने वाले राजनीतिक एवं गैर-राजनीतिक संगठनों ने बहुत ही धीरे स्वर में प्रतिक्रिया दी है।
हमारा यह जो दोहरा आचरण है, यह ही इस सांप्रदायिकता के मजबूत होने के लिए जिम्मेदार है। इस तरह की कोई भी घटना हो, किसी भी समुदाय की ओर से की गई हो, उसका एक ही मजबूत स्वर में विरोध होना चाहिए। कर्नाटक सरकार को दंगाईयों के विरोध कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। उत्तरप्रदेश सरकार की नीति का पालन करते हुए सार्वजनिक नुकसान की भरपाई दंगाईयों की संपत्ति कुर्क करके की जाए। इस सांप्रदायिकता को रोकने के लिए एक ओर सरकार को कड़े कदम उठाने होंगे, वहीं दूसरी ओर समाज को भी जागरूक होकर सांप्रदायिकता के प्रति एकजुट होना होगा।
डॉ. वंदना गांधी समाजशास्त्र की शिक्षिका हैं। समाज में चल रही गतिविधियों और उनके पीछे के एजेंडे को वह बहुत बारीक से समझती हैं। जब उन्होंने प्रेम की आड़ में चल रहे 'लव जिहाद' की नब्ज टटोलने की कोशिश की तो उनका सामना ऐसे सच से पड़ा, जो बहुत डरावना है। अपने कहानी संग्रह 'एक मुखौटा ऐसा भी' में उन्होंने 15 सच्ची कहानियों के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि कैसे प्रेम का मुखौटा लगा कर हिंदू युवतियों को निशाना बनाया जा रहा है। उनका जीवन बर्बाद किया जा रहा है। इनमें छह कहानियां मध्यप्रदेश की हैं और शेष भारत के विभिन्न हिस्सों से ली गई हैं। लेखिका का कहना है कि वह कई परिवारों और पीडि़त युवतियों से प्रत्यक्ष मिली हैं और उनके दर्द को समझने का प्रयास किया है।
धरती पर सबसे अधिक पवित्र कुछ है तो वह प्रेम है। प्रेम के सभी रूप मनुष्य के जीवन को सुंदर बनाते हैं। यह शाश्वत सत्य है कि जिसको किसी प्रकार जीतना संभव न हो, उसे प्रेम जीता जा सकता है। प्रेम में एक-दूसरे पर अटूट भरोसा हो जाता है। इस अटूट भरोसे के कारण ही कई बार प्रेम के मुखौटे के पीछे छिपी घिनौनी सूरत को हम देख नहीं पाते हैं। जब यह मुखौटा हटता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। कहानीकार डॉ. वंदना गांधी की पुस्तक निश्चित ही बहुत देर होने से पहले ऐसे घिनौने चेहरों से मुखौटे नौंचने का कार्य करेगी। उनकी यह पुस्तक हिंदू युवतियों को सावधान करती है कि उन्हें जरा एक बार अच्छे से पड़ताल करनी चाहिए कि वह जिसे प्रेम समझ रही हैं, वह वास्तव में प्रेम ही है या कुछ और।
डॉ. वंदना गांधी की यह कहानियां बताती है कि यह सिर्फ प्रेम में धोखे की दास्तां मात्र नहीं है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को छिन्न करने वाला पूरा एक षड्यंत्र है। अब यह कोई छिपा हुआ षड्यंत्र नहीं है कि हिंदू युवतियों का धर्मांतरण करने के लिए सुनियोजित ढंग से 'लव जिहाद' शुरू किया गया है। तथाकथित प्रगतिशील बंधु इसे भाजपा और आरएसएस का राजनीतिक एजेंडा कह कर खारिज कर सकता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा या आरएसएस से भी पहले 'लव जिहाद' शब्द का उपयोग वर्ष 2009 में न्यायमूर्ति केटी शंकरन ने किया था। केरल हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति केटी शंकरन ने मुस्लिम लड़के और हिंदू युवती की शादी के मामले की सुनवाई करते समय कहा था कि देश में लव जिहाद चल रहा है। बाद में, केरल से चर्चा में आए लव जिहाद के मामले देश के कई हिस्सों से भी सामने आए, जो स्पष्टतौर पर न्यायमूर्ति केटी शंकरन के कहे को सत्य सिद्ध करते हैं। यह पुस्तक भी लव जिहाद की ऐसी कहानियां का संग्रह है। पुस्तक यह स्पष्ट करती है कि यह किसी का राजनीतिक एजेंडा हो या न हो, किंतु यह एक सामाजिक संकट जरूर है। इस पर राजनीतिक बहस कम और सामाजिक दृष्टि से विमर्श अधिक होना चाहिए।
मुस्लिम समाज भी कोरी कल्पना कह कर 'लव जिहाद' नकार नहीं सकता। यथार्थ में क्या है? यह भी मुस्लिम समाज को देखना होगा। घटनाएं और मुस्लिम समाज का व्यवहार तो यही बयां करता है कि मुस्लिम समाज का कट्टरपंथी धड़ा 'लव जिहाद' की अवधारणा पर काम तो कर रहा है। वरना क्या कारण है कि मुस्लिम युवक से विवाह करने वाली प्रत्येक लड़की को इस्लाम कबूल करना पड़ता है? मुस्लिम लड़का क्यों नहीं हिंदू धर्म अपनाता? यह कैसा प्रेम है कि हिंदू लड़की को ही अपने धर्म का त्याग करना पड़ता है? हिंदू लड़की के सामने इस्लाम अपनाने के अलावा कोई रास्ता नहीं छोडऩा, लव जिहाद नहीं तो क्या है? यह तो स्पष्टतौर पर धर्मांतरण का तरीका है। ज्यादातर मामलों में यह भी देखने में आता है कि युवक अपनी मजहबी पहचान छिपा कर हिंदू लड़की से मुलाकात बढ़ाता है। झूठ की बुनियाद पर बनाया गया संबंध प्रेम कतई नहीं हो सकता।
पुस्तक 'एक मुखौटा ऐसा भी' निश्चित तौर पर अपने उद्देश्य को पूरा करने में सफल होगी। एक षड्यंत्र के विरुद्ध जागरूकता लाने में यह पुस्तक सहायक सिद्ध होगी। डॉ. गांधी कहती हैं कि लव जिहाद की खौफनाक हकीकत सामने लाकर उन्हें बहुत संतोष है। यह किताब कॉलेज छात्राओं के लिए गीता साबित होगी। हर युवती को इस किताब को जरूर पढऩा चाहिए। अर्चना प्रकाशन को साधुवाद कि उसने ऐसे विषय पर पुस्तक प्रकाशित करने का साहस दिखाया, जिस पर दुर्भाग्यपूर्ण राजनीति हो रही है। इस संबंध में अर्चना प्रकाशन के ट्रस्टी ओमप्रकाश गुप्ता कहते हैं कि लव जेहाद की सच्ची घटनाओं पर देश में यह पहली किताब है। इस किताब में उन युवतियों की पीड़ा को उजागर किया गया है, जो गलत कदम उठाने के बाद अब पछता रहीं हैं। दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में विमोचित इस कृति ने पर्याप्त चर्चा प्राप्त की है।
पुस्तक : एक मुखौटा ऐसा भी (लव जिहाद पर केंद्रित कहानी संग्रह)
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान अपने मुल्क के वास्तविक चरित्र पर पर्दा डालने के लिए अनेक प्रयास कर रहे हैंं। धार्मिक कट्टरवाद और आतंकियों की शरणस्थली की पहचान से बाहर निकलना पाकिस्तान की मजबूरी भी बन गई है। इस संदर्भ में उन्होंने पिछले दिनों अल्पसंख्यकों को समानता का अधिकार देने का दावा किया था। उन्होंने दुनिया को यह भरोसा दिलाने का प्रयास किया था कि यह नया पाकिस्तान है, जहाँ सबको स्वतंत्रता एवं समानता का अवसर मिलेगा। अब भला इमरान खान को कौन बताए कि बातें करने से 'नया पाकिस्तान' नहीं बनेगा। उसके लिए सामर्थ्य दिखाना पड़ेगा, आतंकी और चरमपंथी ताकतों से लडऩा पड़ेगा। कट्टर सोच को कुचलना पड़ेगा। यह सब करने का माद्दा इमरान खान में नहीं है। वह सिर्फ गाल बजा सकते हैं। हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार से अल्पसंख्यकों को समानता का अधिकार देने के दावे की पोल अपनेआप ही खुल जाती है। सिंध प्रांत में होली के दिन हिंदू परिवार की दो नाबालिग बेटियों को अगवा कर लिया जाता है, उनका कन्वर्जन किया जाता है और जबरन शादी करा दी जाती है। किंतु, इमरान खान के नये पाकिस्तान का पुलिस प्रशासन सोया रहता है। इतने जघन्य अपराध की शिकायत दर्ज कराने के लिए भी हिंदुओं को एकजुट होकर प्रदर्शन करना पड़ता है।
भारतीय सिनेमा के वरिष्ठ अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने अपने विवादित बयान से एक बार फिर असहिष्णुता की बहस को जिंदा कर दिया है। एक ओर नसीर कह रहे हैं कि उन्हें भारत में डर लगता है, वहीं पाकिस्तान में यातनाएं झेल कर भारत सरकार के प्रयास से वापस लौटे हामिद नेहाल अंसारी अपने देश में सुकून महसूस कर रहे हैं। अब कौन सही है, नसीर साहब या हामिद? नसीरुद्दीन को इस देश ने बहुत सम्मान और प्रसिद्धि दी है। यह देश उनकी कला का प्रशंसक है। किंतु, नसीर अपने देश को क्या लौटा रहे हैं? आज कुछेक घटनाओं को आधार बना कर नसीर कह रहे हैं- 'मैं अपने बच्चों के लिए चिंतित हूं क्योंकि कल को अगर भीड़ उन्हें घेरकर पूछती है कि तुम हिंदू हो या मुसलमान? तो उनके पास इसका कोई जवाब नहीं होगा। यह मुझे चिंतित करता है और मैं हालात को जल्द सुधरते हुए नहीं पा रहा हूं।' उन्हें यह डर तब क्यों नहीं लगता, जब जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पंडितों को चिह्नित कर के मारा और भगाया गया। उन्हें यह डर तब क्यों नहीं लगता, जब कैराना से हिंदुओं का पलायन कराया जाता है? नसीर साहब दुनिया देखती है कि वह भीड़ कौन-सी है जो घेर कर धर्म पूछती है और कुरान की आयत नहीं सुनाने वालों को गोलियों से भून देती है। शुक्र है कि आपके बच्चों को कुरान की आयतें तो याद हैं। जब उन्हें भीड़ घेरेगी तो आयतें सुनाकर वह जान बचा लेंगे, लेकिन उनका क्या होगा जिन्हें रामायण की चौपाई और गीता के श्लोक याद हैं?
गौरक्षा के नाम पर पिछले समय में हुई कुछ हिंसक घटनाओं पर देश का तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग एवं मीडिया काफी मुखर रहा है। रहना भी चाहिए। संविधान एवं कानून के दायरे से बाहर जाकर गौरक्षा हो भी नहीं सकती। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं भी गौरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा का विरोध कर चुके हैं। इसके बाद भी कथित बुद्धिजीवी एवं पत्रकारों ने हिंसा की घटनाओं को आधार बना कर गौरक्षा जैसे पुनीत कार्य और सभी गौरक्षकों को लांछित करने का प्रयास किया है। इसके लिए वह असहिष्णुता, मॉबलिंचिंग और नॉटइनमायनेम जैसी मुहिम चला चुके हैं। परंतु, उनकी प्रत्येक मुहिम संदेहास्पद रही है। उनके प्रत्येक आंदोलन का उद्देश्य और एजेंडा भेदभावपूर्ण रहा है, इसलिए उन्हें सफलता नहीं मिली।
कश्मीरी पंडितों को उनकी भूमि और न्याय दिलाये बिना, रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने के लिए सरकार पर दबाव बनाना, अपने लोगों के साथ बेईमानी है. ये लोग वर्षों से तम्बू में सो रहे हैं, पहले इनके लिए आवाज़ बुलंद करो.
यह सुखद है कि राष्ट्रहित में वर्तमान सरकार कठोर कदम उठाने में हिचकिचाती नहीं है। पूर्ववर्ती सरकारें प्रत्येक मामले को पहले वोट की तराजू पर तोलती थीं और उस वजन के आधार पर निर्णय करती थीं। जबकि वर्तमान सरकार ने अनेक अवसरों पर अपने निर्णयों से बताया है कि उसके लिए राष्ट्रहित सबसे पहले है। रोहिंग्या शरणार्थियों के मुद्दे पर भी सरकार ने अनेक प्रकार की आलोचनाओं की चिंता न करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपना स्पष्ट पक्ष रखा है। केंद्र सरकार ने बीते सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय से रोहिंग्या मुद्दे पर हस्तक्षेप न करने का आग्रह करते हुए कहा कि उन्हें प्रत्यर्पित करने का निर्णय सरकार का नीतिगत फैसला है। केंद्र सरकार ने बिना लाग-लपेट के कह दिया है कि उनमें से कुछ का संबंध पाकिस्तानी आतंकवादी गुटों से है।
शीर्ष न्यायालय रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमार वापस भेजने के केंद्र के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने जब इस मुद्दे पर सरकार का पक्ष जानना चाहा, तब केंद्र सरकार ने अपना उक्त पक्ष रखा और कहा कि यह देश हित में लिया गया एक 'आवश्यक कार्यकारी' फैसला है। केंद्र सरकार का कहना गलत नहीं है कि कई रोहिंग्या मुसलमानों का संबंध आतंकवादी समूहों से है। ऐसे अनेक मामले सामने आ चुके हैं। घोर शांतिप्रिय बौद्ध बाहुल्य देश म्यांमार में रोहिंग्या समुदाय को लेकर जिस प्रकार का वातावरण बना है, वह भी इस ओर इशारा करता है। शरणार्थियों को आश्रय नहीं देने और संप्रग सरकार के समय में आ चुके रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस भेजने के सरकार के निर्णय की आलोचना करने से पहले हमें यह विचार जरूर करना चाहिए कि आखिर वह कौन-से कारण हैं कि इस्लामिक देश भी रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने के लिए तैयार नहीं है।
निवर्तमान उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी जाते-जाते ऐसी बातें कह गए, जो संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को नहीं कहनी चाहिए थी और यदि कहना जरूरी ही था तो कम से कम उस ढंग से नहीं कहना था, जिस अंदाज में उन्होंने कहा। असहिष्णुता के मुद्दे पर किस प्रकार 'बड़ी और गंभीर' बात कहना, इसके लिए उन्हें पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के भाषणों को सुनना/पढऩा चाहिए था। असहिष्णुता के मुद्दे पर पूर्व राष्ट्रपति मुखर्जी ने भी अनेक अवसर पर अपनी बात रखी, लेकिन उनकी बात में अलगाव का भाव कभी नहीं दिखा। जबकि हामिद साहब के अतार्किक बयान के बाद उपजा विवाद बता रहा है कि उनके कथन से देश को बुरा लगा है। यकीनन जब कोई झूठा आरोप लगाता है तब बुरा तो लगता ही है, गुस्सा भी आता है। राज्यसभा टीवी को दिए साक्षात्कार को देख-सुन कर सामान्य व्यक्ति को भी यह समझने में मुश्किल हो रही है कि आखिर किस दृष्टिकोण से भारत में मुस्लिम असुरक्षित हैं। जब भी किसी ने मुस्लिमों के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणी की है, तब उसके विरोध में सबसे अधिक आवाज देश के बहुसंख्यक समाज की ओर से उठी हैं। मुसलमान भी किसी इस्लामिक देश की अपेक्षा भारत में अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं। वे पाकिस्तान जाने की अपेक्षा भारत में ही रहना पसंद करते हैं। भारत में जितनी आजादी मुसलमानों को है, क्या उतनी कहीं और है? मान सकते हैं कि लोकतंत्र की सफलता इस बात से तय होती होगी कि वहाँ अल्पसंख्यक कितने सुरक्षित हैं? हामिद साहब भारत में अल्पसंख्यक सुरक्षित ही नहीं है, बल्कि सफलताएं भी अर्जित कर रहे हैं। भारत के प्रत्येक क्षेत्र में मुस्लिम शीर्ष तक पहुँचे हैं। लोकप्रियता अर्जित की है। राजनीति के क्षेत्र में भी अपना नेतृत्व दिया है। हामिद अंसारी साहब का परिवार और वे स्वयं भी भारतीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय भी पूरे आनंद के साथ भारत-भूमि पर जीवन जी रहे हैं। उपराष्ट्रपति जैसे पद को सुशोभित करने वाले और उच्च शिक्षित व्यक्ति को ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए, जिससे देश के विभिन्न समुदायों में नकारात्मक भाव उत्पन्न हों। उन्हें मुस्लिम समाज को प्रेरित और सकारात्मकता की ओर अग्रेषित करने का प्रयास करना चाहिए था। जाते-जाते बड़प्पन दिखाना चाहिए था। बतौर उपराष्ट्रपति अपने अंतिम वक्तव्य में सकारात्मक बात कहनी चाहिए थी।
भारत में 'जय श्री राम' कहने पर फतवे जारी होने लगें, तब यह विचार जरूर करना चाहिए कि क्या देश में सब कुछ ठीक चल रहा है? सभी मत-पंथ के प्रवर्तक यह दावा करते हैं कि उनका पंथ सर्व-धर्म सद्भाव की सीख देता है। प्रत्येक संप्रदाय के रहनुमा कहते हैं कि उनके पंथ की प्राथमिक शिक्षाओं में शामिल है कि औरों के धर्म का सम्मान करना चाहिए। अगर इस्लाम के संबंध में भी यह सच है, तब प्रश्न उठता है कि 'जय श्री राम' बोलने वाले बिहार सरकार के मंत्री खुर्शीद आलम के खिलाफ फतवा जारी होना चाहिए था या फिर खुर्शीद आलम के खिलाफ फतवा जारी करने वाले मुफ्ती सोहेल कासमी का बहिष्कार होना चाहिए था? मुफ्ती फतवा जारी करने तक ही नहीं रुका है, बल्कि उसने कहा है कि राम और रहीम एक साथ नहीं रह सकते। यह कैसी अलगाववादी सोच को प्रस्तुत कर रहे हैं? क्या कुरान में यह लिखा है कि दो विभिन्न विचार एक-दूसरे के साथ एक-दूसरे का सम्मान करते हुए नहीं रह सकते?
भारत के राज्य जम्मू-कश्मीर में बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक का मुद्दा बड़ी बहस में तब्दील हो सकता है। इस मसले पर बहस होनी भी चाहिए। देश के उच्चतम न्यायालय ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए कहा है कि केंद्र और राज्य सरकार को आपस में बातचीत करके इस मसले का हल खोजना चाहिए चाहिए कि राज्य में मुस्लिम समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा मिलते रहने देना चाहिए या नहीं? उन्होंने चार सप्ताह में इस मुद्दे पर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। ध्यान देने की बात यह है कि उच्चतम न्यायालय ने इस मुद्दे को महत्त्वपूर्ण माना है। यकीनन यह बहुत महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। राज्य के लिए ही नहीं, बल्कि देश के संदर्भ में भी इस पर व्यापक बहस की जानी चाहिए। आखिर किस सीमा तक किसी समाज को अल्पसंख्यक माना जाना चाहिए? अल्पसंख्यक दर्जे को पुन: परिभाषित करने की जरूरत है। यह संवेदनशील मुद्दा है। इस पर बहस के अपने खतरे भी हैं। लेकिन, तमाम खतरों के प्रभाव को कम करने के उपाय खोजते हुए इस विषय पर एक गंभीर और सकारात्मक बहस की जरूरत है।
भारत के स्वाभिमान और हिंदू आस्था से जुड़े राम मंदिर निर्माण का प्रश्न एक बार फिर बहस के लिए प्रस्तुत है। उच्चतम न्यायालय की एक अनुकरणीय टिप्पणी के बाद उम्मीद बंधी है कि हिंदू-मुस्लिम राम मंदिर निर्माण के मसले पर आपसी सहमति से कोई राह निकालने के लिए आगे आएंगे। राम मंदिर निर्माण पर देश में एक सार्थक और सकारात्मक संवाद भी प्रारंभ किया जा सकता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वह राम मंदिर निर्माण के मसले पर मध्यस्थता करने को तैयार हैं, यदि दोनों पक्ष न्यायालय के बाहर सहमति बनाने को राजी हों। उन्होंने यह भी कहा कि यह एक संवेदनशील और भावनाओं से जुड़ा मसला है। अच्छा यही होगा कि इसे बातचीत से सुलझाया जाए। निश्चित ही मुख्य न्यायमूर्ति का परामर्श उचित है। दोनों पक्षों को उदार मन के साथ इस दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए। मुख्य न्यायमूर्ति का विचार इस विवाद के समाधान की आदर्श पद्धति है। समूचा देश भी यही चाहता है भगवान राम का मंदिर अयोध्या में बिना किसी विवाद के बहुत पहले ही आपसी सहमति से बन जाना चाहिए था। लेकिन, यह राह इतनी आसान भी नहीं है। इस राह पर चलने में कुछ लोगों के कदम ठिठकेंगे, तो कुछ लोग इस राह आना ही नहीं चाहेंगे। उच्चतम न्यायालय के मंतव्य पर आईं प्रतिक्रियाओं से यह स्पष्ट भी हो गया है कि कुछ लोगों को यह सुझाव रास नहीं आया है।
उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद से जिन्हें प्रदेश में मुसलमानों के लिए संकट दिखाई दे रहा है, वे लोग पूर्वाग्रह से ग्रसित तो हैं ही, भारतीय समाज के लिए भी खतरनाक हैं। उनके पूर्वाग्रह से कहीं अधिक उनका बर्ताव और उनकी विचार प्रक्रिया सामाजिक ताने-बाने के लिए ठीक नहीं है। योगी आदित्यनाथ को मुस्लिम समाज के लिए हौव्वा बनाकर यह लोग उत्तरप्रदेश का सामाजिक सौहार्द बिगाडऩा चाहते हैं। योगी आदित्यनाथ सांप्रदायिक हैं, वह कट्टर हैं, मुख्यमंत्री पद के लिए उनके नाम की घोषणा के बाद से ही मुस्लिम समुदाय के लोग दहशत में है, अब उत्तरप्रदेश में मुस्लिमों के बुरे दिन आ गए, उन्हें मारा-पीटा जाएगा और उनका शोषण होगा, इस प्रकार की निराधार आशंकाएं व्यक्त करने का और क्या अर्थ हो सकता है? दरअसल, मुसलमानों को योगी आदित्यनाथ का डर दिखाने वाले लोग राजनीतिक और वैचारिक मोर्चे पर बुरी तरह परास्त हो चुके हैं। योगी के खिलाफ अनर्गल बयानबाजी और लिखत-पढ़त करके यह लोग अपनी हताशा को उजागर कर रहे हैं। राजनीतिक तौर पर निराश-हताश और विभाजनकारी मानसिकता के इन लोगों को समझ लेना चाहिए कि उत्तरप्रदेश की जनता क्या, अब देश भी उनके कुतर्कों को सुनने के लिए तैयार नहीं है। उत्तरप्रदेश के रण में पराजय का मुंह देखने वाली कांग्रेस, बसपा और सपा से कहीं अधिक बेचैनी कम्युनिस्ट खेमे में दिखाई दे रही है। कम्युनिस्ट खेमे के राजनेता, विचारक और पत्रकार ठीक उसी प्रकार के 'फ्रस्टेशन' को प्रकट कर रहे हैं, जैसा कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री चुने जाने पर किया गया था। उस समय इन्होंने नरेन्द्र मोदी के नाम पर देश के मुसलमानों को डराने और भड़काने का प्रयास किया, आज योगी आदित्यनाथ के नाम पर कर रहे हैं। देश के मुसलमानों पर न तो नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से कोई खतरा आया है और न ही योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से कोई संकट खड़ा होने वाला है।
असम के 46 मौलवियों की कट्टरपंथी सोच को 16 वर्षीय गायिका नाहिद आफरीन ने करारा जवाब दिया है। नाहिद ने कहा है कि खुदा ने उसे गायिका का हुनर दिया है, संगीत की अनदेखी करना मतलब खुदा की अनदेखी होगा। वह मरते दम तक संगीत से जुड़ी रहेंगी और वह किसी फतवे से नहीं डरती हैं। इंडियन आइडल से प्रसिद्ध हुई नाहिद आफरीन ने हाल में आतंकवाद और आईएसआईएस के विरोध में गीत गाए थे। आशंका है कि कट्टरपंथियों को यह बात चुभ गई होगी। सुरीली आवाज का गला घोंटने के लिए कट्टरपंथियों ने 46 फरमान जारी करते हुए नाहिद को 25 मार्च को संगीत कार्यक्रम की प्रस्तुति नहीं देने के लिए धमकाया है। आफरीन के खिलाफ मंगलवार को मध्य असम के होजई और नागांव जिलों में कई पर्चे बांटे गए, जिनमें असमिया भाषा में फतवा और फतवा जारी करने वाले लोगों के नाम हैं। इन फतवों के अनुसार, 25 मार्च को असम के लंका इलाके के उदाली सोनई बीबी महाविद्यालय में 16 साल की नाहिद को गीत गाना है, जिसे पूरी तरह से शरिया के खिलाफ बताया गया है। फतवों की माने तो संगीत संध्या जैसी चीजें पूरी तरह से शरिया के खिलाफ हैं। दरअसल, इन मौलवियों के दिमाग में जहर भरा हुआ है। यही कारण है कि उन्हें एक बच्ची की प्रतिभा दिखाई नहीं दे रही। इन्हें भारत में इस्लाम और संगीत के रिश्ते की समझ भी नहीं है। 21वीं सदी में आगे बढ़ने की जगह इस्लाम के यह ठेकेदार अपनी कौम को पीछे धकेलने का निंदनीय कृत्य कर रहे हैं। अब भी यह कूपमंढूक बने रहना चाहते हैं।
जुमे की नमाज के लिए मुस्लिम कर्मचारियों को 90 मिनट का अवकाश देकर उत्तराखंड सरकार ने सिद्ध कर दिया है कि कांग्रेस ने सेक्युलरिज्म का लबादा भर ओढ़ रखा है, असल में उससे बढ़ा सांप्रदायिक दल कोई और नहीं है। कांग्रेस के साथ-साथ उन तमाम बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों के सेक्युलरिज्म की पोलपट्टी भी खुल गई है, जो भारतीय जनता पार्टी या किसी हिंदूवादी संगठन के किसी नेता की 'कोरी बयानबाजी' से आहत होकर 'भारत में सेक्युलरिज्म पर खतरे' का ढोल पीटने लगते हैं, लेकिन यहाँ राज्य सरकार के निर्णय पर अजीब खामोशी पसरी हुई है। उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार के घोर सांप्रदायिक निर्णय के खिलाफ तथाकथित प्रगतिशील और बुद्धिजीवी समूहों से कोई आपत्ति नहीं आई है। सोचिए, यदि किसी भाजपा शासित राज्य में निर्णय हुआ होता कि सोमवार को भगवान शिव पर जल चढ़ाने के लिए हिंदू कर्मचारियों-अधिकारियों को 90 मिनट का अवकाश दिया जाएगा, तब देश में किस प्रकार का वातावरण बनाया जाता? सेक्युलरिज्म के नाम पर यह दोगलापन पहली बार उजागर नहीं हुआ है। यह विडम्बना है कि वर्षों से इस देश में वोटबैंक की राजनीति के कारण समाज को बाँटने का काम कांग्रेस और उसके प्रगतिशील साथियों ने किया है, लेकिन सांप्रदायिक दल होने की बदनामी समान नागरिक संहिता की माँग करने वाली भारतीय जनता पार्टी के खाते में जबरन डाल दी गई है।
बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा विकराल होती जा रही है। बंगाल की स्थितियाँ देश और समाज के लिए खतरनाक होती जा रही हैं। हालात यह हैं कि मुस्लिम समाज से जुड़े अतिवादियों की दंगई से आजिज आकर कई क्षेत्रों से हिंदुओं को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। बंगाल में हिंदुओं को रहना, व्यापार करना और यहाँ तक की अपनी आस्थाओं का पालन करना भी कठिन हो गया है। मंदिरों में पथराव, मूर्तियों का खंडित किया जाना, हिंदू बस्तियों में आगजनी, हिंदुओं की दुकानों को लूटने जैसी घटनाओं की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। दंगइयों के हौसले इतने बुलंद हैं कि पुलिस थानों को भी खाक करने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता है। देश को अच्छे से याद है कि मालदा में ढाई लाख लोगों की भीड़ ने किस कदर आतंक फैलाया था। अब फिर से मालदा की पुनरावृत्ति की खबरें सामने आ रही हैं।
तीन तलाक के मुद्दे पर सरकार का हलफनामा स्वागत योग्य है। मुस्लिम महिलाओं की सामाजिक स्थिति और उनके संवैधानिक अधिकार को मजबूत करने के लिए केन्द्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में दायर अपने हलफनामे में स्पष्ट कहा है कि तीन तलाक महिलाओं के साथ लैंगिग भेदभाव करता है। केन्द्र सरकार ने उचित ही कहा है कि पर्सनल लॉ के आधार पर किसी को संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। महिलाओं की गरिमा के साथ किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता। केन्द्र सरकार ने यहाँ तक कहा है कि तीन तलाक, हलाला निकाह और बहुविवाह इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है। सरकार का यह कहना उचित ही है। यदि यह प्रथाएँ इस्लाम का अभिन्न अंग होती, तब इस्लामिक देशों में इन पर प्रतिबंध संभव होता क्या? दुनिया के अनेक प्रमुख इस्लामिक मुल्कों में तीन तलाक, हलाला निकाह और बहुविवाह प्रतिबंधित हैं। इसलिए भारत में भी महिलाओं के साथ धर्म और पर्सनल लॉ के नाम पर होने वाली ज्यादती रुकनी चाहिए।